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सडक़ से सदन तक कुत्तों का डर

राजस्थान के सिरोही से हाल में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आयी थी। सिरोही से सरकारी अस्पताल में मां के पास सो रहे एक महीने के बच्चे को कुत्ता उठाकर ले गया। कुत्ता मासूम का पेट और एक हाथ नोंचकर खा गया, जिससे बच्चे की मौत हो गयी। यह घटना कोई पहली और आख़िरी नहीं है। 

इस तरह की घटनाएँ केवल राजस्थान में ही नहीं हो रही हैं। पूरे देश में आवारा और पालतू कुत्तों का आतंक है। लोग कुत्तों के आतंक से परेशान हैं और ख़ौफ़ में जी रहे हैं। अगर ख़बरों पर ध्यान दें तो देश के अलग-अलग हिस्सों से रोज़ाना औसतन 3,000 से 4,000 घटनाएँ कुत्तों के काटने की सामने आ रही हैं। झारखण्ड भी इसमें पीछे नहीं है।

झारखण्ड के गिरिडीह ज़िले के तीसरी प्रखंड में (26 दिसंबर 2022) एक कुत्ते ने बच्चों समेत 26 ग्रामीणों को काटकर घायल दिया। राज्य के कोडरमा ज़िले के चंदवारा क्षेत्र में (24 फरवरी 2023) एक कुत्ते ने एक चार साल की बच्ची को गंभीर रूप से घायल कर दिया। कुत्ते ने इतनी बुरी तरह नोचा था कि उसे इलाज के लिए रांची राजधानी रिम्स रेफर करना पड़ गया। धनबाद ज़िला में (16 से 22 फरवरी 2023) के दौरान 398 लोगों को कुत्ता ने अपना शिकार बनाया। ये कुछ घटनाएँ बयाँ करती हैं कि इन दिनों राज्य में आवारा कुत्तों का कितना आतंक है। ख़ौफ़ का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों झारखण्ड विधानसभा बजट सत्र के दौरान भी यह मामला उठा। सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने सरकार को घेरा और समाधान की माँग की। सवाल है आख़िर कुत्ते इतने उग्र क्यों हो रहे हैं? क्यों कुत्ता काटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं? आख़िर प्रशासन क्यों नहीं क़ाबू कर पा रहा है?

एक लाख में 30 लोग शिकार

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (झारखण्ड) के अनुसार, राज्य में एक लाख की आबादी पर 30 लोग डॉग बाइट के शिकार होते हैं। केवल राजधानी रांची की ही बात की जाए, तो बीते चार महीने में 5,097 लोगों को कुत्ते ने काटा है। एंटी रेबीज इंजेक्शन लेने के लिए आने वालों के आँकड़ों के मुताबिक केवल रांची में हर दिन औसत 30 लोगों को कुत्ता अपना शिकार बना रहा है। हालाँकि आँकड़े बताते हैं कि राज्य में कोरोना-काल में कुत्तों का आंतक कुछ कम हुआ। राज्य में वर्ष 2015 में कुत्ता काटने के 47,717 मामले सामने आये थे। वहीं, वर्ष 2019 में यह बढक़र 71,725 हो गये। कोरोना काल में घटनाओं में कुछ कमी आयी।

सन् 2020 में 38,381 कुत्ता काटने की घटनाएँ हुईं। सन् 2021 में 31,708 घटनाएँ हुईं। वहीं सन् 2022 में फिर से बढक़र 40,000 के लगभग पहुँच गयी हैं। इस नये साल यानी वर्ष 2023 के केवल तीन महीने में राज्य में यह आँकड़ा 5,000 को पार कर चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर भी कुत्तों के काटने का आँकड़ा भी बढ़ रहा। महाराष्ट्र में सन् 2022 में 3.46 लाख, तमिलनाडु में 3.30 लाख और आंध्र प्रदेश में 1.69 लाख, उत्तराखण्ड में 1.62 लाख कर्नाटक में 1.46 लाख, गुजरात में 1.44 लाख और बिहार में 1.18 लाख  कुत्तों के काटने की घटनाएँ सामने आयीं।

विधानसभा में उठा मुद्दा

झारखण्ड विधानसभा का बजट सत्र 27 फरवरी से 23 मार्च तक चला। इस दौरान एक दिन कुत्ता काटने की घटना को लेकर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने सरकार को घेरा। भाजपा के मुख्य सचेतक विधायक बिरंची नारायण ने इस मुद्दे को उठया। उन्होंने कहा कि अकेले रांची में हर दिन 300 से ज़्यादा लोग डॉग बाइट सेंटरों पर इलाज के लिए पहुँच रहे हैं। कोडरमा से भाजपा की विधायक नीरा यादव ने कहा कि राज्य के बाकी इलाकों की बात तो छोडि़ए, विधानसभा के कैंपस में भी आवारा कुत्तों का आतंक है।

विधानसभा आने-जाने के समय इस बात का डर रहता है कि न जाने कब कौन-सा कुत्ता हमला कर दे! सत्तारूढ़ पार्टी झामुमो के विधायक मथुरा महतो ने कहा कि अगर बोकारो में आवारा कुत्ता पकड़ा जाता है, तो उसे गाड़ी वाले धनबाद में ले जाकर छोड़ देते हैं। भाकपा माले के विधायक विनोद कुमार सिंह ने सरकार को कुत्ते के काटने से हो रही मौतों पर भी मुआवज़े का प्रावधान करने की माँग की।

पालतू कुत्ते भी ख़तरनाक

समस्या सिर्फ़ सडक़ों और गलियों के आवारा कुत्ते नहीं हैं। घरों में कुत्ते पालने वाले लोगों की लापरवाही भी डॉग बाइट की घटनाओं की एक बड़ी वजह होती है। दिल्ली, एनसीआर समेत झारखण्ड में भी इससे सम्बन्धित कई मामले सामने आये हैं। रांची की बात करें तो यहाँ लगभग 10,000 लोगों ने कुत्ते पाल रखे हैं; लेकिन सिर्फ़ 72 लोगों ने इसके लिए लाइसेंस निर्गत कराया है। हर दिन राज्य के विभिन्न सोसायटी में रहने वालों के बीच कुत्ते को लेकर विवाद सामने आता रहता है।

नसबंदी की ज़िम्मेदारी किसकी?

