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चीन कर रहा पानी पर क़ब्ज़ा

बढ़ते ख़तरे के बीच दुविधा में भारतीय प्रतिष्ठान

हठधर्मी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग चुपचाप दक्षिण की ओर जाने वाली नदियों के प्रवाह को तिब्बती पठार की ओर मोड़ रहे हैं। सत्ता में और ताक़तवर होने के बाद शी ने ताइवान और भारत को लेकर अपनी रणनीति में पानी को शामिल किया है। चीन की इस चाल के बारे में बता रहे हैं गोपाल मिश्रा :-

भारत तिब्बत के साथ अपनी सीमाओं के लगभग तीन हज़ार किलोमीटर के सीमावर्ती राज्य, जो अब चीनी क़ब्ज़ें में है; के तहत होने के नाते इन रिपोट्र्स से चिंतित है कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने दक्षिणी बाध्य नदी के प्रवाह को तिब्बती पठार की ओर मोडऩा शुरू कर दिया है। आशंका जतायी जा रही है कि अगर ऐसा होने दिया गया, तो उत्तर भारत जल्द ही रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल, रक्षा और विदेश मंत्रालयों के कार्यालय सहित देश के सुरक्षा प्रतिष्ठान को पहले ही एक पूर्ण विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया जा चुका है। कथित तौर पर केंद्र सरकार इस चीनी शरारत या भारत पर युद्ध के विभिन्न आयामों का अध्ययन कर रही है। इसे विख्यात सिंचाई विशेषज्ञ एस.के. कुमार ने तैयार किया है और इसे गुपचुप भारत के पूर्व रक्षा सचिव योगेंद्र नारायण द्वारा अग्रेषित किया गया था। आशंका यह है कि क्या ड्रैगन दक्षिण एशियाई क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए पानी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगा? यह युद्ध की योजनाएँ बीजिंग स्थित एक ऑनलाइन मीडिया वेब प्लेटफॉर्म ‘सोहू’ पर विस्तृत रूप से उपलब्ध थीं। हालाँकि बाद में चीनी विदेश कार्यालय द्वारा इसके विवरण का खण्डन किया गया था। कहा जा रहा है कि ताइवान को हड़पने के लिए चीन को 2020-25 के दौरान युद्ध छेडऩा है और पाँच साल बाद वह भारत के अरुणाचल प्रदेश पर हमला करेगा।

अलग-थलग अमेरिका

नई दिल्ली के लिए शी जिनपिंग के नये अवतार से चिंतित होना स्वाभाविक है, जो अन्तत: 2023 में अपने पूर्ववर्तियों देंग जियाओपिंग और हू जिंताओ की बयानबाज़ी के दोहराव और विवाद से बचने की कोशिश में दिखते हैं। चीन की नयी आक्रामक कूटनीति की तुलना पश्चिमी ताक़तें चीन की एक्शन फ़िल्म ‘वॉल्फ वारियर-2’ से करती हैं, जिसे वह ‘वॉल्फ वारियर डिप्लोमेसी’ नाम देते हैं। इस नयी पहल के एक हिस्से के रूप में, चीन ने सफलतापूर्वक ईरान और सऊदी अरब को अपने राजनयिक सम्बन्धों को बहाल करने के लिए इस्तेमाल किया। वह यूक्रेन से यह भी कहता है कि यदि वह एक राष्ट्र के रूप में अपना अस्तित्व चाहता है, तो उसे रूस के साथ युद्ध विराम के लिए सहमत होना होगा। इन घटनाक्रमों के बीच दो प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ, फ्रांस और जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका को भरोसा देते हैं कि वे यूक्रेन के समर्थक के रूप में नाटो के साथ रहेंगे; लेकिन हो सकता है कि वे ताइवान में किसी अमेरिकी कार्रवाई के साथ सहयोग न करें।

साल 2020-25 के दौरान ताइवान पर विजय प्राप्त करने के अपने इरादे के बाद वेबसाइट ने भारत में दक्षिणी तिब्बत (2035-40) यानी अरुणाचल का $खुलासा किया है। इसे वह दक्षिणी तिब्बत की ‘पुनर्विजय’ के नाम से संदर्भित करता है। नदियों के बहाव को मोडऩा इस नयी युद्ध रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

नदी का रुख़ मोड़ा

ऐसा प्रतीत होता है कि चीन ने अपने पड़ोसियों को अधीन करने के लिए नदी के पानी को एक नये हथियार के रूप में उपयोग करने के लिए अपनी युद्ध रणनीति पर पहले ही अमल कर लिया है। आँकड़ों के मुताबिक, अगले सात साल में यानी 2030 तक दुनिया की आबादी 8.5 अरब के अंक तक पहुँच जाएगी, जिसमें भारतीय और चीनी विश्व का लगभग छठा हिस्सा बनाते हैं, जिसमें भारत अग्रणी है। ये सभी जीवन को बनाये रखने के लिए मूल रूप से उसी परिमित और कमज़ोर जल संसाधन पर निर्भर होंगे, जो आज हैं। चूँकि नदियों और जलभृतों को राजनीतिक सीमाओं के भीतर सीमित नहीं किया जा सकता है, इसलिए सभी राष्ट्रों की अन्योन्याश्रितता उनकी जनसंख्या के रूप में तेज़ी से बढ़ रही है। इसने इस क़ीमती संसाधन में एक अशुभ आयाम जोड़ दिया है- कृत्रिम बाढ़ या सूखे को प्रेरित करके डराना, मजबूर करना और अन्तत: बड़े पैमाने पर विनाश के हथियार के रूप में इसे रोककर इसका उपयोग करना। हम पहले से ही हिमालय के उस पार अपने उत्तरी पड़ोसी चीन से इस ख़तरे का सामना कर रहे हैं।

चीन का भव्य डिजाइन

चीन की तुलना में भारत की भेद्यता को समझने के लिए इस क्षेत्र के भूगोल पर एक नज़र डालते हैं। एशियाई महाद्वीप की अधिकांश प्रमुख नदियाँ जो अफ़ग़ानिस्तान से वियतनाम तक दक्षिण एशिया में रहने वाली दुनिया की 29 फ़ीसदी आबादी को पानी की ज़रूरतें प्रदान करती हैं, तिब्बत के पठार से निकलती हैं। इसे लगभग 46,000 ग्लेशियरों के साथ पानी के लिए तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। इनमें सतलज, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, करनाली, इरावदी, सालवीन, मेकांग, यांग्त्ज़ी और हुआंग हे (पीली नदी) शामिल हैं।

अपने सभी पड़ोसियों के साथ चीन के क्षेत्रीय विवाद नदियों पर हावी होने और भूमि पर क़ब्ज़ा करने से जुड़े हैं। जबसे वर्तमान कम्युनिस्ट शासन ने चीन पर नियंत्रण प्राप्त किया है, तबसे चीनी सत्ता ताज़ा पानी के भंडारण पर ध्यान केंद्रित कर रही है। चीन के जल संसाधन असमान रूप से वितरित हैं। क़रीब 42 फ़ीसदी आबादी वाले बेहतर विकसित उत्तरी क्षेत्र में मीठे पानी का केवल 14 फ़ीसदी हिस्सा है। कृषि प्रधान दक्षिण, तुलनात्मक रूप से कम विकसित, 86 फ़ीसदी हिस्सेदारी के साथ जल अधिशेष है। चीन ने अध्यक्ष माओ के अधिशेष दक्षिण से शुष्क उत्तर में पानी ले जाने के शुरुआती आदेश के बाद कई बाँधों और जलाशयों का निर्माण किया है। तिब्बत पर अधिकार करना भी इसी रणनीति का एक हिस्सा था। आज चीन में विभिन्न प्रकार के लगभग 98,000 बाँध / जल भंडारण संरचनाएँ हैं। दुनिया के कुल बड़े बाँधों में चीन सबसे अधिक हैं, जो कुल का 20 फ़ीसदी है। दुनिया का सबसे बड़ा जलाशय यांग्त्जी नदी पर चीन के थ्री गॉर्जेस डैम द्वारा बनाया गया है, जो 1,045 वर्ग किलोमीटर (403 वर्ग मील) के सतह क्षेत्र के साथ 39.3 बिलियन घन मीटर (31,900,000 एकड़ फीट) पानी संग्रहीत करता है। थ्री गॉर्जेस दुनिया का सबसे बड़ा पॉवर स्टेशन भी है।

भारत के लिए पैदा हो रही जल-चुनौती

थ्री गॉर्ज से जुड़े बिना ज़्यादा धूमधाम और प्रचार के चीन चुपचाप ब्रह्मपुत्र के प्रवाह को रोककर मोड़ रहा है। जांगमू बाँध चीन द्वारा नदी के मध्य भाग में बनाया गया था, जो भूटान-भारत सीमा से कुछ किलोमीटर की दूरी पर अक्टूबर 2015 में बिजली उत्पादन पूरी तरह से चालू हो गया था।

यह दावा किया जा रहा है कि जलाशय सिर्फ़ एक रन-ऑफ-द-रिवर-बिजली परियोजना है; लेकिन रिपोट्र्स हैं कि चीनी झिंजियांग, गांसु और इनर मंगोलिया के रेगिस्तान की सिंचाई के लिए 200 बिलियन क्यूबिक मीटर तक पानी मोडऩे की योजना बना रहे हैं। इसी भौगोलिक स्थिति में दागू, जिएक्सू और जियाचा में ऐसे तीन अन्य बाँध बन रहे हैं।

चीन ने 195 किलोमीटर लम्बी सहायक नदी शिआबूक को भी अवरुद्ध कर दिया है, जो भारतीय राज्य सिक्किम के क़रीब शिगाज में ब्रह्मपुत्र से मिलती है। यहीं पर शिआबूक पर एक बाँध का निर्माण 2014 में शुरू किया गया था, जिसके 2019 तक पूरा होने की उम्मीद थी, जो लल्हो जलविद्युत परियोजना का हिस्सा है। नवंबर, 2020 में 2021-2025 के लिए चीन ने अपनी 14वीं पंचवर्षीय योजना में हिमालय की तलहटी में चीन के तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) में वार्षिक टैंगो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर 60-गीगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता के साथ 50 मीटर ऊँचे विशाल बाँध के निर्माण की घोषणा की।

यह नियोजित मेगा-डैम उनके वर्तमान सबसे बड़े बाँध, थ्री गोरजेस में तीन गुना अधिक जल विद्युत का उत्पादन कर सकता है। भारतीय सीमा से केवल 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस बाँध योजना ने भारत और बांग्लादेश में बड़ी चिन्ता और घबराहट पैदा की है, और इसके कारण भी हैं। उनके प्रमुख जल संसाधन की निरंतरता के लिए चुनौती सामने आ गयी है और दोनों देशों द्वारा प्रभावी जवाबी उपाय करने की तत्काल माँग की गयी है।

ब्रह्मपुत्र नदी

ब्रह्मपुत्र नदी (इयरलॉन्ग टैंगो), जिसे वार्षिक सांगो या यालुजांगबू भी कहा जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा है, जो पश्चिमी तिब्बत में पवित्र मानसरोवर झील के निकट पूर्व की ओर निकलती है। मानसरोवर झील से चार प्रमुख दिशाओं को पूरा करने वाली तीन अन्य महत्त्वपूर्ण नदियाँ सिंधु (उत्तर), सतलज (पश्चिम) और करनाली (दक्षिण) हैं- अन्त में गंगा में मिलती है। सालाना टैंगो समुद्र तल से लगभग 5,000 मीटर की ऊँचाई पर बहती है, जो इसे दुनिया की सबसे ऊँची नदी बनाती है। फिर नदी पूर्व के ग्रांड कैन्यन में 2700 मीटर नीचे गिरती है। यह दुनिया में सबसे गहरी और 504.6 किलोमीटर संयुक्त राज्य अमेरिका के ग्रैंड कैन्यन से थोड़ी लम्बी है। तेज़ गिरावट इसे पनबिजली शक्ति का उपयोग करने के लिए विशेष रूप से अनुकूल बनाती है। तिब्बत में 1625 किलोमीटर तक पूर्व की ओर बहती हुई, नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर ‘ग्रेट बेंड’ लेती है और अरुणाचल प्रदेश में सियांग के रूप में भारत में प्रवेश करती है।

दिबांग और लोहित के संगम के बाद आगे जाकर इसे ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है। असम से गुज़रने के बाद यह बांग्लादेश में गंगा में मिल जाती है और बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। इसी ग्रेट बैंड पर ही चीन का नया सुपर हाइड्रोपॉवर बाँध बनाने का प्रस्ताव है। ग्रेट बेंड पर नदी को बाँधने से न केवल चीन को भारत में ब्रह्मपुत्र के प्रवाह पर पूर्ण नियंत्रण मिलेगा, बल्कि यह जोखिम भरा भी है; क्योंकि यह उच्च भूकंपीय क्षेत्र में है। यह सदी के कुछ सबसे भीषण भूकंपों का केंद्र रहा है, जिसमें 1950 का विनाशकारी भूकंप भी शामिल है, जिसने असम में ब्रह्मपुत्र की दिशा बदल दी और हज़ारों लोग मारे गये।

ब्रह्मपुत्र भारत के मीठे पानी के संसाधनों का लगभग 30 फ़ीसदी हिस्सा है। बारहमासी यह नदी सिंचाई, मत्स्य पालन और अंतर्देशीय जल परिवहन के लिए इसके किनारे रहने वाले समुदायों के लिए जीवन रेखा है। चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र के पानी को मोडऩे / रोकने के नतीजे इन सभी के लिए हानिकारक हो सकते हैं। यह न्यूनतम आवश्यक पानी की गहराई को काफ़ी कम करके सदिया से धुबरी तक 890 किलोमीटर के राष्ट्रीय जलमार्ग-2 की नौगम्यता को गम्भीर रूप से प्रभावित कर सकता है। पास के क्षेत्र में एक विशाल बाँध भी नदी द्वारा ले जायी जा रही भारी मात्रा में उपजाऊ गाद को रोक सकता है। हालाँकि चीन का दावा है कि ये सभी उद्यम सिर्फ़ ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ जलविद्युत योजनाएँ हैं, जिसमें पानी का कोई मोड़ शामिल नहीं है। लेकिन उनके पास निश्चित रूप से इसे अपने शुष्क क्षेत्रों में रोकने और मोडऩे का लाभ है और तीव्र सिंचाई के दौरान यहाँ सूखे का कारण बनता है। इसके अलावा वे इसे मानसून के दौरान छोड़ सकते हैं, जिससे अरुणाचल प्रदेश और पहले से ही बाढ़ की आशंका वाले असम में अचानक बाढ़ आ सकती है।

