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दिल्ली में सभी सात सीटों पर लड़ेंगे चुनाव- कांग्रेस

दिल्ली में आज (बुधवार) आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की अहम बैठक हुई। कांग्रेस ने अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में सभी सात सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

बैठक दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में हुई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में हुई बैठक में राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल, दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अनिल चौधरी, प्रभारी दीपक बावरिया समेत में पार्टी के कुल 35 नेता मौजूद रहे।

सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में कांग्रेस नेतृत्व ने लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) से गठबंधन नहीं करने का संकेत दिया, नेतृत्व ने सभी 7 सीटों पर तैयारी करने का निर्देश दिया और राहुल गांधी ने हाल ही में अलग-अलग वर्ग के लोगों से अपनी मुलाकात का अनुभव भी साझा किया।

साथ ही बैठक के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा कि, कांग्रेस पार्टी दिल्ली की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी और आज की इस बैठक में आप से फिर गठबंधन की कोई चर्चा नहीं हुई।

बता दें, अगले साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को हराने के लिए विपक्ष की 26 पार्टियों ने मिलकर इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) गठबंधन बनाया है और उनमें आप भी शामिल है। दिल्ली में तीन मुख्य पार्टियां है जिनमें कांग्रेस, भाजपा और आप शामिल है। ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस का सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला एक बड़ा फैसला है।

मणिपुर, जहाँ मुस्लिम सुरक्षित हैं?

किसी भी समझदार व्यक़्तिके मन में अब यह शंका नहीं कि मणिपुर में एन. बीरेन सिंह सरकार विफल रही है। पुलिसकर्मियों की मौज़ूदगी में जब वहाँ की दो महिलाओं को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र करके घुमाया गया, उनका बलात्कार किया गया और इसकी एक वीडियो क्लिप भी वायरल हुई, तब भी राज्य सरकार कार्रवाई करने में विफल रही। बीरेन प्रशासन दूसरी बार तब विफल रहा, जब पुलिस-शस्त्रागार से गोला-बारूद सहित लगभग 4,000 हथियार जबरन छीन लिए गये। पुलिसकर्मी भी इसमें विफल रहे, क्योंकि उन्होंने इसका बिलकुल भी विरोध नहीं किया। आज जब मणिपुर क़रीब तीन महीने से उबल रहा है, आरोप है कि अपराधियों के हथियार लूटने की घटना को अंजाम देने में पुलिसकर्मियों की भी मिलीभगत थी। राज्य प्रशासन अपने नागरिकों की रक्षा करने में भी विफल रहा, जिससे वहाँ 100 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि हज़ारों को विस्थापित होना पड़ा है।

अपराध की बर्बरता पर भारत के मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि अगर कोई वीडियो नहीं होता, तो क्या होता? मुख्य न्यायधीश ने साफ़  कहा कि नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है; तब और, जब वह जानती है कि उत्तर-पूर्व दशकों से उग्रवाद का केंद्र रहा है। ऐसे में अन्य राज्यों में हिंसा के मामलों को मणिपुर की घटना के साथ उद्धृत करना महिलाओं का अपमान है। मणिपुर एक अनुपस्थित सरकार और एक निष्प्रभावी पुलिस का उदाहरण है। मणिपुर की घटनाएँ राज्य सरकार और उसके पुलिस बल की छवि पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं।

‘तहलका’ की विशेष जाँच टीम ने इसे समझने के लिए मणिपुर के कुछ लोगों से बातचीत की, जिसमें पाया कि स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। जाँच के दौरान ‘तहलका एसआईटी’ ने एक दिलचस्प रहस्योद्घाटन किया कि कैसे संघर्षग्रस्त राज्य में युद्धरत मैतेई और कुकी समुदायों के बीच मुसलमान एक अद्वितीय पुल के रूप में उभरे हैं।

वर्तमान अंक में ‘मणिपुर में मुस्लिम होना, मतलब सुरक्षित’ शीर्षक से हमारी कवर स्टोरी से पता चलता है कि मणिपुर में मुसलमान अब कुकी और मैतेई दोनों के मित्र हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि मणिपुर के मध्य में स्थित इंफाल घाटी के चारों ओर एक सीमा रेखा खिंच गयी है। एक ओर जहाँ मैतेई पहाड़ों पर नहीं जा सकते, वहीं कुकी नीचे घाटी में नहीं जा सकते। इस अलिखित नियम का उल्लंघन करने वालों के मारे जाने का ख़तरा रहता है। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच की इस भौतिक खाई को केवल वही लोग पार कर सकते हैं, जो न तो दोनों समुदायों के मित्र हैं और न ही विरोधी। इसी के चलते मुस्लिम समुदाय के सदस्य एक अद्वितीय बफर के रूप में उभरे हैं और इन दिनों मणिपुर में मुस्लिम होने का मतलब सुरक्षित होना है। शायद इसीलिए मौज़ूदा परिस्थितियों में इस हिंसा-ग्रस्त राज्य में जाने वाले लोग अपनी सुरक्षा के लिए किसी परिचित मुस्लिम या मुस्लिम ड्राइवर को साथ रखते हैं।

मणिपुर में क़रीब तीन महीने से चल रही नस्ली हिंसा के बाद दोनों समुदायों के बीच विभाजन और गहरा गया है। दोनों समुदायों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास,ग़ुस्सा और यहाँ तक कि नफ़रत भी बढ़ गयी है। नफ़रत और अविश्वास के इस माहौल में ‘तहलका’ ने विशेष रूप से एक ऐसे मुद्दे को छुआ, जिसे अब तक किसी अन्य मीडिया संगठन ने नहीं उठाया है। मौज़ूदा परिस्थियों में मणिपुर में यह आम धारणा है कि यहाँ ‘मुस्लिम होना, मतलब आप सुरक्षित हैं!’

पिछड़ों को एसटी का दर्जा देना राजनीतिक प्रोपेगेंडा

बीते अप्रैल माह में मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा मणिपुर के बहुसंख्यक मैतेइयों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने सम्बन्धी फ़ैसले के बाद से ही वहाँ हिंसा का माहौल बन गया। अब केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारें भी कुछ समुदायों / जातियों को एसटी दर्जा देने की पहल कर रही हैं, जिसे कुछ लोगों ने राजनीति से प्रेरित प्रोपेगेंडा बता रहे हैं। कुछ जगह इसका विरोध भी हो रहा है।

जम्मू-कश्मीर में विरोध

बीते 26 जुलाई को लोकसभा में संविधान (जम्मू-कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक-2023 एवं जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक-2023 पारित किया गया। जिसका जम्मू-कश्मीर के गुज्जर बकरवाल समेत अन्य एसटी, एससी, ओबीसी संगठन विरोध कर रहे हैं। संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को दूसरा मणिपुर बनाने पर तुली है। दरअसल उपरोक्त दोनों विधेयकों द्वारा जम्मू-कश्मीर के आर्थिक-सामाजिक रूप से मज़बूत कहे जाने वाले पहाड़ी, ब्राह्मण, कोल, चांग, आचार्य, कौरो समेत कई जातियों को अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और ओबीसी लिस्ट में शामिल किया जाना प्रस्तावित है।

इसी के विरोध में 6 अगस्त, 2023 को जम्मू के पनामा चौक पर सैकड़ों गुज्जर-बकरवाल लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने केंद्र सरकार व प्रदेश प्रशासन के $िखला$फ नारेबाज़ी की और संभागीय आयुक्त रमेश कुमार को अपनी माँगों का ज्ञापन सौंपा। अब यह विरोध और तेज़ी से जम्मू के अलावा पुंछ, राजौरी, श्रीनगर, कुपवाड़ा और अन्य ज़िलों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश तक पहुँच गया है।

जम्मू के प्रदर्शन में शामिल गुफ़्तार अहमद चौधरी ने कहा-‘पहाडिय़ों को एसटी का दर्जा देना गुज्जर-बकरवाल के साथ अन्याय है। सरकार को यह बिल वापस लेना होगा, नहीं तो पूरे देश में लाखों लोग सडक़ों पर उतरकर ऐसे प्रदर्शन करेंगे। जिन लोगों को एसटी का दर्जा दिया जा रहा है, वे कुलीन वर्ग के लोग हैं।’

जम्मू-कश्मीर में जनजातीय समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाली शीर्ष संस्था ऑल रिजव्र्ड कैटेगरीज ज्वाइंट एक्शन कमेटी की ओर से अधिवक्ता अनवर चौधरी का दावा है कि यह पहाडिय़ों को एसटी का दर्जा देना अवैध और असंवैधानिक है, क्योंकि पहाड़ी लोग एसटी दर्जे के मापदंडों को पूरा नहीं करते हैं। वहीं गुज्जर नेता और एआरसीजेएसी के संस्थापक सदस्य तालिब हुसैन ने कहा कि पहाडिय़ों की अलग-अलग जातियाँ और धर्म हैं। पहाडिय़ों में सैयद, बुखारी जैसे ऊँची जाति के मुस्लिम और ब्राह्मण, राजपूत, महाजन जैसे हिन्दू शामिल हैं। वे शासक वर्ग और संपन्न परिवारों से हैं।

जम्मू-कश्मीर पहाड़ी पीपुल्स मूवमेंट के शाहबाज़ $खान ने कहा कि पहाड़ी गुज्जरों की तरह एक जातीय समूह हैं। ज़मीनी तौर पर गुज्जरों और हमारे बीच कोई अंतर नहीं है। $फ$र्क सि$र्फ भाषा का है। वहीं जम्मू-कश्मीर भाजपा अध्यक्ष रविंदर रैना ने कहा कि पहाडिय़ों को आरक्षण से किसी के ना$खुश होने का सवाल ही नहीं है। गृहमंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि पहाडिय़ों को आरक्षण गुज्जर-बकरवाल और अन्य एसटी समुदायों को मिलने वाले 10 प्रतिशत आरक्षण के अतिरिक्त होगा। केंद्र सरकार के फ़ैसले का विरोध जम्मू-कश्मीर के अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े विभिन्न संगठनों द्वारा भी किया जा रहा है। ओबीसी महासभा, ऑल इंडिया बैकवर्ड क्लासेज फेडरेशन एवं ऑल जम्मू-कश्मीर वेलफेयर फोरम श्रीनगर के सदस्यों ने भी इसका विरोध किया। ज्ञात हो कि जम्मू-कश्मीर में ‘पहाड़ी’ भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय है। संविधान (जम्मू-कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक 2023 किसी भाषाई समूह को एसटी दर्जा देने का पहला विधेयक है।

एसटी के दर्जे के लिए प्रक्रिया

संविधान में एसटी स्थिति निर्धारित करने के लिए कोई मानदंड निर्दिष्ट नहीं है। हालाँकि लोकुर समिति (1965) द्वारा निर्धारित पाँच विशेषताएँ- आदिम लक्षणों के संकेत, विशिष्ट संस्कृति, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ सम्पर्क करने में संकोच, भौगोलिक अलगाव और पिछड़ापन को एसटी निर्धारण के लिए मान्यता दी गयी है। संविधान का अनुच्छेद-366(25) अनुसूचित जनजातियों को ऐसी जनजातियों या जनजातीय समुदायों के कुछ हिस्सों या समूहों के रूप में परिभाषित करता है, जिन्हें अनुच्छेद-342 के तहत समझा जाता है। अनुच्छेद-342(1) राष्ट्रपति को राज्यपाल से परामर्श के बाद किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में एसटी निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है। किसी जाति को एसटी दर्जा देने के लिए राज्य सरकार अनुशंसा करती है। इसके लिए उन्हें राज्य के जनजातीय अनुसंधान संस्थान से प्राप्त वैध दस्तावेज़ केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय को देना पड़ता है। दस्तावेज़ को समीक्षा केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा करने के बाद केंद्र सरकार इसे एक विधेयक के रूप में राज्यसभा और लोकसभा से पारित करती है। इसके बाद राष्ट्रपति अनुच्छेद-341 और 342 के तहत अंतिम निर्णय लेते हैं, तब किसी जाति को एसटी का दर्जा मिलता है।

कुड़मी माँग रहे एसटी का दर्जा

झारखण्ड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में कुड़मी समुदाय के लोग एसटी दर्जा के लिए लगातार माँग कर रहे हैं। वे राज्य स्तर पर संगठन बनाकर इसके लिए सरकारों पर दबाव बना रहे हैं। वे इसके लिए कई बार वाहनों एवं ट्रेनों के परिचालन रोक चुके हैं। राज्य बन्द का आह्वान कर चुके हैं। वहीं आदिवासी कुड़मियों के इस माँग को अनुचित बताकर इसका विरोध कर रहे हैं।

