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वह इंद्रधनुष टूट गया

क्या किसी कलाकार से हमें यह अपेक्षा रखनी चाहिए कि वह अपनी पसंद-नापसंद, अपने संबंधों को छोड़कर वैसा जीवन जिए जैसा उसकी कला प्रस्तावित करती है या जैसा उसके प्रशंसक चाहते हैं? इतिहास में बहुत सारे ऐसे महान लेखक और कलाकार हुए हैं जिनका अपना जीवन कई तरह के ओछेपन से घिरा रहा. हम उनके जीवन को अनदेखा करके उनकी कला में निहित मूल्य या सौंदर्य को ग्रहण करते हैं और उसका आस्वाद लेते हैं. बहुत सारे लेखकों-कलाकारों के जीवन का सच तो हमें मालूम भी नहीं हो पाता, इसलिए अंततः उनकी कला ही वह इकलौती कसौटी बचती है जिसके आधार पर हम उनका मूल्यांकन करते हैं. अंततः हम यह पाते हैं कि कला अपने कलाकार से स्वायत्त होती जाती है जिसका हम अपने ढंग से पाठ-पुनर्पाठ, सृजन या पुनर्सृजन करते हैं. लेकिन क्या इसीलिए हमें किसी कलाकार के जीवन और उसकी कला में दिखने वाली फांक की चर्चा नहीं करनी चाहिए, उस पर उदास नहीं होना चाहिए?

पिछले दिनों बाल ठाकरे के देहांत पर लता मंगेशकर की श्रद्धांजलि देखते हुए मेरे भीतर यह सवाल उठता रहा. अपनी आवाज से करोड़ों लोगों के दिल जीतने वाली महान गायिका लता मंगेशकर ने कहा कि बाल ठाकरे की मृत्यु ने उन्हें अनाथ कर दिया है. शायद मराठी मानुष और मानस में बाल ठाकरे की छवि बाकी भारत से कुछ अलग है और शायद लता मंगेशकर का भी मराठी प्रेम दूसरों के मुक़ाबले कुछ प्रखर है, लेकिन इसके बावजूद यह श्रद्धांजलि उनके बहुत सारे चाहने वालों को कुछ उदास कर गई. वैसे बाल ठाकरे के इस सार्वजनिक वंदन में सिर्फ लता मंगेशकर ही नहीं, अमिताभ बच्चन भी शामिल हुए और दूसरे कलाकार भी. निस्संदेह इसमें कुछ भी गलत नहीं है और न किसी को चुभना चाहिए.  किसी की मृत्यु पर शोक जताना एक सहज मानवीय अपेक्षा है- चाहे मरने वाला हमारी अपेक्षाओं के जितने भी विरुद्ध जीवन जीता रहा हो.

लेकिन बाल ठाकरे की श्रद्धांजलि के लिए जिस तरह पूरा बॉलीवुड उमड़ पड़ा, उससे व्यावसायिक सिनेमा के चरित्र पर भी कुछ रोशनी पड़ती है. वैसे भी सिनेमा एकांतिक नहीं, सामूहिक विधा है. अमिताभ बच्चन जो अभिनय करते हैं, जो संवाद बोलते हैं, जिस कहानी को आगे बढ़ाते हैं, वे सब दूसरों के द्वारा लिखित, निर्देशित या परिकल्पित होते हैं, बहुत दूर तक व्यावसायिक तकाजों से संचालित भी. इसी तरह लता मंगेशकर जो गीत गाती हैं जिस धुन पर गाती हैं, वे दूसरों के लिखे और रचे हुए होते हैं. हो सकता है, इसलिए ये लोग अपनी कला की अखंडता या ईमानदारी के प्रति ऐसे संवेदनशील न हों जैसे लेखक, चित्रकार या गंभीर फिल्मकार भी होते हैं. शायद इसलिए किसी बाल ठाकरे की राजनीति उनके और उनकी कला के सामने कोई वैचारिक दुविधा या चुनौती पैदा नहीं करती.

लेकिन सवाल इसके आगे से शुरू होते हैं. क्या यह सच्चाई इस ज़्यादा बड़ी सच्चाई को नज़रअंदाज़ कर सकती है कि अमिताभ या लता जैसे कलाकार जो व्यापक अपील पैदा करते हैं, उसका भी एक मोल होता है, उससे भी एक आचार संहिता बनती है?  यह सच है कि चाहे असली हो या नकली हो, मौलिक हो या किसी और से लिए हुए हों, अमिताभ ने अपने किरदारों और अभिनय के ज़रिए एक दौर में हमारे समय के गुस्से को, हमारे जज़्बात को, अपनी लरजती आंखों और तड़कती आवाज़ से अभिव्यक्ति दी, लता मंगेशकर तो जैसे हमें जीना, गाना, हंसना-बोलना, रूठना-मनाना, मोहब्बत करना और उदास होना सिखाती रहीं. जिन छोटे शहरों में बड़ी और उदात्त कलाओं की पहुंच नहीं थी, वहां अमिताभ का सिनेमा और लता के गीत थे- हमारी बहुत सारी टूटनों के बीच ये हमें जोड़ते रहे, नफ़रत और सियासत, मज़हब और सरहद के पार जाकर इंसान होने का मोल भी सिखाते रहे, हमारे बहुत सारे ज़ख़्मों पर मलहम का काम करते रहे, यकीन दिलाते रहे कि दुनिया उतनी बुरी नहीं है जितनी कुछ लोगों के फितूर और जुनून की वजह से दिखती है.

बेशक, यह सब कल्पना के उस रोमानी परदे से छनकर आता था जो ज़माने की हक़ीक़त के आगे हम टांग दिया करते थे. लेकिन यह कल्पना न होती तो दुनिया शायद अपने सारे साधनों के बावजूद जीने लायक न होती. किसी कला का मोल यही है कि वह यथार्थ के समांतर भी एक प्रतियथार्थ, संसार के समांतर एक प्रतिसंसार रचती है और किसी कलाकार का भी मोल यही है कि वह अपनी उपस्थिति से बहुत सारी अरुचिकर उपस्थितियों को बेमानी और शायद सहनीय बनाता है. बाल ठाकरे की सारी कोशिशों के बावजूद मुंबई अगर दुराग्रह के टापू में नहीं बदली और हम सब के सपनों का शहर बनी रही तो इसलिए भी कि वहां अमिताभ बच्चन और लता मंगेशकर और बहुत सारे दूसरे कलाकार रहे.

लेकिन बाल ठाकरे की शान में कसीदे कढ़कर अमिताभ बच्चन ने उस सपने को जैसे एक झन्नाटे से तोड़ दिया है, वह जादुई शीशा चकनाचूर है जो लता मंगेशकर की आवाज़ बनाती रही और जिसमें हम सब अपना-अपना चेहरा, अपनी-अपनी खुशियों और उदासियों के साथ देखते रहे. हालांकि फिर दुहराने की ज़रूरत है कि व्यक्ति और कलाकार के बीच का जो विडंबनामूलक फासला है, ये शोक प्रस्ताव उसी की देन हैं. हम लता और अमिताभ की आलोचना नहीं कर सकते, आखिर उन्हें अपने ढंग से अपने मित्र चुनने का, उनके सुख में शामिल होने का, उनके दुख में अफसोस जताने का हक़ है. लेकिन हम कामना तो कर ही सकते हैं कि काश लता मंगेशकर ने ऐसे मौके पर अपने अनाथ होने के भाव को ऐसी सार्वजनिक अभिव्यक्ति न दी होती. उनके बहुत सारे प्रशंसक आज टूटे हुए हैं- वे अपनी दुनिया को कुछ मायूसी और अफ़सोस के साथ देख रहे हैं. वे समझ नहीं पा रहे कि हमारे लिए बहुलता और उल्लास के इंद्रधनुष बनाने वाली लता उस शख्स के लिए क्यों शोकाकुल हुईं जिसकी सारी राजनीति इस बहुलता के विरुद्ध थी.  उनका इंद्रधनुष आज टूटा हुआ है.   