कई भारतीय नदियाँ ख़तरे में

चीन तिब्बती पठार से बहने वाली अधिकांश बड़ी नदियों के पानी का दोहन करने की योजना बना रहा है। उन्होंने भारत को बिना बताये सतलुज नदी पर बाँध बना लिया है, और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पहला पुनरुत्थान शील भारत का मन्दिर माना जाने वाला भाखड़ा बाँध सतलुज नदी पर स्थित है। नेपाल की कुछ प्रमुख नदियाँ तिब्बत से निकलती हैं और अन्त में भारत में गंगा में मिल जाती हैं। उनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण नेपाल की सबसे लम्बी, करनाली (507 किमी) है। तिब्बत काली गंडक, बूढ़ी गंडक और त्रिशूली के बड़े हिस्से का उद्गम भी है, जो गंडक नदी प्रणाली की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। इसी तरह कोसी नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ जैसे सूर्य कोसी / भोटेकोसी, तम कोसी और अरुम तिब्बत से निकलती हैं। करनाली (भारत में घाघरा बनकर) क्रमश: नेपाल के पश्चिमी, मध्य और पूर्वी भागों से बहती हुई गंडक और कोसी भारत में प्रवेश करती है और गंगा में मिल जाती है।

गंगा में अकेले नेपाल का प्रवाह 46 फ़ीसदी है और कमज़ोर सीजन के दौरान इसका योगदान बढक़र 71 फ़ीसदी हो जाता है। यदि तिब्बत से नेपाल में बहने वाली इसकी प्रमुख सहायक नदियों पर बाँध और डायवर्सन कार्य किये जाते हैं, तो गंगा का क्या होगा? हालाँकि तिब्बत में इन नदियों के उद्गम स्थल के पास बाँध बनाकर जलाशय बनाना सम्भव नहीं हो सकता है; लेकिन नेपाल के पास ऐसे निर्माण के लिए उपयुक्त स्थल हैं। चीन पहले से ही नेपाल के साथ सडक़ सम्पर्क विकसित करने और उत्पन्न जलविद्युत नेपाल को बेचने की दिशा में काम कर रहा है। चीन का अगला कदमनेपाल को नेपाल में घाघरा, गंडक और कोसी नदियों पर जलाशय बनाने की अनुमति देना और अधिक और सस्ता ‘शायद मुफ़्त’ जलविद्युत प्राप्त करना हो सकता है। चीन के लिए इसका मतलब नेपाल के साथ सीमा पार एकीकरण को और बढ़ावा देना होगा, गंगा बेसिन में पानी के प्रवाह पर बड़ा नियंत्रण हासिल करना, जो कि हमारा अनाज का केंद्र है, और भारत के साथ-साथ बांग्लादेश के लिए और अधिक समस्याएँ पैदा कर रहा है।

सामरिक प्रभाव

यह स्पष्ट है कि चीन ऊपरी तटवर्ती राज्य के रूप में अपनी स्थिति का पूरी तरह से $फायदा उठाना चाहता है; जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार ‘प्रतिबंधित क्षेत्रीय संप्रभुता’ की अनुमति देता है; व्यवहार में ‘प्रतिबंधित’ को ‘पूर्ण’ से बदलने की कोशिश कर रहा है। उसी क़ानून के तहत उसका निचले तटवर्ती राष्ट्रों के हितों की रक्षा करने का भी दायित्व है। पैरानॉयड की सीमा से लगे चीन में भीषण बाँध का निर्माण हो रहा है; लेकिन जल बँटवारे को लेकर चीन और किसी अन्य निचले तटवर्ती देश के बीच कोई व्यवस्था नहीं है। तथ्य यह है कि किसी भी जल बँटवारे तंत्र से दूर बीजिंग निचले तटवर्ती देशों के साथ हाइड्रोलॉजिकल डेटा तक साझा करने के लिए अनिच्छुक है।

चीन के पास जल सन्धि नहीं

चीन दुनिया में नदियों को साझा करने वाला सबसे निचला तटवर्ती देश है। लेकिन अभी तक इसने उनमें से किसी के साथ व्यापक नदी जल बँटवारे का समझौता नहीं किया है। दूसरी ओर 1950 के बाद से दुनिया भर के नदी तटवर्ती देशों के बीच 200 से अधिक समझौते विकसित किये गये हैं, जो सूचना के आदान-प्रदान, निगरानी और मूल्यांकन, बाढ़ नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय घाटियों, पनबिजली परियोजनाओं और उपभोग या ग़ैर-उपभोग उपयोगों के लिए आवंटन सहित जल प्रबंधन के मुद्दों को संबोधित करते हैं। उदाहरण के तौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच जल वितरण के लिए सिंधु जल संधि सन् 1960 में हस्ताक्षरित और अनुसमर्थित है, जिसे आज दुनिया में सबसे सफल और टिकाऊ जल बँटवारे के प्रयासों में से एक माना जाता है, क्योंकि दोनों देशों ने अपनी जलापूर्ति के बावजूद किसी भी जल युद्ध में शामिल नहीं किया है।

चीन को ब्रह्मपुत्र बेसिन के लिए भारत, भूटान और बांग्लादेश के साथ जलसंधियाँ करनी चाहिए थीं। भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ सिंधु घाटी के लिए; सतलुज बेसिन के लिए भारत और पाकिस्तान के साथ; नेपाल और भारत के साथ करनाली, कोसी और गंडक घाटियों के लिए; मेकांग बेसिन के लिए म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया और वियतनाम के साथ; इरावदी बेसिन के लिए म्यांमार के साथ; और साल्वीन बेसिन के लिए म्यांमार और थाईलैंड के साथ।

इसने ऐसा करने से स$ख्ती से इनकार कर दिया है। केवल कुछ एमओयू को छोडक़र, जो केवल हाइड्रोलॉजिकल डेटा की आपूर्ति के लिए हैं, जिनका भी हमेशा अक्षरश: पालन नहीं किया जाता है। उम्मीद है कि भारतीय प्रतिष्ठान जल्द ही इस नये चीनी आक्रमण से निपटने के लिए अपनी रणनीति बनाने में सक्षम होंगे।

अंतरराष्ट्रीय जल क़ानून के पाँच सिद्धांत

 न्यायसंगत और उचित उपयोग

 महत्त्वपूर्ण नुक़सान न पहुँचाने की बाध्यता

 अधिसूचना, परामर्श और बातचीत

 सहयोग और सूचना का आदान-प्रदान

 विवादों का शान्तिपूर्ण समाधान

ये सिद्धांत सन् 1966 के हेलसिंकी नियम, सन् 1997 के यूएन वाटर कोर्स कन्वेंशन, सन् 2004 के बर्लिन नियम और सन् 1960 की सिंधु जल संधि सहित कई जल संधियों में निहित हैं।

एमओयू पर हस्ताक्षर

चीन और भारत के बीच 5 जून 2008 को एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गये थे, जिसके अनुसार चीन केवल तीन चिह्नित स्टेशनों पर बाढ़ के मौसम में ब्रह्मपुत्र नदी के हाइड्रोलॉजिकल डेटा की आपूर्ति करेगा। लेकिन चीन इस जानकारी को भी, जो उस पर बाध्यकारी है, भारत से डेटा रोककर ज्बरदस्ती के एक उपकरण के रूप में हथियार बना रहा है। डोकलाम संकट के चरम के दौरान उनके द्वारा इसे अस्वीकार कर दिया गया था। लेकिन सूत्रों के अनुसार, बांग्लादेश को डेटा प्रदान करना जारी रखा गया था। चीन बहुपक्षीय के बजाय द्विपक्षीय रूप से मुद्दों से निपटना पसंद करता है, जो इसे अपने पक्ष में वार्ता को मोडऩे और भारत और बांग्लादेश के बीच दरार पैदा करने के लिए अधिक लचीलापन देता है।

कुमार के शोध और समर्पण

इंजीनियर और विद्वान एस.के. कुमार आगामी 26 नवंबर को अपने जीवन के 85 वसंत पूरे कर लेंगे; लेकिन उनका उत्साह और समर्पण अगली पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा। भौतिकी में स्नातकोत्तर, उन्होंने अपनी सिविल इंजीनियरिंग देश के सबसे पुराने इंजीनियरिंग संस्थान- तत्कालीन रुडक़ी विश्वविद्यालय, जिसे अब आईआईटी कहा जाता है; से किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग में सेवा की और उनकी सेवानिवृत्ति के बाद वे यूपी लोक सेवा आयोग के सदस्य बने। वर्तमान अध्ययन उनके जीवन भर के शोध और समर्पण पर आधारित है। अपने गृह राज्य की सेवा करने के अलावा वह केंद्र सरकार के विभिन्न संस्थानों के साथ-साथ अन्य राज्य सरकारों से भी जुड़े रहे हैं।

चीन पर दबाव ज़रूरी

इस मसले पर चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना ज़रूरी है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाना चाहिए, जिसमें भारत नेतृत्व करे। हर महाद्वीप में देशों के बीच नदी के पानी का वितरण सटीक जल संधियों या समझौतों द्वारा नियंत्रित होता है। दक्षिण एशिया में हमारे पास भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि 1960, भारत-बांग्लादेश संधि, भारत-नेपाल संधि और मेकांग समझौता और प्रक्रियात्मक नियम-1995 हैं। यूरोपीय संधियों में डेन्यूब नदी संरक्षण सम्मेलन और सीमा पार नदियों पर फिनलैंड-स्वीडन समझौता 2009 और ग्रेट लेक्स जल गुणवत्ता और सीमा जल संधि पर संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के बीच समझौते शामिल हैं।

इसी तरह की संधि संयुक्त राज्य अमेरिका और मेक्सिको के बीच रियो ग्रांडे वाटर्स पर मौज़ूद है। अफ्रीका में सूडान और मिस्र के बीच नील जल समझौता-1959 है। बोलीविया, ब्राजील, कोलंबिया, इक्वाडोर, गुयाना, पेरू, सूरीनाम और वेनेजुएला के सदस्य राज्यों के बीच दक्षिण अमेरिका में अमेज़न सहयोग संधि संगठन-2004 है। नदियों की सबसे बड़ी संख्या का ऊपरी तटवर्ती राज्य होने के नाते चीन के पास सभी लाभार्थी राष्ट्रों के साथ उचित संधियों पर हस्ताक्षर करके और पुष्टि करके जल बँटवारे के इस स्वीकृत सभ्य सम्मेलन की खुले तौर पर अवहेलना करने का कोई वैध तर्क या कारण नहीं है।

इस साल (2023) संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन भी होगा, जहाँ सीमा-पार और अंतरराष्ट्रीय जल सहयोग मुख्य एजेंडे का हिस्सा हैं और इसमें ध्यान यह सुनिश्चित करने पर होगा कि देश पहले से किये वादों को पूरा करें। चीन बिल्कुल इसी श्रेणी में आता है। चीन के सरकारी अख़बार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में हाल ही में प्रकाशित एक लेख में चीन ने जल साझा करने के लिए भारत और बांग्लादेश के साथ बहुपक्षीय सहयोग करने की इच्छा व्यक्त की थी। इसके दो दिन बाद चीनी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा कि नदियों के प्रवाह पर डेटा साझा करने के सम्बन्ध में प्रभावी सहयोग पहले से मौज़ूद है।

यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि चीन उचित समझौते / संधि के माध्यम से निचले तटवर्ती राज्यों के साथ जल बँटवारे के लिए तैयार नहीं है और यह महसूस करता है कि हाइड्रोलॉजिकल डेटा प्रदान करना, जब भी यह उनके लिए उपयुक्त हो; उनकी ज़िम्मेदारी को ख़त्म कर देता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव चीन को सभी डाउनस्ट्रीम उपयोगकर्ता देशों के साथ विवेकपूर्ण जल वितरण के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिए वार्ता की मेज पर लाने के मजबूर कर सकता है। दरअसल चीनियों द्वारा किसी भी बात पर सहमति जताना एक बहुत बड़ा काम है।

भारत के पास विकल्प

चीन द्वारा संभावित गम्भीर जल संकट को रोकने के लिए भारत को व्यापक तरीक़े से जल बँटवारे के मुद्दे को देखने की ज़रूरत है। हमारी रणनीति त्रिस्तरीय होनी चाहिए। सबसे पहले हमें चीन द्वारा कृत्रिम रूप से पैदा की गयी कमी की स्थिति को पूरा करने के लिए अपने मीठे पानी के संसाधनों को युद्धस्तर पर समेकित, संरक्षित और संग्रहित करना चाहिए। अरुणाचल प्रदेश हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि वहाँ का भूभाग घाटी भंडारण के लिए भी अनुकूल है।

‘नदियों के पानी को चुराने’ के भव्य चीनी डिजाइन का मुक़ाबला करने के लिए भारत ने अरुणाचल प्रदेश में 36,900 मेगावाट की अनुमानित जल विद्युत उत्पादन क्षमता के साथ 169 बाँध बनाने की योजना बनायी है। उनमें से ऊपरी सुबनसिरी और निचली सुबनसिरी परियोजनाओं की क्षमता क्रमश: 11,000 मेगावाट और 2,000 मेगावाट है और बाद वाली 2023 के मध्य तक पूरी हो जाएगी। अरुणाचल प्रदेश विशेष रूप से और उत्तर पूर्वी राज्यों को आमतौर पर भारत के लिए ‘स्वच्छ ऊर्जा के नये बिजलीघर’ के रूप में पहचाना जाता है। हालाँकि नियोजित बाँध परियोजनाओं पर बहुत कम प्रगति हुई है। देरी का एक महत्त्वपूर्ण कारक पर्यावरणीय गिरावट के बहाने बाँधों के निर्माण का विरोध करने वाली प्रभावशाली लॉबी भी है।

दूसरा, भारत को म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम के अलावा सभी निचले तटवर्ती देशों बांग्लादेश और भूटान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान का एक संघ गठित करना चाहिए, ताकि चीन को तिब्बत में योजनाबद्ध परियोजनाओं के साथ आगे बढऩे से रोकने के लिए आम सहमति बनायी जा सके। इसी तरह हमारे गंगा बेसिन पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव को दूर करने के लिए नेपाल का समर्थन हमारे लिए ज़रूरी है। एक ऐसी राष्ट्रीय नीति तैयार करने की तत्काल आवश्यकता है, जो रणनीतिक और क़ानूनी दोनों आयामों को ध्यान में रखे।