कुछ माह पहले ही झारखण्ड के आदिवासी संगठनों ने रांची में आक्रोश रैली निकालकर कुड़मियों के माँग का विरोध किया था। जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) झारखण्ड राज्य के अध्यक्ष एवं आदिवासी नेता संजय पहान ने कहा कि एसटी दर्जा कोई फ्री की रेवड़ी नहीं है। आदिवासी बनने के लिए संवैधानिक रूप से जो क्राइटेरिया लोकुर समिति और टीआरआई झारखण्ड ने तय की है, कुड़मी उसके अंतर्गत नहीं आते। हमने तो जयस के द्वारा लाखों की भीड़ के साथ झारखण्ड में रैली करके माँग की देश में लगभग 650 आदिवासी समुदायों के अलावा किसी अन्य नये समुदाय को एसटी का दर्जा नहीं दिया जाए। इससे हमारे अधिकार छिन जाएँगे।

उत्तर प्रदेश में राजभरों का सर्वे

उत्तर प्रदेश में ओबीसी में शामिल भर और राजभर जाति को अब एसटी दर्जा देने के लिए प्रदेश की योगी सरकार उन 17 ज़िलों में सर्वे कराएगी, जहाँ गोंड को एसटी दर्जा प्राप्त है। सरकार का मत है कि भर और राजभर का एसटी दर्जा गोंड जनजाति से उनके रोटी-बेटी के रिश्ते पर निर्भर करेगा। इस पर आदिवासी अधिकारों के सामाजिक कार्यकर्ता मदन गोंड ने कहा कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार यह सब सिर्फ वोट के लिए कर रही है। जब इलेक्शन $खत्म हो जाएगा, यह मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

किसे मिला एसटी का दर्जा?

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर ज़िले के हाटी समुदाय एसटी दर्जा मिल गया। 4 अगस्त, 2023 राष्ट्रपति ने हाटी समुदाय के एसटी संशोधित बिल पर अपनी मुहर लगा दी। वहीं छत्तीसगढ़ में धनुहार, धनुवार, किसान, सौंरा, और बिझिंया समुदायों और भरिया, भूमिया समुदाय के पर्यायवाची के रूप में भुइया और भुइयाँ समुदायों को एसटी में शामिल करने के लिए राज्यसभा में प्रस्ताव पारित किया गया है। इन जातियों का आरोप था कि लिपिकीय त्रुटियों के कारण एसटी दर्जा एवं संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित किया गया।

हिमाचल प्रदेश के हाटी समुदाय एवं अन्य राज्यों के कुछ समुदायों को एसटी दर्जा देने को आदिवासी बुद्धिजीवियों ने इसे भाजपा का राजनीति से प्रेरित $कदम बताया है। उनका कहना है कि भाजपा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र कुछ समुदायों को एसटी दर्जा देकर उन्हें लुभाने की कोशिश की जा रही है। वहीं आदिवासी छात्र संगठन छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष योगेश ठाकुर ने कहा कि छत्तीसगढ़ में जिन 12 जातियों को जनजाति का दर्जा दिया जा रहा है, वह आदिवासी समाज के लिए घातक है।

दिल्ली सेवा क़ानून: सत्ता बनाम शक्ति प्रदर्शन

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बड़ा झटका लगा है। संसद के दोनों सदनों में दिल्ली सेवा अध्यादेश पारित होकर क़ानून बन गया। दिल्ली सरकार को शक्तिहीन बनाने के लिए अपनी केंद्रीय शक़्ति का उपयोग भाजपा ने किया है। सन् 2015 में दिल्ली में सरकार बनाते ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अधिकारियों को नकेल डालनी शुरू कर दी थी। उन्होंने अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे ज़मीन, पुलिस तथा क़ानून व्यवस्था से जुड़ी सभी फाइलें उप राज्यपाल से पहले उनके पास भेजें।

उस समय के दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग ने इस आदेश को लागू नहीं होने दिया तथा दिल्ली सरकार की ओर से सभी अधिकारियों की नियुक्ति रद्द कर दी। तब उप राज्यपाल ने कहा था कि नियुक्ति का अधिकार उन्हें ही है। इस मामले को लेकर दिल्ली सरकार दिल्ली उच्च न्यायालय पहुँची। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अगस्त, 2016 में इस पर फ़ैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने कहा कि उप राज्यपाल ही दिल्ली के असली बॉस हैं। इस फ़ैसले का अर्थ यह था कि दिल्ली सरकार को कोई निर्णय लेने से पहले उप राज्यपाल की अनुमति लेनी होगी। दिल्ली सरकार ने उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

सन् 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चुनी हुई सरकार ही दिल्ली की असली बॉस है। परन्तु साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि ज़मीन, पुलिस तथा क़ानून-व्यवस्था को छोडक़र बाकी सभी अधिकार दिल्ली सरकार के पास रहेंगे।

न्यायालय का फ़ैसला

सर्वोच्च न्यायालय के इसी फ़ैसले को पलटने के लिए केंद्र सरकार संसद में दिल्ली सेवा विधेयक लेकर आयी, जिसे राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली सरकार अध्‍यादेश-2021 कहा गया। इस विधेयक में उप राज्यपाल तथा दिल्ली सरकार की शक्तियों को परिभाषित किया गया है। विधेयक में लिखा गया है कि दिल्ली में सरकार का मतलब उप राज्यपाल है। केंद्र सरकार के इस फ़ैसले को चुनौती देने के लिए दिल्ली सरकार दोबारा सर्वोच्च न्यायालय पहुँची। सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मई, 2023 को दोबारा दिल्ली सरकार को सेवा क्षेत्र में अधिकार दे दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अधिकारियों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण (पोस्टिंग तथा ट्रांसफर) को लेकर दिल्ली सरकार के मंत्रालय फ़ैसला ले सकते हैं। आपात स्थिति में या किसी बड़े मामले को लेकर उप राज्यपाल फ़ैसला ले सकते हैं या फिर उसे राष्ट्रपति को भेजा जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद मुख्यमंत्री केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा था कि ‘कुछ ऐसे अधिकारी हैं, जिन्होंने पिछले एक-डेढ़ साल में दिल्ली की जनता के काम रोके। मोहल्ला क्लीनिक और अस्पतालों में दवाइयाँ बन्द करा दीं। जल बोर्ड की पेमेंट रोककर कई जगह पानी बन्द करा दिया। बुजुर्गों की पेंशन तक रोक दी। ऐसे सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को अब अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ेगा। ऐसे एक-एक अधिकारी और कर्मचारी को चिह्नित करके उन्हें साइड किया जाएगा और उनकी जगह पर ऐसे लोगों को मौक़ा दिया जाएगा, जो मेहनत और ईमानदारी से काम करना चाह रहे थे; लेकिन उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा था। जो अभी तक घुटन महसूस कर रहे थे, अब उनकी अच्छे पदों पर नियुक्ति करके उन्हें जनता के लिए काम करने का अवसर दिया जाएगा। कई ऐसे पद हैं, जिनकी कोई ज़रूरत नहीं है। उन पर बैठे अधिकारी कामों में चार और अड़चनें ही लगाते हैं। हम ऐसे पदों को चिह्नित करके या तो उनको ख़त्म करेंगे या खाली छोड़ेंगे। वहीं जिन विभागों में ज़्यादा पदों की ज़रूरत है, वहाँ नये पद तैयार करेंगे। एंटी करप्शन ब्रांच अभी भी दिल्ली सरकार के पास नहीं है; लेकिन अब विजिलेंस विभाग सरकार के पास आ गया है। तो जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होंगे या ग़लत काम करेंगे, उनके ख़िलाफ़ विजिलेंस प्रोसिडिंग शुरू की जा सकती है।’

दिल्ली सरकार ने दोबारा सर्वोच्च न्यायालय से हरी झंडी मिलते ही अधिकारियों के स्थानांतरण शुरू भी कर दिये थे। उप राज्यपाल तथा केंद्र सरकार में इसे अहमियत नहीं दी तथा न ही इस पर अमल किया। इसे न्यायालय की अवमानना कहते हुए दिल्ली सरकार तीसरी बार सर्वोच्च न्यायालय पहुँची। परन्तु मामले पर सुनवाई होती, इससे पहले ही केंद्र सरकार 19 मई को केंद्र सरकार ने 19 मई को राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली सरकार (संशोधन) अध्‍यादेश-2023 ले आयी तथा इस मानसून सत्र में दिल्ली सेवा विधेयक को पारित कराने का प्रस्ताव रख दिया। दिल्ली सेवा विधेयक को लेकर संसद के लोकसभा सदन तथा राज्यसभा सदन में भारी हंगामा हुआ। परन्तु केंद्र सरकार ने केंद्र सरकार ने 19 मई को राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली सरकार (संशोधन) अध्‍यादेश-2023 जारी किया था; दोनों सदनों से पास करा लिया, जो कि अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधित) विधेयक-2023 हो गया।

संसद में बहस

विधेयक प्रस्ताव पटल पर रखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केंद्र को क़ानून बनाने का अधिकार है। यह अध्यादेश पूरी तरह से संवैधानिक है। इसके पास होते ही विपक्षी पार्टियों का गठबंधन टूट जाएगा। दोनों सदनों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विधेयक पटल पर रखा। इस विधेयक में केंद्र सरकार ने फिर से अधिकारियों के स्थानांतरण तथा नियुक्ति का अधिकार उप राज्यपाल को ही दिया। विपक्षी गठबंधन की मदद से दिल्ली सरकार के लोकसभा तथा राज्यसभा सांसदों ने इस विधेयक को गिराने के काफी प्रयास किये, परन्तु सफलता नहीं मिली।

गृहमंत्री ने कहा कि मैं जो बिल लेकर आज उपस्थित हुआ हूँ, वो महामहिम राष्ट्रपति जी के 19 मई 2023 को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सेवाओं के प्रशासन और प्रबंधन से जुड़े अध्यादेश, जो उन्होंने प्रख्यापित किया था, उस अध्यादेश से बनी हुई व्यवस्था के स्थान पर विधि द्वारा बनी हुई व्यवस्था को प्रस्थापित करने के लिए बिल लाया हूँ। यह इसका मूल उद्देश्य है। कई लोग ये कह रहे हैं कि केंद्र सरकार सरकार दिल्ली की पॉवर को अपने हाथ में लेना चाहती है। लेकिन मैं सा$फ करना चाहता हूँ कि केंद्र के पास पहले से ही बहुत पॉवर है। दिल्ली सेवा विधेयक को केवल और केवल शहर में भ्रष्टाचारमुक्त शासन के लिए लाया गया है। वर्ष 2015 में एक आन्दोलन के ज़रिये अस्तित्व में आई एक पार्टी इस बिल का विरोध कर रही है; लेकिन उसे पता नहीं है कि दिल्ली के मामले में केंद्र को यह संवैधानिक अधिकार वर्षों से मिला हुआ है। बिल के लाने से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं हुआ है।

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि स्वतंत्रता पूर्व भी दिल्ली कई वर्षों से किसी न किसी प्रकार से देश की सत्ता का केंद्र रहा, राजधानी रहा। 1911 में दिल्ली तहसील और महरौली थाना इन दोनों को अलग करके राजधानी बनाया गया। बाद में वर्ष 1919 और 1935 के अधिनियमों में उस व$क्त की ब्रिटिश सरकार ने दिल्ली को चीफ कमिश्नर प्रोविंस माना। स्वतंत्रता के समय जब संविधान बनने की प्रक्रिया हुई, उस वक्त दिल्ली के स्टेटस के बारे में पट्टाभि सीता रमैया और बाबा साहेब अंबेडकर की एक कमेटी बनी और ड्राफ्टिंग कमेटी ने दिल्ली की स्थिति को लेकर विस्तृत विचार-विमर्श किया।

अमित शाह ने कहा कि पट्टाभि सीतारमैया समिति ने दिल्ली को लगभग राज्य स्तर का दर्जा देने की सिफारिश की थी, उसी कमेटी की चर्चा के वक्त पंडित नेहरू, सरदार पटेल, सी. राजगोपालाचारी, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और स्वयं डॉक्टर आंबेडकर जैसे नेताओं ने इसका अलग-अलग तर्क देकर विरोध किया था। उन्होंने कहा कि आंबेडकर की रिपोर्ट कहती है किसी विशेष क्षेत्र के मामले में क्या दिया जाना है? यह राष्ट्रपति अपने आदेश द्वारा निर्धारित करेंगे।