फांसी का जश्न

मुंबई पर 26/11 के आतंकवादी हमले के दोषी अजमल कसाब को आखिरकार फांसी पर चढ़ा दिया गया. निश्चय ही, यह एक बड़ी खबर थी और उसकी विस्तृत कवरेज की उम्मीद थी. लेकिन न्यूज चैनलों और अखबारों ने उसे सिर्फ खबर भर नहीं रहने दिया और न ही उसे एक बड़ी खबर की तरह तथ्यपूर्ण, वस्तुनिष्ठ और संतुलित तरीके से कवर किया. इसके उलट कसाब को फांसी की जैसी अतिरेकपूर्ण और भावनात्मक विस्फोट से भरी कवरेज की गई, उससे ऐसा लगा कि जैसे देश ने कोई युद्ध जीत लिया हो. कसाब को फांसी की खबर चैनलों/अखबारों पर राष्ट्रीय जश्न और देशभक्ति के खुले इजहार के मौके में बदल गई.

लेकिन कसाब की फांसी की कवरेज में भावनाओं के उद्वेग और उन्माद में तथ्य और तर्क के साथ-साथ संतुलन और अनुपात बोध भी किनारे कर दिए गए. यूपीए सरकार के फैसले पर कई जरूरी सवाल नहीं पूछे गए, कई तथ्यों को अनदेखा कर दिया गया और उसकी जगह उन्मादपूर्ण जश्न ने ले ली. हालांकि न्यूज चैनल तो ऐसे भावुक और अतार्किक कवरेज के लिए पहले से बदनाम रहे हैं लेकिन इस बार अखबार भी देशभक्ति के प्रदर्शन में होड़ करते नजर आए. किसी फांसी पर समाचार माध्यमों में ऐसा सार्वजनिक जश्न हैरान करने वाला था. देश के सबसे बड़े समाचार समूह के संपादक पर देशभक्ति का ऐसा दौरा पड़ा कि उन्होंने पहले पृष्ठ पर ‘21/11 वंदे मातरम’ शीर्षक से जोशीला, शौर्यपूर्ण और लगभग युद्धगान करता संपादकीय लिख डाला.

ऐसा लगा जैसे अखबारों/चैनलों का वश चलता तो वे सार्वजनिक तौर पर किसी चौराहे पर कसाब को फांसी पर लटका देते. उन्हें फांसी की लाइव कवरेज न दिखा पाना जरूर खल रहा होगा. यही नहीं, अगर मौका मिलता तो कुछ देशभक्त संपादक/रिपोर्टर कसाब के फांसी के फंदे को खींचने के लिए भी तैयार हो जाते. असल में, अखबारों/चैनलों के इस अतिरेक और उन्मादपूर्ण कवरेज की पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार थी. यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कई सालों से कसाब और संसद पर हमले में दोषी करार दिए गए अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाने की सार्वजनिक मुहिम चल रही थी. खासकर हिंदुत्ववादी संगठनों ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ था. अखबारों और चैनलों में उनकी हां में हां मिलाती हुई ऐसी सुर्खियां अक्सर दिख जाती थीं जिनमें कसाब पर हो रहे करोड़ों रुपये के खर्च और उसे बिरयानी खिलाने की ‘खबरें’ होती थीं और जिनमें उसे जल्दी से जल्दी फांसी पर लटकाने की व्यग्रता और न्याय प्रक्रिया की लेट-लतीफी पर तंज साफ दिखाई देता था. हैरानी की बात नहीं है कि अखबारों/चैनलों पर कसाब की फांसी के बाद अब संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को जल्दी से जल्दी फांसी पर चढ़ाने की मुहिम शुरू हो गई है. लेकिन इस मुहिम में छिपे बारीक सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी रुझान को देखना मुश्किल नहीं है.  

आखिर अखबार/चैनल खून के इतने प्यासे क्यों हो रहे हैं? लेखक सैमुएल जानसन ने बहुत पहले लिखा था कि देशभक्ति लफंगों (और भ्रष्टों) की आखिरी शरणस्थली होती है. क्या अखबारों/चैनलों की इस अंध-देशभक्ति और उन्माद के पीछे भी एक कारण यह है कि उनके भ्रष्ट और आपराधिक अंडरवर्ल्ड का पर्दाफाश होना शुरू हो गया है? कहीं देशभक्ति के झंडे से वे अपने धतकरमों पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं? सवाल यह भी है कि यह देशभक्ति कहीं हिंदी अखबारों के डीएनए में पहले से मौजूद सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी रुझान से तो नहीं उमड़ रही है?

आखिर हालिया इतिहास इस बात का गवाह है कि रामजन्मभूमि और आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर सारे हिंदी अखबार सवर्ण-हिंदू अखबार हो गए थे और कुछ उसके मुखपत्र तक बन गए थे. उसने भारतीय समाज और राजनीति को जितना गहरा नुकसान पहुंचाया, लगता है अखबारों/चैनलों ने उससे कुछ नहीं सीखा है. 

‘संपादक बिजनेस भी लाएगा तो ऐसा ही होगा’

जी न्यूज और जी बिजनेस के संपादकों की गिरफ्तारी के दो पहलू हैं. एक तो नैतिक गड़बड़ी और दूसरा आपराधिक गड़बड़ी. नैतिकता का तकाजा है कि एक पत्रकार के तौर पर आपका आचरण पत्रकारीय आदर्शों के अनुरूप हो. दूसरा यह कि आपने जो काम किया है वह कानून की नजर में अपराध है या नहीं. जहां तक नैतिकता की बात है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि जी न्यूज और जी बिजनेस के दोनों संपादकों ने जो काम किया है उसे कतई सही नहीं ठहराया जा सकता. एक संस्थान का संपादक है जो किसी कंपनी या किसी व्यक्ति के विरुद्ध खबरें प्रसारित कर रहा है और बाद में उसी व्यक्ति से उसी विषय पर जाकर किसी तरह की बिजनेस डील करता है तो यह निश्चित रूप से गड़बड़ी की ओर इशारा करता है. यह गलत बात है. अगर कोई संपादक ऐसा करता है तो इसे परोक्ष तौर पर ब्लैकमेलिंग माना जाएगा.

दूसरी बात है कि दोनों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला बनता है या नहीं. जिंदल ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करवाया था. उन्होंने अपने आरोप के समर्थन में कोई सीडी भी दिखाई थी. यह दो अक्टूबर की बात है. फिर 27 नवंबर को पुलिस ने दोनों संपादकों को गिरफ्तार किया. पुलिस ने अपनी जांच के लिए करीब दो महीने का समय लिया. पहली नजर में ऐसा लगता है कि पुलिस ने सीडी और दूसरे तथ्यों की पूरी जांच करवाने के बाद ही गिरफ्तारी का कदम उठाया है. अब पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि उसने धाराएं सही नहीं लगाईं, रात में क्यों गिरफ्तार किया, गिरफ्तार करना भी चाहिए था या नहीं आदि. लेकिन ये सब कानूनी दांव-पेंच के मामले हैं और यह तय करना अदालत का काम है. निष्पक्ष रूप से अगर कहा जाए तो किसी ने किसी के खिलाफ एक आपराधिक आरोप लगाया और पुलिस ने उसकी जांच के बाद गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त जमीन पाई, लिहाजा उसने आरोपितों को गिरफ्तार किया. संयोग से ये दोनों लोग दो राष्ट्रीय चैनलों के संपादक थे. लेकिन इस आधार पर इन्हें कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता है.

