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मौत की बरसात

देश में बारिश-बाढ़ से तबाही का दौर जारी है। हिमाचल से लेकर केरल तक बारिश का कहर है। देश भर में यह रिपोर्ट लिखे जाने तक बारिश-बाढ़ से करीब 898 लोगों की जान जा चुकी है। केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तराखंड, हिमाचल, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान में बाढ़ और बारिश का सबसे ज्यादा असर दिखा है।

केरल में भारी तबाही

केरल को 1924 के बाद की सबसे भंयकर बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है। उस समय बाढ़ में 1000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस बाढ़़ में अब तक 167 लोग मारे जा चुके हैं और दो लाख से ज़्यादा लोग 1200 राहत शिविरों में रह रहे हैं। बचाव कार्य के लिए नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) की 12 अतिरिक्त टुकडिय़ां तैनात की गई हैं जिनमें 540 लोग हैं। ये उन 18 टुकडिय़ों से अतिरिक्त हैं जो पहले से वहां तैनात है। इस तरह एनडीआरएफ की 30 टुकडिय़ां वहां तैनात हैं। इनके अलावा थल सेना, जल सेना और वायु सेना के सैनिक भी लगातार बचाव कार्य में लगे हैं। आने वाले समय में एनडीआरएफ की 23 और टुकडिय़ां भी वहां भेजी जाएंगी। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया।

केरल में बारिश का कहर जारी है। बाढ़ से केरल में यह रिपोर्ट लिखे जाने तक 79 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 85 हजार से ज्य़ादा लोग शरणार्थी शिविरों में पहुंचाए गए हैं। केरल के इतिहास में यह पहला अवसर है जब नदियों के उफान पर होने के कारण राज्य के मुल्लापेरियार समेत 35 बांधों के फाटक खोल दिए गए हैं। इससे पहले इडुक्की बांध के द्वार 1992 में खोले गए थे। मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने कहा कि भीषण बाढ़ से अब तक राज्य में 8,430 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।

राज्य सरकार ने कहा है कि बाढ़ के खतरे को देखते हुए कोच्चि एयरपोर्ट 18 अगस्त तक बंद रहेगा। केरल में 28,000 हेक्टेयर खेती की जमीन बाढ़ के पानी में डूबी है, जिससे 1,80,000 किसानों को 680 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसमें 310 करोड़ का नुकसान अलपुझा और कोट्टायम की रबड़ बेल्ट में 93 करोड़ रुपये का नुकसान शामिल है। अतिरप्पली, पोनमुढी और मन्नार समेत कई बड़े पर्यटन केंद्र बंद कर दिए गए हैं। कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा परिसर में पानी घुस जाने के कारण उसे शनिवार तक बंद करने की घोषणा की गई है। इंडिगो, एयर इंडिया और स्पाइस जेट ने कोच्चि हवाई अड्डा से अपना परिचालन बंद करने की घोषणा की है। राज्य में बाढ़ का खतरा बना हुआ है। सभी 14 जिलों में अलर्ट जारी कर दिया गया है। कासरगोड से लेकर दक्षिण में तिरूवनंतपुरम तक सभी नदियां उफान पर हैं। खतरे की आशंका के मद्देनजर केरल के सभी स्कूलों को बंद रखने का ऐलान किया गया है। बाढ़ से 2100 से ज्य़ादा घरों को नुकसान पहुंचा है। राज्य में लोगों के लिए 718 राहत शिविर बनाए गए हैं। एनडीआरएफ की चार टीमें पुणे से केरल में काम कर रही हैं।

केरल के मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन के मुताबिक भारी वर्षा अभी कुछ और दिन जारी रहेगी। स्थिति के बिगडऩे की आशंका बनी है। पूरे राज्य में डेढ़ लाख से ज्यादा लोग राहत शिविरों में रखे गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने केरल के मुख्यमंत्री से 16 अगस्त को भी राज्य में बाढ़ के हालात को लेकर चर्चा की। प्रधानमंत्री ने सहायता का आश्वासन दिया है।

सूबे में ट्रेन सेवाएं बाधित हैं और सड़क परिवहन सेवाएं भी अस्तव्यस्त हैं। सड़कें पानी में डूब गई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कसारगोड को छोड़कर बाकी सभी जिलों में शैक्षणिक संस्थानों में छुट्टी की घोषणा कर दी गयी है। कॉलेजों और महाविद्यालयों की परीक्षाएं स्थगित की हैं।

सूबे के विभिन्न हिस्सों में विद्युत आपूर्ति, संचार प्रणाली, पेयजल आपूर्ति बाधित है। स्थिति के और गंभीर होने पर राज्य सरकार ने सेना, एनडीआरएफ और सैन्य इंजीनियरिंग की टीमों की मदद मांगी है।

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में बाढ़ का कहर जारी है। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक सूबे में 296 लोगों की जान जा चुकी है। उत्तर प्रदेश में भारी बारिश से जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है। यूपी में कई जगह बाढ़ के हालत हैं। प्रमुख नदियां गंगा, घाघरा, राप्ती नदियों का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर गयी हैं। कुशीनगर, बिजनौर, गोरखपुर, लखीमपुर खीरी, रायबरेली, मुरादाबाद और बस्ती जिलों में सबसे ज्य़ादा बारिश रेकार्ड की गयी है।

बाराबंकी में घाघरा नदी एल्गिन ब्रिज पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। घाघरा अयोध्या और फैजाबाद में भी खतरे के निशान से ऊपर है। बलिया के तुर्ती पार में भी नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर है। वहीं रायबरेली में सई नदी खतरे के निशान से ऊपर चली गई है। राप्ती नदी बलरामपुर खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। बंसी सिद्धार्थनगर में भी राप्ती नदी चेतावनी बिंदु के ऊपर है। गंगा कानपुर देहात में चेतावनी बिंदु को पार कर गई है। फतेहगढ़, फर्रुखाबाद में भी गंगा नदी और बदायूं में भी कचला ब्रिज और कन्नौज में भी गंगा चेतावनी बिंदु से ऊपर बह रही है।

सरयू नदी में उफान है और करीब एक दर्जन गांव इसकी चपेट में हैं। गोंडा में घाघरा और सरयू नदियों का कहर भी जारी है। कर्नलगंज तहसील के कई गांव बाढ़ की चपेट में हैं जबकि तरबगंज तहसील में भी हजारों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। आधिकारिक आंकड़ों की बात करें तो पहली जुलाई से अगस्त मध्य तक प्रदेश में 296 लोगों की जान बारिश-बाढ़ से जा चुकी है। यूपी राज्य आपदा प्रबंध प्राधिकरण इमरजेंसी ऑपरेशन परियोजना निदेशक अदिति उमराव के मुताबिक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लोगों को जान से हाथ धोने पड़े हैं और सरकारी और निजी सम्पति का भी नुक्सान हुआ है। उन्होंने कहा कि राज्य में 379 लोग घायल हो गए है। घर ढहने के कारण ही 209 लोगों की मौत हुई है, वहीं बिजली गिरने से 46, सांप के काटने से सात और बोरवेल में गिरने से दो लोगों अपनी जान गंवा चुके है। बाकी लोगों की मौत नदी- नालों में बह जाने से हुई है। राज्य में भारी बारिश के कारण अब तक 3001 मकान/भवन क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

बारिश ने सरकार के दावों की पोल भी खोली है। यहाँ तक की ड्रीम प्रोजेक्ट कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश का आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे भी बारिश के कहर से बच नहीं पाया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस ड्रीम प्रोजेक्ट में जब फाइटर प्लेन उतारे गए थे तब देश भर में खूब वाह-वाह हुई थी। लेकिन पहली ही बरसात में एक्सप्रेस-वे की सर्विस लेन 50 फीट धंस गई। ज़मीन धंसने से इसकी चपेट में एक कार आ गई। हादसा आगरा के डौकी क्षेत्र में वाजिदपुर पुलिया पर हुआ। इस हाइवे को 22 महीने के रेकार्ड समय में तैयार गया था और इस पर करीब 13,200 करोड़ रुपए की लागत आई है। हाइवे पर कई जगह दरारें भी आ गई हैं। कई जगह पर सड़क के नीचे की मिट्‌टी धंस रही है। पिछले दिनों जब इसमें कार धंसी तो मौके पर पहुंची क्रेन से गाड़ी में फंसे लोगों को तो बाहर निकाल लिया गया लेकिन जब कार को निकालने का प्रयास किया गया तो क्रेन का पटा ही टूट गया। हादसे ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

उत्तर प्रदेश में तटवर्ती इलाकों में लोग दहशत में हैं और वे पलायन को मजबूर हो गए हैं। फसलें जलमग्न हो गई हैं। पश्चिमी उप्र में भी काफी नुक्सान हुआ है। बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, बलरामपुर, श्रावस्ती, सीतापुर, लखीमपुर के गांव बाढ़ से घिरे हैं। मऊ, बलिया और आजमगढ़ में घाघरा उफान पर होने से कटान की भी स्थिति पैदा हो गई है जिससे तटवर्ती इलाकों में लोग अब पलायन करने लगे हैं। एनडीआरएफ की टीम राहत कार्य में जुटी है। सैकड़ों किसानों की खरीफ की फसलें नदी में समा चुकी हैं।

बुंदेलखंड और मध्य उत्तर प्रदेश के जिलों में भी नुक्सान हुआ है। उन्नाव में गंगा चेतावनी बिंदु के करीब बह रही है। हमीरपुर में यमुना और बेतवा का जलस्तर भी बारिश के साथ बढ़ता रहा है। प्रतापगढ़, कौशांबी और पूर्वांचल में नुक्सान हुआ है जबकि सोनभद्र, मीरजापुर और चंदौली में नदी नालों में उफान से लोग मुश्किल जीवन जी रहे हैं। अभी तक यही देखा गया है कि एनडीआरएफ की टीमें भी कई जगह मज़बूर हो कर हाथ खड़े कर चुकी हैं।

मूसलाधार बारिश की वजह से कर्नाटक के जलाशयों में जलजमाव का स्तर बढ़ता जा रहा है। इससे बाढ़ की स्थिति भयावह होती जा रही है। चेरुथोनी डैम के दो और गेट खोल दिए गए हैं ताकि इड्डुकी जलाशय में पानी का दबाव कम हो। खराब मौसम की वजह से राज्य के इड्डुकी, वायनाड़, पल्लकड़, एर्नाकुलम, कोझीकोड़, मालापुरम और कोलम आदि इलाकों में स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया है। राज्य के कई इलाकों में बचाव कार्य और क्षतिग्रस्त सड़कों के निर्माण के लिए सेना को तैनात किया गया है। राहत शिविरों में ठहरे हुए लोगों के लिए दवा और भोजन के इंतजाम किए जा रहे हैं।  तमिलनाडु में भी बाढ़ की आशंका से प्रशासन सचेत है। मेट्टूर का स्टैनली जलाशय 120 फुट की अपनी पूरी क्षमता तक भर चुका है, जिसके बाद राज्य के 12 जिलों में बाढ़ का अलर्ट जारी किया गया है।

तमिलनाडु के सालेम, इरोड, नमक्कल, करूर, त्रिची, तंजावुर, थिरुवरूर, नागपट्टनम, कुडडालोर, पुडुक्कोट्टाई, पेरम्बलूर और अरियालूर जिले में बाढ़ की चेतावनी जारी की गई है। मेट्टूर बांध का निर्माण 1934 में किया गया था और यह अब तक 40 बार अपनी पूरी क्षमता तक भर चुका है। गौरतलब है कि केरल में बारिश लोगों पर कहर बनकर टूट रही है। पिछले 40 साल में यहां सबसे भीषण बाढ़ देखी गई है। 8 जिले बाढ़ की चपेट में है।

सेना, नेवी से लेकर एनडीआरएफ राहत कार्य में लगे हुए हैं। कर्नाटक के काबिनी और कृष्णा सागर बांध के डूब इलाकों में भारी बारिश की वजह से तमिलनाडु के मेट्टूर बांध में भी बहुत ज्य़ादा पानी पहुंच रहा है। राज्य सरकार ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को वहां से खाली कर कहीं और जाने का सुझाव दिया है। लोगों को यह चेतावनी भी दी गई है कि वे मछली पकडऩे, तैराकी या अन्य किसी भी गतिविधि के लिए कावेरी नदी में न जाएं।

अन्य राज्य

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में खीरगाड़ नदी ने भारी तबाही मचाई है। उत्तराखंड में गंगोत्री नेशनल हाइवे भारी बारिश के चलते बार-बार बंद करना पड़ा है। भूस्खलन से कई जगह सरकारी और निजी सम्पति का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। प्रदेश में अब तक 72 लोगों की जान जा चुकी है।

मध्य प्रदेश में भारी बारिश जबलपुर, सतना, भोपाल, होशंगाबाद, उज्जैन, रतलाम जबकि राजस्थान के कोटा, बूंदी, और झालावाड़ में बहुत नुक्सान हुआ है। उधर सूबे के जैसलमर, बाड़मेर, बीकानेर सहित पश्चिम राजस्थान में भी बारिश हुई है। पिछले सालों में यहाँ ज्य़ादा बारिश नहीं देखी गयी है। वैसे मौसम विभाग के मुताबिक बिहार में अब तक वर्षा सामान्य से 15 और उत्तर प्रदेश में 7 प्रतिशत कम हुई है। दोनों राज्यों में मॉनसून अगस्त मध्य से हरकत में आएगा और पटना, लखनऊ, आगरा में अच्छी बारिश होगी।

हरियाणा में भी बारिश के काफी नुक्सान हुआ है। कई जगह खेती की ज़मीन बाढ़ में बह गयी है। घरों और अन्य सम्पति को भी नुक्सान हुआ है।

बारिश पहाड़ी सूबे हिमाचल में बड़ी तबाही लेकर आई है। 26 लोगों की जान चली गयी है और प्रदेश के 6 नेशनल हाईवे चंडीगढ़-शिमला, चंडीगढ़-मनाली और पठानकोट-पालमपुर यह रिपोर्ट लिखे जाने तक बंद थे। प्रदेश में अब तक 812 करोड़ रूपये के नुक्सान का आकलन किया गया है। स्कूल बंद रखने के आदेश सरकार ने दिए हैं। टोल फ्री नम्बर 1077 स्थापित किया गया है ताकि वर्षा के कारण हुए नुकसान पूर्वनुमान की सूचना उपलब्ध करवाई जा सके।

