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मुलायम पर मायाजाल?

आरोपों और प्रत्यारोपों की काली बौछार से उत्तर प्रदेश की राजनीति का कीचड़ और भी गंदला होता जा रहा है. मुख्यमंत्री मायावती समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगा रही हैं. उधर, ये दोनों पार्टियां इससे इनकार करते हुए मायावती पर पलटवार कर रही हैं. शब्दों की इस लड़ाई से राज्य में राजनीतिक कड़वाहट का एक नया अध्याय शुरू हो गया है.

आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई द्वारा मीडिया में जानकारी लीक करने को लेकर मायावती काफी गुस्से में हैं और ईंट का जवाब पत्थर से देने की तैयारी कर रही हैं. बसपा सरकार ने इस बारे में कानूनी सलाह मांगी है कि क्या कुख्यात यूपी पुलिस भर्ती घोटाले की जांच के लिए गठित की गई तीन सदस्यीय समिति के जांच निष्कर्षों के आधार पर मुलायम सिंह यादव, उनके भाई शिवपाल सिंह यादव और दूसरे लोगों के खिलाफ मामला शुरू किया जा सकता है.

गौरतलब है कि मायावती ने मुलायम सरकार के कार्यकाल में साढ़े तीन साल के दौरान हुई 18,884 कांस्टेबलों की नियुक्तियों को निरस्त कर दिया था. मुख्यमंत्री ने ये कदम अतिरिक्त महानिदेशक शैलजाकांत मिश्रा की अध्यक्षता में गठित एक समिति की सिफारिशों के आधार पर उठाया था. समिति ने चयन प्रक्रिया में रिश्वत और शारीरिक शोषण जैसी अनियमितताएं पाईं थीं. हालांकि बाद में समाजवादी पार्टी और महिला उम्मीदवारों द्वारा शारीरिक शोषण के आरोपों पर बवाल मचाए जाने के बाद इस समिति को रद्द कर दिया गया था. मगर उससे पहले समिति की प्रारंभिक जांच के आधार पर एक आईजी, नौ डीआईजी सहित दर्जन भर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था. इसके अलावा घोटाले में नामित 58 दूसरे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी. आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई द्वारा मीडिया में जानकारी लीक करने को लेकर मायावती काफी गुस्से में हैं और ईंट का जवाब पत्थर से देने की तैयारी कर रही हैं.

चार अक्टूबर 2007 को इस समिति का स्थान तत्कालीन मुख्य सचिव पी के मिश्रा की अध्यक्षता में गठित एक उच्च स्तरीय पैनल ने ले ली. डीजीपी विक्रम सिंह और लखनऊ के कमिश्नर वी एस पांडेय इसके सदस्य बनाए गए. चार महीनों तक घोटाले की जांच करने के बाद पैनल ने इस साल जनवरी के आखिरी हफ्ते में अपनी रिपोर्ट सौंपी.

पैनल की रिपोर्ट में पुलिस भर्ती घोटाले के लिए प्रथम दृष्टया पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव, दो पूर्व डीजीपी और कुछ दूसरे लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया है. रिपोर्ट की एक प्रति तहलका के पास भी है. इसके शब्दों में, वित्त मंत्रालय द्वारा जताई गई गंभीर आपत्तियों के बावजूद बड़ी संख्या में कांस्टेबल के पदों को मंजूरी देने हेतु नौकरशाहों पर दबाव डालने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के खिलाफ प्रथम दृष्टया साक्ष्य पाए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक मुलायम का चयन प्रक्रिया में सीधा दखल था. जाली तरीके से पदों का सृजन किया गया और पूर्व मुख्यमंत्री ने कानून का उल्लंघन करते हुए इसे मंजूरी दी.

शिवपाल सिंह यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं. रिपोर्ट के शब्दों में, “प्रथम दृष्टया ये प्रतीत होता है कि तत्कालीन लोकनिर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने अवैध रूप से उम्मीदवारों से पैसे लिये. रिपोर्ट आगे जोड़ती है कि दो पूर्व डीजीपी, यशपाल सिंह व बुआ सिंह और तत्कालीन विशेष सचिव चंद्र प्रसाद, शिवपाल के साथ मिले हुए थे. पैनल ने एस के मिश्रा समिति के निष्कर्षों की भी पुष्टि की. रिपोर्ट के शब्दों में, “पुलिस रेडियो विभाग में महिला कांस्टेबलों की चयन प्रक्रिया में कई उम्मीदवारों द्वारा शारीरिक शोषण का आरोप लगाया गया है.

इन सभी खुलासों के आधार पर मायावती ने इस घोटाले की सीबीआई जांच की सिफारिश की मगर केंद्र ने 21 अप्रैल 2008 को ये सिफारिश ठुकरा दी. हालांकि पांच जून 2008 को चयन प्रक्रिया में शामिल हुए उम्मीदवारों द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश दिया. इस आदेश के खिलाफ दाखिल अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़ी है.

पी के मिश्रा पैनल के सामने कई शीर्ष आईएएस और आईपीएस अधिकारी पेश हुए थे. मायावती के करीबी एक अफसर बताते हैं, हमारे पास भ्रष्टाचार, शारीरिक शोषण और नेताओं व अधिकारियों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग के पक्के सबूत हैं. कभी मुलायम के वफादार रहे कुछ अधिकारियों ने ही पैनल के सामने उनके और उनके भाई के खिलाफ बयान दिए. एक अफसर बताते हैं, तकनीकी सबूत और अधिकारियों के दर्ज बयान पैनल के निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं.

जांच के दौरान सरकार ने एक स्टिंग ऑपरेशन की स्वीकृति भी दी थी मगर चूंकि पैनल ने पर्याप्त सबूत इकट्ठा कर लिए थे इसलिए इसका इरादा छोड़ दिया गया. पैनल की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना था मगर मायावती की जिद के बाद इसे टाल दिया गया क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि उन पर राजनीतिक दुश्मनी से प्रेरित होने का आरोप लगे. हालांकि पैनल के सदस्य विक्रम सिंह और वी एस पांडे इस संबंध में टिप्पणी करने से इनकार करते हैं.  

उधर, शिवपाल सिंह यादव इन आरोपों से इनकार करते हैं. तहलका से बात करते हुए वो कहते हैं, हमने कुछ भी गलत नहीं किया है. अगर राज्य के 20,000 लोगों को नौकरी देना गुनाह है तो सत्ता में आने पर हम ये गुनाह फिर से करेंगे. वे (मुख्यमंत्री) सिर्फ अपने वफादार अधिकारियों वाले पैनल के निष्कर्षों के आधार पर हमारे खिलाफ कोई मामला नहीं बना सकतीं. अगर आरोपों में थोड़ी सी भी सच्चाई है तो पैनल की रिपोर्ट में दोषी पाए गए पुलिस अधिकारियों को बहाल क्यों किया गया?” पिछले पांच महीनों से एक कोने में पड़े पैनल के जांच परिणामों को मायावती सरकार आसानी से सीबीआई का मुकाबला करने और मुलायम को फंदे में कसने के लिए इस्तेमाल कर सकती है.

पिछले पांच महीनों से एक कोने में पड़े पैनल के जांच परिणामों को मायावती सरकार आसानी से सीबीआई का मुकाबला करने और मुलायम को फंदे में कसने के लिए इस्तेमाल कर सकती है. बसपा प्रवक्ता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, बसपा कार्यकर्ता सीबीआई के आरोपों पर चुप नहीं रहेंगे. मुलायम के खिलाफ दो मामलों में सीबीआई जांच चल रही है जिनमें से एक आय से अधिक संपत्ति का मामला भी है. इसके बावजूद बहनजी को निशाना बनाया जा रहा है. सीबीआई इन मामलों में मुलायम के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल क्यों नहीं कर रही?”

मगर क्या वजह है कि मायावती को पांच साल बाद इस मामले की याद आ रही है? इस सवाल पर शिवपाल यादव कहते हैं, आय से अधिक संपत्ति के मामले में मायावती सीबीआई जांच का सामना कर रही हैं. जांच के परिणाम उन्हें जेल में डालने के लिए काफी हैं. हमारे खिलाफ मामले दर्ज करने का मकसद ये है कि उनके खिलाफ दर्ज मामलों से वोटरों का ध्यान हट जाए.’’

आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई से निपटने के लिए मायावती के सिपाहसलार उनके करीबी विश्वासपात्र सतीश चंद्र मिश्र की अगुवाई में दिन रात एक कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के महाअधिवक्ता ज्योतिंद्र मिश्र कहते हैं, आय से अधिक संपत्ति का मामला शुरू करने के लिए हमने सीबीआई को चुनौती दी है. जब ये मामला सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने आएगा तो हम फिर से इसे चुनौती देंगे.

मायावती के वकीलों का दावा है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले को शुरू करने के लिए किसी ने सिफारिश नहीं की बल्कि सीबीआई ने ताज कॉरीडोर घोटाले की जांच के दौरान ये मामला खुद ही शुरू कर दिया. वकीलों के मुताबिक जांच एजेंसी इस तरह अपनी मर्जी से कोई मामला शुरू नहीं कर सकती. उनका ये भी कहना है कि आयकर विभाग मायावती की संपत्तियों की जांच कर चुका है और उसे इनमें कुछ भी गलत नहीं मिला.

