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घट रहा ख़रीफ़ की फ़सलों का रक़बा

उत्तर प्रदेश गेहूँ, धान, गन्ना, दाल, तिलहन, मूँगफली, मक्का और सब्ज़ियों की फ़सलों के लिए जाना जाता है। मगर इनमें से कई फ़सलों की तरफ़ से किसानों का मोह भंग होता दिख रहा है। इसके कई कारण हैं, जिन पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इन दिनों की अगर बात करें, तो ये ख़रीफ़ की फ़सलों के दिन हैं। ख़रीफ़ की फ़सलें बारिश के मौसम में होती हैं, इस मौसम में ज़ायद की फ़सलें पकती हैं।

खेती किसानी का सर्वेक्षण करने पर पता चलता है कि ख़रीफ़ की फ़सलों का रक़बा कम होता जा रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसान भाई ख़रीफ़ की कुछ फ़सलें पहले की अपेक्षा कम करते जा रहे हैं। सरकार, कृषि अनुसंधान केंद्र, वैज्ञानिक तथा कृषि विशेषज्ञ इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। बड़ी जोत के किसान ओम प्रकाश कहते हैं कि किसान सदैव पाँच बातों को देखकर खेती करता है। एक तो यह कि उस कौन-सी फ़सल से उसे लाभ होगा, परन्तु समस्या यह है कि इस बात का ज्ञान कम ही किसानों को होता है। दूसरी बात यह कि किस फ़सल को पशुओं से कम हानि होगी। तीसरी बात यह कि किस फ़सल में कम लागत आएगी।
चौथी बात यह कि किस फ़सल से उसे नक़द आमदनी होगी। पाँचवीं बात यह कि किस फ़सल को ज़्यादा लोग उगा रहे हैं। यही अधिकतर किसानों की सबसे बड़ी ग़लती होती है कि वे वही फ़सलें अधिक बोते हैं, जो अधिक बोयी जाती हैं। किसानों को बाज़ार में माँग तथा भाव के आधार पर खेती करनी चाहिए। जो किसान ऐसा करते हैं, वे हर साल लाखों रुपये खेती से कमा लेते हैं। युवा किसान ओमवीर सिंह कहते हैं कि किसानों को फ़सल चक्र के आधार पर खेती करनी चाहिए, ताकि उन्हें खेतों से एक ही बार में दोहरा लाभ प्राप्त हो सके। कुल मिलाकर मामला ख़रीफ़ की फ़सलों का रक़बा घटने का है। इनमें कौन-कौन सी फ़सलें शामिल हैं, कृषि विशेषज्ञ इरफ़ान ने इस बारे में विस्तार से बताया।

धान की फ़सल
इरफ़ान कहते हैं कि बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश के किसान धान की फ़सल उगाते हैं। परन्तु पिछले डेढ़-दो दशक से दो समस्याएँ देखने को मिल रही हैं। एक समस्या यह है कि किसानों ने अधिक पैदावार के लालच में अच्छे व स्वादिष्ट धान की बुवाई कम कर दी है। परन्तु वे भूल रहे हैं कि कम पानी से उगने वाले सस्ते बीजों की बुवाई से धान तो ख़राब पैदा होता ही है, साथ ही उसके दाम भी अच्छे नहीं मिल पाते।

इस मामले में किसानों को बीज भण्डार वाले दुकानदार ठगते व गुमराह करते रहते हैं। दूसरी समस्या यह है कि पहले से किसानों ने धान की खेती कम करनी शुरू कर दी है। इसका कारण यह है कि किसानों को धान से उतनी आमदनी नहीं हो पाती, जितनी इस फ़सल की लागत है। अत: वे धान की जगह ज़ायद की फ़सलों को ख़रीफ़ में भी रख लेते हैं, नहीं तो गन्ना आदि ज़्यादा उगाते हैं।

मक्का, ज्वार व बाजरे की खेती
मक्का, ज्वार व बाजरे की खेती भी उत्तर प्रदेश में पहले की अपेक्षा कम होने लगी है। किसान ओम प्रकाश कहते हैं कि आज से 25-30 साल पहले तक मक्का, ज्वार तथा बाजरे की खेती उत्तर प्रदेश में बहुत होती थी। इसकी वजह यह थी कि लोग इन फ़सलों को अनाज के तौर पर उगाते थे। मगर अब किसान इन फ़सलों को बहुत कम उगा रहे हैं। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख कारण आवारा पशुओं से इन फ़सलों की रक्षा करने में किसानों असमर्थ हैं।

दूसरी प्रमुख समस्या चोरों से फ़सलों को बचाना है। ओम प्रकाश कहते हैं कि मैं ख़ुद मक्का की खेती करता हूँ। परन्तु रखवाली के बावजूद हर रोज़ पाँच-दस भुट्टे लोग तोड़ लेते हैं। एक बात यह भी है कि मक्का के साथ-साथ ज्वार तथा बाजरा की माँग बाज़ार में कम हो चुकी है। इसका एक कारण यह भी है कि लोगों को इन अनाजों की गुणवत्ता व इनके लाभ की जानकारी कम है। कम पैदावार के चलते ये तीनों अनाज आज बहुत महँगे हैं। अत: अगर किसान इन्हें उगाता है और रखवाली करने में सक्षम है, तो उसे घाटा तो नहीं होगा।

हिमाचल में चुनावी हलचल तेज़

यह पहली बार है, जब किसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क़रीब दो सप्ताह के अंतराल में हिमाचल प्रदेश के दो दौरे किये हैं। पहला 31 मई को और फिर दूसरा 16 जून को। उनके राज्य में ये दौरे एक तरह से भाजपा के चुनाव अभियान का श्रीगणेश ही हैं। प्रदेश में विधानसभा चुनाव इसी साल के आख़िर में होना है। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रेम कुमार धूमल ने दावा किया है कि भाजपा पिछले 35 साल के दौरान पार्टी की सरकार को कभी नहीं दोहराने के सिद्धांत को तोड़ते हुए जीत हासिल करेगी। कुल मिलाकर मोदी के दौरों से प्रदेश में राजनीति गरमा गयी है। अनिल मनोचा की रिपोर्ट :-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 31 मई को हिमाचल प्रदेश में भव्य स्वागत किया गया। वह केंद्र में भाजपा सरकार की आठवीं वर्षगाँठ मनाने के लिए शिमला में आयोजित पार्टी के एक रोड शो में आये थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुरानी बातें याद करते हुए राज्य में, विशेष रूप से शिमला में बिताये समय को याद किया। यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि मोदी नब्बे के दशक में कुछ साल हिमाचल के भाजपा प्रभारी रहे थे। क़रीब एक पखवाड़े में हिमाचल के अपने 16 जून के दूसरे दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धर्मशाला में एक रोड शो का नेतृत्व किया। इसके ज़रिये पार्टी ने चुनावी रूप से महत्त्वपूर्ण कांगड़ा क्षेत्र में चुनाव अभियान की शुरुआत की। मोदी, मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर के साथ एक किलोमीटर लम्बे रोड शो को कवर करते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों की बड़ी उपस्थिति के बीच फूलों से लदी खुली जीप में रहे।

भाजपा, जिसका लक्ष्य पहाड़ी राज्य में मिशन रिपीट का है; कांगड़ा पर ध्यान केंद्रित कर रही है। क्योंकि यह 68 सदस्यीय राज्य विधानसभा में लगभग एक-चौथाई विधायकों को भेजती है। कांगड़ा में अधिकतम सीटें जीतने वाली पार्टी आमतौर पर राज्य में सरकार बनाती है।

जीत का भरोसा

हमीरपुर में ‘तहलका’ से बातचीत में धूमल ने कहा कि वह पिछले 45 साल से पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता हैं और एक सैनिक के रूप में पार्टी के इशारे पर सब कुछ करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जनता प्यार करती है और देवभूमि में भाजपा फिर से सरकार बनाएगी। मोदी का दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी भी पड़ोसी राज्य पंजाब में अपनी चुनावी सफलता से उत्साहित होकर हिमाचल में पैर जमाने की कोशिश कर रही है। दिलचस्प बात है कि पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में इस पहाड़ी राज्य के तीन दौरे किये हैं। उधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद प्रतिभा सिंह भी लगातार दौरे कर रही हैं, ताकि भाजपा को सत्ता से बाहर करके सरकार बनायी जा सके। वैसे परम्परागत रूप से हिमाचल में केवल दो ध्रुवीय मुक़ाबले हाल के दशकों में देखे गये हैं।

हालाँकि पिछली बार हिमाचल प्रदेश में लोकतांत्रिक मोर्चा था, जिसे 4-5 फ़ीसदी वोट मिले थे। उससे पहले पंडित सुख राम की पार्टी थी, जिसे क़रीब छ: फ़ीसदी वोट मिले थे। जब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने हिमाचल में प्रवेश करने की कोशिश की, तो पार्टी प्रमुख मायावती ने एक भाषण में मतदाताओं से अपनी पार्टी को एक मौक़ा देने की अपील की। लोगों ने चुनावों में उन्हें पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया और बसपा केवल एक सीट जीत सकी। बाद में वह राज्य की राजनीति से दूर हो गयी। राज्य में पहली बार सन् 1998 में गठबंधन सरकार देखी गयी थी, जब दिवंगत सुख राम की तरफ़ से शुरू की गयी हिमाचल विकास कांग्रेस ने भाजपा के साथ गठबंधन किया था।

हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का दावा है कि राज्य ने अधिकांश सामाजिक विकास संकेतकों पर अच्छा प्रदर्शन किया है। क़रीब 83 फ़ीसदी साक्षरता दर के साथ यह देश के सबसे अधिक साक्षर राज्यों में से एक है। इसने प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में सुधार करने में भी काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया है। हिमाचल में शत्-प्रतिशत विद्युतीकरण और एक अच्छा सड़क नेटवर्क है। हालाँकि इस साल के अन्त में चुनाव में जाने पर भाजपा के लिए बहुत कुछ दाँव पर लगा है, क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर हिमाचल से ही हैं। पिछले 35 साल में हिमाचल के मतदाताओं ने कभी भी सरकार नहीं दोहरायी है। प्रतिभा सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के बाद से कांग्रेस पूरी ताक़त से तैयारी कर है। उन्होंने कहा- ‘वीरभद्र सिंह से किसी की तुलना नहीं की जा सकती और उनके जैसा नेतृत्व और शासन कोई नहीं दे पाएगा। हम उनके पदचिह्नों पर चलेंगे। प्रदेश की राजनीति में आप जैसी पार्टियों के लिए कोई जगह नहीं है। हमारा मुक़ाबला सिर्फ़ भाजपा के साथ है।’

कांग्रेस एक पारदर्शिता अधिनियम का वादा कर रही है, जिसके तहत जनप्रतिनिधि और सरकारी कर्मचारी हर साल सम्पत्ति का $खुलासा करेंगे। इसमें यह भी कहा गया है कि यह एक ज़िम्मेदारी अधिनियम लाएगी, जिसमें अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों को सेवाओं की गुणवत्ता के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना का पुनरुद्धार भी कांग्रेस के एजेंडे में है। प्रतिभा सिंह ने शिमला में अपने आवास होली लॉज में ‘तहलका’ को बताया कि कांग्रेस पार्टी के घोषणा-पत्र में इसे शामिल करने के लिए कुछ पूर्व मुख्य सचिवों के साथ चर्चा की है। उन्होंने अग्निपथ योजना, जिसके ख़िलाफ़ ख़ूब विरोध-प्रदर्शन चले; पर कटाक्ष किया और इसे बड़ी ग़लती बताया।

