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'तोप' बड़ी या 'तोपची'

 अमा यार,

आप लोगों ने वो हैवी वाला डायलोग सुना है.- जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो. यार निकाल तो दें, पर परेशानी ये है कि अखबार से तोप का कनेक्शन पल्ले नहीं पड़ रहा. अमा छोड़िये तोप को, हमें तो इतना बता दीजिए, कि जब सामने सफेद टोपी और गेरूए लिबास में तोपची खड़े हों तो क्या किया जाय? तोप कोई बड़ी चीज नहीं है. बड़ी चीज है तोपची. वो भी ऐसे वैसे नहीं, हल्ला मचाते- आग लगाते- हुड़दंगी जमात के खतरनाक तोपची. अबकी नसल में ये पौध खूब हुई है. तोप के छर्रे तो हमारे पुरखों ने खूब छाती पर झेले हैं, फिर भी हम यहां बकतोली के लिए बचे रह गये. पर ये जो पुराने ढ़ंग के नये तोपची आ गये हैं, इनका इलाज नजर नहीं आ रहा.

अब हम खबरी टाइप इंसान निकाल लें अखबार, तो क्या होगा? बड़े ही जाहिल गंवार टाइप जमात है इन तोपचियों की. पहले तो कुछ सुनते ही नहीं. सिर्फ कहते हैं. माइक वालों से. अखबार वालों से. टोपी वालों से. बंदूक वालों से. पजामे वालों से. नेकर वालों से. ये लोग बस बोलना जानते हैं. अब चचे तुम ही बताओ क्या कर लेगा अखबार और क्या कर लोगे तुम. अच्छा चलो, हिम्मत भी की और उनकी बोलती पर तुमने अपनी कहनी-पूछनी शुरू कर दी तो पहले तो तुम्हारे जूते उतारेंगे. फिर तुम्हारे पैरों के सामान से पटापट तुम्हारा ही शीर्षाभिषेक करेंगे. बच आओ तो तुम्हारा भाग्य, नहीं तो उनका आंदोलन. रहतोप कोई बड़ी चीज नहीं है. बड़ी चीज है तोपची. वो भी ऐसे वैसे नहीं, हल्ला मचाते- आग लगाते- हुड़दंगी जमात के खतरनाक तोपची. अबकी नसल में ये पौध खूब हुई है. गया तुम्हारा अखबार तो हां वो उनके काम आ जायेगा. 

उन तोपचीयों में कुछ कुशल शिल्पकार होते हैं जो किसी भी वक्त उन अखबारों को बांस की दो खपच्चियों पर गुत्थम-गुत्था करके एक जैसे आकार-प्रकार वाले पुतले बनाने में माहिर होते हैं और दूसरे उस पर बड़े सम्मान से तुम्हारी ही स्याही, (नहीं तो बूट-पॉलिश) से उस पर बड़े बड़े कर्णिम अक्षरों से दूसरी पार्टी वाले किसी भी महानुभाव का सादर नाम लिख देते हैं. और फिर कभी सरेराह, नुक्कड़- चौराहे पर दशहरे का प्री रिहर्सल या फिर किसी प्रिय के अंतिम संस्कार की पूर्व पैक्टिस. सब कुछ चालू है, अब ये बताओ कि अखबार निकालकर क्या करें.

हम लिखें और खुदा बांचे तो क्या फायदा. सब पर काम है पर हम खबरियों की परेशानी कोई समझने को तैयार ही नहीं. अगर अखबार निकालना है तो बकौल बड़े बुजुर्ग पहले मुकाबिल तोपें ढूंढनी होंगी. और फिर अखबार की फ्रंट पेज लीड और संपादकीय ठूंस ठूंस कर उनकी नाल बंद करनी होगी. इस संपादकीय रिस्क के लिए न तो इग्नू अलग से स्पेशलाइज्ड रिस्क मैनेजमेंट कराती है और न ही एल आई सी सरे चौराहे इन तोपचियों से मुकाबले के लिए कोई इंश्योरेंस पॉलिसी देती है. हम बेचारी अबला खबरिया जात के लिए कोनूं आरक्षण-वारक्षण है कि नाहीं. अरे कोई आंदोलन वांदोलन करो यार. नहीं आता तो इन तोपचियों से ही पूछ लो. इन्हें सब रास्ते पता हैं.

देवेश वशिष्ठ खबरी

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खेल में बदलाव और बदलाव में खेलना

क्रिकेट का इतिहास देखें तो खेल में लगातार महत्वपूर्ण बदलाव आते रहे हैं और क्रिकेट ने इन्हें पूरी उदारता के साथ समाहित किया है. जीवन से जुड़ा ये खेल एक बार फिर बदलाव से गुजर रहा है. श्रीलंका में खेली गई टेस्ट श्रंखला में पहली बार रैफरल सिस्टम यानी तकनीकी राय को लागू किया गया. 

खेल में अयोग्य अंपायर और अपूर्ण तकनीकी योग्यता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय क्रिक्रेट परिषद पर भारी दबाव था. खेल की प्रगति के लिए बदलाव जरूरी भी हैं. इस लगातार तकनीकी होती दुनिया के लिए महान वैज्ञानिक स्टिफन हॉकिन्स ने कहा है हमारी तकनीकी योग्यताओं ने हमारे विवेक की क्षमता को भोंथरा किया है. मगर तकनीक का इस्तेमाल करने वाले के विवेक पर उसकी सफलता या असफलता निर्भर करती है. यही बात खेलों के बारे में भी मानी जा सकती है. दुनिया अब इस मोड़ पर है कि तकनीक है तो उसको नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता.

पिछले साल आस्ट्रेलिया में भारत के खिलाफ गए गलत फैसलों के कारण, 3 टैस्ट मैचों की भारत-श्रीलंका सीरिज में प्रयोग के तौर पर तकनीकी राय लेना स्वीकार किया गया. खेल प्रेमियों को याद होगा कि भारत की साऊथ अफ्रीका टेस्ट श्रृंखला 2001-02 में वीरेन्द्र सहवाग समेत छ: भारतीय खिलाड़ियों को मैच रेफरी माईक जेनिस ने प्रतिबंधित किया था, क्योंकि इन सभी ने अत्यधिक अपील कर अंपायरों पर जबरदस्त दबाव डाला था. टीवी रिप्ले और अन्य तकनीकों के द्वारा पता चला कि कई बार उनकी अपीलें जायज भी थीं. बाद में भारतीय बोर्ड ने इसे रंगभेद बताते हुए जोर डाला तो आईसीसी को अपना फैसला वापस लेना पड़ा. तभी से यह देखा जा रहा था कि टीवी पर देख रहे लोग तो तकनीक का फायदा उठा रहे थे पर मैदान पर खेल रहे खिलाड़ी और अंपायरों के लिए यह उपलब्ध नहीं थी. यह भेद, रंगभेद से भी बड़ा था. प्रयोग के तौर पर आईसीसी ने टेस्ट मैच में दोनों टीमों को अंपायर के फैसले के खिलाफ दिन में तीन बार तकनीकी राय की अपील करने की अनुमति दी. अगर यह तकनीकी राय महान गेंदबाज शेन वार्न और मुरलीधरन के लिए पहले आ जाती तो उन दोनों के ड़ेढ हजार विकेट हो सकते थे

दोनों टीमों ने कुल मिलाकर 48 बार तकनीकी राय लेने का आग्रह मैदानी अंपायरों से किया. यह मानना पड़ेगा कि श्रीलंका के कप्तान जयवर्धने ने इस प्रयोग का भारतीय कप्तान कुंबले से कहीं ज्यादा लाभ उठाया. पांच दिनों के टेस्ट में इस तकनीकी राय के इस्तेमाल में लगा समय महत्वपूर्ण हो सकता है, पर बारिश भी तो कीमती समय खा सकती थी. अगर देखा जाए तो सभी मैचों के निर्णय निकले ही. यानी रुकावटों के बाबजूद तीनों टेस्ट निर्णायक और मनोरंजक रहे, और ऐसा किसी को नहीं लगा कि श्रृंखला जीतने वाली श्रीलंका को तकनीकी राय लेने से कोई अनुचित लाभ मिला हो. श्रीलंकाई खिलाड़ी ज्यादा अच्छा खेले और भारतीय खिलाड़ी अपने स्वभाविक खेल के अनुरूप नहीं खेल पाए. अब कोई वैसा भी नहीं कह सकेगा, जैसा सिडनी टेस्ट में ईशान्त शर्मा की गेंद पर एन्ड्रयू साइमण्डस को लपक लिए जाने पर कहा जा रहा था–अगर वे आऊट करार किए जाते, जो वो थे, तो भारत शायद आस्ट्रेलिया में पहली बार जीत सकता था. सिडनी जैसी बातें श्रीलंकाई दौरे पर नहीं कही गईं. फर्क शायद तकनीकी राय का ही था. श्रीलंकाई श्रृंखला से पहले न खिलाड़ियों को यह सुविधा थी न अंपायरों को. मानना पड़ेगा कि तकनीकी राय देर से आयी पर दुरुस्त आयी.

