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लोगों से सुना तो है कि बहुत कुछ बदल गया

चित्र श्रेय: अदिति चहार

अब 71 साल हो गए। हम लगातार बोझा ढो रहे हैं। हमारी ज़रूरत तभी तक होती है जब तक निर्माण के लिए रेत-बजरी चाहिए हो। मकान बना और हमारी छुट्टी। उसमें हम रह नहीं सकते। हम तो बाहर खुले में या झोपडिय़ों में जीवन काटते हैं। लोगों से सुनते हैं बहुत कुछ बदल गया है। सत्ता बदल गई है, सत्ता चलाने का तरीका बदल गया है, आईना बदल गया है, आम आदमी को जीने के लिए मौलिक अधिकार मिल गए हैं। आज चाहे जो खाओ-पिओ, पहनों, कोई धर्म अपनाओं, कोई भाषा बोलो, देश के किसी भी हिस्से में रहो और अपनी बात को जिस तरह चाहो जनता तक पहुंचाओ। अब तो खाद्य सुरक्षा का नया कानून भी आ गया है। भूख से लडऩे के लिए। यह सुना है कि देश में ज़रूरत से ज़्यादा अन्न पैदा हो रहा है। चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली है हमने ऐसा सुना है।

दो जून की रोटी के लिए जब मुझे अपनी ताकत से ज़्यादा भार ढोना पड़ता है, पूरी मज़दूरी नहीं मिलती रात को आधा पेट खा कर सोता हूं तो सोचता हूं कि क्या बदला है? 71 साल पहले भी ऐसा ही था। 20-20 घंटे काम लिया जाता था और साहूकारों के कजऱ् पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते थे। दो मु_ी अनाज के लिए तरले करते थे। तब भी वही करना पड़ता था जो राजे रजवाडे या बड़े जगीरदार कहते थे। अब भी हालत वही है। हम तो क्या खाएं, क्या न खाएं यह ऊपर से तय होने लगा है, कौन सा धर्म अपनाएं और किस से नफरत करें और किससे प्यार यह बात भी ऊपर से आ रही है। मैं बोझा किस प्रांत में उठाऊं यह भी दूसरे तय करने लगे हैं। किसी एक आदमी की हत्या पर पूरा देश जलता है और हज़ारों लोगों की हत्या होती है। यह मैंने देखा है। सुरक्षा का अधिकार भी कुछ ही लोगों को मिलता है। यह मैंने देखा है। आस्था के मंदिर ढहते देखे हैं। महिलाओं की इज्ज़त लुटते देखी है। क्या-क्या नहीं देखा इन आंखों ने। झूठे वादों से ले कर जुमलों तक मैंने सुने हैं। मैंने झूठ को फैलाए जाने के नए-नए तरीकें इज़ाद होते देखे हैं। देश का विकास हो रहा है। बड़ी-बड़ी इमारतें और मॉल खड़े हो रहे हैं। मैंने भी इन महलों के बनने में हाथ बटाया है। मैंने कारखानों में उत्पादन बढ़ाने में भरपूर सहयोग दिया है। पर हमेशा न्यूनतम वेतन के लिए लडऩा पड़ा है। लोगों का मुनाफा 1600 गुणा तक बढ़ गया एक साल में और हमारी मज़दूरी को मुद्रास्फीती से जोड़ा जाता है।

देश में विकास की बयार बह निकली है। अदालतों में मामलों की लंबी फहरिस्त को देखते हुए लोग सड़कों पर फैसले करने लगे हैं और खुद ही सज़ा सुना कर उसे लागू भी कर देते है। ऐसे मामलों में आमतौर पर सज़ा होती है मौत की। इसने पुलिस और अदालतों का काम आसान कर दिया है। लोग सड़कों को जब मर्जी जाम कर दें। जब मर्जी धार्मिक जलूस ले चलें और यदि सड़क पर कोई गाड़ी उनसे छू भी जाए तो सैकड़ों वहानों को आग के हवाले कर दें। यही है सही न्याय। वर्दीधारी पुलिस का काम होता है मूक दर्शक बने रहने का। उन पर बापू के तीन बंदरों की बात लागू होती है- बुरा मत देखो, जो कर रहा उसे करने दो, बुरा मत सुनो, लुटते-पिटते लोग कोई शिकायत करें तो उस पर कान मत धरो, बुरा मत कहो- हुड़दंगियों को कुछ मत कहो।

मैं तो पीठ पर रेत सीमेंट लाद ऐसी इमारत में गया था जो कभी राष्ट्र की संपत्ति थी, अब तो उसका मालिक कोई धन्ना सेठ हो गया है। ऐसा मुझे बताया गया है। सुना है वह इस संपत्ति का किराया देता है जैसे ही मैंने आठवां चक्कर लगाया, तब तक अंधेरा घिर आया था और वहां चल रहा निर्माण कार्य उस दिन के लिए थम गया। फिर मैं देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया और वहां मौजूद सुरक्षा सैनिकों ने मुझे डंडे मार-मार कर भगा दिया। मैं दूर एक पेड़ के नीचे सुस्ताने को लेटा तो नींद आ गई। आंख खुली तो सवेर थी। उस इमारत पर हज़ारों लोग इक_ा थे। मुझे अभी कल के काम की मज़दूरी लेनी थी। तभी लोगों की तालियों के बीच उस इमारत से आवाज़ आई- ”भाईयो और बहिनो…’’। आगे सुनने की मेरी ताकत नहीं थी। पिछले 71 सालों से हम सब यही तो सुनते आए हैं। बात वादों से जुमलों तक पहुंच गई पर मेरा मसला रोटी का आज भी बरकरार है।

सिंधू का सपना फिर टूटा

पीवी सिंधू ने विश्व बैडमिटन चैंपियनशिप में रजत पदक जीत लिया है। फाइनल में वह स्पेन की कैरोलिना मारिन से 19-21,10-21 से 46 मिनट में हार गई। दोनों खिलाडियों के बीच यह 12वीं भिडंत थी जिसमें से पांच बार सिंधू और सात बार मारिन जीती है। इस साल खेली गई प्रतियोगिताओं के फाइनल में सिंधू की यह चौथी हार है।

 2016 के रियो ओलंपिक के साथ बड़े मुकाबलों के फाइनल में सिंधू की यह आठवीं हार है। रियो के बाद वह लगातार दो बार 2017-2018 में हांगकांग ओपन सुपर सीरिज़ हारी। फिर इस साल इंडियन ओपन और थाईलैंड ओपन के फाइनल में भी सिंधू को हार का मुंह देखना पड़ा।

यह बात सही है कि सिंधू को छोड़ कर कोई भारतीय विश्व चैंपियनशिप में पदक नहीं जीत पाया। सिंधू ने विश्व चैंपियनशिप में दो रजत और दो कांस्य पदक जीते हैं। सिंधू ने ये दो कांस्य पदक 2013 में गुंझाओ और 2014 में कोपनहेगन में जीते थे। दूसरी और मारिन का विश्व चैंपियनशिप का यह तीसरा खिताब रहा। उनके अलावा कोई भी और महिला खिलाडी तीन बार यह खिताब नहीं जीत पाई। इससे पूर्व वह 2014 और 2015 में भी यह खिताब जीत चुकी है।

