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आपातकाल की तरफ़ बढ़ रहा पाकिस्तान!

एक अंतराल के बाद पाकिस्तानी सरकार पर फिर हावी हो रही है सेना

पाकिस्तान की घटनाएँ संकेत दे रही हैं कि वहाँ आपातकाल या मार्शल ला का ख़तरा बढ़ रहा है। हाल के दशकों में पहली बार जनता खुलेआम सेना के ख़िलाफ़ बोल रही है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान, जिन्हें जिहादी गुटों और सेना के भीतर कई अफ़सरों का समर्थन है; अब सेना में अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ खुलकर डट गये हैं। हाल के वर्षों में जो सेना सरकार के मामलों से दूर दिख रही थी, अब सरकार पर हावी होने लगी है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की जिस तरीके से पाकिस्तानी रेंजर्स ने गिरफ़्तारी की, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी रिहाई की और बाद में इस्लामाबाद हाई कोर्ट से उन्हें जमानत मिली, उससे यह तो तय हो गया है कि सेना से लेकर न्यायपालिका तक में इमरान से सहानुभूति रखने वाले लोग हैं। इमरान जल्द चुनाव करवाने पर जो दे रहे हैं, पाकिस्तान सरकार और सेना दोनों ही अभी चुनाव नहीं चाहते।

वर्तमान हालत में पाकिस्तान एक तरह से गृह युद्ध का सामना कर रहा है। पाकिस्तान में आने वाले दिन काफ़ी कठिन होंगे। राजनीतिक उथलपुथल होगी और सेना का सत्ता में हस्तक्षेप बढ़ेगा। इमरान ख़ान लम्बे समय से सेना को खटक रहे हैं। यह जगज़ाहिर है कि सेनाध्यक्ष जनरल सईद आसिम मुनीर इमरान ख़ान को पसन्द नहीं करते। अब इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी और रिहाई के घटनाक्रम के बाद तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के लोगों को अपने नेता की हत्या की आशंका सत्ता रही है। ज़ाहिर है पहले से आर्थिक संकट में फँसा पाकिस्तान अब गृह युद्ध जैसी स्थिति की तरफ़ बढ़ रहा है।

इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद यह भी जानकारी सामने आयी थी कि सेना के कुछ अधिकारियों, जिन्होंने, इमरान की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ बातें की थी, के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गयी है। पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार वज़ाहत एस. ख़ान ने ट्वीट में दावा किया कि कमांडर-ढ्ढङ्क कोर लाहौर, लेफ्टिनेंट जनरल सलमान फ़ैयाज़ गनी, को कमान से हटा दिया गया है। उन्होंने रावलपिंडी जनरल हेडक्वार्टर के सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया कि 408 ख़ुफ़िया बटालियन की ओर से 100 से अधिक अधिकारियों और उनकी कुछ पत्नियों को गिरफ़्तार कर लिया गया है। साथ ही इमरान ख़ान का समर्थन करने को लेकर जाँच की जा रही है।

पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड मेजर आदिल राजा ने अपने एक ट्वीट में दावा किया कि लाहौर के कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल सलमान गनी को आर्मी चीफ आसिम मुनीर के ग़ैर-क़ानूनी आदेशों को मानने से इनकार करने के लिए बर्ख़ास्त कर दिया गया। उनके दावे के मुताबिक लाहौर में कोर कमांडर के सीओएस, एक ब्रिगेड कमांडर और एक इन्फेंट्री यूनिट के सीओ को भी बर्ख़ास्त कर दिया गया है। सेना ने इसकी पुष्टि नहीं की; लेकिन यह पाकिस्तान सेना के बीच विभाजन का संकेत देता है।

यह माना जाता है कि पाकिस्तान के सेनाप्रमुख आसिम मुनीर इस बात से चिन्तित हैं कि सेना में जिहादी समर्थक अधिकारी उनके ख़िलाफ़ रुख़ दिखा रहे हैं। यही नहीं, इनमें से ज़्यादातर इमरान ख़ान का समर्थन कर रहे हैं। इमरान ख़ान को जब जमानत मिलने की बात हो रही थी, तो शहबाज़ शरीफ़ सरकार में मंत्री ख़्वाज़ा आसिफ़ ने कहा कि हम (सरकार) उन्हें बाहर नहीं रहने देंगे। आसिफ़ ने चीफ जस्टिस उमर अता बंदियाल की भी इमरान की रिहाई करने के लिए निंदा की। एक मंत्री मरियम ने तो मुख्य न्यायाधीश को ज्वाइन करने तक की सलाह दे दी।

साफ़ संकेत हैं कि पाकिस्तान अब आपातकाल की तरफ़ बढ़ रहा है। शहबाज़ रूप में वहाँ आपातकाल लगा सकती है। इससे चुनाव टालने में भी मदद मिलेगी। वहाँ पहली बार जनता को खुलेआम सेना के ख़िलाफ़ बोलते हुए देखा गया है। साफ़ है कि ऐसा जनता के बीच इमरान ख़ान के समर्थन के कारण ऐसा हो रहा है।

भारत विरोधी मुनीर

पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर को महत्त्वाकांक्षी, घोर भारत विरोधी और सेना के वर्चस्व की कामना रखने वाला सेनाध्यक्ष माना जाता है। आईएसआई पर उनकी मज़बूत पकड़ है। ऐसे में शहबाज़ शरीफ़ कितने दिन तक सेना के दबाव से बच पाएँगे, कहना मुश्किल है। जिस दिन वह सेना का विरोध करेंगे, उनका वही हाल किया जा सकता है, जो हाल के दशकों में राजनीतिक नेतृत्व का पाकिस्तान में किया जाता रहा है।

इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद उनके हज़ारों समर्थक जिस तरह पाकिस्तान के शहरों-सडक़ों पर उतर आये उससे ज़ाहिर होता है कि वहाँ क्या स्थिति होने वाली है। हिंसा पाकिस्तान में आम बात हो गयी है। स्थिति की गम्भीरता इस बात से समझी जा सकती है कि पीटीआई कार्यकर्ता रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय के गेट को तोड़ कर उसके भीतर घुस गये। लाहौर में ख़ान के समर्थकों ने कैंट में कोर कमांडर के घर के परिसर में खड़े कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया।

पाकिस्तान में राजनीतिक विभाजन जिस सीमा तक चला गया है, वहाँ से वापस नहीं आ पाएगा। शहबाज़ शरीफ़ की सरकार में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी जैसे दल भले आज उनके सहयोगी हैं। लेकिन उनसे उनका टकराव भी हो सकता है। इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई और इन दलों के बीच नफ़रत की हद तक टकराव है, और इसमें हिंसा होना आम बात हो गयी है। पाकिस्तान की राजनीतिक विचारधाराएँ अमेरिका, चीन और अफ़$गानिस्तान (तालिबान) के साथ रिश्तों को लेकर भी गहरे से बँटी हुई हैं।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था डूबने की वैसी ही आशंका जतायी जा रही है, जैसी कुछ महीने पहले श्रीलंका की हुई थी। तब वहाँ जनता राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के महलों तक पहुँच गयी थी। पिछले साल पाकिस्तान ने भीषण बाढ़ देखी थी। उससे प्रभावित लाखों लोगों को आज तक राहत नहीं मिल पायी है और लोग आज भी संकट से जूझ रहे हैं।

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति से अमेरिका के थिंक टैंक में भी चिंता है। कारण यह है कि चीन लगातार पाकिस्तान को आर्थिक प्रलोभन देता रहा है। अमेरिका की चिन्ता यह है कि चीन पाकिस्तान और श्रीलंका को दिये जा रहे क़र्ज़ का इस्तेमाल ग़लत फ़ायदा लेने के लिए कर सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डोनाल्ड लू यह बात सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं।

डोनाल्ड ने हाल में कहा- ‘भारत के निकटवर्ती देशों (पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल) को चीनी ऋण के सम्बन्ध में हम इस बात को लेकर बहुत चिन्तित हैं कि इसका इस्तेमाल जबरदस्ती करने के लिए किया जा सकता है। अमेरिका इस क्षेत्र के देशों से बात कर रहा है कि वे अपने निर्णय स्वयं लें और किसी बाहरी भागीदार के दबाव में न रहें। हम भारत से बात कर रहे हैं कि कैसे हम दक्षिण और मध्य एशिया के देशों को स्वतंत्रता पूर्वक अपने निर्णय लेने में मदद करते हैं। वे चीन सहित किसी अन्य बाहरी साझेदार के दबाव में अपने फ़ैसले न लें।’

दो मोर्चों पर जंग

पाकिस्तान अचानक दोराहे पर आ खड़ा हुआ है। आर्थिक मोर्चे पर उसे सामने चुनौतियों का पहले से अम्बार था और अब राजनीतिक चुनौती भी बन गयी है। पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली का आलम यह है कि वहाँ महँगाई की दर बढक़र क़रीब 35 फ़ीसदी हो गयी है। शहबाज़ शरीफ़ एक साल पहले जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे, उनके नेतृत्व वाली पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट की गठबंधन सरकार का अवाम से सबसे बड़ा वादा यह था कि वो पाकिस्तान को आर्थिक संकट से बाहर निकालेंगे। लेकिन इस एक साल पाकिस्तान के आर्थिक हालत बद से बदतर हो गये हैं।

आँकड़े देखें, तो डॉलर के मुक़ाबले पाकिस्तानी रुपये की क़ीमत में पिछले एक साल में 100 रुपये से अधिक की गिरावट दर्ज की गयी है। वहाँ एक डॉलर की क़ीमत मई के पहले हफ़्ते में 285 रुपये थी। यही नहीं ब्याज की दर में 9.5 फ़ीसदी की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गयी है। पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमत में लगभग 150 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। मुफ़्त के अनाज को हासिल करने के लिए लोगों को लड़ते देखा गया है। पाकिस्तान का मुद्रा भंडार 10.5 अरब डॉलर से घटकर क़रीब 4.2 अरब डॉलर तक पहुँच गया है।

अब राजनीतिक संकट पाकिस्तान के लिए नयी मुसीबत बन गया है। शहबाज़ शरीफ़ और उनके सहयोगियों ने एक साल पहले इमरान ख़ान को सत्ता से बेदख़ल किया था। लेकिन वहाँ राजनीतिक अस्थिरता और गहरा गयी है। याद रहे इमरान ख़ान ने अपनी सरकार गिराने को साज़िश बताया था और उसके बाद लगातार जनता के बीच जाकर शरीफ़ सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम चलाये हुए हैं। वह देश में चुनाव करवाने की भी ज़ोरदार माँग कर रहे हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन चुनाव कराने से घबरा रहा है, क्योंकि उसे डर है कि इमरान ख़ान की लोकप्रियता चर्म पर है और वह बम्पर जीत हासिल कर सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी को लेकर उनकी पार्टी पीटीआई के लोग ही विरोध कर रहे हैं। आम जनता में भी इसका नकारात्मक सन्देश गया है। यहाँ यह बताना भी ज़रूरी है कि नवाज़ शरीफ़ और उनकी पार्टी मुस्लिम लीग (एन) लगातार माँग कर रहे थे कि इमरान ख़ान को जेल में डाल दिया जाए। पार्टी इस समय चुनाव करवाने का भी विरोध कर रही है। इमरान ख़ान अपने समर्थकों को हिंसा न करने की सलाह दे चुके हैं; क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा होने से राजनीतिक नुक़सान होगा। यही शरीफ़ और उनके सहयोगी चाहते हैं।

सेना भी विभाजित

पाकिस्तान सेना में इमरान ख़ान को लेकर विभाजन दिखता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो पाकिस्तानी रेंजर्स के इमरान ख़ान को गिरफ़्तार करते समय सेना के कुछ लोगों का विरोध नहीं होता। इसका वीडियो पाकिस्तान में वायरल है। सेना का एक बड़ा गुट है, जो इमरान ख़ान का समर्थन करता है। आईएसआई के प्रमुख रहे हामिद गुल परदे के पीछे इमरान ख़ान के लिए सेना में समर्थन जुटाते रहे हैं। भले वे अब सेना में नहीं हैं, उनके सेना के बीच बेहतरीन सम्पर्क हैं। एक समय था, जब इमरान ख़ान हामिद गुल को पाकिस्तान सेना का प्रमुख बनाने की तैयारी कर चुके थे।

मुनीर जानते हैं कि जैसी लोकप्रियता के शिखर पर इस समय इमरान ख़ान हैं, उससे साफ़ है कि यदि चुनाव हो गये तो वर्तमान सत्ता पलट जाएगी। साथ ही मुनीर की कुर्सी भी ख़तरे में पड़ जाएगी। इसके अलावा आईएसआई के मेजर जनरल फ़ैसल नसीर भी इमरान के कट्टर विरोधी हैं। इमरान ख़ान उनसे कितनी नफ़रत करते हैं, यह इस बात से ज़ाहिर हो जाता है कि इमरान उन्हें ‘डर्टी हैरी’ कहते हैं।

इमरान आरोप लगा चुके हैं कि नसीर उनकी हत्या करना चाहते हैं और दो बार ऐसी कोशिश कर चुके हैं। यही नहीं, इमरान का यह भी आरोप है कि पाकिस्तानी पत्रकार अरशद शरीफ़ की हत्या का ज़िम्मेदार भी नसीर है। शरीफ़ को इमरान ख़ान का क़रीबी पत्रकार माना जाता था जिनकी पिछले साल देश से बाहर हत्या कर दी गयी थी। इमरान ने यह भी आरोप लगया था कि मेजर जनरल फ़ैसल नसीर ने उनकी पार्टी की सीनेटर आज़म स्वाति के कपड़े तक उतरवा दिये थे। मुनीर इमरान को आरोपों को झूठा बताते हुए उन्हें क़ानूनी कार्रवाई की धमकी दे चुके हैं।

दुविधा में पाकिस्तान

पाकिस्तान अमेरिका के साथ जाए या चीन के साथ? इसे लेकर प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और उनकी मंत्री के बीच ही मतभेद हैं। हाल में अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के कई गोपनीय दस्तावेज़ लीक हो गये, जिनमें ख़ुलासा हुआ है कि पाकिस्तान की विदेश राज्य मंत्री हिना रब्बानी ख़ार ने अपनी ही सरकार को दो नाव में पैर रखकर चलने के प्रति सचेत किया था। हिना का कहना था कि उनका देश चीन और अमेरिका के बीच ‘मिडिल ग्राउंड’ नहीं बना रह सकता और यदि पाकिस्तान अमेरिका की तरफ़ जाता है, तो उसे चीन से मिलने वाले बड़े फ़ायदे खोने होंगे। दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री और उनकी मंत्री के बीच का मार्च का यह इंटरनल गोपनीय मेमो (पाकिस्तान के कठिन विकल्प) अमेरिका के पास कैसे पहुँच गया।