अतिरिक्त महाअधिवक्ता एस के द्विवेदी गुस्से में कहते हैं, सीबीआई ताज कॉरीडोर घोटाले की जांच कर रही थी. ये मामला अब बंद हो चुका है. जांच के दौरान सीबीआई ने कोर्ट को बताया था कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में आरोपपत्र दाखिल करने का इसका कोई विचार नहीं है. फिर ये अब क्यों ऐसा करने की इजाजत मांग रही है और शपथपत्र को हम तक पहुंचने से पहले ही मीडिया में लीक क्यों किया गया?”

मगर देखा जाए तो सीबीआई द्वारा इस मामले में आरोपपत्र दाखिल करने की इजाजत मांगने का कारण मायावती के कानूनी सलाहकारों की चूक लगती है. नौ मई 2008 को मायावती के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल कर इस मामले को रद्द करने की मांग की थी. अदालत ने सीबीआई को इस संबंध में एक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा. इसका फायदा उठाते हुए जांच एजेंसी ने तुरंत एक प्रतिशपथपत्र दाखिल कर और कथित रूप से मीडिया में जानकारियां लीक कर मायावती के लिए ही मुसीबत खड़ी कर दी.

बसपा के एक नेता कहते हैं, सीबीआई के इस कदम का मकसद बहनजी पर दबाव बनाना था ताकि वे परमाणु करार पर विश्वास मत के दौरान अनुपस्थित रहें और केंद्र में कांग्रेस की सरकार बच जाए. हम संसद औऱ कोर्ट, दोनों जगह से ये लड़ाई लड़ेंगे.

सीबीआई की निष्पक्षता एक बार फिर सवालों के घेरे में है. एक तरफ मायावती का आय से अधिक संपत्ति का मामला है और दूसरी ओर मुलायम के खिलाफ दो मामलों में हो रही जांच. मायावती के खिलाफ तो जांच ने रफ्तार पकड़ ली है. मगर मुलायम के खिलाफ इसकी गति धीमी पड़ गई है. ऐसे में लग यही रहा है कि मायावती के आरोपों में दम है.

श्रवण शुक्ल

'आप इस समझौते की कीमत चुकाएंगे'

सरकार ने आएसआई को असैनिक नियंत्रण में लाने की कोशिश की थी। क्या वो ये संदेश देना चाहती थी कि अब और छद्म युद्ध नहीं होंगे?

नहीं। वो अमेरिका को एक सौगात देना चाह रहे थे क्योंकि उनके पास देने के लिए कुछ और नहीं था। सीमावर्ती कबायली इलाकों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, वो लड़ाका समूहों से समझौते की कोशिश कर रहे थे जो अमेरिका को पसंद नहीं। अमरीकियों के दबाव में अब उन्हें अपने क़दम पीछे खींचने पड़ रहे हैं जिससे संकट और भी गहरा हो गया है। आप सीमांत इलाके में कबायलियों के साथ इस तरह के खेल नहीं खेल सकते। आप या तो उनसे समझौता करो या फिर आपको कीमत चुकानी होगी। प्रधानमंत्री अमेरिका का भरोसा जीतना चाहते थे। मेरी तो ये समझ में नहीं आ रहा कि आप हिंदुस्तानी भी अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध क्यों बना रहे हैं। मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं आपको इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। 

अगर वो अमेरिका को खुश करना चाहते थे तो फिर कुछ ही घंटों के भीतर उन्होंने अधिसूचना रद्द क्यों कर दी?

ये सरकार का हथकंडा था। आंतरिक दबाव बहुत ज्यादा था। सेना इसका कड़ा विरोध कर रही थी। यहां तक कि परवेज़ मुशर्रफ भी इसके खिलाफ थे और मुझे यकीन है कि आईएसआई के डीजी ने भी इस पर राष्ट्रपति से जरूर बात की होगी। आईएसआई का पूर्व मुखिया होने के आधार पर मैं आप को बता दूं कि ये एजेंसी पहले से ही असैनिक नियंत्रण में है। यहां पर काम करने वाले ज्यादातर लोग तीनों सेनाओं से आते हैं। ये बेहद अनूठा संगठन है। मुझे याद है कि 1989 में जब मैं इसका मुखिया था, भारत में तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने राजीव गांधी के पास जाकर एक आईएसआई जैसे संगठन की मांग की थी। आईएसआई के चार्टर में एक राजनीतिक प्रकोष्ठ की व्यवस्था है। इसे जुल्फिकार अली भुट्टों के आदेश पर शामिल किया गया था। आईएसआई हमेशा से ये कहती आ रही है कि इसे खत्म किया जाय। लेकिन बेनज़ीर ने इसे नकार दिया। अगर उन्होंने इस प्रकोष्ठ को समाप्त कर दिया होता तो कोई भी इसका विरोध नहीं करता। लेकिन उन्होंने इसे गृह मंत्रालय के मातहत लाने की कोशिश की, एक पुलिस बल की तरह और ये सीधे-सीधे आईएसआई का राजनीतिकरण करने जैसा होता। 

आईएसआई को अपने आप में क़ानून क्यों माना जाता है? इसे किसी लोकतांत्रिक सरकार से भी ज्यादा ताकतवर माना जाता है?

नहीं. सेना, सरकार से ज्यादा ताकतवर है। परेशानी तब शुरू होती है जब सरकार ग़लतियां करना शुरू कर देती है क्योंकि आप माने न माने सेना बेहद ताकतवर संस्था है औऱ आईएसआई सर्वाधिक अनुशासित संगठन है। 

आपकी आईएसआई के सर्वाधिक अनुशासित संगठन होने वाली बात से बहुत से लोग सहमत नहीं होंगे। ये अपने छद्म युद्धों के लिए कुख्यात है।

हां इसने छद्म युद्ध लड़े हैं लेकिन फिलहाल तो ये अमेरिका के लिए लड़ा जा रहा है। पहले ये सोवियत संघ के खिलाफ था जो कि एक महान उपलब्धि रही। मैं आपको बता दूं कि उस वक्त जो चल रहा था उसकी जानकारी सेनाप्रमुख को भी नहीं होती थी। मैं आईएसआई का प्रमुख था और ये पूरी तरह गुप्त रहता था क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि रूसी चौकन्ने हो जाएं। अब अमेरिका चाहता है कि आईएसआई उसके लिए एक बार फिर से अफगानिस्तान की लड़ाई जीते। लेकिन वो ये नहीं जानते कि अब स्थितियां पूरी तरह भिन्न हैं।

राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ अमेरिका की दया पर टिके हुए हैं। तो फिर उन्होंने आईएसआई को असैनिक नियंत्रण में रखने का विरोध क्यों किया?

सेना को खुफिया सामरिक जानकारियां देने वाली एक संस्था गृह मंत्रालय के अधीन कैसे रखी जा सकती है? आईएसआई अग्रिम पंक्ति की सुरक्षा मुहैया करवाती है, अगर आप इसे खत्म कर देंगे तो फिर इस तरह का दूसरा संगठन कहां खड़ा कर पाएंगे? सरकार को आईएसआई से पंगे नहीं लेने चाहिए। अति उत्साह और बचपने में उन्होंने अधिसूचना जारी कर दी और फिर कुछ घंटों के भीतर ही उसे रद्द कर दिया। ये तो थूक कर चाटने वाली बात हुई।

हरिंदर बवेजा

खुद भी सीखें सिखाने वाले

सामाजिक न्याय की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दिल्ली विश्व विद्यालय के 77 महाविद्यालयों में से किसी में भी दलित प्रधानाध्यापक नहीं है और प्राध्यापकों को गिनने के लिए एक हाथ की उंगलियां भी ज़्यादा होंगी…

देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय ये दावा कर सकता है कि उसने अपने यहां कर्मचारियों की नियुक्ति में आरक्षण का प्रावधान 1997 में ही लागू कर दिया था। लेकिन धरातल पर इसका शायद ही कोई प्रभाव नज़र आता हो। कुछ अहम तथ्यों पर नज़र डालें तो डीयू के 77 कॉलेजों में से किसी एक में भी अनुसूचित जाति या जनजाति का प्रधानाध्यापक नहीं है और न ही इसके 80 विभागाध्यक्षों में से ही कोई भी इन समुदायों का प्रतिनिधित्व करता है। 2006 में प्रोफेसर आर के काले द्वारा किए गए एक अध्ययन में ये बात भी सामने आई थी कि डीयू के 719 फैकल्टी सदस्यों में से मात्र 2 अनुसूचित जाति और जनजाति से थे।

सूचना के अधिकार क़ानून के तहत हासिल किए गए आकड़ों से पता चलता है कि डीयू के तमाम विभागों में कार्यरत 300 रीडर्स में से मात्र 4 एससी और 1 एसटी समुदाय से हैं। विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों में दलित और जनजातीय समुदाय के लेक्चरर्स की संख्या भी आरक्षण व्यवस्था के मानकों के लिहाज से काफी कम है।

आंकड़ों के मुताबिक प्रथम श्रेणी की नौकरियों में जहां सिर्फ 11.5 फीसदी एससी और 4.5 फीसदी एसटी समुदाय के हैं वहीं सबसे निचली श्रेणी यानी कि सफाई कर्मचारियों में इनका हिस्सा 59.2 और 4.9 फीसदी है।