उन्होंने जलापूर्ति योजना पर सार्वजनिक धन के कथित दुरुपयोग की भी आलोचना की। उनका आरोप कि पानी नहीं है। पानी की आपूर्ति करने वाली करोड़ों की पाइपलाइन बेकार पड़ी है। प्रतिभा ने कहा कि यह ठीक है कि वह एक राज परिवार से ताल्लुक़ रखती हैं; लेकिन आम लोगों की समस्याओं को समझती हैं। वह कांग्रेस के टिकट के दावेदारों से मिल रही हैं, ताकि उनकी बात सुनी जा सके और कांग्रेस के भीतर किसी भी तरह के अंदरूनी कलह को रोका जा सके। उन्होंने कहा कि जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री को कुछ बड़ी घोषणाएँ करनी चाहिए थीं। उन्होंने भाजपा पर सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का ईडी के बहाने उत्पीडऩ करने का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र की ताक़त पर वह प्रतिशोध की राजनीति कर रही है।

सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस हमीरपुर, कांगड़ा और मंडी की जनसभाओं में केजरीवाल के निशाने पर रहीं। वह अपनी रैलियों और बातचीत में राजनीतिक भ्रष्टाचार, स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ख़राब स्वास्थ्य सुविधाओं, बेरोज़गारी और बढ़ती महँगाई के मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका कहना है कि हिमाचल की जनता ने कांग्रेस को 30 साल और भाजपा को 20 साल तक वोट दिये, अब उन्हें मौक़ा दे। ग़ौरतलब है कि बड़ी आबादी न होने के बावजूद देश में पाँचवें पायदान पर हिमाचल में बेरोज़गारी दर बहुत ज़्यादा है। हिमाचल की राजनीति पर नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी के लिए प्रभाव जमाना इतना आसान नहीं होगा। आम आदमी पार्टी के लिए हिमाचल का रास्ता बाधाओं से भरा है, क्योंकि राज्य के केंद्र में हमेशा से दो दल कांग्रेस और भाजपा ही रहे हैं।

अतीत में भी कई राजनीतिक दलों ने प्रदेश में पैर जमाने की कोशिश की; लेकिन सफल नहीं हुए। क्योंकि लोगों ने हमेशा कांग्रेस और भाजपा पर ही भरोसा किया है। पंजाब और हिमाचल की सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताएँ भी काफ़ी अलग हैं। लिहाज़ा आम आदमी पार्टी को यहाँ आसानी से सत्ता हासिल नहीं होगी।

मुसीबतों की आहट

हमारे यहाँ एक कहावत है कि जब विपत्ति आती है, तो हर तरफ़ से आती है। लेकिन हम सब तो अच्छे दिनों का इंतज़ार कर रहे हैं; क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिन्दुस्तान में अच्छे दिन लाने का वादा किया है। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले का उनका यह वादा उनके आठ साल से ज़्यादा प्रधानमंत्री रहने के बाद अभी तक तो फलीभूत होता दिखायी नहीं दे रहा है; लेकिन शायद आगे फलीभूत हो जाए। मुमकिन है कि प्रधानमंत्री मोदी इसके लिए प्रयासरत हों भी; लेकिन अब जो कुछ घटित हो रहा है, उससे लगता है कि प्रधानमंत्री की लाख कोशिशों के बावजूद अच्छे दिनों की जगह बुरे दिनों यानी मुसीबतों के दिन आने की आहट लगातार सुनायी दे रही है, जिसकी आवाज़ दिन-ब-दिन तेज़ होती जा रही है और लोगों को भयभीत-सा करती जा रही है।

मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ, जो प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अनर्गल बातों, अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं और उन्हें अनाप-शनाप बोलते हैं। लेकिन एक पत्रकार होने के नाते यह ज़रूर कहूँगा कि देश में जो कुछ हो रहा है, उसे रोकना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के हाथ में है। आज जिस तरह से देश भर में उपद्रव और आपदाओं की बाढ़-सी आयी हुई है, उसके लिए कुछ ज़िम्मेदारियाँ सरकार को लेनी ही चाहिए। सीधा सवाल यह है कि केंद्र सरकार को क्या ज़रूरत है ऐसी योजनाएँ लाने की, जिनसे देश के लोगों में आक्रोश और असन्तोष पैदा हो? क्या पिछले दिनों लागू की गयी अग्निपथ योजना की कोई माँग की जा रही थी? बिना सोच-विचार और मंथन किये बिना इसे लाने की क्या ज़रूरत थी? हालाँकि लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक कई ऐसी योजनाएँ लॉन्च की हैं, जो कामयाब दिखी हैं; लेकिन उनमें अधिकतर तो फेल ही हुई हैं। जबकि इन योजनाओं का परिणाम बहुत बेहतर हो सकता था, अगर वो परवान चढ़ती तो। गुजरात मॉडल के सपने से लेकर नोटबंदी, स्टार्टअप, मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया, जीएसटी, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत योजना, प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना, बुलेट ट्रेन योजना, स्मार्ट सिटी, स्मार्ट गाँव, स्वच्छ भारत अभियान और हर आदमी को पक्का घर तक में बहुत कम में सफलता मिली है, जबकि इनमें से अधिकतर परियोजनाएँ काफ़ी हद तक या पूरी तरह असफल हुई हैं। अगर उज्ज्वला योजना को ही लें, तो हर ग़रीब को सिलेंडर देने का क्या फ़ायदा निकला, जब उनमें से एक बड़ा तबक़ा उन सिलेंडरों को भराने में असमर्थ है। शौचालय जैसी योजना में ख़ूब गड़बड़ी हुई। जिन लोगों के शौचालय बने हैं, उनके बिना अच्छी पहुँच या बिना रिश्वत के नहीं बने। पहुँच और रिश्वत की ताक़त यह रही कि जिन लोगों के शौचालय पहले से ही बने हुए थे, उन्हें भी पैसा दिलाया गया। वहीं जिनकी पहुँच नहीं थी या जो रिश्वत नहीं दे सके, ऐसे कई लोगों को एक ईंट का पैसा भी नहीं मिला। प्रधानमंत्री की पक्के मकान वाली योजना में भी घोटाले की ख़बरें अक्सर मिलती रहती हैं। हालाँकि किसान निधि का पैसा ज़रूर किसानों के खाते में पहुँच रहा है; लेकिन सब किसानों को इसका फ़ायदा मिल रहा हो, ऐसा भी नहीं है। कहने का मतलब यह है कि कुछ योजनाओं पर तो काम हुआ है और उनका फ़ायदा भी लोगों को मिला है; लेकिन कई योजनाएँ सरकारी फाइलों में धूल फाँक रही हैं। काले धन की अब कोई चर्चा नहीं होती। कश्मीर में आतंकवाद की ख़बरें लगातार बढ़ रही है।

ग़ौरतलब है कि चीन द्वारा हमारी सीमा में घुसपैठ की ख़बरों के बावजूद इसका कहीं ज़िक्र तक नहीं है। यह केंद्र सरकार की बड़ी कमज़ोरी और विफलता की ओर इशारा करती है। चीन की इस प्रकार की धृष्टता के बावजूद उसकी कई कम्पनियों को हिन्दुस्तान में काम देना, उसके सामान की बिक्री पर प्रतिबंध का कोई रास्ता नहीं निकालना सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा करती है। कई सरकारी संस्थाएँ धीरे-धीरे निजी हाथों में जा रही हैं और देश में हिन्दू-मुस्लिम चल रहा है। आज भी सैकड़ों गाँव विकास की राह देख रहे हैं। गाँव से कुछ लोग जो शहरों में छोटी-मोटी नौकरी करके गुज़ारा करते थे, आज उनमें से बहुत-से अपने घरों में बैठे हुए हैं। क्योंकि कोरोना-काल में जिनकी नौकरी चली गयी, उनमें से 100 फ़ीसदी को अभी तक नौकरी नहीं मिल पायी है। देश में तमाम क्षेत्रों में नौकरियाँ बढऩे के बजाय लगातार घट रही हैं। जिन लोगों की नौकरी चल रही है, उनमें से ज़्यादातर को शर्तों पर काम करना पड़ रहा है।

गाँव के लोगों में एक डर-सा बैठ गया है कि उनके जो बच्चे पढ़-लिखकर सरकारी या निजी नौकरी में जाने की सोच रहे थे, उनके भविष्य का क्या होगा? आज देश में लाखों उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवान नौकरी के लिए परेशान हैं। जो भर्तियाँ हुई भी हैं, उनमें ग्रामीण क्षेत्रों से आये किसान पुत्रों और कामगारों के युवाओं का चयन न के बराबर ही हुआ है। सवाल यह है कि ऐसे बच्चे जिनकी सरकारी नौकरी में जाने की उम्र कोरोना और दूसरे कारणों से निकल चुकी है, वे अब क्या करेंगे? देश में लाखों बच्चे नौकरी की लालसा में समय पर शादी नहीं करते। उनकी चाहत रहती है कि जब उनकी नौकरी लग जाएगी, तब वे शादी करेंगे। आज लाखों बच्चे देश के अन्दर ऐसे हैं, जो 25 से 38-40 की उम्र तक के हो चले हैं और शादी नहीं की है। आँकड़ों के मुताबिक, इसी के चलते हर साल क़रीब 13 फ़ीसदी युवा आत्महत्या कर लेते हैं। अगर देखा जाए, तो यह आत्महत्या का आँकड़ा इतना बड़ा है कि इतनी मौतें तो सड़क दुर्घटना से भी नहीं होती हैं।

ज़ाहिर है कि सरकारी एजेंसियों सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग, अदालतों और पुलिस के दुरुपयोग के आरोप सत्ताधारी दल यानी सरकार पर पहले भी लगते रहे हैं। लेकिन आज तो हाल यह है कि अगर कोई प्रधानमंत्री या उनकी सरकार, गृह मंत्री अथवा किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, तो उस पर देशद्रोह या राजद्रोह का मुक़दमा लगा दिया जाता है। पुलिस प्रशासन भी उसको तंग करने में पीछे नहीं रहता। कई बार तो उस पर अराजक तत्त्वों द्वारा हमले कर दिये जाते हैं।

जानकारों का मानना है कि सरकार की विमुद्रीकरण की योजना भी लगभग असफल रही है। देश में व्यवसायी जीएसटी से परेशान हैं। ख़राब विदेशनीति के चलते हिन्दुस्तान की छवि विदेशों में पहले से कितनी कमज़ोर हुई है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री की सैकड़ों विदेशी यात्राओं के बावजूद विदेशी निवेश और विदेशी मुद्राकोष लगातार घट रहा है। पेट्रोल, डीजल की ऊँची दरों ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है। बुनियादी मुद्दों पर न काम हो रहा है और न ही उनका ज़िक्र करने को सरकार तैयार है। कोरोना-काल में न केवल पढ़ाई ठप हुई है, बल्कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर भी गिरा है। सरकार की नकारात्मकता यह है कि उसने सोची-समझी रणनीति के तहत राष्ट्रीय मुद्दों पर से लोगों का ध्यान हटाने की हर सम्भव कोशिश की है। मीडिया का स्तर मोदी की केंद्र सरकार में इस क़दर गिरा है कि लोग उसे खुलेआम गोदी मीडिया कहने लगे हैं।