हालाँकि गृहमंत्री ने सदन में विधेयक पेश करते समय दिल्ली सरकार की शक्ति भी छीन लेने की नहीं, बल्कि इस ओर ध्यान भटकाया कि दिल्ली सरकार दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की ज़िद कर रही है। जबकि यह ग़लत है, क्योंकि यह लड़ाई दिल्ली सरकार के अधिकारों की है। फिर अगर पूर्ण राज्य की बात है, तो गृह मंत्री को यह भी याद रखना चाहिए कि खुद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा लालकृष्ण आडवाणी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के पक्ष में थे। आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने इस ओर ध्यान भी दिलाया, जिसका उत्तर सरकार ने नहीं दिया। राज्यसभा में केंद्र की ओर से प्रस्तावित दिल्ली सेवा विधेयक पर चर्चा के समय विपक्षी सांसदों ने बहुत प्रयास किया कि इसे रोका जाए, परन्तु दोनों सदनों में सत्ता पक्ष के सदस्य अधिक होने के चलते यह विधेयक दोनों सदनों में पारित हो गया। यह विधेयक कुछ विपक्षी सदस्यों के सभा में उपस्थित न होने, कुछ के वोट न डालने के चलते भी आसानी से पारित हो गया। सत्तापक्ष की ओर से विधेयक पर 34 सदस्यों ने विचार रखे। वहीं सदनों में उपस्थित अधिकतर विपक्षी सदस्यों ने अपने विचार रखे। सदस्यता जाने के कारण आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह अपना मत प्रस्तुत नहीं कर पाये।

राष्ट्रपति ने दी मंज़ूरी

इस विधेयक पर दोनों सदनों में तीखी बहस हुई। परन्तु लोकसभा में इस विधेयक पास होने के बाद राज्यसभा में भी पास हो गया। सरकार विधेयक को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के पास मंज़ूरी के लिए भेज दिया था। इस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधित) विधेयक-2023 को राष्ट्रपति ने मंज़ूरी दे दी है, जिससे यह क़ानून बन गया है। अब अधिकारियों का स्थानांतरण तथ नियुक्ति का अधिकार दिल्ली की चुनी हुई सरकार के बजाय केंद्र सरकार से नियुक्त उप राज्यपाल को मिल गया है।

क्या है दिल्ली सेवा विधेयक?

राजनीति के कुछ जानकारों का कहना है कि वास्तव में दिल्ली सेवा विधेयक दिल्ली सरकार के होते हुए उस पर भी केंद्र सरकार का दबाव बनाये रखने को लेकर लाया गया है, ताकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के विरोधी सुरों को दबाया जा सके। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में मंत्री रहे कांग्रेस नेता अजय माकन ने भी यही माना है कि नियुक्ति तथा स्थानांतरण का अधिकार दिल्ली सरकार का ही है।

इस विधेयक में कुछ विपक्षी सांसदों ने संशोधन का सुझाव दिया, परन्तु केंद्र सरकार ने उन्हें नहीं माना। इस विधेयक के क़ानून बनने से दिल्ली सरकार के पास बची अन्तिम बड़ी शक्ति भी $खत्म हो गयी है, जिसके तहत वह ग्रुप-ए अधिकारियों की नियुक्ति तथा उनका स्थानांतरण कर सकती थी।

दिल्ली सरकार, आम आदमी पार्टी एवं विपक्षी पार्टियाँ सरकार के इस क़दम को सर्वोच्च न्यायाय की अवमानना बता रहे हैं। वहीं सरकार एवं उसके समर्थक इस विधेयक को दिल्ली के हित में बता रहे हैं। प्रश्न है कि क्या अब सर्वोच्च न्यायालय सरकार के इस फ़ैसले में दख़ल दे सकता है? क्या वह केंद्र सरकार के इस विधेयक पर अंकुश लगाएगा?

इस विधेयक में धारा-3(ए) को हटा दिया गया है, जो पहले इस अध्यादेश में थी। इस धारा में दिल्ली सरकार तथा उप राज्यपाल को नियुक्ति एवं स्थानांतरण का अधिकार था, जो अब केवल उप राज्यपाल को रह जाएगा। इस विधेयक में कहा गया है कि अगर किसी अधिकारी के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी हो, तो उसकी सि$फारिश भी प्राधिकरण करेगा, जिसकी सि$फारिश पर आख़िरी फ़ैसला उप राज्यपाल का होगा। उप राज्यपाल तथा प्राधिकरण में अगर कोई मतभेद होता है, तो भी अन्तिम फ़ैसला उपराज्यपाल का ही माना जाएगा। इस हिसाब से दिल्ली सरकार से अधिक शक्ति उप राज्यपाल को मिलेगी तथा केंद्र सरकार को मिलेगी।

इस विधेयक में अध्यादेश की धारा-45(डी) को संशोधित किया गया है। ये धारा राजधानी दिल्ली की अलग-अलग संस्थाओं के अध्यक्ष तथा उनके सदस्यों की नियुक्ति से जुड़ी है। अगर यह विधेयक क़ानून बना तथा उसके माध्यम से किसी प्राधिकरण के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के हाथ में होगी। अगर दिल्ली विधानसभा से अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति की सि$फारिश होती है, तो उसकी सिफारिश राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण करेगा, जिसके आधार पर उप राज्यपाल उन नियुक्तियों को करेंगे। जानकारों का कहना है कि इस विधेयक के क़ानून बनने से दिल्ली सरकार पूरी तरह तो अपाहिज नहीं हुई है; परन्तु बहुत हद तक शक्तिहीन हो चुकी है। भाजपा, जिसका मतलब अब मोदी हो गया है; दिल्ली में हारने के बाद भी दिल्ली पर शासन करने पर आमादा है। अन्त में प्रश्न यही है कि क्या राज्यों में सत्ता न मिलने पर भी प्रधानमंत्री मोदी सत्ता में रहने की ज़िद पर अड़े हुए हैं?

“संसद में अमित शाह ने कहा कि हमारे पास क़ानून पारित करने की शक्ति है। आपको लोगों के लिए काम करने की शक्ति दी गयी है, उनके अधिकार छीनने की नहीं। सा$फ ज़ाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि मैं सुप्रीम कोर्ट को नहीं मानता। दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को जिताकर सा$फ कहा है कि दिल्ली में दख़लंदाज़ी मत करना; लेकिन मोदी जी जनता की बात नहीं सुनना चाहते हैं। मैं जो भी करता हूँ दिल्ली की जनता उसमें मेरा समर्थन करती है और उन्होंने मुझे चुनाव में जीत दिलाकर अपना समर्थन दिखाया है। बीजेपी सिर्फ हमारे अच्छे काम को रोकने की कोशिश कर रही है। इस बार जनता उन्हें कोई भी सीट नहीं जीतने देगी। हमने चार चुनाव बीजेपी को हराये हैं। जब इन्हें लगा कि आम आदमी पार्टी को हराना मुश्किल है, तो चोर दरवाज़े से इन्होंने ऐसा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की आज़ादी चुरा ली है। दिल्ली के लोगों के वोट का कोई मूल्य नहीं बचा है और पीएम मोदी और उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना दिल्ली की सरकार चलाएँगे।’’

अरविंद केजरीवाल

मुख्यमंत्री, दिल्ली

चुनावी लड़ाई का अविश्वास प्रस्ताव

मानसून सत्र में विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव गिर गया। लेकिन इसे 2024 के लोकसभा चुनावों का बिगुल माना जा रहा है। इस अविश्वास प्रस्ताव में जो बहस हुई, उससे यह तो तय है कि इस बार के लोकसभा चुनाव दोनों पक्षों के लिए पिछले दो चुनावों से ज़्यादा दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण होंगे। इस बार जिस तरह अविश्वास प्रस्ताव पर पक्ष-विपक्ष में नोकझोंक हुई, उससे साफ़ है कि दोनों तरफ़ से बड़ी चुनावी लड़ाई का नैरेटिव स्थापित हो चुका है। इस अविश्वास प्रस्ताव में दोनों पक्षों की ओर से सदस्यों की संख्या बल के बलबूते अपने पक्ष में मज़बूत प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के बारे में देश के नागरिकों में नकारात्मक छवि का निर्माण करना था।

इस बार अविश्वास प्रस्ताव में राहुल गाँधी नये तेवर में दिखायी दिये। अपनी भारत जोड़ो यात्रा और संसद में वापसी से अर्जित प्रतिष्ठा के चलते वह अब मोदी-विरोधी ताक़तों के प्रतीक बनकर उभरे हैं। केंद्र सरकार ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करके एक तरह से यह स्वीकार कर लिया है कि राहुल गाँधी मोदी के लिए चुनौती बन रहे हैं। क्योंकि सवाल तो राहुल गाँधी पहले भी करते थे; लेकिन उनसे इतना ख़तरा भाजपा या मोदी ने कभी ज़ाहिर नहीं किया। सन् 2018 के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जब राहुल गाँधी ने राफेल मामले पर केंद्र सरकार को घेरा, तब भी नहीं। न ही राहुल उस समय इतने आक्रामक दिखे, जितने कि इस बार दिखे। संसद से निष्कासित होने के बाद 8 अगस्त को पहली बार विपक्षी दल कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी सदन में पहुँचे; परन्तु उस दिन कुछ बोले नहीं। सत्ता पक्ष ने उन्हें बोलने के लिए उस दिन उकसाया भी।

अगले दिन 9 अगस्त को राहुल गाँधी जब मणिपुर पर बोले, तो सत्ता पक्ष तिलमिला उठा। राहुल ने मणिपुर में फैली हिंसा को भारत की हत्या बताया। राहुल गाँधी ने कहा- ‘कुछ ही दिन पहले मैं मणिपुर गया। हमारे प्रधानमंत्री आज तक नहीं गये, क्योंकि उनके लिए मणिपुर हिन्दुस्तान नहीं है। आज की सच्चाई यह है कि मणिपुर नहीं बचा है। मणिपुर को आपने दो भाग में बाँट दिया है; तोड़ दिया है। इन्होंने मणिपुर में हिन्दुस्तान की हत्या की है। इनकी राजनीति ने मणिपुर को नहीं, हिन्दुस्तान को मणिपुर में मारा है। हिन्दुस्तान का मणिपुर में मर्डर किया है। भारत एक आवाज़ है। उस आवाज़ की हत्या आपने मणिपुर में की। इसका मतलब आपने भारत माता की हत्या मणिपुर में की। आपने मणिपुर के लोगों को मारकर भारत की हत्या की है। आप देशभक्त, देशप्रेमी नहीं हो। आप देशद्रोही हो। इसलिए प्रधानमंत्री मणिपुर नहीं जा सकते; क्योंकि उन्होंने मणिपुर में हिन्दुस्तान की हत्या की है। आप भारत माता के हत्यारे हो। आपने मेरी माँ (भारत माँ) की हत्या की है।’

लोकसभा सदन के अन्तिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को, विशेषतौर पर कांग्रेस को हिंसा, देश के साथ विश्वासघात जैसे कई मुद्दों पर घेरा। उन्होंने कहा कि ‘कांग्रेस का शासन पूर्वोत्तर की सभी समस्याओं का मूल है। मणिपुर के लिए विपक्ष की पीड़ा और संवेदना सेलेक्टिव है। कांग्रेस का इतिहास देश तोडऩे वाला रहा है। मैंने पूर्वोत्तर का 50 बार दौरा किया है। यह सिर्फ़ एक डेटा नहीं है; यह पूर्वोत्तर के प्रति समर्पण है।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर खुद को कोसने का आरोप भी लगाया। कुल मिलाकर हमेशा की तरह विपक्ष को कोसने से प्रधानमंत्री भी पीछे नहीं रहे। उनका पूरा भाषण विपक्ष, खासतौर पर कांग्रेस को घेरने पर केंद्रित रहा। संसद में प्रधानमंत्री ने विपक्षी गठबंधन इंडिया को लेकर भी निशाना साधा। ऐसा लगता है कि देश के मुद्दों से दूर कहीं ‘इंडिया’ शब्द को लेकर वह फँसे हुए हैं। पिछले कई भाषणों में वह इससे बाहर निकलते नहीं दिखे हैं।

एक बात जो पक्ष-विपक्ष में समान है, वह यह कि पक्ष जहाँ पूरा-का-पूरा नरेंद्र मोदी पर आकर टिक गया है; वहीं विपक्ष भी अब राहुल गाँधी पर केंद्रित होता नज़र आ रहा है। शशि थरूर जैसे बुद्धिजीवी नेता को मुख्य वक्ता के रूप में मौका न देना इसका इदाहरण है। क्या यह राहुल गाँधी के हित में था?

