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नीतीश को भारी पड़ सकता है मुजफ्फरपुर कांड

मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है। उसकी यह जांच पटना हाईकोर्ट की निगरानी में हो रही है। विधिवत रूप से जांच का काम 11 अगस्त से शुरू हो गया है लेकिन इसकी तैयारी उसी दिन से कर ली गई थी जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कांड की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान किया था। राज्य पुलिस की ओर से कांड के उन सभी अभियुक्तों को पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया है जिनका एफआईआर में नाम था । राज्य पुलिस अब सीबीआई की मदद करेगी लेकिन कार्रवाई सीबीआई की ओर से होगी। जांच कार्य कब तक चलेगा यह निश्चित नहीं है।

मिली जानकारी के मुताबिक सीबीआई के डीआईजी अभय सिंह की अगुवाई में उनकी टीम 11 अगस्त को सुबह ही बालिका गृह पहुंच गई और उसने वहां पूरी तरह से छानबीन की। उसने गृह की तमाम फाइलें और कागजात अपने कब्जे में कर लिए। राज्य पुलिस ने गृह और उसके कमरों को सील कर रखा था और पहरेदारी का पुख्ता इंतजाम किया था। सीबीआई ने सील को तुडवाया और पूरी छानबीन की। मौके पर दिल्ली से सेंट्रल फारेंसिक साइंस लेबोरटरी के अधिकारी भी पहुंचे थे। उसकी अलग से जांच-पड़ताल शुरू हुई। बालिका गृह से ही सटा कांड के मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर का भव्य मकान है और उसी में उनके अखबार का कार्यालय और छापाखाना भी है। सीबीआई ने उनके पुत्र राहुल आनंद से भी पूछताछ की। सीबीआई ने अखबार, उसके कार्यालय व छापाखाना का मुआयना किया। मेजिस्ट्रेट शीला रानी गुप्त की मौजूदगी में सीबीआई ने अपनी कार्रवाई शुरू की। मिली जानकारी के अनुसार बृजेश ठाकुर को बिना किसी खास बीमारी के अस्पताल में भर्ती करा दिया गया और किन्हीं अस्पष्ट कारणों के उसे ‘हाई स्क्योरिटी वार्डÓ में भेज दिया गया।

मिल जानकारी के मुताबिक सीबीआई गिरफ्तार अभियुक्तों से पूछताछ पूरी होने के बाद बालिकाओं के यौन शोषण के मामले से जुड़े और लोगों की गिरफ्तारी की जाएगी। गृह की पदाधिकारी फरार थी लेकिन उनकी गिरफ्तारी हो चुकी है। उनसे पूछताछ से अहम जानकारी मिल सकती है। कांड के प्रकाश में आने के बाद राज्य पुलिस और समाज कल्याण विभाग की ओर से की गई कार्रवाई के तहत मुजफ्फरपुर बालिका गृह की बालिकाओं को पटना समेत दो जगहों के बालिका गृहों में स्थानांतरण कर दिया गया है। सीबीआई उनसे तमाम जानकारी लेगी। मुजफ्फरपुर आने से पहले सीबीआई के अधिकारी पटना में समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों से मुलाकात कर चुके हैं।

पटना हाईकोर्ट की निगरानी में सीबीआई की जांच से कांड को लेकर आंदोलन कर रहे विभिन्न संगठनों, खासकर मुजफ्फरपुर के महिला संगठनों को यह उम्मीद जगी है कि इन बालिकाओं के साथ अन्याय करने वाले वाले सभी धरे जा सकेंगे और उन्हें सज़ा मिल कर रहेगी। जब तक हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई की जांच का फैसला नहीं हुआ था, तब तक महिला संगठनों को सीबीआई पर ज़्यादा भरोसा नहीं था लेकिन अब भरोसा जगा है। उनके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की वजह से सांसत में हैं। उनकी साख पर बट्टा लगा ही है, आधी आबादी यानी महिलाओं में उनकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग गया है। उनके कामकाज की पारदर्शिता पर उंगली उठने लगी है। उनके खिलाफ आंदोलन का सिलसिला भी मंद पड़ता नहीं दिखता। उनके इस्तीफे की मांग भी होने लगी है। वे अपने अनुकूल स्थिति बनाने की हर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उसका कोई असर नजर नहीं आ रहा है। हाल यह है कि उनके उठाए गए कदमों का श्रेय भी दूसरों को चला गया। कुछ पत्रकार भी कम परेशान नहीं है। उन पर भी उंगली उठने लगी है।

मुजफ्फरपुर बालिका कांड के मद्देनजर नीतीश कुमार के खिलाफ महिलाओं का विरोध, जुलूस और सभा से यह छिपा नहीं रह गया कि वे उनसे घोर नाराज हुई हैं। नीतीश कुमार के लिए उनकी नाराजगी को दूर करना आसान भी नहीं है। दूरदर्शी माने जाने वाले नीतीश कुमार ने सूुबे में सत्ता में आने के बाद से ही आधी आबादी को अपने पक्ष में करने की रणनीति अख्तियार की। वे यह मान कर चले कि आधी आवादी के उनके पक्ष में होने से उनकी स्थिति मजबूत रहेगी और चुनाव जैसे मौके पर उनका पलड़ा भी भारी रहेगा। महिलाओं के सशक्तिकरण के दौर मेें उन्हें जो श्रेय मिलेगा, वह अलग राजनीतिक फायदा होगा। आधी आबादी को अपने पक्ष में करने के लिए उन्होंने सबसे पहले पंचायतों और निकाओं के चुनाव में पचास फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया। एकल पदों पर भी आरक्षण का प्रावधान किया। केवल बिहार में ही नहीं, देश में ऐसा कदम पहली बार उठाया गया था। नीतीश कुमार को आधी आबादी के बीच लोकप्रिय होने में बड़ी कामयाबी मिली। चुनावों में इसका असर भी दिखा। नीतीश कुमार ने आधी आबादी का समर्थन पाने व उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए सूबे में पूर्ण शराबबंदी करने का कदम उठाया। इससे भी उन्हें महिलाओं का मन जीतने में कामयाबी मिली। शिक्षा के क्षेत्र में छात्राओं को साइकिल, मुफ्त पढाई, आर्थिक मदद जैसे कई योजनाओं से ही नहीं, रोजगार मुहैया कराने की विभिन्न योजनाओं से भी आधी आबादी उनकी पक्षधर हुई। नीतीश कुमार आधी आबादी का समर्थन प्राप्त करने के मामले में निश्चित थे। लेकिन अब बदली स्थिति से वे निश्चिंत नहीं रह सकते। आधी आबादी सुरक्षित है, नीतीश कुमार उसे कैसे भरोसा दिला सकेंगे, इस बारे में अनिश्चयता ही है।

नीतीश कुमार की सरकार को कांड का पता काफी पहले चल गया था लेकिन कार्रवाई करने में देर की गई। जब कांड का खुलासा हुआ तो भी उसको गंभीरता से नहीं लिया गया। नीतीश कुमार ने कांड की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान तो किया लेकिन इसका श्रेय भी उनको नहीं है। संसद में विरोधी पक्ष की ओर से मामला उठाने व सीबीआई से जांच कराने की मांग उठाने पर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ऐसा बयान दिया जिससे विरोधी संतुष्ट हो गए और नीतीश कुमार पर दबाव बना। भाजपा के दबाव की वजह से नीतीश सरकार को कांड की जांच सीबीआई से कराने का फैसला करना पड़ा। आखिर नीतीश कुमार के सामने विषम परिस्थिति क्यों पैदा हुई। दबाव की राजनीति में भाजपा कैसे आगे हो गई। नीतीश कुमार क्यों नहीं खुद ब खुद शुरू में ही कांड की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान नहीं कर पाए। समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा की इस्तीफे की मांग भाजपा के नेताओं ने की। वर्मा जद (एकी) के नेता है। जद (एकी) उन्हें खुद ही हटाती तो उसके कदम को सराहा जाता। इस मामले में भी भाजपा का दबाव था।

मुजफ्फरपुर बालिका गृह से जुड़े जिम्मेदार 13 अधिकारियों का तबादला हुआ। राज्य सरकार ने अपने स्तर पर कई कदम उठाए। नीतीश कुमार का यह भी फैसला है कि राज्य के सभी बालिका, बाल और महिला गृहों को अब खुद राज्य सरकार चलाएगी। गृहों को सरकारी भवन में लाया जाएगा। कुल मिला कर यह कि सरकार यह जताना चाहती है कि वह ऐसा इंतजाम कर रही है जिससे मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड जैसा कांड नहीं हो पाए। नीतीश कुमार इधर जहां जा रहे हैं यह जरूर जता रहे हैं कि अपराधी किसी भी सूरत में बच नहीं पाएंगे। उन्होंने माना भी है कि इस कांड से शर्मीदंगी हो रही है।

नीतीश कुमार के निर्देश पर सूचना एवं जन संपर्क विभाग अधिकारियों की बैठक हुई और उसमें फैसला यह लिया गया कि जिन पत्रकारों को सरकारी मान्यता कार्ड मुहैया कराया गया है, उनकी फिर से जांच होगी। तकरीबन 200 पत्रकारों के कार्ड को रद्द किया जाएगा। कार्ड किन पत्रकारों को दिया जाए, किन्हें नहीं, इस बारे में नए नियम-कायदे बनेंगे। कुल मिला कर यह कि सरकार पाक साफ पत्रकारों को ही कार्ड मुहैया कराएंगी। ऐसी सख्ती बरतेगी जिससे ब्रजेश पांडे जैसा पत्रकार फायदा नहीं उठा पाए। सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार पक्षपात की वजह से सारे वह काम हो जाते हैं, जो गैरकानूनी और अनैतिक होते हैं। सरकारी अधिकारियों पर नियंत्रण के लिए क्या कदम हो, इस पर अभी नजर ही नहीं है।