हिंदू कॉलेज के इतिहास विभाग में दलित वर्ग से ताल्लुक रखने वाले सीनियर लेक्चरर रतन लाल कहते हैं कि उनके जैसे लोगों के लिए बिना आरक्षण के विश्वविद्यालयों में शिक्षक की नौकरी पाना लगभग असंभव होता है। “आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार अक्सर सामान्य वर्ग के प्रत्याशियों जितनी योग्यता के बावजूद शिक्षा संबंधित नौकरियों में पिछड़ जाते हैं क्योंकि अक्सर साक्षात्कार बोर्ड ही पूर्वाग्रह का शिकार होता है”, लाल कहते है।

इस वजह से उच्च शैक्षिक योग्यता के बावजूद ज्यादातर दलित शिक्षक आज भी अपनी जातिगत पहचान छुपाने की कोशिश करते हैं। हाल फिलहाल में अगर डीयू में आरक्षण के प्रावधानों को सही तरीके से लागू करने की आवाज़े उठ रहीं हैं तो इसकी एक वजह ये भी है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वर्तमान अध्यक्ष सुखदेव थोरात खुद भी दलित हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय में ये हालत तब है जब प्रो. काले के अध्ययन के मुताबिक यहां लेक्चरर्स के करीब आधे पद रिक्त पड़े हुए हैं। इसमें कोई हैरत नहीं कि रिज़र्वेशन के विरोधी, दलितों की कम संख्या को ये कह कर जायज ठहराते हैं कि वो या तो अनुपलब्ध होते हैं या अयोग्य। लेकिन अयोग्यता का फार्मूला ज्यादातर अर्थशास्त्र, इंग्लिश और कॉमर्स जैसे विषयों में ही लागू होता है, जहां आरक्षित वर्ग के प्रत्याशियों को अंग्रेज़ी भाषा में प्रवीण न होने पर आसानी से अयोग्य करार दिया जा सकता है। दूसरे तमाम विषयों के शिक्षकों और नॉन टीचिंग स्टाफ पर अयोग्यता का ये तर्क आसानी से लागू नहीं होता, जबकि इन क्षेत्रों में भी हालात कुछ ज्यादा अलग नहीं हैं।

कार्मिक, जन शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के 2005 के आंकड़ों के मुताबिक प्रथम श्रेणी की नौकरियों में जहां सिर्फ 11.5 फीसदी एससी और 4.5 फीसदी एसटी श्रेणी के हैं वहीं सबसे निचली श्रेणी यानी कि सफाई कर्मचारियों में इनका हिस्सा 59.2 और 4.9 फीसदी है। इस असंतुलन की वजह देश की निर्णय करने वाली इकाइयों पर प्रभावशाली जातियों का वर्चस्व होना है। उदाहरण के तौर पर डीयू की कार्यकारी परिषद और अकादमिक परिषद को ही लीजिए इनमें एससी और एसटी के लिए कोई आरक्षण नहीं है, जबकि ये विश्वविद्यालय की निर्णय करने वाली मुख्य इकाई है।

जिस तरह से देश में आरक्षण का तंत्र काम करता है उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आरक्षित जातियों की अयोग्यता का तर्क निचली जातियों को नियुक्ति से दूर रखने के लिए कृत्रिम रूप से गढ़ा गया है। देश के सबसे प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय के ये चौंकाने वाले आंकड़े तमाम जिम्मेदार लोगों की आंखें खोलने के लिए काफी होने चाहिए। देश भर के तमाम दूसरे विश्वविद्यालयों में परिस्थितियां इससे भिन्न होने की बजाय और भी बदतर हैं। विडंबना ये है कि दिन-रात सामाजिक न्याय और समतामूलक समाज की बातें करने वाला बौद्धिक वर्ग इस दिशा में बनाए गए नियमों और सिद्धातों का खुद ही धड़ल्ले से लगातार उल्लंघन कर रहा है।

अमित चमड़िया

लौट मुसाफिर रेल को आए ?

रेल का सफर हममें से कई लोगों के बचपन की खूबसूरत यादों का हिस्सा होगा. किसी हिलस्टेशन पर जाना हो या दादी-दादा या नानी-नाना के घर, हर छुट्टी में रेल यात्रा की एक अहम भूमिका हुआ करती थी.

फिर कुछ साल पहले बजट एयरलाइंस का दौर शुरू हुआ और एयर डेक्कन, स्पाइसजेट और उनके जैसी दूसरी एयरलाइंस ने सस्ती हवाई यात्रा का विकल्प पेश कर दिया. एक समय सपना रही हवाई यात्रा अब मध्यवर्ग की पहुंच में आ गई थी और ये वर्ग रेल से दूर होता चला गया.

मगर जल्द ही स्थितियां फिर से बदल सकती हैं. हवाई ईँधन की कीमतें आसमान छू रही हैं और तीन महीनों के दौरान ही इनमें करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है. इससे हवाई किराया बढ़ रहा है और देश भर में लोगों का रुझान एक बार फिर से रेलयात्रा की तरफ बढ़ा है. नतीजतन, पिछले सालों में 30-40 फीसदी रही उड्डयन क्षेत्र की वृद्धि दर अब घटकर एक अंक तक आ गई है.

वैसे तो छुट्टियों का सीजन हमेशा ही रेलवे के लिए सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ भरा होता है मगर इस साल यात्रियों की संख्या में 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई. पिछले साल एसी I, II और III की बुकिंग 85 फीसदी थी जो इस साल बढ़कर 95 फीसदी हो गई. भारतीय रेलवे के निदेशक(यात्री सुविधाएं) राकेश टंडन कहते हैं, कई ट्रेनों के लिए तो महीनों पहले से ही क्षमता से ज्यादा बुकिंग हो चुकी है. हालांकि ये कहना कठिन है कि क्या ये बढ़ोतरी पूरी तरह से हवाई किरायों में वृद्धि का नतीजा है, मगर इसमें कोई शक नहीं कि रेलयात्रियों में बढ़ोतरी का एक कारण बढ़ता हवाई किराया भी है.

इस साल यात्रियों की संख्या में 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई. पिछले साल एसी I, II और III की बुकिंग 85 फीसदी थी जो इस साल बढ़कर 95 फीसदी हो गई.

मगर आने वाले समय में रेलयात्रियों की संख्या मे वृद्धि अवश्यंभावी है और इसके अपने कारण हैं. लागत कम करने के लिए कई एयरलाइंस ने बड़ी संख्या में छोटे शहरों की उड़ानें रद्द करनी शुरू कर दी हैं. साथ ही महानगरों के बीच उड़ानों की संख्या में भी कमी की गई है. ट्रेवेल एजेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (टीएआईआई) के उपाध्यक्ष राजिंदर राय कहते हैं, ट्रेन का रुख करने वाले ज्यादातर छोटे शहरों के हवाई यात्री होंगे क्योंकि उनके लिए विकल्पों में कमी हो रही है.

विकल्पों से राय का मतलब ये है कि सीमित हवाई उड़ानों का भारी-भरकम किराया इन यात्रियों की जेब से बाहर हो जाएगा और इसकी बजाय उनके लिए रेल से यात्रा करना ज्यादा आसान होगा. मेकमाईट्रिपडॉटकाम के सहसंस्थापक और सीओओ केयुर जोशी इससे सहमति जताते हैं, स्पाइस जेट ने अपनी उड़ानों में 15 फीसदी की कमी कर दी है और कुछ दूसरी एयरलाइंस भी कुछ ऐसा ही कर रही हैं इसलिए छोटे शहरों के यात्रियों के पास ज्यादा विकल्प नहीं रह गए हैं. उन्हें या तो अब रेल से यात्रा करनी पड़ेगी या सड़क मार्ग द्वारा, और इनमें पहला विकल्प ज्यादा आरामदायक है.,”

तो क्या इसका अर्थ ये है कि भारतीय रेलवे अब अपने खोये हुए गौरव को फिर हासिल कर लेगा? विशेषज्ञों की मानें तो वो वक्त अभी दूर है. यद्यपि जोशी को उम्मीद है कि कम से कम अगले आठ-दस महीनों तक रेलयात्रियों की संख्या के बढ़ने का मौजूदा रुझान जारी रहेगा मगर उसके बाद लोग हवाई किरायों में बढ़ोतरी के झटके से उबर जाएंगे. टीएएआई के मुखिया अनिल कालसी भी मानते हैं कि हालांकि किराये में वृद्धि हवाई यात्रियों पर असर डाल रही है मगर कोई जरूरी नहीं कि इसका सबसे ज्यादा फायदा रेलवे को ही हो. कालसी के मुताबिक यात्रा के तनाव और कीमत से बचने के लिए कॉरपोरेट कंपनियों के प्रोफेशनल्स वीडियो कांफ्रेंसिग जैसी तकनीकों का सहारा ले सकते हैं. और अगर शारीरिक उपस्थिति अपरिहार्य ही हो तो बढ़ते किराए के बावजूद उनकी प्राथमिकता फिर भी हवाई यात्रा ही होगी. वो कहते हैं, कॉरपोरेट कंपनियों के लिए समय, किराये में थोड़ी बढ़ोतरी से ज्यादा अहम है.

