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पर्यावरण की अनदेखी

विरोध के बावजूद विश्व स्तरीय वाढवण बंदरगाह के विस्तार को मिली मंज़ूरी

एम.एस. नौला / केशर सिंह बिष्ट

आख़िर प्रधानमंत्री मोदी के एक और ड्रीम प्रोजेक्ट के सामने मछुआरों व पर्यावरण वादियों का सपना चूर हो गया। स्थानीय लोगों के कड़े विरोध के बीच क़रीब 77,196 करोड़ रुपये की लागत के विश्व स्तरीय वाढवण बंदरगाह के विस्तार को मंज़ूरी दे दी गयी है। डहाणू तालुका पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (डीटीईपीए) द्वारा जेएनपीए के तहत बनाये जा रहे वाढवण बंदरगाह के लिए इस साल 31 जुलाई को आश्चर्यजनक रूप से एनओसी दे दी गयी। डीटीईपीए और सरकार के बीच की लड़ाई दशकों पुरानी है। दरअसल इस प्राधिकरण की स्थापना ही डहाणू तालुका के पर्यावरण की रक्षा करने और इस बंदरगाह को अनुमति न देने के सिलसिले में हुई थी।

वाढवण बंदरगाह विरोधी संघर्ष कृति समिति के सचिव वैभव वझे कहते हैं- ‘वाढवण बंदरगाह को सशर्त प्राथमिक एनओसी मिलने की अधिकृत आदेश की कॉपी अभी तक हमें नहीं मिली है। इस बंदरगाह के निर्माण के ख़िलाफ़ हमारी जो लड़ाई चल रही थी, वह क़ानूनी रूप से चलती रहेगी।’

बहरहाल इस मेगा पोर्ट का निर्माण दो चरणों में होगा। जेएनपीए पहले चरण में विकास कार्यों पर 44,000 करोड़ रुपये और दूसरे चरण के काम के लिए निजी क्षेत्र से 33,000 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे। इसमें बंदरगाह तक जाने वाली अलग-अलग सडक़ों का निर्माण, ब्रेकवाटर, ड्रेजिंग, रिक्लेमेशन, भूमि अधिग्रहण, रेलवे लाइन का निर्माण, बिजली आपूर्ति प्रणाली, बाँधों का निर्माण, जल आपूर्ति, कार्गो बर्थ का निर्माण आदि काम होंगे। स्थानीय मछुआरों के कड़े विरोध, सीआरजेड, केंद्रीय मंत्रालय से एनओसी और पर्यावरण विभाग से विभिन्न मंज़ूरी मिलने में देरी के चलते चार साल से इसका काम ठप पड़ा था। डीटीईपीए की अनुमति के आधार पर जेएनपीए का कहना है कि वह अब सभी आवश्यक अनुमति की मंज़ूरियों के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण विभाग को एक प्रस्ताव सौंपेगी। बता दें कि डहाणू तालुका पर्यावरण के मद्देनज़र बेहद संवेदनशील है। सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका के आधार पर केंद्र सरकार ने डहाणू तालुका पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण बनाया। इस प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष व रिटायर्ड न्यायाधीश स्वर्गीय धर्माधिकारी व प्राधिकरण सदस्यों ने बंदरगाह के निर्माण की अनुमति नहीं दी थी।

प्रॉफिट कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट के देवी गोयनका के अनुसार, डीटीईपीए के पास केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के समान पर्यावरण प्रदूषण के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने और कार्रवाई करने का अधिकार रहा है। लेकिन समय-समय पर मंत्रालय धन जारी न करके या प्राधिकरण के काम का समर्थन न करके डहाणू प्राधिकरण को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश करता रहा। इकोलॉजिकली रूप से संवेदनशील डहाणू तालुका मुंबई से लगभग 120 किलोमीटर उत्तर में महाराष्ट्र के पालघर ज़िले में स्थित है। डहाणू का ज़िक्र, उत्तर में गुजरात के वापी के रासायनिक गलियारों और दक्षिण में पालघर-बोईसर के औद्योगिक क्षेत्रों के बीच स्थित इस क्षेत्र में कुछ अंतिम बचे ग्रीन जोन के तौर पर किया जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, तालुका की 69.1 फ़ीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति है।

तालुका में 46 फ़ीसदी जंगल का इलाक़ा है। डहाणू को क्षेत्रीय फल एवं अन्न के कटोरे के रूप में जाना जाता है। यहाँ की अधिकांश आबादी खेती करने और मछली पकडऩे का काम करती है। मछली और झींगा मछली के साथ-साथ एक विशेष प्रकार की मछली बोम्बिल ‘बॉम्बे डक’ डहाणू से निर्यात होने वाले प्रमुख उत्पादों में से एक है। जेएनपीए के अध्यक्ष संजय सेठी के अनुसार, डीटीईपीए ने विभिन्न नियमों और शर्तों के तहत डहाणू तालुका में वाढवण बंदरगाह की स्थापना और विकास की अनुमति दी है। अब यहाँ बन रहे इस अत्याधुनिक बंदरगाह में प्रति वर्ष लगभग 300 मिलियन टन कंटेनर की आवाजाही होगी। यह दुनिया का सबसे बड़ा कंटेनर पोर्ट होगा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् प्रोफेसर भूषण भोईर का आरोप है कि इस बंदरगाह का अध्ययन करने के लिए एनसीएससीएम (नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कॉस्ट मैनेजमेंट), एनआईओ (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी) और समुद्री धाराओं का ध्यान करने वाले सीडब्ल्यूपीआरएस को नियुक्त किया गया था। बंदरगाह के सम्बन्ध में विस्तृत अध्ययन करने के बाद तीनों संगठनों ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और डहाणू तालुका पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसे सच्चाई से अलग मैनिपुलेट किया गया है।

बंदरगाह के निर्माण से पर्यावरण को काफ़ी नुक़सान होगा और समुद्रीय जन-सम्पदा को भी भारी नुक़सान होगा। मत्स्य उद्योग के ख़त्म होने से कई भूमिपुत्र बर्बाद हो जाएँगे। इसके ख़िलाफ़ एकजुट स्थानीय लोगों ने सन् 1998 में वाढवण बंदरगाह विरोधी संघर्ष समिति का गठन किया था। तबसे कई बड़े-बड़े आन्दोलन, विरोध-प्रदर्शन हुए। मोर्चे निकले। भूख हड़ताल हुई। बंदरगाह के निर्माण के विरोध चल रहे आन्दोलन में महाराष्ट्र ही नहीं, गुजरात के तटीय क्षेत्र के लोग भी शामिल रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार अपने रुख़ पर क़ायम रही।

महिलाओं का ग़ायब होना दुर्भाग्यपूर्ण

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 02 अगस्त को गुजरात के गाँधीनगर में आयोजित जी-20 के महिला सशक्तिकरण मंत्री-स्तरीय सम्मेलन को डिजिटल माध्यम से सम्बोधित करते हुए महिलाओं के सशक्तिकरण पर ख़ास बल दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण विकास को गति देता है। उन्हें सशक्त बनाने का सबसे प्रभावी तरीक़ा महिला-नीत विकासात्मक नज़रिया है। जब महिलाएँ समृद्ध होती हैं, तो दुनिया समृद्ध होती है। उन्होंने कहा कि महिलाओं का नेतृत्व समावेशिता बढ़ाता है।

प्रधानमंत्री ने इस सम्मेलन में यह भी बताया कि भारत में ग्रामीण स्थानीय निकाहों में 46 फ़ीसदी यानी कि 14 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि महिलाएँ हैं। नागरिक उड्डयन में सबसे अधिक महिला पायलट वाले देशों की सूची में भारत भी शामिल है। इसके अलावा भारतीय वायुसेना में महिला पायलट अब लड़ाकू विमान भी उड़ा रही हैं। ज़ाहिर तौर पर प्रधानमंत्री ने विदेशी प्रतिनिधियों के सम्मुख देश में महिला सशक्तिकरण की एक उज्ज्वल तस्वीर आँकड़ों के साथ पेश की। अब इस उज्ज्वल तस्वीर के समानांतर देश में लड़कियों व महिलाओं की एक और स्थिति को यहाँ पर रखते हैं। देश में लापता लड़कियों और महिलाओं के आँकड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना पर गम्भीर सवाल उठते हैं।

22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत से प्रधानमंत्री ने इस योजना को लॉन्च किया था। इस योजना का मक़सद देश में शिशु लिंग अनुपात में सुधार, महिलाओं के सशक्तिकरण, लैंगिक समानता व महिलाओं को कमतर समझने की मानसिकता को दूर करने वाले क़दम उठाना आदि है। बाद में इसमें लडक़ी बढ़ाओ भी ज़ोर दिया गया। लेकिन इसी 26 जुलाई को संसद के चालू मानसूत्र में गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने राज्यसभा में एक रिपोर्ट पेश की और बताया कि देश में सन् 2019 से सन् 2021 के दरमियान 13.13 लाख से अधिक लड़कियाँ व महिलाएँ लापता हो गयीं। गृह मंत्रालय ने बताया कि ये आँकड़े राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा जुटाये गये हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की क्राइम इन इंडिया नामक इस रिपोर्ट के अनुसार, 18 साल से कम लापता लड़कियों की संख्या 2,51,430 है और 18 साल से अधिक लापता महिलाओं की संख्या 10,61,648 है।

गृह मंत्रालय ने इन आँकड़ों को संसद में रखा और पेश किये गये आँकड़ों के अनुसार, देश में भाजपा शासित मध्य प्रदेश लापता लड़कियों व महिलाओं में पहले नंबर पर है यानी 2019-2021 के दरमियान यहाँ सबसे अधिक लड़कियाँ व महिलाएँ गुम हुईं।

मध्य प्रदेश में गुम होने वाली महिलाओं की संख्या 1,60180 और लड़कियों की संख्या 38,234 है। इसके बाद पश्चिम बंगाल है, जहाँ की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी हैं; जो इस समय देश की इकलौती महिला मुख्यमंत्री हैं। वहाँ यह आँकड़ा 1,56,905 और 36,606 है। महाराष्ट्र, जहाँ की गठबंधन सरकार में भाजपा के सबसे अधिक विधायक हैं और देवेंद्र फडणवीस उप मुख्यमंत्री हैं; वह तीसरे नंबर पर है। महाराष्ट्र में 1,78,400 महिलाएँ और 13,033 लड़कियाँ लापता हो गयी हैं। ओडिशा में बीते तीन वर्षों में 70,222 महिलाएँ और 16,649 लड़कियाँ गुम हो गयी हैं। इसके बाद पाँचवें नंबर पर छत्तीसगढ़ है, जहाँ यह आँकड़ा क्रमवार 49,116 और 10,817 है। तमिलनाडू में इस तीन साल में 18 साल से कम आयु की 14,391 लड़कियाँ व 18 साल से अधिक आयु की 43,529 महिलाओं के लापता होने का रिकॉर्ड सरकार के पास है। गुजरात में लड़कियों के लापता होने का आँकड़ा 4,122 है और ऐसी महिलाओं की संख्या 37,576 है।

हरियाणा में गुम होने वाली लड़कियों की संख्या इन तीन वर्षों में 6,560 व महिलाओं की संख्या 26,471 है। उत्तर प्रदेश में 18 साल से कम आयु की ग़ायब हुई लड़कियों की संख्या 9,479, जबकि महिलाओं की 27,562 है। वैसे लापता हुई लड़कियों व महिलाओं के आँकड़ों हैरत में डालते हैं; बेशक सरकार दस्तावेज़ों में यह भी दावा करती है कि कितनी लड़कियाँ व महिलाओं का पता लगा लिया गया व कितनी रिकवर कर ली गयीं। इन आँकड़ों पर भी निगाह डालनी चाहिए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की बेवसाइट बताती है कि सन् 2019 में 18 साल से कम लापता होने वाली 82,619 लड़कियों में से 49,436 को ढूँढ लिया गया था। इसी साल लापता 3,29,504 महिलाओं में से 1,68,793 महिलाओं को ढूँढ लिया गया। वर्ष 2020 में 79,233 लड़कियाँ व 3,44,422 महिलाएँ गुम हो गयीं और उनमें से बरामद होने वाली महिलाओं की संख्या 2,24,043 है और इस साल रिकवर होने वाली लड़कियों की संख्या नहीं बतायी गयी है। वर्ष 2021 में 90,113 लड़कियाँ ग़ायब हो गयीं और उनमें से 58,980 का पता चल गया और ग़ायब होने वाली 3,75,058 महिलाओं में से 2,02,298 को ढूँढ लिया गया।

इन दिनों केंद्र सरकार के बड़े-बड़े मंत्री सार्वजानिक तौर पर यह ऐलान कर रहे हैं कि भारत 2027 तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बन जाएगा। ऐसा प्रचार किया जा रहा है कि भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है; लेकिन इसी देश में लापता लड़कियों और महिलाओं की संख्या किसी भी राजनीतिक दल के चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल क्यों नहीं होती? राजनीतिक दल इस पर गम्भीर चर्चा क्यों नहीं करते? सवाल गम्भीर है कि आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है? सन् 2012 के निर्भया-कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा से सम्बन्धित क़ानूनों को और कड़ा बनाया गया; लेकिन ज़मीन पर ह$कीक़त क्या है? क्या स्थितियाँ सुधरी हैं?