अब जब तकनीकी राय लेने का प्रयोग हो गया है तो इसकी समीक्षा होना निश्चित है. क्रिकेट विचारकों और आईसीसी तकनीकी समिति को इस प्रयोग पर फैसला करना होगा. तकनीकी राय की प्रयोगात्मक्ता बढ़ाई जाये या इसको अपना लिया जाए?

यह सब जानते हैं तकनीक इंसान बनाता है और वही इस्तेमाल करता है. यह भी हम समझते हैं कि गलती बनाने में भी हो सकती है और इस्तेमाल करने में भी. श्रीलंका में 48 बार तकनीकी मदद के बाबजूद मैदानी अंपायरों के फैसले तीन गुना ज्यादा सही रहे. और यही खेल के लिए महत्वपूर्ण है. क्रिकेट के परम्परावादी लोग तकनीक के बढ़ते उपयोग से खफा हैं पर जितनी भी मदद मैदानी अंपायरों को इससे मिलेगी वह खेल में सुधार ही लायेगी. सिडनी जैसी स्थितियां शायद कम ही हों लेकिन यहां फैसला तकनीक की मदद लेने से है. खेल को तकनीक के भरोसे थोड़े ही छोड़ना है.

श्रीलंकाई जीत के महानायक रहे फिरकी गेंदबाज अजन्ता मैंण्डिस. उनकी तीन टेस्ट श्रृंखलाओं में सबसे ज्यादा विकेट लेने के नए कीर्तिमान का कुछ श्रेय तकनीकी राय को भी जाना चाहिए. पुराने खिलाड़ी मानते हैं कि अगर यह तकनीकी राय महान गेंदबाज शेन वार्न और मुरलीधरन के लिए पहले आ जाती तो उन दोनों के ड़ेढ हजार विकेट हो सकते थे. ऐसा देखा गया है, पहले जिन बल्लेबाजों को सन्देह का लाभ मिलता था वह अब नहीं मिलेगा, और बराबरी के खेल में मिले भी क्यों? गेंदबाजों की मेहनत भी समान होती है. बल्लेबाजों की सफलता में बढ़िया बनाई गई पिच, लगातार बल्लों, ग्लब्स, पैड और हेलमेट में सुधार ने योगदान दिया है. लेकिन गेंदबाजी की कला को नकारा गया. बराबरी के खेल में तकनीकी राय दोनों के लिए उपलब्ध है. संदेह लाभ किसी एक को ही क्यों मिले?

जैसे आप अपने आप से झूठ नहीं बोल सकते हैं वैसे ही हर बल्लेबाज को पता होता है कि कैच होने से पहले गेंद बल्ले से लगी है या नहीं. अगर बल्लेबाज जानता है कि वो कैच आऊट है तो उसे फैसले लेने में अम्पायर की मदद ही करनी चाहिए. तकनीकी राय के प्रयोग के कारण बल्लेबाजों का इंतजार करना उन्हें लज्जित कर सकता है, जैसा कि श्रीलंका में महान सचिन के साथ देखा गया. तीसरे निर्णायक टेस्ट मैच में 144 पर आऊट होने के बाद संगकारा ने अंपायर के फैसले का इंतजार नहीं किया. इसके विपरीत सिडनी में साइमण्ड्स पिच पर डटे रहे. क्रिकेट की परम्परा रही है कि अगर बल्लेबाज को मालूम है कि वह आउट है तो उसे अम्पायर के फैसले का इंतजार किए बिना पवेलियन लौट जाना चाहिए. मगर कड़ी प्रतिस्पर्धा और खिलाड़ियों के बढ़ते पेशेवराना रवैये ने इस परम्परा को आघात पहुंचाया है. शायद तकनीक की वजह से अब यह बदलेगा.

हां, तकनीकी राय अभी जहां संदेह के घेरे में आती है वह पगबाधा फैसलों को ले कर है, क्योंकि तकनीक अलग अलग पिच के उछाल, उन पर गेंद का ज्यादा या कम घुमाव, हवा और नमी के खेल पर असर को पूरी तरह जांचने में असफल रही है. इसमें सुधार लाया जा सकता है.

इंग्लैण्ड में खेली गई साऊथ अफ्रीका के खिलाफ श्रृंखला में यह प्रयोग नही किया गया. सितम्बर में पाकिस्तान में होने वाली चैम्पियंस ट्राफी में इसको लागू किया जा सकता है ताकि सभी देशों के खिलाड़ी इस खेल को जांच लें और खेल में एक नए युग की शुरुआत हो सके. लेकिन इस में एक डर भी छिपा है कि कहीं तकनीक क्रिकेट पर हावी न हो जाए. इसलिए तकनीकी राय का उपयोग करते हुए, परम्परागत विवेक से खेलना भी जारी रखना होगा, क्योंकि वही तो असली क्रिकेट है.

संदीप जोशी.

लेखक क्रिकेट प्रशिक्षक एवं पूर्व रणजी खिलाड़ी हैं.

'मज़बूत संसद ही तानाशाही का इलाज है'

मुशर्रफ की रवानगी के बाद आप खुद को विजेता महसूस कर रहे हैं?

ये कोई निजी दुश्मनी नहीं है। ये एक राष्ट्रीय मुद्दा था, ये तो पाकिस्तान का दुर्भाग्य है कि इसकी आज़ादी के 62 सालों में से 33 सैन्य शासन की भेंट चढ़ गए। जब भी कोई सैन्य तानाशाह सत्ता में आया उसने संविधान की धज्जियां उड़ाई। उसने क़ानून का सम्मान नहीं किया और इस बार तो मुशर्रफ ने जजों को ही जेल में डाल दिया। ये निहायत ही दुखद और परेशान करने वाली बात है। मैं फिर से कहना चाहता हूं कि इसमें कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है।

एक बात बताइए, निर्वासन के सालों में एक राजनेता के तौर पर आपने खुद को कैसे संभाले रखा?

मेरे ख्याल से लोकतंत्र की जड़ें मेरे भीतर, मेरी सोच में, मेरे दिमाग में, मेरे दिल में, मेरे विचारों में मजबूत हो रही थीं। मैं बहुत गहराई से लोकतंत्र से जुड़ा हूं, इसलिए मुझे लगता है कि अब मुझे अपना समय ये सुनिश्चित करने में लगाना चाहिए कि आगे से हमारी व्यवस्था, लोकतंत्र और राजनीतिक ढांचे पर किसी तरह का कोई ख़तरा पैदा न हो। एक तानाशाह को इस बात की परवाह नहीं होती कि कौन प्रधानमंत्री है, कौन राष्ट्रपति। वो सारी शक्ति हाथ में लेने की कोशिश करता है यहां तक कि प्रधानमंत्री और संसद के अधिकार भी। वो इन्हें छीन लेते हैं और सर्वशक्तिमान बन जाते हैं। मैं अपनी बची-खुची ज़िंदगी व्यवस्था को मजबूत करने और ये सुनिश्चित करने में लगाना चाहता हूं कि कोई भी संविधान से इतर कोई क़दम न उठाए और साथ ही सेना भी अपनी छावनियों में रहे।

क्या मुशर्रफ को सुरक्षित रास्ता देना भी डील का हिस्सा है?

इसमें किसी तरह की डील नहीं है। ये बिल्कुल साफ है, पाकिस्तान की जनता ने 18 फरवरी को अपना फैसला दे दिया था। मेरे ख्याल से सत्ताधारी गठबंधन का प्रदर्शन इसके कुछ सहयोगियों की इच्छा के बावजूद आशा के अनुरूप नहीं रहा है। 

तो फिर मुशर्रफ के पद छोड़ने की वजह क्या रही, क्योंकि अक्सर ये कहा जाता था कि "एक कमांडो कभी रिटायर नहीं होता।"

वो कैसा कमांडो है ये आप जानते ही हैं। ये बात भारत से अच्छी तरह कौन जानता होगा। इसलिए जितना कम बोलें उतना बेहतर। संसद ने अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर दी है और मेरे ख्याल से ये बहुत अच्छी बात है। कम से कम संसद तो संप्रभु है। दुनिया के सामने ये बात साबित हो गई है अगर संसद शक्तिशाली और संप्रभु है तो वो किसी भी तानाशाह से निपट सकती है।

आप कह रहे हैं कि किसी डील की बात पर विश्वास मत कीजिए। तो क्या ये माना जाए कि मुशर्रफ पर मुकदमा चलेगा?

