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माही से मनोज तक

प्रशासन और गांववालों की तमाम कोशिशों और न्यूज चैनलों की दुआओं के बावजूद 70 फुट गहरे बोरवेल में गिरकर फंसी चार साल की बच्ची माही को नहीं बचाया जा सका. गुड़गांव (हरियाणा) के पास कासना गांव की माही को बोरवेल से सुरक्षित निकालने के लिए 86 घंटे से भी ज्यादा लंबा अभियान चला और उसे 24 घंटे के न्यूज चैनलों के जरिए पूरे देश ने देखा. हालांकि माही की किस्मत कुरुक्षेत्र के प्रिंस जैसी नहीं थी. उसे बचाया नहीं जा सका. लेकिन चैनल माही को बचाने के अभियान में पीछे नहीं रहे. उनके एंकरों और रिपोर्टरों ने माही के लिए दुआएं मांगीं और बचाव ऑपरेशन के बारे में ब्रेकिंग न्यूज देते रहे.

लेकिन शायद पिछली आलोचनाओं और खिल्लियों का असर था कि इस बार चैनलों में वह उत्साह नहीं दिखा जो उन्होंने 2006 में कुरुक्षेत्र में बोरवेल में गिरे पांच साल के प्रिंस के बचाव अभियान के दौरान दिखाया था. तब चैनलों ने लगातार 50 घंटे से अधिक की लाइव कवरेज की थी. लेकिन कुछ शर्माते- कुछ हिचकते हुए भी चैनलों ने माही बचाओ ऑपरेशन की अच्छी-खासी कवरेज की. असल में, चैनलों की ऐसे मामलों को ‘तानने और उससे खेलने’ में अत्यधिक दिलचस्पी रहती है जिसमें भावनाएं हों, सस्पेंस और उसका तनाव हो, खासकर जिसमें किसी की जान अटकी हो. चैनलों को उसे ‘रीयलिटी शो’ में बदलने में देर नहीं लगती है.

दिल्ली में हर साल 50 से ज्यादा सीवरकर्मी अपने काम के दौरान दुखद और अनजान मौत मरते हैं लेकिन चैनल कभी उनकी सुध नहीं लेते

लेकिन न्यूज चैनलों की इस ‘जन्मजात विकृति’ को एक पल के लिए नजरअंदाज कर दिया जाए तो इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि ऑपरेशन स्थल पर दर्जनों चैनलों के ओबी वैन और कैमरों और उनके उत्साही रिपोर्टरों की मौजूदगी ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार पर माही बचाओ ऑपरेशन को तेज करने के लिए लगातार दबाव बनाए रखा. याद रहे, ऐसे मामलों में चैनलों की अति सक्रियता के कारण ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ साल पहले बोरवेल की खुदाई और रखरखाव को लेकर राज्य सरकारों को कड़े निर्देश दिए ताकि माही जैसे मासूमों को बचाया जा सके. यह और बात है कि प्रशासन और बोरवेल खुला छोड़ने वाले लोगों की आपराधिक लापरवाही जारी है और किसी माही के उसमें गिरने से पहले न्यूज चैनलों की नजर भी उधर नहीं जाती.  

लेकिन न्यूज चैनलों की नजर 19 साल के मनोज और 40 साल के शंकर की मौत की ओर भी नहीं गई जो किसी दूरदराज के गांव या शहर में नहीं बल्कि दिल्ली के रोहिणी इलाके में डीडीए (दिल्ली विकास प्राधिकरण) के सीवर की सफाई करने के दौरान मेनहोल की जहरीली गैस के शिकार हो गए. मनोज और शंकर मेनहोल में उतरकर सीवर की सफाई करते हुए मारे जाने वाले अकेले सफाईकर्मी नहीं हैं. दिल्ली में सिर्फ जून महीने में चार से ज्यादा सफाईकर्मी मारे गए हैं. यही नहीं, अकेले दिल्ली में हर साल 50 से ज्यादा सीवर सफाईकर्मी ऐसी ही दुखद और अनजान मौत मरते हैं. अफसोस उनकी मौत किसी चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनती, कोई लाइव रिपोर्ट और स्टूडियो चर्चा नहीं होती. 

यहां तक कि उनकी मौत चैनलों के टिकर में भी जगह नहीं पाती. नतीजा यह कि सीवर सफाईकर्मियों के मेनहोल में सेफ्टी गियर के साथ उतरने जैसे हाई कोर्ट के कड़े निर्देशों के बावजूद उन्हें निहायत ही अमानवीय और असुरक्षित स्थितियों में काम करना पड़ रहा है. उनमें से कई को जान से हाथ धोना पड़ रहा है और बाकी जानलेवा बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. क्या ‘सबसे तेज’ और ‘आपको आगे रखने वाले’ चैनलों के कैमरे और रिपोर्टर कभी उनका भी दुख-दर्द पूछेंगे? या उनकी दिलचस्पी सिर्फ मौत के रीयलिटी शो में है? जरा सोचिए.

चुनाव में भेदभाव

राष्ट्रपति चुनाव 1971 की जनगणना पर आधारित मतों के आधार पर होने से बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों को राष्ट्रपति चुनाव में वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है. हिमांशु शेखर की रिपोर्ट.

1971 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि उस वक्त देश की कुल आबादी 54.81 करोड़ थी. वहीं 2011 की जनगणना  में आबादी बढ़कर 121.01 करोड़ हो गई है. इसके बावजूद राष्ट्रपति चुनाव में वोट देने वाले जनप्रतिनिधियों के मतों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही किया जा रहा है. अगर आधार वर्ष को 1971 के बजाय 2011 कर दिया जाए तो पिछले 40 साल में बढ़ी आबादी को देखते हुए कई राज्यों के विधायकों के मतों की संख्या काफी बढ़ जाएगी और कुल मतों में उनकी हिस्सेदारी भी.

संविधान के जानकारों का मानना है कि 1971 की आबादी के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव करवाए जाने से इस चुनाव में उन राज्यों को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा जिनकी आबादी इस दौरान दूसरे राज्यों की तुलना में तेजी से बढ़ी है. दरअसल, संविधान में राष्ट्रपति चुनाव के लिए जनप्रतिनिधियों के मतों के निर्धारण को लेकर यह साफ था कि यह काम सबसे नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होगा. इसलिए 1952 का राष्ट्रपति चुनाव 1951 की जनगणना के आधार पर हुआ. जबकि 1961 की जनगणना के आंकड़े समय पर उपलब्ध नहीं होने की वजह से 1962 में राष्ट्रपति का चुनाव भी 1951 की जनगणना के आधार पर ही हुआ. इसके बाद 70 के दशक में हुए राष्ट्रपति चुनावों का आधार 1971 की जनगणना बनी. 

1971 की जनगणना पर ही लोकसभा और विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन हुआ. 2008 से पहले तक के लोकसभा और विधानसभा चुनाव उसी परिसीमन के आधार पर हुए. इस दौरान हुए सभी राष्ट्रपति चुनाव 1971 की जनगणना के आधार पर ही होते रहे. जबकि परिसीमन का राष्ट्रपति चुनाव से कोई संबंध ही नहीं है. जब इस गड़बड़ी की ओर कुछ लोगों ने 2001 में सरकार का ध्यान आकृष्ट किया तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार ने संविधान संशोधन करके यह तय कर दिया कि 2026 तक के सभी राष्ट्रपति चुनाव 1971 की जनगणना के आधार पर ही होंगे.

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के महासचिव रहे सुभाष कश्यप तहलका को बताते हैं, ‘उस वक्त जब यह बात चली तो पता चला कि नया आधार वर्ष लेते ही राष्ट्रपति चुनाव में तमिलनाडु व केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों के मतों की हिस्सेदारी घटेगी वहीं उत्तर भारत के कुछ राज्यों  की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी. तब दक्षिण भारत के राज्यों ने केंद्र से कहा कि जनसंख्या नियंत्रण का काम सफलता से करने का पुरस्कार उन्हें इस रूप में मिलना चाहिए कि राष्ट्रपति चुनाव का आधार वर्ष पुराना ही रखा जाए.’

जानकार बताते हैं कि उस वक्त केंद्र सरकार के इस फैसले का ज्यादा विरोध नहीं हुआ क्योंकि तब तक विधायकों और सांसदों का निर्वाचन भी 1971 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन के आधार पर ही हो रहा था. लेकिन 2008 से विधानसभाओं के चुनाव नए परिसीमन के आधार पर शुरू हुए. नए परिसीमन के लिए आधार बनी 2001 की जनगणना. 2009 का लोकसभा चुनाव भी नए परिसीमन के आधार पर हुआ. इस आधार पर होना तो यह चाहिए था कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी 2011 को न सही 2001 की जनगणना को आधार बनाया जाता. क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव में मत डालने वाले ज्यादातर जनप्रतिनिधि 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन के तहत निर्वाचित हुए हैं.

सोसायटी फॉर एशियन इंटीग्रेशन ने इस बाबत चुनाव आयोग के पास शिकायत की है. संविधान विशेषज्ञ सीके जैन तहलका को बताते हैं, ‘अब अगर  2001 की जनगणना को राष्ट्रपति चुनाव का आधार बनाना है तो इसके लिए संविधान में फिर से संशोधन करना होगा.’ चुनाव आयोग के पास भेजी गई शिकायत की एक प्रति लेकर जब कुछ लोग जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव से मिले तो उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैठक में वे इस मसले पर चर्चा करने के बाद इस मामले को उठाएंगे. सूत्र बताते हैं कि जब शरद यादव ने यह मामला राजग की बैठक में उठाया तो भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि यह संशोधन तो अपनी ही सरकार ने किया था इसलिए इस मामले को लोगों के बीच उठाना ठीक नहीं है. इसके बाद राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन को लेकर भाजपा और जदयू दोनों अलग-अलग राह चल पड़े और यह मामला जहां था वहीं रह गया.

इस गड़बड़ी की वजह से हो रहे भेदभाव की ओर ध्यान दिलाते हुए सोसायटी फॉर एशियन इंटीग्रेशन ने अपनी शिकायत में चुनाव आयोग को लिखा है, ‘बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की अनदेखी करके दक्षिण भारतीय राज्यों के विधायकों के मतों को अधिक महत्व मिलना जनप्रतिनिधित्व की जमीनी हकीकतों के अनुरूप नहीं है.’

संविधान और राजनीति के जानकार मानते हैं कि राष्ट्रपति की चयन प्रक्रिया में मौजूद इस खामी का असली प्रभाव उस वक्त दिखेगा जब कभी दो उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर होगी. इस बार अगर प्रणब मुखर्जी के खिलाफ एपीजे अब्दुल कलाम चुनाव मैदान में उतर जाते तो शायद इसका असर दिख सकता था. क्योंकि कांटे की टक्कर की स्थिति में कुछ सौ वोट भी बने खेल को बिगाड़ने और बिगड़े खेल को बनाने की कुव्वत रखते हैं. ऐसी स्थिति पैदा होने पर वह उम्मीदवार फायदे में रहेगा जिसे दक्षिण भारत के राज्यों के विधायकों का समर्थन हासिल हो. जबकि उत्तर भारतीय राज्यों के विधायकों के समर्थन वाला उम्मीदवार घाटे में रहेगा. 

1971 की आबादी के हिसाब से राष्ट्रपति चुनाव में पड़ने वाले राज्यों के कुल मतों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार की हिस्सेदारी क्रमशः 4.69, 15.25 और 7.65 फीसदी है. जबकि अगर 2001 की जनगणना को आधार बनाया जाए तो इन तीनों राज्यों के कुल मतों की संख्या तकरीबन दोगुनी हो जाएगी और हिस्सेदारी बढ़कर क्रमशः 5.5, 16.19 और 8.08 फीसदी हो जाएगी. नया आधार वर्ष तय होने के बाद घाटे में रहने वाले तीन प्रमुख राज्य होंगे तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश. 1971 की जनगणना के हिसाब से इन राज्यों की हिस्सेदारी क्रमशः 7.49,  3.87 और 7.91 फीसदी थी. जो 2001 की जनगणना के आधार पर घटकर क्रमशः 6.04, 3.09 और 7.39 फीसदी रह जाएगी.  

