दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक छात्र की रविवार को हत्या कर दी गयी है। पुलिस ने इस सिलसिले में दो छात्रों को गिरफ्तार किया जबकि दो अन्य की वह तलाश कर रही है। बताया जाता है कि यह मामला कथित तौर पर मृतक छात्र की प्रेमिका से छेड़छाड़ से जुड़ा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस छात्र की हत्या की गयी है वह डीयू के आर्यभट्ट कॉलेज का निखिल चौहान (19) है, जो पश्चिम बिहार का रहने वाला था। पुलिस के मुताबिक पुलिस के मुताबिक निखिल बीए (ऑनर्स) पॉलिटिकल साइंस स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के प्रथम वर्ष का छात्र था। सात दिन पहले कॉलेज में स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के एक छात्र ने निखिल की प्रेमिका से बदसलूकी की थी।
पुलिस ने हत्या के इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है जिनमें एक 19 साल का राहुल है, जो आर्यभट्ट कॉलेज के बीए फर्स्ट ईयर का छात्र है। दूसरा आरोपी 19 साल का हारुन है जो जनकपुरी का रहने वाला है और राहुल का दोस्त है। बाकी दो और आरोपियों की पुलिस तलाश कर रही है।
घटना की जानकारी पुलिस को चरक पालिका अस्पताल से एक पीसीआर कॉल मिली थी। कॉलर ने पुलिस को बताया कि उनके अस्पताल में एक घायल छात्र को लाया गया है, जिस पर चाकू से हमला किया गया है। छात्र की इलाज के दौरान मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक रविवार दोपहर आरोपी अपने तीन साथियों के साथ कॉलेज गेट के बाहर निखिल से मिला और इसी दौरान उसे चाकू मार दिया।
मणिपुर में जारी हिंसा के बीच पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने राज्य की स्थिति को ‘असाधारण रूप से दुखद’ बताया है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि राज्य की इस स्थिति पर तत्काल ध्यान देने की ज़रुरत है। इस बीच मणिपुर में लगातार झड़पें, आगजनी और हिंसा की ख़बरें आ रही हैं।
मणिपुर के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के एक ट्वीट का जिक्र करते हुए जनरल मलिक ने राज्य में खराब स्थिति पर पीएम मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह को टैग करते हुए उच्चतम स्तर पर तत्काल ध्यान देने को कहा है।
बता दें जनरल मालिक ने जिस सेना अधिकारी के ट्वीट को टैग किया है वह लेफ्टिनेंट जनरल सिंह हैं, जिन्होंने 30 मई को कहा था – ‘मेइती और कुकी लोगों के बीच जातीय हिंसा के बीच म्यांमार से लुंगी पहने हुए 300 आतंकवादी मणिपुर में प्रवेश कर गए हैं।’ लेफ्टिनेंट जनरल सिंह 40 साल तक भारतीय सेना में सेवा देने के बाद 2018 में सेवानिवृत्त हुए थे।
इस बीच मणिपुर के इंफाल शहर में सुरक्षाबलों और भीड़ के बीच शुक्रवार को रातभर हुई झड़पों में दो नागरिक घायल हो गए। अधिकारियों ने बताया कि कल रात संघर्षग्रस्त मणिपुर के क्वाथा और कांगवई इलाकों से स्वचालित हथियारों से गोलीबारी की गई और आज सुबह तक रुक-रुक कर गोलीबारी की खबरें आ रही हैं। तोड़फोड़ और आगजनी की कई घटनाएं हुई हैं। इंफाल में भीड़ ने भाजपा के नेताओं के घर जलाने की भी कोशिश की।
मणिपुर के बिष्णुपुर जिले के क्वाकटा और चुराचांदपुर जिले के कंगवई से पूरी रात गोलीबारी होने की खबर है। सुरक्षाबलों पर भी फायरिंग की सूचना है। इंफाल पश्चिम के इरिंगबाम पुलिस थाने में लूट की कोशिश की गई। हालांकि, इस दौरान कोई हथियार चोरी नहीं हुआ। अधिकारियों के अनुसार, दंगाइयों को इकट्ठा होने से रोकने के लिए सेना, असम राइफल्स और मणिपुर द्रुत कार्य बल (आरएएफ) ने इंफाल में आधी रात तक संयुक्त मार्च निकाला।
ओडिशा के बालासोर में हुए ट्रेन हादसे ने एक बार फिर देश में रेल सुरक्षा तंत्र की पोल खोल दी है। साथ ही इससे जुड़े कई सवाल भी उठा दिये हैं। मोदी सरकार त्वरित काम को अपना एजेंडा बताती है; लेकिन रेल सुरक्षा की ‘रक्षा कवच’ योजना जिस धीमी गति से चल रही है, उससे लगता है ज़मीनी हक़ीक़त उसके दावों से अलग है। हाल में ‘कैग’ की रिपोर्ट में भी रेल सुरक्षा से जुड़ी कई ख़ामियों को सामने लाया गया है। यदि इस हादसे से भी सबक़ नहीं लिया जाता है, तो सैकड़ों बेक़ुसूर लोग यूँ ही रेल हादसों में अपनी जान गँवाते रहेंगे। बालासोर दुर्घटना और अन्य रेल हादसों पर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-
ओडिशा के बालासोर में रेल हादसा बताता है कि कैसे दशकों से सरकारें सुरक्षा के मामले में लापरवाह रही हैं और इस तरफ़ कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया गया। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि मोदी सरकार के बनाये राष्ट्रीय रेल सुरक्षा कोष (आरआरएसके) के पैसे का सही इस्तेमाल नहीं हुआ। दिसंबर, 2022 में संसद में पेश की गयी कैग रिपोर्ट में रेलवे सुरक्षा और भारतीय रेलवे के कार्यों में विभिन्न कमियों पर कई चिन्ताओं को उजागर किया था।
कोष के उद्देश्य के नाकाम होने का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि इसके तहत ट्रैक रिनुअल के काम के लिए 2018-19 में कुल 9607.65 करोड़ रुपये की राशि राखी गयी थी; लेकिन एक साल बाद (2019-20) ही इसमें 2,400 करोड़ की बड़ी कटौती करके इसे 7,417 करोड़ कर दिया गया। कैग की रिपोर्ट से ज़ाहिर होता है कि रेलवे सुरक्षा पर जितना बजट निर्धारित किया गया था, उसे ही पूरा ख़र्च नहीं किया जा सका। भारतीय रेलवे में सुरक्षा का आलम यह है कि कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौज़ूदा मानदंडों का उल्लंघन करते हुए 27,763 कोचों यानी 62 फ़ीसदी में अग्निशमन यंत्र उपलब्ध ही नहीं कराये गये थे।
इस हादसे की जाँच सरकार ने सीबीआई को सौंप दी। हालाँकि सीबीआई ने अभी तक दुर्घटना के कारणों को उजागर नहीं किया है। भारत में दुनिया का सबसे लम्बा रेल नेटवर्क है, जिसके तहत हर रोज़ क़रीब 2.21 करोड़ से ज़्यादा लोग रेल यात्रा करते हैं। ऐसे में सुरक्षा भारत में रेल की सबसे बड़ी चिन्ता है। लगातार होते हादसे बताते हैं कि हाल के वर्षों में हुए रेल हादसों की जो रिपोर्ट सामने आयी हैं, उनसे कोई ख़ास सबक़ नहीं सीखा गया। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, बालासोर के ट्रिपल ट्रेन हादसे में 288 लोगों की मौत हुई, 1,100 से ज़्यादा घायल हुए और यह रिपोर्ट लिखे जाने तक 81 शवों की पहचान ही नहीं हो पायी थी। ग़ैर-सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, इस हादसे में मृतकों की संख्या 500 से ज़्यादा हो सकती है।
बेशक रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव, जो लगातार घटनास्थल पर राहत कार्यों का निरीक्षण करते रहे; ने कहा है कि ओडिशा के बालासोर रेल हादसे के ‘मूल कारण’ की पहचान कर ली गयी है और जल्द ही एक रिपोर्ट में इसका ख़ुलासा किया जाएगा, इस हादसे की जाँच सीबीआई के लिए आसान नहीं होगी। उसे विभिन्न पहलुओं पर जाँच करनी होगी, जिनमें पहला यह है कि क्या यह हादसा साज़िश का नतीजा था? तो साज़िश रचने वाले कौन थे? सीबीआई अभी तक की जाँच में रेलवे के ही उन लोगों की पहचान नहीं कर पायी है; जिनकी ग़लती से यह हादसा हुआ।
सीबीआई देश की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी है; लेकिन यदि इतिहास देखें, तो कई बड़े मामलों की जाँच बाद में ठण्डे बस्ते में डाल दी गयी। सीबीआई को इससे पहले भी दो रेल हादसों की जाँच का ज़िम्मा दिया गया था; लेकिन दोनों ही मामलों में एजेंसी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी थी। ऐसे ही 2016 में कानपुर रेल हादसे की जाँच का ज़िम्मा सरकार ने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को दिया था; लेकिन चार्जशीट दायर किये बिना ही मामला बन्द कर दिया गया था। रेल मंत्री की एनआईए से जाँच करवाने की घोषणा के कुछ ही महीने बाद प्रधानमंत्री मोदी ने एक चुनाव रैली में दावा किया था कि कानपुर रेल हादसा एक साज़िश थी और दोषियों को सख़्त सज़ा दी जाएगी। हालाँकि इसके एक साल बाद एनआईए ने हादसे की जाँच की फाइल बन्द कर दी और चार्जशीट भी दायर नहीं की। उसके बाद कभी हादसे का कोई सच सामने नहीं आया।
उधर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे एक पत्र में कहा कि बालासोर रेल हादसे की जाँच के लिए केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को शामिल करना सरकार की जवाबदेही तय करने के किसी भी प्रयास को पटरी से उतारने की रणनीति का हिस्सा है। सीबीआई, या कोई अन्य $कानून प्रवर्तन एजेंसी, तकनीकी, संस्थागत और राजनीतिक विफलताओं के लिए जवाबदेही तय नहीं कर सकती है। इसके अलावा उनके पास रेलवे सुरक्षा, सिग्नलिंग और रखरखाव प्रथाओं में तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव है।
सुरक्षा कोष पर ही सवाल
रेल यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए साल 2017-18 में रेलवे सुरक्षा कोष का गठन किया गया था। इसके पहले सभी ट्रैक रिन्यूअल का काम डीआरएफ से होता था। रेलवे सुरक्षा कोष के गठन के बाद यह ज़िम्मा उसके पास आ गया। कैग की रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर, 2015 के आकलन के अनुसार रेलवे को ट्रैक रिन्यूअल के लिए 1,54,000 करोड़ रुपये की ज़रूरत थी। इसमें से रेलवे सुरक्षा फंड के ज़रिये 1.19 करोड़ रुपये के फंड का आवंटन होना था। लेकिन रेलवे सुरक्षा कोष के पास तो ज़रूरी पैसा ही नहीं है कि वह फंड दे सके। कैग रिपोर्ट के अनुसार, अगले 5 साल में 1,00,000 रुपये का कोष में आवंटन होना था। लेकिन 2017-18 से लेकर 2020-21 के दौरान बजट आवंटन के ज़रिये 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। और उसमें भी वास्तव में उसे केवल 4,425 करोड़ रुपये ही मिले, अर्थात् 78.88 फ़ीसदी रक़म मिली ही नहीं।
देश में रेलवे की सुरक्षा को लेकर ढिंढोरा पीटा जाता है; लेकिन कैग की एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि रेलवे सुरक्षा कोष का दुरुपयोग कर इस पैसे से फुट मसाजर, क्रॉकरी, बिजली के उपकरण, फर्नीचर, सर्दियों की जैकेट, कम्प्यूटर और एस्केलेटर ख़रीद लिये गये या इस पैसे को उद्यान विकसित करने, शौचालय बनाने, वेतन-बोनस भुगतान करने या झंडा लगाने में इस्तेमाल कर लिया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग़ैर-प्राथमिकता वाले कार्यों के लिए धन के उपयोग में वृद्धि हुई, जो आरआरएसके फंड परिनियोजन ढाँचे के मार्गदर्शक सिद्धांतों के ख़िलाफ़ था, जबकि इसे बेहतर तकनीकों का उपयोग करके ट्रैक रखरखाव गतिविधियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए था।
इस बारे में भारतीय रेलवे का कहना है कि सुरक्षा कोष (आरआरएसके) का उपयोग सिर्फ़ सुरक्षा सम्बन्धी व्यय में किया गया है। सुरक्षा समिति की सिफारिशों के आधार पर रेलवे ने लोको पायलटों के लिए उचित आराम और तनाव से राहत के लिए रनिंग रूम में बॉडी मसाजर, फुट मसाजर, एयर कंडीशनिंग आदि जैसी सुविधाएँ और सुविधाएँ प्रदान की हैं। यह सामान ट्रेनों में सुरक्षित यात्रा के लिए ज़रूरी है। भारतीय रेलवे का कहना है कि सुरक्षा निधि का उपयोग सिर्फ़ सुरक्षा सम्बन्धी मामलों में किया गया है और इसके उपयोग के सम्बन्ध में जो कहा गया है, वह सच नहीं है।
बालासोर के भीषण हादसे के बाद ट्रैक रखरखाव पर उठे सवालों पर भारतीय रेलवे ने कहा कि उसने 2020 में पुराने ट्रैक (ट्रैक नवीनीकरण) को बदलने के लिए राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष (आरआरएसके) से 13,523 करोड़ रुपये ख़र्च किये। हालाँकि यह राशि अभी भी भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की अनुमानित राशि के 44,936 करोड़ से कम थी, जो इस उद्देश्य के लिए ख़र्च होनी थी।