मैं बदला लेने में यकीन नहीं रखता। मुशर्रफ और मेरे बीच कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं हैं। ये सब जो हो रहा है उसका निजी बातों से कोई लेना देना नहीं है। 

लेकिन उन्होंने दो बार संविधान के साथ छेड़छाड़ की, ये तो व्यक्तिगत नहीं है?

मैं उसी बात पर आने वाला था। राज्य और देश के साथ क्या हुआ किसी न किसी को तो ये जवाब देना ही होगा कि वो ये सब क्यों करते रहे। इसलिए मेरी सोच है कि किसी को तो इसका जवाब देना होगा, किसी की तो जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। आखिर उन्हें देश को एक बार जवाब तो देना ही होगा कि उन्होंने ये सब क्यों किया। मेरे ख्याल से देश के इतिहास में पहली बार जजों को घर में नज़रबंद किया गया। उन्होंने दो बार संविधान को तोड़ा-मरोड़ा, दो बार आपातकाल थोपा, उन्हें हर हाल में इसका जवाब देना होगा।

वो पलट कर कह सकते हैं कि अपने आखिरी भाषण में उन्होंने सारे जवाब दे दिए हैं।

नहीं, कोई भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने अपने भाषण में किसी बात का जवाब नहीं दिया। 

यानी आपका कहना है कि जवाब अदालत में ही देना होगा।

किसी को जवाबदेह ऐसे ही बनाया जा सकता है। 

कहा जा रहा है कि मुशर्रफ-विरोध ही पीपीपी और आपकी पार्टी के बीच जुड़ाव की अहम वजह है। विशेषज्ञों की नज़र में असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है।

मेरे ख्याल से असली परीक्षा तो 18 फरवरी के बाद ही शुरू हो गई थी। ये गठबंधन कुछ निश्चित वजहों से बना था। पहली वजह थी जजों की बहाली, दूसरी वजह थी संसद को सर्वशक्तिमान बनाना। तीसरी वजह थी संविधान को उसके 1973 के स्वरूप में फिर से स्थापित करना। ये कुछ मुख्य वजहें थी जिनकी वजह से गठबंधन अस्तित्व में आया था और दोनों मुख्य पार्टियों के बीच एक समझौता हुआ था। मेरे ख्याल से असली चुनौती तो वही थी। सरकार चलाना, कैबिनेट में शामिल होना, आसानी से मंत्री बन जाना और टीवी पर आ जाना कोई चुनौती नहीं है। ये दोनों ही पार्टियों के हित में नहीं बल्कि देश के हित में है। और अगर देश को फायदा होता है तो हम सबका भी फायदा होगा। मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि जिस उद्देश्य के लिए गठबंधन का निर्माण हुआ था उसे हासिल करना चाहिए।

जजों की बहाली पर क्या चल रहा है?

फिलहाल यही मुख्य मुद्दा है। पिछले पांच महीनों से ये अहम मुद्दा बना हुआ है। और आप जो असल परीक्षा की बात कर रही हैं वो असल परीक्षा यही है। ज़रदारी ने तीसरी बार ये वादा दोहराया है। और अगर गठबंधन को जारी रखना है तो उन्हें अपना वादा निभाना पड़ेगा।

लेकिन ज़रदारी स्पष्ट रूप से इस मुद्दे पर अपना क़दम खींचते दिख रहे हैं।

मैं इस पर कुछ नहीं बोलना चाहता हूं क्योंकि हमने उन्हें कुछ और वक्त दिया है। देखिए आगे क्या होता है। 

क्या इस समय सीमा को आगे भी बढ़ाया जा सकता है या फिर ये पूर्णविराम होगा?

अगर कोई विशेष हालात नहीं बनते हैं तो…

अपने विदाई भाषण में मुशर्रफ ने आगे भी देश को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव रखा। क्या आपको उनकी कोई जरूरत होगी?
मुझे तो ये मज़ाक ही लगता है। 

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन को डर है कि मुशर्रफ के जाने से एक राजनीतिक शून्य पैदा हो जाएगा।

राजनीतिक शून्य सिर्फ तानाशाही के दौर में पैदा होता है। लगता है भारत कारगिल के खलनायक मुशर्रफ को भूल गया है। तानाशाही के दौर में सबसे ज्यादा राजनीतिक शून्यता होती है।

और भारत के साथ शांति प्रक्रिया? क्या आप भारतीयों को शांति प्रक्रिया के प्रति आश्वस्त करना चाहेंगे?

शांति प्रक्रिया हर हाल में जारी रहनी चाहिए। लगे हाथ मैं भारत से ये अपील भी करना चाहूंगा कि वो कश्मीर समस्या का हल ढूंढ़े। इस पर सबसे ज्यादा गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। कश्मीरी जनता की रज़ामंदी के बिना इस समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता। 

भारत की चिंता की एक वजह ये भी है कि अमेरिका के मुताबिक काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए हमले में आईएसआई का हाथ है। क्या आईएसआई अभी भी बेलगाम ताकत है, जिसकी सरकार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है?

ये कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है। ये सरकार के अधीन है और आगे भी रहनी चाहिए। इसकी कोई वजह ही नहीं है कि आईएसआई को स्वतंत्र संस्था होना चाहिए। हम ये सुनिश्चित करना चाहेंगे कि आईएसआई पर सरकारी नियंत्रण रहे।

तो फिर काबुल धमाके को लेकर आईएसआई पर लगे आरोपों पर क्या कहेंगे?

मेरे ख्याल से पाकिस्तान सरकार ने इससे जुड़े सबूतों की मांग की है। और अगर कोई सबूत है तो उसकी जानकारी सरकार को होनी चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप तो काफी लंबे समय से चले आ रहे हैं। जब तक कोई पुख्ता गवाह और सबूत न हो ऐसी चीजों से बचना चाहिए। 

और आप एक ऐसे राष्ट्रपति के बारे में क्या कहेंगे, जो पूर्व सेनाध्यक्ष था और जिसे अंत में खुद उस सेनाध्यक्ष का ही समर्थन नहीं मिला जिसे उसने खुद मनोनीत किया था?

मेरे ख्याल से जनरल कियानी ने नियमों का पालन किया है और हर सेनाध्यक्ष को इस देश में ऐसा ही करना चाहिए। उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि वो राजनीति में दखलंदाजी बिल्कुल नहीं करेंगे। इसलिए अगर मुशर्रफ उनसे सहायता की उम्मीद कर रहे थे तो ये उनकी भूल थी। मेरे ख्याल से जनरल कियानी ने बिल्कुल सही क़दम उठाया। 

और सेना ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया, इस पर क्या कहेंगे?

मुझे बहुत अजीब लगा। मुझे नहीं पता कि उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देने का फैसला सेना ने किया या फिर सरकार ने। ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब मिलना चाहिए।

हमारे गृहमंत्रालय ने हाल ही में कहा कि भारत मुजफ्फराबाद के रास्ते व्यापारिक मार्ग खोलना चाहता है लेकिन पाकिस्तान इसके लिए राजी नहीं हुआ।

ये तो मैं पहली बार सुन रहा हूं, पाकिस्तान सरकार की ओर से मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं मिली है।

आखिरी सवाल, क्या हम निकट भविष्य में आपके मंत्रियों को वापस सरकार में देखेंगे?

सिर्फ उसी हालत में जब जजों की बहाली होगी।

अंतिम संस्कार को चार बरस लंबा इंतज़ार

63 वर्षीय थांगजम खुमानलीमा ने अपनी बेटी की मौत के चार सालों बाद, अब जाकर उसके अंतिम संस्कार की रस्में पूरी की हैं. इंफाल की रहने वालीं खुमानलीमा की बेटी थांगजम मनोरमा को 10 जुलाई 2004 को असम राइफल्स के कुछ जवान घर से उठा कर ले गए थे. अगले दिन 32 वर्षीय मनोरमा का गोलियों से छत-विक्षत शव, उनके घर के पास ही पड़ा मिला था. इसके बाद राज्य की तमाम जनता और राजनैतिक-सामाजिक संगठन, सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे. इसे लेकर मणिपुर कई महीनों तक हिंसा की आग में जलता रहा. लोगों में इतना रोष था कि असम राइफल्स के मुख्यालय, कांगला फोर्ट के सामने इसे लेकर 12 महिलाओं ने पूरी तरह नग्न होकर प्रदर्शन किया था.

