
रुखसार, तहलका
नई दिल्ली । 21 सितंबर, 2026 । बिहार के जमुई में कोचिंग से लौट रहे दसवीं कक्षा के नाबालिग छात्र और छात्रा को कथित तौर पर रास्ते में रोककर उनके साथ मारपीट और बदसलूकी का मामला सामने आया है। घटना के वीडियो में कई युवक दोनों को घेरते दिखाई दे रहे हैं। छात्रा लोगों से हाथ जोड़कर उन्हें जाने देने की गुहार लगाती नजर आती है, जबकि छात्र के साथ भी मारपीट की गई। पुलिस के अनुसार घटना 19 सितंबर की शाम जमुई के नगर थाना क्षेत्र में हुई। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज की है और सात लोगों को नामजद किया गया है। इनमें से तीन आरोपियों की गिरफ्तारी की पुष्टि पुलिस ने की है। मामले में पॉक्सो अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की जा रही है।
यह मामला सिर्फ एक वायरल वीडियो तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ दिनों में बिहार और दिल्ली से नाबालिग लड़कियों के साथ यौन अपराध और हिंसा के कई मामले सामने आए हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या बेटियों की सुरक्षा के लिए मौजूद कानून और व्यवस्था जमीन पर उतनी ही प्रभावी है, जितनी कागज पर दिखाई देती है?
जमुई में आखिर हुआ क्या?
पुलिस और सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले दोनों नाबालिग कोचिंग के बाद स्कूटी से लौट रहे थे। इसी दौरान कुछ युवकों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया।
वायरल वीडियो में दोनों को घेरकर पूछताछ करते और उनके साथ कथित तौर पर मारपीट करते हुए देखा जा सकता है। एक वीडियो में छात्रा को हाथ जोड़कर जाने देने की गुहार लगाते देखा गया। दूसरे वीडियो में एक युवक छात्रा को पकड़ता और खींचता हुआ दिखाई देता है।
पुलिस के अनुसार घटना 19 सितंबर की शाम करीब छह से सात बजे के बीच हुई। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने दोनों नाबालिगों की पहचान की और उनके बयान के आधार पर कार्रवाई शुरू की।
मामले में सात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। बाकी आरोपियों की तलाश जारी है।
सवाल सिर्फ जमुई का नहीं, बिहार की बेटियों की सुरक्षा का भी है
राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या पिछले वर्षों में बढ़ी है।
2020 में दर्ज 15,359 मामलों की तुलना में 2024 में यह संख्या बढ़कर 27,359 हो गई। यानी दर्ज मामलों की संख्या में लगभग 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2024 के आंकड़े के हिसाब से बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध के औसतन करीब 75 मामले प्रतिदिन दर्ज हुए। 75 मामले प्रतिदिन सिर्फ छेड़छाड़ या यौन अपराध के मामले नहीं हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध की इस श्रेणी में कई तरह के अपराध शामिल होते हैं।
दिल्ली में भी तस्वीर चिंताजनक
दिल्ली में भी महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों का आंकड़ा बड़ा है।
2024 में बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 27,359 मामले दर्ज हुए, जबकि दिल्ली में 13,396 मामले दर्ज किए गए।
दिल्ली में 2020 के मुकाबले 2024 में दर्ज मामलों की संख्या करीब 33 प्रतिशत अधिक रही। हालांकि केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वास्तविक घटनाएं भी उसी अनुपात में बढ़ी हैं। अपराध की रिपोर्टिंग, प्राथमिकी दर्ज होने की प्रक्रिया और पुलिस तक शिकायत पहुंचने की स्थिति भी आंकड़ों को प्रभावित करती है।
क्या अपराध बढ़े हैं या शिकायतें ज्यादा दर्ज हो रही हैं?
