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‘विकास के फायदे में सबकी भागीदारी हो’

आंदोलन से कैसे जुड़े ?

70 के दशक के आखिर की बात है. तब नर्मदा घाटी में बांधों का विरोध शुरुआती दौर में ही था. मैं एक दिन बाजार से सामान लेकर साइकिल पर अपने गांव लौट रहा था. रास्ते में चाय पीने के लिए एक छोटी-सी दुकान पर रुके. वहां पर पांच-छह जने और थे. उनके साथ एक लड़की भी थी. बातों के दौरान अचानक ही उस लड़की ने मुझसे पूछा कि आप कौन-से गांव के हैं. मैंने अपने गांव का नाम बताया. उसने पूछा कि यह तो डूब क्षेत्र में आ रहा है, आपके घर, खेत, खलिहान डूब रहे हैं. क्या आपको पता है कि इसके बदले में आपको क्या मिल रहा है. मैं क्या बताता. कुछ पता ही नहीं था. उस लड़की ने पूछा कि सरकार को पूछो तो सही. यही वह दिन था जब मैं नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ा और उस लड़की को आज आप लोग मेधा पाटकर के नाम से जानते हैं.

आंदोलन से क्या बदलाव हुआ?
बदलाव तो हुआ. जो लोग आंदोलन के जरिए डटे रहे, उनकी बात कुछ हद तक सुनी भी गई. उनके लिए मुआवजा बढ़ाया भी गया. सरकार बांध की ऊंचाई न बढ़ाने पर सहमत भी हुई. लेकिन जिन्होंने कुछ नहीं किया उनके साथ सबसे ज्यादा अन्याय हुआ.

आपका विरोध किस बात को लेकर है?
हम विकास के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन जिस तरीके से यह विकास किया जा रहा है हम उसका विरोध करते हैं. बिजली पैदा करने के लिए हमारे घर और खेत-खलिहान डुबाए जा रहे हैं, लेकिन हमें ही बिजली नहीं मिल रही. जो इस विकास के लिए सबसे बड़ा बलिदान दे रहा है, उसी की सबसे ज्यादा उपेक्षा भी हो रही है. ऐसा नहीं चलेगा.

‘महात्मा गांधी की नीति से देश आगे बढ़ेगा, विदेशी कंपनियों से नहीं’

मुझे नहीं लगता कि अन्ना हजारे का परिचय करवाने की जरूरत है. शाहरुख खान के जाने के बाद भी जिसे देखने और सुनने के लिए आप सारे लोग बैठे हैं मुझे नहीं लगता कि उसके परिचय की जरूरत है. मेरी दादी  कहती थीं कि बचपन में वे पहचानती थीं कि पोस्टकार्ड कैसा होता है, इंदिरा गांधी कौन हैं और वे जानती थीं कि लता मंगेशकर कौन हैं. आज अगर मेरी दादी होती तो वे शायद अन्ना, हजारे को भी जानतीं. अन्ना सब लोग जानना चाहते हैं कि आपकी तबीयत कुछ खराब थी. अब कैसी तबीयत है आपकी.

अभी तबीयत ठीक है. लड़ाई के लिए मैं तैयार हो गया हूं.

डॉक्टरों को परेशानी है कि आप उनकी बात नहीं सुनते हैं. आराम नहीं करते हैं.

आराम हराम है. देश के लिए काम करते रहना चाहिए. शरीर एक दिन जाना है. जब जाना है तो उससे कुछ काम कर लेना है. सिर्फ खाना, पीना और जाना इसके लिए नहीं है शरीर. समाज, देश के बारे में सोचना है. इसलिए मैं सवेरे पांच उठता हूं और रात में दस बजे तक काम करता रहता हूं. 

लोग कहते थे कि क्रांति दो बार नहीं होती. आपने पिछले साल दो बार करके दिखाया. जब देश के चालीस साल के युवा नेता अस्सी साल के बुजुर्गों के जैसा व्यवहार कर रहे थे, तब आप 17 साल के युवा की तरह जोश से भरे हुए दिख रहे थे. इतनी ऊर्जा, इतना उत्साह, इतनी ताकत अन्ना कहां से लाते हैं?

ऐसा नहीं है. युवा शक्ति हमारे लिए राष्ट्रशक्ति है. 16 अगस्त, 2011 का आंदोलन आपने देखा होगा तो करोड़ों युवा सड़क पर आ गए थे. यह हमारे लिए आशा की बात है. मुझे कहने में कोई झिझक नहीं कि सरकार ने हमारे साथ धोखा किया.वे जनलोकपाल नहीं लेकर आए. बार-बार धोखाधड़ी की. लेकिन 2014 से पहले उन्हें जनलोकपाल लाना ही पड़ेगा, वरना जाना पड़ेगा. सिर्फ लोकपाल ही नहीं राइट टू रिजेक्ट, ग्रामसभा को ताकत,  राइट टू रिकॉल ये सब कानून हमें बनाने हैं. हो सकता है इसमें कुछ समय लगे. 10-15-20 साल तक हम इसके लिए लड़ेंगे. अगर ये कानून बन गए तो देश से 90 फीसदी भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा. वह काम हमें करना है. ये मैं नया नहीं लड़ रहा हूं. 26 साल की उम्र में मैं सेना में था. मैंने भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में हिस्सा लिया. मेरे सारे साथी शहीद हो गए. खेमकरन की सीमा पर मैंने प्रण किया कि अब यह मेरा पुनर्जन्म है. यह जीवन अब देश के लिए अर्पण है. मैंने शादी नहीं की क्योंकि खतरा था कि चूल्हा जलाने में ही सारा समय बीत जाएगा. वहां से मैं अपने गांव वापस लौट आया. फिर मैंने मॉडल गांव बनाया. वहां मैंने देखा कि भ्रष्टाचार हो रहा है. तब मैंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन अपने हाथ में लिया. वहां मैंने छह भ्रष्टाचारी कैबिनेट मंत्रियों को इस्तीफा दिलवाया. 400 से ज्यादा भ्रष्ट अधिकारियों को वापस भेजा. इसके बाद मैं दिल्ली आया. 

अन्ना, मैं युवा नेताओं की बात कर रहा हूं. जब आपका आंदोलन चल रहा था तब बहुत-से युवा नेता जिन्हें देश का भविष्य कहा जा रहा था उनकी हमें कहीं आवाज सुनाई नहीं दी. 

क्या है कि नेताओं का सामाजिक-राष्ट्रीय दृष्टिकोण संकुचित हो गया है. सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता. हमारे बहुत-से नेता समझते हैं कि श्मशान भूमि में जाते समय भी चेयर पर बैठकर ही जाना चाहिए. इतना कुर्सी से चिपक गए हैं. इसीलिए देश की यह हालत बन गई है.

जिन अच्छे और चरित्रशील लोगों को अरविंद चुनाव लड़ाएंगे हम उनकी जांच करेंगे. सबको नहीं, जो चरित्रवान होंगे उनका समर्थन हम करेंगे’

अन्ना, यह बताएं कि आप कह रहे हैं कि जनलोकपाल 2014 तक पास हो जाएगा. लेकिन अभी आपका आंदोलन थोड़ा-सा बंटा है. आपके एक महत्वपूर्ण सहयोगी आपसे अलग हो गए हैं. क्या इससे ताकत कम हुई है?

ऐसा समझने का कोई कारण नहीं है. हमारे रास्ते दो हो गए हैं लेकिन मंजिल हमारी एक ही है-भ्रष्टाचार मुक्त भारत. आज की सड़ी राजनीति को दुरुस्त करने के लिए दोनों रास्तों की जरूरत है. संसद में चरित्रशील लोगों को भेजने के लिए वह भी जरूरी है. वह भी देश की भलाई के लिए है. हमारा रास्ता आंदोलन का है. जहां-जहां भ्रष्टाचार दिखता है उसके खिलाफ आंदोलन करते रहना और व्यवस्था को बदलना. इसलिए तो मैं अरविंद को कह चुका हूं कि आप अगर ईमानदार और चरित्रवान लोगों को चुनाव में खड़ा करेंगे तो हम उनका समर्थन करेंगे और उन्हें संसद में पहुंचाने की कोशिश करेंगे. ऐसे लोग संसद में जाने चाहिए. आज संसद में 163 लोग दागी हैं, 15 केंद्रीय मंत्रियों पर आरोप है. आज संसद के शुद्धीकरण की जरूरत है. तभी भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी. आज भी हम एक-दूसरे को अलग नहीं मानते हैं. अरविंद आज भी बीच-बीच में फोन करके मेरा हाल-चाल पूछते रहते हैं. तो यह सोचना बिल्कुल गलत है कि हमारे बीच कोई मतभेद है. देश को बदलने के लिए दोनों ही रास्ते जरूरी हैं.

अरविंद का तो सबको पता है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई है. नवंबर में वे पार्टी के नाम की घोषणा करने वाले हैं. अब आपका क्या रास्ता होने वाला है? 

हम लोग 30 जनवरी से पूरे देश की यात्रा करेंगे. आज हमारे पास लाखों लोगों के पत्र आए हैं मेरे साथ जुड़ने के लिए. आर्मी के सौ अधिकारियों के पत्र मेरे पास आए हैं. नौ आईएएस अधिकारी हैं, सात आईपीएस हैं. ऐसे लोग मेरे साथ जुड़ रहे हैं. हम लोग एक महीने से छंटाई कर रहे हैं. तो हमें इनमें से ईमानदार, स्वच्छ छवि के लोगों को चुनना है. यह काम चल रहा है. भारत भ्रमण के बाद 2014 तक मेरे साथ लाख नहीं करोड़ों लोग जुड़ चुके होंगे. ग्राम स्तर पर, ब्लॉक स्तर पर, जिला स्तर पर और राज्य स्तर पर संगठन का निर्माण करेंगे. एक बार यह संगठन खड़ा कर लेने पर सरकार की नाक दबाने से उसका मुंह खुल जाएगा. यह हमारा लक्ष्य है. पूरे देश में एक बड़ा संगठन खड़ा करना है. अभी हमें जंतर मंतर पर भीड़ नहीं करनी है, रामलीला मैदान पर भीड़ नहीं करनी है. गांधीजी के, जेपी के, और विनोबा के जो विचार थे उनके आधार पर हमें काम करना है. ग्राम स्तर पर जाकर लोगों के साथ काम करना है.

अन्ना, मैं यह जानना चाहता हूं कि राजनीति में जाने में क्या बुराई थी. आप राजनीति से इतना चिढ़ते क्यों हैं.

मैं राजनीति में जाने को दोष नहीं मानता. मेरा दुख है कि हमारी राजनीति में सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टिकोण का अभाव हो गया है. सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता ही मुख्य ध्येय बन गया है. ये लोग आजादी के बलिदान और उसकी महत्ता को भूल गए हैं. लाखों लोगों की कुर्बानी को ये लोग भूल गए हैं. इसीलिए मुझे आज की राजनीति पसंद नहीं आ रही है. मेरा मानना है कि राजशक्ति पर जनशक्ति का अंकुश लगाना जरूरी है. इसी रास्ते से देश में बदलाव आएगा.

पर अगर राजनीति गंदी है और आप और हम जैसे लोग इसमें नहीं जाएंगे तो राजनीति साफ कैसे होगी?

इसीलिए तो मैंने अरविंद को भेजा ना, इस राजनीति को सुधारने के लिए. और हम बाहर से राजनीति पर दबाव बनाने का काम करेंगे तो दोनों रास्तों से मिलकर राजनीति का शुद्धीकरण होगा. अगर गंदी राजनीति को सही करना है तो अच्छे लोगों को राजनीति में आना होगा. इसीलिए अरविंद को मैंने राजनीति में जाने का समर्थन किया है. मैंने कहा अरविंद से कि तुम राजनीति में जाओ. मैं समाज को इकट्ठा करके सहयोग करूंगा. मेरा विरोध राजनीति से नहीं है. मेरा विरोध मर्यादा और नैतिकताविहीन राजनीति से है. हमने हमेशा लोकतंत्र का इसीलिए तो समर्थन किया है. तो राजनीति से विरोध कैसे हो सकता है. आज देखिए 2जी घोटाला, कोयला घोटाला क्या-क्या हो रहा है. क्या राजनीति इसलिए है. राजनीति से देश का भविष्य सुधारना है.

तो अरविंद केजरीवाल की पार्टी को पूरा सहयोग करेंगे.