ऐसे चुने जाते हैं महामहिम

भारत के राष्ट्रपति का चुनाव सांसद और विधायक करते हैं. अलग-अलग राज्यों के विधायकों की वोट की कीमत अलग-अलग होती है. विधायकों के वोट की कीमत तय करने के लिए राज्य की कुल आबादी को हजार से विभाजित किया जाता है. इसके बाद जो संख्या आती है उसे राज्य के कुल विधायकों की संख्या से विभाजित  करने पर जो संख्या आती है वही संबंधित राज्य के एक विधायक के वोट की कीमत होती है. राज्यों के सभी वोटों को जोड़कर उसे संसद के दोनों सदनों के सदस्यों की संख्या से विभाजित करने पर जो संख्या आती है वह एक सांसद के वोट की कीमत होती है. राष्ट्रपति बनने के लिए कुल वोटों के आधे से अधिक वोट के कोटे को हासिल करना जरूरी होता है. सांसदों और विधायकों को राष्ट्रपति पद के सभी उम्मीदवारों को वरीयता देनी होती है. दो से अधिक उम्मीदवार होने की स्थिति में पहले दौर की गिनती में अगर किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए जरूरी वोट नहीं मिलते तो सबसे कम वोट पाने वाले के दूसरी वरीयता के वोट बाकी सभी उम्मीदवारों में बंटेंगे और ऐसा तब तक होगा जब तक किसी को कोटा नहीं हासिल हो जाए. चयन प्रक्रिया में मौजूद इस खामी का असली प्रभाव उस वक्त दिखेगा जब कभी दो उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर होगी

एक तीर दो शिकार

पीए संगमा ने 2008 में जब तूरा लोकसभा सीट से इस्तीफा देकर विधानसभा चुनाव लड़ा था तब उनका एजेंडा साफ था. मेघालय की राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को मजबूत करना और अपने बच्चों (पुत्र कॉनरेड और जेम्स व पुत्री अगाथा) का राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करना. 2008 में एनसीपी ने क्षेत्रीय पार्टियों से गठजोड़ कर सरकार तो बनाई लेकिन यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला. राज्य की बागडोर फिर कांग्रेस के हाथ में आ गई. तब संगमा तूरा विधानसभा क्षेत्र के विधायक तो बने रहे लेकिन राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर हाशिये पर पहुंच गए. हाल के दिनों तक जब राष्ट्रपति पद की दौड़ में वे शामिल नहीं हुए थे, ऐसा माना जा रहा था जैसे उनकी सारी योजना पर पानी फिर गया हो. लेकिन अब राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनने के बाद राजनीतिक हलकों में  उनके इस कदम के कई निहितार्थ निकाले जा रहे हैं. 

वरिष्ठ पत्रकार और मेघालय के विधायक मानस चौधरी कहते हैं, ‘संगमा के राष्ट्रपति भवन की दौड़ में शामिल होने की खबर सुनते ही मेरी तरह बहुत सारे लोग अचरज में पड़ गए. अगले साल होने वाले चुनाव में संगमा परिवार को गारो हिल्स में ही कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. जबकि यह संगमा परिवार का गढ़ है. कांग्रेस शासन में यहां काफी बढ़िया काम हुआ हैं.’ शिलांग के एक बड़े तबके का मानना है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन में पिछले चुनाव से ज्यादा गिरावट दिख सकती है. दरअसल डॉ मुकुल संगमा के नेतृत्व में कांग्रेस ने राज्य में स्थिर सरकार दी है. अन्यथा 1998-2003 के दौरान मेघालय चार मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में छह सरकारें देख चुका है. 

अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इस बार एनसीपी को खासी और जयंती हिल्स की छोटी पार्टियों के साथ गठजोड़ करना होगा. पर पिछले महीनों में मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने गारो हिल्स अपनी पकड़ काफी मजबूत की है. यही वजह है कि घर वापसी करने के बाद संगमा की चिंताओं में इजाफा हुआ है. क्षेत्रीय सहयोगी पार्टियों का भरोसेमंद नहीं होना भी इसकी एक वजह है. संगमा के बच्चे अभी तक वे अपने-अपने राजनीतिक क्षेत्र में प्रभाव नहीं जमा पाए हैं. संगमा को भी पता है कि वे अपनी लोकप्रियता का लबादा ओढ़कर लंबे समय तक काम नहीं चला सकते. मेघालय में एनसीपी के 13 विधायक हैं और 2013 में मेघालय के 60 सदस्यों वाली विधानसभा में बड़ी भूमिका निभाने के लिए एनसीपी को कम से कम 20 सीटों की दरकार होगी. संगमा का लोकप्रिय होना भी कुछ हद तक उनके लिए दिक्कत पैदा करता है. मानस चौधरी कहते हैं, ‘राजनीति में संगमा के कुछ करीबी मित्र उन्हें आदिवासियों की तुलना में तेज-तर्रार मानते हैं. यही वजह है क्षेत्रीय पार्टियां उन्हें विश्वसनीय नहीं मानतीं. इससे वे राज्य की राजनीति में पिछड़ते जा रहे हैं.’ 

राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में होने की वजह से फिलहाल संगमा और उनका परिवार सुर्खियों में हैं. भाजपा और दक्षिण से जयललिता का समर्थन उन्हें मिल रहा है. क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां शिरोमणि अकाली दल और उड़ीसा में पटनायक का समर्थन मिलने से उनकी स्वीकार्यता राष्ट्रीय स्तर की हो गई है. वे जानते हैं कि गारो के मतदाताओं की नजरें उनपर हैं. राष्ट्रपति चुनाव में आदिवासी और ईसाइयों के प्रतिनिधि के तौर पर खुद को पेश करना मेघालय में उन्हें फायदा पहुंचा सकता है. संगमा ने अपनी पार्टी एनसीपी को भी अच्छी तरह टटोल लिया है. एनसीपी का केंद्रीय नेतृत्व भी उत्तर-पूर्व में अपनी बुनियाद को हिलने नहीं देेगा. गारो हिल्स के एनसीपी के एक विधायक तहलका को बताते हैं, ‘उत्तर-पूर्व में संगमा के बगैर पार्टी को आगे बढ़ाना मुश्किल है. पार्टी का दरवाजा उनके लिए खुला रहेगा.’ राष्ट्रपति चुनाव के दौरान संभव है कि अब संगमा क्षेत्रीय आदिवासियों के मंच के विचार को आगे बढ़ाएं. इससे उन्हें नवीन पटनायक और यहां तक कि ममता बनर्जी से भी समर्थन मिल सकता है. उन्हें इस बात का भी भरोसा हो चुका है कि भाजपा खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए उनके समर्थन में जरूर खड़ी रहेगी. 

मुख्यमंत्री डॉ मुकुल संगमा कहते हैं, ‘पीए संगमा राज्य की राजनीति में असफल हो चुके हैं. यह कदम उनकी हताशा के परिणामस्वरूप लिया गया जान पड़ता है. उनके निर्वाचन क्षेत्र गारो हिल्स में अराजकता का आलम पसरा हुआ है. गारो को छोड़ दें. संगमा या उनकी पत्नी के गांव चले जाएं तो देखेंगे कि उन्होंने अपने क्षेत्र को क्या दिया है.’ आरोप-प्रत्यारोपों को एक किनारे कर दें तो फिलहाल रायसीना की दौड़ में संगमा द्वारा लगाए गए जोर का असर 2013 में मेघालय के विधानसभा चुनाव पर पड़ने की संभावना तो है लेकिन इससे संगमा परिवार की राज्य की राजनीति में वापसी होगी यह कहना मुश्किल जान पड़ता है.

जीर्णोद्धार का बंटाढार

‘क्या आपने कभी बिना तराशा हुआ हीरा देखा है?’ 70 वर्षीय नवरतन कोठारी पूछते हैं. जिस अनगढ़ हीरे की बात कोठारी कर रहे हैं वह 18वीं सदी में आमोद-प्रमोद के लिए जयपुर में बनाया गया जल महल है. इसका ऐसा नाम पड़ा मान सागर नाम की देश की सबसे बड़ी मानव निर्मित झीलों में से एक के बीचोंबीच इसके बने होने की वजह से. जब तक कोठारी ने इसे नहीं तराशा था तब तक जल महल और 17वीं सदी में बनी झील शहर भर की गंदगी को ठिकाने लगाने की जगह थे. उस वक्त यहां पक्षियों के बजाय सुअर घूमते पाए जाते थे. छह साल की कड़ी मेहनत और साफ-सफाई के बाद, वर्ष 2010 में मान सागर झील 40 से ज्यादा प्रजाति के पक्षियों के प्रवास की जगह बन गई. यहां के साफ पानी में तैरती हुई बतखें देखी जा सकती थीं और कछुए भी. जलमहल सही मायनों में महल बन चुका था. पहले की तरह भव्य और सुंदर.

मगर आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और अनमोल विरासत को हड़पने के लिए दस्तावेजों की जालसाजी करने का आरोप लगाकर तीन याचिकाकर्ता, नवरतन कोठारी को अदालत में ले गए. राजस्थान पुलिस ने तीन बार इन आरोपों की जांच की और तीनों बार राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष किसी भी गड़बड़ी की आशंका से इनकार कर दिया. मगर अदालत ने न केवल इसे नहीं माना बल्कि कोठारी और राजनेताओं के बीच मिलीभगत को न देख पाने के लिए पुलिस को फटकार भी लगाई. 16 नवंबर, 2011 को अदालत ने कोठारी के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी कर दिया. इस साल 17 मई को मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने कोठारी की कंपनी द्वारा किए गए काम को फिर पहले वाली स्थिति में पहुंचाने का फैसला सुनाया. दूसरे शब्दों में कहें तो अब हर तरह की गंदगी को सीधे ही झील में डाला जा सकता था. मगर 25 मई को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया और कोठारी की संस्था जल महल रिसोटर्स प्रा लि को मान सागर और जल महल से संबंधित उसके काम जारी रखने की इजाजत भी दे दी. कोठारी ने कुछ गलत किया हो या नहीं मगर उनकी कहानी के इर्द-गिर्द विकास, इतिहास, संस्कृति और संरक्षण से जुड़े कई बुनियादी सवाल बुने हुए हैं – क्या हम अपनी ऐतिहासिक धरोहर की कीमत समझते हैं? क्या हम अपने शहरों को कंक्रीट, लोहे और शीशे के जंगलों में तब्दील कर उन्हें एक ही जैसा बना देना चाहते हैं? या फिर हम पुरानी तहजीब, रवायत और ऐतिहासिक विरासत वाले लखनऊ, हैदराबाद, दिल्ली और जयपुर सरीखे शहरों की पहचान को बनाए रखना चाहते हैं?

1596 में राजस्थान में भयंकर अकाल पड़ा था. ऐसा दुबारा न हो ऐसा सोचकर आमेर के राजा मान सिंह प्रथम ने 1610 में मान सागर झील बनाने के लिए दर्भावती नदी पर एक बांध बनाया था. राजा जय सिंह ने 1727 में किलानुमा शहर जयपुर की स्थापना की. इसके बाद उन्होंने 1734 में अपने आमोद-प्रमोद के लिए जल महल का निर्माण करवाया. आजादी के बाद झील और महल राजस्थान सरकार की संपत्ति होकर धीरे-धीरे तबाह होते गए. 1962 तक आते-आते जयपुर शहर की जरूरतें इतनी बढ़ीं कि शहर की तमाम गंदगी दो नालों – नागतलाई और बृह्मपुरी – की मदद से मान सागर झील में डाली जाने लगी. झील के किनारे बसी हजरत अली कॉलोनी में रहने वाले रफीक अहमद उस समय की हालत बयान करते हुए कहते हैं, ‘जब मेरी बेटी का निकाह 21 बरस पहले हुआ था तब मेहमानों का कहना था कि खाने-पीने से अच्छा होता कि आप हमें इत्र दे देते.’

लेकिन हर कोई खुश नहीं था. जब यह महल पर्यटकों की पहली टोली की बाट जोह रहा था. ठीक उसी वक्त कुछ लोग इससे नाराज हो गए.

जल महल की दशा को सुधारने के प्रयासों की शुरुआत 1999 में तब हुई जब राज्य सरकार ने पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी के जरिए ऐसा करने की सोची. इसमें सरकार की भूमिका राष्ट्रीय झील विकास फंड के 25 करोड़ रुपये के जरिए झील को साफ करने की थी. निजी संस्था को जल महल का पुनरुद्धार करना था और झील व जल महल दोनों के रखरखाव का सालाना खर्च भी वहन करना था. इसके एवज में कंपनी को पास की 100 एकड़ जमीन पर्यटक केंद्र विकसित करने के लिए दी जानी थी जिसके एक छोटे हिस्से पर वह निर्माण कार्य कर सकती थी. नीलामी से पहले की बैठक में इस तरह के काम का लंबा अनुभव रखने वाले नीमराणा समूह जैसी कई कंपनियां शामिल हुई थीं. लेकिन जैसा कि नीमराणा के संस्थापक फ्रैंकिस वैक्जर्ग का कहना था कि इस तरह की परियोजनाओं पर काम करना काफी परेशानी भरा हो सकता है. ‘यह बेहद जटिल और खर्चे वाला काम था और हमारे पास झील को साफ करने के लिए जरूरी धन भी नहीं था. अपने अनुभवों से हम जानते हैं कि पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी में प्राइवेट का पी तो काम करता है मगर पब्लिक का पी ठीक से काम नहीं करता.’