आज भी खुमानलीमा अचानक ही रातों को उठकर चिल्लाने लगती हैं- मोनो आ रही है! मोनो आ रही है! अपनी लाड़ली बेटी थांगजम मनोरमा को वो लाड़ से मोनो ही बुलाती थीं.

अंतिम संस्कार में देरी की वजह पूछने पर वो सिर्फ इतना कहती हैं कि इस मसले पर कुछ भी कहना बहुत दर्द देता है. मनोरमा के भाई थांगजम दोरेन्द्र बताते हैं, मेरी मां को लगता है कि वो अब बेहद कमजोर और बूढ़ी हो गई है इसलिए वो मरने से पहले अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी करना चाहती थीं. इसलिए, इस 11 जुलाई को मनोरमा के  बड़े भाई थांगजम मोडन ने अपनी बहन की आत्मा की शांति के लिए उसकी सांकेतिक चिता को मुखाग्नि दी.

मनोरमा अक्सर मेरे सपनों में आती है. उसके बाल बिखरे होते हैं. वो मुझसे खाना और पानी मांगती है. ऐसा लगता है कि जैसे वो एक अर्से से सोई नहीं है.

दोरेन्द्र को आज भी वो रात अच्छे से याद है जब उसकी बहन को असम राइफल्स के जवान उठा कर ले गए थे, वो कहते हैं, वो शनिवार की रात थी. करीब आधी रात को वो लोग आए और मेरी बहन के बारे में पूछने लगे. उनके पास उसका अरेस्ट वारंट भी था. उन्होंने कहा कि वो उसे सुबह तक छोड़ देंगे. लेकिन जब अगले दिन घर के पास से उसकी लाश मिली तो एफआईआर दर्ज करने के बाद पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. मां ने उसके शव को तब तक लेने से मना कर दिया जब तक कि उसके गुनाहगारों को सजा नहीं दे दी जाती. इसके बाद पुलिस ने शव को लावारिस घोषित कर उसका अंतिम संस्कार कर दिया. 

बेटी की फोटो के पास उकड़ू बैठीं खुमानलीमा कहती हैं, मनोरमा अक्सर मेरे सपनों में आती है. उसके बाल बिखरे होते हैं. वो मुझसे खाना और पानी मांगती है. ऐसा लगता है कि जैसे वो एक अर्से से सोई नहीं है.

शायद यही वजह थी कि न्याय न मिलने पर भी खुमानलीमा ने अपनी बेटी की अंतिम रस्मों को पूरा कर दिया. आखिर कब तक एक मां अपनी बेटी को इस हालत में देख सकती है! फिर चाहे ऐसा सपने में ही क्यों न हो!

टैरेसा रहमान

आलोबिंगो टेक्नोलोजी

 तमाम इश्तिहारों को देखकर मुझे कुछ बातें समझ में आ गयी हैं, जो पहले समझ में नहीं आयी थीं। मेरे खुले ज्ञान चक्षुओं से जो मुझे दिखायी पड़ रहा है, वह इस प्रकार है-

 इस देश में तमाम वैज्ञानिक आविष्कार इसलिए नहीं पाते हैं कि वैज्ञानिक और और कामों में बिजी रहते हैं। जैसे चिप्स टेकनोलोजी वैज्ञानिकों को काफी बिजी रखती है। बिंगो चिप्स के इश्तिहार में बहुत सारे वैज्ञानिक इसके प्रभावों का अध्ययन करते हैं और आखिर में इस बात पर खुश होकर डांस करते हैं कि बिंगो चिप्स बेहतरीन चिप्स हैं। वैज्ञानिकों के नृत्य की क्वालिटी अति ही घटिया है। लगता है कि उन्हे राखी सावंतजी से नृत्य सीखना पड़ेगा। 

राखी सावंतजी से याद आया कि इस देश के तमाम इनवर्टर ठीक ठाक काम नहीं करते, क्योंकि उनके पीछे एक्सपर्ट एडवाइज कुछ अलग टाइप की होती है। मसलन एक इनवर्टर के एड में राखी सावंतजी आकर बताती हैं कि यह इनवर्टर इसलिए बढ़िया है। राखीजी इनवर्टर शास्त्र की गहन अध्येता हैं, ऐसा इस विज्ञापन को देखकर प्रतीत होता है। बस मुझे डर यह लगता है कि कोई पावर कंपनी उन्हे अपना एक्सपर्ट ना बना दे। वैसे पावर संबंधी मामलों में बिपाशा बसुजी अपना क्लेम रख चुकी हैं, वह गीत गाकर -बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है। जिगर में व्यापक इनर्जी स्त्रोतों के संकेत बिपाशाजी दे चुकी हैं। खैर, जब राखीजी इनवर्टर पर एक्सपर्ट हो सकती हैं, तो निश्चय ही बिपाशाजी का भी आगमयी क्लेम अपनी जगह सम्मान योग्य है।

और प्रीति जिंटाजी ने बता दिया है कि क्यों कई योग्य विवाह इच्छुक युवकों को सुंदरी सुकन्या नहीं मिल पा रही है। क्योंकि उनके पास बीएसएनएल का फोन नहीं है। एक विज्ञापन के जरिये प्रीतिजी ने बताया है कि नौकरी, घर, परिवार, चाल चलन के मसले सेकंडरी मसले हैं या ये तो इशू ही नहीं हैं। असल बात है फोन। जिसके पास बीएसएनएल फोन नहीं है, उससे शादी से इनकार कर दिया प्रीतिजी ने। मेरे मुहल्ले के कई जुआरियों, शराबियों ने बीएसएनएल का कनेक्शन लेना शुरु कर दिया है। ये सब एक दिन प्रतिनिधिमंडल बनाकर प्रीतिजी के पास जाने वाले हैं, कि अब तो हमारे पास बीएसएनएल फोन है, आप कब हां कर रही हैं। प्रीतिजी ने इस इश्तिहार में यह क्लियर नहीं किया कि बीएसएनएल फोन धारियों की विवाह मेरिट लिस्ट वह कैसे बनायेंगी। प्लीज साफ कीजिये ना प्रीतिजी। 

हाल में एड देखकर मुझे पता लग गया कि इस देश में चिकित्सा की हालत बहुत खराब क्यों है। क्योंकि तमाम डाक्टर और और कामों में फंसे हैं। मतलब इश्तिहार देखकर लगता है कि अधिकांश डाक्टर टूथपेस्टों में बिजी हैं। डाक्टर तरह तरह के टूथपेस्टों पर तरह तरह के टेस्ट करके घोषित करते रहते हैं कि फलां कीटाणु मुक्त है,बाकी कीटाणु युक्त हैं। फलां में चमक ज्यादा है। एड देखकर लगता है कि कीटाणु इस देश में बहुत हैं, और सारे के सारे दांतों में रहते हैं और डाक्टरों का अधिकांश टाइम इन कीटाणुओं पर रिसर्च में गुजरता है। लगभग हर टूथपेस्ट वाला अपनी चाइस का डाक्टर पकड़ लेता है, जो कीटाणुओँ के मसले पर राष्ट्र के नाम संदेश दे देता है। 

 कुछ डाक्टर हाथों के कीटाणुओं पर भी फोकस किये रहते हैं, ताकि वो बता पायें कि उस वाले साबुन से ही इन कीटाणुओं को भगाया जा सकता है। मानो, इन कीटाणुओं और उस साबुन का कोई परस्पर कालोबोरेशन हो। खैर ये डाक्टर विकट शोध करके हमें बताते हैं कि तंदुरुस्ती की रक्षा करता है…………। यह स्वास्थ्य परियोजना कई दशकों से चल रही है।

 अब इन कीटाणुओं से फुरसत पायें डाक्टर, तो कुछ और करें वो।

खैर तरह तरह के एड देखकर मन निर्मल हो गया, ज्ञान प्राप्त हो गया है। सारी शिकायतें मिट गयी हैं.