ग़ौरतलब बात यह है कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात का ढोल लगातार पीटते रहते हैं कि पिछले 70 साल में देश में कुछ नहीं हुआ। जबकि उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले 70 साल में भाजपा की ख़ुद की यानी एनडीए की और भाजपा समर्थित जनता दल की भी सरकारें केंद्र में रही हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में तो लम्बे समय तक भाजपा ने शासन किया है। मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखण्ड, हिमाचल, राजस्थान, मणिपुर, महाराष्ट्र और बिहार में भी भाजपा की सरकार रही हैं। गुजरात में तो पिछले दो दशक के क़रीब से भाजपा की ही सरकार रही है। इसके बावजूद केवल प्रचार तंत्र का इस्तेमाल करके सरकार ने मोटा पैसा विज्ञापनों पर ख़र्च किया है, वह भी यह साबित करने में कि यह सरकार अब तक की सरकारों में सबसे अच्छी है। इसके बावजूद लोगों में यह बात बैठी है कि इस सरकार ने उनकी कमर जिस तरह तोड़ी है, उस तरह ब्रिटिश सरकार यानी अंग्रेजी हुकूमत ने भी नहीं तोड़ी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जिन सरकारी सम्पत्तियों और संस्थाओं को वह निजी हाथों में दे रहे हैं, वो सब पहले की सरकारों ने ही बनायी हैं। क्योंकि सन् 1947 में जब हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ था, तो यहाँ खाने भर को अनाज भी पैदा नहीं होता था। लेकिन आज हाल यह है कि ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि भारत पूरी दुनिया का पेट भर सकता है। देश की समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा नेताओं और उनके मित्रों के स्वामित्व वाले टीवी चैनल हिन्दू-मुस्लिम, राष्ट्रवादी-राष्ट्रविरोधी, भारत-पाकिस्तान पर बहस छेडऩे से बाज़ नहीं आ रहे हैं।

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि वह साल 2025 तक हिन्दुस्तान की जीडीपी को पाँच ट्रिलियन डॉलर यानी 5,00,000 करोड़ डॉलर की बना देंगे। फिर तालाबंदी के दौरान यह माना गया कि साल 2025 तक देश की जीडीपी 2,60,000 करोड़ डॉलर पर पहुँच जाएगी। लेकिन आज के हालात देखकर लगता है कि आने वाले समय में देश की जीडीपी और कमज़ोर ही होगी। क्योंकि साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता सँभाली थी, तब हिन्दुस्तान की जीडीपी उच्च स्तर यानी 7-8 फ़ीसदी के आसपास थी। लेकिन साल 2019-20 की चौथी तिमाही के दौरान जीडीपी 3.1 फ़ीसदी पर आ गयी, जिसमें गिरावट जारी है।

रिसर्च के मुताबिक, साल 2021 से अब तक क़रीब 2.5 करोड़ से ज़्यादा लोग नौकरी गँवा चुके हैं। वहीं क़रीब 7.5 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा पर पहुँच चुके हैं। बड़ी बात यह है कि इनमें से क़रीब एक-तिहाई लोग मध्यम वर्ग के पायदान से फिसलकर ग़रीबी रेखा पर पहुँचे हैं। इस पर प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्री जल्द ही अमृतकाल मनाने के सपने दिखा रहे हैं, क्या इस तरह देश कभी अमृतकाल मना सकेगा? मुझे तो लगता है कि आज हिन्दुस्तान में जो कुछ हो रहा है, उससे अच्छे दिन तो दूर बल्कि बुरे दिनों की आहट ज़्यादा सुनायी दे रही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। उपरोक्त उनके अपने विचार हैं।)

संथाल के विकास पर सियासी घमासान

देश के सबसे पिछड़े इलाक़ों में शुमार झारखण्ड का संथाल परगना इलाक़ा है। आदिवासी बहुल यह इलाक़ा हमेशा राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण रहा है। राज्य गठन के बाद अब तक छ: मुख्यमंत्री बने हैं। इनमें से मौज़ूदा मुख्यमंत्री समेत तीन मुख्यमंत्री संथाल ने ही दिये हैं। यह क्षेत्र राज्य के गठन के पहले से लेकर अब तक सियासत का गढ़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों से यह विकास का भी गढ़ बन रहा है। इस पर अब राज्य की नहीं, पूरे देश की भी नज़र पड़ रही है। पिछले एक दशक में संथाल परगना के विकास की जो योजनाएँ बनायी गयीं, एक-एक कर धरातल पर उतर रही हैं। चाहे वो केंद्र सरकार की देन हों या फिर राज्य सरकार की।
विकास ने संथाल परगना के लोगों को नयी पहचान दी है। लेकिन विडम्बना यह है कि झारखण्ड जैसे पिछड़े राज्य में विकास पर भी राजनीति हो रही है। दरअसल संथाल परगना का राजनीतिक परिदृश्य ही कुछ इस तरह का है। सियासत के तीनों प्रमुख खिलाडिय़ों (भाजपा, कांग्रेस और झामुमो) में योजनाओं का श्रेय लेने की होड़ और आपसी खींचतान ने राष्ट्रीय स्तर पर राज्य को हास्य का पात्र भी बनाया। साथ ही विकास योजना को बढ़ाने में कई अवरोध भी आये। अब एक बार फिर संथाल परगना का उदय राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय फलक पर होने वाला है। यहाँ हवाई अड्डा बनकर तैयार है। इस महीने हवाई सेवा शुरू होने वाली है। क्षेत्र की जनता यह उम्मीद तो रखती ही है कि अब कम-से-कम विकास को लेकर सियासत नहीं हो, जिससे विकास की बात दब जाए और सियासत की बात उभरकर सामने आये, देश-दुनिया में झारखण्ड परिहास का पात्र बने।

सौग़ातों पर लगा दाग़
संथाल परगना पर हर दल का फोकस रहा है। भाजपा, कांग्रेस या झामुमो या फिर कोई अन्य दल संथाल परगना क्षेत्र को नकार नहीं सकता है। इस क्षेत्र को झामुमो का गढ़ भी माना जाता है। झामुमो गढ़ बचाने, तो भाजपा उसका किला ढहाने की फ़िराक़ में लगी रहती है। इसके लिए हर तरह के प्रयास होते हैं। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि झारखण्ड की पूर्ववर्ती रघुवर सरकार ने संथाल के विकास की नयी कहानी लिखी। अपने कार्यकाल में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने संथाल परगना का 135 बार दौरा किया, जो राज्य के किसी दूसरे इलाक़े से कई गुणा अधिक था। दूसरी तरफ़ सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी क्षेत्र पर फोकस कर रखा है। यही कारण है, पिछले चंद वर्षों में संथाल परगना क्षेत्र को कई सौग़ातें मिलीं। देवघर में एम्स की स्थापना हुई। ओपीडी शुरू हो गया है। जल्द ही अस्पताल भी पूरी तरह चालू होगा।

आज़ादी के 70 साल बाद गोड्डा क्षेत्र तक रेलवे लाइन पहुँची और गोड्डा से दिल्ली रेल सेवा शुरू हुई। साहिबगंज में बंदरगाह का निर्माण हुआ। इन सब विकास योजनाओं के साथ सियासी घमासान भी हुआ। गोड्डा से रेल सेवा शुरू करने के मौक़े पर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और कांग्रेस विधायक प्रदीप यादव आपस में भिड़ गये। हाथापाई तक की नौबत आयी। एम्स के उद्घाटन के मौक़े पर भी केंद्र और राज्य के बीच खींचतान चर्चा में रही। नतीजा यह हुआ कि विकास योजना में देर हुई और $खुशी पर सियासत भारी पड़ गयी। हुआ यह कि राष्ट्रीय स्तर तक विकास के बढ़ते क़दम की बात कम और सियासत की बात अधिक चर्चा में रही, जो जनता का मन खट्टा कर गयी।
उड़ान की तैयारी संथाल परगना जैसा पिछड़ा क्षेत्र अब आसमाँ में उड़ान भरने की तैयारी में है। बाबा नगरी देवघर से जुलाई महीने में हवाई सेवा शुरू हो रही है। झारखण्ड की रांची के बाद दूसरा देवघर हवाई अड्डा बन कर तैयार है। उम्मीद है कि श्रावणी मेले में देवघर आने वाले शिव भक्त नयी हवाई सेवा का आनंद उठा सकेंगे। देवघर हवाई अड्डा पर 8 जून, 2022 को विमान के टेक ऑफ और लैंडिंग की ट्रायल हुई। इंडिगो की पहली फ्लाइट कोलकाता से उड़ान भरकर देवघर हवाई अड्डा पहुँची। इंडिगो की 180 सीटों वाली 320-ए फ्लाइट ने तीन बार टेक ऑफ और लैंडिंग की। सवा घंटे तक ट्रायल के दौरान दिल्ली, कोलकाता और रांची के कई विमानन अफ़सर मुस्तैद रहे। अफ़सरों ने ई-कैटेगरी समेत 320 फैमिली और 737 बोइंग विमान के सभी कैटेगरी से सम्बन्धित सभी पहलुओं का ट्रायल किया। देवघर एटीसी से एक साथ दिल्ली, मुम्बई और बेंगलूरु को कनेक्ट कर दिया गया। इसके बाद रनवे पर लैंडिंग और टेक ऑफ की हरी झंडी मिल गयी। हवाई अड्डा अथॉरिटी ने हवाई अड्डे को अपने अधीन ले लिया है। एयर ट्रैफिक कंट्रोल, रनवे और ऑपरेशन से जुड़ी सारी तैयारियाँ हो चुकी हैं। बाबा धाम का श्रावणी मेला 14 जुलाई से शुरू हो रहा, जो 12 अगस्त तक चलेगा। उम्मीद है कि इससे पहले हवाई अड्डा का उद्घाटन हो जाएगा। यहाँ 180 यात्री वाली एयरलाइंस का आना शुरू हो जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी करेंगे उद्घाटन
देवघर हवाई अड्डा का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मई, 2018 को ऑनलाइन किया था। इस हवाई अड्डा की लम्बाई 2.5 किलोमीटर है। रनवे की चौड़ाई 45 मीटर है। इसके बाद प्लैंक एरिया है। हवाई अड्डा 653.75 एकड़ में फैला है। टर्मिनल बिल्डिंग 4,000 वर्ग मीटर में फैला है, जहाँ 180 यात्रियों के बैठने की व्यवस्था है। इसके निर्माण पर 401.34 करोड़ रुपये $खर्च किये गये हैं।