मैंने बताया न कि जिन अच्छे और चरित्रशील लोगों को अरविंद चुनाव लड़ाएंगे हम उनकी जांच करेंगे. सबको नहीं, जो चरित्रवान होंगे उनका समर्थन हम करेंगे. हम वहां की जनता से कहेंगे कि यह विकल्प है इसे वोट दो. 

अन्ना, अखबारों में खबर आ रही है कि जनरल वीके सिंह अब आपके लिए अरविंद केजरीवाल की भूमिका निभा रहे हैं.

जी हां. जनरल वीके सिंह हमारे साथ जुड़ गए हैं. उन्होंने मुझसे कहा कि आप देश में जो डेढ़ साल घूमने वाले हैं मैं भी आपके साथ घूमूंगा. ये हमारे घर में बैठे दुश्मन से लड़ाई है. अभी हम दोनों मिलकर यह लड़ाई लड़ेंगे.

‘आरोप लगना कोई नई बात नहीं है. सतयुग से ऐसा होता रहा है. जिस पेड़ में फल लगता है उस पर सब पत्थर मारते हैं’

आपको लगता है कि भ्रष्टाचार ही सबसे बड़ा मसला है या इस समय भ्रष्टाचार के अलावा भी देश में कुछ मुद्दे हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए?

नहीं, बहुत-सी समस्याएं हैं देश में, लेकिन भ्रष्टाचार बहुत महत्व का मुद्दा है. यह महारोग है. और विश्व के स्तर पर. तहलका ने ये जो थिंक कार्यक्रम आयोजित किया है उसके लिए मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूं. आज भ्रष्टाचार के साथ पर्यावरण, पानी की समस्या है. आज भ्रष्टाचार के साथ प्रकृति का जो दोहन हो रहा है वह बहुत बड़ा खतरा है. आज पानी का निजीकरण हो रहा है. जंगल का निजीकरण हो रहा है. विदेशी कंपनियों के हाथ देश का पानी, जंगल, खनिज संपत्ति सब कुछ बिक रहा है. आज देश के ज्यादातर लोगों को इसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं है. लेकिन इसका बोझ सबके ऊपर पड़ेगा. हम विदेश से लोगों को बुला रहे हंै. हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं विदेशी कंपनियों के निवेश के बिना इस देश का विकास नहीं हो सकता. अरे हम लोग काम कर रहे हैं, आकर देखिए न. मॉडल गांव बनाकर दिखाया है न. महात्मा गांधी कहते थे कि इस देश की अर्थनीति को बदलने के लिए गांव की अर्थनीति को मजबूत करना होगा. जब तक गांव की अर्थनीति नहीं मजबूत होगी तब तक देश की अर्थव्यवस्था नहीं मजबूत होगी. पर प्रधानमंत्री जी को यह बात समझ में नहीं आती है. हमारा पानी खराब हो रहा है, जमीन बिगड़ रही है, हवा प्रदूषित हो गई है. हमने भी गांवों का विकास किया है. लेकिन एक भी विदेशी पैसा नहीं लिया है, मानवता का दोहन नहीं किया है, प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाया है, प्रकृति ने जो दिया है उसी को संचित कर लिया. बारिश के पानी से जमीन को रिचार्ज कर दिया. जिन गांवों में तीन सौ एकड़ जमीन पर एक फसल के लिए पानी नहीं था आज वहां डेढ़ हजार एकड़ जमीन पर दो फसलों के लिए भरपूर पानी है. जिस गांव में अस्सी फीसदी लोग भूखे थे वहां से आज सब्जी विदेश में सप्लाई होती है. यह गांव की अर्थनीति है.

अन्ना, यह बात तो ठीक है, लेकिन जैसे ही आप आंदोलन शुरू करते हैं लोग आपके ऊपर आरोप लगाते हैं कि आप आरएसएस के साथ मिलकर काम करते हैं.

यह कोई नई बात नहीं है. सतयुग से यही होता आ रहा है. एक बात मान लीजिए कि जिस पेड़ में फल लगता है उस पर सब पत्थर मारते हैं. ऐसे लोगों की चिंता नहीं करनी है. आपके अंदर पांच गुण होने चाहिए. शुद्ध आचार, शुद्ध विचार, निष्कलंक जीवन, जीवन में त्याग और अपमान को सहन करने की शक्ति. ये पांच गुण अगर हैं तो कितना भी कोई निंदा करे, कोई फर्क नहीं पड़ता है.  सत्य कभी पराजित नहीं होता है भले ही समय लगे. निंदा करने वाले को करने दो. हार्ट अटैक से लोग मरते हैं. ऐसे मरने के बजाय देश और समाज के लिए काम करते हुए अगर मृत्यु आ जाए तो यह हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी.

मैं एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल की बात पर आता हूं. वे भी लंबे समय से सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे, आपने भी समाज के कामों में लंबा जीवन बिताया है. साथ मिलकर आप दोनों ने बहुत ही सफल आंदोलन चलाया. अब आप अलग हो गए हैं. क्या यह अच्छा नहीं होता कि आप दोनों मिलकर आगे बढ़ते? आप बेहतर प्रत्याशी चुनने में उनकी मदद करते. वे आपके आंदोलन को आगे बढ़ाने में आपका साथ देते.

आज तो लाखों लोग हमसे जुड़ रहे हैं. डेढ़ साल बाद आपको दिखेगा कि करोड़ों लोग हमारे साथ जुड़े होंगे. हमें बहुत कुछ करना है. राइट टू रिजेक्ट हमें लाना है. दस उम्मीदवार हैं आखिरी चिह्न डाल दो उसमें नापसंद का. वोटर देखेगा कि सारे गुंडे और भ्रष्ट हैं तो वह नापसंदी पर मुहर लगा देगा. अगर ज्यादा वोट नापसंदी को मिलता है तो चुनाव कैंसिल. आठ करोड़-दस करोड़ एक चुनाव में बांटते हो. एक चुनाव कैंसल हो जाएगा, सारा पैसा पानी में चला जाएगा तो दिमाग ठिकाने आ जाएगा इन लोगों का.

आप कह रहे हैं कि राजनीति से कोई विरोध नहीं है, लेकिन ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं कि आपने अपने क्षेत्र में कभी किसी को चुनाव प्रचार नहीं करने दिया.

ऐसी बात नहीं है. मैं किसी को मना नहीं करता हूं. पर मैं किसी व्यक्ति विशेष को वोट देने के लिए भी नहीं कहता. चाहे किसी का चुनाव हो मैं किसी से नहीं कहता कि वोट किसे देना है. शुरू शुरू में हम गांव के लोग साथ बैठकर ऐसा करते थे. तब राजनीति में अच्छे लोग थे. पर आज तो राजनीति में चरित्रशील लोगों को खोजना मुश्किल हो गया है. मैं कहता हूं कि जो पसंद हो उसे दे दो.

अन्ना, एक छोटा-सा सवाल है कि कपिल सिब्बल से आप इतने नाराज क्यों हैं?

नहीं मैं नाराज नहीं हूं. वो क्या है कि वे झूठ इतना बोलते हैं कि मुझे गुस्सा आ जाता है. बहुत झूठ बोलते हैं. मैंने उनसे कहा कि जनलोकपाल का ड्राफ्ट बनाने के लिए जनता की हिस्सेदारी कर दो. जनतंत्र में सरकार और जनता मिलकर ड्राफ्ट बनाए और संसद में उस विचार हो. तो कपिल सिब्बल बोले कि बाहर के लोगों को क्या लेना. मैंने कहा कि वे बाहर के नहीं हैं. वे तो हमारे मालिक हैं. आप उनके सेवक हैं. आप उन्हें बाहरी कह रहे हैं. तब उन्हें बात समझ में आई. फिर कमेटी बनाई, तीन महीने तक हमारी मीटिंग चली और फिर वे अचानक पल्टी मार गए. बोले हम नहीं करेंगे.

आपने शरद पवार के लिए भी बोला कि सिर्फ एक ही थप्पड़ क्यों. वे ये कहते हैं कि गांधीवादी अन्ना हिंसा और मारपीट की बात करते हैं.

अभी शरद पवार से हमारी दोस्ती है. ऐसा है कि 1991 में वन विभाग में बड़ा घोटाला हुआ था. मैंने उन्हें खूब सबूत दिए थे और कहा कि इसकी जांच करवा लो. शरद पवार मुख्यमंत्री थे. आज पूरी दुनिया पर्यावरण की चिंता करती है. पर उन्होंने कुछ किया ही नहीं. तब मैंने अपना पद्मश्री पुरस्कार राष्ट्रपति को वापस कर दिया. तब भी वे कुछ करने को तैयार नहीं हुए. लेकिन लोग इस घटना से जग गए, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तब मैं अनशन पर बैठ गया.  फिर इतने लोग जागरूक हो गए कि शरद पवार की सरकार ही चली गई. तब जाकर कार्रवाई हुई.
आज कमी इसी बात की है. हम लोग आपस में इतना लड़ रहे हैं. लोग नारा लगा रहे हैं कि अन्ना हजारे आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं. और पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं है. यह देश की लड़ाई है. देश के हर नागरिक को सड़कों पर उतर कर लड़ना होगा तभी भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण होगा. यह सिर्फ अन्ना हजारे की लड़ाई नहीं है. 

‘हम स्त्रियों को हर दौर में भेदभाव और शोषण का सामना करना पड़ा है…’

देश की राजनीति को एक नई दिशा देने की बात हमेशा कही जाती रही है. क्या आपको नहीं लगता कि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के कारण पिछले एक साल में इस दिशा की तरफ बढ़ने की शुरुआत हो चुकी है? क्या इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने नेताओं के हाथ से भ्रष्टाचार का मुद्दा छीन लिया है?
सारे नेता एक जैसे ही हैं, ऐसा सोचना गलत है. आज नेताओं की छवि बेहद नकारात्मक और डरावनी बना दी गई है. नेताओं पर हर व्यक्ति अपनी भड़ास निकाल रहा है. जबकि सच्चाई यह है कि समाज के बाकी अन्य लोग भी देश की आज जो हालत है उसके लिए जिम्मेदार हैं. भ्रष्टाचार के छींटे सभी पर हैं. चाहे वह मीडिया हो, राजनेता हों, आम लोग हों, सिविल सोसाइटी हो या फिर एनजीओ के लोग. हम सभी को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी. मेरा यह मानना है कि बदलाव की शुरुआत हर व्यक्ति को अपने आप से करनी होगी. पहले खुद को बदलना होगा. यह बदलाव सामने वाले को गाली देने से नहीं होगा.
बहुत-से लोग कहते हैं कि अधिकांश महिलाओं को रसूखदार परिवार से होने की वजह से ही राजनीति में आने का मौका मिलता है. लेकिन मेरा यह मानना है कि भले ही हम लोगों को संपन्न परिवारों में पैदा होने के कारण राजनीति में मौका मिल जाता है लेकिन खुद को साबित करने के लिए हमें बाकी लोगों की तुलना में दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है.

लोगों की नजरों में आज भाजपा और कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हो गए हैं. लोगों को उनकी कार्यशैली में कोई अंतर दिखाई नहीं दे रहा. जब आप अपने मतदाताओं के सामने जाएंगी तो उन्हें कैसे समझाएंगी कि ऐसा नहीं है ?
मेरी पूरी चिंता और प्राथमिकता पिछले 10 सालों से राजस्थान पर केंद्रित है. मेरी भूमिका यह है कि जिस क्षेत्र में मुझे जो जिम्मेदारी सौंपी गई है उसे मैं बहुत ईमानदारी और मेहनत से निभाऊं. मेरा यह सौभाग्य है कि मैं एक ऐसे परिवार में पैदा हुई जहां मुझे बचपन से ही यह संस्कार मिला कि जिम्मेदारी को बेहतर तरीके से निभाना चाहिए. लेकिन जब मैं राजनीति में आई तो मुझे 30-40 सालों तक लगातार जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ी, तब जाकर मैं वहां पहुंची जहां मैं आज हूं. यह पूरी यात्रा बहुत मुश्किल थी क्योंकि पुरुषों से भरी राजनीति में अपने लिए जगह बना पाना और काम कर पाना बेहद कठिन है.