राज्य में नगर निगम को आवारा कुत्तों के नसबंदी की ज़िम्मेदारी दी गयी है। रांची नगर निगम की हालत यह है कि आवरा कुत्तों की संख्या कितनी है, इसकी सटीक जानकारी तक उनके पास नहीं है। निगम के अधिकारी कहते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक, रांची शहरी क्षेत्र में 90,000 से अधिक आवारा कुत्ते हैं। निगम ने एक एजेंसी को कुत्तों की नसबंदी की ज़िम्मेदारी दी है। वह एजेंसी 11 वर्षों में 50,000 के लगभग कुत्तों का नसबंदी कर पायी है। यानी अभी भी 35,000 से 40,000 कुत्तों की नसबंदी बची है। वहीं, कुत्तों के आतंक पर विधानसभा में हंगामे पर हेमंत सरकार के मंत्री सत्यानंद भोक्ता ने जवाब दिया कि प्रतिदिन 10-15 कुत्तों का बंध्याकरण व टीकाकरण किया जा रहा है। रांची, गिरिडीह, धनबाद और देवघर नगर निगम में आवारा कुत्तों का बंध्याकरण व वैक्सिनेशन कराया जा रहा है। वहीं, जमशेदपुर, हज़ारीबाग़ और आदित्यपुर नगर निगम क्षेत्र में एजेंसी के चयन की प्रक्रिया चल रही है। उधर, स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के 13 निकायों को आवारा कुत्तों के गणना और बंध्याकरण का निर्देश जारी किया है।

ख़तरनाक क्यों हो रहे कुत्ते?

कुत्तों को मानव का सबसे अच्छा दोस्त और सबसे वफ़ादार जानवर माना जाता है। अब कुत्तों को लेकर दहशत का माहौल है ऐसा है कि महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक के सोसायटीज में अलग-अलग नियम बनाने की बात सामने आ रही है। आख़िर क्या कारण है कि सडक़ के आवारा कुत्ते हों या पालतू कुत्ते इनते आक्रामक हो रहे हैं? शोध बताते हैं कि कुत्तों का आक्रामक होना कई मामलों पर निर्भर करता है। जिस वजह से वे काटने लगते हैं। पयार्वरण में जो परिवर्तन हो रहा, उसका असर कुत्तों पर भी हो रहा। शोध में यह बात भी सामने आयी है कि कुत्ते अधिकतर हीट पीरियड में आक्रामक होते हैं। वह सामने वाले से डरकर भी हमला करता है। कुत्तों को भी मानसिक स्ट्रेस होता है और वो इस स्ट्रेस के कारण परेशान हो सकते हैं। ख़ासकर पालतू कुत्तों में इस तरह की चीजें देखी गयी हैं। वहीं, सडक़ पर आवारा कुत्तों में इन कारणों के अलावा भोजन की कमी भी एक बड़ा कारण बन रहा। 

दरअसल आजकल, ख़ासकर शहरों में बचा भोजन लोग फेंकते नहीं हैं। कई संस्थाएँ इसे लेकर जाती हैं और ग़रीबों में बाँट देती हैं। इससे कुत्तों का पेट नहीं भर रहा। मामला जो भी हो यह एक गम्भीर विषय है। क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल विश्व में 55,000 लोगों की मौत रेबीज के कारण होती है। इसमें से 90 फ़ीसदी एशिया और अफ्रीका के लोग हैं।

एसोसिएशन फॉर प्रिवेंशन ऑफ रेबीज इन इंडिया के अनुसार, भारत में प्रति वर्ष लगभग 20,000 लोगों की मौत कुत्तों के काटने के बाद होने वाली बीमारी से होती है। इसलिए इस पर गम्भीरता से विचार करने और निदान तलाशने की ज़रूरत है। 

पानी पर सेस!

हिमाचल सरकार की पानी से पैसा कमाने की सोच से हरियाणा और पंजाब नाराज़

प्राकृतिक सम्पदा के धनी हिमाचल प्रदेश द्वारा बिजली परियोजनाओं पर वाटर (पानी) सेस लागू करने के फ़ैसले से पड़ोसियों में रार छिड़ गयी है। हरियाणा और पंजाब बेहद नाराज़ हैं और पड़ोसी राज्य के फ़ैसले को अवैध बताया है।

हाल में हिमाचल की नवनियुक्त कांग्रेसी सरकार ने अपने संसाधनों से पैसा कमाने के लिए एक मास्टर स्ट्रोक खेला था। सरकार चाहती थी कि पहाड़ी राज्य की आर्थिक स्थिति को मज़बूत करने के लिए ठोस क़दम उठाये जाएँ। इस मंथन में सरकार की नज़रें सूबे से गुज़रने वाली नदियों पर लगी पन विद्युत परियोजनाओं पर पड़ीं। सरकार ने तुरन्त पहाड़ी राज्यों उत्तराखण्ड और जम्मू-कश्मीर को स्टडी किया और पानी से पैसा कमाने का रास्ता तलाश लिया।

सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने इसके लिए राज्य विधानसभा में बिल पास कर एक झटके में करोड़ों रुपये कमाने के लिए पन विद्युत परियोजनाओं पर वाटर सेस लगाने का फ़ैसला ले डाला। इस फ़ैसले की परिधि में 172 पन बिजली परियोजनाएँ आयीं। ये परियोजनाएँ 10,991 मेगावाट वाली हैं और इससे राज्य को हर साल क़रीब 4,000 करोड़ रुपये की आय की बात कही गयी है। हालाँकि सरकार ने यह भी दावा किया इसका असर आम जनता पर नहीं पड़ेगा। यह सेस केवल कम्पनियों को चुकाना होगा। दूसरी ओर यह फ़ैसला पड़ोसियों पंजाब और हरियाणा के कानों तक पहुँचा, तो उन्होंने भी अपनी विधानसभाओं में निंदा प्रस्ताव पारित कर फ़ैसले का विरोध किया।

हिमाचल विधानसभा में जल विद्युत उत्पादन पर जल उपकर विधेयक 2023 पेश किया गया था। उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने सदन में यह प्रस्ताव पारित करते हुए कहा था कि यह क़ानून उत्तराखण्ड और जम्मू-कश्मीर में लगाये गये जल उप कर गहन अध्ययन करने के बाद ही लाया गया। उनका तर्क था कि उत्तराखण्ड और जम्मू-कश्मीर में कई लोग जल उपकर के ख़िलाफ़ अदालतों में गये; लेकिन वहाँ फ़ैसला सरकार के पक्ष में ही आया था। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के अनुसार, राज्य के पास आय के साधन बढ़ाने के सीमित संसाधन हैं। हमें आय के स्रोत बढ़ाने के लिए और संसाधन जुटाने होंगे। मौज़ूदा परिस्थितियों में यह बहुत ज़रूरी हो गया है। इस दिशा में यह पहला क़दम है। यह एक प्रयास है और भविष्य में इस तरह के और भी क़दम उठाये जाएँगे। आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार पड़ोसी के फ़ैसले से सख़्त नाराज़ है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने रिपेरियन सिद्धांत के मुताबिक पानी पर अपना क़ानूनी हक़ जताते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट पर वाटर सेस लगाने के फ़ैसले को अमान्य क़रार दिया।