जब नारी आन्दोलन शुरू हुआ, तो उसने महिला मुद्दों को मुखरता से उठाया और महिला सुरक्षा पर ख़ास फोकस रखा। नारीवादियों की चिन्ता इस समय भी महिला सुरक्षा है। लेकिन सवाल फिर वही सामने आकर खड़ा हो जाता है कि आख़िर महिलाएँ असुरक्षित क्यों हैं? केंद्र सरकार व विभिन्न राज्य सरकारें महिलाओं के सशक्तिकरण और सुरक्षा के लिए चलाये जाने वाले कई योजनाओं के बारे में समय-समय पर अवगत कराते रहते हैं।

मध्य प्रदेश में आने वाले दो-तीन महीनों में विधानसभा चुनाव होंगे, इसके मद्देनज़र मध्य प्रदेश सरकार इन दिनों अपनी उपलब्धियों के बहुत बड़े विज्ञापन से जनता को अवगत करा रही है। मध्य प्रदेश सरकार ने कुछ माह पहले लाडली बहन योजना शुरू की है, जिसके तहत राज्य की महिलाओं की आर्थिक मदद की जा रही है। इस योजना का विज्ञापन सोशल मीडिया पर अधिक प्रचारित किया जा रहा है।

यहाँ सवाल यह है कि इस राज्य के मुख्यमंत्री सार्वजनिक तौर पर जनता को क्यों नहीं बताते कि उनके शासन में बीते तीन वर्षों से सबसे ज़्यादा लड़कियाँ और महिलाएँ लापता हुई हैं? ऐसे सरकारी आँकड़े, जो शर्म से सिर झुका देने वाले हों और लड़कियों, महिलाओं की सुरक्षा के बाबत सरकारी और प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलते हों, वे क्यों छुपा दिये जाते हैं? ग़ायब होती लड़कियों व महिलाओं की बड़ी तादाद बताती है कि हमारा देश इस मामले में एक असफल राष्ट्र है।

किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा का एक मापक वहाँ की महिला सुरक्षा वाला बिन्दु भी है, जो अहम है। इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आख़िर लड़कियाँ, महिलाएँ लापता क्यों होती हैं? इसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं, जैसे-पढऩे का दबाव, घर का माहौल ख़ुशनुमा नहीं होना, प्रेम सम्बन्ध, किसी तरह का तनाव होना आदि। इसके अलावा नौकरी के झाँसे में आकर घर में बिना बताये कहीं ओर चले जाना। यहाँ पर लापता लड़कियों व महिलाओं की मानव तस्करी होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि कई बार ऐसे समाचार सामने आते हैं, जिसमें लउ़कियों को किसी-न-किसी बहाने फुसलाकर घर से बाहर ले जाया गया व फिर उन्हें तस्करी करने वाले गिरोह के पास बेच दिया गया। तीन महीने पहले मई में महाराष्ट्र की राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर ने अपने राज्य में लापता लड़कियों व महिलाओं की संख्या के बाबत सरकार से ऐसे मामलों की जाँच के लिए एसआईटी का गठन करने की माँग की थी। अध्यक्ष रूपाली चाकणकर ने कहा कि अधिकतर मामलों में लापता लड़कियों को शादी या नौकरी का लालच देकर फँसाया जाता है।

अगर पुलिस उन्हें फौरन नहीं ढूँढती है, तो उनके यौन शोषण का $खतरा बढ़ जाता है। वैसे ग़ायब लड़कियों व महिलाओं के जो आँकड़े सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होते हैं। ये वो आँकड़े हैं, जो दर्ज हैं। लेकिन असल में यह संख्या अधिक होती होगी; क्योंकि कई अभिभावक या परिजन लड़कियों / महिलाओं के लापता होने की सूचना घर से बाहर साझा करना परिवार की बदनामी से जोडक़र देखते हैं। यह सोच ख़तरनाक है; क्योंकि वह भी इंसान है। यहाँ पर भी समाज का लैंगिक भेदभाव अपना असर दिखाता है। समाज को इस सोच से ऊपर उठने की ज़रूरत है। सरकार बेशक देश की बेटियों व महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनायी गयी नीतियों व क़ानूनों की लम्बी सूची लेकर खड़ी है; लेकिन संसद में पेश किये गये आँकड़े कड़वी हकीक़त सामने रखते हैं।

दिल्ली में चौकसी की ज़रूरत

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिसंवेदनशील केंद्र शासित राज्य है। यहाँ सभी दुनिया के अनेक देशों, अधिकतर धर्मों तथा अधिकतर जातियों के लोग रहते हैं। दिल्ली में सबसे अधिक संख्या हिन्दुओं की है, उसके बाद मुस्लिम सबसे अधिक संख्या में यहाँ हैं। दिल्ली के पड़ोसी राज्य हरियाणा में साम्प्रदायिक हिंसा भडक़ने से दिल्ली पुलिस सतर्क हो गयी है। हरियाणा में भडक़ी हिंसा के बाद दिल्ली में लगातार हो रहे विरोध-प्रदर्शन इसका मुख्य कारण हैं।

ज़िम्मेदारों को हिंसक घटनाएँ रोकनी चाहिए। अगर नहीं रोक सकते, तो इस्तीफ़ा देना चाहिए। दंगाइयों को जेल भेजा जाना चाहिए। ऐसी माँगें आज देश के हर कोने से उठ रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर मौखिक रूप से निष्पक्ष लोग इस तरह की माँगें उठा रहे हैं। परन्तु कुछ लोगों ने पिछले दिनों हरियाणा के नूंह, मेवात की हिंसा के लिए दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन किये। यह प्रदर्शन शाहदरा में हुए। जबकि विरोध के लिए देश के लोग दिल्ली के जंतर-मंतर, इंडिया गेट तथा संसद मार्ग पर आते हैं। प्रश्न यह है कि हिन्दू संगठनों के लोगों ने हिंसा का विरोध दिल्ली के शाहदरा में क्यों किया?

कुछ लोगों का कहना है कि वास्तव में शाहदरा मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। पिछली बार दिल्ली में दंगों की लपटें शाहदरा में भी फैली थीं। इसलिए लोग वहाँ जमा होकर नारेबाज़ी कर रहे थे। वास्तव में निशाना दिल्ली पर है। यही कारण है कि कभी बाढ़ के बहाने, कभी दिल्ली सरकार के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के कथित आरोपों के बहाने तथा कभी दिल्ली में अव्यवस्था के बहाने दिल्ली की राज्य सरकार को गिराने की योजनाएँ बनायी जा रही हैं।

जब किसी राज्य में हिंसा भडक़ती है, तो उसके पड़ोसी राज्यों को भी हिंसा भडक़ने का डर सताता रहता है। राजधानी दिल्ली में यह डर इसलिए भी बढ़ जाता है; क्योंकि यहाँ केंद्र में भाजपा की सरकार है तथा राज्य में आप की सरकार है। दोनों में राजनीतिक तनाव रहता है।

हाल ही में दिल्ली सेवा विधेयक को लेकर लोकसभा में जिस तरह गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा नेताओं ने दिल्ली सरकार तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को खलनायक साबित करने के लिए आरोपों की बोछार की, उससे यह स्पष्ट है कि दिल्ली सरकार में न होने का जितना मलाल भाजपा नेताओं को है, उतना मलाल शायद ही किसी दूसरे दल को किसी राज्य में सत्ता न मिलने का होगा। प्रश्न यह है कि क्या दिल्ली में दंगों की वजह कभी सत्ता भी रही है? इस प्रश्न का उत्तर यही दिया जा सकता है कि सत्ता की भूख ही दंगों की ज़मीन तैयार करती है, चाहे वो किसी भी राज्य का मामला क्यों न हो।

दिल्ली में दंगों की संवेदनशीलता को पुलिस भी अच्छी तरह जानती है तथा केंद्र सरकार भी समझती है। परन्तु रोकने की कोशिश करना एक दूसरी बात है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस दंगा करने की स्थितियों को भाँपकर उन्हें रोकने में नाकाम है, परन्तु कई बार दंगे भडक़ने पर आसानी से शान्ति बहाल नहीं हो सकी है। अगर दिल्ली में 2015 के बाद से हुए दंगों पर नज़र डालें, तो देखेंगे कि केवल आठ वर्षों में यहाँ कई बार दंगे भडक़ चुके हैं तथा कई बार उन्हें समय रहते पुलिस ने भडक़ने से रोका भी है।

पुलिस रिकॉर्ड तथा विभिन्न रिपोट्र्स के अनुसार, सन् 2015 में दिल्ली में कुल 130 जगहों पर दंगे भडक़े थे, जिनमें अधिकतर मामले साम्प्रदायिक दंगों के थे। सन् 2016 में दिल्ली में 79 जगहों पर दंगे भडक़ने की घटनाएँ हुईं, जिनमें अधिकतर साम्प्रदायिक थीं। इसके बाद सन् 2017 में कुल 50 दंगे दिल्ली में हुए। इन दंगों में भी साम्प्रदायिक दंगे ही अधिक थे। सन् 2018 में 23 जगहों पर दंगे भडक़े, जिनमें से कई साम्प्रदायिक मामलों को लेकर हुए थे। सन् 2019 में भी 23 जगहों पर दंगे हुए, जिसमें आधे से अधिक साम्प्रदायिक थे। सन् 2020 दिल्ली के लिए दंगों के मामले में बहुत $खराब रहा तथा इस साल दिल्ली दंगों के मामले में सबसे अधिक कलंकित रही।

इस साल दंगों की 689 घटनाएँ हुईं, जिनमें अधिकतर साम्प्रदायिक दंगे थे। इनमें एक दंगा सबसे बड़ा रहा, जो ठीक चुनाव से पहले हुआ। इस साल अधिक दंगे होने का कारण चुनाव के पास आने का विशेषज्ञों ने माना। सन् 2021 में 68 दंगे दिल्ली में हुए, जिनमें साम्प्रदायिक दंगे अधिक थे। सन् 2020 के सबसे बड़े दंगे ने दिल्ली के कई क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया था, जिसमें कई नेताओं पर दंगा भडक़ाने के कथित आरोप भी लगे थे, जिसमें एक नाम कथित तौर पर कपिल मिश्रा का भी आया था।

हालाँकि उनके ख़िलाफ़ कोई मामला न बनने से उन पर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई। परन्तु दंगों से पहले उनका आप पार्टी छोडक़र भाजपा में जाना तथा दंगों के बाद उन्हें केंद्र सरकार द्वारा सुरक्षा मुहैया कराना भी एक अलग ही माजरा है।

हालाँकि अब उन्हें भाजपा का दिल्ली प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। यह वही कपिल मिश्रा हैं, जिन्होंने भरी विधानसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर शारीरिक व्यभिचार की घिनौनी टिप्पणियाँ करते हुए उसके सुबूत होने का दावा किया था। इसके बाद से ही कपिल मिश्रा का धीरे-धीरे आप पार्टी से नाता टूटा तथा वह भाजपा में शामिल हो गये। 

जो भी हो, दिल्ली की हरियाणा सीमाएँ इन दिनों पुलिस की कड़ी निगरानी में हैं, ताकि हरियाणा की हिंसा की आँच दिल्ली तक न पहुँच सके। अगर अब तक के दंगों का इतिहास देखें, तो दिल्ली के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र दंगों की चपेट में आसानी से आते दिखे हैं। हरियाणा के नूंह, मेवात में भडक़ी हिंसा के बाद जिस शाहदरा में हिन्दू संगठनों ने विरोध-प्रदर्शन करते हुए नारेबाज़ी की, वह क्षेत्र भी दिल्ली का पूर्वी क्षेत्र है। शाहदरा के अतिरिक्त सीमापुरी, न्यू उस्माननगर, जाफ़राबाद, वेलकम, ज्योतिनगर, कल्याणपुरी, त्रिलोकपुरी, भजनपुरा, गोकलपुरी, करावल नगर, खजूरी $खास जैसे क्षेत्र संवेदनशील हैं, जिनमें अधिकतर क्षेत्र शाहदरा के पास ही हैं। इसलिए दिल्ली पुलिस को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दिल्ली में ऐसी किसी भी प्रकार की गतिविधि न होने दे जिससे किसी दूसरे सम्प्रदाय को उकसावा मिले।

दिल्ली के अलावा सन् 2016 से सन् 2020 तक देश भर में दंगे बहुत अधिक हुए थे। केंद्र सरकार द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार, सन् 2016 से सन् 2020 तक देश में लगभग 3,400 साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। केंद्र सरकार के अनुसार, सन् 2020 तक देश में दंगों के कुल 2,76,000 दंगे हुए। इनमें से 3,400 दंगे साम्प्रदायिक हिंसा के थे। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, सन् 2016 में कुल 61,974 दंगे देश में हुए। सन् 2017 में 58,880 दंगे देश में हुए। इसी प्रकार सन् 2018 में 57,828 दंगे, सन् 2019 में कुल 45,985 दंगे देश में हुए। वहीं सन् 2016 में साम्प्रदायिक 869 दंगे, सन् 2017 में 723 साम्प्रदायिक दंगे, सन् 2018 में 512 साम्प्रदायिक दंगे, सन् 2019 में 438 साम्प्रदायिक दंगे तथा सन् 2020 में 857 साम्प्रदायिक दंगे देश में हुए।

यह तो पिछले दंगों का रिपोर्ट कार्ड है, जिसे दोहराने का कारण यह बताना भी है कि दिल्ली में सतर्कता की बहुत आवश्यकता है। क्योंकि दिल्ली में केंद्र सरकार का शासन होने बाद भी अगर यहाँ इतनी संख्या में हर साल दंगे भडक़े हैं, तो यह केंद्र सरकार तथा उसकी कानून व्यवस्था की बड़ी विफलता ही कही जाएगी। इसका कारण यह है कि यहाँ पुलिस के अतिरिक्त कई सुरक्षा एजेंसियाँ केंद्र के अधीन हैं तथा देश की सरकार यहीं से चलती है। फिर भी अगर दंगे भडक़ जाते हैं, तो यह बेहद शर्मनाक है।

हरियाणा में साम्प्रदायिकता हावी

मेवात, गुडग़ाँव, हांसी में हिंसा के बाद पलवल, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, झज्जर में भी तनाव

हरियाणा का नूंह (मेवात) साम्प्रदायिक दंगा शासन-प्रशासन की घोर नाकामी की वजह से हुआ। दंगे के बाद पुलिस का क़रीब छ: घंटे के बाद पहुँचना और उसके बाद भी हिंसा का जारी रहना सवाल खड़े करता है। आरोप है कि दंगाई लूटपाट और आगजनी करते रहे और हिन्दू समुदाय को निशाना बनाते रहे और पुलिस असहाय की तरह सब कुछ देखती रही। कुछ मुसलमानों ने भी उनके लोगों पर इसी तरह हिंसा होने का आरोप लगाया है। दर्ज़नों की संख्या में पुलिसकर्मी थे और सैकड़ों की संख्या में दंगाई थे।

हालत बिगड़े, तो पुलिसकर्मी भी भागते नज़र आये। यात्रा की सुरक्षा में लगे दो होमगार्ड जवानों की हत्या कर दी गयी, जबकि क़रीब एक दर्ज़न पुलिसकर्मी घायल हुए। जब लोगों को सुरक्षा देने वालों के जान के लाले पड़े हुए थे, तो आमजन की दंगों में क्या बिसात थी?