टर्मिनल पर बाबा बैद्यनाथ मन्दिर के गुम्बद की आकृति उकेरी गयी है। यहाँ आने वाले यात्रियों को बाबा मन्दिर के स्वरूप का दर्शन हवाई अड्डा पर ही हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देवघर हवाई अड्डे का उद्घाटन 7 जुलाई को करेंगे। हालाँकि इसकी अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की गयी है; लेकिन हर स्तर पर इसकी तैयारियाँ चल रही हैं। हवाई अड्डा पर विमानों का परिचालन शुरू होने के साथ देवघर शहर देश के कई प्रमुख शहरों से सीधे जुड़ जाएगा। यहाँ से दिल्ली, मुम्बई, बेंगलूरु और रांची के लिए विमान सेवा शुरू होगी।

अब न हो कोई विवाद
देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में केंद्र और राज्य का रिश्ता अत्यधिक संवेदनशील होता है। झारखण्ड जैसे छोटे राज्यों के लिए तो और भी जटिलताएँ सामने आती रहती हैं। क्योंकि बड़ी योजनाओं के लिए हमेशा केंद्र का मुँह देखना होता है। केंद्र सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह पूर्वाग्रह और निजी तल्ख़ी को त्याग कर संरक्षक की भूमिका निभाएगी।

वहीं, राज्य सरकार से उम्मीद रहती है कि वह केंद्र सरकार को स्थानीय स्तर पर मदद पहुँचाएगी, जिसमें किसी तरह की राजनीति नहीं हो। इस सामंजस्य को बनाने में क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की भूमिका अहम होती है। झारखण्ड में अन्य विकास कार्यों में विवाद की तरह देवघर हवाई अड्डा निर्माण भी विवाद से अछूता नहीं रहा है। जिस वजह से निर्धारित समय से योजना देर से चल रही। लगभग छ: महीने से सब हो जाने के बाद भी विमान सेवा शुरू नहीं हो पायी। भूमि अधिग्रहण, एप्रोच रोड आदि के निर्माण में विवाद सामने आ चुका है। यहाँ तक कि एप्रोच रोड निर्माण को लेकर न्यायालय का हस्तक्षेप भी हो चुका है।
जनता उम्मीद रखती है कि अब उद्घाटन को लेकर कोई विवाद नहीं हो, जिससे उनकी $खुशी की गूँज राष्ट्रीय स्तर तक जाए। क्योंकि पूर्व में देवघर एम्स और गोड्डा रेल सेवा के उद्घाटन मौक़े पर जो हुआ, वह जगव्यापी है। साथ ही जनता की नज़र संथाल की एक और बड़ी योजना पर है। संथाल के साहिबगंज और बिहार के मनिहारी के बीच गंगा नदी पर पुल बन रहा है। इस पुल के निर्माण से संथाल ही नहीं, पूरे झारखण्ड का परिदृश्य बदल जाएगा। झारखण्ड पूर्वोत्तर से सीधे जुड़ जाएगा। नेपाल की दूरी कम हो जाएगी। असम, बांग्लादेश, बिहार, नेपाल से झारखण्ड की दूरी कम हो जाएगी। व्यापार और रोज़गार के मार्ग खुलेंगे। पुल का निर्माण कार्य पहले से ही तय समय से देर से चल रहा है। अब इसमें देर न हो और योजना धरातल पर उतरे, यह चाहत तो है ही।

हरियाणा स्थानीय निकाय चुनाव

भाजपा-जजपा का परचम, विपक्षी दल हाशिये पर

हरियाणा में 18 नगर परिषद् और 28 नगर पालिका के चुनाव नतीजे भाजपा-जजपा (भाजपा जनता पार्टी और जननायक जनता पार्टी) गठबंधन सरकार को वर्ष 2024 में सत्ता वापसी की बड़ी उम्मीद लग रही है। सरकार के लिए स्थानीय निकाय चुनाव पहली कसौटी थी, जिसमें वह खरी उतरी है। शुरू में भाजपा अपने बूते ही चुनाव लडऩे की इच्छुक थी, जजपा को वह साथ नहीं रखना चाहती थी। गठबंधन को लेकर ग़लत सन्देश न जाए, इस पर मंथन हुआ तो उसे साथ लेना पड़ा। इससे जजपा की साख बची रही, वहीं भाजपा को भी कुछ क्षेत्रों में इसका फ़ायदा मिला।

कांग्रेस ने पार्टी चिह्न पर मैदान में न उतरने का फ़ैसला कर लिया था। इसकी मुख्य वजह यह रही कि एक ही पद के लिए एक से ज़्यादा पार्टी प्रत्याशी ख़म ठोक रहे थे। कुछ स्थानों पर चार से पाँच लोग दावेदारी जता रहे थे। गुटबाज़ी से प्रभावित पार्टी के लिए यह स्थिति ठीक नहीं थी। एक को प्रत्याशी बनाने पर बाक़ी के आज़ाद प्रत्याशी के तौर पर निश्चित ही उतरते। राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग और अजय माकन की हार से कांग्रेस नेता हताशा में थे। जबकि भाजपा और जजपा के लिए अच्छी शुरुआत रही।

सत्ताधारी दलों के लिए चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल था और इसके लिए बाक़ायदा पूरी तैयारी भी की जा रही थी। स्थानीय निकाय चुनाव में प्रदर्शन पर सरकार की प्रतिष्ठा निर्भर कर रही थी। जब कोई पार्टी सीधे तौर पर चुनाव चिह्न पर मैदान में न उतरे, तो समझा जाना चाहिए कि स्थिति ज़्यादा अनुकूल नहीं है। गठबंधन के लिए यह पहला संकेत शुभ रहा। मुक़ाबले में आम आदमी पार्टी और इंडियन नेशनल लोकदल ही रहे। इनमें आम आदमी पार्टी के बारे में अप्रत्याशित नतीजे देखने वालों की संख्या कम नहीं थी। ठीक चंडीगढ़ नगर निगम और पंजाब विधानसभा चुनाव की तरह यहाँ भी वैसा ही प्रदर्शन करने की अटकलें लगायी जा रही थीं। आम आदमी पार्टी ने इसकी तैयारी भी की थी; लेकिन नतीजे आशा के बिलकुल विपरीत आये। इनेलो (इंडियन नेशनल लोकदल) ने अपने गढ़ डबवाली में ही साख को बचाये रखा।

जजपा के गठन के बाद इनेलो का जनाधार घट रहा है। एक हलक़े तक सिमट जाने वाली पार्टी को विघानसभा चुनाव में श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए नतीजों से सबक़ सीखना होगा। आम आदमी पार्टी को भी हरियाणा में पंजाब की तरह बदलाव आने के सपने से बाहर आना होगा। अच्छी जीत के बाद भाजपा को भरोसा हो गया है कि उसका जनाधार कम नहीं, बल्कि बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जीत को विकास कार्यों का नतीजा और पार्टी का बढ़ता आधार बता रहे हैं। चुनाव में 815 वार्ड सदस्य आज़ाद प्रत्याशी के तौर पर विजयी हुए हैं। इन्हें मत (वोट) सरकार के किये कार्यों की वजह से नहीं, बल्कि अपनी वजह से मिले हैं। एक बहुत बड़ा मत प्रतिशत किसी पार्टी के हिस्से में नहीं आया।

स्थानीय निकाय या पंचायत चुनाव में मतदाता पार्टी विशेष से ज़्यादा व्यक्ति विशेष को महत्त्व देता है। यह वजह रही कि चुनाव में वार्ड सदस्य के चुनाव में आज़ाद प्रत्याशियों का बोलबाला रहा। इससे परिषद् और पालिका के प्रमुख से गठबंधन दलों को किसी ख़ुशफ़हमी में नहीं रहना चाहिए। भाजपा अपने को संगठनात्मक तौर पर अन्य दलों से अलग मानती है; लेकिन वार्ड सदस्य के चुनाव में उसे भी ज़्यादा सफलता नहीं मिली। उसकी संख्या 60 तक पहुँची, जबकि अन्य दल दहाई के आँकड़े को भी नहीं छू सके।

कांग्रेस इन स्थानीय निकाय चुनाव में सीधे तौर पर नहीं थी, जिसका फ़ायदा गठबंधन प्रत्याशियों को मिला। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी की उम्मीद सबसे ज़्यादा टूटी। चंडीगढ़ नगर निगम और बाद में पंजाब के विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित नतीजों से आम आदमी पार्टी को इस चुनाव में वैसा ही प्रदर्शन की उम्मीद थी, पर मात्र एक नगर पालिका इस्माइलाबाद हिस्से में आयी। इनेलो भी डबवाली नगर परिषद् पर क़ब्ज़ा जमा सकी। बाज़ी कुल मिलाकर गठबंधन के हाथ में ही रही। इस बार नगर परिषद् और पालिका में अध्यक्ष पदों पर सीधा मुक़ाबला हुआ। इससे पहले पार्षदों या वार्ड सदस्यों में से कोई अध्यक्ष बनता था। पंचायत चुनाव से ग्रामीण मतदाता के रुख़ का, जबकि नगर निगम, परिषद् और पालिका चुनाव से शहरी मतदाता के रुख़ का पता चलता है। चूँकि राज्य में अभी पंचायत चुनाव लम्बित हैं। ग्रामीण मतदाताओं के रुख़ के बारे में अभी से कहना मुश्किल है। लेकिन शहरी मतदाताओं ने अपना रुख़ कुछ स्पष्ट कर दिया है। 18 नगर परिषद्, 28 नगर पालिका (कुल 46) में से गठबंधन ने 25 पर जीत दर्ज की। इसमें भाजपा को 22, जबकि जजपा को तीन, जबकि एक-एक पर आम आदमी पार्टी और इनेलो का क़ब्ज़ा रहा। बाक़ी पर निर्दलीय क़ाबिज़ रहे, जिनमें से ज़्यादातर कांग्रेस समर्थित माने जा रहे हैं।

चूँकि कांग्रेस ने चुनाव से पहले ही पार्टी चिह्न पर मैदान में न उतरने का फ़ैसला कर लिया था। राज्यसभा चुनाव में अजय माकन की हार बड़ा झटका था ही, पार्टी में गुटबाज़ी से भी स्थानीय निकाय चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी। हो सकता है कि इसीलिए पार्टी ने चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं किया हो। उधर भाजपा, जजपा, इनेलो और आम आदमी पार्टी अपने-अपने चिह्नों पर मैदान में थीं। पिछले विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस तब इतनी कमज़ोर नहीं हुई थी, इसके बावजूद उसने चुनाव में दिलचस्पी नहीं दिखायी। शायद इसी वजह से कांग्रेस के मौज़ूदा 14 विधायकों के हलक़ों में पार्टी समर्थित प्रत्याशी हारे हैं। गठबंधन सरकार आधी से ज़्यादा जीत को अपनी उपलब्धि मान रही है।