इससे यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तानी प्रशासन में अमेरिका की घुसपैठ कितनी गहरी है। ज़ाहिर है मंत्री ख़ार अमेरिका को ख़ुश करने के ख़िलाफ़ हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करके पाकिस्तान चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी से हाथ धो बैठेगा। इससे पहले फरवरी में यूक्रेन के मसले पर भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की बातें लीक हो गयी थीं। इसमें शहबाज़ यूक्रेन संघर्ष पर यूएन में मतदान से जुड़े मुद्दे पर बात कर रहे थे, जो रूस की निंदा और पश्चिम के दबाव में से किसी एक को चुनने को लेकर था। प्रधानमंत्री शरीफ़ को पाकिस्तानी सहयोगी की सलाह थी कि यदि वह रूस की निंदा करते हैं, तो इससे पाकिस्तान के स्टैंड में बदलाव दिखेगा। पाकिस्तान इससे पहले एक ऐसे ही प्रस्ताव में मतदान से ग़ैर-हाज़िर रहा था।

सहयोगी का सुझाव था कि पाकिस्तान के पास रूस के साथ व्यापार और ऊर्जा सौदे से जुड़ी बातचीत करने की क्षमता है और अगर रूस की निंदा के प्रस्ताव का समर्थन करते हैं, तो तो रूस से सम्बन्धों पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इसके बाद 23 फरवरी को यूएन में इस मसले पर मतदान से पाकिस्तान दूर रहा। ऐसी अहम और ख़ुफ़िया जानकारी लीक होने से पाकिस्तान सरकार मुश्किल में पड़ सकती है, क्योंकि इससे उसे अमेरिका की नाराज़गी का ख़तरा रहेगा।

पाकिस्तान के लिए यह इस मायने में असहनीय होगा, क्योंकि अमेरिका से वह आर्थिक मदद लेता रहा है। यहाँ यह ज़िक्र करना ज़रूरी है कि पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल असीम मुनीर ने हाल में चीन की यात्रा की थी। यह दौरा ऐसे समय में हुआ, जब यह जानकारी सामने आयी कि चीन ने अपने यहाँ से पाकिस्तान के ग्वादर तक रेल पटरी बिछाने की परियोजना का ख़ाका तैयार कर लिया है। इससे संकेत मिलता है कि पाकिस्तान अमेरिका की जगह चीन तो तरजीह दे रहा है।

घटनाओं पर भारत की नज़र

पाकिस्तान की घटनाओं पर भारत की भी नज़र है। शहबाज़ शरीफ़ सरकार का सेनाध्यक्ष असीम मुनीर को पूरा समर्थन है। इसका कारण इमरान ख़ान भी हैं, जिनके मुनीर कट्टर विरोधी हैं। इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद शरीफ़ इसे सही और क़ानूनी बता चुके हैं। साथ ही वे इमरान की इस बात के लिए आलोचना कर रहे हैं कि वे सेना और सरकार पर ग़ैर-ज़रूरी आरोप लगा रहे थे। यह माना जाता है कि जनरल मुनीर भारत के ख़िलाफ़ हैं। वे जम्मू-कश्मीर को लेकर भी भारत विरोधी रुख़ रखते हैं। यह भी माना जाता है कि वे आतंकवाद गुटों को जम्मू-कश्मीर में सक्रिय रखने की हिमायत करते हैं। पाकिस्तान की वर्तमान घटनाओं पर भारत ने अभी कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी है। भारत का रुख़ इसे ‘पाकिस्तान का आंतरिक मामला’ बताना ही रहेगा, यह तय है। लेकिन भारत के सेनाध्यक्ष यह कह चुके हैं कि सेना किसी भी स्थिति के लिए हमेशा तैयार रहती है। भारत से बाहर यह चर्चा भी आजकल है कि अगले साल के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर कार्रवाई कर सकती है। इसे लेकर पाकिस्तानी मीडिया में समय-समय पर कयास लगते रहे हैं। ख़ुद भारत के सेनाध्यक्ष आतंकवाद को लेकर पीओके में कार्रवाई की बात कह चुके हैं।

भारत ने कुछ साल पहले पीओके में घुसकर वहाँ आतंकवादी शिविरों को तबाह किया था। भारत के टीवी चैनल भी आये दिन पीओके में कार्रवाई को लेकर चर्चाएँ करते हैं, जिसमें वे पाकिस्तानी पत्रकारों भी शामिल करते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसी कार्रवाई भारत करता है। भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 ख़त्म करने को लेकर 2019 में लाये सरकार के बिल के वक़्त अपने सम्बोधन में कहा था कि पीओके भारत का हिस्सा है और उसे लेकर रहेंगे। ऐसे में आने वाले महीने काफ़ी महत्त्वपूर्ण रह सकते हैं। इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान के वर्तमान हालात में सेना वहाँ सत्ता में क़ाबिज़ हो जाए। लिहाज़ा भारत की पड़ोसी देश की घटनाओं पर पैनी नज़र है।

‘आँखों ने पाकिस्तान के 75 साल के इतिहास में ऐसे मंज़र (हिंसा) कभी नहीं देखे थे। लोगों को एंबुलेंस से निकालकर गाडिय़ों में आग लगा दी गयी। सरकारी सम्पत्ति पर दुश्मन की तरह हमले किये गये। हम किसी को देश के ख़िलाफ़ साज़िश नहीं करने देंगे और न ही उनके (इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पीटीआई) मंसूबों को कामयाब होने देंगे।’

शहबाज़ शरीफ़

प्रधानमंत्री, पाकिस्तान

‘मेरी गिरफ़्तारी नहीं की गयी थी, मुझे अगवा किया गया था। रेंजर्स ने मुझे बेहोश होने तक पीटा। हम दंगा-फ़साद नहीं, बल्कि चुनाव चाहते हैं।’

इमरान ख़ा

पूर्व प्रधानमंत्री (इस्लामाबाद हाई कोर्ट में)

उचित नहीं मिल रहा गेहूँ का भाव

इस वर्ष रबी की फ़सलों का बेमौसम की वर्षा एवं ओलावृष्टि ने तो बर्बाद किया ही, अब किसानों को गेहूँ का कम भाव रुला रहा है। इस वर्ष गेहूँ का सरकारी भाव 110 रुपये प्रति कुंतल के साथ 2,125 रुपये प्रति कुंतल खुला है। सरकारी क्रय केंद्रों पर 15 जून, 2023 तक गेहूँ की ख़रीद की जाएगी, जो 01 अप्रैल से चल रही है। मगर समस्या यह है कि इसत बार गेहूँ का दाना मर गया है। केवल 40 प्रतिशत गेहूँ ही ठीक हुआ है।

इसके चलते सरकारी ख़रीद केंद्रों पर जहाँ मरे हुए दाने का गेहूँ लेने में आनाकानी हो रही है, वहीं उसे व्यापारी भी 1,600 रुपये से लेकर 1,650 रुपये प्रति कुंतल ही लेने पर राज़ी हो रहे हैं। हालाँकि सरकार की ओर से सरकारी क्रय केंद्रों के लिए मरे हुए दाने का गेहूँ न ख़रीदने का कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं हुआ है, जिसके चलते किसानों को कुछ राहत है। मगर जिन किसानों को मजबूरी में निजी व्यापारियों को गेहूँ बेचना पड़ रहा है, उन्हें अच्छे दाने के गेहूँ के भाव तो सरकारी क्रय केंद्रों से भी अच्छे 2,200 रुपये प्रति कुंतल के मिल रहे हैं। मगर जिस गेहूँ का दाना मरा हुआ है, उसके भाव व्यापारी मनमाने लगा रहे हैं।

इधर सरकारी क्रय केंद्रों पर तौल में देरी एवं कहीं-कहीं गड़बड़ी की शिकायतें मिली हैं। हालाँकि क्रय केंद्र के कर्मचारियों का कहना है कि किसानों का हर तरह से सहयोग किया जा रहा है। हर प्रकार के गेहूँ को सरकार द्वारा तय भाव में ख़रीदा जा रहा है। इस बार पारदर्शिता के लिए किसानों के मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी पिन आ रहा है, जिससे उन्हें पता चल सके कि उनकी उपज की ख़रीदी हो चुकी है। इसके साथ ही उन्हें यह भी सुनिश्चित कराया जा रहा है कि उनके गेहूँ की तौल उनके सामने हो।

ओमपाल नाम के एक निजी गेहूँ क्रेता व्यापारी ने बताया कि किसानों को जो भाव सरकारी क्रय केंद्र पर मिल रहा है, उससे अच्छा भाव गेहूँ के निजी क्रेता नक़द दे रहे हैं, जिसके चलते किसान सरकारी क्रय केंद्र पर नहीं जा रहे हैं। इस बार अधिकतर मरे हुए दाने का गेहूँ सरकारी क्रय केंद्र पर अधिक पहुँच रहा है, क्योंकि उसका भाव निजी स्तर पर क्रय करने वाले व्यापारी कम दे रहे हैं। अभी हम लोग अच्छा गेहूँ 2,200 रुपये प्रति कुंतल से लेकर 2,250 रुपये प्रति कुंतल तक ख़रीद रहे हैं। मरे हुए दाने के गेहूँ का भाव 1,500 रुपये प्रति कुंतल से लेकर 1,800 रुपये प्रति कुंतल चल रहा है। इस गेहूँ को सरकारी क्रय केंद्रों पर तो सरकार द्वारा तय भाव पर ख़रीदा जा रहा है, मगर हम अगर उस भाव में लेंगे, तो हमें हानि होगी।

भौजीपुरा क्षेत्र के ग्राम बलिया के किसान तुलसी राम कहते हैं कि किसान होना अपराध जैसा हो गया है। किसानों को एक ओर से प्रकृति मारती है, तो दूसरी ओर से सरकार एवं व्यापारी मारते हैं। सरकार कृषि उपज का सही मूल्य तय नहीं करती, वहीं व्यापारी उससे भी कम में उपज का भाव देते हैं। यह केवल गेहूँ की बात नहीं है, हर उपज के भाव इसी तरह किसानों को रुलाते हैं।

ग्राम जालिम नगला निवासी नत्थूलाल किसान कहते हैं कि बड़ी किसानी में तो लाभ है, मगर छोटे किसानों को सदैव परेशानी का सामना करना पड़ता है। मगर उत्तर प्रदेश में छोटी जोत के किसानों की संख्या अधिक है। जब कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो छोटे किसानों को कुछ नहीं बचता। बड़े किसानों को हानि तो बड़ी होती है, मगर फिर भी उन्हें कुछ-न-कुछ पैदावार मिल जाती है। इस बार गेहूँ एवं दूसरी रबी की फ़सलों में जो हानि हुई, उससे भी छोटी जोत के किसानों की दशा बिगड़ी है। किसानों को अगर इस हानि के बदले कुछ मुआवज़ा मिल जाता, तो किसानों को रोना नहीं पड़ता।

पायलट की राह नहीं आसान

राजस्थान में सत्ता की दौड़ से धिक्कार के साथ धकेल दिये गये कांग्रेस नेता सचिन पायलट आज भी बाज़ नहीं आ रहे। अपनी मौजूदगी बनाये रखने के लिए हालिया अनशन और प्रदेश के गुर्जर बहुल इलाक़ों में अपनी शान बघारने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ रहे। पायलट आख़िर में राजनीति-हित का अंतिम ब्रह्मास्त्र छोड़ते हुए अजमेर से जयपुर की पदयात्रा पर चले हैं। वह कभी कसमसाकर तो कभी गुर्राकर हरीश चौधरी और हेमाराम चौधरी सरीखे अपने शंकालु साथियों के साथ भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर नोसिखियापन दिखा चुके हैं। मंचीय सभाओं में अपने तमाम सियासी मुनाफों को भी दाँव लगा चुके हैं, ताकि झूठे होने के कलंक से बच सकें। लेकिन कहीं-न-कहीं लंगड़ी खाकर फिर चारों खाने चित्त हो जाते हैं।

मुख्यमंत्री गहलोत कहते हैं- ‘मैं इससे पेरशान नहीं हूँ कि पायलट ने मुझसे झूठ बोला। मेरी दिक़्क़त यह है कि अब मैं उन पर भरोसा नहीं कर सकता। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि झूठ एक बार किसी सियासतदान को छू लेता है, तो वो दागी हो जाता है। पिछले दिनों वसुंधरा राजे पर भ्रष्टाचार के आरोपों का मर्सिया पढऩे की ओट में अनशन का कोतुक करने वाले पायलट इस बार फिर दामन में दा$ग लगा बैठे। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस कौतुक को नज़रअंदाज़ नहीं कर सका। नतीजतन पायलट अनुशासनहीनता के दलदल में फँस गये। राजनीतिक ताक़त के पैमाने पर पार्टी संगठन का कर्ता-धर्ता और अधिकारों के लिहाज़ से मुख्यमंत्री से ज़्यादा क़द्दावर होता है। पायलट सियासत का यह गूढ़ ज्ञान नहीं समझ पाये और बग़ावत का झंडालेकर मुट्ठी भर ‘कुर्सी चिपको’ समर्थकों के साथ मानेसर जाकर बैठ गये। पायलट का यह काफिला बहुत छोटा था; लेकिन प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ी दुर्घटना थी। पार्टी में जिस शख़्स की हैसियत शुभंकर की थी, अब सिर्फ़ कंकर बनकर रह गया था। पायलट ने जितना ख़म ठोंककर पानी में आग लगाने की कोशिश की थी, उसमें उनके ही अरमान भस्म हो गये।

सूत्रों की मानें, तो उनके परिवार के एक पितामह ने पायलट के सियासी ज्ञान पर हैरानी ज़ाहिर की थी। पायलट का कहना था- ‘मैं कुश्ती के खेल का महारथी हूँ। मौक़ा मिलते ही अपने प्रतिद्वंद्वी के पाँव खींच लूँगा। जबकि पितामह ने उनके कुतर्क की सोच पर खीझते हुए समझाया था कि राजनीति कबड्डी का खेल नहीं होता, बल्कि ख़ामोशी से सियासी दाँव-पेंच चलने पड़ते हैं। अगर कुश्ती के फेर में पड़ोगे, तो औंधे मुँह गिरोगे। आख़िर यही हुआ भी। सरकार में उप मुख्यमंत्री की शपथ लेने पर माननीय शब्द जोड़ा जाता है। राज्य की अखंडता और स्थिरता की शपथ लेने का अर्थ होता है- व्यापक हित में अपने स्वहित को न्योछावर कर देना। लेकिन पायलट ने अपनी महत्त्वाकांक्षा के आगे घुटने टेक दिये। इस शेर की तर्ज पर कि, ‘मैदान की हार-जीत तो $िकस्मत की बात है। टूटी है किसके हाथ में तलवार देखिए।।’

