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ज्ञान के मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार

शिवेंद्र राणा

मई, 1997 में स्वर्ण जयंती रथयात्रा, जिसे लालकृष्ण आडवाणी ने राष्ट्रभक्ति की तीर्थ यात्रा कहा; के दौरान जब वह उड़ीसा पहुँचे, तब उन्होंने अपने भाषण में कहा था- ‘आम लोगों को एक टेलीफोन कनेक्शन या गैस कनेक्शन लेने के लिए रिश्वत क्यों देनी पड़ती है? हमारे देश में जीवन की बुनियादी ज़रूरतों की चीज़ों की इतनी कमी क्यों है? मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जब भाजपा केंद्र में सत्ता में आएगी, तब हम इन स्थितियों को बदल देंगे।’ अब वाजपेयी की गठबंधन सरकार को जाने दें, तो भी अभी पिछले नौ वर्षों से प्रचंड बहुमत के साथ केंद्रीय सत्ता में स्थापित भाजपा अपने पितृपुरुष आडवाणी के वादे को न सिर्फ़ भूल गयी है, बल्कि शर्मसार करने पर उतर आयी है। आडवाणी के वक्तव्य के लिए कई कारण गिनाये जा सकते हैं। परन्तु इसे याद करने की एक विशेष वजह है।

दरअसल बीते दिनों बिहार के नये राज्यपाल राजेंद्र्र आर्लेकर ने राज्य के सात विश्वविद्यालयों- मगध विश्वविद्यालय बोधगया, पटना विश्वविद्यालय, मौलाना मज़हरुल हक़ अरबी एवं फ़ारसी विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय आरा और मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलसचिवों (रजिस्टार) के काम-काज पर रोक लगाने के निर्देश जारी कर दिये। इनकी नियुक्तियाँ पूर्व राज्यपाल फागू चौहान के समय हुई थीं। साथ ही आर्लेकर भागलपुर विश्वविद्यालय के वित्त पदाधिकारी और वित्तीय परामर्शी के काम पर भी रोक लगायी है, जिनकी नियुक्ति फागू चौहान ने अपने तबादले की ख़बर आने के बाद की थी। बताते चलें कि चौहान के कार्यकाल में बिहार के विश्वविद्यालयों में व्याप्त घोर भ्रष्टाचार आम चर्चा में था। माननीय के कृत्यों का स्तर यह है कि बिहार से अपने तबादले के बाद भी उन्होंने न सिर्फ़ एक विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति की, बल्कि कई रजिस्ट्रारों का ट्रांसफर भी कर दिया।

यह कोई पहला या विशेष मामला नहीं है, जहाँ विश्वविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रकाश में आया है। देश में उच्च शिक्षण संस्थान इस समय संगठित भ्रष्टाचार का केंद्र बने हुए हैं। उदाहरणस्वरूप अभी चर्चा में रहा छत्रपति शाहू जी विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति प्रोफेसर विनय पाठक का मामला। उन पर फ़र्ज़ीवाड़े, भ्रष्टाचार और रंगदारी जैसे गम्भीर आरोप लगे, जिनकी जाँच सीबीआई एवं ईडी कर रही है। एकेटीयू के कुलपति प्रो. पी.के. मिश्रा पर पद के दुरुपयोग और गम्भीर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगाये गये, जिसकी जाँच शुरू होने के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। आगरा वि.वि. के कुलपति प्रो. अशोक मित्तल पर वित्तीय अनियमितता, संविदा शिक्षकों की नियुक्ति में नियमों का पालन न करने के आरोप लगने के बाद उन्होंने जनवरी, 2022 में इस्तीफ़ा दे दिया। ऐसे ही अवध वि.वि. के कुलपति प्रो. रविशंकर सिंह ने भी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगने के पश्चात् जून, 2022 में इस्तीफ़ा दे दिया। दिसंबर, 2020 में भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय (लखनऊ) की कुलपति प्रो. श्रुति सडोलीकर को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में बर्ख़ास्त कर दिया था। जनवरी, 2021 में उनके ख़िलाफ़ गबन, धोखाधड़ी आदि धाराओं में एफआईआर दर्ज करायी गयी। ध्यातव्य हो यूपी के गर्वनर रहे टीवी राजेश्वर ने अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार एवं वित्तीय अनियमिताओं के आरोप में रुहेलखंड वि.वि. बरेली, पूर्वांचल वि.वि. जौनपुर, बुंदेलखंड वि.वि. झांसी, कानपुर कृषि वि.वि. और मेरठ कृषि वि.वि. गोरखपुर वि.वि. आदि लगभग 10 कुलपतियों को बर्ख़ास्त किया था। 2007-08 में सी.पी.एम.टी. में गड़बडिय़ों पर पूर्वांचल वि.वि. के कुलपति को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। राज्यपाल राम नाइक ने भी कानपुर कृषि वि.वि. के कुलपति को भ्रष्टाचार की शिकायतों पर बर्ख़ास्त किया था।

इन भ्रष्ट तत्त्वों को सत्ता का संरक्षण इतना जबरदस्त है कि ये ऐसे आरोपों और जाँच को अपने जूतों पर रखते हैं। जनवरी से सीबीआई विनय पाठक के भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच कर रही है। पिछले डेढ़ दशक में सम्भवत: सूबे में यह पहला मामला है, जिसमें किसी कुलपति पर इतनी गम्भीर धाराओं में मुक़दमे दर्ज हों, वह पद पर विराजमान हो और अलग-अलग विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्त किया जाता रहा हो। इसी प्रकार जाँच एजेंसियों की कार्रवाई की ज़द में रहे एकेटीयू के कुलपति प्रो. पी.के. मिश्र को पदच्युत करने के बजाय उन्हें शकुंतला वि.वि. से संबद्ध कर दिया गया। यही नहीं, राजभवन की ओर से जारी दिशा-निर्देश के बावजूद ये लोग जाँच में भी सहयोग नहीं करते रहे हैं। आख़िर भ्रष्टाचार के विरुद्ध निरंतर गर्जन-तर्जन करने वाली, विपक्षी नेताओं उनकी उनके कार्यकाल की जाँच को आतुर सरकार इस वीभत्स स्थिति पर मौन क्यों है?