पहली गेम में मारिन ने शुरू में 3-1 की बढ़त हासिल कर ली लेकिन सिंधू ‘डीप टास’ और ‘नेट ड्राप्स’ के सहारे 2-3 से आगे निकल गई। फिर वह 6-4 से बढ़त पर थी। इस बीच मारिन ने ‘डाऊन द लाइन’ शाट मारने के चक्कर में कई गलतियां की और सिंधू 11-8 से आगे हो गई। इस प्रयास में स्पेन की खिलाड़ी ने लगातार तीन बार शटल को लाइनों से बाहर मारा था। इस बीच सिंधू की बढ़त 14-9 और फिर 15-11 रही। पर इसके बाद मारिना ने जो गति पकड़ी उसे स्ंाभालना भारतीय खिलाड़ी के बस का नहीं था। एक बार 15-15 की बराबरी हासिल करने के बाद इस स्पेनी खिलाड़ी को रोकना कठिन था। फिर भी एक बार सिंधू 18-17 से आगे हो गई। पर उसके एक कमज़ोर रिटर्न पर अंक लेकर मारिन ने 18-18 की बराबरी हासिल की। इसके बाद मारिन की एक शानदार स्मैश और सिंधू का एक रिटर्न बाहर जाने से वह गेम अंक पर पहुंच गई (20-18) और अंत में 21-19 से पहला गेम अपने नाम कर लिया।

दूसरी गेम में तो सिंधू जैसे दिखाई ही नहीं दी। मारिन ने तेज़ गति से खेलते हुए शुरू में ही गेम और मैच सिंधू से छीन लिया और आसानी से 5-0 की बढ़त ले ली। एक समय वह 11-2 से आगे हो गई। इस समय सिंधू न तो मारिन की गति का मुकाबला कर पा रही थी और न ही गेम को धीमा कर पर रही थी। दूसरी गलती सिंधू ने उसे नेट पर छोटी सर्विस करके की। पहली गेम में सिंधू की ‘डीप’ ‘सर्व’ और ‘टासेस’ में मारिन फंसती थी, पर दूसरी गेम मे सिंधू को जैसे कुछ नहीं सूझ रहा था। कभी वह ‘बेस’ लाइन से बाहर मार देती तो कभी साधारण से स्ट्रोक भी ‘नेट’ में जा रहे थे। जब सिंधू ने कोई आक्रामक स्ट्रोक लगाया तो उसे उसका लाभ ज़रूर मिला। उसने मारिन के शरीर पर दो शानदार ‘पुश’ किए और दो अंक बटोरे। पर वह ज़्यादा कुछ नहीं कर पाई और मारिना ने खिताब अपने नाम कर लिया।

मैच के बाद सिंधू ने कहा,’ कुल मिला कर मरिना बेहतर खेली। यदि मैं पहला गेम जीत लेती तो स्थिति अलग होती। दूसरी गेम में मैंने बहुत गलतियां की। मेरे स्मैश बाहर जा रहे थे। मैं बस यही कह सकती हूं कि यह मेरा दिन नहीं था। मैं पहली गेम में 14-9 से आगे थी। मैंने आसान अंक दिए। जब मैंने गति पकडऩे की कोशिश की तो मुझ से कई गलतियंा हुई। 19-19 के स्कोर पर मुझे ज़्यादा संयम रखना चाहिए था।

 सिंधू ने कहा,’ दुबारा हारना बहुत दुखदायी है। पिछली बार भी फाइनल में ऐसा ही हुआ था। यह निराशाजनक है। मुझे फिर से मजबूत हो कर वापसी करनी होगी और आने वाले मुकाबलों के लिए अच्छी तरह तैयारी करनी होगी। कोई दिन आपका नहीं होता। उतार-चढाव तो हमेशा वहां है पर आप को खुद मज़बूत होना पड़ता है। यह दुखदायी है। इस बार मुझे अच्छे परिणाम की उम्म्मीद थी’।

इससे पूर्व सिंधू ने सेमीफाइनल में विश्व के पूर्व नंबर खिलाड़ी यामागुची को जोरदार मुकाबले में 21-16, 24-22 से परास्त किया था। इस मैच की दूसरी गेम में सिंधू एक बार 12-19 से पीछे थी। यहां उसका आत्म विश्वास काम आया और उसने लगातार आठ अंक लेकर 20-19 की बढ़त हासिल कर ली। इसके बाद यामागुची ने एक अंक लिया और 20-20 की बराबरी पा ली। उस समय सिंधू के चेहरे पर एक विश्वास था। लगता था जैसे वह जीत के लिए मज़बूत इरादे से उतरी हो। उसका यही विश्वास उसे जीत दिला गया। क्वार्टर फाइनल में भी सिंधू ने जापान की ही ओकुहारा को हराया था।

दूसरी ओर करोलिना मारिन ने क्वार्टर फाइनल में भारत की सायना नेहवाल को एक तरफा मुकाबले में 21-6, 21-11 से हराया था। उसने यह मुकाबला मात्र 31 मिनट में जीता था।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी नहीं रहे

भारतीय संसद को जनता के करीब लाने का काम सोमनाथ चटर्जी का है। उन्होंने संसद परिसर में पुस्तकालय और संसद की गतिविधियों को घर-घर पहुंचवाने का इंतजाम किया। खुद माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ज़मीनी नेता होने और दस बार सांसद रहे होने के कारण उनकी राजनीति बहुत साफ थी। जबकि पार्टी के पोलित ब्यूरो में बैठ किताबी नेताओं ने जहां यूपीए गठबंधन को छोडऩे का फैसला लिया वहीं उनसे लोकसभा का अध्यक्ष पद भी छोडऩे को कहा जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। बाद में 2008 में वे पार्टी से मुक्त किए गए।

सोमनाथ चटर्जी अब नहीं है। संसद में रहते हुए उन्होंने अपने हर फैसले में जनहित का ध्यान ज़रूर रखा। सभी पार्टियों के वे सांसद जो उनकी अध्यक्षता के दौरान लोकसभा में थे वे उनके जाने से काफी अंदर तक बेचैन दिखे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी आदि को कुछ घंटे यह तय करने में लगे कि उन्हें पार्टी किस रूप में सम्मान दे। पार्टी के वरिष्ठ सदस्य मोहम्मद सलीम और बिमाम बसु उनके घर भी पहुंचे। लेकिन उनके बेटे ने उन्हें श्रद्धांजलि देने की बजाए लौटने को कहा। पार्टी के लोग चले जाएं क्योंकि उनका संबंध पार्टी से नहीं रहा। पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ज़रूर रूके लेकिन सोमनाथ चटर्जी के पुत्र प्रकाश ने कहा कि पार्टी के दूसरे नेता ज़रूर चले जाएं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंतिम विदाई के आदेश दिए। अगस्त की 13 तारीख को सुबह साढ़े आठ बजे उन्होंने कोलकाता के बेलव्यू अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे 89 साल के थे। उनके शरीर के विभिन्न अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। ममता बनर्जी उन्हें अस्पताल में देखने पहुंची थी। उन्होंने उनके जाने को अपूर्णनीय क्षति बताया और उन्हें बंगाल का महान राजनेता बताया।