इसलिए वे और इसमें शुरुआती रुचि दिखाने वाली ज्यादातर कंपनियां दौड़ से अपने आप ही बाहर हो गईं. आखिर में केवल तीन कंपनियां बच गईं और कोठारी के नेतृत्व वाली केजीके कंसोर्टियम ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से 39 फीसदी ज्यादा बोली लगाकर नीलामी में बाजी मार ली. कंपनी ने नीलामी के लिए जरूरी न्यूनतम राशि की डेढ़ गुना – 2.5 करोड़ – दी थी. केजीके कंसोर्टियम कई कंपनियों का एक समूह था जिससे द जल महल रिजॉर्ट्स प्रा लि बनी. कोठारी की टीम को जल्दी ही अंदाजा हो गया कि पब्लिक के पी के काम न करने की वैक्जर्ग की बात सही थी. झील फंड के 25 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद जब सरकार ने उन्हें 2004 में झील और जल महल सौंपे तो झील की हालत कमोबेश पहले जैसी ही थी. उस वक्त सरकार का कहना था कि अगर कोठारी झील के लिए कुछ और करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा अपने पैसों से करना होगा. इसके बाद परियोजना निदेशक राजीव लुंकड़ ने एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करनी शुरू की जो मानव निर्मित झीलों की दशा सुधारना जानता हो. उनकी खोज उन्हें जर्मन इंजीनियर हैरल्ड क्राफ्ट के पास ले गई. एक नजर झील पर डालने के बाद क्राफ्ट का कहना था, ‘ऐसा करना असंभव है. आप लोग पागल हैं जो इसे साफ करने की कोशिश कर रहे हैं.’ मगर क्राफ्ट ने झील का काम करना स्वीकार कर लिया. पहले पहल क्राफ्ट की टीम ने दो नालों को आपस में जोड़ने का फैसला किया ताकि सारी गंदगी एक जगह इकट्ठी की जा सके. इस पानी को ट्रीटमेंट के बाद एक सेडीमेंटेशन टैंक में भेजा गया जिसे झील के ही एक कोने में बनाया गया था. यहां से निकला पानी झील में गया. लेकिन यह काफी नहीं था. 250 एकड़ में फैली झील 1960 के बाद से लगातार गंदगी सोखती आ रही थी इसलिए इसे ठीक से साफ करने के लिए इसे पूरी तरह से खाली करने की आवश्यकता थी.  इसके बाद जब पहली बारिश हुई तो आश्चर्यजनक नतीजे देखने को मिले. जल महल रिसॉर्ट के अधिकारियों ने 2007 की गर्मियों में झील के पानी की जांच विशेषज्ञों से करवाई. जांच के नतीजों में सामने आया कि टैंक में जाने से पहले जहां पानी में ऑर्गेनिक कचरे की मात्रा 450 बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) थी वहीं बाहर निकलने वाले पानी में यह मात्र 25 बीओडी ही रह गई थी. ई-कोलाई बैक्टीरिया की संख्या में भी काफी कमी आई थी. साल 2000 में पानी में प्रति यूनिट इसकी संख्या जहां 24 लाख थी वहीं 2009 से 2011 के बीच यह प्रति यूनिट केवल 7,000 रह गई. मान सागर के आसपास रहने वाले लोग अब खुद को शान से जल महल का पड़ोसी बताने लगे थे.

इस बीच टीम अब-भी जल महल के पुनरुद्धार में व्यस्त थी. जयपुर के इतिहास पर काफी विस्तार से लिख चुके इतिहासकार गाइल्स टिलोस्टन इस पर रोशनी डालते हैं. ‘अगर आप किसी भवन को जिंदा करना चाहते हैं तो आपको उसे पूरी तरह से बदलना होगा. आप समय को उल्टा नहीं चला सकते.’ इसका मतलब था भवन की मूल संरचना को सुरक्षित रखते हुए बेहद चतुराई से इसके नये उपयोग ढूंढ़ना. बस, जल महल की आंतरिक सज्जा आनंद में रची-बसी पिछली दो सदियों की कलाकृतियों की जीती-जागती यात्रा बन गई. कला पक्ष का जिम्मा विभूति सचदेव के सिर था. उन्हें इसमें जीर्णोद्धार विशेषज्ञ मिशेल अब्दुल करीम क्राइट्स का भी सहयोग मिला. सचदेव बताते हैं कि किस तरह से उन शिल्पकारों को इस योजना के साथ जोड़ा गया जिनमें से ज्यादातर को अब तक सिर्फ टूट-फूट दुरुस्त करने का काम ही मिलता था. शिल्पकारों को संभालने वाले दीपेंद्र सिंह, यह सब कैसे हुआ, इस बारे में बताते हुए भावुक हो जाते हैं. समय और अनदेखी के कारण फर्श बुरी तरह टूटा-फूटा था, छतें उखड़ी हुई थीं और दीवारों की हालत बेहद खराब थी. इन जगहों पर बढ़िया संगमरमर और जालियां लगाई गईं जिससे भवन फिर अपने पुराने सौंदर्य में दमकने लगा. सबसे बड़ी चुनौती थी महल के बागीचे के पुनरुद्धार की जो पूरे महल की शोभा था. इसकी जिम्मेदारी क्राइट्स के सिर पर थी. उन्होंने बाग को सजाने के लिए सफेद खुशबूदार फूलों – चमेली, चंपा और श्वेत कमल – को लगाने का फैसला किया. इसका नाम रखा गया चमेली बाग. बागीचा अठारहवीं सदी के भारत की छाप है. इसमें फव्वारों और रोशनी के शानदार इस्तेमाल से भी इसे नाटकीय बनाने की कोशिश की गई है. 

रोशनी का काम ध्रुवज्योति घोष के जिम्मे था. इन्हीं की कंपनी ने दिल्ली के हुमायूं मकबरे और सिडनी के ओपेरा हाउस की लाइटिंग की है. सूर्यास्त के बाद उनके द्वारा की गई प्रकाश व्यवस्था जल महल को एक अलग ही जादुई आकर्षण देती है. बागीचे का काम खत्म होने से पहले ही इसने बीबीसी द्वारा प्रायोजित पुस्तक अराउंड द वर्ल्ड इन एट्टी गार्डेन्स में अपनी जगह बना ली. झील को साफ कर लेने के बाद परियोजना के निदेशक राजीव लुंकड़ एक दिन दीपेंद्र सिंह के पास जा पहुंचे. वह शुक्रवार का दिन था. उन्होंने एक असंभव सी मांग रख दी, ‘मुझे सोमवार तक इस झील में एक नाव चाहिए?’. दीपेंद्र तुरंत बनारस के लिए रवाना हो गए. वहां उन्होंने एक नाव वाले – आशु – को अपनी नाव के साथ जयपुर आने के लिए बड़ी मुश्किल से मनाया. चार सदियों में हुए नुकसान की भरपाई छह सालों में कर ली गई थी. लेकिन हर कोई खुश नहीं था. जब यह महल पर्यटकों की पहली टोली की बाट जोह रहा था ठीक उस वक्त कुछ लोग इससे नाराज हो गए. 30 साल के भागवत गौर उच्च न्यायालय में वकालत करते हैं. उनकी नाराजगी की वजह यह बनी कि आखिर कैसे प्राकृतिक संसाधनों में शुमार की जाने वाली झील की जमीन एक निजी डेवलपर को दे दी गई. और वह भी बहुत कम पैसे में. गौर का मानना था कि ठेका देने की पूरी प्रकिया ठीक नहीं थी क्योंकि यह झील संरक्षित वन क्षेत्र के बीच में पड़ती है और परियोजना के लिए ठेका देते वक्त इससे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन नहीं किया गया था. गौर का आरोप था कि सरकार ने कोठारी की कंपनी को 100 एकड़ जमीन लीज पर देने के लिए झील के 13 बीघा क्षेत्र का भराव करवा दिया था. जब गौर ने इस संबंध में 2010 में राजस्थान उच्च न्यायालय में याचिका दायर की तो उस वक्त इस 100 एकड़ जमीन की कीमत 3,500 करोड़ रुपये थी. उनके मुताबिक किराये के तौर पर इससे हर साल 2.5 करोड़ रुपये सरकार को मिलना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है.

जल महल संरक्षित स्मारक नहीं है और यह उपेक्षा का शिकार था. ऐसे में कोई भी निजी कंपनी बगैर किसी फायदे के इसकी सेहत सुधारने का काम क्यों करेगी?

 गौर का यह दावा भी था कि गाद का टैंक लगाने से झील का आर्किटेक्चर और इकोलॉजी बर्बाद हो गई है. ठेके के दस्तावेजों में कहा गया था कि इस परियोजना का काम या तो सरकारी या फिर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को दिया जाएगा. लेकिन कोठारी की कंपनी इन दोनों श्रेणियों में नहीं आती. इसका मतलब यह हुआ कि कानूनों का उल्लंघन करके दिया गया यह ठेका अवैध था. हालांकि, कोठारी के वकीलों ने इन दावों का अदालत में विरोध किया जिसका समर्थन राज्य सरकार ने भी किया. राज्य सरकार की कई एजेंसियों पर भी इस गड़बड़ी में शामिल होने का आरोप लगा है. इनका तर्क था कि मान सागर झील संरक्षित वन क्षेत्र में नहीं आती है और इस परियोजना के लिए सभी जरूरी मंजूरियां ले ली गई हैं. इन एजेंसियों और कोठारी के वकील का यह भी कहना था कि 1975 में जब जयपुर का मास्टर प्लान बना था तो उस वक्त भी इस झील को सार्वजनिक-निजी भागीदारी वाली श्रेणी में रखा गया था. अगर सरकार ने लीज पर देने वाली जमीन को 100 एकड़ बनाने के लिए 13 बीघा जमीन का अधिग्रहण किया तो यह देखना चाहिए कि अब यह झील पहले की तुलना में कहीं ज्यादा क्षेत्र में फैल गई है. राजस्व विभाग के दस्तावेज बताते हैं कि पहले के 250 एकड़ की तुलना में यह झील अब 300 एकड़ से ज्यादा में है. कोठारी के वकील इस बात को भी काटते हैं कि उन्हें यह जमीन कौड़ियों के भाव सरकार ने दी थी. वे कहते हैं कि जब 2003 में कंपनी को ठेका मिला था तो उस वक्त इस जमीन की कीमत 900 करोड़ रुपये थी न कि 3,500 करोड़ रुपये. इसके अलावा इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि कंपनी को सिर्फ छह फीसदी जमीन पर निर्माण कार्य करने की छूट है. इसका मतलब यह हुआ कि जितनी जमीन पर उन्हें निर्माण की छूट मिली है उसकी वास्तविक कीमत 50 करोड़ रुपये से अधिक नहीं है.

इसी तरह से वे याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी काटते हैं कि झील से सटी किसी संपत्ति को लीज पर नहीं दिया जा सकता है. कोठारी की टीम कहती है कि जल महल संरक्षित स्मारक नहीं है और यह उपेक्षा का शिकार था. ऐसे में कोई भी निजी कंपनी बगैर किसी फायदे के इसकी सेहत सुधारने का काम क्यों करेगी? इस पूरे काम को अंजाम देने में कोठारी की कंपनी को 80 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े. सरकार ने भी झील से सटी जमीन को बेचने के बजाय यह रास्ता चुनना बेहतर समझा कि हर साल एक निश्चित रकम लेकर इसे 99 साल के लिए लीज पर दे दिया जाए. इन लोगों का यह भी कहना है कि गाद हटाने वाला ये टैंक झील की गंदगी को निकालने और इसकी इकोलॉजी को ठीक करने के मकसद से लगाया गया है न कि किसी और वजह से. ये टैंक झील के पूरे झेत्र के सिर्फ पांच फीसदी में लगा हुआ है. इसके अलावा सरकार ने साझेदारों वाली कंपनी को नीलामी में शामिल होने की अनुमति इसलिए दी क्योंकि इस कंपनी की वित्तीय व्यवस्था बिलकुल दुरुस्त थी और इससे निविदा की प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई. हालांकि, यह बात अलग है कि कोठारी की टीम की तरफ से दिए गए तर्कों से उच्च न्यायालय संतुष्ट नहीं हुआ. अदालत ने साफ तौर पर कहा कि यह ठेका देने का तरीका गलत और असंवैधानिक था और ऐसा जनता के भरोसे को तोड़कर किया गया. लेकिन अगर कोई सिर्फ जल महल मामले की कानूनी पेंचों में ही फंसा रहेगा तो वह एक जरूरी बिंदु को समझ नहीं पाएगा. मान सागर झील और जल महल के जीर्णोद्धार की राह में सबसे बड़ी बाधा रही है राजनीति. इस पूरी कहानी के इस हिस्से की तस्वीर उतनी साफ नहीं है जितनी लगती है. सबसे पहले इस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी है कि याचिका दायर करने वाले लोग कौन हैं और आखिर क्यों अचानक भागवत गौर को यह लगा कि जीर्णोद्धार के मुद्दे पर उन्हें कानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए? तहलका से बातचीत में गौर ने इस बात को स्वीकार किया कि जीर्णोद्धार होने के बाद उन्होंने न तो झील में कदम रखा है और न ही जल महल में. आखिरी बार वे वहां तब गए थे जब वे पढ़ाई करते थे. झील और महल की सेहत सुधारने का काम चार साल चलने के बाद 2010 में गौर को इस बात का ख्याल आया कि कुछ गड़बड़ हो रहा है. वे कहते हैं, ‘धरोहरों को संरक्षण के लिए निजी क्षेत्र को नहीं देना चाहिए. सिर्फ जल महल ही नहीं बल्कि अलवर के नीमराणा किले को भी निजी कंपनी को दे दिया गया है. मैं इसके भी खिलाफ हूं.’

