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रामसेतु और सबके अपने हेतु

जबर्दस्त राजनीतिक बवंडर के बावजूद सेतुसमुद्रम परियोजना को 2010 से पहले पूरा करने की सारी तैयारियां की जा रही हैं। सेतुसमुद्रम कॉर्पोरेशन के एक वरिष्ठ अधिकारी तहलका को बताते हैं कि पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद परियोजना के लिए ऐसा वैकल्पिक मार्ग चुनने की संभावनाएं बढ़ गई हैं जो सभी दलों को स्वीकार्य हो।

इस परियोजना से भारत के पूर्वी और पश्चिमी तट के बीच की दूरी काफी कम हो जाएगी। अभी ये दूरी तय करने के लिए जहाज़ों को श्रीलंका का चक्कर काटना पड़ता है। तमिलनाडु के नज़रिये से ये परियोजना पूरी होने के बाद समुद्री व्यापार में वृद्धि होगी, कोलाचेल और तूतीकोरिन बंदरगाहों का विकास होगा और उसके दक्षिणी ज़िलों की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार होगा।

लेकिन फिलहाल परियोजना की राह में कई रुकावटें हैं। रामेश्वरम तट के पास खुदाई का काम सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश के बाद रुका हुआ है। कोर्ट ने ये आदेश रामसेतु (एडम्स ब्रिज) तोड़ने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर दिया था जिनमें दलील दी गई थी कि एडम्स ब्रिज का निर्माण भगवान राम ने किया था और इसे तोड़ने से हिंदुओं की भावनाएं आहत होंगी। लेकिन भू-विज्ञानियों का कहना है कि विवादित स्थल प्राकृतिक रूप से निर्मित हुई चूना पत्थर की चट्टाने हैं और इस तरह की चट्टाने अन्य जगहों पर भी मौजूद हैं। इस मुद्दे ने उस वक्त राजनीतिक रुख अख्तियार कर लिया जब भाजपा और संघ परिवार ने इस परियोजना के विरोध में प्रदर्शन कर इसे धार्मिक रंग दे दिया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम का अस्तित्व न होने संबंधी एक शपथपत्र दाखिल करने के बाद यूपीए की जमकर आलोचना हुई थी। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के इस बयान ने कि राम कौन हैं और उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई कहां से की है, आग में और भी घी डालने का काम किया।

अनुमान है कि देश के पूर्वी और पश्चिमी तट के बीच सेतुसमुद्रम परियोजना के रास्ते यात्रा करने पर एक जहाज को 54 लाख रूपए तक का फायदा होगा।

सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में कई दिलचस्प बहसें देखने को मिली। पूर्व एटॉर्नी जनरल के पारसरन ने हिंदू मन्नानी नेता रामा गोपालन का पक्ष रखते हुए कहा कि राम सेतु एक पवित्र स्थल है और इसे तोड़ने से हिदुओं की भावनाएं स्थाई रूप से आहत होंगी। इस पर न्यायमूर्ति रवींद्रन ने पूछा, “क्या विकास के वास्ते इस सेतु के एक छोटे से हिस्से को छुआ जा सकता है? हमारे देश में हिमालय, गोवर्धन, तिरुपति पहाड़, नदियां और ज़मीन सभी पूजनीय हैं। आपके कहने का अर्थ है कि ज़मीन को नहीं छुआ जा सकता, नदियों पर बांध नहीं बनाए जा सकते और पहाड़ों को पत्थरों के लिए नहीं छुआ जा सकता?”

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को परियोजना के लिए वैकल्पिक रास्ते की संभावना तलाशने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने जानना चाहा कि क्या परियोजना का मार्ग धनुषकोडि से होकर जाने की बजाय थोड़ा घुमाया जा सकता है ताकि पुल को बचाया जा सके। दिलचस्प बात ये है कि राज्य सरकार के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि वर्तमान प्रस्तावित मार्ग को पूर्ववर्ती भाजपा की सरकार ने ही हरी झंडी दी थी और ये रास्ता इस परियोजना के लिए सबसे उपयुक्त है। वर्तमान मार्ग की पुष्टि केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल इस परियोजना के पुनर्निरीक्षण के लिए बनाई गई एक विशेष समिति ने भी की थी।

इस बीच एक नाटकीय घटनाक्रम में केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता फाली एस नरीमन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सीता को वापस पाने के बाद भगवान राम ने अपने जादुई धनुष से रामसेतु को तोड़ दिया था। उन्होंने कंबन रामायण (रामायण का तमिल संस्करण) का हवाला देते हुए कहा, “भगवान राम ने पुल को तीन हिस्सों में तोड़ दिया था। जिस चीज़ को तोड़ दिया गया हो वो पुल तो कतई नहीं हो सकता। हम उस चीज़ की पूजा नहीं कर सकते जिसे तोड़ दिया गया हो।”

इससे पहले सेतुसमुद्रम परियोजना अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के निशाने पर रही। जनवरी में जलसेना अध्यक्ष एडमिरल सुरेश मेहता ने एक विवादित बयान दिया, “इस परियोजना पर काम हो सकताहै पर पूरी होने पर ये सिर्फ छोटे जहाजों के काम आ सकेगी, बड़े जहाज इस रास्ते से नहीं गुजर सकेंगे।” दिलचस्प बात ये है कि इन्हीं सुरेश मेहता ने, 2005 में, जब वे पूर्वी नेवी कमान के मुखिया थे, इस परियोजना का समर्थन किया था। उनका कहना था, “ये परियोजना जहाजों दूरी को कम कर ईंधन की बचत करेगी। इन फायदों की वजह से ट्रैफिक में वृद्धि होगी जिससे लिट्टे की घुसपैठ भी नियंत्रित होगी।” केंद्रीय जहाजरानी मंत्री टीआर बालू उनके आरोपों को नकारते हुए कहते हैं कि 2006-07 के दौरान भारतीय बंदरगाहों पर आने वाले 79 फीसदी जहाज छोटे ही थे जिनका बोझ 50,000 टन से कम था।

राज्य सरकार के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि वर्तमान प्रस्तावित मार्ग को पूर्ववर्ती भाजपा की सरकार ने ही हरी झंडी दी थी और ये रास्ता इस परियोजना के लिए सबसे उपयुक्त है।

विशेषज्ञ बालू का समर्थन करते हैं। कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल के प्रोफेसर एम सुब्रमण्यम मीडिया द्वारा इस परियोजना के सकारात्मक पहलुओं की अनदेखी की आलोचना करते हैं। उनका अनुमान है कि देश के पूर्वी और पश्चिमी तट के बीच सेतुसमुद्रम परियोजना के रास्ते यात्रा करने पर एक जहाज को 54 लाख रूपए तक का फायदा होगा। ये अनुमान वर्तमान ईंधन मूल्यों पर आधारित है। परियोजना के तहत थोन्डी और रामेश्वरम में दो बहुउद्देश्यीय बंदरगाह और मूकियार, सेतुभयछत्रम और मुथुपेट में मछली पकड़ने के तीन बंदरगाह बनने थे। कन्याकुमारी के कोलाचेल बंदरगाह को एक मुख्य ट्रांस शिपमेंट कंटेनर केंद्र के रूप में विकसित करने की कोशिशें जारी हैं।

तमिलनाडु के दक्षिणी ज़िलों में परियोजना के प्रति जबर्दस्त समर्थन देखा जा सकता है। जून में तमिलनाडु चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (टीएनसीसीआई) ने इस मुद्दे पर मदुरै में एक गोष्ठी भी आयोजित की थी। ‘सेतुसमुद्रम परियोजना पूर्ण करने में दुविधा क्या है?’ इसमें अलग-अलग क्षेत्रों के वक्ताओं ने केंद्र से इस परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने का निवेदन किया था। “ये परियोजना दक्षिणी ज़िलों के आर्थिक विकास को तेज़ करेगी। इसे काफी पहले ही बन जाना चाहिए था। इसे सियासी या धार्मिक वजहों की भेंट नहीं चढाया जाना चाहिए,” टीएनसीसीआई के अध्यक्ष एस रेथिनावेलु तहलका से कहते हैं।

देश के सर्वाधिक पुराने मठों में से एक मदुरै अधीनम के आचार्य अरुणागिरिनाथ नानासम्बन्दा देसिका परमाचार्य इस परियोजना के कट्टर समर्थक हैं। वो कहते हैं कि इस परियोजना को हिंदुओं की भावनाओं को आहत किए बिना जल्द से जल्द शुरू किया जाना चाहिए।

थेवर स्थित संगठन ऑल इंडिया मूवेन्दर मुन्नानी कझगम के नेता एन सेतुरामन, भाजपा द्वारा अपने शासनकाल में इस परियोजना को अनुमति दिए जाने के बावजूद अब राजनीतिक फायदे के लिए इसकी राह में रोड़े अटकाने की निन्दा करते हैं। नादर और दलितों के अलावा थेवर तमिलनाडु के दक्षिणों ज़िलो में एक प्रभावशाली जाति हैं।

एमडीएमके मुख्यालय के सचिव के एस राधाकृष्णन के मुताबिक करुणानिधि ने भगवान राम के खिलाफ उल्टे-सीधे बयान देकर परियोजना की राह में रोड़ा अटका दिया। दूसरी तरफ डीएमके अपने बयान से पीछे हटने को तैयार नहीं है। पार्टी की सांसद और करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी कहती हैं कि डीएमके विश्वासों पर सवाल करने की परंपरा वाली पार्टी है। “तमिलनाडु में शैव संतों ने सदियों पहले कहा था कि फूल चढ़ाकर और पत्थरों पर मंत्र लिखकर उसे ईश्वर नहीं कहा जा सकता। जबकि भगवान असल में आपके भीतर ही हैं।” वो कहती हैं कि डीएमके के राजनीतिक विरोधी जिनमें एआईएडीएमके भी शामिल है, पहले इस परियोजना के समर्थन में थे लेकिन अब वे इसका विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि डीएमके सत्ता में है।

पी सी विनोज कुमार

क्या है रामसेतु? 

1966 में मिहिर सेन ने दुनिया के 6 सबसे संकरे जलमार्गों को तैर कर पार करने का रिकॉर्ड बनाया था। इनमें श्रीलंकाई समुद्र तट तलाईमन्नार से भारतीय हिस्से धनुषकोडि के बीच का जलमार्ग भी था। हिंद महासागर के इस हिस्से से बड़े जहाज और नौकाएं नहीं गुजर सकते क्योंकि यहां पानी की गहराई मात्र डेढ़ से साढ़े तीन मीटर तक ही है। इसकी तलहटी मायोसीन युग के चूना पत्थर की मोटी तह से बनी है। अंग्रेजों ने इस उथले समुद्री हिस्से को एडम्स ब्रिज नाम दिया और भारतीय हिंदू इसे रामायण में वर्णित राम सेतु के नाम से जानते रहे । आज कोच्चि या पश्चिमी तट से चेन्नई या फिर पूर्वी तट के किसी अन्य बंदरगाह तक जाने के लिए जहाजों को इस उथले जलक्षेत्र की वजह से श्रीलंका का चक्कर काटना पड़ता है। 2,427 करोड़ रूपए की सेतु समुद्रम परियोजना का उद्देश्य पाक खाड़ी से मन्नार की खाड़ी के बीच 44.9 नॉटिकल मील की दूरी का रास्ता तैयार करना है। इससे पश्चिमी और पूर्वी तट के बीच की यात्रा 400 नॉटिकल मील या 21 घंटे तक कम हो जायेगी।

सी डी की ए बी

      क्लास में ड्यूटी लगा दी गयी कि बच्चों को सी डी की ए बी सी डी बतायी जाये, सो साहब शुरु हुआ। 

      बच्चो सीडी के बारे में क्या जानते हो-मैंने शुरुआत की।      

      प्रियंका चोपड़ा जी की सीडी होती है, राखी सावंतजी की सीडी होती है। कलियों का चमन बनता है- गाने की भी सीडी होती है, , जिसमें काम करने वाले बहुत कम कपड़े पहनते हैं या पहनती हैं। सरकार बनाने और गिराने की सीडी भी होती है, इसमें काम करने वाले यूं तो पूरे कपड़े पहनते हैं, फिर पता नहीं क्यों लगता है कि वो कपड़े बगैर ही स्क्रीन पर आ रहे हैं-एक बच्चे ने बताया। 