संसद की यह बहस बताती है कि किस तरह से पक्ष-विपक्ष के मतभेद, मनभेद के ज़रिये एक ध्रुवीकृत लड़ाई में बदल चुके हैं, जिसका एक ही मक़सद है- ‘किसी भी तरह एक-दूसरे की सत्ता की चुनौतियों को ख़त्म करना।’

दोनों की इस लड़ाई में राज्यों में तटस्थ तीसरे स्तर की पार्टियों का अस्तित्व ख़त्म होता जा रहा है। वे या तो एनडीए में शामिल हो रहे हैं या फिर विपक्षी गठबंधन इंडिया में। जो पार्टियाँ अभी तक किसी के साथ नहीं हैं, उन पर कोई एक गठबंधन चुनने का मानसिक दबाव बन रहा है। शायद इसी दबाव के चलते इंडिया गठबंधन के साथ खड़ी कई पार्टियों के प्रतिनिधि संसद से नदारद रहे। एक तरह से वे भाजपा के निकट दिखायी दिये।

संसद की गरिमा ताक पर

सांसदों की अभद्र और तल्ख़ भाषा से क्या सीखेंगे देश के नागरिक?

देश के लोकतंत्र के मंदिर में जो मानसून सत्र में हुआ और हो रहा है, वह बेहद शर्मनाक और अफ़सोसजनक है। सवाल यह है कि सांसदों की अभद्र और तल्ख़ भाषा से देश के लोगों की मानसिकता पर क्या असर पड़ेगा? वे एकता का पाठ कैसे सीखेंगे? क्या उनमें मतभेद पैदा नहीं होगा? क्या वे जगह-जगह लडऩे पर आमादा नहीं होंगे? और इसका परिणाम संसद के बाहर देश के हर शहर, हर क़स्बे और हर गाँव में देखने को मिल भी रहा है। चाहे वो जगह-जगह लोगों के बीच बढ़ता तनाव और लड़ाई के रूप में हो, या चाहे मणिपुर में तीन महीने से भडक़ी शर्मनाक हिंसा के बाद हरियाणा के नूंह, मेवात और गुडग़ाँव में हिंसक झड़पों की साज़िश हो। हालाँकि ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र के मंदिर संसद में पहले कभी इतनी तीखी बहस, वॉकआउट और एक-दूसरे के ऊपर छींटाकशी का दौर नहीं चला है। लेकिन जैसा इस बार संसद के अंदर हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ।

न ही ऐसा हुआ कि सवालों से सरकार इस क़दर बचती रही हो और न ही ऐसा हुआ कि रिश्ते इतने तल्ख़ हो गये हों कि उनकी कड़वाहट सरेआम दिखने लगी हो और इतनी ज़्यादा बढ़ गयी हो कि एक-दूसरे के सभी दुश्मन बन बैठे हों। पहले जब संसद में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुआ करती थी, तो संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में चाय पीने से लेकर खाना खाने तक सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता एक साथ दिखते थे और एक-दूसरे से हँसकर मिलते थे, कभी-कभी तो हल्की-फुल्की मज़ाक़ भी हुआ करती थी। लेकिन पिछले क़रीब एक दशक से यह सिलसिला धीरे-धीरे ख़त्म होता जा रहा है और अब तो हालात यहाँ तक पहुँच गये हैं कि सत्तापक्ष और विपक्ष के देश भर से चुने हुए प्रतिनिधि एक-दूसरे का चेहरा देखने से भी कतराते दिखते हैं। दुश्मनी इतनी कि सत्ता पक्ष विपक्षी दलों को ख़त्म करने पर ही आमादा-सा दिखायी देता है।

कहा जाता है कि विपक्ष और निष्पक्ष मीडिया के बिना सरकार निरंकुश हो जाती है। क्या यही वजह है कि आज की केंद्र सरकार विपक्ष और निष्पक्ष मीडिया को ख़त्म करने पर आमादा है कि क्योंकि यह दोनों उसकी कमियों को ये उजागर कर रहे हैं? एक तरफ़ मणिपुर दंगों से लेकर कई महत्त्वपूर्ण सवालों से जिस तरह कतराकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार संसद के मानसून सत्र में उपस्थित नहीं रहे।

दूसरी तरफ़ सवाल पूछने पर, प्रति फाडऩे पर सांसदों को निष्कासित किया गया। क्या संसद में ऐसी घटनाएँ पहले नहीं हुईं? लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला संसद में नहीं जाते हैं। कहते हैं कि जब तक विपक्ष हंगामा बन्द नहीं करेगा, वो संसद में नहीं जाएँगे। प्रधानमंत्री इस मानसून सत्र से पूरी तरह $गायब रहे। बस आख़िरी दिन औपचारिकतावश आये। बड़ी अजीब बात है कि क्या कोई सवालों के डर से संसद में नहीं आएगा? तो कोई हंगामे को लेकर नहीं आएगा, फिर संसद चलेगी कैसे? क्या पहले हंगामा नहीं होता था या आज सत्ता पक्ष के सांसद हंगामा नहीं करते हैं? जब भी विपक्ष का कोई सदस्य बोलने की कोशिश करता है, तब क्या सत्ता पक्ष के सदस्य $खामोशी से उसे सुनते हैं?

बहरहाल, इस बार जिस तरीक़े से मणिपुर और हरियाणा में हुई हिंसा से बचने के लिए सरकार ने पैंतरेबाज़ी की, वह यह दर्शाती है कि सरकार को अपनी ग़लती पर सुनने की आदत नहीं है और इसके लिए वो न तो किसी की भी कोई टिप्पणी सुनना चाहती है और न ही किसी का कोई सवाल बर्दाश्त करती है। मणिपुर और हरियाणा में भडक़ी हिंसा से बचने के लिए ही सरकार ने दिल्ली विधेयक का मामला उठाया। यही हुआ भी, मणिपुर पर जो हंगामा होना था और सवाल पूछे जाने थे और अब हरियाणा को लेकर जो सवाल उठने थे, उन सबकी जगह दिल्ली विधेयक पर सबका ध्यान चला गया, ताकि सरकार अपनी जवाबदेही के साथ-साथ हिंसा के आरोपों से बच सके। इसके अलावा जिस प्रकार से संसद में चुनी हुई दिल्ली की केजरीवाल सरकार के बारे में निचले दर्जे की भाषा का इस्तेमाल किया गया, वो किसी जनप्रतिनिधि की भाषा कभी होगी? ऐसा किसी ने नहीं सोचा होगा।

वहीं दूसरी ओर कोई कोर कसर न रखने वाले केजरीवाल की भाषा में भी देश के सम्मानीय पद पर बैठे प्रधानमंत्री के लिए चौथी पास राजा, अनपढ़ प्रधानमंत्री जैसे आपत्तिजनक शब्द और निम्न स्तर की भाषा का प्रयोग अति अशोभनीय है। मेरे विचार से इसे अदालत में चुनौती देनी चाहिए, जो शायद दे भी रखी है। लेकिन संसद में सत्ता पक्ष के सांसदों द्वारा गिरगिट, घोटालेबाज़, भ्रष्टाचारी, सत्ता का भूखा, झूठा, दुर्योधन और तू-तड़ाक आदि बोला जाना संसद की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला ही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री पर जो आरोप संसद में लगाये जा रहे हैं, अगर वह सच है, तो अब तक केजरीवाल को गिर$फ्तार क्यों नहीं कर लिया गया?

दरअसल इस विधेयक के क़ानून बनने से जब दिल्ली के मुख्यमंत्री और दिल्ली सरकार के पास कोई शक्ति बची ही नहीं, तो वो करेंगे क्या? पुलिस पहले से ही गृह मंत्रालय के पास है। क़ानून व्यवस्था भी केंद्र के ही पास है। ज़मीन से जुड़ा काम भी केंद्र के पास ही है। डीडीए भी केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के पास है। एसीबी पहले ही दिल्ली सरकार से छीनी जा चुकी है और अब ट्रांसफर-पोस्टिंग भी दिल्ली विधेयक को क़ानून बनाकर छीन लिया गया, तो दिल्ली सरकार करेगी क्या? यह सोचने का विषय है और यह सिर्फ़ दिल्ली सरकार की सत्ता होते हुए भी सत्ता छिनने के मामले में ही सोचने का विषय नहीं है, बल्कि दूसरे उन राज्यों के भविष्य के बारे में सोचने का विषय है, जहाँ विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं।

बहरहाल विचारणीय विषय यह है कि संसद में जिस तरह से हंगामा सत्ता पक्ष के सदस्य करते हैं और जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल वो आजकल करने लगे हैं, क्या वो सडक़-छाप भाषा नहीं है? ऐसे में अगर विपक्ष के संजय सिंह को संसद से निष्कासित किया जा सकता है, तो फिर सत्ता पक्ष के सांसदों को निष्कासित क्यों नहीं किया जाता? हालाँकि ऐसा नहीं है कि पहले सांसदों को निष्कासित नहीं किया गया; लेकिन इतनी छोटी बातों पर किसी सांसद को सदन से निष्कासित किया गया हो, यह मेरी जानकारी में नहीं है। भाजपा की वाजपेई सरकार के समय की बात है, जब अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे और प्रमोद महाजन संसदीय कार्य मंत्री थे, तब विपक्ष ने सदन में कुछ ज़्यादा ही हंगामा कर दिया था, जिस पर प्रमोद महाजन ने बड़े विनम्र स्वभाव से कहा कि आपका प्रश्न सरकार ने सुन लिया है। हम बीच का रास्ता निकाल लेंगे। आइए, बैठकर बात करें। यह भाषा हुआ करती थी संसद की। आज की भाजपा कई अपने दिग्गज नेताओं को याद करती है, उनके जन्मदिवस और पुण्यतिथियाँ मनाती है; लेकिन प्रमोद महाजन जैसे दिग्गज नेता को याद तक नहीं करती है। इसकी क्या वजह है? वो पुराने लोग अच्छी तरह जानते हैं।

इसी प्रकार का एक वाक़िया इंद्र कुमार गुजराल सरकार के समय का है। अटल बिहारी वाजपेई सदन में बोल रहे थे, तो सत्तापक्ष के लोग उन्हें बीच-बीच में टोंक रहे थे, जिससे अटल बिहारी वाजपेई नाराज़ हो गये और सत्ता पक्ष में सन्नाटा पसर गया। किसी ने उसके बाद शोर नहीं किया। यह गरिमा कभी विपक्ष की हुआ करती थी। सन् 1996 में भी तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त एक दिन अपना सिर पकड़े संसद भवन के केंद्रीय कक्ष के बाहर बैठे थे, इसकी वजह भाजपा के एक सांसद थी, जो उस समय विपक्ष में थी; लेकिन गृह मंत्री ने विपक्ष को तब खरी-खोटी नहीं सुनायी और न ही किसी विपक्षी सदस्य को सदन से निष्कासित कराने की साज़िश की। लेकिन आज जिस तरह से सत्ता पक्ष विपक्ष के ख़िलाफ़ क्रूर और दुश्मन की तरह व्यवहार करने पर आमादा है; वो समझ से बाहर है।

दरअसल, सत्ता पक्ष अपनी मर्र्ज़ी से विधेयक पारित करता जा रहा है और अपनी ही मर्र्ज़ी से क़ानूनों बदलना चाहता है। सन् 2014 के बाद बिना विपक्ष की सहमति के और बिना चर्चा के ऐसे कई विधेयक संसद में पारित हो चुके हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? जब विपक्ष में कोई बोलेगा नहीं और सवाल भी नहीं पूछेगा, तो फिर विपक्ष का मतलब क्या रह जाएगा? ऐसे कई सवाल हैं, जो उन सवालों की बिना पर खड़े हुए हैं, जिनके जवाब सत्तापक्ष देने से कतरा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक संपादक हैं।)

इस्तीफ़ा क्यों दे रहे हैं जज?

बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रोहित बी. देव का 4 अगस्त को भरी कोर्ट में इस्तीफ़ा देना स्तब्ध कर गया। न्यायमूर्ति रोहित बी. देव नागपुर पीठ में सेवारत थे। वह सन् 2016 में महाराष्ट्र के महाधिवक्ता थे और जून, 2017 में बॉम्बे उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति के पद पर नियुक्त हुए थे। न्यायमूर्ति रोहित बी. देव हमेशा अपने फ़ैसलों को लेकर सुर्ख़ियों में रहे। साल 2025 में उन्हें रिटायर होना था। लेकिन इससे दो साल पहले ही 4 अगस्त को उन्होंने कोर्ट की कार्रवाई के दौरान ही भरी कोर्ट में मौज़ूद लोगों और वकीलों से माफ़ी माँगते हुए इस्तीफ़ा देने का ऐलान करके सबको चौंका दिया।

न्यायमूर्ति रोहित बी. देव ने कहा कि ‘जो लोग अदालत में मौज़ूद हैं, मैं आप सभी से माफ़ी माँगता हूँ। मैंने आपको डाँटा, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि आप सुधर जाएँ। मैं आपमें से किसी को भी चोट नहीं पहुँचाना चाहता, क्योंकि आप सभी मेरे लिए परिवार की तरह हैं और मुझे खेद है। आपको बता दूँ कि मैंने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है। मैं अपने आत्मसम्मान के ख़िलाफ़ काम नहीं कर सकता। आप लोग कड़ी मेहनत करें। मैंने अपना इस्तीफ़ा भारत के राष्ट्रपति को भेज दिया है।’

चर्चा का विषय यह है कि न्यायमूर्ति रोहित बी. देव ने सबसे महत्त्वपूर्ण बात कही कि वह अपने आत्मसम्मान के ख़िलाफ़ काम नहीं कर सकते। सवाल यह है कि इस देश में कितने न्यायाधीश ऐसे होंगे, जिन पर उनके आत्मसम्मान के ख़िलाफ़ काम करने का दबाव होगा? जो न्यायाधीश आत्मसम्मान बचाकर काम करना चाहते हैं, उनके आत्मसम्मान को कौन लोग ठेस पहुँचाना चाहते हैं? क्या न्यायाधीशों को भी किसी दबाव में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है? न्यायाधीशों की नियुक्ति की पहली शर्त ही ईमानदारी, निष्पक्षता और स्वतंत्रता में निहित है। लेकिन क्या भारत में ऐसा हो पा रहा है कि देश की न्यायालयों में नियुक्त न्यायाधीश निष्पक्ष रूप से स्वतंत्र होकर काम कर पा रहे हों? इसके लिए हमें कुछ और न्यायाधीशों के मामलों पर भी गौर करना होगा।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सन् 2017 से 4 अगस्त, 2023 तक 12 न्यायाधीशों ने रिटायर होने से पहले ही इस्तीफ़ा दिया है। न्यायाधीशों के इस्तीफ़ा देने के सबसे ज़्यादा मामले बॉम्बे उच्च न्यायालय के हैं। सन् 2017 में न्यायमूर्ति जयंत पाटिल ने इस्तीफ़ा दे दिया। इसकी मुख्य वजह यह थी कि वरिष्ठता के हिसाब उन्हें कर्नाटक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति या कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति बनाया जाना था; लेकिन उनका इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ट्रांसफर कर दिया गया। सन् 2018 में हैदराबाद उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीश बनाये जाने के एक साल बाद ही इस्तीफ़ा दे दिया था। हालाँकि इस्तीफ़ा राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार किये जाने से पहले ही उन्होंने इसे वापस ले लिया और राष्ट्रपति ने उसे वापस भी कर दिया।

इसके बाद न्यायमूर्ति नक्का बालयोगी ने रिटायर होने (जनवरी 2019) तक सेवाएँ दीं। सन् 2019 में न्यायमूर्ति ताहिलरमानी ने इस्तीफ़ा दिया। सन् 2018 में उन्हें मद्रास उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। इस पदोन्नति और ट्रांसफर के 11 महीने के भीतर भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) रंजन गोगोई के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने उन्हें मेघालय उच्च न्यायालय में ट्रांसफर करने की सिफ़ारिश की। उन्होंने कॉलेजियम से अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करने की उनकी अपील की, जिसे अनसुना कर दिया गया। ताहिलरमानी अनियमितताओं को लेकर भी विवादों में रहे। आख़िर उन्होंने भी इस्तीफ़ा दिया। सन् 2020 में न्यायमूर्ति अनंत बी. सिंह ने इस्तीफ़ा दे दिया। न्यायमूर्ति अनंत बी. सिंह उस समय झारखण्ड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति थे। सन् 2020 में ही बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस.सी. धर्माधिकारी ने खुली कोर्ट में इस्तीफ़ा देने की घोषणा की। वह बॉम्बे उच्च न्यायालय में दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायमूर्ति थे। उन्हें दूसरे उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायमूर्ति के बनाने का प्रस्ताव था; लेकिन वह बॉम्बे उच्च न्यायालय छोडऩे के तैयार नहीं थे और इस्तीफ़ा दे दिया था।

सन् 2020 में दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल ने अपने रिटायरमेंट से एक महीने पहले इस्तीफ़ा देकर सबको चौंका दिया था। हालाँकि उनके इस्तीफ़े के बाद उन्हें दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। सन् 2021 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुनील कुमार अवस्थी ने इस्तीफ़ा दे दिया। इसके दो महीने के अंदर सन् 2021 में ही छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति शरद कुमार गुप्ता ने भी इस्तीफ़ा दे दिया। इसके ठीक पाँच महीने के अंदर बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दामा शेषाद्रि नायडू ने इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने अपने इस्तीफ़े में निजी वजह बतायी। सन् 2022 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजय तिवारी ने रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। न्यायमूर्ति अजय तिवारी पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में दूसरे वरिष्ठ न्यायमूर्ति थे। इसके आठ महीने बाद हिमाचल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चंद्र भूषण बारोवालिया ने इस्तीफ़ा दे दिया। सन् 2022 में ही बॉम्बे उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने इस्तीफ़ा दे दिया। इसके अलावा अतिरिक्त न्यायमूर्ति आशुतोष कुंभकोनी, अतिरिक्त न्यायमूर्ति अनिल साखरे और अतिरिक्त न्यायमूर्ति गिरीश गोडबोले ने भी रिटायरमेंट से पहले इस्तीफ़ा दिया था और अब बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रोहित बी. देव ने इस्तीफ़ा दिया है।

जजों के इस्तीफ़े कभी सरकारों से टकराव के चलते होते रहे हैं, तो कभी सर्वोच्च न्यायालय के टकराव से, तो कभी फ़ैसले को लेकर किसी दबाव के चलते। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद साल 2017 से न्यायाधीशों के इस्तीफों में तेज़ी आयी है। सन् 2017 से हर साल औसतन दो न्यायाधीशों ने इस्तीफ़ा दिया है। हालाँकि सरकार और कोर्ट के बीच टकराव, दबाव या अन्य वजहों से न्यायाधीशों का इस्तीफ़ा देना कोई नयी बात नहीं है।

कांग्रेस के समय में भी न्यायाधीशों ने इस्तीफ़े दिये हैं; लेकिन इस बड़े रिकॉर्ड से कम। कांग्रेस के केंद्र में कार्यकाल के दौरान सन् 1985 में भारत के मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती तो एक बार अपने इस्तीफ़े पर अड़ गये थे। इसकी वजह यह थी कि कांग्रेस सरकार न्यायमूर्ति नारायण को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाना चाहती थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती यह नहीं चाहते थे। हालाँकि बाद में सरकार को हार माननी पड़ी। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश पीएन भगवती ने सरकार के पास दूसरे तीन उच्च न्यायालय के तीन मुख्य न्यायमूर्ति के नाम भेजे, जिस पर सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया था। सन् 1986 ख़त्म होने से पहले मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती के रिटायर होने पर न्यायमूर्ति आर.एस. पाठक को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। लेकिन मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद उनसे भी सरकार का न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सरकार से टकराव बना रहा।

उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के अलावा सन् 2022 में मध्य प्रदेश की एक महिला अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश ने इस्तीफ़ा दे दिया था। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने उनका इस्तीफ़ा अस्वीकार कर दिया था। महिला अतिरिक्त न्यायाधीश ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश के ख़िलाफ़ यौन उत्पीडऩ के आरोप लगाये थे। अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश ने अपने इस्तीफ़े में नक्सल प्रभावित इलाक़े में ट्रांसफर किये जाने और अपनी बेटी से दूरी होने का भी ज़िक्र किया था। जजों के इस्तीफ़े के ज़्यादातर मामले बॉम्बे उच्च न्यायालय के हैं। इन इस्तीफ़ों की वजह चाहे जो रही हो; लेकिन न्यायाधीशों की कमी के दौर में उनके इतनी बड़ी संख्या में इस्तीफ़े देना चिन्ता का विषय है। सवाल यह है कि क्या इस तरह न्यायाधीशों के इस्तीफ़े स्वैच्छिक हो सकते हैं? जैसा कि कई न्यायाधीशों ने यही कहकर इस्तीफ़ा दिया है। महिला ज़िला न्यायाधीश मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि उनके इस्तीफ़े को स्वैच्छिक नहीं माना जा सकता। इसमें कोई दो-राय नहीं कि सरकारें और ता$कतवर लोग अपने पक्ष में फ़ैसले चाहते हैं, जिसके आधार पर उनके साथ बर्ताव होने की बातें भी सामने आती रहती हैं। कुछ पूर्व न्यायाधीशों को सरकार के मुताबिक काम करने का इनाम उनकी संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के रूप में मिला है, जिसका एक उदाहरण सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई हैं।

लोग यही मानते हैं कि न्यायाधीश का मतलब न्याय का देवता होता है और इसी सोच के साथ लोग अपने साथ हुए अन्याय के ख़िलाफ़ कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते हैं। ऐसे में न्यायाधीशों को किसी के दबाव में न आकर इस बात का ख़याल करना चाहिए कि उनकी नियुक्ति ही न्याय करने के लिए हुई है। हालाँकि न्यायाधीश भी समाज का ही एक हिस्सा हैं। उनका भी परिवार होता है। लेकिन न्यायाधीशों का इस्तीफ़ा या डर आपराधिक सोच वाले लोगों और राजनीतिक ता$कत का $गलत इस्तेमाल करने वालों का हौसला बढ़ाता है।  ऐसा नहीं है कि न्यायाधीशों के फ़ैसलों में कोई कमी होती है; लेकिन अगर उन पर राजनीतिक दबाव या किसी अपराधी का दबाव हो, तो उन्हें अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए उन पर दबाव देने वालों के नामों को सार्वजनिक करते हुए अपनी सुरक्षा की माँग रखनी चाहिए। हो सकता है कि इससे न्याय और न्यायाधीशों के प्रति लोगों की आस्था और मज़बूत हो और वे न्यायाधीशों के पक्ष में खड़े हो सकें। इससे उन लोगों का हौसला भी पस्त होगा, जो अपनी मर्ज़ी से फ़ैसला कराने का दबाव कोर्ट पर बनाते हैं।

वैचारिक अवसान के दौर में भाजपा!