चैनल की तरफ से कहा जा रहा है कि यह पत्रकारिता के लिए काला दिन है क्योंकि पुलिस ने उनके खिलाफ कार्रवाई की है. मेरा मानना है कि यह पत्रकारिता के लिए सचमुच काला दिन है, लेकिन मेरे लिए इसकी परिभाषा दूसरी है. दो राष्ट्रीय चैनलों के संपादकों पर इस तरह के आरोप लगना कि वे उगाही कर रहे थे यह बेहद शर्मनाक बात है. पुलिस की कार्रवाई को न तो मीडिया की आजादी पर हमला कहा जा सकता है न ही यह आपातकाल की पुनरावृत्ति है. यह कोरी बकवास है, इसे मीडिया पर सेंसरशिप के रूप में प्रचारित करना बहुत गलत बात है. मेरी राय है कि आरोपित संपादकों या जी न्यूज को अपने बचाव में यदि कुछ कहना है तो वे अदालत में अपना पक्ष रखें और खुद को अदालत में निर्दोष साबित करें. टेलीविजन पर अभियान चलाने से कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा. यह चैनल की अपनी व्याख्या है कि वे इसे आपातकाल के रूप में प्रचारित करें या मीडिया पर हमले के रूप में. लेकिन किसी संपादक का यह आचरण ही अपने आप में अक्षम्य और शर्मनाक है.

इस मामले में हमने देखा कि कंपनी ने जिस आदमी को संपादक बनाया है उसी को बिजनेस हेड भी बनाया है. यह हितों का घालमेल है. जब आप रोजमर्रा के बिजनेस का जिम्मा संपादक को देते हैं तो हितों का टकराव लाजिमी है. वही आदमी आपके लिए हर दिन राजस्व का भी जुगाड़ करेगा और वही दिन भर खबरें भी लाकर देगा आपको. यह घालमेल बुराई की तरफ ले जा रहा है. इस बात पर विचार करना होगा कि क्या यह कार्रवाई किसी संपादक के ऊपर की गई है जैसा कि चैनल प्रचारित कर रहा है. आप वहां संपादक की हैसियत से गए थे या बिजनेस मांगने गए थे, इन दोनों चीजों में अंतर करना होगा.

हाल के दिनों में हमने देखा कि इंडिया टीवी और एबीपी न्यूज के दो रिपोर्टर भी इसी तरह के मामले में गिरफ्तार हुए हैं. यह स्थिति खतरे का इशारा है. राष्ट्रीय स्तर के मीडिया में इस तरह की प्रवृत्ति और भी चिंतनीय है. जिला-गांव के स्तर पर इस तरह की शिकायतें पहले भी आती रही हैं. लेकिन वे न तो इतने प्रभावी माध्यम थे और न ही उन पर कोई ज्यादा ध्यान देता था. हम उन्हें नजरअंदाज करते आ रहे थे. यह संकट का समय है, कुछ ठोस कदम उठाने का समय है. प्रेस काउंसिल पूरी तरह से निष्प्रभावी संस्थान साबित हुआ है. वह तो खैर प्रिंट पत्रकारिता के लिए जिम्मेदार है. टेलीविजन पर निगरानी के लिए बनी एनबीएसए जैसी संस्थाएं वैसे तो काफी प्रभावशाली हैं लेकिन इनके पास संसाधन और शक्तियों का अभाव है. इसके निर्णय सिर्फ एनबीए के सदस्यों पर लागू होते हैं. सारे चैनल इसे मानने के लिए मजबूर नहीं हैं. अब एक ऐसी संस्था के बारे में विचार करने का समय आ गया है जो पूरी तरह स्वतंत्र, अधिकार संपन्न और आत्मनियंत्रित हो. यह किसी भी तरह के सरकारी या किसी अन्य हस्तक्षेप से मुक्त हो.  

2007 में उमा खुराना प्रकरण हुआ था. उसके बाद कुछ और घटनाएं सामने आईं जिससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चिंता जगी. इसी चिंता के नतीजे में एनबीएसए का गठन हुआ था. अपने दायरे में रहते हुए एनबीएसए ने बेहतरीन काम भी किया लेकिन सीमित अधिकारों के चलते यह बहुत मुखरता से काम नहीं कर पाता. यह सोचना होगा कि इसे संवैधानिक दर्जा कैसे दिलाया जाए. ऐसा करते समय हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह प्रेस काउंसिल जैसी संस्था न बन जाए. ऐसा नहीं है कि हमारे सामने मॉडल नहीं है. बीबीसी को ही लीजिए. यह एक ऑटोनॉमस बॉडी है. लेकिन सारा राजस्व सरकार देती है इसके बावजूद बीबीसी पूरी तरह से स्वायत्त बनी हुई है. तो इस तरह के कुछ मॉडलों पर हमें विचार करना होगा. यह समय की जरूरत है.
(अतुल चौरसिया से बातचीत पर आधारित)              

‘ठाकरे की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ करने की बड़ी वजह यह थी कि वे एक कलाकार थे’

महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के निधन के बाद बना माहौल ऐसा था जैसे पूरा राज्य शिवसेना से भयभीत है.
अरे, कैसा डर? यदि अंत्येष्टि के समय 20,000 पुलिसवालों की तैनाती डर की वजह से थी तो मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जिस व्यवस्थित तरीके से इस पूरे घटनाक्रम को संभाला गया है उसकी तारीफ की जानी चाहिए. हमने अंत्येष्टि के एक दिन पहले शिवसेना के नेताओं से बात की थी ताकि अगले दिन किसी भी तरह की हिंसा न हो. हमने इस दौरान काफी सावधानी बरतते हुए काम किया है.

इस बात पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि बाल ठाकरे की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ क्यों हुई जबकि उन पर दंगे भड़काने के आरोप लगे थे?
कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस सहित कई दलों के वरिष्ठ नेताओं ने हमसे यह अनुरोध किया था किक बाला साहब ठाकरे की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की जाए. उनका मत था कि हमें उन्हें एक राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि एक कलाकार और एक कार्टूनिस्ट होने के नाते राजकीय सम्मान देना चाहिए.

ठाकरे के जाने के बाद आप महाराष्ट्र की राजनीति में क्या बदलाव देखते हैं और इसका शिवसेना पर क्या असर पड़ेगा?
हमें पूरा भरोसा है कि अगले विधानसभा चुनावों में राज्य में एक बार फिर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार बनेगी. जहां तक शिवसेना की बात है तो बालासाहब ठाकरे के निधन से पार्टी को बहुत बड़ा झटका लगा है. भाजपा और शिवसेना के सदस्य पार्टी छोड़कर राज ठाकरे की मनसे के साथ जा सकते हैं. इस स्थिति में शिवसेना के वोट बंटना तय है.

लेकिन आपकी सरकार की तरफ देखें तो लगता है कि वहां भी बहुत समस्याएं हैं. कहा जा रहा है कि शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल को आपसे बहुत दिक्कत है और वे यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दे चुके हैं?
एनसीपी के यूपीए सरकार के साथ वैसे ही मतभेद थे जैसे कि गठबंधन सरकार में पार्टियों के एक-दूसरे से होते हैं. उन्हें इस बात पर आपत्ति थी कि उन्हें सरकार में महत्वपूर्ण पद नहीं मिले. हां, महाराष्ट्र में भी कुछ छोटे-मोटे मसले थे जिन पर उन्हें दिक्कत थी लेकिन यह आपको एनसीपी से ही पता चल जाएगा कि कम से कम इस वजह से वे सरकार से समर्थन वापस लेने वाले नहीं थे.

एनसीपी का आरोप है कि आप उसकी स्थिति कमजोर करने के लिए महाराष्ट्र की सिंचाई परियोजनाओं पर श्वेतपत्र लाने वाले हैं. यह भी आरोप है कि वायपी सिंह के शरद पवार का नाम (लवासा भूमि अधिग्रहण मामला) लेने के पीछे भी आपकी भूमिका है.
ये बेकार की बात है. श्वेत पत्र का क्या मतलब होता है? यह एक दस्तावेज है जिसका नाम हर देश के हिसाब से अलग-अलग होता है. महाराष्ट्र जैसे राज्य में जहां खेत-किसानी की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है, वहां सिंचाई परियोजनाओं से जुड़े मुद्दे हल होने चाहिए. इस मामले पर हमारी एनसीपी के साथ सहमति थी कि हम 10 दिसंबर तक सदन में श्वेत पत्र ले आएंगे. हमने जल संसाधन मंत्री से सभी सिंचाई परियोजनाओं और उनके लिए जरूरी फंड की विस्तृत सूची बनाने की बात कही थी. तो इस मामले में कोई भी विरोधाभास नहीं है. जहां तक अंजलि दमानिया और आईएसी की बात है तो वे आरटीआई एक्टिविस्ट मयंक गांधी के साथ मुझसे मिलने आई थीं. उनकी जमीन भी अधिगृहीत की गई है और वे इसके लिए आरटीआई लगाना चाहते हैं. उन्हें सारी जानकारी इस कानून के जरिए मिली है. इसमें कैसे गड़बड़ी हो सकती है? कांग्रेस और एनसीपी के बीच मतभेद जरूर हैं लेकिन हम यह भी जानते हैं कि एक-दूसरे से गठबंधन के बिना हमें राज्य में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. इसलिए हमें अपने मतभेद सुलझाने पड़ेंगे.