आप राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री रही हैं. राजस्थान में अगले साल चुनाव है जो संभवतः आपके नेतृत्व में ही होगा. क्या कभी आपको यह महसूस हुआ कि आपकी अपनी पार्टी के अंदर इस बात को लेकर घोर असहजता है कि एक महिला उनकी नेता बन बैठी है?
यह स्थिति तो पूरी दुनिया में स्त्री को लेकर है. स्त्री होने के नाते हम सभी को किसी न किसी समय में किसी न किसी तरह से अन्याय, पक्षपात या शोषण का सामना करना पड़ा है. कहीं किसी स्त्री का शरीर निशाने पर रहा है तो कहीं उसे मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया है. बहुत-सी स्त्रियों को इन सबसे गुजरते हुए अपनी यात्रा तय करनी पड़ी है. लेकिन हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे. लड़े हैं, लड़ेंगे और जीतेंगे.
मुझे भी इसका सामना करना पड़ा है. जब मैं राजनीति में आई तो लोग मेरी पीठ पीछे हंसते हुए कहते थे, ‘देखते हैं, कैसा करती है.’ जब मैंने अपने काम से खुद को साबित किया तो फिर उन लोगों ने मुझे खारिज करने के लिए वह रास्ता अपनाया जो प्रायः ऐसे लोग अंतिम अस्त्र के रुप में अपनाते हैं. चरित्र हनन का रास्ता. चिट्ठियां, जांच… कई तरह से मुझे परेशान करने और मेरा चरित्र हनन करने की कोशिश की गई. लेकिन मैं इस बात से खुश हूं कि जो भी लोग इन सबके पीछे थे चाहे वे विपक्ष के लोग हों या बाकी दूसरे, उन सभी लोगों को मुंह की खानी पड़ी. मेरे कद, सम्मान और प्रभाव पर उनके दुष्प्रचार का रत्ती भर भी असर नहीं पड़ा. राजस्थान के आम लोगों ने इस पूरे दुष्प्रचार के बावजूद मुझ पर अपना विश्वास बनाए रखा. वे हमेशा मेरी ताकत बनकर मेरे साथ खड़े रहे.

ममता बनर्जी को लेकर आपकी क्या राय है?
मैं ममता बनर्जी की बहुत बड़ी प्रशंसक हूं. संसद में हमारी कई बार मुलाकात हुई, उनसे काफी बातें हुईं. उनकी शैली मुझसे बहुत अलग है. वह शायद इस कारण से कि हम लोग अलग-अलग राज्यों से हैं जिनकी प्रकृति बहुत अलग-अलग है. लेकिन बुनियादी तौर पर हम लोग समान हैं. हमें आम जनता तक पहुंचना है. इस वर्ग की समस्याएं लगभग पूरे देश में एक जैसी ही हंै. ऐसे में चाहे मैं हूं, ममता हों या फिर कोई और. हम सभी को एक जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

आज बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो यह महसूस कर रहे हैं कि सरकार उनके ऊपर अपने फैसले थोप रही है. एफडीआई और भू -अधिकार समेत कई मामले हमारे सामने ऐसे हैं जिनको लेकर लोग सशंकित हैं. एक राजनेता के तौर पर आप जनता की इन चिंताओं को किस तरह से दूर करेंगी?
लोगों की शंकाओं को दूर करना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है. सबसे पहले आपको शहर और गांव के बीच जो बड़ी खाई है, उसे पाटना पड़ेगा. दोनों जगहों के लोगों की उम्मीदें लगभग एक जैसी ही हैं. कौन नहीं चाहता कि उसका जीवन समृद्ध हो, सुखी हो? सभी चाहते हैं कि उनका जीवन स्तर सुधरे, वे विकास करें, आगे बढ़ें. उनके जीवन में खुशहाली आए. इसके लिए सबसे पहले हमें बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना होगा. दूसरी बात यह कि आप लोगों को आदेश नहीं दे सकते बल्कि आपको उनके साथ बैठकर उन्हें समझाना होगा कि जो किया जा रहा है वह किस तरह से उनके हित मंे है. लोगों से संवाद स्थापित करना होगा. लेकिन अभी हो यह रहा है कि हम उनके ऊपर चीजें थोप देते हैं. उनसे बात तक नहीं करते.

भाजपा कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाती है. लेकिन वंशवाद के उदाहरण तो आपकी पार्टी में भी भरे पड़े हैं. आप भी उसी वंश परंपरा से आती हैं.
देखिए, बात कांग्रेस-भाजपा की नहीं है. यह एक सच्चाई है कि हमारे देश में सामंती लोकतंत्र का शासन है. मुझे सामंती होने पर गर्व है. हम जिस सामंती परिवेश में पले-बढ़े वह आज के माहौल से बिल्कुल उल्टा था. हमें विनम्र होना सिखाया गया था. हमें आम जनता को अपने ही परिवार का सदस्य मानने की सीख दी गई थी. परिवार के सदस्य की तरह उनका ख्याल रखना, उन्हें प्रेम करना, उनके दुख-सुख को अपना दुख-सुख समझना सिखाया गया था. हम लोगों को लूटते नहीं थे, उनका शोषण नहीं करते थे, उन्हें प्रताड़ित नहीं करते थे. इसी कारण से राज परिवार के लोगों को जनता हमेशा अपना मत देकर उनकी जीत सुनिश्चित कराती रही है.
जब मैं राजनीति में आई तो मेरी मां ने मुझसे कहा था, ‘देखो, पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, उन सबसे अलग-अलग तरीके से पेश आना होगा. हमें लोगों को जाति, धर्म, संप्रदाय, वोट बैंक के आधार पर नहीं बल्कि उनको सामूहिक तौर पर देखना होगा. उनका अपने परिवार के सदस्य की तरह ख्याल रखना होगा. जब तुम ऐसा करोगी तब पाओगी कि इस तरह की राजनीति इतनी ज्यादा सफल होगी जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी. मैं उसी रास्ते पर चली और शायद यही कारण है कि मैं आज तक कोई चुनाव नहीं हारी. मैं प्यार और देखभाल के सिद्धांत में विश्वास रखती हूं.

क्या आप अपने बेटे के राजनीति में जाने के फैसले से खुश थीं?
बिल्कुल नहीं. मैं नहीं चाहती थी कि वह राजनीति में आए. मैं उसे इस सबसे बाहर रखना चाहती थी. यही वजह है कि उसे रोकने का मैंने हर संभव तरीका अपनाया. लेकिन वह नहीं माना. मुझे लगता है कि कुछ चीजें खून में होती हैं. वह जिस परिवार से है उसे देखते हुए उसके लिए यह स्वाभाविक था. आज मैं उसके काम को देख कर बहुत खुश हूं. वह एक ऐसा राजनेता है जो चमक-दमक और लाइमलाइट से दूर रहते हुए अपने क्षेत्र में चुपचाप अपने लोगों की सेवा कर रहा है. अगर हर आदमी अपने छोटे-से खांचे में दिए गए काम को अच्छी तरह से करे तो फिर बदलाव कौन रोक सकता है?

आपका परिवार राजनीतिक तौर पर विभाजित रहा है. एक तरफ स्वर्गीय माधवराव सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं जो कांग्रेस के सदस्य रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आप और आपके बेटे ने भाजपा को चुना. व्यक्तिगत स्तर पर आपका परिवार इस राजनीतिक अंतर से किस तरह निपटता है?
मैं, मेरा बेटा, मेरी मां और मेरी छोटी बहन. हम सब किसी न किसी समय में संसद सदस्य रहे हैं. मेरा ऐसा मानना है कि हर व्यक्ति को स्वतंत्र चिंतन का अधिकार है. लोगों को सहमत-असहमत होने का अधिकार है. आप परिवार में लोगों को किसी एक खास दिशा में सोचने के लिए बाध्य नहीं कर सकते. मेरा परिवार पूरी तरह से लोकतांत्रिक है. हम सभी एक दूसरे के विचारों और असहमतियों का पूरी तरह से सम्मान करते हैं.
इस तरह से जबतक आप असहमतियों का सम्मान करते हैं और अपने काम को बेहतर तरीके से करते हैं तब तक कोई दिक्कत नहीं है. जैसे मेरा भाई और भतीजा अपने काम में बहुत बेहतरीन रहे हैं. ऐसे में कोई समस्या नहीं होती.

क्या एक-दूसरे को लेकर मन में किसी तरह की नाराजगी या कटुता नहीं आती ?
जब आप असहमत होते हैं तो कभी-कभार थोड़ी-बहुत नाराजगी रिश्तों में जगह बना लेती है, लेकिन वह बहुत थोड़े समय के लिए होती है.

‘ मैंने चौबीसों घंटे काम करना शुरू कर दिया था…’

शाहरुख अपनी जीवनी लिखने की प्रक्रिया में हैं और जब दो साल पहले मेरी उनसे मुलाकात हुई थी तब उन्होंने पहली बार अपनी जीवनी के कुछ बहुत-ही मार्मिक अंश मुझसे साझा किए थे. हम आज की इस बातचीत का स्वरुप सपनों के इस सौदागर के निजी और सार्वजनिक जीवन के इर्द-गिर्द ही बुनने की कोशिश करेंगे. शाहरुख आपने पिछली बार अपनी किताब के जो अंश मुझे पढ़कर सुनाए थे वे मूलतः आपके माता-पिता के बारे में थे. हालांकि आपके माता-पिता बहुत अलग-अलग इंसान थे लेकिन आपका व्यक्तित्व ढालने में दोनों की ही बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है. एक ओर जहां आपके आदर्शवादी लेकिन गरीब पिता ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था वहीं आपकी मां बहुत व्यावहारिक थीं. क्या आप हमें बता सकते हैं कि आपके माता-पिता ने आपके जीवन को किस तरह प्रभावित किया और आज आप उन्हें कैसे याद करते हैं?
जब मैंने इंडस्ट्री में पांच साल पूरे कर लिए थे तभी मुझे विश्वास हो गया था कि मैं यहां एक दशक तक टिकने वाला हूं. तब मैंने सोचा था कि मैं एक किताब लिखूंगा जिसका नाम होगा ‘ट्वेंटी इयर्स इन अ डेकेड’. यह नाम इसलिए कि मुझे पता था कि मैं 20 सालों को एक दशक में जीने वाला हूं. अब मुझे यहां काम करते हुए 22 साल गुजर गए हैं, लेकिन किताब अभी तक पूरी नहीं हो पाई है. किताब के जो अंश मैंने शोमा को पढ़कर सुनाए थे उनमें मेरे निजी जीवन के बारे में विस्तार से लिखा है. मैं अपने पिता को हमेशा एक सफलतम ‘असफलता’ के तौर पर देखता रहा हूं. मुझे उन पर हमेशा बहुत नाज रहा है. मैं उन्हें हमेशा ही एक खूबसूरत और विनम्र व्यक्ति के तौर पर याद करता हूं. वे छह फुट लंबे थे. उनके बालों का रंग गहरा भूरा था और आंखें गेहुंए रंग की थीं. वह एक बहुत हैंडसम पठान लगते थे. मुझे आज भी याद है जब मैं उनके साथ आखिरी बार पेशावर गया तब सिर्फ 14 साल का था. मेरे पिता मुझे दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम के सामने बने चौराहे के पास ले गए और कहा कि यारां, यहीं बैठेंगे और गाड़ियों को आते-जाते देखेंगेवहां हमारे परिवार के सभी लोग 6 फुट 2 इंच से ज्यादा ही लंबे थे और बहुत गोरे थे. वे सभी पंजाबी लहजे में बात करते थे. उन्होंने मुझे देखते ही कहा – ‘ऐन्नू की हो गया ! ऐ तो पठान लगदा ही नहीं है.’ तो मैं ऐसा पठान था. उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया और जब मैं 15 साल का था तब वो गुजर गए. मुझे याद है एक बार वो मुझे फिल्म दिखाने ले गए थे. तब हमारे पास पैसे नहीं थे. उन्होंने मुझे यह नहीं बताया कि हमारे पास पैसे नहीं हैं और फिल्म दिखाने के बजाय वो मुझे दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम  के सामने बने चौराहे के पास ले गए. मेरे हाथों में मूंगफली पकड़ाते हुए वो अपने पंजाबी लहजे में बोले, ‘यारां, यहीं बैठेंगे और गाड़ियों को आते-जाते देखेंगे. यही सबसे अच्छा होता है.’ इसके उलट मेरी मां ज्यादा व्यावहारिक थीं और उन्होंने बाद में नाराज होते हुए कहा भी कि पैसे नहीं थे तो फिल्म दिखाने के बजाए सिर्फ मूंगफली खिला कर वापस ले आए. वो हैदराबाद से थीं और मेरे पिता से ज्यादा मुखर और बातूनी थीं. मेरे पिता के गुजरने के बाद जैसे उनकी जिंदगी का एकमात्र उद्देश्य हमारी अच्छे से परवरिश करना बन गया था. मेरे पिता पेशे से वकील थे लेकिन उन्होंने कभी वकालत नहीं की क्योंकि उन्हें लगता था कि वो कभी झूठ नहीं बोल पाएंगे. दूसरी तरफ मेरी मां एक मजिस्ट्रेट थीं और बहुत ही उत्साहित रहती थीं. मेरे पिता के जाने के बाद उन्होंने उनके सपने को आगे बढ़ाया. उनका कहना था कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले. अगर उन्हें अच्छी शिक्षा मिल गई तो जिंदगी उनके लिए ठीक रहेगी. मुझे लगता है कि मैंने अपने पिता से असफलता के लिए डर विकसित किया है. मैं कभी उनकी तरह असफल नहीं होना चाहता. मैं चाहता हूं कि यदि मैं अपने बच्चे को एक फिल्म दिखाने का वादा करूं  तो मैं उसे एक फिल्म ही दिखाऊं, ऑडिटोरियम के बाहर बैठकर सिर्फ गाड़ियां न दिखाऊं. मेरी मां बहुत ऊर्जावान महिला थीं और मैंने उनसे सीखा कि हमें किस तरह मेहनत से पैसा कमाना चाहिए ताकि हम अपने बच्चों की परवरिश ठीक से कर सकें. मुझे लगता है कि मैंने उनसे जो भी शिक्षा ली है उसने मुझे एक व्यावहारिक और साथ ही एक व्यावसायिक इंसान के रूप में ढाला है.