      शटअप, कलियों के चमन और सरकार का कंपेरीजन मत करो, बी सीरियस-मैंने डांटा। 

      राइट, कोई कंपेरीजन नहीं हो सकता है, कलियों का चमन एकैदम साफ सुथरा होता है। कोई कली  दूसरी कली पर आरोप नहीं लगाती है कि हमसे पैसे लेकर उधर दूसरी तरफ भाग ली-दूसरे बच्चे ने क्लेरिफिकेशन दिया। 

      ओफ्फो, तुम समझ नहीं रहे हो, लोकतंत्र में सीडी के कई आयाम होते हैं। बच्चो बताओ, सीडी देखकर तुम्हे क्या समझ में आता है-मैंने बच्चों को नये सिरे से समझाने की कोशिश की। 

      सर यही समझ में आता है कि सीडी बहुत बोरिंग होती है। आप बताइए घंटों-घंटों सिर्फ नोटों के लेन देन को कोई कैसे  देखे। सीडी में कुछ इंटरेस्टिंग एलीमेंट्स डाले जाने चाहिए। जैसे इस पार्टी का बंदा नोट लेकर उस पार्टी में जा रहा हो, तो पीछे से वह गाना बजना चाहिए-हे जोनी गद्दार. आज नकद और कल उधार, हे जोनी गद्दार, सब चलता है खेल में, हे जोनी गद्दार लग जा तू भी सेल में। जोनी……………। एकदम सस्पेंस का सीन हो जायेगा। पब्लिक देख लेगी, पांच दस मिनट। अभी तो ये सीडी बहुत बोरिंग होती हैं-एक बच्चे ने पूरी गंभीरता से बताया। 

      शटअप, ये किस तरह की बातें कर रहे हो। तुम सीडी के सारे पक्ष समझने की कोशिश करो-मैंने जोर से डांटा। 

      जी बिलकुल सही कह रहे हैं।  सारे पक्ष नहीं समझ रहे हैं बच्चे। सरजी हम सीडी में नाट्य रुपांतरण डाल सकते हैं इस लेन देन को इंटरेस्टिंग बनाने के लिए।  मसलन शक्ति कपूरजी, गुलशन ग्रोवरजी को दिखा सकते हैं, नोटों का लेन देन करते हुए। पीछे से प्रियंका चोपड़ाजी गाना गा रही हों, अरे दीवानों मुझे पहचानो, मैं हूं डान। सर अब तक की सारी सीडियों में दिक्कत यह है कि लेडीज लोग का रोल नहीं दिखाया गया है। थर्टी परसेंट की डिमांड तो संसद में रिजर्वेशन को लेकर है। सीडी में प्रियंका चोपड़ा का नाट्य रुपांतरण दिखाया जाना चाहिए-एक बच्चा  सीडी के और नये आयाम लेकर सामने आ गया है। 

      ये तुम क्या नयी नयी बातें लेकर आ रहे हो-मैंने अबकी बार बहुत ही जोर से डांटा। 

      यस सर आप सही कह रहे हैं-एक छात्र उठा, यह पुरानी फिल्मी गीतों का प्रेमी था। 

      वह बोला-सर हमें पुराने गीतों को भी सीडी में जगह देनी चाहिए। वह वाला गीत भी इसमें डालिये, तेरा पीछा ना छोड़ूंगा, भेज दे चाहे जेल में। 

      तुम तो सारे फिल्मों लोगों को, विलेनों को ही पालिटिक्स में डालने पर आमादा हो। ये क्या हो रहा है-मैंने बच्चों से पूछा। 

      जी शक्ति कपूर, गुलशन ग्रोवर टाइप सारे पालिटिक्स में आने को तैयार हैं। कह रहे हैं कि उठाईगिरी, चोरी, डकैती, अपहरण करके भी एक झटके में पच्चीस करोड़ नहीं मिलते, यहां मिल जाते हैं-बच्चा जवाब दे रहा है। 

      बच्चो तुम सीडी की बात समझ नहीं पा रहे हो-मैंने निराश होकर कहा। 

      सर आप सीडी की बातें समझा ही कहां पा रहे हैं-सारे बच्चों ने एक साथ मिलकर कहा

      वैसे मुझे लगता है कि शायद बच्चे सही कह रहे हैं।

आलोक पुराणिक

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रात गई, बात वहीं की वहीं

ये कहानी पहले भी लिखी जा चुकी है और कोई संदेह नहीं कि आगे भी लिखी जाती रहेगी. विशेषज्ञ अपनी टिप्पणियां दे रहे हैं, देते रहेंगे. समाचार चैनल तरह-तरह की चीज़ें सामने लाते रहेंगे. पिछले साल नवंबर में भी ऐसा ही हुआ था जब फैजाबाद, वाराणसी और लखनऊ में बम धमाके हुए थे. इस साल मई में जयपुर में सिलसिलेवार धमाके हुए और 80 बेगुनाहों की जान चली गई. और अब बैंगलोर और फिर अगले दिन अहमदाबाद में बम धमाके होने के बाद एक बार फिर जैसे सब सोते से जागे और आतंकवाद फिर से सुर्खियों के केंद्र में आ गया है.

वही सवाल फिर से पूछे जा रहे हैं. ये किसने किया? कौन जिम्मेदार है? क्या इंडियन मुजाहिदीन एक आड़ है? क्या इस हमले के पीछे आईएसआई है या फिर देश का ही कोई संगठन? क्या ये हूजी है या लश्करे तैय्यबा या फिर जैशे मुहम्मद? क्या पोटा, फिर से लगाया जाना चाहिए? क्या एक फेडरल जांच एजेंसी ही ऐसे हमलों का जवाब है जो पिछले चार सालों से कुछ महीनों के अंतराल पर लगातार हो रहे हैं?

मगर इन सवालों के जवाब से पहले कुछ दूसरे सवालों का जवाब मिलना ज़रूरी है. जैसे कि पिछले साल नवंबर में उत्तर प्रदेश और इस साल मई में हुए जयपुर बम धमाकों के बीच की अवधि में एक और आतंकी हमला न होने देने के लिए क्या किया गया? राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ गरमागरम बहस के अलावा गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उनकी टीम ने और क्या किया?  राजे के ही शब्दों में कहें तो क्या खुफिया एजेंसियों की अति गोपनीय जानकारियां मौसम विभाग की जानकारियों से किसी मायने में बेहतर हैं? क्या इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की खुफिया क्षमताएं पर्याप्त हैं या फिर उनमें और पुलिस के तौर तरीकों में सुधार की जरूरत है?

पश्चिमी देशों में एक लाख की जनसंख्या पर 250 से 500 पुलिसकर्मी होते हैं. भारत में ये आंकड़ा 126 है जिसे बहुत खराब कहा जाएगा.

नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट फॉर कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर अजय साहनी कहते हैं, बैठकों में रेड अलर्ट, समन्वय समितियों और सुरक्षा कड़ी करने के उपायों पर तो चर्चा होती है मगर इन सवालों को कोई नहीं उठाता. ऐसा इसलिए क्योंकि जवाब शर्मिंदा करने वाला बल्कि कहा जाए तो अपमानजनक होगा.

भारत में हुए हालिया आतंकी हमले बता रहे हैं कि अपने इरादों को अंजाम देने के लिए आतंकवादियों को किसी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं बल्कि वे तो बड़ी आसानी से ये काम कर रहे हैं. इन सभी हमलों में प्रेशर कुकर या टिफिन में रखे बम इस्तेमाल किए गए हैं. इन्हें बनाने के लिए अमोनियम नाइट्रेट जैसे दहनशील पदार्थों का इस्तेमाल किया गया जिन्हें स्थानीय बाजारों से ही खरीदा गया था. 1993 में मुंबई में हुए धमाकों के उलट, जिसमें अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम द्वारा आरडीएक्स बाहर से भेजा गया था, हाल में हुए सभी धमाकों को स्थानीय आतंकियों ने अंजाम दिया है. रॉ के पूर्व निदेशक विक्रम सूद कहते हैं,केंद्र को बड़ी तस्वीर ध्यान में रखनी चाहिए. सुरक्षा तंत्र को चौकस करना चाहिए और उसके बाद इसकी राजनीतिक वजहों पर नजर डालनी चाहिए. आंकड़े दिखाने और बढ़ाने के लिए संदिग्धों को पकड़ने का असर वैसा ही होगा जैसा अमेरिका द्वारा हवाई बमबारी करके स्थानीय अफगानियों को मारने का हो रहा है.

सुरक्षा तंत्र पर एक नजर डालते हैं. साहनी बताते हैं कि 2007 में जाकर गृहमंत्रालय को ख्याल आया कि उसे संसद के सामने रखी जाने वाली अपनी रिपोर्ट में पुलिस और जनसंख्या के अनुपात के आंकड़े भी शामिल करने चाहिए. वे कहते हैं, दो दशक तक आतंकवाद का सामना करने के बाद जाकर किसी गृहमंत्री ने पहली बार इस तथ्य को लेकर जागरूकता दिखाई कि इस समस्या से निपटने के लिए देश में पुलिस और खुफिया विभाग के पास संसाधनों की भारी कमी है. हकीकत ये है कि थाने से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भारत की समूची न्याय व्यवस्था पूरी तरह से बीमारू हो चुकी है. ताजा आतंकी हमले की बारीकियों से भी नाजुक मसला असल में ये है

सवाल उठता है कि अपने देश में पुलिस-जनसंख्या का अनुपात क्या है? पश्चिमी देशों में एक लाख की जनसंख्या पर 250 से 500 पुलिसकर्मी होते हैं. भारत में ये आंकड़ा 126 है जिसे बहुत खराब कहा जाएगा. अंतराष्ट्रीय स्तर पर शांतिकाल में इस अनुपात को 10000:222 रखने का सुझाव दिया जाता है. इससे भी अहम तथ्य ये है कि भारत का ये अनुपात भी कुल स्वीकृत पदों पर आधारित है जिसमें से कई मामलों में ये स्वीकृति 1980 में दी गई थी. इसमें 20 फीसदी रिक्तियों को जोड़ कर जनसंख्या वृद्धि को भी शामिल कर दें तो स्थिति विकट हो जाती है. मगर बात केवल पुलिसकर्मियों की ही नहीं है, इंटेलीजेंस ब्यूरो जैसे विभाग के पास भी स्टाफ की कमी है. निश्चित रूप से एक डरावनी तस्वीर उभरती है. सूत्र बताते हैं कि एक अरब से ज्यादा की जनसंख्या वाले इस देश में आईबी के मात्र 3500 लोग खुफिया सूचनाएं जुटाने का काम कर रहे हैं. साहनी कहते हैं, इनका भी बस एक छोटा सा हिस्सा ही आतंकवाद के मोर्चे पर कार्यरत है.

आईबी को 50,000 अतिरिक्त आदमी चाहिए. आज हर कोई फेडरल जांच एजेंसी की मांग कर रहा है मगर पहले जो एजेंसियां हैं उनकी हालत तो सुधारिये.

इस समस्या के बारे में सब जानते हैं मगर एक के बाद एक आने वाली सरकारें बस फाइलें इधर-उधर खिसकाती रही हैं. गृह मंत्रालय के एक अधिकारी कहते हैं, कई सिफारिशें मेज पर पड़ी हैं मगर नेता ध्यान ही नहीं देते. उनकी आदत ही हो गई है कि कुछ देर तक आग बुझाओ और फिर अगला हमला होने तक सो जाओ.”  

समझा जा सकता है कि कोई फर्क क्यों नहीं पड़ता. शायद इसी घातक प्रवृत्ति के चलते 1999 में करगिल युद्ध के बाद सुरक्षा और इंटेलीजेंस की व्यापक समीक्षा रिपोर्ट को कभी भी लागू नहीं किया गया.?