कोष के लिए रेलवे को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में वार्षिक 5,000 करोड़ रुपये का योगदान देना था। हालाँकि कैग ने पाया कि प्रतिकूल आंतरिक संसाधन स्थिति के कारण, रेलवे चार वित्तीय वर्षों क्रमश: 2017-18, 18-19, 19-20 और 20-21 के लिए वांछित योगदान को पूरा करने में विफल रहा। कुल मिलाकर रेलवे के वित्त पोषण में 15,775 करोड़ रुपये का घाटा था। भारतीय रेलवे की स्थायी समिति ने कहा कि ‘रेलवे के आंतरिक संसाधनों से आवश्यक धन का विनियोजन न होने के कारण आरआरएसके का उद्देश्य धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।’ रिपोर्ट में जो चिन्ताजनक बात कही गयी है, वह यह है कि धन की कमी के कारण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य रुके हुए थे।
ख़ामियों में सुधार नहीं
पिछले साल सितंबर में संसद में रेलवे की एक ऑडिट रिपोर्ट पेश की गयी थी। इस रिपोर्ट में रेल सुरक्षा में कई गम्भीर ख़ामियाँ सामने आयी थीं। रेल मंत्री वैष्णव ने कहा कि दुर्घटना इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग में बदलाव के कारण हुई। हालाँकि भारत के शीर्ष ऑडिटिंग निकाय कैग ने 2022 में ट्रेनों के पटरी से उतरने की घटनाओं को लेकर चिन्ता जतायी थी। रिपोर्ट में यह पता लगाने के लिए कहा गया था कि रेल मंत्रालय ने ट्रेनों के पटरी से उतरने और ट्रेनों को टकराने से रोकने के स्पष्ट उपाय तय या कार्यान्वित किये हैं या नहीं? उसने इंस्पेक्शन में बड़ी कमी, हादसों के बाद जाँच रिपोर्ट जमा करने या स्वीकार करने में विफलता, प्राथमिकता वाले कार्यों के लिए तय रेलवे फंड का उपयोग नहीं करना, ट्रैक नवीनीकरण के लिए फंडिंग में कमी और सुरक्षा के लिए अपर्याप्त स्टाफ को लेकर गंभीर चिन्ता जतायी थी।
छानबीन से ज़ाहिर होता है कि हाल के वर्षों में रेलवे पटरियों की ज्योमेट्रिकल और स्ट्रक्चरल कंडीशन का आकलन करने के लिए ज़रूरी ट्रैक रिकॉर्डिंग करने वालों ने 30-100 फ़ीसदी तक कम इंस्पेक्शन की। रिपोट्र्स में ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम में विफलताओं की बात कही गयी है, जिनमें आज तक कोई सुधार नहीं किया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रैक प्रबंधन प्रणाली ट्रैक रखरखाव गतिविधियों की ऑनलाइन निगरानी के लिए एक वेब-बेस्ड एप्लिकेशन बनायी गयी है; लेकिन जाँच में टीएमएस पोर्टल का इन-बिल्ट मॉनिटरिंग मैकेनिज्म चालू नहीं पाया गया था। देश में रेल के अप्रैल, 2017 से मार्च, 2021 तक ‘इंजीनियरिंग विभाग’ के कारण डिरेलमेंट के 422 मामले सामने आये थे। इनमें 171 मामले बोगियों के पटरी से उतरने के लिए ज़िम्मेदार प्रमुख कारणों में ट्रैक के रखरखाव, जबकि 156 मामले ट्रैक पैरामीटर की सीमा से अधिक विचलन के थे। रिपोर्ट के मुताबिक, डिरेलमेंट की घटनाओं के पीछे ख़राब ड्राइविंग / ओवर स्पीड भी प्रमुख कारण हैं। ऑपरेटिंग डिपार्टमेंट के कारण होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या 275 थी। इसके अलावा प्वाइंट्स की ग़लत सेटिंग और शंटिंग ऑपरेशन में अन्य ग़लतियाँ 84 प्रतिशत घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार बतायी गयी हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश डिरेलमेंट की घटनाएँ पाँच कारणों से हुईं। इनमें नियम और संयुक्त प्रक्रिया आदेश, कर्मचारियों का प्रशिक्षण / काउंसलिंग, संचालन का सुपरविजन, विभिन्न विभागों के कर्मचारियों के बीच समन्वय और संचार और शेड्यूल इंस्पेक्शन शामिल हैं। क़रीब 63 फ़ीसदी मामलों में जाँच रिपोर्ट स्वीकार करने वाले अधिकारी के पास निर्धारित समय सीमा में जमा नहीं की गयी और 49 फ़ीसदी मामलों में स्वीकार करने वाले अधिकारियों की ओर से रिपोर्ट की स्वीकृति में देरी की गयी। कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रैक नवीनीकरण कार्यों के लिए धन के आवंटन में कमी आयी है और पहले से आवंटित राशि का भी पूरी तरह से उपयोग नहीं किया गया है।
देश में 2017 से 2021 के बीच डिरेलमेंट की 1,127 घटनाओं में से 289 (26 फ़ीसदी) घटनाएँ ट्रैक नवीनीकरण से जुड़ी हुई हैं। इस दौरान मानवयुक्त 2,908 रेलवे क्रॉसिंग (नौ फ़ीसदी) को समाप्त करने के लक्ष्य में से केवल 2,059 (70 फ़ीसदी) क्रासिंग को ख़त्म किया गया था। कैग ने अपनी आख़िरी रिपोर्ट में सि$फारिश की है कि रेलवे दुर्घटना से संबंधित जाँच पूरी करने और उसे अंतिम रूप देने के लिए निर्धारित समय-सीमा का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे और ट्रैक का रखरखाव करने के लिए बेहतर टेक्नालॉजी के साथ पूरी तरह से मशीनीकृत तरी$कों को अपनाये। साथ ही रख-रखाव गतिविधियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए एक मज़बूत निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।
हादसे के बाद उठे सवाल
जिस रूट पर यह भयंकर रेल हादसा हुआ, उसे भारत का सबसे पुराना और सबसे व्यस्त रूट माना जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि कोयले, तेल ढुलाई आदि के लिए मालगाडिय़ाँ भी इसी रूट का इस्तेमाल करती हैं। इस ट्रैक के इतने पुराने और इस पर अत्यधिक ट्रैफिक होने के कारण इसकी मरम्मत नहीं हो पाती। दूसरे हादसे की शुरुआती जाँच में सामने आयी जानकारी के मुताबिक, कोरोमंडल एक्सप्रेस को अप मेनलाइन का सिग्नल दिया गया, जिसे वह लूप लाइन में चली गयी और वहाँ खड़ी मालगाड़ी से जा टकरायी। इससे मेन ट्रैक पर गिरीं कोरोमंडल एक्सप्रेस की बोगियाँ दूसरी तरफ़ से आ रही बेंगलूरु-हावड़ा सुपरफास्ट एक्सप्रेस की बोगियों से टकरायीं। ज़ाहिर है कहीं-न-कहीं सिग्नल से जुड़ी चूक हुई। रेलवे में सुरक्षा के उपाय जिस तेज़ी से किये जाने चाहिए, वह नहीं हो रहे।
कैग की रिपोर्ट से ज़ाहिर होता है कि ट्रैक के रिन्यूअल से जुड़े कामों के लिए फंड वितरण में लगातार गिरावट आयी है। इसी 17 अप्रैल को रेल मंत्रालय की तरफ़ से जारी रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रेल ने वित्त वर्ष 2022-23 में 2.40 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड राजस्व हासिल किया, जो पिछले वित्त वर्ष से क़रीब 49,000 करोड़ रुपये ज़्यादा है। रेलवे का 2022-23 में ऑपरेटिंग रेशियो 98.14 फ़ीसदी रहा। अर्थात् रेलवे की कमायी का 100 रुपये में से 98.14 रुपये ख़र्च हो गया।
दिलचस्प यह है कि इसमें से क़रीब 70,000 करोड़ पेंशन फंड में ख़र्च हो गया। वेतन और दूसरे मदों पर हुआ ख़र्च अलग है। ज़ाहिर है बाक़ी में से रखरखाव के लिए कुछ नहीं बचता है। संसद की स्थायी समिति रेलवे के ज़्यादा ऑपरेटिंग रेशियो पर सवाल उठा चुकी है। इसके मुताबिक, साल 2018-19 से रेलवे का ऑपरेटिंग रेशियो 97 फ़ीसदी से ऊपर बना हुआ है।
कहाँ गया रक्षा कवच?
ट्रेन-टक्कर रोधी प्रणाली, जिसे मूल रूप से ‘रक्षा कवच’ का नाम दिया गया है, एक बड़ी उम्मीद के साथ रेलवे सुरक्षा का हिस्सा बनता दिखा था। लेकिन 2012 में हुई सफल टेस्टिंग के बावजूद यूपीए सरकार ने इस पर आगे कुछ नहीं किया। इसके 10 साल बाद मार्च, 2022 एनडीए की सरकार के समय भी सफल ट्रायल रन हुआ; लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। मार्च, 2022 में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन ने दो अलग-अलग ट्रेनों पर सवार होकर इस तकनीक का सफल परीक्षण किया था। दोनों बार ट्रायल में देखा गया कि दो ट्रेन आमने-सामने से टकराती हैं या नहीं। कवच के कारण आमने-सामने की ट्रेन काफ़ी मीटर दूर पूरी तरह से रुक गयीं। बेशक प्रधानमंत्री मोदी पिछले एक साल में दर्ज़न भर वन्दे भारत ट्रेन को हरी झंडी दिखा चुके हैं, रेलवे की सुरक्षा जहाँ की तहाँ खड़ी है।
‘तहलका’ की जुटायी जानकारी से ज़ाहिर होता है कि मार्च 2022 के ट्रायल के एक साल बाद महज़ 65 लोको इंजनों में कवच टेक्नोलॉजी लगायी जा सकी है। इस एक साल में रेलवे के 19 जोन में सिर्फ़ सिकंदराबाद में ही कवच लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई है। बता दें देश में कुल 13,215 इलेक्ट्रिक इंजन हैं।
इस साल फरवरी में जब मंत्री निर्मला सीतारमण ने रेल बजट पेश किया था, तो उसमें रेलवे सुरक्षा निधि में 45,000 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने का ऐलान किया था। पिछले साल के सफल परीक्षण के बाद रेल मंत्री ने घोषणा की थी कि 2022 से 2000 किलोमीटर की लंबाई वाले 23 रेलवे नेटवर्क कवच तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। उसके बाद हर साल 4,000-5,000 किलोमीटर का नेटवर्क जोड़ा जाएगा। लेकिन सरकार उस गति से काम नहीं कर पायी। ख़ुद रेल मंत्री ने इसे स्वीकार किया था ।
ट्रेन कोलिजन अवॉइडेंस सिस्टम (टीसीएस), जिसे अब मोदी सरकार ने ‘कवच’ का नाम दिया; का पहला परीक्षण मनमोहन सिंह सरकार के दौरान अक्टूबर, 2012 में हो गया था। यह टेस्टिंग हैदराबाद में हुई और जब सफल रही, तो मनमोहन सिंह सरकार ने इसे ‘क्रांतिकारी तकनीक’ कहा था। तब इस तकनीक से लैस दो ट्रेनों को एक ट्रैक पर एक ही दिशा में चलाया गया और जब वे एक दूसरे से क़रीब 210 मीटर दूर थीं, तो रुक गयीं। इसके बाद इस तकनीक को सफल घोषित किया गया।
कांग्रेस आज मोदी सरकार (एनडीए) से सवाल पूछ रही है कि 2022 में जब रक्षा कवच का सफल ट्रायल कर लिया गया था, तो इसे पूरी तरह लागू क्यों नहीं किया गया। लेकिन सवाल कांग्रेस (यूपीए) पर भी बनता है कि जब 2012 में उसने सफल ट्रायल कर लिया था, तब उसने इस पर आगे और काम क्यों नहीं किया? इस तरह यह दोनों ही सरकारों की नाकामी है।
‘कवच’ तकनीक उस स्थिति में जब एक ट्रेन को स्वचालित रूप से रोकेगा, जब निर्धारित दूरी के भीतर उसी पटरी पर उसे दूसरी ट्रेन के आने का सिग्नल मिलता है। साथ ही भारतीय रेलवे का डिजिटल सिस्टम रेड सिग्नल के दौरान ‘जंपिंग’ या किसी अन्य ख़राबी का सिग्नल मिलने पर भी कवच के ज़रिये ट्रेन ख़ुद रुक जाती है। कवच प्रणाली लगाने की शुरुआत दिल्ली-हावड़ा और दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग पर लगाने का प्रस्ताव था।
ओडिशा हादसे में बारे में इस तकनीक के जानकार कह रहे हैं कि कवच तकनीक होता, तो कोरोमंडल एक्सप्रेस जैसे ही सिग्नल जंप करती, तो स्वचालित रूप से ब्रेक लग जाता। ऐसा होने यह होता कि कोरोमंडल मालगाड़ी से 380 मीटर पीछे ही रुक जाती और उससे नहीं टकराती। ऐसे ही विपरीत दिशा से आ रही बेंगलूरु-हावड़ा सुपरफास्ट कवच के कारण हादसा होने से पहले ही रुक जाती। ज़ाहिर है यह हादसा रोका जा सकता था।
ऐसे में यह साफ़ है कि रक्षा कवच पर यदि तेज़ी से काम किया गया होता, तो ओडिशा हादसा रोका जा सकता था। जानकारों के मुताबिक, कवच प्रणाली का ढिंढोरा तो बहुत पीटा गया; लेकिन ज़मीन पर काम नहीं हुआ। हुआ होता, तो इतनी बड़े पैमाने पर इंसानी जानों को बचाया जा सकता था। बेशक रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव रेल हादसे के बाद रात-दिन हादसा स्थल पर राहत के काम का ख़ुद निरीक्षण करते रहे। सच यह भी है कि यह उनके मंत्रालय का ज़िम्मा था कि वह कवच प्रणाली पर बेहतर तरी$के से काम करता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद बार-बार रेल के आधुनिकीकरण की बात करते रहे हैं। सुरक्षा इसमें सबसे बड़ा कम्पोनेंट है; लेकिन इस पर ज़मीन पर बहुत कमज़ोर काम हुआ है।
देश के बड़े रेल हादसे
6 जून, 1981 को मानसी-सहरसा ट्रेन बागमती नदी में जा गिरी। हादसे में 300 लोगों की मौत हुई।
20 अगस्त, 1995 को फ़िरोज़ाबाद में पुरुषोत्तम एक्सप्रेस की कालिंदी एक्सप्रेस से टक्कर में कम-से-कम 350 लोगों की मौत हो गयी।
26 नवंबर, 1998 को पंजाब के खन्ना-लुधियाना सेक्शन पर खन्ना में जम्मू तवी-सियालदह एक्सप्रेस और अमृतसर-बाउंड फ्रंटियर मेल में टक्कर के बाद डिब्बे पटरी से उतरने के कारण कुल 212 लोगों की मौत हुई।
2 अगस्त, 1999 को अवध-असम एक्सप्रेस और ब्रह्मपुत्र मेल में टक्कर से कोलकाता के पास गाइसल स्टेशन पर 300 से ज़्यादा लोग मारे गये।
10 सितंबर, 2002 को राजधानी एक्सप्रेस बिहार में रफीगंज के पास धावा नदी पुल पर पटरी से उतर गयी, जिससे 130 लोगों की मौत हुई।