ऐसी भी खबरें हैं कि कांग्रेस और एनसीपी के बीच एक समझौता हो गया है. और अब आपको वापस दिल्ली बुलाया जाएगा?
देखिए, मैं बिल्कुल यहीं हूं. आपके सामने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में, और मुझे नहीं लगता कि मैं यहां से कहीं जाने वाला हूं.

गौरी भोंसले नहीं, संपादक कहाँ हैं?

एबीपी न्यूज इन दिनों लंदन की एनआरआई लड़की गौरी भोंसले को खोजने में जुटा हुआ है. चैनल के मुताबिक, लंदन से भारत के कोल्हापुर के लिए निकली गौरी भोंसले बीच में कहीं गुम हो गई. चैनल पर गौरी की गुमशुदगी के बारे में लगातार ‘ब्रेकिंग न्यूज’ और स्क्रोल भी चल रहा है जिसमें लन्दन पुलिस के एक अफसर के बयान से लेकर उसके बारे में कुछ जानकारियां भी शामिल हैं. दर्शकों से अपील की जा रही है कि अगर गौरी भोंसले दिखाई दे तो एक खास नंबर पर फोन करें. 

एबीपी न्यूज पर कई दिनों से चल रही इस सनसनीखेज ‘खबर’ के बीच ही अंग्रेजी के तीन बड़े अखबारों में यह ‘खबर’ छपी कि लंदन से गुम हुई गौरी भोंसले को सहारनपुर पुलिस ने देवबंद के पास एक गांव से बरामद कर लिया है. लेकिन इसके पहले कि यह ‘एक्सक्लूसिव खबर’ सभी चैनलों और अखबारों की सुर्खियों में छा जाती, यह पता चला कि देवबंद से बरामद लड़की न तो एनआरआई है और न ही गौरी भोंसले. वह गौरी भोंसले हो भी नहीं सकती थी क्योंकि सच यह है कि गौरी भोंसले नाम की कोई एनआरआई लड़की गुम नहीं हुई है. 

दरअसल, गौरी भोंसले एक काल्पनिक चरित्र है जो मनोरंजन चैनल ‘स्टार प्लस’ पर 12 नवंबर से शुरू होनेवाले धारावाहिक की मुख्य नायिका है. ‘स्टार प्लस’ का दावा है कि उसने इस धारावाहिक के प्रचार के लिए एबीपी न्यूज और बाद में कई और चैनलों पर चलनेवाले उस खबरनुमा विज्ञापन अभियान का सहारा लिया और दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश की. यह और बात है कि इस विज्ञापन अभियान से जिससे बहुतेरे दर्शक और यहां तक कि अखबार भी धोखा खा बैठे और गौरी भोंसले की गुमशुदगी की कहानी को सच्ची मान बैठे, वह कभी विज्ञापन की तरह नहीं दिखा.

तथ्य यह है कि एबीपी न्यूज पर उसे खबर की तरह गढा, पढ़ा और पेश किया गया. चैनल के एंकर ने उसे उसी शैली में पढ़ा और पेश किया जिस शैली में बाकी ब्रेकिंग न्यूज पेश की जाती है. साफ़ तौर पर यह विज्ञापन नहीं बल्कि पेड न्यूज था और चैनल ने विज्ञापन को ‘खबर’ की तरह दिखाकर अपने दर्शकों के साथ धोखा किया है. उनके विश्वास को तोडा है. उन्हें बेवकूफ बनाया है. कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे प्रकरणों से दर्शकों का चैनलों और उनकी ब्रेकिंग न्यूज में भरोसा कम होगा. ऐसे ही चला तो ब्रेकिंग न्यूज जल्दी ही ‘ब्रोकरिंग न्यूज’ (खबर दलाली) बन जाएगी. 

सच पूछिए तो इस प्रकरण ने गौरी भोंसले से ज्यादा चैनलों में संपादक की गुमशुदगी और मार्केटिंग/सेल्स मैनेजरों के बढ़ते दबदबे को उजागर किया है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि खबर में विज्ञापन की सीधी घुसपैठ ने संपादक नाम की संस्था को बेमानी बना दिया है. इससे यह भी पता चलता है कि खबर और विज्ञापन के बीच राज्य और चर्च की तरह की स्पष्ट और मजबूत विभाजक दीवार मुनाफे के दबाव में ढह चुकी है और इस प्रक्रिया में संपादकों को न सिर्फ मूकदर्शक बल्कि भागीदार भी बना दिया गया है. आखिर गौरी भोंसले की गुमशुदगी का ‘पेड न्यूज’ चैनल के एंकर ही पढ़ते नजर आते हैं. 

यह इस मायने में खतरनाक संकेत है कि पेड न्यूज के कारोबारियों ने न्यूज चैनल के साथ-साथ उनके संपादकों की बची-खुची साख और विश्वसनीयता को भी दांव पर लगाना शुरू कर दिया है. अगर संपादक अब भी न चेते तो गौरी भोंसले के उलट सचमुच में गुम हो जाएंगे.

‘मैं सशक्तीकरण को महसूस कर सकती हू’

इस क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

पढ़ाई के दिनों की बात है. एक दिन कहीं जा रही थी तो रास्ते में गांव की कुछ महिलाएं मिल गईं. ये झारखंड जंगल बचाओ नामक एक आंदोलन की बैठक में शामिल होने जा रही थीं. उन्होंने मुझसे भी साथ चलने को कहा. उत्सुकतावश मैं चल दी. बैठक खूंटी में ही थी. वहां पर अपने जल, जंगल और जमीन जैसी चीजों को बचाने के प्रति लोगों का जुनून मेरे दिल को छू गया. यहीं से मैं इस अभियान के साथ जुड़ गई. फिर एक दिन पता चला कि इंडिया अनहर्ड नामक एक संस्था के लिए पूरे भारत से वीडियो स्वयंसेवक मांगे गए हैं. मैंने आवेदन भेजा जो स्वीकार हो गया. उसके बाद थोड़ी-सी ट्रेनिंग हुई, एक कैमरा मिला और काम शुरू हो गया.

इसके बाद क्या बदलाव महसूस हुआ?

सशक्तीकरण महसूस किया है मैंने. एक उदाहरण बताती हूं. हमारे यहां निर्दोष गांववालों को नक्सली करार देकर उन्हें हिरासत में लेने की घटनाएं होती रहती हैं. कुछ समय पहले थाने से पुलिस आई और हमारे गांव के दो लोगों को नक्सली बताकर ले गई. मैं अपने कैमरे के साथ थाने पहुंची. पुलिस से बात करने की कोशिश की. पुलिसकर्मियों ने बात तो नहीं की, लेकिन इतना जरूर हुआ कि उन ग्रामीणों को छोड़ दिया गया. मुझे लगता है कि मैं उपेक्षितों की आवाज बन गई हूं.

-विकास बहुगुणा

'हर विश्वास को तर्क, तथ्य और वैज्ञानिक अनुभवों की कसौटी पर कसें"

आप जादूगर थे. फिर तर्कवाद की तरफ कैसे मुड़ गए?