यही हाल कमोबेश मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के करनाल और उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के उचाना हलक़ों का रहा, जहाँ मतदाताओं ने विरोधी रुख़ अपनाया। वार्ड सदस्य के तौर पर जीतने वाले 815 निर्दलीय रहे, पार्टी चिह्नों पर जीतकर आने वालों की संख्या तो 100 के आँकड़े तक नहीं पहुँच सकी। दरअसल गठबंधन सरकार का पूरा जोर परिषद् और पालिका के अध्यक्ष पद पर केंद्रित रहा, जिसके लिए भरपूर प्रचार भी किया गया। सरकारी तंत्र का भी ख़ूब इस्तेमाल किया गया। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने चुनाव में ज़्यादा रुचि नहीं दिखायी। पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपरोक्ष तौर पर इससे कमोबेश दूरी ही बनाये रखी। यही वजह रही कि रोहतक क्षेत्र में पार्टी समर्थित प्रत्याशी सफलता प्राप्त नहीं कर सके। उनके बेटे सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने ज़रूर अपने समर्थक प्रत्याशियों के लिए प्रचार किया; लेकिन ज़्यादा कारगर साबित नहीं हो सके। महम में भाजपा समर्थित जीता, जबकि बहादुरगढ़, झज्जर और गोहाना में भाजपा-जजपा गठबंधन ने जीत दर्ज की।

विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव बहुत कुछ संकेत कर देते हैं। फ़िलहाल राज्य में विधानसभा चुनाव में अभी काफ़ी समय है। तब तक स्थितियाँ बहुत कुछ बदल चुकी होंगी। ऐसे में भाजपा-जजपा को किसी ख़ुशफ़हमी में और कांग्रेस को निराश होने की ज़रूरत नहीं है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद हरियाणा में पार्टी की सक्रियता बहुत तेज़ी से बढ़ी थी। यहाँ भी बदलाव की बातें होने लगी थीं। अब इस पार्टी को राज्य में पैर जमाने के लिए नये सिरे से विचार करना होगा।


“स्थानीय निकाय चुनाव में जीत सरकार की उपलब्धि है। लोगों ने गुड गवर्नेस और विकास कार्यों को तरजीह दी। भाजपा-जजपा गठबंधन वर्ष 2024 के विस चुनाव में जीत दर्ज करेगा। कांग्रेस ने तो पार्टी चिह्न पर चुनाव में उतरने की हिम्मत नहीं दिखायी। आम आदमी पार्टी का राज्य में कोई जनाधार नहीं है; यह नतीजों से स्पष्ट हो गया है। आधे से ज़्यादा अध्यक्ष भाजपा और जजपा के चुनाव चिह्न पर जीतकर आये हैं। वार्ड सदस्यों में भी भाजपा समर्थितों की संख्या काफ़ी है। केंद्र सरकार की अग्निपथ पर विरोध-प्रदर्शन का यहाँ कोई असर नहीं रहा। गठबंधन सरकार के पास अग्निवीरों के लिए बहुत-सी योजनाएँ हैं।”
मनोहर लाल खट्टर
मुख्यमंत्री, हरियाणा


“नतीजे भाजपा-जजपा की आशा के विपरीत हैं। 70 फ़ीसदी से ज़्यादा सीटों पर गठबंधन प्रत्याशी जीतते, तो इसे जीत माना जा सकता था। यह आधी-अधूरी जीत है। चुनाव नतीजे से कांग्रेस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। राज्यसभा चुनाव की वजह से पार्टी इसकी तैयारी नहीं कर सकी। जहाँ-जहाँ ज़रूरत हुई पार्टी नेताओं ने प्रचार किया और सफलता हासिल की।”
उदयभान
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, हरियाणा


“पार्टी राज्य में पाँव जमा रही है। स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी को 15 से 20 फ़ीसदी मत (वोट) मिले हैं। स्पष्ट है कि आधार बढ़ रहा है। राज्य में भी पंजाब की तरह सत्ता बदलाव होगा और यह करिश्मा आम आदमी पार्टी ही करेगी। चुनाव में समय ज़्यादा मिलता, तो प्रदर्शन शायद इससे बहुत ज़्यादा बेहतर होता।”
सुशील गुप्ता
सांसद, हरियाणा प्रभारी, आम आदमी पार्टी

काबुल में गुरुद्वारे पर हमला निंदनीय

काबुल में गुरुद्वारे पर हमला अमानवीय और निंदनीय है। इससे भारत के ही नहीं, दुनिया भर के सिखों में रोष है। सिखों का कहना है कि वे सभी धर्म का सम्मान करते हैं। लेकिन कई देशों में अक्सर सिखों के साथ अमानवीय रवैया अपनाया जाता है। ऐसे में भारत सरकार को सिखों की सुरक्षा को लेकर कड़े व साहसिक क़दम उठाने चाहिए। ताकि किसी भी देश में सिख धर्म ही नहीं, अन्य धर्म के लोगों के साथ भी कोई अप्रिय घटना न घट सके। दिल्ली के सिखों ने ‘तहलका’ संवाददाता से कहा कि काबुल में जो हुआ, वह बर्दाश्त करने लायक नहीं है।

दिल्ली सिख नेता सरदार जत्थेदार दर्शन सिंह का कहना है कि काबुल के कार्ते परवान गुरुद्वारे पर हुए हमले से अफ़ग़ान सहित दुनिया भर के सिखों को हिलाकर रख दिया है। उन्होंने कहा कि कितना दु:खद है, जिस अफ़ग़ान में लाखों सिख रहा करते थे, वहाँ अब बमुश्किल से 200 से कम ही परिवार बचे हैं। उन्होंने कहा कि इस हमले की गम्भीरता को देखते हुए भारत सरकार ने इन्हीं में से 111 सिखों को ई-वीजा दे दिया है। जत्थेदार दर्शन सिंह का कहना है कि इस हमले की मुख्य वजह यह है कि भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा व नवीन जिंदल ने पैगम्बर सम्बन्धी बयान दिया था। इससे वहाँ के अराजक तत्त्वों ने यह मान लिया कि कुछ लोग भाजपा के समर्थक हैं। इसलिए उन्होंने गुरुद्वारे पर हमला कर दिया। लेकिन हमला निन्दनीय है। वहाँ की सरकार को इस मामले में कड़े क़दम उठाने की ज़रूरत है। इस हमले में मृतकों के परिजनों को तालिबान सरकार ने एक-एक लाख रुपये और गुरुद्वारे के पुनरुद्धार के लिए डेढ़ लाख रुपये दिये हैं।

शिरोमणि अकाली दल दिल्ली स्टेट के सदस्य गुरुदीप सिंह जस्सा का कहना है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है। गुरुद्वारे पर जिस आतंकवादी, जिस संगठन ने हमला किया, उसके ख़िलाफ़ वहाँ की सरकार कड़ी कार्रवाई करे, ताकि भविष्य में कोई इस तरह की हरकत न कर सके। उन्होंने भारत सरकार से अपील की है कि इस मामले को गम्भीरता से ले और वहाँ पर सिखों की सुरक्षा के लिए क़दम उठाये। उनका कहना है कि भारत सरकार ने भी तालिबान शासन के दौरान अफ़ग़ानिस्तान की जनता की मदद के लिए हज़ारों टन गेहूँ और दवाइयाँ काबुल भिजवायी थीं।

सरदार इंद्रजीत सिंह कहते हैं कि अजीब विडम्बना है कि भारत सरकार सबकी मदद करने के लिए सबसे आगे आती है। लेकिन जब किसी देश में सिखों पर हमला होता है, तो कार्रवाई की जगह वहाँ की सरकार से सुरक्षा की अपील करती है। जबकि भारत सरकार को वहाँ की सरकार को तुरन्त कार्रवाई करने के साथ वहाँ पर रह रहे सिखों की सुरक्षा के लिए साहसी क़दम उठाने चाहिए।

बताते चलें कि भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा और नवीन जिंदल द्वारा पैगम्बर सम्बन्धी बयान के बाद देश के साथ-साथ पूरी दुनिया के मुस्लिम संगठनों द्वारा जो विरोध किया गया है, उसका नतीजा काबुल में गुरुद्वारे पर हमले के रूप में निकला है। दिल्ली के सिखों का कहना है कि दुनिया में किसी भी धर्म से जुड़े लोगों पर जब भी मानवीय संकट आता है, तो सबसे पहले सिख धर्म के लोग ही मदद के लिए आगे आते हैं। लेकिन कुछ अराजक तत्त्व ऐसे होते हैं, जिनका काम ही आतंक फैलाना है।

सिख नेता परमजीत सिंह सोढी का कहना है कि तालिबान सरकार ने जो मदद की है, उससे यह स्पष्ट है कि भारत के प्रति तालिबान शासन के मन में कितनी सद्भावना है। हमलावर भारत और तालिबान के बीच सम्बन्धों के सौहार्दपूर्ण रिश्तों से घबरा गये हैं, इसलिए उन्होंने अमानवीय कृत्य को अंजाम दिया है।
ग़ौरतलब है कि जिस तालिबान को अत्यंत कट्टरपंथी माना जाता है, वहीं की पुलिस गुरुद्वारे की सुरक्षा में लगी है। इस हमले में एक सिख के अलावा एक तालिबान सिपाही मारा गया और सात घायल हुए थे।

सरदार कुलजीत सिंह ने कहा कि इसके पहले जलालाबाद और हरराय साहिब गुरुदारे पर हुए हमलों में दर्ज़नों लोग मारे गये थे। लेकिन इस पर से परदा उठना चाहिए कि इस तरह के हमले के पीछे कौन है? उनकी मंशा क्या है? अन्यथा इस तरह की घटनाएँ देर-सबेर होती रहेंगी, जो ठीक नहीं है।

सोच-समझकर पीएँ बोतलबंद पानी

बाज़ारवाद के इस दौर में लालची व्यापारियों द्वारा ग्राहकों की विश्वसनीयता को छला जा रहा है। उपभोक्ताओं इसलिए छले जाते हैं, क्योंकि वो ब्रांड पर भरोसा करते हैं। आजकल महँगी और ब्रांडेड चीज़ें लेने, खाने का फैशन है। बोतलबंद पानी के मामले में भी यही है। सफ़र में बोतलबंद पानी पीने का चलन बहुत है। यह लोगों की मजबूरी भी हो सकती है; लेकिन ज़्यादातर लोग बोतलबंद पानी पीने में अपनी शान समझते हैं। लेकिन ऐसे लोगों के शायद पता नहीं है कि पीने का क़ुदरती पानी ही सबसे अच्छा होता है।

भले ही बोतलबंद पानी आज बहुत ज़्यादा चलन में है; लेकिन डॉक्टरों ने इस पानी को कभी उतना अच्छा और फ़ायदेमंद नहीं माना, जितना कि हमारे शरीर को ज़रूरत होती है। दूसरा यह पानी प्लास्टिक की जिन बोतलों में पैक होकर आता है, उन बोतलों पर ही एक बार इस्तेमाल के बाद बोतलों को नष्ट करने का सन्देश लिखा होता है। इतना ही नहीं, पानी की बोतल पर एक्सपायरी डेट भी लिखी होती है। लेकिन उपभोक्ता इस डेट पर ध्यान नहीं देते और पानी की बोतल ख़रीदते ही गटागट पीने लगते हैं। बता दें कि पानी में अगर कुछ पड़ा न हो, तो वह कभी ख़राब नहीं होता। लेकिन जिस बोतल में पानी पैक होता है, वो बोतल बहुत दिन तक चलने लायक नहीं होती। ऐसे में अगर उस बोतल में ज़्यादा दिन तक पानी भरा रहता है, तो वो दूषित हो जाता है। अफ़सोस की बात है क इन बातों पर बहुत से लोग ध्यान नहीं देते और लम्बे समय से रखा हुआ बोतलबंद पानी तो पी ही लेते हैं, साथ ही पानी की प्लास्टिक की इन ख़तरनाक बोतलों का भी बार-बार इस्तेमाल करते रहते हैं। यह तो हुई सामान्य जानकारी की बात। लेकिन अगर कोई यह कहे कि ब्रांडेड पानी की बोतलों में शीलबंद पानी ही पीने के लायक नहीं है, तो क्या आप नहीं चौंकेंगे? लेकिन यह सच है।