29 अक्टूबर, 2005 को वेलिगोंडा ट्रेन हादसे में 114 लोगों की मौत हुई।
10 जुलाई, 2011 को यूपी के फ़तेहपुर के पास कालका मेल के 15 डिब्बे पटरी से उतरने से 70 लोगों की मौत हो गयी।
7 जुलाई, 2011 को उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले में छपरा-मथुरा एक्सप्रेस की बस से टक्कर हो गयी, जिससे 69 लोगों की मौत हुई।
20 मार्च, 2015 को यूपी के रायबरेली में देहरादून-वाराणसी की जनता एक्सप्रेस पटरी से उतर गयी, जिससे 58 लोगों की मौत हुई।
20 नवंबर, 2016 को इंदौर-पटना एक्सप्रेस कानपुर के पास पुखरायाँ में पटरी से उतर गयी, जिससे 146 लोग मारे गये।
20 नवंबर, 2016 को इंदौर-पटना एक्सप्रेस 19321 पटरी से उतर गयी, जिससे 150 यात्रियों की मौत हुई।
2 जून, 2023 ओडिशा के बालासोर में कोरोमंडल एक्सप्रेस और बेंगलूरु-हावड़ा एक्सप्रेस के बेपटरी होने और एक मालगाड़ी के टकराने से 288 लोगों की मौत हुई।
ट्रेनों की लेटलतीफ़ी
भारत में ट्रेनों की लेटलतीफ़ी कोई नयी बात नहीं है। इन दिनों वंदे भारत एक्सप्रेस को लेकर दावा किया जाता है कि यह 160 से 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ सकती है। हालाँकि हाल में सूचना के अधिकार में पूछे गये सवाल के जवाब में रेलवे ने वंदे भारत के साथ ही देश की विभिन्न ट्रेनों के बारे में चौंकाने वाली बातें बतायी हैं। रेल मंत्रालय के जवाब के मुताबिक, भारत की सबसे तेज़ गति से चलने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन 2021-22 में क़रीब 84 किमी प्रति घंटे और 2022-23 में 81 किमी प्रति घंटे की औसत रफ़्तार से दौड़ी है। इस अवधि यानी 2021-22 में राजधानी एक्सप्रेस की औसत रफ़्तार 71 किमी प्रति घंटा, शताब्दी की क़रीब 72 किमी प्रति घंटा, दुरंतो की 69 किमी प्रति घंटा, तेजस की 75 किमी प्रति घंटा से ज़्यादा रफ़्तार रही है, जबकि मेल एक्सप्रेस ट्रेनों की रफ़्तार 53 किमी प्रति घंटे की रही। वहीं 2022-23 में राजधानी की औसत रफ़्तार 71 किमी प्रति घंटा, शताब्दी की 69 किमी प्रति घंटा, दुरंतो की 67 किमी प्रति घंटा और तेजस की 73 किमी प्रति घंटा रही, जबकि मेल एक्सप्रेस ट्रेनों की 51 किमी प्रति घंटा रफ़्तार रही है। नीमच में आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौर ने यह जानकारी आरटीआई से माँगी थी। रेल मंत्रालय ने यह भी बताया कि साल 2022-23 में कुल 2,74,587 ट्रेनें लेट हुईं, जिसमें क़रीब 4,46,206 घंटे का समय बर्बाद हुआ अर्थात् हर 18,591 दिन (50 साल 93 दिन) का समय बर्बाद हो गया।
हादसे के बाद का मंज़र
यह एक हादसा था, जिसकी तस्वीरों ने सभी को विचलित कर दिया। तीनों ट्रेन का डिब्बे बुरी तरह छितरे पड़े थे और शव जहाँ तहाँ बिखरे पड़े थे। किसी का सिर साथ नहीं था, तो किसी बाज़ू ग़ायब थे। हादसे के बाद घटनास्थल के बहुत से वीडियो सामने आये। इनमें एक वीडियो बहुत हृदयविदारक था, जिसमें दिख रहा था कि शवों को जानवरों की तरह वाहन के भीतर डाला जा रहा है। एक अन्य घटना उस व्यक्ति की है, जो अपने बेटे को शवगृह से ज़िन्दा ढूँढ लाया। उसे मृत समझकर वहाँ रख दिया गया था।
हेला राम मल्लिक नाम के इस व्यक्ति के मुताबिक, जब उन्हें बालासोर ट्रेन हादसे की ख़बर मिली, तो वह अपने घर से 230 किलोमीटर की दूरी तय करके घटनास्थल पर पहुँचे और अपने बेटे को ढूँढना शुरू किया। बेटे को ढूँढते हुए वह एक अस्थायी मुर्दाघर में भी गये और वहीं उन्होंने देखा कि उनका बेटा लाशों के ढेर में जीवित पड़ा है। बेटे को वह अस्पताल लेकर गये, क्योंकि और उसके हाथ-पैर में काफ़ी चोटें थीं। लोगों को अपने परिजनों के शव ढूँढने में भी काफ़ी दिक्क़त झेलनी पड़ी। कई शव इतने दिन बाद भी पहचाने ही नहीं गये। इसका एक कारण यह भी था कि हादसे में शव बहुत क्षत्-विक्षत हो गये थे। हादसे के बाद हर ओर चीख-पुकार मची रही। अस्पतालों के मुर्दाघर में लाशों का अंबार लगा रहा। एक घटना यह हुई कि अपने बड़े भाई का शव ले जाने के लिए एक व्यक्ति सनातन साहू कई घंटे अस्पताल के बाहर खड़ा रहा; लेकिन भाई का शव नहीं ले जा सका। कारण था अस्पताल में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का दौरा। सनातन साहू ने शव वाहन की माँग की तो उन्हें इंतज़ार करने को कहा गया। वैसे प्रधानमंत्री मोदी भी घटनास्थल पर आये। बहुत-से विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी घटनाओं में वीवीआईपी के दौरे ऐसे होने चाहिए कि राहत कार्य प्रभावित न हों।
किसानों के आत्महत्याएँ करने के मामलों में वृद्धि की ख़बर निश्चित ही परेशान करने वाली है। ख़ासकर तब, जब विभिन्न सरकारें किसान कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करती रहती हैं; जिनमें आकर्षित करने वाली क़र्ज़माफ़ी योजनाएँ भी शामिल हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट नामक संस्था ने हाल में एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें बताया गया है कि 2021 में कृषि क्षेत्र के 10,881 लोगों ने आत्महत्या कर ली, जो हाल के पाँच वर्षों में सबसे ज़्यादा है। शोध करने वाले थिंक-टैंक ने पाया कि केंद्र सरकार के कृषि आय दोगुना करने के वादे के बावजूद आत्महत्या करने वाले किसानों की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है। हक़ीक़त में मंत्रालय के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन के आँकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि 2013 और 2019 के बीच किसानों की आय में 30 फ़ीसदी की वृद्धि तो हुई; लेकिन उनका क़र्ज़ा भी क़रीब 58 फ़ीसदी बढ़ गया।
हाल में संसद में पेश की गयी कृषि पर आधारित एक संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में ख़ुलासा किया था कि सरकार कृषि आय को दोगुना करने के अपने 2022 के लक्ष्य को हासिल करने से बहुत दूर है। समिति ने कहा कि औसत मासिक कृषि घरेलू आय महज़ 10,218 रुपये थी। रिपोर्ट के मुताबिक, आत्महत्या के सबसे ज़्यादा 4,064 मामले महाराष्ट्र में दर्ज हुए। इसके बाद कर्नाटक में 2,169 और मध्य प्रदेश में 671 मामले आता है। रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में साल भर में 270 किसानों की मौत हुई। किसान नेताओं का आरोप है कि सरकारें अक्सर पंजाब, जिसने हरित क्रांति की शुरुआत की; में कृषक समुदाय की ख़राब स्थिति को कम करके दिखाती हैं। सच यह है कि नौ राज्यों में सन् 2020 की तुलना में सन् 2021 में किसान आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। अकेले असम में क़रीब 13 गुना वृद्धि देखी गयी है। ज़ाहिर है कि खाद्यान्न पैदा करने के लिए ख़ून-पसीना देने वाले किसानों की आय दोगुनी करने का केंद्र का बड़ा लक्ष्य अभी भी सपना ही है।
किसानों के आत्महत्या करने का सबसे बड़ा कारण क़र्ज़ है। यह बात पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में सामने आयी है। इस अध्ययन के मुताबिक, कम-से-कम 83 फ़ीसदी आत्महत्याएँ क़र्ज़ के कारण हुईं। आत्महत्या करने वाले ऐसे किसानों के पास पाँच एकड़ से कम भूमि थी। यह कुल आत्महत्या मामलों का 45.61 फ़ीसदी है, जबकि छोटे किसानों (2.47 एकड़ और 5 एकड़ के बीच की भूमि वाले किसानों) के मामले 30.53 फ़ीसदी हैं।
अध्ययन में पाया गया है कि जान देने वाले अधिकतर किसान अपनी युवावस्था में थे। अध्ययन के मुताबिक, 72 फ़ीसदी पीडि़त 15-35 वर्ष की आयु वर्ग के थे। अध्ययन बताता है कि किसानों द्वारा आत्महत्या के प्रमुख कारण किसान विरोधी $कानून, ख़राब सरकारी नीतियाँ, ऋणग्रस्तता, बढ़ती इनपुट लागत, घटती आय, महँगी स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा, उच्च ब्याज दर, सब्सिडी के वितरण में भ्रष्टाचार, फ़सल ख़राब होना, ख़राब मानसिक संतुलन और फ़सलों की बिक्री का संकट आदि थे। इसके अलावा कई बार तो एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य इतना कम था कि उससे लागत भी पूरी नहीं हो पाती। कुछ मामलों में तो यह सुनिश्चित भी नहीं होता। इस निराशाजनक परिदृश्य को देखते हुए सरकार को कृषि क्षेत्र, जिस पर 70 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं; की मदद के लिए तत्काल क़दम उठाने चाहिए।
किसानों और हरियाणा सरकार के बीच तनातनी ख़त्म हो गयी है। सूरजमुखी के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी के लिए हरियाणा के कुरुक्षेत्र में धरने पर बैठे किसान पुलिस के लाठीचार्ज के बाद सडक़ों पर उतर आये थे। बता दें कि किसान आन्दोलन ख़त्म करने के लिए केंद्र सरकार ने किसानों से एमएसपी की गारंटी क़ानून बनाने का वादा किया था; लेकिन ऐसा किया नहीं। किसानों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज की देश भर में निंदा हुई और हरियाणा के किसानों के समर्थन में पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान भी हरियाणा पहुँचने लगे थे।
बात सूरजमुखी के उचित दामों को लेकर शुरू हुई थी; लेकिन सरकार की हेकड़ी से मामला बढ़ गया। एक बार को तो लगा कि आन्दोलन बड़ा हो जाएगा। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सरकार को बड़े आन्दोलन की चेतावनी दी थी। किसानों लाठीचार्ज से नाराज़ किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा था कि अगर लाठीचार्ज होगा, तो जाम भी होगा।
केंद्र सरकार की ओर से तय एमएसपी के हिसाब से वित्त वर्ष 2022-23 में सूरजमुखी (बीज) का भाव 6,400 रुपये प्रति कुंतल था, जबकि वित्त वर्ष 2023-24 में यानी अब इसका भाव 6,760 रुपये प्रति कुंतल है। लेकिन पिछली एमएसपी पर भी ख़रीद न होने से सूरजमुखी 4,000 से 4,500 रुपये प्रति कुंटल बेचने को किसान मजबूर थे। इसी लूट के ख़िलाफ़ अपना हक़ माँगने के लिए किसानों ने सरकार से बात करनी चाही थी, जो पहले असफल रही थी। लेकिन अब सरकार एमएसपी पर सूरजमुखी लेने को तैयार हैं।
सरकार के प्रतिनिधि के तौर डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि सूरजमुखी की फ़सल न्यूनतम समर्थन मूल्य की दर पर (6400 रुपये प्रति कुंतल) ही ली जाएगी। किसानों की यह जीत सिद्ध करती है कि हरियाणा सरकार को उनकी अहमियत का एहसास हो चुका है। बता दें कि पिछले दिनों एमएसपी पर सूरजमुखी ख़रीद की माँग को लेकर किसानों की पिपली अनाजमंडी में एमएसपी दिलाओ किसान बचाओ महारैली निकाली थी। हरियाणा सरकार तो जैसे किसानों से पहले ही दुश्मनी माने हुए है, उसने पिछले किसान आन्दोलन की तरह ही किसानों पर इस बार भी लाठीचार्ज कराया। इससे पहले सरकार ने किसान नेताओं से बातचीत के लिए समय माँगा; लेकिन वह सिरे नहीं चढ़ पायी। इसके बाद किसान कुरुक्षेत्र में धरने पर बैठ गये थे। हाईवे पर उतरे, जहाँ उन पर 6 जून को लाठीचार्ज हुआ। इसके साथ ही पुलिस ने भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के प्रमुख नेता गुरनाम चढ़ूनी समेत उनकी किसान यूनियन के नौ किसान नेताओं को गिर$फ्तार करके 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इन किसान नेताओं पर पुलिस ने दंगा भडक़ाने, ग़ैर-क़ानूनी रूप से भीड़ इकट्ठी करने, सरकार के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचने समेत कई संगीन धाराओं में केस दर्ज किये थे।
हालाँकि किसानों के आगे हरियाणा सरकार को झुकना पड़ा और उसे सूरजमुखी की एमएसपी पर ख़रीदी के अलावा किसान नेताओं की रिहाई की माँग भी माननी ही पड़ी। ऐसा लगता है कि हरियाणा के विधानसभा चुनावों में कम समय बचे होने के चलते सरकार ने किसानों के आगे झुकना पड़ा, वरना उसने पहले-पहल लाठीचार्ज कराकर किसानों को डराने की कोशिश की।