एक और उदाहरण पर नजर डालें. 2001 में गिरीश सक्सेना समिति ने देश के सुरक्षा तंत्र पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इसमें खुफिया एजेंसियों के हर विभाग में व्यापक सुधारों की सिफारिश की गई थी. ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स ने इन सिफारिशों पर मंजूरी की मुहर भी लगा दी थी. मगर सात साल गुजर गए और बात जहां की तहां है. कुछ प्रतीकात्मक बदलावों को छोड़कर इस रिपोर्ट को अब तक लागू नहीं किया गया. रिपोर्ट के सुझावों में एक ये भी था कि आईबी में 3000 अतिरिक्त लोगों की नियुक्ति की जाए. मगर 2008 तक केवल 1400 अतिरिक्त पदों की स्वीकृति दी गई है. साहनी बताते हैं, आईबी को 50,000 अतिरिक्त आदमी चाहिए. आज हर कोई फेडरल जांच एजेंसी की मांग कर रहा है मगर पहले जो एजेंसियां हैं उनकी हालत तो सुधारिये.

गौरतलब है कि इस पहलू पर सक्सेना समिति ने पर्याप्त ध्यान दिया था. समिति का सुझाव था कि आईबी के तहत एक मल्टी एजेंसी सेंटर (मैक) और ज्वाइंट टास्क फोर्स (जेटीएफआई) की स्थापना की जाए. मैक को जहां आतंकवाद से संबंधित सूचनाओं को इकट्ठा करना था वहीं जेटीएफआई को उस सूचना को राज्य सरकारों के साथ बांटना था. ये दोनों विभाग काम तो कर रहे हैं मगर संसाधनों की कमी से जूझते हुए.

यही वो कमियां है जिनका आतंकी संगठन फायदा उठा रहे हैं. ये संगठन इतने दुस्साहसी हैं कि धमाके से पहले पुलिस और मीडिया को ईमेल भेज रहे हैं. वे न्याय व्यवस्था के प्रति भारतीय मुसलमानों के शिकवे को भी भुना रहे हैं जिससे उन्हें अपनी जंग के लिए नए सिपाही भर्ती करने में मदद मिलती है. इंडियन मुजाहिदीन द्वारा भेजी गई मेल के बारे में रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमन कहते हैं, ये संदेश सिर्फ उनकी कार्रवाई की चेतावनी ही नहीं है बल्कि उन कारणों को भी दर्शाता है जिनकी वजह से भारतीय मुसलमान इस कृत्य में शामिल होने का फैसला कर रहे हैं. इसका मुख्य बिंदु ये था कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में मुसलमानों के साथ काफी कड़ाई बरती जाती है जबकि हिंदुओं के साथ नरम व्यवहार होता है. इसमें इस्तेमाल भाषा, संदर्भ और मुद्दे खालिस हिंदुस्तानी थे और ये वही थे जिनके बारे में मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से में काफी नाराजगी है मसलन बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना, श्रीकृष्ण आयोग द्वारा दोषी पाए गए मुंबई के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का न होना, 1993 के मुस्लिम आरोपियों को कड़ी सजा और गुजरात दंगे.”

ये सारी बातें सिर्फ एक तरफ इशारा करती हैंउस तरफ जहां से हमने शुरुआत की थी, कि ये कहानी आगे भी तब तक लिखी जाती रहेगी जब तक सरकार की नींद नहीं खुलती और वो दो कड़वी सच्चाइयों की तरफ ध्यान नहीं देतीपहली आंतरिक सुरक्षा तंत्र को किस तरह दुरुस्त किया जाए और दूसरी, न्याय व्यवस्था के प्रति एक तबके के शिकवों को किस तरह दूर किया जाए.

तीसरे मोर्चे का प्रधानमंत्री

आज वामपंथियों के अतिरिक्त जनता दल(एस), आरएलडी, इनेलो, तेलगूदेशम पार्टी, टीआरएस आदि सभी दल सुश्री मायावती के साथ इसलिए खड़े हैं क्योंकि उनके पास जनाधार है। यह जनाधार क्यों और किन परिस्थितियों में आया, यदि उसे न समझा गया तो इस देश में सिद्धांतों की नहीं बल्कि मजबूरी, सुविधा और स्वार्थ की राजनीति ही होती रहेगी।

आज़ादी के तुरंत बाद पिछड़ों और दलितों में जागृति नहीं थी और सभी राजनैतिक दल कमोबेश सवर्णों  के नेतृत्व में कार्यरत थे। यही वह समय था जब राजनीति केवल स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था को बदलने पर भी होनी चाहिए थी। आज़ादी के तुरंत बाद लोगों को जिस तरह से चलने के लिए प्रेरित किया जाता, वे चल भी पड़ते। इतना अच्छा मौका हाथ से निकल गया, जिसकी भरपाई होना असंभव है। चाहे राजनेता हों, बुद्धिजीवी, साहित्यकार या समाजसेवी, सभी इसके गुनहगार हैं। दरअसल वे जिस जाति से थे, उसी मानसिकता के कारण यह भयंकर गलती हुई। 

समय रहते अगर सावधानी बरती गयी होती तो दबे पिछड़ों के नेता आज जातिगत भावनाओं को उकसाकर सस्ते में नेता न बन जाते। आज कम्युनिस्टों को मजबूरन मायावती की शरण न लेनी पड़ती। ब्राह्मणों को भी बसपा के दरवाजे से सत्ता में भागीदारी की जरूरत न पड़ती। यहां की सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी है कि बिना गलत काम किए या सिद्धांत के समझौते के लोगों को संगठित करना मुश्किल है। जाति के नाम पर लोग कुछ भी करने को तैयार हैं। हाल में गुर्जर आंदोलन से सीख ली जा सकती है कि जाति के नाम पर लोगों ने जान दे दी लेकिन देश के नाम पर शायद एक भी आदमी ऐसा करने वाला नहीं होगा। देश के नाम पर गिने चुने लोग ही अब तक जान देते रहे हैं। जिस तरह से जाति के नाम पर बहादुर गुर्जर पुलिस की गोलियां खा गए, यदि देश के नाम पर इतने लोग बलि देने को तैयार होते तो हम आज कहां पहुंच गए होते।

अगर सावधानी बरती गयी होती तो दबे पिछड़ों के नेता आज जातिगत भावनाओं को उकसाकर सस्ते में नेता न बन जाते।

22 जुलाई के घटनाचक्र के बाद यदि हम नए सिरे से सोचना नहीं शुरू करेगें, तो भूल जाएं कि कभी महाशक्ति बनेंगे और आने वाले 50 वर्ष में भी गांव और शहर के बीच दूरी कम हो पाएगी, साम्प्रदायिकता समाप्त हो सकेगी और जातीय भावनाएं कम होंगी। राजनीति और नेता समाज की उपज हैं। शुरू में गड़बड़ी फैलाने का काम नेताओं ने ही किया, लेकिन धीरे-धीरे इसमें जनता भी शामिल हो गयी। मुसीबत अब उन लोगों के लिए पैदा हो गयी है जो विकास, सिद्धांत एवं मानवता की राजनीति करना चाहते हैं। इस होड़ में पैसे का महत्व इतना बढ़ गया है कि अगर संगठन, सिद्धांत एवं कार्यकर्ता सभी हों तो भी बिना पैसे के मामला नहीं बन सकता। राजनीति में नोट का इस्तेमाल तो ऐसा हो गया है कि जैसे कार के चार पहिए में, एक पहिया न हो तो वह चल नहीं सकती।

कुछ पिछड़े और दलित, जातीय भावनाओं को भड़काकर राजनीति में जबर्दस्त रूप से सफल हुए और अब यह होड़ बढ़ती ही जा रही है। जाति के लोगों का भला हो या नहीं, ज्यादातर लोग इसी बात से खुश हैं कि उनकी जाति का नेता और दल हुकूमत में हैं। बहुजन समाज पार्टी के उभार से इसमें कोई दो मत नहीं है कि दलितों में हुकूमत की भूख जगी है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि वे खो भी बहुत कुछ रहे हैं। जब तक बसपा नहीं आयी थी, दूसरे दल दलितों के अधिकारों की बात करते थे। स्पेशल काँपोनेंट प्लान, 20 सूत्रीय कार्यक्रम, आरक्षण लागू करने का काम, खाली पदों पर भर्ती आदि सभी कांग्रेस की ही सरकार में हुए। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस को दलित वोटों का लालच हुआ करता था। जब से यह वोट कांग्रेस से कटा है, वह सिर्फ ऊपर से दलितों की बात करती है। इसको हम इस तरह से समझ सकते हैं कि न्यूनतम साझा कार्यक्रम में शामिल दलितोत्थान की बातें जैसे – निजी क्षेत्र में दलितों को आरक्षण, खाली पदों पर भर्ती, आरक्षण कानून बनाना, भूमिहीनों को भूमि आदि में से एक भी लागू नहीं किया गया। निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात कभी कभार प्रधानमंत्री एवं नौकरशाही के स्तर पर तो होती रहती है, लेकिन गंभीरता होती तो अब तक यह हो चुका होता। इसके विपरीत निजीकरण को बढ़ावा देकर रहा-सहा अधिकार भी समाप्त किया जा रहा है। परोक्ष रूप से बसपा ही इसके लिए जिम्मेदार है और वह स्वयं भी इन मुद्दों पर कुछ नहीं करती। योजनागत बजट का जो पैसा दलितों की आबादी के अनुपात में खर्च होना चाहिए, वही अगर कर दिया जाए तो भी बहुत बड़ा परिवर्तन हो सकता है। उपरोक्त बातों पर बहुत कुछ किया जा सकता है, बशर्ते कांग्रेस और यहां तक कि भाजपा को यह लालच हो जाए कि दलित का वोट उन्हें भी मिल सकता है।

देश की राजनीति जातीय भावना से अभिशप्त हो चुकी है। मंडल लागू करके कितना बड़ा काम वी पी सिंह ने पिछड़ों के लिए किया, लेकिन वे इस जाति से नहीं थे इसलिए उन्हें कभी वोट नहीं मिला।

बहुजन समाज पार्टी की सरकार जब भी उ0 प्र0 में बनी दलित अधिकार कम ही हुए हैं। तीसरी बार जब सुश्री मायावती मुख्यमंत्री थीं, तो उ0 प्र0 अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष, एस डी बागला उच्च अधिकारियों को सम्मन करके दलित उत्पीड़न की घटनाओं का समाधान करते थे। अधिकारियों ने मायावती से चुगली कर दी कि बागला जी उन्हें बुलाकर बैठा लेते हैं, जिससे वे अपना विभागीय कार्य नहीं कर पा रहे हैं। मायावती ने सलाह मांगी कि इसका समाधान क्या है? अधिकारियों ने कहा कि आयोग के अध्यक्ष का उच्च अधिकारियों को बुलाने का अधिकार छीन लिया जाए। ऐसा आदेश जारी हो गया और अब निचले स्तर का अधिकारी आयोग में हाजिरी लगाने पहुंच जाता है, ऐसे में समस्या का समाधान होने का प्रश्न ही नहीं उठता। जब वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे तो राम विलास पासवान आदि ने उनसे कहकर अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989, बनवाए। मायावती की सरकार ने इसके तहत 22 अपराधों में से 20 पर कार्यवाही न करने के लिए आदेश निकाला, जिसको हमने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करके दुरूस्त कराया वरना महेन्द्र सिंह टिकैत द्वारा की गयी जातिसूचक शब्द की टिप्पणी का बदला स्वयं मायावती न ले पाती। हाल में अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष, बूटा सिंह, ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का मुआयना करने के बाद, उद्योग सचिव को तलब किया तो उ0 प्र0 की सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका फाइल करके रोक लगवा दी कि आयोग द्वारा सचिव को ही बुलाना ज़रूरी नहीं है। इस तरह से तीन बड़े अधिकार सुश्री मायावती के कर-कमलों से छिने।