अब उच्च शिक्षा की उन्नति के लिए सरकार की नीयत को एक दूसरे प्रसंग से समझने का प्रयास करते हैं। इस वर्ष जनवरी में नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सिफ़ारिश के पश्चात् विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जारी एक नये मसौदे के तहत अब विदेशी उच्च शिक्षण संस्थान यूजीसी की अनुमति से देश में कहीं भी अपने कैंपस खोल सकेंगे। यह अनुमति शुरुआत में 10 वर्षों की होगी, जिसे यथावत् रखने का फ़ैसला प्रदर्शन के आधार पर लिया जाएगा। इनकी निगरानी का अधिकार भी यूजीसी को दिया गया है। इन विदेशी शिक्षण संस्थानों द्वारा किसी भी अनियमितता की स्थिति में ज़ुर्माना और अनुमति वापस लेने जैसे दंडात्मक प्रावधान भी किये गये हैं। सरकार का तर्क है कि यह बड़ा क़दम है। इससे राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत देश में ही गुणवत्तापूर्ण और विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा मुहैया हो सकेगी। इससे भारतीय छात्रों का उच्च शिक्षा हेतु यूरोप और अमेरिका पलायन रोका जा सकेगा और भारतीय मुद्रा की बचत होगी। चालू शैक्षणिक सत्र में ही तक़रीबन साढ़े चार लाख विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए विदेश गये, जिनके द्वारा अनुमानित व्यय 28-30 बिलियन डॉलर होगा।

अब इस महान् नीति का दूसरा पहलू देखिए- यूजीसी के मसौदे के अनुसार, भारत में अपने दाख़िले और शिक्षण शुल्क तय करने का अधिकार इन विदेशी विश्वविद्यालयों को ही होगा। यूजीसी इसमें दख़ल नहीं देगा। दूसरा, ये संस्थान शुल्क भारतीय रुपये में ही लेकर अपने देश भेजेंगे। भारतीय मुद्रा तब भी बाहर ही जाएगी। तो जिस रुपये के संरक्षण का दावा किया जा रहा है, वह तो वैसे भी विदेशी विश्वविद्यालयों को प्राप्त धन के रूप में बाहर जाएगा। साफ़ है यह योजना भारतीय विश्वविद्यालयों, विशेषकर कमज़ोर संसाधनों और निम्न उत्पादकता वाले शिक्षण संस्थानों को निगल जाएगी। वैसे ही, जैसे देश के तमाम प्राथमिक विद्यालयों को निगलकर आज हरेक दूसरे चौराहे पर किंडरगार्टन और कॉन्वेंट स्कूल जैसी शिक्षा प्रदाता दुकानें दिखती हैं। सवाल यह है कि इन विदेशी संस्थानों की गुणवत्ता का मानक क्या हो, यह भी स्पष्ट होना बाक़ी है। लेकिन इन महँगे विदेशी विश्वविद्यालयों में नामांकन भी धनाढ्य परिवारों के बच्चों ही कराएँगे, क्योंकि इनकी मनमानी फीस चुकाने की क्षमता आम भारतीय परिवारों में होना कठिन है। यह सम्भवत: उदारीकरण का विस्तार है। तब इसका सीधा अर्थ है कि भारत को विकसित और श्रेष्ठ बनाने के नाम पर इसे शिक्षा का ग्लोबल बाज़ार बनाने अथवा उदारीकरण की नीति के तहत शिक्षा के बाज़ारीकरण की पूरी तैयारी हो चुकी है।

होना तो यह चाहिए था कि अपने देशी उच्च शिक्षण संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने के प्रयास किये जाते। परन्तु प्राध्यापकों की राजनीतिक नियुक्तियाँ और जनता के पैसे से मोटी तनख़्वाह पर इन तथाकथित बौद्धिक परजीवियों का पालन ही इस समय मुख्य ध्येय बन गया है। एक उदाहरण से इसे समझिए. पत्रकारिता विभाग में कई ऐसे लोग उच्च पदों पर हैं, जिन्होंने जीवन में कभी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पत्रकारिता नहीं की है। केवल किताबों में पढ़ा है और एकेडमिक सम्बन्धों के बूते विश्वविद्यालयों में नियुक्त होकर वही किताबी ज्ञान बच्चों को दे रहें हैं। मानविकी के कई ऐसे प्राध्यापक की, जो प्रोफेसर पद तक प्रोन्नत हो चुके हैं; अपने विषयों में गम्भीर लेखन तो दूर, सम्बम्धित मुद्दों पर बात करते हुए ज़बान लडख़ड़ाने लगती है। यदि इनसे भारत के भविष्य निर्माण की उम्मीद की जा रही है, तो स्थिति चिंताजनक है।

परन्तु इन मुद्दों पर विमर्श की कौन कहे, यहाँ वसूली से फ़ुर्सत मिले तभी इस दिशा में कुछ सोचा जाएगा। तो पहले सरकार संरक्षित इन शिक्षा माफ़ियाओं द्वारा वसूली की हवस पूरी हो जाए, फिर यदि समय मिला तो शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सोच लिया जाएगा। साथ ही अगर विधिक नज़रिये से देखें, तो यदि कुलपतियों की नियुक्तियाँ आर्थिक लेन-देन पर आधारित है और नियुक्ति के पश्चात् स्वयं ये कुलपति ले-देकर नियुक्तियाँ कर रहें हैं और ख़ुद भी दोनों हाथों से बटोर रहें हैं, तो इसमें कोई बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि विधि आयोग सरकार को नये क़ानून के रूप में यह प्रस्ताव दिया है कि सही काम के लिए रिश्वत देना अब अपराध नहीं रहेगा। यानी अब सही लोगों को नियुक्त करिये और सही तरीक़े से बटोरिये और इन सही लोगों से भी बटोरवाइए। यदि विश्वविद्यालयी भ्रष्टाचार के मामलों के उद्धरण एवं गिनती की बात हो, तो एक पूरा महाकाव्य लिखना पड़ सकता है।