पंजाब विधानसभा में इसके विरोध में एक प्रस्ताव लाया गया। पंजाब के जल स्रोत मंत्री गुरमीत सिंह मीत हेयर ने इसे पंजाब के हितों से बड़ा धक्का क़रार दिया। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के अनुसार सुक्खू सरकार का क़दम ग़ैर-क़ानूनी और तर्कहीन है। मान ने कहा कि नदियों के पानी पर पंजाब का क़ानूनी हक़ है और कोई भी राज्य का यह हक़ नहीं छीन सकता। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अपनी ज़मीन के रास्ते बह रहे पानी पर पंजाब एक पैसा भी किसी को नहीं देगा। मुख्यमंत्री मान यह भी कहते हैं कि इस फ़ैसले से साफ़ हो गया है कि कांग्रेस के कई चेहरे हैं और वह हमेशा राजनीतिक सुविधा के लिए अपने इन चेहरों को इस्तेमाल करती रही है।

वहीं हरियाणा की भाजपा-जजपा गठबंधन सरकार भी हिमाचल के ख़िलाफ़ खड़ी हो गयी। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने भी विधानसभा में ऐसा ही प्रस्ताव रख हिमाचल सरकार के अध्यादेश का विरोध करते हुए कहा कि वाटर सेस के लिए हरियाणा को बाध्य नहीं किया जा सकता। इसलिए हिमाचल सरकार अपना फ़ैसला वापस लेना चाहिए। हरियाणा सरकार ने केंद्र से भी आग्रह किया है कि वह यह अध्यादेश वापस लेने के आदेश दे, क्योंकि यह केंद्रीय अधिनियम यानी अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम-1956 का भी उल्लंघन है। मुख्यमंत्री ने यह भी तर्क रखा कि भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) से हरियाणा पहले से ही हरियाणा और पंजाब के कम्पोजिट शेयर की 7.19 प्रतिशत बिजली हिमाचल को दे रहा है। हिमाचल के उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने दावा किया कि वाटर सेस से पंजाब और हरियाणा को इससे नुक़सान नहीं होगा। सरकार ने अपने राजस्व में बढ़ोतरी करने के लिए यह फ़ैसला लिया है। इसे लगाने के लिए राज्य क़ानूनी रूप से सक्षम है।  हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह ‘सुक्खू’ इस पूरे विवाद में पंजाब व हरियाणा के तर्कों से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि पड़ोसी राज्यों की सरकार की ओर से सन् 1956 की सन्धि का उल्लंघन होने की बात तर्कसंगत नहीं है। उनकी दलील है कि सेस लगाने वाला हिमाचल पहला राज्य नहीं है। उत्तराखण्ड और जम्मू-कश्मीर भी पहले ही इसी तरह वाटर सेस लगा चुके हैं। इस लिए हिमाचल सरकार किसी अन्य राज्य सरकार के अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं कर रही है।

महानंद डेयरी का संकट टाल सकेगा एनडीडीबी?

लगातार घाटे और भ्रष्टाचार के आरोपों से चर्चा में चल रही महानंद डेयरी चलेगी। महानंद को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) चलाएगा। सवाल यह है कि क्या डेयरी में काम करने वाले कर्मचारियों की नौकरी बची रहेगी? असल पेच यही है, जो फँसा है। क्योंकि एनडीडीबी ने एक शर्त रखी है कि एनडीडीबी वर्तमान में कार्यरत 940 में से 350 श्रमिकों को समायोजित कर सकता है। ऐसे में शेष 590 कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटक गया है।

एनडीडीबी ने कहा है कि वह सभी मौज़ूदा कर्मचारियों को समायोजित नहीं कर सकता है। लेकिन सच्चाई से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है। महानंद डेयरी की माली हालत ख़राब होने के कारण महानंद डेयरी के पास कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं। सन् 2005 में एक समय महानंद का दुग्ध संग्रह लगभग आठ लाख लीटर था, जो अब सिर्फ़ 25 से 30 हज़ार लीटर ही है। पिछले 15 वर्षों से महानंद का मुनाफ़ा भी लगातार घट रहा है, जो अब घटकर 15 करोड़ रुपये रह गया है। इसलिए फेडरेशन चलाने के लिए बैंकों से ओवरड्राफ्ट लेना पड़ता है। विधानमंडल के शीतकालीन सत्र में पेश की गयी ऑडिट रिपोर्ट में महानंद मिल्क के प्रबंधन की कड़ी आलोचना की गयी थी। रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गयी थी कि महानंद को गिरती सम्पत्ति, बढ़ते घाटे, नयी योजनाओं की कमी और घटती नेटवर्थ को देखते हुए दो-तीन साल में महानंद डेयरी को बंद करना होगा।