आलोक पुराणिक

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औघट घाट

घाटे पानी सब भरे औघट भरे न कोय।

औघट घाट कबीर का भरे सो निर्मल होय।। 

साधो ये देखकर मुझे बड़ा संतोष होता है कि तुम सब एक ही ब्रह्म के साधक हो। तुम्हारा एक अभिनव बिंद्रा निशानेबाजी में चीन से एक स्वर्ण पदक ले आया है। और तुम उसे माथे पर उठाए इस तरह घूम रहे हो जैसे तुम वासुदेव हो और वह कृष्ण कन्हैया। जो तुम सबको तार देने वाला अविनाशी अवतार है। एक यही अभिनव बिंद्रा है जो खेलकूद के संसार में एक अकेले स्वर्ण से तुम लोगों की डगमगाती नैया को पार लगा देगा। एक यह अभिनव और उसका जीता एक यह स्वर्ण पदक ही तुम्हारा एक ओंकार है। कितने साल हो गए तुम्हारे किसी साधक ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक नहीं पाया था। हॉकी में पहले जीतते थे लेकिन वो तो टीम का खेल था। दस ग्यारह लोग एक साथ खेलते थे। एक ब्रह्म का साधक तो एक ही की और अकेला ही साधना करता है। इसलिए तुम लोगों ने हॉकी को ऐसे रसातल में पहुंचाया कि इस बार टीम जाने लायक ही नहीं रही। एक ब्रह्म के साधक का यही धर्म और यही साधना है। अभिनव बिंद्रा भी अकेले साधना करता था। इसलिए देखो स्वर्ण जीत लाया।

फेल्प्स को उसके मां-बाप ने घुमा-घुमा कर दुनिया को नहीं दिखाया। न राष्ट्रपति के पास ले गए न प्रधानमंत्री के पास। राष्ट्रपति बुश खुद ही अमेरिकी झंडा लहराता हुआ तैरने के तालाब पर खड़ा था।

वो लोग आकर मुझे बता रहे हैं साधो कि अमेरिका से 23 बरस का कोई फेल्प्स भी चीन में खेल रहा है। तैरता है। तुम्हारे अभिनव की तरह पूरे देश को एक अकेला ही पार नहीं लगाता। तैरने के जितने भी प्रकार और तरीके हैं सब में तैर लेता है। कहते हैं वह पानी की सबसे तेज़ मछली नहीं, पूरा का पूरा और अच्छा खासा मगरमच्छ है। वह एक नहीं दो नहीं आठ के आठ स्वर्ण पदक जीत गया। अब तक कोई खिलाड़ी ओलंपिक इतिहास में आठ स्वर्ण नहीं जीता था। उसी के देश में स्पिट्ज़ ने 36 साल पहले सात स्वर्ण पदक तैराकी में ही जीते थे। फेल्प्स उसके भी आगे निकल गया। एथेंस के पिछले ओलंपिक के छह मिला लो तो फेल्प्स के 14 स्वर्ण पदक हो जाएंगे। कई देशों ने इतने स्वर्ण पदक जीते नहीं है। बताते हैं कि देशों की गिनती में फेल्प्स अकेला ही आठवें नंबर पर आएगा। साधो वे अमेरिकी एक ब्रह्म के साधक नहीं हैं। माया में पड़े कई के पीछे भटकते फिरते हैं। तभी तो इतने दुखी रहते हैं।

फेल्प्स को उसके मां-बाप ने घुमा-घुमा कर दुनिया को नहीं दिखाया। न राष्ट्रपति के पास ले गए न प्रधानमंत्री के पास। राष्ट्रपति बुश खुद ही अमेरिकी झंडा लहराता हुआ तैरने के तालाब पर खड़ा था। फेल्प्स के मां बाप ने उसे मीडिया के सामने खड़ा कर यह भी नहीं कहा कि लो मैंने ओलंपिक का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनाकर दुनिया को दे दिया। अब अमेरिका इसकी देखभाल करे। साधो अपने यहां मां-बाप ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे उनके लड़के लड़की ओलंपिक में खेलने नहीं स्कूल की प्रतियोगिता में गए हैं। और उनका अपना खेल नहीं मा-बाप की दुआ और पूजा पाठ उन्हें पदक दिला देगी। अखिल कुमार, मुक्केबाज के हवलदार पिता ने तो यह भी बता दिया जेलर ने उनकी तनख्वाह तीन महीने से रोक रखी है। तभी तो साधो अपने साधक खिलाड़ी को एक ही ब्रह्म की साधना करनी पड़ती है। एक ही साधे सब सधे। साधो तुम कब जाओगे ओलंपिक में। सब एक-एक स्वर्ण पदक लाओगे पक्का। 

प्रभाष जोशी

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भारत की आत्मा कहां रहती है?

भारत की आत्मा अब गांवों में नहीं रहती है। पंद्रह साल पहले की सरकारी टेक्स्टबुक एलान करती थी कि भारत की आत्मा गांवों में रहती है। जब भी गांव से शहर आता था लगता था कि गांव में आत्मा को अकेला छोड़ कर आ रहे हैं। शहर में आते ही लगता था यहां सब है मगर आत्मा नहीं क्योंकि आत्मा तो गांवों में रहती है। भूगोल का ज्ञान हुआ तो सोचने लगा कि भई अमेरिका या जापान की आत्मा कहां रहती होगी? क्या उधर की आत्मा भी गांव में रहती है या फिर सबर्ब या उपनगर में रहती है। जवाब किसी से नहीं मिलता। सवाल पूछता भी नहीं वरना लोग कहते बेवकूफ है। लिहाज़ा ख़ुद को बुद्धिमान कहलाते रहने के लिए ऐसे सवालों को ताक पर रख देता।

बिहार की राजधानी पटना से मोतिहारी ज़िला अपने गांव जाता था तो लगता था कि वहां आत्मा इंतज़ार कर रही होगी। टूटी सड़कें, बैलगाड़ियां, कभी न खड़े हो सकने वाले बिजली के खंभे आदि आदि। इन्हीं सब में आत्मा नहीं होती थी। ये तमाम समस्याएं आत्माओं के अभाव में बेजान पड़ी रहती थीं। आदमी चलते फिरते नज़र आते थे तो लगता था कि हां इन्हीं में है आत्मा। मगर शहर में भी तो आदमी चलते हैं। वहां आत्मा किधर रहती है। इतिहासकार भी तो बता रहा था कि बिहार बनने से सदियों पहले पाटलीपुत्र काल में पटना के आस पास गांव ही होंगे। जब गांव से शहर बना होगा तब क्या आत्माओं ने पटना छोड़ दिया होगा। इतिहासकार भी तो बता रहा था कि बिहार बनने से सदियों पहले पाटलीपुत्र काल में पटना के आस पास गांव ही होंगे। जब गांव से शहर बना होगा तब क्या आत्माओं ने पटना छोड़ दिया होगा।

ख़ैर अच्छा हुआ मैंने इस सरकारी टेक्स्टबुक को दूसरी क्लास में नहीं पढ़ा। हमारे हिंदुस्तान में टेक्स्टबुक के साथ सबसे बड़ी ख़ूबी यही है। आपको एक साल के लिए ही झेलना पड़ता है। दूसरी क्लास में दूसरी टेक्स्टबुक आ जाती हैं। लेकिन ज़ेहन में गांवों में आत्मा के रहने का ख़्याल बना रहता था। अब तो यह कहा जा रहा है कि गांव से लोग शहर में आ रहे हैं। गांव के लोगों का काम आत्माओं से नहीं चल रहा। उन्हें कमाना है, खाना है और बच्चों को पढ़ाना है। इसके लिए आत्मा की विशेष ज़रूरत नहीं होती।