पार्थिव शरीर को राज्य विधानसभा ले जाया गया जहां राजकीय सम्मान के साथ सैनिक टुकड़ी ने उन्हें विदा दी। फिर उसे घर लाया गया। जहां से शाम को शव एसएसकेएम कॉलेज -अस्पताल के सुपुर्द किया गया। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में पढाई शोध के लिहाज से अपनी देह दान कर दी थी।

सोमनाथ चटर्जी की बेटी अनुशीला बसु ने बताया कि माकपा नेता उनकी देह पार्टी मुख्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट ले जाना चाहते थे। वे चाहते थे कि पार्टी के झंडे को उनकी देह पर रखा जाए। हमने इससे इंकार कर दिया। क्योंकि पार्टी से तो उनकी मुक्ति हो चुकी थी, काफी पहले। वे आज़ाद पंछी थे।

माकपा की सेंट्रल कमेटी के सदस्य सुजन चक्रवर्ती सारे समय चटर्जी की मृत देह के साथ रहे। उनका सोमनाथ चटर्जी के परिवार से भी अच्छा संबंध रहा। पार्टी महासचिव येचुरी ने कहा कि हमने सोमनाथ दादा को पार्टी की ओर से श्रद्धांजलि दी है। उनका निधन लोकतंत्र के लिए बड़ा आधात है। आज हमें उनसे मार्ग दर्शन की अपेक्षा थी। मेरे उनके और उनकी पत्नी से बेहद अच्छे संबध थे।

 जब दादा सोमनाथ चटर्जी का पार्थिव शरीर उनके घर से निकला तो माकपा कार्यकर्ता भी बड़ी तादाद में इक_े हो गए। शव वाहन के साथ दो पंक्तियों में वे चलते रहे और गाते रहे

कम्युंिनस्ट इंटरनेशनल गीत ‘हम होगें कामयाब, एक दिन’।

उत्तराखंड के सामने चुनौतियां

उत्तराखंड राज्य को बने 18 साल हो चुके हैं, लेकिन जिस मकसद से इसके निर्माण के लिए उत्तराखंड की जनता ने आहुतियां दीं क्या वे फलीभूत हुईं? इस पर बहुत सारे प्रश्न चिन्ह हैं। इस प्रदेश में सरकारें आईं और अपना कार्यकाल पूरा कर चली गईं। सब हाथ झाड़ते हुए चले गये, पर समस्या जस की तस है। क्या कोई यह सोच सकता था कि पलायन इतना भंयकर होगा कि गांव के गांव उजड़ जायेंगे। फसल के नाम पर बंजर खेत और वह भी झाड़ झंकार से भरे हुए। साथ ही पूरे उत्तराखंड के गांवों में जंगली सुअरों का आतंक। गावों में कहीं कुछ बचे खुचे परिवार भी होंगे, वे अपने खेतों से एक महीने का राशन तक नहीं उपजा सकते, हां तराई को छोड़ कर।

ऐसी परिस्थितियों में हमने वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह के विचार कई मंचों और राष्ट्रीय अखबारों में देखे और सुने। एक दृष्टि में यह लगा कि यह प्रायोजित कार्यक्रम है। फिर भी जैसा भी हो, उनके विचारों को आपके साथ बांटना चाहूंगा। जैसा कि उनका मानना है कि सत्ता में आये उन्हें अभी एक वर्ष ही हुआ है, पर दृष्टि उनकी प्रदेश के विकास को गति देने की है। इसी संदर्भ में पहले उनके विचारों को सिलसिलेवार प्रस्तुत कर रहा हूं-

चारधाम यात्रा के लिए सड़क निर्माण में 3,500 पेड़ काटने पड़ेंगे, लेकिन एनजीटी ने परियोजना को मंजूरी नहीं दी है, मंजूरी तब ही मिलेगी जब कटने वाले पेड़ों से दस गुणा पेड़ों का रोपण हो, इस संदर्भ में मुख्यमंत्री कहते हैं कि देहरादून में उन्होंने ढाई लाख पौधे एक दिन में रोपे, इसी तरह कोसी नदी के किनारे एक घंटे में एक लाख 57 हजार 755 पौधों का रोपण किया।

सभी जिलाधीशों को सुझाव दिया कि वे अपने अपने जि़ले की एक एक नदी को गोद लें और उसके इको सिस्टम को संरक्षित करने का प्रयास करें तो इसके अच्छे परिणाम 50-60 वर्षों के बाद ही दिखेंगे। उत्तराखंड में विकास पर्यावरण मित्र के रूप में किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री कहते हैं कि पलायन मैदानों में नहीं हो रहा है, यह सिर्फ पहाड़ों से हो रहा है। 57 फीसदी लोगों ने गांव छोड़ दिये और देहरादून, हरिद्वार और तराई के क्षेत्र उधम सिंह नगर में बस गये। यह लोग रोज़गार और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए चले गये क्योंकि खेती का धंधा फायदे वाला नहीं है। पहाड़ों में बहुत कम लोगों के पास भूमि है, इस कारण उत्पादन सीमित है।

मुख्यमंत्री बताते हैं कि हमने ग्राम लाइट प्रोजेक्ट शुरू किया- इस कार्यक्रम में हमने 10 महिलाओं को एलईडी लैंप बनाने के लिए प्रशिक्षित किया, जिसमें ट्यूब लाइट और उसी तरह के 45 वस्तुएं हैं।

इससे रोजगार पैदा करने का बल मिला। इन उत्पादों की कीमत उन उत्पादों से आधा है जो बाजरों में हैं। और वारंटी का समय भी दूना किया। हमने बहुत सारा काम उद्योग केंद्रों में किया, महिलाओं को सिलाई सिखाई और उन्हें बाजार में कैसे बेचते हैं, उसके लिए प्रशिक्षित किया।

प्रदेश में 55 फीसदी डाक्टर हैं पर मैं उम्मीद करता हूं कि दो वर्ष में सभी रिक्त पद भर लिए जाएंगे। हम ऐसी तकनीकी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें सुदूर क्षेत्रों के लोगों को कोई समस्या न हो, हमने किसानों को सलाह दी कि गांवों में मटर की खेती करें, पहले वे आलू का उत्पादन करते थे, लेकिन उसकी पैदावार अच्छी नहीं हो रही थी। जिसके कारण उसे बाजार तक भी नहीं ले जा पा रहे थे। अब वे 50 रुपये किलो मटर बेच रहे हैं। पहले ही वर्ष 50 लाख रुपये के मटर बेचे गए। इस वर्ष हम दो करोड़ रुपये के मटर बेचने की उम्मीद कर रहे हैं। पहले फोन और इंटरनेट कनक्टिविटी कस्बों और गांव में नहीं थी, लेकिन अब हमने दिल्ली के अपोलो अस्पताल से उन्हें जोड़ दिया है। सेटेलाइट फोन हर जिले में तीन-चार स्थानों पर हैं। गांव के लोग डाक्टरों से सलाह ले सकते हैं।