सुबह तीन या चार बजे आप जो ट्वीट करते हैं, उनसे आपके व्यक्तित्व का वह हिस्सा झलकता जो आमतौर पर हमें कभी स्टेज या स्क्रीन पर दिखाई नहीं देता. आपने यह भी बताया था कि आपकी बहन का अस्तित्व आपको हर रोज इस बात की याद दिलाता रहता है कि आपको अपने पिता की तरह असफल नहीं होना है. क्या आप अपनी जिंदगी के उस मुश्किल दौर पर कुछ रोशनी डालते हुए हमें यह बताएंगे कि आपके पिता के गुजर जाने का आपकी बहन पर क्या प्रभाव पड़ा ? मैं आपसे यह सब इसलिए पूछ रही हूं कि इन बातों का आपको सुपर स्टार बनाने में बड़ा योगदान है.
मेरे पिता की मृत्यु कैंसर की वजह से हुई थी. कैंसर जो पहले उनके गले में हुआ था और फिर लीवर तक फैल गया. मुझे याद है बाद के दिनों में वे बोल नहीं पाते थे. तब वह लिखकर हमें अपनी बातें बताते. फिर उन्होंने लिखना भी बंद कर दिया और इशारों में हमसे बातें करने लगे. सभी पिताओं की तरह उन्हें भी अपनी बेटी से बहुत प्रेम था. मेरी बहन बहुत सुंदर थी, हमारे घर के सभी लोग बहुत सुंदर हैं. वे अस्पताल में भरती थे. जब एक दिन मैं अस्पताल पहुंचा तो पता चला कि वो गुजर चुके हैं. उनके पैर बहुत ठंडे थे. वो बहुत शांत दिखाई दे रहे थे. कदम दुबले और कमजोर-से, अब वो उस ‘हैंडसम पठान’ की तरह बिल्कुल नहीं लग रहे थे जिसे मैं अपने पिता के तौर पर देखता आया था. अस्पताल से निकलकर मैं और मेरी मां कार में बैठे और मैं गाड़ी चलाकर उन्हें घर ले आया. उस वक्त मैं सिर्फ 15 साल का था और मैंने उसी दिन पहली बार गाड़ी चलाई थी. तब मेरी मां  ने मुझसे पूछा कि तुमने गाड़ी चलाना कब सीखा. तो मैंने कहा कि अभी. उस वक्त मेरी बहन लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ती थी. मैं उसे कॉलेज से लेकर आया और पापा के पास ले गया. मुझे याद है कि मेरी बहन मेरे पिता के पार्थिव शरीर के सामने खड़ी थी. उसने उन्हें देखा. वह न रोई, न ही कुछ बोली बस सीधे मुंह के बल फर्श पर गिर गई. उसके बाद अगले दो साल तक वह कभी सामान्य नहीं हो पाई. बस खामोश रहती थी और स्पेस में देखती रहती थी. हालांकि अब वो बेहतर है दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे  के निर्माण के दौरान वह फिर से बहुत बीमार हो गई. डॉक्टरों ने कहा कि अब उसे बचाया नहीं जा सकता. फिर मैं उसे इलाज के लिए स्विट्जरलैंड ले गया और वह ठीक होने लगी. लेकिन वह कभी अपने पिता को खो देने के गम से नहीं उबर पाई. फिर 10 साल बाद हुई मेरी मां की मृत्यु ने उसके लिए चीजें और मुश्किल कर दीं. मां के जाने के बाद हम वो हो गए जिसे मुसलमानों में ‘यतीम’ और ‘यसीर’ कहते हैं. मेरी बहन बेहद जहीन, इंटेलीजेंट पढ़ी-लिखी और समझदार है. लेकिन वह अपने पिता के जाने के गम से कभी नहीं उबर पाई और इस बीच मैंने अपने अंदर कहीं एक विरक्ति, भड़कीलापन, झूठी वाहवाही और सेंस ऑफ ह्यूमर विकसित कर लिया जिसे लोग बहुत पसंद करते हैं. लेकिन यह सब कुछ मैंने अपने अंदर के दुख और डिप्रेशन को छुपाने के लिए किया. मैं अपनी बहन की तरह नहीं बनना चाहता था. मेरी बहन बहुत अच्छी है, वह मुझसे भी अच्छी है. मेरे बच्चे उसे अपने माता-पिता से ज्यादा प्यार करते हैं. वह ईश्वर की बच्ची है और हम सबसे कहीं बेहतर इंसान है. मैं बहुत खुश हूं कि वह हमारी जिंदगी का हिस्सा इस तरह से है, मुझे उस पर बहुत नाज है. लेकिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि मैं उस की तरह दुखी और निश्चल रहूं. मैं इतना अच्छा और बेहतर इंसान नहीं कि उसकी तरह दुख को इतने लंबे समय तक जी सकूं. इसलिए मैंने चौबीसों घंटे काम करना शुरू कर दिया. मैं अपने ही कामों का मजाक उड़ाता, हंसी-मजाक करता रहा लेकिन फिर भी काम करता रहा. क्योंकि अगर मैंने काम करना बंद कर दिया तो मुझे भी उसी की तरह डिप्रेशन हो जाएगा. तो मैंने अपने -आप को जिंदा रखने के लिए और डिप्रेशन से दूर रखने के लिए पागलों की तरह काम किया. यह पैसा कमाने, विज्ञापन करने और संपत्ति जुटाने से कहीं बड़ी चीज है. और यही मेरा सच है. मुझे नहीं लगता कि मैं कभी भी अपने जीवन में इससे ज्यादा ईमानदार रहा हूं.

फिल्म अभिनेता शाहरुख खान तहलका के थिंक फेस्ट में अपनी बात रखते हुए.. फोटो: अरुण सहरावत
शाहरुख, आपकी शिक्षा और आपके स्कूल-कॉलेज के दिन, आपके जीवन का दूसरा अनछुआ पक्ष है. आपके जीवन के शुरुआती साल दिल्ली में बीते और फिर आप मुंबई आ गए. इन सालों ने आपको कैसे प्रभावित किया और इनकी आपके व्यक्तित्व निर्माण में क्या भूमिका रही?  आपने अपने-आप को एक सुपरस्टार के तौर पर कैसे बनाया ?
(हंसते हुए) अरे, मैं हमेशा से ही ऐसा था. बहुत  सजीला और बेहद शिक्षित. सेंट-स्टीफन वाले चाहते थे कि मैं उनके यहां पढूं लेकिन मैंने कहा नहीं! मैं कैसे समझाऊं, अगर यहां दिल्ली वाले लोग हैं तो वो समझ जाएंगे. मैं बिल्कुल दिल्ली वाला लड़का हूं. हंसी-मजाक में एक सही बात कहूं तो मैं एक टिपिकल दिल्ली वाला गुंडा हूं !  दिल्ली में जो भी पैदा होते हैं, बड़े होते हैं वो गुंडे ही होते हैं. तो मेरी पैदाइश और परवरिश पर दिल्ली की संस्कृति का बहुत गहरा असर है. हां, लेकिन मेरी पढ़ाई दिल्ली के ‘आयरिश ब्रदर स्कूल’ में हुई और वहां का माहौल बिल्कुल अलग था. सभी बेहद अंग्रेजीदां भाषा में बात करते थे और अंग्रेजीदां सलीके से रहते थे. वहां सब मुझे मिस्टर शाह बुलाते थे. असल में हमारे यहां जब तक बच्चा 18 साल का न हो जाए तब तक अपने नाम के आगे खान नहीं लगा सकता. इसलिए मेरे स्कूल में सभी को लगता था कि मेरा नाम मिस्टर शाह और मेरे पिता का नाम रुख है ! तो अपनी जिंदगी के बड़े हिस्से तक लोग मुझे गुजराती समझते रहे (हंसते हुए ). लेकिन जैसे ही मैं मुंबई आया मेरी यहां खूब लड़ाइयां होने लगीं. स्टारडम मुझे समझ में नहीं आता था और हम दिल्ली वाले ऐसे ही होते हैं. वैसे हम बहुत सभ्य हैं, ठीक से बात कर रहे हैं लेकिन बदतमीजी समझ में नहीं आती. उस दौरान एक मैगजीन ने यह छाप  दिया कि मेरे अपनी फिल्म की अभिनेत्री के साथ संबंध हैं. इस झूठ पर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं सीधा उस पत्रिका के दफ्तर चला गया. वहां काफी मारपीट हुई और फिर मुझे जेल जाना पड़ा. मैं अपनी पत्नी को तब से जानता था जब वह सिर्फ 14 साल की थी. अभी वह सिर्फ 22 साल की थी और हमारी नई-नई शादी हुई थी. उसे बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है, फिल्मस्टार क्या करते हैं, कैसे जीते हैं और फिल्मों के सिवा क्या-क्या करते हैं? ऐसे बातों से वो बहुत परेशान हो जाती थी और मैं दुखी. हम लोग तब बहुत नए थे. तो मैं दिल्ली वाली अपनी पुरानी आदत के तहत लड़ने लगा. अगले दिन जब मैं अपनी फिल्म ‘कभी हां, कभी ना’ की शूटिंग कर रहा था तभी पुलिस मुझे लेने आई. बाद में नाना-पाटेकर ने जमानत देकर मुझे छुड़वाया और मैंने तय किया मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा क्योंकि मेरी बीवी बहुत परेशान हो जाती थी. फिर मैंने सभ्य लोगों की तरह रहने का मन बनाया और तब से मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में हॉकी खेलने वाले गुंडों के बजाय अपने आयरिश ब्रदर स्कूल वालों की तरह रहा हूं! (हंसते हुए).

‘अगर हम ताजमहल के लिए इतनी हाय-तौबा मचा सकते हैं तो गंगाजी के लिए क्यों नहीं?’

आपने गंगा के लिए कब से काम करना शुरू किया?