तीस साल से भी ज्यादा समय तक मैं जादूगर रहा. इस दौरान मैं ऐसे कई भोले लोगों से मिला जो मेरे करतब देखकर सवाल करते थे कि क्या मैं किसी पंथ या संप्रदाय का हिस्सा हूं. आजकल ऐसे कई गुरु हैं जो हाथ की सफाइयों को ईश्वर का चमत्कार बताते हैं. वे मुझे ऐसा ही कोई समझ लेते. मैं उन्हें बार-बार समझाता कि यह सब तो बस भ्रम है, आंखों का धोखा है. लेकिन उन्हें इस पर यकीन ही नहीं होता. इसलिए 60 साल की उम्र में रिटायर होने के बाद मैंने यह फैसला किया कि मैं अब बाकी का जीवन अपने पेशे से जुड़े झूठ को दूर करने में लगाऊंगा.

आप हर चीज को संशय के साथ देखने की बात करते हैं, लेकिन शंका की सीमा क्या हो? क्या हमें विज्ञान को भी उतने ही संशय के साथ नहीं देखना चाहिए?

बिल्कुल, अगर किसी भी तरह के विज्ञान का इस्तेमाल लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए हो रहा हो तो आपको जरूर इस पर संशय होना चाहिए. लेकिन परिभाषा के हिसाब से विज्ञान उन सिद्धांतों के हिसाब से काम करता है जो अनुभवजन्य होते हैं. विज्ञान जब कोई बात कहता है तो उसके पीछे एक तर्क होता है जिसकी प्रायोगिक रूप से व्याख्या भी की जा सकती है. यह ज्ञान की एक ऐसी उन्नतिशील शाखा है जो कई सदियों में विकसित हुई है. उन्नतिशील से मेरा मतलब यह है कि विज्ञान को नए साक्ष्य मिलते हैं तो यह पुराने विचारों को छोड़कर नए विचारों को अपना लेता है. यह धार्मिक सिद्धांतों के उलट है जो बदलते नहीं. उल्टे इनमें और विचार जोड़े जाते रहते हैं ताकि आखिर में आपके पास एक जटिल कहानी हो. विज्ञान कई चीजों के बारे में बता सकता है और कई चीजों का भंडाफोड़ भी कर सकता है. इसलिए आप इसे अविश्वास की नजर से देखेंगे तो ऐसा आप अपने जोखिम पर ही करेंगे. जब तक आप अपने दावों के समर्थन में सबूत पेश कर सकें तब तक कोई समस्या नहीं है.

लेकिन कुछ सबूत ऐसे होते हैं जिनकी पुष्टि अनुभवजन्य तरीकों द्वारा नहीं की जा सकती. जैसे टू पाई आर फॉर्मूला किसी वृत्त की परिधि और त्रिज्या का संबंध बताता है. लेकिन प्रकृति में ऐसा कोई वृत्त नहीं पाया जाता जिस पर यह फॉर्मूला फिट होता हो. यह सिर्फ ज्यामिति या गणित की दुनिया में होता है.

ये दो बिल्कुल अलग मामले हैं. हो सकता है हमारे ब्रह्मांड में कोई आदर्श वृत्त न हो, लेकिन यह फॉर्मूला आपको दो चीजों के बीच एक निश्चित पारस्परिक संबंध तो बताता ही है. 

लेकिन न्याय, कला, प्रेम आदि जैसी कई दूसरी चीजें भी हैं जिनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकती?

ऐसा तभी हो सकता है जब आप ऐसा मान लें. एक जादूगर जो करतब दिखाता है उनके पीछे भी विज्ञान छिपा होता है. लेकिन आप यह भी मान सकते हैं कि मैं झूठ कह रहा हूं. दरअसल यकीन बड़ी ताकतवर चीज है. यह इसके बूते ही हो पाता है कि लोग ऐसी चीजों की भी कल्पना कर लेते हैं जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता.

कुछ वैज्ञानिक इस बात पर अड़े हैं कि उनकी नई खोजों को अमेरिका की न्यायिक व्यवस्था में शामिल कर लिया जाना चाहिए. आप इस पर क्या कहेंगे?

कई लोगों को अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की आदत होती है. ये भी ऐसे ही हैं. अगर आप यह कह रहे हैं कि विज्ञान नैतिकता के लिए किसी तरह का आधार हो सकता है तो मैं इससे असहमत हूं.  हालांकि पूरी तरह से नहीं. कानून में नैतिक मूल्यों को फिट करना बहुत ही पेचीदा काम है. हमें एक-दूसरे के साथ कैसे रहना है, यह हमने लाखों साल तक चली एक प्रक्रिया के बाद सीखा है. इसके बाद हमने मूल्यों की एक व्यवस्था बनाई है  जिसके हिसाब से हम यह तय करते हैं कि किस परिस्थिति में कौन-सा आचरण सही होगा और कौन-सा गलत. क्रमिक विकास की लंबी प्रक्रिया के चलते यह सब शायद हमारे डीएनए में ही आ गया है. वे आचरण और कदम, जो हमारे लिए आत्मघाती थे, क्रमिक विकास की प्रक्रिया ने कुछ दूसरी बेहतर चीजों के लिए आखिरकार उन्हें छोड़ दिया. यही वजह है कि हमारे यहां लड़ाई को बुरा माना जाता है क्योंकि लड़ने की स्थिति में हम एक-दूसरे को मिटाने की तरफ बढ़ते हैं जो कि एक ही प्रजाति से होने के नाते हमारे हित में नहीं है.  लेकिन फिर एक दूसरी चीज भी है और वह है जीवन को बचाए रखना. सारे जीवित प्राणियों में उत्तरजीविता की यह प्रवृत्ति होती है. जब भी जीवन खतरे में होगा तो नैतिकता कभी-कभी किनारे रख दी जाएगी. तो अपने कानूनी ढांचे का इन सब बातों से तालमेल बिठाना एक फिसलन भरा रास्ता हो जाता है. ऐसे में हम बस इंतजार ही कर सकते हैं कि समाज और परिपक्व हो और तब इस पर कोई फैसला ले.

आपके हिसाब से वह कौन-सा विचार है जो दुनिया को बदल सकता है?

अभी भी दुनिया में बहुत-से लोग हैं जो किसी भी चीज पर सहज ही विश्वास कर लेते हैं. एक बड़ी आबादी को अभी यह समझाने की जरूरत है कि किसी भी चीज पर भरोसा करने से पहले खूब सावधानी बरतें. हर विश्वास को तर्क, तथ्य और वैज्ञानिक अनुभवों की कसौटी पर कसें. हर चीज पर सवाल उठाएं, शंका जताएं क्योंकि जीवन बस एक बार ही जिया जाता है और आपके पास बस यही मौका है.

‘वन्य प्रजातियों के संरक्षण के लिए लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करने में भी कोई बुराई नहीं है’

किस चीज ने आपको इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया?

पर्यावरणप्रेमी आम तौर पर युवावस्था में ही इसकी तरफ आकर्षित हो जाते हैं. प्रकृति के प्रति मेरे मन में शुरू से ही जिज्ञासा थी. इसी कारण मैं अलास्का यूनिवर्सिटी में स्नातक की पढ़ाई के लिए गया. वन्यजीवन के समीप रहते हुए इस पर निगरानी रखने के लिए अलास्का बिल्कुल उपयुक्त स्थान है. इस तरह से मैंने इस क्षेत्र में शुरुआत की.

आपके मुताबिक ऐसा कौन-सा विचार या तरीका है जो इस क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है?

मौजूदा हालात में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती लोगों के विचार में सामुदायिक स्तर पर परिवर्तन लाने की है. अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि कोई संरक्षणवादी, सरकार या कार्यकर्ता चाहे जितनी मेहनत कर ले, वन्यजीव पर्यावासों के भीतर रहने वाले समुदायों को जागरूक किए बिना समाधान दूर की कौड़ी बना रहेगा. आज पूरी दुनिया के लगभग 85 फीसदी वन्यजीव पर्यावासों के भीतर लोग जीवों के साथ रह रहे हैं. हमें इन्हें विश्वास में लेना होगा. एक बात और, इनके विस्थापन का कोई सार्वभौमिक सूत्र नहीं हो सकता क्योंकि हर इलाके के लोगों की समस्या बिल्कुल अलग है और उनके समाधान बिल्कुल अलग हैं.

किसी प्रजाति विशेष का संरक्षण करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका क्या है?