इसके अलावा विशेषज्ञों के एक निकाय का गठन इस मुद्दे को पूरी तरह से हल करने में दीर्घकालिक रूप से बहुत सहायक हो सकता है।

कर्नाटक जीता, पर चुनौतियाँ और भी हैं

कर्नाटक का जनादेश अपने साथ जीत और हार के ज़रूरत से ज़्यादा निहितार्थ निकालने और इस पर अति प्रतिक्रिया दिखाने का जोखिम लेकर आया है। कांग्रेस की असली परीक्षा इसी साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के भीतर के कलह पर अंकुश लगाने और इसके बाद 2024 के आम चुनाव के लिए विपक्षी गठबंधन को मूर्त रूप देने की है। क्योंकि कर्नाटक का मॉडल अन्य राज्यों में वैसा काम नहीं कर सकता है।

भाजपा को जवाबी प्रहार करने के लिए जाना जाता है और वह मनोबल बढ़ाने वाली जीत से मिली कांग्रेस की ऊर्जा को कमज़ोर करने का भरसक प्रयास करेगी। इसलिए कांग्रेस को 13 मई की कर्नाटक जीत के उत्साह को बनाये रखने और ख़ुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने के लिए अपने शासन वाले राज्यों में भ्रष्टाचार मुक्त शासन देना ज़रूरी है। वह सिर्फ़ जीत से संतुष्ट होने का जोखिम नहीं उठा सकती। भाजपा को भी यह समझ आ गया होगा कि अकेले प्रधानमंत्री का अभियान एक अलोकप्रिय सरकार की भरपाई नहीं कर सकता, जो आरोपों से घिरी हुई थी। सत्तारूढ़ व्यवस्था के रूप में उसे अपने काम की जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए थी, न कि मतदाताओं के सामने मुद्दों पर बात करने की बजाय सांप्रदायिक रुख़ देना चाहिए था। नतीजों का अर्थ है कि पार्टी राज्यों में अब उतनी अजेय नहीं है, जैसी कि वह राष्ट्रीय स्तर पर दिखायी देती है।

दीवार पर लिखी इबारत को पहचानते हुए भाजपा ने पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नौ साल के शासन की उपलब्धियों के संदेशों को प्रसारित करने के घोषित उद्देश्य के साथ सभी 545 लोकसभा क्षेत्रों को कवर करते हुए ‘महा जनसंपर्क अभियान’ की योजना बनायी है। महीने भर की यह क़वायद 30 मई से शुरू होगी, जिस दिन मोदी सरकार नौ साल पूरे करेगी और यह 30 जून तक जारी रहेगी। कांग्रेस के लिए व्यापक जीत निश्चित ही मनोबल बढ़ाने वाली है; लेकिन 224 सदस्यीय विधानसभा में 135 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की जीत के बाद भी कांग्रेस भाजपा की हार से काफ़ी कुछ सीख सकती है। चुनाव के दौरान कांग्रेस एकजुट रही, जबकि भाजपा नेता आपस में हिसाब बराबर करते और विभाजनकारी मुद्दे उठाते दिखे। अपने अभियान में कांग्रेस ने देशी डेयरी ब्रांड ‘नंदिनी’ सहित स्थानीय मुद्दों को उठाया। निर्णायक $फैसले के साथ कर्नाटक के मतदाताओं ने राजनीतिक वर्ग को एक महत्त्वपूर्ण सबक़ दिया है कि वे नैरेटिव बदलने की अनुमति नहीं देंगे, बल्कि अपनी आकांक्षाओं को ज़्यादा महत्त्व देंगे।

हालाँकि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ जनादेश और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए एक बड़ी उपलब्धि मान लेना भूल और जल्दबाज़ी होगी। कांग्रेस दावा कर सकती है कि नफ़रत पर मोहब्बत की जीत हुई है और भारत जोड़ो यात्रा ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय और मतदाताओं को उत्साहित कर दिया है। हालाँकि कर्नाटक में कांग्रेस द्वारा लोगों को दी गयी पाँच गारंटी को पूरा करना वहाँ बन रही कांग्रेस सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। यह भी लगता है कि एक ग़ैर-गाँधी को पार्टी प्रमुख के रूप में चुनना भी कांग्रेस के लिए लाभकारी रहा है। उनका ज़िम्मा अब विपक्षी दलों और इसके बड़े नेताओं- नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और के. चंद्रशेखर राव को साथ लाना होगा। साथ ही आम चुनाव तक अपने लम्बे समय के विपक्षी सहयोगियों के साथ निरंतरता भी सुनिश्चित करनी होगी।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर विशेष

बेमौत मार रहा यह धीमा ज़हर

बार-बार सरकारी ऐलानों के बावजूद तंबाकू पर आज तक प्रतिबंध नहीं लगाया जा सका है। तंबाकू एक ऐसी नशीली चीज़ है, जिसका सेवन करने वालों की लत मुश्किल से ही छूटती है। भारत में तंबाकू और तंबाकू युक्त धूम्रपान की वजह से हर साल क़रीब 13.5 लाख लोग असमय मौत की नींद सो जाते हैं।

तंबाकू सेवन करने वालों को समझ लेना चाहिए कि तंबाकू से 40 तरह के कैंसर होते हैं और 25 तरह की बीमारियाँ होती हैं। इसी के चलते समाजसेवी संगठनों और चिकित्सकों ने केंद्र सरकार से 2023-24 के बजट में तंबाकू उत्पादों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने की अपील की थी। विश्व स्वास्थ संगठन भी तंबाकू उत्पादों पर कम से कम 75 प्रतिशत शुल्क लगाने की सिफ़ारिश करता है। वर्तमान में तंबाकू उत्पादों पर जीएसटी, उपकर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और नॉन कन्वर्टिबल डिबेंचर (एनसीडी) सब कुछ मिलाकर कुल उत्पाद और बिक्री बोझ ग्राहकों पर 22 से 64 प्रतिशत के अंदर ही पड़ता है। इसमें यह बोझ सिगरेट पर 52.7 प्रतिशत, बीड़ी पर कुल 22 प्रतिशत और खाने वाली तंबाकू पर 63.8 प्रतिशत पड़ता है। कुछ साल पहले सरकार ने ऐलान किया था कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने वालों का चालान कटेगा; लेकिन आज भी सार्वजनिक स्थानों पर लोग धूम्रपान करते मिल जाते हैं और उनका कुछ नहीं होता।

कहा जाता है कि धूम्रपान करने वाले से न करने वाले को ज़्यादा नुक़सान होता है, क्योंकि हवा में घुलता धुआँ धूम्रपान न करने वाले की श्वांस के माध्यम से उसे नुक़सान पहुँचाता है। इसलिए पुलिस को चाहिए कि वह सरकार द्वारा चालान के आधार पर सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने वालों के चालान काटे, ताकि इस तरह भी कुछ हद तक तंबाकू के सेवन पर रोक लग सके। हर साल 31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। सन् 2022 में विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की थीम ‘पर्यावरण की सुरक्षा करें’ थी। अब 2023 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की थीम ‘तंबाकू और फेफड़े का स्वास्थ्य’ है। यानी इस बार लोगों को उनके फेफड़ों के स्वास्थ्य और फेफड़ों पर तंबाकू के नकारात्मक प्रभाव के प्रति जागरूक किया जाना है।

रिपोट्र्स के मुताबिक, भारत में तंबाकू सेवन से पिछले 30 साल में 58.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। सन् 1990 में छ: लाख लोगों की जान इसी तंबाकू ने ले ली। लेकिन सन् 2019 में 10 लाख लोग भारत में तंबाकू से मरे थे। लेकिन अगर सन् 2021 के अंतरराष्ट्रीय जर्नल लैंसेट के आँकड़ों की बात करें, तो अब भारत में हर साल तंबाकू उत्पादों के सेवन के चलते क़रीब 13.5 लाख लोगों की मौत हो जाती है। ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे इंडिया की 2016-17 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लगभग 26.7 करोड़ यानी 29 प्रतिशत वयस्क तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। वहीं 12 प्रतिशत के लगभग नाबालिग़ तंबाकू सेवन के जाल में फँस चुके हैं। वहीं पूरी दुनिया में 15 साल से ऊपर के क़रीब 32.7 प्रतिशत पुरुष करते हैं, जबकि 6.62 प्रतिशत महिलाएँ तंबाकू उत्पादों का सेवन करती हैं। सन् 2019 में पूरी दुनिया में क़रीब 76.9 लाख लोगों की मौत हुई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी तंबाकू टैक्स मैन्युअल के मुताबिक, तंबाकू उत्पादों के इस्तेमाल से हर साल दुनिया को क़रीब 1,40,000 करोड़ डॉलर यानी क़रीब 113.4 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हो रहा है।

कुछ समाज सुधार संगठनों और डॉक्टरों की सिफ़ारिश पर केंद्र सरकार ने तंबाकू उत्पादों के उपभोग की आयु सीमा को 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने का प्रस्ताव रखा है; लेकिन अभी तक इस तरह का क़ानून नहीं बना है। अगर विवाह की उम्र तय करने की तरह इसके लिए भी क़ानून बने, तो इससे भी तंबाकू सेवन करने वालों की संख्या कम हो सकती है; लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। इसके साथ-साथ कम उम्र में तंबाकू उत्पादों की लत लगाने वाले बच्चों को रोकना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक उनके माँ-बाप और शिक्षक उनकी ज़िन्दगी में तंबाकू सेवन से होने वाले नुक़सानों के प्रति जागरूक नहीं करेंगे। इसके साथ ही सभी देशों को वायु प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए तंबाकू नियंत्रण पर डब्ल्यूएचओ ढाँचागत संधि (एफसीटीसी) को ध्यान में रखना होगा, जिसका आज तक पालन नहीं हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन की उपस्थिति में हुई यह दुनिया की पहली संधि है, जिसका पालन करने में दुनिया के तक़रीबन सभी देश नाकाम रहे हैं। तंबाकू उत्पादों की बिक्री कम करने के लिए सरकारों को नशा तस्करों पर रोक लगानी चाहिए, जो कि तक़रीबन नामुमकिन हो चुकी है। आज तंबाकू उत्पादों का धड़ल्ले से उत्पादन भी हो रहा है और उनकी लत लगाने के लिए पैसे बटोरने की अपनी हवस के चलते कई अभिनेता पर्याप्त भूमिका निभा रहे हैं।

इसके अतिरिक्त तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी होने के बावजूद उनका सेवन करने वालों को भी समझ होनी चाहिए कि जब इतने बड़े हिस्से पर बहुत गंदी सी कैंसर की तस्वीर तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर छपी होती है, इसके अलावा साफ-साफ लिखा होता है कि तंबाकू सेवन / धूम्रपान करने से कैंसर हो सकता है। इसके बावजूद उपभोक्ता नहीं मानते और लगातार तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम (एनटीसीपी) के तहत भारत की केंद्र सरकार ने साल 2007 में कई नियमों के तहत कुछ कार्यक्रम शुरू किए थे, ताकि तंबाकू उत्पादों के सेवन करने वालों की संख्या घटे, लेकिन नहीं घटी।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

दिल्ली-एनसीआर में पाँच नशामुक्ति केंद्र चलाने वाले शांतिरत्न फाउंडेशन के अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह कहते हैं कि देश भर में तंबाकू उत्पादों का सेवन धड़ल्ले से होता है। धीरे-धीरे लोगों को तंबाकू उत्पादों की लत लग जाती है। लेकिन तंबाकू सेवन करने वाले यह नहीं समझते कि वे अपने शारीरिक नुक़सान के साथ-साथ एक बड़ा आर्थिक नुक़सान भी कर रहे हैं। मैं और कुछ अन्य लोग नशामुक्ति अभियान चलाते हैं; लेकिन माफ़िया और नशा उत्पादकों को यह बात नागवार गुज़रती है। कई परिवार भी शराब, सिगरेट और तंबाकू पीने को उतना बुरा नहीं मानते; लेकिन वे भूल जाते हैं कि इसके घातक परिणाम आख़िरकार उन्हें ही भुगतने होते हैं।

कर्नाटक के सिंहासन पर कांग्रेस का अभिषेक

कर्नाटक में हार से भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना काफ़ी हद तक टूटा है। कांग्रेस की इस बड़ी जीत से निश्चित ही दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर असर पड़ेगा। हो सकता है कि इस हार से सबक़ लेकर भाजपा अपने चुनावी तौर-तरीक़े बदले। इसी को लेकर बता रहे हैं डॉ. अनिल सिंह :-

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत न केवल कांग्रेस के लिए, बल्कि देश के अन्य क्षेत्रों में ग़ैर-भाजपा दलों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। यह नतीजे दर्शाते हैं कि भाजपा अब अपराजेय पार्टी नहीं है और बेहतर रणनीति से उसे सत्ता से बाहर किया जा सकता है। एक राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस ने हाल के समय में पहली बार सरकार बनाने के लिए इतना प्रचंड बहुमत हासिल किया है।

कांग्रेस के लिए चुनौती

कर्नाटक में सत्ता पाने के बाद कांग्रेस को अब कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जिनमें सबसे बड़ी चुनौती अपने चुनाव अभियान के दौरान राज्य के मतदाताओं से किये गये पाँच वादों को पूरा करने की होगी। अपने चुनावी वादों को निभाने के अलावा उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि (विधायक) ‘ऑपरेशन लोटस’ का शिकार न बनें, जैसा कि सन् 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद हुआ था। पार्टी नेतृत्व को अपने विधायक दल को एक साथ रखते हुए कांग्रेस के राज्य संगठन के साथ आंतरिक सामंजस्य बनाये रखना होगा।

निस्संदेह कर्नाटक में कांग्रेस की जीत राज्य और अन्य जगह न केवल पार्टी का मनोबल बढ़ाने के लिए ख़ुराक का काम करेगी, बल्कि इस जीत से भाजपा को हराने के लिए विपक्ष के समन्वित प्रयासों को भी बड़ा बल मिलेगा। सन् 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद अपनी खोयी हुई ज़मीन को फिर हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस को कर्नाटक में जीत से विश्वास और विश्वसनीयता दोनों हासिल होने की संभावना है। पार्टी की जीत कांग्रेस के भीतर राहुल गाँधी के नेतृत्व को मज़बूत करेगी और संघीय स्तर पर अन्य राज्यों में भाजपा के प्रभाव को चुनौती देने के लिए अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन की संभावनाओं को मज़बूत करेगी। इसके अतिरिक्त कांग्रेस की इस जीत से मतदाताओं के बीच यह सन्देश भी गया है कि भाजपा अपराजेय नहीं है और देश में एक मज़बूत विकल्प है, जो भाजपा पर जनता से किये गये वादों को पूरा करने का दबाव बना सकता है; जिसमें किसानों की माँगें, आर्थिक मंदी और साम्प्रदायिक हिंसा सहित कई मुद्दे शामिल हैं, जिन्होंने जनता के बीच उसके प्रभाव को कम किया है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस अब अन्य विपक्षी दलों को साथ काम करने के लिए राज़ी करने की बेहतर स्थिति में नज़र आ रही है।