भारत में घरेलू उड़ानों के यात्रियों का एक बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स से आता है. अगर वे हवाई यात्रा से मुंह नहीं मोड़ते तो रेलवे को उतना फायदा नहीं होने वाला. राय मानते हैं कि ये कॉरपोरेट यात्री तब तक रेलवे का रुख नहीं करेंगे जब तक हवाई किराये में असाधारण बढ़ोतरी न हो जाए.

मगर फिर ये बात भी अपनी जगह है कि रेल की रफ्तार और इसका आकर्षण परंपरागत रूप से इन लोगों के मतलब की चीज है भी नहीं. रेल तो उनकी पहली पसंद रही है जो छुट्टियां बिताने कहीं जा रहे हों. सस्ती हवाई यात्रा के दौर ने इन यात्रियों की एक बड़ी संख्या को रेलवे से छीन लिया था. अब रेलवे इन यात्रियों को वापस अपनी तरफ लुभा सकता है. भेल में कार्यरत राजीव माथुर मानते हैं कि रेल और हवाई यात्रा के बीच किसी भी व्यक्ति का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों विकल्पों के किराये का फर्क कितना ज्यादा है. मगर राजीव भी मानते हैं कि अगर रेल यात्रा एक रात से ज्यादा लंबी हो और समय की मारामारी हो तो वे हवाई यात्रा को तरजीह देंगे.

गौरतलब है कि रेल से सफर करने वाले यात्रियों में सबसे ज्यादा वृद्धि उस यात्री वर्ग में देखी गई है जो वातानुकूलित डिब्बों में सफर करते हैं. राय के शब्दों में एक बार जब बड़े शहरों के लोग हवाई यात्रा की सुविधाओं के आदी हो जाते हैं तो उन्हें वापस खींचना तब तक बहुत मुश्किल है जब तक ट्रेनों में भी वैसी ही सुविधाएं न दी जाएं.कई यात्री इस बात से सहमत दिखते हैं. दिल्ली में अपना व्यवसाय चलाने वाले करण कुमारिया कहते हैं कि अगर बहुत जल्दी न हो तो वे रेल यात्रा को प्राथमिकता देंगे मगर वे एसी फर्स्ट या सेकेंड क्लास से ही जाएंगे. कुमारिया कहते हैं, अभी किरायों में अंतर काफी ज्यादा है. इसलिए हवाई यात्रा की बजाय किसी एसी ट्रेन का टिकट लेने से मेरा काफी पैसा बच जाएगा.”

मगर दूसरी ओर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो ट्रेन से सिर्फ इसलिए सफर करते हैं क्योंकि ये उन्हें भाता है. एमिटी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर कल्याण चटर्जी कहते हैं, लंबी दूरी के लिए मैं एक तरफ की रेल यात्रा को तरजीह दूंगा क्योंकि मुझे सफर के नजारे बहुत अच्छे लगते हैं. गृहणी गीता भार्गव को लगता है कि रेलयात्रा बच्चों के लिए एक सीख भरा अनुभव होती है. वे बताती हैं कि उन्होंने अपनी बहनों के साथ ट्रेनों में कई यादगार यात्राएं की हैं और यही यादें उन्हें रेल की तरफ खींचती हैं.

लगता है कि रेलवे भी इस बदलाव को भांपकर उसे भुनाने के प्रति गंभीर है. रेलवे बोर्ड वर्तमान ट्रेनों में बेहतर सुविधाओं वाली वातानुकूलित बोगियां बढ़ाने की सोच रहा है और यात्रियों की अतिरिक्त संख्या को देखते हुए कुछ और ट्रेनें भी चलाने की योजना है. टंडन कहते हैं, कुछ समय पहले हमने 800 नई बोगियां जोड़ी थीं और अगर मांग बहुत ज्यादा रहती है तो हम इसमें और भी बढ़ोतरी कर सकते हैं.

कृष्ण कौशिक 

छोटे पर्दे पर गूंगी गुड़िया

मनोरंजन चैनल 9 एक्स और इसके मालिकों इंद्राणी और पीटर मुखर्जी के लिए इंदिरा गांधी के जीवन पर टीवी धारावाहिक बनाने का फ़ैसला एक बड़े जुए जैसा है। इसकी घोषणा होने के साथ ही ये ख़बर बन गई और कार्यक्रम पूरा होने तक और शायद उसके बाद भी ऐसा ही होता रहेगा। मगर इंद्राणी इसे लेकर कतई चिंतित नहीं है। लाख बार मरने की बजाय मैं एक बार ढ़ंग से जीना पसंद करूंगी, वे कहती हैं और इस बात पर आश्चर्य जताती है कि इतने चमत्कारिक व्यक्तित्व के ऊपर देश में कभी कोई फिल्म बनाने की कोशिश क्यों नहीं की गई।

इंद्राणी बिना लागलपेट के ये भी बताती हैं कि ये आइडिया उनके ही दिमाग की उपज है, उनके पति की नहीं, जिन्हें देश के सबसे सफलतम टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। इंद्राणी के मुताबिक, अगर हमने इस विषय पर धारावाहिक नहीं बनाया तो कोई और बना लेगा। उनकी सोच बिल्कुल साफ है, वो इस मामले में दूसरों से बाजी मार लेना चाहती हैं। फिलहाल इस धारावाहिक का शीर्षक इंदिरा गांधी ही है और इसे हिंदी और अंग्रेज़ी दोनो भाषाओं में बनाया जाएगा।

पवार के मुताबिक उन्हें 10 जनपथ से स्वीकृति मिल चुकी है और इसी वजह से शायद वो इतने आश्वस्त भी नज़र आते हैं। मगर इस पर ज्यादा कुछ न बोलते हुए वे सिर्फ इतना कहते हैं कि वे गांधी परिवार की सहमति लिए बिना ऐसा नहीं कर सकते थे।

9 एक्स ने इसके लिए उत्तम सिंह पवार को बतौर कंटेंट हेड नियुक्त किया है। पवार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के देवर और पूर्व सांसद हैं। उनके कंधों पर छह महीनों तक पूरे देश भर में चलने वाली शूटिंग के बाद धारावाहिक को चैनल पर प्रसारित करने की जिम्मेदारी डाली गई है। । हमने उनकी ज़िंदगी पर काफी पहले एक फिल्म बनाने का फैसला किया था और उसकी शूटिंग भी शुरू हो गई थी। मैंने मनीषा कोईराला को इंदिरा गांधी और अमरीश पुरी को मोरारजी देसाई की भूमिका के लिए चुना था। लेकिन किन्हीं वजहों से हमारे साथ कई दुर्घटनाएं हुईं और ये योजना परवान नहीं चढ़ सकी। मेरे मुख्य कैमरामैन तक की इस दौरान मौत हो गई। 9 एक्स के लिए इसे दोबारा से शुरू करके मुझे बेहद खुशी हो रही है, पवार तहलका को बताते हैं।

कुछ छोटी मोटी जानकरियों के अलावा 9 एक्स और पवार ज़्यादा कुछ बताने को तैयार नहीं होते। वो इस बात का भी खुलासा नहीं करते कि इस धारावाहिक का निर्देशन वो खुद करेंगे या कोई औऱ। मुख्य किरदार के लिए करिश्मा कपूर से लेकर तब्बू तक के नाम हवा में होने की बात पर वे कहते हैं, मैं आपको ज्यादा कुछ नहीं बता सकता लेकिन इतना कह सकता हूं कि इसमें न तो तब्बू है न करिश्मा कपूर और न ही ऐश्वर्या राय।

इस बात की भी संभावना है कि पवार, स्वर्गीय कमलेश्वर द्वारा इंदिरा गाधी पर किए गए वृहद शोध का सहारा लें। दूरदर्शन के मुखिया रहे कमलेश्वर ने गांधी पर गंभीर अध्ययन किया था और उनके जीवन से प्रेरित मशहूर लेखक-निर्देशक गुलज़ार की फिल्म आंधी की पटकथा भी लिखी थी।

पवार के मुताबिक उन्हें इसके लिए 10 जनपथ से भी स्वीकृति मिल चुकी है और इसी वजह से शायद वो इतने आश्वस्त नज़र आते हैं। मगर इस पर ज्यादा कुछ न बोलते हुए वे सिर्फ इतना कहते हैं कि वे गांधी परिवार की सहमति लिए बिना ऐसा कर ही नहीं सकते थे।

उनकी घोषणा पर तत्काल प्रतिक्रियाएं भी हुई हैं। उनका जीवन सफलताओं और त्रासदियों की महागाथा है। टेलीविज़न का पर्दा इतने व्यापक व्यक्तित्व को समेटने के लिए बहुत छोटा है, मशहूर इतिहासकार और इंदिरा गांधी की करीबी और उनकी जीवनी लेखिका पुपुल जयकर की बेटी डॉ. राधिका हेर्ज़बर्गर कहती हैं।

ये देखना काफी रोचक होगा कि पवार और इंद्राणी मुख्य भूमिका के लिए किसे चुनते हैं। लास्ट एम्परर और क्राउचिंग टाइगर, हिडेन ड्रैगन जैसी फिल्मों की सह निर्माता चाइना फिल्म ग्रुप कॉर्पोरेशन ने इंदिरा गांधी के ऊपर बनने वाली द्विभाषीय (चीनी और अंग्रेज़ी) फिल्म बानडुंग सोनाटा के लिए पेरीजाद ज़ोराबियन को पहले से ही साइन किया हुआ है। इस फिल्म का मुख्य विषय 1955 में आयोजित हुआ एशिया-अफ्रीका सम्मेलन है जो कि एशियाई और अफ्रीकी देशों का ऐसा पहला सम्मेलन था जिसमें महाशक्तियों को शामिल नहीं किया गया था।

अब ये पवार और मुखर्जी के ऊपर है कि वो एक ऐसा चेहरा पेश करें जिसे सारा देश स्वीकार करे। आखिरकार भारत में सितारे ही तो हैं जो किसी कार्यक्रम की सफलता-असफलता तय करते हैं।

शांतनु गुहा रे

क्या अब भी राह पर है गाड़ी ?