नूंह के बाद गुडग़ाँव में भी हिंसा भडक़ी। कई जगहों पर उपद्रव, हंगामा, तोडफ़ोड़ और आगजनी की ख़बरें सामने आयीं। गुडग़ाँव के खांडसा गाँव में एक धर्मस्थल दोपहर में आग लगा दी गयी। गुडग़ाँव के सेक्टर-37 स्थित एक पुलिस स्टेशन में अज्ञात व्यक्तियों के ख़िलाफ़ धारा-34, धारा-153(ए) धारा-188, धारा-436 के तहत एफआईआर दर्ज की गयी है। इस घटना के बाद गुडग़ाँव में धारा-144 लागू कर दी गयी। गुडग़ाँव के अलावा पलवल में भी दंगे हुए। उपद्रवियों ने मस्जिद में पत्थरबाज़ी की। एक स्कूटी में आग लगा दी। अन्य गाडिय़ों में तोडफ़ोड़ की। शहर थाना पुलिस ने यहाँ भी 30-35 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की।

इसी तरह हांसी में भी हिंसा का माहौल बना। वहाँ कुछ हिन्दुओं पर भीड़ में निकलकर लोग कहते दिखे कि किसी मुसलमान को नौकरी पर रखा है, तो दो दिन में निकाल दें। ऐसा न करने वाले दुकानदारों का बहिष्कार किया जाएगा। इसके अलावा 8 अगस्त को रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और झज्जर की 50 से ज़्यादा ग्राम पंचायतों ने गाँव में मुस्लिम व्यापारियों के आने पर रोक लगा दी।

नूंह में दंगे के बाद राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और गृहमंत्री अनिल विज ने इसे सोची-समझी साज़िश बताया। दंगे अचानक कम और सोची-समझी साज़िश के तहत ही होते हैं। किसी गड़बड़ी की आशंका के मद्देनज़र ख़ुफ़िया जानकारी और पुख़्ता प्रबंध करने की ज़िम्मेदारी किसकी होती है? सरकार यानी शासन और उसके बाद क़ानून व्यवस्था का ज़िम्मा पुलिस-प्रशासन का होता है। सरकार के पास हालात ख़राब होने की रत्तीभर भी जानकारी नहीं, तो फिर पुलिस-प्रशासन ने रुटीन के हिसाब से ही काम किया। नतीजतन व्यापक स्तर पर दंगा हुआ और हज़ारों लोगों की जान पर बन आयी। अपनी जान पर खेलकर हिन्दू समुदाय के लोगों ने दंगाइयों को शहर के अंदर आने से रोका वरना बहुत बड़े स्तर पर लोगों की मौत, आगजनी और लूटपाट का नंगा नाच हो सकता था। घोर लापरवाही की वजह से छ: लोगों की मौत, साइबर थाने में तोडफ़ोड़, आगजनी, दर्ज़नों वाहनों में आग, करोड़ों की क्षति, लूटपाट और सबसे अहम मेवात का साम्प्रदायिक सौहार्द पूरी तरह से बिगड़ गया। मेवात क्षेत्र में 90 प्रतिशत मुस्लिम और 10 प्रतिशत हिन्दू हैं। बाबरी ढाँचे को गिराने के बाद देश के अन्य हिस्सों की तरह मेवात क्षेत्र में भी हिंसा हुई थी। एक विशेष वर्ग को निशाना बनाया गया था।

यह क्षेत्र संवेदनशील है; लेकिन सुरक्षा का कोई विशेष प्रबंध नहीं है। हरियाणा के सबसे पिछड़े इस इलाक़े में गौरक्षकों और गौकशी (गाय तस्करी और वध) करने वालों के बीच तनातनी चली आ रही है। कुछ माह पहले राज्य के भिवानी ज़िले में नासिर और जुनैद नामक दो युवकों को वाहन में ज़िन्दा जला दिया गया था। जघन्य हत्या का आरोप गौरक्षकों पर लगा। राजस्थान पुलिस ने मामला दर्ज कर कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया है।

आरोपियों में बजरंग दल से जुड़े गौरक्षक मोहित यादव उर्फ़ मोनू मानेसर का नाम भी है; लेकिन वह अभी गिरफ़्त से बाहर है और लोगों में जबरदस्त रोष है। मेव समुदाय का आरोप है कि हत्याकांड का मास्टरमाइंड मोनू मानेसर ही है। भरतपुर (राजस्थान) के नासिर और जुनैद मेव समुदाय के ही थे। जलाभिषेक यात्रा से पहले मोनू मानेसर ने वीडियो जारी कर लोगों को इसमें शामिल होने का आह्वान भी किया था। इसके अलावा बिट्टू बजरंगी ने आपत्तिजनक संदेश भेजकर आग में घी का काम किया। यात्रा में दोनों के शामिल होने को लेकर मेवात क्षेत्र में भारी रोष था।

यह अलग बात है कि मोनू को यात्रा में एहतियात के तौर पर बुलाया नहीं गया। इसके बावजूद यात्रा पर हमला हो गया? नूंह में विश्व हिन्दू परिषद् और दुर्गा वाहिनी जलाभिषेक 84 कोस यात्रा के दौरान ऐसा क्या हुआ कि साम्प्रदयिक दंगा हो गया? यात्रा तो तीन साल से बराबर होती आ रही थी। कुछ दिन पहले कांवड़ यात्रा भी यहाँ से निकली; लेकिन कभी कुछ नहीं हुआ। अब ऐसा क्या हुआ कि व्यापक स्तर पर दंगा हो गया। पक्का है कि दंगों की पूरी तैयारी थी।

सोशल मीडिया के माध्यम से मेवात के अलावा दूसरे ज़िलों और राज्यों से लोगों को बुलाया गया। हथियारों के अलावा पेट्रोल बम, तलवारे और पत्थर आदि जमा कर लिए गये। सभी को अलग-अलग ज़िम्मेदारी दे दी गयी। सवाल यह कि सोशल मीडिया पर इतने बड़े कुचक्र का किसी को पता क्यों नहीं चला? सीआईडी इंस्पेक्टर विश्वजीत एक वीडियो में कह रहे हैं कि गड़बड़ी की आशंका थी, इसकी जानकारी ऊपर पहुँचा दी गयी।

सवाल यह कि आख़िर वह सूचना नूंह पुलिस तक क्यों नहीं पहुँची। राज्य के गृह मंत्रालय को कोई सूचना नहीं मिली। राज्य का सीआईडी विभाग गृहमंत्री अनिल विज के बजाय मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के तहत है। तो क्या सूचना राज्य के सीआईडी प्रमुख आलोक कुमार के माध्यम से मुख्यमंत्री दफ़्तर पहुँची? इस बारे में कोई स्पष्टीकरण अब तक नहीं आया है। अगर सूचना थी, तो क्या मुख्यमंत्री दफ़्तर से कहीं चूक हुई? सम्भव है ख़ुफ़िया जानकारी को हल्के में लिया गया।

नूंह के थानाधिकारी किशन कुमार के मुताबिक, उनके पास गड़बड़ी की किसी आशंका की कोई सूचना नहीं थी। अगर होती, तो अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जाता, यात्रा को स्थगित किया जा सकता था। अप्रिय घटना को टालने के लिए कुछ भी किया जा सकता था। हमारे पास जितने पुलिसकर्मी थे, सब यात्रा के रास्ते में तैनात थे; लेकिन भीड़ के मुक़ाबले वे काफ़ी कम रह गये और इतनी बड़ी घटना हो गयी। नूंह में नल्हड़ के नलहेश्वर मंदिर से चली यात्रा के दौरान ही आयोजकों को कुछ अप्रिय होने की आशंका हो गयी थी। जिस तेज़ी के साथ यात्रा चली कुछ ही दूरी पर पत्थरबाज़ी शुरू हो गयी और फिर आगजनी। यात्रा में शामिल सैकड़ों श्रद्धालु किसी तरह जान बचाकर उसी मंदिर में शरण लेने पर मजबूर हुए। ऊपर पहाड़ी से मंदिर परिसर में गोलीबारी भी हुई। अतिरिक्त सुरक्षा बलों की मदद से सैकड़ों, महिलाओं, बच्चो, युवकों और वरिष्ठ नागरिकों को बचाया जा सका।

विश्व हिन्दू परिषद के महामंत्री सुरेंद्र जैन के मुताबिक, दंगाइयों की बड़े नरसंहार की साज़िश थी। अगर मंदिर परिसर में नहीं पहुँचते, तो मेवात में वह हो जाता, जिसकी कल्पना करना मुश्किल था। पहाड़ी से मंदिर परिसर में सैकड़ों फायर किये गये। घेरकर कर मारने की साज़िश किसी तरह नाकाम हो गयी; लेकिन इतनी बडी गड़बड़ी की सरकार को भनक तक नहीं हुई, यह हैरानी की बात है। फ़िरोजपुर झिरका के कांग्रेसी विधायक मम्मन ख़ान का विधानसभा में दिया बयान भी लोगों को उकसाने वाला था। वह मंत्री को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मोनू मानेसर ने हमारे तीन लोगों की जान ले ली है, उसने मेवात में आतंक मचा रखा है। इस बार अगर वह मेवात आया, तो उसे प्याज की तरह फोड़ देंगे। मम्मन ख़ान की कोई सीधी भूमिका अब तक सामने नही आयी है; लेकिन उन्होने दंगों के बाद मेवात के लोगों के साथ खड़े होने की बात ज़रूर कही है।

दंगों के बाद कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल को नूंह में जाने से रोक दिया गया, वहीं भाजपा के नेता वहाँ आराम से जा रहे हैं। दंगों पर राजनीति शुरू हो गयी है। मेवात क्षेत्र में नूंह से आफ़ताब अहमद, फ़िरोजपुर झिरका से मम्मन ख़ान और पुन्हाना से मोहम्मद इलियास कांग्रेस विधायक हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के अनुसार, मेवात में दंगे के लिए राज्य सरकार पूरी तरह से ज़िम्मेदार है। दंगे के दूरगामी प्रिणाम होंगे और इसे भाजपा-जजपा सरकार को भुगतना होगा।

दंगों के बाद लोगों में सरकार के प्रति भारी रोष था। ऐसे में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर बजाय उनको सुरक्षा देने की गारंटी की अपेक्षा यह कहते हैं कि सरकार हर व्यक्ति को सुरक्षा मुहैया नहीं करा सकती। पुलिस की संख्या सीमित है। ऐसे में पुलिस हर व्यक्ति को कैसे सुरक्षा देगी? मुख्यमंत्री को अपने पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान पर विचार करना चाहिए, जिसमें वह कहते हैं कि प्रदेश के 22 करोड़ लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी और सरकार की है।

सैकड़ों आरोपी गिरफ़्तार

पुलिस ने अब तक 142 प्राथमिकी दर्ज कर 312 लोगों को गिरफ़्तार किया है। इनमें नूंह के 57 मामलों में 170, गुडग़ाँव में 32 मामलों में 92 और पलवल में 20 मामलों में पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया है। दंगे में शामिल काफ़ी लोग अपने ठिकानों से $गायब हैं। हरियाणा के अलावा राजस्थान और उत्तर प्रदेश के दंगों में शामिल होने का संदेह है। अभी बहुत सी गिरफ़्तारियाँ होनी हैं। गिरफ़्तार दंगा आरोपियों में ज़्यादातर 17 से 22 वर्ष के बीच के हैं। दंगों में नाबालि$गों की भूमिका भी रही है।

पुलिस अधीक्षक नरेंद्र बिजराणिया ने लोगों से आरोपियों को तुरन्त जाँच में शामिल होने को कहा है, अन्यथा उनके पास पूरे सबूत हैं। पुलिस दंगाइयों पर कड़ी कार्रवाई करेगी, चाहे वह किसी भी समुदाय का क्यों न हो। बिजराणिया नूंह में रहे हैं; लिहाज़ा लोगों को उनके काम करने के तरीक़े के बारे में अच्छी तरह पता है। दंगे में धार्मिक शख्स मोहम्मद शाद की भी हत्या हुई है। पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार भी किया है। हिन्दू समुदाय के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। बावजूद इसके पुलिस कार्रवाई करने से गुरेज़ नहीं कर रही है।

बिगड़ रहा भाईचारा

मेवात में साम्प्रदायिक सौहार्द बहुत ज़्यादा अच्छा नहीं है। दंगे ने आपसी भाईचारा बिगाडक़र रख दिया है। राज्य के तीन ज़िलों रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और झज्जर की 50 से ज़्यादा पंचायतों ने मुस्लिमों का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया है। महापंचायत में लोगों से मुस्लिमों को दुकान या मकान आदि न देने, उनकी दुकान से कोई सामान न ख़रीदने और उनकी पहचान आदि पुलिस थाने में जमा कराने का प्रस्ताव पारित किया है। इससे स्थिति ख़राब होती जा रही है। हिन्दू बहुल क्षेत्रों में मुस्लिमों का कारोबार पूरी तरह से बन्द हो गया है। वे डर के मारे अपनी दुकानें नहीं खोल पा रहे हैं। उन्हें क्रिया की प्रतिक्रिया होने का डर भी सता रहा है। प्रशासन ने पंचायतों के इस क़दम को ग़लत बताते हुए ठोस क़दम उठाने की बात कही है। नूंह में दंगे के बाद हिन्दू समुदाय के लोगों का भरोसा सरकार से उठ गया है। वे अपनी सुरक्षा के लिए हथियार लाइसेंस की माँग कर रहे हैं। राज्य सरकार को आपसी भाईचारा बहाल करना होगा।