गौर ने एक सोसाइटी का गठन किया जिसका नाम रखा धरोहर बचाओ समिति (डीबीएस) और इसे 2010 के मार्च महीने में पंजीकृत कराया. इसके दो महीने बाद उन्होंने राजस्थान उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की. ऐसा लगता है कि याचिका दायर करने से मात्र दो महीने पहले ही उनकी इस मामले में दिलचस्पी जागी. गौर कहते हैं कि सोसाइटी की अनौपचारिक बैठकें पहले से हो रही थीं. लेकिन जब मामला जल महल का आया तो उन्हें लगा कि संस्था का पंजीयन करा लेना चाहिए. क्या उन्होंने यह मामला उठाने से पहले किसी पर्यावरणविद या झील विशेषज्ञ से बातचीत की थी? एक अजीबोगरीब जवाब मिलता है कि कुछ चीजों पर से पर्दा नहीं हटाया जा सकता. याचिका दायर करने के कुछ दिनों बाद गौर और डीबीएस के अध्यक्ष वेद प्रकाश शर्मा के बीच विवाद पैदा हो गया. गौर ने शर्मा पर तरह-तरह के आरोप लगाते हुए उन्हें संगठन छोड़ने के लिए कहा. इसके बाद अलग होकर शर्मा ने हेरिटेज कंजर्वेशन सोसायटी बनाई और इस परियोजना के खिलाफ एक अलग याचिका दायर की. इन दोनों याचिकाओं के दायर होने के साल भर बाद एक तीसरी याचिका प्रोफेसर केपी शर्मा ने दायर की. वे राजस्थान विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान पढ़ाते हैं. उन्होंने अपनी याचिका में यह कहा कि जीर्णोद्धार के बाद झील का खारापन खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. उनकी रिपोर्ट अब तीनों याचिकाओं का हिस्सा बन गई है.

वसुंधरा राजे और उनके दफ्तर को इस बात का बिल्कुल अंदाज नहीं था कि यह ईमेल उन्हें सीधे-सीधे याचिकाकर्ताओं से जोड़ देगा

वनस्पति विज्ञान के जानकार कहते हैं कि यह एक तथ्य है कि शहरी इलाके की झीलों का खारापन समय के साथ बढ़ता ही है. मान सागर झील शहर के बीचोबीच है और यहां का भूजल काफी प्रदूषित है. केपी शर्मा का यह तर्क वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है कि खारापन बढ़ने से एक दिन यह झील पूरी तरह से सूख जाएगी. जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजिकल रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन भी शर्मा के दावों पर पानी फेरता है. जल महल रिसॉर्ट से मिले और कुछ अपने आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक एबी गुप्ता और उनके तीन सहयोगियों ने यह निष्कर्ष निकाला है, ‘झील के पुनरुद्धार के लिए अपनाए गए तरीकों जैसे कि ट्रीटमेंट प्लांट से कचरा निकालना और सेडीमेंटेशन टैंक की व्यवस्था से झील के पानी की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है.’ जल महल मामले के पीछे जारी राजनीति का सुराग याचिकाकर्ताओं की पृष्ठभूमि के साथ-साथ याचिका में उनके द्वारा उठाए बिन्दुओं से भी मिलता है. अपनी याचिका में उन्होंने साफ बताया है कि कोठारी का सबसे बड़ा अपराध यह था कि उन्हें अशोक गहलोत की तत्कालीन कांग्रेसी सरकार का समर्थन प्राप्त था. याचिका में इस बात को रेखांकित किया गया है कि लीज के कागजों पर गहलोत सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से ठीक एक दिन पहले दिसंबर 2003 में हस्ताक्षर किए गए थे. उसके बाद आई भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार के पूरे कार्यकाल के दौरान झील के आसपास की 100 एकड़ ज़मीन पर प्रस्तावित तमाम विकास योजनाओं पर कभी दस्तखत नहीं हुए.  यह भी कहा जाता है कि कोठारी को प्रोजेक्ट दिलवाने में कल्पतरु नामक गहलोत की करीबी फर्म की मुख्य भूमिका रही. नतीजतन, एक ऐसा महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट जिसे जयपुर के एक हिस्से को उसे ही लौटाने के लिए शुरू किया गया था, राजनीतिक मल्लयुद्ध में फंस गया. 

यह बात सही है कि गहलोत सरकार के कार्यकाल के अंतिम दिन लीज पर दस्तखत किए हुए थे. मगर वसुंधरा राजे की सरकार ने लगभग 10 महीने तक इस प्रोजेक्ट की समीक्षा भी तो की थी. इसके बाद, 27 अक्टूबर, 2004 को लीज और लाइसेंस के कागज़ातों पर दस्तखत किए गए. दोनों नालों को मिलाने और झील की गाद हटाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय और राज्य के शहरी विकास सचिव ने भी अपनी मजूरी दे दी थी. जब मरम्मत का काम लगभग पूरा हो गया और कोठारी ने झील के आसपास की ज़मीन को विकसित करके कुछ मुनाफा कमाना चाहा, तब उन्हें तुरंत अदालती समन भेज दिए गए. हालांकि मरम्मत का काम भाजपा कार्यकाल में भी चलता रहा, पर झील के सामने बनाए जाने वाले होटल, रेस्तरां और क्राफ्ट बाज़ार अनुमति मिलने की बाट जोहते रहे.  इन सभी योजनाओं को सन 2009 में कांग्रेस सरकार के आते ही स्वीकृति मिल गयी. इस मुद्दे पर राज्य विधानसभा में काफ़ी बहस भी हुई थी.  फरवरी, 2011 के विधानसभा सत्र के दौरान राजस्थान पर्यटन मंत्री बीना काक ने जल महल विकास योजनाओं को सन 2006 से 2008 तक रोकने के पीछे राजे सरकार के मंतव्यों पर सवाल उठाये थे.

उन्होंने भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि जल महल से जुड़ी सभी विकास योजनाएं इसलिए रोक दी गयीं कि प्रोजेक्ट में एक गैरकानूनी भागीदारी की मांग को पूरा नहीं किया गया था.इन सवालों ने ही तहलका को भी याचिकाकर्ताओं और वसुंधरा राजे सरकार के बीच संभावित संबंधों को टटोलने के लिए मजबूर किया.

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने बताया कि जल महल के मुद्दे पर उनकी पूर्व-मुख्यमंत्री से कभी कोई मुलाकात ही नहीं हुई है. जब तहलका ने इस बारे में वसुंधरा राजे से बात की तो उन्होंने कहा, ‘मेरा ऑफिस आपको मामले से संबंधित सभी दस्तावेज़ भेज देगा. आप पहले उन्हें पढ़िए, फिर हम बात कर सकते हैं.’ उनके प्रेस सचिव ने तहलका को जलमहल से सम्बंधित दस्तावेजों का ईमेल भेजा. इस ईमेल में ‘जल महल समरी’ नामक एक दस्तावेज़ भी मौजूद था. राजे और उनके दफ्तर को इस बात का बिल्कुल अंदाज नहीं था कि यह ईमेल उन्हें सीधे-सीधे याचिकाकर्ताओं से जोड़ देगा. यह ईमेल राजे के ईमेल अकाउंट से फॉरवर्ड किया गया था, जहां उसके मूल सेंडर के तौर पर भागवत गौर के वकील अजय जैन का नाम था. तहलका ने जब इस बारे में पूछताछ की तो राजे के प्रेस सचिव का कहना था, ‘आप जो चाहें वह लिख सकती हैं पर हमारा याचिकाकर्ताओं से कोई संबंध नहीं है.’ एक कहानी जिसकी शुरुआत मान सागर और जल महल के जीर्णोद्धार के लिए हुई थी, अब राजनीतिक रंगमंच में तब्दील हो चुकी है. कोठारी के साथ-साथ, उन तीन सरकारी कर्मचारियों को भी अपराधी और षड्यंत्रकारी घोषित कर दिया गया जिन्होंने जल महल के जीर्णोद्धार से संबंधित कागजों पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन सरकार और कोठारी को इस कहानी का खलनायक मानना पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और इसके जरिए हो सकने वाले ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.

कंज़र्वेशन आर्किटेक्ट अनिशा शेखर मुखर्जी बताती हैं कि जंतर-मंतर के संरक्षण पर काम करते वक्त उन्हें भी कोठारी जैसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ा था. अपने अनुभव बताते हुए वे कहती हैं, ‘हर बार जब भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का मुखिया बदलता, हमें हमारा पूरा काम उसे नए सिरे से दोबारा समझाना पड़ता था.’  आगा खान ट्रस्ट प्रोजेक्ट के निदेशक रत्नीश नंदा कहते हैं, ‘हम आज भी अपनी धरोहर को एक बोझ की तरह देखते हैं,  निधि की तरह नहीं. उदाहरण के लिए, अगर आगरा यूरोप में होता, तो यहां के लोगों का जीवन स्तर काफी बेहतर होता. जबकि अभी इसका उल्टा है.’ इसी बीच कन्सेर्वेशनिस्ट गुरमीत राय एक महत्वपूर्ण बिंदु की तरफ ध्यान खींचते हैं. कल्चरल रिसोर्स कंजर्वेशन इनिशिएटिव के निदेशक के तौर पर कार्य कर रहे राय बताते हैं कि दुनिया भर में जितनी भी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप  होती हैं वह सब उस देश की धरोहरों को बचाने के लिए विकसित की गई एक सोच का परिणाम होती हैं. वे कहते हैं, ‘भारत में तो हमारे पास ऐसा कोई रोड मैप ही नहीं है. मैं भी पंजाब के नाभा फोर्ट वाले प्रोजेक्ट के दौरान अदालती कार्यवाहियों में उलझ गया था. असल में वह प्रोजेक्ट नाभा के महाराज के पड़पोते ने शुरू करवाया था पर मेरे खिलाफ याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को लगा कि मैं किले को एक मॉल में तब्दील करने जा रहा हूं. लेकिन पंजाब हाई-कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा कि धरोहर को बचाने के लिए निजी क्षेत्र का इस्तेमाल करना अच्छी बात है.’ अब सुप्रीम कोर्ट इस बात का निर्णय करेगा कि कोठारी ने जल-महल का जीर्णोद्धार करके सही किया या गलत. या फिर उन्होंने 80 करोड़ रुपये खर्च करके जल महल और उसके आसपास के क्षेत्र को जिस तरह सजाया है, उससे एक शहर के तौर पर जयपुर को कुछ वापस मिलता है या नहीं.  या फिर गौर जैसे लोगों की सीवेज के नालों में झील को वापस खोलने की मांग कितनी जायज है.

रामभरोसे राजकाज

झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा ली गई विभिन्न परीक्षाओं की जांच सीबीआई से करवाने के आदेश दिए हैं. इससे करीब 12 हजार कर्मचारियों का रोजगार खतरे में पड़ता दिख रहा है. अनुपमा की रिपोर्ट.

झारखंड ने किसी और चीज में रिकॉर्ड बनाया हो या नहीं लेकिन तरह-तरह के भ्रष्टाचार में यह सभी राज्यों को पछाड़ चुका है. 12 साल के सफर में इस राज्य ने भ्रष्टाचार के इतने रिकार्ड अपने नाम कर लिए हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर आकलन हो तो संभवतः यह विजेता राज्य बनकर उभरे. कभी राज्य के मुखिया भ्रष्टाचार की बाजीगरी दिखाते हैं तो कभी विधानसभाध्यक्ष. कभी माननीय विधायक राज्यसभा चुनाव में पैसे को लेकर दीन-ईमान और नैतिकता को गिरवी पर रख राज्य को चर्चा में लाते हैं तो कभी राज्यसभा चुनाव ही टालने पड़ जाते हैं. ये सारी बुरी खबरें मानो पर्याप्त नहीं थीं कि हाई कोर्ट के डंडे से राज्य लोक सेवा आयोग के काले कारनामों का घड़ा फूट गया.  14 जून को राज्य के हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि झारखंड लोक सेवा आयोग के तहत आयोजित द्वितीय सिविल सेवा परीक्षा में चयनित 166 अधिकारियों को तत्काल ही काम करने से रोक दिया जाए और उनके वेतन पर भी रोक लगाई जाए. कोर्ट के डंडे से संचालित होने की अभ्यस्त हो चुकी झारखंड की सरकारी मशीनरी इस आदेश के बाद मजबूरी में हरकत में आई. इस परीक्षा के तहत 172 अधिकारियों की नियुक्ति विभिन्न पदों पर हुई थी. 172 में से पांच लोगों ने पदभार ग्रहण ही नहीं किया था, 166 को अदालत ने अयोग्य ठहरा दिया है. ले-देकर पूरे बैच से सिर्फ एक विकलांग महिला अधिकारी कार्यरत हैं.अदालत का आदेश सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहा. उसने आयोग द्वारा अब तक ली गई 16 विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में से 12 की जांच सीबीआई से करवाने का आदेश भी जारी किया है. जिन 12 परीक्षाओं की जांच सीबीआई करने वाली है, उसकी जद में लगभग 12 हजार सरकारी कर्मचारी आ गए हैं. कोर्ट ने अपने आदेश में राज्य के निगरानी विभाग को निर्देश दिया है कि वह इस मामले से संबंधित सारे दस्तावेज 15 दिन के अंदर सीबीआई को उपलब्ध करवाए, और सीबीआई तीन महीने के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दे. जांच रिपोर्ट आने और उस पर कोई निर्णय लेने में अभी काफी वक्त लगेगा, लेकिन जिन लोगों को कोर्ट ने तत्काल कार्यमुक्त करने और वेतन रोकने का आदेश दिया है उन पर इसका बुरा असर दिखना शुरू हो गया. बीडीओ वगैरह बनकर घूमने वाले कई अधिकारी कार्यमुक्त और वेतनरहित होते ही लोगों की नजरों से ओझल हो गये हैं. दूसरी ओर ऐसे अधिकारियों को मोटा दहेज देकर  अपनी बेटी का हाथ सौंपने वाले अभिभावकों के पास फिलहाल किस्मत का रोना रोने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है. बोकारो के निवासी एके सिन्हा कहते हैं, ‘दो साल पहले अपनी जिंदगी की सारी बचत खर्च कर अधिकारी दामाद को अपनी बेटी दी थी. अब मैं अपनी बेटी के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हूं. क्या करूं, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है.’  सिन्हा जी का दर्द कइयों का दर्द है.