चुनाव हों एक साथ ही: अमित शाह

अमित शाह ने भाजपा के अंदर ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बहस छिड़वा दी है। इसके साथ ही उन्होंने विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान को इस बाबत पत्र भी भेजा है। भारतीय चुनाव आयोग अब इस प्रस्ताव से बढऩे वाले खर्च के हिसाब-किताब में जुट गया है। ईवीएम मशीनों, वीवीपीएटी मशीनों के साथ ही सुरक्षा और लोगों की ज़रूरत जताई जा रही है। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का कहना टालना आसान नहीं लगता।

विधि आयोग को अमित शाह ने आठ पेज का पत्र भेजा है। ऐसा ही पत्र केंद्रीय चुनाव आयोग को भी भेजा गया है। हालांकि कांगे्रस और कई दूसरी पार्टियां देश में ‘एक देश, एक चुनाव’ के तहत एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। इस पर अमित शाह का कहना है कि इस मुद्दे का विरोध आधारहीन है। ‘एक देश,एक चुनाव’ होने से देश के संघीय ढांचे को खासी मज़बूती मिलती है। विपक्ष जो विरोध कर रहा है वह आधारहीन है। उसे राजीतिक तौर पर उकसाया गया है जो अनुचित है।

अमित शाह ने विपक्ष के इस अंदेशे को भी बेबुनियाद बताया कि इस तरह चुनाव कराने से राष्ट्रीय पार्टियों को ही ज़्यादा लाभ मिलेगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब 1980 में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए थे उसके साथ ही संसदीय चुनाव भी हुए। कांगे्रस की तब जीत हुई। इसी तरह 2016 में जब महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के 307 दिन के लिए उन इलाकों के लिए आदर्श संहिता जारी की थी जहां संसद, विधानसभा या स्थानीय निकायों के लिए चुनाव होने थे। अमित शाह का पत्र तब पहुंचा था जब केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के नेतृत्व में पार्टी के नेता विनय सहस्त्र बुद्धेे, भूपेंद्र यादव और अनिल बलूनी एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे पर विधि आयोग के अध्यक्ष से मिले। इस बात की पूरी संभावना लग रही है कि अगले वर्ष यानी 2019 की शुरूआत में ही बारह राज्यों में चुनाव एक साथ हो जाएंगे।

एक साथ चुनाव पर ज़रूरी विचार मंथन: मोदी

उधर भाजपा के अंदर भी लोकसभा चुनावों के साथ बारह राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव 2019 में ही करा लेने पर खासा विचार मंथन होता रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विचारमंथन की इस प्रक्रिया की तारीफ की। उन्होंने लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए भी यह कहा कि यदि देश को बार-बार आम चुनावी खर्च से बचाना है तो ऐसा करना ही होगा।

पार्टी के एक सूत्र के अनुसार पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं ने तमाम तरह की संभावनाओं पर राय-मश्विरा किया। एक संभावना तो यह भी थी कि मध्यप्रदेश, राजस्थान छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनावों को टाला जाए और जब इन राज्यों की विधानसभाओं की मियाद पूरी होती है यानी नवंबर-दिसंबर में तभी राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। फिर 2019 की शुरूआत में ही आम चुनावों के साथ यहां भी चुनाव हो जाएं।

आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और ओडिसा में लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव संभव हैं। लेकिन महाराष्ट्र, हरियाणा, अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और झारखंड जिनमें एनडीए की सरकारें है वहां भी चुनाव पहले कराए जा सकते हैं जिसमे लोकसभा चुनावों के साथ ही वहां भी चुनाव हो जाएं।

पार्टी के नेताओं का मानना है कि तकरीबन एक दर्जन राज्यों में बिना किसी कानून के बदलाव किए बगैर चुनाव हो सकते हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री संविधान मानते हुए अवधि पूरी हुए बगैर अपने इस्तीफे भी दे देंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनावों के नतीजों में पार्टी वापस सत्ता मे आ पाएगी।

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव सबसे पहले चुनाव आयोग ने ही 1983 में रखा था। विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी ने मई 1999 में आयोग की 170वीं रपट में कहा था ‘हमें उस स्थिति में जाना चाहिए जब लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, एक ही समय पर हो सकें।’

अभी हाल में विधि आयोग के साथ हुई बैठक में कांगे्रस पार्टी ने कहा कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना असंवैधानिक और अमल में लाने के अनुरूप नहीं जान पड़ता। इस पार्टी ने इसे संवैधानिक तौर पर प्रतिकूल और निरर्थक भी बताया। कांग्रेस ने कहा यदि यह अमल में आया तो इससे लोकतंत्र की चूलें चरमरा जाएंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही इस मुद्दे पर अपना इरादा जता दिया था। वे अमूमन एक देश और एक चुनाव के मुद्दे पर बोलते भी रहे हैं। हालांकि शिरोमणि अकाली दल, बीजू जनता दल, एआईडीएमके समाजवादी, टीआरएस और वाईएसआरपीओ पार्टियां इसके पक्ष में हैं लेकिन कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस डीएमके, टीडीपी, सीपीएम, सीपीआई, जद (एस) और फारवर्ड ब्लाक इसके विरोध में हैं।

चुनाव आयोग इस विचार का समर्थक तो है लेकिन उसकी सलाह है कि उसे इस प्रस्ताव पर काम करने के लिए और समय चाहिए।

तो नए साल में राज्यों के भी चुनाव, होंगे लोकसभा के साथ?

चुनाव आयोग की हिचकिचाहट के बावजूद विधि आयोग में विभिन्न पार्टियों के तर्को को सुना जाना है। संकेत इस प्रकार के हैं कि आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में अपना फैसला देगा। इसके लिए ज़रूरी वैधानिक संशोधन भी किए जाएंगे। फिर दो चरणों में राज्य विधानसभाओं और आम चुनाव करा लिए जाएंगे।

विधि आयोग जर्मनी में अमल में आ रहे नमूने को भारत के संदर्भ में उपयोगी मान रहा है। जहां अविश्वास प्रस्ताव का एक सकारात्मक वोट भी है जिसके आधार पर जब एक सरकार जाती है तो दूसरी सरकार को शपथ दिला दी जाती है। अब इसे ध्यान मेें रखते हुए दलबदल कानून में और संशोधन ज़रूरी होंगे। साथ ही (पार्लियामेंटरी प्रोसीज़र एंड रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल्स एक्ट) कुछ दूसरे कानूनों में भी संशोधन ज़रूरी होगा जिससे सुचारू रूप में इस योजना पर अमल हो सके।

उम्मीद है कि विधि आयोग आंतरिक तौर पर जल्दी ही मसौदा भेजेगा और साथी सदस्यों को उस पर दस दिन में अपनी प्रतिक्रिया देने का अनुरोध करेगा फिर आखिरी मसौदा तैयार हो जाएगा।

‘एक देश, एक चुनाव’ कराने में खर्च का मुद्दा बहुत अहम नहीं होगा। अलबत्ता चुनाव के दौरान इस्तेमाल होने वाली मशीनों की तादाद ज़रूर बढग़ी इसी तरह दूसरे खर्च भी बढ़ेेंगे। लेकिन इन सबके उपयोग एक साथ जब होगा तो निश्चय ही खर्च का बहाना अनुचित होगा। एनडीए के शासन के पिछले दो पूर्व मुख्य न्यायाधीश एमएन वेंकटचलैया संविधान समीक्षा आयोग के अध्यक्ष भी थे।

देश में एक साथ चुनाव कराने का सिलसिला 1967 तक था। लेकिन 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के भंग किए जाने और दिसंबर 1970 में लोकसभा के भंग होने के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराने का सिलसिला शुरू हुआ।

अभी हाल में विधि आयोग ने इसी साल, अप्रैल में एक वर्किंग पेपर जारी किया था। इसमें कहा गया था कि पांच संवैधानिक सिफारिशें आवश्यक होंगी जिससे ‘एक देश, एक चुनाव’ को अमल में लाया जाए। नीति आयोग ने भी केंद्र के कहने पर इसी मुद्दे पर जनवरी 2017 में एक वकिंग पेपर जारी किया था। इस प्रस्तावों में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव लोकसभा और विधानसभाओं के साथ ही कराने की बात नहीं है।सीमा चिश्ती

साभार: इंडियन

चुनाव आयोग ने कहा इतनी जल्दी नहीं!