शिवेन्द्र राणा

यूनानी राजनीतिज्ञ पोलीबियस कहते हैं- ‘प्रत्येक व्यक्ति अथवा राजनीतिक जीवन अथवा व्यवसाय में विकास चरमोत्कर्ष तथा ह्रास का एक नैसर्गिक सोपान है। अपने चरमोत्कर्ष पर ही प्रत्येक वस्तु अपनी श्रेष्ठता पर होती है।’

भारतीय राजनीतिक-सामाजिक हलचल को देखें, तो क्या भाजपा का सर्वश्रेष्ठ समय बीत चुका है और उसकी राजनीतिक सत्ता ढलान पर है। पिछले कुछ महीनों की उसकी राजनीतिक बेचैनी, जैसे- नयी कार्यकारिणी, कई पुराने और वरिष्ठ सांसदों के टिकट काटने की घोषणा, जाति आधारित छोटे क्षेत्रीय दलों से गठबंधन, नूंह और मणिपुर हिंसा के आधार पर धार्मिक-जातिगत गोलबंदी आदि मुद्दों से तो यही लगता है।

क्या भाजपा घबरायी हुई है? कहीं ये घबराहट ‘इंडिया’ गठबंधन के बैनर तले विपक्षी एकजुटता और 2024 के आम चुनाव में सत्ता गँवाने की तो नहीं है। सन् 2014 में संप्रग सरकार के पिछले 10 वर्षों के कार्यकाल के विरुद्ध देश में मौज़ूद भारी एंटी इनकंबेंसी, गुजरात मॉडल का विकास और मज़बूत नेतृत्व के दावे के समक्ष जनता ने भाजपा को सत्ता सौंप दी। लेकिन अब देश पुन: पिछले दशक की मनोदशा में लौट चुका है। इसकी मूल वजह पार्टी का वैचारिक अवसान है, जिससे वर्तमान सरकार जूझ रही है। ऐसा क्यूँ है? क्योंकि जब सत्ताएँ निकृष्ट, निरंकुश होकर नैतिकता की सभी सीमाएँ मिटा दें, तो राष्ट्र अराजकता की स्थिति में पहुँच जाता है। जब किसी सत्ता का ध्येय येन-केन-प्रकारेण अपनी सार्थकता बनाये रखना हो, तब उसूलों की तार्किक बातें बेमानी होती हैं। जब सरकार का लक्ष्य जनरक्षण के बजाय दलालों की वसूली का संरक्षण हो, तो ईमानदारी के नारे गालियों जैसे लगते हैं। जब सरकार का ध्येय जाति आधारित सामाजिक विघटन पैदा करना हो, तो राष्ट्र निर्माण की उद्घोषणा राष्ट्रीय अपमान का आभास देता है। जब सत्ता का इरादा क़ानून-व्यवस्था की स्थापना के बजाय अपराधियों-भ्रष्टाचारियों का संरक्षण हो, तो सामाजिक मान्यताओं का कोई अर्थ नहीं रह जाता। जब विकास के नाम पर सरकार के वरदहस्त प्राप्त लुटेरे राष्ट्रीय संसाधनों की लूट-खसोट में लिप्त हो, तो सुशासन के दावे बेमानी प्रतीत होते हैं।

अत: भाजपाई अमृत-काल के चाहे जितने नारे लगाये; लेकिन सत्य यही है कि वसूली और परिवारवाद इस समय चरम पर है। राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों-मंत्रालयों में दलालों और भ्रष्ट तत्त्वों का बसेरा एवं विकास के नाम पर आर्थिक अराजकता का बोलबाला है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर विरोधी स्वर दबाये जा रहे हैं। फिर भी आश्चर्यजनक रूप से एक राजनीतिक-सामाजिक और प्रबुद्ध वर्ग ऐसे सत्ता-धन लोभियों का प्रशंसक बना बैठा है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ठीक ही कहते हैं- ‘पैसा कमाइए, पूरा देश आपको अच्छा व्यक्ति कहने की साज़िश रचेगा।’

एक दौर था, जब अटल, आडवाणी, नानाजी देशमुख की पीढ़ी के नेता भाजपा को ‘पार्टी विद् डिफरेंस’ कहते थे, तो आम कार्यकर्ता गर्व से भर उठता था। लेकिन नयी परिस्थितियाँ षड्यंत्रकारी हैं। अब भाजपा को कम-से-कम डॉ. मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय एवं अटल, आडवाणी की तस्वीरें अपने मुख्यालयों एवं कार्यक्रम स्थलों से हटाते हुए उनका नाम लेने से बचना चाहिए; क्योंकि इससे पार्टी के अभियान को भले ही लाभ मिलता हो, परन्तु ऐसे व्यक्तित्वों का अपमान ही होता है। हालाँकि वर्तमान राजनीतिक दशा पर आरएसएस की बेबस चुप्पी अजीब है। भाजपा के गठन के पश्चात् यह पहला दौर है, जब उसका नेतृत्व सैद्धांतिक विचलन की स्थिति में भी न सिर्फ अपने मातृ संगठन संघ पर हावी है, बल्कि निरंतर दबाव बनाने में सफल रहा है। आश्चर्य तब अधिक होता है, जब वर्तमान नेतृत्व विशुद्ध संघी संस्कारों में दीक्षित हो। सर्वविदित है कि प्रधानमंत्री संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रहे हैं। अत: यह समय संघ के लिए भी आत्ममंथन का विषय है कि कैसे और किन परिस्थितियों में राजनीतिक विषाक्तता उसकी सांस्कृतिक गतिविधियों पर हावी होती गयी है? कैसे उसके संस्कारों में दीक्षित काडर सत्ताजनित अहंकार में सैद्धांतिक द्रोह पर उतर आते हैं?

बहुत सूक्ष्म विश्लेषण के बजाय सामान्य परिपेक्ष्य में देखें, तो सत्ता हेतु भाजपा का वैचारिक अवसान स्पष्ट दिखेगा। जैसे भारतीय राजनीति में अब परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं रहा। पूर्व में भाजपा एवं वामदलों को ही इस मुद्दे पर विरोध का नैतिक अधिकार प्राप्त था; क्योंकि इन्हीं दोनों ने वंशवाद को सांगठनिक रूप से कभी प्रश्रय नहीं दिया था। लेकिन अब भाजपा परिवारवाद-वंशवाद के विषकुंड में आकंठ डूबी है और गठबंधन के आवरण में सुभासपा, निषाद पार्टी, अपना दल जैसी वंशवादी पार्टियों को संरक्षित करने में भी लगी है। अब तो राकांपा, भारत राष्ट्र समिति, वाईएसआर कांग्रेस को भी गठबंधन का निमंत्रण मिल ही रहा है। भारतीय राजनीति में भाजपा ने परिवारवाद का सबसे अधिक विरोध किया है। किन्तु आज वही संस्थागत रूप से वंशवाद को संरक्षण दे रही है। दूसरी ओर अस्तित्त्व के लिए संघर्षरत वामदल वंशवादियों के साथ गठबंधन में हैं, इसलिए अब इसके विरोध का कोई नैतिक पक्ष बचा भी नहीं है। अत: एक बात तो तय है कि अब भारतीय राजनीति में वंशवाद-परिवारवाद मुद्दा नहीं रह गया है।

सत्ता के लिए किसी वैचारिक आन्दोलन के चारित्रिक पतन का सबसे ज्वलंत उदाहरण भाजपा है। एक वो भाजपा भी रही है, जहाँ बाबरी ढाँचे के ध्वंस की ज़िम्मेदारी एवं अपने सैद्धांतिक निष्ठा के लिए कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री की कुर्सी को ठोकर मार दी थी। आज उसी सत्तालोलुप भाजपा द्वारा संवैधानिक निष्ठा एवं राजनीतिक नैतिकता को ताक पर रखकर पार्टियाँ तोड़ी जा रही हैं। विधायक-सांसद ख़रीदे जा रहे हैं। जनप्रतिनिधियों को ईडी और सीबीआई का डर दिखाकर प्रताडि़त किया जा रहा है। विभिन्न राज्यों में जननिर्वाचित सरकारें गिरायी जा रही हैं। ऑपरेशन लोटस के नाम पर पिछले कुछ वर्षों से मचायी गयी राजनीतिक लूटमार किसी से छिपी नहीं है। ध्येय बस इतना है कि येन-केन-प्रकारेण अपनी सत्ता बनी रहे।

कभी इसी भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने हवाला कांड में नाम आने पर न्यायालय से बेदा$ग साबित न हो जाने तक राजनीति से संन्यास ले लिया था। आज वही पार्टी देश भर के भ्रष्ट तत्त्वों को अपनी वॉशिंग मशीन के ज़रिये निरंतर समर्थन की सफ़ेदी से शुद्ध एवं बेदा$ग दिखा करके लोकतांत्रिक पदों पर स्थापित कर रही है। हर राजनीतिक दल ने भारतीय राजनीति में अच्छी या बुरी कोई नयी परम्परा स्थापित की है। जैसे कांग्रेस ने वंशवाद, जनता दल ने पिछड़ावाद, बसपा ने बहुजनवाद आदि की शुरुआत की; वैसे ही भाजपा का नवाचार उसकी भ्रष्टाचारी शुद्धिकरण पद्धति है। देश भर के चोर-उचक्के, लम्पट, गुंडे-बदमाश और भ्रष्टाचारी भाजपा की सदस्यता लेते ही तुरन्त शुद्ध, पवित्र, ईमानदार और धर्मात्मा बन जाते हैं। जैसे सुभासपा एनडीए का हिस्सा बन चुकी है, तो भाजपाई परम्परानुसार मुख़्तार अंसारी और उनके परिवार के लोग अब देश भक्त एवं ईमानदार होने का सर्टिफिकेट पा चुके हैं। अब इनके विरुद्ध कार्रवाई रुकेगी ही।

अच्छा है, अब भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार-वंशवाद पर आरोप-प्रत्यारोप नहीं होंगे। क्योंकि ‘पार्टी विद डिफरेंस’ की अवधारणा तो कब की मर चुकी है। अब हमाम में सभी नंगे हैं। लेकिन सत्ता के अहंकार और छद्म ईमानदारी के आवरण में चयनित विपक्षी नेताओं का क़ानूनी उत्पीडऩ सरासर अनुचित है। सरकार को समझना होगा कि ईडी और सीबीआई के ज़ोर पर लम्बे समय तक राजनीतिक विरोध नहीं दबाया जा सकता।

इसके अतिरिक्त अब हिन्दुत्व के मुद्दे की सार्थकता बची नहीं है; क्योंकि उसके पीछे की अवसरवादी सत्ता लोलुपता जनता देख रही है। अपने नौ वर्ष के सत्ताकाल में भाजपा सरकार ने दिखाया है कि उसकी प्राथमिकता हिन्दुत्व नहीं, बल्कि वह चुनावी राजनीति का अस्त्र मात्र है। क्योंकि जिन तौर-तरीक़ों और योजनाओं-भाषणों के लिए भाजपा विपक्ष पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है, वो सब अब ख़ुद उसके सत्ता-काल में चलायमान हैं। तो इसका तात्पर्य यह है कि आपकी कोई सैद्धांतिक निष्ठा नहीं है। सत्ता के लिए ये किसी भी स्तर पर उतर सकते हैं। जहाँ तक मोदी ब्रांड की बात है, तो वह बहुत हद तक अपनी साख गवाँ चुके हैं। रहा विकास का मुद्दा, तो जो चमक दिख रही है, वो नितिन गडकरी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ है। वरना गडकरी को पाश्र्व में धकेलने की गुजराती लॉबी की तिकड़में चली होतीं, तो यहाँ भी केवल लफ़्फ़ाज़ी ही बचती।

भाजपा के पितृपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने सन् 1999 में एनडीए सरकार के गठन के समय पार्टी को चेताते हुए कहा था- ‘सत्ता का मद और अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए शासकीय मशीनरी के दुरुपयोग से बचना होगा; क्योंकि ठीक इन्हीं बुराइयों के कारण कांग्रेस इतने अपयश की पात्र बनी थी।’

लेकिन भाजपा ने तब भी नहीं सीखा था। वह फील गुड और शाइनिंग इंडिया के दम्भ में आश्वस्त थी, जिसका नतीजा शर्मनाक पराजय थी। मगर भाजपा ने अब भी नहीं सीखा है। अब वह मोदी-मोदी तथा खोखले हिन्दुत्व के नारों के भुलावे में है। इस बार भी इतिहास अपनी नियति को दोहराएगा, इसकी पूरी सम्भावना है। सन् 2004 में भाजपा की पराजय की समीक्षा करते हुए लालकृष्ण आडवाणी लिखते हैं- ‘भाजपा की हार का अन्य कारण सत्ता के दौरान अपने वैचारिक क्षेत्र की उपेक्षा करना रहा।’ क्या पथभ्रष्ट भाजपा सरकार के रूप में इतिहास स्वयं को नहीं दोहरा रहा?