साज़िश की गुत्थी

पुलिस ने सैकड़ों गिरफ़्तारियाँ ज़रूर कर ली है। दंगों में शामिल लोगों ने पूछताछ में बहुत कुछ ख़ुलासे भी किये हैं; लेकिन अभी तक वे बड़े चेहरे बेनक़ाब नहीं हुए हैं, जिन्होंने अपरोक्ष तौर पर इसे अंजाम दिया है। सैकड़ों लोगों को लामबंद करना और हथियार आदि मुहैया कराने का काम वीडियो आदि में दिख रहे युवकों का नहीं है। दंगे को राजनीतिक संरक्षण हासिल रहा है। जलाभिषेक यात्रा की मंज़ूरी से लेकर नूंह के पुलिस अधीक्षक का छुट्टी पर होना, यात्रा के रूट पर जगह-जगह पत्थरबाज़ी कर उसे रोकना, सोशल मीडिया पर लोगों को अलग-अलग स्थानों पर इकट्ठा करना ऐसे बहुत-से काम है, जो किसी की सोची-समझी साज़िश के तहत ही हुआ है। दंगे की एक वजह अफ़वाहें भी रही हैं। यात्रा शुरू होने से पहले यह स्पष्ट हो चुका था कि मोनू मानेसर और बिट्टू बजरंगी आदि नहीं आ रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया पर उनके पहुँचने की बातें होने लगी। इससे लोगों में रोष बढऩे लगा। ये बातें कौन फैला रहा था? कौन चाहता था कि मेवात में दंगे जैसी स्थिति पैदा हो और हालात बद से बदतर हो जाएँ? पुलिस जाँच में बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा; लेकिन इसके लिए तह में जाने की ज़रूरत होगी। सीबीआई या एनआईए जैसी एजेंसी ही परतें खोल सकती है।

मेवात संवेदनशील इलाक़ा है। भविष्य में फिर कभी भी ऐसी घटना हो सकती है। लिहाज़ा सरकार को साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाये रखने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे।

ख़ाकी का ख़ौफ़ नहीं

मेवात में ख़ाकी का ज़्यादा ख़ौफ़ नहीं है। कुछ माह पहले मेवात में साइबर क्राइम का बड़ा मामला सामने आया था। 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा साइबर ठगी के आरोपी इसी क्षेत्र के थे। 5,000 से ज़्यादा पुलिसकर्मियों ने ज़िले के विभिन्न स्थानों पर छापे मारकर सैकड़ों युवकों को गिरफ़्तार किया था। छोटे मोटे मामलों में पुलिस की छापेमारी का लोग विरोध करते हैं। लिहाज़ा पुलिस को बहुत ध्यान से काम करना पड़ता है। अरावली पहाड़ी क्षेत्र होने के नाते यहाँ ग़ैर-क़ानूनी खनन का काम बहुत होता है। अवैध खनन की शिकायत की जाँच करने गये एक डीएसपी को डंपर से कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया था। साक्षरता दर यहाँ ज़्यादा नहीं है; लेकिन साइबर अपराध में यहाँ के लोग बहुत शातिर हैं। साइबर ठगी में इसे झारखण्ड का जामताड़ा जैसा माना जाता है। यह क्षेत्र गौ-तस्करी के लिए कुख्यात है। अक्सर गौरक्षकों और तस्करों के बीच मारपीट और गोलीबारी की घटनाएँ होती रहती है। इस मुद्दे पर दोनों समुदायों में ठनी रहती है। मेव समुदाय के काफ़ी लोग पशुओं का कारोबार करते हैं; लेकिन गौरक्षकों की चौकसी की वजह से उनका काम प्रभावित हो रहा है।

बुलडोजर कार्रवाई

दंगाइयों की प्रॉपर्टी पर उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बुलडोजर की कार्रवाई ख़ूब चली। अनधिकृत क़ब्ज़े हटा दिये गये। रोहिंग्या मुसलमानों के दंगों में शामिल होने के संदेह में उनके क़ब्ज़े भी हटाये गये हैं। प्रवासी मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद कार्रवाई रुक गयी है।

तालमेल की कमी

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और गृहमंत्री अनिल विज में तालमेल की कमी है। सीआईडी विभाग को लेकर दोनों में एक दौर में ठन गयी थी; लेकिन बाद में मामला शान्त हो गया। गृहमंत्री विज किसी तरह की ख़ुफ़िया रिपोर्ट से अनभिज्ञ बता रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री कार्यालय इसकी पुष्टि नहीं कर रहा। दंगों पर ज़्यादातर बयान मुख्यमंत्री की ओर से ही आये हैं। गृहमंत्री विज ने इस मामले की जाँच कराने के आदेश दिये हैं। उन्होंने अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजने के अलावा दंगे को सोची-समझी साज़िश बताने जैसे बयान के अलावा बहुत कुछ नहीं किया है।

गोलीबारी के बाद पुलिस मुठभेड़

मेवात में दंगा आरोपियों की धरपकड़ जारी है। ज़्यादातर दंगाई पुलिस कार्रवाई से डरकर मेवात से भाग चुके हैं। दंगे में शामिल रहे दो लोगों के पहाड़ी क्षेत्र में छिपे होने की सूचना के बाद पुलिस मौक़े पर पहुँची। गिरफ़्त से बचने के लिए दोनों ने पुलिस पर गोलीबारी करके वहाँ से भागने का प्रयास किया; लेकिन जवाबी कार्रवाई में एक सैफुल के पाँव में गोली लगी और दूसरे को पीछा करके पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया गया। दूसरा आरोपी मुनसैद है। इनसे एक देसी कट्टा और मोटरसाइकिल बरामद हुई है। दोनों मेव समुदाय के हैं और दंगों के लिए राजस्थान से यहाँ बुलाये गये थे। दोनों मेवात से निकलने की जुगत में थे; लेकिन पुलिस नाकों की वजह से छिपते फिर रहे थे। पुलिस इस तरह के दंगाइयों की तलाश में संवेदनशील स्थानों पर नज़र रखे हुए है।

गुजरात में बदल सकता है लव मैरिज क़ानून!

क़ानून बदलने पर माता-पिता की सहमति के बिना नहीं होगी कोर्ट मैरिज

जिप्यार हो जाता है, उन्हें जाति, धर्म, घर, समाज और सीमाओं से कोई लेना-देना नहीं होता। प्रेमियों को वह सब कुछ अच्छा लगता है, जो उनका मन कहता है; लेकिन समाज में प्यार और लव मैरिज को आज के आधुनिक युग में भी सहज मान्यता नहीं है। ज़्यादातर माता-पिता भी बच्चों के प्यार को स्वीकार नहीं करते। इन्हीं सब हालात को देखते हुए गुजरात सरकार एक ऐसा क़ानून लाना चाहती है, जिसमें कोर्ट मैरिज में भी माता-पिता की सहमति ज़रूरी होगी।

अभी तक प्यार करने वाले माता-पिता, परिजनों या समाज की धमकियों, उनके डर से निजात पाने के लिए क़ानून की मदद लेते थे। लेकिन अब क़ानून में ही यह हो सकता है कि कोर्ट प्यार करने वालों से कहे कि आपके माता-पिता की इच्छा के ख़िलाफ़ जाकर आपकी शादी नहीं करा सकते। अगर ऐसा हुआ, तो फिर लव मैरिज करने के इच्छुक जोड़ों की शादी कैसे हो सकेगी? क्योंकि उन्हें क़ानून की मदद तभी मिल सकेगी, जब उनके माता-पिता राज़ी होंगे।

दरअसल, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पिछले महीने की 30 जुलाई को मेहसाणा में स्नेहमिलन नाम के कार्यक्रम में लव मैरिज के क़ानून में फेरबदल के संकेत दिये थे। माना जा रहा है कि गुजरात में लव मैरिज एक्ट में बदलाव के बाद राज्य में लव मैरिज करने वाले जोड़ों को अपने माता-पिता की अनुमति लेनी ज़रूरी होगी। माना जा रहा है कि गुजरात में पटेल यानी पाटीदार समाज की माँग पर ऐसा किया जा रहा है।

बता दें कि गुजरात में पाटीदार समाज की संख्या काफ़ी ज़्यादा है और इसके वोटर 21 फ़ीसदी हैं। मुख्य रूप से किसान इसी पाटीदार समाज ने आरक्षण और राजनीति में भागीदारी को लेकर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा की गुजरात सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खड़ा कर दिया था। पहले तो सरकार ने पाटीदार समाज को कुचलने की कोशिश की; लेकिन जब सत्ता हाथ से खिसकती देखी, तो पाटीदार नेताओं को साधना पड़ा। पाटीदार आन्दोलन के चलते ही नरेंद्र मोदी ने भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाकर पाटीदारों में दो-फाड़ करना चाहा था; लेकिन बाद में पाटीदार आन्दोलन के सूत्रधार हार्दिक पटेल को भी भाजपा में शामिल करना पड़ा। हालाँकि ऐसा नहीं है कि इससे सभी पाटीदार भाजपा के साथ खड़े हो गये। अभी भी 40-42 फ़ीसदी पाटीदार कांग्रेस के साथ खड़े हैं। कुछ पाटीदार अब हार्दिक पटेल से नाराज़ हैं। उनका मानना है कि हार्दिक पटेल ने सत्ता के लालच में उसी भाजपा से हाथ मिला लिया, जिसने हमेशा पाटीदारों के साथ नाइंसाफ़ी की है।

पाटीदार समाज के भूपेंद्र पटेल पिछले साल हुए गुजरात चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद दोबारा मुख्यमंत्री बने हैं। मुख्यमंत्री ने मेहसाणा के स्नेहमिलन कार्यक्रम में कहा कि हम क़ानून के मुताबिक कोई अच्छे रिजल्ट वाली व्यवस्था बनाएँगे। गुजरात सरकार एक ऐसी व्यावहारिक प्रणाली लागू करने के लिए जाँच करेगी, जो लव मैरिज के लिए माता-पिता की मंज़ूरी को अनिवार्य बनाती है। लेकिन यह सिर्फ़ तभी होगा, जब यह संविधान के अनुरूप होगा। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि संवैधानिक रूप से अगर सम्भव हुआ, तो सरकार लव मैरिज में माता-पिता की मंज़ूरी को ज़रूरी बनाने वाली व्यवस्था को लेकर क़ानून बनाएगी।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के इस संकेत से पहले ही लव मैरिज में माता-पिता की सहमति पर क़ानून बनाने की चर्चा गुजरात विधानसभा में हो चुकी है। मार्च, 2023 में विधानसभा में भाजपा विधायक फतेहसिंह चौहान और कांग्रेस विधायक गेनी ठाकोर ने लव मैरिज पर इस तरह के क़ानून बनाने की माँग की थी। कहा जा रहा है कि गुजरात में कई माता-पिता इस तरह का क़ानून बनाने को लेकर माँग करते रहे हैं, जिनमें पाटीदार समाज के लोग शामिल हैं। मेहसाणा ज़िले में पाटीदार समाज ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व करता है।

स्नेहमिलन कार्यक्रम सरदार पटेल ग्रुप ने आयोजित किया था। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को निमंत्रित किया गया था। मुख्यमंत्री को राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने ही विवाह के लिए लड़कियों को भगाने की घटनाओं का अध्ययन कराने का सुझाव दिया है। इसी के मद्देनज़र ऐसी व्यवस्था बनाने की माँग उठ रही है, जिसमें लब मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति अनिवार्य हो। इस क़ानून बनाने के संकेत को लेकर कांग्रेस विधायक इमरान खेड़ावाला ने अपनी सहमति जताते हुए कहा है कि अगर राज्य सरकार विधानसभा में इस सम्बन्ध में कोई विधेयक लेकर आती है, तो वह उसका समर्थन करेंगे। विधायक ने कहा कि लव मैरिज में माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य बनाने को लेकर मुख्यमंत्री ने अध्ययन का भरोसा दिलाया है। अगर ऐसा होता है, तो वह उसका समर्थन करेंगे।

बता दें कि गुजरात सरकार ने साल 2021 में गुजरात धार्मिक स्वंतत्रता अधिनियम में संशोधन किया गया था। इस दौरान लव मैरिज करके विवाह के नाम पर जबरदस्ती और ग़लत तरी$के से धर्मांतरण कराने को दण्डनीय अपराध बनाया गया था। तब गुजरात सरकार ने यह क़ानून बनया था कि अगर कोई लडक़ा या लडक़ी किसी से लव मैरिज या परिवारों की सहमति से विवाह करने के बाद अपने जीवनसाथी का जबरन या छलपूर्वक तरी$के से धर्म परिवर्तन कराएगा, तो संशोधित अधिनियम के तहत दोषी / दोषियों को 10 साल की जेल का प्रावधान होगा। लेकिन बाद में इस क़ानून को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी और हाईकोर्ट ने इसके अमल पर रोक लगा दी। इसके बाद हाईकोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी, जो अभी तक वहाँ विचाराधीन है। क़ानून के मुताबिक, शादी के लिए कम से कम 21 साल लडक़े की उम्र और कम से कम 18 साल लडक़ी की उम्र होनी चाहिए। मैरिज एक्ट-1954 अधिनियम के मुताबिक, कोई भी प्यार करने वाला शादी के योग्य जोड़ा समाज या माता-पिता या परिजनों के भय से अगर शादी के लिए कोर्ट में जाता है, तो अलग-अलग मैरिज एक्ट के तहत, जिसमें वो जोड़ा फिट बैठता है; कोर्ट शादी करा देता है। इसमें अंतर-धर्म विवाह के लिए भी क़ानूनी व्यवस्था है।

क़ानून तो लिव इन रिलेशनशिप को भी ग़लत नहीं ठहराता। हालाँकि इस मामले पर भी अभी कई लोग याचिका दायर कर चुके हैं। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि अपनी मर्ज़ी से शादी यानी लव मैरिज करने या किसी के साथ अपनी मर्ज़ी यानी लिव इन रिलेशन में रहने की आज़ादी और अधिकार हर बालिग़ को है और इसे अनुच्छेद-21 से अलग नहीं माना जा सकता।

भारत में विशेष विवाह अधिनियम-1954 के मुताबिक, कोर्ट मैरिज एक बालिग़ पुरुष और एक बालिग़ महिला के बीच हो सकती है। लव मैरिज क़ानून का मुख्य भाग कहता है कि कोई भी बालिग़ (लडक़ा 21 और लडक़ी 18 या इससे ऊपर का) जोड़ा कोर्ट मैरिज कर सकता है। कोर्ट मैरिज की ज़रूरत समाज के विरोध के बाद महसूस हुई, जिसमें अगर किसी एक या दोनों के परिजनों के राज़ी न होने पर तब यह शादी हो सकती है, जब दोनों बालिग़ एक-दूसरे के साथ वैवाहिक जीवन गुज़ारने के लिए सहमत हों।

