
— एम. रियाज़ हाशमी, तहलका
‘तहलका’ विश्लेषण: सहारनपुर की हरौड़ा सीट से दो बार मुख्यमंत्री बन चुकी मायावती, 2007 में जिले की 7 में 5 सीटें जीतने वाली पार्टी का अब विधानसभा में एक भी विधायक नहीं; ऐसे में दलित राजनीति की खाली होती जमीन पर भाजपा का फोकस
सहारनपुर । 22 सितंबर, 2026 । उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में सहारनपुर सिर्फ पश्चिमी यूपी का एक जिला नहीं है। यह वह राजनीतिक जमीन है, जहां से भाजपा कई बार अपने चुनावी अभियान का आगाज करती रही है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों तथा 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अभियान की शुरुआत सहारनपुर से की थी। 2027 के चुनाव से पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का यहां पहुंचना इसी राजनीतिक परंपरा की अगली कड़ी है।
लेकिन इस बार नबीन के दौरे का सबसे महत्वपूर्ण संदेश संगठन की बैठक से ज्यादा दलित राजनीति से जुड़ा दिखाई देता है। रविदास मंदिर में पूजा और उसके बाद दलित भाजपा कार्यकर्ता अजब सिंह के घर जाकर भोजन- इन दोनों कार्यक्रमों को एक साथ देखें तो सवाल सिर्फ सामाजिक समरसता का नहीं, बल्कि उस वोट समूह तक भाजपा की पहुंच का भी है, जो कभी इसी इलाके में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत रहा है।
सहारनपुर में दलित सिर्फ वोटर नहीं, सत्ता का समीकरण है
सहारनपुर जिले की कुल आबादी में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी 22.05 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा बढ़कर 26.14 प्रतिशत हो जाता है। रामपुर मनिहारान (आरक्षित) सीट पर दलितों की आबादी 35 प्रतिशत तक है। जिले के चुनावी गणित में दलित आबादी को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं है। इसी सामाजिक आधार ने कभी सहारनपुर को बसपा का मजबूत इलाका बनाया था। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने जिले की तत्कालीन सात विधानसभा सीटों में से पांच पर जीत दर्ज की थी। उस समय नकुड़ (अब गंगोह), सरसावा (अब नकुड़), नागल (अब रामपुर मनिहारान सुरक्षित), देवबंद और हरौड़ा सुरक्षित (अब सहारनपुर देहात) सीटें बसपा के खाते में गई थीं। यही वह चुनाव था जब मायावती के नेतृत्व में बसपा ने पूरे उत्तर प्रदेश में 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। सहारनपुर इस जीत के महत्वपूर्ण जिलों में था।
हरौड़ा से दो बार जीतीं मायावती, यहीं से पहुंची सीएम कुर्सी तक
सहारनपुर की दलित राजनीति की कहानी हरौड़ा विधानसभा सीट के बिना पूरी नहीं होती। हरौड़ा (अनुसूचित जाति) से मायावती ने 1996 और 2002 में चुनाव जीता था। 2002 में उन्हें 47.76 प्रतिशत वोट मिले थे। इसी राजनीतिक दौर में मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। यानी हरौड़ा केवल एक विधानसभा सीट नहीं थी; यह मायावती के राजनीतिक सफर और पश्चिमी यूपी में बसपा के विस्तार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। 2008 के परिसीमन के बाद हरौड़ा सीट समाप्त हो गई और उसके बड़े हिस्से को मौजूदा सहारनपुर देहात सीट में शामिल किया गया। आज वही राजनीतिक भूगोल भाजपा के लिए नए सामाजिक समीकरण बनाने की प्रयोगशाला बनता दिखाई दे रहा है।
माया का गढ़ खाली हुआ, भाजपा इसी खालीपन को भरने चाहती है
बसपा की मौजूदा स्थिति इस बदलाव को और महत्वपूर्ण बनाती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पूरे सूबे में बसपा सिर्फ रसड़ा की एक सीट जीत सकी थी। अगस्त 2026 में विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं बचा। यही वह राजनीतिक रिक्तता है जिस पर अब कई दलों की नजर है। बसपा का उत्तर प्रदेश में वोट आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। 2022 में उसे 12.88 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2024 लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर करीब 9.39 प्रतिशत रहा। यानी सीटों में तब्दील न होने के बावजूद एक बड़ा सामाजिक वोट आधार अब भी मौजूद है। इसलिए 2027 से पहले दलित वोट को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। समाजवादी पार्टी पीडीए- पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के जरिए अपना आधार विस्तार करने की कोशिश कर रही है, जबकि दूसरे दल भी बसपा के सामाजिक आधार तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
भाजपा की रणनीति: सत्ता विरोधी माहौल की काट में दलित संपर्क?