हमने देवभोग कार्यक्रम भी शुरू किया हुआ है। इसमें हमने स्थानीय लोगों और महिलाओं को शिक्षित किया कि प्रसाद कैसे बनाते हैं। इस कार्यक्रम के लिए 25 लोगों का चुनाव किया और प्रत्येक व्यक्ति को 25 लाख रुपये की राशि दी जिससे वे देव भोग को बना सकें। केदार नाथ में भोग की बिक्री डेढ़ करोड़ रुपये की हुई। राज्य में 625 मंदिर हैं। जिनमें बद्रीनाथ, यमनोत्री, गंगोत्री, जगन्नाथ, राजेश्वर धाम, बागेश्वर धाम के साथ हमने देव भोग बांटना शुरू किया। हम आने वाले पांच-छह वर्षों में देव भोग के वितरण से 200 करोड़ रुपये प्राप्त कर सकेंगे। इस धन को ग्रामीण और महिलाएं उपयोग में ला सकती हैं।

जीएसटी की वजह से दवा कंपनियों के निर्माता चिंतित हुए, हमने उनके साथ मीटिंग की तो पता चला कि देश में दवा उत्पादन के क्षेत्र में प्रदेश का हिस्सा 20 फीसदी का है। कंपनियों ने अपनी परेशानी हमारे साथ बांटी, तब हमने हल निकालने की कोशिश की। मुख्य सचिव और अन्य सचिव भी मीटिंग में मेरे साथ थे, वहीं पर निर्णय लिया गया कि आपको उत्तराखंड में रहने के और भी फायदे है, जैसे राज्य में सारे देश से सबसे सस्ती बिजली दी जा रही है, कानून

व्यवस्था में कोई परेशानी नहीं है। कंपनियों ने कहा कि बिजली के वितरण में परेशानी है क्योंकि बहुत सारे ट्रांसफार्मरों की कमी है। हमने तुरंत संबंधित एजेंसियों को आदेश दिया कि शीघ्र समस्या का समाधान करें।

मैं स्वीकार करता हूं कि जीएसटी से कंपनियों को नुकसान हुआ है। मैं नहीं समझता कि दवा कंपनियां किसी और जगह शिफ्ट होंगी।

हम पांच हजार घरों को बना रहे हैं। करीब एक लाख लोगों को कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया गया हैं। ं

हम पर्यटन के विकास पर अपने को केंद्रित कर रहे हैं। इस वर्ष 46 दिनों में उतने पर्यटक आये जितने छह महीने में आते हैं।

पर्यटन के क्षेत्र में अधिक रोजगार पैदा किये जा सकते हैं। नैनीताल 1881 में बसा और पूरी तरह से भर गया है, आगे विकास की गुंजाइश समाप्त है। वहां निर्माण के लिए नया कुछ भी नहीं है। मसूरी भी लगभग 200 वर्ष पहले बसी वह भी संतृप्त है। इस लिए अब हम 13 नये स्थानों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हम आने वाले वर्षों में राजस्व बढाने की कोशिश कर रहे हैं। 2020 तक प्रदेश के संसाधनों में दूनी वृद्धि करना चाहते हैं।

हमने गैरसैण में विकास कार्य शुरू कर दिया है। वह बहुत छोटी जगह है। वहां हम झील बना रहे हैं, क्योंकि उस क्षेत्र में पानी की कमी है। वहां अभी 1200 के करीब लोग निवास करते हैं। मैं पूरी तरह से उनकी परेशानी से परिचित हूं। देहरादून उत्तराखंड का सबसे बड़़ा शहर है, यहां राजधानी बनने का दबाव महसूस किया जा रहा है। इसलिए हम चाहते हैं कि गैरसैण को राजधानी बनाया जाए। हम उचित समय पर इसका निर्णय लेंगे। आवश्यक आवश्यकतायें बिजली, सड़क और पानी उपलब्ध होना ज़रूरी है। देहरादून कब तक राजधानी रहेगी इसका उत्तर अभी नहीं है।

हमारे पास गैरसैण है, हमारे पास टिहरी झील के आसपास विकास करने लायक क्षेत्र है। प्रत्येक जिले में हमारे पास चयनित स्थान हैं, जिन्हें हम विकसित करना चाहते हैं। हम निवेशकों को आमंत्रित कर रहे हैं। हम चार और पांच अक्टूबर को निवेशकों का सम्मेलन कर रहे हैं, इसमें प्रधानमंत्री होंगे। थाईलैंड भी उत्तराखंड में निवेश करना चाहता है। हमने कुछ लोगों को लाइसेंस दिये हैं। ऋषिकेश में हमारे पास 900 एकड़ जमीन है, वहां हमारी अंतर्राष्टीय सम्मेलन केंद्र बनाने की योजना है।

पर्यटन उत्तराखंड का भविष्य है। हमारे पास संपूर्ण भारत के अलावा दुनिया से लोग आते हैं। राज्य धार्मिक पर्यटन के लिए लोकप्रिय है। लेकिन अब बहुत सारे लोग राफ्टिंग, पैरा ग्लाइडिंग और पर्वतारोहण के लिए आते हैं। बहुत सारे पर्यटकों की संख्या बढी है। कुछ लोग योग के लिए आते हैं, लोग सफारी के लिए जिम कौर्वेट पार्क आते हैं जो कि देश में बाघों की सबसे अधिक आबादी के लिए ख्यात है।

भारत में 16 मौसम के क्षेत्र यानी क्लाइमेट जोन हैं उनमें से अकेले उत्तराखंड में 15 जोन हैं।

ग्ंागा और यमुना नदियों के तटबंध मिट्टी और रेत से बने हैं जो उत्तराखंड के पर्वतों से बहकर आया है। आज गंगा देश के 45 फीसदी लोगों को खाद्यान्न देती है। रेत का आना और जाना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। पर्वतों की मिट्टी नदियों के माध्यम से बह रही है। बांधों का निर्माण पूर्ण सर्वेक्षण के बाद हुआ है। बहुत सारे कारकों का विश्लेषण करने के बाद प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जाती है। कुछ दिन पहले दिल्ली के एक युवा ने एक वीडियो तैयार की, जिसमें उसने दर्शाया कि सीवरेज का पानी किन किन स्थानों पर गंगा को प्रदूषित कर रहा है। हमने उस पर कार्य किया, और उसे स्वच्छ बनाने के लिए आगे आये। इसे हमने पांच दिन के भीतर साफ किया। सारी सीवरेज की लाइने 2020 तक साफ हो जाएंगी।