यदि कुछ राज्यों की विधानसभाओं की अवधि कम करनी हो या बढ़ानी हो तो उसके लिए संविधान में संशोधन ज़रूरी है। यह कहना है मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का। एक कानूनी ज़रूरत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने इस संभावना से इंकार किया कि इतनी जल्दी एक साथ चुनाव कराना संभव है। इसके लिए लाजिस्टिक ज़रूरतें भी पूरी होनी चाहिए, मसलन वीवीपीएटी (पेपर पर यह जताने वाली मशीनें कि अपने वोट किसे दिया)

उन्होंने बताया कि ‘एक देश, एक चुनाव’ के मुद्दे पर आयोग 2015 में ही अपनी तैयारी और अपनी राय- बात मसलन अतिरिक्त तौर पर पुलिस बल आदि ज़रूरतों पर अपनी ओर से जवाब दे चुका था। मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि चुनाव पैनेल चुनाव कराने की अपनी जिम्मेदारी अवश्य निभाएगा। जब भी राज्य विधानसभाओं की अवधि खत्म होगी। चुनाव आयोग ईवीएम और वीवीपीएटी को लोकसभा चुनाव के पहले ही मंगाने के प्रयास में जुटा है। तमाम आवश्यक ईवीएम यानी 13.95 लाख बैलेट इकाइयां और 9.3 लाख कंट्रोल यूनिट 30 सितंबर तक आ जाएंगे। इसी तरह 16.25 लाख वीवीपीएटी भी नवंबर के अंत तक आ जाएंगे। कुछ अतिरिक्त  वीवीपीएटी भी ली जिससे कहीं मशीन खराब हो जाए तो उन्हें बदला जाए। तकरीबन 10,300 वीवीपीएटी मशीनों के दस राज्यों में गड़बड़ हो जाने की बात सामने आई थी। उन्हें 28 मई तक उप चुनावों में दुरूस्त कराना पड़ा।

अब यदि 2019 में एक साथ चुनाव  लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक साथ होने हैं तो चुनाव आयोग को तकरीबन 24 लाख ईवीएम की ज़रूरत पड़ेगी ।

कानून आयोग के साथ 16 मई को एक साथ चुनाव कराने पर हुई बातचीत के दौरान भी चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें बारह लाख अतिरिक्त ईवीएम और उनके बराबर तादाद के वीवीपीएटी मशाीनों को खरीदने के लिए रुपए 4,500 करोड़ मात्र की ज़रूरत होगी। यह बजटीय अनुमान तब मशीन खरीदने पर आ रही मशीनों के खर्च पर आधारित था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कानून आयोग को अगस्त में लिखा था कि यह कहीं बेहतर होगा यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करा दिए जाएं।  उन्होंने यह भी कहा था कि यदि इस विचार का विरोध होता है तो वह ‘राजनीति से प्रेरित ही’ होगा। अभी हाल ही में कानून आयोग ने एक पेपर में यह सिफारिश की थी कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों को 2019 की शुरूआत में  ही दो चरणो मे करा दिया जाए।

एक साथ चुनाव कराने पर एनडीए में शामिल पार्टियों में शिरोमणि अकाली दल, अन्ना एकआईडीएमके और समाजवादी पार्टी और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने उत्साह तो जताया है लेकिन कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, द्रमुक (डीएमके), तेलुगु देशम, जनता दल (यू) और जनता दल (एस) ने असहमति जताई है।

कई राजनीतिक टिप्पणीकार और विशेषज्ञ भी मानते हैं कि एक साथ चुनाव कराने का भारत के संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा और राज्य की स्वायत्तता भी घटेगी।साभार: वायर

इमरान की कामयाबी की दुआ मांगिए

क्रिकेट के मैदान से अपना हुनर साबित करने वाले इमरान खान अब पाकिस्तान में अमन-चैन कायम रख पाएंगे इस पर खासी बहस चल रही है, लेकिन इस बात का अंदेशा ज़रूर है कि इमरान के लिए राजकाज चला पाना आसान नहीं होगा।  हालांकि जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा पिच अच्छी, टॉस भी जीत लिया है। सेना के साए में वे 18 अगस्त को शपथ ज़रूर लेंगे। लेकिन देश में भूख, बेरोजगारी और मंहगाई पर कितना पुरजोर काबू बना पाएंगे इस पर विवाद है।

तकरीबन दो दशक से पाकिस्तान में इमरान की पार्टी पीटीआई भी पार्टियों की जमात में एक अदद पार्टी थी जिसका काम सिफारिश करना और काम करा देने का मकसद पूरा करना था। लेकिन इस बार इसे जो वोट मिले वह पीएमएलएन के वोट से 40 लाख ज़्यादा हंै। इमरान की पार्टी कराची में खासी उभरी। यह शहर मशीनों में जुगाड़ के काम, ठगी और राजनीति के लिए मशहूर रहा है। अभी इमरान की पार्टी को पंजाब में अपना आधार और मजबूत करना है। वहां खासी बड़ी जनसंख्या है। यहां पीएमएलएन के जाने-माने नेता शरीफ भाई हंै। यानी शाहबाज और नवाज शरीफ। इनमें नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। शाहबाज पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं।

राष्ट्रीय असेंबली में इमरान खान को 115 सीटें अपनी पार्टी की बदौलत हासिल हुई हैं। यानी देश में सबसे बड़ी पार्टी अब इसे छोटी पार्टियों और निर्दलीयों को साथ लेकर सरकार बनानी है। पार्टी के खासमखास जहांगीर तरीन निर्दलीयों को साधने में लगे हंै। जिससे राज चले। इमरान कतई नहीं चाहते कि सरकार चलाने के लिए उन्हें क्रांतिकारी इस्लामी संगठनों का साथ लेना पड़े।

देश की आर्थिक हालत खासी नासाज है। देश में करंसी घटती जा रही है और घाटा बढ़ता जा रहा है। विदेशी मुद्रा का सुरक्षित कोष इस समय नौ बिलियन रह गया है ऐसी हालत में आईएमएफ से मदद की गुहार लगानी पड़ेगी। पाकिस्तान का चीन के साथ खासा सहयोग रहा है।

चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर पर फिलहाल काम चल रहा है। इसमे मूलभूत संसाधनों पर चीन ने 62 बिलियन डालर खर्च करने का करार किया है। उधर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंमेई ने कहा है यदि यह अहसास हुआ कि चीन को आईएमएफ कजऱ् से पाकिस्तान अदायगी कर रहा है तो अमेरिका उस कजऱ् को रुकवाने की पूरी कोशिश करेगा। अब पाकिस्तान के नज़रिए को अमेरिका को जताने और चीन को समझाने की जिम्मेदारी असद उमर को शायद मिले। ऐसी संभावना है कि वे ही पाकिस्तान में वित्तमंत्री बनेंगे। उमर साहब सुधारवादी माने जाते हैं साथ ही देश के सबसे बड़े निजी औद्योगिक समूह ‘एग्रो’ के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हंै।

देश में दूसरी सबसे बड़ी चुनौती बिजली क्षेत्र है। पिछली पीएमएलएन सरकार ने चीन की मदद से देश में बिजली का एक लक्ष्य तय किया था। लेकिन राज्य, ऊर्जा सप्लाई करने वाले और बैंको ने ग्रिड से ही बिजली चुरानी शुरू कर दी । इस पर तो शायद हुक्मरान सब्सीडी कम करके, ऊर्जा पर टैक्स बढ़ा कर और राज्य को दुरूस्त करके काफी हद तक काबू पा लेंगे। एक बार बिजली पर मचे गोरखधंधे पर लगाम कस जाए तो समस्या का निदान काफी हद तक संभव होगा।

पाकिस्तान में अभी हाल जब चुनाव हुए तो हिंसा भी खासी हुई। उस हिंसा से जुड़ा धर्म का लबादा निस्संदेह खासा खतरनाक है। इससे इमरान साहब कैसे निपटते हैं यह वाकई बड़ा सवाल है। देश को बचाए रखने और वहां विकास का परचम लहराने के लिए शांति बेहद ज़रूरी है। पाकिस्तान की सीमा पर एक और तो उत्तरपश्चिम में युद्ध से त्रस्त अफगानिस्तान है दूसरी और भारत जहां अर्से से तनाव बरकरार रहा है। इमरान साहब के लिए यह ज़मीनी हकीकत काफी परेशानी पैदा करती रहेगी यदि उन्होंने योजना बनाकर सख्ती से अमल नहीं किया।

पिछले दिनों यह ज़रूर सुनाई दिया कि इमरान साहब अमेरिका के खिलाफ हैं जो ड्रोन के जरिए जिहादियों को मारता है। फिर वे उस सेना के साथी बन कर आज सत्ता की कुर्सी पर आए हैं इसलिए ऐसा जान पड़ता है कि भारत के साथ पाकिस्तान के संबंध सामान्य नहीं हो सकते क्योंकि सेना नहीं चाहती कि दोनों देशों में संबंध सहज हों। पिछली सरकार में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार और सेना के बीच मतभेद की यही पुख्ता वजह थी। सेना कतई नहीं चाहती थी कि भारत के प्रति शरीफ की दोस्ती की बेचैनी बढ़े।

लेकिन देर सवेर इमरान खान की नागरिक सरकार और सेना में असहमतियां बढ़ेंगी। वे चाहते हैं कि अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान की सीमा खुले। जबकि सेना चाहती है कि 2300 किलोमीटर की सीमा पर कंटीले बाड़ लगाए जाए। वे चाहते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर ज़्यादा खर्च हो लेकिन यह तभी संभव है जब सेना के खर्च में कटौती हो। एक दौर था जब इमरान साहब कहा करते थे कि संसद के सत्र निहायत ‘बोर’ होते हैं। वे खुद बहुत कम बार ही सदन में दिखे भी। उनका कहना था कि पृथ्वी पर सबसे बोर जगह यही है। लेकिन अब उन्हें समर्पण, ब्यौरों और समझौते की तैयारी के साथ सदन में मौजूद रहना होगा। उन्हें अब उन राजनीतिकों के संपर्क में रहना होगा जिन्हें कभी वे अमूमन खारिज कर देते थे। उन्होंने देशवासियों से वादा किया था कि 90 दिनों में वे देश से भ्रष्टाचार खत्म कर देंगे। देखना है किस हद तक वे कामयाब हो पाते हैं।