प्रदेश में भू-स्खलन के कारण 923 सड़कें अवरूद्ध हैं, जिनमें 6 राष्ट्रीय उच्च मार्ग भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने प्रदेश में भारी वर्षा के कारण उत्पन्न स्थिति की समीक्षा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक तलब की और हालात का जायजा लिया। मुख्यमंत्री ने राज्य उच्च मार्गों और राष्ट्रीय उच्च मार्गों पर भू-स्खलन से निपटने के लिए अधिकारियों को तत्काल श्रमशक्ति और मशीनरी तैनात करने के निर्देश दिए ताकि लोगों को किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े। प्रदेश सरकार ने बचाव, बहाली और पुनर्वास कार्यों के लिए 96.50 करोड़ रुपये की राशि जारी की है। प्रदेश में भारी बारिश के कारण 812 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। प्रदेश सरकार ने पुन:स्थापन कार्य के लिए अभी तक 229 करोड़ रुपये जारी किए हैं।

राज्य मुख्यालय पर प्राप्त सूचना के अनुसार अब तक विभिन्न जिलों से 26 व्यक्तियों की मृत्यु की खबर है । प्रभावित परिवारों को जिला प्रशासन के माध्यम से अंतरिम राहत प्रदान की गई है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को सड़कों के अवरूद्ध होने के कारण सेब की ढुलाई में किसी प्रकार की बाधा नहीं आना सुनिश्चित बनाने के भी निर्देश दिए हैं। उन्होंने लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को सेब उत्पादक क्षेत्रों में अवरूद्ध सड़कों को तत्काल बहाल करने के भी निर्देश दिए। मुख्य सचिव विनीत चौधरी ने उपायुक्तों को खराब मौसम के पूर्वानुमान के दृष्टिगत विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए शिक्षण संस्थानों को 14 अगस्त को बंद करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने उपायुक्तों को सैलानियों और स्थानीय लोगों को नदियों के किनारे नहीं जाने देने के लिए कदम उठाने और ट्रैकिंग गतिविधियों पर नजर रखने के भी निर्देश दिए हैं । उन्होंने कहा कि सड़कों, जल और विद्युत आपूर्ति की बहाली के लिए पर्याप्त श्रमशक्ति और मशीनरी तैनात की गई है और उपायुक्तों और सम्बन्धित विभागों को धनराशि जारी कर दी गई है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के किसी भी हिस्से में आवश्यक खाद्य सामग्री की कोई भी कमी नहीं है।

अतिरिक्त मुख्य सचिव राजस्व और लोक निर्माण मनीषा नंदा ने कहा कि प्रदेश में भू-स्खलन के कारण 923 सड़कें अवरूद्ध हैं, जिनमें 6 राष्ट्रीय उच्च मार्ग भी शामिल हैं। विभाग इन सड़कों को शीघ्रातिशीघ्र खोलने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि बचाव और राहत कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध है और अगर आवश्यक हो तो उपायुक्त सड़कों को बहाल करने और अन्य कार्यों के लिए स्थानीय स्तर पर भी मशीनरी किराये पर ले सकते हैं।

उपायुक्त कुल्लू ने बताया कि मनाली राष्ट्रीय उच्च मार्ग भू-स्खलन के कारण अवरूद्ध है और इस मार्ग को खोलने के लिए युद्धस्तर पर कार्य चल रहा है।  भारी बारिश से नदियों में जल स्तर बढऩे के साथ ही गाद भी बढ़ गयी है। इसका असर बिजली उत्पादन पर पड़ रहा है। सतुलज नदी जलग्रहण क्षेत्र में भारी वर्षा से सतलुज नदी में गाद का स्तर इतना बढ़ गया है कि नदी पर बनी 1500 मेगावाट की नाथपा झाकड़ी पनविद्युत परियोजना, 1000 मेगावाट की कड़छम वांगतू पनविद्युत परियोजना और 412 मेगावाट की रामपुर पनविद्युत परियोजना में बिजली उत्पादन ठप हो गया है। जानकारी के मुताबिक सतलुज नदी में गाद का स्तर 20 हजार पीपीएम से ऊपर पहुंच गया है। इसके चलते इन तीनों ही बड़ी परियोजनाओं में बिजली उत्पादन बंद कर दिया गया है ताकि टरबाईन को कोई नुकसान न हो। अब इन बिजली परियोजनाओं में फिर से उत्पादन शुरू होने के लिए गाद का स्तर 5 हजार पीपीएम से नीचे आना जरूरी है। इन 3 बड़ी पनविद्युत परियोजनाओं में बिजली उत्पादन ठप हो जाने से देश के 9 उत्तरी राज्यों हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और चंडीगढ़ में बिजली आपूर्ति प्रभावित होगी। बिजली उत्पादन ठप होने से हिमाचल को हर रोज रॉयल्टी के रूप में करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है।

दरकते पहाड़

हिमाचल बेहाल है। जहाँ-तहाँ पहाड़ दरक रहे हैं। पर्यावरण का बंटाधार करने के गंभीर नतीजे सामने आने लगे हैं। कहीं राष्ट्रीय राजमार्गों तो कहीं दूसरे विकास के नाम पर जंगल के जंगल तबाह कर दिए गए और अब प्रकृति का भीवत्स रूप सामने है। प्रदेश के चार बड़े राष्ट्रीय और राज्य मार्ग हर दूसरे दिन मलबा गिरने से बंद हो जाते हैं और मुसीबत झेलनी पड़ती है स्थानीय लोगों या पर्यटकों को। सरकार का आपदा प्रबंधन भी इस मुसीबत के सामने पंगु नजर आता है।  पर्यटकों के लिहाज से अहम् चंडीगढ़-मंडी-मनाली नेशनल हाईवे पिछले एक महीने में दर्जन बार बंद हो चुका है। बार-बार रास्ता बंद होने से वाहनों की लंबी कतार लग जाती है और यात्री-पर्यटक घंटों बीच में बेहाली की हालत में फंसे रहते हैं। इनमें छोटे बच्चो से लेकर बूढ़े-जवान सब शामिल हैं। कई बार तो खाने के लाले तक पड़ जाते हैं। पूरे बरसात मौसम में हर साल इस पहाड़ी सूबे में अरबों की सरकारी और निजी सम्पति तबाह हो जाती है। इसमें बड़ा हाथ सालों से बेदर्दी से कट रहे पेड़ हैं। दसियों की मौत पहाड़ों से पत्थर, मलबा गिरने से हो जाती है। लेकिन इस से बड़ी चुनौती भविष्य की है। जो हालत पहाड़ों की हो गयी है (देखें फोटो) उससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि आने वाले कुछ ही सालों में हमें पेड़ काटने और बिना भविष्य की चिंता किये अंधाधुंध विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। विस्फोटकों के इस्तेमाल और लगातार खुदाई से पहाड़ कमजोर हो गए हैं। खासकर सभी राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य मार्गो से।

परवाणू-शिमला नेशनल हाईवे के फोरलेन बनने के काम में अब तक हज़ारों पेड़ों की बलि दी जा चुकी है। अभी तो 35 प्रतिशत काम ही हुआ है। उसमें भी पहाडिय़ां लगातार खिसक रही हैं। निर्धारित कौण ज्यादा भीतर तक पहाडिय़ां दरक चुकी हैं। इस हाईवे पर पिछली तीन-चार बरसात से हर रोज मलबा नीचे गिर रहा है। कई बार घंटों हाईवे बंद रहता है या उस पर लंबा जाम लग जाता है। जब खुलता है तब भी खतरा बना रहता है कि पता नहीं कब ऊपर से मलबा मौत बनकर आ गिरे।

इस हाईवे से हर रोज हज़ारों वाहन गुजरते हैं जिनमें बड़ी संख्या में पर्यटक वाहन भी शामिल हैं। सोलन और परवाणू के बीच पिछले चार साल से हाईवे फोरलेन करने का काम चल रहा है जिसमें अभी भी बहुत काम बाकी है। सोलन-शिमला के बीच अभी बहुत छोटे हिस्से में ही काम शुरू हुआ है। इसमें उतनी दिक्कत अभी नहीं है जितनी सोलन-परवाणू के बीच है।  दूसरे सेब का सीजन शुरू होने से यहाँ ट्रैफिक में खासी बढ़ोतरी हो जाती है। इससे लम्बे जाम लगते हैं। कई बार तो बस का जो सफर परवाणू-शिमला के बीच 3 घंटे का होता है वह 6-7 घंटे का हो जाता है। इस इलाके में फॉर लेन के कारण बड़ी तादाद में पेड़ काटे गए हैं। सोलन में दुकान करने वाले सुभाष चंद ने बताया कि फोरलेन का काम शुरू होने से पहले आम तौर पर सड़क पर जाम या लहासा (मलवा) गिरने की घटनाएं नहीं होती थीं। अब तो आये दिन यहाँ जाम लगते हैं और पहाड़ से मलबा गिरने की घटनाएं होती हैं।  यही हाल मंडी-कुल्लू-मनाली नेशनल हाईवे (एनएच 71) का है। पंडोह से हणोगी और ओट मार्ग बहुत संवेदनशील है जहाँ कभी भी पहाड़ दरक जाता है। यहाँ पिछले सालों में बड़े हादसे हो चुके हैं। पूरा पहाड़ खोदने से कमजोर हो चुका है। इस मार्ग पर बड़ी संख्या में पेड़ कटे हैं। पूरा रास्ता संवेदनशील पहाड़ के नीचे है और पता नहीं चलता बरसात में कब पहाड़ी नीचे आ गिरे। इसके अलावा प्रदेश में केंद्र की योजनाओं के दर्जनों मार्ग हैं जहाँ पेड़ों की बलि बड़े पैमाने पर दी गयी है। राज्य मार्गों को चौड़ा करने का भी काम चल रहा है। पिछले सालों में प्रदेश के लिए दर्जनों मार्ग केंद्र से मंजूर हुए हैं। यह सही है कि लोगों की ज़रुरत सड़क पहुँचाने की रही है लेकिन यह भी सच है कि पेड़ों के काटने से जो नुक्सान हुआ है उसने लोगों की ही जि़ंदगी नरक बनाई है।  प्रदेश पर्यावरण और खेल संस्था के संयोजक और विधायक विक्रमादित्य सिंह कहते हैं कि पहाड़ी सूबे में जैसे सड़कें लोगों की जीवन रेखा हैं वैसे ही पेड़ भी हैं। पेड़ों का संरक्षण हर हालत में होना चाहिए। यदि ज़रुरत में पेड़ काटने ही पड़ें तो क्षेत्र में उससे दोगुने पेड़ लगाने का प्रावधान होना चाहिए और उनका संरक्षण भी करना चाहिए ताकि वो बर्बाद न हो जाएँ।

उपेक्षित कर दिया गया हिमाचल निर्माता

उन्हें हिमाचल निर्माता कहा जाता है। उनकी ईमानदारी की बानगी यह कि जब उनका निधन हुआ तो उनके बैंक खाते में महज 563.30 रूपये थे। अपना कोई मकान मुख्यमंत्री रहते नहीं बनाया और कई बार तो साधारण बस में ही सफर कर लिया करते थे। बात यशवंत सिंह परमार की है जिनका इसी महीने 4 तारीख को जन्मदिन था। जब तक जि़ंदा रहे कांग्रेस में रहे। इंदिरा गाँधी उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानती थीं और उनकी मुरीद थीं। लेकिन यही परमार पिछले कुछ दशक में अप्रासंगिक से हो गए क्योंकि सरकारों ने, यहाँ तक कि कांग्रेस की ही सरकारों ने, उनकी सुध नहीं ली।

हिमाचल परमार के दिल में बसता था। उनकी उपेक्षा का आलम यह कि उनके नाम से दिया जाने वाला भाषा संस्कृति विभाग का राज्य पुरस्कार पिछले 13 साल से नहीं दिया गया है। वैसे विभाग इस तरह के चार पुरस्कार देता है और इनमें से एक भी 13 साल से नहीं दिया गया। इसके अलावा ले-देकर सोलन जिले के नौणी में स्थित बागबानी विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर है।

कांग्रेस ने उनकी उपेक्षा की। इसकी पुष्टि उनके पोते के कुछ माह पहले भाजपा में शामिल हो जाने से हो जाती है। परमार के पोते और पूर्व कांग्रेस विधायक कुश परमार के बेटे चेतन परमार जब भाजपा में शामिल हुए तो उनका आरोप था कि आज कांग्रेस हिमाचल निर्माता वाईएस परमार के योगदान को भूल गई है। इस पार्टी को मेरे दादाजी और पिता ने अपने खून-पसीने से सींचा था लेकिन वीरभद्र सिंह के नेतृत्व ने यशवंत सिंह परमार के नाम को एक सोचे समझे षड्यंत्र के तहत खत्म करना शुरू कर दिया था।

दरअसल परमार की उपेक्षा कांग्रेस के ही भीतर की राजनीति का हिस्सा है। कांग्रेस परमार के प्रति कितनी सम्मान की भावना रखती रही यह इस बात से साबित हो जाता है कि जिसे वे हिमाचल निर्माता कहते रहे हैं उसकी जयंती बंद कमरे में मानते रहे। इस पर कोई प्रदेश स्तरीय कार्यक्रम तक कभी आयोजित नहीं किया गया जबकि हर पांच साल बाद कांग्रेस की सरकार प्रदेश में रही है। राजनीति में इसे वीरभद्र सिंह बनाम परमार के रूप में देखा जाता रहा है। वीरभद्र सिंह विरोधी आरोप लगते हैं कि वे परमार के कद को छोटा करके रखना चाहते थे ताकि खुद उनका अपना कद उनसे छोटा न रह जाये। हालांकि वीरभद्र सिंह समर्थक और विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री इसे गलत बताते हैं। अग्निहोत्री कहते है – ‘वीरभद्र सिंह के मन में परमार के प्रति बहुत सम्मान रहा है। 1985 में नौणी में परमार साहब के नाम से बागवानी एवं वानिकी विश्वविदयालय वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री रहते ही बना और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अप्रैल, 1988 में इसका उदघाटन किया।’