भविष्य में यदि मायावती प्रधानमंत्री बन भी जाती हैं तो पक्का है कि कुछ न कुछ दलितों-पिछड़ों के अधिकार घटेगें। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वामपंथी या और दल आत्ममंथन करें कि इसका क्या समाधान है? इन दलों को उन लोगों का साथ लेना पड़ेगा जो दलित और पिछड़ी जातियों से हैं और जो समतामूलक समाज, विकास की राजनीति, विश्वस्तरीय सोच आदि रखते हों, तभी मायावती जैसे नेताओं के बढ़ते हुए प्रभाव को कम किया जा सकता है। यदि यह नहीं किया गया तो भावी राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा लेकिन वह स्वस्थ एवं विकासोन्मुख नहीं होगा। भले ही प्रकाश कारत कहें कि उनके दल ने मायावती को प्रधानमंत्री के रूप में नहीं प्रस्तुत किया है, लेकिन परमाणु करार के मुद्दे पर दस दलों के तमाम नेता ऐसा कर चुके हैं। भविष्य में चाहे ये सारे दल मायावती का साथ छोड़ भी दें तो भी तीर कमान से निकल चुका है।

जिस तरह से उ0 प्र0 के दलितों में दलित मुख्यमंत्री बनाने की भूख जगी थी, उसी तरह आज दलित प्रधानमंत्री बनाने की भूख पूरे देश में बड़ी तेजी से जगी है। कमोबेश मायावती का काम हो चुका है। इस पर किसी दलित नेतृत्व से ही रोक संभव है, क्योंकि

देश की राजनीति जातीय भावना से अभिशप्त हो चुकी है। इस राजनैतिक गणित को समझना मुश्किल भी नहीं है। मंडल लागू करके कितना बड़ा काम वी पी सिंह ने पिछड़ों के लिए किया, लेकिन वे इस जाति से नहीं थे इसलिए उन्हें कभी वोट नहीं मिला।

डॉ. उदित राज

उदित राज, अनुसूचित जाति/जन जाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ और इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष हैं.

पिताजी ठीक ही कहते थे…

रेडियो पर किसी कार लोन वाले विज्ञापन में कोई गला फाड़ रहा था—“और मैं कार इसलिए भी नहीं लेता क्योंकि ऑफिस देर से पहुंचने का बहाना जो मिल जाता है.”

किसने कहा कि कार से जल्दी ऑफिस पहुँच जाते हैं? मेरे घर से ऑफिस की दूरी करीब 6-7 किलोमीटर है. कुछ महीने पहले अपनी मोटरसाइकिल से आराम से मैं, 10-15 मिनट में वहां पहुंच जाता था–हालांकि टाइम पर मैं तब भी कभी नहीं पहुंचा. फिर थोड़ी तनख्वाह मेरी और थोड़ी बीवी की बढ़ी तो शान दिखाने, खुद को आराम पहुंचाने और बीबी को सड़क चलते हरेक की घूरती निगाहों से बचाने के लिए कार ले ली. अब गनीमत रही तो आधा घंटे में, न रही तो आधा प्लस एक में, और फंस गया तो बस किसी तरह ऑफिस पहुंच भर जाता हूं. ऐसा क्यों भाई? जवाब है, कार, मोटरसाइकिल की तरह एक फुट जगह में से थोड़े ही निकाली जा सकती है. इतनी देर में तो शायद नहीं बल्कि पक्का ही समझें कि आदमी पैदल ही 6 किमी चल सकता है. ऑटो और बस में जाने पर भी, जहां थोड़ा अटके, उसे छोड़ कर दूसरा किया या दूसरी में बैठा जा सकता है. मगर अपनी जेम्सबांड की सुविधाओंरहित कार में जाने पर दिन के सबसे कीमती समय का एक बड़ा हिस्सा सड़क की भेंट चढ़ना ही चढ़ना है क्योंकि यातायात को व्यवस्थित और सड़कों को दुरुस्त करने वाला कोई तंत्र कहीं नज़र ही नहीं आता.

पहली कार थी और पार्किंग की विकट समस्या के चलते घर से आधा किलोमीटर दूर खड़ी करनी पड़ती थी. यानी कि बचपन में नये जूतों को तकिये के नीचे रख के सोने वाला, नई कार को घर की खिड़की से झांक के देख भी नहीं सकता था.

शुरू में शौक था तो कार में आधा पौना घंटा सड़क पर रहना इतना बुरा नहीं लगता था. पहली कार थी और पार्किंग की विकट समस्या के चलते घर से आधा किलोमीटर दूर खड़ी करनी पड़ती थी. यानी कि बचपन में नये जूतों को तकिये के नीचे रख के सोने वाला, नई कार को घर की खिड़की से झांक के देख भी नहीं सकता था. ज़ाहिर है कार के साथ रहना पहले अच्छा और बाद में उतना बुरा नहीं लगता हो…मगर अब तो मन कार का आदी होने के साथ-साथ, रोज़-रोज़ की धक्कमपेल और एफ एम स्टेशनों के घिसे हुए रिकॉर्डों से बुरी तरह त्रस्त हो चुका है…

एक दिन फिल्म जोधा अकबर देखने निकला तो अरबिंदो मार्ग पर आईआईटी से ठीक पहले जो जाम में फंसा तो निकलने की कोई राह ही नज़र नहीं आती थी…जानने की कोशिश की तो कोई एक्सीडेंट, चैकिंग जैसी तात्कालिक वजह नज़र ही नहीं आई…जो समझ आया वो ये कि ये यहां रोज़ की बात है. डेढ़ घंटे पहले निकलने वाला, फिल्म में आधा घंटा लेट पहुंचा. गुस्सा और हताशा इतनी थी कि फिल्म में भी देश, देश की समस्याओं इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को मन ही मन कोसता रहा…तभी फिल्म में अचानक एक दृश्य आया जिसमें बादशाह अकबर वेश बदलकर अपनी रियाया का हाल जानने जाते हैं. क्या देश के तारणहार भी, करोड़ों रुपया खर्च करके समस्याओं का कानों सुना और आंखों पढ़ा हाल जानने के बजाय, कुछ ऐसा ही नहीं कर सकते. क्या देश के हालात ऐसे डरावने और ये लोग इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई इन्हें न पहचाने तब भी इनकी जान को भयंकर खतरा है और आम आदमी के ऊपर हर समय मंडराने वाला ये खतरा इन खास लोगों के लिए मोल नहीं लिया जा सकता…या फिर देश की बागडोर थामने वाले ये सारथी अब 200 रुपये किलो वाले खास अल्फाँस आम के अलावा किसी भी आम चीज़ के नज़दीक तक नहीं जाना चाहते…या फिर उन्हें सब पता है और कदम केवल उठते दिखें इसलिए कमेटियों-शमेटियों का हो हल्ला होता रहता है. 

छोटे से गांव जैसे शहर में बचपन बीता और एक पड़ोसी की टीवी और दूसरे के अखबार में दिल्ली-बंबई के दृश्य देख मन ये सोच-सोच कर बड़ा दुखी होता था कि हमारे शहर में बड़ी-बड़ी चिमनियों जैसी इमारतें और सड़क पर पौं-पौं करती दौड़ती कारें क्यों नहीं हैं…शहर की सबसे व्यस्त सड़क पर अगर हम कभी एक मिनट में दो कारें निकलती देख लेते थे तो मन बाग-बाग हो सोचने लग जाता था कि अब हमारा शहर भी बस बड़ा बनने ही वाला है और अभी नहीं तो जब तक हम बड़े होएंगे तब तक तो ऐसा हो ही जाएगा. फिर हमारी ऐश ही ऐश होगी…आज लगता है कि पिताजी ठीक ही कहते थे जब कहते थे कि “मासूम बच्चे अगर दिल से कुछ चाहते हैं तो वो पूरा हो जाता है” और “संजू! बहुत सी बातें तुम बड़े होकर ही समझोगे…”

मेरा कस्बा अब शहर बन चुका है और मुझे इसके ऐसा होने और छुटपन में इसे ऐसा बनाने के लिए भगवान से प्रार्थना करने पर गहरा अफसोस है. भगवान को समझना चाहिए था कि नादानी में मांगी गई हर दुआ सही ही हो ऐसा थोड़े ही होता है.

संजय दुबे

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आतंक के मोहरे या बलि के बकरे ?

हर शुक्रवार की तरह 25 जुलाई को भी मौलाना अब्दुल हलीम ने अपना गला साफ करते हुए मस्जिद में जमा लोगों को संबोधित करना शुरू किया. करीब दो बजे का वक्त था और इस मृदुभाषी आलिम (इस्लामिक विद्वान) ने अभी-अभी अहमदाबाद की एक मस्जिद में सैकड़ों लोगों को जुमे की नमाज पढ़वाई थी. अब वो खुतबा (धर्मोपदेश) पढ़ रहे थे जो पड़ोसियों के प्रति सच्चे मुसलमान की जिम्मेदारी के बारे में था. गंभीर स्वर में हलीम कहते हैं, “अगर तुम्हारा पड़ोसी भूखा हो तो तुम भी अपना पेट नहीं भर सकते. तुम अपने पड़ोसी के साथ हिंदू-मुसलमान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते.”

तीस घंटे बाद, शनिवार को 53 लोगों की मौत का कारण बने अहमदाबाद बम धमाकों के कुछ मिनटों के भीतर ही पुलिस मस्जिद से सटे हलीम के घर में घुस गई और भौचक्के पड़ोसियों के बीच उन्हें घसीटते हुए बाहर ले आई. पुलिस का दावा था कि हलीम धमाकों की एक अहम कड़ी हैं और उनसे पूछताछ के जरिये पता चल सकता है कि आतंक की इस कार्रवाई को किस तरह अंजाम दिया गया. पुलिस के इस दावे के आधार पर एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने उन्हें दो हफ्ते के लिए अपराध शाखा की हिरासत में भेज दिया.

त्रासदी और आतंक के समय हर कोई जवाब चाहता है. हर कोई चाहता है कि गुनाहगार पकड़े जाएं और उन्हें सजा मिले. ऐसे में चुनौती ये होती है कि दबाव में आकर बलि के बकरे न ढूंढे जाएं. मगर दुर्भाग्य से सरकार इस चुनौती पर हर बार असफल साबित होती रही है. उदाहरण के लिए जब भी धमाके होते हैं सरकारी प्रतिक्रिया में सिमी यानी स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया का नाम अक्सर सुनने को मिलता है. ज्यादातर लोगों के लिए सिमी एक डरावना संगठन है जो घातक आतंकी कार्रवाइयों के जरिये देश को बर्बाद करना चाहता है.

मगर सवाल उठता है कि ये आरोप कितने सही हैं?

एक न्यायसंगत और सुरक्षित समाज बनाने के संघर्ष में ये अहम है कि असल दोषियों और सही जवाबों तक पहुंचा जाए और ईमानदारी से कानून का पालन किया जाए. इसके लिए ये भी जरूरी है कि झूठे पूर्वाग्रहों और बनी-बनाई धारणाओं के परे जाकर पड़ताल की जाए. इसीलिए तहलका ने पिछले तीन महीने के दौरान भारत के 12 शहरों में अपनी तहकीकात की. तहकीकात की इस श्रंखला की ये पहली कड़ी है.

हमने पाया कि आतंकवाद से संबंधित मामलों में, और खासकर जो प्रतिबंधित सिमी से संबंधित हैं, ज्यादातर बेबुनियाद या फिर फर्जी सबूतों पर आधारित हैं. हमने पाया कि ये मामले कानून और सामान्य बुद्धि दोनों का मजाक उड़ाते हैं.

इस तहकीकात में हमने पाया कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के पूर्वाग्रह, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव और सनसनी का भूखा व आतंकवाद के मामले पर पुलिस की हर कहानी को आंख मूंद कर आगे बढ़ा देने वाला मीडिया, ये सारे मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं जो सैकड़ों निर्दोष लोगों पर आतंकी होने का लेबल चस्पा कर देता है. इनमें से लगभग सारे मुसलमान हैं और सारे ही गरीब भी.