पंचेश्वर बांध भारत का सबसे बड़ा बांध है। नेपाल का उसमें हिस्सा है। लगभग नेपाल के कैचमेंट के 30 गांव उससे प्रभावित हो रहे हैं। यह हमारे देश का भविष्य है। टिहरी बांध एक उदाहरण है, जिसने भारी जनसंख्या को विस्थापित किया। बांध हमारी मदद पीने के पानी से लेकर सिंचाई में कर रहा है।

मुख्यमंत्री जिस उत्साह से इन कार्यों पर चर्चा कर गये, वे समस्यायें तो हैं ही, पर उससे बड़ी समस्या उत्तराखंड की भूमि को किस तरह से चकबंदी में समेटा जाए, है। एक ड्राईव पिछले मुख्यमंत्री ने चलाया था, उस पर अमल नहीं हुआ। दूसरा सबसे बड़ा काम है कि पहाड़ों की भूमि को सिंचिंत कैसे करें, क्या सरकार के पास योजनाकारों की कमी है जो वाटर लिफ्ंिटग विधि का प्रयोग नहीं दे पा रहे हैं। इजारायल जब अपनी भूमि को उपजाऊ बनाने में सक्षम है, तब हमारे यहां उस बहते हुए पानी को पहाड़ों की चोटी तक पहुंचाने में सक्षम क्यों नहीं है? पहाड़ों की जवानी और पहाड़ों के पानी को रोके बिना संपन्नता का रास्ता नहीं खुलता। और सबसे बड़ा मुद्दा चक बंदी या कलक्टिब फार्मिंग का रास्ता निकालने का कोई उपाय हो। मुख्यमंत्री पर्यटन की बात कर रहे हैं, वह पर्यटन व्यावसायिक रूप तभी लेगा जब वहां स्थानीय आदमी दिखें। नहीं तो ये बातें ऐसी ही होंगी जैसे अन्य धुरंदर मुख्यमंत्री अपने अपने कार्यकाल निपटाकर चले गये।

बहुत सारे ठोस मुद्दे हैं जिन्हें मुख्यमंत्री ने नहीं उठाये। प्रदेश में पर्यटन आज से नहीं सदियों से विकसित है, इसमें किसी ने प्रचार नहीं किया, उन संतों को इसका श्रेय जाता है जो सुदूर दुर्गम मार्गों को पैदल पार करते हुए उत्तराखंड पहुंचे और इसे एक धार्मिक दृष्टिकोण से देखते हुए कुछ मान दंड स्थापित कर आस्था जगाई। वही आज पर्यटन का मुख्य केंद्रबिंदु है।

धार्मिक पर्यटक तो आयेंगे ही, पर आपने क्या ऐसा किया जो प्रदेश समृद्धि की तरफ बढे?

अलविदा वाडेकर

भारतीय टेस्ट क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान व बांए हाथ के महान बल्लेबाज अजित लक्ष्मण वाडेकर नहीं रहे। एक अप्रैल 1941 को मुंबई में जन्में वाडेकर ने आज़ादी के दिन 15 अगस्त 2018 को अंतिम सांस ली। उनका देहांत मुंबई के जसलोक अस्पताल में हुआ। वे 77 वर्ष के थे। वे काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

भारत ने 1971 में अजित वाडेकर के नेतृत्व में ही इंग्लैंड और वेस्टइंडीज़ के खिलाफ टेस्ट श्रंखलाएं जीत कर इतिहास रचा था। ‘स्लिप’ के अद्वतीय क्षेत्ररक्षक वाडेकर ने अपने जीवन काल में कुल 37 टेस्ट मैच खेले, 46 कैच पकड़े और 31.7 की औसत से 2,113 रन बनाए। इनमें उनका एक शतक भी शमिल है। एक दिवसीय मैचों में भी वे भारत के पहले कप्तान थे। उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ दो एक दिवसीय मैच खेले और दोनों ही हारे। इसके बाद 1974 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास ले लिया।

इसके बाद 90 के दशक में उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम का मैनेजर नियुक्त किया गया। उस समय मोहम्मद अजहरूद्दीन टीम के कप्तान थे। उस दौरान भारत 1996 के विश्व कप के सेमीफाइनल में पहुंचा था। इसके बाद वे क्रिकेट चयन समिति के अध्यक्ष भी रहे। लाला अमरनाथ और चंदू बोडऱ्े के अलावा वाडेकर ही एक ऐसे क्रिकेटर हैं जो टीम के कप्तान, मैनेजर और चयनकर्ता रहे।

जब 1971 में उन्हें मंसूर अली खान पटौदी के जगह कप्तान बनाया गया उस समय टीम में सुनील गावस्कर, गुंडप्पा विश्वनाथ और बिशन सिंह बेदी जैसे सितारे थे।

उनकी प्रथम श्रेणी क्रिकेट में शुरूआत 1958 में हो गई थी, पर टेस्ट टीम में आने में उन्हें आठ साल इंतजार करना पड़ा। वे नंबर तीन के आक्रामक बल्लेबाज थे। उनके आंकड़े उनके खेल के स्तर को सही बयान नहीं करते। टेस्ट मैचों में उनका एक ही शतक (143) है जो उन्होंने वेलिग्ंटन में 1968 में न्यूज़ीलैंड दौरे के दौरान बनाया था। इसके साथ उन्होंने 14 अर्धशतक भी बनाए। इनमें से चार ऐसे हैं जिनमें वे 90 और 100 के बीच रहे। 1967 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार और 1972 में उन्हें पद्मश्री दिया गया।

शायद यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि जब 1971 में भारत ओवल टेस्ट में इंग्लैंड के खिलाफ विजयी रन बना रहा था उस समय कप्तान वाडेकर नींद की गोद में थे। वाडेकर ने एक साक्षातकार में बताया था कि हमें ओवल में जीत के लिए 97 रन चाहिए थेे, पर मैं आखिरी दिन की पहली ही गेंद पर रन आउट हो गया। जब मैं वापिस लौट रहा था तो अगले बल्लेबाज के रूप में विश्वनाथ मैदान पर आ रहे थे। जब हम एक दूजे के पास से निकले तो विश्वनाथ ने कहा- चिंता मत करो कप्तान आराम से जा कर सो जााओ। हम ये रन बना लेंगे। उस समय विश्वनाथ के साथ फारूख इंजीनियर मैदान पर थे।

मैं थोड़ी देर पेवलियन से देखता रहा पर रन नहीं बन रहे थे। मुझे वहम सा हुआ और मैं अंदर कमरे में आ गया। इतने में शोर पड़ा ‘ इट्स फोर’। मंैने सोचा मैं अंदर ही ठीक हूं, और मंै कमरे में ही रहता हूं। मैं वहां लेटा और सो गया। मुझे तब पता चला जब इंग्लैंड के मैनेजर केन बैरिंगटन ने मुझे जगाया, ‘हे! अजित उठो, तुम्हें पता है, तुम जीत गए हो।’