हालाँकि आडवाणी के संदेश का कोई विशेष अर्थ वर्तमान पार्टी के लिए नहीं है। क्योंकि जो भाजपाई सत्ता-अहंकार में अपने पूर्वजों की इज़्ज़त नहीं करते, वे उनके संदेशों को क्या सम्मान देंगे? वैसे भी भाजपाई सत्ता अपने संध्या-काल की ओर अग्रसर है। बमुश्किल एक और आम चुनाव में धोखाधड़ी आधारित फ़तेह और उसके बाद प्रचंड सत्ता विरोधी लहर के साथ लम्बे समय तक विपक्ष की सीट उसका प्रारब्ध है। अत: ऐसे दौर से गुज़र रही भाजपा से समझदारी की उम्मीद बेमानी है। अन्तिम समय में रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था- ‘जिस दिन ब्रिटिश सत्ता की धारा सूखेगी, तब अंग्रेज अपने पीछे पता नहीं कितना कीचड़ छोडक़र जाएँगे।’

ऐसा ही कुछ वर्तमान भाजपा सरकार के साथ है। उसकी विदाई तो तय है। किन्तु अपने पीछे ये लोग कितना कीचड़, कितनी नयी स्थापित ग़लत परम्पराएँ, कितना भ्रष्टाचार, कितनी अनैतिकता, कितना राजनीतिक विद्वेष, कितनी सामाजिक कटुता छोडक़र जाएँगे? आज यह यक्ष प्रश्न है।

(लेखक पत्रकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

बनारस में विनोबा-जे.पी. की विरासत ध्वस्त

आचार्य विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन को कौन भूल सकता है। आज की पीढ़ी भले ही भूल चुकी हो, मगर इससे पिछली पीढ़ी तो नहीं भूल सकती। इतिहास भी नहीं भूल सकता। विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन ने दुनिया में एक नया अनोखा इतिहास रचा था। आचार्य विनोबा भावे ने 14 साल तक पूरे देश के गाँवों में घूम-घूमकर लगभग 50 लाख एकड़ भूमि को अमीरों से दान में लेकर उसे निर्धनों को बाँटा था, जिससे निर्धनों को आजीविका को साधन मिल सके एवं वे निर्धनता से बाहर निकल सकें।

सन् 1960 में भूदान यात्रा के दौरान ही आचार्य विनोबा भावे ने वाराणसी (बनारस) में गंगा किनारे राजघाट में भारतीय रेलवे से 13 एकड़ भूमि का क्रय करके एक साधना केंद्र बनाया, जिसका उद्देश्य समाज निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण के लिए युवा रचनाकारों को तैयार करना एवं साहित्यिक पुस्तकों का प्रकाशन करना था। राजघाट की यह भूमि आचार्य विनोबा भावे के आग्रह पर तत्कालीन रेल मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने सर्व सेवा संघ को देने का निर्णय लिया था।

सन् 1960 में विनोबा भावे के वाराणसी पहुँचने पर राष्ट्रीय स्वयं संघ के दिग्गजों ने उनका स्वागत किया था, उन्हें अपने एक कार्यक्रम में बुलाकर उनका ऐतिहासिक भाषण भी सुना था। आचार्य विनोबा भावे की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘गीता प्रवचन’ एवं ‘कार्यकर्ता पाथेय’ भी उस समय के स्थापित सर्व सेवा संघ प्रकाशन से मँगवाकर संघ प्रचारकों को पढऩे को दी थीं। जिस जगह पर विनोबा भावे ने साधना केंद्र बनाया, वहीं जयप्रकाश नारायण ने गाँधी विद्या संस्थान बनाया, जिसे गांधियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडीज भी कहते हैं। सर्व सेवा संघ, राजघाट (वाराणसी) में सन् 1974 के आन्दोलन के समय संघ (आरएसएस), विपक्ष के नेता, जिसमें भाजपा नेता भी थे; एवं कार्यकर्ता जयप्रकाश नारायण से सलाह एवं आशीर्वाद लेने जाते थे।

जबरन क़ब्ज़ाई भूमि!

आरोप है कि निर्धनों को भूमि दिलाने वाले समाजसेवी विनोबा भावे एवं जयप्रकाश नारायण के विचारों को कुचलकर उनकी ऐतिहासिक विरासत सर्व सेवा संघ एवं गाँधी विद्या संस्थान को मिटाकर उनकी भूमि हड़पने पर केंद्र सरकार तत्पर है। सर्व सेवा संघ के कार्यक्रम संयोजक एवं सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज कहते हैं कि अकारण ही समन भिजवाकर इस क्रय की गयी भूमि को अवैध केंद्र सरकार ने इस पर कथित रूप से अधिकार जमा लिया है एवं आरोप लगाया है कि आचार्य विनोबा भावे एवं जयप्रकाश नारायण ने इस भूमि को अतिक्रमण करके हथिया लिया था। जबकि इस भूमि के क्रय के काग़ज़ एवं भुगतान का ब्योरा उपलब्ध है।

रामधीरज कहते हैं कि इस भूमि पर सरकार के आधिपत्य के विरुद्ध सर्व सेवा संघ एवं गाँधी विद्या संस्थान के लोगों ने आन्दोलन आरम्भ किया है, ताकि ये भूमि सर्व सेवा संघ को वापस मिल सके एवं इस भूमि से समाजसेवा की गतिविधियाँ चलायी जा सकें। वास्तव में विनोबा भावे एवं जयप्रकाश नारायण की विरासत वाली यह भूमि अत्यधिक महँगी एवं उपयोगी है, जिसके चलते सरकार की नीयत ख़राब हुई है। इस महँगी एवं उपयोगी भूमि को सरकार अपने चहेतों को देना चाहती है, ताकि इस भूमि से वे मोटी कमायी कर सकें।

अनेक विनोबा-जेपी समर्थक मौन

विडंबना यह है कि जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन से निकले नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, शिवानंद तिवारी, राजनाथ सिंह एवं कई अन्य सांसद, विधायक लाचारों की तरह मौन हैं। कई बड़े पत्रकार एवं विचारक, जो गले में ढोल बाँधकर जयप्रकाश नारायण एवं विनोबा भावे के गीत गाते थे; आज प्रशासन की अतिक्रमणवादी नीति का विरोध करने की जगह चुप होकर बैठे हैं। अभी तक किसी ने भी आचार्य विनोबा भावे एवं जयप्रकाश नारायण की विरासत को बचाने के लिए संकल्प नहीं लिया है एवं न ही सरकार से इस बारे में कोई प्रश्न किया है।

रामधीरज कहते हैं कि अगर कल इन ऐतिहासिक इमारतों की तरह अन्य इमारतों को गिरा दिया जाएगा एवं अन्य ऐतिहासिक विरासतों पर इसी तरह जबरन क़ब्ज़ा किया जाएगा, तो क्या उन ऐतिहासिक विरासतों से फलीभूत हुए लोग रोएँगे अथवा ख़ुशी मनाएँगे? आज हो सकता है कि सर्व सेवा संघ को नेस्तनाबूत होता देख कुछ लोग मिठाइयाँ भी बाँटे, एक इतिहास को सरकार द्वारा मिटाने की ख़ुशी में; मगर कल को जब उनकी विरासतों को मिटाया जाएगा, तब वो क्या ऐसे ही ख़ुशी मनाएँगे? उन्हें याद रखना होगा कि जो अपने इतिहास को मिटाता है अथवा अपने इतिहास के मिटने की ख़ुशी मनाता है, इतिहास में से उसे भी मिटा दिया जाता है। अगर मिटाया नहीं जा सकता, तो फिर दुर्दांत अपराधी की तरह विध्वंसक अवश्य लिखा जाता है। रामधीरज कहते हैं कि कल जब विनोबा एवं जयप्रकाश की इस विरासत के निशान नहीं रहेंगे, तब हो सकता है कि कुछ लोग आएँ इसके निशान ढूँढने। कुछ फोटो खींचकर सहेज लेंगे एवं कुछ इसके मिटते इतिहास का समाचार लिखेंगे; यह बताते हुए कि यहाँ विनोबा भावे की विरासत हुआ करती थी। मगर तब कोई लाभ नहीं होगा। लोग अपने घरों में उन समाचारों को पढ़ लेंगे एवं शान्त बैठ जाएँगे। मगर आज जो कुछ लोग इसे बचाने के प्रयास में लगे हैं, उनके योगदान को लोग तब समझेंगे, जब उनकी विरासतों को मिटाने का प्रयास किया जाएगा। तब इतिहास मिटाने वालों एवं मौन रहने वाले लोगों में अंतर क्या होगा? रामधीरज कहते हैं कि क्या हम सब मौन होकर सरकार की साज़िशों को बैठकर देखते रहेंगे या सरकार की इन कोशिशों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँगे, प्रतिवाद करेंगे।

न्यायालय की अवहेलना

सर्व सेवा संघ की इस भूमि पर बने गाँधी विद्या संस्थान के विवाद की सुनवाई इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चल रही है। इस कारण कमिश्नर कौशलराज शर्मा द्वारा गाँधी विद्या संस्थान को किसी दूसरी संस्था को सौंपना विधि विरुद्ध है एवं माननीय न्यायालय की अवहेलना है। मगर 15 मई 2023 को अपराह्न 3:45 बजे सर्व सेवा संघ परिसर, राजघाट स्थिति गाँधी विद्या संस्थान के पुस्तकालय के सभी अधिकार राष्ट्रीय इंदिरा गाँधी कला केंद्र को दे दिये गये। जबकि संस्थान की सभी चल-अचल सम्पत्तियाँ सर्व सेवा संघ को पुन: वापस होनी है। इस सम्बन्ध में भी सर्व सेवा संघ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वाद दायर किया है, जो विचाराधीन है।

गाँधी विद्या संस्थान को लेकर सन् 2007 में वाराणसी के अपर ज़िला जज दशम के निर्देश पर वाराणसी के कमिश्नर की अध्यक्षता में एक संचालन समिति बनायी गयी थी, जिसे निर्देश थे कि उस समिति को संस्थान संचालित करना है। मगर समिति ने आज तक न तो कोई बैठक बुलायी एवं न ही इस संदर्भ में सर्व सेवा संघ को कोई सूचना दी। अब अचानक ही पुस्तकालय को निर्गत कर दिया गया। कमिश्नर ने सरकार को प्रसन्न करने के लिए यह अन्यायपूर्ण कार्य किया है।

रामधीरज कहते हैं कि 22 जुलाई को वाराणसी सर्व सेवा संघ में ज़िला प्रशासन एवं रेल प्रशासन द्वारा जबरन ग़ैर- क़ानूनी तरीक़े से बिना किसी आदेश के पूरे परिसर को क़ब्ज़ा कर ख़ाली करवा दिया। इतना ही नहीं, 60-70 वर्ष से चल रहे सर्व सेवा संघ प्रकाशन की पुस्तकों को और जयप्रकाश नारायण द्वारा स्थापित सर्वोदय पुस्तकालय की पुस्तकों को निकालकर बाहर सडक़ों पर फेंक दिया।

दु:खी होते हुए रामधीरज कहते हैं कि बहुत विनती करने पर भी उसको कूड़ा गाड़ी डंपर में भरकर नागेपुर गाँव में लोक समिति विद्यालय में भेज दिया गया। कूड़े के ढेर की तरह पड़ी हुई किताबों को देखकर आप समझ सकते हैं कि क़ीमती किताबों की क्या दुर्दशा प्रशासन द्वारा की गयी है। प्रशासन की इस हरकत से 50-60 के दशक से प्रकाशित विनोबा प्रवचन एवं भूदान यज्ञ की हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू की फाइलें नष्ट हो गयी हैं।

लगातार हो रहा विरोध

विनोबा भावे एवं जयप्रकाश नारायण की विरासत एवं भूमि को बचाने के लिए इस भूमि का स्वामित्व रखने वाला सर्व सेवा संघ संघर्षरत है। वर्ष 2023 के आरम्भ से ही सर्व सेवा संघ एवं गाँधी विद्या संस्थान के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता एवं विनोबा भावे की विरासत के वाहक अनेक लोगों समेत कांग्रेस के कुछ नेता, आम आदमी पार्टी के कुछ नेता, दख़ल संस्था की महिलाएँ, वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय के एनएसयूआई के छात्र संगठन, भारतीय किसान यूनियन, जेपी विरासत बचाओ संघर्ष समिति, सेवाग्राम आश्रम प्रतिष्ठान, गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, राष्ट्रीय गाँधी स्मारक निधि, लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान, जेपी फाउंडेशन, लोक समिति एवं लोक चेतना समिति की महिलाएँ आन्दोलन एवं प्रतिरोध सम्मेलनों का आयोजन लगातार कर रहे हैं।