भाजपा पर असर

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हार के 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की संभावनाओं पर कई तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं। भाजपा दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों में ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश कर रही है। इसलिए यह हार उन प्रयासों के लिए झटका है। इसके अतिरिक्त इन नतीजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुँचाया है, जिन्होंने कर्नाटक में भाजपा के लिए सघन प्रचार किया। साथ ही विपक्षी दलों को अधिक ताक़त दी है; विशेष रूप से कांग्रेस को, जो लगातार चुनावी हार के बाद अपने लिए बेहतर संभावनाओं का इंतज़ार कर रही थी। राष्ट्रीय मंच पर ख़ुद को भाजपा के सामने गम्भीर चुनौती के रूप में पेश करने के लिए कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए कर्नाटक को ज़मीन के रूप में इस्तेमाल करना चाहेगी। भाजपा की हार से उन क्षेत्रीय दलों को भी प्रेरणा मिलने की संभावना है, जिन्हें हाल के वर्षों में काफ़ी हद तक नज़रअंदाज़ किया गया था।

भाजपा के लिए यह हार उसकी आंतरिक गतिशीलता पर असर डाल सकती है। क्योंकि यह पार्टी नेतृत्व में बदलाव का रास्ता खोल सकती है या भीतर ही नेताओं का विद्रोह हो सकता है, जो महसूस करते हैं कि उन्हें पार्टी के आलाकमान की तरफ़ से नज़रअंदाज़ किया गया या टिकट से वंचित किया गया है। इसने यह सवाल भी उठाया है कि भाजपा की सत्ता ने कोरोना महामारी, किसान आन्दोलन, अर्थव्यवस्था में मंदी और सांप्रदायिक हिंसा जैसे मुद्दों को कैसे सँभाला है।

भविष्य की राह

कर्नाटक चुनाव के नतीजे, जहाँ कांग्रेस जीत गयी और भाजपा हार गई; मध्य प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इसी साल के उत्तरार्ध में होने वाले विधानसभा चुनाव जीतने की दोनों पार्टियों की सम्भावनाओं पर असर डाल सकते हैं। मध्य प्रदेश, जहाँ भाजपा के पास बहुत कम बहुमत है; में कर्नाटक के नतीजे को कांग्रेस अपने कुछ असन्तुष्ट विधायकों को वापस साथ लाने और कमलनाथ के नेतृत्व में एक एकीकृत मोर्चा बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। कर्नाटक में भाजपा की हार तेलंगाना में भगवा पार्टी के विश्वास और उम्मीद को नुक़सान पहुँचा सकती है, जहाँ सत्ताधारी टीआरएस उसके ख़िलाफ़ मज़बूती से अभियान चलाये हुए है। ऐसे में राज्य में भाजपा की हार से उसकी मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस लाभान्वित हो सकती है। कांग्रेस टीआरएस और भाजपा दोनों सरकारों की कमियों को उजागर करके अपनी संभावनाओं को बेहतर करने की कोशिश कर सकती है।

कर्नाटक में जीत राजस्थान में कांग्रेस के मनोबल और स्थिरता को बढ़ावा दे सकती है, जहाँ वह वर्तमान में बहुत कम बहुमत के साथ सत्ता में है। अब कांग्रेस अपने नेताओं में मतभेद दूर करने और जनता के सामने एकजुटता दिखाने की कोशिश करेगी। कर्नाटक में हार से राजस्थान में मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के लिए कांग्रेस से मुक़ाबला चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। राज्य में भाजपा को आंतरिक गुटबाज़ी और नेतृत्व की समस्या झेलनी पड़ सकती है। कर्नाटक की जीत ने राजस्थान में कांग्रेस के मनोबल और स्थिरता को मज़बूत किया है।

कांग्रेस की कर्नाटक में जीत से ऐसा प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ में उसकी स्थिति के साथ-साथ समर्थन में मज़बूती आएगी, जहाँ वह ताक़तवर बहुमत के साथ सत्ता में है। राज्य में कांग्रेस ने कई कल्याणकारी कार्यक्रमों और किसान समर्थक नीतियों को लागू कर जनता का भरोसा जीता है। अब राज्य में भाजपा के लिए कांग्रेस को हराना और चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। यह देखते हुए कि भाजपा 2018 और 2019 में सीधे मुक़ाबले वाले दो चुनाव हार गयी, उसे अपने संगठन और रणनीति को पुनर्गठित करने के साथ-साथ ख़ुद को चुनौती दे सकने वाले स्तर पर लाना होगा।

(लेखक चुनावों के दौरान कर्नाटक के दौरे पर थे।)

कांग्रेस को मिली संजीवनी

विपक्ष के पास है अब भाजपा पर हावी होने का अवसर

कर्नाटक में भाजपा की हार से विपक्ष में कितनी जान आ गयी है, यह नतीजे आने के सिर्फ़ एक दिन बाद ही महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन, जिसमें उद्धव ठाकरे शिव सेना-कांग्रेस-एनसीपी शामिल हैं; की भविष्य की रणनीति के लिए की गयी बैठक से ज़ाहिर हो जाता है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर फ़ारूक़ अब्दुला-महबूबा मुफ़्ती और शरद पवार से लेकर अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे के कर्नाटक नतीजों पर बयान ज़ाहिर करते हैं कि हाल के वर्षों में निराशा में भरे रहे विपक्ष को मानो कोई संजीवनी मिल गयी है। इन नतीजों से कांग्रेस को विपक्ष का अगुआ बनने और राज्यों में नेतृत्व की लड़ाई को नियंत्रण में रखने में भी मदद मिलेगी। कर्नाटक में कांग्रेस की जीत कांग्रेस और विपक्ष दोनों के ही लिए अपने पंख फैलाने का सुनहरा मौक़ा है।

दक्षिण के दुर्ग पर अब कांग्रेस का झंडा फहरा रहा है। कर्नाटक दक्षिण का सबसे अहम राजनीतिक गढ़ है। पहले भी दक्षिण भाजपा की कमज़ोर कड़ी थी। अब उसकी पकड़ दक्षिण पर और कमज़ोर हो गयी है। कर्नाटक के नतीजे से यह भी ज़ाहिर होता है कि भाजपा जिसे ‘मोदी मैजिक’ कहती है- ‘उसकी भी अपनी सीमाएँ हैं। और हर बार हर जगह यह नहीं चल पाता। दो साल पहले पश्चिम बंगाल, और हाल के छ: महीनों में यह मोदी मैजिक पहले हिमाचल और अब कर्नाटक में नहीं चला है। टीएमसी और कांग्रेस ने इन राज्यों में बड़े बहुमत से सरकारें बनायी हैं।

कर्नाटक में रणनीति बुनने में कांग्रेस भाजपा से चतुर निकली। भाजपा के दिग्गज नेता अमित शाह को पार्टी के नेता ‘चाणक्य’ कहते हैं। लेकिन कांग्रेस के स्थानीय मुद्दों के विपरीत भाजपा ने बजरंग दल, बजरंग बली, पीएफआई, प्रधानमंत्री को गालियाँ आदि-आदि मुद्दे चुने। यह भाजपा की रणनीति की बड़ी चूक थी। जनता ने अपने वोट से बता दिया कि उसके महत्त्व के मुद्दे क्या हैं। कांग्रेस ने तो नतीजे आने के बाद कहा भी कि बजरंग बली ने भाजपा नहीं उसका साथ दिया; क्योंकि वह सच्चे दिल से जनता की भलाई की लड़ाई लड़ रही थी।

यह नतीजे भाजपा के लिए सबक़ हैं और कांग्रेस के लिए अवसर कि वह अब एकजुट होकर और इस जीत के अहंकार से बचते हुए राज्यों में अपनी हालत ठीक करे। तभी 2024 के आम चुनाव से पहले वह विपक्ष की अगुआ बनने की अपनी कल्पना साकार कर पाएगी। कांग्रेस को कर्नाटक के बाद इस साल तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा से सीधा मुक़ाबला करना है। यदि कांग्रेस जीतती है तो इसका राष्ट्रीय फ़लक पर उसे बहुत लाभ मिलेगा। ख़ासकर 2024 में विपक्ष का नेतृत्व करने के मामले में। दो अन्य चुनाव वाले राज्य तेलंगाना और मिजोरम हैं, जहाँ भाजपा-कांग्रेस के अलावा और मैदान में होंगे। इनके अलावा जम्मू-कश्मीर भी है, जहाँ चुनाव को लेकर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।

उत्तर बनाम दक्षिण भारत

अमूमन उत्तर के राज्यों का मिज़ाज दक्षिण से अलग रहता है। भाजपा का धार्मिक एजेंडा दक्षिण के मुक़ाबले उत्तर भारत, जिसमें मध्य भारत के कुछ राज्य भी शामिल हैं; में ज़्यादा काम करता है। लिहाज़ा इन राज्यों में 2024 के आम चुनाव से पहले कांग्रेस को भाजपा के किले विधानसभा चुनावों में ध्वस्त करने पड़ेंगे। कहा जा रहा है कि आयोध्या में नवनिर्मित राममंदिर अगले साल जनवरी-फरवरी में आम जनता के लिए खुलेगा।

भाजपा चाहेगी कि यह लोकसभा चुनाव की घोषणा से ऐन पहले हो, ताकि वह इसे ‘हिन्दू गौरव’ से जोडक़र चुनाव में इसका राजनीतिक लाभ ले सके। नहीं भूलना चाहिए कि कर्नाटक में भाजपा को कांग्रेस से आधे से भी कुछ कम सीटें मिली हैं।

दक्षिण भारत (कर्नाटक) में धार्मिक मुद्दों के एजेंडे पर मात खा चुकी भाजपा अब भी पूरी तरह हिन्दुत्व के एजेंडे को ही अपनाएगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यह उसकी राजनीतिक मजबूरी है। अन्यथा दो बार के कार्यकाल की ‘एन्टी इंकम्बेंसी’ उसकी नैया डुबो भी सकती है। इसमें बिलकुल भी संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय स्तर भी लोकप्रियता समय के साथ कम होने के बावजूद अभी भी काफ़ी हद तक बरकरार है। लेकिन यह भी सच है कि उत्तर भारत से बाहर दक्षिण और अन्य राज्यों में यह उतनी टिकाऊ नहीं दिखती। उत्तर भारत में भाजपा का सबसे बड़ा हथियार अभी भी ‘हिन्दुत्व’ ही है जिसे उसके राजनीतिक विरोधी ‘हिन्दू-मुस्लिम एजेंडा’ भी कहते हैं। लेकिन समय के साथ विपक्ष यदि मोदी के मुक़ाबले अपना नेतृत्व सामने ले आता है, तो बात बन सकती है।

इन चुनाव नतीजों से ज़ाहिर हो गया है कि दक्षिण में भाजपा की दाल शायद ज़्यादा नहीं गल पाएगी। उसकी पूरी निर्भरता 2024 में उतर भारत और मध्य भारत के हिन्दी भाषी राज्य ही रहेंगे। कुछ हद तक पूर्वोत्तर में वह सीटें ला पाएगी, जिनमें असम और कुछ हद तक पूर्वी भारत का राज्य ओडिशा भी शामिल हैं। भाजपा को चिंता यह है कि आम चुनाव में उत्तर भारत में भी यदि उसका स्कोर पिछली बार के मुक़ाबले नीचे चला जाता है तो उसे सत्ता से बाहर होना पड़ेगा, यह तय है। ऐसी स्थिति में जोश से भरी कांग्रेस और एकजुट विपक्ष भाजपा के लिए बड़ी मुसीबत बन सकते हैं।

मोदी पर निर्भरता

प्रधानमंत्री मोदी ने कर्नाटक में 17 विधानसभा हलक़ों में जो रैलियाँ की उनमें से 13 पर कांग्रेस जीत गयी, दो जेडीएस ने जीतीं, जबकि भाजपा के हिस्से भी महज़ दो ही सीटें आयीं। भाजपा जिस तरह मोदी पर निर्भर हुई है, उसके विपरीत नतीजे अब दिखने लगे हैं। एक समय कांग्रेस भी ऐसे ही इंदिरा गाँधी पर निर्भर हो गयी थी, जिससे राज्यों में उसके क्षेत्रीय नेता असरहीन हो गये।

हाल के वर्षों में देखा गया है कि भाजपा विधानसभा चुनाव की बात छोडिय़े, नगर निगम जैसे छोटे चुनावों में भी मोदी का चेहरा आगे कर देती है।

ज़ाहिर है उसके राज्यों में चेहरे चुनाव जिताने लायक नहीं रहे। राज्यों में नेताओं का करिश्मा ख़त्म होना भाजपा के लिए बड़ी चिन्ता की बात होनी चाहिए। इससे उसका आधार सिकुडऩे का ख़त्मा रहेगा। वैसे ही जैसा कांग्रेस के साथ हुआ है। आज भी यह माना जाता है कि भाजपा के अध्यक्ष तो जे.पी. नड्डा हैं; लेकिन पार्टी के फ़ैसलों में सबसे बड़ा प्रभाव मोदी-शाह का रहता है। ऐसा ही कुछ सरकार के मामले में भी माना जाता है।

खडग़े की तैयारी

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े कर्नाटक से निपटते ही राजस्थान पर फोकस करने जा रहे हैं। ‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक गाँधी परिवार का पूरा भरोसा रखने वाले खडग़े मई में ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, जो कुछ नाराज चल रहे हैं, को दिल्ली तलब करने वाले हैं।

उन्हें साफ़ तौर पर आपसी मतभेद ख़त्म करने के लिए कहा जाएगा। पार्टी की आंतरिक रिपोर्ट में राजस्थान चुनाव को लेकर बहुत उत्साहजनक ख़त्म नहीं है। इसके मुताबिक, यदि गहलोत-पायलट की लड़ाई जारी रही, तो चुनाव में इसका नुक़सान हो सकता है।