हमारी तमाम तकनीकी उन्नति के बावजूद हमें आज भी इस बात का कोई ज्ञान नहीं है कि हमारा पारिस्थितिकी तंत्र किस तरह से काम करता है. हर चीज आपस में गुंथी हुई है. हाथियों की आबादी में गिरावट का बुरा प्रभाव उसके आप-पास की पारिस्थितिकी पर पड़ेगा, पर हमें आखिर तक नहीं पता चल पाता कि इसका असर किस रूप में हमारे सामने आएगा. भारत में सरकार एक बार फिर से चीता को लाने की तैयारी कर रही थी. वे ईरानी चीते को भारत में लाना चाहते थे. अच्छा हुआ कि ईरान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. दुनिया में सिर्फ 50-60 एशियाई ईरानी चीता बचे हुए हैं. मुझे विश्वास है कि यह योजना औंधे मुंह गिरती. 8-10  जो भी चीते यहां लाए जाते उन्हें यहां के तेंदुए आदि मार गिराते. हालांकि कुछ विशेष प्रजातियों के संरक्षण के लिए आर्थिक मदद इकट्ठा करना आसान है. मसलन हिम तेंदुए के लिए फंड इकट्ठा करना किसी जोंक के संरक्षण से कहीं ज्यादा आसान होगा. व्यक्तिगत रूप से भी मैं जोंक के बजाय हिम तेंदुए के लिए काम करने को तरजीह दूंगा. अगर प्रजातियों के संरक्षण के लिए लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल किया जाता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है.

विलुप्त हो चुकी प्रजातियों को वैज्ञानिक तरीकों से पुन: तैयार करने के जो प्रयास चल रहे हैं, आप उनका समर्थन करते हैं? मसलन मैमथ को लें.

देखिए, हमारे पास पहले से ही उन प्रजातियों के संरक्षण की बड़ी चुनौती है जो इस समय धरती पर मौजूद हैं. ऐसे में विलुप्त हो चुकी प्रजातियों को फिर से जिंदा करने का विचार मेरे ख्याल से मूर्खतापूर्ण है विशेषकर मैमथ का, जो साइबेरिया के निर्जन बर्फीले इलाके में पाया जाता था. आज इस इलाके की आधी से ज्यादा बर्फ पिघल चुकी है. टुंड्रा धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है. तो आप मैमथ को रखेंगे कहां?

भारत में संरक्षण की राह में आने वाली अड़चनें कौन-सी हैं?

सबसे निराश करने वाली बात है वन्यजीव संरक्षण अभियानों के लिए फंड का अभाव. तमाम प्रतिभाशाली भारतीय विदेशों में जाकर संरक्षण से जुड़ी पढ़ाई करते हैं और जब वे यहां वापस लौटते हैं तो उन्हें बहुत कम पैसे में काम करना पड़ता है. पैंथेरा नाम का एक संगठन इस दिशा में काम कर रहा है. यह उन लोगों की आर्थिक मदद करता है जो पूरे समर्पण के साथ बड़ी बिल्लियों को बचाने के काम में लगे हुए हैं.

प्रजातियों के संरक्षण के अलावा क्या इसका कोई राजनीतिक प्रभाव भी है?

बिल्कुल, इस दिशा में कुछ प्रयास हो रहे हैं जिनसे काफी उम्मीदें जगती हैं. इसे ट्रांस फ्रंटियर रिजर्व के नाम से जाना जाता है. तमाम ऐसे वन्यजीव अभयारण्य हैं जो एक से ज्यादा देशों में फैले हुए हैं. उदाहरण के तौर पर मानस राष्ट्रीय अभयारण्य को लीजिए, यह असम और भूटान में फैला हुआ है. ऐसी हालत में हम दोनों देशों को आपस में सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. ऐसे अभयारण्यों को हमने पीस पार्क का नाम दिया है. सैद्धांतिक रूप से अरुणाचल प्रदेश की वन्य संपदा के संरक्षण के लिए भारत और चीन को मिलकर काम करना चाहिए. मैं पामीर अंतरराष्ट्रीय पीस पार्क के गठन से जुड़ा रहा हूं. यह चार देशों- पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान और चीन- में फैला हुआ है. जब इन देशों को पता चलेगा कि ये तरीके उनके अपने हित में हैं तो लोग आपस में सहयोग बढ़ाएंगे.

संरक्षण के बारे में भारत चीन से क्या सीख सकता है?

चीन संरक्षण के क्षेत्र में बढ़िया काम कर रहा है. उसने पिछले 30 साल में 2,000 वन्यजीव अभयारण्य बनाए हैं. उन्होंने तमाम प्रजातियों के शिकार को प्रतिबंधित कर दिया है. शिकार के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया है. चिरू (तिब्बती हिरण) के शिकार पर 5-15 साल की सजा हो सकती है. भारत को आत्ममंथन की जरूरत है. उसे सीखना पड़ेगा कि सरिस्का जैसे इलाकों से बाघ पूरी तरह गायब क्यों हो गए. कभी-कभी समस्या बहुत आसान होती है. गार्ड ने लापरवाही की और शिकारियों को मौका दे दिया. मुझे नहीं लगता कि इस तरह की समस्या से निपटना भारत सरकार के लिए कठिन है.

आपने तिब्बत और अफगानिस्तान में दुनिया के कुछ सबसे बड़े वन्यजीव रिजर्व स्थापित किए हैं. भारत के लिए भी कोई योजना है?

मेरे हिसाब से भारत में पहले से ही कुछ बेहद जुनूनी और प्रतिभाशाली लोग वन्यजीव संरक्षण के काम में लगे हुए हैं. मेरे मित्र उल्लास कारंत भारतीय वन्यजीव संरक्षण सोसाइटी के निदेशक हैं. वे बाघों के संरक्षण के लिए बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं. मैं उनके काम करने के तरीके में बिना वजह कोई अड़चन नहीं डालना चाहता हूं.

आपके लिहाज से संरक्षण का सबसे बढ़िया तरीका क्या है?

इतने सालों तक काम करने के बाद मैंने पाया है कि प्रजातियों के संरक्षण का कोई एक सार्वभौमिक तरीका नहीं हो सकता है. जैसा कि मैंने पहले बताया है कि कुछ प्रजातियों से इंसान का लगाव बहुत ज्यादा होता है. ऐसे में उनके साथ होने वाली किसी भी गड़बड़ी पर तत्काल ही लोगों का ध्यान चला जाता है. हमें लोगों के अंदर परिवर्तन लाना होगा. जीव संरक्षण को अध्यात्म से जोड़ना होगा. चमड़े और फर के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने की जरूरत है. जरूरत से ज्यादा उपभोग की आदत में कमी लानी होगी क्योंकि इससे जंगलों पर असर पड़ रहा है. जंगल कट रहे हैं और उनमें रहने वाली प्रजातियां संकट में घिर गई हैं.

आस्था बनाम तर्क

आपसे शुरुआत करती हूं सद् गुरु. आपको सांप, एसयूवी, मोटरसाइकिल, हेलिकॉप्टर, रोमांचकारी यात्राएं जैसी चीजें प्रिय हैं. दूसरी तरफ आप सद् गुरु भी हैं. भौतिकता और अध्यात्म, ये दोनों चीजें साथ कैसे चलती हैं?

सद् गुरु जग्गी वासुदेव– सबसे पहले तो मैं आपकी बात में यह सुधार कर दूं कि मुझे सांपों, मोटरसाइकिलों, हेलिकॉप्टरों से कोई प्रेम नहीं है. ये सब बातें तो लोग मेरे बारे में कहते हैं. वास्तव में मेरा प्रेम और जुड़ाव जीवन के प्रति है. मैं कोई भी चीज तब तक नहीं कर पाता जब तक मैं उसमें पूरी तरह खो न जाऊं. जीवन को जानने के लिए उससे पूर्ण जुड़ाव जरूरी है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप व्यापार से संबंध रखते हैं या संगीत से या कला से या फिर अध्यात्म से. अगर इन चीजों से आपका जुड़ाव नहीं है तो आपको इनसे कोई आनंद नहीं मिलेगा. 