15 मई, 2023 को गाँधी विद्या संस्थान के भवनों पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा करने से पहले 2 दिसंबर, 2020 को सर्व सेवा संघ की भूमि पर काशी कॉरिडोर के वर्कशॉप बनाने के लिए तत्कालीन ज़िलाधिकारी एवं वर्तमान कमिश्नर ने बलपूर्वक अवैध क़ब्ज़ा कराया था।

रामधीरज कहते हैं कि राजघाट परिसर के निकट खिड़किया घाट को नमो घाट बनाया गया है और काशी स्टेशन को मल्टी मॉडल स्टेशन बनाने की योजना है। इस उद्देश्य से वाराणसी कमिश्नर को ज़मीन चाहिए और उनकी नज़र सर्व सेवा संघ पर आकर टिक गयी है। सच तो यह है कि भूमि क़ब्ज़ाने के बहाने केंद्र सरकार गाँधीवादी केंद्रों को समाप्त करना चाहती है। इसी षड्यंत्र के तहत केंद्र सरकार के इशारे पर भारतीय रेलवे से सर्व सेवा संघ द्वारा क्रय की गयी भूमि को धोखाधड़ी एवं साज़िश बताते हुए उप ज़िलाधिकारी सदर के यहाँ मुक़दमा दायर किया गया है, जिसमें सर्व सेवा संघ द्वारा तत्कालीन राष्ट्रपति के आदेश से सन् 1960, सन् 1961 एवं सन् 1970 में क्रय की गयी भूमियों को अवैध बताया गया है। सर्व सेवा संघ पर उल्टा मुक़दमा करने का अर्थ है कि आचार्य विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णानंद एवं जगजीवन राम को कूटरचित दस्तावेज़ों के माध्यम से इस भूमि को हथियाने का दोषी तय कर दिया है, जो कि सरासर अन्यायपूर्ण एवं अनुचित है।

सर्व सेवा संघ के संदर्भ में 7 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय ने महत्त्वपूर्ण फ़ैसला दिया है। प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि वाराणसी कलेक्टर ने जो आदेश दिया है, वह विधि सम्मत् नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के अनेक आदेशों में इसका ज़िक्र है। इसी के साथ वाराणसी न्यायालय में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर 7/12 आवेदन निष्प्रभावी हो जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वाराणसी की ज़िला न्यायालय में जो प्रकरण जारी है, उसमें कलेक्टर के आदेश का भी किसी तरह से प्रभाव नहीं पडऩा चाहिए। सर्व सेवा संघ द्वारा दायर किये गये स्थगन आदेश पर वाराणसी न्यायालय को सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल सुनवाई का आदेश दिया है और कहा कि स्वामित्व के लिए सर्व सेवा संघ द्वारा बनारस न्यायालय में जो वाद दायर किया गया है, उस पर कलेक्टर बनारस एवं उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सर्व सेवा संघ व उत्तर प्रदेश गाँधी स्मारक निधि की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण व अरुंधती काटजू पैरवी कर रहे हैं। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने रेलवे को विध्वंस की कार्यवाही अगली सुनवाई तक स्थगित रखने को कहा था।

भवनों पर बुलडोजर

रामधीरज कहते हैं कि केंद्र सरकार एवं उसके मातहत अधिकारी अपने निहित स्वार्थ एवं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय महापुरुषों, देशभक्तों एवं देश पर सर्वस्व न्योछावर करने वालों को भी लांछित करके कलंकित बनाने के प्रयासों से बाज़ नहीं आ रही है। इस प्रकार आचार्य विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण ही नहीं महात्मा गाँधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर एवं अन्य इतिहास पुरुषों को भी नष्ट करने के प्रयासों में सरकार लिप्त है। सरकार ने काशी स्टेशन मल्टी मॉडल परियोजना के तहत क़रीब 40 भवनों को गिराया है। इन भवनों में चार और आठ फ्लैट थे, जिसमें रहने वाले लोगों को जबरन निकाल दिया। इसके अवावा गाँधी आश्रम के भवन में चार एवं सर्व सेवा संघ के प्रकाशन के भवन में चार हॉल थे। इन सबको गिरा दिया है। प्रशासन ने चालाकी यह की कि भवनों को गिराने का काम महीने के दूसरे शनिवार एवं रविवार को किया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया इस तोड़-फोड़ में बाधा न बन सके। भवनों को तोडऩे की कार्रवाई का विरोध करने सर्व सेवा संघ के पदाधिकारी एवं सदस्य रामधीरज, अरविंद कुशवाहा, नंदलाल मास्टर, डॉ. अनूप श्रमिक, तारकेश्वर सिंह, अनूप आचार्य, अवनीश, ध्रुव बड़वानी, जागृति राही एवं अन्य लोग पहुँचे, तो उन्हें गिर$फ्तार कर लिया। जागृति राही ने बताया कि मैं यहीं जन्मी। मेरे दो बच्चे भी यहीं जन्मे। मेरे दादा पंचदेव तिवारी स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं और सर्व सेवा संघ से आजीवन जुड़े रहे। मेरे पिता रामचंद्र राही भी सर्वसेवा संघ की सेवा में लगे रहे। आज हमको बिना कारण के ज़मीन के लालच में केंद्र सरकार ने बेघर कर दिया है।

रामधीरज कहते हैं कि जब देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, तब जिन लोगों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और आज़ाद देश के निर्माण में योगदान दिया, उनकी कर्मभूमि को 15 अगस्त आने से पहले ही ध्वस्त कर दिया। यह अमृतकाल का कैसा दृश्य है, जिसमें गाँधी, विनोबा भावे और जे.पी. के विचारों और विरासत को कुचला जा रहा है। गाँधी जी के सचिव महादेव भाई देसाई थे। उनके पुत्र नारायण देसाई जिस भवन में रहते थे, उस भवन को भी गिरा दिया गया है। सुनने में आया है कि अगर इस भूमि को हड़पने से प्रशासन बाज़ नहीं आया, तो सर्व सेवा संघ एवं अन्य संगठनों के अतिरिक्त भाजपा के रूठे हुए लोग भी केंद्र सरकर के इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले हैं।  

पर्यावरण की अनदेखी

विरोध के बावजूद विश्व स्तरीय वाढवण बंदरगाह के विस्तार को मिली मंज़ूरी

एम.एस. नौला / केशर सिंह बिष्ट

आख़िर प्रधानमंत्री मोदी के एक और ड्रीम प्रोजेक्ट के सामने मछुआरों व पर्यावरण वादियों का सपना चूर हो गया। स्थानीय लोगों के कड़े विरोध के बीच क़रीब 77,196 करोड़ रुपये की लागत के विश्व स्तरीय वाढवण बंदरगाह के विस्तार को मंज़ूरी दे दी गयी है। डहाणू तालुका पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (डीटीईपीए) द्वारा जेएनपीए के तहत बनाये जा रहे वाढवण बंदरगाह के लिए इस साल 31 जुलाई को आश्चर्यजनक रूप से एनओसी दे दी गयी। डीटीईपीए और सरकार के बीच की लड़ाई दशकों पुरानी है। दरअसल इस प्राधिकरण की स्थापना ही डहाणू तालुका के पर्यावरण की रक्षा करने और इस बंदरगाह को अनुमति न देने के सिलसिले में हुई थी।

वाढवण बंदरगाह विरोधी संघर्ष कृति समिति के सचिव वैभव वझे कहते हैं- ‘वाढवण बंदरगाह को सशर्त प्राथमिक एनओसी मिलने की अधिकृत आदेश की कॉपी अभी तक हमें नहीं मिली है। इस बंदरगाह के निर्माण के ख़िलाफ़ हमारी जो लड़ाई चल रही थी, वह क़ानूनी रूप से चलती रहेगी।’

बहरहाल इस मेगा पोर्ट का निर्माण दो चरणों में होगा। जेएनपीए पहले चरण में विकास कार्यों पर 44,000 करोड़ रुपये और दूसरे चरण के काम के लिए निजी क्षेत्र से 33,000 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे। इसमें बंदरगाह तक जाने वाली अलग-अलग सडक़ों का निर्माण, ब्रेकवाटर, ड्रेजिंग, रिक्लेमेशन, भूमि अधिग्रहण, रेलवे लाइन का निर्माण, बिजली आपूर्ति प्रणाली, बाँधों का निर्माण, जल आपूर्ति, कार्गो बर्थ का निर्माण आदि काम होंगे। स्थानीय मछुआरों के कड़े विरोध, सीआरजेड, केंद्रीय मंत्रालय से एनओसी और पर्यावरण विभाग से विभिन्न मंज़ूरी मिलने में देरी के चलते चार साल से इसका काम ठप पड़ा था। डीटीईपीए की अनुमति के आधार पर जेएनपीए का कहना है कि वह अब सभी आवश्यक अनुमति की मंज़ूरियों के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण विभाग को एक प्रस्ताव सौंपेगी। बता दें कि डहाणू तालुका पर्यावरण के मद्देनज़र बेहद संवेदनशील है। सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका के आधार पर केंद्र सरकार ने डहाणू तालुका पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण बनाया। इस प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष व रिटायर्ड न्यायाधीश स्वर्गीय धर्माधिकारी व प्राधिकरण सदस्यों ने बंदरगाह के निर्माण की अनुमति नहीं दी थी।

प्रॉफिट कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट के देवी गोयनका के अनुसार, डीटीईपीए के पास केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के समान पर्यावरण प्रदूषण के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने और कार्रवाई करने का अधिकार रहा है। लेकिन समय-समय पर मंत्रालय धन जारी न करके या प्राधिकरण के काम का समर्थन न करके डहाणू प्राधिकरण को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश करता रहा। इकोलॉजिकली रूप से संवेदनशील डहाणू तालुका मुंबई से लगभग 120 किलोमीटर उत्तर में महाराष्ट्र के पालघर ज़िले में स्थित है। डहाणू का ज़िक्र, उत्तर में गुजरात के वापी के रासायनिक गलियारों और दक्षिण में पालघर-बोईसर के औद्योगिक क्षेत्रों के बीच स्थित इस क्षेत्र में कुछ अंतिम बचे ग्रीन जोन के तौर पर किया जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, तालुका की 69.1 फ़ीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति है।

तालुका में 46 फ़ीसदी जंगल का इलाक़ा है। डहाणू को क्षेत्रीय फल एवं अन्न के कटोरे के रूप में जाना जाता है। यहाँ की अधिकांश आबादी खेती करने और मछली पकडऩे का काम करती है। मछली और झींगा मछली के साथ-साथ एक विशेष प्रकार की मछली बोम्बिल ‘बॉम्बे डक’ डहाणू से निर्यात होने वाले प्रमुख उत्पादों में से एक है। जेएनपीए के अध्यक्ष संजय सेठी के अनुसार, डीटीईपीए ने विभिन्न नियमों और शर्तों के तहत डहाणू तालुका में वाढवण बंदरगाह की स्थापना और विकास की अनुमति दी है। अब यहाँ बन रहे इस अत्याधुनिक बंदरगाह में प्रति वर्ष लगभग 300 मिलियन टन कंटेनर की आवाजाही होगी। यह दुनिया का सबसे बड़ा कंटेनर पोर्ट होगा। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् प्रोफेसर भूषण भोईर का आरोप है कि इस बंदरगाह का अध्ययन करने के लिए एनसीएससीएम (नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कॉस्ट मैनेजमेंट), एनआईओ (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी) और समुद्री धाराओं का ध्यान करने वाले सीडब्ल्यूपीआरएस को नियुक्त किया गया था। बंदरगाह के सम्बन्ध में विस्तृत अध्ययन करने के बाद तीनों संगठनों ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और डहाणू तालुका पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसे सच्चाई से अलग मैनिपुलेट किया गया है।

बंदरगाह के निर्माण से पर्यावरण को काफ़ी नुक़सान होगा और समुद्रीय जन-सम्पदा को भी भारी नुक़सान होगा। मत्स्य उद्योग के ख़त्म होने से कई भूमिपुत्र बर्बाद हो जाएँगे। इसके ख़िलाफ़ एकजुट स्थानीय लोगों ने सन् 1998 में वाढवण बंदरगाह विरोधी संघर्ष समिति का गठन किया था। तबसे कई बड़े-बड़े आन्दोलन, विरोध-प्रदर्शन हुए। मोर्चे निकले। भूख हड़ताल हुई। बंदरगाह के निर्माण के विरोध चल रहे आन्दोलन में महाराष्ट्र ही नहीं, गुजरात के तटीय क्षेत्र के लोग भी शामिल रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार अपने रुख़ पर क़ायम रही।