जाँच में फेल निकला बोतलबंद पानी
हाल ही में एक चौंकाने वाली ऐसी ही ख़बर राजस्थान से सामने आयी है। वहाँ पर दो बड़ी और ब्रांडेड कम्पनियों ब्रिबेरी और अक्वो के पानी की 55,000 लीटर से ज़्यादा बोतलबंद पानी को सीज़ किया गया है। साथ ही अग्रिम आदेशों तक इन कम्पनियों के पानी की बिक्री पर रोक लगा दी है। यह कार्रवाई राजस्थान के खाद्य सुरक्षा कमिश्नर सुनील शर्मा के निर्देश पर प्रदेश में शुद्ध पेयजल के लिए चलाये जा रहे अभियान के तहत अजमेर में की गयी। सूत्रों की मानें, तो ब्रिबेरी की 24,000 लीटर पानी की की बोतलें व अक्वो की 32,000 बोतलों को सीज़ किया गया है। दरअसल कुछ दिन पहले जाँच के लिए इन दोनों ब्रांड के बोतलबंद पानी के सैंपल लिये गये थे। जाँच में पाया गया कि इनके बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के टुकड़े मौज़ूद हैं। इसके बाद इन कम्पनियों का बोतलबंद पानी सीज किया गया।

क्या कहते हैं डॉक्टर?
जनरल फिजिशियन डॉक्टर मनीष कहते हैं कि पानी अगर पीने योग्य न हो, तो उससे दर्ज़नों बीमारियाँ पैदा होती हैं। इन बीमारियों में नज़ला, सर्दी-जुकाम, खाँसी, पेट के रोग, ब्लड के रोग, बाल झडऩे की समस्या या पूरी तरह गंजापन, चर्म रोग आदि होते हैं। इन सबमें सबसे गम्भीर बीमारियाँ- डायरिया, हैजा, उलटी, दस्त, मलेरिया, फाइलेरिया आदि हैं। इसलिए पानी हमेशा शुद्ध ही पीना चाहिए।

जच्चा-बच्चा विशेषज्ञ डॉक्टर परेश कहते हैं गंदा और दूषित पानी बच्चों पर बहुत जल्दी दुष्प्रभाव डालता है। बच्चे बहुत नाज़ुक और सिंसेटिव होते हैं। इसलिए बच्चों को जब भी पानी पिलाएँ, तो सोच-समझकर ही पिलाएँ। वहीं गर्भवती माँओं को भी पानी गरम करके छानकर फिर नॉर्मल करके पीना चाहिए। क्योंकि गंदा और दूषित पानी पीने से न सिर्फ़ उन्हें, बल्कि उनके गर्भ में पल रहे शिशु को भी जन्म से पहले ही कई रोग लग सकते हैं, जिनका इलाज फिर बहुत मुश्किल होता है।

बिना विकल्प के प्लास्टिक पर प्रतिबंध!

सार्वजनिक स्थलों पर, बाज़ारों में खाने-पीने की दुकानों के अन्दर या बाहर रखे कूड़ेदानों में सबसे अधिक कचरा अक्सर जो दिखायी देता है, उसमें चिप्स के रैपर, प्लास्टिक के स्ट्रा, कप, गिलास, तश्तरी आदि होते हैं। लेकिन अब 01 जुलाई से इनके इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग चुका है। दरअसल 01 जुलाई से देश भर में एकल उपयोग प्लास्टिक से बनी 19 वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा है। इन 19 वस्तुओं की सूची में स्ट्रा (पाइप), कॉफी बैग, सोडा और पानी की बोतलें, ईयरबड्स, बोतलों के प्लास्टिक के ढक्कन, खाद्य पदार्थों के रैपर, ग़ुब्बारों, झण्डों, कैंडी, आइसक्रीम में लगने वाली प्लास्टिक स्टिक, थर्माकोल से बनी प्लेट, कप, गिलास, प्लास्टिक के चम्मच, कांटा, चाकू के अलावा मिठाई के डिब्बों, नियंत्रण पखें और सिगरेट के पैकेट की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली फ़िल्म व 100 माइक्रोन से कम के प्लास्टिक बैग व पीवीसी बैनर भी शामिल हैं।

एकल उपयोग प्लास्टिक उसे कहते हैं, जिन प्लास्टिक उत्पादों को एक समय के इस्तेमाल के लिए डिजाइन व बनाया जाता है और फिर उसे फेंक दिया जाता है। ये डिस्पोजेबल आइटम भी कहलाते हैं। इनका इस्तेमाल करना आसान है। लेकिन इस्तेमाल करने वालों को यह भी पता होना चाहिए कि ऐसा प्लास्टिक पर्यावरण व इंसान दोनों के लिए हानिकारक है। इससे हानिकारक गैसें पैदा होती हैं, जिनके अपघटित होने यानी क्षरण में सैंकड़ों साल लगते हैं और मिट्टी को नुक़सान पहुँचता है। इस नुक़सान के दायरे में पर्यावरण, जानवरों, इंसानों, हरियाली, जीवों सहित पूरी धरा आ जाती है। क्या हम ऐसी ज़िन्दगी चाहते हैं? क्या हम ऐसी धरा चाहते हैं? बिलकुल नहीं। लेकिन इसके बावजूद हमने हालात ऐसे बना दिये हैं। बाज़ार की व्यवस्था ने हमारे खान-पान के तरीक़े इस क़दर बदल दिये कि वे हमारी ज़िन्दगी, पर्यावरण के लिए ख़तरा बन गये हैं। यही वजह है कि सरकारें इनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने को विवश हो गयी हैं।
ग़ौरतलब है कि प्लास्टिक ने सस्ती और सुविधाजनक व क़िफ़ायती होने के कारण पैकेजिंग उद्योग से अन्य सभी वस्तुओं का स्थान ले लिया। लेकिन इसके साथ एक गम्भीर चुनौती यह भी है कि प्लास्टिक धीरे-धीरे विघटित होता है, जिसमें सदियाँ लग सकती हैं। और विघटन की प्रक्रिया में यह धीरे-धीरे ज़हरीले रसायन निकलते हैं, जो हमारे भोजन, पानी में प्रवेश कर जाते हैं। इससे जलीय जीवों के लिए भी ख़तरा है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्लास्टिक कचरे का देश में प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ा योगदान है।

आँकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल उत्पादित 9.46 मिलियन टन प्लास्टिक कचरे में 43 फ़ीसदी एकल उपयोग प्लास्टिक है। पर्यावरण, वन और जलवायु मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के प्लास्टिक की वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाने के पीछे वजह उनके संग्रह में आने वाली दिक़्क़तें हैं व उसके चलते रीसाइकिलिंग में दिक़्क़तें आती हैं। इन वस्तुओं का चयन इसलिए किया गया, क्योंकि ये बहुत छोटी हैं। इसलिए इन्हें इकट्ठा करना कठिन काम है और ये चीज़ें सीधे वातावरण में ही फेंक दी जाती हैं। बड़ी चीज़ों की तरह इन्हें रीसाइकिलिंग के लिए इकट्ठा करना आसान नहीं है।

प्लास्टिक को लेकर सन् 2019 में टॉक्सिक लिंक का एक अध्ययन आया था, जिससे पता चला था कि देश की राजधानी दिल्ली में इस्तेमाल होने वाला ज़्यादातर एकल उपयोग प्लास्टिक कचरा रीसाइक्लिंग प्लांट की जगह अन्य जगहों पर पहुँचने वाले कचरे में जा रहा है। कई प्लास्टिक ऐसे हें, जिन्हें कोई लेने को तैयार ही नहीं हैं। इनमें खाने के सामानों के पैकेट, बिस्कुट और चिप्स के मल्टी लेयर पैकेट आदि शामिल हैं। विश्व में एकल उपयोग प्लास्टिक कचरे के सन्दर्भ में चीन व अमेरिका के बाद भारत तीसरे नंबर पर आता है। भारत एक ज़िम्मेदार राष्ट्र होने के नाते प्लास्टिक प्रदूषण को ख़त्म करने के लिए प्रयासरत है।

भारत ने 2016 में एकल उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध को लेकर अपना पहला नियम लागू किया था। प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 में नवीनतम संशोधन 11 मार्च, 2021 में किया गया था, जिसे प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम-2021 कहा जाता है। दरअसल केंद्र सरकार ने एकल उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए अगस्त, 2021 में एक अधिसूचना जारी की थी। इसमें एकल उपयोग प्लास्टिक की 19 चीज़ों पर पाबंदी लगाने को कहा गया था। उसके बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सभी सम्बन्धित पक्षों को एक नोटिस जारी करते हुए उन्हें 30 जून तक एकल उपयोग प्लास्टिक पर पाबंदी के लिए सारी तैयारी पूरी करने को कहा था। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सभी सम्बन्धित पक्षों को 30 जून तक अपना स्टॉक इस्तेमाल करने के निर्देश दिये थे, ताकि वे 01 जुलाई से उनके विकल्पों का इस्तेमाल करना शुरू कर दें। विकल्पों में काग़ज़, बांस, मिट्टी आदि से बनी वस्तुएँ हैं। एकल उपयोग प्लास्टिक से बनी वस्तुओं को बनाने वालों से लेकर इस्तेमाल करने वाली कम्पनियों की राय में विकल्प का इस्तेमाल करना महँगा पड़ेगा। इससे क़ीमतें बढ़ेगी और भारतीय उपभोक्ता जो पहले से ही महँगाई की मार सह रहा है, उसके लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। यह सही है कि सस्ती होने की वजह से प्लास्टिक अधिक प्रचलन आयी और उसने काग़ज़ों, बांस व मिट्टी से बनने वाली वस्तुओं को बाज़ार से ही बाहर कर दिया। इधर ईको फ्रेंडली चीज़ें की लागत बढ़ गयी और सरकार की ओर से भी उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयास अधिक कारगर नतीजें नहीं ला सके।

अब सरकारों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है कि वे इनके बदले पर्यावरणीय मैत्री विकल्प क़िफ़ायती क़ीमतों में कम्पनियों को मुहैया कराएँ। इस सन्दर्भ में यहाँ ज़िक्र करना ज़रूरी है कि 01 जुलाई से प्रतिबंध वाले आदेश से बेवरेज कम्पनियाँ विशेषतौर पर चिन्तित हैं। जूस व डेयरी प्रोडक्ट्स के छोटे पैक्स के साथ प्लास्टिक का स्ट्रा होता है। अब 01 जुलाई से प्लास्टिक का यह स्ट्रा नहीं मिल रहा है। ऐसा उत्पाद बनाने वाली व बेचने वाली अधिकतर कम्पनियों ने इसके वैकल्पिक स्रोत ग्राहकों को मुहैया कराने की अभी तक व्यवस्था नहीं की है। इन कम्पनियों ने अब प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें इस सन्दर्भ में छूट देने की गुहार लगायी है। अपने लिए और अधिक वक़्त माँगा है।

देश में पाँच रुपये से लेकर 30 रुपये तक की क़ीमत वाले डेयरी प्रोडक्ट्स बहुत-ही लोकप्रिय हैं। इधर कन्फेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) की राय में अभी एकल उपयोग प्लास्टिक बन्द होने पर पर्याप्त विकल्प उपलब्ध नहीं है। इस संस्था का यह मानना है कि जिस तरह से सरकार ने 01 जुलाई से इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध का ऐलान किया, उस अनुपात में बाज़ार में उनके विकल्प मुहैया नहीं कराये गये। ऐसे में अगर सरकार पूर्ण रूप से एकल उपयोग प्लास्टिक पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाती है, तो इससे व्यापार और उद्योग को भारी नुक़सान होगा। व्यापारिक संगठनों की ओर से सुनायी पडऩे वाली ये आवाज़ें फ़िलहाल सरकार की आधी-अधूरी तैयारी पर सवाल करती नज़र आती हैं। बहरहाल उपभोक्ताओं को प्लास्टिक की इन प्रतिबंधित वस्तुओं के विकल्प का इंतज़ार है। क्योंकि सरकार ने एकल उपयोग प्लास्टिक की जिन 19 वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है, उनके विकल्प अभी बाज़ार में उतने बड़े स्तर पर नहीं हैं?