इसके बावजूद यह माना जाता है की परमार को कांग्रेस वो स्थान नहीं दे पाई जिसके वे वास्तव में अधिकारी थे। बहुत दिलचस्प है कि परमार तो जीवन भर कांग्रेस में रहे, अब भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री ने परमार को सही सम्मान देने के लिए उनकी जयंती हर साल बड़े पैमाने पर मनाने का ऐलान किया है। सीएम जय राम ने कहा – ‘एक बंद कमरे में अब तक हिमाचल निर्माता परमार का जन्मदिन मनाया जाता रहा यह बड़े अफ़सोस की बात है। अगले साल से उनका जन्मदिन बड़े स्तर पर सरकार मनाएगी।’

परमार का जीवन

4 अगस्त, 1906 में परमार ने सिरमौर के एक छोटे गांव चनालग में जन्म लिया। लखनऊ से एलएलबी और समाजशास्त्र में पीएचडी की। सिरमौर में जन्मे परमार सिरमौर की रियासत में 11 साल तक सब जज और मजिस्ट्रेट रहे और बाद में न्यायाधीश के रुप में 1937 से 1941 तक सेवाएं दीं।

नौकरी की परवाह न करते हुए परमार सुकेत सत्याग्रह प्रजामंडल से जुड़े। उनके ही प्रयासों से यह सत्याग्रह सफल हुआ। परमार के प्रयासों से ही 15 अप्रैल, 1948 को 30 रियासतों का विलय हो सका जिसके बाद कहीं जाकर हिमाचल प्रदेश अस्तित्व में आया। उसके बाद 25 जनवरी,1971 को इस प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। साल 1963 से 24 जनवरी, 1977 तक हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे और प्रदेश के विकास को नई दिशा दी। उन्हें 1957 में सांसद बनने का भी मौका मिला। परमार ने हिमाचल को केंद्र में रख कई पुस्तकें लिखी जिनमें ‘पालियेन्डरी इन द हिमालयाज’, ‘हिमाचल पालियेन्डरी। इट्स शेप एण्ड स्टेटस’, ‘हिमाचल प्रदेश केस फॉर स्टेटहुड’ और ‘हिमाचल प्रदेश एरिया एण्ड लेंगुएजिज’ काफी प्रसिद्ध हैं।

पर्यावरण के प्रति परमार के मन में विशेष चिंतन था। उन्होने एक बार कहा था – ‘वन हमारे बड़ा सरमाया है। इनकी हिफाजत हर हिमाचली को हर हाल मे करनी है। नंगे पहाड़ों को हमें हरियाली की चादर ओढ़ाने का संकल्प लेना होगा।’

‘पंचायत टाइम्स’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक परमार को राजनैतिक सूझबूझ, वाकपटुता, कर्मठता और दूरदृष्टि के कारण मार्च 1947 में ‘हिमालयन हिल स्टेट्स रीजनल काउन्सिल’ का प्रधान चुना गया। परमार जब हिमाचल के राजनैतिक क्षितिज पर उभरे, तब यहाँ के लोग 31 छोटी-छोटी रियासतों में बँटे हुए थे। तब इन सभी रियासतों का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और भौतिक विकास अत्यंत दयनीय दशा में था।

पत्रिका के मुताबिक 15 अगस्त, 1947 को देश तो आजाद हुआ परन्तु पंजाब हिल स्टेट के तहत पडऩे वाली पाँच बड़ी रियासतों-चंम्बा, मंडी, बिलासपुर, सिरमौर और सुकेत के अलावा शिमला हिल स्टेट के नाम से जानी जाने वाली 27 छोटी रियासतों में गुलामी का अंधकार छाया रहा। परमार और इनके सहयोगियों के लगातार अथक प्रयास से 15 अप्रैल, 1948 को 30 रियासतों को मिलाकर हिमाचल राज्य का गठन हुआ। तब इसे मंडी, महासू, चंबा और सिरमौर चार जिलों में बांट कर प्रशासनिक कार्यभार एक मुख्य आयुक्त को सौंपा गया। बाद में इसे ‘ग’ वर्ग का राज्य बनाया गया। वर्ष 1952 के आम चुनाव में 36 सदस्यीय विधानसभा में 28 कांग्रेस के और 8 निर्दलीय विधायकों के निर्वाचित होने के बाद 24 मार्च को मुख्यमंत्री परमार को बनाया गया। राजा आनन्द चंद के अधीन बिलासपुर अभी भी एक स्वतंत्र रियासत थी। जबकि प्रजा इसे हिमाचल में शामिल करने को आंदोलित थी। अंतत: पहली जुलाई, 1954 को इसका विलय हिमाचल में कर दिया गया। 1956 में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा हिमाचल को पंजाब राज्य में मिलाने की सिफारिश करने के उपरांत इसका दर्जा ‘ग’ से घटाकर इसे केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया और यहाँ 1 नवंबर, 1956 को उप-राज्यपाल की नियुक्ति के साथ ही ‘हिमाचल टैरिटोरियल काउन्सिल’ गठित कर दी गई। इसके विरोध में प्रदेश के मंत्रिमंडल सहित मुख्यमंत्री डॉ. परमार ने त्यागपत्र दे दिया और यहाँ लोकतंत्र की बहाली का अभियान जनसभाओं, प्रदर्शनों, ज्ञापनों आदि के माध्यम से जारी रखा। लंबे संघर्ष के बाद 1963 में तत्कालीन गृहमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने लोकसभा में एक वक्तव्य में कहा-”निरुत्साहित मन से कोई कार्यवाही करने से बेहतर है कि जनप्रतिनिधियों को अपनी सरकार चलाने के लिए जो भी शक्तियां हम प्रदान करना चाहते हैं, वे दे दें।’’ फलस्वरूप हिमाचल टैरिटोरियल काउन्सिल को विधानसभा में परिवर्तित कर दिया गया और पहली जुलाई, 1963 को परमार के मुख्यमंत्रित्व में हिमाचल सरकार का गठन हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद परमार ने हिमाचल के चहुँमुखी विकास के लिए रात-दिन एक कर दिया। उठते-बैठते, सोते-जागते उन्हें इस पर्वतीय क्षेत्र को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने के साथ ही इसे एक सुदृढ़ रूप-आकार देने की धुन सवार रहती थी। हिमाचल के लिये अथक काम के बाद 2 मई, 1981 को परमार दिवंगत हो गए।

परमार के नाम पर विश्वविद्यालय

यशवन्त सिंह परमार के नाम पर जिस बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (सोलन) का नाम रखा गया वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) 2018 में देश के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में शामिल है। नौणी विवि देशभर के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में 71वें स्थान पर है। विश्वविद्यालयों की शीर्ष 100 की श्रेणी में हिमाचल प्रदेश का एकमात्र विश्वविद्यालय है। एशिया में यह अपने तरह का पहला विश्वविद्यालय है जिसमें बागवानी और वानिकी की शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार (एक्सटेंशन) होता है। दरअसल बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय की शुरुआत एक कृषि कालेज के रूप में 1962 में हुई थी। तब यह पंजाब विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। 1970 में जब हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) की स्थापना हुई तो इस कालेज में एचपीयू का परिसर खोल दिया गया। इसके बाद 1978 में पालमपुर कृषि विश्विद्यालय, पालमपुर (कांगड़ा) की स्थापना हुई तो उसका हार्टिकल्चर काम्प्लेक्स यहाँ खोला गया। इस तरह लम्बे सफर के बाद पहली दिसंबर, 1985 को यहाँ उस समय के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की कोशिशों से सम्पूर्ण यशवन्त सिंह परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय शुरू हो गया। 30 अप्रैल, 1988 को तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने इसका उदघाटन किया। परमार के नाम पर स्थापित इस विश्वविद्यालय में करीब 54 पाठ्यक्रम हैं जिनमें से 17 पीएचडी से जुड़े हैं। विश्वविद्यालय परिसर करीब पौने छह किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और आधुनिक सुविधाओं वाले भवन वहां हैं।

‘अब करेंगे कार्यक्रम’

परमार की जयंती अब महज रस्म अदायगी नहीं रहेगी। करीब साढ़े तीन दशक से चली आ रही परिपाटी को बदलते हुए जय राम सरकार ने निर्णय किया है कि हिमाचल निर्माता डा. यशवंत सिंह परमार की जयंती पर बड़ा समारोह आयोजित किया जाये। खुद मुख्यमंत्री जय राम ने परमार की जयंती के अवसर पर इसका ऐलान किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि परमार की जयंती पर अब तक विधानसभा के एक छोटे से हॉल में कार्यक्रम होते आए हैं, परंतु रस्म अदायगी के रूप में एक छोटा सा कार्यक्रम कर देना नाकाफी है। इस पुरानी

व्यवस्था को बदला जाएगा और भविष्य में पीटरहॉफ में एक बड़ा समारोह सरकार द्वारा आयोजित किया जाएगा। जय राम ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को परमार के योगदान के बारे में जानकारी होनी चाहिए। इसलिए जरूरी है कि बड़े समारोह में उनकी जीवनी दिखाई जाए और युवाओं को बताया जाए कि परमार हिमाचल के लिए क्या सोच रखते थे और उन्होंने प्रदेश के लिए क्या किया है। विधानसभा में कार्यक्रम हिमाचल प्रदेश संसदीय समूह ने आयोजित किया था जहाँ सीएम ने यह घोषणा की। जय राम ने कहा कि परमार का प्रदेश के किसानों के कल्याण और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति हमेशा संवेदनशील दृष्टिकोण रहा। उन्होंने हमेशा ही इनके समग्र विकास को प्राथमिकता दी। उन्हीं के नेतृत्व में प्रदेश को अलग पहचान बनाने में सफलता मिली और हिमाचल प्रदेश भारतीय गणराज्य के 18वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। जय राम ने कहा कि परमार ने प्रदेश में सड़कों के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, क्योंकि वे मानते थे कि सड़कें ही पहाड़ी राज्य के विकास की भाग्य रेखाएं हैं। हमें परमार के जीवन और कार्य से प्रेरणा लेनी चाहिए। वैसे इस कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, परमार के पुत्र पूर्व विधायक कुश परमार और उनके परिवार के सदस्य भी अन्य के साथ उपस्थित थे।

जीतने की आदत होना भी ज़रूरी है

सिंधू की विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में हार पर सवाल उठने और उस पर चर्चा होना स्वाभाविक है। यह भी कहा जाता है कि हार और जीत तो खेल का हिस्सा है। इसे खेल भावना के हिसाब से लेना चाहिए। यह बात बहुत हद तक सही है। यह भी सही है कि पुसारला वेंकेट सिंधू पिछले कई सालों से देश के लिए पदक जीतती आ रही है। अब तक वह विश्व चैंपियनशिप में दो रजत, दो कांस्य जीत चुकी है। इसके अलावा उसके नाम एक ओलंपिक रजत पदक भी है। बैडमिंटन के कुछ जानकारों का कहना है कि सिंधू की यह उपलब्धि कम नहीं है। वह पिछले पांच साल से लगातार सभी प्रतियोगिताओं के सेमीफाइनल या फाइनल में खेल रही है। इन लोगों को इस बात पर ऐतराज है कि सिंधू के ‘फैन’ और आम आदमी सिंधू की आलोचना करने में लग गए हैं। यह आलोचना नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार सिंधू अगर लगातार अपनी फार्म को बरकरार रख कर ऐसा ही प्रदर्शन करती रहती है तो एक समय वह खिताब भी जीतने लगेगी।

यह बात बहुत हद तक सही हो सकती है पर पूर्णतया सही नहीं है। यदि समय के अनुसार देखा जाए तो यह देखा गया है कि समय के साथ चलते हुए भी खिलाडी एक समय अपनी सर्वश्रेष्ठ फार्म में होता है। बैडमिंटन जैसे खेल में यह फार्म ज़्यादा समय तक बरकरार नहीं रहती। सायना नेहवाल इसकी मिसाल है। राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक और ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद वह कोई बहुत बड़ा परिणाम नहीं दे पाई।

बात फाइनल की

इस बात पर प्रश्न उठ रहे हैं कि क्या सिंधू जैसी खिलाडी के प्रशिक्षण में कहीं कोई कमी है? क्या वह मानसिक तौर पर उस स्तर पर नहीं है जिसकी ज़रूरत विश्व स्तर का टूर्नामेंट जीतने के लिए होती है? प्रतिभा और खेल के स्तर के हिसाब से देखें तो सिंधू को नेहवाल से बेहतर खिलाड़ी माना जाता है। इसमें कोई संदेह भी नहीं है। जब सिंधू और नेहवाल का मुकाबला पहले, दूसरे या तीसरे दौर के मैचों में होता है तो जीत सिंधू की होती है लेकिन जब टक्कर फाइनल में होती तो जीत नेहवाल की होती है। राष्ट्रमंडल खेलों के फाइनल में यही हुआ और देश की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी ऐसा ही परिणाम सामने आया। गोल्डकोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों के सेमीफाइनल में सिंधू ने कनाडा की मिशेल को 21-18, 21-8 से परास्त किया जबकि नेहवाल को स्कॉटलैंड की क्रिस्टी गिलमोर को 21-14, 18-21, 21-17 से हराने में एडी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा। पर फाइनल में सायना नेहवाल ने सिंधू को सीधी गेम में 21-18, 23-21 से परास्त कर दिया। जहां तक राष्ट्रमंडल प्रतियोगिता की बात है तो उसमें भी सायना ने सीधी गेमों में 21-17, 27-25 से पराजित किया।

इससे यह बात साबित होती है कि सिंधू फाइनल का दवाब नहीं ले पाती। फिर वह फाइनल चाहे सायना के खिलाफ हो या कैलोरिना मारिन के खिलाफ या फिर जापान की यामागुच्ची सामने हो। यही खिलाडी यदि उसे फाइनल के अलावा किसी और दौर में मिलें तो पूरी संभावना है कि सिंधू जीते।