किसानों पर लाठीचार्ज के बाद हरियाणा के किसान रणदीप सिंह ने कहा था कि सरकार सिर्फ़ किसानों पर लाठीचार्ज कराने में आगे है, किसानों की समस्याओं से उसे कोई लेना-देना नहीं है। पिछली बार की तरह ही सरकार ने शान्तिपूर्वक अपनी माँग कर रहे किसानों पर अत्याचार किया। बुजुर्ग और निहत्थे किसानों पर लाठीचार्ज कराया। दर्ज़नों किसान इस लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल हुए। भाजपा की सरकारें किसानों से दुश्मनों जैसा व्यवहार करने में अग्रणी हैं। हरियाणा पुलिस ने सीधे-सादे किसानों की कभी इज़्ज़त नहीं करी। अब सरकार ने हार मानी ही, तो पहले ही मान लेना चाहिए था। लेकिन अपने हक़ की लड़ाई लडऩे के लिए आगे बढऩे वाले किसानों पर हर बार पुलिस जिस तरह बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करती है, हम इसका विरोध करते हैं।
किसानों के समर्थन में धरना स्थल पर पहुँचे पहलवान बजरंग पूनिया भी पहुँचे थे। उन्होंने कहा था कि पहले किसान यूपी में घटना के जिम्मेदार अजय मिश्रा टेनी के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे। हम बृजभूषण के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। किसी पर एक्शन नहीं हुआ। किसानों को सडक़ पर खड़े देखकर दु:ख होता है। हम खिलाड़ी भी किसान परिवारों से हैं। हम जितने भी खिलाड़ी हैं, हम किसानों के साथ हैं। भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) की महिला प्रदेश अध्यक्ष सुमन हुड्डा ने भी किसानों का समर्थन करते हुए कहा था कि भाजपा सरकार तानाशाही पर उतरी हुई है। किसान मजबूर होकर पिपली की धरती से एमएसपी दिलाओ-किसान बचाओ आन्दोलन कर रहे हैं। यही कुरुक्षेत्र की धरती है, जहाँ से महाभारत की शुरुआत हुई थी।
किसानों पर लाठीचार्ज के बाद हरियाणा के किसानों ने सरकार के ख़िलाफ़ हल्ला बोल आन्दोलन की शुरुआत कर दी थी। माना जा रहा था कि अगर हरियाणा सरकार किसानों की यह माँग नहीं मानती, तो फिर यह आन्दोलन देशव्यापी हो सकता था। अब सरकार के पिछले साल की एमएसपी पर हामी भरने पर किसान अपने-अपने घरों को लौट गये हैं।
सरकारों को सोचना चाहिए कि किसानों को खेती-बाड़ी में बहुत बड़ा $फायदा नहीं होता। दिन-रात मेहनत करने के बाद उन्हें एमएसपी के हिसाब से भी अगर फ़सलों का भाव नहीं मिलेगा, तो फिर वे कहाँ जाएँगे। एमएसपी और किसान नेताओं की रिहाई के अलावा किसानों ने रबी के मौसम में हुई बरसात के कारण ख़राब हुई फ़सलों का मुआवज़ा 50,000 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब देने की माँग की थी; लेकिन उस पर कोई बात खुलकर नहीं हुई।
हालाँकि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने किसानों को फ़सल नुक़सान का मुआवज़ा देने की बात पहले ही कह दी थी; लेकिन वह किसानों की माँग से काफी कम है। हरियाणा सरकार ने पहले ही दावा किया था कि उसने सूरजमुखी ख़रीद के लिए भी धनराशि जारी की है। लेकिन किसानों को कहना है कि उन्हें सरकार द्वारा तय एमएसपी के हिसाब से भी सूरजमुखी के दाम नहीं मिल रहे थे।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान चंद्रसेन का कहना है कि सरकार को समझना होगा कि अगर वो किसानों की माँगें अनसुनी करके उन पर हर बार पुलिस से अत्याचार कराती रहेगी, तो किसान कैसे चुप रहेंगे। क्योंकि अब अगर किसानों को मजबूर किया, तो जो आन्दोलन होगा, तो फिर थमेगा नहीं।
उनका कहना है कि एमएसपी किसानों का न्यूनतम हक़ है, जो उन्हें हर हाल में मिलना ही चाहिए। क्योंकि एमएसपी सरकार ही तय करती है। इसलिए सरकार को बिना किसी शर्त के एमएसपी का गारंटी क़ानून संसद में पारित करना चाहिए। क्योंकि पहले से ही कई तबक़े सरकार से ख़फा हैं। पहलवान भी एक भाजपा नेता के ख़िलाफ़ मोर्चे पर हैं।
कर्नाटक में हार के बाद सबसे बड़ी पार्टी में गठबंधनों और रणनीति पर चल रहा मंथन
क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के करिश्मे को लेकर कुछ आशंकाएँ उभरी हैं? आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गेनाइजर’ के 23 मई के अंक के संपादकीय में कहा गया है- ‘मज़बूत नेतृत्व और क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावी डिलीवरी के बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा और हिन्दुत्व की वैचारिकता पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए कर्नाटक चुनाव के नतीजे को 2024 के आम चुनाव के लिए सही से देखने की ज़रूरत है; क्योंकि इस जीत से विपक्षी दलों का मनोबल बढ़ा है।’
भाजपा के बीच चिन्ता कर्नाटक में कांग्रेस की जीत से तो है ही, वह इस बात से भी परेशान है कि उसके सबसे बड़े चेहरे (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) को इतनी आक्रामकता से आगे करने के बावजूद उसे कर्नाटक चुनाव में ख़राब हार मिली।
इस हार के दबाव से बाहर निकलने के लिए भाजपा अब 2024 के लोकसभा और इस साल के विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुट गयी है। बैठकों के दौर शुरू हो गये हैं और गठबंधनों, $खासकर दक्षिण राज्यों की रूपरेखा पार्टी बना रही है। राष्ट्रीय और राज्यों के स्तर पर संगठन में फेरबदल की भी तैयारी है। भाजपा हाल में वर्षों में ‘मोदी है, तो मुमकिन है’ के नारे के भरोसे चुनावों में विपक्षियों को धूल चटाती रही है। लेकिन अब हाल के महीनों में भाजपा का भरोसा डगमगाया है। पहले हिमाचल प्रदेश और उसके बाद कर्नाटक में हार इसका कारण है।
निस्संदेह भाजपा अभी प्रधानमंत्री मोदी पर निर्भर रहने के लिए मजबूर है। इसका कारण हिन्दी पट्टी में अभी भी मोदी की स्वीकार्यता होना है। लेकिन भाजपा में चिन्ता इस बात की भी है कि जिस चेहरे और हिन्दुत्व के जिस मुद्दे को वह जीत की गारंटी मानती रही है, वह देश के कई हिस्सों में प्रभाव नहीं दिखा रहा। आरएसएस ने शायद ऑर्गेनाइजर के संपादकीय में इसी बात को उठाया है। आरएसएस का कहना है कि सकारात्मक कारक, विचारधारा और नेतृत्व भाजपा के लिए वास्तविक संपत्ति हैं। लेकिन उसे आगे सोचने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से भाजपा को हाल के वर्षों में मिली जीत के कारकों से बाहर जाकर कुछ सोचने की ज़रूरत आरएसएस बता रहा है।
अब चूँकि यह सुझाव आरएसएस की तरफ़ से आया है, भाजपा नेतृत्व और संगठन इसे हल्के में नहीं ले सकते। आरएसएस के मुखपत्र के सम्पादकीय में जो दूसरी अहम बात कही गयी है, वह यह है कि कर्नाटक की जीत से विपक्षी दलों का मनोबल बढ़ा है। आरएसएस की यह बात इस तथ्य से प्रमाणित हो जाती है कि इसी महीने की 23 तारीख़ को कांग्रेस सहित तमाम बड़े विपक्षी दल पटना में बड़ी बैठक करने जा रहे हैं, जिसमें विपक्षी एकता को लेकर एक रोडमैप तय किया जा सकता है। विपक्ष में यह स्फूर्ति कर्नाटक में कांग्रेस की जीत से आयी है।
निश्चित ही 2014 के बाद भाजपा के ख़िलाफ़ एकजुट होने की विपक्ष की यह सबसे ज़मीनी और महत्त्वपूर्ण क़वायद होगी, जिसमें राहुल गाँधी, मल्लिकार्जुन खडग़े, शरद पवार, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, लालू यादव और तेज़स्वी यादव, उद्धव ठाकरे, एम.के. स्टालिन, हेमंत सोरेन, अखिलेश यादव, अरविन्द केजरीवाल, सीताराम येचुरी, डी. राजा, दीपांकर भट्टाचार्य जैसे दिग्गज जुटेंगे। भाजपा जानती है कि विपक्ष की यह बैठकें राजनीतिक रूप से महत्त्व रखती हैं, लिहाज़ा उसने ज़मीन पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।
पार्टी की तैयारी
कर्नाटक की हार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे में उतार को देखते हुए भाजपा को इस साल होने वाले विधानसभाओं के चुनावों में अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। भाजपा को इस बात से भी काफ़ी धक्का लगा है कि उसने कर्नाटक के चुनाव में अपने सबसे विश्वसनीय प्रचारकर्ता मोदी के इतने सघन प्रचार के बावजूद 31 (13.8 फ़ीसदी) सीटों पर जमानत खो दी। सन् 2014 में भाजपा में मोदी के उदय के बाद एक ऐसे राज्य, जहाँ उसकी अपनी ही सरकार थी; भाजपा को मिली यह सबसे बड़ी हार है। भाजपा अब राष्ट्रीय और राज्य संगठनों में फेरबदल की क़वायद भी कर सकती है।
भाजपा में अब बैठकों का दौर शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर अमित शाह और जे.पी. नड्डा सक्रिय दिख रहे हैं। मोदी सरकार की नौ साल की उपलब्धियाँ जनता के सामने लाने के लिए राज्यों में कार्यक्रम किये जा रहे हैं। हाल के महीनों में यह देखा गया है कि केंद्र सरकार की तरफ़ से दिये जाने वाले रोज़गार के पत्र भी अब मोदी ख़ुद बाँटने लगे हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है कि प्रधानमंत्री के स्तर का व्यक्ति ये चीज़ें की हैं।
भाजपा के एक बड़े नेता ने नाम न छपने की शर्त पर स्वीकार किया कि इससे जनता में सरकार की मिलीजुली कोशिशों का सन्देश नहीं जा पाता।
केंद्र में मंत्री रहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता पवन बंसल ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘प्रधानमंत्री की यह आदत है कि सरकार की हर चीज़ को अपने तक सीमित रखते हैं। वह श्रेय लेने में आगे रहते हैं। विफलताओं और नाकामियों को दूसरों के ऊपर डाल देते हैं।’
हालाँकि इसमें कोई दो-राय नहीं कि आज भी भाजपा के छोटे-से-छोटे कार्यकर्ताओं की उम्मीद मोदी ही हैं। यह कार्यकर्ता हाल की विफलताओं के बावजूद उम्मीद करते हैं कि 2024 में सिर्फ़ मोदी ही भाजपा की नैया पार लगा सकते हैं। दिल्ली के मोहन गार्डन में भाजपा के मंडल स्तर के पदाधिकारी राजेश वोहरा ने कहा- ‘मोदी के सामने टिक सकने वाला विपक्ष में कोई नेता नहीं है। उनका एक सन्देश ही भाजपा के कार्यकर्ता में जोश भर देता है। अगले साल के चुनाव में मोदी की ही लहर चलेगी।’
लेकिन भाजपा के बड़े नेता जानते हैं कि माहौल अब वैसा नहीं रहा कि भाजपा की कोई लहर चले। सन् 2019 में मोदी की लोकप्रियता जब चरम पर थी और उनके पास पुलवामा-बालाकोट से उपजे माहौल की ताक़त भी थी, तब भी भाजपा 302 सीटों तक ही पहुँच पायी थी। बहुत-से राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा का अधिकतम उत्कर्ष काल था और अगले चुनाव में उसे बहुमत की सीटें जीतने के लिए बहुत मशक्क़त करनी पड़ेगी।
भाजपा के सहयोगी
हाल के वर्षों में देखा गया है कि भाजपा के पैंतरों से नाराज़ होकर उसके कुछ सहयोगी उसे छोडक़र चले गये। उनका आरोप रहा है कि ख़ुद को मज़बूत करने के लिए भाजपा सहयोगियों के नेताओं को तोडऩे में भी परहेज़ नहीं करती। हालाँकि भाजपा ने कर्नाटक के बाद अपनी रणनीति में बदलाव किया है। भाजपा अब विस्तारवाद के एजेंडे से इतर उन राज्यों में वोट को संगठित करने की रणनीति पर काम करती दिख रही है, जहाँ उसका आधार मज़बूत नहीं है।
मई के आख़िर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में मुख्यमंत्री परिषद् की बैठक की थी, तो उन्होंने यह सन्देश देने की कोशिश की कि भाजपा सहयोगी दलों का पूरा सम्मान करती है। भाजपा ने पिछले आठ साल क्षेत्रीय स्तर पर ख़ुद को मज़बूत करने में खपाये हैं और सहयोगी दलों की ताक़त को अपनी ताक़त बनाने से कभी परहेज़ नहीं किया। भाजपा अब नये सहयोगियों को तलाश रही है या पुराने सहयोगियों को फिर साथ जोडऩे की रणनीति पर तेज़ी से काम कर रही है।
हाल में भाजपा ने आंध्र प्रदेश के नेता चन्द्रबाबू नायडु को एनडीए के साथ जोडऩे की क़वायद की है, जिसके सकारात्मक नतीजे आ सकते हैं। भाजपा दक्षिण को लेकर चिन्ता में है; लिहाज़ा उसका फोकस पूरी तरह दक्षिण राज्यों पर है। भाजपा को डर है कि यदि उसने दक्षिण में क्षेत्रीय दलों को नहीं साधा, तो वहाँ कांग्रेस वहाँ चुनाव तक अपनी स्थिति और मज़बूत कर सकती है। चूँकि कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद दक्षिण के क्षेत्रीय दलों को भी वहाँ कांग्रेस के उभार की चिन्ता है; उनमें से ऐसे दल भाजपा के साथ जा सकते हैं, जो भाजपा का विरोध नहीं करते हैं। तमिलनाडु में भाजपा की नज़र दिवंगत जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके पर है।