अब सवाल ये उठता है कि इस पूरे घटनाक्रम का भाजपा, एनडीए और सबसे अहम, जनमानस पर क्या असर पड़ने वाला है

आडवाणी की चिंता के कारण समझे जा सकते हैं. वोटिंग के तीन दिनों पहले से ही राजनीतिक पंडितों और मीडिया में चर्चाएं होना शुरू हो गईं थीं कि सरकार बचाने के लिए भाजपा ने अपनी अप्रत्यक्ष सहमति दे दी है. मीडिया का ये विश्वास कपोल-कल्पना पर आधारित नहीं था. भाजपा में हर कोई इस बात को जानता है कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ऐसी किसी भी स्थिति के सख्त खिलाफ थे जो इस साल आम चुनाव का कारण बने. उनके इस रुख का ठीक-ठीक कारण क्या है कहा नहीं जा सकता. हालांकि पार्टी की शीर्ष निर्णय इकाई में अध्यक्ष का वजन ज्यादा नहीं है फिर भी सिंह का विरोध पार्टी की एकराय में बाधा बन गया. पिछले सोमवार को पूरे दिन सिंह के करीबी पार्टी के एक नेता संसद के केंद्रीय हॉल में बैठकर मीडिया से ऑफ द रिकॉर्ड फुसफुसाते रहे कि यूपीए सरकार का तत्काल पतन भाजपा के हित में नहीं है.

शीर्ष स्तर पर इस तरह की बगावत की अहमियत कम करके नहीं आंकी जानी चाहिए. पहले तो ऐसे समय पर, जब तत्काल निर्णय जरूरी थे, इसने भाजपा की निर्णय लेने की पहले से ही धीमी रफ्तार को और भी सुस्त कर दिया. लंबे समय तक रही ये अनिश्चितता भी एक कारण रही कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने यूपीए के साथ रहने का फैसला किया. हालांकि झामुमो को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण सहयोगी तो नहीं कहा जा सकता मगर अगले लोकसभा चुनाव में झारखंड में भाजपा-जद(यू)-झामुमो का गठबंधन बहुत शक्तिशाली साबित होता. दूसरा, धारणा ये बन गई थी कि भाजपा सरकार गिराने के प्रति गंभीर नहीं है. इससे यूपीए के संकटमोचकों को भाजपा के पाले में सेंध लगाने का उत्साह मिल गया जिससे आखिरकार सरकार बच गई.

उधर, आडवाणी सरकार को गिराने के लिए कृतसंकल्प थे. यहां तक कि ऐसा करने के लिए उन्होंने नेपथ्य में वाममोर्चे और बसपा के साथ अनौपचारिक तालमेल का इंतजाम भी कर लिया था. उनका ये संकल्प भारत-अमेरिका परमाणु करार पर पार्टी के विरोध के कारण नहीं था. इसकी मुख्य वजह था आडवाणी का विश्वास. आडवाणी को यकीन था कि मनमोहन सिंह सरकार के गिरने से कांग्रेस में हर स्तर पर हताशा की एक लहर पैदा हो जाएगी जिसका आगे चलकर चुनाव परिणामों पर सीधा असर होगा. आडवाणी ये भी मान रहे थे कि राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उड़ीसा में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ-साथ होने से यूपीए के खिलाफ सत्ता विरोधी राष्ट्रीय लहर स्थानीय सत्ताविरोधी लहर पर भारी पड़ जाएगी. आडवाणी सरकार को गिराने के लिए कृतसंकल्प थे. यहां तक कि ऐसा करने के लिए उन्होंने नेपथ्य में वाममोर्चे और बसपा के साथ अनौपचारिक तालमेल का इंतजाम भी कर लिया था.

अगर यूपीए के लिए सबकुछ ठीक हुआ होता तो विश्वास मत पर इसकी आसान जीत से भाजपा में काफी हताशा पैदा हुई होती. पार्टी के इतने सारे सांसदों के बागी होने को आडवाणी की अकुशलता के उदाहरण के रूप में पेश किया गया होता. मनमोहन ने जिस तरह से अपनी शैली के विपरीत आडवाणी पर हमला करते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई उससे इस संदेह को बल मिलता है कि विश्वास मत की जीत को और मज़बूत करने के लिए बीजेपी को तोड़ने की सुनियोजित तैयारी की गई थी.

मगर ये तैयारी अगर पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई तो इसका कारण ऐन वक्त पर लोकसभा में भाजपा सांसदों का नोटों के बंडल लहराना रहा. इस घटना को भाजपा नियोजित ऑपरेशन मानने वाले लोग आंशिक रूप से सही हैं. भाजपा ने अंतिम क्षणों में यूपीए के लापरवाह रवैये का फायदा उठा, सरकार बचाने के लिए अपनाए जा रहे अनैतिक तरीकों को रोशनी में लाने की कोशिश की थी. पार्टी नेतृत्व को साफ तौर पर मालूम था कि यूपीए द्वारा सांसदों की खरीद-फरोख्त का खुलासा करने के लिए एक स्टिंग ऑपरेशन किया जा रहा है. पहले योजना ये थी कि जिस चैनल के साथ मिलकर इसे अंजाम दिया जा रहा है वो मंगलवार की दोपहर फोन पर हुई बातचीत और कैमरे पर दर्ज तस्वीरों का प्रसारण करेगा. दुर्भाग्यवश संबंधित चैनल ने आखिरी वक्त पर अपने हाथ पीछे खींच लिए. इसके बाद तीन सांसदों के पास चारा यही था कि वे सरकार के संकटमोचकों द्वारा अपनाए जा रहे भ्रष्ट तरीकों का खुलासा करने के लिए कोई दूसरा विकल्प खोजें. संसद में दिखे नाटकीय दृश्य इसी का परिणाम थे.

इसमें कोई शक नहीं है कि उस दिन संसद में जो हुआ, और जिसके गवाह करोड़ों लोग बने, उससे सरकार के कई इरादों को धक्का लग सकता है. इस घटनाक्रम ने सरकार की जीत को दागदार बना दिया. हार से निराश विपक्ष यही सोचकर तसल्ली कर रहा है कि यूपीए की नैतिक हार हुई है. एनडीए में हताशा की लहर पैदा करने की बजाय रिश्वत पर हुए हंगामे ने उसे एक नया औऱ शक्तिशाली मुद्दा दे दिया है.

यहां पर ये याद रखना अहम है कि आडवाणी के लिए विश्वास मत का ये अनुभव किसी हमले में बाल-बाल बचने जैसा रहा है. सरकार के सबसे चतुर संकट प्रबंधकों की योजना तो ये थी कि विश्वास मत पर जीत को आडवाणी के नेतृत्व पर हमले के साथ जोड़कर दोहरी चोट की जाए. अगर संसद में तीन सांसदों ने विरोध प्रदर्शन नहीं किया होता तो ये योजना सफल भी हो चुकी होती. आडवाणी को एक ऐसा अप्रेरणादायी नेता मान लिया जाता जो अपने झुंड को भी इकट्ठा नहीं रख सकता. इससे उनकी पकड़ कमजोर होती और बगावत का एक नया दौर शुरू हो जाता. इसके अलावा ऐसे में तीसरे मोर्चे को ये दावा करने का मौका मिल जाता कि वही असली विपक्ष है. कांग्रेस भी ऐसा ही चाहती थी क्योंकि ऐसे में दिग्भ्रमित एनडीए समर्थकों का लाभ स्वाभाविक रूप से उसे ही मिलता. इस तरह देखा जाए तो मंगलवार की शाम को आडवाणी ने एक नजदीकी तख्तापलट को टाल दिया.

कोई कम तजुर्बेकार नेता इस तरह के खतरे पर बिना सोचे प्रतिक्रिया कर सकता था. मगर आडवाणी खतरे से निपटने की कोशिशों के साथ ऐसा दिखने की कोशिश भी करेंगे मानो कुछ हुआ ही न हो. इसके अपने लाभ हैं क्योंकि इससे उन लोगों का कद कम हो जाता है जिनकी जिंदगी ही साजिशों के इर्द-गिर्द घूमती है. मगर इससे एक नुकसान भी हो सकता है वो ये कि निश्चिंतता का ये आवरण पार्टी को सबक सीखने से वंचित कर सकता है.