पिछले साल एक रिपोर्ट आई थी। कहा गया कि आज से २२ साल बाद यानी २०३० में भारत में शहर में रहने वालों की आबादी बढ़ जाएगी। इस समय कुल भारतीय आबादी का २८.४ फीसदी हिस्सा ही शहरों में रहता है। २२ साल बाद यह ४०.७६ फ़ीसदी हो जाएगा। यानी शहर बढ़ेंगे और गांव घटेंगे। दिल्ली के आस पास न जाने कितने गांवों को पांच साल के भीतर दफन होते देखा है। कई सारे गांवों को खत्म कर एनसीआर बन गया है। मुंबई भी आस पास के गांवों को निगलती जा रही है। शहर फैल रहे हैं और शहर में लोग आ रहे हैं। गांव के गांव खाली हो गए हैं। पुरानी सरकारी योजनाओं के तहत बनी सरकारी इमारतों में अब कोई नज़र नहीं आता। बीच बीच में आइडिया, वोडाफोन और एयरटेल के फोन की घंटी बजती रहती है। लगता है खंडहर होते गांवों में आत्माएं मिलकर कोई भुतहा नाच कर रही हैं। दिल्ली, मुंबई, सूरत और सतना से आवाज़ आती है। हैलो। हैलो। हां हां बोलो। घन्न घन्न आती आवाज़ सांय सांय की जगह ले रही है। गांव में बैठे बूढ़े मां बाप शहर गए बच्चों की आत्मा को फिक्स डिपोज़िट की तरह संभाल कर रखे होते हैं। उन्हें लगता है कि बेटा लौटेगा। कुछ दिन तक तो यह सिलसिला होली, दिवाली और छठ में चलता है। बाद में दिल्ली में पूर्वांचल समाज बन जाता है। कालोनी में गड्ढा खोद कर सूरज को अर्घ्य देने लगते हैं। यमुना नदी पर छठ से अनजान शीला दीक्षित छठ समारोह का औपचारिक उद्घाटन कर देती हैं। गांव वाली आत्मा इंतज़ार करती रहती है।

मुझे लगता है कि अब आत्माओं की संवैधानिक जगह में बदलाव करने का वक्त आ गया है। सरकारी टेक्स्ट बुक को बदलना होगा। बोलना होगा कि भारत की आत्मा गांव से शहरों की तरफ बहुत तेज़ी से शिफ्ट हो रही है। गांवों में आत्माओं की संख्या में गिरावट देखी गई है। शहर में आत्माओं की संख्या बढ़ रही है। अब मुझे शहर में खालीपन नहीं लगता। गांव की याद नहीं आती। क्योंकि वहां रहने वाली आत्मा अब यहां आ गई है। अब उससे मिलने के लिए ट्रेन पकड़ कर नहीं जाना पड़ेगा।

रवीश कुमार

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सिक्के बिकें सरे बाज़ार

बांग्लादेश से लगी सीमा के आस-पास ये लेन-देन का नया तरीका बन चुका है। यहां चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूरों को उनके मालिक सिक्कों की जगह गत्ते से बने टोकनों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। ये टोकन कई आकारों और कीमतों के होते हैं और मजदूर इनके जरिए कंपनी की कैंटीन में चाय-नाश्ते आदि की कीमतों का भुगतान करते हैं।

दरअसल चाय बागानों को इलाके में चल रही सिक्कों की भारी कमी के चलते ऐसा करना पड़ रहा है। और ये कमी भारतीय सिक्कों के पड़ोसी बांग्लादेश में तस्करी होने के कारण पैदा हुई है। वहां इन सिक्कों को पिघला कर इनसे ब्लेड और फाउंटेन पेनों के निब आदि सामान बनाए जा रहे हैं। ये भी एक कारण था कि पिछले साल रिजर्व बैंक को करीब 90  करोड़ नए सिक्के जारी करने पड़े थे।

मगर ऐसा होने की वजह क्या है? रिजर्व बैंक के कोलकाता ऑफिस के पास मौजूद मनी चेंजर्स उन वजहों का खुलासा करते हैं जिससे तस्करी का ये धंधा मुनाफे का सौदा बन गया हैएक रूपए के सिक्के से छह या सात ब्लेड तक बनाए जा सकते है जिनकी कीमत 35 बांग्लादेशी टका तक होती है। रूपए और टका के बीच विनिमय की दर 1:1.6 है, इस तरह से देखा जाये तो ये बीस गुना से भी ज्यादा मुनाफा देने वाला धंधा है।

भारत में एक रूपए, दो रूपए और पांच रूपए के सिक्कों के अलावा 25 और 50 पैसे के सिक्के भी चलते हैं। फिलहाल दो और पांच रूपए के सिक्कों में 75 प्रतिशत तांबा और 25 प्रतिशत निकिल होती है। जबकि एक रूपया, 50 और 25 पैसे का सिक्का स्टील से बनता है।

एक किलोग्राम सिक्के का बाज़ार मूल्य जहां अलग-अलग सिक्कों के लिए 333 रूपए से 555 रूपए तक होता है वहीं इन्हें पिघला कर बनाई गई धातु की कीमत 2,500 रूपए तक होती है।

यहां ये बात गौर करने लायक है कि सिक्कों की जो कीमत होती है उसके मुकाबले इनमें इस्तेमाल की गई धातु की कीमत कहीं ज्यादा होती है। सिक्कों की अवैध तस्करी में शामिल लोगों की माने तो एक किलोग्राम सिक्के का बाज़ार मूल्य जहां अलग-अलग सिक्कों के लिए 333 रूपए से 555 रूपए तक होता है वहीं इन्हें पिघला कर बनाई गई धातु की कीमत 2,500 रूपए तक होती है। पिछले साल व्यापारियों द्वारा सिक्के गलाने की ख़बर मिलने के बाद हमने कुछ गिरफ्तारियां की थी। ये काफी मुनाफे का धंधा है, कोलकाता पुलिस के मंडल उपायुक्त जावेद शमीम कहते हैं।

शमीम आगे बताते हैं, पहले तस्कर, सिक्कों को सीमापार ले जाकर पिघला देते थे। लेकिन, अब कुछ दुकानदारों ने खुद ही ऐसा करना शुरू कर दिया है। उनके मुताबिक पश्चिम बंगाल पुलिस की एक टीम सीमा सुरक्षा बल के जवानों के साथ मिलकर सिक्कों की तस्करी को रोकने का अभियान चला रही है।

असम के अलावा सिक्कों की सबसे विकट समस्या त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में देखने को मिल रही है। और इस कमी को पूरा करने की कोशिश में सिक्कों की जगह पुराने कटे-फटे नोटों ने ले ली है।

विशेषज्ञों की निगाह में ये कोई अकेले भारत की समस्या नहीं है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता निर्बेद रॉय कहते हैं कि 70 के दशक में इटली और 80 के दशक में मिस्र भी इसी तरह की समस्या से दो चार हो चुके हैं। रॉय के मुताबिक अमेरिका ने 2006 में सिक्कों को पिघलाना संघीय अपराध घोषित कर दिया था। वहां हाल ही में सिक्कों का प्रचलन बंद करने के हिमायती समूहों को तब सफलता की उम्मीद जगी जब डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बराक ओबामा ने उन्हें इस पर विचार करने का भरोसा दिया। लेकिन भारत में समस्या अलग है, यहां आरबीआई ने चाय बगान मालिकों को सिक्कों का विकल्प तैयार करने की इजाजत नहीं दी है। अगर आरबीआई को पूर्वोत्तर में चल रही इस टोकन मुद्रा की भनक भी लग गई तो इस पर बड़ा विवाद पैदा हो जाएगा, रॉय हंसते हुए कहते हैं। वो आगे जोड़ते हैं, भारतीय टकसाल को सिक्कों के दूसरे इस्तेमाल को रोकने के लिए कुछ सुधार करने होंगे जैसे कि सिक्कों में धातुओं की मात्रा में बदलाव।

शमीम, एक भिखारी, लक्ष्मी दास का वाकया बताते हैं जिसने स्थानीय बैंक कर्मियों को हैरत में डाल दिया था। वो हाथ में सिक्कों से भरी चार बाल्टियां लेकर बैंक में पहुंचा और वहां एक खाता खोलने या फिर सिक्कों के बदले काग़ज़ के नोट लेने की जिद करने लगा। दरअसल भिखारी को डर था कि नोटों की बजाय उसके सिक्कों के चोरी चले जाने का खतरा ज़्यादा था।

आरबीआई को भी इस संकट का अहसास है और वो इससे पार पाने के लिए एक बार फिर से नए सिक्के जारी करने जा रहा है मगर नए सिक्के बाज़ार में आते ही छूमंतर हो जाते हैं और स्थिति फिर से पहले जैसी ही हो जाती है।

शांतनु गुहा रे

रोशनी की तलाश में नवदीप

नोयर(अपराध) फिल्म शैली में बनी और राजस्थान के एक काल्पनिक शहर लखोट की सुस्त जिंदगी को दिखाती मनोरमा सिक्स फीट अंडर ने अपनी रिलीज के वक्त कोई बड़ी हलचल नहीं मचाई थी. मगर धीरे-धीरे इसे पसंद करने वालों की संख्या बढ़ती गई. एक साल बाद अब भी लोग अपने दोस्तों को इसे देखने की सलाह दे रहे हैं. इसलिए हैरानी नहीं कि आज ये उन फिल्मों की लिस्ट में शुमार है जिनकी डीवीडी सबसे ज्यादा बिक रही हैं. 