वैसे भी जिस सरकार में एक पेशेवर अपराधी केंद्रीय गृहराज्य मंत्री हो, जहाँ तमाम गम्भीर आरोपों को धता बताकर एक बाहुबली कुश्ती संघ के अध्यक्ष पद पर बना रहा सकता है, उससे कौन-सी नैतिकता की उम्मीद की जाए? बिहार में राजभवन के संरक्षण में हुए इन अनियमितताओं के प्रकाश ने आने पर ना सिर्फ़ मौन साधने, बल्कि ऐसे व्यक्ति को पुन: उसी स्तर के पद यानी मेघालय का राज्यपाल नियुक्त करने वाली भाजपा लालू परिवार के आर्थिक अपराधों के आरोप पर किस निर्लज्जता से मुखर हो रही है? यहाँ भाजपा विपक्ष पर दुष्प्रचार का आरोप भी नहीं लगा सकती, क्योंकि राजेंद्र्र आर्लेकर कोई विपक्षी एजेंट नहीं, बल्कि संघ की पृष्ठभूमि से आये एक सम्मानित-स्वच्छ छवि के व्यक्ति है। वैसे भी फागू चौहान, जो स्पष्ट रूप से संवैधानिक अधिकारों के दुरुपयोग के आरोपों से घिरे हैं, उन्हें पुन: मेघालय के राज्यपाल पद पर नियुक्त करके सरकार क्या संदेश देना चाहती है?

रही बात केंद्र सरकार की, तो उच्च शिक्षा के लिए वह  कितनी आग्रही थी, इसका प्रमाण उसने 2014 में मंत्रिमंडल के गठन के समय दिया। जब उसने स्मृति ईरानी को मानव संसाधन मंत्रालय (अब शिक्षा मंत्रालय) का प्रभार सौंपा, जिनकी योग्यता यह थी कि कई वर्षों तक सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने और टीवी सीरियल में काम करने के अतिरिक्त वे इंटरमीडियट यानी 12वीं कक्षा तक पढ़ी भी थी। अजीब है, तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक परिवेश में भाजपा को क्या कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो शिक्षा व्यवस्था के रूप में देश का भविष्य संभाल पाये। शिक्षा ही किसी राष्ट्र के भविष्य की नींव तैयार करती है और उसे एक अर्द्ध-शिक्षित सांसद को सौंप कर पार्टी ने अपनी हद पहले ही दिखा दी थी। सत्ता से नैतिकता की उम्मीद छोड़ दें पर जनता को समझना होगा कि जब भी कोई सत्ता शिक्षा और शिक्षण संस्थानों में अनाधिकृत हस्तक्षेप करती है, तो वह वास्तव में समाज को पतनशीलता की ओर धकेल रही होती है। भाजपा की धोवन मशीन से शुद्ध होकर संवैधानिक एवं सांविधिक पदों पर नियुक्त किये जा रहें है ये समाजद्रोही शिक्षा माफ़िया, शिक्षण संस्थानों में कितनी गंदगी फैला रहे हैं, वो शायद सत्ताधारी दल को नहीं दिख रहा है या सत्ता के दंभ में उसे अनदेखा कर रही है अथवा अपने वसूली एजेंट के रूप में प्रश्रय दे रही है। कारण जो भी हो, परन्तु इसका दुष्परिणाम देश का भविष्य भुगतेगा।

(लेखक पत्रकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं।)

धुँधली हो रही जम्मू-कश्मीर में चुनाव की उम्मीद

देश 2024 के आम चुनाव के लिए तैयार हो रहा है। लेकिन ऐसा कोई संकेत नहीं है कि जम्मू और कश्मीर में विधानसभा चुनाव होंगे। और हर बीतते महीने के साथ राष्ट्रीय चुनाव से पहले केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव होने की उम्मीद तेज़ी से धुँधली पड़ती जा रही है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि केंद्र शासित प्रदेश में भाजपा को छोडक़र पूरा राजनीतिक वर्ग चाहता है कि निकट भविष्य में चुनाव हों।

जम्मू-कश्मीर में जून, 2018 के बाद से कोई निर्वाचित सरकार नहीं है, जब पीडीपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और बहुमत खोने के कारण सरकार की विदाई होते ही वहाँ राज्यपाल शासन लगाया गया था। इसके बाद 5 अगस्त, 2019 को, नई दिल्ली ने अनुच्छेद-370 को निरस्त कर दिया, जिसमें भारत के संविधान के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल था। साथ ही राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़  में बाँट दिया गया। तब से वहाँ राज्यपाल की जगह उपराज्यपाल ने ज़िम्मा सँभाल लिया। पिछले चार साल में पूर्ण राज्य से केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के बाद जम्मू कश्मीर में बड़ा राजनीतिक बदलाव देखा गया है। इतना कि कई पहलुओं में वर्तमान जम्मू-कश्मीर अगस्त, 2019 से पहले की तुलना में बहुत कम समानता रखता है। भाजपा शान्ति स्थापित करने का दावा कर रही है; लेकिन फिर भी चुनाव कराने से कतरा रही है। इसने विपक्षी दलों को एकजुट होने और चुनाव की माँग करने के लिए मजबूर किया है।

मार्च की शुरुआत में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्ला के नेतृत्व में राजनीतिक नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने भारत के चुनाव आयोग से मुलाक़ात कर केंद्र शासित प्रदेश में जल्द चुनाव की माँग की परिसीमन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। उन्होंने आयोग को ज्ञापन सौंपा, जिसमें यूटी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली का आह्वान किया गया था। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार कहा है कि सरकार विधानसभा चुनाव कराने के लिए तैयार है; लेकिन अन्तिम फ़ैसला आयोग को लेना है।

ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में फ़ारूक़ अब्दुल्ला, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, राकांपा प्रमुख शरद पवार डीएमके, टीएमसी, राजद, सपा, आप जैसे राष्ट्रीय दलों के वरिष्ठ नेता शामिल थे। इन नेताओं ने समर्थन देने के लिए मई में श्रीनगर जाने का भी फ़ैसला किया। जम्मू-कश्मीर के नेताओं द्वारा इस क्षेत्र में राज्य और लोकतंत्र की बहाली के लिए देश भर के विपक्षी दलों से समर्थन माँगने का यह पहला प्रयास था। यह पहल अब्दुल्ला के जम्मू सम्भाग के विपक्षी नेताओं की रैली करने के तुरन्त बाद हुई।

इस ज्ञापन में कहा गया है कि चुनाव आयोग जम्मू और कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने के लिए एक संवैधानिक दायित्व से बँधा है। चुनाव में देरी और इनकार करना जम्मू और कश्मीर के लोगों को उनके मौलिक और लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करना और संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन होगा। नेशनल कॉन्फ्रेंस सांसद हसनैन मसूदी ने कहा- ‘भारत के चुनाव आयुक्त ने कोई विशेष तारीख़ नहीं दी है कि चुनाव कब होंगे। लेकिन हमें उम्मीद है कि यह बैठक फलदायी होगी।’

देश में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले क़रीब 10 विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर उनमें से एक नहीं है। इनमें कर्नाटक (घोषित हो चुके हैं और मई में होंगे), छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना के चुनाव काफ़ी अहम होंगे। भाजपा इन सभी को जीतने की उम्मीद करेगी; लेकिन यदि उसे अगर पार्टी को इनमें से अधिकांश राज्यों में हार का सामना करना पड़ा, तो यह उसकी 2024 की संभावनाओं पर सवालिया निशाँ लगा सकता है। यह चुनाव विपक्ष, ख़ासकर कांग्रेस के लिए फिर से पैर जमाने का आख़िरी अवसर होगा।

जम्मू-कश्मीर में चुनावों का बेसब्री से इंतज़ार है, क्योंकि इस क़वायद से राज्य का दर्जा बहाल होने की उम्मीद लोगों को है। कम-से-कम केंद्रीय गृह मंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा चुनाव होने और प्रतिनिधि सरकार बनने के बाद ही बहाल होगा। अभी तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि केंद्र अपनी नीति की समीक्षा कर रहा है।

जहाँ तक मौसम और सुरक्षा की बात है, कश्मीर में अभी वसंत का समय है और मौसम अपेक्षाकृत गर्म है। दूसरा, सुरक्षा के लिहाज़ से कश्मीर अब काफ़ी अधिक शान्तिपूर्ण जगह है। वैसे भी इसे केंद्र सरकार अगस्त, 2019 में क्षेत्र की विशेष स्थिति ख़त्म करने के बाद अपनी एकमात्र उपलब्धि के रूप में पेश करती है। यदि यह सही चुनाव के लिए यह आदर्श समय है। लेकिन किसी-न-किसी वजह से चुनाव टाले जा रहे हैं। कुछ लोग अनुमान लगा रहे हैं कि भाजपा ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है और 2024 के चुनावों के बाद तक के लिए उन्हें स्थगित करना चाहती है, जब वह देश में एक नये जनादेश के साथ लौटने की उम्मीद करती है।

कश्मीर में घटी आतंकियों की संख्या

जम्मू-कश्मीर पुलिस के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, कश्मीर घाटी में सक्रिय आतंकियों की संख्या अब तक के सबसे निचले स्तर 28 पर पहुँच गयी है। तीन दशक में यह पहली बार है कि जब आतंकियों की संख्या इस तरह कम हुई है। सुरक्षा बल आशावादी हैं कि आने वाले हफ़्तों में यह संख्या घटती रहेगी। हाल में एक साक्षात्कार में जम्मू-कश्मीर के सहायक पुलिस महानिदेशक विजय कुमार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना, अर्धसैनिक बलों और एनआईए, ईडी और एसआईए जैसी केंद्रीय और राज्य एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई ने सक्रिय आतंकवादियों को बेअसर करने और गिरफ़्तार करने में मदद की है।

स्थानीय युवाओं की नयी भर्ती पर अंकुश लगा है, जिससे क्षेत्र में आतंकियों की संख्या में कमी लाने में मदद मिली है। उनके मुताबिक, ‘सुरक्षा बल इस संख्या को और नीचे लाने, आतंकी पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करने और आतंकवादियों को आश्रय या सहायता प्रदान करने वाले किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’ जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने और उसका विशेष दर्जा ख़त्म करने के बाद ऑपरेशन ऑल आउट के तहत अब तक 500 से अधिक आतंकी मारे गये हैं, जिनमें से अधिकांश स्थानीय युवा और दक्षिण कश्मीर के रहने वाले हैं। इससे शान्ति बहाल करने में मदद मिली है।

सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकवादियों और उन्हें पनाह देने वालों की सम्पत्तियों को भी ज़ब्त किया है। आतंकियों को शरण देने वाले घरों को भी इन्होंने अपने क़ब्ज़े में ले लिया है। आतंकियों की घटती संख्या ने यूटी सरकार के लिए कश्मीर घाटी के कुछ हिस्सों से सेना को वापस बुलाना सम्भव बना दिया है। हालाँकि सवाल यह है कि क्या उग्रवाद का यह कमज़ोर होना स्थायी है?

पिछले तीन दशक के रिकॉर्ड को देखकर ऐसी आशंका पैदा होती है। घुसपैठ कम हुई है, और स्थानीय भर्ती घटी है। लिहाज़ा आने वाले महीनों में ज़मीन की सही स्थिति का पता चलेगा।

हम जानते हैं कि एक बार प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद वे (चुनाव) अवश्य होने चाहिए। और मौसम, सुरक्षा चिन्ताओं और अन्य सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, …उस समय होने वाले अन्य चुनाव…(को ध्यान में रखकर हम निर्णय लेंगे)।

राजीव कुमार

(सीईसी द्वारा जनवरी में दिया गया बयान)

अदालती फ़ैसलों में देरी के लिए ज़िम्मेदार कौन?