कोर्ट मैरिज की शर्तें भी हैं। इसकी पहली शर्त है कि किसी एक या दोनों की वैवाहिक जीवन किसी दूसरे के साथ नहीं चल रहा हो। यानी दोनों पहले से कहीं और शादीशुदा न हों और अगर वे पहले से शादीशुदा हैं, तो दोनों का तलाक़ या फ़ैसला हो चुका हो। प्यार करने वालों के बीच भारत में लव मैरिज की लोकप्रियता समाज या परिजनों के विरोध के चलते बढ़ी है और इसमें आज भी बढ़ोतरी हो रही है। कोर्ट मैरिज के चलन को देखते हुए अब कई माता-पिता और परिजन भी इसे अनुमति देने लगे हैं। कई शादियों में तो यह तक देखने को मिलता है कि परिवारों की मर्ज़ी से शादी होने के बावजूद परिजन नवविवाहित जोड़े की शादी को मज़बूत बनाने के लिए कोर्ट मैरिज भी कराने लगे हैं। अभी तक देश में क़ानून है कि बालिग़ लडक़े-लडक़ी की राज़ी होने पर समाज, माता-पिता या परिजन उन्हें विवाह से नहीं रोक सकते। हालाँकि इस तरह की शादी में क़ानूनी मदद और सुरक्षा की ज़रूरत रहती है, जिसके न मिलने या पुलिस की लापरवाही के चलते हर साल कई प्रेमी जोड़ों की हत्याएँ आज भी हो जाती हैं। आज भी कई माता-पिता या परिजन या समाज के लोग प्रेमी जोड़ों को उनकी अपनी इच्छा से शादी की छूट नहीं देते।

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर गुजरात सरकार माता-पिता की सहमति वाला लव मैरिज क़ानून बना पायी, तो क्या सभी प्रेमी जोड़ों की शादी सम्भव हो सकेगी? ज़ाहिर है कि माता-पिता की पसन्द जहाँ नहीं होगी, वहाँ वो शादी होने ही नहीं देंगे। लव मैरिज का मतलब ही यही है कि दो बालिग़ प्रेमी अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन साथी चुन सकें। लेकिन इस क़ानून के बनने से गुजरात के कई प्रेमी जोड़ों की शादी उनकी मर्ज़ी से नहीं हो सकेगी। प्यार करने वाले अक्सर दिल से सोचते हैं। ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं कि प्यार करने वाले किसी लडक़े या लडक़ी की शादी में अड़चन पडऩे से उनके अवसादग्रस्त होने या आत्महत्या करने के मामले बढ़ें। इस पर भी सरकार को विचार करना होगा।

पीपीपी अर्थव्यवस्था का सच

परचेजिंग पॉवर पैरिटी (पीपीपी) के हिसाब से भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। चीन ने अर्थव्यवस्था के मामले में अमेरिका को पछाडक़र पहला स्थान हासिल करके पूरी दुनिया को चौंका दिया है। माना जा रहा है कि अर्थव्यवस्था में कई विकसित देशों और ज़्यादातर विकासशील देशों को पीछे छोडऩा भारत के लिए भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। लेकिन इससे बड़ी बात अर्थव्यवस्था के मामले चीन का नंबर एक पर जाना है, जो अमेरिका के साथ ही भारत के लिए भी सिरदर्दी का कारण बन सकता है।

हालाँकि कहने को अब भारत पीपीपी में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है; लेकिन बेरोज़गारी दर, भुखमरी, कुपोषण और आत्महत्या दर में भारत अपने पड़ोसी देशों से भी पीछे जा चुका है। वल्र्ड ऑफ स्टैटिसटिक्स के डेटा के मुताबिक, परचेजिंग पॉवर पैरिटी के हिसाब से यह इकोनॉमी के साइज का आकलन है। इस आकलन के हिसाब से अर्थव्यवस्था के मामले में भारत ने जापान और रूस को भी पीछे छोड़ दिया है। इस लिस्ट में टॉप-5 देशों में पहले नंबर पर चीन, दूसरे पर अमेरिका, तीसरे पर भारत, चौथे पर जापान और पाँचवें नंबर पर रूस है। इसके अलावा टॉप 10 में छठे नंबर पर जर्मनी, सातवें नंबर पर इंडोनेशिया, आठवें नंबर पर ब्राजील, नौवें नंबर पर फ्रांस और दसवें नंबर पर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था है।

परचेजिंग पॉवर पैरिटी के हिसाब से भारत की अर्थव्यवस्था 11.8 ट्रिलियन डॉलर है। लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था भारत से क़रीब तीन गुना अधिक 30.3 ट्रिलियन डॉलर है। वहीं अमेरिका की अर्थ व्यवस्था अब 25.4 ट्रिलियन डॉलर है, जो भारत की अर्थव्यवस्था से दोगुनी से ज़्यादा है। इसी तरह जापान की अर्थ व्यवस्था 5.7 ट्रिलियन डॉलर, रूस की अर्थव्यवस्था 5.32 ट्रिलियन डॉलर, जर्मनी की अर्थव्यवस्था 5.3 ट्रिलियन डॉलर, इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था 4.03 ट्रिलियन डॉलर, ब्राजील की अर्थव्यवस्था 3.83 ट्रिलियन डॉलर, फ्रांस की अर्थव्यवस्था 3.77 ट्रिलियन डॉलर और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 3.65 ट्रिलियन डॉलर है। लेकिन अगर आबादी के घनत्व के हिसाब से देखें, तो भारत की अर्थव्यवस्था टॉप 10 की सूची के देशों से कम प्रभावी मालूम होगी।

भारत की जनसंख्या इन दिनों अनुमानित 1.42 अरब से ज़्यादा है, जबकि भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किलोमीटर है। वहीं 3,77,973 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले जापान की जनसंख्या 12.46 करोड़, 1.70 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले रूस की जनसंख्या 14.61 करोड़, 3,57,588 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले जर्मनी की जनसंख्या 8.32 करोड़, 19,04,569 वर्ग किलोमीटर वाले इंडोनेशिया की जनसंख्या लगभग 27 करोड़, 85,15,767 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले ब्राजील की जनसंख्या 21,65,45,252 है, जो कि भारत से लगभग 2.6 गुना बढ़ा है और आबादी में भारत से लगभग 6.7 प्रतिशत से भी कम है। वहीं 6,47,56,584 जनसंख्या वाले फ्रांस का क्षेत्रफल 5,51,695 वर्ग किलोमीटर और 2,09,331 वर्ग किलोमीटर वाले ब्रिटेन की जनसंख्या 6,77,36,802 है। वहीं अगर चीन का क्षेत्रफल 95,96,960 वर्ग किलोमीटर और वहाँ की जनसंख्या 1,45,48,25,869 है, जबकि 93,72,610 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले अमेरिका की जनसंख्या 33.70 लाख है।

इस हिसाब से भारत की अर्थव्यवस्था भले ही विश्व में तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन चुकी हो; लेकिन आबादी के हिसाब से यह बहुत कम है। केंद्र सरकार में बैठे लोग इस बात से ख़ुश हो सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर करने का वादा किया था और यह बढ़ गयी। वे इसका प्रचार भी कर सकते हैं; लेकिन याद रखना होगा कि यह अर्थव्यवस्था जमा पूँजी नहीं या चलन वाली मुद्रा में नहीं, बल्कि परचेजिंग पॉवर पैरिटी है। परचेजिंग पॉवर पैरिटी का मतलब होता है क्रय शक्ति समता। इसे और सरलता से समझें, तो देखना होगा कि भारत का जीडीपी रेट क्या है? मान लीजिए कि भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.5 फ़ीसदी रहती है, तो इसकी जीडीपी 2.9 लाख करोड़ डॉलर ही होगी; जबकि जापान, जो कि अर्थव्यवस्था में भारत से पिछड़ा हुआ बताया जा रहा है, उसकी जीडीपी छ: लाख करोड़ डॉलर से अधिक होगी।  

अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में परचेजिंग पॉवर पैरिटी किसी देश की मुद्रा की क़ीमत के अतिरिक्त वहाँ रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति की जानकारी देती है; लेकिन यह जनसंख्या के घनत्व पर निर्भर करता है। भारत की आबादी भारत के क्षेत्रफल के हिसाब से कई गुना ज़्यादा है, जबकि परचेजिंग पॉवर पैरिटी के हिसाब से भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था से लगभग तीन गुना कम है। इस हिसाब से भारत अर्थव्यवस्था में चीन से ही नहीं, बल्कि जापान और दूसरे निचले देशों से भी पीछे हुआ। परचेजिंग पॉवर पैरिटी की गणना आवश्यक वस्तुओं की एक बास्केट के हिसाब से होता है, जिसमें अमूमन उन वस्तुओं को शामिल किया जाता है, जो जीवन जीने के लिए ज़रूरी हैं। इन वस्तुओं को हर देश के पैसे की वैल्यू के हिसाब से देखा जाता है कि उस देश के कितने पैसे में कितनी वस्तुएँ ख़रीदी जा सकती हैं। ज़ाहिर है कि भारत का रुपया डॉलर के मुक़ाबले पिछले 8-10 वर्षों में तेज़ी से कमज़ोर हुआ है, जिसके चलते रुपये की वैल्यू काफ़ी कम है।

इसका मतलब है कि भारत में पैसे की कमी नहीं है; लेकिन पैसे की वैल्यू बहुत कम है। भले ही रुपया दो प्रतिशत लोगों के पास आधे से ज़्यादा है। अब यही देखिए, भारत के 1 रुपये की क़ीमत 0.0867 चीनी युआन है, मतलब 1 युआन 11.55 भारतीय रुपये के बराबर है। वहीं 1 डॉलर 82.81 रुपये के बराबर है। इस तरह भारतीय रुपये की क़ीमत कम होना भी भारत को अर्थ व्यवस्था के नज़रिये से कमज़ोर करता है।

इसका मतलब यह हुआ कि भारत में 100 रुपये में जितना सामान ख़रीदा जा सकता है, उतना ही सामान अमेरिका के लगभग 1.21 डॉलर में और चीन के लगभग 8.4 युआन में ख़रीदा जा सकता है। इसे ही परचेजिंग पॉवर पैरिटी कहा जाता है।

इसलिए लोग भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था मानने की भूल उस नज़रिये से न करें, जो जमा पूँजी की मज़बूती के आधार से होती है। भारत को इन दिनों अपनी अर्थव्यवस्था, जिसमें ठोस जीडीपी शामिल है, सुधारने की आवश्यकता है और साथ ही यह देखने की चीन उससे ताक़त में लगातार मज़बूत होता जा रहा है।

चीन की ताक़त और हिम्मत

एक बार फिर से ख़बरें आ रही हैं कि चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ताइवान पर चढ़ाई की तैयारी में है। कहा जा रहा है कि चीनी सैनिक युद्ध अभ्यास कर रहे हैं। चीनी सेना पीपुल्स की स्थापना के 96 साल पूरे होने पर चीनी सरकार ने स्टेट मीडिया सीसीटीवी पर झू मेंग (चेसिंग ड्रीम्स) नाम से इसकी एक डॉक्यूमेंट्री जारी की है। भारत को भी चीन की इस हरकत से सचेत रहना चाहिए, पहले ही चारों तरफ़ से भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में लगा चीन भारत की ज़मीन हथियाने की कोशिश में लगा है।

भारत की केंद्र सरकार को इन दिनों चीन की छोटी-से-छोटी गतिविधि पर नज़र रखने की ज़रूरत है। जानकारी के मुताबिक, चीन भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में अपना दबदबा बढ़ाने की कोशिशों में लगा है। ताइवान पर चढ़ाई के युद्धाभ्यास को झुठलाया नहीं जा सकता। चीन पहले भी इस तरह की तैयारियाँ और युद्ध अभ्यास करता रहा है। भारत की केंद्र सरकार का मानना है कि चीन भारत से नहीं उलझेगा। लेकिन सरकार को चीन की पूर्व की हरकतों को ध्यान में रखते हुए चीन की तरफ़ से आँखें नहीं मूँद लेनी चाहिए।

याद रखना होगा कि भारत और चीन की सेनाओं के बीच जून, 2020 से लगातार दर्ज़नों झड़पें हुई हैं, जिनमें चीनी पीपुल्स आर्मी की हरकतें और अतिक्रमणवादी गतिविधियाँ साफ़-साफ़ नज़र आयी हैं। हालाँकि 2020 में भारत सरकार ने चीनी कम्पनियों और चीनी सामान पर अंकुश लगाने की बात कही थी; लेकिन ऐसा हो नहीं सका है। इस दिशा में भी भारत सरकार को ठोस क़दम उठाने की आवश्यकता है। अन्यथा चीन का बढ़ता हौसला भारत को इसी तरह हर क्षेत्र में कमज़ोर करने की कोशिश में घेरता रहेगा। जिस तरह चीन ने भारत के पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में करने के लिए उनका इस्तेमाल किया है, उससे भी भारत को सीख लेने और पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारने की आवश्यकता है।

चीन अपनी उत्पादक क्षमता के दम पर भारत से आगे निकल रहा है, जबकि भारत चाहे तो चीन से अच्छे उत्पाद बनाकर अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में अपना दबदबा बढ़ा सकता है। लेकिन यहाँ की सरकार को राजनीति से फ़ुरसत मिले, तब इस ओर ध्यान भी दिया जाए। लेकिन भारत की केंद्र सरकार तो विपक्ष की सरकारों को गिराने, सांसदों, विधायकों को तोडऩे, ख़रीदने और सरकारों के अधिकार छीनने में ही व्यस्त है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए।

राजे को रास नहीं आएँगे और आसमाँ

बक़ौल एक विश्लेषक वसुंधरा राजे ने कभी भी राजस्थान की राजनीति से बाहर क़दम रखने की ख़्वाहिश नहीं की। अलबत्ता राजनीति उनका ख़ास शगल है। सूत्रों की मानें, तो इस बार उन्हें विधानसभा चुनावों में अगुवाई से अलग रखा जा रहा है। वजह कहा जाता है कि भाजपा आलाकमान इन सियासी अक्षरों की इबारत को मिटाना चाहता है कि राजस्थान में भाजपा को चुनावी फ़तेह सिर्फ़ वसुंधरा का चेहरा ही दिला सकता है।

बतौर सूत्र, इस मसले में सिर्फ़ वसुंधरा को ही हुनरमंद माना जाना है। पिछले दिनों तब वसुंधरा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया, तो उनके समर्थक ख़ुशियों से उछल पड़े। लेकिन हक़ीक़त समझ में आयी, तो इबारत कुछ और निकली कि उन्हें अब संगठन में काम करने भेज दिया गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के मुताबिक, संगठन में शामिल नेता चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। उन्हें सिर्फ़ राज्यों का चुनावी प्रबंध देखना होगा। दिलचस्प बात है कि चुनावी प्रबंध का दायित्व भी वसुंधरा को अन्य राज्यों का सौंपा गया है। सूत्र कहते हैं कि राजस्थान का चुनावी प्रबंध देखने के दौरान राजे अपने लिए कोई गली निकाल सकती हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि वसुंधरा के अतीत के पन्नों को टटोला जाए, तो समझ में आ जाएगा कि उन्हें सत्ता की सियासत से दरकिनार कर हाशिये पर डालना आसान नहीं है। हालाँकि भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि उन्हें चुनावी अगुवाई से परे करने का मक़सद सचिन पायलट की सम्भावित तीरंदाज़ी से बचना है। लेकिन राजे को यह ख़ुराक हज़म नहीं हो रही। सूत्रों का कहना है कि आइंदा 15 दिनों में राजे कोई नया गुल खिला सकती हैं। लेकिन क्या?