पता नहीं क्यों पायलट भूल गये कि भारतीय राजनीति एक वीभत्स बिजनेस मॉडल पर आधारित है और आज की तारीख़ में गहलोत उसके ब्रांड एंबेसडर हैं। राजनीति ही उनका कारोबार है, जो पूरी तरह संगठन और सरकार को बढ़ाते रहने में जुटे हैं। दिलचस्प बात है कि पायलट ने सरकार को फिटनेस का मंत्र देने की बजाय गहलोत का ताज गिराने का बीड़ा उठा लिया। विश्लेषकों का कहना है कि पायलट ने प्रधानमंत्री रहे वी.पी. सिंह का जुमला दोहरा दिया। वह कहते थे- ‘मैं एक रॉकेट की तरह हूँ, जो उपग्रह की परिक्रमा कक्ष में छोडऩे के बाद जलकर खाक हो जाता है।’ जानकार सूत्र कहते हैं कि राजस्थान की सत्ता का ताज पहनने के लिए जब जयपुर से दिल्ली की मैराथन दौड़ चल ही थी, दिवंगत विधायक भंवरलाल शर्मा की सीख उन्हें गुमराह कर गयी कि मौक़ा मिलते ही तुम गहलोत के नीचे से जाजम छीन लेना। लेकिन इस सीख पर अमल करना पायलट को कितना भारी पड़ा? कहने की ज़रूरत नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार वैदिक सवाल करते हैं कि क्या आज तक किसी पार्टी के मुखिया ने अपनी ही सरकार गिराने की कोशिश की? वाच एंड वेट की इस फ़िज़ा में एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट है कि ‘न तो गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है और न ही पायलट को मुख्यमंत्री का ताज सौंपा जा सकता है। विश्लेषक कहते हैं कि इस पूरे घमासान में गहलोत ने जिस जुस्तजू से सरकार को बचाये रखने की मशक़्क़त की, किसी तीसरे व्यक्ति की ताजपोशी सम्भव ही नहीं है। पायलट की लड़ाई विचारधारा की लड़ाई नहीं है। यह मुख्यमंत्री बनने की महत्त्वाकांक्षा में गले-गले तक डूबे एक ऐसे राजनेता की लड़ाई है, जो अपने उद्देश्य में व्यक्तिवादी टकराव की खाइयाँ खोद रहा है।

पायलट अपनी भड़ास निकालने का कोई अवसर नहीं चूकते। उनके विवादास्पद बयान इस बात की तस्दीक करते हैं। 2 अक्टूबर को गाँधी जयंती के मौक़े पर भी उन्होंने भावनाओं की हवा बाँधने में कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा था- ‘राजनीति में अपने मन की बात रखनी चाहिए। महात्मा गाँधी भी यही करते थे। महात्मा गाँधी विरोधियों को भी सम्मान देते थे। किन्तु आज की राजनीति में विरोधियों के साथ द्वेषपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है।’ पायलट बराबर भाजपा को यह मौक़ा देते आ रहे हैं। क्या अब यह समझ लिया जाना चाहिए कि मुख्यमंत्री नहीं बन पाने से पायलट बहुत दु:खी हैं। वह इसे पचा नहीं पा रहे हैं। कुछ और तथ्य भी पायलट की पीड़ा की पुष्टि करते हैं। पिछले दिनों पायलट ने यह कहकर अपनी ही सरकार पर हमला किया कि राज्य में क़ानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है। गहलोत तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री हैं। राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी हैं। सन् 2008 में सी.पी. जोशी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे। जोशी भले ही एक वोट से हार गये; लेकिन उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा। सरकार के मुखिया के लिए जाट नेता शीशराम ओला ने भी धमक दिखायी। विधायकों की रायशुमारी की पर्चियाँ डाली गयीं, तो नाम गहलोत का ही निकला। सन् 1998 में कांग्रेस 153 सीटों के साथ अपने सबसे बड़े बहुमत से सत्ता में लौटी थी। उस समय जाट राजनीति के क़द्दावर नेता परसराम मदेरणा प्रदेश अध्यक्ष थे। विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता भी थे। तकरीबन तय हो चुका था कि मदेरणा मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन जादू गहलोत का ही चला।

विश्लेषक कहते हैं कि आलाकमान का गहलोत पर भरोसा है। फिर गहलोत राजनीति का सबक़ गहनता से पढ़ चुके हैं कि यहाँ वो ज़्यादा महत्त्व की बात नहीं है, जो आप कर रहे हो। महत्त्व इस बात का है कि आपका जनता में मैसेज क्या जा रहा है? गुजरात और कर्नाटक में अपनी बड़ी भूमिका निभाकर गहलोत ने राहुल का विश्वास जीता। जहाँ तक सत्ता सन्तुलन का सवाल है, तो गहलोत को ब$खूबी साधना आता है। वहीं पायलट एक तर$फ सरकार दोहराने के लिए सत्ता और संगठन में तालमेल बैठाने की दुहाई दे रहे हैं, तो दूसरी तर$फ गहलोत पर भ्रष्टाचार को पनाह देने के आरोप लगा रहे हैं। हालाँकि राजस्थान कृषि बोर्ड के अध्यक्ष रामेश्वर डूडी इस अदावती खेल को छोटी-मोटी बात कहकर हवा में उड़ाते हैं। लेकिन गहलोत ने 7 मई को मानेसर कथा को बेपर्दा करते हुए कहा कि केंद्रीय मंत्री अमित शाह, धमेंद्र प्रधान और गजेंद्र सिंह शेखावत ने हमारी सकार को गिराने की साज़िश रची। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, कैलाश मेघवाल पैसे के बूते चुनी हुई सरकार को गिराने के षड्यंत्र में शामिल होने से इन्कार कर दिया। गहलोत ने कहा कि रोहित बोहरा, चेतन डूडी और दानिश अबरार ने मुझे सही समय पर इसकी सूचना दे दी, नतीजतन एक बड़ी दुर्घटना को समय रहते इस भूचाल को रोक दिया। गहलोत ने यहाँ तक इस साज़िश को बेपर्दा किया कि बग़ावत पर आमादा विधायकों को 20-20 करोड़ दिये गये।

नहीं छूटती प्रपंच की राजनीति

प्रदेश कांग्रेस के सचिव राम सिंह कस्वां बड़ी बेबाकी से कहते हैं- ‘सचिन के साथ सबसे बड़ी दुविधा है कि वह अपने अतीत से भी सबक़ नहीं लेना चाहते। उन्होंने सियासत को नहीं समझा और ‘मैं’ ही सब कुछ के खाँचे में चिपके रहे। सचिन के लिए गहलोत की सोहबत से सीखने-समझने का बेहतरीन मौक़ा था, जो न सिर्फ़ राजनीति के एनसाइक्लोपीडिया हैं, बल्कि पूरी राजनीति उनमें समायी हुई है। उन्होंने इस बात को नहीं समझा कि राजनीति में लालच नहीं लय बनाये रखने से आगे की राह बनती है। लेकिन उन्होंने सल्तनत डिगाने के लिए तुगलकी राजनीति की राह पकड़ी। मानेसर के स$फर से लोटकर उन्हें गहलोत के साथ बग़ावत के संक्रमण को दूर करने की कोशिश की होती, तो शायद कहा जा सकता था कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आये, तो उसे भूला नहीं कहा जाता। लेकिन उन्होंने तो $फासले पाटने के लिए दरारें डाल दीं।’

कस्वां कहते हैं कि सचिन की शख़्सियत में पूर्वाग्रह की संस्कृति रची बसी है। उनकी इच्छाशक्ति एक जुएबाज़ सरीखी उड़ान है, जिसका जोश हार के बाद भी उसी अनुपात में बढ़ता ही जाता है। अब जब सचिन केंद्रीय सुरक्षा बल की सुरक्षा में अजमेर से पैदल यात्रा निकाल रहे हैं, तो समझना क्या मुश्किल है कि उनकी राह अब कौन-सी है? ‘जमाने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं। वहाँ ले जाते हैं कश्ती जहाँ तूफान होते हैं।।’ हर रोज़ कोई नित नया खटराग छेडऩा उनकी आदत में शुमार हो गया है। जब एक राजनेता भरोसा गँवा देता है, तो उससे ज़्यादा अकेला कोई नहीं होता।

पहलवानों की पीड़ा

एक कहावत है कि ऊपर वाले के दर पर देर है, अँधेर नहीं। लेकिन खेल संस्थान के एक ताक़तवर मुखिया के ख़िलाफ़ देश की राजधानी में न्याय की लड़ाई लड़ रहीं महिला पहलवानों को अपने मामले की एफआईआर दर्ज करवाने के लिए ही देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा। उनके आरोप यौन उत्पीडऩ से जुड़े हैं और यह निश्चित ही एक गम्भीर मुद्दा है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ को लेकर क़ानून हैं; लेकिन एक कड़वा सच यह है कि देश की अधिकतर खेल एसोसिएशन के पास आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) ही नहीं है, जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम-2013 (पॉश अधिनियम-2013) में होना ज़रूरी है। इनमें रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इण्डिया भी शामिल है, जिसके अध्यक्ष के ख़िलाफ़ महिला पहलवान और उनके समर्थन में जुटे लोग जंतर-मंतर पर न्याय की गुहार लगा रहे हैं।

महिला पहलवानों के धरने पर बैठने की बात समझ में भी आती है। उनके आरोप नये नहीं हैं। महिला पहलवान कह रही हैं कि वे पहले से अपनी बात उच्च अधिकारियों या सत्ता में बैठे लोगों तक पहुँचाने की कोशिश कर रही थीं। उनका पहला धरना इसी साल 18 जनवरी को जंतर-मंतर पर ही हुआ था, जब विनेश फोगाट, बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक सहित कुछ दिग्गज पहलवान वहाँ जुटे थे। उन्होंने बाक़ायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह सहित कुश्ती संघ पर गम्भीर आरोप लगाये थे। उनके आरोपों में गाली देना, अपशब्दों का इस्तेमाल, मानसिक रूप से प्रताडऩा और अध्यक्ष पर यौन शोषण जैसे गम्भीर आरोप शामिल थे। हालाँकि बृजभूषण फ़िलहाल कुश्ती संघ में शक्तिहीन हो चुके हैं।

बृजभूषण शरण सिंह, जो भाजपा के सांसद भी हैं; इन आरोपों को झूठा बताते हैं और उनका कहना है कि यदि उन पर आरोप साबित हो जाएँ, तो उन्हें फाँसी पर लटका दिया जाए। उलटे उनका दावा है कि वे तो पहलवानों की भलाई के लिए जेब तक से पैसे खर्च करते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में मामला जाने के बाद अब सिंह के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। सर्वोच्च अदालत ने पहलवानों को भी निचली अदालत में अपना मामला ले जाने का सुझाव दिया है। ज़ाहिर है यौन उत्पीडऩ के ख़िलाफ़ बैठी महिला पहलवानों की लड़ाई लम्बी खिंच सकती है। उनके लिए हिम्मत बढ़ाने वाली बात यह है कि किसान, ख़ास पंचायतें और अन्य वर्गों के लोग उनके समर्थन में जुट रहे हैं।

यह अचरज की बात है कि हमारी जिन महिला पहलवानों से दुनिया भर की पहलवान $खौफ़ खाती हैं, वो ख़ुद असहाय सी दिख रही हैं। न्याय के लिए उनका इंतज़ार इस बात को साबित करता है कि हमारी व्यवस्था में कितनी ख़ामियाँ हैं। दरअसल जनवरी में महिला पहलवानों ने जब धरना दिया था, तो मोदी सरकार में ताक़तवर युवा मंत्री अनुराग ठाकुर उनसे मिले थे। उसमें जाँच समिति बनाने की बात हुई, जिसे अनुराग ठाकुर ने पूरा भी किया। महिला पहलवानों के आरोपों की जाँच के लिए भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी ऊषा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन हुआ, जिसमें जानी मानी विश्व विजेता मुक्केबाज़ एम.सी. मैरी कॉम, पहलवान योगेश्वर दत्त, राष्ट्रमंडल खेलों की स्वर्ण पदक विजेता पहलवान बबीता फोगाट, बैडमिंटन स्टार तृप्ति मुर्गुंडे, भारतीय खेल प्राधिकरण (एसएआई) की पूर्व निदेशक राधिका श्रीमन और लक्ष्य ओलंपिक पोडियम योजना के पूर्व सीईओ राजेश राजगोपालन शामिल थे।

रिपोर्ट का खेल

बड़े नामों वाली इस निगरानी समिति ने जाँच पूरी करके अप्रैल में रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप दी। ‘तहलका’ की जाँच के दौरान समिति के सदस्यों के बीच कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं, जिनसे कई तरह के शक जन्म लेते हैं। बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ जो आरोप लगे थे, उनकी जाँच कर रही समिति की एक सदस्य बबीता फोगाट ने जो ख़ुलासे किये हैं, उनसे शक पैदा होता है कि सिंह को बचाने के लिए दबाव का इस्तेमाल किया जा रहा है। बबीता के आरोपों के मुताबिक, इस मामले की जाँच सदस्यों ने सही तरी$के से नहीं की। उनका तो यह भी कहना है कि जो रिपोर्ट बनायी गयी, उसमें सभी सदस्यों की सहमति नहीं थी।

बबीता फोगाट ने जो मामले की जाँच को लेकर को ख़ुलासे किये हैं, वह बहुत चौंकाने वाले हैं। इनमें एक यह भी है कि जब वह (बबीता) जाँच रिपोर्ट का अध्ययन कर रही थीं, तो भारतीय खेल प्राधिकरण (एसएआई) की पूर्व निदेशक राधिका श्रीमन, जो जाँच समिति में सदस्य के रूप में शामिल थीं, ने उनसे रिपोर्ट छीन ली थी। बबीता का तो यह भी आरोप है कि श्रीमन ने उनके साथ बदतमीजी भी की, जिसका आधार यह था कि वे उसी परिवार से सम्बन्ध रखती हैं; जिनके सदस्य धरने पर बैठे हैं। बबीता ने जब रिपोर्ट के कुछ हिस्सों पर सवाल उठाये, तो उन्हें अनसुना कर दिया गया। बबीता का कहना है कि उन्होंने इसे लेकर अपनी आपत्ति रिपोर्ट में दर्ज करवायी है।

वैसे यह कथित रिपोर्ट आज तक सामने आयी ही नहीं है। कहा जाता है कि इस रिपोर्ट में बृजभूषण शरण सिंह को ‘क्लीन चिट’ दी गयी है। बबीता फोगाट इसे लेकर कहती हैं- ‘इस मसले पर मैं कुछ कहना नहीं चाहती। महिला होने के नाते मैं पहले भी और आज भी खिलाडिय़ों के साथ हूँ।’ समिति की एक सदस्य ही यदि यह कहती हैं कि एकतर$फा जाँच की गयी और सब कुछ छिपाकर किया गया है, तो उस रिपोर्ट का क्या औचित्य रह जाता है। बबीता कहती हैं कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। बबीता की बातों से साफ़ है कि समिति के सभी सदस्य इस मसले पर एक राय नहीं थे।

बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ आरोप काफ़ी गम्भीर हैं। आरोप लगाने वालों में एक खिलाड़ी व्यस्क नहीं है और यह आरोप यौन उत्पीडऩ का है। सिंह के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर के मुताबिक, एक मामला पोक्सो एक्ट के तहत भी है। अब यहाँ यह सवाल उठता है कि पोक्सो एक्ट के तहत मामला होने के बावजूद आरोपी की गिरफ़्तारी क्यों नहीं हुई। ज़ाहिर है सिंह की ताक़त के आगे क़ानून और प्रशासन लाचार दिख रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि देश का नाम रोशन करने वाली देश की बेटियों को इतना अकेला क्यों छोड़ दिया गया?