यही इस पूरी तस्वीर का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़े दर्ज मामलों को दिखाते हैं। वे उन घटनाओं को पूरी तरह नहीं दिखाते जो पुलिस तक पहुंच ही नहीं पातीं।
दूसरी तरफ, प्राथमिकी दर्ज होने की बेहतर व्यवस्था और शिकायतों पर पुलिस की बढ़ी हुई कार्रवाई भी दर्ज मामलों की संख्या बढ़ा सकती है। दर्ज मामलों की संख्या लगातार बढ़ी है और यह कानून-व्यवस्था तथा महिला सुरक्षा की गंभीर समीक्षा की मांग करती है।
मामला दर्ज होने के बाद सजा कितनी?
2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े मामलों के न्यायालयी निपटारे में बिहार में 1,285 मामलों में दोषसिद्धि हुई। इनमें 1,114 मामले पिछले वर्षों से लंबित थे और 171 मामले उस वर्ष के मामलों में से थे।
दिल्ली में 2023 में 1,487 मामलों में दोषसिद्धि हुई। इनमें 1,374 मामले पिछले वर्षों से संबंधित थे और 113 मामले उसी वर्ष के मामलों में से थे। न्यायालय में एक वर्ष में जिन मामलों का फैसला होता है, उनमें बड़ी संख्या पुराने मामलों की होती है।
2022 की तस्वीर
2022 में बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में न्यायालयों में विचारण के लिए 1,15,796 मामले लंबित थे। उस वर्ष 1,059 मामलों में दोषसिद्धि हुई।
दिल्ली में 2022 के अंत में 78,777 मामले विचारण के लिए लंबित थे और 442 मामलों में दोषसिद्धि हुई।
बिहार में 2022 के लिए न्यायालय द्वारा निपटाए गए मामलों में दोषसिद्धि दर 60.9 प्रतिशत और दिल्ली में 32 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
कानून इतना सख्त है, फिर अपराधियों को डर क्यों नहीं?
किसी अपराध में न्याय की पूरी प्रक्रिया कई चरणों से गुजरती है—
घटना → शिकायत → प्राथमिकी → जांच → गिरफ्तारी → साक्ष्य → आरोपपत्र → न्यायालय में सुनवाई → फैसला → सजा
इनमें से किसी भी चरण में देरी होने पर अंतिम फैसला प्रभावित हो सकता है।
जमुई मामले में पुलिस का कहना है कि घटना के बाद तत्काल शिकायत नहीं मिली थी और वायरल वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने पीड़ितों की पहचान कर कार्रवाई शुरू की।
नाबालिग के मामले में पॉक्सो कानून क्या कहता है?
यदि किसी बच्चे के साथ यौन अपराध होता है तो बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) लागू होता है।
कानून के अनुसार, यौन मंशा से बच्चे के शरीर के संवेदनशील अंगों को छूना या बिना प्रवेश के यौन मंशा से शारीरिक संपर्क करना यौन हमला माना जाता है।
ऐसे अपराध के लिए कम से कम तीन वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष तक की जेल तथा जुर्माने का प्रावधान है।
यदि अपराध गंभीर परिस्थितियों में किया गया हो और वह गंभीर यौन हमला माना जाए तो सजा और कठोर हो सकती है।
वहीं, बच्चे के साथ प्रवेशात्मक यौन हमला साबित होने पर सजा अधिक कठोर है। गंभीर परिस्थितियों वाले प्रवेशात्मक यौन हमले के मामले में कम से कम 20 वर्ष की कठोर कैद से लेकर आजीवन कारावास या कुछ परिस्थितियों में मृत्युदंड तक का प्रावधान है।
इसलिए जमुई मामले में अंतिम रूप से कौन-कौन सी धाराएं लागू होंगी और कितनी सजा हो सकती है, यह जांच में सामने आने वाले तथ्यों और न्यायालय के निष्कर्ष पर निर्भर करेगा।
पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में भी सामने आए गंभीर मामले
जमुई की घटना के कुछ ही दिनों के भीतर दिल्ली से भी नाबालिगों के खिलाफ गंभीर अपराध के मामले सामने आए हैं।
सदर बाजार
दिल्ली के सदर बाजार में 16 सितंबर की रात एक छठी कक्षा की छात्रा के साथ कथित यौन अपराध का मामला सामने आया। पुलिस के अनुसार बच्ची सामान खरीदने के लिए निकली थी और एक दुकान में उसे कथित तौर पर बहला-फुसलाकर ले जाया गया। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। मामले में पॉक्सो अधिनियम और दुष्कर्म से संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।
स्वरूप नगर
दिल्ली के स्वरूप नगर में 16 वर्षीय किशोरी के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और हत्या का मामला सामने आया। पुलिस ने मामले में एक 19 वर्षीय युवक और तीन नाबालिगों को पकड़ा है। पुलिस के अनुसार जांच में सीसीटीवी फुटेज और एक वाहन के माध्यम से आरोपियों तक पहुंचा गया। तीन नाबालिगों को किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश किया गया। पुलिस ने उन्हें वयस्क के रूप में चलाए जाने वाले मुकदमे के लिए अदालत से अनुमति मांगने की बात कही है।
कार्रवाई में देरी का सवाल आखिर क्यों उठता है?