खडग़े-राहुल गाँधी की टीम छत्तीसगढ़ में भी भाजपा पर दबाव बनाये रखने और उसे चुनाव से पहले कोई अवसर नहीं देने की रणनीति बना रही है। दोनों को मध्य प्रदेश के चुनाव में उत्साहजनक नतीजे आने की उम्मीद है जहाँ उसके लिए चुनाव रणनीतिकार सुनील कानूनगोलू काम कर रहे हैं।

कर्नाटक में भी कानूनगोलू ही कांग्रेस के रणनीतिकार थे। पार्टी के आंतरिक सर्वे में मध्य प्रदेश ऐसा राज्य बताया गया है, जहाँ उसकी सत्ता में लौटने की संभावनाएँ हैं। कर्नाटक की जीत ने खडग़े और गाँधी परिवार को पार्टी के भीतर और मज़बूत किया है। एनसीपी नेता शरद पवार तक ने नतीजों के बाद कहा कि राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का कांग्रेस को काफ़ी लाभ मिला है। बता दें ऐसी एक और यात्रा की योजना राहुल गाँधी के लिए कांग्रेस ने बनायी है।

विपक्ष की ख़ुशी

सभी विपक्षी दल कांग्रेस की जीत पर उसे बधाई दे चुके हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने कहा कि बदलाव के पक्ष में निर्णायक जनादेश के लिए कर्नाटक के लोगों को सलाम है।  जहाँ भी कांग्रेस मज़बूत है, उन्हें लडऩे दीजिए। हम उन्हें समर्थन देंगे, इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। लेकिन उन्हें अन्य राजनीतिक दलों का भी समर्थन करना होगा।’

शरद पवार ने तो नतीजों के अगले ही दिन महाराष्ट्र में विकास अघाड़ी (एमवीए) की बैठक कर ले जिसमें सभी गठबंधन दलों के नेता शामिल हुए। इसमें कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार पर ख़ुशी जतायी गयी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार न ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मिल चुके हैं। हालाँकि उन्होंने भाजपा या कांग्रेस गठबंधन के साथ जाने में रुचि नहीं दिखायी है। इसके बाद नीतीश कुमार ने शरद पवार और उद्धव ठाकरे के साथ मुलाक़ात कर विपक्षी एकता की दिशा में कुछ क़दम बढ़ाये हैं।

शरद पवार ने कहा कि कर्नाटक चुनाव के परिणाम का ट्रेंड 2024 तक चलता रहेगा। हमारा लक्ष्य भाजपा को हराना है। पवार ने कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस को राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा का फ़ायदा हुआ है और कर्नाटक के लोगों ने ‘मोदी है, तो मुमकिन है’ नारे का अस्वीकार कर दिया है।

उत्तर प्रदेश में योगी का जादू बरक़रार

इसमें कोई दो-राय नहीं कि उत्तर प्रदेश में अभी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जादू चल रहा है। निकाय चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत इस बात की तस्दीक़ करती है। हाल के कुछ विवादों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर योगी ने भाजपा को मज़बूत रखा हुआ है। इन चुनावों में जैसी मेहनत योगी करते दिखे, वैसी किसी अन्य दल के नेता ने नहीं की।

इन चुनावों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को मात मिली है। भाजपा ने महापौर पद की 17 में से 17 सीटों पर जीत दर्ज की। यदि चुनाव प्रचार को देखें, तो ज़मीन पर सिर्फ़ योगी दिखे। सपा के लिए अखिलेश यादव और बसपा के लिए मायावती का प्रचार सीमित रहा। कांग्रेस के बड़े नेता तो वैसे भी कर्नाटक चुनाव में व्यस्त थे। लिहाज़ा पार्टी प्रचार में कहीं दिखी ही नहीं। मुस्लिम वोट हमेशा से सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं; लेकिन इस चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम की उपस्थिति ने इन पार्टियों के मुस्लिम वोटों में ख़ासी सेंधमारी की, जिसका लाभ मिला भाजपा को।

योगी के माफ़िया-राज के ख़िलाफ़ अभियान से भाजपा को उम्मीद में थी कि उसे जनता का समर्थन मिलेगा। यही हुआ और जनता ने झोली भरके उसे वोट दिये। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में राजनीति और माफ़िया का गठजोड़ बहुत पुराना है। योगी ने अपने छ: वर्षों के में कार्यकाल इस गठजोड़ को तोडऩे की जो कोशिश की है, उसका भाजपा को राजनीतिक लाभ मिला है; क्योंकि आम जनता माफ़िया से बहुत परेशान रही है। उमेशपाल हत्याकांड के मुख्य आरोपी अतीक अहमद के बेटे असद की मुठभेड़ में मौत पर सवाल भी उठे। उसके बाद अतीक और उसके भाई का मर्डर हो गया, वह भी पुलिस की उपस्थिति के बावजूद। लेकिन इस पर भी भाजपा को जनता का समर्थन मिला है। उसके टिकट पर कुछ मुस्लिम उम्मीदवार भी जीते हैं।

उधर माफ़िया मुख़्तार अंसारी समेत क़रीब 40 माफ़िया आज की तारीख़ में उत्तर प्रदेश की जेलों में बन्द हैं। माफ़ियाओं की हज़ारों करोड़ की सम्पत्ति ज़ब्त हो चुकी है। याद रहे मुख्यमंत्री योगी ने विधानसभा में सौगंध उठायी थी कि राज्य के माफ़िया को वह मिट्टी में मिला देंगे। इसका भी चुनाव में असर पड़ा और जनता भाजपा के समर्थन में रही।

वैसे यह ज़्यादातर होता है कि प्रदेश में जिसकी सरकार होती है, निकाय चुनावों में जनता उस पार्टी को ही वोट देती है। हिमाचल में भी हाल में यह दिखा था, जब शिमला नगर निगम के चुनाव में कांग्रेस ने 34 में से 24 सीटें जीत ली थीं। निकाय चुनाव जीत के बाद मुख्यमंत्री योगी कह चुके हैं कि भाजपा राज्य में 2024 के लोकसभा चुनाव में जबरदस्त जीत दर्ज करेगी। इसमें कोई दो-राय नहीं कि गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश ही ऐसा प्रदेश है, जहाँ भाजपा बड़े चुनावों में जीत की गारंटी मान सकती है। यहाँ यह भी दिलचस्प है कि जैसे कुछ साल पहले तक प्रधामंत्री मोदी ‘गुजरात मॉडल’ की बात करते थे, वैसे ही आज योगी ‘उत्तर प्रदेश मॉडल’ की बात करते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि योगी राज्य में विपक्षियों के लिए जहाँ ख़तरा हैं, वहीं भाजपा के भीतर भी वह प्रधानमंत्री मोदी के विकल्प के रूप में देखे जाते हैं।

चुनाव आयोग के अनुसार, नगर निगम में भाजपा ने सभी 17 मेयर सीटें जीतीं। इसके अलावा उसके 813 पार्षद, परिषदों में 89 अध्यक्ष और 1360 सभासद, 191 नगर पंचायत अध्यक्ष और 1403 वार्ड में सदस्य जीत गये। सपा के नगर निगमों में 191 पार्षद, 35 परिषदों के अध्यक्ष, 425 सभासद, 79 नगर पंचायत अध्यक्ष और 485 वार्ड सदस्य जीते, जबकि बसपा के 85 पार्षद, 16 परिषद अध्यक्ष और 191 सभासद, 37 नगर पंचायत अध्यक्ष और 215 वार्ड सदस्य जीते। कांग्रेस के 77 पार्षद, चार परिषद अध्यक्ष, 91 सभासद और 14 नगर पंचायत अध्यक्ष, 77 वार्ड सदस्य जबकि आम आदमी पार्टी के आठ पार्षद, तीन परिषद अध्यक्ष, 33 सभासद और दो नगर पंचायत अध्यक्ष जीते। एआईएमआईएम के 19 पार्षद, तीन परिषद अध्यक्ष और 30 सभासद, छ: नगर पंचायत अध्यक्ष, रालोद के 10 पार्षद, सात परिषद अध्यक्ष, 40 सभासद और सात नगर पंचायत अध्यक्ष जीते।

उपचुनाव के नतीजे

पंजाब में जलंधर की लोकसभा सीट आप प्रत्याशी सुशील कुमार ‘रिंकू’ ने 58,691 वोटों से जीत ली। मेघालय की सोहियोंग विधानसभा सीट पर यूडीपी के सिंशर कुपर रॉय लिंगदोह थबाह, ओडिशा की झारसुगुड़ा विधानसभा सीट बीजद की दीपाली दास, उत्तर प्रदेश की छानबे विधानसभा सीट अपना दल (सोनेलाल) की प्रत्याशी रिंकी कोल ने, तो रामपुर की स्वार टांडा सीट भी अपना दल के शफीक़ अहमद अंसारी ने जीती।

अमृतसर में बम धमाके निंदनीय

पंजाब में स्वर्ण मंदिर के आसपास एक सप्ताह में तीन बम धमाके एक गहरी साज़िश की शुरुआत है। कम तीव्रता वाले इन धमाकों से कोई जान तो नहीं गयी; लेकिन इससे अमृतसर और राज्य में दहशत का माहौल ज़रूर बन गया। सवाल है कि इन धमाकों का मक़सद क्या था, दहशत फैलाना या अमृतसर को दहलाने की साज़िश? पुलिस और सरकार की मानें, तो दहशत फैलाना कारण है; लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है। धमाकों के बाद लोगों में फैली दहशत को दूर करने के लिए पुलिस महानिदेशक गौरव यादव को फ्लैग मार्च में शामिल होना पड़ा। जबकि ऐसा मौक़ा तब आता है कि जब लोगों का भरोसा पुलिस तंत्र से उठ जाता है।

दंगों जैसी स्थिति के बाद अक्सर लोगों में शान्ति व्यवस्था क़ायम रखने और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी के लिए पुलिस फ्लैग मार्च करती है; लेकिन उसमें भी महानिदेशक स्तर के अधिकारी कम ही हिस्सा लेते हैं। इसके लिए पुलिस महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी भी काफ़ी होते हैं। इससे स्पष्ट है कि राज्य सरकार भी प्रदेश की क़ानून व्यवस्था क़ायम रखने और लोगों में हर सम्भव भरोसा बनाये रखने में पूरी तरह से तैयार है। तीन धमाकों के मुख्य आरोपियों की पहचान का काम सबसे पहले शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) की टास्क फोर्स ने किया।

एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी कहते हैं कि आरोंपियों को हम लोगों ने पकड़ लिया है। अब पुलिस का काम है कि वह विस्तृत जाँच कर पता लगाये कि साज़िश किस संगठन की हुई और उसका मक़सद क्या था? स्वर्ण मंदिर परिसर में जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हैं; लेकिन परिसर के बाहर गलियारे में हेरिटेज गलियों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को चाहिए कि साज़िश नाकाम होने के बाद वह बाहरी क्षेत्र में सुरक्षा के और दुरुस्त प्रबंध करे और बाहरी क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरे भी लगवाये। एसजीपीसी के महासचिव गुरचरण सिंह ग्रेवाल कम तीव्रता वाले धमाकों को सरकार और पुलिस की की नाकामी बताते हैं।

पहला धमाका 6 मई की रात को हुआ, दूसरा 8 मई को हुआ, उसके दो दिन बाद फिर वहीं हुआ। इस दौरान पुलिस किसी आतंकी मक़सद को तय नहीं कर सकी। एसजीपीसी की माँग है कि भविष्य में स्वर्ण मंदिर के पास ऐसी कोई वारदात न हो, इसके लिए गुरुद्वारा संतोखसर साहिब से सारागढ़ी तक सीसीटीवी लगने चाहिए। क्योंकि एक धमाका इसी क्षेत्र में हुआ; लेकिन वहाँ की कोई सीसीटीवी फुटेज नहीं है। पंजाब पुलिस के अलावा इन धमाकों की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) भी कर रही है; लेकिन अभी तक कुछ विशेष सुरा$ग नहीं मिले हैं। किसी आतंकी संगठन ने इनकी ज़िम्मेदारी भी नहीं ली है। अमृतसर क्षेत्र के पुलिस आयुक्त नौनिहाल सिंह के दिशा-निर्देश पर स्वर्ण मंदिर के आसपास सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गयी है।

पूछताछ में अभी गिरफ़्ता पाँच लोगों का किसी बड़े आतंकवादी संगठन से जुड़ाव साबित नहीं हुआ है; लेकिन पाकिस्तान, कनाडा, अमेरिका और अन्य देशों में कट्टरपंथी संगठनों का कोई-न-कोई तार इनसे जुड़ा निकलेगा। एक के बाद एक पाँच दिन में तीन धमाके और वह भी स्वर्ण मंदिर के आसपास, जो सिखों का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल है; कोई छोटी घटना नहीं है। आतंकवाद के दौर में भी स्वर्ण मंदिर के पास कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं हुई। लेकिन अब उसी जगह को ब्लास्ट के लिए चुना गया, तो इसकी कुछ वजह निश्चित ही होगी।

आरोपियों का स्वर्ण मंदिर परिसर की गुरु रामदास सराय में रुकना, वहीं बम तैयार करना और भोर में (तडक़े सुबह) धमाके करना बताता है कि उनके इरादे दहशत से ज़्यादा कुछ और हैं। गिरफ़्तार लोगों में अमरीक सिंह, आज़ादवीर सिंह, साहिब सिंह, धर्मेंद्र और हरजीत सिंह (सभी अमृतसर और आसपास के) हैं। अमरीक और आज़ादवीर धमाके के कुछ दिन पहले से गुरु रामदास सराय के कमरा नंबर-225 में रुके हुए थे। तीनों धमाकों में आरोपी परिसर से बाहर नहीं गये, बल्कि छतों और खिड़कियों के माध्यम से धमाके करने का प्रयास किया।

संदिग्ध लोगों में अमरीक की पत्नी भी है। पुलिस उससे भी पूछताछ कर रही है। साहिब सिंह के पास पटाखे बनाने की विस्फोटक सामग्री का लाइसेंस है। स्वर्ण मंदिर के आसपास हुए धमाकों में जितना विस्फोटक लगा और लगभग एक किलो की बरामदगी हुई, वह साहिब सिंह से ख़रीदा गया था। पोटेशियम क्लोराइड और सल्फर इन्होंने बाज़ार से 5,000 रुपये में ख़रीदा था। अभी तक की जाँच में यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि गिरफ़्ता इन स्थानीय लोगों का कोई कनेक्शन खालिस्तान कमांडो फोर्स, खालस्तिान ज़िन्दाबाद और बब्बर खालसा इंटरनेशनल से है; लेकिन पाँच दिन के भीतर तीन धमाकों के दौरान कुछ ऐसी फोन कॉल्स क्षेत्र में आयी हैं, जो संदेह पैदा करती हैं।