सर्वोच्च न्यायालय में मामला नहीं गया होता, तो शायद आरोपी के ख़िलाफ़ एफआईआर भी दर्ज नहीं होती। सात पहलवानों की याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने नोटिस जारी किया। डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष पर यौन उत्पीडऩ लगाने वाले पहलवान अभी भी जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हैं। अब सर्वोच्च न्यायालय ने इन पहलवानों को निचली अदालत में जाने को कहा है। खिलाडिय़ों का यह भी आरोप है कि शिकायतकर्ताओं पर दबाव डाला गया है। यही नहीं डब्ल्यूएफआई अधिकारी उनके घर जाकर पैसे तक की पेशकश कर चुके हैं। देश की 16 ऐसे खेल संगठन हैं, जिनमें आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) नहीं है। कुछ में इसकी खानापूर्ति की गयी है। ऐसे में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम-2013 (पॉश अधिनियम-2013) की क्या अहमियत रह जाती है, सहज ही समझा जा सकता है। रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इण्डिया भी इनमें शामिल है। वहाँ अब एक तदर्थ समिति बना दी गयी है। ऐसे में महिला खिलाड़ी न्याय की क्या उम्मीद कर सकती हैं।

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि खेल मंत्रालय के भरोसे और निगरानी समिति गठित करने के बाद पहलवानों ने फरवरी में धरना $खत्म कर दिया था। यही नहीं, इस दौरान बृजभूषण को महासंघ के अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारियों से अलग तक कर दिया गया। लेकिन समिति की रिपोर्ट नहीं आने और मसले को लटकता देख 23 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता पहलवान बजरंग पुनिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और अन्य फिर दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठ गये। इस दौरान बारिश में भीगे बिस्तर की जगह खाट मँगवाने के मसले पर पुलिस से उनकी झड़प भी हुई। उनकी माँग है कि सरकार को तत्काल डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष के ख़िलाफ़ की गयी जाँच को सार्वजनिक करना चाहिए। बता दें कि विनेश फोगाट ने एक बार यौन उत्पीडऩ के आरोपों की जाँच करने वाली निगरानी समिति के एक सदस्य पर मीडिया को संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप लगाया था।

बिश्केक टूर्नामेंट

जंतर-मंतर पर पहलवानों के साथ जनवरी में धरने पर बैठे पाँच पहलवानों का बिश्केक टूर्नामेंट के लिए चयन किया गया है। इनमें टोक्यो ओलिंपिक रजत पदक विजेता रवि कुमार दहिया, टोक्यो ओलंपिक में पाँचवें स्थान पर रहने वाले दीपक पूनिया, एशियाई चैंपियन सरिता मोर ने 01 से 04 जून को बिश्केक (किर्गिस्तान) में होने वाले तीसरे रैंकिंग टूर्नामेंट में देश के लिए खेलने को तैयार हैं। भारतीय ओलंपिक संघ की तदर्थ समिति ने इन पहलवानों की प्रविष्टि भेजी है। यह पहलवान राष्ट्रीय शिविर में शामिल होंगे। यहाँ यह बता दें कि सरिता मोर को छोडक़र अन्य पहलवान इस बार जंतर-मंतर के धरने में शामिल नहीं हुए थे, भले उन्होंने उनका समर्थन किया था।

कहाँ ग़ायब हो गयीं हज़ारों लड़कियाँ?

आज नारी सुरक्षा देश का सबसे बड़ा मुद्दा है। इस समय में जब हरियाणा की महिला खिलाड़ी यौन शोषण के कथित आरोपी एक नेता के ख़िलाफ़ दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी हैं, इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात से पिछले पाँच वर्षों में कुल 41,621 लड़कियों का लापता होना काफ़ी चौंकाने वाला है। यह उस राज्य गुजरात में हुआ है, जहाँ के बारे में सरकार और राज्य की पुलिस द्वारा दावा किया जाता है कि यहाँ महिलाएँ सबसे ज़्यादा सुरक्षित हैं। ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देते हैं।

आज जब महिला सुरक्षा को लेकर देश भर में आवाज़ें उठ रही हैं, तब कई ऐसे बेबुनियादी मुद्दे विवादों का केंद्र बने हुए हैं, जिन्हें जानबूझकर हवा दी जा रही है; लेकिन गुजरात से हज़ारों लड़कियों के ग़ायब होने पर सियासी ख़ामोशी ज़ाहिर करती है कि इसमें कहीं न कहीं राजनीतिक षड्यंत्र है। लापता लड़कियों पर बनी फ़िल्म द केरला स्टोरी में दिखायी गयी लड़कियों के ग़ायब होने की कहानी के बीच नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के द्वारा पेश गुजरात से ग़ायब होती लड़कियों के आँकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। लेकिन इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि द केरला स्टोरी में ग़ायब दिखाई हिन्दू लड़कियों पर छाती पीटने वाले न तो गुजरात से ग़ायब हुई लड़कियों को लेकर कुछ बोल रहे हैं और न ही जंतर-मंतर पर न्याय की गुहार लगा रही महिला खिलाडिय़ों को लेकर बोल रहे हैं।

यह नहीं कहा जा सकता कि द केरला स्टोरी में ग़ायब हुई हिन्दू लड़कियों की कहानी सिरे से ग़लत है; लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि जिस तरह से इस फ़िल्म को लेकर प्रधानमंत्री से लेकर कई भाजपा नेता छाती पीट रहे हैं, उससे यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि फ़िल्मों और हक़ीक़त का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है। अगर गुजरात जैसी घटना किसी ऐसे राज्य में घटी होती, जहाँ भाजपा की सरकार नहीं है, तो यही नेता छाती पीट-पीटकर चुनावों में ग़ायब हुई लड़कियों का ज़िक्र कर रहे होते। फिर आख़िर क्यों गुजरात से ग़ायब हुई हज़ारों लड़कियों का ज़िक्र नहीं हो रहा है।

एनसीआरबी के मुताबिक, भाजपा शासित राज्य गुजरात में पिछले 5 वर्षों में 41,21 लड़कियाँ ग़ायब हुई हैं। हैरान करने वाले यह आँकड़ों पर न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ बोल रहे हैं और न ही गृह मंत्री अमित शाह ही कुछ बोल रहे हैं। गुजरात की विधानसभा में भी भाजपा सरकार का कोई अदना नेता इस पर बोलने को तैयार नहीं है। इससे भी हैरानी की बात यह है कि गुजरात पुलिस भी इस पर ख़ामोश है। आख़िर इसकी वजह क्या है? कौन है इतनी बड़ी संख्या में लड़कियों के ग़ायब होने के पीछे? इन सवालों के जवाब तलाशने से पहले एनसीआरबी के आँकड़ों पर नज़र डालनी ज़रूरी है। एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक, साल 2021 में कुल 3,89,844 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज राज्य के अलग-अलग थानों में दर्ज हुईं। इन लोगों में सिर्फ़ महिलाओं की संख्या 2,65,481 है, जिसमें सबसे ज़्यादा लड़कियाँ हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट की मानें, तो यह संख्या साल 2020 के मुक़ाबले 20.6 प्रतिशत ज़्यादा है।

एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक, साल 2016 में जहाँ 7,105 लड़कियाँ गुजरात से लापता हुईं, वहीं साल 2017 में 7,712, साल 2018 में 9,246, साल 2019 में 9,268 और साल 2020 में 8,290 लड़कियाँ अकेले गुजरात से ग़ायब हुई हैं, जिनका अभी तक की पता नहीं चला है। यानी पिछले पाँच वर्षों में गुजरात से कुल 41,621 लड़कियाँ लापता हुई हैं। राज्य से हज़ारों लड़कियों के लापता होने का मुद्दा विधानसभा में भी उठ चुका है, बावजूद इसके सरकार को जैसे इसकी कोई ख़ास फ़िक़्र नहीं है, जबकि साल 2021 में ख़ुद भाजपा सरकार ने विधानसभा में अपने एक बयान में कहा था कि साल 2019-20 में ही अहमदाबाद और वडोदरा में 4,722 महिलाएँ ग़ायब हुई हैं।

अख़बारों में छपी ख़बरें और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड (एनसीआरबी) के आँकड़े बेहद डरावने और ख़तरनाक हालातों की ओर इशारा करते हैं। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी और गुजरात राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य सुधीर सिन्हा ने इन लड़कियों के ग़ायब होने को पुलिस व्यवस्था की ख़ामी बताते हुए सीधे-सीधे वेश्यावृत्ति की घिनौनी हरकत की ओर इशारा किया है। उन्होंने कहा है कि हत्या से भी गंभीर इन मामलों में ग़ायब बच्चों के वर्षोंसाल लौटने का इंतज़ार तो पुलिस करती है, लेकिन हत्या की तरह सख्ती से जाँच नहीं होती है। पुलिस ब्रिटिश काल के तरीक़े से जाँच करती है, जो खानापूर्ति के सिवाय कुछ नहीं है। वहीं एक पूर्व पुलिस अधिकारी ने राज्य से इतनी बड़ी संख्या में लड़कियों के ग़ायब होने के पीछे मानव तस्करी को ज़िम्मेदार ठहराया है।

सवाल यह है कि क्या पिछले 27 वर्षों से गुजरात पर क़ाबिज़ भाजपा सरकार ने महिला सुरक्षा के नाम पर झूठा ढिंढोरा ही पीटा है? गुजरात में पिछले क़रीब 28 वर्षों से भाजपा सत्ता में है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, तब वो महिला सुरक्षा का लगातार दावा किया करते थे। साल 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनावों में भी महिला सुरक्षा में गुजरात का मिसाल दी थी और प्रधानमंत्री बनने के बाद ही उन्होंने लडक़ी बचाओ, लडक़ी पढ़ाओ का नारा दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा के शासन में महिलाएँ सुरक्षित हैं? दिल्ली के निर्भया कांड पर रुदाली रोना रोने वाली भाजपा के कई नेता ख़ुद महिला शोषण के आरोपों से घिरे रहे हैं। ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गुजरात के मुख्यमंत्री रहते महिला शोषण के कई कथित आरोप लगे हैं, जिन पर उन्होंने कभी कोई सफ़ाई नहीं दी।

पिछले साल दिसंबर में हुए चुनावों भाजपा एक बार फिर सत्ता पर क़ाबिज़ हुई। ऐसे में पिछले पाँच वर्षों के भाजपा शासन में 41,621 लड़कियों के ग़ायब होने और 2021 के बाद लड़कियों के ग़ायब होने की रिपोर्ट न आने के पीछे की वजहों की भी जाँच की जानी चाहिए, ताकि दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जा सके। गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति के प्रवक्ता हिरेन बैंकर ने भाजपा नेताओं द्वारा द केरला स्टोरी को लेकर हाय-तौबा मचाने और गुजरात से ग़ायब होती लड़कियों पर चुप्पी साधने को लेकर निशाना साधा है। वहीं आम आदमी पार्टी की गुजरात प्रदेश की महिला अध्यक्ष रेशमा पटेल ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात मॉडल को पूरे देश घुमाया; लेकिन सच यह है इसनी बड़ी संख्या में गुजरात की बेटियाँ और महिलाएँ लापता हैं। अगर भाजपा सरकार जरा भी संवेदनशील है, तो इन लापता बेटियों की खोज में तत्परता दिखाये, क्योंकि यह आँकड़ा सीधे-सीधे गुजरात मॉडल पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने सरकार से लड़कियों को खोजकर उनके पुर्नवास की व्यवस्था की माँग की है।

यहाँ प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ-साथ गुजरात सरकार को याद कराना ज़रूरी है कि राज्य में महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा के उतने कड़े इंतज़ाम नहीं है, जितने दावे ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सूरत शहर की महिला कांस्टेबल सुनीता यादव का है, जिन्होंने कोरोना काल में लगे कफ्र्यु में रात को बिना मास्क के सडक़ों पर वाहन से जाते हुए गुजरात के स्वास्थ्य राज्य मंत्री कुमार कनानी के बेटे प्रकाश कनानी को रोककर सिर्फ़ यही कहा था कि आप कफ्र्यु में आगे नहीं जा सकते और बिना मास्क के तो बिलकुल नहीं। इस मामले में क़ानून तोडऩे की सज़ा मंत्री के बेटे को प्रकाश कनानी को मिलनी चाहिए थी; लेकिन सज़ा अपनी ड्यूटी का सही पालन करने वाली महिला कांस्टेबल सुनीता यादव को मिली। कांस्टेबल सुनीता को इतना धमकाया गया कि उन्हें कई दिनों तक घर में क़ैद रहना पड़ा, पुलिस और लोगों से मदद की गुहार लगानी पड़ी और आख़िर में अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा, जबकि मंत्री का बेटा क़ानून तोडऩे के बावजूद प्रकाश कनानी उस रात के वीडियो में महिला कांस्टेबल को धमकाते हुए नज़र आया।

