टोल में झोल: NHAI के सॉफ्टवेयर के ‘गुप्त सिस्टम’ से डबल शुल्क की रकम हो रही थी डायवर्ट

NHAI टोल प्लाजा में फर्जी टोल कलेक्शन घोटाले में ईडी ने 14 ठिकानों पर छापा मारा
प्रवर्तन निदेशालय ने NHAI टोल प्लाजा में फर्जी टोल कलेक्शन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 14 ठिकानों पर तलाशी शुरू की है।

बिना FASTag या कम बैलेंस वाले वाहनों से वसूले गए अतिरिक्त टोल को समानांतर सॉफ्टवेयर के जरिए NHAI के आधिकारिक हिसाब से बाहर रखा जाता था, ईडी के छापों में खुली पोल

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली

टोल प्लाजा पर गाड़ी रुकी, शुल्क लिया गया और रसीद भी मिल गई… ऊपर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता था। लेकिन कुछ टोल प्लाजा में इसी सामान्य दिखने वाली प्रक्रिया के पीछे एक दूसरा डिजिटल सिस्टम चल रहा था। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बुधवार को नेशनल हाईवे अथॉरिटी इंडिया (NHAI) के विभिन्न टोल प्लाजा में फर्जी टोल कलेक्शन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 14 ठिकानों पर तलाशी शुरू की। कार्रवाई उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, दिल्ली-NCR और पश्चिम बंगाल तक फैली है।

ईडी के मुताबिक जांच में ऐसे अनधिकृत सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं, जिनसे अनधिकृत टोल रसीदें बनाई जाती थीं और टोल की रकम को आधिकारिक लेखा प्रणाली से बाहर डायवर्ट किया जाता था। एजेंसी का कहना है कि फॉरेंसिक जांच और NHAI के रिकॉर्ड ने ऐसे सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की पुष्टि की है। लेकिन यह कथित खेल काम कैसे करता था?

पहला कदम: निशाना वे वाहन, जिनसे डबल टोल वसूली

जनवरी 2025 में उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने मिर्जापुर के शिवगुलाम टोल प्लाजा पर कार्रवाई की थी। उस जांच के दौरान सामने आए विवरणों के मुताबिक कथित नेटवर्क का खास निशाना बिना फास्टैग या अपर्याप्त फास्टैग बैलेंस वाले वाहन थे। ऐसे वाहनों से नियमों के तहत सामान्य टोल की तुलना में दोगुना शुल्क लिया जाता है। यही अतिरिक्त रकम कथित फर्जीवाड़े का सबसे अहम हिस्सा थी। एसटीएफ की जांच में आरोप लगा कि इसी अतिरिक्त शुल्क को आधिकारिक सिस्टम से बाहर करने के लिए समानांतर सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता था।

दूसरा कदम: एनएचएआई के कंप्यूटर में ही ‘दूसरा रास्ता’

जांच में सामने आए विवरण के मुताबिक कथित तौर पर एनएचएआई के आधिकारिक सॉफ्टवेयर के साथ ही एक अलग/ पैरेलल सॉफ्टवेयर टोल बूथ के कंप्यूटर सिस्टम में चलाया जाता था। एसटीएफ के रिकॉर्ड में एक आरोपी के बयान के आधार पर कहा गया था कि इस सॉफ्टवेयर को टोल प्लाजा के सिस्टम में ऑनलाइन या ऑफलाइन तरीके से इंस्टॉल किया जाता था और इसे दूर बैठे लैपटॉप से भी एक्सेस किया जा सकता था। यानी फर्जीवाड़े का तरीका कोई अलग काउंटर बनाकर पैसे छिपाना भर नहीं था। टोल कलेक्शन की डिजिटल प्रक्रिया के भीतर ही एक समानांतर रास्ता बनाया गया था।

तीसरा कदम: असली जैसी दिखती थी रसीद

समानांतर सॉफ्टवेयर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही था। इससे निकलने वाली रसीद एनएचएआई के आधिकारिक सॉफ्टवेयर से निकली रसीद जैसी दिखाई देती थी। वाहन चालक को रसीद मिल जाती थी और उसके पास तत्काल यह समझने का कोई आसान तरीका नहीं होता था कि उसका भुगतान किस सिस्टम में दर्ज हुआ है। जांच में यह भी दावा किया गया था कि हर टोल, बूथ और ट्रांजैक्शन का विवरण कथित ऑपरेटर के लैपटॉप पर दिखाई देता था। यही वह बिंदु है जो इस मामले को सामान्य नकद चोरी से अलग बनाता है। लेनदेन को ही इस तरह दर्ज किया जाता था कि वह ऊपर से वैध दिखाई दे, लेकिन आधिकारिक हिसाब में पूरी रकम न पहुंचे।

चौथा कदम: रकम का पूरा हिस्सा NHAI को नहीं जाता था

यूपी एसटीएफ के अनुसार, बिना फास्टैग वाले वाहनों से वसूले गए डबल टोल का एक हिस्सा एनएचएआई के खाते में जमा होना था। जांच में पता चला कि समानांतर सॉफ्टवेयर के जरिए वसूली गई रकम को आधिकारिक सिस्टम से बाहर रखा जाता था और बाद में उसे नेटवर्क से जुड़े लोगों के बीच बांटा जाता था। ऐसे लेनदेन की रकम बैंक खातों और डिजिटल वॉलेट के जरिए आगे भेजी जाती थी। यही वह वित्तीय रास्ता है जिसे अब ईडी खंगाल रही है। एजेंसी की मौजूदा तलाशी का उद्देश्य डिजिटल और दस्तावेजी सबूत जुटाने के साथ-साथ किसे फायदा हुआ और कथित तौर पर डायवर्ट की गई रकम कहां गई, इसका पता लगाना है।