विडंबना देखिए, पड़सी गुजरात ने अमूल जैसे दूध के ब्रांड को जहाँ एक और ग्लोबल बना दिया है, वहीं पर सहकारिता में एक आन्दोलन के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले महाराष्ट्र की महानंदा जैसी संस्था ने अपना दम तोड़ दिया है। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि महानंद जैसे ब्रांड को शासकों (नेताओं सहित) ने खा लिया। इसके लिए सभी दल और उसके नेताओं को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। राज्य में सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों के शीर्ष निकाय महानंद को कभी भी अपने अच्छे प्रदर्शन जैसे रिकॉर्ड दूध संग्रह, दूध के नये ब्रांड या प्रसंस्कृत खाद्य के लिए नहीं जाना जाता है। यह दुग्ध संघ भ्रष्टाचार, सरकारी निधि की हेराफेरी से त्रस्त रहा है। इसका इतिहास वित्तीय अनियमितताएँ, पिछले एक दशक से दूध पाउडर और अन्य परियोजनाओं की बढ़ी हुई लागत, लीज पर ली गयी दूध पैकेजिंग इकाई में घोटाला, निदेशकों को महँगे उपहारों का वितरण, कथित चारा ख़रीद की जाँच, उसमें आरोपों की जाँच, निदेशक मंडल की बार-बार बर्खास्तगी और अब ऑडिट रिपोर्ट में गम्भीर आरोप दुष्कर्मों से भरा पड़ा है। महानंद की स्थिति को लेकर कई लोग अपनी ग़लतियाँ छुपाने के लिए आरोप लगाने से नहीं चूकते कि अन्य राज्य के ब्रांड महानंद को बदनाम करने की साज़िश कर रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि महानंद की हालत के लिए सरकार और वे लोग जिन पर इसे चलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी वही हैं। दरअसल महानंद में पिछले डेढ़ से दो दशक से विद्रोह शुरू होने के बाद ही सहकारिता आंदोलन का रंग फीका पडऩे लगा। लेकिन अभी तक किसी ने भी इससे सबक़ नहीं लिया और आज हम देख सकते हैं कि महानंद की दयनीय स्थिति हो गयी है।

राज्य के शिखर दूध संघ का मक्खन कभी भी उत्पादकों तक नहीं पहुँचे, क्योंकि राज्य शासक इसे अपनी निजी सम्पत्ति मानते थे। जब-जब राज्य में सत्ता हस्तांतरण हुआ, उस वक़्त किसी भी सत्ताधारी ने यह नहीं सोचा इस डेयरी का उत्थान किस तरह से किया जाए? यह सवाल वास्तव में किसी के दिमाग़ में नहीं आया। इसके विपरीत सभी राजनीतिक दलों ने ने बात इतना ही सोचा है कि कैसे महानंद पर उनका पलड़ा भारी होगा और वे इससे अधिक मलाई कैसे खा सकते हैं? महानन्द पिछले कई वर्षों से सरकार के नियंत्रण में है, जबकि व्यापार करना सरकार का काम नहीं है, प्रत्यक्ष काम तो दूर की बात है और सरकार को व्यापार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हाल ही के दिनों में दूध पाउडर परियोजना में जबरदस्त वृद्धि हुई, निजी दुग्ध संघों ने इस मौक़े का दोहन किया और अच्छा मुनाफ़ा कमाया। उन्होंने उत्पादकों को दूध के दाम भी बढ़ा दिये। महानंद उस प्रतियोगिता में टिक नहीं सका। अगर इस दौरान सरकार ने महानंद का सहयोग किया होता तो आज महानंद की यह हालत नहीं होती। महानंद के निदेशक मंडल की बर्खास्तगी का हमेशा राजनीतिक लाभ रहा है। राज्य में सत्ता हस्तांतरण के बाद डेयरी विकास मंत्री द्वारा महानंद के निदेशक मंडल को तुरन्त बर्खास्त करने का फ़ैसला भी एक तरह से अपने वर्चस्व को बनाने की रणनीति रही है। बोर्ड बर्खास्त करना एक अलग बात हो सकती है, अपने वर्चस्व की बात हो सकती है; लेकिन नये बोर्ड के साथ महानंद के उद्धार करने की नीयत से कोशिश कभी नहीं की गयी कड़वा सच तो यह है कि हर राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद महानंद की मलाई खाने की साज़िश में लगा रहा; लेकिन उसको महानंद के उद्धार और उत्थान की बातें उनकी प्रधानता में नहीं रही। ऐसे अनेक कारणों के चलते महानन्द की आस्था उत्पादकों के साथ-साथ उपभोक्ताओं में भी कम हो गयी थी।

इस बीच आज महाराष्ट्र में सहकारी समितियों, सरकारी और निजी दुग्ध संघों के बीच समन्वय नहीं होने के कारण सभी की पाउच पैकिंग 50 प्रतिशत तक कम हो गयी है। अमूल इस गैप को भरने का काम कर रहा है। यदि महानन्द को इस तरह के पतन से बाहर लाना है, तो पहले इसमें सरकारी हस्तक्षेप को रोकना होगा। महाराष्ट्र सरकार का यह फ़ैसला कि महानंद अब एनडीडीबी को चलाने के लिए दिया जाएगा, वाक़ई समझदारी भरा फ़ैसला है यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। फ़िलहाल डेयरी विकास मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल के विधानसभा में महानंद डेयरी को चलाने के लिए एनडीडीबी को दिये जाने की बात कह चुके हैं।

अमेरिका में क्रिकेट !

सुनकर थोड़ा अजीब लगता है, क्योंकि अमेरिका की प्रसिद्धि बेसबॉल, रेसिंग, बास्केटबॉल या एथलेटिक्स जैसे खेलों में रही है, क्रिकेट में तो बिलकुल ही नहीं। कई लोगों को शायद पता ही नहीं होगा कि इसी जुलाई में वहाँ भारत के आईपीएल जैसी टी-20 की क्रिकेट लीग होने वाली है, जिसका नाम मेजर लीग क्रिकेट (एमएलसी) रखा गया है। और भी दिलचस्प यह है कि अमेरिका में इस लीग में जो छ: फ्रेंचाइजी टीमें हिस्सा ले रही हैं, उनमें से आईपीएल में खेलने वाली मुम्बई इंडियन सहित चार भारतीय फ्रेंचाइज की टीमें भी होंगी।

हाँ, इनमें खिलाड़ी वह नहीं होंगे, जो हमारे यहाँ आईपीएल टीम का हिस्सा हैं; लेकिन मालिक वही होंगे, जैसे कि एमएलसी में खेलने वाली मुम्बई इंडियन टीम की मालकिन नीता अम्बानी होंगी। और भी दिलचस्प यह है कि आईपीएल में, तो पाकिस्तान का कोई खिलाड़ी नहीं खेलता; लेकिन एमएलसी में भारतीय फ्रेंचाइज की टीमों में तीन ऐसे खिलाड़ी हैं, जो पाकिस्तान के लिए खेल चुके हैं। अमेरिका में क्रिकेट लोकप्रिय हो, इसके लिए वहाँ के क्रिकेट अधिकारियों ने जाने माने डब्लयूडब्ल्यूई सुपर स्टार जॉन सीना को अमेरिकन क्रिकेट का ब्रांड एम्बेसडर बनाया है। अमेरिका में क्रिकेट का जूनून धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अन्यथा वहाँ क्रिकेट को किसी समय वक्त बर्बाद करने वाला खेल माना जाता था। हालाँकि अब वहाँ क्रिकेट बेसबॉल या बास्केटबॉल जैसे खेलों की तरह लोकप्रियता लेता दिख रहा है।