ऐसा नहीं है कि केवल गुजरात से ही लड़कियाँ ग़ायब हुई हैं, बल्कि अन्य राज्यों से भी लड़कियों के ग़ायब होने के आँकड़े एनसीआरबी के ज़रिये सामने आये हैं। मध्य प्रदेश में साल 2021 तक देश की सबसे ज़्यादा 68,738 लड़कियाँ ग़ायब हुईं, जिनमें 13,034 नाबालिग़ लड़कियाँ भी हैं। इनमे से सिर्फ़ 35,464 मिल गयीं, जबकि 33,274 का कोई पता नहीं चला। लड़कियों के ग़ायब होने में दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल आता है, जहाँ साल 2021 तक कुल 64,276 लड़कियाँ ग़ायब हुईं, जिनमें से 35,464 का पता पुलिस ने लगा लिया, जबकि 35,110 को नहीं ढूँढा जा सका। लड़कियों के ग़ायब होने में महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर है, जहाँ पाँच वर्षों में कुल 60,435 लड़कियाँ ग़ायब हुईं, जिनमें से साल 2021 तक 39,805 लड़कियों को पुलिस ने ढूँढ निकाला। ओडिशा में पाँच वर्षों में कुल 35,981 लड़कियाँ ग़ायब हुईं, जिनमें से साल 2021 तक 16,806 लड़कियों को पुलिस ने ढूँढ निकाला। राजस्थान पिछले पाँच वर्षों में कुल लापता 30,182 लड़कियाँ ग़ायब हुईं, जिनमें से साल 2021 तक 18,401 को पुलिस ने ढूँढ लिया। इसके अलावा दिल्ली से 29,676, तमिलनाडु से 23,964, छत्तीसगढ़ से 22,126, तेलंगाना से 15,828, बिहार से 14,869, कर्नाटक से 14,201, हरियाणा से 12,622, उत्तर प्रदेश से 12,249 और पंजाब से 7,303 लड़कियों के ग़ायब होने की रिपोर्ट दर्ज हुई थी।

केरल की अगर बात करें, तो यहाँ कुल 6,608 लड़कियाँ ग़ायब हुई हैं, जिनमें जिनमें से 6,242 लड़कियों को साल 2021 तक पुलिस ने ढूँढ निकाला था। यानी कुल 366 लड़कियों को नहीं ढूँढा जा सका। इस राज्य में साल 2021 में 951 गुमशुदा नाबालिग़ लड़कियों में पुलिस ने 919 को ढूँढ निकाला।

पत्रकारिता की दो सच्चाइयाँ

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

पत्रकारिता का स्तर जितनी तेज़ी से पिछले नौ वर्षों में गिरा है, वह दु:ख का विषय है। लम्बे समय तक जो आम समाज पत्रकारों को अपनी आवाज मानता रहा, आज पत्रकारिता के गिरते स्तर को देखते हुए वही आम समाज अब उन्हें काफ़ी हद तक नकारने लगा है। आज का अहम सवाल यह है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की गरिमा कैसे बचे? क्या छोटे-छोटे मीडिया संस्थानों के ईमानदार पत्रकार और सोशल मीडिया पर सक्रिय ईमानदार पत्रकार इस चौथे स्तंभ की गरिमा बचा सकेंगे?

एनडीटीवी को कैसे स्तरहीन किया गया हम सबने देखा ही है। बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन) पर भी प्रधानमंत्री की डाक्यूमेंट्री को लेकर भी उसी तरह शिकंजा कसा जाना था; लेकिन इस मामले में बीबीसी ने दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में साफ़ कह दिया कि सरकार को अधिकार नहीं है कि वह हेग कन्वेंशन के तहत उसके ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा चलाये। हेग कन्वेंशन में बीबीसी को जो अधिकार मिले हैं, उसके तहत भारत की अदालत उसके ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा नहीं चला सकती।

मुख्य सवाल यह है कि क्या भारत में मीडिया के गिरते स्तर के लिए सिर्फ़ चैनल ही ज़िम्मेदार हैं? इसी बार 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2023 यह बताते हैं कि भारत में सरकार का मीडिया के क्षेत्र में कितना प्रभावी दख़ल है। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 180 देशों के इस सूचकांक में 36.62 अंक के साथ भारत 161वें स्थान पर है। वर्ष 2022 में भारत की रैंक 150 थी। वहीं 2014 में 120 थी। 2016 में भारत की रैंकिंग 133 पर चली गयी थी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मामले में बहुत तेज़ी से पिछड़ा है, अर्थात् मीडिया के गोदी मीडिया होने में बढ़ोतरी हुई है, जिसके पीछे कॉरपोरेट सोच वाले मीडिया संस्थानों के मालिकों और पत्रकारों का लालच तो हैं ही, साथ ही सरकार का दबाव और अपना स्तुतिगान कराने की मंशा से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।

अगर हम भारत के दो महत्त्वपूर्ण पड़ोसी देशों की बात करें, तो श्रीलंका की रैंकिंग इस साल 135 है, जबकि पाकिस्तान की 150 है। मतलब ये दोनों देश प्रेस स्वतंत्रता के मामले में भारत से कहीं बेहतर हैं। अगर यही हाल रहा तो कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले आधे दशक के अंदर भारत का मीडिया स्वतंत्रता के मामले में आख़िरी पायदान पर खड़ा दिखे।

इस गिरावट की वजह ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारों के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा और पक्षपाती पत्रकारों के लिए राजनीतिक कोष के खुले दरवाज़े हैं। इसके साथ हीं कुलीन वर्गों द्वारा मीडिया आउटलेट्स का अधिग्रहण करना भी इसका एक कारण है, जो सत्ताधारी और बाहुबली नेताओं के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बनाए रखने में रुचि रखता हैं। मीडिया के पतन का तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है कॉरपोरेट घरानों की मीडिया में घुसपैठ, जिसे रोकना भारत में अब बिलकुल नामुमकिन हो गया है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने तो यहाँ तक दावा किया है कि भारत में कई पत्रकार अत्यधिक दबाव के कारण ख़ुद को सेंसर करने के लिए मजबूर हैं।

तसल्ली की बात यह है कि भारतीय पत्रकारिता के इस तेज़ी से गिरते स्तर के बावजूद कई पत्रकार ऐसे हैं, जो सोशल मीडिया के माध्यम से निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं और देश व समाज के मुद्दे लगातार उठा रहे हैं। कई मीडिया संस्थान भी अभी ऐसे बचे हैं, जिन्हें भले ही कोई सरकारी या ग़ैर-सरकारी विज्ञापन नहीं मिल रहा हो; लेकिन उन्होंने पत्रकारिता की गरिमा को ज़िन्दा रखे हुए है।

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आज की पत्रकारिता पर व्यावसायिकता हावी हो चुकी है; लेकिन अभी भी कई मीडिया संस्थान चलाने वालों की दिलचस्पी विशुद्ध पत्रकारिता में है। लेकिन फिर भी एक सवाल, जो और भी अहम है, वो यह है कि जो लाखों बच्चे देश में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं, उनका भविष्य कितना उज्ज्वल है? क्योंकि निजी फ़ायदे के लिए टीआरपी के खेल में फँसे अधिकतर मीडिया संस्थान ग़ुलामी और चाटुकारिता की पत्रकारिता की ओर अपने पत्रकार इंप्लाई को धकेल रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इसी तरह के लालची और पैसे की भूख से जुड़े पत्रकारों की एक भीड़ है, जो फेक न्यूज को बढ़ावा देने के लिए किसी भी हद तक चली जा रही है और पत्रकारिता का गला घोंट रही है, जिसका सीधा असर समाज पर तो पड़ रहा है, पत्रकारिता की छवि पर भी बहुत-ही बुरा पड़ रहा है। इसे सीधे शब्दों में कहा जाए, तो यही कहा जाएगा कि पत्रकारिता के सिद्धातों का पालन करने वालों की संख्या भारत में बहुत तेज़ी से घट रही है, जिससे लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है।

इन हालातों को बदलने में युवा पत्रकार अपनी भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इसके लिए शिक्षण संस्थानों से ही उनमें बदलाव की भावना भरने के साथ हीं उन्हें ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकार बनाने की दिशा में शिक्षकों को अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। क्योंकि देश को सही दिशा में ले जाने के लिए ईमानदार सरकारों के साथ ही पत्रकारों का ईमानदार होना बहुत ज़रूरी है। आज कुछ पत्रकार मीडिया को ग्लैमर की दुनिया का हिस्सा मानकर जिस तरह मोटी कमायी करने और अपनी धाक जमाने के लिए गाड़ी, बंगला और गाड़ी पर तथा घर की चौखट पर प्रेस अथवा पत्रकार लिखवाने के शौ$कीन हुए हैं, उसने उनके ज़मीर को मार दिया है और उन्हें मीडिया जैसे निष्पक्ष पेशे में एक लालची व्यापारी की तरह स्थापित किया है। लेकिन इसका नतीजा भी यह हुआ है कि जनता ने अभी तक कई ऐसे ही पत्रकारों पर हमले किये हैं और इस तरह के पत्रकारों की राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय छवि भी बुरी तरह ख़राब हुई है। बड़े-बड़े मीडिया हाउसेज के इन पत्रकारों की अपेक्षा स्वतंत्र रूप से और छोटे संस्थानों में काम करने वाले निष्पक्ष पत्रकारों की छवि में सुधार देखा गया है। हालाँकि सरकारों द्वारा ऐसे निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों के ख़िलाफ़ मुक़दमेबाज़ी और पुलिस कार्रवाई ने, अज्ञात लोगों के हमलों ने उन्हें भी डराने की कोशिश की है; लेकिन फिर भी कई पत्रकार ऐसे हैं, जिन्होंने बिना किसी से डरे अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता को ज़िन्दा रखा है और एक सच्चे पत्रकार का धर्म निभाया है।

दूसरी ओर पत्रकारों की एक ऐसी जमात भी है, जो अवैध कारोबारियों से; भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों से और यहाँ तक कि पुलिस तक से ह$फ्ता वसूली करने के काम में लगे हैं। ऐसे पत्रकार जनता के बीच निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों की छवि को भी ख़राब कर रहे हैं। आजकल चैनलों पर ऐसे पत्रकारों की हर रोज़ अखाड़ेबाज़ी होती है, जिनमें कुछ को छोडक़र ज़्यादातर पक्षपात के शिकार होते हैं। ये लोग लिफ़ाफ़ों के लज़न के आधार पर ही अपना पक्ष रखते हैं और यहाँ तक ड्रामा करते हैं कि एक-दूसरे के साथ अभद्रता पर भी उतारू हो जाते हैं। प्रेस क्लब में बैठकर दिन भर गप्पे मारने वाले यही पत्रकार एक साथ चाय की चुस्कियों का लुत्फ़ उठाते हुए नज़र आ जाएँ, तो हैरान होने की ज़रूरत नहीं; क्योंकि इनका काम ही है लिफ़ाफ़ा देने वाले अपने-अपने पक्ष के नेताओं को ख़ुश करना। ये वही पत्रकार हैं, जो आदर्श पत्रकार होने की छवि बनाये रखने के लिए भी हर तरह की ड्रामेबाज़ी करते हैं।

पत्रकारिता जगत की इन विसंगतियों के बीच आज के दौर में पत्रकार बनना उतना ही मुश्किल है, जितना कि आज के दौर में ग़लत को ग़लत साबित करना। बहुत आसानी से साल-दो साल के भीतर ही एक नामचीन पत्रकार बनने के साथ ही बंगला और गाड़ी की भूख ने युवा पत्रकारों को भी बुरी तरह भटका रखा है। इस छवि को बदल भी यही युवा पत्रकार सकते हैं। लेकिन उन्हें इसके लिए समझना होगा कि अगर टैलेंट है, तो मीडिया संस्थानों में भी अच्छी सेलरी मिलती है, जिससे उनकी ज़िन्दगी आराम से गुज़र सकती है। अगर कहीं मौक़ा नहीं है, तो पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया के दरवाज़े सहज ही खुल जाते हैं, जिसमें शुरू में सही दिशा में मेहनत करने पर एक अच्छी आमदनी हो सकती है और पत्रकारिता की आत्मा को ज़िन्दा रखने की ज़िम्मेदारी भी निभायी जा सकती है। बस एक ही बात ध्यान रखनी होगी कि निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों से सरकारें भी डरती हैं और इसका हालिया सबसे बड़ा उदाहरण है रवीश कुमार।

ध्यातव्य हो कि 30 मई को पत्रकारिता दिवस है। ऐसे में सभी पत्रकारों को एक संकल्प लेने की ज़रूरत है कि भारतीय लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को किसी भी हाल में ढहने नहीं देना है, भले ही कितना भी दबाव हो। मन से लालच निकालकर ख़ुद को बड़े स्तर पर स्थापित करने का सबसे अच्छा रास्ता आख़िर को निष्पक्षता और ईमानदारी का ही है। भले ही उसमें कुछ अड़चने शुरू शुरू में आनी तय हैं; लेकिन भविष्य ख़राब नहीं होगा।

राजनीति का माध्यम बन रहीं फ़िल्में

फ़िल्मों की सफलता-असफलता का ठेका क्यों लेने लगे हैं नेता?

बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जहाँ पैसा बरसता है, वहाँ झगड़ा भी होता है; राजनीति भी होती है। मगर फ़िल्मों के मामले राजनीतिक लोग हस्तक्षेप करने लगे हैं, जो कुछ ठीक संकेत नहीं हैं। कोई चार-पाँच साल से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ फ़िल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड का अड्डा उत्तर प्रदेश में बनाना चाहते हैं, यह अलग बात है कि उन्हें अभी तक इसमें सफलता नहीं मिली है मगर कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हार नहीं मानी है।

ऐसे ही देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी फ़िल्मों में रुचि रखते हैं। वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी उनके प्रमुख शौ$क हैं। यहाँ तक तो ठीक है, मगर जब यही राजनीतिक लोग फ़िल्मों की सफलता एवं असफलता का पर्याय बनने लगें, तो इसे ठीक नहीं माना जा सकता। फ़िल्मों की सफलता एवं असफलता का ठेका लेना देश के कार्यों में लगे लोगों को नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह कार्य दर्शकों का है। फ़िल्म की सफलता के लिए प्रयास करने का कार्य फ़िल्म के निदेशक एवं कलाकारों का है। फ़िल्म को पास करना भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन आने वाले केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड या भारतीय सेंसर बोर्ड का है, जो कि फ़िल्मों, टीवी धारावाहिकों, टीवी विज्ञापनों एवं अन्य प्रकार की दृश्य सामग्री की समीक्षा करने सम्बन्धी विनियामक निकाय है।

सेंसर बोर्ड के नाम से प्रसिद्ध सिनेमैटोग्राफ अधिनियम-1952 के तहत स्थापित केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड में एक अध्यक्ष के अतिरिक्त 25 ग़ैर-सरकारी सस्दयों का होना स्पष्ट करता है कि फ़िल्मों में राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए कोई जगह नहीं है। इस बोर्ड का कार्यालय भी मुंबई में है एवं इसके क्षेत्रीय कार्यालय बैंगलोर, कोलकाता, चेन्नई, कटक, गुवाहाटी, हैदराबाद, नई दिल्ली एवं तिरुवनंतपुरम में हैं। सेंसर बोर्ड की अनुमति के बाद ही कोई फ़िल्म रिलीज होती है, जिसके लिए वह प्रमाण-पत्र जारी करता है।

भारतीय सेंसर बोर्ड को नवनिर्मित फ़िल्मों, टीवी धारावाहिकों, टीवी विज्ञापनों एवं अन्य दृश्य सामग्री को विभिन्न श्रेणियाँ प्रदान करने का एवं उन्हें स्वीकार अथवा अस्वीकार करने का अधिकार है। मगर अब स्थिति यह आ गयी है कि स्वयं बड़े-बड़े राजनीतिक लोग फ़िल्मों की सफलता एवं असफलता के लिए प्रयास करने लगे हैं, जिसके लिए वे अब कुछ वर्षों से खुलकर सामने आ रहे हैं। ये राजनीतिक लोग जिन फ़िल्मों का समर्थन करते हैं, उन्हें इनके समर्थक देखने के लिए लालायित रहते हैं; मगर जिन फ़िल्मों का ये राजनीतिक लोग विरोध करते हैं, उन फ़िल्मों का इनके समर्थक हर हाल में विरोध करते हैं। मगर समाज का आईना माने जाने वाले फ़िल्म उद्योग में इस हद तक सरकारों का हस्तक्षेप अच्छी बात नहीं है।

उत्तर प्रदेश में द केरला स्टोरी कर मुक्त

इन दिनों विवाद फ़िल्म ‘द केरला स्टोरी’ को लेकर चल रहा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस फ़िल्म को अपने राज्य में पहले ही कर मुक्त कर चुके हैं। इसके बाद अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी ‘द केरला स्टोरी’ को कर मुक्त करने के अतिरिक्त इसे पूरे मंत्रिमंडल के साथ देखने के बाद कहा कि अघोषित आतंकवाद का एजेंडा है लव जिहाद। वास्तव में यह फ़िल्म कुछ हिन्दू युवतियों के अगवा होने एवं उनके धर्म परिवर्तन की कहानी है। अदा शर्मा की इस फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज होने पर ही बवाल शुरू हो गया था, अब यह विवाद न्यायालय तक पहुँच गया है।

पश्चिम बंगाल एवं तमिलनाडु में इस फ़िल्म पर पहले ही प्रतिबंद लगा दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस फ़िल्म की करुण कहानी को लेकर भावनात्मक टिप्पणी कर चुके हैं। केंद्रीय मंत्री सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने बंगाल एवं तमिलनाडु में फ़िल्म को प्रतिबंधित करने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम बंगाल फ़िल्म को बैन करके अन्याय कर रहा है।

तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति का यह खेल भारत की बेटियों की ज़िन्दगी की बर्बाद कर रहा है। इधर ‘द केरला स्टोरी’ के निर्माता विपुल शाह ने बंगाल में फ़िल्म के बैन करने को लेकर नाराज़गी जतायी है। उन्होंने कहा है कि हमारी फ़िल्म आतंकवाद पर है, जिसमें तीन लड़कियों की कहानी है। यह समस्या केवल भारत की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। पश्चिम बंगाल में फ़िल्म पर प्रतिबंध को लेकर हम $कानूनी प्रावधानों के तहत लड़ेंगे।

कुल मिलाकर इस फ़िल्म को उन राज्यों में बढ़ावा दिया जा रहा है, जहाँ भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। इसी के चलते पहले मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सिंह सरकार ने ‘द केरला स्टोरी’ को कर मुक्त किया, उसके बाद उत्तर प्रदेश में भी इस फ़िल्म को कर मुक्त कर दिया गया। अन्य राज्यों में भी इस फ़िल्म को लेकर समर्थन एवं विरोध जारी है।

कई फ़िल्में हो चुकी हैं कर मुक्त

फ़िल्मों में राजनीतिक लोगों की दिलचस्पी कोई नयी बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत मुलायम सिंह यादव भी फ़िल्मों में रुचि रखते थे, मगर मुलायम सिंह यादव के बारे में जगज़ाहिर है कि वे कला प्रेमी थे। साहित्यकारों का जो सम्मान मुलायम सिंह यादव ने किया, वो सम्मान अब बिरले ही राजनीतिक लोग करते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी फ़िल्मों में रुचि रखते हैं। उन्होंने सलमान ख़ान की फ़िल्म बजरंगी भाईजान को प्रदेश में कर मुक्त कर दिया था। इससे पहले भी कई फ़िल्मों को प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारों ने कर मुक्त किया है, जिसमें ‘हमारी अधूरी कहानी’, ‘पीके’, ‘तेवर’, ‘डेढ़ इश्क़िया’, ‘मैरीकॉम’, ‘मर्दानी’ जैसी फ़िल्में कर मुक्त हो चुकी हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी ‘द केरला स्टोरी’ से पहले कई फ़िल्मों को बढ़ावा दिया है एवं कई फ़िल्मों का विरोध भी उनके माध्यम से सामने आया है।

कर मुक्ति से राजस्व की हानि

फ़िल्मों को कर मुक्त करने से केवल उत्तर प्रदेश सरकार को कई 100 करोड़ की हानि होती है। सलमान ख़ान की फ़िल्म ‘बजरंगी भाईजान’ को कर मुक्त करने से प्रदेश सरकार को 67.9 लाख रुपये की हानि हुई थी। वहीं हमारी अधूरी कहानी से लगभग एक करोड़ रुपये की हानि हुई। ‘डेढ़ इश्क़िया’ एवं ‘मैरीकॉम’ से भी लाखों रुपये के राजस्व की हानि हुई। मर्दानी फ़िल्म को कर मुक्त करने से लगभग 80 लाख रुपये की हानि हुई। अब ‘द केरला स्टोरी’ के कर मुक्त होने से उत्तर प्रदेश सरकार को लाखों के अथवा संभवत: करोड़ों के राजस्व की हानि हो सकती है।

कई हैं विवादत फ़िल्में

‘द केरला स्टोरी’ के अतिरिक्त पहले भी कई फ़िल्मों विवादों में रही हैं। इन विवादित फ़िल्मों पर अलग अलग राज्यों की सरकारों ने अपनी रुचि के अनुरूप इन्हें स्वीकार अथवा अस्वीकार किया है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ फ़िल्म में तो सीधे भारत सरकार ने रुचि दिखायी। कथित आरोप है कि इस फ़िल्म को भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने बढ़ावा दिया एवं इसे ऑस्कर पाने तक के लिए जबरन प्रयास किये गये।

‘द कश्मीर फाइल्स’ पर विवाद इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया से शुरू हुआ, जहाँ स्वयं जूरी हेड नादव लैपिड ने फ़िल्म की निंदा करते हुए इस फ़िल्म को एक प्रोपेगेंडा और वल्गर फ़िल्म बताया था। ऑस्कर भी इस फ़िल्म को नहीं मिल सका। इस फ़िल्म को बढ़ावा देने के आरोप भारत सरकार, भारत सरकार के मंत्रियों, यहाँ तक कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगे। द कश्मीर फाइल्स से पहले कई फ़िल्मों का विरोध एवं समर्थन स्पष्ट दिखता रहा है। कई फ़िल्मों में तो यहाँ तक विवाद हुआ है कि लोगों ने थिएटरों को आग लगा दी है।

प्रधानमंत्री पर फ़िल्म, वेब सीरीज

वास्तव में फ़िल्म जगत पैसे एवं राजनीतिक दबदबे का शिकार हो चुका है। राजनीतिक लोग अपनी मनमर्जी इसमें जबरन ठूँसने लगे हैं एवं अपने ऊपर फ़िल्में बनाने में रुचि दिखाने लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी अपने ऊपर फ़िल्म बनवाने का कथित आरोप लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर, 2019 ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ फ़िल्म रिलीज हुई, जिसमें प्रधानमंत्री की भूमिका विवेक ओबेरॉय ने निभायी। 2022 में जब अपना 72वाँ जन्मदिन मनाया, तो तमाम बॉलीवुड हस्तियाँ उनके इस जन्मदिन में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हुईं। इसी दौरान इस वर्ष से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कई फ़िल्में एवं वेब सीरीज आनी शुरू हुईं।

मगर हैरानी हुई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी फ़िल्म कुछ विशेष नहीं चली। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी वेब सीरीज ‘मोदी-जर्नी ऑफ अ कॉमन मैन’ भी बहुत लोकप्रिय नहीं हो सकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी इस वेब सीरीज का दूसरा भाग ‘मोदी सीजन-2’ भी बना है। इसके अलावा एक और नरेन फ़िल्म भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बन चुकी है, मगर यह फ़िल्म जारी नहीं हो सकी है। इस फ़िल्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना स्वामी विवेकानंद से करने के आरोप हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फ़िल्म ‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’ बनवाने का कथित आरोप है। वर्ष 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी इस फ़िल्म में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का किरदार दिखाया गया है, जिसमें उन्हें एक दमदार नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

फ़िल्मों में योगी की रुचि

फ़िल्मों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रुचि भी जगज़ाहिर है। वह बॉलीवुड को नोएडा फ़िल्म सिटी सेंटर लाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त उनके ऊपर एक फ़िल्म बनने का चर्चा भी रहा है, जिसका नाम ज़िला गोरखपुर बताया जा रहा है। इस फ़िल्म का पोस्टर भी जारी हुआ था, मगर फ़िल्म कब बनेगी, बनेगी भी या नहीं बनेगी, इसे लेकर कोई जानकारी नहीं है।

ऐसा भी कहा जाता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक फ़िल्म ‘जाग मछन्दर गोरख आया’ की पटकथा भी लिख चुके हैं, जो कि साल 2013 में रिलीज हुई थी। कहा जाता है कि योगी आदित्यनाथ ने इस फ़िल्म की कहानी अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ के कहने पर लिखी थी। मछेन्द्र नाथ गुरु गोरखनाथ के गुरु थे। इसमें संदेह नहीं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की फ़िल्मों में रुचि कला के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। मगर उन्हें इसके लिए धर्म का चश्मा हटाने की आवश्यकता है; क्योंकि कला धर्म एवं जाति से परे सम्पूर्ण मानव जगत का कल्याण करने लिए होती है।

ताक़तवरों के मकडज़ाल में फँसता झारखण्ड

झारखण्ड के एक और आईएएस छवि रंजन निलंबित हो गये। राज्य सरकार ने 6 मई को उन्हें निलंबित कर दिया। उन पर रांची के उपायुक्त रहते हुए ज़मीन फ़र्ज़ीवाड़ा करने का आरोप है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 4 मई को 10 घंटे की पूछताछ के बाद छवि रंजन को गिरफ़्तार किया था। ईडी उन्हें रिमांड पर लेकर पूछताछ कर रही है। झारखण्ड राजनीतिक आकाओं की सरपरस्ती में कारोबारी, बिल्डर और आईएएस के मकडज़ाल में किस तरह फँसता जा रहा है, ईडी की कार्रवाई ने इसे साफ़ कर दिया है। केवल एक सेना की 4.55 एकड़ के फ़र्ज़ीवाड़े का मामला नहीं है।

रांची के कई और भूखंडों का फ़र्ज़ीवाड़ा सामने आया है। करोड़ों रुपये का लेन-देन हुआ। इससे पहले निलंबित आईएएस पूजा सिंघल मनरेगा घोटाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ईडी की गिरफ़्त में आ चुकी हैं। वह भी जेल में हैं। उस मामले की भी जाँच चल रही है। लोगों के बीच एक सवाल तैर रहा कि क्या राज्य में केवल एक छवि रंजन या पूजा सिंघल ही ऐसे आईएएस अधिकारी हैं, जो आरोप में घिरे हैं? इसका जवाब भी लोग ख़ुद ही देते हैं। ये पकड़े गये तो नज़र आये हैं, नहीं तो कई और अधिकारी आरोपों में घिरे और बचे हुए हैं। उनके ख़िलाफ़ जाँच आगे नहीं बढ़ी और मामले फाइलों में धूल फाँक रही हैं। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है।

सच साबित हुआ आईएएस का लेख

मध्य प्रदेश की 1994 बैच की महिला आईएएस दीपाली रस्तोगी ने कुछ साल पहले अंग्रेजी अख़बार में एक लेख लिखा था। उस वक़्त यह लेख काफ़ी चर्चित हुआ था। इस लेख को भारतीय नौकरशाही के लिए ‘आई ओपनर’ कहा जाता है। रस्तोगी ने लिखा हम अपने बारे में, अपनी बुद्धिमत्ता के बारे में और अपने अनुभव के बारे में बहुत ऊँची राय रखते हैं। सोचते हैं कि लोग इसी वजह से हमारा सम्मान करते हैं, जबकि असलियत यह है कि लोग हमारे आगे इसलिए समर्पण करते हैं, क्योंकि हमें किसी को फ़ायदा पहुँचाने या किसी का नुक़सान करने की ताक़त दी गयी है। हमें वेतन और सुविधाएँ इसलिए मिलती हैं कि हम अपने काम को कुशलता से करें और सिस्टम विकसित करें। सच्चाई यह है कि हम कुप्रबंध और अराजकता फैला कर पनपते हैं, क्योंकि ऐसा करने से हम कुछ को फ़ायदा पहुँचाने के लिए चुन सकते हैं और बाक़ी की उपेक्षा कर सकते हैं।