हिंदुस्तान की अदालतों से ज़्यादातर लोगों की शिकायत रहती है कि उनके फ़ैसले काफ़ी देरी से आते हैं। हालाँकि यह शिकायत ग़लत नहीं है, क्योंकि देखा गया है कि फ़ैसले आने में देरी होती ही होती है। बहुत कम मामले ऐसे हैं, जिन पर कम समय में फ़ैसले आते हैं। कई मुक़दमे तो दो से तीन-चार पीढिय़ाँ तक लड़ती रहती हैं। सवाल यह है कि क्या इसके लिए केवल अदालतें और जज ही ज़िम्मेदार हैं?

हाल ही में इंडिया टुडे के एक कॉन्क्लेव में ‘जस्टिस इन द बैलेंस : माय आइडिया ऑफ इंडिया एंड द इंपॉर्टेंस ऑफ सेपरेशन ऑफ पॉवर्स इन अ डेमोक्रेसी’ विषय पर सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों की परेशानियों को देश के सामने रखा। उन्होंने जजों की छुट्टियों को लेकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का हर जज सातों दिन काम करता है। उन्होंने कहा कि हम सुबह 10:30 बजे से शाम 4:00 बजे के बीच करते हैं, वह हमारे काम का एक हिस्सा है। इसके अलावा हर शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का हर जज अपने आदेश को डिक्टेट करता है और फिर रविवार को उसी आदेश को पढ़ता है, जो उसे सोमवार को सुनाना है।

सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में एक महीने में सिर्फ़ आठ से नौ दिन और पूरे साल में सिर्फ़ 80 दिन ही काम होता है। क्योंकि वहाँ कोर्ट तीन महीने भी नहीं चलती। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में हाई कोर्ट एक महीने में दो हफ़्ते सुनवाई ही करता है। वहाँ भी पूरे साल में 100 से भी कम दिन तक जज बैठते हैं। वहाँ कोर्ट की दो महीने की छुट्टी रहती है। इसी तरह से सिंगापुर की अदालतें पूरे साल में सिर्फ़ 145 दिन काम करती हैं। लेकिन ब्रिटेन और हिंदुस्तान में अदालतें साल में 200 दिन काम करती हैं। लेकिन लोगों को नहीं पता कि हिंदुस्तान में जजों को जो छुट्टी मिलती है, उसमें से ज़्यादातर वक़्त सुरक्षित रखे गये आदेशों को लिखने में गुज़र जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यहाँ जजों को पूरे हफ़्ते काम करना पड़ता है।

सीजेआई ने कहा कि जजों के पास छुट्टियों का उपयोग अपने लिए करने का समय ही नहीं होता, वो लगातार मुक़दमों के निपटारे में लगे रहते हैं। इसलिए वह अदालत में भाषा और टेक्नोलॉजी में कुछ तरह के बदलाव लेकर आ रहे हैं। उन्हें संगीत सुनना बहुत पसंद है।

हिंदुस्तान के पूर्व सीजेआई जस्टिस एनवी रमना (तब के सीजेआई) ने ठीक ही कहा है कि हिंदुस्तान की अदालतें काम के बोझ तले दबी हुई हैं। उनके अनुसार, हिंदुस्तान की निचली अदालतों में चार करोड़ से ज़्यादा मुक़दमे लंबित पड़े हैं। उन्होंने सीजेआई रहते हुए मुख्य न्यायाधीशों के 39वें सम्मेलन का उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मौज़ूदगी में साफ़ कहा था कि अदालतें जजों की कमी से जूझ रही हैं। देश में 10 लाख लोगों पर महज़ 20 जज हैं, जो बढ़ती मुक़दमेबाज़ी को सँभालने के लिए नाकाफ़ी हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि 24,000 जजों के पदों में बड़ी संख्या में जजों के पद ख़ाली पड़े हैं। उस समय उन्होंने देश के 25 उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों से जल्द-से-जल्द जजों की पदोन्नति के लिए नाम भेजने को भी कहा था।

एनसीआरबी के आँकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में देश में एससी, एसटी और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामले तेज़ी से बढ़े हैं। अख़बारों की सुर्ख़ियाँ देखने और सोशल मीडिया में हर दिन हज़ारों ख़बरों को देखने से पता चलता है कि देश में पिछले कुछ वर्षों से एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं, किसानों, मज़दूरों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अपराधों में बढ़ोतरी हुई है। एक अनुमान के मुताबिक, अदालतों में लंबित मामलों के चलते एससी, एसटी और महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध के मुक़दमे दर्ज होने में या तो देरी होती है या देरी के चलते पीडि़त ही मुक़दमे दर्ज नहीं करवा पाते हैं या पुलिस ही उनके मामलों को अपने पास रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करती है। इतनी अड़चनों के बावजूद भी जो मुक़दमे दर्ज हो भी जाते हैं, उनका फ़ैसला आने में काफ़ी देरी होती है। एनसीआरबी के मुताबिक, एससी, एसटी और महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराधों से ज़्यादा चिन्ता की बात यह है कि उन्हें समय पर न्याय नहीं मिलता और अधिकतर मामले अदालतों में लंबित ही रह जाते हैं।

एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में एससी के लोगों के ख़िलाफ़ 45,935 अपराध दर्ज हुए, जो कि साल 2018 के मुक़ाबले 7.3 फ़ीसदी ज़्यादा थे। मतलब साल 2019 में देश में हर 12 मिनट में एक दलित के ख़िलाफ़ अपराध हुआ। इसी प्रकार से महिलाओं के ख़िलाफ़ भी अपराध बढ़े हैं। एक अनुमान के मुताबिक, एससी, एसटी और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमों में से छ: से आठ फ़ीसदी मुक़दमों पर ही फ़ैसला आ पाता है। इसका मतलब यह हुआ कि 92 से 94 फ़ीसदी मुक़दमों में एससी, एसटी के लोगों और महिलाओं को समय पर न्याय नहीं मिल पाता।