पांचवां कदम: बाकी वाहनों को ‘छूट’ दिखाकर रिकॉर्ड से गायब

एसटीएफ की जांच में एक और चौंकाने वाला आरोप सामने आया था। रिकॉर्ड के मुताबिक जिन वाहनों से इस तरीके से रकम वसूली जाती थी, उनके गुजरने के बाद उन्हें सिस्टम में इस तरह दिखाया जा सकता था कि वाहन शुल्क से छूट प्राप्त था। इस तरह वास्तविक वसूली और आधिकारिक सिस्टम में दर्ज लेनदेन के बीच अंतर पैदा हुआ। यही अंतर किसी भी टोल फर्जीवाड़े में सबसे अहम होता है- पैसा लिया गया, लेकिन सरकारी हिसाब में उस भुगतान का पूरा प्रतिबिंब नहीं आया।

एक प्लाजा से शुरू हुआ मामला कई राज्यों तक पहुंचा

जनवरी 2025 में एसटीएफ की कार्रवाई के बाद जांच में आरोपी की ओर से कई टोल प्लाजाओं के नाम बताए गए थे। एसटीएफ के रिकॉर्ड में 42 टोल प्लाजाओं पर ऐसे सॉफ्टवेयर की स्थापना का दावा दर्ज है। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम, छत्तीसगढ़, जम्मू, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना के टोल प्लाजा शामिल थे। हालांकि, इन सभी टोल प्लाज़ों को फर्जीवाड़े में शामिल मान लेना सही नहीं होगा। बाद की कानूनी कार्यवाही में कई टोल ठेकेदारों ने इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि उनके खिलाफ स्वतंत्र आपत्तिजनक सबूत नहीं मिले।

‘सॉफ्टवेयर’ मिला कैसे और फर्जीवाड़ा पकड़ा कैसे गया?

यही इस पूरे मामले का सबसे पेचीदा हिस्सा है। दिल्ली हाईकोर्ट के जुलाई 2026 के फैसले में दर्ज तथ्यों के मुताबिक एनएचएआई ने कुछ टोल प्लाजा पर कार्रवाई के बाद नकद संग्रह में अचानक बढ़ोतरी को भी कथित पुराने फर्जीवाड़े का संकेत माना था। लेकिन अदालत ने इस निष्कर्ष पर गंभीर सवाल उठाए। कुछ मामलों में नकद संग्रह की प्रतिशत वृद्धि बड़ी दिखाई दे रही थी क्योंकि शुरुआती नकद संग्रह का आधार बहुत छोटा था। अदालत ने यह भी पाया कि कई जगह फास्टैग संग्रह भी बढ़ा था और नकद संग्रह में बदलाव के पीछे महाकुंभ, पर्यटन, मौसम और अन्य स्थानीय कारणों की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता था। इसलिए सिर्फ नकद संग्रह बढ़ने को फर्जीवाड़े का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

फिर इस बार ईडी के हाथ में क्या नया है?

यही मौजूदा कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। ईडी का कहना है कि उसके पास फॉरेंसिक जांच और एनएचएआई रिकॉर्ड से अनधिकृत सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की पुष्टि हुई है। इसलिए इस बार एजेंसी सिर्फ टोल प्लाजा के कलेक्शन आंकड़ों तक सीमित नहीं है। 14 ठिकानों पर तलाशी के पीछे तीन मुख्य लक्ष्य हैं।

पहला- कथित समानांतर सॉफ्टवेयर और उससे जुड़े डिजिटल सबूत हासिल करना।

दूसरा- पता लगाना कि इस सिस्टम को किसने बनाया, इंस्टॉल और संचालित किया।

तीसरा- डायवर्ट की गई रकम का पूरा वित्तीय रूट तलाश कर लाभार्थियों तक पहुंचना।

एनएचएआई के सिस्टम में सेंध का सवाल क्यों बड़ा है?

टोल कलेक्शन केवल रोजाना वाहन शुल्क वसूलने की प्रक्रिया नहीं है। यह बड़े पैमाने पर डिजिटल और वित्तीय रिकॉर्ड तैयार करने वाली व्यवस्था है।

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में दर्ज एनएचएआई के नियमों के मुताबिक प्राधिकरण को वसूले गए यूजर फीस की शुद्धता, सभी वाहनों को सही रसीद जारी होने और इलेक्ट्रॉनिक डेटा की जांच का अधिकार है। एनएचएआई की 2024 की नीति में प्रोजेक्ट डायरेक्टर और अथॉरिटी इंजीनियर को कैश कलेक्शन की लगातार निगरानी करने तथा समानांतर सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल को रोकने के निर्देश भी दिए गए थे। इसलिए मौजूदा ईडी जांच सिर्फ यह पता लगाने की कवायद नहीं है कि कितने पैसे का कथित घोटाला हुआ। बड़ा सवाल यह है कि अगर आधिकारिक सॉफ्टवेयर के समानांतर दूसरा सिस्टम चल रहा था, तो वह कितने समय तक चला, कितने प्लाजा तक पहुंचा और निगरानी की कई परतों को पार कैसे करता रहा?