इस अनुभव का सबसे अहम सबक ये है कि चुनावी जोड़-तोड़ को लेकर भाजपा अब तक ऐसी कोई सुनियोजित रणनीति नहीं बना पाई है जिसके बल पर ह यूपीए को पटखनी दे सके. 1996 में केंद्र में पहली बार बनी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिनों में ही इसी वजह से गिर गई थी क्योंकि भाजपा अकाली दल के अलावा दूसरे नए साथी ढूंढने में नाकामयाब रही थी. इस असफलता के कई कारण थे. इनमें से प्रमुख ये था कि पार्टी अपनी परंपरागत छवि से ऊपर नहीं उठ पाई थी. 1998 से 2004 तक सफलता से गठबंधन सरकार चलाने के बावजूद भाजपा अब भी राजनीतिक अस्पृश्यता से संबंधित कठिनाइयों का सामना कर रही है. गठबंधन राजनीति और लचीलेपन की जरूरत की बाध्यताओं को लेकर आडवाणी संवेदनशील जरूर हैं(ये बात उन्होंने संसद में दिए गए अपने भाषण में भी जोर देकर कही है) मगर कांग्रेस के मुकाबले, नए दोस्त बनाने के खेल में भाजपा नेता काफी अनुभवहीन हैं. जहां इसकी स्थिति मजबूत है वहां तो फिर भी ठीक है मगर जहां मुकाबला बराबर का हो या स्थितियां विपरीत हों तो वहां पार्टी फिसल जाती है जैसे गोवा और झारखंड में देखने को मिला. विश्वास मत पर इसकी उद्देश्यहीन तैयारियों का अतिरेक भी इस बात की पुष्टि करता है. आदर्श स्थिति में भाजपा को यूएनपीए में मची अस्थाई उलट-पुलट का लाभ उठाकर इसका इस्तेमाल एनडीए का दायरा बढ़ाने में करना चाहिए था. मगर असमंजस में खड़ी ये उस शून्य को काफी समय तक देखती रही जो सपा के यूएनपीए छोड़ने से पैदा हुआ था. इससे मायावती को नाटकीय रूप से इस जगह को कब्जाने का मौका मिल गया. योजना तो ये थी कि विश्वास मत पर जीत को आडवाणी के नेतृत्व पर हमले के साथ जोड़कर दोहरी चोट की जाए. अगर संसद में तीन सांसदों ने विरोध प्रदर्शन नहीं किया होता तो ये योजना सफल भी हो चुकी होती.

आडवाणी के लिए विश्वास मत का दूसरा सबक ये है कि किसी नीति पर असमंजस को लंबे समय तक बनाए रखने का कोई फायदा नहीं होता. ये जगजाहिर है कि भारत-अमेरिका परमाणु करार पर अपनी नीति को लेकर भाजपा पूरे समय असमंजस में रही. पार्टी के एक धड़े ने इसे वाजपेयी सरकार द्वारा की गई पहल की तर्कसंगत अगली कड़ी के तौर पर देखा वहीं दूसरे गुट ने इसे चीन और इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ आड़ की तरह काम आने वाला रणनीतिक गठजोड़ माना. तीसरा धड़ा मान रहा था कि ये कदम अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत को चंद गिने-चुने देशों की श्रेणी में ले आएगा. इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं मगर इनमें और वामदलों और दूसरे लोगों के करार विरोधी विचारों में दूर-दूर तक कोई समानता नहीं है.

आडवाणी को काफी समय से इस बात का एहसास रहा है कि परमाणु करार का ज़्यादा विरोध करने पर पार्टी के मज़बूत मध्यवर्गीय वोटबैंक के खिसकने का खतरा पैदा हो सकता है. इसीलिए आडवाणी ने एक घरेलू कानून के माध्यम से हाइड एक्ट के नकारात्मक प्रभावों को खत्म करने की बात कर करार के दोनों तरफ खड़े लोगों के बीच एक पुल बनाने की कोशिश की थी. ये एक ऐसा सुझाव था जिसे सरकार भी मानने के लिए तैयार है या यूं कहें कि विश्वास मत से पहले तैयार थी. दुर्भाग्यवश, आडवाणी के ऐसे प्रयासों को कट्टरवादियों ने खारिज कर दिया और उन्होंने ऐसी कोई नीति नहीं बनाई जो कि पार्टी के इस परंपरागत मतदाता के विचारों के मुताबिक हो. कोई आश्चर्य नहीं कि करार पर यूपीए के हमले के जवाब में पार्टी को बगलें झांकनी पड़ जाती हैं.

भले ही बीजेपी का ये अनुमान कि परमाणु करार आगामी चुनावों में कोई बड़ा मुद्दा नहीं होगा, सही हो मगर अनुभव ये बताता है कि भाजपा किसी भी नीतिगत मुद्दे पर संशय की स्थिति को झेलने की स्थिति में नहीं है. भाजपा और इसके एनडीए के सहयोगियों के बीच कई मुद्दों पर लगातार मतभेद रहे हैं. ये महत्वपूर्ण हो सकते हैं अगर कांग्रेस खुद को राष्ट्रीय हितों का अलंबरदार दिखाने का और राहुल गांधी के माध्यम से एक नये भारत की बात देश के सामने रखने का प्रयास करती है.

एक स्तर पर कांग्रेस और भाजपा के मतदाता बिल्कुल अलग हैं. कांग्रेस अभी भी गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों पर निर्भर है वहीं भाजपा मध्यवर्गीयज़्यादातर अगड़ी जातियों वालेऔर पिछड़े वर्ग के एक हिस्से पर अपना अधिकार समझती है. आने वाले चुनावों में कांग्रेस के दलित-मुस्लिम मतवर्गों का मायावती और वामदलों की ओर खिसक जाने का खतरा है. ये कांग्रेस को उत्तर प्रदेश से आगे पूरे उत्तरी और मध्य भारत में नुकसान पहुंचा सकता है. उधर कांग्रेस इस नुकसान से बचने और बढ़ी मुद्रास्फीति के चुनावी प्रभावों को नकारने के लिए युवा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर भाजपा के मध्यवर्गीय वोटबैंक को लुभाने का प्रयास कर सकती है.

कांग्रेस के दलित-मुस्लिम वोट बैंक के कांग्रेस और बीएसपी नीत यूएनपीए के बीच बंट जाने से सबसे बड़ा फायदा भाजपा को ही होने वाला है मगर यदि कांग्रेस भाजपा के दुर्ग में सेंध लगा देती है तो इस फायदे का कोई फायदा नहीं.

आडवाणी को ये जानना चाहिए कि असल फायदा तब होगा जब वो पहले राष्ट्र के नारे को कांग्रेस के हाथों में न जाने दे. इसके बजाय इसे कांग्रेस के मतदाताओं को भी अपने पाले में खींचना होगा. अब तक भाजपा सत्ताविरोधी रुझान का फायदा उठाती रही है. मगर अब इसे एक सकारात्मक एजेंडा विकसित करना होगा जो कि अनूठा और मौजूं हो और वैचारिक स्तर पर लोगों को उद्वेलित कर सके. आडवाणी के लिए यूपीए सरकार को सत्ताच्युत करने में असफल होना भले ही बड़ा झटका हो मगर कांग्रेस और सपा के काले-पीले कारनामों ने इसे एक आपदा में तब्दील होने से रोक लिया. ये अनुभव बताता है कि भाजपा को एक उद्देश्यपरक टीम, विचारधारा में लचीलेपन और आने वाली चुनौतियों के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है. आडवाणी ने अब तक पार्टी को एक नरम नेतृत्व दिया है मगर जिस तरह से परिस्थितियां मुश्किल हो रही हैं, इसे बदलना होगा. समय की मांग है कि जनरल आगे बढ़कर नेतृत्व करे और एक जुझारू (न कि दिखाऊ) टुकड़ी उसके सहयोग के लिए पीछे खड़ी हो. आडवाणी के लिए आने वाले कुछ महीने उनकी उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी का सबसे चुनौतीभरा समय लाने वाले हैं.