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध में केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है।
एक प्रभावी व्यवस्था में यह भी देखा जाना चाहिए कि
- शिकायत कब मिली?
- प्राथमिकी कब दर्ज हुई?
- आरोपी की पहचान कितनी जल्दी हुई?
- गिरफ्तारी कब हुई?
- साक्ष्य कितनी जल्दी जुटाए गए?
- आरोपपत्र कब दाखिल हुआ?
- सुनवाई कब शुरू हुई?
- मुकदमा कितने समय तक चला?
- अंत में दोषसिद्धि हुई या आरोपी बरी हुआ?
जमुई मामले में तीन गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, लेकिन गिरफ्तारी को सजा नहीं माना जा सकता।
इसी तरह दिल्ली के मामलों में भी गिरफ्तारी और जांच की प्रगति को अंतिम न्याय नहीं माना जा सकता।
क्या कानून का डर खत्म हो रहा है?
किसी अपराधी के मन में कानून का डर कितना है, इसे सीधे आंकड़ों से मापना मुश्किल है।
लेकिन आपराधिक न्याय व्यवस्था में पकड़े जाने की निश्चितता, निष्पक्ष जांच और समय पर न्याय महत्वपूर्ण हैं।
अगर अपराध के बाद आरोपी की पहचान नहीं हो, जांच लंबी चले, साक्ष्य कमजोर पड़ जाएं या मुकदमे वर्षों तक लंबित रहें, तो न्याय मिलने में देरी होती है।
यही वजह है कि महिला सुरक्षा की चर्चा केवल “कितने आरोपी गिरफ्तार हुए” तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
सवाल यह भी होना चाहिए—
- कितने मामलों में आरोपपत्र दाखिल हुआ?
- कितने मामलों की सुनवाई पूरी हुई?
- कितने मामलों में दोषसिद्धि हुई?
- और पीड़ित को न्याय मिलने में कितना समय लगा?
जमुई की घटना हमें क्या सवाल पूछने पर मजबूर करती है?
एक नाबालिग लड़की को सार्वजनिक सड़क पर कथित तौर पर घेरना, उसके साथ बदसलूकी करना और पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाया जाना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है। यह सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कई सवाल सामने लाता है।
बिहार में 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 15,359 मामले दर्ज हुए थे। 2024 में यह संख्या बढ़कर 27,359 हो गई। दिल्ली में 2020 के 10,093 मामलों के मुकाबले 2024 में 13,396 मामले दर्ज हुए।
इन आंकड़ों को वास्तविक घटनाओं की पूरी तस्वीर नहीं माना जा सकता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों का बोझ कम नहीं हुआ है।
कानून मौजूद है, पुलिस कार्रवाई भी होती है, आरोपी गिरफ्तार भी होते हैं—फिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों सामने आती हैं?
इस सवाल का जवाब केवल सख्त कानून में नहीं, बल्कि तेज जांच, मजबूत साक्ष्य, समयबद्ध न्याय, पीड़ितों की सुरक्षा और कानून के प्रभावी पालन में छिपा है।
जमुई मामले में अब असली परीक्षा गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि जांच से लेकर न्यायालय के अंतिम फैसले तक की होगी।



