पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में बंपर वोटिंग महज चुनावी उत्साह नहीं, बल्कि वजूद बचाने की जंग ज्यादा नजर आ रही है! राजनीतिक के जानकारों की मानें तो यहां मतदान के भारी आंकड़ों के पीछे नागरिकता खोने का एक गहरा मनोवैज्ञानिक खौफ छिपा है। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) और फिर मतदातासूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी चर्चाओं ने मतदाताओं के एक वर्ग के मन में यह डर बैठा दिया है कि यदि वे वोट डालने नहीं गए या उनका नाम वोटर लिस्ट में सक्रिय नहीं दिखा, तो भविष्य में उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने में कठिनाई हो सकती है! यह डर केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों और कस्बों में राजनीतिक दल भी इस नैरेटिव को हवा देते रहे हैं। लोगों को यह भी समझाया गया कि यदि वे बूथ तक नहीं पहुंचे और उनका नाम मतदाता सूची में ‘निष्क्रिय’ दिखा, तो भविष्य में उन्हें अपनी पहचान साबित करने में भारी मुश्किल होगी।
आंकड़ों की बात करें तो पश्चिम बंगाल में चुनावी जुनून का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां पहले चरण में मतदान का प्रतिशत 92.25% तक पहुंचकर एक नया रिकॉर्ड बना गया। जिलेवार देखें तो दक्षिण दिनाजपुर में सबसे ज्यादा 94.77% और कालिम्पोंग जिले में सबसे कम फिर भी 82.93% वोट डाले गए।
खासकर, पश्चिम बंगाल के परिप्रेक्ष्य में, राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार की बंपर वोटिंग के पीछे एसआईआर के कारण उपजा एक अनजान खौफ भी बड़ा कारण रहा है। यानी ‘पहचान खोने का डर’ ही सीमावर्ती जिलों में मतदान का असली इंजन बनकर उभरा है। राजनीतिक दल भी रैलियों में इस नैरेटिव को हवा देते रहे हैं कि यह चुनाव केवल सरकार चुनने का नहीं, बल्कि अपनी जमीन बचाने की लड़ाई है।
पश्चिम बंगाल के साथ-साथ दक्षिण भारत के तमिलनाडु में भी 85.03% मतदान हुआ, जो काफी भारी और शांतिपूर्ण रहा। लेकिन बंगाल की तस्वीर अलग रही, जहां मुर्शिदाबाद समेत कुछ जगहों पर हिंसा की खबरें सामने आईं। मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर समर्थकों और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें हुईं, तो वहीं दक्षिण दिनाजपुर की कुमारगंज सीट पर भाजपा प्रत्याशी सुवेंदु सरकार पर हमले के वीडियो दिनभर सोशल मीडिया पर वायरल रहे।
बहरहाल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की यह बंपर वोटिंग किसी लहर से ज्यादा ‘वजूद बचाने की छटपटाहट’ नजर आती है। बंगाल में नागरिकता छिनने का खौफ है, तो तमिलनाडु में सरकारी लाभ और पहचान खोने का डर। यह भारी मतदान लोकतंत्र की मजबूती से ज्यादा मतदाता की असुरक्षा का पैमाना है। प्रचंड गर्मी के बीच उंगली पर लगी यह स्याही सरकार चुनने का माध्यम कम और खुद को ‘वैध’ साबित करने का सबसे बड़ा दस्तावेज ज्यादा बन गई है।
उत्तर प्रदेश के चुनाव हों या बंगाल-तमिलनाडु के, ‘बंपर वोटिंग’ हमेशा राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक पहेली रही है। आमतौर पर यह माना जाता है कि भारी मतदान या तो सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) का संकेत है या फिर सत्ता के समर्थन में जबरदस्त उत्साह (Pro-incumbency) का। ऐसे में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में बंपर वोटिंग को केवल ‘नाराजगी’, ‘उत्साह‘ या ‘पहचान खोने का डर’ कहना जल्दबाजी होगी। यह अत्यधिक प्रतिस्पर्धा (Hyper-competitiveness) का परिणाम भी हो सकता है। जब दो या तीन पार्टियां एक-एक सीट के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाती हैं, तो वे अपने समर्थकों को घर से निकलने के लिए मजबूर कर देती हैं, जिससे मतदान का ग्राफ ऊपर चला जाता है। ऐसे में सटीक परिणाम केवल ईवीएम (EVM) ही बता सकती है।