विश्लेषकों का कहना है कि यह सब कहते हुए राजे एक बार फिर अबूझ पहेली की तरह नज़र आयीं। लेकिन एक ख़ामोश एहसास ज़रूर उनके चेहरे पर हावी होता नज़र आया। जानकारों का कहना है कि हाल की चन्द घटनाओं का गणित समझें, तो भाजपा नेतृत्व और वसुंधरा राजे के बीच राजनीतिक टकराव की चिंगारी भडक़ चुकी है। भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष नड्डा और राजे के बीच आपस में गहराते संकट की अफ़वाहों का बाज़ार किस क़दर तप चुका है? राजे राजनीतिक ताक़त के रूप में अपनी अहमियत किस क़दर गँवा चुकी हैं? इसका अंदाज़ा नड्डा के दो-टूक लफ्ज़ों से हो जाता है कि आपको किसी सूबे का गवर्नर बना दिया जाए? अथवा आप चाहें, तो केंद्रीय राजनीति में आपको सक्रिय कर दिया जाए?

विश्लेषकों का कहना है कि राजे कोई नौसिखिया राजनेता नहीं हैं। इस बात का तो सपने में भी गुमान नहीं किया जा सकता कि राजे भाजपा की बदली हुई राजनीतिक संस्कृति न समझ पायी हों? और अब तक अपने अँगूठे को ही घायल करती रही हों? ऐसा क़तई नहीं था। उन्होंने ‘क्या’ और ‘क्या नहीं’ के बीच सीमा रेखा खींचते हुए कहा कि मैं पार्टी के हर फ़ैसले के साथ हूँ; किन्तु स्वाभिमान से समझौता नहीं कर सकती। उन्होंने राजनीतिक विरोधाभास का ख़ुलासा करते हुए कहा कि प्रदेश के कुछ नेता पदाधिकार मिलने के साथ ही पार्टी की रीति-नीति भूल गये। क्यों हुआ ऐसा? क्या उन्हें अनुशासन का पाठ नहीं पढ़ाना चाहिए?

इस बयान में राजे का इशारा किसकी तरफ़ था? किसके टटके और अनगढ़ तौर-तरीक़े सशंकित करने वाले थे? आख़िर राजे का विराट असमंजस क्या था? कांग्रेस के सियासी संग्राम की फ़िज़ाँ में भाजपा के अदृश्य दाँव-पेंच में राजे की चुप्पी का रहस्य क्या था? हालाँकि राजे ने अपनी चुप्पी को सावन मास में पूजा-अर्चना की ख़ातिर धौलपुर प्रवास को वजह बताया। लेकिन सूत्र कहते हैं कि राजे का अतीत इसकी पुष्टि नहीं करता। अनेक मौक़ों पर अपने दमख़म का परिचय दे चुकी राजे की चुप्पी ज़िम्मेदारी से दूर भागने की कहानी तो नहीं हो सकती। राजे के स्पष्टीकरण में किसी धारावाहिक से कम नाटकीयता नहीं थी। उनके हर सवाल उनकी जवाबतलबी की बजाय प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया, विधानसभा में उपनेता राजेन्द्र सिंह राठौड़ और भाजपा के घटक दल के राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल को कटघरे में खड़ा कर रहे थे।

सूत्रों की मानें, तो राजस्थान में जिस तरह भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियाँ बदल रही हैं। तमाम तरह की राजनीतिक गतिविधियों पर पूनिया की पकड़ मज़बूत होती जा रही है? राजे को इस खेल कोई तवज्जो मिल पाएगी? सोचना भी $गलत है। सूत्र कहते हैं कि अपने दर्द और स्वाभिमान से इत्तिफ़ाक़ रखने वाली राजे गर्दन झुका लेंगी? सम्भव ही नहीं। विश्लेषकों का कहना है कि राजे को राजस्थान की राजनीति से बेदख़ल करना एक दु:स्वप्न तो हो सकता है; हक़ीक़त नहीं। मोदी और शाह पिछले साल भर से राजे से कन्नी काटे हुए हैं। क्या शाह फिर राजे को मिलने का मौक़ा देंगे? इसके कोई आसार ही नहीं हैं। स्वाभिमानी राजे के पास एक ही आख़िरी हथियार बचा है- ‘थर्ड फ्रंट।’

दिल्ली की बेख़ुदी बेसबब भी तो नहीं, कुछ तो पर्दादारी है। आख़िर इस दोहरे खेल का क्या मतलब है कि एक तरफ़ तो प्रदेश कार्यकारिणी में वसुंधरा समर्थकों को फटकने तक नहीं दिया। दूसरी तरफ़ वसुंधरा को कोर कमेटी में शामिल कर लिया गया है। विश्लेषकों का कहना है कि यह ख़बरों के सिलसिले को अपने हिसाब से फेंटने और लगातार आ रही बुरी ख़बरों से ध्यान भटकाने की कोशिश भी हो सकती है। अलबत्ता यह कोई साधारण सियासी गणित नहीं है। इस गणिताई के जो भी मायने रहे हों? वसुंधरा ने कोर कमेटी की बैठक में जाना तो दूर, उधर रुख़ भी नहीं किया। भले ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया अपने दफ़्तर में अपनी पीठ ठोकने की मुद्रा में बैठे हों; लेकिन उनकी कार्रवाइयों में षड्यंत्र की छाया छिपाये नहीं छिपती। विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व और वसुंधरा राजे के बीच यह लुकाछिपी का खेल विधानसभा चुनावों में भाजपा की पराजय के बाद से ही चल रहा है। इस सियासी पतंग की डोर आरएसएस के हाथों में है।

सूत्रों की मानें, तो संघ वसुंधरा को सक्रिय राजनीति या चुनावी राजनीति में देखना ही नहीं चाहता। नतीजतन लाख प्रतिरोध के बावजूद वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनने दिया गया। कई असहमतियों के बावजूद एक दूरदर्शी फ़ैसले के तहत गुलाबचंद कटारिया को यह पद सौंप दिया गया। जिस वक़्त नेता प्रतिपक्ष पद पर कटारिया की ताजपोशी की जा रही थी, वसुंधरा के चेहरे पर खीझ के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे। टीम वसुंधरा के गठन की पटकथा अनायास ही नहीं लिख दी गयी। संभवत: यह मकर संक्रांति की पूर्व संध्या थी, जब वसुंधरा के बेहद ख़ास माने जाने वाले भाजपा विधायक प्रताप सिंह सिंघवी के घर वसुंधरा गुट के तमाम विधायकों और सांसदों की गुप्त बैठक हुई। यह बैठक विधायकों, सांसदों का जमावड़ा अधिक लग रही थी। इस बैठक में वसुंधरा राजे ख़ुद भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से वर्चुअली जुड़ी हुई थीं। अधिकांश की राय थी कि वसुंधरा राजे अपना अलग राजनीतिक बनाये और अगले विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ शुरू कर दें।

वसुंधरा को लेकर संघ के ‘थिंक टैंक’ की अनेक आशंकाएँ हैं। संघ के पदाधिकारियों का मानना है कि वसुंधरा शक्तिपुंज बनकर फिर अधिनायकवाद को बढ़ावा दे सकती हैं। तब भाजपा की रीति-नीति के विरुद्ध एक अटपटा परिदृश्य उभर आएगा। एक आशंका यह भी है कि कालांतर में पार्टी में धृतराष्ट्र, भीष्म और गांधारियों का बोलबाला हो जाएगा। इसकी परिणति इस परिदृश्य में हो सकती है कि वसुंधरा का आचरण एहसान करने जैसा हो जाएगा कि उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा बहुमत लेकर आयी। अन्यथा किसमें इतनी सामथ्र्य थी? वसुंधरा की वापसी को लेकर पार्टी नेतृत्व भी विश्वास की लीक खींचने को तैयार नहीं है। वसुंधरा का रोचक राजनीतिक रोजनामचा बाँच चुके रणनीतिकार अनेक दृष्टांत गिनाते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी से तो राजे के रिश्तों में तब खटास आ गयी थी, जब वसुंधरा प्रतिगामी राजनीति की पटरी पर चल पड़ी थीं। विश्लेषकों ने तो यहाँ तक कह दिया था कि वसुंधरा को राज्य की नयी गवर्नेंस का सूत्रधार होना चाहिए था। वह अचानक मोदी मॉडल की सबसे कमज़ोर कड़ी बन गयी हैं। आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी को लेकर पासपोर्ट विवाद ने भाजपा नेतृत्व को कितनी मुश्किलों से दो-चार होना पड़ा था। कहने की ज़रूरत नहीं है। इस मुद्दे को लेकर पार्टी में सुलग रही आग आज भी नही बुझी है। ‘राजमहल’ होटल विवाद ने भाजपा नेतृत्व को क्या कुछ नहीं भुगतना पड़ा था? कहने की ज़रूरत नहीं है।

अतीत के पन्ने पलटें, तो राज्य में समग्र बदलाव का खाका खींचने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने राजे को विकल्प भी दिया था कि आम चुनाव जीतने के बाद विधानसभा सीटों से इस्तीफ़ा दिलाकर उनके बेटे दुष्यंत को चुनाव लड़वाया जाए, ताकि राज्य की सियासत में युवा सक्रिय भूमिका निभा सके। लेकिन राजे ने केंद्रीय नेतृत्व के दाँव पर खेलने से साफ़ इनकार कर दिया। राजे लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए इसलिए भी तैयार नहीं थी, क्योंकि इससे उनके बेटे दुष्यंत की उम्मीदवारी ख़तरे में पड़ जाती, जो इस समय झालावाड़ से सांसद है। राजे के निकटवर्ती सूत्रों का कहना है कि वह इस व्यवस्था के पीछे छिपा संदेश पढ़ चुकी थी। उन्होंने इस बात को भी समझ लिया था कि उन्हें सियासत की किस धुरी पर स्थापित किया जाएगा?

सूत्र कहते हैं कि राजे इस मुद्दे पर भी नाराज़गी भरी चुप्पी साधे रही है कि उन्हें पार्टी संगठन में उपाध्यक्ष का ओहदा तो बख़्श दिया; लेकिन लोकसभा चुनावों के लिए बनायी गयी 17 समितियों में से उन्हें एक में भी जगह क्यों नहीं दी गयी? जबकि इन समितियों में केंद्रीय मंत्रियों, संगठन के पदाधिकारियों और हिन्दी भाषी राज्यों के नेताओं को प्रमुखता से जगह दी गयी।

राजे के निकटवर्ती सूत्रों का कहना है कि उन्हें यह कहकर उपाध्यक्ष बनाया गया था कि उन जैसी जनाधार वाली और सक्रिय नेता के दिल्ली जाने से पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूती मिल सकती थी । उनकी तेज़-तर्रार नेता की छवि और अनुभव का फायदा पार्टी को आम चुनावों में राजस्थान समेत अन्य राज्यों को मिल सकता है, तो फिर समितियों से दूरी क्यों?

उत्तर प्रदेश में उत्तम राजमार्ग, घटिया सडक़ें

उत्तर प्रदेश कई दर्शनीय स्थलों एवं अच्छे जीटी रोड के लिए जाना जाता है। उत्तर प्रदेश की सडक़ व्यवस्था दो तरह की है, जिसमें राष्ट्रीय राजमार्गों की व्यवस्था भारत सरकार की है एवं शेष सडक़ें उत्तर प्रदेश सरकार निर्मित कराती है। एक ओर राष्ट्रीय राजमार्ग अत्यधिक अच्छे हैं एवं अभी लगातार अच्छे किये जा रहे हैं; तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार की सडक़ों में गड्ढे, धूल, कंकरीट आदि का मिलना आम बात है।

भौजीपुरा क्षेत्र के व्यवसायी सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि यहाँ की सडक़ें कभी गड्ढामुक्त नहीं हो सकतीं। दूसरी बार योगी जी मुख्यमंत्री हैं, मगर सडक़ों पर उनका ध्यान ही नहीं है। सडक़ों के निर्माण की बात तो छोडि़ए, सडक़ों में कई साल पहले पड़े गड्ढे बड़े होकर छोटा तालाब बनने लगे हैं। सडक़ों की मरम्मत हर वर्ष होनी चाहिए, मगर उनके गड्ढे तक नहीं भरे जाते। विधायक, मंत्री सब अपनी महँगी गाडिय़ों में फर्राटा भरते हुए निकल जाते हैं, उन्हें गड्ढों से कोई लेना-देना नहीं।

बहरोली गाँव के निवासी जितेंद्र कुमार बहरोली से नगरिया तक थ्री-व्हीलर से प्रतिदिन सवारियाँ ढोते हैं। जितेंद्र कुमार कहते हैं कि इस 12 किलोमीटर की सडक़ पर इतने गड्ढे हैं कि उन्हें गिनने में 10 दिन का समय लग जाएगा। मगर सरकार को रोड टैक्स वसूलने से मतलब है एवं पुलिस वालों को ह$फ्ता वसूलने से मतलब है, सडक़ बनवाने से किसी को मतलब नहीं है। नूंदना गाँव के रहने वाले रमेश कहते हैं कि नूंदना से मिलक तक जाने वाली सडक़ कई वर्ष से जगह-जगह टूटी पड़ी है, मगर कोई इसे बनवाने वाला नहीं है। जालिम नगला निवासी धर्मेंद्र कहते हैं कि हमारे गाँव से बहुत दूर नहीं इधर भौजीपुरा तक जाने में एवं उधर शाही तक जाने में सडक़ों का बुरा हाल है। सडक़ों पर बजरी-ही-बजरी है, गड्ढे-ही-गड्ढे हैं। ट्रक चालक राकेश कहते हैं कि रामपुर से शाहजहाँपुर तक पीलीभीत से बदायूँ तक राजमार्गों पर भी कई जगह बजरी, धूल एवं गड्ढे मिलते हैं। इन गड्ढों के कारण गाडिय़ाँ पलट जाती हैं। दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। इतने पर भी सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं देती है।