चूँकि सत्तारूढ़ डीएमके के साथ कांग्रेस का समझौता है, भाजपा को राज्य में अपने पैर जमाने के लिए इस पार्टी का साथ चाहिए होगा। हालाँकि एआईएडीएमके में भी गुटबाज़ी है और देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा किस गुट को चुनती है। उधर भाजपा ने एक साल पहले महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे को उद्धव ठाकरे से तोडक़र शिवसेना का बँटवारा कर दिया था। हालाँकि यह माना जाता है कि जनता की सहानुभूति उद्धव के साथ है। लिहाज़ा चुनाव में शिंदे भाजपा को कितना लाभ दे पाएँगे, इस पर अभी सवालिया निशान है। भाजपा के बीच तो यह भी चर्चा है कि शिंदे को निपटा दिया जाए।
उत्तरी राज्य हरियाणा में जननायक जनता पार्टी (जजपा) के साथ भाजपा की खटपट चल रही है और हलोपा भाजपा के साथ आने को उत्सुक दिख रही है। हलोपा के नेता गोपाल कांडा 9 जून को दिल्ली में भाजपा प्रभारी बिप्लब देव से मिल चुके हैं। उनसे एक दिन पहले चार निर्दलीय विधायक अलग से देव से मिले थे। इन गतिविधियों से ज़ाहिर होता है कि भाजपा राज्य में जजपा को झटका दे सकती है। यहाँ यह बताना दिलचस्प होगा कि संसद के नये भवन के उद्घाटन पर जिन उद्धव ठाकरे और जेडीयू ने बायकॉट किया था, वह दोनों 2019 के चुनाव में महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा के सहयोगी थे।
उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का साथ दिया था। लेकिन नतीजे आते ही जब यह चर्चा चली कि शिव सेना के कुछ विधायक भाजपा में जा सकते हैं, तो उद्धव बहुत ख़फ़ा हुए और उन्होंने बिना देरी किये दशकों से चल रहा भाजपा का साथ छोडक़र एनसीपी-कांग्रेस से गठबंधन कर लिया।
सन् 2019 के चुनाव में भाजपा के सहयोगियों ने जो 50 सीटें जीती थीं, उनमें से अकेले जद(यू) और तत्कालीन पूर्ण शिवसेना की 34 सीटें थीं। अब यह दोनों भाजपा के ख़िलाफ़ खड़े हैं, जो इस बात का संकेत है कि दोनों राज्यों में भाजपा को नुक़सान होगा। बिहार में रामविलास पासवान की मौत के बाद लोजपा भी बँट चुकी है। सन् 2019 में नीतीश-रामविलास के साथ भाजपा गठबंधन को बिहार में 40 में 39 सीटें मिल गयी थीं। लेकिन 2024 में यह प्रदर्शन दोहराना भाजपा के लिए टेढ़ी खीर होगा। देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा बिहार में नये सहयोगी ढूँढती है? महाराष्ट्र के ज़मीनी संकेत हैं कि राहुल गाँधी की यात्रा के बाद राज्य में लोगों की दिलचस्पी कांग्रेस के प्रति बढ़ी है। उद्धव कमज़ोर नहीं हुए हैं और एनसीपी अपनी ज़मीन बचाये हुए है। ऐसे में शिंदे की शिवसेना ही भाजपा का सहारा होगी।
आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर पार्टी के जगन मोहन रेड्डी ने (पिछले विधानसभा चुनाव में 49.95 फ़ीसदी वोट) मज़बूती से पैर जमा रखे हैं। वह कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए दिक्क़त हैं। यदि भाजपा राज्य में चंद्रबाबू नायडु (पिछले विधानसभा चुनाव 39.26 फ़ीसदी वोट) के साथ जाती है, तो जगन निश्चित ही उसके विरोध में रहेंगे। भाजपा के पवन कल्याण की जन सेना पार्टी से सहयोगी रिश्ते हैं; लेकिन वह उतनी प्रभावी नहीं कि भाजपा को बड़ा लाभ दे सके। राज्य में 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस-भाजपा दोनों का स्कोर शून्य रहा था।
ओडिशा में भाजपा सत्तारूढ़ बीजद के नवीन पटनायक को साथ रखना चाहती है; लेकिन वह भी कांग्रेस-भाजपा से बराबर दूरी बनाये हुए हैं। हाँ, भाजपा के साथ पटनायक ने वर्किंग रिलेशन ज़रूर रखे हैं। तेलंगाना में भाजपा इस बार बड़ी उम्मीद लगाये है; लेकिन राहुल गाँधी की यात्रा से बदले हालात और जगन मोहन रेड्डी की बहन शर्मिला की पार्टी के साथ कांग्रेस के गठबंधन की संभावनाओं को देखते हुए तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) ही भाजपा की सहयोगी बन पाएगी।
पंजाब में भाजपा पुराने सहयोगी अकाली दल की तरफ़ मुडऩे को मजबूर हो सकती है। वहाँ आम आदमी पार्टी अपनी सरकार होने के कारण मज़बूत दिख रही है, जबकि कांग्रेस का भी वहाँ आधार है। कांग्रेस के जो हिन्दू-सिख नेता हाल के महीनों में भाजपा के पाले में गये हैं, उनका कोई राजनीतिक लाभ उसे मिलता नहीं दिखा है। कर्नाटक में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 28 में से 26 सीटें जीती थीं।
अब वह देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल (धर्मनिरपेक्ष) यानी जद(एस) से उम्मीद किये है। राज्य में माहौल भाजपा के पक्ष में नहीं दिखता लिहाज़ा इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 42.9 फ़ीसदी वोट हासिल किये हैं, जिसका लोकसभा चुनाव में असर दिख सकता है।
मुस्लिम वोटरों को रिझाने की कोशिश
कुल मिलाकर भाजपा की सबसे बड़ी चिन्ता कांग्रेस है। उसे डर है कि कांग्रेस यदि पुराना वोट बैंक वापस अपने पाले में लाने में सफल होती है, तो सबसे ज़्यादा नुक़सान उसका ही होगा। लिहाज़ा उसने उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में पिछड़े, दलित, ओबीसी वोटरों को जोडऩे की क़वायद शुरू की है। सबसे ज़्यादा हैरानी यह है कि भाजपा मुस्लिम वर्ग को रिझाने की भी कोशिश करती दिख रही है। आरएसएस से लेकर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के कुछ नेता आजकल मुसलामानों से दोस्ती जैसी भाषा अपनाते दिख रहे हैं। कारण साफ़ है। हाल के कुछ चुनावों, जिनमें बंगाल का एक उपचुनाव और कर्नाटक का विधानसभा चुनाव शामिल है; यह देखने में आया है कि मुस्लिम कांग्रेस के पीछे जुटने लगे हैं। मुस्लिम यह भी कोशिश करते दिख रहे हैं कि उनके वोट का बँटवारा न हो। यही नहीं, ओबीसी और दलित भी कांग्रेस ख़ेमे की तरफ़ उम्मीद लगाते दिख रहे हैं।
प्रियंका गाँधी का इंदिरा अवतार
बहुत कम लोगों को पता होगा कि कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी पुलवामा और अन्य मुठभेड़ों में ड्यूटी के दौरान शहीद हुए सैनिकों के परिजनों के अलावा विभिन्न राज्यों में रेप पीडि़त लड़कियों-महिलाओं के परिजनों के साथ लगातार संवाद बनाकर रखती हैं। कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक, मथुरा में जब भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता कांग्रेस शासित राजस्थान में एक दुष्कर्म पीडि़ता को उनकी रैली में ले आये, तो प्रियंका ने इसका विरोध नहीं किया। उलटे वह पीडि़ता को यमुना किनारे ले गयीं और एक बड़ी बहन की तरह उससे बात की।
प्रियंका ने पीडि़ता का न सिर्फ़ कॉलेज में एडमिशन कराया, बल्कि वह लगातार उसके सम्पर्क में रहती हैं। यहाँ तक कि वह उन लोगों से भी सम्पर्क रखती हैं, जिन्हें राजनीतिक विरोधी उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल करते हैं। कांग्रेस में एक साल पहले तक प्रियंका गाँधी की भूमिका उत्तर प्रदेश की प्रभारी होने तक सीमित थी। लेकिन अचानक पार्टी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्टार प्रचारक के रूप में तेज़ी से आगे करती दिख रही है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि प्रियंका आक्रामक होने के साथ-साथ प्रभावशाली भी दिखती हैं और उनका करिश्मा भी जनता के बीच है। ‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस प्रियंका को इस साल के चुनावी राज्यों तेलंगाना, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रचार में बड़ी भूमिका सौंपने की तैयारी में है। हिमाचल और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गाँधी ने सघन प्रचार किया था, जहाँ कांग्रेस को जीत मिली। प्रियंका तेलंगाना में एक रैली कर चुकी हैं। मध्य प्रदेश में भी 12 जून को वह गयी हैं। महिलाओं को 1,500 रुपये की इनकम गारंटी का वादा और महिला संवाद उनके भाषणों में प्रमुखता से रहता है। इसमें महिलाओं को इनकम सपोर्ट, मु$फ्त गैस सिलेंडर और बस यात्रा शामिल हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस की पाँच गारंटियों में ये चीज़ें शामिल थीं। कांग्रेस के भीतर नेताओं को प्रियंका गाँधी की प्रचार शैली और जीत पर फोकस रखने की बात सकारात्मक लगती है। राहुल गाँधी के साथ प्रियंका की जोड़ी प्रचार में विपक्ष को रक्षात्मक कर देती है। राहुल का फोकस गारंटी पर रहता है, तो प्रियंका पार्टी के हक़ में माहौल बनाने पर काम करती हैं। एक तरह से प्रियंका का रोल प्रधानमंत्री मोदी के प्रभाव को कम करना है। कांग्रेस उन्हें नयी ‘इंदिरा गाँधी’ के अवतार में ढाल रही है और यह प्रभावकारी रणनीति हो सकती है। कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम कहते हैं- ‘प्रियंका गाँधी ने अभी तक $फैसला नहीं किया है कि उत्तर प्रदेश प्रभारी पद से हटती हैं, तो देश में कांग्रेस को मज़बूत करेंगी। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूँ कि प्रियंका गाँधी को 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनना चाहिए। यदि ऐसा होता है, तो हम मोदी को हरा पाएँगे।’
प्रियंका के इस चढ़ते ग्राफ के बीच कांग्रेस कुछ राज्यों में नये अध्यक्ष बनाने और नयी कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के गठन की तैयारी में भी है।
रूस और अमेरिका के बीच संतुलन साधने की कोशिशों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा काफी महत्त्वपूर्ण साबित होने वाली है। मोदी 21 से 24 जून तक अमेरिका की राजकीय यात्रा पर रहेंगे। माना जाता है कि अमेरिका मोदी की यात्रा को काफी महत्त्व देने की कोशिश में है, ताकि उसे रूस से दूर रखा जा सके। इसके अलावा दोनों पक्ष दीर्घकालीन द्विपक्षीय सम्बन्धों की रूपरेखा तय करने वाले दस्तावेज़ों पर भी काम कर रहे हैं।
बाइडेन और मोदी ने पिछले साल मई में उभरती हुई प्रौद्योगिकी (आईसीईटी) सम्बन्धी अमेरिका-भारत पहल की घोषणा की थी। मक़सद दोनों देशों की सरकारों, व्यवसायों और शिक्षण संस्थानों के बीच रणनीतिक प्रौद्योगिकी साझेदारी और रक्षा औद्योगिक सहयोग बढ़ाना और विस्तार देना था। संयुक्त बयान का जो मसौदा तैयार किया जा रहा है, कहा जाता है कि उसमें उन मुद्दों का ज़िक्र होगा, जो भारत-अमेरिका साझेदारी को आगे बढ़ाएँगे। इनमें प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और रक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। जानकारों के मुताबिक, इस सम्बन्ध में अंतिम फैसला दोनों नेता 22 जून को करेंगे। मोदी की इस यात्रा के परिणाम स्वरूप दोनों देशों के सम्बन्ध आगे बढऩे की उम्मीद है। हाल के महीनों में यह देखा गया है कि रूस के साथ भारत की बढ़ती दोस्ती के चलते अमेरिका में तनाव रहा है। अमेरिकी अधिकारी बीच-बीच में भारत को इसके लिए अपने अंदाज़ में चेताते भी रहे हैं। अमेरिकी कम्पनियाँ भारत को एक बड़े बाज़ार के रूप में देखती हैं। लिहाज़ा दोनों देशों को आपूर्ति शृंखला क्षेत्र सहित आपसी सम्बन्धों के दो विश्वसनीय भागीदारों के रूप में देखा जा रहा है।
खास बात अमेरिकी प्रौद्योगिकी के साथ बड़े पैमाने पर और रियायती कीमतों पर उत्पादन करने की क्षमता है। ऐसे में मोदी की इस यात्रा के फलस्वरूप दोनों देशों के बीच भरोसे का एक नया स्तर बनने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। मोदी को राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनकी पत्नी जिल बाइडन ने आधिकारिक राजकीय यात्रा के लिए आमंत्रित किया है। इसमें 22 जून को राजकीय रात्रिभोज भी शामिल होगा। दोनों देशों की राजधानियों में इस यात्रा की तैयारियाँ ज़ोरों से चल रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन अपने भारतीय समकक्ष अजित डोवल के साथ दूसरे दौर की आईसीईटी वार्ता के लिए दिल्ली आ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह में भाग लेने के बाद न्यूयॉर्क से वाशिंगटन रवाना होंगे। बड़ी संख्या में भारतीय अमेरिकी व्हाइट हाउस के सामने पार्क में और अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक गेस्ट हाउस ब्लेयर हाउस के पास एक मेगा सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी 23 जून को अमेरिकी कांग्रेस की संयुक्त बैठक को संबोधित करेंगे। मोदी दूसरी बार अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करेंगे और वह इजराइल के बाहर तीसरे विश्व नेता होंगे, जिन्होंने दो बार अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित किया हो। व्हाइट हाउस हिस्टोरिकल एसोसिएशन के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति का किसी भारतीय नेता के लिए आयोजित 11वाँ राजकीय रात्रिभोज होगा और पिछले 75 साल में केवल दो भारतीय नेताओं को आधिकारिक राजकीय यात्रा का सम्मान दिया गया है। उनसे पहले जून,1963 में राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन और नवंबर, 2009 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा को राजकीय यात्रा का दर्जा दिया गया था। दोनों देशों के नेता कह रहे हैं कि भारत-अमेरिका सम्बन्ध न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि शेष विश्व के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। जानकारों के मुताबिक, सभी क्षेत्रों में प्रधानमंत्री मोदी की राय शामिल होने की संभावना है। उनका •ाोर इस बात पर है कि इन्हें लोगों के विकास और कल्याण से जोड़ा जाना चाहिए।