बेसब्र, बेसबब, बेख़बर प्रधानमंत्री के देश में

प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी को, अब किराए पर जा चुके हमारे लालकिले ने, इस स्वतंत्रता दिवस पर, तकनीकी तौर पर अंतिम बार, अपने कंधे पर खड़ा किया। हम सब ने पूरे 82 मिनट तक उनकी गिनाई उपलब्धियों पर सीना फुलाया, उनके दिखाए सपनो की चमक अपनी आंखों में बसाई, अम्बर से भी ऊपर जाने की उनकी कवितामयी ख्वाहिश से अपने को सराबोर किया और उनके साथ पूरा दम लगा कर भारत माता की जय बोली। बावजूद इसके कि मैं देश के उन 69 प्रतिशत मतदाताओं में से एक हूं, जिन्होंने 2014 की गर्मियों में नरेंद्र भाई के पक्ष में मतदान नहीं किया था, वे मेरे भी प्रधानमंत्री हैं। इसलिए मुझे लग रहा था कि कम-से-कम इस बार तो वे अपने भाजपाई-खोल से बाहर आएंगे और हमें बताएंगे कि देश सचमुच कहां-से-कहां पहुंच गया है।

लेकिन प्रधानमंत्री हैं कि सब का प्रधानमंत्री बनने को तैयार ही नहीं हैं। सो, वे अपनी सियासी जन्मघुट्टी के मुताबिक़ संघ-प्रचारक की मुद्रा में ही बोले। उनके बोले हुए में कितना सच था, वे जानते हुए भी नहीं जानते होंगे, लेकिन देश तो जानता ही है। इसलिए उनके बिगुल से सवा चार साल की सरकारी उपलब्धियों की धुन सुन कर मेरे तो पैर नहीं थिरके। नरेंद्र भाई प्रधानमंत्री हैं, इसलिए उन्हें यह कहने से कौन रोक सकता है कि पहले के किसी गैऱ-भाजपाई प्रधानमंत्री ने इस देश के लिए कुछ किया ही नहीं, लेकिन मैं चूंकि एक अदना पत्रकार हूं इसलिए यह नहीं कहता कि हमारे प्रधानमंत्री ने सिंहासन संभालने के बाद कुछ किया ही नहीं है। उन्होंने बहुत कुछ एक साथ करने की कोशिश की है। अपनी इस हड़बड़ी में वे ऐसा गच्चा खा गए हैं कि कुछ ख़ास न हो पाने का मलाल, लगता है कि, उन्हें भी अब भीतर-ही-भीतर कचोटने लगा है। इसीलिए लालकिले की प्राचीर से सफाई देने लगे कि वे क्यों इतने बेसब्र हैं, क्यों इतने बेचैन हैं, क्यों इतने व्याकुल हैं, क्यों इतने व्यग्र हैं, क्यों इतने अधीर हैं और क्यों इतने आतुर हैं?

मुझे उनसे इसलिए सहानुभूति नहीं है कि वे क्यों इतने बेसब्र वगैरह-वगैरह हैं। मुझे तो इसलिए उन पर दया-सी आती है कि वे क्यों इतने बेख़बर हैं कि उन्हें इसका अहसास तक नहीं है कि सवा चार साल में उनके प्यारे देशवाािसयों के एक बहुत बड़ें हिस्से को अपने सब्र का, अपने चैन का, अपने शांत-चित्त होने का, अपनी एकाग्रता का, अपने धीरज का और अपने गांभीर्य का कैसा-कैसा इम्तहान देना पड़ा है? आचरण, व्यवहार और क्रिया-कलापों के सदियों पुराने संस्कारों से बंधे भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री की इतनी आकुलता-व्याकुलता का कोई सबब भी तो हो! नाहक ही ‘बे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंगÓ की दर्द भरी इबारत से हर दीवार रंगी पड़ी है। रहीम ने लिखा है कि बेर की झाड़ी और केले के पेड़ का साथ भला कैसे निभे? बेर का झाड़ तो अपनी मौज में डोल रहा है, मगर उसके बेतरह हिलने-डुलने से बगल में खड़े केले के पेड़ का तो अंग-अंग फटा जा रहा है।

जैसा कि नरेंद्र भाई मानते हैं, हो सकता है कि जिन साठ वर्षों में देश को भाजपा-सरकारों का सौभाग्य नहीं मिला, उस दौरान सचमुच कुछ नहीं हुआ हो। अगर ऐसा होता तो हमारे आज के प्रधानमंत्री को इस तरह आगा-पीछा देखे बिना दिन-रात काम करना काम क्यों करना पड़ता? लालकिले से उन्होंने 2013 और 2018 की रफ़्तार का फ़कऱ् हमें बताया। लेकिन यह नहीं बताया कि ऐसी कौन-सी मालिश-विधि उनके पास है, जिसने भारत के सूखे-पांखरे बदन को रातों-रात गामा-पहलवान बना दिया? नरेंद्र भाई हमारे देश को अम्बर से ऊपर ले चलें तो हम से ज़्यादा ख़ुश कौन होगा? हमें कौन-सा पाताल में पड़े रहने का शौक़ है? मगर बिना ख़ास सोचे-समझे, बिना किसी तैयारी के, महज़ अपनी झौंक पूरी करने के लिए, जिस अंतरिक्ष-गुब्बारे पर उन्होंने भारत को लाद दिया है, उसने मुल्क़ की हड्डी-पसली एक कर दी है।

जिन्हें यह यात्रा सुखद लग रही है, वे अपनी जानें; मैं तो इतना जानता हूं कि हमारे प्रधानमंत्री के प्यारे देशवासियों में से तीन-चौथाई से ज़्यादा तो दर्द से बिलबिला रहे हैं। लेकिन अगर नरेंद्र भाई को जऱा भी इल्म होता तो क्या वे लालकिले से इसका जि़क्र तक न करते? ईमानदारी के उत्सव में कंधे-से-कंधा मिला कर साथ देने वाले अपने देशवासियों के दर्द को ले कर क्या वे इतने उदासीन रहते? यह तो अच्छा है कि वे बेसब्र हैं। लेकिन यह घातक हैं कि वे बेख़बर हैं। इसलिए यह सोच-सोच कर मुझे रात भर नींद नहीं आती है कि एक बेख़बर चौकीदार के साए तले हम कब तक महफूज़़ रह पाएंगे?

प्रधानमंत्री आश्वस्त हैं कि उन्होंने सत्ता के गलियारों से दलाली ख़त्म कर दी। उन्हें गर्व है कि वे भाई-भतीजावाद हिंद महासागर में तिरोहित कर आए हैं। उनका सिर ऊंचा है कि लाखों छद्म-कंपनियों पर ताला लगा कर चाबी उन्होंने अपनी जेब में रख ली है। मगर मैं प्रधानमंत्री से भी ज़्यादा आश्वस्त हूं कि प्रधानमंत्री को ख़ुद की पार्टी की राज्य सरकारों के गलियारों की कोई जानकारी ही नहीं है। उन्हें यह मालूम ही नहीं है कि देसी-परदेसी अफ़सरशाही के बरामदों में किस के भाई-भतीजे क्या कर रहे हैं? वे इस तथ्य से आंखें फेरे हुए हैं कि आज भी मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और सूरत जैसे टापुओं का दुबई, सिंगापुर, हांगकांग और मॉरीशस जैसे द्वीपों से कितना ख़ुशनुमा बिरादराना क़ायम है?

इसलिए लालकिले पर खड़े हो कर बोले गए शब्दों से ज़्यादा बड़ी तो प्रधानमंत्री की वह ख़ामोशी है, जो पता नहीं क्या-क्या जवाब मांग रही है। ऐसा क्यों है कि आजकल नरेंद्र भाई नोट-बंदी की बात करने से लजा रहे हैं? वे हमें यह क्यों नहीं बताते कि रिज़र्व बैंक के हाथों पर ऐसी भी कौन-सी मेहंदी लगी है कि वह पुराने नोट अब तक नहीं गिन पाया है? क्यों वे पड़ौसी देशों से संबंधों के मसले पर बगले झांक रहे हैं? वे भारत के महाशक्ति बनते वक़्त इस बात का जि़क्र करने से क्यों बचते हैं कि दुनिया की बाकी महाशक्तियों से हमारे संबंधों का समीकरण किस दिशा में जा रहा है? नरेंद्र भाई के संकल्पों के लिए अब भी लोग अपनी बची-खुची काया खपाने को तैयार बैठे हैं, मगर पता तो चले कि आखिऱ उन्होंने तय क्या कर रखा है?