इसी प्रकार से एनसीआरबी के साल 2021 के आँकड़ों के मुताबिक, जेलों में मुस्लिम क़ैदियों की तादाद घटी है, जबकि हिंदू क़ैदियों की तादाद में इज़ाफ़ा हुआ है। आँकड़ों के मुताबिक, साल 2021 में मुस्लिम क़ैदियों की संख्या 18.7 फ़ीसदी हो गयी थी, जो कि साल 2020 में 20.2 फ़ीसदी थी। बहरहाल, देश में बढ़ते अपराधों का नतीजा यह हो रहा है कि देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही रही है। जजों की कमी के चलते दशकों पुराने मामले भी अदालतों में चल रहे हैं। जजों की कमी के चलते हर रोज़ जितने पुराने मुक़दमों का निपटारा हो रहा है, उससे कहीं ज़्यादा मुक़दमे हर रोज़ अदालतों में दर्ज हो रहे हैं।

पिछले दिनों लोकसभा को दिये एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने सूचित किया था कि देश में 4.70 करोड़ मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से 69,000 मुक़दमे सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। वहीं देश के 25 उच्च न्यायालयों में क़रीब 60 लाख मुक़दमे लंबित हैं, तो निचली अदालतों में 4,10,47,976 मुक़दमे लंबित हैं। केंद्र सरकार ने यह भी बताया कि इन आँकड़ों में अरुणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के आँकड़े शामिल नहीं हैं, जो कि उसके पास उपलब्ध भी नहीं हैं।

अदालतों में जहाँ लंबित मुक़दमों के चलते लोग परेशान रहते हैं, वहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से वकील और लगातार काम के बोझ से जज परेशान रहते हैं। इसके निपटारे के लिए या तो सरकार को अदालतों और जजों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी या फिर जजों को साल के 365 दिन लगातार 16-16 घंटे काम करना पड़ेगा, तब कहीं जाकर लंबित मुक़दमों को आगामी 10 वर्षों में 80 से 90 फ़ीसदी तक निपटाया जा सकेगा। 

पिछले दिनों क़ानून मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में कहा था कि अदालतों में मामलों का समय पर निपटारा बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है, जिसमें जजों और अन्य न्यायिक अधिकारियों की समुचित संख्या, आधारभूत ढाँचा, तथ्यों की जटिलता, सुबूतों की उपलब्धता, पक्षों का सहयोग, नियमों औ प्रक्रियाओं का पालन आदि शामिल हैं। हालाँकि हाल ही में उन्होंने इंडिया टुडे कांक्लेव में विवादित बयान भी दिया। उन्होंने दावा किया कि कुछ एक्टिविस्ट चाहते हैं कि कोर्ट विपक्षी दल की भूमिका निभाएँ। इस दौरान वह कॉलेजियम प्रणाली की निंदा करने से नहीं चूके और उन्होंने इसका ठींकरा कांग्रेस पार्टी के सिर पर फोड़ते हुए कहा कि यह कांग्रेस पार्टी के दुस्साहस का परिणाम है।

बहरहाल नीति आयोग ने साल 2018 में अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि जिस रफ़्तार से अदालतों में मामलों का निपटारा हो रहा है, उससे लंबित पड़े मामलों के निपटारे में 324 साल से ज़्यादा का वक़्त लगेगा। सन् 2018 में 2.9 करोड़ मामले देश की अदालतों में लंबित पड़े थे। इन मामलों में से 65,695 मामले 30 साल से ज़्यादा पुराने थे। क़ानून और अदालतों की व्यवस्था के जानकार बताते हैं कि मुक़दमों में देरी का एक कारण डिजिटाइजेशन का न होना भी है। कोरोना काल में अदालतों ने ऑनलाइन सुनवाई की थी, साथ ही पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश की अदालतों ने मुक़दमों के निपटारे में तेज़ी लाने की कोशिश की है; लेकिन तेज़ी से दर्ज होते मुक़दमों के चलते और जजों की कमी के चलते मुक़दमों के निपटारे में देरी होती है। इसके अलावा सरकारों और पूँजीपतियों के दबाव के चलते भी आम आदमी के मामले लटके रहते हैं। इसलिए बुद्धिजीवी वर्ग हमेशा कहता है कि अदालतों को दबाव मुक्त होना चाहिए और उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए जिस प्रकार से बनाया गया है, उनकी स्वतंत्रता को उसी प्रकार से बरक़रार रहने देना चाहिए।

जहाँ तक देश में अदालतों में जजों के पदों की बात है, तो सुप्रीम कोर्ट में कुल सेंक्शन पद 34 हैं। वहीं देश भर के सभी 25 हाई कोर्ट में कुल सेंक्शन पद 1,108 हैं। इन प्रमुख अदालतों में भी काफ़ी पद ख़ाली पड़े हैं। वहीं देश की निचली अदालतों में तक़रीबन भी हज़ारों पद जजों की नियुक्ति की राह देख रहे हैं। सरकार को चाहिए कि जजों के ख़ाली पड़े पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया जल्द पूरी करे, ताकि देश में लंबित मुक़दमों को जल्द से जल्द निपटाया जा सके। अगर सरकार इन पदों पर भर्तियों के लिए हरी झंडी नहीं देती है, तो इसमें सुप्रीम कोर्ट को पहल करनी चाहिए, ताकि जल्द से जल्द जजों की भर्ती प्रक्रिया को पूरा किया जा सके। सरकार को समझना होगा कि सिर्फ़ न्याय व्यवस्था को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने से काम नहीं चल सकता, उस पर अमल करना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

भारत की विदेश नीति मज़बूत या कमज़ोर?