जीतने की आदत

इन हालात में पंडितों का यह कहना कि सिंधू वक्त के साथ जीतने लगेगी, कोई मायने नहीं रखता। खेल मनोचिकित्सकों की राय में जीतने की भी एक आदत होती है। मारिन चाहे छोटे टूर्नामेंटस में हराती रहे लेकिन वह विश्व चैपिंयनशिप या ओलंपिक में मानसिक तौर पर इतनी मज़बूत हो कर आती है कि उसे फाइनल में हरा पाना किसी भी कमज़ोर दिमाग के खिलाडी के लिए संभव नहीं। रियो में वह पहला गेम 19-21 से हारने के बाद भी दूसरी गेम 21-12, 21-15 से जीत कर स्वर्ण पदक ले गई। दूसरी और सिंधू को लें तो वह विश्व चैंपियनशिप में पहली गेम में 14-9 की और बाद में 15-11 की बढ़त लेने के बाद भी कभी चैंपियन की तरह नहीं खेली। इससे ऐसा लगने लगा था कि शायद वह जीतने के लिए मानसिक रूप से तैयार ही नहीं है। यह दूसरी गेम में सही साबित हो गई। देखा जाए तो सिंधू ने दूसरी गेम तो शुरू होते ही 0-5 से पिछड कर खो दी थी। उसके बाद तो औपचारिकता ही नजऱ आई। बात चाहे कुछ लोगों को पसंद आए या नहीं लेकिन यह सही है कि यदि सिंधू को मानसिक रूप से जीतने के लिए तैयार करने में हमारे प्रशिक्षक और मनोविज्ञानी सफल नहीं होते तो देश के लिए स्वर्ण पदक आना संभव नहीं। बात सिर्फ बैडमिंटन की नहीं, बाकी खेलों की भी यदि स्वर्ण पदक पाना है तो जीतने की आदत डालना ज़रूरी है।

देश में ज्य़ादातर मुद्दों की वजह रहा अयोध्या का संग्राम

अयोध्या में राम मंदिर बने या न बन पाए लेकिन देश में इसका खासा असर तो रहा। आज़ादी के बाद ही देश की अपनी प्राचीन संस्कृति और गौरव को बचाने की चाहत बढ़ी। यह चाहत धीरे-धीरे देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी पकड़ मज़बूत करती गई। यह पकड़ धीरे-धीरे चुनौती देने की स्थिति में आ गई।  जाने कितनों ने बड़ी खामोशी से अयोध्या में युद्ध के की प्रक्रिया जारी रखी और एक दिन वह ढांचा टूट गया जो भारत में विदेशी आक्रामण की याद दिलाता था।

आज़ाद भारत में ढांचे का टूटना भी सदियों से अयोध्या में लगातार चलते रहे युद्धों का समाज में प्रथम महासंग्राम था। यह महासंग्राम निश्चय था समाज में परिवर्तन का। यह एक कोशिश थी बदलाव की। बदलाव हुआ भी।

आधुनिक हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘आयोध्या का चश्मदीद’ पुस्तकों की कड़ी को राम और जन्मभूमि पर प्रामाणिक पुस्तक माना है। उन्होंने तो यह तक लिखा ‘भगवान राम अयोध्या में रहे लेकिन उन्हें आम लोगों तक काशी  (बनारस या वाराणसी का प्राचीन नाम) ने पहुंचाया। तुलसीदास ने काशी में रामचरित मानस रची और अब पांच सौ साल से भी ज्य़ादा समय के बाद बनारस के ही लेखक हेमंत शर्मा की ये पुस्तकें आई हैं।’

आधुनिक पत्रकारिता को इतिहास जैसा महत्व देने के लिए मशहूर पत्रकार हेमंत शर्मा ने शहर अयोध्या को उसके प्राचीन गौरव के साथ जहां तलाशा है, वहीं आधुनिक अयोध्या की एक पहचान रही तीन गुबंदों के खिलाफ चले महासंग्राम को महाभारत के संजय की तरह वह युद्धभूमि में मौजूद रह कर पूरे महासंग्राम का चश्मदीद बन कर अपनी तब की रिपोर्टिंग से वह पेशेवर तेज दिखाया है जो तब की ‘जनसत्ता’ में छपा था।

तब ‘जनसत्ता’ के संपादक थे दिग्गज पत्रकार प्रभाष जोशी। यहां यह बताना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तब अयोध्या में हुए महासंग्राम की रिपोर्टिंग तटस्थता, गुणवत्ता और सच्चाई के साथ दूसरे कई अखबारों ने तब नहीं की। जिस पर प्रेस आयोग ने आपत्ति जताई।

लेकिन ऐसा कोई आक्षेप तब की ‘जनसत्ता’ पर नहीं लगा।

‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ दोनों ही किताबें पहली नज़र में आपको देखने और पढऩे के लिए बेबस कर देती हैं। आप भी इन्हें देखें और पढ़ डालें। खूबसूरत छपाई, ढेरों चित्र और पूरी प्रस्तुति बेहद बढिय़ा है।

अनंत काल की उड़ान के लिए यायावर मन

मनुष्य यात्राएँ क्यों करता है! क्या स्वभाव से यायावरी उसके भीतर है? अथवा कुछ नया जानने की जिज्ञासा उसे सुदूर देशों की यात्रा के लिए प्रेरित करती रहती है? चरैवति-चरैवति का सिद्धांत पहली बार पैर का अहसास होते ही क्षण भर भी न बैठने के लिए उत्सुक बालक के भीतर देखा जा सकता है जो अपनी यात्रा का गंतव्य नहीं जानता पर चलना चाहता है-निरंतर! ऐसा ही भाव कुछ उन कलमकारों के भीतर जरूर पैदा हुआ होगा जिन्होंने अनंत यात्राएँ की-आँख खोलकर, मन की आँख जो सब देख सकती है, शिव की तरह! सोचिए कि वास्को डी गामा यात्रानुमा खोज पर न निकला होता तो हमारी पहचान क्योंकर हमसे हो पाती! या ऐसी ही यात्राएँ मैगास्थानीज ने चन्द्रगुप्त के राज्य में न की होती या ह्वेनसांग भारत न आता या कुमारजीव चीन न जाते तो कितना ही ज्ञान-संवेदना का सागर सूखा ही रह जाता! ‘जिन खोजा तिन पाईया गहरे पानी पैठ’ कहना बिना अनुभव के तो संभव नहीं हुआ होगा। अलेक्जेंडर पोप ने कहा था ‘जिसने केवल घर देखा है उसने संसार की किताब का केवल पहला पन्ना पढ़ा है, बाकी पूरी पुस्तक अभी पलटनी बाकी है’

मेघदूत लिखने वाला कवि कितना बड़ा घुमक्कड़ होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। मेघ के बहाने रामगिरी पर्वत से लेकर अल्कापुरी तक की यात्रा क्या मेघ और यक्ष ही कर रहे थे? कवि कालिदास साथ नहीं दिखे? पाठक रम्य होकर अल्कापुरी तक पहुँच जाता है और सारी यात्रा एक सुखद रोमांच में तब्दील हो जाती है।

साहित्य की परिधि में यात्रा कभी वृत्तांत बनकर आई, तो कभी घुमक्कड़ी का शास्त्र बनकर! कभी यात्रा संस्मरण लिखे गए तो कभी यात्रा ललित निबन्ध का रूप लेकर आई। रूखे- सूखे वृतांतों में यात्रा एक विवरण रिपोर्ट नुमा आलेख भर होकर ही रह गई वहीं काव्य और रहस्य के बादलों के भीतर उतरे पाठक के लिए गहन जीवनानुभव भी बनी।

आधुनिक काल में भारतेंदु युग में गद्य की शुरुआत होती है। गद्य के आरम्भ के साथ ही यात्राओं का रोचक विवरण इसी काल से मिलने लगता है। बनारसी दास जैन की आत्मकथा ‘अर्धकथानक’ को किसी अर्थ में यात्रावृत्त भी समझना चाहिए। व्यापार के सिलसिले में देश भर की यात्राएँ करने वाले जैन साहब ने चोरों के साथ यात्रा के अपने अनुभवों को बड़ी रोचकता से पिरोया है। भारतेंदु युग में तीर्थाटन से जुड़े अनुभव ही यात्रा साहित्य के रूप में रचे गए। भारतेंदु के 5 यात्रा वृत्तांत कवि वचन सुधा में 1871 के आसपास प्रकाशित हुए। ये सभी हरिद्वार, लखनऊ, सरयूपार, वैद्यनाथ की यात्रा पर आधारित थे। इस काल में तीर्थ स्थान से लेकर विदेश यात्राओं से जुड़े अनुभवों को यात्रा वृत्त के रूप में लिखा गया। 1883 में प्रकाशित ‘मेरी लंदन यात्रा’ को पहला यात्रा वृत्तांत माना गया। द्विवेदी युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव यात्रा तथा ठाकुर गदाधर सिंह ने चीन यात्रा (चीन में तेरह मास) पर यात्रा विवरण प्रस्तुत किए। सत्यदेव परिव्राजक इस युग के प्रमुख यात्रा साहित्यकार हैं।

यात्रा साहित्य का वास्तविक स्वरूप राहुल जी के आने से निर्मित होता है। राहुल सांकृत्यायन ने घुमक्कड़ी पर पूरा शास्त्र लिखा जिसे पढ़कर वास्तव में महाभिनिष्क्रमण के लिए तरुण एवं तरुणियाँ निकल पड़े। सचमुच पूरा शास्त्र है- किस उम्र में घर छोडऩा चाहिए, किस श्रेणी के घुमक्कड़ के लिए क्या जानना आवश्यक है, माता की भूमिका, पिता की भूमिका, पति पत्नी की भूमिका, स्वयं घुमक्कड़ का संतुलन और जिज्ञासा का मेल सभी पर अत्यंत विस्तार से राहुल जी बात करते हैं ‘कौन समय है जबकि तरुण को महाभिनिष्क्रमण करना चाहिए? मैं समझता हूँ इसके लिए कम-से-कम आयु 16-18 की होनी चाहिए और कम-से-कम पढऩे की योग्यता मैट्रिक या उसके आसपास वाली दूसरी तरह की पढ़ाई। मैट्रिक से मेरा मतलब खास परीक्षा से नहीं है, बल्कि उतना पढऩे में जितना साधारण साहित्य, इतिहास, भूगोल गणित का ज्ञान होता है, घुमकक्ड़ी के लिए वह अल्पतम आवश्यक ज्ञान है। मैं चाहता हूँ कि एक बार चल देने पर फिर आदमी को बीच में मामूली ज्ञान के अर्जन की फिक्र में रुकना नहीं पड़े।’ (घुमक्कड़ शास्त्र)

उनके घुमक्कड़ धर्म की खासियत है- कि वह किसी जाति-धर्म-वर्ण भेद को नहीं मानता, समदर्शिता और आत्मीयता का व्यवहार सिखाता है, काव्य रस के समान आह्लादकारी है, आत्मसम्मान सिखाता है, शारीरिक श्रम पर बल देता है, प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान रखने पर बल देता है तथा बेहतर आदमी होना सिखाता है। राहुल जी की लद्दाख यात्रा, तिब्बत यात्रा, यूरोप यात्रा, एशिया के दुर्गम भूखंडों में एवं ऐसी ही अनेक यात्राओं के उनके अनुभव यात्रा संसार से ही परिचय नहीं कराते बल्कि स्वधर्म की पहचान के लिए भी प्रेरित करते हैं। उनकी यात्राएँ केवल पुरुषों के लिए ई नहीं बल्कि समान रूप से स्त्रियों के लिए भी हैं ‘स्त्रियों को घुमक्कडी के लिए प्रोत्सांहित करने पर कितने ही भाई मुझसे नाराज होंगे, और इस पथ की पथिका तरुणियों से तो और भी। लेकिन जो तरुणी मनस्विनी और कार्यार्थिनी है, वह इसकी परवाह नहीं करेगी, यह मुझे विश्वास है। उसे इन पीले पत्तों की बकवाद पर ध्यान नहीं देना चाहिए। जिन नारियों ने आँगन की कैद छोड़कर घर से बाहर पैर रखा है, अब उन्होंने बाहर विश्वन में निकलना है। स्त्रियों ने पहले-पहल जब घूँघट छोड़ा तो क्या कम हल्ला मचा था, और उन पर क्या कम लांछन लगाये गये थे? लेकिन हमारी आधुनिक-पंचकन्याओं ने दिखला दिया कि साहस करने वाला सफल होता है, और सफल होने वाले के सामने सभी सिर झुकाते हैं। मैं तो चाहता हूँ, तरुणों की भाँति तरुणियाँ भी हजारों की संख्या में विशाल पृथ्वी पर निकल पड़े और दर्जनों की तादाद में प्रथम श्रेणी की घुमक्कड़ा बनें।’

राहुल जी के बाद स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, भगवत शरण उपाध्याय, रामवृक्ष बेनीपुरी जी का नाम भी उल्लेखनीय है। यूरोपीय देशों पर बेनीपुरी जी ने दो यात्रा वृत्तांत लिखे- पैरों में पंख बाँधकर तथा उड़ते चलो-उड़ते चलो। डायरी शैली में खोजपूर्ण और नाटकीय तरीके से उन्होंने इन यात्राओं का वर्णन किया। ‘फ्रांस की कामिनियाँ-कैसी रंगीन कल्पना है उनके बारे में! किन्तु सामने के पेड़ पर जो दो पंडुक बैठे दीख रहे हैं, यह कहते हैं-कामिनियों को पेरिस में देखना, अभी हमें देखो!’