लखनऊ में भी टूटी हुई हैं सडक़ें

उत्तर प्रदेश में जहाँ तक भी देखो, गाँवों एवं छोटे जनपदों में कई सडक़ें टूटी हुई मिलेंगी। मगर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी सडक़ों का टूटा होना हैरान करता है। लखनऊ शहर की छोटी सडक़ों तक पर गड्ढे हैं। कहीं कहीं सडक़ें खुदी पड़ी रहती हैं। सडक़ निर्माण विभाग की नींद तब टूटती है, जब कोई बड़ा नेता अथवा मंत्री किसी मार्ग से होकर निकलने वाला होता है। उस समय रातों-रात सडक़ें बन जाती हैं। लखनऊ जनपद में आने वाले गाँवों तक जाने वाली सडक़ों की दशा भी बहुत अच्छी नहीं है। इस बार बरसात में सडक़ों की दशा और बिगड़ गयी है। जब भी बरसात हो जाती है सडक़ों पर कीचड़ एवं पानी जमा हो जाता है। कई सडक़ों पर तो दलदल जमा हो जाती है।

गड्ढों से बढ़ीं सडक़ दुर्घटनाएँ

अनहोनी को टाला नहीं जा सकता मगर सडक़ दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। मास्टर नंदराम कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में सडक़ दुर्घटाओं से असमय जितनी दर्दनाक मौतें होती हैं, उससे हृदय काँप उठता है। मेरी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से विनती है कि वो सडक़ों को ठीक कराने का कष्ट करें। प्रदेश भर का तो नहीं पता मगर हमारे क्षेत्र में कई सडक़ों पर गड्ढे-ही-गड्ढे हैं। कोई जनप्रतिनिधि इस ओर ध्यान नहीं देना चाहता। इससे एक निश्चित दूरी तय करने में समय अधिक लगता है एवं दुर्घटनाएँ भी होती रहती हैं। समाचार पत्रों में हर दिन चार-पाँच सडक़ दुर्घटनाओं के समाचार आते हैं।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2022 से अधिक सडक़ हादसे इस वर्ष हो रहे हैं। बीते वर्ष केंद्रीय सडक़ एवं परिवहन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत विश्व का दूसरा सबसे अधिक सडक़ दुर्घटनाओं वाला देश है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रति एक लाख लोगों में से 32 लोग सडक़ दुर्घटना के शिकार होते हैं। भारत में वर्ष 2022 में कुल 4,12,432 सडक़ दुर्घटनाएँ हुईं, जिनमें 1,53,972 लोगों की मौत हुई। अनुमानित तौर पर भारत की कुल सडक़ दुर्घटनाओं में से उत्तर प्रदेश में छ: प्रतिशत से अधिक दुर्घटनाएँ होती हैं। उदाहरण के रूप में वर्ष 2022 में जनवरी एवं फरवरी में हुई सडक़ दुर्घटनाओं की अपेक्षा वर्ष 2023 में जनवरी एवं फरवरी औसत 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। आश्चर्य होता है कि जिन राजमार्गों पर बड़े अधिकारियों, मंत्रियों, नेताओं एवं स्वयं सडक़ परिवहन विभाग के अधिकारियों की कारें सरपट दौड़ती रहती हैं, उन सडक़ों की दशा भी बहुत अच्छी नहीं है। मगर कार में बैठकर उन्हें इन गड्ढों से कोई लेना-देना नहीं रहता।

जागरूकता से ही इतिश्री

टूटी हुई सडक़ों पर दुर्घटनाएँ होने की संभावना हर समय रहती है। लोगों को जागरूक करने के लिए सडक़ परिवहन विभाग एवं प्रदेश सरकार नियम बनाकर इतिश्री कर देते हैं। नियमों का पालन भी कई लोग नहीं करना चाहते तो कई मजबूर होकर नियम तोड़ते हैं। सडक़ परिवहन विभाग लोगों को जागरूक तो करता हैं, मगर सडक़ों की व्यवस्था पर किसी का ध्यान नही जाता। आरटीओ विभाग को एवं पुलिस को गाडिय़ों का चालान काटने से समय नहीं मिलता। दुर्घटाएँ होने पर बीमा कम्पनियाँ वाहन एवं व्यक्तिगत हानि की भरपाई करती हैं। कई जनपदों में लोक निर्माण विभाग की अनेक सडक़ों पर गड्ढे-ही-गड्ढे हैं। गाँवों की सडक़ें सबसे बुरी दशा में हैं, जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। इससे गाँव के लोगों को चलने में समस्या आती है एवं दुर्घटना होने की संभावना बनी रहती है।

महानगर बरेली में लोकनिर्माण विभाग की 82.73 किलोमीटर की लम्बाई की 33 सडक़ों को गड्ढामुक्त करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने मार्च 2023 को 11.30 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी, मगर अभी तक अनेक सडक़ें गड्ढामुक्त नहीं हो सकी हैं। प्रदेश के गाजियाबाद, मेरठ, ग्रेटर नोएडा, बुलंदशहर, कानपुर, लखनऊ, आगरा गोरखपुर जैसे जनपदों की सभी सडक़ें गड्ढामुक्त नहीं हैं। पिछले वर्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 15 नवंबर तक प्रदेश की सभी सडक़ों को गड्ढामुक्त करने के निर्देश दिये थे, जिन पर कोई अमल नहीं हुआ।

बजट कम नहीं

उत्तर प्रदेश में सडक़ों के निर्माण एवं उनकी मरम्मत के लिए बजट की कमी नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कार्यकाल में हर वर्ष सडक़ों के निर्माण एवं उनकी मरम्मत हेतु बजट बढ़ाते हैं, मगर अधिकारी इस पैसे का उपयोग कैसे करते हैं? सडक़ एवं परिवहन मंत्री बजट उपयोग करने वालों पर निगरानी रखते हैं अथवा नहीं? ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर मुख्यमंत्री के संज्ञान में बात जाने पर भले ही मिल जाएँ।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संभवत: नहीं पता हो कि उनके राज्य में लोगों के सामने इतनी समस्याएँ हैं, अन्यथा यह दशा नहीं होती। इस बार वित्त वर्ष 2023-24 का बजट प्रस्तुत करते हुए प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने सडक़ों एवं सेतुओं के निर्माण हेतु 21,159.62 करोड़ रुपये के बजट की व्यवस्था प्रस्तावित की थी। इसमें सडक़ों के रखरखाव हेतु 3,000 करोड़ रुपये एवं राज्य सडक़ निधि से निर्माण हेतु 2,500 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भी उन्होंने रखा था।

लापरवाही कहाँ?

समाचारों से पता चला है कि अब राज्य के जनपदों की सडक़ों को 15वें वित्त एवं राज्य वित्त आयोग से निर्मित कराया जाएगा। शहरों की सडक़ों को विशेषकर चमकाया जाएगा। मास्टर नंदराम कहते हैं कि काम चाहे कोई करे मगर जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए। जनता इसके लिए कई तरह के कर तरह-तरह के माध्यमों से सरकार को देती है। सरकार को भी चाहिए जनता के कर के बदले जनता को सुविधाएँ मुहैया कराए। कुछ स्थानों से समाचार मिले हैं कि सम्बन्धित विभाग फुल डेप्थ रिक्लेमेशन तकनीक से गाँवों की सडक़ें बना रहा है। देश में सबसे पहले यह तकनीक केवल उत्तर प्रदेश सरकार ने उपयोग की है।

बारिश से टूट गयीं सडक़ें

बारिश से सडक़ें टूटना कोई नयी बात नहीं है। मगर उत्तर प्रदेश में तो सडक़ें बिना बारिश के भी उखड़ जाती हैं। कई स्थानों पर पाया गया है कि सडक़ पडऩे के एक-दो महीने के अंदर बजरी उखडऩे लगती है।

सडक़ परिवहन विभाग के एक कर्मचारी ने नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए बताया कि सडक़ें इस कारण से शीघ्र उखडऩे लगती हैं, क्योंकि उन्हें बनाने में डामर एवं बजरी का उपयोग कम किया जाता है। अगर सडक़ों को निर्मित करते समय नीचे टूटा हुआ पत्थर बिछाकर उस पर एक मोटी परत की बजरी को अधिक डामर में लपेटकर बिछाया जाए एवं उसके ऊपर से महीन बजरी की पतली परत पर सही मात्रा में डामर डाला जाए, तो सड़क़ें कई वर्ष तक ख़राब नहीं होतीं।

सडक़ को दी श्रद्धांजलि

जुलाई, 2023 के पहले सप्ताह में उत्तर प्रदेश सरकार ने नगरों एवं महानगरों में टूटी सडक़ों की मरम्मत करने का कार्य सम्बन्धित निकायों दिया था। प्रदेश सरकार ने नगरों एवं महानगरों की सडक़ों को बनाने में योगदान देने वाले नगरायुक्तों एवं अधिशासी अभियंताओं को निर्देश दिये थे कि वे सडक़ों को गड्ढामुक्त करके अपने हस्ताक्षर वाले प्रमाण-पत्र जारी करेंगे। मगर सडक़ें गड्ढामुक्त नहीं हो सकीं।

कहा जा रहा है कि बारिश में टूटी सडक़ों का सर्वे हो रहा है। कानपुर में टूटी सडक़ों को लेकर डेढ़ माह पहले समाजवादी पार्टी व्यापार प्रकोष्ठ, कानपुर के व्यापारियों ने सडक़ के गड्ढों श्रद्धांजलि दी। व्यापारियों ने निराला नगर में टूटी सडक़ पर अगरबत्ती जलाकर एवं फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी। समाजवादी पार्टी व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश वरिष्ठ उपाध्यक्ष अभिमन्यु गुप्ता ने कहा कि इन टूटी हुई खूनी सडक़ों से पूरा कानपुर त्रस्त है। कानपुर का व्यापारी वर्ग विशेषकर इस समस्या से अत्यधिक पीडि़त है।

आस्था पर आघात

आस्था या धर्म के चलते मनुष्य भगवान या किसी के साथ जुड़ता है। विश्वास इनसे मनुष्य का सम्बन्ध निर्धारित करता है। धर्म या आस्था और विश्वास में चोली-दामन का सम्बन्ध है। यही वजह है कि हर धर्म के विश्वास का प्रतीक उनके धर्म स्थल या तीर्थ स्थल हैं।

इन तीर्थ स्थलों में अगर मिलावट की परत चढ़ जाए, तो निश्चित रूप से श्रद्धालुओं का मन खट्टा होता है। ऐसा ही कुछ सावन में झारखण्ड के देशव्यापी धर्म स्थली देवघर यानी बैद्यनाथ धाम (बाबा धाम) में हो रहा है। खाने-पीने का सामान की कौन कहे, लोगों की आस्था और विश्वास रूपी प्रसाद भी मिलावट से अछूता नहीं रहा है। दरअसल एक पूरा तंत्र इसके पीछे सक्रिय है, जो धर्म-आस्था में मिलावट का चक्रव्यूह कुटिलता से रचता है। पुलिस-प्रशासन मुस्तैद है। कार्रवाई भी हो रही है। लेकिन यह केवल अभिमन्यु तरह चक्रव्यूह को भेदने का रास्ता है, जबकि ज़रूरत चक्रव्यूह को भेदकर उससे निकलने का रास्ता भी तलाश करने की भी है। न कि चक्रव्यूह में फँस कर दम तोडऩे का।

देश में 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग झारखण्ड स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम या बाबा धाम (देवघर) को माना जाता है। इसलिए हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए यह एक पवित्र स्थल है। यूँ तो साल भर यहाँ श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है; लेकिन सावन महीना ख़ास होता है। पूरा सावन महीना मेला लगता है। बिहार के सुल्तानगंज से पवित्र गंगा से जल लेकर श्रद्धालु (कांवड़ यात्रा) 100 किलोमीटर से अधिक पैदल यात्रा कर झारखण्ड के बाबा धाम पहुँचते और महादेव को जल चढ़ाते हैं। सावन में हर दिन एक लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा धाम पहुँचते हैं। जो श्रद्धालु बैद्यनाथ धाम आते हैं, वे बाबा मंदिर में दर्शन के बाद बासुकीनाथ मंदिर महादेव के दर्शन के लिए ज़रूर जाते हैं। बासुकीनाथ मंदिर देवघर से 42 किलोमीटर दूर जरमंडी गाँव के पास है। मान्यता है कि बाबा धाम की यात्रा तब तक अधूरी रहती है, जब तक बासुकीनाथ का दर्शन नहीं किया जाए।

प्रसाद में गड़बड़ी के आरोप

देवघर और बासुकीनाथ में प्रसाद के रूप में पेड़ा, चूड़ा और इलायची दाना प्रसाद के रूप में विख्यात है। यह प्रसाद श्रद्धालु अमूमन बाबा को चढ़ा नहीं पाते हैं। अधिकतर श्रद्धालुओं के बीच मान्यता यह भी है कि बाबा महादेव को चढ़ा हुआ प्रसाद खाते नहीं हैं। इसलिए ऐसे लोग बाबा धाम और बासुकीनाथ समेत अन्य शिवालयों में बाबा को प्रसाद चढ़ाकर वहीं छोड़ देते हैं। इन दोनों शहरों की दुकानों में बिकने वाला पेड़ा, चूड़ा और इलायची दाना ही बाबा का प्रसाद है। मान्यता के अनुसार, इसे बाबा को चढ़ा हुआ प्रसाद माना जाता है। लेकिन श्रद्धालु इन धर्म स्थलों की दुकानों से बाबा के प्रसाद के रूप में पेड़ा, चूड़ा और इलायची दाना ख़रीदकर लेकर जाते हैं। परिवार, रिश्तेदार, दोस्त और अन्य लोगों के बीच इस प्रसाद बाँटते हैं।