 हलीम का परिवार

हलीम का परिवार

अहमदाबाद के सिविल अस्पताल, जहां हुए दो धमाकों ने सबसे ज्यादा जानें लीं, का दौरा करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना था, “हम इस चुनौती का मुकाबला करेंगे और मुझे पूरा भरोसा है कि हम इन ताकतों को हराने में कामयाब होंगे.” उन्होंने राजनीतिक पार्टियों, पुलिस और खुफिया एजेंसियों का आह्वान किया कि वे सामाजिक ताने-बाने और सांप्रदायिक सद्भावना को तहस-नहस करने के लिए की गई इस कार्रवाई के खिलाफ मिलकर काम करें. मगर निर्दोषों के खिलाफ झूठे मामलों के चौंकाने वाले रिकॉर्ड को देखते हुए लगता है कि अक्षम पुलिस और खुफिया एजेंसियां कर बिल्कुल इसका उल्टा रही हैं. मौलाना अब्दुल हलीम की कहानी इसका सुलगता हुआ उदाहरण है.

पिछले रविवार से ही मीडिया में जो खबरें आ रही हैं उनमें पुलिस के हवाले से हलीम को सिमी का सदस्य बताया जा रहा है जिसके संबंध पाकिस्तान और बांग्लादेश स्थित आतंकवादियों से हैं.  गुजरात सरकार के वकील ने मजिस्ट्रेट को बताया कि आतंकवादी बनने का प्रशिक्षण देने के लिए हलीम मुसलमान नौजवानों को अहमदाबाद से उत्तर प्रदेश भेजा करते थे और इस कवायद का मकसद 2002 के नरसंहार का बदला लेना था. वकील के मुताबिक इन तथाकथित आतंकवादियों ने बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई दूसरे नेताओं को मारने की योजना बनाई थी. पुलिस का कहना था कि इस मामले में आरोपी नामित होने के बाद हलीम 2002 से ही फरार चल रहे थे.

इस मौलाना की गिरफ्तारी के बाद तहलका ने अहमदाबाद में जो तहकीकात की उसमें कई अकाट्य साक्ष्य निकलकर सामने आए हैं. ये बताते हैं कि फरार होने के बजाय हलीम कई सालों से अपने घर में ही रह रहे थे. उस घर में जो स्थानीय पुलिस थाने से एक किलोमीटर दूर भी नहीं था. वे एक सार्वजनिक जीवन जी रहे थे. मुसलमानों को आतंकवाद का प्रशिक्षण देने के लिए भेजने का जो संदिग्ध आरोप उन पर लगाया गया है उसका आधार उनके द्वारा लिखी गई एक चिट्ठी है. एक ऐसी चिट्ठी जिसकी विषयवस्तु का दूर-दूर तक आतंकवाद से कोई लेना-देना नजर नहीं आता.

दिलचस्प ये भी है कि शनिवार को हुए बम धमाकों से पहले अहमदाबाद पुलिस ने कभी भी हलीम को सिमी का सदस्य नहीं कहा था. ये बात जरूर है कि वह कई सालों से 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों के पीड़ितों की मदद में उनकी भूमिका के लिए उन्हें परेशान करती रही है. हलीम के परिजन और अनुयायी ये बात बताते हैं. इस साल 27 मई को पुलिस थाने से एक इंस्पेक्टर ने हलीम को गुजराती में एक पेज का हस्तलिखित नोटिस भेजा. इसके शब्द थे, “मरकज-अहले-हदीस (इस्लामी पंथ जिसे हलीम और उनके अनुयायी मानते हैं) ट्रस्ट का एक दफ्तर आलीशान शॉपिंग सेंटर की दुकान नंबर चार में खोला गया है. आप इसके अध्यक्ष हैं…इसमें कई सदस्यों की नियुक्ति की गई है. आपको निर्देश दिया जाता है कि उनके नाम, पते और फोन नंबरों की सूची जमा करें.”

कानूनी नियमों के हिसाब से बनाए गए एक ट्रस्ट, जिसके खिलाफ कोई आपराधिक आरोप न हों, से की गई ऐसी मांग अवैध तो है ही, साथ ही इस चिट्ठी से ये भी साबित होता है कि पुलिस को दो महीने पहले तक भी सलीम के ठिकाने का पता था और वह उनसे संपर्क में थी. नोटिस में हलीम के घर—2, देवी पार्क सोसायटी का पता भी दर्ज है. तो फिर उनके फरार होने का सवाल कहां से आया. हलीम के परिवार के पास इस बात का सबूत है कि पुलिस को अगले ही दिन हलीम का जवाब मिल गया था.

एक महीने बाद 29 जून को हलीम ने गुजरात के पुलिस महानिदेशक और अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त को एक टेलीग्राम भेजा. उनका कहना था कि उसी दिन पुलिस जबर्दस्ती उनके घर में घुस गई थी और उनकी गैरमौजूदगी में उनकी पत्नी और बच्चों को तंग किया गया. हिंदी में लिखे गए इस टेलीग्राम के शब्द थे,“हम शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाले नागरिक हैं और किसी अवैध गतिविधि में शामिल नहीं रहे हैं. पुलिस गैरकानूनी तरीके से बेवजह मुझे और मेरे बीवी-बच्चों को तंग कर रही है. ये हमारे नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है.”

जैसा कि संभावित था, उन्हें इसका कोई जवाब नहीं मिला. अप्रैल में जब सोशल यूनिटी एंड पीस फोरम नाम के एक संगठन, जिसके सदस्य हिंदू और मुसलमान दोनों हैं, ने एक बैठक का आयोजन किया तो लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की इजाजत के लिए संगठन ने पुलिस को चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में भी साफ जिक्र किया गया था कि बैठक में हलीम मुख्य वक्ता होंगे. ये साबित करने के लिए कि हलीम इस दौरान एक सामान्य जीवन जीते रहे हैं, उनका परिवार उनका वो ड्राइविंग लाइसेंस भी दिखाता है जिसका अहमदाबाद ट्रांसपोर्ट ऑफिस द्वारा 28 दिसंबर, 2006 को नवीनीकरण किया गया था. तीन साल पहले पांच जुलाई 2005 को दिव्य भास्कर नाम के एक गुजराती अखबार ने उत्तर प्रदेश के एक गांव की महिला इमराना के साथ उसके ससुर द्वारा किए गए बलात्कार के बारे में हलीम का बयान उनकी फोटो के साथ छापा था.

हलीम की रिहाई के लिए गुजरात के राज्यपाल से अपील करने वाले उनके मित्र हनीफ शेख कहते हैं, “ये आश्चर्य की बात है कि हमें मौलाना हलीम की बेगुनाही साबित करनी है.”  नाजिर, जिनके मकान में हलीम अपने परिवार के साथ किराये पर रहा करते थे, कहते हैं, “मैं मौलाना को सबसे करीब से जानता हूं. वे धार्मिक व्यक्ति हैं और उनका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं रहा है.”  हलीम की पत्नी भी कहती हैं कि उनके पति आतंकवादी नहीं हैं और उन्हें फंसाया जा रहा है.

हलीम को जानने वालों में उनकी गिरफ्तारी को लेकर हैरत और क्षोभ है. 27 वर्षीय अहसान-उल-हक कहते हैं, “मौलाना हलीम ने सैकड़ों लोगों को सब्र करना और हौसला रखना सिखाया है.” ये साबित करने के लिए कि हलीम फरार नहीं थे, हक अपना निकाहनामा दिखाते हैं जो हलीम की मौजूदगी में बना था और जिस पर उनके हस्ताक्षर भी हैं.

 

यासिर की पत्नी सोफिया

उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले 43 वर्षीय अब्दुल हलीम 1988 से अहमदाबाद में रह रहे हैं. वे अहले हदीस नामक एक इस्लामी संप्रदाय के प्रचारक हैं जो इस उपमहाद्वीप में 180 साल पहले अस्तित्व में आया था. ये संप्रदाय कुरान के अलावा पैगंबर मोहम्मद द्वारा दी गई शिक्षाओं यानी हदीस को भी मुसलमानों के लिए मार्गदर्शक मानता है. सुन्नी कट्टरपंथियों से इसका टकराव होता रहा है.  मीडिया में लंबे समय से खबरें फैलाई जाती रही हैं कि अहले-हदीस एक आंतकी संगठन है जिसके लश्कर-ए-तैयबा से संबंध हैं. पुलिस दावा करती है कि इसके सदस्य 2006 में मुंबई में हुए ट्रेन धमाकों सहित कई आतंकी घटनाओं में आरोपी हैं. करीब तीन करोड़ अनुयायियों वाला ये संप्रदाय इन आरोपों से इनकार करता है और बताता है कि दो साल पहले जब इसने दिल्ली में अपनी राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी तो गृह मंत्री शिवराज पाटिल इसमें बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे.

14 साल तक अहमदाबाद में अहले हदीस के 5000 अनुयायियों का नेतृत्व करने के बाद हलीम तीन साल पहले इस्तीफा देकर एक छोटी सी मस्जिद के इमाम हो गए. अपनी पत्नी और सात बच्चों के परिवार को पालने के लिए उन्हें नियमित आय की दरकार थी और इसलिए उन्होंने कबाड़ का व्यवसाय शुरू किया.

हलीम की मुश्किलें 2002 की मुस्लिम विरोधी हिंसा के बाद तब शुरू हुईं जब वे हजारों मुस्लिम शरणार्थियों के लिए चलाए जा रहे राहत कार्यों में  शामिल हुए. उस दौरान शाहिद बख्शी नाम का एक शख्स दो दूसरे मुस्लिम व्यक्तियों के साथ उनसे मिलने आया था. कुवैत में रह रहा शाहिद अहमदाबाद का ही निवासी था. उसके साथ आए दोनों व्यक्ति उत्तर प्रदेश के थे जिनमें से एक फरहान अली अहमद कुवैत में रह रहा था. दूसरा व्यक्ति हाफिज़ मुहम्मद ताहिर मुरादाबाद का एक छोटा सा व्यापारी था. ये तीनों लोग 2002 की हिंसा में अनाथ हुए बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा और देखभाल का इंतजाम कर उनकी मदद करना चाहते थे. इसलिए हलीम उन्हें चार शरणार्थी कैंपों में ले गए. एक हफ्ते बाद एक कैंप से जवाब आया कि उसने ऐसे 34 बच्चों को खोज निकाला है जिन्हें इस तरह की देखभाल की जरूरत है. हलीम ने फरहान अली अहमद को फोन किया जो उस समय मुरादाबाद में ही था और उसे इस संबंध में एक चिट्ठी भी लिखी. मगर लंबे समय तक कोई जवाब नहीं आया और योजना शुरू ही नहीं हो पाई. महत्वपूर्ण ये भी है कि किसी भी बच्चे को कभी भी मुरादाबाद नहीं भेजा गया.

तीन महीने बाद अगस्त 2002 में दिल्ली पुलिस ने शाहिद और उसके दूसरे साथी को कथित तौर पर साढ़े चार किलो आरडीएक्स के साथ गिरफ्तार किया. मुरादाबाद के व्यापारी को भी वहीं से गिरफ्तार किया गया और तीनों पर आतंकी कार्रवाई की साजिश के लिए पोटा के तहत आरोप लगाए गए. दिल्ली पुलिस को इनसे हलीम की चिट्ठी मिली. चूंकि बख्शी और हलीम दोनों ही अहमदाबाद से थे इसलिए वहां की पुलिस को इस बारे में सूचित किया गया. तत्काल ही अहमदाबाद पुलिस के अधिकारी डी जी वंजारा(जो अब सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में जेल में हैं) ने हलीम को बुलाया और उन्हें अवैध रूप से हिरासत में ले लिया. घबराये परिवार ने उनकी रिहाई के लिए गुजरात हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की. उनके परिवार के वकील हाशिम कुरैशी याद करते हैं, “जज ने पुलिस को आदेश दिया कि वह दो घंटे के भीतर हलीम को कोर्ट में लाए.” पुलिस ने फौरन हलीम को रिहा कर दिया. वे सीधा कोर्ट गए और अवैध हिरासत पर उनका बयान दर्ज किया गया जो अब आधिकारिक दस्तावेजों का हिस्सा है.