2007 में एक दिन मैं वकील एमसी मेहता के साथ दिल्ली में था. उनसे मिलने प्रिया पटेल आई थी. प्रिया भटवाड़ी में भागीरथी नदी पर काम कर रही थीं. वे गंगा पर बन रहे बांधों के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने के लिए आई थीं. मैं उनके साथ गंगा पर बन रहे बांधों को देखने के लिए उत्तराखंड चला गया. करीब 30 साल पहले मैं गंगोत्री जा चुका था. तब मैंने भागीरथी की सुंदरता को देखा था. 2007 में यह देखकर मैं दंग रह गया कि मनेरी बाली बांध के नीचे भागीरथी में एक बूंद पानी नहीं था. मुझे बड़ा दुख हुआ. लगभग पूरी नदी को हमने खत्म कर दिया था. इसका सारा पानी एक सुरंग में जा रहा था. यह दृश्य मेरे दिमाग में बार-बार कौंधता रहा. मैंने फैसला किया कि अब गंगा पर कोई बांध नहीं बनना चाहिए. 2008 में रामनवमी के दिन मैंने चित्रकूट में अपना सारा जीवन गंगाजी को समर्पित कर दिया. मैं गंगाजी को सिर्फ एक नदी या पर्यावरण का मसला नहीं मानता हूं. गंगाजी हमारे लिए दैवी ताकत हैं, हमारी पहचान हैं, मेरी आस्था हैं. मेरी मां हैं. मैं भगीरथ को अपना पूर्वज मानता हूं और गंगा को अपनी विरासत. ताजमहल और कुतुबमीनार महज 400-500 साल पुराने हैं फिर भी हम उन्हें अपनी विरासत का हिस्सा मानते हैं. इस लिहाज से गंगा हमारी कहीं बड़ी विरासत है. अगर हम इतना कुछ ताजमहल के लिए कर रहे हैं तो गंगाजी के लिए क्यों नहीं कर सकते.

आज गंगा की हालत क्या है?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका सारा पानी सिंचाई के लिए इधर-उधर मोड़ दिया जाता है. 1840 में प्रॉबी कॉटले द्वारा पहली गंगा नहर बनने से पहले गंगा से इतने बड़े पैमाने पर कभी पानी को मूल प्रवाह से अलग नहीं किया गया. उस समय हरिद्वार में न्यूनतम प्रवाह 8,500 क्यूसेक हुआ करता था जिसमें से उस समय 7,000 क्यूसेक सिंचाई के लिए अलग कर दिया गया. कॉटले का मानना था कि 1,500 क्यूसेक निचली धारा के लिए पर्याप्त है. मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं. अगर आप मानव शरीर का 70-75 फीसदी खून निकाल लें तो क्या वह जीवित रहेगा? वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड का कहना है कि प्रयाग में कम से कम 530 क्यूसेक का प्रवाह होना चाहिए. पिछले साल हमने जांच कर पाया कि सिर्फ 38 क्यूसेक जल प्रवाह हो रहा है.

दूसरे धर्माचार्यों और गुरुओं द्वारा इस दिशा में की जा रही कोशिशों से क्या आप सहमत हैं?

मैं चाहता था कि कोई दूसरा बड़ा संत या धर्माचार्य आमरण अनशन करे. आखिरकार गंगा को बचाने की जिम्मेदारी उन सभी की है. दुर्भाग्य से गंगाजी के किनारे आश्रम बना कर रहने वाले साधु सिर्फ मूकदर्शक की तरह इसके साथ हो रहे दुर्व्यवहार को देख रहे थे. मैंने सोचा अगर मैं इस काम को करते हुए मर गया तो मैं इन लोगों को सोचने के लिए विवश कर दूंगा कि आखिर ये लोग गंगाजी के लिए क्यों नहीं मर सकते. हो सकता है कि मैं इस जीवन में वह सब हासिल नहीं कर पाऊं जिसकी इच्छा करता हूं, लेकिन अगर अपने कर्मों से मैं एक भी ऐसा व्यक्ति तैयार कर लेता हूं जो मेरी तरह इस काम को अपने हाथ में ले सके तो यह उपलब्धि बहुत बड़ी होगी.

गंगा को इसके पुराने स्वरूप में लाने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?

हमने सरकार को 10 सूत्री फार्मूला दिया है. गंगा का प्रवाह अबाधित होना चाहिए. इस पर कोई भी बांध या नहर नहीं बनना चाहिए. असली गंगाजल गंगा सागर में पहुंचना चाहिए. इसके बाद हमें मानवजनित समस्याओं पर निगाह डालनी होगी मसलन खनन पर रोक, कछार के इलाकों में अतिक्रमण पर लगाम, औद्योगिक प्रदूषण पर रोक आदि. संसद में गंगा को संरक्षित करने के लिए एक्ट पास करना चाहिए.

पर्यावरण विज्ञानी से संन्यासी बने 87 स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद

क्या सरकार गंगा को बचाने के प्रति गंभीर है?

चाहे जो सरकार सत्ता में रहे, सबकी रुचि पैसे में है. विकास की सरकारी अवधारणा बेहद संकीर्ण है. हम गंगा को माता कहते हैं. आप अपनी मां का दूध पी सकते हैं उसका खून नहीं. हमारा लालच हमें ईमानदारी से सोचने तक नहीं देता. अब हमारी उम्मीदें अंतर- मंत्रालयी समूह के अध्यक्ष और योजना आयोग के सदस्य बीके चतुर्वेदी पर टिकी हैं. प्रधानमंत्री ने उन्हें जून में नियुक्त किया था और तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देने का समय दिया था. मैंने प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद अपना अनशन समाप्त किया था. समूह को इसके बाद एक महीने का विस्तार दिया गया था. 31 अक्टूबर को यह सीमा भी खत्म हो गई है. अब सुनने में आ रहा है कि सरकार ने इसका कार्यकाल तीन महीने के लिए और आगे बढ़ा दिया है. यानी अब 31 जनवरी तक रिपोर्ट देनी होगी. लेकिन हमें लगता है कि तब तक भी रिपोर्ट पूरी नहीं होगी. रिपोर्ट पूरी होनी होती तो वे पहले विस्तार में ही इसे निपटा देते. मैं, सुनीता नारायण, राजेंद्र सिंह और महंत वीरभद्र मिश्रा इस समूह में गैरसरकारी लोग हंै. हम लोगों ने फैसला किया है कि हम सरकार को कोई भी गंगा विरोधी बिल पास नहीं करने देंगे. 1 नवंबर को हमने इसकी घोषणा की और 2 नवंबर को इस आयोजन में आने से पहले उन्होंने समूह का कार्यकाल बढ़ा दिया. यह सरकार की नीयत को दिखाता है. लेकिन हम जैसे लोग जो जान देने के लिए तैयार हैं उनके लिए इस तरह के हथकंडे कोई मायने नहीं रखते. हमारे लिए यह एक विराम है. अगर सरकार ने हमारी नहीं सुनी तो हम फिर से विरोध शुरू कर देंगे.

आप अपनी भूख हड़ताल के नतीजों से संतुष्ट हैं?

प्रशासन तीन बांधों को रद्द करने के लिए मजबूर हुआ. ये लोग भैरों घाटी बांध बनाने जा रहे थे जो कि गंगोत्री से सिर्फ छह किलोमीटर दूर था. हालांकि यह अभी भी इनकी योजना में है. इन्होंने 100 करोड़ रुपये पाला मनेरी बांध पर और 550 करोड़ रुपए लोहारी नागपाला बांध पर खर्च किए थे. दोनों को रोक दिया गया है. सरकार ने इन तीनों बांधों को निरस्त करने का नोटिस जारी कर दिया है. इसके अलावा 130 किलोमीटर लंबी भागीरथी को गंगा नदी घाटी प्राधिकरण ने पर्यावरण संवेदी क्षेत्र घोषित किया है. हालांकि इसके लिए नोटिस जारी होना अभी बाकी है. यह एक तरह की उपलब्धि है. मेरे भूख हड़ताल करने का सबसे बड़ा हासिल यह है कि अब लोग इस पर बात करने लगे हैं. तहलका ने इस पर पूरी श्रृंखला चलाई और मुझे थिंक में आमंत्रित किया. यहां लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है. कई ऐसे लोग मुझे मिले जो सरकार के रवैये से अवाक हैं और गंगा के लिए काम करना चाहते हैं. यह भी एक उपलब्धि है.
-बृजेश पांडेय

तुलसी संगत साधु की…

400 के करीब घातक विषाणुओं की गुत्थी सुलझाने वाला एक जीव विज्ञानी. एक गणितज्ञ जिसकी जबान से गणित किसी किस्से जैसा दिलचस्प लगने लगता है. जन्म लेते ही मरने के लिए कड़कड़ाती ठंड में छोड़ दी गई एक बच्ची जो आज अपने देश के शीर्ष राजनेताओं में से एक है और जल्द ही अपने देश की राष्ट्रपति भी बन सकती है.

एक इतिहासकार जो ब्रह्मांड की व्याख्या एक कविता में करता है. एक भौतिकवेत्ता जिसकी कोशिशों से ऊर्जा और पर्यावरण, दोनों के भविष्य के लिए साथ-साथ उम्मीदें जगती हैं. दो संत जो गंगा को बचाने की खातिर खुद को मिटाने के लिए तैयार हैं.

सिर्फ ये ही नहीं, मनुष्य की सीमाओं की परीक्षा लेने वाली, उनका दायरा बढ़ाने वाली और इस तरह हमारी सभ्यता के भविष्य को आकार देने वाली ऐसी कई हस्तियां थिंक 2012 का हिस्सा बनीं. गोवा में तहलका के इस अनोखे सालाना आयोजन में राजनेता, फिल्मी सितारे, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति और किसान, सब साथ थे.

इन्हीं में भारत के उस हिस्से से आई एक महिला भी थी जिसके बारे में ज्यादातर लोग नहीं जानते. उसने बताया कि कैसे उसके गांव में बीज बोने का उत्सव मनाने के लिए जुटी भीड़ एक सामूहिक नरसंहार का शिकार हो गई. किस तरह दो घंटे तक चली गोलियों ने 19 गरीब आदिवासियों की जान ले ली. कैसे उसके गांव में एक मां को यह साबित करने के लिए अपने स्तनों से दूध निकालकर दिखाना पड़ा कि एक दुधमुंहा बच्चा घर पर उसका इंतजार कर रहा है.

आस्था और विश्वास की जंग. मिश्र और अफगानिस्तान में तमाम दुश्वारियों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ी स्त्री शक्ति. मीडिया को एक नए सिरे से परिभाषित करने के लिए हाशियों पर काम करते पत्रकार. कारोबार के तरीकों पर बहस करते उद्योगपति. जमीन की सरकारी समझ को लेकर विरोध जताते किसान. आंखों के धोखे से आस्था को छलने के खेल की कलई खोलता एक जादूगर.

थिंक के पीछे की सोच यही थी कि यह एक ऐसा मंच बने जिसमें विविध क्षेत्रों में दुनिया को राह दिखाने वाली कुछ कुशाग्र प्रतिभाएं आएं और विचारों की विशाल अनुगूंज पैदा करें–एक जैसी गूंज जो न सिर्फ दिमागों में हलचल पैदा करे बल्कि आम तौर पर एक-दूसरे से कटी दुनियाओं के बीच किसी पुल जैसा काम भी करे.

बीते पखवाड़े तीन दिन तक ऐसा ही हुआ. धर्म, आस्था, ब्रह्मांड, विज्ञान, विस्थापन, ऊर्जा, कारोबार, मीडिया, राजनीति जैसे तमाम मुद्दों पर विचारोत्तेजक परिचर्चाएं और बहसें हुईं. इनकी अनुगूंज वाकई असरदार थी. खनन कारोबार के एक दिग्गज एक किसान की इस बात से सहमत थे कि एक हद के बाद पैसा और कुछ नहीं, बस कागज का टुकड़ा है. सुपरस्टार शाहरुख खान का कहना था कि सफलता आदमी को अकेला कर देती है और उन्हें बार-बार यह अहसास होता है.

धर्म से लेकर विज्ञान और राजनीति तक वे तमाम मुद्दे इस विचार महोत्सव के विषयों में शामिल थे जो मानव सभ्यता को लगातार मथते रहते हैं. जो भी इस आयोजन का हिस्सा बने, चाहे वे वक्ता रहे हों या श्रोता, सबका कहना था कि वे इस आयोजन से एक बदले हुए इंसान की तरह वापस जा रहे हैं. यह भी कि उनके भीतर जो दुनिया है उसकी दीवारों में कुछ और खिड़कियां जुड़ गई हैं.

इस बहुरंगी जमावड़े का सम्मान करने और इससे उपजे उत्साह को आपसे साझा करने के लिए हमने इस अंक की आवरण कथा इस आयोजन में गूंजे विविध विचारों को बनाया है.