बहरहाल सरकार यही कह रही है कि उल्लंघन करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होगी। नियमों का पालन कराने की ज़िम्मेदारी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दोनों की होगी। प्रतिबंध का उल्लंघन करने सम्बन्धित निगरानी दोनों बोर्ड करेंगे। प्रतिबंध का उल्लंघन करने वालों को वातावरण संरक्षण अधिनियम-1986 के तहत पाँच साल की सज़ा या एक लाख रुपये तक की ज़ुर्माना या दोनों हो सकते हैं। वैसे इससे पहले भी कई राज्यों ने एकल उपयोग प्लास्टिक की कई चीज़ों पर प्रतिबंध लगाया है। इसमें हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, उत्तराखण्ड शामिल हैं। यहाँ शत्-प्रतिशत सफलता तो नहीं मिली; लेकिन प्रयास जारी है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा समूचे देश में 01 जुलाई से एकल उपयोग प्लास्टिक के 19 आइटम्स पर प्रतिबंध लगाने के ऐलान से यह सन्देश भी राज्यों में गया है कि अब ढील नहीं दी जा सकती। क्योंकि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड को रिपोर्ट करना है। उसकी जबावदेही बढ़ गयी है। विकल्पों के अभाव को दूर करने के साथ-साथ राज्य सरकारों को इसके प्रति जागरूकता अभियान भी युद्ध स्तर पर शुरू करने होंगे। अमल करने वाली संस्थाओं पर भी इसकी सफलता बहुत हद तक निर्भर करेगी।

भारतीयों का ख़बरों पर बढ़ा भरोसा

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म की हाल में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोग कोरोना वायरस महामारी, रूस के यूक्रेन पर आक्रमण और जीवन-यापन के संकट जैसी महत्त्वपूर्ण ख़बरों को देखने से चुनिंदा रूप से बच रहे हैं। भारत उन सात देशों में एक है, जहाँ समाचारों में लोगों का विश्वास बढ़ा है। यह तीन फ़ीसदी बढ़कर 41 फ़ीसदी हो गया है। फिनलैंड समाचार विश्वास के इस पैमाने पर 69 फ़ीसदी के साथ उच्चतम स्तर वाला देश है, जबकि अमेरिका में समाचार की विश्वसनीयता तीन फ़ीसदी और गिरकर सर्वेक्षण में सबसे कम 2.6 फ़ीसदी है।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि समाचारों पर विश्वास आज भी कोरोना महामारी से पहले की तुलना में अधिक है। हालाँकि 2015 की तुलना में यह कम है। ये निष्कर्ष रॉयटर्स इंस्टीट्यूट डिजिटल न्यूज रिपोर्ट 2022 में निहित हैं, जिसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म के राजनीति और अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। विभिन्न देशों में समाचारों का उपभोग कैसे किया जा रहा है, इसके ज़रिये इसे समझने में मदद मिलती है। यह रिसर्च यूगोव (ङ्घशह्वत्रश1) की तर$फ से जनवरी के आख़िर और फरवरी, 2022 की शुरुआत में एक ऑनलाइन प्रश्नावली का उपयोग करके शोध के ज़रिये की गयी।
भारत में सबसे अधिक उपयोग किये जाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में 53 फ़ीसदी उत्तरदाताओं का कहना है कि वे यूट्यूब का उपयोग करते हैं और 51 फ़ीसदी समाचार जानने के लिए व्हाट्स ऐप का उपयोग करते हैं। सर्वेक्षण में 12 प्रमुख देशों को शामिल करने वाले विश्लेषण में फेसबुक (30 फ़ीसदी) के लिए सबसे लोकप्रिय सोशल नेटवर्क बना हुआ है।

इसके बाद यूट्यूब (19 फ़ीसदी) और व्हाट्स ऐप (15 फ़ीसदी) हैं। समाचारों तक पहुँचने के माध्यम के रूप में फेसबुक की लोकप्रियता में 2016 के बाद से 12 फ़ीसदी की गिरावट आयी है। अपेक्षाकृत युवा आबादी वाला भारत भी एक मज़बूत मोबाइल केंद्रित बाज़ार है, जहाँ स्मार्टफोन के माध्यम से 72 फ़ीसदी समाचार और कम्प्यूटर के माध्यम से केवल 35 फ़ीसदी तक पहुँच है। न्यूज एग्रीगेटर प्लेटफार्म और ऐप जैसे गूगल न्यूज (53 फ़ीसदी), डेली हंट (25 फ़ीसदी), इनशॉट्र्स (19 फ़ीसदी), और न्यूज प्वाइंट (17 फ़ीसदी) समाचारों तक पहुँचने के महत्त्वपूर्ण ज़रिये बन गये हैं और सुविधा के मामले में आगे हैं।

रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि भारत में सर्वेक्षण का जवाब देने वालों में से 84 फ़ीसदी ने सोशल मीडिया सहित ऑनलाइन समाचारों का उपयोग किया, जो दो फ़ीसदी की वृद्धि है, जबकि 63 फ़ीसदी ने सोशल नेटवर्क पर, 59 फ़ीसदी टेलीविजन पर और 49 फ़ीसदी प्रिंट से समाचार जाने।

डीडी न्यूज और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सार्वजनिक प्रसारकों के साथ सबसे भरोसेमंद टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनॉमिक टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे प्रिंट ब्रांडों के साथ समाचार स्कोर में कुल भरोसा तीन फ़ीसदी बढ़कर 41 फ़ीसदी हो गया।

यह सर्वेक्षण एशिया में 11, दक्षिण अमेरिका में पाँच, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका में तीन और यूरोप में 24 सहित कुल 46 देशों में किया गया, जो दुनिया की आधी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक देश में 2,000 से अधिक उत्तरदाता थे, जबकि सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोग नियमित रूप से समाचार का उपभोग करते हैं। इनमें से 38 फ़ीसदी ने कहा कि वे अक्सर या कभी-कभी समाचार देखने-पढऩे से बचते हैं, जो साल 2017 के 29 फ़ीसदी से ज़्यादा है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म ने अपनी वार्षिक डिजिटल समाचार रिपोर्ट में कहा कि लगभग 36 फ़ीसदी, विशेष रूप से 35 वर्ष से कम आयु के; लोगों का कहना है कि समाचार उनके मूड को कमज़ोर (ख़राब) करता है।

ख़बरों पर भरोसा भी कम हो रहा है। बड़ी संख्या में लोग मीडिया को अनुचित राजनीतिक प्रभाव के अधीन देखते हैं और केवल एक छोटे से वर्ग का मानना है कि अधिकांश समाचार संगठन अपने स्वयं के व्यावसायिक हित के मुक़ाबले समाज के हिट को आगे रखते हैं। रिपोर्ट में रॉयटर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक रासमस क्लेस नीलसन लिखते हैं कि 46 बाज़ारों में किये गये 93,432 लोगों के ऑनलाइन सर्वेक्षण के आधार पर यह तथ्य सामने आया है।

रिपोर्ट में पाया गया कि युवा दर्शक टिकटॉक जैसे प्लेटफार्मों के माध्यम से समाचारों तक तेज़ी से पहुँच रहे हैं। हालाँकि समाचार ब्रांडों से उनका सम्बन्ध कमज़ोर है। हर हफ़्ते 18 से 24 साल के 78 फ़ीसदी बच्चे एग्रीगेटर्स, सर्च इंजन और सोशल मीडिया के ज़रिये ख़बरें जानते हैं। उस आयु वर्ग के 40 फ़ीसदी लोग हर हफ़्ते टिकटॉक का उपयोग करते हैं, जिसमें 15 फ़ीसदी कहते हैं कि वे इसका उपयोग समाचार खोजने, चर्चा करने या साझा करने के लिए करते हैं।

ऑनलाइन समाचारों के लिए भुगतान करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि का स्तर कम हो सकता है, क्योंकि डिजिटल सदस्यता का एक बड़ा हिस्सा कुछ राष्ट्रीय ब्रांडों के लिए जा रहा है। 20 देशों, जहाँ समाचार के लिए भुगतान व्यापक है; में सर्वेक्षण के उत्तरदाताओं में से 17 फ़ीसदी ने ऑनलाइन समाचार के लिए भुगतान किया, जो पिछले वर्ष के बराबर का ही आँकड़ा है। स्थानीय समाचारों के लिए भुगतान बाज़ारों में भिन्न होता है। द रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म को थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, जो थॉमसन रॉयटर्स की बिना लाभ की शाखा है। पोल में त्रुटि (एरर) का मार्जिन 2-3 फ़ीसदी ऊपर या नीचे हो सकता है।
अध्ययन में एक और खोज पर रोशनी डाली गयी है, जो चुनिंदा समाचारों से बचने की संख्या में वृद्धि की है। इसके परिणामस्वरूप कई देशों में लोग समाचार से तेज़ी से डिस्कनेक्ट हो रहे हैं। अधिकांश असन्तुष्टों का कहना है कि समाचारों में बहुत अधिक राजनीति और कोरोना महामारी भरा है और उस समाचार का उनके मूड पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

रिपोर्ट की प्रस्तावना में रॉयटर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफेसर रासमस क्लेस नीलसन ने कहा कि बड़े अन्तर के बावजूद स्वतंत्र पेशेवर पत्रकारिता लोगों को व्यक्तिगत अनुभव से परे दुनिया को समझने में मदद कर सकती है। हम समाचारों में घटती रुचि, कम विश्वास, पिछले साल एक सकारात्मक टक्कर के बाद कुछ समूहों के बीच सक्रिय समाचार वाचन में वृद्धि देखते हैं।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 30 वर्ष से कम उम्र के लोग सीधे समाचार मीडिया से जुडऩे में बहुत कम रुचि रखते हैं। पत्रकारिता को कैसा दिखना चाहिए? इस पर अलग-अलग विचार हैं, और अधिकांश के पास सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मोबाइल एग्रीगेटर जैसे समाचार खोज ज़रिये हैं। युवा पीढ़ी के लिए टिकटॉक अब 40 फ़ीसदी हिस्से तक तक पहुँच गया है, और उनमें से 15 फ़ीसदी समाचार के लिए इस सामाजिक मंच का उपयोग करते हैं। अन्य विजुअल केंद्रित प्लेटफॉर्म जैसे इंस्टाग्राम और यूट्यूब भी इस समूह के भीतर समाचारों तक पहुँचने के लिए अधिक लोकप्रिय हुए हैं।

वास्तव में सर्वेक्षण के तहत आये सभी बाज़ारों के लिए इस वर्ष पहली बार प्रत्यक्ष पहुँच (23 फ़ीसदी) की तुलना में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (28 फ़ीसदी) के माध्यम से होने वाले समाचारों तक पहुँच को प्राथमिकता दी गयी। सन् 2018 के बाद से यह नौ अंक नीचे है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल की रिपोर्ट में एक स्पष्ट संकेत है। युवा समूहों की बदलती आदतें, विशेष रूप से 30 वर्ष से कम उम्र के लोगों तक पहुँचने के लिए समाचार संगठन अक्सर संघर्ष करते हैं। हमने पाया कि यह समूह जो सोशल मीडिया के साथ पला-बढ़ा है; न केवल अलग है, बल्कि पहले की तुलना में कहीं अधिक भिन्न है।

सरकार की बढ़ती ताक़त, गिरती साख

PM being welcomed by people of Bengaluru, on June 20, 2022.