अध्यात्म का लक्ष्य हमारे यहां माना जाता रहा है कि आदमी को भौतिक चीजों से हटाया जाए. उसे इनकी सीमा समझाई जाए. लेकिन आप बिल्कुल उलट बात कहते हैं.

सद् गुरु- यह धारणा कि अध्यात्म का मतलब है इच्छा से मुक्ति, पहले इसे समझें. अगर आप खाने की इच्छा करते हैं, पैसे की इच्छा करते हैं, जमीन के एक टुकड़े की इच्छा करते हैं, तो यह लालच नहीं है. यह इच्छा का क्रमिक विकास है. पांच साल की उम्र में आपने जो इच्छा की होगी उसका आपके 10 साल का होने पर कोई मतलब नहीं रहा. धीरे-धीरे यह विकास होता है और फिर आप आखिर में समझ जाते हैं कि आप जो भी करें, आपको एक दिन खत्म होना है. फिर आपके मन में सवाल उठता है मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है. तो यह इच्छा से अलग होना नहीं है. यह इच्छा को एक संभावना तक पहुंचाने की बात है.

आप पिछले जन्म में यकीन करते हैं. हमारे साथ जेम्स रैंडी भी हैं जो इन सब चीजों के बारे में कहते हैं कि यह सब दिमाग को छलने का खेल है. क्या यह दिमाग की कंडिशनिंग यानी अनुकूलन का खेल है?

सद् गुरु- ऐसा नहीं है. जब आप पैदा हुए थे तो आपका आकार बहुत छोटा था. फिर इसमें संचय होता गया और आपका स्वरूप आज ऐसा है. तो आप जिसे अपना शरीर कहते हैं वह बस एक तरह का संचय है. इसी तरह जिसे आप अपना दिमाग कहते हैं वह भी कई तरह के प्रभावों का एक ढेर है जो एक तय समय के दौरान इकट्ठा हुआ है. तो आपका शरीर और दिमाग, दोनों ही एक तरह का संचय हैं. जहां तक पिछले जन्म, इस जन्म आदि का सवाल है तो मैं लोगों से कहता हूं कि इन चीजों पर यकीन न करें. लेकिन मैं यह भी कहता हूं कि इन चीजों को बिल्कुल नकारने की मूर्खता भी न करें. आप मैं नहीं जानताका महत्व नहीं समझते. इसका मतलब है अगाध संभावना. जब आप यह मानेंगे कि मैं नहीं जानता तभी आपके कुछ जानने की संभावना पैदा होगी. जब आप किसी को आध्यात्मिक कहते हैं तो आप उसको अन्वेषक या खोजने वाला कहते हैं. खोज कौन सकता है? वही जिसे अहसास होगा कि वह नहीं जानता.

जावेद जी, हम एक देश में रहते हैं जहां कई तरह की आस्थाएं और विश्वास प्रचलित हैं. आप एक तर्कवादी हैं. लेकिन आपको नहीं लगता कि अगर आस्था की कोई सीमा है तो तर्क की भी सीमा हो सकती है?

जावेद अख्तर- पहले हम यह समझें कि आस्था क्या है. आस्था और विश्वास में क्या फर्क है. मुझे विश्वास है कि मैं गोवा में हूं. मुझे विश्वास है कि उत्तरी ध्रुव नाम की एक जगह है. क्या यह मेरी आस्था है? नहीं. क्यों? क्योंकि इसके पीछे एक कारण है. कोई भी चीज जिसमें तर्क, कारण, सबूत और गवाह जैसी कोई चीज नहीं होती वह है आस्था. और इसलिए मुझे हैरत होती है कि आस्था और मूर्खता में क्या फर्क है क्योंकि मूर्खता की भी यही परिभाषा है. मैं आपकी बात मानने के लिए तैयार हूं, लेकिन इसके पीछे कोई तर्क होना चाहिए, कोई कारण होना चाहिए. आप मुझे बता रहे हैं कि मेरा शरीर और दिमाग बस एक संचय है और मैं यह नहीं हूं. यह ऐसा ही है कि आप प्याज की तलाश में प्याज को छीले जा रहे हैं. वे परतें जिन्हें आप छील रहे हैं वे ही प्याज हैं. यह संचय ही मैं हूं. अगर आप यह संचय हटा देते हैं तो मेरा कोई वजूद ही नहीं है.

जावेद साहब, मैं एक बार फिर से आपका ध्यान तर्क की सीमा की तरफ खींचना चाहूंगी. हमारे यहां रामानुजन नाम के एक मशहूर गणितज्ञ हुए हैं जो गणित की कई समस्याओं के हल तक बिना किसी तार्किक चरण के ही पहुंच जाते थे. यह उनका सहज ज्ञान था. क्या आपको नहीं लगता कि बुनियादी ज्ञान के परे भी कोई चीज है?

जावेद अख्तर- बिल्कुल है. लेकिन इसमें आध्यात्मिक जैसा कुछ नहीं है. आप पूरी रफ्तार से घूमते हुए किसी पंखे को देखें. आपको इसके ब्लेड दिखाई नहीं देंगे. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे ब्लेड हैं ही नहीं. हो सकता है कि आप बिजली की गति से सोच रहे हैं और इसमें आप कई चरण लांघकर किसी हल तक पहुंच जाएं. लेकिन जब आप आराम से इसका विश्लेषण करेंगे तो आप पाएंगे कि अगर आप समाधान तक पहुंचे हैं तो इसका रास्ता कुछ निश्चित चरणों से होकर ही जाता है.

 लेकिन रामानुजन कहते थे कि वे ऐसा देवी की कृपा से कर पाते हैं.

जावेद अख्तर- अरे भाई, वे भी एक इंसान ही थे और जरूरी नहीं कि इंसान हर बार सही ही हो.

लेकिन जावेद साहब, आपको ऐसा नहीं लगता कि आस्था कई बार इंसान को अलग-अलग क्षेत्रों में महानता की तरफ ले जाती है?

जावेद अख्तर- बिल्कुल, इसमें कोई शक नहीं है. आस्था इंसान से बहुत अच्छे काम करवा सकती है. और बहुत बुरे भी. ये आत्मघाती हमलावर आस्था वाले ही लोग हैं. अगर वे तर्कशील होते तो ऐसा नहीं करते. तो आस्था एक अंधा रास्ता है. आस्था आपके दिमाग को आपसे छीन लेती है. इसलिए आप या तो बहुत अच्छा काम करते हैं या बहुत बुरा. दोनों ही परिस्थितियों में आपका दिमाग आपके बस में नहीं होता.

आप तर्क में यकीन रखने वाले लोगों के बारे में क्या कहेंगे? मसलन साम्यवादियों या कम्युनिस्टों के बारे में.

जावेद अख्तर- वे तर्कवादी नहीं हैं, वे साम्यवादी हैं. वे साम्यवाद पर विश्वास करते हैं और उन्होंने इसे अपनी आस्था बना लिया है. यह भी धार्मिक होने जितना ही बुरा है.

तो फिर आप कैसे रहें? अगर आपको प्रचलित विश्वासों के हिसाब से नहीं जीना है तो आप कैसे जिएंगे?

जावेद अख्तर- कॉमन सेंस यानी व्यावहारिक बुद्धि से जीने में क्या दिक्कत है?

विज्ञान भी कहता है हम ब्रह्मांड का पांच फीसदी ही समझ पाए हैं. इसके बाहर क्या है इसके बारे में कई विश्वास प्रचलित हैं. आपको इसमें कोई परेशानी नहीं है. तो फिर जब तक कोई हल नहीं मिल जाता, लोगों को उनके विश्वास के हिसाब से जीने देने में क्या दिक्कत है? उन विश्वासों से उनके दुख कम होते हैं. उन्हें तसल्ली मिलती है.