जहां दिल्ली पुलिस ने उत्तर प्रदेश के दोनों व्यक्तियों और शाहिद बख्शी के खिलाफ आरडीएक्स रखने का मामला दर्ज किया वहीं अहमदाबाद पुलिस ने  इन तीनों के खिलाफ मुस्लिम युवाओं को मुरादाबाद में आतंकी प्रशिक्षण देने के लिए फुसलाने का मामला बनाया. अहमदाबाद के धमाकों के बाद पुलिस और मीडिया इसी मामले का हवाला देकर हलीम पर मुस्लिम नौजवानों को आतंकी प्रशिक्षण देने का आरोप लगा रहे हैं. हलीम द्वारा तीस नौजवानों को प्रशिक्षण के लिए मुरादाबाद भेजने की बात कहते वक्त गुजरात सरकार के वकील सफेद झूठ बोल रहे थे. जबकि मामले में दाखिल आरोपपत्र भी किसी को अहमदाबाद से मुरादाबाद भेजने की बात नहीं करता.

दिल्ली में दर्ज मामले में जहां हलीम को गवाह नामित किया गया तो वहीं अहमदाबाद के आतंकी प्रशिक्षण वाले मामले में उन्हें आरोपी बनाकर कहा गया कि वो भगोड़े हैं. कानून कहता है कि किसी को भगोड़ा साबित करने की एक निश्चित प्रक्रिया होती है. इसमें गवाहों के सामने घर और दफ्तर की तलाशी ली जाती है और पड़ोसियों के बयान दर्ज किए जाते हैं जो बताते हैं कि संबंधित व्यक्ति काफी समय से देखा नहीं गया है. मगर अहमदाबाद पुलिस ने ऐसा कुछ नहीं किया. हलीम के खिलाफ पूरा मामला उस पत्र पर आधारित है जो उन्होंने सात अगस्त 2002 को फरहान को लिखा था. इस पत्र में गैरकानूनी जैसा कुछ भी नहीं है. ये एक जगह कहता है, “आप यहां एक अहम मकसद से आए थे.”  कल्पना की उड़ान भर पुलिस ने दावा कर डाला कि ये अहम मकसद आतंकी प्रशिक्षण देना था. हलीम ने ये भी लिखा था कि कुल बच्चों में से छह अनाथ हैं और बाकी गरीब हैं. पत्र ये कहते हुए समाप्त किया गया था, “मुझे यकीन है कि अल्लाह के फज़ल से आप यकीनन इस्लाम को फैलाने के इस शैक्षिक और रचनात्मक अभियान में मेरी मदद करेंगे.”  आरडीएक्स मामले में दिल्ली की एक अदालत के सामने हलीम ने कहा था कि उनसे कहा गया था कि मुरादाबाद में बच्चों को अच्छी तालीम और जिंदगी दी जाएगी. उन्हें ये पता नहीं था कि बख्शी और दूसरे लोग बच्चों को आतंकी प्रशिक्षण देने की सोच रहे हैं.

पिछले साल दिल्ली की एक अदालत ने “आरडीएक्स मामले” में बख्शी और फ़रहान को दोषी करार दिया और उन्हें सात-सात साल कैद की सज़ा सुनाई. बावजूद इसके कि तथाकथित आरडीएक्स की बरामदगी के चश्मदीद सिर्फ पुलिस वाले ही थे, कोर्ट ने पुलिस के ही आरोपों को सही माना. फरहान का दावा था कि उसे हवाई अड्डे से तब गिरफ्तार किया गया था जब वो कुवैत की उड़ान पकड़ने जा रहा था और उसके पास इसके सबूत के तौर पर टिकट भी थे. लेकिन अदालत ने इसकी अनदेखी की.

 

यासिर 

बख्शी और फरहान ने इस सज़ा के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की जिसने निचली अदालत द्वारा दोषी करार देने के बावजूद उन्हें ज़मानत दे दी. वहीं गुजरात हाई कोर्ट ने उन्हें “आतंकी प्रशिक्षण” मामले में  ज़मानत देने से इनकार कर दिया जबकि उन पर आरोप सिद्ध भी नहीं हुआ था. गुजरात क्राइम ब्रांच भी ये मानती है कि इस मामले में उनका अपराध सिर्फ षडयंत्र रचने तक ही सीमित हो सकता है.

सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता. मुरादाबाद के ताहिर को आरडीएक्स मामले में बरी कर दिया गया था. वो एक बार फिर तब भाग्यशाली रहा जब गुजरात हाई कोर्ट ने जून 2004 में उसे आतंकवाद प्रशिक्षण मामले में ज़मानत दे दी. अदालत का कहना था, “वर्तमान आरोपी के खिलाफ कुल मिलाकर सिर्फ इतना ही प्रमाण है कि वो अहमदाबाद आया था और कैंप का चक्कर भी लगाया था, ताकि उन बच्चों की पहचान कर सके और उनकी देख रेख अच्छे तरीके से हो सके और इसे किसी तरह का अपराध नहीं माना जा सकता.”

बख्शी और फरहान पर भी बिल्कुल यही आरोप थे, लिहाजा ये तर्क उन पर भी लागू होना चाहिए. लेकिन गुजरात हाई कोर्ट के एक अन्य जज ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर दिया और दोनों को जेल में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस बीच ताहिर अहमदाबाद आकर रहने लगा क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने उसकी ज़मानत के फैसले में ये आदेश दिया था कि उसे हर रविवार को अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ऑफिस में हाजिरी देनी होगी. 26 जुलाई को हुए धमाकों के बाद अगली सुबह रविवार के दिन डरा सहमा ताहिर अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के ऑफिस पहुंचा. ताहिर ने तहलका को बताया, “उन्होंने चार घंटे तक मुझसे धमाके के संबंध में सवाल जवाब किए. उस वक्त मुझे बहुत खुशी हुई जब उन्होंने मुझे जाने के लिए कहा.” आतंकी प्रशिक्षण मामले की सुनवाई लगभग खत्म हो चुकी है. अब जबकि हलीम भगोड़े नहीं रहे तो ये बात देखने वाली होगी कि उसके खिलाफ इस मामले में अलग से सुनवाई होती है या नहीं. इस बीच हलीम के परिवार को खाने और अगले महीने घर के 2500 रूपए किराए की चिंता सता रही है। हलीम की पत्नी बताती है है कि उनके पास कोई बचत नहीं है. हलीम की कबाड़ की दुकान उनका नौकर चला रहा है.

दुखद बात ये है कि मौलाना अब्दुल हलीम की कहानी कोई अकेली नहीं है. 15 जुलाई की रात हैदराबाद में अपने पिता के वर्कशॉप से काम करके वापस लौट रहे मोहम्मद मुकीमुद्दीन यासिर को सिपाहियों के एक दल ने गिरफ्तार कर लिया. दस दिन बाद 25 जुलाई को जब बंगलोर में सीरियल धमाके हुए, जिनमें दो लोगों की मौत हो गई, तो हैदराबाद के पुलिस आयुक्त प्रसन्ना राव ने हिंदुस्तान टाइम्स को एक नयी बात बताई. उनके मुताबिक पूछताछ के दौरान यासिर ने ये बात स्वीकारी थी कि गिरफ्तारी से पहले वो आतंकियों को कर्नाटक ले गया था और वहां पर उसने उनके लिए सुरक्षित ठिकाने की व्यवस्था की थी. मगर जेल में उससे मिलकर लौटीं उसकी मां यासिर के हवाले से तहलका को बताती हैं कि पुलिस झूठ बोल रही है, और पुलिस आयुक्त जिसे पूछताछ कह रहे हैं असल में उसके दौरान उनके बेटे को कठोर यातनाएं दी गईं. वो कहती हैं, “उसे उल्टा लटका कर पीटा जा रहा था.”

हालांकि पुलिस के सामने दिये गए बयान की कोई अहमियत नहीं फिर भी अगर इसे सच मान भी लें तो ये हैदराबाद पुलिस के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा होगा. आखिर यासिर सिमी का पूर्व सदस्य था, उसके पिता और एक भाई आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद हैं. उसके पिता की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट तक से खारिज हो चुकी है. ये जानते हुए कि उसके भाई और बाप खतरनाक आतंकवादी हैं हैदराबाद पुलिस को हर वक्त उसकी निगरानी करनी चाहिए थी, और जैसे ही वो आतंकियों के संपर्क में आया उसे गिरफ्तार करना चाहिए था.

पुलिस ने न तो यासिर के बयान पर कोई ज़रूरी कार्रवाई की जिससे बैंगलुरु का हमला रोका जा सकता और न ही वो यासिर द्वारा कर्नाटक में आतंकियों को उपलब्ध करवाया गया सुरक्षित ठिकाना ही ढूंढ़ सकी. इसकी वजह शायद ये रही कि उसने ऐसा कुछ किया ही नहीं था. तहलका संवाददाता ने हैदराबाद में यासिर की गिरफ्तारी के एक महीने पहले 12 जून को उससे मुलाकात की थी. उस वक्त यासिर अपने पिता द्वारा स्थापित वर्कशॉप में काम कर रहा था. उसका कहना था, “मेरे पिता और भाई को फंसाया गया है.”

ऐसा लगता है कि अंतर्मुखी यासिर फर्जी मामलों का शिकार हुआ है. 27 सितंबर 2001 को सिमी पर प्रतिबंध लगाए जाने के वक्त वो सिमी का सदस्य था. (तमाम सरकारी प्रचार के बावजूद देश की किसी अदालत ने अभी तक एक संगठन के रूप में सिमी को आंतकवाद से जुड़ा घोषित नहीं किया है) यासिर ने देश भर में फैले उन कई लोगों की बातों को ही दोहराया जिनसे तहलका ने मुलाकात की थी. उसने कहा कि सिमी एक माध्यम था जो धर्म में गहरी आस्था और आत्मशुद्धि का प्रशिक्षण देता था और इसका आतंकवाद या फिर भारत विरोधी साजिशों से कोई नाता नहीं था। “सिमी चेचन्या से लेकर कश्मीर तक मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों की बात करता था”, यासिर ने बताया. “उसने कभी भी बाबरी मस्जिद का मुद्दा नही छेड़ा और इसी चीज़ ने हमें सिमी की तरफ आकर्षित किया”, वो आगे कहता है.

 

मौलाना नसीरुद्दीन

सिमी पर जिस दिन प्रतिबंध लगाया गया था उसी रात हैदराबाद में यासिर और सिमी के कई प्रतिनिधियों को ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. अगले दिन उन्हें ज़मानत मिल गई. एक दिन बाद ही पुलिस ने तीन लोगों को सरकार के खिलाफ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. दो लोगों को फरार घोषित कर दिया गया जिनमें यासिर भी शामिल था. उन्होंने कोर्ट में आत्मसमर्पण किया और उन्हें जेल भेज दिया गया. यहां यासिर को 29 दिनों बाद ज़मानत मिली. इस मामले में सात साल बीत चुके हैं, लेकिन सुनवाई शुरू होनी अभी बाकी है.

यासिर के पिता की किस्मत और भी खराब है. इस तेज़ तर्रार मौलाना की पहचान सरकार के खिलाफ ज़हर उगलने वाले के रूप में थी, विशेषकर बाबरी मस्जिद और 2002 के गुजरात दंगो के मुद्दे पर इनके भाषण काफी तीखे होते थे. तमाम फर्जी मामलों में फंसाए गए मौलाना को हैदराबाद पुलिस ने नियमित रूप से हाजिरी देने का आदेश दिया था.