वास्तव में यात्रा साहित्य के मील के पत्थर हैं- मोहन राकेश, अज्ञेय और निर्मल वर्मा जिनके यात्रा संस्मरण, यात्रा काव्य पाठक को यात्रा का सुखबोध ही नहीं कराते बल्कि उस कालानुभव को साकार भी कर देते हैं। अज्ञेय जैसे संगीत की तान लेते हुए लय और रागिनियों के साज-ओ-सामान के साथ ‘एक बूँद सहसा उछली’ में इटली का चित्र संजोते हैं। सचमुच पाठक उन भव्य इमारतों की गलियों के भीतर कदम रख देता है, फौन्तेना त्रेविया तक पहुँच जाता है पर अज्ञेय उसे सिर्फ सैर नहीं कराते बल्कि पूर्व और पश्चिम के बीच की लकीर को भी साफ़-साफ़ दिखा देते हैं-

‘अंगूर की कटी-छटी बेलें-इतनी नीची कटी हुई कि पौधे मालूम हों। लिलाक की झाडिय़ाँ जिनके बकायन-जैसे फूलों के गुच्छों का रंग रात में नहीं पहचाना जाता। पर मधुर गन्ध वायुमण्डल को भर रही है। तरह-तरह के खंडहर जिनमें कुछ चित्रों द्वारा परिचित हैं कुछ अपरिचित। स्वच्छ सुन्दर सड़कें, जहाँ-तहाँ प्रतिमा-मण्डित फव्वारे-ये फव्वारे न केवल इटली की मूर्तिशिल्प और वास्तु-प्रतिभा के उत्कृष्ट नमूने हैं वरन पौराणिक आख्यानों से इतने गुँथे हुए हैं कि पूरी क्लासिकल परम्परा उनकी फुहार के साथ मानो झरती रहती है। नगर के मध्य में फोन्तांना दि त्रेवी मानो कल्पस्रोत्र हैं-वहाँ पर यात्री जल में सिक्का फेंककर मन्नत करते हैं कि उनका फिर रोम आना हो। सुना है कि त्रेवी की शक्ति दिल्ली के ‘हडिय़ा पीर’ से कुछ कम नहीं है; किन्तु इटली फिर आना चाहकर भी मैंने उसका सहयोग नहीं माँगा! यों उत्सुक अथवा चिन्तित प्रेमी-युगलों की भीड़ त्रेवी पर लगी ही रहती है और विदेशी यात्रियों को स्थायी स्मृति-सुख देने के लिए गिद्धों की-सी तीव्र द्वष्टिवाले फोटोग्राफरों की पंक्तियाँ भी दिन-रात कैमरे और रोशनी का सामान लिये फव्वारे के आस-पास मंडराती रहती हैं।’ (एक बूँद सहसा उछली)

अज्ञेय अपने यात्रा काव्य में पूर्व और पश्चिम को समझने की युक्तियाँ देते हैं, काव्यास्वादन कराते हैं, विचार और संवेदना को साथ जगाते हैं, साथ ही पाठक के लिए सोचने की अनेक सरणियाँ निर्मित कर देते हैं। अज्ञेय के समान काव्यात्मक प्रतिमाएं बहुत कम ही यात्रा पथिक बना सके हैं। अज्ञेय कला के पारखी तो हैं ही!

मोहन राकेश के यात्रा वृत्त ‘आखिऱी चट्टान तक’ को पढ़ते हुए कुछ वैसी ही भटकन का अहसास रहता है जैसा किसी अनजान पथ पर चलें वाले यात्री को होता होगा! भटकन भी है और उतना ही और जान्ने, भीतर धंसने का उत्साह भी! एक क्षण के लिए भी उससे अलग नहीं हो सकते, जब तक आखिरी चट्टान तक पहुँच न जाएँ। पढ़ते हुए भवानी प्रसाद मिश्र की कविता सतपुड़ा के जंगल याद आ जाती है। धंस सको तो धँसो इनमें….

बम्बई से कन्याकुमारी की यात्रा के इस वृत्तांत में बूढ़े आशिकमिजाज मल्लाह के किस्से भी हैं, सिंधी परिवार के साथ बिताई शाम है, अविनाश के साथ भोपाल का टाल है और बीना तक के टिकट पर बम्बई जाते लडके के किस्से भी। ‘हर आबाद शहर में कोई एकाध सडक़ ज़रूर ऐसी होती है जो न जाने किस मनहूस वजह से अपने में अलग और सुनसान पड़ी रहती है। इधर-उधर की सडक़ों पर ख़ूब चहल-पहल होगी, पर बीच की वह सडक़, अभिशप्त उदास और वीरान ऐसे नजऱ आती है जैसे बाक़ी सडक़ों ने कोई षडयन्त्र करके उसका बहिष्कार कर रखा हो। मडगांव में एक ऐसी ही सडक़ के बीच में रुककर मैं कुछ देर चार-पाँच अधनंगे बच्चों को सिगरेट की ख़ाली डिबियों से अपना ही एक खेल खेलते देखता रहा।’ (आखिऱी चट्टान तक)

निर्मल वर्मा एक कदम आगे चलकर चीड़ों पर चांदनी में यूरोप के पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के अंतर को दिन और रात के वर्णन से जीवित कर देते हैं। विश्व युद्ध के बाद बर्लिन की दीवार का गिरना यूरोप के लिए जिस परिवर्तन का सूचक बना, उसकी मौजूदगी निर्मल वर्मा के इस वृत्तांत में हर जगह है। ब्रेख्त के बर्लिन एन्सेम्बल की ओर जाते हुए या प्राग के ‘होस्पेदाओं’ से होकर आइसलैंड जाते हुए! निर्मल जैसे जीवन को, साँस लेने को चमत्कार मानते हैं, वैसे ही यात्राओं को भी। यात्राएँ उनको चमत्तकृत करती हैं, और हर बार लौट कर आने के लिए निमंत्रित करती हैं। चीड़ों पर चांदनी की भूमिका में ही वे लिखते हैं ‘अरसे बाद अपने इन स्मृति-खंडों को दोबारा पढ़ते समय मुझे एक अजीब-सा सूनापन अनुभव होता रहा है। कुछ वैसा ही रीता अनुभव जब हम किसी जिन्दा फडफ़ड़ाते पक्षी को क्षण-भर पकड़कर छोड़ देते हैं। उसकी देह हमसे अलग हो जाती है लेकिन देर तक हथेलियों पर उसकी धड़कन महसूस होती रहती है। एक दूरी का अभाव जो सफ़ारी-सूटकेस पर विभिन्न देशों के लेबलों पर लटका रहता है। उन्हें न रख पाने का मोह रह जाता है न फेंक पाने की निर्ममता ही जुड़ पाती है।

इन फटे-पुराने लेबलों के पीछे कितने चेहरे हाथ से हाथ मिलाने के गरम स्पर्श, होटलों के खाली कमरे छिपे हैं, क्या इनका लेखा-जोखा कभी संभव हो सकेगा’।

यह अहसास लगभग हर यात्री के भीतर मौजूद होता है। यात्राएँ छूट जाती हैं, पर हथेलियों पर उसकी धडकन हमेशा के लिए अंकित हो जाती है। निर्मल सिर्फ यात्रा ही नहीं करते बल्कि उस यात्रा के विचार सूत्रों को साहित्य और जीवन की परिधि पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं। ब्रेख्त का जिक्र करते हुए वे पूर्वी और पश्चिमी देशों के बनावटीपन को भी सामने ले आते हैं ‘पश्चिम के साहित्यकार ब्रेख्त के महान कृतित्व को स्वीकार करते हैं उनके कम्युनिस्ट व्यक्तित्व को नहीं। पूर्वी देशों के आलोचक उनके कम्युनिस्ट व्यक्तित्व की सराहना करते हैं, किन्तु उनके कृतित्व के संबंध में, शायद पूरी तरह से आश्वस्त नहीं।’ (चीड़ों पर चांदनी)।

यात्राएं अद्भुत संसार बनाती हैं। इस संसार के भीतर अनेकों यात्रा संस्मरण यूरोप और विदेश यात्राओं के संसर्ग से बने (नए चीन में दस दिन: गोविन्द मिश्र) (चलते तो अच्छा था: असगर वजाहत- ईरान और आइजारविजान की यात्रा) तो वहीं किसी पर्वतीय प्रदेश के अद्भुत सौन्दर्य से अभिभूत होकर (कृष्णा सोबती: बुद्ध का कमंडल लद्दाख) पर अभी हाल में ही प्रकाशित यह भी कोई देस है महराज (अनिल यादव) पढ़कर एक नई यात्रा का अहसास होता है- जो पूर्वोत्तर राज्य के भीतर के अंतर्विरोधों, समस्याओं, मान्यताओं के साथ-साथ उनकी शोचनीय स्थिति को भी दिखती है। उग्रवाद का अध्ययन करता लेखक पहले ही झटके में सुनता है कि उग्रवादी तो वहाँ ऐसे घुमते हैं जैसे पानी में मछली। बेरोजगारी, पलायन, भाषा के संकट से जूझते पूर्वोत्तर के लिए सरकारें कितनी सजग हैं, यह सवाल हवा में लगातार तैरता रहता है। आदिवासी अस्मिताओं, रीति रिवाजों से लेकर शोषित होने वाले और शोषण करने वालों की दुनिया को लेखक खोलकर रख देता है। पुराने और नए लामाओं के बीच सोच का अंतर राजनैतिक प्रक्रिया में भागीदारी के प्रश्न को देखने का नजरिया बदल देता है। टीवी के आने से लामाओं की दुनिया बदली है और बाहरी दुनिया राजनीति में भाग लेकर कार्य करने की इच्छा भी बढ़ी है।

‘दूसरा बड़ा परिवर्तन मठों में केबिल कनेक्शन वाले टीवी का पहुंचना है. जिन पुरातन इमारतों का सन्नाटा सदियों तक आदमी की जांघ की हड्डी से बने वाद्ययंत्रों से टूटता था उनमें रहने वाले लामा अब सीरियलों और फिल्मों पर खूब बात करते हैं। उन दिनों बाइक के एक विज्ञापन का जिंगल हुड़ीबाबा बाकी किशोरों की तरह लामाओं में भी हिट था। टीवी अपने साथ वर्षों तक चलने वाला लंबा शास्त्रार्थ लेकर आया था। पुराने भिक्षुओं का कहना था, औरत की अर्धनग्न देह और फिल्मों की हिंसा ब्रह्मचारियों को भ्रष्ट करेगी। युवाओं का कहना था जबरदस्ती होगी तो चोरी छिपे कहीं और देखेंगे जिससे झूठ अपराधबोध जैसी विकृतियां आएंगी. अंतत: टीवी जीता और साधना के नीरस जीवन में रंगीन दुनिया दाखिल हो गईं।’

इस रंगीन दुनिया ने तंत्र में मदिरा के जगह पेप्सी को पहुँचा दिया तो ‘टीजी रिनपोछे लुमला विधानसभा से चुनाव भी लड़े’ इस बात की भी सूचना मिलती है। इस यात्रा संस्मरण ने मात्र यात्रा का ही विवरण नहीं दिया, बल्कि यात्राओं के भीतर के जरूरी अहसास को मूर्त कर दिया। मुक्तिबोध जिसे ज्ञान और संवेदन की साझेदारी मानते हैं वह यात्रा और उसके अहसास के सीझने में ही सम्पन्न होती है।

युग बदला, लोग पैदल पथ से बैलगाड़ी से होकर मोटर कार और हवाई जहाज की दुनिया में आ गए। अनुभवों की दुनिया में गाँव से बढ़कर देश, विदेश सब कुछ शामिल हुआ। शिक्षा ने इस समझ के दायरे विस्तृत किए। अब यात्राएं केवल लेखा जोखा भर नहीं है, बल्कि मनुष्य की निर्मिति में उनकी सहायक भूमिका है। ये यात्रा संस्मरण उसी निर्मिति के एक रूप को दिखाने का कार्य करते हैं। अज्ञेय के शब्दों में ‘घुम्मकड़ी एक प्रवृत्ति ही नहीं, एक कला भी है। देशाटन करते हुए नये देशों में क्या देखा, क्या पाया, यह जितना देश पर निर्भर करता है उतना ही देखने वाले पर भी। एक नजर होती है जिसके सामने देश भूगोल की किताब के नक्शे जैसे या रेल-जहाज के टाइम-टेबल जैसे बिछे रहते है; एक दूसरी होती है जिसके स्पर्श से देश एक प्राणवान प्रतिमा-सा आपके सामने आ खड़ा होता है-आप उसकी बोली ही नहीं, हृदय की धड़कन तक सुन सकते हैं। ‘

सुन सको तो सुनो घुमक्कड़ों की आवाज और सफरी झोले के साथ निकल पड़ो अपनी यात्रा पर …

नीदरलैंड्स की बादशाहत बरकरार भारत का सफर क्वार्टर फाइनल तक

भारत ने महिला हाकी विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन करते हुए क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। 1978 के बाद यह पहला मौका था जब भारत ने क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। लेकिन वहां वह आयरलैंड से पेनाल्टी शूट आऊट में 1-3 से हार कर सेमी फाइनल में प्रवेश का मौका गंवा बैठा।

दूसरी और अक्तूबर 2011 से विश्व रैंकिंग में नंबर एक के स्थान पर चल रही नीदरलैंड्स की टीम ने एक तरफा फाइनल में आयरलैंड को 6-0 के भारी अंतर से हरा कर विश्व कप पर कब्जा कर लिया। इस जीत के साथ नीदरलैंड्स ने आठवीं बार यह खिताब अपने नाम कर लिया। इसके अलावा अर्जेंटीना, जर्मनी और आस्ट्रेलिया भी दो-दो बार यह खिताब जीत चुके हैं। नीदरलैंड्स और आस्ट्रेलिया ही दो ऐसी टीमें हैं जो लगातार दो बार विश्व कप जीती हैं।

1974 में जब यह टूर्नामेंट शुरू हुआ और 1978 में इसमें 10 टीमों ने भाग लिया। 1976 में 11 टीमें और 2002 में सबसे ज़्यादा 16 टीमें इसमें थी। इसके बाद खेले गए सात विश्व कप मुकाबलों में 12-12 टीमें ही हिस्सा लेती रही। 2018 के इस विश्व कप में फिर 16 टीमों को भाग लेने दिया गया है। एफआईएच इस बात पर भी विचार कर रही हे कि 2022 में 24 टीमों को इसमें भाग लेने की मंजूरी दे दे।

इस विश्व कप में नीदरलैंड्स के लिए कभी कोई चुनौती थी ही नहीं। पूल ए में खेल रही इस टीम ने अपने पूल मैचों में एक तरफा जीत दर्ज की। इसने चीन को 7-1 से, दक्षिण कोरिया को 7-0 से और इटली को 12-1 से पराजित किया। इस प्रकार उसने पहले तीन मैचों में ही 26 गोल कर डाले जबकि उस पर मात्र दो ही गोल हुए। क्वार्टर फाइनल में उसने नंबर दो टीम व मेजबान को 2-0 से और सेमीफाइनल में आस्ट्रेलिया को 1-1 की बराबरी पर रहने के बाद शूटआऊट में 3-1 से पराजित किया।