दिदेश की राजनीति का स्तर दिन-ब-दिन गिरता जा रहा है। लोग अब राजनीति में दिलचस्पी ले ज़रूर रहे हैं; लेकिन उनका मोहभंग भी राजनीति से ही हो रहा है। आजकल लोग जब भी कहीं राजनीति की चर्चा करते हैं, तो उनमें एक ग़ुस्सा होता है। मौज़ूदा केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध भी इसी तरह बढ़ता जा रहा है। हाल यह है कि जन-आक्रोश सड़कों पर देखने को मिल रहा है। इस बारे में ‘तहलका’ संवाददाता को कई राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों से लेकर जनता ने अपने मन की बात बतायी।

लोगों का कहना है कि देश में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो, अन्य दलों की सरकार रही हो या अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार हो; सभी ने कुछ-न-कुछ ऐसा किया है, जिसका विरोध जनता ने किया है। लेकिन मौज़ूदा सरकार का जिस क़दर विरोध देखने को मिल रहा है, उतना विरोध किसी सरकार को देखने को नहीं मिला है। हाल यह है कि भाजपा का नाम आये या भाजपा सरकार का उस सबमें मोदी का ही नाम हो रहा है और मोदी को ही बदनामी मिल रही है। अगर कोई काम अच्छा होता है, तो समर्थक मोदी की ही तारीफ़ करते हैं, चाहे वो भाजपा शासित किसी भी राज्य में काम हुआ हो। ऐसे ही अगर कोई काम ख़राब होता है, तो विरोधी, जिसमें आम लोग भी बड़ी संख्या में अब हो गये हैं; मोदी का ही होता है। यानी अब भाजपा शासन में तारीफ़, रोष, विरोध का केंद्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो चुके हैं।

राजनीतिक विश्लेषक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हंसराज का कहना है कि सन् 2019 में शाहीन बाग़ में एनआरसी सहित सीएए क़ानून के विरोध में जमकर मोदी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ महीनों तक धरना-प्रदर्शन चलता रहा है। लेकिन अचानक 2020 में कोरोना वायरस के कहर के चलते शाहीन बाग़ का विरोध-प्रदर्शन समाप्त हो गया। फिर कोरोना वायरस के बीच ही केंद्र सरकार तीन कृषि क़ानून ले लायी, जिनका किसानों ने जमकर विरोध किया। सरकार की किसान विरोधी नीतियों के विरोध में यह आन्दोलन एक साल से अधिक चला।

इस आन्दोलन को ख़त्म करने के लिए सरकार ने किसानों की आधी-अधूरी माँगों को मानकर बाक़ी माँगें जल्द पूरी करने का वादा कर दिया और जैसे-तैसे आन्दोलन ख़त्म कराया। हालाँकि किसानों में रोष है कि सरकार ने उनकी माँगें पूरी नहीं कीं। किसान के आन्दोलन जब स्थगित हुआ, तो लोगों ने सोचा कि सरकार अब कोई ऐसा क़दम नहीं उठाएगी, जिससे लोग फिर से विरोध-प्रदर्शन करें। लेकिन अब अग्निपथ योजना को लेकर जिस तरह देश भर आगजनी और हिंसा हुई है, उससे पूरे देश को कई दिनों तक बड़ा हिंसक आन्दोलन झेलना पड़ा। इससे देश की निजी सम्पत्ति का करोड़ों रुपये का नुक़सान हुआ है। प्रो. हंसराज का कहना है कि सरकार जिस तरह से अपनी मर्ज़ी से नये अंदाज़ में नये क़ानून व योजनाएँ ला रही है, उससे जनाक्रोश तो बढऩा लाज़मी है।

अग्निपथ योजना के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन ठीक से थमा नहीं, तब तक महाराष्ट्र सरकार को लेकर सियासी ड्रामा शुरू हो गया। महाराष्ट्र मामले में भले ही भाजपा ने कुछ नहीं कहा; लेकिन देश की जनता यही मान रही है कि केंद्र सरकार इशारे के बिना यह सब सम्भव नहीं हो सकता। दिल्ली की राजनीति के जानकार सुरेश सिंह का कहना है कि मौज़ूदा सरकार की राजनीतिक दलों में ही नहीं, बल्कि आमजन में यह पहचान बनती जा रही है कि जो दल या अधिकारी सरकार के अनुसार नहीं चलते हैं, उनके ख़िलाफ़ ईडी और सीबीआई की छापेमारी सहित अन्य प्रकार के क़ानूनी डंडे चलने लगते हैं। यह सरकार की हेकड़ी को दिखाती है।

अम्बेडकर कॉलेज के पूर्व प्रो. अखिलेश कुमार का कहना है कि राजनीति में बदले की भावना से काम होता है, और अगर सुधार नहीं हुआ, तो ऐसे ही होता रहेगा। क्योंकि राजनीति पूरी तरह से स्वार्थ पर टिकी है। इसमें आज जो अपने हैं, कल वे पराये हो जाते हैं। यहाँ यह सब आम बात है। लेकिन जब सरकारी योजनाओं का जनमानस पर विपरीत असर पडऩे लगे और लोगों के बीच आपसी सौहार्द टूटने लगे, तो समझो कि सरकार के प्रति विरोधी राजनीतिक दलों में ही नाराज़गी नहीं बढ़ती, बल्कि आमजन का आक्रोश की बढऩे लगता है। अगर ऐसे ही सब चलता रहा, तो सरकार को आगामी चुनावों में इससे काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ सकता है। उनका कहना है कि मौज़ूदा समय में किसी भी सरकार का आभा मण्डल कितना भी बड़ा क्यों न हो; लेकिन सरकार किसी-न-किसी तरह के विवाद में फँस ही जाती है। अगर ऐसा लगातार होता रहे, तो सरकार की सियासी चाल भी कई दफ़ा उलटी पड़ जाती है। इसलिए कोई भी फ़ैसला सरकार को सोच-समझकर लेना चाहिए, जिससे जनाक्रोश न भड़के।
अखिलेश कुमार का कहना है कि जिस तरीक़े से राहुल गाँधी परिवार पर नेशनल हेराल्ड मामले में कार्रवाई हुई है और उससे जो माहौल दिल्ली की सड़कों पर देखने को मिला है, उससे जनता में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति का माहौल बना है। इसी तरह आम आदमी पार्टी के दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर ईडी के शिकंजे में फँसे होने से भी केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में दिल्ली की राजनीति में विरोधियों को एकजुट करने का मौक़ा मिला है।

दिल्ली के लोगों का कहना है कि सरकार की नीतियों का विरोध अगर विपक्षी दल करते हैं, तो देश में माहौल बिगडऩे की सम्भावनाएँ कम ही होती हैं। लेकिन किसानों, युवाओं और छात्रों के भविष्य के साथ किसी तरह के खिलवाड़ का कोई ग़लत सन्देश जाता है, तो निश्चित तौर पर पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों की आशंका बनती है। किसान नेता भूपेन्द्र सिंह का कहना है कि जिस प्रकार से रातोंरात अग्निपथ योजना लाकर देश भर हिंसा का माहौल बनाया गया, कहीं उसके पीछे किसानों से बदला लेने की कोई योजना तो नहीं है? क्योंकि किसान आन्दोलन के आगे जिस तरह केंद्र की मोदी सरकार को झुकना पड़ा, उसके पीछे किसानों के साथ-साथ पूरे देश के ज़्यादातर लोगों की नाराज़गी भी वजह बनी।

किसानों को लेकर सैनिक भी सरकार से नाराज़ रहे, जो कि पहले ही कई चीज़ों को लेकर सरकार से नाराज़ थे। सरकार सैनिकों से नाराज़गी नहीं लेना चाहती, क्योंकि देश के क़रीब 80 फ़ीसदी सैनिक किसान परिवारों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से ही होते हैं। इन्हीं सभी पहलुओं पर विचार करके सरकार को किसानों की कुछ माँगों को मानना पड़ा। अग्निपथ योजना एक तरह से किसानों के भी विरोध में है। उत्तर प्रदेश के किसान नेता व राजनीति शास्त्र के अध्यापक उदित नारायण का कहना है कि सरकारें आती-जाती हैं। लेकिन सरकार की कुछ ग़लतियों का ख़ामियाज़ा राजनीतिक दलों को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को उठाना पड़ता है।

मौज़ूदा दौर में जो सियासी खेल चल रहा है, उसके घातक परिणाम सामने आ सकते हैं। आज देश में अफ़रा-तफ़री का माहौल है। करोड़ों की सम्पत्ति को बर्बाद किया जा रहा है। ट्रेने फूँकी गयी हैं। लोगों को यात्रा करने में डर लगने लगा है कि कहीं कोई अप्रिय घटना न घट जाए। ट्रेनों का आवागमन बन्द होने से अन्य वाहनों से आने-जाने में कई गुना किराया लोगों को देना पड़ रहा है। एक भाजपा की नेता ने पैगंबर पर विवादित बयान दिया, तो देश में एक समुदाय ने पूरे देश में तोड़-फोड़ का माहौल बना दिया है। इन्हीं सभी पहलुओं पर सरकार को गम्भीरता से विचार करना होगा, अन्यथा आने वाले दिनों में और भी स्थिति बिगड़ सकती है।

उदित नारायण का कहना है कि सरकार की एक सोच होती है, जिसके तहत देशवासी उसका समर्थन करते हैं। चाहें वो वोट देते हों या न देते हों। लेकिन वर्तमान-काल में जो चल रहा है, उसका विरोध जिसने वोट दिया है, वो भी कर रहा है और जिसने नहीं दिया, वो भी कर रहा है। ऐसे में देश में शान्ति और विकास की बात करना मुश्किल हो गया है।