दीपाली रस्तोगी ने अपने लेख में यह भी लिखा था कि ‘हमें भारतीय गणतंत्र का स्टील फ्रेम माना जाता है। सच्चाई यह है कि हममें दूरदृष्टि ही नहीं होती। हम अपने राजनीतिक आकाओं की इच्छा के अनुसार औचक निर्णय लेते हैं। हम पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का अपनी जागीर की तरह अपने फ़ायदे में या अपने चहेते लोगों के फ़ायदे में शोषण करते हैं।’ उन्होंने आगे लिखा था कि ‘हमें लगता है कि इतने पॉवर में हैं कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। हक़ीक़त देश में सही न्याय होता, तो हमारी क़ौम बहुत पहले ही ख़त्म हो जाती या दुर्लभ होती।’

यह बात कुछ हद तक सही भी है। क्योंकि छवि रंजन के बारे में जो बातें सामने आ रही हैं, ये सब तो आईएएस अधिकारियों पद के ग़ुरूर और राजनीतिक आकाओं की सरपरस्ती को ही झलकाता है। सूत्रों की मानें, तो छवि रंजन को राज्य के कुछ वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने इस तरह का काम नहीं करने की सलाह दी थी। वह बोलते थे- दस्तावेज़ कभी नहीं मरते। उस वक़्त छवि रंजन का जवाब था कि ‘अपने लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। ऊपर के कहने पर कर रहे हैं। दस्तावेज़ मरते नहीं, जलते तो हैं न।’

ऊपर कौन है, यह तो सभी जानते ही हैं; लेकिन दस्तावेज़ कितने जले यह छवि रंजन के अलावा शायद ही किसी को पता हो। यह हाल केवल छवि रंजन या पूजा सिंघल का नहीं है, जो भी पद के ग़ुरूर और राजनीतिक आकाओं की सरपरस्ती में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उन सभी भ्रष्ट आईएएस पर रस्तोगी की बातें सटीक बैठती हैं।

छवि रंजन पर कई आरोप

छवि रंजन की गिरफ़्तारी चौंकाने वाली नहीं थी। वह 2011 बैच के आईएएस हैं। केवल 12 साल के करियर में छवि रंजन ने जिस तरह की अपनी ‘छवि’ बना ली थी, उसमें कभी न कभी इस तरह के हालात का आना तय माना जा रहा था। सेना की भूमि समेत अन्य भूखंडों के फ़र्ज़ीवाड़ा में फँसे छवि रंजन के ख़िलाफ़ पहले भी कई आरोप लग चुके हैं। वह हमेशा से विवाद में रहे हैं। जुलाई 2020 में छवि रंजन को रांची उपायुक्त बनाया गया। वह जुलाई 2022 तक इस पद पर रहे। इस दौरान एक संवेदक ने हथियार का लाइसेंस देने के बदले पाँच लाख रुपये रिश्वत माँगने, हाईकोर्ट के अधिवक्ता एक अधिवक्ता को धमकाने समेत अन्य आरोप लगे। इससे पहले कोडरमा के उपायुक्त थे, तो अवैध रूप से पेड़ कटवाने का आरोप लगा था; जिसमें एसीबी की जाँच हुआ मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है।

बचते रहे कई भ्रष्ट

क्या झारखण्ड में भ्रष्टाचार की एकमात्र प्रतीक पूजा सिंघल या छवि रंजन ही हैं या पाप की इस नाली में डुबकी लगाने वाले किरदार और भी हैं? लोग यह सवाल पूछते भी हैं और चर्चा होने पर इसका जवाब भी देते हैं। लोग कहते हैं राज्य में भ्रष्ट अधिकारियों की कमी नहीं है। यही वजह है कि राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है। झारखण्ड में खनिज के अवैध धंधे के साथ ज़मीन और अन्य भ्रष्ट कामों के लिए राजनेता, कारोबारी, बिल्डर और अधिकारियों का एक नया नेक्सेस तैयार हो गया है। नौकरशाह बेफ़िक्र इसलिए होते हैं, क्योंकि वह कभी-कभार ही लपेटे में आते हैं।

सूत्रों की मानें, तो राजभवन से बीते वर्ष आरोपित आईएएस की सूची माँगी गयी थी, जिसमें किन पर क्या आरोप है और जाँच कहाँ लंबित है यह ब्योरा भी माँग गया था। सूत्र बताते हैं कि इसमें पूजा सिंघल, छवि रंजन जैसे लगभग दर्ज़न भर आईएएस अधिकारियों के नाम थे। जिनके कारनामे फाइलों में दम तोड़ रही हैं। अगर सरकारी फाइलों को खँगालें, तो स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव सह विकास आयुक्त अरुण कुमार सिंह, पथ व भवन निर्माण सचिव सुनील, आईएएस किरण, संयुक्त सचिव गोपालजी तिवारी जैसे कई अधिकारी हैं, जिन पर आरोप लगे हैं। इनका मामला सीबीआई, एसीबी तो विभागीय स्तर जैसी जाँच एजेंसियों के पास फँसा पड़ा है। सरकार फाइल दाब कर बैठी हुई है।

दो और आईएएस निशाने पर

ईडी राज्य में ज़मीन फ़र्ज़ीवाड़ा के अलावा अवैध माइनिंग, मनी लॉन्ड्रिंग समेत अन्य मामलों की जाँच कर रही है। फ़िलहल दो आईएएस राजीव अरुण एक्का और रामनिवास यादव से पूछताछ हो चुकी है। आईएएस राजीव अरुण एक्का पर पॉवर ब्रोकर विशाल चौधरी के ऑफिस में सरकारी फाइलें पूछताछ कर निपटाने का आरोप है। इस मामले की जाँच के लिए राज्य सरकार ने रिटायर्ड चीफ जस्टिस बी.के. गुप्ता की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का गठन भी किया है। वहीं आईएएस रामनिवास से साहिबगंज में अवैध खनन में संदेह के घेरे में हैं।

उधर, पॉवर ब्रोकर प्रेम प्रकाश, व्यवसायी विष्णु अग्रवाल, रांची और कोलकाता के रजिस्ट्रार समेत ज़मीन दलाल, अवैध खनन से जुड़े लोग और अन्य से पूछताछ की जा चुकी है। कुछ जेल में न्यायिक हिरासत में हैं, तो कुछ अभी तक बचे हुए हैं। ईडी कई लोगों को आगे पूछताछ के लिए बुलाने की तैयारी कर रही है। उनके ख़िलाफ़ सुबूत जुटाने में लगी है। जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ेगी ईडी का शिकंजा कसता जाएगा।

स्थिति बदलने की उम्मीद

झारखण्ड में भ्रष्टाचार के हर दिन नये क़िस्से सामने आते हैं। भ्रष्टाचार और घूसख़ोरी को हम चाहे कितना भी कोस लें, यह हक़ीक़त है कि आज हमारे सिस्टम का अंग बन गया है। इस अंग को हर हाल में काटकर अलग करना ही होगा। एक तरफ़ हम विश्व गुरु बनने का सपना देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ पूजा सिंघल और छवि रंजन जैसे नौकरशाह हैं, जो 130 करोड़ लोगों के इस सपने को इस सड़ांध में डुबोने के लिए तैयार बैठे दिखायी देते हैं।

आज भी राज्य में कई ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी हैं, जो वाक़ई ईमानदारी से काम करना चाहते हैं। इनको राजनीति के चतुर खिलाडिय़ों, भ्रष्ट नौकरशाहों की अति महत्त्वाकांक्षा और पैसा कमाने की अंधाधुंध होड़ ने पीछे धकेल दिया है। इन्हें आगे लाने की ज़रूरत है। इसके लिए सरकार को मज़बूत होना होगा। नहीं तो जनता तो यही उम्मीद रखेगी कि जाँच एजेंसियों के $खौफ़ में ही सही कभी-न-कभी तो स्थिति बदलेगी।

असुरक्षित औद्योगिक क्षेत्र

पंजाब के मानचित्र में लुधियाना शहर एक औद्योगिक हब के रूप में अपनी ख़ास पहचान रखता है और यहाँ प्रवासी आबादी भी हज़ारों में है। इसी औद्योगिक नगरी में बीती 30 अप्रैल को एक दर्दनाक हादसा हुआ, जिसमें 11 लोगों ने अपनी जान गँवा दी। लुधियाना का ग्यासपुरा इलाक़ा जहाँ उद्योग भी हैं और लोग रहते भी हैं, वहाँ 30 अप्रैल की सुबह क़रीब 7:00 बजे एक किराना की दुकान पर दूध लेने आये कुछ लोग बेहोश होने लगे। और देखते-ही-देखते लोग मरने लगे। प्राथमिक जाँच से पता चला कि जहाँ गैस रिसी, वहाँ से सीवर लाइन गुज़र रही है। सीवर में केमिकल डाला गया था, जिसके चलते गैस बन गयी होगी। मृतक बिहार व उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे।

इस दर्दनाक हादसे में बिहार के गया के धनु बिगहा गाँव के एक परिवार के पाँच सदस्यों की मौत हो गयी। लुधियाना की उपायुक्त सुरभि मलिक ने पत्रकारों को बताया कि ऐसी आशंका है कि सीवर में कुछ रसायनों की मीथेन गैस से प्रतिक्रिया हुई होगी। आशंका जतायी गयी है कि मौतों की वजह हाइड्रोजन सल्फाइड गैस हो सकती है। उपायुक्त ने यह भी जानकारी साझा की कि जान खोने वालों में ‘वसन सम्बन्धी कोई समस्या नहीं पायी गयी। उन्होंने कहा कि ऐसी आशंका है कि न्यूरोटॉक्सिन (विषाक्त पदार्थ के सम्पर्क में आने से तंत्रिका तंत्र की सामान्य गतिविधि में बदलाव) की वजह से मौत हुई हो। अतिरिक्त उपायुक्त अमरजीत सिंह बैंस का कहना है कि उस इलाक़े में एक टूटा हुआ मैनहोल मिला है और उसमें से तेज़ बदबू आ रही थी।

ऐसी आशंका है कि उस जगह से सीवरेज में रसायन डाला गया हो। इस रासायनिक दुर्घटना के फ़ौरन बाद पंजाब की सरकार ने जाँच कमेटी बिठा दी और मुआवज़े का भी ऐलान कर दिया गया। पंजाब सरकार ने घटना में मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और घायलों को 50,000 रुपये के मुआवज़े की घोषणा की। घायलों के उपचार का ख़र्च भी सरकार उठा रही है। उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य के मरने वाले पाँच लोगों के आश्रितों को मुख्यमंत्री राहत कोष से दो-दो लाख रुपये अनुदान देने का ऐलान कर दिया। यही नहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी ) अर्थात् राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने राज्य सरकार को पीडि़तों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। सरकार कह रही है कि वह इस मामले को लेकर कड़ा रुख़ अपना रही है और अपराधियों का पता चलते ही उनके ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी। अब सवाल यह भी उठता है कि हादसा होने पर ही सरकार ऐसे बयान क्यों देती है?

सरकारी अधिकारी ही कह रहे हैं कि आधे ढके मैनहोल में किसी ने अम्लीय रसायन डाल दिया होगा। लुधियाना के नगर निगम के कर्मचारियों को क्या यह मैनहोल नज़र नहीं आया होगा और उसकी मरम्मत क्यों नहीं की? इसकी जवाबदेही कौन लेगा? एक हक़ीक़त जिससे वहाँ के स्थानीय लोग व ज़िला प्रशासन भी वाक़िफ़ हैं कि ग्यासपुरा में नट्स व बोल्ट्स और इलेक्ट्रोप्लेटिंग उत्पादन की कई इकाइयाँ हैं, जिनसे ज़हरीले रसायन बनते हैं। घरों में भी कुछ इकाइयाँ चलती हैं और वहीं के सीवरेज लाइन में कारख़ानों के अपशिष्ट पदार्थ का निपटान कर देते हैं। लुधियाना के पुलिस आयुक्त मनदीप सिंह सिद्धू ने भी इस हक़ीक़त को इस तरह बयाँ किया-इस तरह की रिपोर्ट है कि कुछ औद्योगिक इकाइयाँ अपने अपशिष्ट पदार्थों को मैनहोल में डाल देते हैं। यदि ग्यासपुरा गैस हदासे की यही वजह है, तो उद्योगपतियों व पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सम्बन्धित अधिकारियों के नाम भी एफआईआर में जोड़े जाएँगे।’

अपराधियों का पता लगाने के लिए विभिन्न कमेटियों का गठन किया गया है। मजिस्ट्रेट जाँच कमेटी का गठन किया गया, पाँच सदस्यीय वाली एसआईटी भी जाँच में जुट गयी है। यही नहीं राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया व पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अध्यक्षता में आठ सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम का गठन किया है और टीम को एक महीने के अंदर यानी 30 जून तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का कहा है। इसके साथ ही ज़िला प्रशासन को ज़हरीली गैस से मरने वाले लोगों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। यह भी स्पष्ट कर दिया कि राज्य सरकार बाद में यह राशि उन लोगों से वसूल सकती है, जो हादसे के लिए दोषी पाये जाएँगे। एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोयल हैं। जस्टिस आदर्श कुमार गोयल, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और डॉ. सेंथिल ब्रेल जो कि विषेशज्ञ हैं कि बैंच ने कहा कि घटना के कारणों का पता लगाना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उपचारात्मक कार्रवाई करना और पीडि़तों को मुआवज़ा देना आवश्यक है। नागरिकों की सुरक्षा के लिए पर्यावरणीय मानदंडों का अनुपालन सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है।’

एनजीटी का यह हस्तक्षेप एनजीटी एक्ट के सेक्शन-15 के तहत आता है। एनजीटी ने एम.सी. मेहता बनाम भारत सरकार और अन्य, एमसीडी बनाम उपहार त्रासदी पीडि़त एसोसिएशन मामलों पर भरोसा करने का ज़िक्र किया और कहा कि इन मामलों में राज्य और निजी दोनों सस्ंथाओं द्वारा पर्यावरणीय मानदंडों के उल्लघंन के परिणामस्वरूप होने वाली मौतें और चोटों सम्बन्धित मसलों को सुलझाया गया था। एनजीटी ने यह भी साफ़ किया कि ऐसे मामलों में मृतक के परिजन आमतौर पर 20 लाख रुपये के हक़दार होते हैं। ग़ौरतलब है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की स्थापना राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम-2010 के तहत पर्यावरण बचाव और वन संरक्षण और अन्य प्राकृतिक संसाधन सहित पर्यावरण से सम्बन्धित किसी भी क़ानूनी अधिकार के प्रवर्तन और क्षतिग्रस्त व्यक्ति अथवा सम्पत्ति के लिए अनुतोष और क्षतिपूर्ति प्रदान करना और इससे जुड़े हुए मामलों का प्रभावशाली और तीव्र गति से निपटारा करने के लिए किया गया है। यह एक विशिष्ट निकाय है। एनजीटी की स्थापना के साथ ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद भारत एक विशेष पर्यावरण अधिकरण स्थापित करने वाला दुनिया की तीसरा देश बन गया। ऐसा करने वाला भारत पहला विकासशील देश है। भारत ने एनजीटी का गठन कर दुनिया में यह संदेश दे दिया कि वह ऐसे मुद्दों के प्रति गंभीर है। लेकिन सवाल यह है कि भोपाल गैस त्रासदी के बाद बने सुरक्षा नियमों पर सख़्ती से अमल क्यों नहीं होता?