वाडेकर ने एक बार अपने एक और साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें अपने कप्तान बनाए जाने पर विश्वास नहीं था उन्हें लगता था कि वह जिम्मेदारी ‘टाइगर पटौदी’ पर डाली जाएगी। वाडेकर ने बताया,’ पटौदी मेरे साथ बहुत अच्छे थे, हम लोग एक दूसरे के नज़दीक रहे। मैंने एक बार टाइगर से कहा कि मैं ज़्यादा रन नहीं बना पा रहा हूं। आप कोशिश करना कि मैं टीम में रहंू।’ इस पर पटौदी ने कहा था,’ ठीक है अजित, पर ध्यान रखना कि जब तुम कप्तान बन जाओ तो मैं टीम में रहूं।’ वाडेकर ने कहा,’ इसका कोई चांस नहीं है पर यदि ऐसा मौका आया तो तुम टीम में होगे।’

आज यह महान खिलाड़ी हमारे बीच नहीं है। आज भारत की टीम पूरी तरह संतुलित है। इसमें स्पिन और तेज़ गेंदबाजी दोनों है। पर वाडेकर की टीम में कोई तेज़ गेंदबाज नहीं था। सही बल्लेबाज भी नहीं थे। उनके पास थे तो बिशन सिंह बेदी, इरापल्ली प्रसन्ना, भगवत चंद्रशेखर और वेंकेटराघवन जैसे विश्व स्तरीय स्पिन गेंदबाज और एकनाथ सोलकर, अविदअली, वेंकेटराघवन और वाडेकर खुद नज़दीकी क्षेत्र रक्षक जिनमें बल्ले के मुंह से गेंद लपकने की महारत थी। एकनाथ सोलकर, ‘फारवर्ड शार्ट लैग’ पर, अविद अली और वेंकेटराधवन ‘गली’ व ‘क्लोस’ कवर पर और वाडेकर ‘स्लिप’ में गेंद लपकने में माहिर थे। आने वाले समय तक क्रिकेट की दुनिया में वाडेकर का नाम रहेगा।

गांवों के नाम मुस्लिम थे इसलिए बदल दिए

उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर करने के बाद प्रदेश में भी उसी तर्ज का बदलाव शुरू हो गया है। चुनाव सिर पर देख कर सरकार मतदातों को रिझाने के लिए उनकी मांग के अनुसार गांवो के नाम बदल रही है।

शुरूआत हिन्दू बहुल गांवों के मुस्लिम नाम बदलने के साथ हुई है। बाड़मेर के मियां का बाड़ा गांव का नाम महेश नगर और झुंझनू के इस्माइलपुर का नाम पिचानवा खुर्द और जालौर के नरपाड़ा का नाम परपुरा कर दिया कर दिया है और आधा दर्जन गावों के नाम बदलने के प्रस्ताव केन्द्र को भेज दिए गए हैं।

मियां का बाड़ा गांव का नाम बदलने के लिए पंचायत ने 2010 में प्रस्ताव लिया और इसे राज्य सरकार के जरिए केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय को भेजा। वहां से मंजूरी मिलने के बाद गांव का नाम महेश नगर किया गया। यहां के स्टेशन का नाम भी अब बदलने की प्रक्रिया चल रही है। नाम बदलने की वजह प्राचीन गांव का नाम महेश रो बाड़ो होना बताया गया है। अजमेर जिले के सलेमाबाद में श्री निंबार्क तीर्थ है। इसका नाम निंबार्क तीर्थ रखने का प्रस्ताव है। झुझनू जिले के एक अन्य गांव इस्माइलपुर का नाम कौशलनगर या ईश्वर नगर करवाने का प्रयास चल रहा है। चित्तौडग़ढ़ जिले की भदेसर तहसील का मंडफिया गांव देश के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है यहंा सांवलिया सेठ का विशाल मंदिर है। लंबे समय से मंडफिया गांव का नाम सावंलियाजी करने की मांग चल रही है। चित्तौडग़ढ़ के ही मोहम्मदपुरा का नाम मेडी का खेड़ा, नवाबपुरा का नाम नई सरथल, रामपुर-आजमपुर का सीताराम जी का खेड़ा रखना तय है।

हिन्दू बहुल गांवों के मुस्लिम नाम बदलने के पीछे कारण भी अनूठा बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि कई गांवों के लोगों की शिकायतें थी कि गांव का नाम मुस्लिम होने के कारण हिन्दू युवाओं की शादियों में अड़चने आ रही है। इसके बाद ग्राम पंचायत स्तर से ही इन गावों के नाम बदलने का प्रस्ताव आया था। सरकार को केन्द्र से ऐसे 27 गावों के नाम बदलने की मंजूरी मिल चुकी है। किसी भी गांव का नाम बदलने के लिए पंचायत सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर राजस्व विभाग को भिजवाती है। इसकी पुष्टि करने के बाद राज्य सरकार की ओर से केन्द्र को प्रस्ताव भेजा जाता है। अनुमति मिलने के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू की जाती है, लेकिन ऐसा कोई करतब नजर नहीं आता?

कहा जाता है कि, सलेमाबाद का नाम बदलने की मांग काफी पुरानी है। लेकिन श्री जी महाराज के देवलोक गमन के बाद एक स्वर में गांव का नाम बदलने की आवाज़ उठनी शुरू हो गई। यहां के राजकीय विद्यालय का नाम पिछले साल ही बदल दिया गया था। सलेमाबाद के सरपंच धरणीधर उपाध्याय ने बताया कि 15 अगस्त 2017 को विद्यालय का नाम बदलकर जगतगुरू निंबाकाचार्य श्री जी महाराज राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कर दिया गया था। उसके बाद जन प्रतिनिधियों द्वारा प्रस्ताव बनाकर जिला प्रशासन को भेजा गया। सलेमाबाद का नाम जागीरदार सलीम खान के नाम पर पड़ा था लेकिन अब यहां मात्र एक मुस्लिम परिवार के सात सदस्य रहते हैं। सरपंच धरणीधर ने बताया कि सलेमाबाद श्री जी महाराज की वजह से हिन्दुओं का तीर्थ है। इसलिए गांव का नाम श्री निम्बार्क तीर्थ करने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

गत् एक जून को राजस्व विभाग ने बाड़मेर तहसील के समदंडी के राजव ग्राम मियां का वाड़ा का नाम बदलकर महेशनगर कर दिया। जानकारी के अनुसार मुगलकाल में इसका नाम महेश नगर था जिसे बाद में बदलकर मियों का बाड़ा कर दिया गया था। वर्तमान में गांव की मुस्लिम आबादी मात्र 21 है। महेश नगर के जनप्रतिनिधि पिछले दस साल से इसका नाम परिवर्तित करवाने के लिए प्रयासरत थे। अब जाकर महेश नगर के वाशिंदों की यह मांग पूरी हुई है। बदले गए इन गावों के नाम बदलने के पीछे जातिगत आंकड़ों को आधार माना गया है।

राजस्व मंडल के सब रजिस्ट्रार सुरेश सिंधी के अनुसार एक पूरी प्रक्रिया अपनाकर नाम बदला जाता है। पहले पंचायत सबूत या फिर नाम बदलने के आधार पर सर्वसम्मति से राजस्व विभाग को सिफारिश भेजती है, जिसकी पुष्टि कर राज्य सरकार भारत सरकार को भेजती है। जहां से अनुमति मिलने के बाद हम नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। इसलिए कई बार नाम बदलने के प्रक्रिया में समय भी लग जाता है। गांव का नाम बदलने की प्रक्रिया सरपंच से शुरू होकर गृह मंत्रालय तक जाती है। लेकिन सवाल है कि नाम बदलाव में क्या वास्तव में यह पूरी प्रक्रिया अपनाई गई?