मुझे अपने प्रधानमंत्री के कुछ गुण बहुत पसंद है। कहां क्या बोलना है, वे जानते हैं। नफ़े को तौलना वे जानते हैं। अदा से डोलना वे जानते हैं। अपनी मंजि़ल उन्हें हमेशा से मालूम थी और उसे हासिल करने के सफऱ में लोकतांत्रिक यातायात के नियमों का पालन करने में उनकी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है। प्रधानमंत्री बनने के बाद लालकिले से जब वे पहली बार बोले और दस साल के लिए फिऱकापरस्ती-स्थगन का आह्वान किया तो मेरा रोम-रोम खिल उठा था। मगर इन सवा चार साल में वे सारी कोंपले कुम्हला गईं, जिनके भरोसे हम अच्छे दिनों की आस लगाए बैठे थे। उनके ताज़ा संबोधन के बाद तो हरियाली की रही-सही उम्मीद भी झुलस गई। अगर अगले साल भी हम लालकिले की छाती पर नरेंद्र भाई को ही चढ़ा पाएंगे तो भारत प्रजातांत्रिक दरिद्रता के अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका होगा।

लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।

अब नियमित छानबीन होगी आश्रय स्थलों की

परिवार से छूट गए बच्चों, युवाओं और महिलाओं के लिए देश भर में आश्रय स्थलों की नियमित जांच पड़ताल ज़रूरी है। केेंद्र सरकार ने बिहार में मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश में देवरिमा के सारे अनाथालय, मूक बहरे और दृष्टि बाधित लोगों के लिए बने आश्रय स्थलों में यौनशोषण, खान-पान-परिधान में और ठीक-ठाक तरह से न रखे जाने की नियमित जांच के लिहाज से सामाजिक ऑडिट कराने के आदेश जारी कर दिए हैं। पूरे देश में लगभग नौ हज़ार से ऊपर आश्रय स्थल हैं। सांसदों को भी निर्देश हैं कि वे अपने इलाके के ऐसे स्थलों की छानबीन कर रिपोर्ट भेजें जिससे कार्रवाई हो।

केंद्र सरकार में महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने मंगलवार (7 अगस्त) को यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि नेशनल कमीशन फार प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) से कहा गया है कि अगले दो महीने में सभी बाल सुरक्षा संस्थानों की पूरी छानबीन करके रिपोर्ट भेजी जाए। यह रिपोर्ट अक्तूबर तक जमा की जानी है।

जांच के दौरान बच्चों की कुल सुरक्षा, बिस्तर, खाने-पीने परिधान की व्यवस्था पर जानकारी ली जाए और जो वहां काम करते हैं और जो संचालक प्रबंधक सेवादार हैं उनकी क्या पृष्ठभूमि रही है साथ ही बच्चों की क्या स्थिति है। उन्नीस पेज के इस पत्र को केंद्र ने सुप्रीमकोर्ट को अक्तूबर 2015 में दिया भी था जब तमिलनाडु के एक अनाथालय से बच्चों के साथ भावनात्मक, यौनिक और शारीरिक छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आई थीं।

व्यवस्था बनाने वाले ही उन्हें तोडऩे वालों में सबसे आगे होते हैं। वे आत्मिक, शारीरिक, सामाजिक राजनीतिक लाभ पाने के लिए पूरे सिस्टम को तोड़ते हैं और सिस्टम की गड़बडिय़ों की आड़ लेते हैं। मुजफ्फपुर में आश्रय स्थल में जो कुछ बरसों से चलता रहा उसे बिहार सरकार सिस्टम का दोष बता कर नहीं बच सकती। सरकार का काम प्रदेश के सताए हुए लोगों को सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाने का होता है। जिसे सरकारें अमूमन नहीं करतीं।

मुजफ्फरपुर के एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति में रह रहे लोगों के साथ जिस तरह का रख रखाव रहा और शारीरिक शोषण का सिलसिला सालों से बदस्तूर जारी रहा वह किसी भी सांस्कृतिक विरासत वाले सभ्य समाज के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। इसे सिस्टम का दोष बताने वालों को भी संदेह केदायरे में रखा जाना चाहिए।

खबरों के अनुसार इसे और चार अन्य आश्रम स्थलों को चलाने वाला कथित पत्रकार है और उसे केंद्र और राज्य से सालाना एक करोड़ रु पए की राशि मिलती थी। आश्रय स्थल की रहवासियों को जिस तरह के फटे-पुराने कपड़े पहनाए जाते थे और वहां के कर्मियों का उनके प्रति जिस तरह का व्यवहार था वह संदेह ही बढ़ाता है। इस कथित पत्रकार के मुख्यमंत्री के साथ और अन्य विभूतियों के साथ फोटो हैं। स्पष्ट है कि जिले के तत्कालीन कलेक्टर के और विभिन्न विभागों के अधिकारी उसे लाभ लेंगे और लाभान्वित होंगे।

बिहार एक ऐसा उन्नतिशील राज्य माना जाता है जहां चुनावों में महिलाओं की तादाद पुरु षों की तुलना में ज्य़ादा होती है। प्रदेश मुख्यमंत्री ने बड़े परिश्रम से खुद को विकास पुरु ष का तमगा दिलाया लेकिन इस घटना से उस पर अब सवालिया निशान लग गए हैं। जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने थे यानी 2005 से 2010 के दौरान उन्होंने महिला मतदाताओं को आज़ादी का स्वाद चखाया था। पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में पचास फीसद सीटें महिलाओं के लिए नियत की गईं। उन्होंने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना का शुभारंभ किया। तमाम कमियों के बाद भी ये योजनाएं पूरे देश में चर्चा का विषय रहीं। इसी तरह उन्होंने राज्य सरकार की नौकरियों में पैंतीस फीसद रोजगार रिजर्व कराया, बालविवाह और दहेज के खिलाफ उनकी बातें सराही भी गईं।

लेकिन ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री के फैसलों को उन्हीं की नौकरशाही और सिस्टम के लोग नाकाम करने में जुटे रहते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि एक-दूसरे पर चेक-बैलेंस का अभाव। मुजफ्फरपुर में जो घटना हुई है वह अभावग्रस्त लोगों का ज्य़ादा संपन्न लोगों द्वारा शोषण है जिस पर यदि ठीक तरह से सरकारी एजेंसियां नज़र रखतीं तो शायद इतना घृणित काम मानवता के नाम पर न हो पाता।

यह वाकई अच्छा प्रयास है कि केंद्र सरकार ने पूरे देश के तमाम तरह के नौ हज़ार आश्रय स्थलों की जांच-पड़ताल कराने का आखिर फैसला लिया है। इसके लिए सुप्रीमकोर्ट को भी ज़रूरी सूचनाएं दी गई हैं। मई 2017 में सुप्रीमकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सामाजिक ऑडिट हर साल इसलिए कराया जाना चाहिए क्योंकि इससे ट्रास्पेरेंसी और जवाबदेही बनी रहती है साथ ही बाल अधिकार न्याय कानून के तहत नियमावली का पालन भी होता है या नहीं इसका पता चलता है।

देश में ज्य़ादातर आश्रय स्थलों का खर्च या तो केंद्र का महिला और बाल कल्याण विभाग उठाता है या फिर राज्य सरकारें और एनजीओ। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी का कहना है कि सभी आश्रय स्थलों को नियमों के अनुरूप केंद्र सरकार को ही चलाना चाहिए। उन्होंने बताया कि देश में नौ हज़ार से ज्य़ादा भी आश्रय स्थल हो सकते हैं जिसके बारे में अभी जानकारी नहीं मिली है। इन सबको केंद्र के अधीन करना ज्य़ादा ज़रूरी है। हर राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए दस एकड़ की ज़मीन पर कांप्लेकस तैयार करना चाहिए तभी सुरक्षा की व्यापक व्यवस्था संभव है। उन्होंने ने यह भी बताया कि वृंदावन में विधवाओं के लिए जिस तरह व्यवस्था की गई है उसी तरह की व्यवस्था हर राज्य में की जा सकती है। नियोजन फंड का भी इसमें इस्तेमाल हो सकता हैं।

उन्होंने कहा कि इस होम्स की नियमित चैकिंग बेहद ज़रूरी है क्योंकि बच्चों और महिलाओं को खास तरह की सुरक्षा की ज़रूरत पड़ती है। होम्स का साफ-सुथरा होना भी ज़रूरी है। सभी सांसदों को कहा गया है कि वे अपने इलाके के आश्रय स्थलों के बारे में जानकारी दें। जिससे निश्चित समय में कार्रवाई हो सके।

‘गौरव यात्रा’ में छीजता ”गौरव’’

साढ़े चार साल तक जनता से मुंह छिपाए रखिए, मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति से पीछे हटते रह कर शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सेवाओं का निजीकरण करते रहिए, औद्योगिक क्षेत्रों को मंदी की गिरफ्त से निकालने की जहमत मत फरमाइए, योजनाएं ठिठकती है तो बेपरवाह रहिए और मासूम बच्चियों से दरिन्दगी सरीखे कंपाने वाले अपराधों का ग्राफ बढ़ते रहने दीजिए यहां तक कि भ्रष्टाचार के बगूले भी धुंआधार तरीके से उठने दीजिए और जब जनता के मोहभंग की तपिश महसूस करने लगे और लुंज-पुंज सरकार चुनावी सियासत की दहलीज पर पहुंच जाए तो कुशासन पर सुशासन का ठप्पा लगाकर जनता से नजरें मिलाने के लिए भव्य यात्रा निकाल लीजिए। चुनावी चौसर पर खड़े मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारें ऐसा कर चुकी है और अब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इसी लीक पर चलते हुए ‘सुराज गौरव यात्रा’ निकाल रही है। वसुंधरा राजे को ‘सत्ता विरोधी रूझान’ को लेकर कोई ग्लानि नहीं है, क्योंकि वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अमृत वचनों में आकंठ डूबी है कि, ‘सत्ता’ विरोधी रुझान बेपेंदे की बातें हैं और बातों का क्या? ऐसे सौ रुझानों को घोंटकर पी जाना चाहिए? अमित शाह ने राजनीति में एक नया मुहावरा गढ़ कर उस लीक को मिटा दिया कि,’सरकारें जनता से तब डरती है, जब जवाबदेही का मौका आता है?’’ अब जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह वसुंधरा राजे को इस शंका से ही मुक्त कर चुके हैं तो कैसा डर और कैसी हताशा? वसुंधरा को कोई डर अगर है तो यह कि,’जनता कहीं’ इस बात को समझ ना जाए जो उन्हें नहीं समझनी चाहिए, नतीजतन चालीस दिन की यह यात्रा मदारी के स्वांग सरीखी निकाली जा रही है ताकि नौटंकी देखने की उत्सुक गांव-ढाणियों की जनता उन्हें सुनने नहीं देखने को उमड़ती रहे और यह सब स्वफूर्त कहीं नहीं हो रहा बल्कि सरपंचों से लेकर जिला कलेक्टरों तक को यही काम सौंप दिया गया है कि सिर्फ भीड़ जुटाने के एक सूत्री काम में जुट जाएं। इस यात्रा के नाटकीय दृश्य हर कदम पर इसकी पोल खोलते नजर आते है…. वरिष्ठ पत्रकार श्री नंद झा की आंखन देखी को समझें तो, ‘वसुंधरा एक कठोर अनुशासनप्रिय प्रिंसिपल के स्वांग के साथ जब गौरव यात्रा के दौरान जनसमूह को संबोधित करते हुए सवालों की बौछार करती है तो उनके जवाब जिला कलेक्टर विधायक या अधिकारियों को ‘हां या ना’ में देना होता है लेकिन जवाब हां में ही हेाता। मसलन- क्या सिंचाई योजना की डीपी को अंतिम रूप दिया जा चुका है? क्या गांवों में सीमेंट की सड़कें बन चुकी हैं? इसके बाद राज्य सरकार की योजनाओं के चिन्हित लाभार्थियों को मंच पर बुलाया जाता है। आदिवासी क्षेत्र बांसवाड़ा जिले के घाटोल में मुख्यमंत्री ने कन्हैयालाल नामक व्यक्ति से ताबड़तोड़ सवाल पूछे, ‘क्या प्रधानमंत्री आवास योजना से आपको धनराशि मिली? क्या उज्जवला योजना से आपको गैस कनेक्शन मिला? क्या भामाशाह कार्ड मिला? जैसा कि पहले से तय होता है, वसुंधरा राजे को सारे जवाब हां में मिलते हैं।

