नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ खत्म जरूर हुआ, लेकिन औपचारिक तौर पर अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। 2 सितंबर तक दोनों सदनों का प्रोरोगेशन नहीं हुआ है। यानी 20 दिन बाद भी मानसून सत्र तकनीकी रूप से खुला है। यही असामान्य स्थिति अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गई है।
‘अडजर्न्ड साइन डाई’ और ‘प्रोरोगेशन’ में अंतर
संसदीय प्रक्रिया में ‘अडजर्न्ड साइन डाई’ और ‘प्रोरोगेशन’ एक ही चीज नहीं हैं। संसद सत्र खत्म होने के बाद दोनों सदनों को साइन डाई स्थगित किया जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति, केंद्र सरकार की सलाह पर, सत्र को औपचारिक रूप से प्रोरोग करते हैं। आम तौर पर यह प्रक्रिया कुछ दिनों में पूरी हो जाती है। यही देरी विपक्ष को सवाल उठाने का मौका दे रही है कि जब मानसून सत्र का काम पूरा हो चुका है तो उसे औपचारिक रूप से खत्म क्यों नहीं किया गया? इसकी वजह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद को प्रोरोग किए बिना सरकार के पास इसी सत्र को दोबारा बुलाने का विकल्प खुला रहता है।
राजनीतिक गणित: क्या हो सकता है अगला एजेंडा?
लेकिन राजनीतिक गणित साफ है, अगर मौजूदा सत्र को अभी प्रोरोग नहीं किया जाता, तो उसके दोबारा बुलाए जाने की संभावना बनी रहती है। ऐसे में 20 दिनों से लंबित प्रोरोगेशन सिर्फ संसदीय प्रक्रिया का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि यह इस संभावना का संकेत बन जाता है कि सरकार जरूरत पड़ने पर सांसदों को फिर सदन में बुला सकती है।
अब इतने दिन के ठहराव का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगली बार संसद की घंटी बजी तो एजेंडा क्या होगा। महिला आरक्षण का कानून पहले ही 2023 में संसद से पारित हो चुका है, लेकिन उसका लागू होना परिसीमन से जुड़ा है। सरकार का अप्रैल का प्रस्ताव इसी कड़ी को तेज करते हुए 2027 की जनगणना का इंतजार किए बिना परिसीमन और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता खोलना चाहता था।
यही प्रस्ताव अप्रैल में सत्ता पक्ष के लिए अटक गया था। अब अगर सितंबर में संसद की कोई विशेष बैठक होती है, तो उसके केंद्र में सिर्फ महिलाओं को आरक्षण देने का सवाल नहीं, बल्कि लोकसभा का अगला राजनीतिक नक्शा भी हो सकता है। सरकार के सामने अप्रैल में छूटी दो-तिहाई बहुमत की कड़ी परीक्षा फिर होगी, जबकि विपक्ष के सामने यह सवाल रहेगा कि वह महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए परिसीमन की प्रक्रिया और राज्यों के प्रतिनिधित्व में संभावित बदलाव का विरोध कैसे करता है।
निष्कर्ष
इसलिए फिलहाल संसद के दरवाजे बंद जरूर हैं, लेकिन मामला बंद नहीं हुआ है। प्रोरोगेशन की मुहर जितनी देर से लगती है, उतनी देर तक यह संभावना खुली रहती है कि अगली बार जब सदन खुले, तो चर्चा सिर्फ महिलाओं की सीटों की नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में किस राज्य की कितनी राजनीतिक ताकत होगी, इसकी हो।