मुंबई इंडियंस की मालकिन नीता अंबानी ने एमएलसी में टीम की भागीदारी पुख़्ता होने के बाद कहा- ‘मुंबई इंडियंस के परिवार में न्यूयॉर्क टीम का स्वागत करके काफ़ी ख़ुशी हो रही है। अमेरिका में पहली क्रिकेट लीग में भाग लेकर हम मुंबई इंडियंस को वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित कर सकेंगे। यह मुंबई इंडियंस के लिये नयी शुरुआत है और मुझे इसका इंतज़ार है।’ ऐसा ही विचार अन्य भारतीय फ्रेंचाइजी का भी है। यह कहा जा सकता है कि मुम्बई इंडियंस भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी निजी वैश्विक फ्रेंचाइजी है, क्योंकि उनकी अब तक मुंबई इंडियंस आईपीएल (भारत), एमआई केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका 20),एमआई अमीरात (आईएलटी 20), मुंबई इंडियंस डब्ल्यूपीएल (भारत) के बाद अमेरिका में भी फ्रेंचाइजी हो गयी है।

अमेरिकी क्रिकेट में नये युग की शुरुआत तब हुई, जब 20 मार्च को ह्यूस्टन में उन छ: टीमों का निर्णय हुआ, जो मेजर लीग क्रिकेट में हिस्सा लेंगी। आईपीएल के फ्रेंचाइजी मुम्बई इंडियंस की टीम एमआई न्यूयॉर्क, कोलकाता नाइट राइडर्स की लॉस एंजिल्स नाइट राइडर्स, चेन्नई सुपर किंग्स की टेक्सास (नाम अभी तय नहीं) हैं, जबकि दिल्ली कैपिटल्स ने सिएटल ऑरकास टीम के लिए दाँव लगाया है। अन्य दो टीमें सैन फ्रांसिस्को और वाशिंगटन फ्रीडम हैं।

इस अमेरिकन क्रिकेट लीग का उद्घाटन मैच 13 जुलाई को ग्रैंड प्रेयरी, टेक्सास में नवनिर्मित मेजर लीग क्रिकेट मैदान ग्रैंड प्रेयरी स्टेडियम में होगा। इस साल का सीजन 18 दिन तक चलेगा और इसमें कुल 19 मैच होंगे। फाइनल 30 जुलाई को होगा। वैसे एमएलसी मैचों का लुत्फ़ भारत के क्रिकेट प्रेमी स्पोट्र्स-18 पर उठा सकेंगे। वैसे अमेरिकी क्रिकेट की यूएसएक्रिकेट.ओआरजी के नाम से अपनी वेवसाइट भी है।

वैसे हाल के वर्षों में अमेरिका में कुछ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच आयोजित हुए हैं। हालाँकि क्रिकेट वहाँ अभी उतना लोकप्रिय नहीं हो सका है। इसके विपरीत अफ़ग़ानिस्तान जैसे देश की टीम आईसीसी विश्व कप में खेलने लगी है। यह दिलचस्प ही है किसी समय ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे कई देश क्रिकेट खेलते हैं। अमेरिका भी था और इसे इस साम्राज्य से 1776 ईस्वी में आज़ादी मिली थी। क्रिकेट की शुरुआत 18वीं सदी में इंग्लैंड (यूनाइटेड स्टेट) से हुई थी। वैसे तो अमेरिका ने 1844 में कनाडा के ख़िलाफ़ पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेल लिया था; लेकिन इसके बाद वहाँ कुछ नहीं हुआ। अमेरिका में क्रिकेट की जगह इससे मिलते जुलते बेसबॉल को ज़्यादा लोकप्रियता मिली। गृह युद्ध से पहले जो थोड़ी बहुत क्रिकेट अमेरिका में चली थी, वह प्राथन विश्व युद्ध आते-आते ख़त्म ही हो गयी।

चंद मीडिया रिपोट्र्स में यह दावा किया गया था कि 2017 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) ने संयुक्त राज्य अमेरिका क्रिकेट एसोसिएशन को प्रशासन से कुछ समस्याओं की वजह से निलम्बित कर दिया था। हालाँकि एक साल बाद उस पर से यह पाबंदी हटा ली गयी। अब अमेरिका में क्रिकेट को लेकर शौक़ बढ़ता दिख रहा है। अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय टीम बना ली है। दुनिया की कुछ क्षेत्रीय टीमों ने हाल के वर्षों में वहाँ क्रिकेट खेली है।

अमेरिका में क्रिकेट को लेकर मेजर लीग क्रिकेट (एमएलसी) के निदेशक जस्टिन गिले का कहना है- ‘इन गर्मियों में विश्व क्रिकेट की नज़र मेजर लीग क्रिकेट पर होगी। इसमें इस खेल के सितारे तीन हफ्ते तक तेज़-तर्रार टी20 एक्शन में प्रतिस्पर्धा करेंगे।’ गिले को भरोसा है कि एमएलसी की शुरुआत अमेरिकी में क्रिकेट को बदल देगी और दुनिया के सबसे महान खिलाडिय़ों को अपने कौशल का प्रदर्शन करने के लिए बेहतरीन मंच प्रदान करेगी। इससे अमेरिका में घरेलू प्रतिभाओं को उभरने का अवसर मिलेगा और इस खेल की लोकप्रियता नये स्तर पर जाएगी।

एमएलसी के निवेशकों की बात करें, तो इनमें अमेरिका के सफल व्यापारी शामिल हैं। इनमें डलास स्थित निवेशक रॉस पेरोट जूनियर और अनुराग जैन प्रमुख नाम हैं। जैन कहते हैं कि उन्हें गर्व है कि डलास के पास टेक्सास के लिए अपनी टीम होगी जो मेजर लीग क्रिकेट में जड़ें जमाएगी। यह टीम विश्व स्तरीय क्रिकेट खेलेगी। ग्रैंड प्रेयरी स्टेडियम, टेक्सास को क़रीब 20 मिलियन डॉलर की लागत से बनाया गया है, जिसमें क्रिकेट से जुड़ी विशिष्ट सुविधाएँ जुटाने की कोशिश की गयी है। इसमें 1,000 क्लब और प्रीमियम सीटें हैं और इसे 15,000 से ज़्यादा सीटों तक विस्तार देने की क्षमता है। दिलचस्प यह है कि अमेरिका के क्रिकेट अधिकारी 2024 की आईसीसी पुरुष विश्व कप के कुछ मैचों की मेज़बानी की कोशिश में भी जुटे हैं। 