जावेद अख्तर- वे अनुमान हैं, विश्वास नहीं हैं. सद् गुरु ने बिल्कुल ठीक कहा कि आपमें इतनी नम्रता होनी चाहिए कि आप यह मानें कि कई चीजें हैं जिनके बारे में आप नहीं जानते. तभी आप कुछ खोज पाएंगे. लेकिन धर्म के साथ दिक्कत यह है कि इसके पास हर चीज का जवाब होता है. यह आपको बता सकता है कि संसार कैसे बना. इस जन्म से पहले आप कहां थे. इसके बाद कहां होंगे. तो धर्मों के पास सारे जवाब होते हैं और यही समस्या है. 

 सद् गुरु, जब आप कहते हैं कि आध्यात्मिक व्यक्ति को अन्वेषी होना चाहिए तो गुरुओं के पास ही सारे जवाब क्यों होते हैं?

सद् गुरु- गुरु जवाब नहीं देते. वे रास्ता बताते हैं. रही दिमाग की बात तो इसमें जो डेटा या जानकारी होती है वह कैसे आती है? इसे आप अपनी पांच इंद्रियों के जरिए जमा करते हैं. लेकिन ये पांच इंद्रियां भी आपको धोखा दे सकती हैं. जैसे अगर मैं यह मेज छू लूं तो यह मुझे ठंडी लगेगी. लेकिन यदि मैं अपने शरीर का तापमान गिरा लूं तो यही मेज मुझे गर्म लगेगी. यह मुझे वही सूचना देगी जो मेरे जीवित रहने के लिए जरूरी है. अगर जीवित रहना ही आपका उद्देश्य है तो इन इंद्रियों पर निर्भर रहना ठीक है. लेकिन अगर आप इसके परे जाना चाहते हैं तो आपको अपने अनुभव का दायरा आगे ले जाना होगा. तो पूरी आध्यात्मिक प्रक्रिया का संबंध इसी सवाल से है कि अपने अनुभव का विस्तार कैसे किया जाए. अगर आपको वास्तविकता जाननी है तो आपको अपने अनुभव का दायरा बढ़ाना होगा. आप इतिहास में देखें. लोग मानते थे कि दुनिया सपाट है. किसी ने कहा कि यह गोल है, उसकी जान ले ली गई. लोग जमीन पर चलते थे, किसी ने कहा कि मैं उड़ सकता हूं. उसकी जान को आफत हो गई. लोगों का यह विश्वास कि जो मैं नहीं जानता वह है ही नहीं, यह अज्ञान की पराकाष्ठा है.

 जावेद साहब, आप इस पर क्या कहेंगे? इतिहास के हर दौर में उन लोगों ने वास्तविकता की सीमा का विस्तार किया है जिनका किसी ऐसी चीज में विश्वास था जो तब तक मौजूद ही नहीं थी.

जावेद अख्तर- ऐसा नहीं है. देखिए, अध्यात्म सिखाने वाला कोई व्यक्ति सबसे पहले यही करता है कि वह आपकी पांच इंद्रियों पर से आपका विश्वास डिगा देता है. तभी वह आपको नियंत्रित कर सकता है. आप किसी व्यक्ति को लीजिए. उसका ऑपरेशन करके उसके दिमाग का कनेक्शन काट दीजिए और फिर देखिए कि वह अपने अनुभव का विस्तार कैसे करता है. जो भी विस्तार होना है वह आपके दिमाग में होना है. आप अपने दिमाग को कम मत समझिए. अगर कोई व्यक्ति आपसे कह रहा है कि आप अपने दिमाग को कम समझें तो वह आपके साथ बड़ा खतरनाक खेल-खेल रहा है. दिमाग न हो तो आपके पास विवेक ही नहीं होगा. फिर आप कैसे समझेंगे कि जो वह कह रहा है वह सही है या गलत. वह व्यक्ति तो अपना दिमाग इस्तेमाल कर रहा है लेकिन वह यह नहीं चाहता कि आप अपने दिमाग का इस्तेमाल करें. हर विचार दिमाग से आता है. अगर आप यह भी सोचें कि दिमाग ही सब कुछ नहीं है तो यह विचार भी दिमाग से आता है. आप अपने दिमाग पर यकीन नहीं करेंगे तो दूसरे के दिमाग पर यकीन कैसे करेंगे.

 लेकिन एक कलाकार होने के नाते आपको नहीं लगता कि छठी इंद्रिय जैसी भी एक चीज होती है?

जावेद अख्तर- आप इस बात को समझें कि हमारा दिमाग हमारे घर की तरह है. चेतन मस्तिष्क इसका ड्राइंग रूम है. लेकिन इसमें और भी कई कमरे होते हैं जिन्हें आप उतना ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते, मगर करते जरूर हैं. कुल मिलाकर हर विचार इसी दिमाग से आना है.     

‘माहौल को बदलकर आप लोगों की जिंदगी सुधार सकते हैं’

महामारी फैलाने वाले संक्रामक तत्वों को पहचानने के लिए जिन यंत्रों की जरूरत होती है वे सुलभ और सस्ते हो रहे हैं. अब असल चुनौती तो बीमारियों के स्रोत तक पहुंचने की है जिसका संबंध उस समय के साथ होता है जब आप एक छोटे-से बच्चे थे. कभी-कभी तो इसका लेना-देना इससे भी पहले की अवस्था से होता है. असल चुनौती यह समझने की भी है कि कैसे आप पर उम्र भर पड़ने वाले प्रभाव इंसान के तौर पर आपकी मिट्टी और विज्ञान की भाषा में कहें तो जीनों में बदलाव ले आते हैं.

जब हमने मानव शरीर की सबसे छोटी इकाई यानी जीनों की कुंडली बनाने की परियोजना पर काम शुरू किया था तो हमने सोचा था कि इससे हमें इस पहेली का जवाब मिल जाएगा कि इंसान जैसा है वैसा वह क्यों है. लेकिन जैसे-जैसे हम गहराई में उतरते गए हमें पता चला कि सबसे अहम चीज जीनों की कुंडली नहीं बल्कि वह प्रक्रिया है जिसके तहत जीवन के दौरान जीनों में बदलाव आ जाता है. इसका नतीजा कैंसर, दीर्घायु, मोटापा जैसी चीजों के रूप में सामने आता है. हमें पता चला है कि जीवन की शुरुआत में आपको जैसा परिवेश मिलता है उसका आपकी जिंदगी पर काफी गहरा असर पड़ सकता है. यानी लोकतंत्र, उत्पादकता और विकास जैसी सकारात्मक चीजों के संदर्भ में देखा जाए तो माहौल में बदलाव करके आप लोगों की जिंदगी सुधार सकते हैं. चूहों को होने वाली बीमारियों पर शोध कर हमने यह सीखा है कि गर्भावस्था के दौरान आप किसी जानवर को जो खुराक देते हैं उससे यह निर्धारित किया जा सकता है कि उसके बच्चे मोटे होंगे या नहीं. बौद्धिकता और समझदारी जैसे गुणों के मामले में भी ऐसा ही होता है. जीवन के शुरुआती वर्षों में ही किसी को एक समृद्ध सामाजिक परिवेश मिल जाए तो उसकी जिंदगी सुधर सकती है. मसलन आप आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति के प्रारंभिक जीवन का माहौल सुधारकर उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त हो सकते हैं.

एक और चीज जो मुझे बेहद रोमांचित करती है वह यह है कि आप लोगों के सामाजिक व्यवहार के बारे में संक्रामक बीमारियों की तरह सोच सकते हैं. संक्रमण का मतलब होता है बीमारी का एक से दूसरे व्यक्ति में जाना. अब सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में देखें तो किसी व्यक्ति के साथ आपका संबंध अच्छा है या खराब, यह बात उस व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है और उसका व्यवहार किसी तीसरे व्यक्ति पर असर डालता है. यानी कर्म की जो अवधारणा है उसमें कुछ हद तक सच्चाई है. जो बच्चे हिंसाग्रस्त इलाकों में बड़े होते हैं, वे दूसरों को भी हिंसा की तरफ धकेलते हैं. यानी अगर आप उस हिंसा को रोक सकें तो हिंसा फैलेगी नहीं. यानी हिंसा पर रोक हिंसा के खिलाफ टीके जैसा ही काम करती है.
(अजाचि चक्रवर्ती से बातचीत पर आधारित)