(FILES) In this file photo taken on July 10, 2008 a Chinese soldier gestures as he stands near an Indian soldier on the Chinese side of the ancient Nathu La border crossing between India and China. - Indian and Chinese troops have became embroiled in a new brawl on their contested border which left injuries on both sides, barely six months after a deadly clash in the Himalayas, military sources and media reports said. (Photo by Diptendu DUTTA / AFP) (Photo by DIPTENDU DUTTA/AFP via Getty Images)

शैलेंद्र कुमार इंसान

भारत की विदेश नीति मज़बूत है या कमज़ोर? यह सवाल एक अहम सवाल है। क्योंकि एक तरफ़ चीन और भारत के मामले में भारत सरकार की ख़ामोशी और दूसरी तरफ़ अन्य देशों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे और लंबी-लंबी बातें। ये सब बातें कहीं-न-कहीं दो तरह की विदेश नीति की ओर इशारा करती हैं।

हाल ही में जापान के प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा दो दिन की यात्रा पर जब भारत आये, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें गोलगप्पे खिलाये। पार्क में टहलाया। आम पन्ने का, लस्सी का भी लुत्फ़ उठाया। उनके इस दौरे को द्विपक्षीय सम्बन्धों को और मज़बूत करने के रूप में देखा गया। प्रधानमंत्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री फूमियो किशिदा ने भारत-जापान वैश्विक रणनीतिक साझेदारी का विस्तार करने का संकल्प लिया और जापानी भाषा में एमओसी (सहयोग का ज्ञापन) का नवीनीकरण, अनिवार्य रूप से उच्च स्तरीय भाषा सीखने और मुंबई-अमहदाबाद हाई स्पीड रेलवे परियोजना पर 300 बिलियन के जेआईसीए लोन पर नोटों का आदान-प्रदान करने जैसे दो महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर भी किये। दोनों प्रधानमंत्रियों ने दोनों देशों के द्विपक्षीय सम्बन्धों में प्रगति की समीक्षा की और रक्षा उपकरण और प्रौद्योगिकी, व्यापार, स्वास्थ्य, डिजिटल आदि क्षेत्रों में साझेदारी पर विचारों का आदान-प्रदान भी किया। साफ़ है कि जापान क्‍वाड में भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ शामिल है और पुराने रिश्ते होने के चलते वह भारत को नाराज़ नहीं करेगा।

वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी और जापानी प्रधानमंत्री किशिदा की इस मुलाक़ात के कई और पहलू भी हैं। ब्‍लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है कि जापानी प्रधानमंत्री किशिदा चाहते हैं कि भारत रूस के प्रति सख़्त रवैया रखे और उसका विरोध करे। लेकिन रूस पिछले पाँच-छ: दशकों से भारत का रणनीतिक साझीदार है और इस दोस्ती को ख़त्म करना नामुमकिन है। वास्तविकता यह है कि जापान के प्रधानमंत्री किशिदा चाहते हैं कि भारत जापान और रूस में से किसी एक से दोस्ती रखे, जबकि भारत की यह सोच है कि दुनिया के ज़्यादातर देशों से मधुर सम्बन्ध रहें। भारत न तो जापान की दोस्ती ठुकराना चाहता है और न रूस से दोस्ती तोडऩे के पक्ष में हैं। रूस केवल भारत का रणनीतिक साझीदार ही नहीं है, बल्कि वह भारत को हथियार और ऊर्जा का भी बड़ा निर्यातक है। जापानी प्रधानमंत्री किशिदा ने भारत दौरे से पहले कहा था- ‘जी-7 और जी-20 देशों के नेताओं के तौर पर मैं आपसी सम्पर्क मज़बूत करने की कोशिशों को आगे बढ़ाना चाहता हूँ।’

बता दें कि भारत जी-20 का अध्यक्ष है और जापान जी-7 का अध्यक्ष है। लेकिन वह भारत से रूस से रिश्ते तोडऩे की शर्तों पर रिश्ते रखना चाहता है। इधर, जापान और भारत की पहल से चीन तिलमिलाया हुआ है। हालाँकि भारत के विदेश मंत्रालय ने जापान की तरफ़ से हुई बात पर टिप्पणी ही नहीं की है। जापानी प्रधानमंत्री किशिदा चीन के ख़िलाफ़ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के ज़रिये नयी पहल करना चाहते हैं। किशिदा ने पिछले साल जून में शांगरी-ला डायलॉग में कहा था कि अगले साल तक शान्ति की योजना के लिए आज़ाद और खुले हिंद-प्रशांत से जुड़ी नीति को वह जारी करेंगे।

इस योजना पर जापान अगले तीन वर्षों में दो अरब डॉलर का ख़र्चा करेगा। वह इस रकम से हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों को गश्‍ती नाव और ऐसे कई उपकरणों से लैस करना चाहता है, ताकि चीन का मुक़ाबला किया जा सके। यह भारत के हित में है। परन्तु चीन की तरह जापान भी कम चालाक नहीं है। इसलिए यह ऐसा ही होगा कि एक दबंग को हटाने के लिए दूसरे दबंग से हाथ मिलाना। चीन भारत और जापान के प्रधानमंत्रियों की हर गतिविधि पर नज़र रखे हुए था।