कोर्ट के इस फैसले का असर और भी कई रूप  में पड़ रहा है. सरकारी कामकाज इससे सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है. हालत यह है कि पहले से ही पांच दर्जन के करीब अधिकारियों की कमी झेल रहे 70 से अधिक प्रखंड बीडीओ-सीओ विहीन हो गए हैं. सरकार का कहना है कि इसकी भरपाई फिलहाल दूसरे पदाधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर की जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि जब नियुक्त अधिकारियों पर नियुक्ति के कुछ माह बाद ही आरोप लगने लगे थे तब सरकार क्यों नहीं चेती. आखिर उन्हें इतने दिन तक ढोते रहने की क्या मजबूरी थी और भ्रष्ट तरीके से अधिकारी बने लोगों ने राज्य का जो नुकसान किया होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा. इसके अलावा एक और बड़ा सवाल यह है कि जो लोग इस भ्रष्ट नियुक्ति के लिए जिम्मेदार हैं उनके ऊपर क्या कार्रवाई हो रही है. कार्मिक सचिव एएन सिन्हा ने तहलका से कहा, ‘कोर्ट का आदेश है. मामला विचाराधीन है, इसलिए मैं कुछ नहीं बोल सकता.’ जो दलील कार्मिक सचिव दे रहे हैं, लगभग वही भाषा राज्य के सत्ताधारी और विपक्षी दलों के नेताओं की भी रहती है. वे कुछ भी बोलने से कतराते हैं क्योंकि ज्यादातर ने क्योंकि झारखंड लोक सेवा आयोग के जरिये अपने पुत्रों, पुत्रियों, भतीजों, बहुओं और दामादों को उपकृत किया है. हाई कोर्ट के आदेश की चपेट में आए लोगों में जहां इस फैसले से मायूसी है वहीं राज्य का एक तबका खुश भी है. विशेषकर वे लोग जो ईमानदारी से कोशिश करने के बावजूद इन परीक्षाओं में अयोग्य करार दिए गए थे.

झारखंड पहले से ही पांच दर्जन अधिकारियों की कमी से जूझ रहा हैं और अब नए आदेश की वजह से 70 से अधिक प्रखंड बीडीओ-सीओ विहीन हो गए हैं.

हाई कोर्ट के हालिया आदेश से जिस गड़बड़झाले पर पूरे देश की निगाह जम गई है उसकी परतें काफी पहले ही उघड़नी शुरू हो गई थीं. 2008 में बुद्धदेव उरांव और पवन कुमार चौधरी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करके आयोग द्वारा ली गई परीक्षा की वैधता पर सवाल खड़े किए थे. याचिका में यह आरोप भी लगाया  था कि आयोग ने योग्य उम्मीदवारों को दरकिनार करके अयोग्य सदस्यों, नेताओं, अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के रिश्तेदारों-नातेदारों को नियुक्त किया है. याचिकाकर्ताओं ने 152 ऐसे सगे-संबंधियों की सूची भी कोर्ट को सौंपी थी. इस सूची के अनुसार एक ही व्यक्ति या परिवार से ताल्लुक रखने वाले कई अभ्यर्थी अधिकारी बन गए. तब राज्य के राज्यपाल सैय्यद सिब्ते रजी हुआ करते थे. उन्होंने इस मामले की जांच के आदेश दिए थे. निगरानी की रिपोर्ट पर सरकार ने 19 अधिकारियों को बर्खास्त भी किया था लेकिन सरकार के आदेश को चुनौती दी गई तो कोर्ट के एकलपीठ ने सभी बर्खास्त अधिकारियों की सेवा फिर से बहाल कर दी थी. फिर राज्य सरकार ने अपील याचिका दायर करके सेवा बहाल किये जाने के आदेश को चुनौती दी थी. इस बार कोर्ट ने 19 अधिकारियों के बजाय द्वितीय सिविल सेवा परीक्षा में चयनित सभी अभ्यर्थियों को नोटिस भेजा था और बाद में सुनवाई के बाद 166 अधिकारियों को कार्यमुक्त किया और इससे संबंधित कई अन्य याचिकाओं की सुनवाई करते हुए आयोग द्वारा ली गई 12 परीक्षाओं की जांच के आदेश दे दिए. हालांकि इन समस्त परीक्षाओं की जांच का जिम्मा पहले से निगरानी विभाग के पास था, लेकिन उसकी जांच के संतोषजनक परिणाम नहीं निकल रहे थे. 

झारखंड में तीन माह के बाद जेपीएससी के काले कारनामों के सिलसिलेवार खुलासों का सीबीआई जांच की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही बेसब्री से इंतजार किया जाने लगा है. द्वितीय सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों को तो अभी सिर्फ सेवामुक्त व वेतनमुक्त किया गया है. लेकिन निगरानी द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी के अनुसार प्रथम सिविल सेवा परीक्षा में आयोग ने घिनौनेपन की सारी हदें लांघ दीं. प्रथम सिविल सेवा परीक्षा में आयोग ने हर स्तर पर मसलन संचालन, कॉपियों की जांच और इंटरव्यू तक में धांधलियां कीं. आयोग के अध्यक्ष दिलीप प्रसाद और वरीय सदस्य गोपाल प्रसाद सिंह ने कुछ नेताओं, प्रभावशाली अधिकारियों को विश्वास में लेकर ऐसी साजिश रची थी, जिसमें मेधावी अभ्यर्थियों के साथ-साथ विकलांगों तक का हक मार करके अयोग्यों को अधिकारी बनाया गया. चंद उदाहरणों से ही आयोग के दोनों अधिकारियों दिलीप प्रसाद और गोपाल प्रसाद सिंह की साजिश की काली करतूत का पता चल जाएगा. इन दोनों अधिकारियों ने कई लोगों को उपकृत करके करीब दो दर्जन सगे-संबंधियों के अधिकारी बन जाने का मार्ग प्रशस्त किया. आयोग के वरीय सदस्य गोपाल प्रसाद सिंह संथाल परगना इलाके के गोड्डा कॉलेज के प्रोफेसर थे. उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके कॉपियों की जांच के लिए 22 परीक्षकों में से 13 परीक्षक गोड्डा कॉलेज के ही व्याख्याताओं को बना दिया था. राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव वीएस दुबे ने तब गोपाल सिंह के खेल के बारे में सरकार को चिट्ठी लिखी थी.

हालांकि दुबे की बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया था. तहलका से वीएस ने कहा, ‘अगर उस समय सख्ती बरती जाती तब इन कारनामों पर रोक लगाया जा सकता था.’ आयोग के अधिकारियों ने  सात ऐसे उम्मीदवारों को  इंटरव्यू में शामिल होने का मौका दिया, जो प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर सके थे. निगरानी विभाग ने इस बारे में जानकारी मांगी तब आयोग यह नहीं बता सका कि उनके रैंक क्या थे. इतना ही नहीं, पहली परीक्षा के तहत कुल 64 पदों पर नियुक्ति की जानी थी, जिसके लिए नियमानुसार दस गुना ज्यादा यानी 640 अभ्यर्थियों को प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहिए था लेकिन 9,000 के रिजल्ट निकले. नियमानुसार 64 पदों के आलोक में तीन गुना ज्यादा यानी 192 लोगों को इंटरव्यू में बुलाया जाना चाहिए था लेकिन 246 उम्मीदवारों को इंटरव्यू में बुलाया गया  यानी 54 अभ्यर्थियों को गलत तरीके से इंटरव्यू में शामिल करके उनके अधिकारी बनने का मार्ग प्रशस्त किया गया. यह सारा खेल तो आयोग द्वारा ली गई सिर्फ  प्रथम सिविल सेवा परीक्षा भर का है. 12 अन्य परीक्षाओं की जांच सीबीआई करने वाली है. अंदाजा लगाया जा सकता है, कैसे-कैसे कारनामे सामने आएंगे.

सहजीवन का नीड़

उम्मीद का रंग शायद हरा होता होगा. सूखती नदियों और लगातार दूषित हो रहे पर्यावरण की चिंताओं वाले दौर में विवेकानंद नीड़म को देखकर पहला ख्याल यही आता है. चंबल के सूखे बीहड़ों में बने इस हरे भरे ‘आश्रम’ को सहजीवन की उस धारणा के आधार पर बनाया गया है जहां जीवन और प्रकृति के बीच दो तरफा संबंध हैं. प्रकृति से जो लिया जाता है, उस रूप में वापस होता है जिसे वह आसानी से स्वीकार कर सकें. जल संरक्षण के अलग-अलग तरीकों, दैनिक कचरे की रिसाइक्लिंग और गृह-निर्माण की पर्यावरण अनुकूल पद्धतियों को अपनाकर निर्मित किया गया विवेकानंद नीड़म इसी वैकल्पिक जीवनशैली का एक केंद्र है. ग्वालियर जिले की एक वीरान पहाड़ी पर इस आश्रम की परिकल्पना करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सरोदे इसकी स्थापना से जुड़े अनुभव हमें बताते हैं, 

‘हमने 1995 में ग्वालियर के आसपास बसे सहरिया आदिवासियों के बीच काम करना शुरू किया था. एक दिन जब हम एक गांव पहुंचे तो देखा की छह-सात साल की एक लड़की बीमार-सी दिख रही थी. पूछने पर मालूम पड़ा कि कलावती नाम की यह बच्ची विकलांग है. उसकी बड़ी बहन की शादी हो रही थी और उसके मां-बाप उसकी शादी भी उसी दूल्हे से करने की योजना बना रहे थे. हमारे रोकने पर उनका कहना था कि इस विकलांग बच्ची को आगे कौन स्वीकार करेगा? तब हमने बच्चों का एक आश्रम खोलने के बारे में सोचा. फिर काफी खोजबीन के बाद तय किया गया कि हमारी बसाहट प्रकृति को उजाड़कर नहीं, प्रकृति के साथ होनी चाहिए. यह सोच नीड़म की बुनियाद बनी. आज इस आश्रम में कई बच्चे और बुजुर्ग रहते हैं.’

हालांकि इस सामाजिक कार्यकर्ता के लिए नीड़म की स्थापना को सोच के आगे जमीन पर उतारना इतना आसान नहीं था. उन्हें जिले के कलेक्टर ने कई बार समझाया कि वे जिस पहाड़ी को हरा-भरा बनाने की सोच रहे हैं वहां सालों से पौधे नहीं उगे. दूसरी समस्या पहाड़ी की इस 3.5 एकड़ जमीन को नीड़म के लिए लेने की भी थी. सरोदे बताते हैं, ‘ हमारे पास बहुत कम पैसे थे. आश्रम के लिए सरकारी कोष में जमा करवाने के लिए जो पैसा जरूरी था वह भी नहीं था हमारे पास. हमें एक साल तक कानूनी दांवपेंच सुलझाने पड़े तब जाकर हमें कम कीमत पर यह जमीन मिल पाई.’

आज इस आश्रम को 17 साल हो गए हैं और इन सालों में बायोडाइजेस्टर की मदद से काम करने वाले बायो टॉयलेट, गंदे पानी को रिसाइकल करने वाली भूमिगत टंकियां और गोबर गैस संयंत्र जैसी कई पर्यावरण अनुकूल युक्तियां यहां लागू की गईं. अनिल और उनकी पत्नी अल्पना सरोदे के मार्गदर्शन में नीड़म के कार्यकर्ताओं ने दशकों से बंजर रही इस पहाड़ी को कुछ सालों में ही हरा-भरा बना दिया.

विवेकानंद नीड़म में बने बायो टॉयलेट का प्रयोग इतना सफल साबित हुआ कि सेना इनका इस्तेमाल सियाचिन में कर रही है वहीं लक्षद्वीप में  प्रशासन की मदद से ऐसे 12,000 टॉयलेट बन रहे हैं

हालांकि इन मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं के सामने पहले से कोई तैयार योजना नहीं थी जिसके तहत वे अचानक पहाड़ी को हरा-भरा बनाते. इसके लिए उन्हें कई स्तरों पर प्रयोग करने पड़े. इनमें सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख है नीड़म के खास बायोडाइजेस्टर से संचालित बायो टॉयलेट. भारतीय रक्षा अनुसंधान केंद्र ने भारत में पहली बार बायो टॉयलेट की स्थापना विवेकानंद नीड़म में ही करवाई थी. इन विशेष शौचालयों के बारे में आश्रम के कार्यकर्ता आशाराम प्रजापति बताते हैं, ‘ इन शौचालयों से निकलने वाला सारा मानव-मल इस बायोडाइजेस्टर में जाता है. इसमें मौजूद विशेष बैक्टीरिया मल को पचाकर उसे पानी में बदल देते हैं.’ बायो टॉयलेट के साथ-साथ 14,000 लीटर का वाटर-रिचार्जिंग टैंक भी नीड़म के वाटर रिचार्जिंग सिस्टम का एक महत्वपूर्ण अंग है. साफ-सफाई और नहाने आदि के लिए इस्तेमाल किया गया पूरा पानी खास नालियों के जरिए इस वाटर-रिचार्जिंग टैंक में लाया जाता है. बायो टॉयलेट से निकला पानी भी इसी  टैंक में लाया जाता है. यहां से इस पानी को पाइप-लाइन के जरिये परिसर के पेड़-पौधों में डाला जाता है.  इस तरह इस्तेमाल किए जा चुके पानी को वापस पौधों में डालकर पहाड़ी का भू-जल स्तर बढ़ाने का प्रयास किया जाता है. नीड़म में रोजमर्रा के कचरे को खाद में बदलने के लिए तीन बड़ी नाडेप-खाद टंकियां भी हैं. इसके अलावा आश्रम में केचुओं से बनने वाली ‘वर्मीकल्चर खाद’ और गोबर-गैस बनाने के लिए स्थापित कचरा टंकी के दो अलग हिस्से भी मौजूद हैं. 