स्वपन दासगुप्ता

भगवान पर भारी पड़ती आस्था

कहते हैं आस्था पहाड़ों को हिला सकती है, शायद ये आस्था ही है जो श्रद्धालुओं को 4000 फीट की उंचाई पर ऊबड़-खाबड़ रास्तों और प्रतिकूल मौसम के बावजूद पवित्र अमरनाथ गुफा तक पहुंचने की ताकत देती है। लेकिन बहुत से श्रद्धालुओं के लिए इस साल की दुर्गम यात्रा का अंत काफी निराशा भरा साबित हो रहा है। दर्शन के लिए आने वाले बहुत से तीर्थयात्री इस साल गुफा के भीतर हिम शिवलिंग का दर्शन नहीं कर पा रहे हैं। “मैंने कई बार पवित्र शिवलिंग के दर्शन किए हैं, लेकिन इस साल शिवलिंग पिघल चुका है इसलिए मैं इसके दर्शन नहीं कर सका। ऐसा लगता है कि भोलेनाथ हम लोगों से नाराज़ हैं”, दिल्ली से आए शिव प्रसाद निराशा भरे स्वर में कहते हैं। 

हिम शिवलिंग जो अमूमन 8 फीट तक लंबा होता है, इस बार दो महीने तक चलने वाली अमरनाथ यात्रा के 28 दिनों के भीतर ही पिघल गया। अमरनाथ गुफा से लौटने वाले श्रद्धालुओं द्वारा शिवलिंग के पिघलने की पुष्टि के बावजूद श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड (एसएएसबी) इससे इनकार कर रहा है। “शिवलिंग पूरी तरह से नहीं पिघला है। ये 2 से 2.5 फीट तक अभी भी बना हुआ है”, एसएएसबी के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी एसपी सिंह कहते हैं। हालांकि बोर्ड के ही दूसरे अधिकारी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर शिवलिंग के पूरी तरह से पिघल जाने की बात स्वीकार कर लेते हैं।

हिम शिवलिंग जो अमूमन 8 फीट तक लंबा होता है, इस बार दो महीने तक चलने वाली अमरनाथ यात्रा के 28 दिनों के भीतर ही पिघल गया।

तीर्थयात्रियों की बढ़ी हुई संख्या और 2 विशेषज्ञ समितियों द्वारा की गईं तमाम संतुस्तियों की अनदेखी को शिवलिंग के पिघल जाने की वजह ठहराया जा रहा है।

दोनों समितियों ने अपनी रिपोर्ट में सलाह दी थी कि तीर्थयात्रियों की संख्या को एक महीने में एक लाख तक ही सीमित रखा जाए। इसके अलावा एक समिति द्वारा गुफा के भीतर का तापमान नियंत्रित रखने की संतुस्ति को भी गंभीरता से नहीं लिया गया। बोर्ड के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि कुछ पुजारियों ने गुफा के अंदर शीतकारकों(कूलर्स) को लगाने का विरोध किया था। “फिलहाल तो जब तक मामला अदालत में है हम तापमान को नियंत्रित करने के लिए किसी कृत्रिम उपाय का सहारा नहीं ले सकते,” एसपी सिंह बताते हैं।

कुछ दिनों पहले जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने पवित्र गुफा में संगमरमर का शिवलिंग स्थापित करने के लिए एसएएसबी को एक नोटिस जारी किया था। ये नोटिस उस याचिका पर सुनवाई के बाद जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि एसएएसबी का ये क़दम श्रद्धालुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ है।

इसके अलावा 2006 में बोर्ड के ऊपर ये आरोप भी लगे थे कि उसने शिवलिंग के जल्दी पिघल जाने के बाद कृत्रिम बर्फ से इसका निर्माण करने के प्रयास किए थे। उधर पिछली साल ये कहा गया कि यात्रा की आधिकारिक शुरूआत से पहले ही श्रद्धालु शिवलिंग के दर्शन कर इसे छू रहे थे।

इस साल 15 जून से यात्रा शुरू होने के बाद से अब तक पांच लाख से ज़्यादा लोग अमरनाथ गुफा के दर्शन कर चुके हैं जबकि पिछले साल ये आंकड़ा महज़ 2.14 लाख ही था। पर्यावरणविद्, श्रद्धालुओं के जबर्दस्त प्रवाह को हिम शिवलिंग के पिघलने की वजह बता रहे हैं। पर्यावरण अभियंता मंज़ूर अहमद ईटू के मुताबिक यात्रियों की संख्या कम करके और इसका तापमान कृत्रिम तरीके से नियंत्रित करके ही शिवलिंग को संरक्षित किया जा सकता है।

“जब गुफा के अंदर बड़ी संख्या में लोग आएंगे तो उनके शरीर के तापमान से गुफा का तापमान बढ़ेगा। लाखों लोगों के अस्थाई आवासों में खाना पकाने से भी तापमान में वृद्दि होती है,” ईटू कहते हैं। इसके अलावा तीर्थयात्रियों को ढोने वाले हेलीकॉप्टर भी तापमान में वृद्धि करते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक तीर्थयात्रा की अवधि एक महीने से बढ़ा कर दो महीने करने से भी पर्यावरण पर काफी दबाव बढ़ गया है। मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार 2004 में यात्रा की अवधि बढ़ाने के पक्ष में नहीं थी लेकिन तत्कालीन राज्यपाल एसके सिन्हा, जो बोर्ड के अध्यक्ष भी थे, ने उनके विरोध को दरकिनार कर दिया। 2007 में राज्यपाल ने तमाम पर्यावरणवादियों के विरोध के बावजूद पहले से ज्यादा तीर्थयात्रियों को लाने का इंतज़ाम कर हिम शिवलिंग को तेज़ी से पिघलाने वाले कारकों में और भी वृद्धि कर डाली।

पीरज़ादा अरशद हामिद

समंदर : दो कविताएं

1-

समंदर की लहरें भी

बहुत कुछ कह जाती हैं

आते जाते….

मसलन,

जिंदगी हारने का नाम नहीं,

मेरी ही तरह उठो

और आगे बढो

मंजिल के करीब पहुंच

तुम गिर जाओ तब भी

मत हारो हौसला…

मसलन,

दूर, बहुत दूर

चले जाने के बाद भी

बुलंदी के साथ

वापस आना सीखो

और अपने आगोश में ले लो

समय को भी तुम……!

2- 

जिंदगी भी तो कुछ कुछ

समंदर की लहरों की मानिंद

चलती है,

कभी-कभी हौले

तो कभी तेज

थपेडे दुख के

और झोंके सुख के

वैसे ही जैसे

ज्वार और भाटे

हां, एक बात

जुदा होना चाहिए

जिंदगी और समंदर में,

कभी जिंदगी में

समंदर सा

खारापन  न हो

कयोंकि फिर

मजा नहीं रह जाता

जीने का…..!

                                                        अतुल श्रीवास्तव

राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ के रहने वाले अतुल, एक निजी न्यूज़ चैनल में पत्रकार हैं.

साहित्य की कोपलें ‘ उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) hindi@tehelka.com पर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं.

तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

तीसरे गियर में वाम राजनीति

मीडिया में इस तरह की प्रवृत्ति मैं देख रहा हूं, लेकिन सिर्फ इसलिए वामपंथियों की श्रद्धांजलि लिख डालना अभी जल्दबाजी होगी कि उनके समर्थन वापस ले लेने के बावजूद यूपीए सरकार लोकसभा में विश्वासमत हासिल कर चुकी है। 

मई 2007 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में मायावती के हाथों बुरी तरह पिटने के बाद समाजवादी पार्टी बेसब्री से कांग्रेस से रिश्ते सुधारने की ताक में थी। और बाद में पांच विधानसभाओं के उपचुनाव में मायावती की एकतरफा जीत के बाद कठोर रुख दिखाने वाले अमर सिंह भी नरम पड़ने लगे थे। उनकी निगाहें उचित अवसर की तलाश में थीं और तमाम राजनीतिक पंडितों के उलट अमर सिंह को इसका भान काफी पहले उसी वक्त हो गया था जब कांग्रेस ने सलमान खुर्शीद को उत्तर प्रदेश से हटा दिया था। खुर्शीद अकेले व्यक्ति थे जो कांग्रेस-सपा गठजोड़ के खिलाफ थे। और उनकी पार्टी को उनकी इस ज़िद का काफी खामियाजा भी उठाना पड़ा। 

उत्तर प्रदेश में बीजेपी को नियंत्रित करने के लिए वाममोर्चा मुलायम का समर्थन कर रहा था विशेषकर बाबरी मस्जिद ध्वंस के दौरान पीवी नरसिंहा राव की कुंभकर्णी निद्रा के बाद से। यहां तक कि 2004 के पहले भी वामपंथियों की कोशिश थी कि उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस का गठजोड़ बन जाए। मगर कांग्रेस की अपने दम पर खड़े होने की इच्छा इसके आड़े आ गई। मुलायम 39 सीटें जीतने में सफल रहे जबकि मायावती 17 और कांग्रेस सिर्फ 9। एक भी सीट जीते बिना वाममोर्चा उत्तर प्रदेश की जाति आधारित लड़ाई में वर्ग आधारित संघर्ष के विचार को जीवित रखने की कोशिश कर रहा था। 

सत्ता से बेदखल मायावती को मुलायम सिंह और अमर सिंह शायद उत्तर प्रदेश में खुद को ज़िंदा रखने के पासपोर्ट के तौर पर देख रहे हैं। लेकिन कुछ वामपंथी रणनीतिकार इस पर अलग नज़रिया रखते हैं

राम मनोहर लोहिया ने बिल्कुल सही निष्कर्ष निकाला था कि भारत में जाति और वर्ग बहुधा एक ही नज़र से देखे जाते हैं। मुलायम के उभार में इसकी अहम भूमिका रही। उन्होंने काफी सावधानी से अपनी जातिवादी राजनीति को विचारधारा का चोला पहनाने की कोशिश की। जबकि मायावती के जबर्दस्त उदय के पीछे केवल एक विचारधारा रही—“दलित को सत्ता में लाने के लिए जो भी करना होगा मैं करूंगी। 