विचारों में बदलाव के बीज छिपे होते हैं. थिंक 2012 में आए एक श्रोता का कहना था, ‘मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार किसानों को बोलते सुना और मुझे महसूस हुआ कि मेरी समृद्धि उनके दर्द से बनी है. इसने मुझे बहुत गहराई से इस दिशा में सोचने के लिए मजबूर किया कि भविष्य में मुझे अपने लिए कितना लेना है और कैसे मैं कुछ अपने समाज को वापस दूंगा.’

आशा है कि यहां उपलब्ध कराए गए लेख और चर्चा-परिचर्चा हमारे तमाम पाठकों में भी तरह-तरह के जरूरी विचारों की अनुगूंज पैदा करेगा.

वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सौदा

वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सौदे में क्या अनियमितताएं हैं?
प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, कैबिनेट मंत्री और देश के अति विशिष्ट अतिथियों के लिए 12 हेलिकॉप्टर खरीदे जाने हैं. इस खरीद के लिए 2010 में एक एंग्लो-इतालवी कंपनी ‘अगस्ता वेस्टलैंड’ के साथ रक्षा मंत्रालय का करार हुआ था. आरोप है कि भारत की बुनियादी जरूरतों पर इस कंपनी के हेलिकॉप्टर खरे नहीं उतरते थे लेकिन इस कंपनी के साथ सौदा  पक्का करने के लिए भारत ने अपनी जरूरतों में बदलाव किया. 3,546 करोड़ रुपये के इस सौदे में अब अगस्ता वेस्टलैंड द्वारा 350 करोड़ रुपये की दलाली दिए जाने की बात कही जा रही है.  इतालवी अभियोजकों द्वारा इस मामले में 15 लोगों को आरोपित बनाया गया है जिनमें से तीन भारतीय हैं. इस मामले में एक भारतीय ब्रिगेडियर पर भी 50 लाख डॉलर की रिश्वत मांगने का आरोप है.

दलाली की बात कैसे सामने आई?
इतालावी अखबार ‘ला रिपब्लिक’ के अनुसार स्विस सलाहकार गिडो राल्फ हाश्के की इस सौदे में मुख्य भूमिका है. इतालवी अभियोजन पक्ष द्वारा कोर्ट में पेश किए गए तथ्यों में हाश्के को अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी से हुई फोन वार्ताओं में लगातार इस सौदे पर चर्चा करते हुए पाया गया है. हाश्के की ही कंपनी के एक अधिकारी द्वारा इस बात का खुलासा किया गया था कि यह सौदा करवाने की जिम्मेदारी हाश्के को सौंपी गई थी जिसके बदले उन्हें करोड़ों रुपये की दलाली भी दी गई. कुछ दिन पहले स्विट्जरलैंड से दो लोगों को इस सौदे में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. इसके बाद भारत में यह मामला चर्चा में आ गया है.

भारत सरकार द्वारा अब तक क्या कदम उठाए गए?
रक्षा मंत्री एके एंटनी ने विदेश मंत्रालय से इस संदर्भ में ब्रिटेन से जानकारी मांगने की अपील की है. इटली को इस संबंध में पहले ही लिखा जा चुका है. मामला वहां के न्यायालय में लंबित है. इसलिए इटली की सरकार अभी कोई भी जानकारी देने में अपनी असमर्थता जता रही है. भारत में इटली के राजदूत को भी मामले की गंभीरता के विषय में सूचित करते हुए भारत सरकार ने उनसे हर संभव सहयोग करने की अपील की है. रक्षामंत्री ने इस संबंध में कहा है कि दोनों देशों से जानकारी मिलने के बाद यदि कोई  अनियमितता सामने आती है तो वे कड़े कदम उठाएंगे.
-राहुल कोटियाल

टाइम कैप्सूल : इंदिरा गांधी

लाल किले के सामने गड्ढे में दफन किया गया तांबे का पात्र जिसकी सामग्री आज तक रहस्य बनी हुई है.

आम तौर पर टाइम कैप्सूल धातु का बना ऐसा पात्र होता है जिसके भीतर दस्तावेज और अमूल्य प्रतीक चिह्न रखकर इसे जमीन में दबा दिया जाता है. इसका मकसद होता है कि दशकों बाद जब इसे निकाला जाए तो वर्तमान की पीढ़ी उस समय के इतिहास को जान सके.

यह मूल रूप से विदेशों की परंपरा है. वैसे हाल के सालों में भारत के भी कुछ संस्थानों ने टाइम कैप्सूलों में दस्तावेजों को संरक्षित किया है और जिनकी चर्चा अखबारों में आती रही है. लेकिन हमारे यहां टाइम कैप्सूल से जुड़ी सबसे विवादित और चर्चित घटना 80 के दशक की है. जब न सिर्फ इससे राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे काफी तवज्जो दी थी. दरअसल केंद्र सरकार की एक योजना के मुताबिक 15 अगस्त, 1973 को दिल्ली में लाल किले के दरवाजे के आगे गड्ढा खोदकर एक टाइम कैप्सूल दबाया गया था. इसमें रखे गए दस्तावेजों में भारत की आजादी तक का पूरा इतिहास और महापुरुषों की जीवनियां शामिल थीं. यह पूरी सामग्री भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने तैयार की थी. इस टाइम कैप्सूल को कालपात्र नाम दिया गया था.

यह घटना उस समय अचानक विवाद का विषय इसलिए बन गई क्योंकि विपक्ष का आरोप था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों और कांग्रेस विरोधी नेताओं की उपेक्षा करते हुए कांग्रेसी विचारधारा और अपने परिवार को महिमामंडित करने वाले दस्तावेज ही इस कालपात्र में रखवाए हैं.  

सन 1977 में कांग्रेस सरकार का पतन हुआ और जनता पार्टी की सरकार बनी. तब सरकार ने कालपात्र को बाहर निकलवाया और उसमें सुरक्षित दस्तावेजों को पढ़ा. कहा जाता है कि उन दस्तावेजों में हो-हल्ला मचाने जैसी कोई सामग्री नहीं थी. देश की तमाम प्रमुख हस्तियों का उसमें विवरण था. नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में जानकारी भी इसमें शामिल थी. लेकिन इन दस्तावेजों का विवरण कभी मीडिया में नहीं आया और अभी तक यह एक रहस्य है कि उस कालपात्र का बाद में क्या हुआ.

इस घटना से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जहां कालपात्र जमीन में गड़वाने पर आठ हजार रुपये खर्च हुए थे वहीं इसे बाहर निकलवाने में सरकार के 58 हजार रुपये खर्च हुए.   
-पवन वर्मा

राम भरोसे अवाम

पटना में छठ पूजा के दौरान हुए हादसे के बाद उठी चीत्कार गंगा किनारे अदालतगंज घाट से लेकर पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल तक का रास्ता तय करते हुए मृतकों के घरों में सिमटने लगी है. अब 20 से अधिक लोगों की मौत पर सियासत का दायरा बढ़ता जा रहा है. लेकिन इस सबके बीच जरूरी सवाल दफन होने की राह पर हैं.

 19 नवंबर को छठ पूजा के अस्ताचलगामी अर्घ्य के दौरान घटना हुई. पहले कहा गया कि कि लकड़ी के बने अस्थायी पुल के टूट जाने से भगदड़ मची और ज्यादातर बच्चे तथा महिलाएं इसकी चपेट में आकर जान गंवा बैठीं. फिर तुरंत कहा गया कि नहीं, ऐसा नहीं है, बिजली के तार के टूट कर गिर जाने से भगदड़ मची. यह भी कहने की कोशिश हुई कि लोग तो बेमतलब डरकर जान-प्राण गंवा बैठे. भीड़ के चाल-चरित्र को दुनिया जानती है. बिहार में उस चाल-चरित्र को ही जिम्मेदार मानने की कवायद हुई, लेकिन सरकार के खिलाफ मुर्दाबाद की नारेबाजी और शासन-प्रशासन के खिलाफ उभरे त्वरित आक्रोश ने ऐसा कहने-करने से रोक दिया. प्रशासन ने कहा 14 मरे, देखनेवालों ने देखा कि 18 मरे. पटना मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर अपने पुराने अंदाज में सेवा देते रहे. पांच जो जिंदा थे, उन्हें मरा हुआ कहकर इलाज से बेदखल कर लाश की श्रेणी में रख दिया गया. बाद में जिंदा मान इलाज शुरू हो सका. घटना के फौरन बाद राजद के मुखिया लालू प्रसाद ने बयान दिया कि सरकार इस्तीफा दे. उनके सहयोगी व राज्यसभा सांसद रामकृपाल यादव ने कहा कि सरकार की लापरवाही की वजह से हादसा हुआ, मुख्यमंत्री इस्तीफा दें. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रात करीब 11 बजे प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि पुल टूटने से हादसा नहीं हुआ, गृह सचिव जांच कर रहे हैं, उचित कार्रवाई होगी. मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख का मुआवजा देने की भी बात कही.

 19 नवंबर की रात यह सब होता रहा, 20 की सुबह अदालतगंज घाट में पुलिस की पहरेदारी के बीच मातमी सन्नाटा पसरा रहा. पटना के दूसरे हिस्सों में अहले सुबह छठव्रतियों ने पूजा संपन्न की. जो पटनावासी हैं, उनका कहना है कि छठ के दौरान लाखों की भीड़ हर साल जुटती है लेकिन ऐसी घटना पहली बार हुई है.

छठ पूजा के दौरान मची भगदड़ में 18 जानें जा चुकी हैं. फोटो:आफताब आलम सिद्दकी

संभव है कि गृह सचिव की जांच से यह बात सामने आ जाये कि हादसा हुआ कैसे. बिजली का तार गिरने से या पुल के टूटने से. यह भी संभव है कि कुछ लोगों पर कार्रवाई हो भी जाए. संभव है, कुछ यह भी समझाने लगें कि भीड़ और भगदड़ का पुराना संबंध रहा है और मेले-रेले में ऐसे हादसे देशभर में होते रहते हैं, सो इसमें सरकार-प्रशासन क्या कर सकता था? लेकिन इस हादसे के इर्द-गिर्द मूल सवाल दूसरे किस्म के हैं जिन पर गौर किया जाना चाहिए. जिनका जवाब मांगा जाना चाहिए और दिया जाना चाहिए. यह जवाब सरकार को भी देना चाहिए और सरकार के इस्तीफे की मांग से लेकर तमाम तरह की तोहमतें मढ़ रहे लालू प्रसाद जैसे नेताओं को भी, जिनकी कमान में करीब 15 साल तक सत्ता चलती रही है.

यह हर कोई जानता है कि आज छठ ही बिहार का सबसे बड़ा लोकपर्व-महापर्व है. छोटे-बड़े शहरों में छठ के दौरान नागरिक समुदाय अपने स्तर पर इसके लिए खास इंतजाम करता है. बिहार की सरकारें जानती रही हैं कि दिन-ब-दिन इस महापर्व से लोगों का जुड़ाव बढ़ता जा रहा है. सवाल उठता है कि इस महापर्व के बढते दायरे को देखते हुए नीतीश सरकार या पूर्ववर्ती सरकारों ने क्या ऐसे खास इंतजाम करने की कोशिश की. पटना में गंगा पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चार-पांच किलोमीटर दूर खिसक चुकी है. तमाम किस्म की मुश्किलों के बावजूद जीवट छठव्रत्ती लाखों की संख्या में गंगाघाट पहुंचकर ही पर्व करते हैं. तो फिर उचित इंतजाम के नाम पर गंगा तक पहुंचने के लिए कुछ जगमगाती बत्तियां लगा देना और मिटटी की भराई कर देना या लकड़ियों का पुल बना देना ही काफी है? ऐसा तो हर इलाके में कुछ नौजवान भी स्थानीय चंदे से कर लेते हैं. पटना को छोड़ भी दें तो बिहार के औरंगाबाद जिले में देव सूर्य मंदिर छठ का एक महत्वपूर्ण और चर्चित स्थल है. वहां भी भारी भीड़ में जुटती है छठ के मौके पर. क्या वहां की व्यवस्था और वहां पहुंचनेवाले लोगों की सुविधाओं का खयाल उस तरीके से या उस स्तर पर जाकर कभी किसी सरकार ने रखा, जिसकी जरूरत वहां सालों से महसूस की जाती है.