अमेरिका क्रिकेट एसोसिएशन (यूएसएसीए) वैसे 1965 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद् (आईसीसी) सहयोगी सदस्य बन गयी थी। हालाँकि जून 2017 में यूएसएसीए को आईसीसी ने शासन और वित्तपोषण के मुद्दों के कारण निष्कासित किया था; लेकिन जनवरी 2019 में इसे आधिकारिक सदस्यता प्रदान कर दी गयी। अमेरिका ने इंग्लैंड में 1979 आईसीसी ट्रॉफी में अपने अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट की शुरुआत की थी। सन् 2004 में उसने आईसीसी सिक्स नेशंस चैलेंज जीता, जिसके बाद अमेरिका की टीम आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के लिए क्वालीफाई कर गयी। फिर भी क्रिकेट वहाँ पनप नहीं पायी जैसी अफ़ग़ानिस्तान जैसे देश में मशहूर हो गयी।  

भारतीय फ्रेंचाइजी के पाकिस्तानी खिलाड़ी

एमएलसी में तीन पाकिस्तानी खिलाड़ी भी भारतीय फ्रेंचाइजी के लिए खेलेंगे। इनमें एक हमाद आज़म हैं, जिन्होंने पाकिस्तान के लिए 11 एक दिवसीय और 5 टी-20 खेले हैं। दूसरे एहसान आदिल हैं, जो पाकिस्तान के लिए 3 टेस्ट और 6 एक दिवसीय खेल चुके हैं। यह दोनों मुंबई इंडियन की टीम में होंगे। तीसरे सैफ बदर हैं, जो केकेआर लॉस एंजिल्स के लिए खेलेंगे। वह पाकिस्तान अंडर-19 टीम के लिए खेल चुके हैं और प्रथम श्रेणी में उनके नाम 21 मैचों में 979 रन हैं। उनके अलावा सामी असलम भी हैं, जिन्हें टेक्सास करियर ने टीम में शामिल किया है।

पाकिस्तानी खिलाड़ी सिर्फ एक बार 2008 में आईपीएल में खेले थे। उसके बाद भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों की कड़वाहट के कारण कभी नहीं खेले। अब तीन पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को विदेश में भारतीय फ्रेंचाइज की टीमों से खेलने का अवसर मिला है। वैसे भारत के अंडर-19 विश्व कप विजेता टीम के कप्तान रहे उन्मुक्त चंद भी भारत में अवसर नहीं मिलने के कारण ऑस्ट्रेलिया की बिग बैश क्रिकेट लीग में मेलबर्न रेनेगेड्स के लिए खेलने वाले पहले भारतीय बने थे। अब 28 साल के हो गये, उन्मुक्त अमेरिका की टीम का हिस्सा हैं।

धर्मों में गन्दगी

गन्दगी एक ऐसी चीज़ है, जो सब कुछ घृणित, दूषित और बेकार कर देती है। अगर कोई चीज़ बाहर से गन्दी हो, तो दिख जाती है; लेकिन अन्दर से गन्दी हो, तो उसके बारे में जानना मुश्किल होता है। इंसान के बारे में भी यही बात सटीक बैठती है। बाहर से गन्दे इंसानों को तो पहचाना जा सकता है; लेकिन अन्दर से गन्दे लोगों का पता ही नहीं चलता कि वह कितना गन्दा है?

इंसानों की इसी अन्दर की गन्दगी को धोने के लिए धर्मों की नींव रखी गयी। लेकिन अब धर्मों में भी इतनी गन्दगी भर चुकी है कि उस गन्दगी को धर्म का हिस्सा मानकर लोग उसी में ऐसे लोट रहे हैं, जैसे कोई गन्दा पशु कीचड़ में लोट रहा हो। यह गन्दगी स्वार्थ के कारण पैदा हुई है। दु:खद इंसान के अन्दर जब स्वार्थ हो, तो उन्हें यह गन्दगी भी मलाई लगती है। इस गन्दगी में न जाने कितने ही ढोंगी, पाखण्डी और ड्रामेबाज़ फँसे हैं। ये लोग इन धर्मों पर आस्था रखने वाले लोगों को बाहर के चोले से, चमक-दमक वाली लग्जरी लाइफ से, धार्मिक आडम्बरों से, धर्म के नाम पर डराकर और ख़ुद को पहुँचा हुआ सन्त या महात्मा या फ़क़ीर बताकर भ्रमित करते रहते हैं। इनकी सीधी-सीधी पहचान यह है कि ये लोग ख़ुद को समाज से विरक्त बताकर समाज के ही मोह में फँसे रहते हैं। अपने लिए जमकर पैसा कमाते हैं। आधुनिक तकनीक वाली चीज़ों का इस्तेमाल करते हैं और मौक़ा मिले तो काम-वासना के गन्दे कुएँ में भी उतर जाते हैं।

वास्तव में यह लोगों की ग़लती है कि वे ऐसे लोगों को धर्मों से घसीटकर बाहर नहीं निकाल फेंकते। लोगों की अन्ध श्रद्धा ही इन पाखण्डी लोगों का सम्बल बना हुआ है। ऊपर से राजनीतिक जुगलबन्दी ने इन्हें भी बचा रखा है और राजनीति में बैठे पाखण्डियों के लिए भी। लोगों को हवा भी नहीं लगती कि ये लोग मिलकर ग़लत रीति-रिवाज़ों को भी धार्मिक साबित कर देते हैं। अपने कुकृत्यों को छिपाने के लिए ऐसे लोग धर्मों का सहारा इस तरह लेते हैं, जैसे कोई ग़लत आदमी अपने बचाव के लिए कुछ हथियारों का सहारा लेता है। धर्म ऐसे पाखण्डियों के लिए हथियार की तरह ही हैं, जो अनुयायियों को डराते हुए उन्हें सज़ा देने से बचाते रहते हैं। वैसे धर्म अफ़ीम की तरह भी होते हैं, जिन्हें जिसने भी चख लिया उसके अंतर्मन की आँखें तब तक नहीं खुलतीं, जब तक कि कोई सच्चा सन्त उनका मार्गदर्शन न करे। सौभाग्य से दुनिया में कई अच्छे सन्त पैदा हुए; लेकिन यह विडम्बना ही है कि पाखण्डियों के चक्कर में पड़े कमअक़्ल लोगों की आँखें फिर भी न खुलीं।