इसी तरह अक्टूबर 2004 को जब मौलाना पुलिस में हाजिरी देने पहुंचे तो अहमदाबाद से आयी एक पुलिस टीम ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके ऊपर गुजरात में आतंकवादी साजिश रचने और साथ ही 2003 में गुजरात के गृह मंत्री हरेन पांड्या की हत्या की साजिश रचने का आरोप था।

मौलाना के साथ पुलिस स्टेशन गए स्थानीय मुसलमानों ने वहीं पर इसका विरोध करना शुरू कर दिया। इस पर गुजरात पुलिस के अधिकारी नरेंद्र अमीन ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाल कर फायर कर दिया जिसमें एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। इसके बाद तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। नसीरुद्दीन के समर्थकों ने अमीन के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर मृत शरीर को वहां से ले जाने से इनकार कर दिया। अंतत: हैदराबाद पुलिस ने दो एफआईआर दर्ज कीं। एक तो मौलाना की गिरफ्तारी का विरोध करने वालों के खिलाफ और दूसरी अमीन के खिलाफ।

अमीन के खिलाफ दर्ज हुआ मामला चार साल में एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है। हैदराबाद पुलिस को उनकी रिवॉल्वर जब्त कर मृतक के शरीर से बरामद हुई गोली के साथ फॉरेंसिक जांच के लिए भेजना चाहिए था। उन्हें अमीन को गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के सम्मुख पेश करना चाहिए था। अगर गोली का मिलान उनके रिवॉल्वर से हो जाता तो इतने गवाहों की गवाही के बाद ये मामला उसी समय खत्म हो जाता। पर ऐसा कुछ नहीं किया गया।

अमीन, मौलाना नसीरुद्दीन को साथ लेकर अहमदाबाद चले गए और उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर फाइलों में दब कर रह गई। अमीन ही वो पुलिस अधिकारी हैं जिनके ऊपर कौसर बी की हत्या का आरोप है। कौसर बी गुजरात के व्यापारी सोहराबुद्दीन की बीवी थी जिसकी हत्या के आरोप में गुजरात पुलिस के अधिकारी वंजारा जेल में है। अमीन भी अब जेल में हैं।

इस बीच अमीन के खिलाफ हैदराबाद शूटआउट मामले में शिकायत दर्ज करने वाले नासिर के साथ हादसा हो गया। नासिर मौलाना नसीरुद्दीन का सबसे छोटा बेटा और यासिर का छोटा भाई है। इसी साल 11 जनवरी को कर्नाटक पुलिस ने नासिर को उसके एक साथी के साथ गिरफ्तार कर लिया। जिस मोटरसाइकिल पर वो सवार थे वो चोरी की थी। पुलिस के मुताबिक उनके पास से एक चाकू भी बरामद हुआ था। पुलिस ने उनके ऊपर ‘देशद्रोह’ का मामला दर्ज किया।

आश्चर्यजनक रूप से पुलिस ने अगले 18 दिनों में दोनों के 7 कबूलनामें अदालत में पेश किए। इनमें से एक में भी इस बात का जिक्र नहीं था कि वो सिमी के सदस्य थे। इसके बाद पुलिस ने आठवां कबूलनामा कोर्ट में पेश किया जिसमें कथित रूप से उन्होंने सिमी का सदस्य होना और आतंकवाद संबंधित आरोपों को स्वीकार किया था। 90 दिनों तक जब पुलिस उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने में नाकाम रही तो नासिर का वकील मजिस्ट्रेट के घर पहुंच गया, इसके बाद क़ानून के मुताबिक उसे ज़मानत देने के अलावा और कोई चारा नहीं था। लेकिन तब तक पुलिस ने नासिर के खिलाफ षडयंत्र का एक और मामला दर्ज कर दिया और इस तरह से उसकी हिरासत जारी रही। इस दौरान यातनाएं देने का आरोप लगाते हुए उसने पुलिस द्वारा पेश किए गए कबूलनामों से इनकार कर दिया।

दोनों को पुलिस हिरासत में भेजने वाले मजिस्ट्रेट बी जिनाराल्कर ने तहलका को एक साक्षात्कार में बताया:

“जब मैं उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने के लिए जरूरी कागजात पर दस्तखत कर रहा था तभी अब्दुल्ला (दूसरा आरोपी) मेरे पास आकर मुझसे बात करने की विनती करने लगा।” उसने मुझे बताया कि पुलिस उसे खाना और पानी नहीं देती है और बार-बार पीटती है। वो नासिर के शरीर पर चोटों के निशान दिखाने के लिए बढ़ा। दोनों लगातार मानवाधिकारों की बात कर रहे थे और चिकित्सकीय सुविधा मांग रहे थे”।

“मुझे तीन बातों से बड़ी हैरानी हुई—वो अपने मूल अधिकारों की बात बहुत ज़ोर देकर कर रहे थे। वो अंग्रेज़ी बोल रहे थे और इस बात को मान रहे थे कि उन्होंने बाइक चुराई थी। मेरा अनुभव बताता है कि ज्यादातर चोर ऐसा नहीं करते हैं।”

जब एक पुलिस सब इंस्पेक्टर ने मजिस्ट्रेट को फोन करके उन्हें न्यायिक हिरासत में न भेजने की चेतावनी दी तब उन्होंने सबसे पहले सबूत अपने घर पर पेश करने को कहा। “उन्होंने मेरे सामने जो सबूत पेश किए उनमें फर्जी पहचान पत्र, एक डिजाइनर चाकू, दक्षिण भारत का नक्शा जिसमें उडुपी और गोवा को चिन्हित किया गया था, कुछ अमेरिकी डॉलर, कागज के दो टुकड़े थे जिनमें एक पर www.com और दूसरे पर ‘जंगल किंग बिहाइंड बैक मी’ लिखा हुआ था।

जब मैंने इतने सारे सामानों को एक साथ देखा तो मुझे लगा कि ये सिर्फ बाइक चोर नहीं हो सकते। बाइक चोर को फर्जी पहचान पत्र और दक्षिण भारत के नक्शे की क्या जरूरत? उनके पास मौजूद अमेरिकी डॉलर से संकेत मिल रहा था कि उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्क हैं। कागज पर www.com से मुझे लगा कि वे तकनीकी रूप से दक्ष भी हैं। दूसरे कागज पर लिखा संदेश मुझे कोई कूट संकेत लगा जिसका अर्थ समझने में मैं नाकाम रहा। इसके अलावा जब मैंने दक्षिण भारत के नक्शे का मुआयना शुरू किया तो उडुपी को लाल रंग से चिन्हित किया गया था। शायद उनकी योजना एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान उडुपी में हमले की रही हो।”

“मुझे लगा कि इतने सारे प्रमाण नासिर और अब्दुल्ला को पुलिस हिरासत जांच को आगे बढ़ाने के वास्ते हिरासत में भेजने के लिए पर्याप्त हैं।”

तो क्या मौलाना हलीम, मुकीमुद्दीन यासिर, मौलाना नसीरुद्दीन, और रियासुद्दीन नासिर के लिए कोई उम्मीद है?  यासिर और नासिर की मां को कोई उम्मीद नहीं है। वे गुस्से में कहती हैं, “क्यों नहीं पुलिस हम सबको एक साथ जेल में डाल देती है।” फिर गुस्से से ही कंपकपाती आवाज़ कहती है, “और फिर वो हम सबको गोली मार कर मौत के घाट उतार दें।”

‘ये जीत क्रिकेट के लिए है’'

सबसे पहले तो अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने पर आपकी प्रतिक्रिया. जिस दफ्तर में कभी आप बैठा करते थे वहां फिर से जाना कैसा लगा?

मुझे वो दिन याद आया जब खुद पर थोपे गए प्रतिबंध के बाद मैंने इस्तीफा दिया था. मैं कई रातों तक सो नहीं पाया था. मुझे खुशी है क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (कैब) के चुनाव में कभी न हारने का मेरा रिकॉर्ड बरकरार है. आखिरकार मुझे न्याय मिल गया है. बहुत बेइज्जत किया था…

इतनी बड़ी जीत से तो आप खुश होंगे?

सिर्फ मैं ही क्यों?  हर कोई खुश होगा. मुझे उन बेकार और बेबुनियाद विवादों को सुलझाने की भी खुशी है जिनसे मैं घिरा हुआ था और जिनकी वजह से खुद को निर्दोष साबित करने के लिए मुझे देश भर में कई जगहों के चक्कर काटने पड़े. प्रसन्नता इस बात की भी है कि मैंने अपने खिलाफ मुकदमों और फिर कैब चुनाव दोनों में जीत हासिल की. प्रसून मुखर्जी पर मेरी पिछली जीत सत्ता की खातिर थी. ये क्रिकेट के लिए है.

क्या ये मुख्यधारा में लौटने की दिशा में पहला कदम है?

मुझे ये कदम उठाना पड़ा. गंभीर संकट में फंसे बंगाल क्रिकेट को बचाने के लिए मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

मगर कई लोग कहेंगे कि ये आपका बीसीसीआई के अध्यक्ष पद की ओर पहला कदम है?

उन्हें मेरी शुभकामनाएं हैं. आप ही बताइये क्या मैं लोगों को सोचने से रोक सकता हूं?  आपसे ईमानदारी से कह रहा हूं, मेरे दिमाग में ऐसा कुछ नहीं है. मैं किसी दौड़ में शामिल नहीं हूं. मैं बंगाल में क्रिकेट को फिर से पटरी पर लाना चाहता हूं. इसे आईसीयू से बाहर लाने की जरूरत है.

बीसीसीआई सचिव निरंजन शाह ने कहा है कि आपकी जीत से बोर्ड के कामकाज पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

आप तो मुझसे कुछ कहलवा कर ही रहेंगे. लेकिन  मुझे इस पर कुछ नहीं कहना है.

मगर इतना तो आप मानेंगे कि बीसीसीआई के साथ आपका विवाद रहा है जिसकी कुछ निजी वजहें भी हैं.

ऐसा होना ही था? नहीं? मगर अब ऐसा कहना गलत होगा. मैं नहीं चाहता कि वो कैब की उपेक्षा करें. मैं नहीं चाहता कि शानदार ईडन गार्डन को उनकी उपेक्षा झेलनी पड़े. ये क्रिकेट के लिए सबसे बढ़िया जगहों में से है. हम चाहते हैं ये ऐसा ही बना रहे. इसकी हालत घर के पिछवाड़े जैसी न हो जाए. अगर आप कोलकाता को मैच नहीं देंगे तो आपका अपना स्टेडियम, आपका अपना ग्राउंड खत्म हो जाएगा. अब जबकि मैं वापस आ गया हूं, मैं जानता हूं कि कैब और बीसीसीआई के संबंधों को लेकर बहुत सी आशंकाएं हैं. मुद्दे दो तरह के हैंसामूहिक और व्यक्तिगत. सामूहिक रूप से हम बोर्ड से कहना चाहते हैं कि कृपया कैब को कष्ट न झेलने दें. मैं उनकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाऊंगा.

ईडन गार्डन में हुए आईपीएल मैचों के टिकटों का वितरण भी एक बड़ा मुद्दा था

मैं कहूंगा कि ये एक बड़ा नहीं बल्कि छोटा सा मुद्दा था. मेरी नजर में आईपीएल एक असाधारण विचार और एक आश्चर्यजनक सफलता है. मैं भला आईपीएल के खिलाफ क्यों होऊंगा. बल्कि मुझे तो आईपीएल पर बीसीसीआई को हरसंभव सहयोग देने में खुशी होगी.

आप सौरव गांगुली के मुद्दे को कैसे सुलझाएंगे? वे दूसरे पाले में हैं.

मीडिया के लिए ये मुद्दा होगा, मेरे लिए ये कोई मुद्दा नहीं है. अगर कल सौरव मेरे पास बंगाल में क्रिकेट को बढ़ावा देने का कोई प्रस्ताव लेकर आते हैं तो मैं उन्हें सबसे पहले समर्थन दूंगा और उनके साथ काम करुंगा. ये मत भूलिए कि वे पूर्व भारतीय कप्तान और लोगों के आदर्श हैं.