इस यात्रा की प्रबंधन टीम पूरे मशीनी ढंग से काम कर रही है। पत्रकार श्री नंद झा कहते हैं, उस यात्रा के आलेख और विवरण बड़ी चतुराई से गढ़े गए हैं। लेकिन राजे के भाषणों में रचनात्मकता और मानवीय तत्वों का अभाव यात्रा की पोल खोल देते हैं। भले ही प्रदेश के ग्रामीण इलाके भाजपा के पोस्टर बैनर और झंडियों से अटे हुए हैं लेकिन लोग खेती-किसानी की विपदा, अभावों के दुख, गरीबी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नकारापन की शिकायतों को लेकर गहरी पीड़ा में डूबे हुए हैं। भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि,’ये लोग आखिर कैसे इस तमाशाबाजी को वोट देंगे?’’ यात्रा के दौरान नीरस भाषणों से ऊबे लोग अगर थोड़ा बहुत रीझे भी तो वो आध्यात्मिक मुद्दे थे, जब राजे ने भावजी महाराज,कालीबाई क्या गोविंदगुरू सरीखे स्थानीय शूरवीरों को याद किया। इस व्यक्ति केन्द्रित यात्रा में भाजपा के नए अध्यक्ष मदनलाल सैनी तो कहीं नजर ही नहीं आते? और यात्रा के संयोजक गुलाब चंद कटारिया भी उपेक्षित ही रहे? राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि, ‘इस सुराज गौरव यात्रा में सुराज की छाया तो कहीं भी नजर नहीं आती? क्या महाराणा प्रताप, पन्नाधाय और गोरा बादल सरीखे शूरवीरों के बलिदान को याद करने भर से जनता के दुख-दर्द का समाधान हो जाएगा?

अलबत्ता इस यात्रा को खरोंचने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के चालीस सवालों की लड़ी सुराज का सांचा उधेड़ती नजर आती हैं। उदाहरण के लिए, ‘भाजपा सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन के कारण पिछले चार सालों में प्रदेश 2 लाख 29 हजार करोड़ के कजऱ्े में डूब गया? प्रदेश का राजकोषीय घाटा भी नियंत्रण से बाहर हो गया? नतीजतन सरकार का वित्तीय संतुलन बुरी तरह गड़बड़ा चुका है। ऐसे में प्रदेश में निजी निवेश तो खटाई में पड़ ही गया? मुख्यमंत्री ने उद्योग धंधों को चौपट होने दिया और कोई भी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए? पायलट का इस सवाल का उनके पास क्या जवाब है कि,’महिला अपराधों में देश में चौथे स्थान पर रहने के बाद भी क्या प्रदेश की महिला मंत्री को गौरव महसूस होता है?

चुनाव पूर्व अपनी प्रदेशव्यापी यात्रा के दौरान वसुंधरा राजे ने जहां भी भाषण दिए, कुल मिलाकर एक ही बिन्दु पर केन्द्रित रहे कि, ‘अगर राज्य के मतदाता किस भी सरकार को उसका एक कार्यकाल समाप्त होने के बाद अस्वीकार कर देंगे तो नए राजस्थान के निर्माण का काम थम जाएगा।’ उनके इन भाषणों के पीछे अंदेशा साफ झलक रहा था कि,’चुनावी माहौल में सत्ता विरोधी रुझान का डर उन पर पूरी तरह हावी है।’’ विश्लेषकों का प्रति प्रश्न है कि,’अगर सरकारें अपने पूरे कार्यकाल में जनता की उम्मीदों की कसौटी पर खरी उतरे तो, ऐसी नौबत ही क्यों आए? विश्लेषकों का कहना है कि, ‘वसुंधरा के पास इस बात का क्या जवाब है कि, कार्यकाल के साढ़े चार साल बाद ही उनको जनता की सुध क्यों आई? इतना अर्सा बीत जाने के बाद योजनाओं की प्रगति जानने की याद क्यों आई? अब जिस तरह इस यात्रा में प्रशासनिक मशीनरी का दुरूपयोग हो रहा है-क्या जनता में उसका अच्छा संदेश जाएगा? विश्लेषक तो यहां तक कहते है। कि ‘गौरव यात्रा एक तरह की हाई प्रोफाइल इवेंट मैनेजमेंट है। इस यात्रा के लिए की जा रही भारी भरकम फंडिग क्या लोगों को नज़र नहीं आ रही? भाजपा की इस गौरव यात्रा के दौरान हो रहे सरकारी खर्चों के खिलाफ

राजस्थान हाई कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका ने तो वसुंधरा के लिए एक नई दुविधा खड़ी कर दी है।

अंधेरे वाले इलाकों को पहचाना था नायपॉल ने

हिंदुस्तान के प्रति पूरी दुनिया में उत्सुकता को बढ़ाने वाले लेखक उपन्यासकारों में बड़ा नाम है विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल का। उनके पिता भी एक पत्रकार थे जो त्रिनिदाद में थे। नोबल पुरस्कार से सम्मानित वीएस नायपाल एक महत्वपूर्ण लेखक हैं जिन्होंन 85 साल की उम्र में लंबी सांस ली। उन्हें आमतौर पर विवाद बढ़ाने वाला रचनाकार माना जाता है। लेकिन वे वास्तविक भूमि को ही अपना कथानक बना कर लेखन करते थे। उन्होंने दुनिया को पत्रकार और लेखक के तौर पर देखा। उनकी कृतियों को पढ़ते हुए लग सकता है कि उनका लेखन भागीदारी करते हुए लेखन नहीं है।

संभव है कभी उनके पूर्वज भारत से त्रिनिदाद ले जाए गए हों। नायपॉल ने खुद को त्रिनिदाद में नंगे पांव पहुंचा उपनिवेशवादी कहा है। लंदन में जाना माना लेखक मान लिया गया। उनके उपन्यास ‘ए बेन्ड इन द रीवर’ और ‘ए हाउस फार मिस्टर विश्वास’ खासे चर्चित रहे हैं। उनके लेखल में त्रिनिदाद से लंदन और वहां से विभिन्न गरीब देशों की यात्राओं में मिली जानकारी का अच्छा विवरण मिलता है। उन्हें 2001 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला।

नायपॉल की पुस्तकों में ‘ए बेंड इन द रीवर’ से लेकर ‘द एनिग्स ऑफ एराइवल टू फाइंडिग सेंटर- तक उपनिवेशवाद और उपनिवेशवाद खत्म होने का रोमांचकारी विवरण मिलता है। विकासशील देशों में इंसान का खुद ही निर्वासित होना और हर व्यक्ति का संघर्ष पाठक को जोड़े रखता है। राजनीति, धर्म और दुनिया की संस्कृति पर उनके अपने विचार काफी विचारोत्तेजक थे।

वे भारत को ‘गुलाम समाज’ कहते थे। वे कहते कि भारतीय महिलाएं अपने माथे पर एक रंगीन बिंदु बनाती है जो बताता है उनके पास अपना दिमाग नहीं है। उन्होंने 1989 में ईरान के अयातोल्लाह खोमैनी द्वारा सलमान रूश्दी को दिए गए फतवे को ‘साहित्यिक आलोचना’ का ‘उग्र रूप’ भी कहा था।