इस कोशिश में वो लगातार लगी रहीं बिना पूर्वाग्रह और अपनी सोच को सीमित किए हुए। उन्हें अहसास हो गया था कि अपने पक्ष में जातियों का दायरा फैलाए बिना वो ज़्यादा आगे तक नहीं जा सकतीं। उनके रुख में आए इस लचीलेपन ने वामपंथियों को भी ये भरोसा दिलाया कि वो अपनी शुरुआती राजनीतिक छवि से बाहर निकल चुकी हैं। अब दोनों पार्टियां एक पाले में खड़ी हैं। दोनो मिलकर किसी विमर्श तंत्र की स्थापना कर नए राजनीतिक समीकरणों को मजबूत कर सकते हैं। इसके लिए मायावती को कुछ लोगों को नामांकित करना पड़ेगा जो कि उनकी खुद को हर चीज़ के केंद्र में रखने की प्रवृत्ति के उलट होगा।

उत्तर प्रदेश के सियासी गुणा भाग में वाममोर्चे के पास मायावती को देने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन मायावती सीपीआई को एक-दो सीटें जरूर दिलवा सकती हैं। वाममोर्चे से जुड़ाव में मायावती को भी फायदा होगा। इससे हाल में जातिवाद का चोला उतार फेंकने वाली उनकी छवि और पुख्ता हो जाएगी। इसके अलावा अमर सिंह द्वारा केंद्र सरकार पर मायावती के खिलाफ जांच का दबाव पड़ने की हालत में वाममोर्चा देश भर में इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन के जरिए उनकी सहायता करेगा।

सत्ता से बेदखल मायावती को मुलायम सिंह और अमर सिंह शायद उत्तर प्रदेश में खुद को ज़िंदा रखने के पासपोर्ट के तौर पर देख रहे हैं। लेकिन कुछ वामपंथी रणनीतिकार इस पर अलग नज़रिया रखते हैंइससे एक दलित महिला को शहीद का तमगा मिल जाएगा। ऐसी हालत में मायावती अपने सबसे करीबी मंत्री नसीमुद्दीन को मुख्यमंत्री बना सकती हैं। उत्तर प्रदेश का पहला मुसलमान मुख्यमंत्री। उस राजनीतिक परिदृश्य की कल्पना कीजिए।

वर्तमान परिदृश्य में सबसे बड़ी परेशानी ये है कि वाममोर्चे को मायावती की संगत में रहने की आदत नहीं है। इनके बीच सामंजस्य की रूपरेखा उभरनी अभी बाकी है। जबकि दूसरी तरफ सपा के साथ उनके पुराने अनुभवों को देखते हुए सहजता कहीं ज्यादा थी। सीपीआई के लिए एक बाध्यता ये भी है कि वो यादवों को नाराज़ नहीं कर सकती। सीपीआई को बिहार में अपनी तीन विधानसभा सीटों को बरकरार रखने के लिए लालू यादव के सहयोग की जरूरत पड़ेगी।

लोगों को उन वामपंथी नेताओं की बहुत याद आएगी, विशेषकर एबी बर्धन की, जो 80 साल की उम्र में भी मीडिया के बीच छाए हुए थे। सीपीएम और सीपीआई को जल्दी ही इसका एहसास हो जाएगा कि मीडिया में उनकी उपस्थिति और हिंदी बेल्ट में उनका असर दो बिल्कुल अलग-अलग चीज़ें थीं। उनकी ताकत पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा है। पूरे हिंदी इलाके से सिर्फ एक ही वामपंथी सांसद है, जिसने झारखंड में भाजपा के दिग्गज यशवंत सिन्हा को मात दी है। 

मेरा मानना है कि संसद में नोट लहराने का जनता के बीच ग़लत संदेश जाएगा। सांसदों द्वारा संसद भवन में नोट लहराना निहायत ही शर्मनाक था और जिन लोगों ने इस नाटक की भूमिका रची है उन्हें ही ये भारी पड़ेगा। फिलहाल तीन समीकरण दिख रहे हैंबीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए और तीसरा मोर्चा…. ?  चुनाव तक तो इसकी अगुवाई वाममोर्चा करेगा। चुनावों के बाद सांसदों की संख्या इस बात का फैसला करेगी कि यूएनपीए को यूपीए का साथ देना चाहिए या नहीं। इसकी वजह बिल्कुल साफ होगीभाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को रोकना है।

सईद नक़वी

सईद नक़वी वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।

कालिख पोत कर जीतो!

औघट घाट

घाटे पानी सब भरे औघट भरे न कोय।

औघट घाट कबीर का भरे सो निर्मल होय।। 

हम तो गए नहीं थे साधो। लेकिन जो गए थे सिर झुकाए लौट आए। हजार हजार के नोटों की गड्डियां लहराईं तो भाजपा के सांसदों ने लेकिन मुख सबका काला हो गया। उनका भी जो हाथ से मुंह की कालिख पोंछ कर जीत की खुशी में चमचमाते नगाड़ा बजाते हुए निकले। वे मानने को तैयार नहीं हैं कि उनकी जीत खरीदी गई है। वे खरीद फरोख्त करने वाले सौदागर ही हैं। खरीदी बिक्री ही उनका काम है। वे इसे ही अपना धर्म और इसीलिए सबसे अधिक करने लायक कर्तव्य मानते हैं। वे कैसे मान लेंगे कि जिनने धन या दूसरे प्रलोभन ले कर वोट दिया और जिनने न देने के भी पैसे लिए वे लोकतंत्र को लजा रहे थे। उनकी दुनिया में ऐसा कुछ नहीं है जो बिकाऊ नहीं हो। इसलिए जिस कीमत पर वोट बिक रहे थे उनने खरीद लिए। उनके लिए लोकतंत्र में बहुमत खरीदा जा सकता हो तो खरीदने में कोई खराबी नहीं है। सबसे बड़ी चीज़ जीत है। खरीद से मिले चाहे दलाली से। साधो सब के देखते देखते सौदागर तुम्हारी लोकसभा में भी पहुंच गए। वे वहां सेंध लगाने की कोशिश में तो बरसों से थे। राज्यसभा में तो चोर दरवाजे से हो या किसी भी दरार से वे पहुंच ही रहे थे।

साधो सब के देखते देखते सौदागर तुम्हारी लोकसभा में भी पहुंच गए। वे वहां सेंध लगाने की कोशिश में तो बरसों से थे। राज्यसभा में तो चोर दरवाजे से हो या किसी भी दरार से वे पहुंच ही रहे थे। सबको मालूम है कि वहां वे पैसे दे कर आए हैं। फिर भी सत्ता के गलियारों में वे घूम रहे थे तो घबराए हुए नहीं। वहां उनकी इज्जत थी क्योंकि उनकी जरूरत किसी को भी हो जाती है। वह चाहे लुंगी पहने अपने को साधू कहने वाला नरसिंह राव हो चाहे अपने चालीस साल के संसदीय जीवन की दुहाई देने वाला अटल बिहारी वाजपेयी। या फिर खादी के सफेद कुरते पजामें पर हल्की नीली पगड़ी पहनने वाला अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह। इन सबको सरकार चलाने के लिए उनकी तरफ से बिक्री करने वाला सौदागर चाहिए ताकि वे खुद कह सकें कि हम तो बाज़ार से गुजरे हैं खरीददार नहीं है। साधो ये सौदागर अब अपने धंधों के लिए गलियारों में घूमना नहीं चाहते। वे उस लोकसभा में अपना दबदबा बनाना चाहते हैं जहां सरकार से मन चाहे फैसले करवा सकें।

कल उनने बहुमत खरीद कर मनमोहन सिंह को दे दिया और तभी से उन पर दबाव डाल रहे हैं कि अब वे सारे फैसले करो जो वामपंथी तुम्हें करने नहीं दे रहे थे। वे जानते हैं कि देर होगी तो काम बनेंगे नहीं। यह मनमोहन सिंह वापस प्रधानमंत्री नहीं बनेगा। लोकसभा में तो हम इसे जितवा सकते हैं चुनाव नहीं जिता सकते। इसलिए बचे हुए आठ महीनों में इससे आर्थिक सुधारों का काम इस तरह पूरा करवा लो कि अगली सरकार उसे उलट न सके। परमाणु बिजली घर बनाने में करोड़ो-करोड़ों का निवेश होना है। बड़ी अमेरिकी पूंजी और भारतीय पूंजी को कमाई के नए मौके मिलने हैं। मनमोहन सिंह के रहते सौदे हो जाएं तो बेहतर होगा नहीं तो नए लोगों से बात करनी पड़ेगी। इसलिए वे जल्दी में हैं। मनमोहन सिंह के चेहरे पर वामपंथियों को हराने की चमक है। जब तक यह चमक बनी हुई है उससे काम करवा लो। कल वह न हमारे काम का रहेगा न सोनिया गांधी के।

साधो तुम कह रहे हो कि इस सरकार का क्या तो नैतिक इकबाल और क्या राजनैतिक विश्वसनीयता। सबने लोकसभा की टेबल पर नोटों की गड्डियां देखी हैं। कौन कहेगा कि जिनने वोट दिए और जिनने नहीं दिए वे खरीदे नहीं गए थे। साधो तुम्हारे जैसे भोले लोगों से बाज़ार नहीं चलता। जो बाज़ार चलाते हैं वे शर्म और लिहाज से नहीं चलते। वे कालिख पोत कर सब के मुंह काले करते हैं। बेशरम धक्का दे कर ही वे दुनिया चलाते हैं।

प्रभाष जोशी

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