राहुल की अमेरिका यात्रा
एक ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका जा रहे हैं, उनसे कुछ समय पहले ही कांग्रेस नेता राहुल गाँधी अमेरिका में हैं। उनके दौरे के दौरान उनकी अमेरिका के राष्ट्रपति के सरकारी आवास व्हाइट हाउस जाने की जानकारी ने काफी सुर्िखयाँ बटोरी हैं। इसमें एक गोपनीय बैठक (सीक्रेट मीटिंग) की बात भी सामने आयी थी।
कहा गया है कि राहुल गाँधी की यह गोपनीय बैठक व्हाइट हाउस के भीतर हुई। मीटिंग के व$क्त राहुल के साथ कौन-कौन मौजूद था? इस पर कोई सही जानकारी सामने नहीं आयी है। हालाँकि अमेरिकी अखबार ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ ने दावा किया था कि गाँधी की मुलाकात डोनाल्ड लू से हुई थी। खुद कांग्रेस और राहुल गाँधी ने इसकी कभी पुष्टि नहीं की। इसके अलावा राहुल गाँधी कई अन्य ग्रुप्स और छात्रों से भी मिले और विभिन्न विषयों पर चर्चा की। उन्होंने यात्रा में मीडिया को भी सम्बोधित किया था। राहुल की अमेरिका यात्रा को काफी चर्चा मिली थी।
भारतीय दण्ड संहिता की धारा-124(ए) के तहत राजद्रोह एक अपराध है। इसके अनुसार, किसी भी व्यक्ति द्वारा सांकेतिक, वाचन, लेखन अथवा किसी अन्य माध्यम से संवैधानिक सरकार के विरुद्ध विद्रोह या अवमानना ज़ाहिर करना या करने के प्रयास को अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके लिए तीन साल से लेकर अधिकतम सज़ा उम्रक़ैद एवं ज़ुर्माना हो सकता है।
पिछले दिनों विधि आयोग ने अपनी 279वीं रिपोर्ट में धारा-124(ए) के बने रहने की सिफ़ारिश की, और कहा कि इसके इस्तेमाल हेतु अधिक स्पष्टता के लिए कुछ संशोधन किये जा सकते हैं। आयोग ने केंद्र सरकार से इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए मॉडल गाइडलाइन्स जारी करने के साथ ही निर्धारित न्यूनतम सज़ा को तीन से बढ़ाकर सात वर्ष करने के सुझाव भी दिये। आयोग के अनुसार, प्रत्येक देश की क़ानूनी प्रणाली अलग-अलग तरह की वास्तविकताओं से जूझती है। धारा-124(ए) को केवल इस आधार पर निरस्त करना कि कुछ देशों ने ऐसा किया है, निश्चित रूप से भारत की ज़मीनी हक़ीक़त से आँखें मूँद लेना होगा। 22वें विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ऋषिराज अवस्थी का कहना है कि किसी प्रावधान के दुरुपयोग का आरोप उसे वापस लेने का आधार नहीं हो सकता। और न ही औपनिवेशिक विरासत होना भी इसे वापस लेने का वैध आधार है। इसके अतिरिक्त यूएपीए और एनएसए जैसे क़ानूनों के होते हुए 124(ए) की प्रासंगिकता पर विधि आयोग की दलील है कि राजद्रोह क़ानून का प्रयोग उस दशा में होता है, जब आतंरिक हिंसा द्वारा देश को अस्थिर करने या निर्वाचित सरकार को असंवैधानिक तरीक़े से हटाने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे मामलों में यूएपीए और एनएसए का प्रयोग नहीं होता।
प्रथम दृष्ट्या आयोग के तर्क उचित प्रतीत हो रहें हैं। किसी भी क़ानून की उपादेयता का निर्धारण उसके प्रवर्तित कालखण्ड के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी वर्तमान प्रासंगिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि किसी निर्धारित अपराध के लिए ऐतिहासिक दण्ड-विधान वर्तमान की कसौटी पर खरा उतर रहा हो, तो उसे बनाये रखने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। साथ ही दुरुपयोग जैसे तर्क, तो क़ानून ही क्यों? बल्कि सत्ता, शक्ति, पद, धन-सम्पदा सभी के लिए उपयुक्त हैं। जैसे रिवॉल्वर का अविष्कार सन् 1836 में सैमुअल कोल्ट द्वारा फ़सलों को जानवरों से होने वाले नुक़सान से बचाने के लिए किया गया; लेकिन फिर इससे इंसानों की हत्याओं का प्रयोजन सिद्ध होने लगा। यही क्यों, दहेज प्रतिषेध अधिनियम-1961 तथा दहेज प्रतिषेध (वर-वधु भेंट सूची) नियम-
1985 जैसे क़ानूनों का उदाहरण प्रत्यक्ष है, जिनके वधु पक्ष के शत्रुतापूर्ण प्रयोग ने कितने ही परिवारों को बर्बाद कर दिया। कितने ही निर्दोष युवक इसकी भेंट चढक़र जेलों में सड़ते रहे।
नारीवाद के नाम पर क़ानूनों के मार्फ़त पुरुषों की प्रताडऩा सामान्य-सी बात हो चुकी है। हाल ही में दिल्ली तीस हज़ारी कोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म का फ़र्ज़ी मुक़दमा दर्ज कराने के लिए एक महिला अधिवक्ता के विरुद्ध मुक़दमा दर्ज कराने का आदेश दिया। इसी प्रकार मनीष बनाम महाराष्ट्र राज्य तथा अन्य मामले बंबई उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी रुचिरा मेहरा पर बलात्कार का झूठा मुक़दमा दर्ज कराने के आरोप आईपीसी की धारा-195(1) के तहत शिकायत दर्ज करायी। सन् 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘कैनी राजन बनाम केरल राज्य’ मामले में इस पर चिन्ता जतायी थी। अगस्त, 2021 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऐसे फ़र्ज़ी मामलों के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की कि ‘दुष्कर्म के झूठे मामलों में ख़तरनाक वृद्धि हो रही है। केवल अभियुक्त पर दबाव डालने और उन्हें शिकायतकर्ता की माँगों के आगे झुकने के लिए ये मामले दर्ज किये जा रहे हैं।’
अत: दाण्डिक क़ानूनों के सटीक एवं निरपेक्ष प्रयोग की प्रत्याभूति (गारन्टी) देना सम्भव नहीं है। लेकिन ऐसे प्रमाणिक उदाहरणों के बावजूद भी इन क़ानूनों के निरसन की माँग तो नहीं की गयी। अजीब विडंबना है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस धारा-124(ए) क़ानून के विरोध में आरोप लगा रही है कि सरकार इस क़दम से अपनी औपनिवेशिक मानसिकता का परिचय दे रही है तथा इसका $गलत इस्तेमाल विरोधियों के ख़िलाफ़ किया जाएगा। लेकिन इससे पूर्व कांग्रेस को इतिहास के उस दौर के पुनरावलोकन की ज़रूरत है, जब महात्मा गाँधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी पं. जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत में इस विषबीज का आरोपण किया था।
ऐतिहासिक रूप से इस क़ानून को 17वीं शताब्दी में ब्रिटेन में अधिनियमित किया गया था, ताकि राजशाही के विरुद्ध नकारात्मक विचार रखने वालों के सार्वजनिक अभिव्यक्ति को सीमित किया जा सके। ब्रिटिश भारत में मूलत: इसका मसौदा 1837 में लार्ड मैकाले द्वारा तैयार किया गया था। किन्तु धारा-124(ए) को सन् 1870 में जेम्स स्टीफन द्वारा पेश किये गये एक संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
इस क़ानून के तहत ब्रिटिश काल में राजद्रोही भाषणों, लेखन और गतिविधियों के लिए लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी से लेकर भगत सिंह तक को दोषी ठहराया गया था। अत: ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति की ओर अग्रसर भारत इस पर सजग था। संविधान सभा में इस क़ानून की प्रासंगिकता पर लम्बी बहस हुई। जिन मौलिक अधिकारों के लिए उसने सन् 1985 से संघर्ष शुरू किया था। इसके लिए मोतीलाल नेहरू ने सन् 1925 में केंद्रीय असेंबली में विधेयक प्रस्तुत किया था। नेहरू रिपोर्ट (1928) प्रकाश में आयी और सन् 1929 में रावी के तट पर संकल्प लिया गया। उसके लिए हर रुकावट का शमन करने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व तत्पर था। प्रारूप समिति के सदस्य के.एम. मुंशी का कहना था- ‘लोकतांत्रिक भारत में जनता की आलोचना और असहमति का सम्मान होना चाहिए।’
इस तरह राजद्रोह क़ानून निरस्त कर दिया गया। परन्तु इसे पुन: जीवित किया गया।
वरिष्ठ पत्रकार, संविधानविद् एवं इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष पद्म श्री रामबहादुर राय की सुप्रसिद्ध किताब ‘भारतीय संविधान : अनकही कहानी’ इसका प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है कि कैसे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू की शह पर औपनिवेशिक क़ानूनों की पुनरावृत्ति हुई। असल में तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में पं. नेहरू के सर्वाधिकारवादी मानसिकता के विरुद्ध संविधान दीवार बन रहा था। नेहरू प्रेस एवं विरोधियों की आलोचना को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. विधानचंद्र राय को लिखे पत्र में उन्होंने स्वीकार किया कि यदि संविधान कांग्रेस की नीतियों के विपरीत जाता है, तो उसे बदलकर और अनुकूल बनाया जाना चाहिए। इसी के अनुरूप 12 मई, 1951 को नेहरू स्वयं संविधान संशोधन का प्रस्ताव लेकर आये। अपने अधिनायकवादी रवैये को उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा विदेशों से सम्बन्ध और जनहित जैसे परिष्कृत एवं गूढ़ शब्दों के आवरण में रखा। उस समय हृदयनाथ कुंजरू ने सेंसरशिप के क्रूर-काले इतिहास का उल्लेख करते हुए कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती देकर स्वतंत्र भारत में आईपीसी की धाराओं-124(क) तथा 153(क) को पुन: लागू करने का औचित्य पूछा। भारतीय प्रेस ने भी इसे अलोकतांत्रिक बताकर कड़ी निंदा की। तत्कालीन जनसंघ अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 16 मई, 1951 को अपने भाषण में कहा- ‘नेहरू सरकार ने संविधान के मौलिक सिद्धांतों को पलट दिया है, जिससे नागरिक स्वतंत्रता में सरकार का हस्तक्षेप बढ़ेगा।’
यह आशंका सही साबित हुई। जब अंग्रेजी साप्ताहिकों ‘क्रॉस रोड्स’ द्वारा सेलम (तमिलनाडु) जेल गोली कांड के विरुद्ध तथा ‘ऑर्गेनाइजर’ द्वारा सन् 1948 के भारत-पाक समझौता एवं सन् 1950 के नेहरू-लियाक़त समझौते की विफलता के ख़िलाफ़ जबरदस्त अभियान चलाने के कारण तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा इनके विरुद्ध सेंसरशिप लागू करने का प्रयास हुआ, जिसमें प्रतियाँ ज़ब्त करने और उनके वितरण पर रोक लगाने, हर अंक के प्रकाशन से पूर्व सरकार से अनुमति लेने का आदेश देने, प्रतियाँ ज़ब्त करने, वितरण पर रोक लगाने का प्रयास हुआ। इसके बाद इन्हें सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। इस तरह स्वतंत्रता भारत में संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के हनन की सत्ता समर्थित प्रक्रिया प्रारम्भ हुई, जो बदस्तूर जारी रही।
होना तो यह चाहिए था कि ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति के पश्चात् भारत को हर औपनिवेशिक विरासत से भी मुक्ति की दिशा में बढऩा था। किन्तु विडंबना यह है कि राष्ट्र इसे $गौरवान्वित रूप से ढोता रहा, चाहे वह ब्रिटिश नौकरशाही, उनकी संसदीय व्यवस्था हो या अंग्रेजी क़ानून हो। स्वतंत्र भारत में सत्ताधारी वर्ग की औपनिवेशवादी मानसिकता बनी रही। किन्तु फिर भी मौज़ू प्रश्न हैं कि ऐतिहासिकता के सन्दर्भ क्या वर्तमान की पूर्ण व्याख्या में सक्षम हैं? यदि इन ऐतिहासिक निर्णयों को न स्वीकारें, तब क्या सहभागी लोकतंत्र में ऐसे क़ानूनों की आवश्यकता है? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कठोर क़ानूनी कार्यवाही का भय उसे कुंठित करने का प्रयास नहीं माना जाना चाहिए?