भोपाल गैस त्रासदी के फ़ौरन बाद सरकार ने पर्यावरण को नियमित करने एवं सुरक्षा उपायों व दंडों को निर्धारित करने व निर्दिष्ट करने वाले कई क़ानून बनाये। मसलन, भोपाल गैस रिसाव (दावों की प्रक्रिया) अधिनियम-1985, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1986, सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम-1991, ख़तरनाक रसायनों के निर्माण, भंडारण और आयात नियम-1989, रासायानिक दुर्घटनाएँ (आपातकाल, योजना निर्माण, तैयारी और प्रतिक्रिया) नियम-1996, राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम-1997 इत्यादि। आख़िर सरकार का काम महज़ क़ानून बनाना ही नहीं है, बल्कि उनका सख़्ती से पालन सुनिश्चित कराना भी है। इस सब के लिए कई विभागों का गठन किया जाता है; लेकिन क्या वजह है कि देश में रासायनिक दुर्घटनाओं की ख़बरें आती रहती हैं। लोग अपनी जान गँवा देते हैं।

औद्योगिक इकाइयाँ नियमों के पालन के प्रति लापरवाही वाला रुख़ क्यों अख्तियार करती हैं। औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों के निपटान के लिए उचित व्यवस्था का हर जगह नहीं होना भी प्रशासन व सम्बन्धित विभागों पर सवालिया निशान लगाता है। दरअसल गैस लीक का यह मामला केवल लुधियाना तक ही सीमित नहीं है। इस मामले ने तो एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि देश में ऐसे इलाक़ों में जहाँ उद्योग व रिहायशी बस्तियाँ साथ-साथ हैं, वहाँ हालात किस क़दर ख़राब हैं। ऐसे मिश्रित लैंड यूज वाले इलाक़ों में प्रदूषण की निगरानी सख़्ती से होनी चाहिए और वहाँ की सीवरेज व्यवस्था का प्रबंधन भी बढिय़ा होना चाहिए। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास अच्छी प्रयोगशालाएँ व विशेष इकाइयाँ भी हैं; लेकिन राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ऐसी अनुकूल विशेषताओं से लैस नहीं है। इसी फरवरी माह में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने राज्यसभा को बताया कि प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण कमेटियों में 49 प्रतिशत पद ख़ाली हैं।

बीते साल सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च ने नौ प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का अध्ययन किया, जिसमें पंजाब भी शामिल है। इस अध्ययन से पता चला कि इन बोर्ड के सदस्यों में वैज्ञानिक, मेडिकल प्रैक्टिस करने वाले और शिक्षाविद की संख्या सात प्रतिशत है, जबकि प्रदूषण फैलने की संभावना जिन पर अधिक होती है; जैसे कि उद्योगपति, और निजी सेक्टर निगमों का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत से भी अधिक है। ऐसे में राज्य सरकारों की मंशा सवालों के घेरे में आती है। देष में बार-बार होने वाले ऐसे हादसे ख़तरे की घंटी तो बजाते हैं पर नतीजा हम सब जानते हैं। लुधियाना गैस त्रासदी के असली अपराधी कब पकड़े जाएँगे, उन्हें क्या सज़ा मिलती है, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा।

आदिवासियों को नहीं मिल रहे एसटी प्रमाण-पत्र

किसी आदिवासी व्यक्ति के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) का सर्टिफिकेट सिर्फ़ उसे सरकारी नौकरियों और सरकारी योजनाओं का फ़ायदा लेने मात्र के लिए नहीं होता है, बल्कि वह उसकी पहचान, परंपरा, संस्कृति और अधिकारों का भी आधार होता है। लेकिन मध्य प्रदेश में ऐसे कई आदिवासी समुदाय हैं, जिन्हें अनुसूचित जनजाति के सर्टिफिकेट के लिए मशक़्क़त करनी पड़ रही है।

मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय भील, भिलाला, पटेलिया जो मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अधिसूचित जनजाति सूची में क्रमांक 07 पर दर्ज हैं। इस समुदाय के लगभग 75,000 लोग मध्य प्रदेश के ही झाबुआ, अलीराजपुर, धार आदि ज़िले से अपना घर परिवार ज़मीन-जायदाद सब छोडक़र 50 वर्ष पूर्व श्योपुर ज़िले में चले गये। यह आबादी श्योपुर ज़िले के लगभग 35 गाँवों में निवासरत है।

इन समुदायों को श्योपुर ज़िले में वर्ष 2010 तक हस्तलिखित और वर्ष 2014 तक ऑनलाइन डिजिटल स्थायी अनुसूचित जनजाति का सर्टिफिकेट दिया जाता था। किन्तु वर्ष 2014 के बाद सम्बन्धित अनुविभागीय अधिकारियों द्वारा आदिवासी आवेदकों को 1950 की स्थिति में निवास की पुष्टि न होने का कारण बताकर अनुसूचित जनजाति के सर्टिफिकेट के लिए किया गया आवेदन निरस्त कर दिया जाता है। यदि श्योपुर के आदिवासी सन् 1950 की स्थिति में झाबुआ, अलीराजपुर, धार ज़िले में निवासरत अपने पूर्वजों के पता से आवेदन करते हैं, तो सम्बन्धित अनुविभागीय अधिकारी द्वारा निवास व जाति तथा परिवार की पुष्टि न होने का हवाला देकर उक्त आवेदन को भी निरस्त कर दिया जाता है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ज़िले के बरगवां में लगाई चौपाल और उसके बाद पीएम के कार्यक्रम से पहले कराहल आने पर इस सम्बन्ध में आश्वासन दे चुके हैं। इसके बावजूद इन तीनों आदिवासी समुदायों को जाति प्रमाण-पत्र पाने के लिए भटकना पड़ रहा है। इस प्रकार श्योपुर ज़िले में निवासरत इन तीनों आदिवासी समुदाय के युवाओं जहाँ छात्रवृत्ति, नौकरी एवं अन्य सरकारी योजनाओं से वंचित हो रहे हैं, वहीं इस समुदाय के लगभग 75,000 लोगों के समक्ष अपनी पहचान का भी संकट खड़ा हो गया है।

मध्य प्रदेश के सिवनी और छिंदवाड़ा में निवासरत गोंड जनजाति की उपजाति अगरिया समुदाय, जिन्हें गोंडी लोहार का दर्जा दिया गया है; को भी अनुसूचित जनजाति के सर्टिफिकेट के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। अगरिया समुदाय की आबादी लगभग 2,00,000 है। इन्हें लौह धातु का खोजकर्ता भी कहा जाता है। माना जाता है कि अगरिया लोग आदिकाल से लोहा गलाकर लौह अयस्क की गर्म भट्टी पर औज़ार बनाने का कार्य करते रहे हैं। अगरिया लोगों का नेग, दस्तूर, संस्कृति, रीति-रिवाज़ सब गोंड आदिवासी समुदाय के अन्य उपजातियों की तरह ही है। अगरिया लोगों का रहन-सहन, रिवाज़, परम्परा, सब कुछ अन्य हिन्दू (ओबीसी) लोहारों से भिन्न है। फिर भी मध्य प्रदेश सरकार अगरिया जनजाति के लोगों को लोहार जाति का मानकर ओबीसी का सर्टिफिकेट जारी करती है।

लौह प्रगलक अगरिया जनजाति, ज़िला सिवनी इकाई के अध्यक्ष प्रमोद कुमार बामनिया कहते हैं- ‘हमारा समाज आदिकाल से ही लोहा गलाने का कार्य करता रहा है। आज के समय में अगरिया जनजाति काफ़ी पिछड़ा और वंचित समाज है। सरकारी नौकरियों में हमारी भागादीरी नहीं है। हम लोग गोंड जनजाति के उपजाति में आते हैं, फिर भी मध्य प्रदेश सरकार हमें जनजाति का सर्टिफिकेट नहीं दे रही है।’

प्रमोद कुमार बामनिया आगे कहते हैं- ‘जिस प्रकार गोंड क्षेत्र में गाय चराने वाले गोंड जनजाति की उपजाति गोवारी को गुडेरा अहीर कहते हैं और उन्हें मध्य प्रदेश शासन द्वारा गोंड गोवारी जनजाति का सर्टिफिकेट दिया जाता है तो हमें क्यों जनजाति सर्टिफिकेट से वंचित रखा जा रहा है। जबकि सम्पूर्ण आदिवासी गोंड परधान व अन्य आदिवासी समाज भी अगरिया को आदिवासी मानता है, तो मध्य प्रदेश शासन हमें जनजाति सर्टिफिकेट क्यों नहीं दे रहा है?’

बामनिया सरकार से सवाल करते हैं- ‘मध्य प्रदेश के जनजाति सूची क्रमांक-16 में अंकित गोंड जाति की उपजाति अगरिया / गोंडी लुहार की स्पष्ट व्याख्या नहीं की जाकर सिर्फ़ अगरिया क्यों किया गया है। आज शासन आज़ादी का 75वीं वर्षगाँठ मना रहा है; लेकिन जो समाज पीछे छुट गया है। शासन उस समाज को आगे लाने का प्रयास क्यों नहीं कर रहा है? अगरिया और गोंडी लुहार एक ही हैं, फिर शासन स्पष्ट व्याख्या क्यों नहीं कर रहा है, क्यों अगरिया लोगों को जनजाति सर्टिफिकेट से वंचित किया जा रहा है?’

परिवार एजुकेशन में एजुकेशन को-ऑर्डिनटर मुन्ना पटेलिया कहते हैं- ‘श्योपुर ज़िले के कराल ब्लॉक में भील, भिलाला और पटेलिया समाज के सन् 2013 तक जब ऑफलाइन अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्र बनते थे। लेकिन 2014 से ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू कर दी गयी, तबसे अनुसूचित जनजाति के सर्टिफिकेट देने में प्रशासनिक अधिकारी आनाकानी कर रहे हैं। अधिकारी बोलते हैं कि आप लोग पहले जहाँ के (इंदौर संभाग के सभी ज़िलों के) स्थायी निवासी थे, वहीं से सर्टिफिकेट बनवाकर लाओ। जबकि इंदौर संभाग से इन जातियों के लगभग 75,000 लोग 50-55 साल पहले चंबल संभाग के श्योपुर ज़िले की कराल तहसील में बस गये थे। अब जब तीसरी पीढ़ी यहाँ की मूल निवासी हो चुकी है, तो फिर इंदौर संभाग में किसी को वहाँ का कोई अधिकारी सर्टिफिकेट कैसे देगा? दूसरी बात यह है कि एक परिवार में मान लीजिए छ: लोग हैं, जिनमें दो का अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्र कराल का है और चार सदस्यों का इंदौर संभाग का है, तो उन्हें कोटे से राशन नहीं मिलता। राशन वितरक बोलते हैं कि आप अपने पुराने मूल निवास से जाकर राशन लीजिए। इस तरह की और भी कई समस्याएँ हम लोगों के सामने आ रही हैं, जिनका समाधान सरकार को करना चाहिए।’

 इसी तरह बैतूल ज़िले गायकी जाति को भी वर्ष 2017 से अनुसूचित जनजाति का सर्टिफिकेट नहीं मिल पा रहा है। पिछले दिनों गायकी समुदाय के लोगों ने बैतूल में प्रदर्शन भी किया और चेतावनी दी कि यदि उनकी समस्याओं का हल नहीं होगा, तो वे मिलकर मुख्यमंत्री आवास पर भी धरना देंगे।

गायकी जाति मध्य प्रदेश शासन के राजपत्र में अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची में क्रमांक 16 पर अंकित है। बैतूल ज़िला प्रशासन के अधिकारी गायकी जाति द्वारा दिये जा रहे लिखित रिकॉर्ड दस्तावेज़ों को भी अमान्य कर रहे हैं, जबकि बैतूल ज़िले में वर्ष 2017 तक गायकी जाति को अनुसूचित जनजाति का सर्टिफिकेट जारी किया जाता था। इस सम्बन्ध में कलेक्टर ज़िला बैतूल एवं अनुविभागीय अधिकारी मुलताई का कहना है कि ‘गायकी जाति किस वर्ग में सम्मिलित हैं? इसके स्पष्ट दिशा-निर्देश कार्यालय में अप्राप्त हैं।’

विधानसभा में 14 मार्च 2022 को प्रश्न क्रमांक-1524 के उत्तर में जनजाति कार्यमंत्री कुमारी मीना सिंह मांडवे ने बताया था कि ‘बैतूल ज़िले में गायकी समाज को परीक्षण उपरांत अनुसूचित जनजाति के प्रमाण-पत्र जारी किये जा रहे हैं।’

क्या है संविधान में प्रावधान?

भारत के तमाम आदिवासी समुदाय, जिन्हें भारतीय संविधान में अनुसूचित जनजाति कहा गया है। संविधान के अनुच्छेद-342 के तहत आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति में नोटिफाइड किया गया है। किसी भी आदिवासी व्यक्ति के लिए अनुसूचित जनजाति का सर्टिफिकेट सिर्फ़ सर्टिफिकेट नहीं होता है, बल्कि वह उनकी पहचान, परम्परा, रीति-रिवाज़, संस्कृति और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा होता है। आदिवासी समुदाय आज भी अपनी परम्परा और संस्कृति और अपने परम्परागत रीति रिवाज़ों को पूरे मन से मानते हैं। चाहे वह जन्म हो या फिर शादी-ब्याह, आदिवासी अपने पारम्परिक रीतियों को बड़े उत्साह के साथ जीते हैं। आदिवासियों के जीवनशैली की $खासियत यह है कि इनसे कभी प्रकृति को हानि नहीं पहुँचती है।