भाजपा के सामने 2027 में एक स्वाभाविक चुनौती सत्ता विरोधी भावना को संभालने की भी होगी। चुनावी राजनीति में अक्सर सत्तारूढ़ दल को कुछ वर्गों में स्थानीय असंतोष, उम्मीदवारों के खिलाफ नाराजगी और सरकार के प्रति एंटी-इनकंबेंसी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में भाजपा की रणनीति का एक हिस्सा उन सामाजिक समूहों में अपनी पकड़ मजबूत करना हो सकता है, जहां से उसे अतिरिक्त समर्थन मिल सके। 8-10 प्रतिशत वोट के संभावित एंटी-इनकंबेंसी प्रभाव की भरपाई दलित समर्थन से करने की बात राजनीतिक विश्लेषण के तौर पर कही जा सकती है, लेकिन इसे कोई स्थापित या सार्वभौमिक चुनावी आंकड़ा नहीं माना जा सकता। इसलिए नबीन का दलित कार्यकर्ता के घर भोजन केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रम मानकर छोड़ देना शायद इस दौरे के राजनीतिक संदर्भ को छोटा कर देगा।
सहारनपुर में नंबर गेम भी महत्वपूर्ण, गिनती का प्रतीक भी
सहारनपुर की एक और खासियत इसका चुनावी भूगोल है। मौजूदा परिसीमन में जिले की विधानसभा सीटों की क्रम संख्या 1 से 7 तक है- बेहट, नकुड़, सहारनपुर नगर, सहारनपुर देहात, देवबंद, रामपुर मनिहारान और गंगोह। लोकसभा सूची में भी सहारनपुर सीट का क्रमांक 1 है। इसलिए भाजपा के लिए सहारनपुर से अभियान शुरू करना सिर्फ परंपरा नहीं, पश्चिमी यूपी के बड़े राजनीतिक मैदान में शुरुआती संदेश देने की कवायद भी है।
रविदास मंदिर से दलित कार्यकर्ता के घर तक एक ही राजनीतिक फ्रेम
नितिन नबीन ने रविदास मंदिर में पूजा की, स्थानीय लोगों से संवाद किया और फिर दलित कार्यकर्ता अजब सिंह के घर भोजन किया। इसके साथ उन्होंने विकास, एक्सप्रेस-वे, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ब्रह्मोस जैसे मुद्दों को भी अपने राजनीतिक संदेश में जोड़ा। यानी भाजपा का संदेश दो स्तरों पर है- विकास के जरिए शासन की उपलब्धियां और सामाजिक संपर्क के जरिए नए वोट समूहों तक पहुंच। सहारनपुर में इस रणनीति का सबसे बड़ा परीक्षण दलित राजनीति के स्तर पर होगा। जिस जिले को कभी बसपा के मजबूत किले के तौर पर देखा जाता था, वहां अब भाजपा यह दिखाना चाहती है कि मायावती की राजनीतिक विरासत से जुड़ा दलित वोट अब किसी एक दल का स्थायी चुनावी आधार नहीं है।
और शायद यही वजह है कि 2027 की चुनावी पटकथा में सहारनपुर से निकलने वाला सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि भाजपा कितनी सीटें जीतती है, बल्कि यह होगा कि बसपा के कमजोर पड़ने के बाद उसके सामाजिक आधार का कितना हिस्सा किस राजनीतिक खेमे की ओर जाता है।