पुलिस जाँच में उसे भी अब अहम माना जा रहा है। एक कनेक्शन वारिस पंजाब दे के प्रमुख अमृतपाल सिंह की गिरफ़्तारी से भी जुड़ रहा है। विरोध स्वरूप राज्य में फिर से अशान्ति का माहौल पैदा करना है। सबसे बड़ा सवाल यही कि आख़िर धमाकों के लिए स्वर्ण मंदिर, गलियारा और आसपास के क्षेत्र को ही क्यों चुना गया? क्या इसके पीछे आपसी भाईचारे और सौहार्द को बिगाडऩा था।

बम कांड का मक़सद अगर दहशत से ज़्यादा नुक़सान पहुँचाने का मक़सद होता, तो भीड़भाड़ वाले अन्य स्थानों को चुना जाता। यह सब जानते हुए कि स्वर्ण मंदिर परिसर और आसपास का पूरा क्षेत्र सीसीटीवी वाला है, और कोई भी सदिग्ध गतिविधि सामने आ सकती है; बावजूद इसके यह सब हुआ। पुलिस मानती है कि आरोपियों से यह सब कराने वाले स्थानीय स्तर के लोग हो सकते हैं; लेकिन पुलिस अभी तक किसी का पता नहीं लगा सकी है।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी कहते हैं कि हम अपनी टास्क फोर्स को और मज़बूत करेंगे, ताकि भविष्य में ऐसी कोई वारदात न हो। पुलिस और सरकार अपने तौर पर अपनी व्यवस्था करे। बम धमाकों के बाद आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार और पुलिस पर विरोधी दलों ने ख़ूब हमले किये। कांग्रेस नेता नवजीत सिद्धू ने सीधे मुख्यमंत्री मान को निशाना बनाते हुए कहा कि वह (मान) तो सुरक्षा कवच में रहते हैं। इसलिए उन्हें आम लोगों के जान-माल का कुछ पता नहीं है। अमृतपाल की गिरफ़्तारी से पहले कमज़ोर साबित हुई सरकार अब ज़्यादा मज़बूती से काम कर रही है।

मोहाली में पुलिस दफ़्तर पर राकेट हमले के बाद ऐसी कोई बड़ी घटना नहीं हुई है, जिससे क़ानून व्यवस्था पर कोई सवालिया निशान लगता हो। प्रदेश में किसी भी तरह की कोई आतंकवादी घटना न होने देने और क़ानून व्यवस्था को चाक-चौबंद बनाये रखने के मुख्यमंत्री भगवंत मान बराबर दावे करते रहे हैं। बावजूद इसके वह इस दिशा में लोगों का भरोसा पूरी तरह से नहीं जीत सके हैं। उन्हें स्वर्ण मंदिर के बाद प्रदेश के अन्य धार्मिक स्थलों की चौकसी बढ़ानी होगी। क्योंकि समाज में सौहार्द बिगड़ाने के लिए देश और राज्य विरोधी संगठन इन्हीं का सहारा लेते हैं।

अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास बम धमाके में कई घायल के समाचार के बाद कांग्रेस नेता नवजोत सिद्धू ने बयान जारी कर मुख्यमंत्री और सरकार पर सवाल उठा दिये। वह कहते हैं कि जिस जंग में राजा की जान को ख़तरा न हो, उसे जंग नहीं राजनीति कहते हैं। 1,200 सिक्योरिटी वालों के कवच में मज़बूत रहकर जब सबसे सुरक्षित मुख्यमंत्री मूकदर्शक बनकर अपने राज्य में खुलेआम क़त्ल, फ़िरौतियाँ और लूट होता देख रहा हो, तो पतन निश्चित है। अमन-अमान जब बिगड़ जाए, जान-माल महफ़ूज़ न हो, दुकानों में ग्राहक न हों, कारोबारी प्रदेश छोडक़र जाने लगें, नौजवान पलायन करने लगें, राज्य की एक लाख करोड़ की सम्पत्ति बिक जाए और राज करने वाले बस ख़ुद को और अपने दिल्ली वाले आकाओं को सुरक्षित करने में व्यस्त हों, तो राज्य की सुरक्षा कैसे हो? जहाँ प्रदेश की वित्तीय स्थिति बदतर होती है, वहीं अराजकता का माहौल पैदा होता है। क्या यह पंजाब को बदनाम करने की और मुद्दों से भटकाने की साज़िश है? या फिर सरकार अनाड़ी और नाक़ाबिल है? दोनों परिस्थितियों में हार पंजाब की है। दुर्भाग्यपूर्ण है। …पंजाब जीतना चाहिए।

“स्वर्ण मंदिर परिसर के तीन धमाकों के पाँच आरोपी पकड़े जा चुके हैं। पूछताछ हो रही है। घटना को पुलिस और सरकार ने बड़ी गम्भीरता से लिया है। राज्य में अमन-चैन, लोगों में सुरक्षा की भावना को बनाये रखने और क़ानून व्यवस्था को न बिगडऩे देने के हरसंभव प्रयास होंगे। आरोपियों की धरपकड़ में एसजीपीसी का पूरा सहयोग रहा है। धमाके कम तीव्रता वाले थे; लेकिन एक के बाद एक ऐसा करके आरोपियों का मक़सद लोगों में दहशत पैदा करना था या कुछ और? यह जाँच में स्पष्ट हो जाएगा।“

गौरव यादव

पुलिस महानिदेशक, पंजाब

उमा जी! यहाँ न्याय मत माँगिए

शिवेंद्र राणा

बाहुबली पूर्व सांसद आनंद मोहन की रिहाई के विरुद्ध दिवंगत आईएएस जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर बिहार सरकार द्वारा क़ानून में किये गये संशोधन को चुनौती दी है। सुनवाई शुरू हो चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में बिहार सरकार से जवाब माँगा है। ध्यातव्य है कि बिहार सरकार ने 10 अप्रैल को बिहार जेल मैनुअल 2012 में बदलाव करते हुए सरकारी कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान हत्या के मामले में जेल से रिहाई का प्रावधान किया, जिसके पश्चात् आनंद मोहन को 27 अप्रैल को जेल से रिहाई मिल गयी। मोहन के साथ ही अन्य 26 दुर्दांत अपराधी भी मुक्त कर दिये गये, जो बलात्कार और हत्या, डकैती जैसे गम्भीर मामलों में सज़ायाफ़्ता थे।

मृतक ज़िलाधिकारी जी. कृष्णैया साधारण नहीं थे। वह तेलंगाना के एक ग़रीब भूमिहीन दलित परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता कुली का काम करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति सँभालने के लिए अपने पिता के साथ कृष्णैया भी कुली का काम करने लगे। इसके साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। उन्होंने कुछ समय पत्रकारिता भी की। बाद में एक सरकारी दफ़्तर में उन्हें क्लर्क की नौकरी मिल गयी। यहीं उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की और सन् 1985 में इस प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल भी हुए। उन्हें बिहार काडर मिला और पहली पोस्टिंग पश्चिमी चंपारण में हुई। अपनी विशिष्ट कार्यशैली और जनजुड़ाव के चलते वह जल्दी ही लोकप्रिय हो गये। सन् 1994 में उन्हें गोपालगंज का ज़िलाधिकारी नियुक्त किया गया।

5 दिसंबर, 1994 को एक वीभत्स घटना ने कृष्णैया का जीवन लील लिया। राज्य में विधानसभा के चुनाव की सरगर्मी थी। हाईवे से एक अपराधी कौशलेन्द्र उर्फ़ छोटन शुक्ला की शवयात्रा गुज़र रही थी, जिसकी हत्या राजनीतिक-आपराधिक रंजिश में हुई थी। वह इसी बाहुबली आनंद मोहन की पार्टी बीपीपी के टिकट पर केसरिया सीट से चुनाव लडऩे उतरा था। दुर्योग से उसी समय जी. कृष्णैया पटना से एक चुनावी बैठक में शामिल होकर वापस लौट रहे थे। उत्तेजना का माहौल था। कृष्णैया की सरकारी गाड़ी को देखकर क्रुद्ध भीड़ ने उसे घेर लिया। इसी बीच अपने नेताओं के उकसाने पर लोगों ने उनकी कार पर हमला करते हुए उन्हें इतना पीटा कि कृष्णैया की मौक़े पर ही मौत हो गयी। इस जघन्य कृत्य का मुख्य सूत्रधार यही आंनद मोहन था। इस मामले में कृष्णैया के परिवार को 12 साल बाद ही सही पर न्याय मिला। वर्ष 2007 में ज़िला एवं सत्र अदालत ने आनंद मोहन को फाँसी की सज़ा सुनायी। आज़ाद भारत में यह पहला मुक़दमा था, जिसमें एक जनप्रतिनिधि को मृत्युदंड की सज़ा हुई थी। हालाँकि बाद में पटना उच्च न्यायालय ने दिसंबर, 2008 में फाँसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया। इसके बाद आनंद मोहन ने अपनी सज़ा कम करवाने के लिए वर्ष 2012 में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की, जो ख़ारिज हो गयी। तबसे पिछले 15 साल से वह बिहार की सहरसा जेल में सज़ा काट रहा था। लेकिन अब अपने राजनीतिक रसूख़ के बूते रिहा हो चुका है।

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, आनंद मोहन की रिहाई से उनसे सम्बन्धित जाति विशेष का महागठबंधन सरकार की दिशा में झुकाव सम्भव है, इसलिए सरकार उस पर मेहरबान हुई है। आनंद मोहन की रिहाई को राजपूत जाति के सम्मान सरीखा प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। याद कीजिए जब विकास दुबे का एनकाउंटर हुआ, तब भी उसे ब्राह्मण जाति का नायक साबित करने की कोशिश हुई। यह पहली बार नहीं है, जब ऐसे छँटे हुए अपराधी-बदमाशों को जाति विशेष के नायक के तौर पर स्थापित किया जा रहा है। इसकी कहानी बहुत पुरानी है। आंनद मोहन और उस जैसे अनेक राजनीतिक अपराधी एवं स्वयंभू जातीय नेता 90 के दशक में समाजवाद के नाम पर हुए जातिवादी संघर्ष एवं राजनीतिक-आपराधिक गठजोड़ की उपज हैं। उस दौर में जातीय वर्चस्व के नाम पर ‘कम्युनिटी वॉरियर्स’ पैदा हुए, जो कि विशुद्ध अपराधी थे। बाद में नेताओं के मार्गदर्शन और जातीय समर्थन के बूते ये जनप्रतिनिधि भी बने।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर कहते हैं- ‘क़ानून व्यवस्था न्याय की स्थापना के लिए होती है। और जब वे (अपराधी) इसमें नाकाम रहते हैं, तो वे ख़तरनाक ढंग से बने बाँध की तरह हो जाते हैं; जो सामाजिक प्रगति के प्रवाह को थाम लेते हैं।’ बिहार में 90 के दशक में यही हुआ। दुष्परिणामस्वरूप राज्य पिछड़ता चला गया।

सन् 1966 में इंदिरा गाँधी जब पहली बार प्रधानमंत्री बनीं, तब उन्होंने कहा था- ‘कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि काश आज़ादी के वक़्त हिन्दुस्तान में भी फ्रांस या रूस की तरह कोई वास्तविक क्रान्ति हुई होती।’ यह ठीक भी है; क्योंकि समझौते के तहत अंग्रेजों द्वारा स्थानांतरित सत्ता एवं उनकी इच्छानुरूप समझौते में प्राप्त स्वतंत्रता से हम वो मूल्य ग्रहण करने से चूक गये, जिनसे हमें क्रान्ति और स्वतंत्रता का सम्मान की सीख मिलती। उसके अभाव में हमारा तीव्र नैतिक पतन हुआ है, जिसने राष्ट्र को इस पतनशीलता की कगार पर ला खड़ा किया है।

आनंद मोहन की रिहाई इस देश के राजनीतिक वर्ग की निर्लज्जता और घटियापन का सुबूत है। यहाँ कोई भी राजनीतिक वर्ग पक्ष या विपक्ष में खड़ा नहीं है, बल्कि जो समर्थक हैं, उनको चुनावी लाभ दिख रहा है; और जो विरोध में हैं, उनका आक्रोश अपनी चुनावी हानि के कारण ही है। आनंद मोहन की रिहाई के लिए महागठबंधन सरकार की आलोचना करने के बजाय भाजपा के नेता भी उन्हें अपनी पार्टी में स्वागत करने को तैयार है, जो थोड़ा-बहुत आलोचना का स्वर है, वह सिर्फ़ इसलिए है कि रिहा होने वाला हमारे बजाय विरोधी पक्ष का सहयोगी बनेगा।

आंध्र प्रदेश आईएएस एसोसिएशन ने भी इसका विरोध जताते हुए बिहार सरकार से अपने $फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की। वहीं उमा कृष्णैया ने राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री से दख़ल देने की अपील की है। उन्होंने न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए कहा कि वे (जज) ज़रूर इस केस में न्याय करेंगे।’ उनकी बेटी जी. पद्मा ने राज्य सरकार के निर्णय ग़लत बताते हुए नीतीश को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा। उनकी अपील वाजिब है। इस देश में न्यायिक दुव्र्यवस्था के लिए हर बार न्यायपालिका को कटघरे में खड़े ज़रूरत नहीं है, क्योंकि न्यायपालिका ने बहुत हद तक इस देश में लोकतंत्र का सम्मान बनाये रखा। आवश्यकता है कि न्याय के कटघरे में देश के नेतृत्व वर्ग को खड़ा किया जाए और पूछा जाए कि क्या वास्तव उनकी (नेताओं की) अंतरात्मा जीवित है? क्या उनमें नैतिकता का अंश मात्र भी बचा है? क्या उनमें किंचित लोकतंत्र के प्रति निष्ठा शेष है? इस आत्ममंथन से जनता को भी गुज़रना होगा और अपनी ज़िम्मेदारी तय करनी होगी। उसे भी यह बताना ही होगा कि क्या उसकी सोच सही दिशा में है? क्योंकि वह लोकतंत्र की अधिष्ठाता है। मतदान का अधिकार तो उसका अपना है, जिसे उसने सांप्रदायिकता-जातिवाद के हाथों गिरवी रखा है, तो इस न्याय के कटघरे में उसे भी खड़ा होना होगा।