छठ को छोड़ भी दें तो बिहार में दो और धार्मिक आयोजन बेहद खास होते हैं, जिसमें लाखों की आबादी हर साल जुटती है. पहला है गया का पितृपक्ष मेला. गया में पिंडदान के लिए हर साल करीब 15 लाख लोग पहुंचते हैं लेकिन वहां की बदइंतजामी से हर कोई वाकिफ है. दूसरा महत्वपूर्ण आयोजन पटना के उस पार सोनपुर के सालाना मेले का भी है. छठ, पितृपक्ष और सोनपुर का माघी मेला, बिहार के तीन ऐसे महत्वपूर्ण आयोजन हैं जिनसे भले ही सरकारी खजाने में बड़े राजस्व की प्राप्ति नहीं होती हो पर ये दुनिया भर में बिहार की ब्रांडिंग बड़े फलक पर करते हैं. लेकिन इन तीनों आयोजनों में सरकारों की रुचि उस कदर कभी नहीं रही, जैसी रुचि बोधगया में रहती है, या अभी चंपारण के केसरिया में अंकोरवाट मंदिर का रेप्लिका बनाने में है. बाकी  राजद और जदयू को छोड़ दें तो भाजपा जैसी पार्टी के नेता, जो रोज बयानों के बाण चलाते हैं, उनकी भी जितनी रुचि पिछले साल सिमरिया में लगाये गये जबरिया कुंभ में रही, वैसी कभी छठ, माघी मेला या पितृपक्ष को लेकर नहीं रही.

दयामनी से कौन डरता है?

छह नवंबर की बात है. जेल में बंद दयामनी बरला को अदालत ने दो घंटे के पेरोल पर छोड़ा था. वे अपनी भाभी के अंतिम संस्कार में शामिल होने आई थीं. दयामनी रांची में अपने छोटे-से झोपड़ीनुमा होटल पहुंचीं. वहां उनके साथी, शुभचिंतक और परिजन पहले से मौजूद थे. भाभी की मौत से गमगीन दयामनी अपने भाई जॉलेन बरला को देखते ही उनके गले लगकर रोने लगीं. दोनों भाई-बहन कुछ देर तक फफकते रहे. फिर जॉलेन ने दयामनी को चुप कराते हुए समझाया, ‘देख दयामनी, मां कहती थी कि घर में सभी भाई-बहनों में एक तुम्हीं सबसे लायक निकली हो. मां को तुम्हीं से बड़े काम की उम्मीद थी. तुम कभी समझौता नहीं करना किसी से. कभी रोना नहीं और ना ही किसी से डरना. मरने से भी नहीं डरना. तुम तो जानती ही हो कि ईसा मसीह को घेर कर सूली पर चढ़ा दिया गया था, तो क्या डरना!’

24 घंटे पहले अपनी पत्नी की मौत से दुखी और गम में डूबे जॉलेन बिना किसी बनावट के ये बातें अपनी बहन को समझा रहे थे. माहौल अजीब था. वहां मौजूद लोगों की आंखों में आंसू छलकने लगे थे, लेकिन रो रही दयामनी अब भाई की आंखों से आंख मिलाकर मुस्कुराने लगी थीं. जॉलेन का हाथ पकड़ते हुए वे बोलीं,  ‘तुम लोग ही घर संभालते रहे हो. अच्छे से संभालो. मुझ पर भरोसा रखना. वचन दे रही हूं कि कभी भी लोगों का भरोसा नहीं तोड़ूंगी, कभी समझौता नहीं करूंगी.’ इतना कहकर वे दोबारा जेल के लिए रवाना हो गईं.

यह छोटा-सा प्रसंग बताना है कि साधारण-सी दिखने वाली दयामनी बरला को वह फौलादी ऊर्जा कहां से मिलती है जिसके बल पर उन्होंने लक्ष्मी निवास मित्तल जैसे धनकुबेर उद्योगपतियों से लेकर ताकतवर सत्ता संस्थानों तक की नाक में दम कर रखा है. जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ाई लड़ने वाली झारखंड की इस महिला की धमक आज राज्य के दायरे से बाहर निकल चुकी है. यही वजह है कि दो दशक से आदिवासियों के संग आंदोलन में खड़ी दयामनी को देश और दुनिया भर से समर्थन मिल रहा है. पहली बार उनकी गिरफ्तारी बीती 16 अक्टूबर को एक मामूली मामले में हुई थी. फिर जब एक-एक कर उनके खिलाफ पुराने मामले खुलते गए और दयामनी की जेल अवधि बढ़ती रही तो इसका विरोध होने लगा और उनकी रिहाई के पक्ष में देश और दुनिया भर से कोशिशें होने लगीं. अमेरिका के प्रसिद्ध चिंतक नोम चोम्स्की ने केंद्र सरकार को पत्र लिखा. मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय रांची पहुंचे. माकपा नेत्री वृंदा करात भी जेल पहुंचीं.

दयामनी बरला को वह फौलादी ऊर्जा कहां से मिलती है जिसके बल पर उन्होंने लक्ष्मी निवास मित्तल जैसे धनकुबेर उद्योगपतियों से लेकर ताकतवर सत्ता संस्थानों तक की नाक में दम कर रखा है.

दरअसल यह सवाल आज एक सार्वजनिक सवाल बन चुका है कि आखिर दयामनी से कौन डरता है? क्यों डरता है. लोगों के लिए लड़ने वाली दयामनी किसके लिए दुश्मन-सी हैं और क्यों हैं? उनकी गिरफ्तारी को लेकर राज्य सरकार आलोचना के घेरे में है. आरोप लग रहा है कि पुलिस दयामनी को किसी भी हालत में जेल में रखना चाहती है. हालांकि झारखंड के पुलिस महानिदेशक जीएस रथ ने इस आरोप को खारिज किया. उनका कहना था कि पुलिस दयामनी की जमानत का विरोध करेगी या नहीं यह उनके खिलाफ मौजूद सबूतों पर निर्भर करता है.

16 अक्टूबर के दिन दयामनी को छह साल पुराने मामले में जेल जाना पड़ा. मामला 29 अप्रैल, 2006 का था. रांची से सटे अनगड़ा में ग्रामीण मनरेगा में हो रही धांधली का विरोध करते हुए जॉब कार्ड की मांग कर रहे थे. दयामनी को भी ग्रामीणों ने बुलाया था. वे गई थीं और लोगों का समर्थन किया था. तब वहां के पुलिस अवर निरीक्षक वसी अहमद ने धारा 147/148/149/342/353/354/379/427 के तहत मामला दर्ज कराया था. छह साल बाद इस मामले में दयामनी के खिलाफ वारंट निकला. वे कोर्ट पहुंचीं जहां से उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया. उन्हें जमानत मिल गई लेकिन जमानत मिलते ही दूसरे मामले में फिर से जेल भेज दिया गया. यह मामला रांची से सटे नगड़ी में आईआईटी, आईआईएम, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के निर्माण के लिए जमीन के अधिग्रहण के विरोध का था. ग्रामीणों के आंदोलन के समर्थन में दयामनी इसी साल 15 अगस्त को वहां पहुंची थीं इस आंदोलन में उन खेतों की जुताई की गई थी जिन्हें सरकार ने इन संस्थानों के लिए अधिगृहीत किया था. इस मामले में दयामनी इकलौती नामजद अभियुक्त बनाई गई थीं, जबकि करीब 100 अभियुक्तों को अनाम रखा गया था. दो नवंबर को दयामनी पर एक और मामला खुला. यह मामला नगड़ी आंदोलन के ही समर्थन में रांची के मुख्य स्थल अलबर्ट एक्का चौक पर सरकार का पुतला दहन करने से संबंधित था. दयामनी के प्रमुख सहयोगी और मार्गदर्शक रहे फैसल अनुराग बताते हैं, ‘दयामनी नगड़ी मामले में लगातार सरकार की पोल खोल रही थीं. सरकार किसी भी तरह नगड़ी में निर्माण करवाना चाहती है, इसलिए दयामनी को जेल भिजवाने की योजना बनी. अलबर्ट एक्का चौक पर जिस दिन पुतला दहन का कार्यक्रम था, उसमें दयामनी शामिल भी नहीं थीं. वे तो वहां धरने पर बैठे राजनीतिक साथियों से सिर्फ मिलने भर गई थीं. लेकिन उन पर केस दर्ज करा दिया गया.’

इस बीच आठ नवंबर को हाई कोर्ट ने दयामनी बरला, झारखंड दिशोम पार्टी के अध्यक्ष सालखन मुर्मू समेत छह अन्य लोगों के खिलाफ पुतला दहन के मामले में नोटिस जारी करके पूछा कि क्यों न इन लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए क्योंकि नगड़ी मामले में चार अक्टुबर को सालखन के नेतृत्व में हाई कोर्ट का पुतला दहन किया गया था. इसका जवाब देने के लिए 26 नवंबर तक की तिथि दी गई है.
इतना ही नहीं आठ नवंबर को दयामनी को जमानत मिलनी थी, लेकिन न्यायालय ने सुनवाई की अगली तिथि 14 या 17 नवंबर तय कर दी. यह सुनवाई नगड़ी में 15 अगस्त को खेत जुताई वाले मामले से संबंधित है.
दयामनी को छह साल पहले के मामले में पहले जेल पहुंचा कर फिर तुरंत नगड़ी आंदोलन से संबंधित केस में जेल में बनाए रखने की नौबत क्यों आई, इसकी पड़ताल करने पर बात साफ होती है. दयामनी पिछले कुछ सालों से खूंटी-तोरपा और आस-पास के ग्रामीणों को गोलबंद करके आर्सेलर-मित्तल कंपनी द्वारा उस इलाके में स्थापित किए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े स्टील प्लांट का विरोध कर रही थीं. उनके नेतृत्व में 40 आदिवासी गांवों के लोग एकजुट हुए. जमीन न देने और गांवों के उजाड़े जाने के खिलाफ आंदोलन इतना संगठित और तेज हुआ कि मित्तल जैसी कंपनी को आखिरकार इलाका बदलना पड़ा. सरकार और प्रशासन के लोग इस आंदोलन और नेतृत्व से कसमसाते रहे, लेकिन कुछ कर नहीं पाए क्योंकि आंदोलन करते वक्त दयामनी संविधान और कानून-व्यवस्था का पूरा ध्यान रखती हैं.

उनके नेतृत्व में 40 आदिवासी गांवों के लोग एकजुट हुए. जमीन न देने और गांवों के उजाड़े जाने के खिलाफ आंदोलन इतना संगठित और तेज हुआ कि मित्तल जैसी कंपनी को आखिरकार इलाका बदलना पड़ा. सरकार और प्रशासन के लोग इस आंदोलन और नेतृत्व से कसमसाते रहे, लेकिन कुछ कर नहीं पाए क्योंकि आंदोलन करते वक्त दयामनी संविधान और कानून-व्यवस्था का पूरा ध्यान रखती हैं.

इसके बाद दयामनी सरकार की एक और महत्वाकांक्षी योजना की राह में खड़ी हो गईं. मामला रांची से सटे नगड़ी में आईआईटी, आईआईएम और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी खोलने का था. नगड़ी में 227 एकड़ जमीन पर इन संस्थानों के निर्माण कार्य की शुरुआत हुई. स्थानीय किसानों ने इसका विरोध किया. उनका कहना था कि जमीन उनकी है, वे इस पर खेती करते हैं और रसीद कटवाते हैं. सरकार ने कहा कि 1957-58 में इसका अधिग्रहण हो चुका है. सरकार और ग्रामीणों के बीच तकरार की शुरुआत हुई. ग्रामीणों ने जमीन पर खेती की. सरकार ने उस पर बुलडोजर चलवा दिया. ग्रामीण फिर लड़ाई के लिए तैयार हुए. 7 जनवरी, 2012 को 12 ग्रामीणों पर मामला दर्ज हुआ. 9 जनवरी को  पुलिस बल वहां पहुंचा और चहारदीवारी का निर्माण कार्य शुरू हो गया. 227 एकड़ जमीन पर धारा 144 लागू हो गई. 25 जुलाई को ग्रामीणों ने बंद का ऐलान किया. इस दौरान इसमें कुछ हिंसा और तोड़फोड़ भी हुई. ग्रामीणों के संपर्क करने पर दयामनी इस आंदोलन से जुड़ गईं और अपने तरीके से इस पर काम भी कर रही थीं. उन्होंने खून-खराबे की निंदा की और ग्रामीणों को कहा कि हिंसा से रास्ता नहीं निकलेगा. उनके आंदोलन से जुड़ते ही आंदोलन का रुख दूसरी ओर जाने लगा. उन्होंने सूचनाधिकार का इस्तेमाल शुरू किया. भू अर्जन विभाग से इस बारे में तमाम जानकारी मांगी गई.