फाइनल मैच तो पूरी तरह से एक तरफा था। आयरलैंड की टीम जिसने पूल बी में अमेरिका को 3-1 से और भारत को 1-0 से हराया था तीसरा मैच इंग्लैंड से 0-1 से हार गई थी। क्वार्टर फाइनल में उसने भारत पर शूट आऊट में 3-1 से विजय हासिल की। सेमीफाइनल में उसका खेल निखरा और उसने स्पेन को पूरे समय तक 1-1 से रोक रखा और फिर बाद में शूट आऊट में 3-2 से जीत दर्ज कर ली। फाइनल में वह कहीं नजऱ नहीं आई और नीदरलैंड्स जैसी मज़बूत टीम ने उसके पैर उखाड़ दिए।

तीसरे स्थान के लिए खेले गए मैच में स्पेन ने दो बार की विश्व विजेता आस्ट्रेलिया को 3-1 से परास्त कर कांस्य पदक पर कब्जा कर लिया।

भारत का प्रदर्शन

भारत के लिए इस बार कम से कम सेमीफाइनल में पहुंचने का सुनहरा मौका था। पूल बी में भारत के साथ विश्व की दो नंबर की टीम इंग्लैंड, 16 नंबर की आयरलैंड और सातवें नंबर की अमेरिका का रखा गया था। पहले मैच में जब भारत ने इंग्लैंड के साथ 1-1 की बराबरी हासिल कर ली तो एक आस बंधी थी कि कुछ अच्छा हो सकता है। अगला मैच आयरलैंड के साथ था जिसने पहले मैच में अमेरिका को 3-1 से पराजित किया था। हालांकि विश्व लीग में भारत आयरलैंड से 1-2 से हार चुका था लेकिन उम्मीद थी कि युवा व अनुभव की मिश्रित भारतीय टीम आयरलैंड को हरा सकती है। भारत आक्रामक हाकी खेलने के लिए जाना जाता है। पर 2-4-4-1 की पद्धति ने भारतीय रक्षा पंक्ति को तो मज़बूती दे दी पर गोल करने की क्षमता को काफी कमज़ोर कर दिया। इसकी सबसे बड़ी मिसाल यह है कि तीन पूल मैंचों में वह मात्र दो गोल की कर पाई जब कि उस पर तीन गोल हो गए। इस तरह भारत की टीम पूल में दो ड्रा खेल दो अंकों के साथ तीसरे स्थान पर आ गई। अंक तो अमेरिका के भी दो थे, पर उनका गोलांतर -2 था जबकि भारत का -1। इस प्रकार गोलांतर के कारण भारत चार टीमों के पूल में तीसरा स्थान पा गया।

भारत की किस्मत अच्छी थी कि ‘क्रासओवरÓ मैचों में उसकी टक्कर सबसे कमज़ोर टीम इटली से हो गई। ध्यान रहे पूल मैच में नीदरलैंड्स ने इटली को 12-1 से हराया था। भारत ने यह मैच 3-0 से जीत कर क्वार्टर फाइनल में स्थान बना लिया। यहां उसका मुकाबला संयोग से फिर आयरलैंड से हो गया। भारत के पास अपनी हार का बदला लेने का सुनहरा मौका था। सभी को उम्मीद थी कि भारत पूरी तरह चढ़ कर खेलेगा और पूल मैच की हार का बदला लेने के इरादे से हमले बनाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। भारत ने एक बार भी यह नहीं दिखाया कि उसे जीतने की भूख है। उसके सारे हमले आधे दिल से किए हुए लग रहे थे। आयरलैंड की 23 मीटर की लाइन से आगे जैसे भारत को कोई लक्ष्मण रेखा दिखाई देती थी। पूरे मैच में एक बार भी वह आयरलैंड पर कोई सार्थक हमला नहीं बना पाया। भारतीय ‘थिंक टैंकÓ शायद यह भूल गए कि मैच जीतने के लिए गोल करने ज़रूरी होते हैं। अपने गोल की रक्षा से आप बचाव तो कर सकते हैं पर मैच जीत नहीं सकते। टीम के कोच सजोर्ड मेरिजन ने बाद में कहा भी कि हमने पूरा ज़ोर रक्षण पर दिया था, इसी कारण पूरे टूर्नामेंट में हम पर मात्र तीन ही गोल हो सके। उनकी यह बात सही है, पर विश्व कप में टीमें जीत के लिए जाती हैं। प्रयोग का समय ऐसे टूर्नामेंटों से पहले होता है।

यदि भारतीय टीम के आयरलैंड के साथ पूल मैच की बात करें तो आयरलैंड की एक ही खिलाडी आना ओ फलैनगन ही भारत से जीत छीन उसे पराजय का हार पहना गई। 170 मैचों का अनुभव लिए आना ने दोनों फ्लैंकस से ज़ोरदार हमले तो बनाए ही साथ उसने भारत के सात पेनल्टी कार्नरों को बेकार करने में भी अहम भूमिका निभाई। आयरलैंड को पता था कि भारत के हमले मध्य मैदान से बनते हैं जहां रानी रामपाल, वंदना कटारिया, लिलिया मिंज और नेहा गोयल मौजूद रहती हैं। इस कारण उन्होंने जितना हो सका गेंद को भारतीय खिलाडिय़ों से दूर रखा। भारत ने मिले सातों पेनल्टी कार्नरों पर कुछ नहीं किया। उनमें कोई विविधता या तेजी नहीं दिखाई। कोई ‘इन डायरेक्टÓ शाट नहीं लिया। आयरलैंड को एक ही पेनल्टी कार्नर मिल जिसे आना ने गोल में मोड़ कर टीम को जीत दिला दी।

यह सही है कि भारत की रक्षा पंक्ति अच्छा खेली और उस पर पांच मैचों में तीन ही गोल हुए लेकिन यदि उसे एशिया खेलों में कुछ करना है तो गोल करने भी सीखने होंगे। वैसे भी कोरिया, चीन और जापान से जीतना इतना सहज नहीं होगा।

विश्व रैंकिंग में भारत नौवें स्थान पर

भारतीय महिला हाकी टीम ने विश्व के क्र्वाटर फाइनल में प्रवेश कर अपनी रैंकिंग में एक कदम का सुधार किया है। 1138 अंकों के साथ वह अब नौवें स्थान पर है। उसके बाद दक्षिण कोरिया 10वें, चीन 11वें और अमेरिका 12वें स्थान पर हैं। विश्वकप में खराब प्रदर्शन के कारण इन टीमों की रैंकिंग में गिरावट आई है। कोरिया की टीम नौवें से 10वें स्थान पर चीन आठवें से 11वें स्थान पर और अमेरिका सातवें से 12वें स्थान पर खिसक गया है।

रैंकिंग में सबसे ऊंची छलांग विश्वकप के उपविजेता आयरलैंड ने लगाई है। वह 16वें स्थान से सीधा आठवें स्थान पर पहुंच गया है। इससे पहले उसका सबसे ऊंचा स्थान 14वां था। विश्वकप विजेता नीदरलैंड्स पहले स्थान पर बनी रही है। उन्होंने फाइनल में आयरलैंड को 6-0 से मात दी। ध्यान रहे कि नीदरलैंड्स अक्तूबर 2011 से पहले स्थान पर बना हुआ है। विश्वकप में छठा स्थान लेने वाला इंग्लैंड अभी भी दूसरे स्थान पर था अब तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। विश्वकप में उसे चौथा स्थान मिला। अब तक तीसरे स्थान पर चल रही पैन अमेरिकी चैंपियन अर्जेटीना की टीम चौथे स्थान पर सरक गई। चौथे स्थान की न्यूज़ीलैंड की टीम खराब प्रदर्शन के कारण छठे स्थान पर चली गई। जर्मनी को एक स्थान का लाभ मिला और वह छठे से पांचवें स्थान पर आ गई। विश्वकप में आस्ट्रेलिया पर 3-1 से अप्रत्याशित जीत दर्ज करने वाली स्पेन की टीम रैंकिंग में सातवें स्थान पर पहुंच गई है। इससे पूर्व स्पेन 11वें स्थान पर था।

नई विश्व रैंकिंग:

  1. नीदरलैंड्स 2.           इंग्लैंड
  2. आस्ट्रेलिया 4.           अर्जेंेटीना
  3. जर्मनी 6.           न्यूज़ीलैंड
  4. स्पेन 8.           आयरलैंड
  5. भारत 10.         दक्षिण कोरिया
  6. चीन 12.         अमेरिका

जब दादा ने कहा गोल मत करो, इन्हें बस दौड़ाते रहो।

बात 1936 के बर्लिन ओलंपिक की है। भारतीय हाकी टीम की कप्तानी विश्व के सर्वश्रेष्ट खिलाड़ी ध्यानचंद को दी गई थी। यह ऐसा समय था जब दुनिया का कोई भी देश हाकी के खेल में भारत के सामने खड़ा भी नहीं हो सकता था। ध्यानचंद का यह तीसरा और आखिरी ओलंपिक था।

इस बार भारत थोड़ा उहापोह की स्थिति में था। इसका कारण था कि एक अभ्यास मैच में जर्मनी ने भारत को 4-1 से हरा दिया था। भारत के लिए यह चिंता का विषय था । इस विषय पर भारतीय हाकी के पदाधिकारियों की एक बैठक हुई। इस बैठक में फैसला हुआ कि टीम को मज़बूत करने के लिए अली इकतिदार शाह दारा को टीम में लिया जाए। यह वही दारा थे जिन्होंने भारत विभाजन के बाद 1948 में ओलंपिक में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व किया ।

बर्लिन में भारत की शुरूआत अच्छी रही। उसने सेमीफाइनल में फ्रांस को 10-0 से, और फाइनल में मेजबान जर्मनी को 8-1से हरा कर स्वर्ण पदक जीता। इस मैच में एक रोचक घटना हुई। जर्मन के गोलकीपर टीटो वार्नहोल्ज़ से टकरा कर ध्यानचंद एक एक दांत टूट गया। टीटो को वैसे भी बहुत आक्रामक गोलरक्षक माना जाता था।

ध्यानचंद ने मैदान के बाहर जा कर डाक्टरी सहायता ली और अंदर आते ही टीम के सदस्यों से कहा कि अब हम इन जर्मन खिलाडिय़ों को सबक सिखांएगे। हम इन पर गोल नहीं करेंगे। इसके बाद भारतीय खिलाडी जर्मन की ‘डी’ में गेंद ले जाते और फिर धुमाफिरा कर वापिस ले आते। बस गेंद जर्मन खिलाडिय़ों को छूने भी न देते। इसके बावजूद इस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने 11 गोल किए। इतने ही गोल उनके भाई रूप सिंह ने भी किए थे।

इससे पूर्व 1932 के लास एंजलेस ओलंपिक में भारत ने दो मैचों में 35 गोल किए थे जबकि उनके खिलाफ दो ही गोल हो पाए। इन मुकाबलों में भारत ने जापान को 11-1 और मेजबान अमेरिका को 24-1 से परास्त किया था। इन 35 गोलों में से 12 गोल ध्यानचंद ने , 13 गोल उनके भाई रुप सिंह ने , 8 गोल गुरमीत सिंह खुल्लर ने व एक-एक गोल ब्रूम पीन्निगर और रिचर्ड कार ने किए। उसी ओलंपिक के एक मुकाबले में जापान ने अमेरिका को 9-2 से हरा कर रजत पदक जीता था।

दादा ध्यानचंद ने 31 वर्ष की आयु में रिटायरमेंट लेने से पहले तीन ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया और तीन स्वर्ण पदक जीते। उन्होंने सबसे पहले 1928 में एमेस्ट्रडम ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। यह पहला मौका था जब भारतीय हाकी टीम ओलंपिक में खेलने गई थी। 1928 में भारत ने लीग मे चार मैच खेले थे। उस समय भारत के पूल में बेल्जियम, डेनमार्क, स्विटजऱलैंड और आस्ट्रिया की टीमे थी। इन चार मैचों में भारत ने कुल 26 गोल किए जबकि भारत पर एक भी गोल नही हो पाया। इस दौरान भारतीय टीम ने आस्ट्रिया को 6-0 से , बेल्जियम को 9-0 से , डेनमार्क को 5-0 से और स्विटजऱलैंड को 6-0 से पराजित किया था।

दूसरे पूल में नीदरलैंड्स ने तीन मैच खेले और दो जीते। यही स्थिति जर्मनी की भी थी। उसने भी दो मैच जीते, फ्रांस ने एक और स्पेन ने कोई मुकाबला नहीं जीता। यहां पर जर्मनी ने बेल्जियम को 3-0 से हार कर कांस्य पदक जीता पर स्वर्णपदक भारत को मिला। जयपाल सिंह के नेतृत्व में गई इस टीम ने फाइनल में नीदरलैंड्स को 3-0 से परास्त किया। भारत के लिए तीनों गोल ध्यानचंद ने किए। इस टूर्नामेंट में ध्यानचंद ने कुल 14 गोल किए। फिरोज खान ने पांच और भारत के ही जार्ज मार्टिन ने भी पांच ही गोल किए। इस प्रकार तीन ओलंपिक खेलों में ध्यानचंद ने 12 मैच खेले और 33 गोल किए।

भारत पर गोल कैसे हुआ?