एक राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग आनंद मोहन की रिहाई को दलित उत्पीडऩ से जोडक़र देख रहा है। ये भी कुंठित मानसिकता का ही परिचायक है। यदि जी. कृष्णैया किसी तथाकथित सवर्ण जाति के होते, तब क्या आनंद मोहन जैसे किसी अपराधी को जेल से रिहा किया जाना नैतिक होता? असल में इस देश में सांप्रदायिकता एवं जातिवाद से ग्रसित राजनीतिक विमर्श कुंठा और ओछेपन के निम्नतम स्तर तक पतित हो चुका है। अगले दो-तीन दशकों तक यही हालात रहें, तो एक दिन खंडित राष्ट्र के साथ हम सभी पागलख़ाने में होंगे। जातिवाद के दुर्धर्ष रोग से पीडि़त जनता की मानसिक विकृति किस स्तर पर पहुँच चुकी है, इसका उदाहरण आनंद मोहन की रिहाई पर गूँज रहे वे नारे हैं, जिनमें उसे ‘बिहार का शेर’ एवं ‘बिहार का नेल्सन मंडेला’ कहा जा रहा है। मूल प्राकृतिक न्याय के आत्मा का निवास हर न्यायिक व्यवस्था में होता है। संभव है कि न्यायपालिका के निर्णय से बिहार सरकार की आत्मा जाग जाए और आनंद मोहन को वापस उसकी सही जगह यानी जेल भेज दिया जाए। पर क्या उससे उमा कृष्णैया के उस दु:ख की भरपाई कैसे होगी, जो एक लम्बे वैधव्य में उन्हें मिला? एक बेटी, जो पितृत्व प्रेम के सुख से वंचित रह गयी। सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि कुछ बाहुबलियों की सनक और हनक बरक़रार रहनी चाहिए।

वे नेता-बुद्धिजीवी, जो हर छोटी-बड़ी घटना पर लिंचिंग-लिंचिंग का शोर मचा रहे हैं, आज उनकी ज़ुबान को लकवा मर गया है। ये स्वतंत्र भारत के इतिहास के शर्मनाक अध्यायों में से एक है, जहाँ हज़ारों की भीड़ के सामने एक ज़िलाधिकारी की मॉब लिंचिंग हो गयी। उस दिन सिर्फ़ एक व्यक्ति की जान ही नहीं गयी, बल्कि देश के संविधान, सरकार और प्रशासन का इक़बाल भी रसातल में चला गया। ऊपर से आनंद मोहन जैसे दुर्दांत अपराधियों की रिहाई ने इस देश के आम नागरिकों को यह संदेश दिया है कि नैतिकताविहीन राजनीतिक सत्ता, जातिगत गोलबंदी, धनबल एवं बाहुबल का गठजोड़ इस देश के क़ानून, न्यायिक व्यवस्था तथा न्याय की अवधारणा को कभी भी नपुंसक एवं कायर बना सकता है। वह विधानमंडलों और लोकतंत्र के मंदिर में संविधान की धज्जियाँ उड़ा सकता है।

कृष्णैया की हत्या मात्र एक नौकरशाह की हत्या नहीं थी, बल्कि मेहनती, संघर्षशील युवाओं के संघर्षों तथा सपनों की हत्या की भी हत्या थी। यह इस देश में समानांतर सत्ता चला रहे राजनीतिक अपराधियों के विरुद्ध संविधान एवं क़ानून की श्रेष्ठता की स्थापना की उम्मीदों की हत्या थी। आनंद मोहन की रिहाई ने यह साबित किया कि इस देश में राजनीति अपने विघटनकारी और संवेदनशीलता की पराकाष्ठा की तर$फ अग्रसर है। इससे यह संदेश गया कि इस देश में न्याय की अवधारणा संभ्रांत और शक्तिशाली वर्ग के आगे बेबस है। इसलिए उमा जी! आपसे निवेदन है कि कृपया इस देश से अपने लिए न्याय मत माँगिए, क्योंकि यह आपके नैसर्गिक अधिकार के उत्पीडऩ का तमाशा उसी उपहास भरी मौन नज़रों से देखेगा, जिस तरह वह निरंतर संसद और विधानमंडलों में सांप्रदायिकता-जातिवाद रूपी दु:शासन के हाथ रोज़ लोकतंत्र एवं न्याय की देवी का चीरहरण देखता रहा है। इसलिए निवेदन है कि अपनी वेदना को इस निष्ठुर समाज के समक्ष तमाशा मत बनने दीजिए। परन्तु इस सारी विवेचना से अधिक ज़रूरी उन जातियों के आत्ममंथन का यह विषय है, जिनके नेता के तौर पर ऐसे दुर्दांत अपराधियों को स्थापित किया जाता रहा है।

साथ ही कुछ सवाल भी है। जातिगत गोलबंदी और राजनीतिक ध्रुवीकरण को एक तर$फ रख दें, तो भी जातीय सम्मान के नारे लगाने वालों को स्वयं से यह प्रश्न करना आवश्यक है कि क्या उनकी जातीय चेतना इतनी छिछले स्तर पर आ चुकी है कि उन्हें अपने समाज के नेतृत्व के लिए विकास दुबे और आनंद मोहन जैसे सर्टिफाइड अपराधी चाहिए? अगर आनंद मोहन एवं विकास दुबे जैसे शातिर अपराधी किसी समाज के प्रतिनिधि अथवा नायक हो सकते हैं, तो य$कीन मानिए, वो समाज अपने वैचारिकी के निम्नतम स्तर की ओर अग्रसर है। यह सवाल देश की हर जाति के लिए ज़रूरी है, जिनके भीतर से ‘कम्युनिटी वॉरियर्स’ के आवरण में दुर्दांत अपराधी अपनी जाति का नेतृत्व हथियाने का प्रयास करते हैं।

क्या इन जातियों को अपने भविष्य को गुंडागर्दी और अपराध की दिशा देनी है या समाज में अध्ययन-मनन द्वारा नये मार्ग तलाशने हैं? इसका निर्णय तो उन्हें करना ही पड़ेगा। क्योंकि इतिहास द्वारा निर्धारित यह प्रश्न बारंबार उनके समक्ष तब तक खड़ा होगा, जब तक वे इसका समुचित उत्तर नहीं तलाश लेते। उनका जवाब ही उनके भविष्य की दिशा निर्धारित करेगा।

(लेखक पत्रकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं।)

राजनीति में न फँसें खिलाड़ी

कुश्ती के खिलाडिय़ों के आन्दोलन को जाट आन्दोलन बनाने की हो रही पूरी कोशिश

पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर बैठे पहलवानों की सुनवाई नहीं हो रही है। बृजभूषण शरण सिंह पर एफआईआर दर्ज हुए भी काफ़ी समय हो चुका; लेकिन दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण शरण सिंह से यह पूछने की भी हिम्मत नहीं दिखायी है कि मामला क्या है? लेकिन अब इस आन्दोलन में एक नया सियासी मोड़ देखने को मिल रहा है। इसलिए मुझे लगता है कि पहलवानों को न्याय मिलेगा या नहीं यह तो भविष्य बताएगा; लेकिन भाजपा को आगामी लोकसभा चुनाव और हरियाणा की विधानसभा में लाभ की संभावना बढ़ चली है, क्योंकि भाजपा हरियाणा में 35 बनाम एक का खेल पहले ही खेलती रही है।

दरअसल, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस आन्दोलन को भाजपा जाट बनाम अन्य जाति करने की कोशिश कर रही है। ज़ाहिर है कि यूट्यूबर और छोटे चैनल, अख़बार इस आन्दोलन को कवर कर रहे हैं। परन्तु मुख्यधारा मीडिया का एक ख़ास तबक़ा और दिल्ली पुलिस इस आन्दोलन को पनपने नहीं देना चाहते। हालाँकि ख़ास पंचायतों के कुछ नेता और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता महिला पहलवानों के के पक्ष में आकर खड़े हो रहे हैं। लेकिन फिर भी जानबूझकर इस आन्दोलन को जाट बनाम मोदी सरकार किया जा रहा है, जिसके चलते अभी तक इस आन्दोलन को बल नहीं मिल रहा है। सवाल यह है कि फिर इस आन्दोलन को कैसे बड़ा आकार मिले।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस आन्दोलन को महिला बनाम मोदी किया जाए, तभी देश भर में भाजपा का माहौल बनेगा, अन्यथा यह आन्दोलन भाजपा को नुक़सान पहुँचा देगा। अगर याद करें, तो हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 35-1 के फार्मूले से चुनाव लड़ा था यानी 36 जातियों में एक जाति- जाट एक तरफ़, और बाक़ी 35 जातियाँ एक तरफ़ के फार्मूले पर चुनाव लड़ा गया था, और इसी के चलते भाजपा जीती थी। इसलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर महिला खिलाडिय़ों के शोषण का जो आन्दोलन चल रहा है, इस आन्दोलन को भी 35-1 के फैक्टर की ओर मोडऩे की कोशिशें की जा रही हैं, जो कि कहीं न कहीं इस आन्दोलन को कमज़ोर किये हुए है। माना जा रहा है कि इसलिए इस आन्दोलन में ख़ास पंचायतों को बढ़ावा दिया जा रहा है। अगर यह आन्दोलन केवल एक जाति या समाज का बनकर रह गया, तो फिर इसे ख़त्म होने में देर नहीं लगेगी। बृजभूषण भले कुश्ती संघ में शक्तिहीन हो गये; लेकिन अभी उनका बचाव हो रहा है।

ग़ौरतलब है कि पहलवानों का आन्दोलन पहली बार नहीं हो रहा है, पहले भी खिलाड़ी अपनी समस्याओं और माँगों को लेकर धरने पर बैठे हैं। लेकिन इस बार पहलवानों, ख़ासकर महिला पहलवानों ने जिस तरह के गम्भीर मुद्दे उठाये हैं, उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। सन् 2008 में हॉकी खिलाडिय़ों ने कु-प्रबंधन और खेल की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए तत्कालीन केंद्रीय खेल मंत्री एम.एस. गिल के ख़िलाफ़ दिल्ली के कनॉट प्लेस पर काले बेंज लगाकर धरना प्रदर्शन करते हुए प्रशासन में बदलाव की माँग को लेकर भूख हड़ताल की थी।

इससे पहले सन् 1970 में दिल्ली के राजपथ पर खिलाडिय़ों ने सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें रेसलर भी शामिल थे। लेकिन इस बार मामला न सिर्फ़ खिलाडिय़ों की तौहीन का है, बल्कि महिला खिलाडिय़ों के ख़िलाफ़ कथित रूप से यौन उत्पीडऩ का भी है, वह भी एक ऐसे बाहुबली नेता का; जिसके ख़िलाफ़ भले ही क़रीब 40 क्रिमिनल मुक़दमे हों। लेकिन वह भाजपा का क़द्दावर नेता भी है और मौज़ूदा दौर में मोदी सरकार में सांसद भी।

ऐसे में इसमें कोई दो-राय नहीं कि इस बड़े नेता के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होने में पहले ही संदेह है। दरअसल कभी भी निष्पक्ष जाँच के लिए ज़रूरी है कि नेता को उसके पदों से अलग किया जाता और राजनीतिक संरक्षण देना बंद किया जाता, तब दूध का दूध और पानी का पानी होता।

बहरहाल असली सवाल यह है कि क्या पहलवानों का आन्दोलन जाति की भेंट चढ़ सकता है? क्या इस आन्दोलन को ख़त्म करने की एक कोशिश की जा रही है। हालाँकि नाम नहीं छापने की शर्त पर कुछ लोग तो यहाँ तक दावा कर रहे हैं कि इस मुहिम का मोहरा ख़ुद सत्यपाल मलिक भी हैं? हालाँकि मुझे इसमें संदेह है और इस बात में कोई दम भी नहीं लगता। क्योंकि सत्यपाल मलिक तमाम पदों पर सरकार के ख़िलाफ़ मुखर होकर बोल रहे हैं। सवाल थोड़े अटपटे ज़रूर हैं; लेकिन है गम्भीर! लेकिन सच्चाई इससे इतर हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

दिल्ली लुटियंस के राजनीतिक गलियारे में तो खुलकर कानाफूसी हो रही है कि पूर्व राज्यपाल भाजपा का मोहरा हैं। मोहरा किस तरह हैं? यह समझने वाले समझ रहे होंगे, लेकिन वो या तो निशाने पर हैं, या निशाने के लिए हैं। हालाँकि दावे के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता।

सामाजिक चिंतक और किसान नेता प्रबल प्रताप शाही कहते हैं कि क्या मोदी और शाह इतने नादान हैं कि एक सांसद को बचाने के लिए एक बड़ा वोट प्रतिशत खोएँगे? और और वह इतने कमज़ोर हैं कि बृजभूषण शरण सिंह को गिरफ़्तार नहीं करा सकते? प्रधानमंत्री मोदी को कर्नाटक में कांग्रेस के चुनावी घोषणा-पत्र में बजरंग दल पर बैन लगाने की बात को लेकर चिन्ता है; लेकिन प्रधानमंत्री को बजरंगबली के भक्त और अखाड़े में बजरंगबली के साधक बजरंग पूनिया और अन्य महिला पहलवानों की कोई चिन्ता नहीं है? इससे साफ़ हो जाता है कि प्रधानमंत्री सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीति करते हैं।

वहीं दूसरी ओर शाही यह भी कहते हैं कि संघ से जुड़े हुए चंद जाट और राजपूत युवा जंतर-मंतर के इस आन्दोलन को समाज में वैमनस्य फैलाने के लिए जाट बनाम राजपूत की लड़ाई बनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं, उसी के तहत भडक़ाऊ सामग्री सोशल मीडिया के माध्यम से फैला रहे हैं, जिससे कि इस आन्दोलन को भ्रमित किया जा सके, क्योंकि वे जानते हैं कि हरियाणा और अन्य जाट बाहुल्य क्षेत्रों में जाट बनाम अन्य से ही उन्हें फ़ायदा होगा। भाजपा को लगता है कि अगर हिन्दुत्व का मुद्दा फेल होता है, तो जाति का कार्ड खेल दिया जाता है। जबकि और यह जंतर-मंतर पर तो यह ख़ुद-ब-खुद अपने आप ही हो रहा है। इसलिए खिलाडिय़ों को अपने इस आन्दोलन को जातिगत राजनीति की दलदल में फँसने से बचाना होगा।