केरल में रेड अलर्ट हटाया, अब ऑरेंज अलर्ट

खतरनाक स्थिति जब होती है तो किसी राज्य में ”रेड अलर्ट” घोषित किया जाता है। केरल में बारिश  थमने के बाद क्योंकि जलस्तर थोड़ा घटा है, लिहाजा वहां ‘रेड अलर्ट’ हटा लिया गया है। लेकिन वहां अब ‘ऑरेंज अलर्ट’ घोषित किया गया है । इसके मायने हैं खतरा, तैयार रहें। अभी १० जिलों के लिए ”ऑरेंज अलर्ट” जारी किया गया है।

प्राकृतिक या अन्य कारणों से जब मौसम खराब होता है तो ऑरेंज अलर्ट घोषित किया जाता है। इसमें लोगों को इधर-उधर जाने के प्रति सावधानी बरतने की सलाह होती है। इससे नीचे यानी सबसे काम चेतावनी वाला अलर्ट है यलो अलर्ट। इसके मायने हैं किसी भी खतरे के प्रति सचेत रहें। चंदेक इलाकों में ‘यलो अलर्ट’ घोषित है। रेड अलर्ट सबसे ऊंची अलर्ट चेतावनी है जब मौसम खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है या भारी नुकसान की आशंका होती है।

केरल में मरने वालों की संख्या ३६२ पहुंच चुकी है। सेना पूरी ताकत से लोगों को राहत शिविर पहुंचाने में जुटी है। एनडीआरफ से लेकर जल सेना के जवान दिन-रात कड़ी मेहनत कर बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। बाढ़ से केरल में अब तक ९६ हजार किलोमीटर की सड़कें टूट चुकी हैं। राज्य सरकार ने बाढ़ से हुए नुकसान के कारण सुविधाओं को बहाल करने के लिए 2000 रुपये केंद्र सरकार से मांगे हैं। गौरतलब है कि दो दिन पहले पीएम मोदी ने हवाई सर्वेक्षण कर तत्काल 500 करोड़ देने का एलान किया था। इससे पहले गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी हवाई सर्वेक्षण कर 100 करोड़ राहत की घोषणा कर चुके हैं। इसे बहुत नाकाफी बताते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार से केरला की आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर ज्यादा आर्थिक सहायता की मांग की है। उन्होंने मोदी सरकार की केरला को काम राशि देने पर हैरानी जताई है।

जलमग्न केरल पर प्रकृति की जबरदस्त मार पड़ी है। वहां बाढ़, बारिश और भूस्खलन से आम जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित है। अलग-अलग इमारतों और छतों पर फंसे हजारों लोगों को शनिवार को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया। अब तक मारे गए लोगों की संख्या बढ़कर ३६२ हो गई है, अकेले शनिवार को ही 35 लोगों की मौत हो गई। अलवत्ता बारिश रुकने से फिलहाल हालात धीरे-धीरे सुधर रहे हैं।

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने बताया कि बाढ़ के कारण राज्य को 19, 512 करोड़ का नुकसान हुआ है। केरल में 3.14 लाख लोगों को राहत शिविरों में पहुंचाया गया है। पिछले सौ साल में ऐसी भंयकर बाढ़ केरल में देखने को नहीं मिली। राज्य के सभी डैम को खोल कर रखा गया है।

वैसे मौसम विभाग ने राज्य के जिलों इरनाकुलम, पथानमिट्टा और अलपुझा में भारी बारिश की आशंका जताई है। इस समय 6,61,887 लोग 3,466 राहत शिविरों में रह रहे हैं। राज्य के अलुवा, चालकुडी, चेनगन्नूर, अलपुझा और पथानमिट्टा जिलों में बाढ़ ने सबसे ज्यादा कहर ढाया है। एनडीआरएफ, सेना, नौसेना और कोस्ट गार्ड यहां पूरी मुस्तैदी से बचाव और राहत कार्य में जुटे हैं।

भारतीय वायुसेना ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिए आसमान से राहत का सामान फेंक कर लोगों को राहत दे रहे हैं। एनडीआरफ के डीजी ने बताया कि एनडीआरएफ की 58 टीमों को राज्य के 8 जिलो में तैनात किया गया है। वह बचाव, निकाली का काम करने के साथ ही आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्रदान कर रहे हैं। एनडीआरएफ ने अलप्पड़ गांव के चेरपू पुलिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत एक गर्भवती महिला को भी बचाया है। भारतीय वायुसेना के गरुड़ स्पेशल फोर्स के विंग कमांडर प्रशांत ने बाढ़ प्रभावित जिले अलपुझा के एक घर की छत से बच्चे को बचाया है।

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के डॉ दाभोलकर हत्यारा गिरफ्तार

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ नरेंद्र दाभोलकर की  पांचवीं पुण्यतिथि के  पहले उन पर गोलियां चलाने वाले आरोपियों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है।

20 अगस्त को डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को 5 साल पूरे हो रहे हैं। 20 अगस्त 2013 अगस्त के दिन पुणे के ओमकारेश्वर पुल पर दो अज्ञात लोगों ने डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर पर गोलियां चलाई थी जिनसे उनकी मौत हो गई थी।

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने वाले आरोपीयों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। डॉक्टर नरेंद्र की हत्या से संबंधित इस गिरफ्तारी को बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है । 20 अगस्त को डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को 5 साल पूरे होने जा रहे हैं अपराधियों को ना पकडे जाने को लेकर सरकार की बड़ी किरकिरी हो रही थी। डॉ दाभोलकर के पुत्र हमीद ने कहा कि यदि दाभोलकर की हत्या के मामले में कार्रवाई तेजी से होती और समय रहते अपराधी पकड़ लिया जाते तो अन्य  हत्याएं टालीं जा सकती थी। डॉ दाभोलकर की हत्या के बाद के बाद 16 फरवरी को कम्युनिस्ट लीडर गोविंद पानसारे पर  गोलियां चलाई गई थी जिसमें वह बुरी तरह घायल हुए थे और कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई यह घटना कोल्हापुर की है। महाराष्ट्र की इन दो घटनाओं के बाद कर्नाटक की लेखिका गौरी लंकेश की हत्या भी गोली मारकर उनके बाहर घर के बाहर कर दी गई थी।

पिछले दिनों नालासोपारा में बरामद विस्फोटक विस्फोटकों की जांच के दौरान सीबीआई टीम को संदेहास्पद शरद के मित्र सचिन अंदुरे के बाबत जानकारी मिली इसी आधार पर सचिन को गिरफ्तार किया गया और इसी सिलसिले में हुई पूछताछ के दौरान सचिन से डॉ दाभोलकर के हत्यारों की कड़ियां खुलती चली गई।दावा किया जा रहा है कि डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या सचिन ने ही की थी दाभोलकर पर सचिन ने ही गोलियां चलाई थी।