नीड़म में बना विशेष बायो टॉयलेट इतना अहम प्रयोग साबित हुआ कि बाद में देश भर में कई संस्थान अपने यहां इनकी स्थापना के लिए अनिल से संपर्क कर चुके हैं.  वे बताते हैं, ‘ सियाचिन की रक्षा पोस्टों पर भी हमारे बायो-टॉयलेट लगवाए गए हैं. असल में ऐसी बर्फीली जगहों पर मानव मल का साफ-सुथरा खात्मा एक बड़ी समस्या थी. इसी तरह लक्षद्वीप द्वीप समूहों में रहने वाले लोगों के लिए भी मानव मल का हाइजीनिक खात्मा भी बड़ा सरदर्द था. अब वहां भी 12,000 बायो-टॉयलेट लगवाए जा रहे हैं.’ आज नीड़म में 250 प्रकार के 11,000 पेड़-पौधों के साथ-साथ 60 प्रजातियों के पक्षी भी मौजूद हैं. यहां भू-क्षरण को रोकने के लिए पूरी पहाड़ी पर सीढ़ी नुमा पट्टियां बनाकर, उन पर पेड़ लगवाए गए हैं. इन पेड़ों के चारों ओर छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर उनमें पानी, खाद और सूखे पत्ते डाल दिए जाते हैं.

आश्रम में सहजीवन की इस अवधारणा को पानी बचाने और कचरे की रिसाइकलिंग के साथ-साथ गृह-निर्माण में भी इस्तेमाल किया गया है. आश्रम में बने 24 घरों के निर्माण में ‘लो-कॉस्ट हाउसिंग’ के सिद्धांतों का सख्ती से पालन किया गया है. अनिल बताते हैं, ‘ हमने यहां घरों के निर्माण में लारी-बेकर कांसेप्ट का इस्तेमाल किया है. यानी सभी घरों की दीवारें चूहे दानी जैसी बनावट की हैं और अंदर से लगभग खोखली. इससे कंक्रीट और ईंटों का इस्तेमाल तो 50 प्रतिशत तक घटता ही है, घर का तापमान भी मौसम के हिसाब से कम-ज्यादा होता रहता है. जैसे गर्मियों में इन घरों के भीतर आम घरों से 6 -7 डिग्री कम तापमान रहता है और सर्दियों में 6 -7 डिग्री ज्यादा.’ साथ ही नीड़म के घरों के निर्माण में फेंके जा चुके पुराने सामानों का भी इस्तेमाल हुआ है. पुरानी बोतलों, पुराने खंबों, टूटे टाइल्स और पुरानी जालियों का रचनात्मक इस्तेमाल कर इन घरों की सुंदर सजावट की गई है. 

पिछले 17 सालों से विवेकानंद नीड़म के जरिए एक वैकल्पिक जीवन शैली विकसित करने का प्रयास कर रहे अनिल का मानना है कि सहजीवन का यह मॉडल नदियों और पर्यावरण को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. प्रदूषित नदियों और सूखते जल-स्रोतों के बीच आए दिन पानी की किल्लत झेल रहे शहरों और गांवों के लोगों को सह-जीवन का रास्ता दिखाते हुए वे कहते हैं, ‘अगर फैक्टरियों के कचरे को बायोडाइजेस्टर से ट्रीट करके नदियों में डाला जाएं तो काफी हद तक नुकसान को कम किया जा सकता है. साथ ही आम लोग भी अपने-अपने घरों में छोटे-छोटे बायोडाइजेस्टर लगवाकर भू-जल स्तर को बनाए रखने के प्रयास कर सकते हैं.’

भाग्य भरोसे भाजपा

जो उपचुनाव उत्तराखंड भाजपा के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है, उसमें पार्टी की ताकत का ज्यादातर हिस्सा मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को चुनौती देने के बजाय अपना खेमा बचाने में खर्च हो रहा है. मनोज रावत की रिपोर्ट.

उत्तराखंड के सितारगंज विधानसभा उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सामने चुनौती पेश कर रही भाजपा की असली ताकत आक्रामक रुख अपनाने के बजाय अपने विधायकों को पार्टी में बनाए रखने की रक्षात्मक रणनीति में चुक गई दिखती है. गौरतलब है कि सितारगंज से भाजपा के ही विधायक किरन मंडल ने मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए सीट छोड़ते हुए अपनी पार्टी को बड़ा झटका दिया था. चुनाव प्रचार में कुछ ही दिन बाकी हैं, मगर एक के बाद एक विधायकों के पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने की खबरों के कारण भाजपा का चुनाव अभियान अब तक रफ्तार नहीं पकड़ पाया है.

दूसरी ओर 13 जून को चुनाव अधिसूचना जारी होने के दिन ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने नामांकन करवाकर चुनाव अभियान शुरू कर दिया था और इस लिहाज से भाजपा पर रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त बना ली थी. उनके नामांकन में उनकी कैबिनेट के अधिकांश मंत्री व सांसदों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री हरीश रावत भी शामिल हुए. दूसरी ओर, भाजपा जब तक मंडल के दलबदल के झटके से उबर कर सितारगंज चुनाव की रणनीति बनाना शुरू करती तब तक देहरादून में घनसाली से भाजपा विधायक भीम लाल आर्य की भी भाजपा के हाथों से फिसलने की अफवाह उड़ने लगी. भीमलाल की भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के विरुद्ध उम्मीदवार न उतारने की अपील वाली चिट्ठी सार्वजनिक होना उत्तर प्रदेश के कन्नौज में प्रत्याशी न उतार पाने से फजीहत झेल रही भाजपा के लिए बड़ा झटका था. चिट्ठी सार्वजनिक होने के अगले दिन यानी 16 जून को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके स्वीकारा कि भीमलाल वास्तव में उनके हाथ से निकल कर कांग्रेस के पाले में बैठ गए हैं. मंडल और भीम लाल प्रकरण से खीजी भाजपा ने कांग्रेस द्वारा विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप की पुष्टि कराने के लिए सितारगंज के एक प्रधान किशोर राय को पेश करके उनसे रहस्योद्घाटन कराया कि किरन मंडल को कांग्रेस ने 10 करोड़ रुपये में खरीदा है. हालांकि आरोप लगाने वाले राय कोई सबूत पेश नहीं कर पाए.  अजय भट्ट ने बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त को इन आरोपों की सीडी ही सबूत के रूप में सौंपी और मुख्यमंत्री के नामांकन को निरस्त करने की मांग की.

नेता प्रतिपक्ष के द्वारा भीमलाल के पार्टी छोड़कर जाने की स्वीकारोक्ति के दो दिन बाद हुए बड़े उलटफेर में अचानक भीमलाल ने देहरादून में प्रकट होकर स्वयं को भाजपा का सच्चा सिपाही बताया. मुख्यमंत्री के विरुद्ध प्रत्याशी खड़े न करने की अपील को उन्होंने किसी के द्वारा धोखे में लिखवाई चिट्ठी बताया. कांग्रेस में जाने की अफवाह को भी उन्होंने बेबुनियाद बताया. लेकिन सूत्रों के अनुसार दाल में कुछ काला तो था ही. उनके वापस आने से भाजपा को भले ही सुकून मिला हो परंतु तब तक भाजपा को बड़ा  राजनीतिक नुकसान हो गया था. चुनाव अभियान के शुरुआती दिनों में भाजपा को चुनावी रणनीति बनाने के बजाय सारा समय भीमलाल बचाओ अभियान पर लगाना पड़ा. लंबी जद्दोजहद और मंथन के बाद किसी तरह 19 जून को सितारगंज से भाजपा प्रत्याशी के रूप में प्रकाश पंत का नाम तय हो पाया. पंत  नामांकन दाखिल करने के अंतिम दिन यानी 20 जून को नामांकन कर पाए. पंत के नामांकन में पूर्व मुख्यमंत्री खंडूड़ी और निशंक की गैरमौजूदगी भाजपा कार्यकर्ताओं को खटक रही थी. एक भाजपा कार्यकर्ता दबी जुबान में कहते हैं, ‘भले ही सितारगंज में उपचुनाव हो रहा हो लेकिन इस चुनाव से राज्य के मुख्यमंत्री का भविष्य तय होना था और भाजपा के पास कांग्रेस द्वारा कराए गए किरन मंडल के दलबदल का सही अवसर भी था. इसलिए दिग्गजों की उपस्थिति से न केवल कार्यकर्ताओं में उत्साह आता बल्कि संकट के क्षणों में पार्टी की एकजुटता भी दिखती.’ मंडल और भीमलाल एपिसोड के बाद हुई राज्य भाजपा मुख्यालय की बैठक में विधायकों ने राज्य नेतृत्व पर संगठित होकर रणनीति न बनाने के आरोप तक जड़े. सूत्रों के मुताबिक विधायकों का बैठक में यहां तक कहना था कि हमारे नेता चाहते हैं कि हम दूसरी पार्टी के हाथों बिक जाएं.

सितारगंज में मुख्यमंत्री बहुगुणा और प्रकाश पंत के अलावा और चार उम्मीदवार हैं. मतदान 8 जुलाई को होना है.  सरकार में सहयोगी दल बसपा और उक्रांद के अलावा सपा ने भी अपना उम्मीदवार उतारने के बजाय कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया है. इस तरह चुनावी मुकाबला सीधा-सीधा कांग्रेस और भाजपा के बीच में है. सितारगंज विधानसभा में कुल 91,247 मतदाता हैं. लैंड ग्रांट एक्ट में मिले पट्टों को भूमिधरी में बदलने का शासनादेश जारी करने के बाद कांग्रेस 29 प्रतिशत बंगाली मतदाताओं का झुकाव अपनी ओर मान रही है. कोई सशक्त मुस्लिम उम्मीदवार न होने के कारण सितारगंज के 22 प्रतिशत मुसलिम मतदाताओं के बड़े हिस्से का भी कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने का भरोसा कांग्रेस के रणनीतिकारों को है. इसके अलावा  10 प्रतिशत सिख व पंजाबी, 10 प्रतिशत थारु और 5 प्रतिशत शहरी क्षेत्र के कारोबारी मतदाता हैं. प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य का दावा है कि उन्हें हर वर्ग के मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है. कांग्रेस का चुनाव अभियान खुद मुख्यमंत्री बहुगुणा और प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य ने संभाल रखा है. प्रदेश कांग्रेस ने भितरघात की आशंका को समाप्त करने के लिए बिना अनुमति के कांग्रेसियों के सितारगंज आने पर रोक लगाई है. 

सूत्रों के मुताबिक भाजपा विधायकों का बैठक में यहां तक कहना था कि हमारे नेता चाहते हैं कि हम दूसरी पार्टी के हाथों बिक जाएं

सितारगंज के मुसलिम बहुल गांव सिसैया में बहुगुणा लोगों से अपील करते हुए कहते हैं,  ‘आज तक सितारगंज को कोई जानता नहीं था. अब प्रदेश में होने वाला हर विकास कार्य सितार गंज से शुरू होगा.’ बारी गांव में मुख्यमंत्री की सभा में मौजूद मोहम्मद इमरान कहते हैं कि इस चुनाव में मुद्दा केवल विकास है. स्नातक इमरान की पीड़ा यह है कि कंप्यूटर में डिप्लोमा करने के बाद भी उन्हें सितारगंज के औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार नहीं मिल पाया है. वे बताते हैं कि यहां की औद्योगिक इकाइयों में स्थानीय पढ़े-लिखे, व्यावसायिक शिक्षा पाए बेरोजगारों के बजाय बाहरी राज्यों के युवकों को नौकरी दी जाती है. पास के गांव कल्याणपुर के ग्रामीणों की शिकायत है कि गांव के दो ट्यूब वेलों से सिंचाई का पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है. मुख्यमंत्री हर मांग पर कहते हैं कि आचार संहिता तक उनके ओंठ सिले हैं पर बाद में हर परेशानी का हल निकलेगा. 