पहलवानों और खिलाडिय़ों को राजनीतिक समझ नहीं आती; लेकिन कम-से-कम समाज के बुजुर्गों और ख़ास नेताओं को तो समझना चाहिए कि ग़ैर-जाटों और महिला संगठनों को आगे करें, तभी तो देश का मुद्दा बन पाएगा। पहलवानों के धरने से भाजपा का फ़ायदा हो रहा है और वो चाहते हैं कि यह ख़ास और जाट आन्दोलन के रूप में चले। जैसा भाजपा ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसान आन्दोलन के दौरान किया और 2022 चुनाव मे जाट बनाम अन्य कर के फ़ायदा लिया था।

हालाँकि भाजपा को पहलवानों के इस आन्दोलन से जाट वोटों का बहुत बड़ा नुक़सान होगा, मुझे इस पर संशय है; क्योंकि भाजपा ने पहले ही तमाम तथाकथित जाट नेताओं की झोली में कुछ न कुछ डालकर उनका मुँह बन्द कर रखा है। तमाम जाट नेता भाजपा में हैं और वो इस समय महिला पहलवानों के मामले में ख़ामोशी के साथ बैठे हैं। उनका ख़ामोश रहना और महिला पहलवानों के बारे में कुछ न बोलना भी कई सवाल खड़े करता है। महिला खिलाडिय़ों के साथ आकर बैठने वाले लोग किसान आन्दोलन के मुक़ाबले 2-3 फ़ीसदी भी नहीं हैं।

इसलिए अगर अभी यह आन्दोलन देश की महिला सुरक्षा बनाम महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ नहीं बना, तो यह आन्दोलन चलने वाला नहीं। आज सिर्फ़ महिला खिलाडिय़ों के ख़िलाफ़ अत्याचारों का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि महिला सुरक्षा को लेकर कोई बेहतरी न होना, बल्कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध और अत्याचार का मुद्दा भी है। अगर याद हो, तो हाथरस कांड, बदायूँ कांड, उन्नाव कांड और न जाने कितने ही महिलाओं पर अत्याचारों के मामले हैं, जिन्हें इस महिला खिलाड़ी आन्दोलन में शामिल किया जा सकता है, ताकि यह आन्दोलन जाट बनाम एक सांसद न बने, बल्कि महिला बनाम भाजपा सरकार बने।

सवाल यह है कि महिला पहलवानों के साथ किसान ही खड़े क्यों हों, क्यों देश के दूसरे तबके खुलकर नहीं बोल रहे हैं। क्या यह देश में महिला सुरक्षा का मुद्दा नहीं है। अगर आज इन महिला खिलाडिय़ों को न्याय नहीं मिल सका, तो फिर देश की महिलाएँ, ख़ासतौर पर बेटियाँ सुरक्षित रह सकेंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकेगा। हालाँकि कई नेता इन महिला खिलाडिय़ों के साथ आकर खड़े हो चुके हैं; लेकिन सवाल यह है कि केवल चंद मिनट महिला खिलाडिय़ों के बीच आकर भाषण देने भर से कुछ नहीं होने वाला, इसके लिए इन नेताओं को महिला खिलाडिय़ों के साथ इस तरह खड़ा होना पड़ेगा। इन महिला खिलाडिय़ों का सबसे बड़ा संबल महिलाएँ बन सकती हैं, जो इनके साथ खड़ी हो सकती हैं।

कई महिलाएँ महिला सुरक्षा की लड़ाई लड़ती हैं, वो भी इनके साथ एकजुट होकर आ सकती हैं। इसके लिए सबको अपनी-अपनी दुकान चलाने की फ़िक्र छोडऩी होगी और राजनीति से दूर रहकर महिला खिलाडिय़ों को न्याय दिलाने के लिए आगे आना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि यह एक जाट आन्दोलन नहीं, बल्कि महिला उत्पीडऩ का मामला है, और वो भी उन महिलाओं के उत्पीडऩ का मामला है, जो दुनिया में देश का गौरव बढ़ाने के लिए मैडल जीतकर लाती हैं। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

मणिपुर हिंसा पर लीपापोती!

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर जातीय हिंसा की वजह से माहौल तनावपूर्ण है। हिंसा की ख़बरें मुख्यधारा की मीडिया के अधिकांश प्लेटफॉर्म से नदारद हैं। एक लम्बी हिंसा के बाद अब हालात मामूली तौर पर सुधरे हैं, परन्तु अभी भी हालात बिगडऩे की आशंका है। कर्नाटक में बजरंगबली को चुनाव में भुनाने की कोशिश करने वाले भाजपा नेता मणिपुर पर अब भी ख़ामोश हैं। हालाँकि मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इस हिंसा को दुर्भाग्यपूर्ण बताया, परन्तु बहुत देर होने के बाद। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि इस हिंसा में 60 लोगों की जान चली गयी, 231 लोगों के घायल हो गये तथा 1700 घरों में आग लगा दी गयी। इस भीषण हिंसा में एक विशेष समुदाय के लोगों पर अत्याचार हुआ, परन्तु देश के प्रधानमंत्री अपनी प्रचार लॉबी के साथ किसी भी हाल में कर्नाटक में विधानसभा जीतने के लिए प्रचार करते रहे।

मणिपुर हिंसा तब भडक़ी, जब ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर ने आदिवासी एकजुटता मार्च निकाला। आदिवासी एकजुटता मार्च एक ऐसे समय में मणिपुर में निकाला जा रहा था, जब देश ने पहली बार एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति का का ताज पहनाया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदिवासियों के कई महोत्सवों को बढ़ावा दिया है, उनके कार्यक्रमों में भाग लिया है।

बावजूद इसके मणिपुर में आदिवासी एकजुटता मार्च के दौरान भडक़ी हिंसा पर किसी ने संज्ञान नहीं लिया, जबकि वहाँ भाजपा सरकार है। हालाँकि जब हिंसा की आग बुझने लगी, तब भाजपा ने उसे शान्त करने का क़दम उठाया है, जो कि लम्बी आगजनी और हिंसा के बाद आग के अधबुझे शोलों पर धूल डालने जैसा ही माना जाएगा। यह हिंसा क्यों भडक़ी इसके पुख़्ता सुबूत तो जाँच के बाद ही सामने आएँगे। परन्तु अभी तक मिली जानकारियों के मुताबिक, यह मार्च 19 अप्रैल को मणिपुर उच्च न्यायालय के फ़ैसले के जवाब में आयोजित किया गया था।

इस मार्च में राज्य की मेइती आबादी को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी में शामिल करने की माँग की जा रही थी, इसी माँग के ख़िलाफ़ अन्य आदिवासी समुदाय, जिसमें विशेष रूप से कुकी और नागा समुदाय शामिल थे, पर कथित रूप से मेइती समुदाय के लोगों ने हमला कर दिया और हिंसा भडक़ उठी। मेइती समुदाय की माँग के ख़िलाफ़ मार्च निकालने पर आदिवासी समुदायों पर हुए हमले को मेइती समुदाय, जो कि संख्या में अन्य आदिवासी समुदायों से काफ़ी अधिक है, इस हिंसा को अपने ख़िलाफ़ एक साज़िश बता रहा है। वहीं आदिवासी समुदायों ने हमले के लिए मेइती समाज को आरोपी ठहराया है। मणिपुर में मेइती समाज के लोगों की आदिवासी दर्जे की माँग को पहले से आदिवासी समाज अपने आरक्षण और अन्य प्राकृतिक संसाधनों में में सेंध मान रहा है और इसका विरोध कर रहा है।

दरअसल मेइती समाज द्वारा अपने लिए अनुसूचित जनजाति का दर्जा माँगने के मामले में मणिपुर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर केंद्र को एक सिफ़ारिश भेजने का निर्देश दिया था, जिस आदिवासी मेइती के लिए आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

धरातल से छनी जानकारियों का दावा है कि हिंसा की धुरी भले ही मेइती, कुकी और नागा समुदाय हो, परन्तु यह केवल एक जातीय विवाद नहीं है। इस हिंसा में बड़े-बड़े हाथ हैं, जिन्हें गैर राजनीतिक भी नहीं कहा जा सकता। मणिपुर में बहुसंख्यक मेइती समुदाय की उसे अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की माँग सरकार से कोई आज की नहीं है। परन्तु आग में घई ऐसे समय में डाला गया है, जब कर्नाटक के बाद कुछ आदिवासी बहुल पूर्वोत्तर राज्यों में चुनाव होने हैं। स्थानीय सूत्रों का दावा तो यहाँ तक है कि हिंसा में 100 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, और हज़ारों लोग घायल हुए हैं। सरकार का कहना है कि मणिपुर में हिंसक झड़पों के चलते पाँच दर्ज़न के लगभग लोगों की जान जा चुकी है, वहीं सैकड़ों लोगों को घर छोडऩा पड़ा है।

मुख्यमंत्री बीरेन बता चुके हैं कि हिंसा वाली जगहों से 20,000 फँसे हुए लोगों को निकाला जा चुका है और 10 हज़ार लोग अब भी फँसे हुए हैं। केंद्र सरकार ने केंद्रीय बलों की कई कंपनियाँ भेजी हैं। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है। पीडि़तों के लिए बतौर मुआवज़ा 5-5 लाख रुपये प्रति मृतक के हिसाब से उसके परिवार को, गम्भीर रूप से घायलों को 2-2 लाख रुपये और कम गम्भीर चोटिलों को 25-25 हज़ार रुपये दिये जाएँगे। हिंसा भडक़ाने वाले व्यक्तियों / समूहों और सरकारी कर्मचारियों की ज़िम्मेदारी तय करने के लिए एक उच्च-स्तरीय जाँच की जाएगी। 1,593 छात्रों सहित 35,655 लोग सुरक्षित स्थानों पर चले गये हैं। उन्होंने कहा कि 3 मई की दुर्भाग्यपूर्ण घटना में क़रीब 60 निर्दोष लोगों की जान चली गयी, 231 लोगों को चोटें आयीं और लगभग 1,700 घर जल गये। मैं लोगों से राज्य में शान्ति और शान्ति लाने की अपील करता हूँ।

हाल के मणिपुर के हालात देखें, तो पता चलता है कि मामला अभी भी शान्त नहीं हुआ है और इसका असर कहीं हो न हो, पूर्वोत्तर राज्यों में बहुत होगा। कुछेक जगहों को छोड़ दें, तो लोगों में अभी भी डर बना हुआ है और फँसे हुए लोग सुरक्षित स्थान चाहते हैं। स्थानीय लोगों में इतना ग़ुस्सा है कि उन्होंने नेताओं की भी पिटाई की है। स्थानीय जानकारी से पता चला है कि वहाँ भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने मणिपुर छोड़ दिया है और कई राज्य में ही सुरक्षित स्थानों पर चले गये हैं।

मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह कह रहे हैं कि हालात पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नज़र रखे हुए हैं। लेकिन सुलगते मणिपुर को शान्त करने के लिए कई बार हर दिन एक नया मुख्य सचिव बनाया गया और आख़िर में हिंसक घटनाओं को रोकने के लिए राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी के महानिदेशक आईएएस विनीत जोशी को ज़िम्मेदारी दी गयी है। जोशी ने मणिपुर सरकार के रेजिडेंट कमिश्नर के रूप में भी काम किया है। विनीत जोशी भाजपा के बड़े नेताओं के काफ़ी पसंदीदा अधिकारी हैं और वह मणिपुर की रग जानते हैं।

इधर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मणिपुर में लम्बे समय से चल रही हिंसा को लेकर मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है। जयराम रमेश ने ट्वीट किया- ‘मणिपुर के मुख्यमंत्री ने आख़िरकार सभी राजनीतिक दलों और कुछ नागरिक समाज के समूहों के साथ बैठक करने का एहसान किया। लेकिन वह राज्य में भीषण हिंसा तथा हत्याओं के लिए ख़ुद को तथा नयी दिल्ली और नागपुर में अपने संरक्षकों को ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकते।’

जयराम रमेश ने इशारे-इशारे में मणिपुर हिंसा का आरोप आरएसएस और भाजपा पर लगाया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) / भाजपा पूर्वोत्तर में जो कर रहे हैं, कांग्रेस उसके नतीजों की चेतावनी देती रही है। लेकिन अब मणिपुर में शान्ति तथा सौहार्द लाने के लिए सामूहिक संकल्प लेने का व$क्त है। मैं प्रदेश के लोगों से शान्ति और सौहार्द बनाये रखने की अपील करता हूँ।

जो भी हो, तत्काल तो मणिपुर सरकार के आगे राज्य को हिंसा से बचाना है; क्योंकि वहाँ हिंसा कई जगह भडक़ी है, जिसके आसानी से शान्त होने के आसार नहीं हैं। तमाम चुनौतियों के बीच मणिपुर सरकार आईएएस विनीत जोशी पर भरोसा किये बैठी है, जो कि यह साबित करता है कि मणिपुर के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ख़ुद इस हिंसा से निपटने में नाकाम हैं या फिर वो इसके लिए केंद्र सरकार पर निर्भर हैं कि वो ही कुछ करे। यह भी हो सकता है कि बीरेन सिंह के हाथ बँधे हों कि वो अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कर सकते, जब तक कि केंद्रीय नेतृत्व की ओर से कोई निर्देश नहीं मिल जाता। तो क्या जाँच के नाम पर हीलाहवाली चल रही है?

अब देखना यह है कि मणिपुर हिंसा कब तक थमती है। राजनीति की शिकार जनता आख़िर कब समझेगी कि जातिवाद की दलदल से निकलकर उसे आगे बढऩा चाहिए, अन्यथा वो लगातार इसी तरह हिंसा का शिकार होती रहेगी या फिर निचले स्तर पर पिसती रहेगी। मणिपुर में जिन तीन जातियों में हिंसक झड़पें हुईं, उन्हें देखना होगा कि कौन उनके बीच घुसकर इस हिंसा का कारण बना। यह किसी पर दोषारोपण नहीं है, वरन् सचेत करने के लिए एक सुझाव है; जिसे पूरे देश की जनता को समझना होगा।

कभी भी किसी भी जगह हिंसा की वजह दो समुदाय हो सकते हैं, परन्तु बहुत बड़े पैमाने पर हिंसा, आगजनी, मारकाट तथा तोडफ़ोड़ का मतलब उसके लिए आम जनता से कहीं अधिक अराजक तत्त्व हैं, जिसके पीछे कोई-न-कोई राजनीतिक खोपड़ी काम करती है, वो चाहे सत्ता पक्ष की हो या फिर विपक्ष की हो। तस्वीर साफ़ करने के लिए निष्पक्ष जाँच ही एक सही रिपोर्ट पेश कर सकती है, जो किसी भी हाल में होनी चाहिए।