‘मेरे भीतर बच्चों सी इच्छाएं हिलोरें मारने लगीं’

1999 के अगस्त माह का वो रविवार मुझे आज भी याद है। वो शायद मेरी ज़िंदगी का सबसे अहम लम्हा था। उस वक्त मुझे इसका अहसास नहीं था लेकिन उस क्षण ने मेरी ज़िंदगी बदल दी या मुझे कहना चाहिए कि मेरी उस असलियत से मेरा परिचय करवाया जो 25 सालों से कहीं छुपी हुई थी। इसने मुझे हमेशा के लिए ज़िंदगी में एक मकसद दे दिया।

बचपन में मुझे मार्टी स्टॉफर्स का टेलीविज़न कार्यक्रम अवर लिविंग प्लैनेट देखना बेहद पसंद था। मैं हमेशा उन सुंदर जंगलों, शानदार जानवरों और पक्षियों के बारे में सोचती रहती थी जिन तक सिर्फ मार्टी ही पहुंच सकता था और हमें उन्हें टीवी पर देखकर ही संतोष करना पड़ता था। मुझे मार्टी से ईर्ष्या होती थी और मैं कम से कम एक बार मैं उनसे मिलना चाहती थी। तभी एक दिन, जब मैं करीब 15 बरस की थी, एक पत्रिका में मैंने भरतपुर के केवलादेव पक्षी अभ्यारण्य के बारे में एक लेख देखा जिसके साथ कुछ खूबसूरत फोटो भी थे। उस वक्त मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं रही जब मैंने पाया कि इतने सालों से मार्टी मुझे जो कुछ टीवी पर दिखाता रहा है कम से उनमें से एक जगह भारत में भी है। मैंने उस पत्रिका को सहेज कर रख दिया और फैसला किया कि एक दिन मैं वहां जरूर जाऊंगी।

ज़िंदगी गुज़रती रही। मैंने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया लेकिन मार्टी, उनकी टीवी श्रंखला और भरतपुर का सपना ज़िंदा रहा। मेडिकल कॉलेज में मैं शनिवार को अक्सर अपने प्रोफेसर, जो कि मेरे मार्दर्शक भी थे, से क्लास छोड़ने की अनुमति ले लेती ताकि मैं मार्टी का कार्यक्रम देख सकूं। दिलचस्प बात ये है कि प्रोफेसर ने कभी भी मुझे रोका नहीं। हम अक्सर देखते थे कि वो लेक्चर देते-देते बीच में चुप्पी साध लेते थे, मानो वो कुछ सुनने की कोशिश कर रहे हों। इस पर हम लोग हंस देते थे। मुझे बड़ी जिज्ञासा होती थी कि वो ऐसा क्यों करते हैं? लेकिन ये रहस्य बना ही रहा।

मैंने अपनी मेडिकल डिग्री हासिल कर प्रैक्टिस शुरू कर दी और ज़िंदगी ठीक-ठाक चलने लगी। लेकिन दो साल बाद मैं बीमार पड़ गई, और मुझे अपना ऑपरेशन कराना पड़ा। 15 दिन बाद ऑपरेशन फिर से करना पड़ा क्योंकि पहले ऑपरेशन के दौरान लापरवाही बरती गई थी। बहरहाल घाव जल्द ही भर गया। मगर इसके बाद मैं बार-बार बीमार पड़ने लगी और दो सालों के भीतर ही मुझे तीन-चार ऑपरेशन करवाने पड़े। बार-बार की पीड़ा ने मुझे अवसाद में पहुंचा दिया। दवाओं की वजह से मुझे भूख लगनी बंद हो गई और मैं बहुत दुबली हो गई। मेरी बीमारी ने मेरी प्रैक्टिस को भी बुरी तरह से प्रभावित किया। मैंने पाया कि मैं अब कभी भी उस तरह की सफलता नहीं पा सकती जैसी मैंने शुरुआती दो सालों में पायी थी। मुझे बहुत झुंझलाहट होती, एक तरह से कहें तो मैं बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी।

इन सालों के दौरान मैं लगातार अपने प्रोफेसर के संपर्क में बनी रही। उन्हें मेरी बीमारी औऱ उसकी वजह से पैदा हुए अवसाद की जानकारी थी। एक दिन उन्होंने कहा, तुम इस रविवार को मेरे साथ क्यों नहीं चलतीं?” कहां?”, मैंने पूछा. उन्होंने कहा, तुम बस चलो

मैंने ऐसा ही किया। हम दोनों, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के साथ उनके जंगल की सैर पर गए। यहां आकर उनकी उन चुप्पियों का राज़ खुला जो वो लेक्चर के बीच में अक्सर साध लेते थेवो चिड़ियों की आवाज़े सुनने और उन्हें पहचानने की कोशिश किया करते थे। कोई आश्चर्य नहीं कि मुझे मार्टी के कार्यक्रम के लिए छुट्टी बड़ी आसानी से मिल जाती थी। बहरहाल मैंने सैर का जमकर लुत्फ उठाया। घर लौटने पर मैं अच्छा महसूस कर रही थी और जल्द ही ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ गई।

इसके बाद 1999 के अगस्त माह में अख़बार के पहले पन्ने पर खिले हुए खूबसूरत कर्वी के फूल छपे थे। उसके नीचे लिखा था, ये फूल आठ साल में एक बार खिलते हैं और ये खिलने का साल है। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने इसे देखने के लिए संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान की प्राकृतिक यात्रा का आयोजन किया है। मेरे अंदर एक हलचल सी मच गई। मैंने प्रोफेसर साहब से इस यात्रा पर चलने के बारे में पूछा और रजिस्ट्रेशन करवा दिया। जब हम उद्यान के भीतरी हिस्से में पहुंचे तो मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। यही तो वो चीज़ थी जिसे देखने की मैं सालों से कल्पना करती रहती थी, इस बात से बेखबर कि ये मेरे पास में ही था, या कहें कि ठीक मेरे पीठ पीछे। पूरा उद्यान बिल्कुल उसी तरह का था जैसा मैं मार्टी के कार्यक्रमों में देखा करती थी और जहां मैं रहती थी उसके इतने करीब भी। मुझे इसे खोजने में इतनी देर कैसे लगी?

मेरा मन किया कि मैं बच्चों जैसी उछलूं और ज़ोर-ज़ोर से हंसूये ऐसा था जैसे मुझे लंबे समय से बिछड़ा हुआ कोई प्यारा या फिर कोई खजाना मिल गया हो। कर्वी के फूल, जंगल के बीच मानसून की फुहारें, चारो तरफ फैली हरियाली, चिड़ियां और तितलियांये सारी चीज़ों ने मुझे बेसुध सा कर दिया और मैं एक नई दुनिया में विचरण करने लगी।

इसके बाद मैं अक्सर ऐसी यात्राओं पर जाने लगी, जहां तक मेरा स्वास्थ्य मुझे इजाजत देता। दो महीने में एक बार, महीने में एक बार, और फिर दो हफ्ते में एक बार। मेरा स्वास्थ्य सुधरने लगा। इससे भी बड़ी बात ये थी कि कुछ समय के बाद एकाकी और शांत रहने वाली मैं काफी बिंदास हो गई। मैंने कई दोस्त बनाए, मेरे आत्मविश्वास में वृद्धि हो गई और मैं काफी दृढ़ हो गई। क्या मैं वही थी? इतने सालों तक मैं कहां छुपी हुई थी? मैंने फोटोग्राफी भी शुरू कर दी और अलग अलग अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में जाने लगी। मैं संरक्षण और जागरुकता जैसे कामों में शामिल हो गई।

आज, मैं हर हफ्ते कुछ घंटे बाहर प्रकृति की छांव में जरूर बिताती हूं। आदत के रूप में जो चीज़ शुरू हुई थी वो धीरे-धीरे जुनून, मकसद और फिर जीवन की गति बन गई। आज यही वो चीज़ है जिसके लिए मैं जी रही हूं और यही मुझे हर तूफान का सामना करने और मुस्कराने की ताकत देती है।

डॉ. संगीता धानुका 

(36 वर्षीय डॉ. धानुका, मुंबई की एक फार्मास्युटिकल कंपनी में मैनेजर हैं।)

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तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

अब पुल की क्या जरूरत?

अपना काम निकलते ही भगवान राम ने रामसेतु तोड़ दिया था। बनाने का मकसद था माता सीता को पापी, खलकामी रावण के चंगुल से मुक्त कराना। वो महान कार्य संपन्न हुआ तो फिर पुल की क्या जरूरत। रावण को परास्त करने के बाद ज्ञानी, गुणीजनों की सभा में भगवान राम को एक सुर से शायद यही राय दी गई थी। माता सीता को वापस पाने के बाद ऋक्षराज, वानरराज और तमाम विद्वानों की सभा में अयोध्या वापसी का महत्वपूर्ण मुद्दा किनारे करके पहले पुल पर बहसी बहसा शुरू हो गई थी और अंतत: निष्कर्ष ये निकला कि पुल को तोड़ दिया जाय और ये शुभ कार्य भगवान श्रीराम स्वयं अपने हाथों अंजाम दें।

वैसे भी राक्षसों की धरती का पवित्र आर्यावर्त की माटी से जुड़ना भविष्य के लिहाज से कोई अच्छी बात नहीं हैं। सतयुग का काल था। सब के सब दूरदर्शी हो लिए थे। सभा के गुणीजनों का एक मत से फैसला था राक्षसों की धरती लंका अगर सूर्यवंश की धरती से जुड़ी रही तो भविष्य में आर्य कन्याओं पर हमेशा खतरा बना रहेगा। इन राक्षसों का क्या भरोसा। उनका कोई ईमान धर्म तो है नहीं, बार बार हमारी पावनी कन्याओं को ही उड़ा ले जाएंगे। कौन बार बार इनसे लड़ाई लड़ेगा। इतनी दूर कौन आएगा? इसलिए पुल तोड़ना ज्यादा बेहतर रहेगा।

रही बात पुष्पक विमान की तो इसे भगवान श्री राम चंद्र अपने साथ अयोध्या लेकर चले जाएंगे। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कोई राक्षस लाख चाहकर भी इधर से उधर नहीं आ पाएगा। मुसीबत आने की तीसरी राह जलमार्ग हो सकती है पर भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी संभावना नगण्य है क्योंकि हिंदू शास्त्रों के मुताबिक सागर की यात्रा महापाप है। जिसको धर्म, करम, ईमान से जाना हो वो समुद्र में उतरेऐसी मान्यता है। सागर यात्रा के नाम पर बस थोड़ी सी छूट है गंगा सागर यात्रा की वो भी बस एक बारसारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार। 

तो इस तरह से तमाम मुसीबतें हल हो जाएंगी किसी तरह की विदेश नीति का संकट भी नहीं खड़ा होगा। तो कुल मिला कर निष्कर्ष यही निकला कि पुल का मकसद पूर्ण हुआ, अब अगर ये रहेगा तो भविष्य में, कलियुग में दोनों देशों के बीच मुसीबत ही पैदा करेगा। तब इतने शुद्ध समझदार लोग तो होंगे नहीं। लिहाजा सभा ने ध्वनिमत से फैसला दिया कि पुल को भगवान श्रीराम के कर कमलों से तोड़ दिया जाए।

पर जाने कहां भगवान से भी चूक हो गई। पुल तोड़ने की बात कम्बन रामायण, स्कंद पुराण में दी गई पर पुल का अस्तित्व फिर भी कायम है।

ये सारी बातें कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर भगवान राम के आस्तित्व को नकार चुकी यूपीए सरकार ने एक नए शपथपत्र में कही है। इसलिए अगर उपरोक्त किसी बात से आपको आपत्ति हो तो बरास्ता सर्वोच्च न्यायलय आप सरकार से पूछताछ कर सकते हैं। अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है। आपकी सुविधा के लिए सूचना के अधिकार का क़ानून भी है।

अतुल चौरसिया

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बची हुई है डैमोक्रैसी

चक्र सुदर्शन

डैमोक्रैसी ग्रीक से, निकली सदियों पूर्व,

भारत में यह ठीक से, चलती दिखे अपूर्व।

चलती दिखे अपूर्व, चलाते हैं अपराधी,

जब भी संकट आया, इसकी डोरी साधी।

चक्र सुदर्शन, आम जनों की ऐसीतैसी,

गर्व करो तुम, बची हुई है डैमोक्रैसी।

                                       अशोक चक्रधर

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