एक सच यह भी है कि गन्दगी पाखण्डी धर्माचार्यों में ही नहीं है, बल्कि धर्मों में भी कुछ ऐसी गन्दगी है, जो उनके अनुयायियों को दिग्भ्रमित करते हैं। एक तो यही भ्रम है कि कोई भी धर्म आज तक ईश्वर के बारे में सही व्याख्या नहीं कर सका है। उसके बाद उस ईश्वर को पाने के रास्ते इतने भटकाऊ हैं कि लोग उनके चक्कर में पडक़र जीवन भर चक्कर काटते रहते हैं और उनसे बाहर नहीं निकल पाते। वे एक ऐसी दलदल में फँस जाते हैं, जिससे निकल पाना न तो वे जानते हैं और न ही सोचते हैं। विडम्बना यह है कि उसी दलदल में पड़े ये लोग अपने-अपने भटकाऊ और पाखण्डी धर्मगुरुओं के बहकावे में आकर गन्दगी और करने लगते हैं। इस तरह से धर्मों में इतनी गन्दगी इकट्ठी हो चुकी है कि अब उस गन्दगी को साफ़ करना मुश्किल है। अगर कोई इस गन्दगी को साफ़ करना चाहे, तो उस पर अकारण ही हमले होने लगते हैं। हमलावर मूर्खतावश इसे धर्मों का विरोध समझते हैं।

सभी धर्मों से गन्दगी को $खत्म करना हो, तो इन धर्मों से उन बातों को हटाना आवश्यक है, जिनके चलते लोगों में आपसी भेदभाव, बैर, ईष्र्या, वैमनस्य, घृणा आदि चीज़ें पैदा हो रही हैं। इसके अतिरिक्त धर्मों से उन बातों को भी हटाना होगा, जो लोगों को दिग्भ्रमित करती हैं। इसके अतिरिक्त जितने पाखण्डी, धन्धेबाज़, ढोंगी, पापी, कामी, लोभी, अपराधी और अज्ञानी सन्त, फ़क़ीर, पादरी या जिस रूप में भी धर्मों का ठेका लेकर बैठे हैं, उन्हें भी धर्मों से निकालकर बाहर फेंक देना चाहिए। ऐसे लोगों को तो धर्मों से ही नहीं, समाज से भी निकालकर बाहर फेंक देना चाहिए। क्योंकि ऐसे लोग समाज में भी रहने लायक नहीं होते। समझ नहीं आता, जो लोग समाज से विरक्त होने का ढोंग करते हैं, उन्हें समाज में रहने की आवश्यकता क्यों रह जाती है। लोगों को चाहिए कि ऐसे लोगों पर पैनी नज़र रखें और अगर कोई ग़लत पाया जाता है, तो उसे समाज से निष्कासन की सज़ा दें। अगर कोई ग़लत करता है, तो वह सही हो ही नहीं सकता, भले ही वह धर्म से ही क्यों न जुड़ा हो। समाज ऐसे लोगों से दूषित होकर भटक जाता है, जिसके चलते पाप, अत्याचार, गुण्डागर्दी, दुराचार, ग़रीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी और दु:खों का पहाड़ हर व्यक्ति पर टूटता है, जिससे लोग कभी सुख से नही रह पाते। इसलिए पवित्रता पाने और उद्धार के लिए धमोँ में हर तरह से पवित्रता का होना आवश्यक है।

कनाडा से अवैध रूप से अमेरिकी में घुस रहे भारतीय परिवार समेत 8 की मौत

अवैध रूप से अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहे सेंट लॉरेंस नदी में डूबने से दो परिवारों के 8 लोगों की मौत हो गई। कनाडा से अमेरिका में घुस रहे इन लोगों में एक भारतीय परिवार भी शामिल है।

पुलिस ने शुक्रवार को कहा कि अवैध रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने की कोशिश करने के बाद कनाडा-अमेरिका सीमा के पास एक दलदल में दो बच्चों सहित आठ लोग मृत पाए गए। कनाडा के तटरक्षक बल के साथ हवाई खोज के दौरान क्यूबेक के एक इलाके में पलटी हुई नाव के निकट यह शव मिले।

अधिकारियों ने कहा – ‘संभवता यह सभी लोग कनाडा से अमेरिका में अवैध रूप से घुसने का प्रयास कर रहे थे। उनके शव अकवेस्ने मोहॉक समुदाय के एक लापता व्यक्ति की डूबी हुई नाव के पास पाए गए। कुल आठ शव पानी से बरामद किए गए हैं।’

मोहॉक आदिवासी क्षेत्र क्यूबेक और ओंटारियो के कनाडाई प्रांतों और अमेरिकी राज्य न्यूयॉर्क में फैला हुआ है। मोहॉक पुलिस ने शुक्रवार को कहा – ‘माना जा रहा है कि छह व्यक्ति दो परिवारों से थे। एक परिवार रोमानियाई मूल का और दूसरा भारत का है।’

सरबत खालसा बुलाने का अधिकार सिर्फ अकाल तख़्त प्रमुख को है: एसजीपीसी

पुलिस से भाग रहे अमृतपाल सिंह के मामले के बीच शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने कहा है कि सरबत खालसा सभा बुलाना केवल अकाल तख्त प्रमुख का विशेषाधिकार है। याद रहे फरार चल रहे अमृतपाल सिंह ने अपने वीडियो में सिख समुदाय से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख़्त के प्रमुख से सरबत खालसा की सभा बुलाने को कहा है।

एसजीपीसी के महासचिव गुरचरण सिंह ग्रेवाल ने कहा कि अमृतपाल सिंह  वह उसकी निजी इच्छा है। सरबत खालसा बुलाना या न बुलाना किसी और नहीं बल्कि अकाल तख्त का ही विशेषाधिकार है।

उन्होंने कहा – ‘चूंकि जत्थेदार सिख समुदाय का नेतृत्व करता है, इसलिए वह प्रत्येक निर्णय गहन विचार के साथ लेता है और सिख विद्वानों और बुद्धिजीवियों की राय लेता है। जत्थेदार देखेंगे कि मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर क्या किया जाना चाहिए।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि अमृतपाल सिंह के करीबी कई सिखों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया, जो गंभीर चिंता का विषय है।’

