पड़ोसी धर्म और व्यापार: Trivedi बनेंगे सेतु!

बांग्लादेश मिशन: वर्तमान में ढाका और नई दिल्ली के रिश्ते एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। ऐसे में दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में भारत का नया उच्चायुक्त नियुक्त करने की सुगबुगाहट केवल एक राजनयिक फेरबदल नहीं, बल्कि डगमगाते व्यापारिक हितों को बचाने और बंगाल चुनाव के समीकरण साधने की बड़ी बिसात है…   

-ममता सिंह, नई दिल्ली/कोलकाता। 

भाजपा नेता Dinesh Trivedi को बांग्लादेश में भारत का नया उच्चायुक्त नियुक्त करने की सुगबुगाहट केवल एक राजनयिक फेरबदल (Diplomatic Reshuffle) नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की एक सोची-समझी बिसात (Calculated Strategy) है। वर्तमान में ढाका और नई दिल्ली के रिश्ते एक बेहद नाजुक मोड़ (Critical Junction) पर खड़े हैं। Sheikh Hasina के जाने के बाद वहां जिस तरह का सत्ता परिवर्तन हुआ और फिर जिस तरह से भारत विरोधी स्वर मुखर हुए, उसने दशकों की मेहनत पर पानी फेरने का जोखिम पैदा कर दिया है। ऐसे में भाजपा का एक मंझे हुए राजनेता पर दांव खेलना बताता है कि अब ढाका में केवल ‘करियर डिप्लोमैट’ से काम नहीं चलने वाला, वहां एक ऐसे शख्स की जरूरत है जो राजनीति की भाषा समझता हो और जिसके पास बंगाल की माटी की गहरी समझ हो।

भाजपा की इस रणनीति के पीछे कई गहरे निहितार्थ हैं। सबसे बड़ा मोर्चा आर्थिक सुरक्षा का है। Adani और Ambani जैसे बड़े भारतीय समूहों के प्रोजेक्ट्स वहां अधर में लटके हैं। जलमार्ग और रेल कनेक्टिविटी की जो महत्वाकांक्षी योजनाएं पूर्ववर्ती सरकार के समय शुरू हुई थीं, वे अब अनिश्चितता के भंवर में हैं। भाजपा जानती है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र की वापसी के दावों के बीच अगर भारत ने अपनी पकड़ ढीली की, तो चीन वहां पैर पसारने में देर नहीं लगाएगा। उद्योगपति त्रिवेदी की नियुक्ति से संदेश जाएगा कि भारत इस पड़ोसी देश को अपनी आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय हितों के साथ जोड़कर देख रहा है।

West Bengal के चुनावों से ठीक पहले इस संभावित घोषणा का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। हिन्दीभाषी त्रिवेदी का कद बड़ा है और वे बंगाल की संस्कृति, भाषा और वहां के लोगों की नब्ज पहचानते हैं। बांग्लादेश के साथ पश्चिम बंगाल का रोटी-बेटी का रिश्ता है। यदि त्रिवेदी वहां हिंदुओं की सुरक्षा और सीमा पार के तनाव को कम करने में सफल होते हैं, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को बंगाल के आगामी चुनावों में मिल सकता है। क्योंकि उनकी नियुक्ति यदि वाकई में होती है तो साफ है कि भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह बंगाल के हितों की रक्षा के लिए अपने सबसे अनुभवी चेहरों को मोर्चे पर लगा रही है।

कूटनीतिक नजरिए से देखें तो दिनेश त्रिवेदी एक ‘पुल’ का काम कर सकते हैं। वे ममता बनर्जी के करीबी रह चुके हैं और अब मोदी सरकार के भरोसेमंद हैं। बांग्लादेश के नए नेतृत्व के साथ बातचीत की मेज पर वे सिर्फ फाइलों का आदान-प्रदान नहीं करेंगे, बल्कि एक राजनेता के तौर पर विश्वास बहाली की कोशिश करेंगे। भारत सरकार को इस समय वहां एक ऐसे चेहरे की जरूरत है जो तनाव के बीच भी संवाद के रास्ते खोल सके और भारतीय उद्योगों को सुरक्षित रखने की गारंटी दे सके। त्रिवेदी की नियुक्ति यह साबित करेगी कि भाजपा अब विदेश नीति को केवल दफ्तरों से नहीं, बल्कि जमीन की हकीकत और राजनीतिक प्रभाव के जरिए साधने की तैयारी में है। यह प्रयोग सफल रहा तो दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में भारत का पलड़ा फिर से भारी हो सकता है।

बहरहाल, त्रिवेदी को बांग्लादेश भेजना भारत की सोची समझी कूटनीतिक चाल के रूप राजनीतिक विश्लेषक देख रहे हैं। ऐसा करके भारत बांग्लादेश की आर्थिक एवं सामाजिक मसलों पर भी पहले के मुकाबले ज्यादा पैनी नजर रख पाएगा। हां, चीन को भी एक मैसेज तो चला ही जाएगा कि भारत अपने पड़ोसी देशों के सौहार्द पूर्वक माहौल रखना चाहता है। लिहाजा कूटनीतिक नजरिए से भारत चीन को तगड़ा संदेश तो दे ही सकता है। दूसरा पश्चिम बंगाल चुनावी समीकरण को राजनीतिक नजरिए से भी त्रिवेदी की नियुक्ति के जरिए साधने की कोशिश की गई है।