भू अर्जन विभाग को जानकारी देनी पड़ी कि 1957-58 में जब 202.27 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ था  तब 153 रैयत थे, उनमें से 128 रैयतों ने पैसा लेने से इनकार कर दिया था और उनका पैसा रांची कोषागार में जमा है. इस जमीन का अधिग्रहण तब के राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय यानी बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के लिए हुआ था, इसलिए दयामनी ने आरटीआई का इस्तेमाल करके कृषि विश्वविद्यालय से भी भू अर्जन विभाग वाली ही सूचना मांगी कि आपने कितनी जमीन अधिगृहीत की है. किस-किस रैयत की कौन-कौन खाता-प्लॉट नंबर वाली जमीन अधिगृहीत हुई और आपने कितना और कैसे भुगतान किया था? जवाब आया कि जमीन अधिग्रहण की उसे कोई जानकारी नहीं और न ही विभाग द्वारा इसके लिए कोई भुगतान किया गया है.

जानकारियां सामने आ रही थीं और इससे सरकार व प्रशासन की मुश्किलें बढ़ रही थीं. दयामनी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने राजभवन के सामने सत्याग्रह शुरू कर दिया. दयामनी कहती हैं, ‘फरवरी से जब हमने ये सूचनाएं जुटानी शुरू कीं तभी से ही मुझे लग रहा था कि सरकारी तंत्र के लोग खुद अपने ही बुने जाल में फंसते जा रहे हैं. और तभी मुझे यह भी लगा था कि ये लोग मुझे फंसाएंगे जरूर.’ मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग कहते हैं कि नगड़ी आंदोलन की वजह से ही दयामनी को परेशान किया गया है और शुरुआत वाला अनगड़ा मामला तो सिर्फ उन्हें एक बार जेल तक पहुंचाने का बहाना भर था.

हालांकि इस बीच हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार नगड़ी में शीघ्र काम शुरू करवाए और इसे पूरा करवाए. दो नवंबर से भारी संख्या में पुलिस बलों की तैनाती के साथ फिर से काम भी शुरू हो चुका है. लेकिन यहां जिन संस्थानों को खुलना है उनके सुर भी बदलने लगे हैं. आईआईएम रांची के निदेशक प्रो एमके जेवियर कहते हैं, ‘हमारा मकसद ग्रामीणों को किसी भी तरह से दुख पहुंचाना नहीं है, इसलिए हमने सरकार से आग्रह किया है कि वह दूसरी जगह जमीन दे दें.’ फिलहाल नगड़ी में काम जारी है, लेकिन दयामनी भी जेल से निकलने के बाद नगड़ी आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखने की बात कह रही हैं.

दयामनी की गिरफ्तारी के वक्त कुछ और बातें भी साफ हुई हैं. इस पूरी हलचल के दौरान झारखंड के राजनीतिक गलियारों में एक अजीब किस्म का सन्नाटा दिखा. नगड़ी पर तो सभी अपनी रोटी सेंकते रहे लेकिन दयामनी पर बोलने से कतराते रहे. झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से पहले तो नगड़ी के समर्थन में बातें की गई थीं, लेकिन गिरफ्तारी के बाद बयान लगभग बंद रहे. झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन बार-बार कहते रहे हैं कि आदिवासियों की जमीन पर जबरदस्ती करना ठीक नहीं. लेकिन इन दिनों सरकार का नेतृत्व न बदलने पर उसे गिरा देने की धमकी देने वाले सोरेन नगड़ी और इस बहाने दयामनी की गिरफ्तारी के संदर्भ में सरकार पर दबाव नहीं बना पाए.  पिछले साल बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा ने दयामनी का नाम राज्यसभा सदस्य के लिए हवा में उछालकर वाहवाही भी बटोरी थी. फिलहाल इस मुद्दे पर उन्होंने राजनीतिक चुप्पी को तोड़ने की कोशिश की है. मरांडी ने कहा कि सरकार ने अपने अहंकार के कारण दयामनी को फंसाया है. उन्होंने मांग की कि दयामनी की जगह सरकार उन्हें जेल में डाल दे. उनके इस बयान से झारखंड के दूसरे राजनीतिक दलों के भी बयान आने का सिलसिला शुरू होगा, ऐसा माना जा रहा है.

उधर, भाकपा माले ने दयामनी की रिहाई को लेकर पूरे राज्य में जनांदोलन छेड़ने की घोषणा की है. उग्रवादी संगठन पीएलएफआई ने 8 नवंबर को नगड़ी आंदोलन के समर्थन में रांची बंद का आह्वान किया था, जिसका ग्रामीण इलाकों में व्यापक असर देखने को मिला. नौ नवंबर को दयामनी ने एक और चिट्ठी जेल से जारी की है. उनका कहना है कि जब तक कोयल-कारो और छाता नदी की धाराएं बहती रहेंगी तब तक उनकी जंग जारी रहेगी.                                                   

दयामनी से बातचीत: ‘मैं सरकार से लड़ नहीं रही, सिर्फ बता रही हूं कि आप संविधान नहीं मानते तो 15 अगस्त और 26 जनवरी मनाना छोड़ दीजिए’

झारखंड की चर्चित जमीनी आंदोलनकारी दयामनी बरला जेल में हैं. उन्हें छह साल पहले एक रैली में भाग लेने से लेकर हालिया दिनों में रांची के पास आईआईटी, आईआईएम और लॉ यूनिवर्सिटी के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध करने के मामले में न्यायिक हिरासत में भेजा गया है. दयामनी से निराला और अनुपमा ने टुकड़ों में बातचीत.

क्या लगता है आपको, सरकार सुनियोजित तरीके से आपको परेशान कर रही है?

यह तो साफ दिखता है. छह साल पहले रांची से सटे अनगड़ा में मनरेगा जॉब कार्ड में हेराफेरी और घपले को लेकर ग्रामीणों ने एक रैली की थी. मैं ऐसे आंदोलनों में जाती हूं, वहां भी गई थी. मनरेगा का घपला तो नहीं रुका और न ही अनगड़ा वाले मजदूरों की समस्या का समाधान हुआ. लेकिन इतने साल बाद मैं उसी मामले में जेल जरूर भेज दी गई. इससे संबंधित गिरफ्तारी का वारंट मुझे भेजा तक नहीं गया था लेकिन कहा गया कि आपके खिलाफ वारंट है.

उद्योगपति लक्ष्मी निवास मित्तल के खिलाफ आप लंबी और मजबूत लड़ाई लड़ रही हैं, नगड़ी में आईआईटी, आईआईएम और लॉ यूनिवर्सिटी बनाने पर आमादा सरकार के खिलाफ जो मोर्चा खुला है उसका नेतृत्व भी आप कर रही हैं. आपके हिसाब से किस मसले का कोप आपको झेलना पड़ रहा है?

सभी मसलों को लेकर. मेरे खिलाफ तैयारी बहुत दिनों से थी, इसका अहसास मुझे हो रहा था. फरवरी से ही मैंने मनरेगा के हालात का अध्ययन शुरू किया था और एक-एक पंचायत में करोड़ों के घपले की बात सामने आ रही थी. दूसरी ओर नगड़ी मामले में मैं आरटीआई के जरिए सरकार द्वारा ग्रामीणों की खेती की जमीन हड़पने की योजना की सच्चाई मालूम कर चुकी थी. इन सबकी वजह से मुझे लेकर पहले से ही तैयारी थी. मुझे फंसाया गया छह साल पहले के एक केस में, फिर उसके बाद तुरंत दूसरा केस, फिर तीसरा. नगड़ी के बहाने मैं सरकार चलाने वालों को बताना चाहती हूं कि आजादी के बाद बने भारतीय संविधान में शेड्यूल पांच और छह का वर्णन है, अगर उसका पालन नहीं करवा सकते तो 15 अगस्त और 26 जनवरी मनाने के बजाय साहस करके कहना चाहिए कि हम अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति से एक रत्ती भी आगे नहीं जा सकते.

आप आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों के पक्ष में  हैं या नहीं?

सरकार गरीबों की खेती की जमीन को छोड़ कहीं किसी बंजर और गैरउपजाऊ जमीनों पर इन संस्थानों की स्थापना करवाए, मैं स्वागत करूंगी. मैं विकास विरोधी नहीं हूं लेकिन वह न्यायपूर्ण हो.

झारखंड में सरकार भाजपा, झामुमो और आजसू की है. तीनों दलों की चुप्पी तो समझ में आती है, लेकिन दूसरे दल भी लगभग खामोश ही हैं. आपके समर्थन में राजनीतिक दल खुलकर सामने नहीं आ सके, जबकि पिछले साल तक तो आपको राज्यसभा भेजने की भी बात हो रही थी! 

इस पर मैं क्या कहूं. मेरा अनुभव है कि अधिकांश झारखंड नामधारी दल भी घोंघे की तरह हैं. घोंघा शांत पानी में तो अपना मुंह बाहर निकालकर दिखाते रहता है लेकिन जैसे ही पानी में थोड़ी हलचल होती है, अपने को अंदर समा कर चुपचाप बैठ जाता है मरे जैसा. और आप जो राज्यसभा आदि में मुझे भेजे जाने वाले प्रसंग की चर्चा कर रहे हैं तो वह सब महज एक नाटक होता है. 

जेल में रहने से आपके द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों पर किस तरह का फर्क पड़ सकता है?

मैं सकारात्मक फर्क की ही उम्मीद करती हूं क्योंकि किसी और पर भरोसा हो या नहीं, मुझे अपने साथियों व ग्रामीणों पर पूरा भरोसा है. अब वे और जोरदार तरीके से अपने आंदोलन को जारी रखेंगे.

जेल में आपके साथ राजनीतिक बंदी की तरह व्यवहार हो रहा है?

मुझे राजनीतिक बंदी बनने का शौक नहीं. मैं आम कैदियों की तरह ही उनके बीच रहना चाहती हूं. पहली बार जेल में आई हूं तो बहुत कुछ करीब से देखने-समझने की कोशिश कर रही हूं. हां, मैंने जेल प्रशासन से यह आग्रह जरूर किया था कि मुझे डायबिटीज है और भोजन में यदि थोड़ा ध्यान रखा जाए तो बेहतर. लेकिन फिलहाल मेरे इस अनुरोध पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया.

क्या देख और महसूस कर रही हैं आप? क्या दिनचर्या रहती है आपकी यहां?

जेल की दुनिया बड़ी विचित्र दुनिया है. यहां बेगुनाह भी जिंदगी गुजार रहे हैं. छोटे-मोटे केस में फंसे लोगों को भी जवानी यहीं खत्म करनी पड़ रही है. मैं दिन भर या तो अपने साथ के बंदियों से बातचीत करती हूं या आदिविद्रोही, भारत का स्वतंत्रता संग्राम आदि किताबें पढ़ती हूं. यह समझने की कोशिश कर रही हूं कि क्यों आदिवासी नेताओं के स्वतंत्रता आंदोलन को उस तरह जगह नहीं दी गई है.

आप जिस जेल में हैं उसी में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा समेत कई मंत्री बंद हैं. क्या उनमें से कोई आपसे मिलने आया और आपको समर्थन देने की बात कही?

यहां उन लोगों के सामने मेरी हैसियत क्या है. उनके लिए जेल में भी वैसा ही राज है. मुझसे कोई मिलने नहीं आया. वैसे भी मुझे आम जनता और राज्य व देश के कोने-कोने में बसे अपने साथियों के अलावा किसी के समर्थन की जरूरत भी नहीं.

जेल से निकलने के बाद क्या योजना और रणनीति होगी?

जो करती रही हूं, वही करूंगी. झारखंड की धरती को धोखा नहीं दूंगी. सरकारों की नजर में लुटेरे शुभचिंतक बने हुए हैं, उस धारणा को बदलना होगा. इसके लिए संघर्ष करूंगी. मुझे किसी सजा से डर नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं कि सिद्धू-कान्हू से लेकर बिरसा मुंडा तक को सजा ही भुगतनी पड़ी. संघर्ष और सजा तो हमारी परंपरा और विरासत है. उससे क्या घबराना.