भारत ने जापान को 11-1 से हराया था। जब अमेरिका के साथ मुकाबला चल रहा था तो भारत ने धड़ाधड गोल करने शुरू कर दिए। अंत में भारत ने इस मैच को 24-1 से जीता। पर जो गोल भारत पर हुआ उसकी एक रोचक कहानी है। भारतीय खिलाड़ी गोल करते-करते इतने बोर हो गए कि उनकी रक्षा पंक्ति ने सोचा कि एक बार तो अमेरिकियों को अपनी ‘डी’ में आने देते हैं। यही सोच उन्होंने अमेरिकी फारवर्डों को खुला छोड़ दिया। पर जब उन्होंने पीछे देखा तो टीम के गोल रक्षक रिचर्ड ऐलन कहीं दिखाई नहीं दिए। पता चला कि रिचर्ड तो गोल पोस्ट के पीछे खड़े अपने प्रशंसकों को ‘आटोग्राफ’ दे रहे थे।

आज भी बरकरार है चिंटू की चमक

इस बदलाव का संचालन करते हैं अमिताभ के साथ ऋषि कपूर जो अपने करियर के सबसे दिलचस्प और आकर्षक मोड़ का भरपूर आनंद ले रहे हैं। लेकिन यह ऋषि कपूर का वर्तमान करियर है जो हिंदी सिनेमा में बदलाव की सबसे प्रगतिशील कहानी बताता है।

‘मुल्क’ फिल्म में ऋषि कपूर ने एक मुस्लिम पिता का किरदार निभाया है जिसके बेटे के इस्लामी आतंकवादियों के साथ संबंध हैं। जब उसके बेटे के बारे में छानबीन होती है, तो उसका पिता जो कानून का पालन करने वाला इंसान हैं उसे और उसके परिवार को सामाजिक विमुखता और अपमान का सामना करना पड़ता है। यह साबित करने के लिए कि वे लोग सामूहिक रूप से आतंक के कार्यों में शामिल नहीं हैं वह लंबी अदालती लड़ाई लड़ता है। फिल्म में ऋषि कपूर के साथ तापसी पन्नूू और प्रतीक बब्बर हैं। फिल्म की मुख्य भूमिका बीते दिनों के 60 वर्ष से ऊपर के सितारे से जुडी है। वर्षीय सितारे से संबंधित है। अनुभव सिन्हा की यह फिल्म पूरी तरह से उसके अभिनय की ताकत पर निर्भर है जो सामजिक पक्षपात के विवादास्पद और कठिन पक्ष को दिखता है।

कपूर उस समय में उभरते प्रतीत होते हैं जब अधिकांश कलाकार अभिनय से छुट्टी कर लेते हैं। पिछले कुछ दशकों में उनके समय और किरदारों से संबंधित भूमिकाएं आ रही हैं जो उन्हें कलाकार के रूप में चुनौती देती हैं। जिसने उन्हें फिल्मों की वर्तमान पीढ़ी के लिए दृश्यमान बना दिया है। इस साल की शुरूआत में अमिताभ और ऋषि ‘102 नॉट आऊट’ सुपर हिट फिल्म में साथ आए जो बुजुर्ग माता-पिता के साथ हो रहे खराब व्यवहार जैसे सामाजिक मुद्दे को दिखाती है। दोनों सितारों के अभिनय पर पूर्णतया आधारित इस फिल्म ने दर्शकों के दिल के तारों को छू लिया और इसने ढेर सी कमाई की और सिनेमाघरों में टिकी रही। 11 करोड़ से कम बजट की इस फिल्म ने 75 करोड़ रुपए कमाए। कपूर और बच्चन ने भावनाओं और अनुभवों को जीवित किया जिनकी युवा सितारे केवल कल्पना ही कर सकते हैं। यही उनका स्तर और प्रतिभा है।

मीडिया से बातचीत करते हुए कपूर ने याद किया कि हर बार जब वह अमिताभ के साथ काम करते हैं तो कुछ नया सीखते हैं। ‘अतीत में हमने कई सफल फिल्मों में भाई, दोस्त की भूमिका निभाई है। इस बार वह मेरे पिता की भूमिका में हैं’। हम दोनों अनुशासित पेशेवर हैं, और मैं हर समय, हर बार खुद को सिनेमा का छात्र मानता हूं, मैं बच्चन से कुछ नया सीखता हूं। इस बार मैंने सीखा कि कितनी आसानी से वह एक पात्र में समा जाते हैं।

कपूर की यह टिप्पणी सुखद आश्चर्य है इसके अदंरूनी जानकारों और अनुभवी पत्रकारों के लिए जो यह जानते है कि ये दोनों फिल्मी सितारे कभी साथ मिलकर नहीं रहे। 70 के दशक में अमिताभ का ‘एंग्री यंगमैन’ का व्यक्तित्व इतना भारी था कि ऋषि कपूर हमेशा सहायक कलाकर की भूमिका में रह जाते थे। संवेदनाओं और भावनाओं को व्यक्त करने की पूरी प्रतिभा होने के बावजूद कपूर को हमेशा रोमांटिक नायक की भूमिका दी गई। बच्चन वह है जिसके लिए लेखकों ने भूमिकाएं लिखी कपूर सिर्फ कलाकारों के साथ जुडऩे आया था। यही कारण है कि अपनी जीवनी ‘खुल्लम-खुल्ला’ में कपूर ने उल्लेख किया है कि बच्चन ने अक्सर अपनी कामयाबी में लेखकों और निर्देशकों के योगदान को स्वीकार किया हैै। एक सुपर स्टार के तौर पर उन्होंने अपने सह कलाकारों के बारे में कभी बात नही की , जैसे कपूर जिसने स्वंय उनकी फिल्मों की सफलता में भूमिका निभाई है। इस कथन में कड़वाहट के स्वर को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

ऋषि कपूर महसूस करते हैं कि जब वे अपने करियर के शीर्ष पर थे तभी वे टॉप की दौड़ से बाहर हो गए थे। बॉबी में मुख्य भूमिका के रूप में अपनी शुरूआत करने के बावजूद (उन्होंने फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में सबसे पहले एक युवा लड़के की भूमिका निभाई थी) एक ऐसी प्रेम कहानी जिसने सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे और एक किवंदती बन गई थी। इन सबके बावजूद कपूर को शायद ही कभी रोमांटिक नायक की भूमिका से आगे जाने का मौका मिला। जैसा कि वह अक्सर अपने साक्षात्कारों में बताते हैं ऋषिकेश मुखर्जी, और शक्ति सांमत जैसे फिल्म निर्माताओं ने भी कभी उन्हें संजीदा पात्र के बारे में नहीं सोचा। इसके बजाए वह कश्मीर, ऊटी, स्विटजरलैंड की सुंदर वादियों में नायिकाओं के साथ रोमांटिक भूमिका में ही दिखे। जब भी उन्हें अपनी अभिनय शक्ति को प्रदर्शित करने का मौका मिला, तो उन्होंने उस भूमिका को बड़ी संजीदगी से निभाया। कजऱ्, एक चादर मैली सी, बारूद, दूसरा आदमी, प्रेम रोग और दामिनी में इन्होंने सशक्त भूमिका निभाई और अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया। दुर्भाग्य से इनमें से कई फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया।

यह फिल्म निर्माता ही हैं जिन्होंने 90वें के दशक में ऋषि कपूर की छिपी प्रतिभा को देखा और उसका उपयोग चरित्र भूमिकाओं के मूल्यांकन के लिए किया। वह अक्सर याद करते हैं जोया अख्तर ने ‘लक वाय चांस’ में रोमी रॉली की भूमिका लिखी।उसने अपने चरित्र को आप बना लिया। फिल्म फ्लाप हो गई लेकिन इस अनुभवी स्टार के लिए अवसर अचानक खुल गए। विभिन्न किरदारों की भूमिका निभाने की उनकी भूख ने भी कपूर को विभिन्न भूमिकाएं निभाने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने ‘कपूर एंड सन्स’ में 80 साल के बूढे की भूमिका निभाई जो अपने परिवार को जोडऩे की कोशिश करता है। ‘अग्निपथ’ में नैतिकता के मज़बूत कोड के साथ मानव तस्कर की भूमिका निभाई। ‘प्यार आज और कल’ और ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में खोए प्रेमियों के लिए अनुभवी सलाहकार की भूमिका निभाई। इन सभी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय से प्रामणिकता और विश्वसनीयता का स्पर्श लाया। उनके प्रदर्शन ने सीधे-सादे पात्रों को जीवित बना दिया जिसने इन फिल्मों को मज़बूत बना दिया। उनके पास भूलने योग्य भाग भी था, लेकिन वह जो पैसा आज कमा रहे हैं वह एक मज़बूत पे्ररणा साबित हुआ। जब उन्होंने ‘डी-डे’ और ‘औरगंजेब’ में नकारात्मक भूमिका निभाई तो उन्होंने उसे पूरी योग्यता से किया।

2002 में दिवालिया होने के बाद अमिताभ अपना घर बेचने के लिए मज़बूर हो गए थे इसके बाद अमिताभ एक प्रतिशोध के साथ काम करने के लिए लौट आए। सिनेमा में उनकी वापसी ने फिल्म निर्माताओं, लेखकों को उम्रदराज पात्रों की कल्पना, निर्माण करने की संभावना का दरवाजा खोला। जैसा कि ऋषि कपूर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हमेशा मार्ग का नेतृत्व किया है। कपूर अपनी विशिष्ट शैली के साथ इस क्रांति में गहराई ले आए। अब 61 वर्षीय अनिल कपूर ने ‘फन्ने खां’, ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ में अहम भूमिका निभाई है, जिसने सिनेमा के अनुभवी स्टार के लिए एक अलग जगह बनाई है। दर्शकों ने लगातार उनकी एक्शन भमिकाओं का आनंद लिया।

ऋषि कपूर एक ऐसे युग से संबंधित हैं जब एक विशेष लिपि और चरित्र भूमिकाएं न के बराबर थी। अब जब लेखकों ने एक संगठित दृष्टिकोण अपनाया है और दर्शकों को आकर्षित करने के लिए वास्तविकता से संबंधित फिल्में बनाने लगे हैं तो ऋषि कपूर और उनके समकालीन लोगों के सामने आने वाले समय में कुछ महान फिल्मों की संभावना है। जो उन्हें अधिक ताकत देगी।

‘बचपन’ लूटने वालों पर कसा शिकंजा

दोपहर के समय पूर्व दिल्ली के शास्त्री नगर में जि़ला मजिस्ट्रेट कार्यालय में बचाव दल बचाव अभियान चलाने की अनुमति मिलने का इंतजार कर रहा था। यह एक सामान्य कार्रवाई थी। टीम में किसी को यह पता नहीं था कि वे कहां जा रहे हैं सिवाए इस विचार को छोड़कर कि वे सभी एक आम-मिशन के लिए इक_े हुए हैं- बच्चों को बचाने के लिए। जो कारखानों, दुकानों और अन्य स्थानों में अवैध रूप से मज़दूरी करते हैं।

जल्दी ही बाल श्रम बचाव अभियान शुरू हुआ। टीम चार समूहों में विभाजित हो गई वे शास्त्री नगर इलाके की भीड़ वाली तंग गालियों में फैल गए अधिकतर रिहायशी इलाके में जहां यह अवैध कारखाने, चल रहे थे। इन कारखानों में ज़्यादातर, कढ़ाई, ज़री और आभूषण बनाने का काम होता है। इन कारखानों में आठ साल की उम्र के बच्चों को भी कार्य में शामिल किया गया था।

कारखाने और दुकान वालों को इस अभियान का पता पहले से ही चल गया था और उन्होंने बच्चों को बचाव दल की आंखों से बच कर इधर-उधर भागने के लिए कहा। बचाव दल केवल 12 बच्चों को ही बचा पाया। यहां जब भी छापा मारा जाता हैं तो फैक्टरी वालों को इसका पता पहले ही चल जाता है। कारखाने के मालिकों को हमारी योजना का पहले ही पता चल जाता है। इस मिशन का नेतृत्व करने वाले अरशद ने ‘तहलका’ को बताया।

26 जून को कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन की टीम के साथ लगभग 12 कर्मचारियों ने पूर्व दिल्ली के शास्त्री नगर में बाल श्रम -बचाव अभियान किया। यह अभियान का दूसरा दिन था। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन की टीम में रेड एफएम इंडिया, जिला मेजिस्ट्रेट के महेश और ‘तहलका’ भी शामिल थे।

बच्चों ने बताया

11वर्षीय आकाश (बदला हुआ नाम) ने हिचकिचाहट के साथ अपने दाहिने हाथ में गहरे कट का निशान दिखाया, एक चोट जो उसे पूर्वी दिल्ली में एक जूस की दुकान में काम करते हुए लगी थी। शुरू में लड़के ने अपने कट (ज़ख्म) के बारे में जानकारी देने से इंकार कर दिया। परन्तु जब उसे यह आश्वासन दिया गया कि भविष्य में ऐसा कुछ नहीं होगा, तो उसने बताया कि उसने दुकान में काम करना छोड़ दिया क्योंकि दुकान का मालिक अक्सर छोटी-छोटी गलतियों पर उसे मारता था।

”पहले वाला मालिक बहुत बुरा इंसान था। रोज़ मारता था, हर बात पर- जो भी हाथ में आता था उठा कर मार देता था’’। तभी वहां काम छोड़ दिया। आकाश ने कहा।

दूसरे पीडि़त विजय (बदला हुआ नाम) जो कि बिहार के दरभंगा जि़ले से था और तीन महीने पहले काम करने के लिए दिल्ली आया था। वह पूर्वी दिल्ली में स्थानीय चाइनीज फास्ट फूड की दुकान पर एक कुक के रूप में काम करता था। यह 15 वर्षीय 10 घंटे तक बिना आराम किए और बिना साप्ताहिक अवकाश के काम करता। जब उससे मुलाकात हुई तब तक उसे मालिक से कोई पैसा भी नहीं मिला था।

बिहार के पूर्णिया जि़ले के 13 वर्षीय सोनू (बदला हुआ नाम) ने कहा कि वह तंग जगह में कमरे को नौ-दस अन्य साथियों के साथ सांझा करता है। वे सभी सहायक या मज़दूरों के रूप में पूर्वी दिल्ली में कपड़ों की दुकान में काम करते हैं।

आकाश, विजय और सोनू 12 जून को कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन और रेड एफएम इंडिया के नेतृत्व में बालश्रम बचाव अभियान में बचाए गए 12 लड़कों में से तीन थे। ‘तहलका’ को जो इस मिशन में भागीदार था उसे लड़कों से बातचीत करने का अवसर मिला।

जांच से पता चला है कि 11 लड़के बिहार और उत्तरप्रदेश के थे। इन्हें दो-तीन महीने पहले दिल्ली लाया गया था।