ग्रेवाल ने कहा – ‘हाल में 27 मार्च को जत्थेदार के आह्वान पर अकाल तख्त पर 100 सिख संगठनों की एक सभा हुई थी। सभा का एकमात्र एजेंडा पुलिस की कार्रवाई के बाद बनी स्थिति पर चर्चा करना था। गहन बैठक के बाद, जत्थेदार एक तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचे और पुलिस कार्रवाई के दौरान गिरफ्तार किए गए सिख युवकों को रिहा करने के लिए पंजाब सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया।’

याद रहे अजनाला पुलिस स्टेशन पर हमला करने की घटना के बाद से कट्टरपंथी उपदेशक और खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह 18 मार्च से फरार है। पुलिस उसे तलाश कर रही है। उसकी उपस्थिति को लेकर भी कई भ्रामक जानकारियां सामने आई हैं।

बता दें आखिरी सरबत खालसा का आयोजन 16 फरवरी, 1986 को हुआ था। उस समय ज्ञानी कृपाल सिंह अकाल तख्त के जत्थेदार थे। अमृतपाल सिंह ककी घटना सामने आने के बाद जत्थेदार हरप्रीत सिंह ने पंजाब सरकार को ‘अल्टीमेटम’ दिया था कि अमृतपाल सिंह और उसके ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के खिलाफ 18 मार्च से शुरू हुई कार्रवाई के दौरान पकड़े गए सिख युवकों को रिहा किया जाए। अब पंजाब सरकार ने हिरासत में लिए गए 360 में से 348 प्रदर्शनकारियों को रिहा कर दिया है।

पाकिस्तान में खाने के सामान के लिए जुटे लोगों में भगदड़ से 12 की मौत

पाकिस्तान में खाने के सामान के लिए जुटे लोगों में मची भगदड़ में 12 लोगों की मौत हो गयी है। यह घटना कराची की है जहाँ रमजान के लिए एक खाद्यान्न वितरण केंद्र पर भगदड़ मच गयी। भगदड़ तब मची जब खाना बांटने के समय कुछ लोगों ने गलती से बिजली के तार पर पैर रख दिया।

घटना में 12 लोगों की मौत हुए है जिनमें बच्चे और महिलाऐं शामिल हैं। कई लोग  घायल भी हुए हैं, जिनका इलाज किया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक बिजली के तार पर पैर रखने के बाद लोग एक दूसरे को धक्का देकर भागने लगे। कुछ लोग पास के नाले में जा गिरे।

अधिकारियों ने बताया कि शुरुआत में बिजली के तार की चपेट में आने से दो लोगों की मौत हुई, जिससे वहां अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया और भगदड़ मच गई। भीड़ की वजह से नाले की दीवार ढह गई और उसमें दो बच्चे और दो महिलाएं गिर गए।

इस घटना के अलावा पाकिस्तान में खाद्यान्न वितरण केंद्रों पर मची भगदड़ में मारे गए लोगों की संख्या कम से कम 22 हो गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पिछले हफ्ते मुफ्त खाद्यान्न वितरण की योजना शुरू की थी। हालांकि, इन घटनाओं के कारण लोगों को जान गंवानी पड़ी है

पंजाब कांग्रेस नेता नवजोत सिद्धू कल होंगे पटियाला जेल से रिहा

पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू शनिवार को पटियाला जेल से रिहा हो जाएंगे। उनके ट्विटर हैंडल से इसकी जानकारी दी गयी है। सिद्धू को पिछले साल मई में जेल जाना पड़ा था जब सर्वोच्च न्यायालय ने 34 साल पुराने रोडरेज मामले में उन्हें एक साल की जेल की सजा सुनाई थी। हाल में उनकी पत्नी नवजोत कौर के कैंसर से पीड़ित होने की ख़बरें भी मीडिया  थीं।

सिद्धू विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गए थे। हालांकि, पार्टी की हार के बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था। सिद्धू जो इस समय पटियाला जेल में हैं, कल रिहा होंगे।

सिद्धू के अधिकारिक ट्विटर अकाउंट से इसकी जानकारी साझा की गई है जिसमें कहा गया है – ‘सभी को सूचित किया जाता है कि सरदार नवजोत सिंह सिद्धू को कल पटियाला जेल से रिहा किया जाएगा। (जैसा कि संबंधित अधिकारियों द्वारा सूचित किया गया है।’

याद रहे एक व्यक्ति के परिवार की याचिका पर अदालत का फैसला आया था। इस व्यक्ति की 1988 में सिद्धू और उनके दोस्त के साथ झगड़े के बाद मृत्यु हो गई थी।  परिवार ने कड़ी सजा और सुप्रीम कोर्ट के 2018 के उस आदेश की समीक्षा की मांग की थी, जिसमें सिद्धू को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया था।

सर्वोच्च अदालत ने आदेश में कहा था कि अपर्याप्त सजा देने के लिए दिखाई गई कोई भी सहानुभूति न्याय प्रणाली को और अधिक नुकसान पहुंचाएगी और इससे कानून के प्रभाव के प्रति जनता के भरोसे पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। सिद्धू के अधिवक्ता एचपीएस वर्मा ने कहा कि पंजाब जेल नियमावली के मुताबिक अच्छे चालचलन वाला दोषी छूट पाने का हकदार हैं।

अहमदाबाद में मोदी विरोधी पोस्टर लगाने के मामले में 8 गिरफ्तार किये

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में पोस्टर लगाने के मामले में अब गुजरात के अहमदाबाद में 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। शहर के काफी हिस्सों में ‘मोदी हटाओ, देश बचाओ’ के पोस्टर लगाए गए थे जिस पर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक ये गिरफ्तारियां आम आदमी पार्टी के पीएम मोदी के खिलाफ राष्ट्रव्यापी पोस्टर अभियान शुरू करने के एक दिन बाद हुई हैं। आप ने भाजपा के खिलाफ ये पोस्टर अभियान देश भर में 11 भाषाओं में शुरू किया है।

याद रहे राजधानी दिल्ली में दीवारों पर पीएम के विरोध में हजारों पोस्टर दिखाई दिए थे, जिसके बाद पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की थी। इसमें 49 एफआईआर दर्ज की गईं और 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

गिरफ्तार किए लोगों में से दो प्रिंटिंग प्रेस के मालिक थे। आप ने यह पोस्टर अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू के अलावा, गुजराती, पंजाबी, तेलुगु, बंगाली, उड़िया, कन्नड़, मलयालम और मराठी में जारी किए हैं