हालांकि इसके निर्देशक नवदीप सिंह मानते हैं कि मनोरमा…एक अलग सी मगर साधारण शुरुआत थी. नवदीप का इरादा बारी-बारी से एक मुख्यधारा की और एक मनमुताबिक फिल्म बनाने का है. उन्हें उम्मीद है कि इस तरह वे आखिरकार उन कल्पनाओं को पर्दे पर उतारने में कामयाब होंगे जो बरसों से उनके दिमाग में उमड़ती-घुमड़ती रही हैं. अब वे विज्ञापन फिल्मों, जिनके लिए उन्हें जाना जाता है, पर ध्यान देना कम कर रहे हैं और अपनी मनमुताबिक फिल्म बनाने के बाद मुख्यधारा की एक बड़ी फिल्म बसरा बनाने में जुटे हैं. ये एक जासूसी थ्रिलर है जिसकी कहानी रॉ के एक एजेंट के इर्दगिर्द घूमती है.

मनोरमा….जैसी फिल्म बनाने वाले शख्स के बारे में जिज्ञासा स्वाभाविक ही है. आखिर पहली ही फिल्म में लीक से हटकर काम करने का जोखिम कितने फिल्मकार उठा पाते हैं. हिंदी फिल्मों में हीरो को आमतौर पर नैतिकता से ओतप्रोत दिखाया जाता है. ऐसे में सामान्य हीरो की जगह घूस लेने के आरोप में निलंबित सिंचाई विभाग के जूनियर इंजीनियर सत्यवीर को फिल्म का नायक बनाने में क्या उन्हें ज़रा भी अजीब नहीं लगा? जवाब में नवदीप कहते हैं,मैं किसी मुद्दे पर आधारित फिल्म नहीं बना रहा था. और वैसे भी हमारे लिए नैतिकता का मतलब सेक्स और मांसाहार से दूर रहना भर रह गया है. अगर आप शाकाहारी और ब्रह्मचारी हैं तो आपका कोई भी काम अनैतिक नहीं हो सकता. भले ही आप पैसा कमाने के लिए कितने ही क्रूर क्यों न बन जाते हों, किसी इंसान का कत्ल तक कर देते हों, मगर आप अनैतिक तब तक नहीं है जब तक कि आप उस इंसान का मांस नहीं खा रहे हों.

नवदीप की एक दूसरी थ्योरी भी बेहद दिलचस्प है, वो कहते हैं, हमारी संस्कृति के बनियाकरण ने हमारी फिल्मों को बर्बाद करके रख दिया है. मैं अपनी छत पर खडे़ रहकर सुन सकता हूं कि पड़ोसियों के यहां झगड़ा हो रहा है और सब एक दूसरे को मां-बहन की गालियां दे रहे हैं. आज की वास्तविकता यही है पर निर्माता मुझसे कहते हैं कि पिता-पुत्र के संबंध पर जिस फिल्म के बारे में मैं सोच रहा हूं उसमें पश्चिम की झलक बहुत ज्यादा है क्योंकि इसमें बेटा, बाप को उलटा जवाब देता है. शायद हमारे यहां के अभिजात्य संयुक्त परिवारों में ऐसा न होता हो मगर निश्चित रूप से कई जगहों पर ऐसा ही होता है.हालांकि तुरंत ही पलटने की कोशिश करते हुए नवदीप कहते हैं कि शायद वो कुछ ज्यादा ही रुखा बोल रहे हैं.

बॉलीवुड की तरफ रुख करने से पहले विज्ञापन फिल्मों की दुनिया में सक्रिय रहे नवदीप को उपभोक्तावाद का अतिरेक नहीं सुहाता. वो कहते हैं, अमीर और गरीब तो हमेशा से थे. मगर अब दिखावा पहले से कहीं ज्यादा है. इसलिए जल्द ही एक स्थिति ऐसी आएगी जब कोई सोचेगा कि अपनी कमाई से तीन गुना महंगे जूते खरीदने का सपना देखने से अच्छा है कि ऐसा जूता पहने किसी शख्स को गिरा दो और उसके जूते लेकर चंपत हो जाओ.नवदीप सिंह

खुद का ही मजाक बनाते हुए नवदीप आपको उन स्क्रिप्ट्स के बारे में बताते हैं जो उन्होंने लिखीं और अमेरिका से बॉलीवुड पहुंचते ही रद्दी की टोकरी में डाल दीं. वे कहते हैं, मेरी एक कहानी में एक रूसी गैंगस्टर, पोर्न फिल्मों की स्टार उसकी प्रेमिका और उसके प्रेम में गिरफ्तार एक पोर्न फिल्म निर्देशक था. मैंने सोचा कि मैं इस कहानी को भारत के हिसाब से ढाल लूंगा. मुझे लगता था कि मुंबई, न्यूयॉर्क जैसा ही होगा, बस यहां भारतीय वहां से ज्यादा होंगे.

दिल्ली से ग्रेजुएशन करने के बाद नवदीप और उनके एक मित्र ने एक एनिमेशन स्टूडियो शुरू किया जो देश में अपनी तरह का पहला स्टूडियो था. वो बताते हैं, हमने खुद ही सब कुछ सीखा था मगर काम बढ़िया चला. 27 की उम्र में उन्होंने डिजाइन के क्षेत्र में आगे अध्ययन करने की सोची. मगर फिर अचानक ही उन पर न जाने क्या धुन सवार हो गई कि उन्होंने एक फिल्म स्कूल में दाखिला लेने का फैसला कर लिया. उन दिनों को याद करते हुए नवदीप बताते हैं, मैं शादीशुदा था, मेरी पत्नी गर्भवती थी और मेरे सास-ससुर बहुत चिंतित थे. मगर ये सोचकर कि आपको सिर्फ उन्हीं चीजों का अफसोस होता है जो आप कर नहीं पाते. उन चीजों का नहीं जिन्हें आप करते हैं, मैंने आगे कदम बढ़ा दिए.

नवदीप ने कैलिफोर्निया स्थित आर्ट सेंटर स्कूल ऑफ डिजाइन में दाखिला लिया. ये एक ऐसी जगह है जहां से दिलीप छाबड़िया जैसे मशहूर कार डिजाइनर भी निकले हैं और जैक स्नाइडर जैसे जाने-माने फिल्मकार भी. इसके बाद एक दशक तक लॉस एंजल्स में काम करने के बाद नवदीप फिल्में बनाने के लिए 1999 में भारत लौटे. ये वो वक्त था जब सत्या और हैदराबाद ब्लूज जैसी फिल्मों के साथ बॉलीवुड में परिवर्तन की एक हल्की सी बयार शुरू हुई थी. लोग दिलचस्पी के साथ वैकल्पिक सिनेमा की संभावित वापसी को देख रहे थे. मुंबई पहुंचते ही नवदीप को ये देखकर बड़ी हैरानी हुई कि वहां की दुनिया अपने आप में ही सिमटी हुई थी. वो कहते हैं, मुझे एड फिल्में तुरंत ही मिल गई मगर बॉलीवुड का रुख मेरे प्रति दोस्ताना नहीं था. कला के क्षेत्र में सभी क्रांतियां सृजनशील व्यक्तियों द्वारा उनके काम और विचारों के आदान-प्रदान से पैदा हुई हैं. मगर यहां तो लगता है कि कोई इस बात को समझता ही नहीं.”

आज के दौर में जब बॉलीवुड की आलोचना को देशद्रोह सरीखा समझा जाता हो, नवदीप, फिल्म उद्योग और इसकी संस्कृति को लेकर क्षुब्ध नजर आते हैं. वो कहते हैं, मुझे उन शहरों से नफरत है जो बॉलीवुड के अतिरिक्त किसी और संस्कृति से कटे हुए से लगते हैं. विदेश में रहने के दौरान मैं जिन चीज़ों को सबसे ज्यादा याद करता था वो हैं पुस्तकालय, संग्रहालय और संगीत. निश्चित रूप से सांस्कृतिक और बौद्धिक गतिविधियों तक मेरे बच्चों की पहुंच उससे कहीं कम है जितनी मेरी तब हुआ करती थी जब मैं उनकी उम्र का था. गुड़गांव जैसी नई जगहें संस्कृति नामक चीज से दूर-दूर तक महरूम है. अगर हमें पश्चिम से कुछ लेना ही है तो हम सबसे बेहतर क्यों न लें?  क्यों नहीं हम चीन की तरह कई संस्कृतियों से मिलकर बनी एक महान संस्कृति पैदा करते? कला को तो भूल ही जाइये हमारे पास एक लोकप्रिय संस्कृति तक नहीं है. इसीलिए हमारे पास धूम जैसी फिल्में हैं. जरा बताइये तो भारत में कहां इस तरह के मोटरसाइकिल गैंग देखने को मिलते हैं?”