बिहार में दरभंगा और पूर्णिया जि़लों और उत्तरप्रदेश के दहरिया और बादान जि़ले के अधिकांश लड़के भारत की राजधानी में बाल मज़दूरी में लगे हुए हैं। इन लड़कों में से एक उसी दिन वहां पहुंचा था जिस दिन यह बचाव अभियान चला गया था। बचाव दल ने पाया कि लगभग हर दिन बिहार और उत्तरप्रदेश के पिछड़े इलाकों से एक या दो लड़के शास्त्री नगर के लघु उद्योग क्षेत्र में आते हैं।

हालांकि विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि पिछले दो दशकों में बाल श्रम (बाल मज़दूरी) में नाटकीय गिरावट आई है। अभी भी भारत में बाल श्रम को खत्म करना एक कठिन कार्य है। ऐसी कई नीतियों के बावजूद भी लगभग 80 फीसद बच्चे अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी आर्थिक- सामाजिक स्थितियों के अधिकार से वंचित हैं और गैर कानूनी गतिविधियों में उनके बचपन और भविष्य के खो जाने का जोखिम हैं।

बाल श्रम अधिनियम

जुलाई 2016 में संसद ने बाल श्रम संशोधन बिल पारित किया था। यह अधिनियम 83 खतरनाक व्यवसायों और प्रक्रियाओं में बच्चों के रोज़गार पर रोक लगाता है। यह अधिनियम 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के रूप में ”किशोरावस्था’’ को परिभाषित करता है और किसी भी खतरनाक व्यवसाय में बच्चों के रोज़गार पर रोक लगाता है।

अधिनियम स्पष्ट करता है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों को कार्य पर रखने वाले को छह महीने से दो साल तक की जेल और 20 हजार से 50 हजार रुपए का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह अपराध दोहराने पर अपराधी को एक से तीन साल तक की जेल हो सकती है। 12 जून 2018 को बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस के अवसर पर कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाऊंडेशन और रेड़ एफएम इंडिया दोनों बाल सुरक्षा के महान मिशन को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ आए।

नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने रेड एफएम से कहा,” जब मैंने बाल श्रम के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की तब रेडियो मेरी सक्रियता का एक साधन था। प्रसारण माध्यम के रूप में रेडियो का एक दूरगामी प्रभाव है जो दूर दराज के क्षेत्रों में पहुंचने की क्षमता रखता है। मुझे खुशी है कि सुरक्षित बचपन का संदेश जनता तक पहुंच सकता है’’।

रेड एफएम के आरजे रौनक ने कहा, ”मैं हाल में एक बचाव अभियान का हिस्सा बना था मेरा विश्वास कीजिए वहां से बचाए गए बच्चों को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की सख्त ज़रूरत है। वे भूखे थे और कपड़ों से वंचित थे। मुझे पूरा विश्वास है कि कैलाश सत्यार्थी फाऊंडेशन उनके जीवन को एक नया अर्थ देगा और उनकी शिक्षा का ध्यान रखेगा’’।

फिलहाल इन लड़कों की कैलाश सत्यार्थी फाऊंडेशन के ‘बचपन बचाओं आंदोलन’ के पुनर्वास केंद्र ‘मुक्ति आश्रम’ में देखभाल की जा रही है।

चश्मा साफ कर लीजिए

हम और वह नहीं हम’, ‘चश्मा साफ कर लीजिए’ जैसे वाक्यों से फिल्म के आखिर में जज साहेब द्वारा पूरा संदेश दे दिया गया है।

समाज के हर वर्ग को बहुत धीरे से मगर बहुत गहराई से एक सीख दे दी गई। फिल्म देखने के बाद बहुत ताकत और तर्क मिलते हैं। मुसलमान को देशभक्ति का सबूत देने की कोई ज़रूरत नहीं।

हर कुतर्क का जवाब देने की ज़रूरत नहीं वरन संविधान को संभालने की व उसे मजबूत करने की बात की गई है। पूरी फिल्म का सार इसी में सिमट आता है। यह समझ में नहीं आता कि जिंदाबाद लेखक को कहूं, निदेशक को, किरदारों को जिन्होंने बहुत खूबसूरती से अपने किरदारों को निभाया।

फि़ल्म के अंत में आतंकवाद की परिभाषा को बहुत सादगी के साथ रख दिया गया। ‘राज्य या विरोधभाव को दबाने के लिए हिंसा या भयोत्पादक उपायों का अवलंबन’ इस परिभाषा में कहीं कोई धर्म की बात नहीं है। जिस की पुरजोर कोशिश बहुत वर्षों से दुनिया भर में पूंजीवादी ताकतें और सांप्रदायिक ताकते आतंकवाद को मुसलमानों के साथ जोड़कर लोगों के दिमागों में डालने को पुरजोर कोशिश कर रही हैं।

पूरी फिल्म देश में 2014 से जो गंदगी फैली है उसको बहुत बेहतरीन तरीके से साफ करने का सफल प्रयास किया है।

आरएसएस का कार्य तो उसके जन्म के साथ ही चल रहा है किंतु पिछले 4 सालों में सत्ता की शाबाशी के साथ हर जगह जिस भगवा आतंकवाद को फैलाया है उस जहर को शांत करने के लिए तो कोई गांधी जैसा व्यक्तित्व ही चाहिए।

‘अंतिम परिच्छेद’ के पहले खंड में गांधी जी के सचिव प्यारेलाल 114 वें पन्ने पर लिखते हैं कि जब गांधी जिन्ना को 1944 में मिलने गए तब भी उन के हमले चालू थे। आरएसएस के लोग जिनमे गोडसे भी था, गांधी जिन्ना वार्ता रोकने के लिए गांधी जी के वर्धा निवास के तीनों रास्तों को घेर कर बैठ गए थे। पुलिस ने कहा कि वह गंभीर शरारत करना चाहते हैं मगर बापू ने कहा ‘मैं उनके बीच अकेला जाऊंगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूंगा स्वयंसेवक अपना विचार बदलने और मुझे मोटर में जाने को कहें तो दूसरी बात है।’ पुलिस ने उन लोगों को गिरफ्तार किया तो उनके पास चाकू भी मिला।

1948 में 28 जनवरी को बिरला भवन पर प्रार्थना के समय बम विस्फोट किया गया किंतु गांधी ने गृह मंत्री और प्रधानमंत्री दोनों को इस बात के लिए मना किया कि उनकी सभा में आने वाली किसी भी व्यक्ति की तलाशी डाली जाए।

व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के विद्यार्थी इन तथ्यों को नहीं जानते कि 1946 में आजादी की बातें हो रही थी। आज के बांग्लादेश में स्थित नोआखली और टिपेरा जिलों में गांधीजी हिंदू समुदाय की रक्षा के लिए गांव-गांव पैदल घूम रहे थे। एक गांव से दूसरे गांव पैदल जाते थे। उनके साथ उनके भतीजे की बेटी मनुबेन गांधी रहती थी। दोनों दादा पोती बहुत कम सोते, दिन भर लोगों से मिलते। काम करते। हिंदुओं को कहते कि गीता पढ़ो और मुसलमानों को कुरान पढऩे की ताकीद करते थे। सामूहिक प्रार्थना करते थे जिसमें सभी धर्मों की प्रार्थना का अंश हैं। सकरे-घने सुपारी के पेड़ों के बीच से होकर एक से दूसरे गांव के पैदल रास्ते में शरारती लोग कांच के टुकड़े व मानव मल तक डाल देते थे। उस दौरान गांधी ने किसी भी सभा में स्वागत समारोह को स्वीकार नहीं किया। अपने इस काम को मानव मात्र की सेवा मानते थे। मंदिर में चप्पल पहन कर नही जाते इसलिए सारी यात्रा के दौरान वे नंगे पैर ही रहे। और इस तांडव को रोकने में सफलता प्राप्त की। वह हिंदू नहीं मुस्लिम घर में ठहरते थे। अपने सभी साथियों को उन्होंने अलग-अलग गांवों में बिठा दिया था। बीमार पडऩे पर राम ही मेरा रक्षक है ऐसा करके किसी डॉक्टर को भी नहीं बुलाते थे।

सामूहिक प्रार्थना में हर दिन हिंदू मुसलमानों से रघुपति राघव राजा राम ईश्वर अल्लाह तेरे नाम यह प्रार्थना करवाते थे और करते थे।

नोआखली यात्रा के दौरान एक दिन उनसे नेहरू जी मिलने आए और उन्होंने कहा बापू हमें आपकी दिल्ली में बहुत जरूरत है आप दिल्ली आइए। गांधीजी का उत्तर था मैं यहां एक गांव मेंं जो काम करूंगा वह पूूरे भारत के लिए नजीर है।

हिंदू मुसलमान का फर्क न मानकर एक मानव मात्र के रूप में मनुष्य को देखते थे। 1947 के अगस्त सितंबर में कोलकाता बिहार में जब मुसलमानों का कत्लेआम होने लगा तो वे कोलकाता गए और उन्होंने दो-तीन दिन में ही शांति स्थापना की।

मनु बहन की लिखी पतली सी किताब ‘बापू मेरी मां’ में कई बातों का उल्लेख है कि गांधी जी से मिलने तत्कालीन बंगाल के मुख्यमंत्री सोहरावर्दी साहब आए और कहा कि बापू आप बंगाल चलिए गांधी जी नेेे उत्तर दिया की आप और मैं एक साथ रहेंगे। गांधी बंगाल गये और दुनिया कलकत्ते के चमत्कार को देख पाई। एक बूढ़े कृशकाय 79 वर्ष के आदमी और 16-17 साल की लड़की के पास रात को एक मुसलमान अपनी जान बचाने आता है। गांधी आताताई भीड़ के सामने खड़े हो जाते हैं। भीड़ को मजबूरन लौटना पड़ता है। गांधी अगले दिन 21 दिन के उपवास की घोषणा करते हैं। भारत की अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के शब्दों में जो काम एक पूरी बटालियन नहीं कर सकती थी वह गांधी जी के उपवास ने कर दिखाया।

प्रसिद्ध लेखक स्वर्गीय अजीत भट्टाचार्य जी ने लिखा हैं कि कोलकाता में गांधीजी के उपवास का यह असर था कि लोग ट्रकों में डंडों की जगह घर-घर राखियां लेकर पहुंचे और एक दूसरे से राखी बंधवा रहे थे। उस प्यार उस जज्बे की देश को ज़रूरत है। उस इंसाफ पसंद इंसान की देश को जरूरत है जिसका अपना कुछ नहीं हो। बहुत कठिन है सामने वाले की सारी नफरत को समेटते हुए उसके लिए प्यार रखना। माफ करने की ताकत और गले लगाने का जज्बा होना चाहिए।

अपने को तथाकथित हिंदू रक्षक कहलाने वाले नोआखली और टिपेरा जिलों में उस दौरान कुछ भी काम करते नजर नहीं आए। अकेले गांधी ने अपने कुछ अनुयायियों के साथ भारत के इतिहास में इंसानियत के वह स्वर्णिम पन्ने जोड़ दिए जो तालिबानी कौमों के कुकर्मों के बाद भी चमचमाते रहेंगे।

गांधी के संघर्ष की विरासत को लेकर चलने वाले बहुत कम नजर आ रहे हैं। और जो हैं वह समाज के सामने जिस तरह परिलक्षित होने चाहिए वह नहीं हो पा रहे क्योंकि आज हमला बापू के समय से बड़ा है। ज़हर फैलाने के लिए मात्र सुबह की शाखा ही नहीं वरन फेसबुक, व्हाटसअप की आभासी दुनिया भी है। जो आज के हिटलरी झुंड को झूठ को सच मे प्रदर्शित करने की ताकत दे रहा है। हिटलर के साथी ग्लोबल्स ने कहा था कि एक झूठ को सौ बार कहने से वह सच लगने लगता है। धर्मनिरपेक्ष ताकतों के पास आरएसएस जैसा संगठन नहीं जो उन्माद की बुनियाद पर खड़ा है और हिंदुत्व को भगवा आतंकवाद में बदल रहा है। इसका सामना करने के लिए सच्चाई और प्रेम की राह पर चलने वाला गांधी ही हो सकता है।

विनोबा भावे से जब पूछा गया की गांधी जी की हत्या के बाद पहले क्षण आपको कैसा लगा? उन्होंने कहा गांधी मरे नहीं मैं आंख बंद करते ही उनको सामने पा जाता हूं। शायद इसी भावना की जरूरत है वह आधा नंगा फकीर जिसने देश की हर समस्या को अपने से जोड़कर उसका हल तलाशा। उसी को देश में ढूंढे। उसका विचार अगर हमारे अंदर उतरे, तो वहीं आज की हवा में फैलते इस जहर को रोक सकता है। झूठ को रोक सकता है। गांधी ने अहिंसा का प्रतिकार किया था। नोआखाली, कोलकाता, बिहार से लेकर दिल्ली तक अकेले ही उन्होंने मौत के तांडव को परास्त किया था।

उस जादुई चमत्कार के लिए आहुति देने वाले लोगों की ही आज जरूरत है और वही एक तरीका बचता है। जब सरकारें हिंसक हो, सत्ता मधान्त हो, संविधान को जलाने वाले नजरअंदाज कर दिए जाएं और अंधेरे का घनत्व बढ़ता जाए। जब आताताई शक्तियां संगठित रूप से आंख कान बंद करके हमले कर रही हो और रक्षक आंख-कान बंद करके उन्हें हवा दे रहे हो।

तब हमें देश के अंदर और अपने अंदर गांधी को तलाश करना होगा। उस रास्ते पर आगे बढऩा होगा। अफसोस कि गांधी विचार वाले कहलाने वाले साथी लोग सड़कों पर या इस तांडव के सामने जिस तरह खड़े होकर की दिखने चाहिए वह नहीं दिख रहे है। ज़रूर वे अपनी तरफ से कुछ करते होंगे।

गांधी जी ने कहा था की ‘निराशा ने जब भी घेरा तो बार-बार इतिहास साक्षी हुआ की प्यार और सत्य की सदा विजय हुई। इस धरती पर बहुत से हत्यारे और सितमगर हुए और कभी कभार ऐसा लगा कि विजय उन्हें ही मिलेगी पर आखिर यही हुआ कि वह मिट गए।’

मुल्क की तस्वीर तभी साफ हो पाएगी जब हम अपना चश्मा साफ कर ले।