भारत में राजनीतिक सत्ता का विरोधियों की प्रताडऩा में किये जाने का लम्बा इतिहास रहा है। सन् 1950 के दशक से राजनीतिक प्रतिशोध की परम्परा अब तक जारी है। जब दाण्डिक क़ानूनों का प्रयोग राजनीतिक-सामाजिक विरोध को दबाने के लिए भी किया गया। इसका सर्वप्रमुख उदाहरण आपातकाल है, जब बाक़ी विरोधियों के अलावा लोकनायक जे.पी. तक नहीं ब$ख्शे गये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या वृहद रूप में मौलिक अधिकार प्रत्यक्षत: 124(ए) जैसे क़ानूनों का कोप भाजन बनते रहे। अत: तस्वीर का दूसरा पहलू अधिक बदरंग है। लेकिन न्यायपालिका ने मौलिक अधिकारों के संरक्षण का अपना दायित्व ब$खूबी निभाया।
मई,1953 में बेगूसराय में एक रैली को सम्बोधित करते हुए कम्युनिस्ट नेता केदारनाथ सिंह ने अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए सुरक्षाकर्मियों एवं कांग्रेस नेतृत्व को ‘कुत्ता एवं गुण्डा’ कहा। बिहार सरकार द्वारा दर्ज मुक़दमे में उन्होंने न्यायालय की शरण की जिस पर केदारनाथ सिंह को राहत देते हुए मुख्य न्यायाधीश बी.पी. सिन्हा की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ (1962) ने निर्णय दिया कि ‘राजद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ़ तभी दण्डित किया जा सकता है, जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा या असन्तोष या फिर सामाजिक आक्रोश बढ़े।’ अर्थात् सरकार की आलोचना राजद्रोह नहीं है।
इसके अतिरिक्त ऐसे कई मामलों में विभिन्न न्यायालयों द्वारा इस क़ानून की संवैधानिकता पर प्रश्नचिह्न लगाये गये एवं इसके स्पष्टीकरण पर ज़ोर दिया। यथा तारासिंह गोपीचंद बनाम राज्य (1951) मामले में पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय, राम नंदन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959) मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय, बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995) मामले में सर्वोच्च न्यायालय, जून, 2021 में दो तेलुगु भाषी समाचार चैनलों टीवी 5 और एबीएन आंध्र ज्योति के विरुद्ध आंध्र प्रदेश सरकार की कार्रवाई से बचाते हुए उच्चतम न्यायालय ने देशद्रोह की सीमा को परिभाषित करने की बात की। इसी सन्दर्भ में जुलाई, 2021 को उच्चतम न्यायालय ने ब्रिटिशकालीन दमनकारी क़ानून को अब तक जारी रखने के औचित्य पर प्रश्न उठाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमणा ने इस क़ानून के $गलत इस्तेमाल की चिन्ता ज़ाहिर करते हुए इसे बनाये रखने को दुर्भाग्यपूर्ण माना। पुन: मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने स$ख्त टिप्पणी की कि धारा-124(ए) को तब तक प्रभावी रूप से स्थगित रखा जाना चाहिए, जब तक कि केंद्र सरकार इस प्रावधान पर पुनर्विचार नहीं करती। अत: सरकारें भले असमंजस में रही हों, परन्तु न्यायपालिका की दृष्टि सदैव इस विषय पर स्पष्ट एवं जनभावना के साथ थीं कि इस क़ानून के दोष इसके गुणों से अधिक स्थूल है।
अब प्रश्न है कि जहाँ एक तरफ़ देश के विभाजन की माँग करने वाले विखंडनवादी हैं। उनके सरपरस्त विदेशी आका हैं; तो दूसरी तरफ़ आतंरिक उपद्रव का प्रसार करने में संलग्न माओवादी और उनके बौद्धिक साथी, आंतकी गतिविधियों के संचालक एवं उनके समर्थक मौज़ूद हैं; और ये सभी प्रभावी भी हैं। तब क्या देश के विखंडवादी नकारात्मकता से जूझते समय व्यक्तिवादी स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्रीय हित दाँव पर लगा दिये जाने चाहिए? नहीं, बिलकुल भी नहीं। स्वतंत्रता को सामाजिक आत्मसंयम से संयुक्त और सामान्य प्रसन्नता के लिए सर्वाधिक लोगों की स्वतंत्रता के अधीन होना चाहिए। -(एस.एस.बोला बनाम बी.डी. सरदाना-1997, 8 एस.सी.सी.522)।
संविधान प्रदत्त एवं संरक्षित नागरिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसकी अभिव्यक्ति राष्ट्रविरोधी एवं सामाजिक रूप से विघटनकारी हो। तब विकल्प क्या है?
इस बारे में यही कहा जा सकता है कि पद्म श्री रामबहादुर राय की सलाह महत्त्वपूर्ण है। एक उदीयमान राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य के लिए क़ानूनों का निर्धारण राष्ट्रीय आवश्यकताओं एवं भविष्योन्मुख चुनौतियों पर आधारित होना चाहिए औपनिवेशिक तर्कों पर नहीं।
(लेखक पत्रकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)
“विधि आयोग क्या कहता है कि यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। पहली बात तो विधि आयोग ने जो सिफ़ारिश की है, वही गलत है। विधि आयोग ने ऐसी सलाह क्यों दी? यह वही जाने। लेकिन न्याय यही है कि राजद्रोह से सम्बन्धित आईपीसी और सीआरपीसी की जो-जो औपनिवेशिक-कालीन धाराएँ हैं, उनको समाप्त किया जाना चाहिए। रही बात राजद्रोह जैसी कोई गतिविधि में संलिप्तता की, तो उसके लिए उचित है कि सरकार संसद में अलग से क़ानून ले आये। उसमें तो कोई समस्या नहीं है।“
रामबहादुर राय
वरिष्ठ पत्रकार, संविधानविद् एवं इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष
भारत का पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर लगभग डेढ़ महीने से सुलगने के उपरांत पुलिस तथा सेना की माहौल में सुधार की कोशिश व्यर्थ गयी। लाख कोशिशों को उपरांत भी कुकी, नगा और मेइती समुदाय के उग्र लोग हिंसात्मक हैं। सरकार के लिए अब यह हिंसा सिरदर्द बन चुकी है।
सरकार का शान्ति बहाली दावा सही साबित नहीं हुआ। शिविरों में रहने को मजबूर 50,000 से अधिक लोग बेघर हैं। शान्ति की ख़बरों और कोशिशों के बीच मणिपुर की राजधानी इंफाल में पश्चिमी ज़िले के एक गाँव में 9 मई को एक महिला समेत तीन लोगों की हत्या और अब 11 लोगों की हत्या ने माहौल फिर ख़राब कर दिया है। हिंसा में उग्रवादियों की एंट्री हो चुकी है। दुविधा यह है कि उग्रवादी सुरक्षाकर्मियों के भेष आ रहे हैं और हमले कर रहे हैं। खामेनलोक क्षेत्र में उग्रवादियों के हमले से लोग ख़ौफ़ में हैं।
विदित हो कि मणिपुर में मेइती समुदाय द्वारा अनुसूचित जनजाति का दर्जा माँगें जाने के विरोध में कुकी तथा नगा समुदायों ने 3 मई को आदिवासी एकजुटता मार्च ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर के बैनर तले निकाला था, जिसके विरोध में मणिपुर में मेइती हिन्दू तथा आदिवासी कुकी, जो कि ईसाई हैं, एवं नगा समुदाय, जो कि कुकी समुदाय के साथ है, के बीच के बाद यह हिंसा भडक़ी थी। यह मार्च उच्च न्यायालय के 27 मार्च के उस फैसले के विरुद्ध निकाला जा रहा था, जिसमें न्यायालय ने राज्य को ही अनुसूचित जनजातियों की सूची में मेइती समुदाय को शामिल करने पर विचार करने का निर्देश दिया था। 3 मई से भडक़ी इस हिंसा में अब तक 100 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं तथा 300 से अधिक लोग घायल हो चुके हैं।
विदित हो कि मणिपुर में उग्रवाद एक पुरानी समस्या है, जिसकी जड़ें कथित रूप से राजनीति में भी बहुत गहरी हैं। ऐसे में अगर तीन जातियों की हिंसक झड़पों में अगर उग्रवादी शामिल हो चुके हैं, तो मणिपुर सरकार ही नहीं, केंद्र सरकार के लिए भी इसे रोकना अब आसान नहीं होगा। हालाँकि मणिपुर में पहले के मु$काबले कफ्र्यू के चलते काफ़ी शान्ति है, परन्तु सामान्य जनजीवन पटरी पर नहीं लौटा है तथा न जल्दी हालात सामान्य होने के संकेत हैं। इसकी वजह यह है कि हिंसा अब केवल जातिवाद और आरक्षण तक सीमित नहीं रही, वरन् क्षेत्रीयता तथा वर्चस्व की लड़ाई तक पहुँच चुकी है, जिसे लगातार छिपाने का प्रयास किया जा रहा है।
शुरू की सरकार की लापरवाही इतनी बड़ी हिंसा के लिए कहीं-न-कहीं ज़िम्मेदार मानी जानी चाहिए। अब हाल यह है कि हिंसा में अधिकारियों तथा नेताओं को भी अपना ख़तरा बना हुआ है। असम राइफल्स, पुलिस, सीआरपीएफ तथा सुरक्षा एजेंसियाँ हिंसा रोकने का भरसक प्रयास कर रही हैं। हिंसा की जाँच सीबीआई कर रही है। एसआईटी बन चुकी है। केंद्र सरकार ने मणिपुर के राज्यपाल की अध्यक्षता में राज्य में एक शान्ति समिति का गठन किया है। इस समिति के सदस्यों में मुख्यमंत्री, राज्य सरकार के कई मंत्री, कुछ सांसद, कुछ विधायक, वहाँ सक्रिय राजनीतिक दलों के नेता, कुछ विश्वसनीय अधिकारी, पूर्व सिविल सेवक, शिक्षाविद्, साहित्यकार, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता तथा विभिन्न जातीय समूहों के प्रतिनिधि शामिल हैं। गृह मंत्री अमित शाह मणिपुर हिंसा पर नज़र रखे हुए हैं। वह मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह तथा अधिकारियों, मंत्रियों के साथ बैठक कर चुके हैं। लेकिन उनके दौरे के बाद हिंसा भडक़ना आश्चर्यजनक है।
प्रश्न यह है कि क्या केंद्र सरकार का सीधा दख़ल इस हिंसा को शान्त करा पाएगा? यह प्रश्न इसलिए भी है, क्योंकि उग्रवादियों का हिंसा में कूदना इस हिंसा के शान्त होने को लेकर शंका पैदा करता है। मुश्किल यह है कि गृह मंत्री अमित शाह के दख़ल से भी यहाँ के हिंसा में शामिल समुदाय, विशेषकर पर कुकी समुदाय नाराज़ है तथा अपनी सुरक्षा की गुहार लगा रहा है। पिछले दिनों इस समुदाय ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आवास के बाहर प्रदर्शन किया था। कुकी समुदाय के प्रदर्शनकारियों ने इस दौरान हाथों में तख़्तियाँ ली हुई थीं, जिन पर लिखा था- ‘कुकी समुदाय के लोगों के जीवन की रक्षा करें।’ बाद में ये प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर भी बैठे थे।
हिंसा रोकने के लिए मणिपुर के हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में लगातार इंटरनेट सेवाएँ 3 मई से बंद की हुई हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरनेट सेवाओं के निलंबन के ख़िलाफ़ याचिका की तत्काल लिस्टिंग से इनकार करते हुए कहा कि मामला उच्च न्यायालय के पास है। परन्तु इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय हिंसा को लेकर हुए जान-माल के नुक़सान पर चिन्ता जताते हुए राज्य में शान्ति बहाली की प्रक्रिया पर ज़ोर दे चुका है। सवाल यह है कि लम्बे समय तक मणिपुर हिंसा पर केंद्र सरकार ने कुछ भी क्यों नहीं कहा? दूसरा सवाल यह है कि अगर अगर मणिपुर हिंसा रोकने में राज्य सरकार अभी तक असफल है, तो सरकार को ब$र्खास्त करके वहाँ राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगा दिया जाता? क्या ग़ैर-भाजपा शासन वाले किसी राज्य में इतनी बड़ी हिंसा के बाद केंद्र सरकार उस राज्य की सरकार को बर्दाश्त कर पाती? अगर नहीं, तो मणिपुर सरकार पर नाराज़गी क्यों ज़ाहिर नहीं हो रही है? अवैध हथियारों को स्वेच्छा से जमा करने के निर्देश के बजाय सरकार ने पहले ही क्यों नहीं जाँच अभियान चलाकर लोगों के हथियार ज़ब्त कर लिये? अब जिस स$ख्ती से हिंसा रोकने की कोशिश की जा रही है, वह कोशिश पहले भी तो की जा सकती थी।
कुल मिलाकर अब ग़ैर-अफस्पा क्षेत्रों में तलाशी अभियान के दौरान दण्डाधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित की जा रही है। सैकड़ों अवैध हथियार बरामद किये गये हैं। इन हथियारों में 900 से अधिक कम तथा अधिक ख़तरनाक बंदूक, राइफल, कट्टे जैसे हथियार, 1,200 से अधिक कारतूस, 200 से अधिक बम तथा अन्य सैकड़ों अन्य धारदार हथियार शामिल हैं। सभी प्रमुख सडक़ों पर सैन्य टुकडिय़ों का पहरा है।
देखने में आ रहा है कि सेना के डर से लोग भले ही घरों में क़ैद हैं, परन्तु अभी भी मेइती समुदाय उग्र दिख रहा है। हिंसा में बड़ी बात यही है कि सबसे पहले मेइती समुदाय के लोग ही उग्रता पर उतरे तथा इस समुदाय के लोगों ने आदिवासी एकता मार्च पर हमला किया। सवाल यह है कि मेइती समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्यों पाना चाहता है? मणिपुर के आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना है कि उनको मिले आरक्षण तथा उनके अधिकार क्षेत्र की प्राकृतिक चीज़ों पर क़ब्ज़ें की यह साज़िश है और सरकार इस साज़िश में शामिल है। तत्काल के हालात यह हैं कि उग्रवादी संगठन इस हिंसा को शान्त नहीं होने देना चाहते। जानकार मान रहे हैं कि उग्रवादी संगठनों का हिंसा में कूदना सरकार के लिए और मुसीबत खड़ी कर सकता है। उग्रवादी संगठन हिंसा को बढ़ावा देंगे तथा विरोधी पक्ष के सामान्य लोगों को मौत के घाट उतारने से नहीं चूकेंगे। शान्ति बहाली की कोशिश तथा कड़ी निगरानी के बीच तीन लोगों की हत्या यह साबित कर चुकी है।
संवेदनशील क्षेत्रों के जिन लोगों को सरकार ने विस्थापित कर दिया है, उनके वापस अपने घर लौटने की संभावनाएँ फ़िलहाल नहीं हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय हिंसा प्रभावित मणिपुर में विस्थापित लोगों के लिए 101.75 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की मंज़ूरी दे चुका है। हालाँकि राज्य सरकार के सुरक्षा सलाहकार कुलदीप सिंह का यह दावा है कि मणिपुर में स्थिति शान्तिपूर्ण है तथा नियंत्रण में है, $गलत साबित हुआ। कांग्रेस का कहना है कि सरकार हिंसा रोकने में नाकाम साबित हुई है।
मणिपुर के कुछ ज़िलों में 24 घंटे में 12 घंटे तथा पहाड़ों के पड़ोसी ज़िलों में 24 घंटों में से 8 से 10 घंटे की ढील कफ्र्यू में दी गयी थी। लेकिन फिर से तनाव बढऩे पर सख्त पहरे के बीच जनता है। पुलिस तथा सैन्य टुकडिय़ाँ लोगों पर लगातार नज़र बनाये हुए हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग-37 पर आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही कड़ी सुरक्षा निगरानी के बीच हो रही है। हर वाहन की जानकारी पुलिस के पास होने पर ही वह सडक़ों पर चल पा रहा है।
शान्ति बहाली के लिए राज्य में सेना तथा असम राइफल्स के लगभग 10,000 जवान तैनात हैं। सवाल यह है कि मणिपुर में मौत का तांडव कब रुकेगा?
