क्यों BJP के लिए जरूरी बन गए Yogi Adityanath और Pushkar Dhami?

मिशन 2027: योगी-धामी पर भाजपा का 'रिपीट' दांव नेतृत्व पर मुहर: भाजपा हाईकमान ने योगी आदित्यनाथ और पुष्कर सिंह धामी को 2027 विधानसभा चुनाव के लिए आधिकारिक चेहरा घोषित किया…

साफ रणनीति: भाजपा अब 2027 के महासंग्राम में बिना किसी आंतरिक भ्रम के योगी-धामी के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी...
साफ रणनीति: भाजपा अब 2027 के महासंग्राम में बिना किसी आंतरिक भ्रम के योगी-धामी के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी...

-ममता सिंह, नई दिल्ली।

वर्ष 2027 की चुनावी बिसात अभी से बिछाते हुए BJP आलाकमान ने Uttar Pradesh में योगी आदित्यनाथ और Uttarakhand में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। पिछले काफी समय से राजनीतिक गलियारों में तैर रही नेतृत्व परिवर्तन की तमाम अटकलों और कयासों पर पूर्ण विराम लगाते हुए, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव इन्हीं दोनों चेहरों के इर्द-गिर्द लड़े जाएंगे। भाजपा का यह रणनीतिक निर्णय न केवल इन दोनों मुख्यमंत्रियों के कद को और मजबूत करता है, बल्कि इसने पार्टी के भीतर और बाहर सक्रिय उन विरोधियों के मंसूबों पर भी पूरी तरह पानी फेर दिया है जो बदलाव की उम्मीद लगाए बैठे थे।

इन दोनों राज्यों में बीते दो वर्षों से ‘अपनों’ ने ही अपनी सरकारों को निशाना बना रखा था। बावजूद इसके, योगी और धामी विकास के लक्ष्य से नहीं भटके। दरअसल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा पिछले दिनों योगी और धामी को लेकर जो घोषणा की गई, वह काम भाजपा हाईकमान को दो साल पहले ही कर देना चाहिए था। ऐसा नहीं है कि इन दिग्गज नेताओं को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए मुहिम हाल-फिलहाल में छेड़ी गई है, बल्कि यह मामला लंबे समय से चल रहा है। लेकिन खुद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सब कुछ जानकर भी चुप्पी साधे रहा।

शुरूआती दौर में ही यदि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इन मुख्यमंत्रियों के खिलाफ बगावती सुर अलापने वालों पर अनुशासन का डंडा चलाया होता तो आज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Nitin Nabin को मीडिया के सामने यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि योगी और धामी ही वर्ष 2027 में होने वाले विधान सभा चुनाव में पार्टी का चेहरा होंगे।  

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मुख्यमंत्री की कुर्सी एक है लेकिन दावेदारों की संख्या अनगिनत है। योगी और धामी को सीएम की कुर्सी पर इसलिए बिठाया गया कि उस दौरान तमाम खींचतान के बीच योगी और धामी का पलड़ा अन्य दावेदारों के मुकाबले काफी Heavyweight रहा। लेकिन जब कुर्सी के लिए खींचतान चली, तब भाजपा का ‘Think Tank’ खामोश रहकर तमाशबीन बना रहा। इसका असर निश्चित रूप से विकास योजनाओं पर पड़ा।

स्वाभाविक है कि जब कोई कुर्सी पर हमला करेगा, तो व्यक्ति कामकाज छोड़कर अपनी कुर्सी का बचाव करना शुरू करेगा। इस स्थिति में विकास योजनाओं का प्रभावित होना लाजिमी है। ऐसा ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी हुआ। क्योंकि खींचतान का फायदा नौकरशाही खूब उठाती है। नौकरशाह की नजर अगले उस व्यक्ति पर टिक जाती है जो कुर्सी पर बैठने वाला हो। ऐसे में करोड़ों-अरबों की केंद्र एवं राज्य पोषित योजनाएं प्रभावित होती हैं।

राजनीतिक रूप से इतना उथल-पुथल होने के बावजूद योगी और धामी ने अपने-अपने राज्यों में विकास का पहिया थमने नहीं दिया। उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है? मतलब साफ है कि दोनों राज्यों में राजनीतिक भूचाल आने के बावजूद योगी और धामी ने विकास से जुड़ी योजनाओं को पटरी से उतरने नहीं दिया। वैसे भी किसी भी राज्य के लिए राजनीतिक अस्थिरता Positive संकेत नहीं माना जा सकता है।

प्रयागराज में योगी ने दिव्य एवं भव्य Maha Kumbh का सफल आयोजन करके पूरे विश्व को न केवल अपनी क्षमता दिखाई, बल्कि सबको चौंका भी दिया। उत्तर प्रदेश से ‘Gundaraj’ का खात्मा योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी सफलता है। वहीं, केंद्र ने उत्तराखंड को बतौर प्रयोगशाला प्रयोग किया और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वही किया जैसा केंद्रीय नेतृत्व चाहता था। भाजपा के एजेंडे को पूरी तरह से क्रियान्वित करने वाला उत्तराखंड अब पहला राज्य बन गया है। नकल विरोधी कानून से लेकर यूसीसी (UCC) को बिना देर किए लागू करना धामी की बड़ी कामयाबी है।

बहरहाल, जब योगी और धामी अपने-अपने राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री के इशारे पर ही भाजपा के एजेंडे को लागू कर रहे थे, तो बार-बार नेतृत्व परिवर्तन की मांग क्यों उठ रही थी? महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस हवा को बल कौन दे रहा है? उससे भी अहम बात यह है कि जब इतना बवंडर चल रहा था, तब भाजपा नेतृत्व किन कारणों से खामोश रहा? यह सच है कि यदि शुरुआत में ही विरोधियों की नकेल कसी गई होती, तो आज नेतृत्व को मीडिया के सामने आकर सफाई नहीं देनी पड़ती। विश्लेषकों का कहना है कि ये दोनों तो शुरू से ही चेहरा थे, फिर दोबारा घोषणा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? स्पष्ट है कि भाजपा के अंदर भी कोई बड़ा ‘खेला’ चल रहा है।