पैतृक क्षेत्र पौड़ी और लोकसभा क्षेत्र टिहरी की किसी सीट के बजाय सितारगंज से चुनाव लड़ने की वजह पूछने पर बहुगुणा तहलका से कहते हैं, ‘मेरे लिए सारा राज्य ही अपना क्षेत्र है. यह पिछड़ा क्षेत्र था. कई चुनौतियां थी. इसे भी आगे बढ़ाना था.’ हम उनसे पूछते हैं कि भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त और लोकतंत्र की हत्या को मुद्दा बना रही है, तो उनका जवाब आता है, ‘बेबुनियाद आरोप हैं. कांग्रेस सरकार की लोकप्रियता से घबरा कर और उपचुनाव में निश्चित हार से ध्यान बटाने के लिए भाजपा स्तरहीन आरोप लगा रही है. सच तो यह है कि राज्य भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की गुटबाजी से परेशान भाजपा के विधायकों का वहां दम घुट रहा है और वे और ठिकानों की तलाश में हैं.’ उधर, भाजपा प्रत्याशी प्रकाश पंत जनसभाओं के अलावा घर-घर जाकर संपर्क कर रहे हैं. वे स्वयं को मिल रहे समर्थन से संतुष्ट हैं. भाजपा प्रवक्ता और युवा मोर्चे के पूर्व अध्यक्ष गजराज सिंह का दावा है कि पार्टी एकजुट होकर कड़ी टक्कर दे रही है. प्रचार में पार्टी के बड़े नामों की गैरमौजूदगी पर वे बताते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष चुफाल और प्रभारी थावर चंद गहलोत प्रचार करके जा चुके हैं .वे  कहते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री खंडूड़ी और निशंक भी सितारगंज में चुनाव प्रचार के लिए समय देंगे. वे बताते हैं, ‘सितारगंज में भाजपा जल्दी ही हेमामालिनी, वरुण, सिद्वू सहित 36 स्टार प्रचारकों को प्रचार में उतारने वाली है.’ उधमसिंह नगर के नौ विधायकों में से 7 भाजपा के हैं. भाजपा इन विधायकों के अलावा राज्य के अन्य विधायकों को भी  सितारगंज चुनाव में झोंकने की रणनीति पर काम कर रही है. पंत अलग राज्य बनने के बाद बनी पहली अंतरिम सरकार में विधानसभा अध्यक्ष और पिछली भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं. हाल के आम विधानसभा चुनावों में वे अपनी परंपरागत सीट पिथौरागढ़ से चुनाव हार गए थे. तहलका से बातचीत में वे कहते हैं, ‘सितारगंज चुनाव में लोकतंत्र की हत्या, भ्रष्टाचार और कांग्रेस सरकार की असफलता के 100 दिन प्रमुख मुद्दे हैं.

पूर्व विधायक किरन मंडल पर उनके नजदीकी रिश्तेदार ने ही बिकने का आरोप लगाया है.’ लेकिन मंडल तो कहते हैं कि उन्होंने भूमिधरी और विकास के लिए विधायकी का बलिदान किया. इस पर पंत कहते हैं, ‘कांग्रेस का भूमिधरी का वादा झूठ का पुलिंदा है. 30 मई को इस संबंध में जारी शासनादेश प्रचलित कानूनों और विधियों के विपरीत है. फिर 4 जून को मुख्य राजस्व आयुक्त का आदेश पहले के सभी आदेशों को समाप्त करता है. हमने भूमिधरी के मामले में कांग्रेस से चार प्रश्न पूछे हैं, कांग्रेस को उनके जवाब सार्वजनिक रुप से देने चाहिए.’  उनका आरोप है कि सितारगंज में राज्य बनने के बाद 10 साल से बसपा विधायक रहे और कांग्रेस के सांसद. उनकी निष्क्रियता से विकास रुक गया. पंत कहते हैं, ‘हम जनता से पांच साल मांग रहे हैं. हम क्षेत्र की सूरत बदल देंगे.’ किरन मंडल के भांजे और भाजपा नेता दीपक विश्वास का दावा है कि बंगालियों को किए जा रहे भूमिधरी के दावे में दम नहीं है. वे कहते हैं, ‘बंगालियों को भूमिधरी वाले शासनादेश की हकीकत पता चल गई है इसलिए वे कांग्रेस के छलावे में नहीं आएंगे.’ उनके अनुसार यहां का बंगाली मतदाता  भाजपा का मतदाता रहा है और इस चुनाव में भी भाजपा के साथ रहेगा. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का भी दावा है कि कुछ दिनों में स्थितियां उलट हो जाएंगी. सूत्र बताते हैं कि भाजपा को कांग्रेस के एक खेमे द्वारा मुख्यमंत्री के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का भी भरोसा है. वे भी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार संगमा की तरह किसी चमत्कार की आशा में हैं. 

 

‘‘ मिशन फॉर क्लीन गंगा-2020 ब्यूरोक्रेट्सों की चोंचलेबाजी और चालबाजी है’’

गंगा की अविरलता और निर्मलता में कौन अहम मसला है?

अविरलता. इसे छोड़ निर्मल गंगा की कामना नहीं की जा सकती. सिर्फ निर्मलता के नाम का जाप वे लोग ज्यादा करते रहते हैं,जिनकी रुचि इसके नाम पर बजट बढ़ाने-बढ़वाने का खेल करना होता है.

तो सीवर, औद्योगिक कचरों आदि को लेकर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं! 

ऐसा मैं नहीं कह रहा. लेकिन आप देखिए कि निर्मल गंगा के लिए जो जरूरी है, वह तो होता नहीं अलबत्ता सीवर ट्रीटमेंट और गंगा सफाई आदि के नाम पर घोषणाओं-योजनाओं का रेला लग जाता है. अब आप देखिए कि कानपुर में 402 चमड़ा फैक्ट्रियों को बंद करने का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दे रखा है लेकिन कहां एक भी बंद करवाया जा सका. निर्मल गंगा के लिए ही तो गंगा एक्शन प्लान भी चला, उसका हश्र देखा जा चुका है.

निर्मल गंगा के लिए ही क्लीन गंगा मिशन 2020 भी शुरू होनेवाला है!

यह तो सरासर कुछ आईएएस अधिकारियों का चोंचलेबाजी और चालबाजी है. इस मिशन के लिए विश्व बैंक से सात हजार करोड़ रुपये मिलने हैं और भारत सरकार की ओर से आठ हजार रुपये मिलने हैं. अब यह पैसे एनजीओ के माध्यम से खर्च होने हैं तो आईएएस अधिकारियों ने इसके लिए अपना एक एनजीओ बना रखा है, उसी से पैसे खर्च होंगे. अब इसमें भी गंगा एक्शन प्लान की तरह का खेला होगा. गंगा एक्शन प्लान को लेकर 1985 में राजीव गांधी ने भाषण दिया था कि गंगा की सफाई जरूरी है ताकि उसके पानी को पीने लायक बनाया जा सके. 1986 में जब ड्राफ्ट तैयार हुआ तो अधिकारियों ने बहुत ही चालाकी से पीने लायक पानी नहाने लायक लिख दिया. और फिर करोड़ों का वारा न्यारा होता रहा. उसी तरह क्लीन गंगा प्रोजेक्ट में यह स्पष्ट ही नहीं किया गया है कि किस लायक गंगाजल को क्लीन किया जाएगा, उसका पैमाना क्या होगा लेकिन यह तय किये बिना ही पैसे भी निर्गत होने लगे.

गंगा के नाम पर निर्मलता-अविरलता के पापुलर फ्रंट पर ही सभी फंसे हुए हैं जबकि गंगा के दूसरे संकटों की भी फेहरिश्त लंबी है…

आप ऐसा नहीं कह सकते. हम तो दूसरे मसले पर ही ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इलाहाबाद में नवप्रयागपुरम और ओमेक्स सिटी का निर्माण इलाहाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा कुंभ स्थल के पास नदी इलाके में हो रहा था, वह रूका. कोर्ट ने कहा कि नदी के बाढ़ इलाके के 500 मीटर के दायरे में कोई निर्माण नहीं हो सकता. गंगा की जमीन क्या है, यह अब तक तय ही नहीं सका है, जिस वजह से अतिक्रमण होते रहता है, इसे लेकर भी आंदोलन होगा. 

सिर्फ ब्यूरोक्रेट्सों और सरकारी तंत्रों को कब तक दोष देते रहेंगे. आंदोलनकारी भी अपनी-अपनी गंगा बहाने के फेरे में बदलते रहते हैं. 

सच है यह. अपनी-अपनी गंगा बहाने में बहुत सारे लोग लगे हुए हैं. आंदोलनकारियों की बात यदि कर रहे हैं तो सबसे पहले तो विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल जी को जवाब देना चाहिए, जिन्होंने कहा था कि टिहरी के माध्यम से यदि अन्याय हुआ तो वे 60 हजार संतो के साथ जल समाधि ले लेंगे. टिहरी से तो चार इंच व्यास वाले पाईप से ही गंगा को निकाला गया, कहां किसी ने कुछ किया. स्व.कवि प्रदीप रौशन एक कविता के माध्यम से पूछा करते थे- चार इंच में बहा रहे हो, अविरल धारा. भरी सभा में बोलो कौन गंगा हत्यारा…

 

हिंसा में डूबकर, हमसब पर हंसती फिल्म : गैंग्स ऑफ वासेपुर

फिल्म: गैंग्स ऑफ वासेपुर

निर्देशक: अनुराग कश्यप

मुख्य कलाकार: मनोज वाजपेयी, तिगमांशु धुलिया, पीयूष मिश्रा और रिचा चड्ढ़ा

रेटिंग: 4/5

वासेपुर की हिंसा हम सबकी हिंसा है जिसने फ़ैज़लों को स्कूल छोड़कर रेलगाड़ियां साफ़ करने और ख़त्म होते रहने के लिए मज़बूर किया है. मैं नहीं जानता कि आपके लिए ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ गैंग्स की कहानी कितनी है, लेकिन मेरे लिए वह उस छोटे बच्चे में मौज़ूद है, जिसने अपनी माँ को अपने दादा की उम्र के एक आदमी के साथ सोते हुए देख लिया है, और जो उस देखने के बाद कभी ठीक से सो नहीं पाया, जिसके अन्दर इतनी आग जलती रही कि वह काला पड़ता गया, और जब जवान हुआ, तब अपने छोटे भाई से बड़ा दिखता था. फ़िल्म उस बच्चे में भी मौज़ूद है, जिसके ईमानदार अफ़सर पिता को उसी के सामने घर के बगीचे में तब क्रूरता से मार दिया गया, जब पिता उसे सिखा रहे थे कि फूल तोड़ने के लिए नहीं, देखने के लिए होते हैं. थोड़ी उस बच्चे में, जिसकी नज़र से फ़िल्म हमें उसके पिता के अपने ही मज़दूर साथियों को मारने के लिए खड़े होने की कहानी दिखा रही है. थोड़ी उस बच्चे में, जो बस रोए जा रहा है, जब बाहर उसके पिता बदला लेने का जश्न मना रहे हैं.

थोड़ी कसाइयों के उस बच्चे में, जिस पर कैमरा ठिठकता है, जब उसके और उसके आसपास के घरों में सरदार ख़ान ने आग लगा दी है. फ़िल्म मेरे लिए उस कोयले की खदान में भी जाकर ठहर गई है, जिसमें बारह घंटे से पहले रुकने पर खाल उधेड़ दी जाएगी, जिसमें रोशनी कम है या हवा, यह ठीक से बताना मुश्किल है, और तब कभी-कभी चमकती रोशनी में काले पड़े शरीर हैं, उस आदमी का चेहरा है, जिसे उस समय के बाद हमेशा के लिए क्रूर हो जाना है, अपने लोगों को मारना है, उनके घर जलाने हैं और शक्ति पानी है. और जब मरना है, तो अपने बेटे को उस आग में छोड़ जाना है, जिसमें वह अपने बाल तभी बढ़ाएगा, जब अपने पिता के हत्यारे से बदला ले लेगा. और बदला नहीं लेगा, कह के लेगा उसकी. 

कितनी फ़िल्में होंगी, जो किसी अपराधी की बिना शादी के पैदा हुए बेटे पर इतना भर ठहरेंगी कि जब अब्बू आएं तो वह पढ़ाई छोड़कर दरवाज़े तक दौड़ा जाए और कहे- सलाम अब्बू, और इतने में ही आपको अन्दर कहीं रोना आए. कितनी फ़िल्में होंगी, जो आपको कोयला खदानों के माफ़िया के बारे में बताते हुए उनका इतिहास और वर्तमान बताएंगी, कोयले और लोहे की चोरियां इतनी आम दिखाएंगी कि रात का इंतज़ार नहीं और उन्हीं रास्तों से छोटे छोटे बच्चे लोहा चुराकर लाते हैं जिनसे आईसक्रीम वाला जा रहा है.

कितनी फ़िल्में टाटा बिड़ला और थापर में खदानों की बन्दरबाँट की बात करेंगी और कहेंगी कि अंग्रेज तनख़्वाह भी देते थे और छत भी, लेकिन आज़ादी के बाद के अंग्रेज छत तोड़कर-जलाकर सिर्फ़ तनख़्वाह देते हैं, फिर वे कहीं भी जाकर छत डालें.