एक बातचीत में उन्होंने बताया था कि वे उन दरिद्र भारतीयों की संतान हैं जिन्हें भारत से जहाज द्वारा वेस्टइंडीज में त्रिनिदाद ले जाया गया था। उन्हीं में उनके पिता थे जो पढ़-लिख गए तो पत्रकार हुए। उन्हें 1950 में एक स्कॉलरशिप मिली और अपने परिवार को छोड़ कर इंग्लैंड आ गए। वहां ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सटी से उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य की पढाई की। स्नातक होने के बाद वे बीमारी , गरीबी और बेरोजग़ारी के शिकार हुए। उन्होंने एक पत्र में लिखा है कि यहां लोग उनकी चेतना को तोडऩे पर आमादा नजऱ आते हैं जिससे वे कुछ कर न संके। तभी उन्हें बीबीसी वल्र्ड में मौका मिला। वहां वेस्टइंडियन साहित्य पर वे बातचीत करते और लेखन के प्रति उनमें रूचि बढ़ी। उनकी पहली पुस्तक थी ‘द मिस्टिक मैस्योर’ व्यंग्य से भरपूर इस पुस्तक में उन लोगों की जिंदगी का ब्यौरा है जो त्रिनिदाद में झुग्गियों में रहते हैं। उनके पास कोई ताकत नहीं होती पर वे ताकत के सपने देखते हैं। उन्हें सोमरसेट मॉम पुरस्कार कहानियों के संग्रह ‘मिगुएल स्ट्रीट’ के लिए मिला उनकी चर्चित पुस्तक ‘ए हाउस फारमिस्टर विश्वास’ 1961 में छपी। एक आदमी की जि़ंदगी किस तरह एक औपनिवेशिक समाज में सिमट कर रह जाती है। यह किताब उनके पिता को उनकी श्रद्धा स्वरूप् मानी जाती है। पूरी दुनिया में इसे सराहा जाता है।

उन्होंने बतौर पत्रकार ढेरों यात्राएं की और यात्रा पुस्तकें और लेख लिखे। अपने पूर्वजों के गांव और वहां की संस्कृति पर भी उन्होंने लिखा।

 नायपॉल ने ‘इस्लामी उग्रवाद’ पर काफी पहले लिखा था । उनकी किताबों में है ‘एमंग द बिलीवर्स एंड बिंयांड बिलीफ’। उनके लेखन पर उन्हें नोवबल पुरस्कार परिचय में लिखा है ‘ एक साहित्यिक तो खुद में शायद ही कभी अपने घर में रहा हो।

पांच बार मुख्यमंत्री ही नहीं कवि और पत्रकार भी

द्रविड़ राजनीति का यह दिग्गज खिलाड़ी राज्य सरकारों, राज्यों की स्वायत्तता और संघीय सोच का हिमायती था। उन्होंने ही यह आदेश जारी कराया था कि आज़ादी के दिन मुख्यमंत्री राज्य में झंडा फहरा सकेंगे।

तमिलनाडु में पांच बार मुख्यमंत्री बनने वाले द्रमुक अध्यक्ष राजनीति में पचास साल पूरे करने के बाद मंगलवार को शाम छह बजे चिरनिद्रा में लीन हो गए। मृत्यु के समय वे 94 साल के थे। इन्फेक्शन और वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों से तकरीबन 11 दिन तक वे कावेरी अस्पताल में जूझते रहे। उनकी मौत पर राष्ट्रीय झंडा झुकाया गया। एम करूणानिधि को प्यार से कलाईनर (कला विशेषज्ञ और लेखक) के रूप में याद किया जाता था। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विभिन्न दलों के नेताओं ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी। तमिलनाडु सरकार ने सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की।

हज़ारों की संख्या में लोग अस्पताल पर जुटे थे। बाद में अस्पताल से उनका शव शाम को उनके आवास गोपालपुरम ले जाया गया। जिससे लोग अपने प्रिय दिग्गज नेता को देख सकें। बाद में उनका शव अन्य सिलाई में राजाजी हाल ले जाया गया। जिससे लोग अंतिम दर्शन कर सकें।

द्रविड़ आंदोलन के दिग्गज नेताओं में एक करूणानिधि की पत्नियां हैं दयालु अम्मपल और राजथी अम्माल। इनके पहले पुत्र है एमके मुथु (उनकी पहली पत्नी पद्मावती से जन्मे), एमके अलागिरी, एनके स्टालिन, एमके तमिलारासु और बेटी (मां दयाजु अम्माल) और एम कनिमोजी (मां राजथी अम्माल). द्विड़ आंदोलन के अपने सभी सम सामयिको को पीछे छोडऩे वाले एम करूणानिधि को 28 जुलाई को ब्लड प्रेशर कम हो जाने पर अस्पताल में भरती कराया गया। तब से ही वे अस्पताल में थे। सोमवार से उनकी तबियत खराब होने लगी। उनके महत्वपूर्ण अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। मंगलवार की शाम साढ़े चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

राज्य के वे अकेले मुख्यमंत्री थे जिनकी सरकार दो बार बर्खास्त हुई थी। एक बार आपातकाल में 1976 में और दूसरी बार 1991 में जब उन्होंने धारा 356 हटाई थी। 1957 से वे विधानसभा की तेरह सीटों पर विजयी होते रहे हैं। उन्होंने राज्य के लिए एक तमिल गीत भी चुना था जिसके कवि थे मैनम मानियम सुंदरनार। उनका गीत था ‘तमिल थाई वाज्झतुÓ संगीतज्ञों के परिवार में जन्मे एम करूणानिधि तंजवुर जि़ले के छोटे से गांव थिरूकुवलाई में पैदा हुए थे। उनके पिता मुथुवेलर नागस्वर के कलाकार थे। करूणानिधि से भी यह सीखने को कहा गया पर वे तैयार नहीं हुए। वे हिंदी भाषा लादे जाने के विरोधी थे। उन्होंने 1938 में इसके खिलाफ आंदोलन किया। शुरू के सालों में पूर्वी तंजवौर में उन्होंने कम्युनिस्टों की लोकप्रियता देखी। उनके मन में तमिल भाषा और सामाजिक न्याय के लिए ललक थी। वे जस्टिस पार्टी की विचारधारा की ओर आकृष्ट हुए। उस समय पेदीथार ईवी रामासामी और सी एन अन्नादोरई इसके जाने माने नेता थे और फिर डीएम में। दोनों ही जगह वे बढ़े। अन्नादुराई के जाने के बाद पार्टी को चलाने का जुमा उनमें था। पार्टी में उनका विकास और सरकार में उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उन लोगों का अता-पता नहीं चला जो पार्टी सुप्रीमो अन्नादुराई को हमेशा घेरे रहते थे। धीरे-धीरे पूरी पार्टी उनके साथ हो गई।

खुद एक अच्छे लेखक, भाषण में माहिर और पत्रकार होने के कारण उन्होंने पार्टी का मुख्य पत्र मुरासौली का प्रकाशन शुरू किया। आपातकाल के दौरान उन्होंने सेंसरशिप का मुकाबला किया उन्हें अनुमति नहीं थी कि वे उन लोगों के नाम छापे जो मेन्टिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट (मीसा)  के तहत गिरफ्तार किए गए। उन्होंने उन लोगों के नाम छापे जो द्रमुक के संस्थापक अन्नादुराई को श्रद्धांजलि नहीं दे पाए। यह ऐसा संदेश था जिस पार्टी के लोग अच्छी तरह समझते थे। संवाद लेखन और स्क्रीन प्ले राइटर बतौर उन्होंने 77 फिल्मों में काम किया। उनके लिखे संवादों के चलते तमिल सिनेमा के तीन अभिनेता बतौर हीरो ज़रूर उभरे। उनकी पहली फिल्म थी राजकुमारी जिसके संवाद उनके लिखे थे। इसी फिल्म से हीरो बने थे एमजी रामचंद्रण। पाराशक्ति दूसरी फिल्म थी जिसके संवादों से शिवाजी गणेशन के फिल्म दुनिया में आने की मुनादी हुई। तीसरे अभिनेता थे एसएस राजेंद्रन। उन्हें अभाईउप्पन के लिए जाना जाता है। उसके लिए कभी मौका नहीं मिला। इसके भी संवाद लेखक एम करूणानिधि थे।