नवदीप के पिता सेना में थे और इस वजह से उनके बचपन का एक हिस्सा कई छोटे कस्बों में भी बीता. शायद यही वजह है कि वो इन कस्बों के जीवन को अच्छी तरह समझते हैं. मनोरमा…के निर्माण के दौरान वो अड़े रहे कि इसकी शूटिंग मुंबई में बने सेट्स की बजाय किसी असली जगह पर हो. अंधेरी स्थित उनके अपार्टमेंट में छोटे कस्बों में दिखने वाले, हाथ से पेंट किए गए कई साइनबोर्ड नजर आते हैं जिन्हें उन्होंने ही इकट्ठा किया है. नवदीप कहते हैं, कस्बों में कई रंग देखने को मिलते हैं. ज्यादातर बड़े शहर तो एक जैसे ही लगते हैं.

नवदीप को ये देखकर भी काफी गुस्सा आता है कि बॉलीवुड के पास लोकेशंस के नाम पर गिनी चुनी जगहें ही हैं. वो कहते हैं, ज्यादातर फिल्मों में या तो विदेश दिखता है या फिर ऐसी कोई जगह जो हमने देखी ही नहीं होती. आप एक फिल्म के चरित्रों पर नजर डालते हैं और बताना मुश्किल होता है कि वो कौन हैं या कहां हैं या फिर कहां के हैं. उदाहरण के लिए अगर आप एक तमिल फिल्म देख रहे हों तो इसका एक सुपरिभाषित देश, काल और वातावरण होता है इसलिए इसमें लोकेशन, पात्र वगैरह जैसी तमाम चीजें साफ समझ में आ जाती हैं. बॉलीवुड के साथ यही दिक्कत है. इसके स्वाभाविक दर्शक कौन से हैं? कौन ऐसी हिंदी बोलता है? कोई नहीं. मनोरमा…में एक जगह पर ऐसी हिंदी बोली गई है जैसी राजस्थान के किसी कस्बे में बोली जाती है. लोगों की शिकायत थी कि ये तो एक बोली है और ये उनकी समझ में नहीं आ रही. इसलिए हमारे पास ऐसी फिल्में हैं जो न जाने कहां के बारे में हैं और इन्हें ऐसे दर्शकों के लिए बनाया गया है जो न जाने कहां के हैं.”

तो फिर नवदीप यहां क्यों रुके रहे? क्यों वो दोबारा लंदन या लॉस एंजल्स नहीं लौट गए? इन सवालों के जवाब में वो आपको झटका देते हुए कहते हैं, ऐसी कामचलाऊ काबिलियत के साथ मेरा गुजारा भला और कहां होता?” उनकी ये बात सुनकर लगता है जैसे वो साबित करना चाहते हों कि बॉलीवुड में यथार्थवाद या अच्छे सिनेमा की बात करने का कोई फायदा नहीं. मगर फिर दूसरी ही सांस में वो ये भी कह जाते हैं, एक वक्त आता है जब आप घटिया काम और कॉमेडी से ऊब जाते हैं. और तब ऐसी फिल्में बनना शुरू होती हैं जिन्हें हम देखना चाहते हैं. मैं आशावान हूं.”  

निशा सूज़न

साधो भाई दुबले क्यों?

औघट घाट

घाटे पानी सब भरे औघट भरे न कोय।

औघट घाट कबीर का भरे सो निर्मल होय।। 

साधो तुम तो सर झुकाए ऐसे चल रहे हो जैसे उस पर कोई कलंक लगा हो और उसे छुपाए बिना रह नहीं सकते हो। और वे लोग जो तुम कहते हो कि यह कलंक लगाए हैं बड़ी शान से घूम रहे हैं। कल विएना गए थे और आज श्रीलंका से लौटने वाले हैं। विएना में जीत गए और श्रीलंका में पाकिस्तान को काबुल विस्फोट के लिए दबा आए। उनका तो सिर उजला है और चमक रहा है। उस पर कलंक क्या कोई सल तक नहीं दिखाई देता। विजय का राजतिलक अब तक दिपदिपा रहा है। उनके चलने, उठने और करने-धरने में कोई हिचक-झिझक नहीं है। जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्हें तो जीतना था सो जीत गए। और अब वे अपने सामने कोई कंकर-पत्थर रोड़ा फोड़ा नहीं देखना चाहते। तेज़ी में हैं। सारे काम आठ महीने में निपटा लेने हैं।

उन्हें तो जीतना था सो जीत गए। और अब वे अपने सामने कोई कंकर-पत्थर रोड़ा फोड़ा नहीं देखना चाहते। तेज़ी में हैं। सारे काम आठ महीने में निपटा लेने हैं।

तो साधो शरम खाने की तमीज क्या तुम्ही में बची है जो बाइस जुलाई को याद कर कर के शून्य में गुम हो जाते हो। लगता है तुम्हारे पास कोई काम नहीं है। ठाले बैठे हो इसलिए खरीदे गए बहुमत की ही जुगाली कर रहे हो। आओ, हमारे पास आओ। कोने में जो कपास पड़ा है उसे यहां हमारे सामने आकर ओटो। जब तुम्हारी तरह कोई महसूस नहीं करता हो और कोई तुम्हारी सुनने को तैयार भी न हो तो चुपचाप बैठकर कपास ओटना चाहिए। और कुछ नहीं तो कातने के लिए पूनी बन जाएगा और ढोरो को चबाने के लिए बिनौले मिल जाएंगे। कपास ओटते हुए यह भी समझ आएगा जो जान बूझ कर और सोच विचार कर के धतकरम करते हैं उन्हें कोई लाज शरम और पछतावा नहीं होता। वे जानते हैं कि उनने शुभ किया है क्योंकि किए बिना दुनिया नहीं चलती। और जिससे दुनिया चलती है उसमें कोई खराबी नहीं होती। खराबी का हल्ला वही मचाते हैं जिन्हें या तो कुछ करना नहीं है या जिनका किया अब अनकिया हो गया हो। तुमने तो न कुछ किया न करने में विफल हुए। बस अपनी कसौटियां लिए बैठे हो। उन पर कोई खरा नहीं उतरता तो बैठे सिर धुनते रहते हो।

तुम चिंता में मरे जा रहे हो साधो कि जैसा बहुमत अभी खरीदा गया वैसा बेचा और खरीदा जाएगा तो एक दिन पैसे से ही सरकार बनाई और गिराई जाएगी। तब करोड़ो लोगों के वोट दे कर जनादेश देने का कोई मतलब रह नहीं जाएगा। जिसके पास ज्यादा धन होगा और जिसका दांव लग जाएगा वो सरकार बना लेगा और उसे अपने काम करने में लगा लेगा। जब दूसरे धनपति को लगेगा कि उसका उद्योग धंधा तो चौपट हुआ जा रहा है तो वह कुछ सांसदों को खरीदेगा, सरकार गिरवाएगा। अस्थिरता समाप्त करने के नाम पर दल बदलुओं की सरकार बनाएगा और उससे अपने नुकसान की भरपाई करवाएगा और फिर पहले वाले धनपति को कंगाल करने में लग जाएगा। इस तरह दो सरकारें दो धनपतियों के लिए देश चलाएंगी। उनके काम हमारे विकास और उन्नति के लिए होंगे। उनके नफे नुकसान से देश का नफा और नुकसान तय होगा। तुम हल्ला करोगे तो वे कहेंगे कि यह हमारे पिछड़ेपन के कारण हो रहा है। चालीस-पचास बड़े धनपति होते तो ये एकाधिकार या दो की होड़ नहीं होती। बहुत से होते तो संतुलन आता और हमारा लोकतंत्र मजबूत होता।

साधो, तुम गरीब देश के पिछड़े साधु हो। जिनके पास धन होता है वो लक्ष्मी की साधना करते हैं। लोकतंत्र की चिंता नहीं।

प्रभाष जोशी

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