कितनी फ़िल्में उन गरीबों के घर जला रहे आदमी के चेहरे पर ठहरेंगी? उस आदमी के चेहरे की असहजता पर भी, जिसके हुक्म से अभी अभी उसके एक कारिंदे के परिवार को ख़त्म कर दिया गया है?  इसीलिए ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में भले ही कितनी भी गालियाँ और गोलियाँ हों, कितने ही कटते हुए आदमी और भैंसे हों, लेकिन अपनी भीतर की परत में यह हमारी सामूहिक कहानी है. वासेपुर के अंश हम सबके बीच में हैं. वह हमारी माँ ही है, जो घर के पुरुषों द्वारा रचे जा रहे हत्या के षड्यंत्र के दौरान बैकग्राउंड में दबी आवाज़ में नौकर से कह रही है कि चीनी मिट्टी के बरतन में खाना परोसना, क्योंकि मेहमान मुसलमान है. वे हमारे पिता ही हैं, जो भले ही दुनिया भर का कत्ल करके लौटे हों, लेकिन अपने बेटे को कुछ छर्रे लगने पर पागल हुए जाते हैं.

इसकी तेज रफ़्तार बहुत सारी डीटेल्स आपके दूसरी बार में देखने के लिए भी छोड़ देती है. लेकिन तब भी, जहाँ जहाँ फ़िल्म ठहरती है अपने किरदारों के दुखों और गुस्से में, वहाँ यह और भी अलग होती जाती है. वैसे पल, जहाँ यह धीमी होती है, कविता जैसी, जब वे कोयले से सिर तक सने लड़ रहे हैं. यह अपनी घटनाओं के लिए नहीं, अपने किरदारों और हालात पर उनकी प्रतिक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण फ़िल्म है. यह इतनी स्वाभाविक है कि हत्या करके और लूटकर भागते इसके किरदारों की चप्पलें बीच में ही छूट जाती हैं और वे उन्हें लेने लौटते हैं. यह वासेपुर की गली ही है, जिसमें सरदार ख़ान एक पहलवान को दिनदहाड़े छुरे से मार रहा है और पीछे कुछ औरतें और बच्चे दूसरी दिशा में आराम से चले जा रहे हैं. फ़िल्म बार-बार उस हिंसा के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गवाह बन रहे बच्चों पर ठहरती है, उन बच्चों पर भी, जिन्हें बाद में यही सब करना है, और इसीलिए यह ख़ास है. 

फ़िल्म अपने किरदारों, उनकी ज़िन्दगियों, उनके मोहल्लों और उनके शहर की विश्वसनीयता बार-बार अपनी हदों से आगे जाकर भी कायम करती है. कभी ‘कसम पैदा करने वाले की’, ‘कुली’ या ‘गाइड’ के पोस्टरों से, कभी पिस्तौल देखते ही चमत्कारिक ख़ुशी से भर जाने वाले अपने किरदारों के चेहरों से, कभी ऑटोमैटिक पिस्तौलों की उनकी चाह से, और कभी घर में फ़्रिज आने की ख़ुशी से अपने अलग-अलग समय को बताती हुई। कभी यह उन गाँव वालों के साथ बैठी है जो मंत्रीजी के स्वागत में उनके घर के बाहर फलों की टोकरियाँ लेकर बैठे हैं, कभी उनके साथ, जो उनके बेटे के पैरों में गिर रहे हैं। देखिए, क्या होना था लोकतंत्र और मज़दूर विकास पार्टी को क्या करना था? 

यूं तो आप इसे सिर्फ़ प्रतिशोध की कहानी भी समझ सकते हैं, लेकिन यह अलग इसलिए है कि अपने गैंगस्टर्स के घरों की रसोइयों में दाखिल होती है, उनके चौबारों पर टहलती है, उनके साथ चाट खाती है, लस्सी पीती है, उनके पास बैठती है जब वे अपनी प्रेमिकाओं के साथ नल पर कपड़े धो रहे हैं, उनके साथ शरमाती है, जब वे किसी पार्क में पहली बार उनके हाथ छू रहे हैं, उनके साथ उनकी शादियों के गीत गाती है और देसी कट्टे से किए फ़ायर से जब उनके हाथ झनझनाते हैं, तो हँसती है.

यह आईसक्रीम की चोरी से लेकर कोयले, लोहे, मछली, तालाब, पैट्रोल और पैसे की, वह हर लूट दिखाती है जो वासेपुर में हो रही है.

वासेपुर के ऐक्टर उसकी साँसें हैं – मनोज वाजपेयी इसलिए कि अपने किरदार की कमीनगी में इतना उतरते हैं कि आपको बार-बार बेहद विकर्षित करते हैं, लेकिन बस इतना ही कि जब वे अपना बदला ले रहे हों तो आप उनके बिल्कुल साथ खड़े हों. जैसा काम उन्होंने यहाँ किया है, वह दुर्लभ है. रिचा चड्ढा अपने उच्चारण, लहजे और रोने-हँसने में वही हैं जो शादी में ढेर सारा अतिरिक्त और फूहड़ मेकअप पुतवाकर आई कोई बेपढ़ी लड़की होगी. उनका किरदार खूब लिखा गया है और उन्होंने इसे खूब जिया भी है. नवाज़ुद्दीन जब आते हैं, फ़िल्म कोई और ही फ़िल्म लगने लगती है. इसी तरह जयदीप अहलावत, तिग्मांशु धूलिया, पीयूष मिश्रा, रीमा सेन, हुमा कुरैशी और बहुत सारे और भी ऐक्टर मिलकर हमें पूरा यक़ीन दिलाते हैं कि हम उनकी कहानी में नहीं, उनके जीवन में हैं. 

अनुराग कश्यप इसलिए भी अलग हैं कि उनकी फ़िल्मों के स्त्री पात्र भले ही थोड़ी देर के लिए आएँ, मामूली जीवन जी रहे हों या कितने भी सताए जा रहे हों, लेकिन हमेशा अपने पूरे आत्मसम्मान और शक्ति के साथ आते हैं. वे हॉल में फ़िल्म देखते हुए सीटियाँ बजाती हैं, चिल्लाकर बच्चन को शादी का प्रस्ताव देती हुई, और बिना मर्ज़ी के छूने वाले प्रेमी को परमिशन लेने का कहती हैं. वे हमेशा गुस्से में रोती हैं, अबला होकर कभी नहीं. यह उनके यहाँ ही संभव है कि जब उनकी स्त्रियों का बस नहीं चलता कि अपने पतियों को वेश्याओं के पास जाने से रोक सकें, तो डाँटकर उन्हें खूब खाने को कहती हैं कि वहाँ जाकर कम से कम उनकी बेइज़्ज़ती तो न कराए. वे उनसे थप्पड़ खाती हैं और भले ही उल्टा मार न सकें, लेकिन उनके लिए दरवाज़े हमेशा के लिए बन्द कर देती हैं. और अपने गालों पर वे उंगलियाँ कभी भूलती नहीं.     

ट्रेन में, पटरियों पर, धर्मशालाओं-होटलों में, सड़क पर, मुहर्रम के मातम और बनारस के घाटों पर अनुराग कश्यप हमेशा की तरह बेहद सहजता से फ़िल्म को ले जाते हैं. वही उन्हें अलग करता है. पहली बार वे अपनी शहरी स्वभाव की फ़िल्मों से अपनी जड़ों की ओर लौटे हैं. और यह कैसी विडम्बना है कि उनका दबंग किरदार जब घायल होकर गिरता है, उसके लिए कोई एम्बुलैंस नहीं, कोई गाड़ी या मोटरसाइकिल भी नहीं, उसके लिए एक साइकिल रिक्शा है बस, जिस पर किसी दुकानदार जायसवाल का नाम लिखा है. उसे उसी पर गिरना है, रिक्शा को चल पड़ना है और ओझल होते जाना है. वही रिक्शा, जिसे उसके जैसे कितने ही सरदार ख़ान देश के हर कोने में चलाते हैं और इस तरह देश चलाते हैं, लेकिन कोई कोना उनका नहीं. यह वह जगह है, जहाँ किसी कलाकार या कलाकृति को अपना स्टैंड लेना होता है, अपने होने की वजह बतानी होती है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ यहीं कविता होती है और ‘जिया तू बिहार के लाला’ का जयघोष करती है. 

बात बदले की नहीं है, न वासेपुर की. बात उस हिंसा की है, जिसमें हमारी कितनी पीढ़ियां और नस्लें खप गई हैं, कितने फ़ैज़ल स्कूल छोड़कर ट्रेन के पाखाने साफ़ करने को मज़बूर किए गए हैं, बाद में नशे में डूब जाने को और उसके बाद बदले की आग में. यह उस हिंसा में डूबकर लगातार हँसती रहती है. ख़ुद पर और हम सब पर. यह इसीलिए डेढ़ इंच ऊपर है. 

-गौरव सोलंकी

सिनेमा के सौ साल के उपलक्ष्य में…

फिल्म इतिहास के सौ साल पूरे होने के सुअवसर पर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई. तय हुआ कि सभी पार्टियों के लोग साथ-साथ एक फिल्म देखेगें. लेकिन तभी एक बुजर्ग नेता ने सुझाव दिया कि चूंकि हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए मुनासिब यही होगा कि सब अपनी-अपनी पसंद की फिल्में देखें. इस सुझाव को सभी दलों ने फौरन मान लिया. सब अपनी-अपनी पसंद की फिल्म देखने निकल पड़े.

अधिकांश नेताओं ने मनी है तो हनी है को देखना पंसद किया. जैसे कि पांचो उंगलियां एक बराबर नहीं होतीं, वैसे ही सब नेता एक-से नहीं होते, इसलिए बहुतेरों ने वह फिल्म न देखकर दूसरी फिल्म अपना सपना मनी मनी  देखी. मगर कुछ खास नेताओं ने खास वजहों से खास फिल्में देखीं. 

लालकृष्ण आडवाणी जी जिस सिनेमाघर में फिल्म देखने गए, इत्तफाक से वहां उन्हें नरेंद्र मोदी मिल गए. उस सिनेमाघर में चल रही फिल्म का नाम था, एक फूल दो माली. दुआ-सलाम करने के बाद दोनों तय करके अलग-अलग सिनेमाघर में फिल्म देखने गए. आडवानी जी ने देखी वह सुबह कभी तो आएगी तो मोदी ने जागते रहो

ए राजा ने गोलमाल रिटर्न तो कलमाड़ी साहब ने खेल खेल में देखी. करुणानिधि जी ने घात देखी, तो जयललिता जी ने प्रतिघात देखी. यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश जी का पापा कहते हैं देखने का मन था, मगर डैडी  देखी, तो मुलायम सिंह जी ने बेटा देखी.

बहिन मायावती ने देखी गीत गाया पत्थरों ने तो ममता दीदी ने अमानुष देखी. रेलमंत्री मुकुल राय जी एक फिल्म देखने जा ही रहे थे कि उनका पीए उनके कान में कुछ फुसफुसा गया. रेलमंत्री का चेहरा चमक गया. रेलमंत्री ने द बर्निंग ट्रेन न देखकर फिर चलती का नाम गाड़ी देखी.

नीतीश जी खिलाड़ी देखने अपने घर से अभी निकले ही थे कि लालू जी को यह बात पता चल गई, उन्होंने झट खिलाडि़यों का खिलाड़ी देख डाली. जब यह बात नीतीश जी को पता चली तो फिर उन्होंने सबसे बड़ा खिलाड़ी देखी.

शरद पवार जी का मूड तो था सौदागर या काला बाजार देखने का, मगर टिकट न मिलने के चलते कॉरपोरेट देखी. वहीं वित्तमंत्री प्रणब दा ने कर्ज तो गृहमंत्री पी चिंदबरम जी ने कागज के फूल देखी. 

फिल्म के चयन को लेकर सबसे ज्यादा अगर कोई कन्फ्यूजन हुआ, तो माननीय दिग्विजय सिंह जी को. उनकी फिल्मों की सूची लंबी थी. दबंग, जीने नहीं दूंगा, झूठ बोले कौवा काटे वगैरह थी, इसलिए वह इतनी दुविधा में पड़ गए कि कोई फिल्म न देख सके.

प्रधानमंत्री जी भी फिल्म देखने की सोच रहे थे. इस बाबत वे सोनिया जी से मिले. ‘मैडम आप कौन-सी देखने जा रही है?’ ‘जो राहुल दिखाने ले जाए!’ ‘ तो कौन सी फिल्म चुनी है राहुल बाबा ने ?’ ‘मत पूछिए मनमोहन जी, एक हो तो बताऊं! उसकी लिस्ट में तो मुगल-ए-आजम, मुकद्दर का सिकंदर, मदर इंडिया न जाने क्या-क्या है! खैर छोडि़ए! आप कौन-सी फिल्म देखने जा रहे हैं?’ ‘सोच रहा हूं कि राजा हरीश्चंद्र देखूं!’ ‘अरे वह तो मूक फिल्म है!’ ‘तो फिर ‘खामोशी’ कैसी रहेगी!’ ‘ आप पर काम का कितना बोझ है! कोई हल्की-फुल्की मनोरंजक फिल्म देखिए न!’ ‘ एक फिल्म और सोची है मैडम! सोचता हूं वही देख लूं …’ ‘हां हां, बताइए न! कौन-सी सोची है?’ मनमोहन जी रुककर बोले, ‘…सिंग इज किंग’. यह सुनते ही सोनिया जी मुस्करा दी. मनमोहन जी शरमा गए. 

-अनूप मणि त्रिपाठी