शरद कळसकर से पूछताछ के दौरान सचिन अंदुरे का नाम सामने आया। सचिन अंदुरे और शरद कळसकर दोनों गहरे मित्र हैं। अपराध में सचिन की संलिप्तता को देखते हुए एटीएस ने उसे गिरफ्तार किया और सीबीआई को सौंप दिया है । नालासोपारा विस्फोटक मामले में एटीएस ने वैभव राऊत, सुधन्वा गोंधळेकर और शरद कळसरकर को गिरफ्तार किया हैै। एटीएस के अनुसार  शरद कळसरकर ने  डॉ दाभोलकर की हत्या में शामिल होने की बात स्वीकारी है। इसी सिलसिले  में जालना से रीकांत पांगारकर नामक एक अन्य व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया गया है। सचिन नालासोपारा विस्फोटक मामले में आरोपी शरद का करीबी मित्र है ।सचिन औरंगाबाद के राज बाजार ग्वार फली इलाके में किराए पर रह रहा था। वह निराला बाजार के एक कपड़े की दुकान पर दुकान में काम कर रहा था। एटीएस ने 14 अगस्त को सचिन को गिरफ्तार किया था।

हाल ही में कोर्ट ने  डॉ दाभोलकर और पानसारे की हत्याओं की जांच में हो रही ढिलाई को लेकर जांच एजेंसियों को फटकार लगाई थी। डॉक्टर दाभोलकर के पुत्र हामिद ने भी कहा कि गिरफ्तारीयां इसलिए हो सकी है क्योंकि कोर्ट ने जांचकार्य को काफी नजदीकी से देखना शुरु किया था ।

गोविन्द‌ पानसारे कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे और डॉ दाभोलकर द्वारा समाज में फैले जादू टोना, अंधविश्वास आदि के खिलाफ सामाजिक जागरण अभियान में सहयोग करते थे।

इसी बीच गौरी लंकेश की हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार लोगों के पास से मिली डायरी में कोडवर्ड में लिखी गई जानकारियों के चलते डॉ दाभोलकर के पुत्र हमीद और उनके परिजनों की सुरक्षा को चाक चौबंद कर दिया गया है । सूत्रों के अनुसार उन डायरियों में इनके नाम लिखे गए थे।

अब मानसिक रोग भी होंगे इन्शुरन्स पॉलिसी में शामिल

सभी बीमा कंपनियों को मानसिक बीमारियों को बीमा पॉलिसियों के दायरे में लाने का प्रावधान करने का निर्देश दिया गया है।
भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) ने  की ओर से 16 अगस्त को जारी आदेश में कहा गया है कि ‘मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा कानून-2017, 29 मई, 2018 से अस्तित्व में आया है।
पीटीआई भाषा की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कानून की धारा 21(4) में कहा गया है कि सभी बीमा कंपनियों को मेडिकल बीमा के तहत मानसिक रोग के इलाज का भी प्रावधान करना होगा। यह अन्य बीमारियों के लिए उपलब्ध सुविधा के अनुरूप ही होगा।
आदेश में ये भी कहा गया है कि सभी बीमा कंपनियों को मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा कानून, 2017 के इस प्रावधान का अनुपालन तत्काल प्रभाव से करना होगा।
ये भी बता दें कि आदेश के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा कानून-2017 के तहत मानसिक रोग से पीड़ित किसी भी व्यक्ति को अन्य प्रकार की बीमारियों से प्रभावित व्यक्ति के समान ही माना जाएगा।

15 सितंबर से आपका चेहरा पहचानेगा आधार

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) जल्द ही व्यक्ति की पहचान के सत्यापन के लिए फोटो का चेहरे से मिलान करने की सुविधा शुरू करेगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ यह सुविधा पहले दूरसंचार सेवा कंपनियों के साथ 15 सितंबर को शुरू की जा रही है।
यूआईडीएआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अजय भूषण पांडे ने अनुसार, “लाइव फेस फोटो को ईकेवाईसी फोटो से मिलाने का निर्देश सिर्फ उन्हीं मामलों जरूरी होगा जिनमें सिम जारी करने के लिए आधार का इस्तेमाल किया जा रहा है। दूरसंचार विभाग के निर्देशानुसार यदि सिम आधार के अलावा किसी अन्य तरीके से जारी किया जाता है, तो ये निर्देश लागू नहीं होंगे।”
प्राधिकरण ने इससे पहले चेहरा पहचानने का फीचर एक जुलाई से लागू करने की योजना बनाई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर एक अगस्त कर दिया गया था।
इसके तहत मोबाइल सिम कार्ड के लिए आवेदन के साथ लगाए गए फोटो को संबंधित व्यक्ति के सामने लिए गए फोटे से की जाएगी। ऐसा पीटीआई भाषा की एक रिपोर्ट में बताया गया है।
यूआईडीएआई ने अगले महीने के मध्य से इस तय लक्ष्य को पूरा नहीं करने वाली दूरसंचार कंपनियों पर मौद्रिक जुर्माना लगाने का भी प्रस्ताव किया है।
यूआईडीएआई ने ये भी स्पष्ट किया है किदूरसंचार कंपनियों के अलावा अन्य सत्यापन एजेंसियां के लिए चेहरा पहचानने की सुविधा के क्रियान्वयन के बारे में निर्देश बाद में जारी किए जाएंगे।
हालांकि, प्राधिकरण ने इसके लिए कोई समयसीमा नहीं दी है। खास बात यह है कि यूआईडीएआई ने कहा है कि ‘लाइव फेस फोटो’ और ईकेवाईसी के दौरान निकाली गई तस्वीर का मिलान उन मामलों में जरूरी होगा, जिनमें मोबाइल सिम जारी करने के लिए आधार का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यूआईडीएआई ने कहा कि यह कदम फिंगरप्रिंट में गड़बड़ी की संभावना रोकने या उसकी क्लोनिंग रोकने के लिए उठाया गया है। इससे मोबाइल सिम जारी करने और उसे ऐक्टिव करने की ऑडिट प्रक्रिया और सुरक्षा को मजबूत किया जा सकेगा।
यूआईडीएआई के एक परिपत्र के अनुसार 15 सितंबर से दूरसंचार सेवा कंपनियों को महीने में कम से कम 10 प्रतिशत सत्यापन चेहरे का लाइव (सीधे) फोटे से मिलान करके करना अनिवार्य होगा। इस प्रकार का सत्यापन इससे कम अनुपात में हुआ तथा प्रति सत्यापन 20 पैसे का जुर्माना लगाया जाएगा।
याद रहे कि इस साल जून में हैदराबाद के एक मोबाइल सिम कार्ड वितरक ने आधार ब्योरे में गड़बड़ी कर हजारों की संख्या में सिम ऐक्विटवेट किए थे।