करोड़ों रुपये का कारोबार

देवघर और बासुकीनाथ में पेड़ा, चूड़ा और इलायची दाने यानी प्रसाद का करोबार साल भर में करोड़ों रुपये का है। सावन महीना ख़ास होता है। देवघर ज़िला पेड़ा व्यवसाय का हब बन जाता है। देवघर और बासुकीनाथ धाम मुख्य मार्ग पर स्थित घोड़मारा के पेड़ा काफ़ी विख्यात है। यहाँ आम दिनों में तक़रीबन 150 से पेड़े की दुकानें सजी रहती हैं, जबकि सावन माह में इसकी संख्या 1,000 से अधिक तक पहुँच जाती है।

देवघर, बासुकीनाथ और घोड़मारा में सावन में लगभग 60 करोड़ रुपये से अधिक का पेड़ा बिकता है, जबकि साल भर में यहाँ 120 करोड़ रुपये से अधिक का पेड़ा कारोबार हो जाता है। इस वर्ष 2023 में मलमास लगने के कारण सावन लगभग दो महीने (58 दिन) का हो गया है। इसलिए 4 जुलाई से शुरू हुआ सावन मेला 30 अगस्त को समाप्त होगा। लिहाज़ा इस वर्ष कारोबार अधिक होने की उम्मीद है। स्थानीय व्यवसायियों की मानें, तो इस वर्ष सावन के दौरान 80 से 100 करोड़ रुपये के कारोबार की उम्मीद है।

खोवा की आवक और ज़ब्ती

स्थानीय व्यवसायी का कहना है कि सावन में हर दिन एक लाख से अधिक श्रद्धालु बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ पहुँचते हैं। अगर एक श्रद्धालु औसत एक किलो पेड़ा भी ख़रीदता है, तो हर दिन 1,00,000 किलो पेड़ा की बिक्री होती है। हालाँकि यह एक अनुमान मात्र है। इससे अधिक ही पेड़ा की बिक्री होती होगी। पेड़ा के लिए खोवा (मावा) की ज़रूरत होती है। एक लीटर शुद्ध दूध से लगभग 100 से 150 ग्राम खोवा निकलता है। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 1,00,000 किलो पेड़ा के लिए कितने लीटर दूध की ज़रूरत होती है? देवघर और बासुकीनाथ में स्थानीय स्तर पर दूध उत्पादन से माँग के अनुसार खोवा की आपूर्ति नहीं हो पाती है। लिहाज़ा बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से खोवा मँगाया जाता है।

सावन में देवघर, बासुकीनाथ, घोड़माड़ा आदि इला$कों में प्रशासन द्वारा मिलावटी पेड़ा की जाँच को लेकर विशेष अभियान चलाया जा रहा है। खाद्य-आपूर्ति विभाग के अधिकारियों ने औचक निरीक्षण में बासुकीनाथ में मंदिर के पास स्थित दुकानों से 8 जुलाई को 200 किलो मिलावटी पेड़ा बरामद किया गया। यह सिंथेटिक खोवा से बना था। इसे ज़ब्त कर नष्ट किया गया और दुकानदारों पर कार्रवाई की गयी। केवल बासुकीनाथ से ही अब तक 5,500 किलो से अधिक का मिलावटी पेड़ा पकड़ा जा चुका है।

इसी तरह 23 जुलाई को 250 किलो मिलावटी पेड़ा देवघर, बासुकीनाथ और घोड़ामाड़ा इलाक़े से बरामद किया गया। पूरे सावन हर दिन पर जाँच के दौरान मिलावटी पेड़ा की सूचना देवघर, बासुकीनाथ और घोड़माड़ा के किसी-न-किसी इलाक़े से मिलती रहती है।

दूध की कमी और मिलावट

खोवा दूध से ही बनता है। देश में दूध और डेयरी उत्पादों के उत्पादन उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है, जो वैश्विक दूध उत्पादन में 24 प्रतिशत का योगदान देता है। भारत का दूध उत्पादन 2013-14 में 137.7 मिलियन टन से बढक़र 2021-22 में 221.1 मिलियन टन हो गया है। वहीं उपलब्धता भी 303 ग्राम प्रति दिन से बढक़र 444 ग्राम प्रति दिन हो गयी है। इसके बाद भी माँग के अनुसार दूध के उत्पादन की कमी महसूस की जा रही है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, झारखण्ड में लगभग 1.25 करोड़ गायें और 14.50 लाख भैंसें हैं। कुछ वर्ष पहले जहाँ प्रतिदिन 97 हज़ार लीटर दूध का उत्पादन था। वहीं यह मौज़ूदा में बढक़र 1.45 लाख लीटर प्रतिदिन हो गया है।

इसके बावजूद राज्य में माँग के अनुसार उत्पादन नहीं हो रहा है। हर दिन लगभग 30 से 40 हज़ार लीटर दूध बिहार और उत्तर प्रदेश के राज्यों से मँगाने की ज़रूरत होती है। ऐसी स्थिति में सावन में देवघर, बासुकीनाथ आदि क्षेत्र में दूध की माँग का अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है। लाखों लोगों के एक स्थान पर हर दिन जुटने से माँग बढऩा तय है।

खोवा की कौन कहे, मिलावटी तो दूध से ही शुरू हो जाती है। दूध में मिलावट के ख़िलाफ़ पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी भारत सरकार को एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें संगठन ने साफ़तौर पर कहा है कि अगर देश में मिलावटी दूध और इससे बने उत्पादों पर प्रतिबंध नहीं लगा, तो अगले साल 2025 तक भारत की 87 फ़ीसदी आबादी कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी की चपेट में आ जाएगी। झारखण्ड हाई कोर्ट ने पिछले दिनों दूध समेत अन्य खानपान की चीज़ों में मिलावट पर स्वत: संज्ञान लिया था।

कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार बताये कि फूड सेफ्टी अफ़सर और इससे सम्बन्धित अन्य पदों पर बहाली क्यों नहीं हो रही? फूड सेफ्टी अफ़सर नहीं रहने से आम जनता को मिलावटी दूध और खाना परोसा जा रहा है। यह ख़तरनाक है। यानी देश से लेकर राज्य स्तर तक दूध में मिलावट की बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। सावन में देवघर और बासुकीनाथ में पेड़ा के अलावा दूध की माँग बढ़ जाती है। पेड़ा ही नहीं चाय, रबड़ी, दही समेत अन्य दूध के बायप्रोडक्ट की खपत बढ़ जाती है। आपूर्ति माँग के अनुसार नहीं होने पर मिलावट की बात को इनकार नहीं किया जा सकता है।

सुधार की ज़रूरत

दूध और खोवा व्यवसाय से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि शुद्ध दूध 50 रुपये प्रति लीटर से कम में नहीं मिलता है। एक लीटर दूध से क़रीब 100 ग्राम खोवा निकलता है। इसके बाद चीनी आदि मिलाकर पेड़ा तैयार होता। यानी एक किलो पेड़े की क़ीमत 600 से 700 रुपये होनी चाहिए। अगर इससे कम दर पर पेड़ा बेचा जाएगा, तो निश्चय ही घाटे का सौदा होगा। ऐसे में 200-300 रुपये किलो पेड़ा बेचा जा रहा है, तो शुद्धता की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। दरअसल किसी भी सामान की माँग अधिक और आपूर्ति कम होगी, तो उसकी क़ीमत बढ़ेगी या फिर मिलावट कर उसकी भरपाई की जाएगी। जिस हिसाब में देवघर और बासुकीनाथ में पेड़े की माँग है, उस हिसाब में शुद्ध खोवा की आपूर्ति होगी, तो मिलावट की सम्भावना कम होगी। साथ ही क़ीमत को भी उचित रूप में तय करना होगा। तभी मिलावट पर कार्रवाई के साथ-साथ इस चक्रव्यूह से निकला जा सकेगा। नहीं तो ऐसे ही एक तरफ़ कार्रवाई होती रहेगी और दूसरी तरफ़ मिलावट का खेल जारी रहेगा।

जेब-तराश हत्यारे

धर्मों के ठेकेदार अपने ही धर्म के लोगों की जेब धार्मिक तरीक़े से काट रहे हैं और धार्मिक तरीक़े से ही उनकी गर्दनें कटवाने पर आमादा हैं। उन्होंने अपने ही लोगों के दिमाग़ में इतनी धर्मांधता भर दी है कि उन्हें अच्छा-बुरा, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, शुभ-अशुभ और भविष्य तक की समझ नहीं रहती; ईश्वर तो दूर की बात है। ईश्वर के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम है। न ही तथाकथित धर्म के ठेकेदारों को कुछ भी मालूम है और न उनका अंधानुकरण करने वालों को ही कुछ मालूम है। जिन्हें मालूम है, उन्होंने घृणा, दुराचार, लूट, चोरी, वैमनस्य, ईष्र्या, छोटा-बड़ा, ऊँच-नीच, अच्छा-बुरा, क्रोध, लालच, काम-वासना, चुगली, झूठ, छल, कपट, लिप्सा, अहंकार सब कुछ छोड़ दिया है। उन्हें न इस संसार से मोह है। न इस संसार में कोई रुचि है; और न ही इस संसार से कोई लालच है। उन्हें ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी धर्म के सहारे की भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि उन्हें ईश्वर से विशुद्ध प्रेम हो चुका है। इसलिए वे किसी का बुरा भी नहीं सोचते और भला भी नहीं सोचते। वे जो कुछ हो रहा है, सब कुछ ईश्वर की इच्छा मानकर उसी पर छोड़ देते हैं। उन्हें पता है कि काल के चक्र से कोई नहीं बच पाया है। इसलिए वे काम, मद, मोह, लिप्सा, धत्कर्म और पाप सबसे बचे रहते हैं।

यह एक कटु सत्य है कि अपराध वही करता है, जिसमें अज्ञानता भरी हुई हो। अज्ञानता ही लोभ, क्रोध, मद और मोह का बीज है। लेकिन अज्ञानता ही भय, हीनता, दीनता और अंधविश्वास भी पैदा करती है। अज्ञानता की वजह से ही लोग भ्रमित होते हैं। किसी चालाक या समझदार के लिए उन्हें हाँकना उतना ही आसान होता है, जितना कि भेड़ों को हाँकना। बस उनके आगे-आगे चलते जाना है। सभी अंधविश्वासी अपने आप भेड़ों की तरह पीछे-पीछे चलने लगते हैं। जैसे भेड़ों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनके आगे कौन चल रहा है? गधा या कुत्ता? वैसे ही अंधानुकरण करने वालों को भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उन्हें कौन धर्मोपदेश दे रहा है? बस उसके हाथ में धर्म का झण्डा, धर्म की किताबें होनी चाहिए। कोई नहीं पूछता कि उसे धर्म और ईश्वर के बारे में सही में कितना पता है? कोई धर्म के तथाकथित ठेकेदारों से यह भी नहीं पूछता कि आख़िर हमें ले कहाँ जा रहे हो? क्योंकि सच्चाई यह भी है कि कोई नहीं जानता, आख़िर जाना कहाँ है? कोई नहीं जानता, ईश्वर कैसा है? कोई ईश्वर को पहचानता भी नहीं है। किसी को ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता भी नहीं मालूम? सब अन्धे हैं। ऊपर से सब घुप्प अँधेरे में हैं। किसी में रास्ता दिखाने की सामथ्र्य नहीं है। किसी को कोई किरण नहीं दिखती, सब उन्हीं पगडंडियों के चक्कर काट रहे हैं, जो पगडंडियाँ पहले से किसी ने बना रखी हैं। वे आगे भी नहीं बढ़ रहे हैं। सब चींटियों की तरह बनी-बनायी पगडंडियों पर ही रेंग रहे हैं। एक भी उन पगडंडियों से अलग होता है, अथवा अपना रास्ता अलग बनाता है, तो सब उसे भटका हुआ मानकर उसे धर्म-विरोधी और ईश्वर-विरोधी तय कर देते हैं।

इस विरोध का कारण यह नहीं है कि वह भटक गया है; बल्कि यह है कि उनकी पंक्ति से अलग चल रहा व्यक्ति कहीं उनका विरोध न कर दे। उसके अलग होने से वह अपनी जेब कटने से बचा ले जाएगा। वह उस भीड़ में शामिल नहीं होगा, जो एक उकसावे पर धर्म के नाम पर हिंसा के लिए उतारू हो जाते हैं। बस यही बात तथाकथित पाखण्डी धर्माचार्यों को परेशान करती है। इसी कारण तथाकथित किताबी धर्मों के विरोध में खड़े लोगों की हत्याएँ होती हैं। भले ही वे कितने भी मानवीय हों। कितने भी लोगों की भलाई का काम करते हों। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे सत्य भी बोलते हों। फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि उन्होंने पाखण्ड को स्वीकार क्यों नहीं किया? उस लीक को क्यों छोड़ दिया, जिस पर सब अन्धे होकर चल रहे हैं?

इस संसार में यही समस्या है। जो अलग चला, जिसने अपना रास्ता ख़ुद बनाने की सोची, उसके विरोध में तमाम अन्धे रोड़ा बनने लगते हैं। वे चाहते हैं कि अपना रास्ता बनाने वाला उनकी तरह ही अन्धा होना चाहिए। वे यह भी भूल जाते हैं कि जो अपना रास्ता ख़ुद बना रहा है, उससे उन्हें भी लाभ होगा। इसीलिए तो ईश्वर की खोज करने वाले संसार को छोड़ देते हैं। वे जानते हैं कि मूर्खों से भरे इस संसार में अगर कोई उनका समर्थन न करके अपने तरीक़े से ईश्वर का भजन करेगा, तो उसके धन्धे का विद्रोह हो सकता है। इसलिए, जिसने संसार में रहकर एक सही रास्ता ईश्वर को पाने का बताया है; उसका पुरज़ोर विरोध हुआ है। चाहे कबीर हों, चाहे ओशो, चाहे कोई और। धर्म के नाम पर जेब-तराश हत्यारों को इससे बड़ी तकलीफ़ होती है। उनकी सत्ता को इससे ख़तरा होने लगता है। उन्हें डर लगने लगता है कि उनके सुख-भोग और सम्मान का अन्त न हो जाए। इसलिए वे धर्म की किताबों को दबोचे एक बड़ी भीड़ को गुमराह किये रहते हैं। उनके पास अपना कोई ज्ञान नहीं है।