तमिल भाषा के हिमायती थे कलाईनर

प्राचीन भारतीय संस्कृति में तमिल भाषा काफी समृद्ध मानी जाती रही है। प्राचीन समाज साहित्य की जानकारी काफी हद तक संगम साहित्य में मिलती है। इसे छह हजार वर्ष पुराना माना जाता है। संगम साहित्य प्राचीन तमिल लिपि में ही है। कुछ सामग्री संस्कृत में भी मिलती है। इसके विद्वान लेखक- अनुवादकों की तादाद भी खासी कम हो चली है। जून 2010 में एम करूणानिधि ने विश्व क्लैसिक भाषाओं में से शास्त्रीय भाषा तमिल का आयोजन किया था। यह आयोजन पूरी तौर पर कामयाब हो इसके लिए वे प्राण-प्रण से जुटे । तमिलनाडु में राजनीति के हथियार के तौर पर भाषा का भी इस्तेमाल होता है। विधानसभा चुनाव 1967 में द्रमुक ने कांग्रेस को परास्त किया। वे फरवरी 1969 में मुख्यमंत्री हुए। उन्होंने तमिल के विकास के लिए काफी काम किया।  वे पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2004 में तंिमल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया। हालांकि तब वे मुख्यमंत्री नहीं थे। लेकिन भाषा के प्रति उनमें समर्पण भाव था। तब 2004 के लोकसभा चुनावों में युनाइटेड प्रोगेसिव एलायंस की सरकार सत्ता में आई। इसने सत्ता में आते ही पहले पुरानी मांग को तुंरत स्वीकार किया। इसलिए यूपीए को टिके रहना भी करूणानिधि के समर्थन के कारण था। चुनाव में द्रमुक नेतृत्व में बने गंठजोड़ ने 40 सीट जीती। तमिलनाडु के अलावा पुडुचेरी में भी इसकी जीत हुई। उस समय राष्ट्रपति थे एपीजे अब्दुल कलाम। वे खुद तमिल भाषी थे। उन्होंने भी तमिल को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया। मार्च 2006 में मैसूर में सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज के परिसर में शास्त्रीय तमिल भी पहुंची। जून 2010 में यह चेन्नई आ गई। जून 2010 में द्रमुक राज में कोयंबटूर में विश्व शास्त्रीय तमिल सम्मेलन आयोजित किया। इसमें भी करूणानिधि ने बहुत रूचि ली। कई मौकों पर उन्होंने थिरूवल्लुवर में नैतिकता पर लिखने वाले कवि थिरूक्कुराल के प्रति अपना प्रेम दिखाया। 1970 के मध्य में चेन्नई कोट्टम में स्मारक बना। कुछ सप्ताह बाद यह जनता के लिए खुला। लेकिन सरकार ही बर्खास्त हो गई। करूणानिधि जनवरी 1976 में सरकार से बाहर हो गए। फिर वे जनवरी 1989 में सत्ता में लौटे । उन्होंने विधानसभा चुनाव 1989 में जीत हासिल की। इसी मेमोरियल में उन्होंने शपथ ली। कन्याकुमारी में थिरूवल्लुवर की मूर्ति स्थापित करने का उनका सपना पूरा हुआ जब 133 फीट लंबी मूर्ति लगी । उन्होंने 1972 में ही अपनी सरकार के मुख्यमंत्री रहते हुए विद्वानों से पता लगा लिया था कि थिरूवल्लुवर पूर्व ईसा जनमें थे। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पुम्पुहार में शिल्प पड्डिकरम आर्ट गैलरी और तमिल भाषा के विकास का एक अलग विभाग खुलवाया। जब 2006 में वे मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने अध्यादेश जारी करके दसवीं कक्षा तक तमिल अनिवार्य भाषा की। उनके बाद जो दूसरी सरकार आई उसने भी कानून में बदलाव नहीं किया। करूणानिधि द्विभाषा कानून के पक्षधर थे लेकिन वे चाहते थे कि अंगे्रज़ी को शैक्षणिक संस्थानों में बतौर एक विषय पढ़ाया जाए।

द्रमुक के दिग्गज नेता की समाधि मैरीना बीच पर बनाने से सरकार का इंकार अदालत की अनुमति

तमिलनाडु सरकार ने ऐन मौके पर दिग्गज द्रमुक नेता एम करूणानिधि की समाधि मैरीना बीच पर बनाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया। इससे परिवार और पार्टी के लोगों ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मद्रास हाईकोर्ट ने देर रात अनुमति दी कि मैरीना बीच पर बनी अन्ना समाधि के पास एम करूणानिधि की भी समाधि बनाई जाए।

करूणानिधि के निधन की घोषणा के पहले ही मंगलवार को द्रमुक नेता स्टालिन मुख्यमंत्री ईके पलानिस्वामी से मिले थे और मांग की थी कि उनके पिता की समाधि मैरीना बीच पर ही अन्ना समाधि के पास बनाने की इजाज़त दी जाए। मुख्यमंत्री ने अनुमति देने से इंकार कर दिया। स्टालिन के साथ उनके बड़े भाई एमके अलगिरी, सांसद बहन कनिमोजी और पार्टी के वरिष्ठ नेता गए थे। मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव खारिज कर दिया और गांधी मंडपम् पर दो एकड़ की भूमि देने का प्रस्ताव किया।

मैरीना बीच एक तरह तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास की परत दर पतर खोलता है। यहां पर दिग्गज द्रविड नेताओं की समाधियां है। द्रविडों के आदि दिग्गज नेता सीएन अन्नादुरई, अभिनेता मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रम और पूर्व अभिनेत्री मुख्यमंत्री जे जयललिता की भी यहीं समाधियां है।

सरकार का कहना था कि मैरीना बीच पर इसलिए एम करूणानिधि की समाधि बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि उनकी मौत मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नहीं हुई है। द्रमुक के एक वरिष्ठ नेता ने बताया करूणानिधि के परिवार के लोग राज्य की मुख्य सचिव गिरिजा वैद्यनाथ से मिले। लेकिन बात बनी नहीं। उनका कहना था कि मैरीना बीच की ज़मीन पर अदालत में ढेरों विवाद हंै।

इस विवाद को बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने बेतुका बताया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को दुख की इस घड़ी में इस बात को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। अभिनेता और अब राजनीतिक कमल हसन ने भी कहा कि करूणानिधि की समाधि मैरीना बीच पर ही होनी चाहिए। कांगेे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि विपदा के समय राज्य सरकार को सहानुभूतिपूर्वक इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए था। करूणानिधि भी तमिल जनता की आवाज़ थे। उन्हें वही स्थान दिया जाना चाहिए था। द्रमुक नेता सावन्ना ने कहा कि भाजपा-आरएसएस ने जानबूझ कर इस घड़ी में यह विवाद पैदा किया है।

नामवर जुग-जुग जीएं पर ज़रूरी है कि पुनर्पाठ भी हो

इस समय नामवर सिंह के लिखे पुनर्पाठ की ज़रूरत है। उन्होंने ‘कविता के नए प्रतिमान’ से ही अपनी माक्र्सवादी विचारधारा में विचलन शुरू कर दिया था। न केवल इतना ही आज वे यह स्वीकार भी करते हैं कि वह पुस्तक उन्होंने तत्कालीन साहित्य अकादमी सचिव भारतभूषण अग्रवाल के कहने पर महज तीन सप्ताह मेें लिखी थी। उद्देश्य था अकादमी पुरस्कार पाना।

इस पुस्तक के प्रकाशित होते ही प्रगतिशील आलोचना के शिखर पुरुष और समीक्षक डा. रामविलास शर्मा ने इस पुस्तक की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि इस पुस्तक में लेखक का अपना कुछ नहीं है। सारा कुछ अमेरीकन ‘न्यू क्रिटिसिज्म’ से आयातित है। दूसरे इस पुस्तक में बड़ी ही चतुराई से नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल को हाशिए पर ढकेल दिया गया। जो लेखक ऐसे तुच्छ समझौते, तुच्छताओं के लिए करता है, वह महान लेखक नहीं हो सकता। महानता सिर्फ लेखन से ही नहीं, लेखक के आचरण से भी परखी जाती है। राम विलास शर्मा ने ऐसा कोई समझौता कभी नहीं किया।

नामवर सिंह सत्ता और संस्थानों से जुड़कर साहित्य की छिछली राजनीति करते रहे हैं। उन्होंने कभी लेखन के लिए कोई बड़ा जोखिम नहीं उठाया। अपनी राजनीति के लिए ही राजकमल प्रकाशन और उसकी साहित्यक पत्रिका ‘आलोचना’ भी हासिल की।

एक साधक लेखक यह सब नहीं करता। जब भी नियुक्तियों में भूमिका निभाने का मौका मिला उन्होंने अपने चाटुकारों को ही लिया। योग्य लोगों को किनारे किया। इसमें कोई संदेह नही कि वे बहुत परिश्रमी और बहुत पढ़ाकू व्यक्ति रहे हैं। यह कतई ज़रूरी नहीं कि एक पढ़ाकू व्यक्ति, नेक इंसान भी होगा। अंग्रेजी में कहावत है, ‘द वाइजेस्ट एंड द मीनेस्ट ऑफ मैनकाइंड’ यानी एक बहुत बड़ा विद्वान, लेकिन आचरण में ‘अधम’। अनेक उदाहरण हैं जिन्हें उनके संदर्भ में आमानवीय ही कहा जाएगा।

हिंदी में आलोचना के शिखर पुरुष आज भी रामविलास शर्मा ही है, चूंकि वे अंग्रेजी में थे इसलिए वे कभी हिंदी के चाटुकार शिष्यों की फौज तैयार नहीं कर पाए। फिर भी उनका अध्ययन और हिंदी में साहित्य लेखन हमेशा प्रमाणिक रहा। नामवर सिंह मुझे एक ‘प्रोफेशनल’ आलोचक ही लगते हैं। वे मौलिक साधक-सर्जक कम हैं। यह तथ्यपरक सवाल पहले भी उठता रहा है। अब ज्य़ादा उठने लगा है।

आखिर क्या कारण रहा कि नामवर सिंह पिछले दो दशकों में कोई मौलिक रचना नहीं दे पाए। हिंदी के व्यापक साहित्य पर नया और मौलिक सोचने-कहने की आज ज्य़ादा ज़रूरत है। इस पर सोचना चाहिये क्योंकि आलोचना में काफी कुछ नया और मौलिक कहने-करने की जगह है। आज वहां एक बड़ा खालीपन है।

डाक्टर नामवर सिंह काफी बड़ी भूमिका निभा सकते थे। मेरा विनम्र अनुरोध है कि हिंदी में मूर्ति पूजा नहीं बल्कि हिंदी के समकालीन साहित्य की वस्तु निष्ठ मूल्यांकन की ज्य़ादा ज़रूरत आज है। मैंने खुद अंग्रेजी भाषा में अध्ययन, अध्यापन और हिंदी में लेखन पूरी जि़ंदगी किया है। मुझे नामवार सिंह से कभी कोई लाभ लेने की नौबत नहीं आई। हिंदी आलोचकों में आज भी शिखर आलोचक और नेक इंसान डा. रामविलास ही लगते हैं। साहित्य सृजन और जीवन में हम उनसे ही ज्य़ादा प्रेरित होते हैं। नामवर सिंह से नहीं जिनका लेखन ठहर गया। रामविलास शर्मा अंतिम क्षण तक नया रचते रहे, नया तार्किक चिंतन करते रहे और नए विमर्श उठाते रहे।