महिला पहलवानों के यौन उत्पीडऩ मामले में बृजभूषण शरण सिंह अपने विरुद्ध महिला पहलवानों के आरोपों में आधी जीत एवं आधी हार पर अटके हैं। अधिकतर लोग मान रहे हैं कि यह बृजभूषण की पहली जीत है। क्योंकि किशोरी पहलवान के यौन शोषण मामले में पुलिस ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है।
पटियाला हाउस कोर्ट में पुलिस ने इस मामले की क्लोजर रिपोर्ट एवं बालिग़ पहलवानों के आरोपों वाले मामले में चार्जशीट भी पेश कर दी है। इस चार्जशीट में बृजभूषण के साथ कुश्ती संघ के असिस्टेंट सेक्रेटरी विनोद तोमर भी आरोपी है। दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण के विरुद्ध पॉस्को एक्ट को कोर्ट से रद्द करने की अपील की है। बालिग़ पहलवानों के मामले में बृजभूषण सिंह के विरुद्ध दायर की गयी पहली चार्जशीट में भारतीय दंड संहिता की चार धाराओं के तहत आरोप तय हुए हैं। धारा-354 (स्त्री की शालीनता को ठेस पहुँचाने के लिए उस पर हमला, बल प्रयोग। 1 से 5 साल तक की सज़ा।), धारा-354-ए (यौन उत्पीडऩ, 3 साल तक की सज़ा) और धारा-354-डी (पीछा करना, पहली बार दोषसिद्धि पर 3 साल की सज़ा), धारा-506‘1’ (आपराधिक धमकी, 2 साल तक की सज़ा)। मगर आरोपी को सभी धाराओं में जमानत मिल सकती है। इस मामले में 22 जून को सुनवाई होगी। वहीं पॉक्सो वाले मामले की 4 जुलाई को सुनवाई होगी। ध्यान रहे एक पूर्व रेफरी ने बृजभूषण पर यौन आरोपों को सही ठहराया था।
कुश्ती महासंघ की बात करें, तो बृजभूषण के दामाद विशाल सिंह अभी बिहार कुश्ती संघ के अध्यक्ष हैं। कुश्ती संघ के संयुक्त सचिव आदित्य प्रताप सिंह हैं, जो बृजभूषण के बेटे के साले हैं। अब रेशलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (भारतीय कुश्ती महासंघ) के चुनाव 6 जुलाई को होने हैं। मगर बृजभूषण सिंह और उनके परिवार वाले इस चुनाव में कम से कम इस चुनाव में किसी पद के लिए भाग नहीं हो सकेंगे। मगर कहा जा रहा है कि बृजभूषण को 36 फेडरेशंस में से लगभग 75 प्रतिशत का समर्थन प्राप्त है। फेडरेशन के अधिकतर अधिकारी बृजभूषण के ही पक्ष में हैं। इसलिए यह माना जा रहा है कि जा रहा है कि अगर बृजभूषण के हाथ से कुश्ती महासंघ की अध्यक्षता जाती भी है, तो भी उनकी इच्छा से ही कुश्ती महासंघ का अध्यक्ष चुना जाएगा।
जाँच में हुई ढील
यह सत्य है कि बृजभूषण शरण सिंह मामले में पुलिस जिस गति से एवं नाटकीय रूप से इस गंभीर प्रकरण की जाँच कर रही थी, उससे अत्याचार की इस घटना का पटाक्षेप असंभव लगता है। बृजभूषण शरण सिंह को भी यह पता है कि वो अभी पूरी तरह सुरक्षित हैं। कई बार पुलिस बृजभूषण शरण सिंह के घर पुलिस गयी मगर लौटी बैरंग ही। पुलिस ने अभी तक यह साहस नहीं जुटाया है कि वो भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह से इस प्रकरण को लेकर कुछ प्रश्न ही पूछ सके। मगर पहलवानों को अपराधियों की तरह घसीटा गया।
समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता उदयपाल सिंह कहते हैं कि सरकार जिसकी सुरक्षा करे उसे भला कौन गिरफ़्तार कर सकता है। पुलिस में यह हिम्मत कहाँ कि वो अपने कर्तव्य को याद करते हुए अपने अधिकारों का उपयोग बृजभूषण शरण सिंह जैसे माफ़िया के विरुद्ध कर सके। अगर यह नैतिकता पुलिस में होती, तो आज उत्तर प्रदेश में अपराधियों के लिए दो अलग-अलग नियम क़ानून नहीं होते। यह पुलिस पर बड़ा प्रश्न उठा है कि वो अतीक के बेटे का एनकाउंटर कर सकती है; मगर भाजपा के नेताओं एवं ऊँची जातियों के योगी बाबा के समर्थकों के गिरेबान तक अपने हाथ नहीं ले जा सकती। मगर पहलवानों पर पुलिस ने अपना बल प्रयोग करके ये सिद्ध कर दिया कि सत्ता जो चाहेगी वही होगा।
योगी के मौन पर सवाल
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ के पक्षवादी रवैये पर अब उँगलियाँ उठने लगी हैं। लोग कह रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ का बुलडोजर बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ नहीं चलेगा, क्योंकि मामला उनकी अपनी पार्टी का है एवं सबसे बढक़र एक दूसरे राजपूत का है। यही कारण है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पक्षवादी मन यहाँ मौन है।
कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि अब योगी आदित्यनाथ की हिम्मत ही नहीं कि वो अब ये बोल दें कि माफ़िया को मिट्टी में मिला देंगे, क्योंकि बृजभूषण शरण सिंह उनसे अधिक ताक़तवर है। तो कुछ लोग कह रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ जैसे माफ़िया राजा भैया के प्रति भाईचारा बरत रहे हैं, वैसे ही वो बृजभूषण शरण सिंह से भाईचारा बरत रहे हैं। इसी कारण से पुलिस भी जाँच में हीलाहवाली कर रही है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ऐसे आरोप पहले भी लग चुके हैं। मगर यहाँ मामला एक केंद्रीय नेता का है एवं उनके विरुद्ध पुलिस जाँच चल रही है; यह भी योगी आदित्यनाथ की चुप्पी का एक कारण है। मगर उन्हें कुछ तो इस मामले को लेकर बोलना ही चाहिए अन्यथा प्रदेश की जनता उनके पक्षपाती होने की बात तो कहेगी ही। लोग भी यह कह ही रहे हैं, भले दबी ज़ुबान से सही।
बृजभूषण का शक्ति प्रदर्शन
यौन उत्पीडऩ के आरोपी भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह स्वयं को दूध का धुला साबित करने के लिए हर दिन नये-नये स्वांग रच रहे हैं। कुछ दिन पहले बृजभूषण शरण सिंह ने उत्तर प्रदेश के गोंडा में एक रैली को संबोधित किया। इस रैली में बृजभूषण शरण सिंह की सुरक्षा व्यवस्था देखते ही बनती थी। बृजभूषण शरण सिंह की सुरक्षा व्यवस्था देखकर ऐसा लग रहा था कि उनकी गिरफ़्तारी असंभव है।
बृजभूषण शरण सिंह ने अपने इस रैली में पुलिस के सामने व्यापक रूप से अपना शक्ति प्रदर्शन किया एवं ये संदेश दिया कि उनका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता।
अब समझ में आ रहा है कि एक दबंग भाजपा नेता की गिरफ़्तारी की माँग वाला उच्चतम स्तर के पहलवानों का आन्दोलन भी क्यों निरर्थक सिद्ध हो रहा है? वैसे भी बृजभूषण शरण सिंह की ताक़त का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जाँच में लगी पुलिस उनके घर में भी बिना उनकी अनुमति के प्रवेश नहीं कर पाती है। घर में ही हैलीपैड रखने वाले बृजभूषण शरण सिंह के पास पुलिस अगर कहीं दिखती भी है, तो वो उनकी सुरक्षा का दायित्व निभाती दिखती है।
पहलवानों के हिस्से में प्रतीक्षा
पुलिस ने अपनी जाँच रिपोर्ट पेश कर दी। मगर अभी तक पहलवानों को न्याय नहीं मिला है। उन्हें गृह मंत्री अमित शाह से जाँच की प्रतीक्षा करने की सलाह एवं खेल मंत्री अनुराग ठाकुर से न्याय का आश्वासन मिला। प्रश्न यह है कि क्या गृह मंत्री अमित शाह एवं खेल मंत्री अनुराग ठाकुर का आश्वासन पहलवानों को केवल शान्त कराने वाला ही है। वैसे तो खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने पहलवानों को 15 जून तक बृजभूषण शरण सिंह के विरुद्ध चल रही जाँच को निष्पक्ष रूप से पूरा करने का वचन दिया है। मगर राजनीति में भावनाओं एवं वचनों की कोई क़ीमत नहीं होती। ऐसे में खेल मंत्री का यह कहना कि हमने आश्वासन दिया है कि 15 जून तक जाँच पूरी कर ली जाएगी एवं चार्जशीट दायर की जाएगी, पर विश्वास नहीं होता।
ऐसा भी हो सकता है कि बृजभूषण शरण सिंह पर कार्रवाई देरी से राजनीतिक लाभ के आधार पर हो। क्योंकि भाजपा शीर्ष मंडल की यह प्रवृत्ति रही है कि वो हर कार्य लाभ के अवसर को देखकर ही करता है। वैसे गृह मंत्री अमित शाह पहलवानों को आश्वासन दे चुके हैं कि क़ानून सबसे लिए बराबर है। उन्होंने गंगा में पदक बहाने के पहलवानों के निर्णय के उपरांत पीडि़त महिला पहलवानों से मिलकर कहा था कि क़ानून को अपना काम करने दें। क़ानून सबके लिए बराबर है।
बृजभूषण बोले, ‘फाँसी लगा लूँगा’
भाजपा सांसद हर दिन अनेक तरह से देश की जनता को यह बता रहे हैं कि वो निर्दोष हैं एवं जिन पहलवानों को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाया, वो अब उन्हें बदनाम कर रहे हैं। मगर प्रश्न यह है कि इतने अधिक अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान ऐसे कैसे बृजभूषण शरण सिंह के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं।
अगर कहीं धुआँ उठा है, तो आग भी लगी ही होगी। कोई एक महिला पहलवान आरोप लगाती, तो समझ में आता; मगर समूह में इतनी महिला पहलवान ऐसे ही इतने बड़े नेता एवं आरोप लगाने के समय के वर्तमान कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष पर आरोप नहीं लगा सकतीं। उन्हें अपने भविष्य का डर भी रहा होगा, जो दाँव पर लग चुका है।
हर तरह से अपने बचाव के प्रयास में लगे बृजभूषण शरण सिंह हर दिन स$फाई दे रहे हैं। इसके लिए बृजभूषण शरण सिंह कभी अपना स्वयं का चरित्र स्वच्छ बताते हैं, तो कभी यह कहने का प्रयास करते हैं कि वो अत्यधिक शक्तिशाली हैं। अब तो वो भावनात्मक रूप से लोगों को द्रवित करने के प्रयास भी करने लगे हैं, जिससे लोग पहलवानों का पक्ष लेना छोडक़र उनके पक्ष में खड़े हो जाएँ।
कुछ दिन पहले बृजभूषण शरण सिंह ने ऐसा ही एक भावनात्मक पासा फेंका। उन्होंने कहा कि अगर उनके ख़िलाफ़ एक भी आरोप साबित होता है, तो वह फाँसी लगा लेंगे। वह नार्को टेस्ट अथवा पॉलीग्राफ टेस्ट कराने को तैयार हैं। वैसे वह लगातार यह सिद्ध करने में लगे हैं कि वह बिलकुल निर्दोष हैं। उनके कई समर्थक उनके बचाव के लिए उनके चरित्र का कथित प्रमाण-पत्र जनता को बाँट रहे हैं। उनकी प्रशंसा का राग अलापने से नहीं चूक रहे हैं। मगर यह नहीं बता रहे हैं कि बृजभूषण शरण सिंह के विरुद्ध इतनी बड़ी संख्या में आपराधिक मुक़दमे कैसे दर्ज हुए। ऐसा क्या हुआ कि इतने आरोप एवं मुक़दमे इस भाजपा नेता पर लगे। पूरे देश को अब यह प्रतीक्षा है कि इस बड़े आरोप प्रकरण का हल क्या निकलता है।