इधर अमेरिका और भारत के रिश्तों में बदलाव आ रहा है, जो कि सैन्य गतिविधियों को लेकर चल रहा है। अमेरिकी सेना ख़ुफ़िया जानकारी सीधे भारतीय सेना से साझा कर रही है। अमेरिका चाहता है कि भारत चीन को एलएसी से पीछे करे। दरअसल, इसके पीछे अमेरिका के अपने मक़सद हैं। लेकिन एलएसी को लेकर अमेरिका ने भारत को हाई क्वालिटी की सैटेलाइट की तस्वीरें दी थीं। इस कारण चीन को अपनी आक्रामक नीति पर फिर से सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा था। दावा किया जा रहा है कि चीन को बातचीत की मेज पर लाने के पीछे भारत को बड़े पैमाने पर मिल रही विदेशी मदद बड़ा कारण था। ऐसा पहली बार हुआ है, जब अमेरिका ने इतनी जल्दी दूसरे देश से सम्बन्धित ख़ुफ़िया जानकारी को भारत के साथ साझा किया है। लेकिन भारत सरकार की प्रतिक्रिया से लगता है कि वह इस मुद्दे पर ज़्यादा सक्रिय नहीं है। वहीं भारतीय सेना के रणकौशल के आगे चीन टिक नहीं पा रहा है। जब भी चीनी सेना एलएसी का अतिक्रमण करती है, भारतीय सेना उसे पीछे धकेल देती है। पिछले साल गलवान, अरुणाचल प्रदेश में हुई मुठभेड़ों में यही हुआ। अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के साथ चीनी सैनिकों की मुठभेड़ में अमेरिका की भूमिका स्पष्ट थी। कहा जा रहा है कि अमेरिकी सेना ने सीधे तौर पर भारतीय सेना के समर्थन में थी। वास्तव में अमेरिका को चीन के आगे बढऩे से समस्या है। भारत के लिए चीन के बढ़ते क़दम किसी बड़े ख़तरे से कम नहीं हैं। चीन की विस्तारवाद जहाँ अमेरिका के लिए सिरदर्द बनी हुई है, वहीं एलएसी पर उसकी अतिक्रमण नीति भारत के लिए इससे भी बड़ा सिरदर्द है।

भारत एक चतुर विदेश नीति को आगे बढ़ाना जानता है। उसे मालूम है कि अगर वह चीन को पीछे धकेलने के लिए अमेरिका की मदद लेगा, तो अमेरिका भारत का इस्तेमाल इससे भी ख़राब तरीक़े से करने की कोशिश करेगा। भारत के परमाणु परीक्षण से पहले ही वह नाराज़ बैठा है और उसने इसका बदला लेने के लिए पहले भी हर सम्भव प्रयास किये हैं। लेकिन चीन से भी भारत निपटना चाहता है और कई बार साफ़ कह चुका है कि चीन उसे कमज़ोर न समझे। चीन भी इस बात को समझता है। भारत ने गुआम किलर को डब्ल्यूटीसी कमॉड में अलग ब्रिगेड शामिल करके चीनी सेना में एक डर बनाया है। यही वजह है कि चीन भारत को अपने लिए बड़ा ख़तरा मानने लगा है। इसी डर से चीन की सेना ने 4,000 से 5,000 किलोमीटर रेंज वाली 64 मिसाइल बेस में वेस्टर्न थिएटर कमांड में नया मिसाइल ब्रिगेड स्थापित किया है। लेकिन भारत ने चीन से निपटने की हर तैयारी कर रखी है। यही कारण है कि चीन भारत की हर गतिविधि पर नज़र रखता है।

भारत की विदेश नीति अपनी जगह काफ़ी अलग और मज़बूत है। भारत को पता है कि उसे किस देश से किस हद तक किस तरह के रिश्ते रखने हैं। पिछले आठ-नौ वर्षों में इन रिश्तों में कई तरह के मोड़ भी आये हैं; लेकिन फिर भी मज़बूती मिली है। यह भारत सरकार के नुमाइंदों का कहना है। पिछले आठ-नौ वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश यात्राओं को जितनी तवज्जो दी है और दूसरे देशों के प्रतिनिधियों को भी भारत बुलाया है। वास्तव में भारत क्षेत्रीय अखंडता और विदेशी सीमा सुरक्षा को लेकर सतर्क रहता है और इसकी वजह भारत की सीमा में विदेशियों का बार-बार अतिक्रमण करना भी है। कहा जाता है, जब कोई किसी पर बार-बार हमला करने की सोचे तो वह सचेत रहता है। भारत को पता है कि उसकी सभी सीमाएँ सीमावर्ती देशों द्वारा दबाने के प्रयास होते रहे हैं। विदेशों के आंतरिक मामलों में ग़ैर-संयोजक नीति अपनाने के सिद्धांतों को मज़बूत करने के भारत के इस प्रयास को सही नज़रिये से देखा जाना चाहिए। साथ ही भारत को विदेशी भागीदारों के साथ बातचीत करके कुछ मुद्दों को सुलझाने की आवश्यकता है, ताकि प्रत्यक्ष विदेशी नीति और परोक्ष विदेश नीति के अतिरिक्त उसे वित्तीय समझौतों, मेक इन इंडिया और औद्योगिक मसलों को सुलझाने में कठिनाई न हो। भारत का बुनियादी विकास का ढाँचा काफ़ी मज़बूत है, परन्तु उसे इसकी सुरक्षा के लिए विदेशों से बिना बात बिगाडऩे की आवश्यकता भी नहीं है और इसी रास्ते पर भारत चल भी रहा है। उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में भारत ने विदेश नीति के मामले में राजनीतिक कूटनीति के साथ आर्थिक कूटनीति को एकीकृत करके एक दृष्टिकोण अपनाया है।

समझना होगा कि भारत दुनिया में सबसे बड़ा प्रवासी देश है, जहाँ लगभग दो करोड़ प्रवासी भारतीय और लगभग 138 करोड़ भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इनमें से कुछ लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। इसलिए भारत को अपनी विदेश नीति के तहत किसी भी देश से बिगाडऩे का मतलब ही नहीं बनता, जो सही भी है। वास्तव में यह ठीक भी है, क्योंकि भारत की संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की है। इसलिए जापान के प्रधानमंत्री के साथ जैसा व्यवहार और आवभगत भारत को करनी थी, वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की।

भारत सरकार ऐसा वातावरण तैयार कर रही है, जिससे भारत के समूल विकास के लिए एक समावेशी और अनुकूल माहौल बन सके। इसके लिए हर देश से मधुर रिश्तों की आवश्यकता भी है। सबसे गम्भीर मुद्दा है भारत का अभी तक विकासशील देशों में ही रहना। भारत को बहुत पहले ही विकसित देशों की सूची में आ जाना चाहिए था। लेकिन यह क्यों सम्भव नहीं हो सका है, इसका जवाब किसी के भी पास नहीं है। अब भारत को इस ओर क़दम बढ़ाना चाहिए और विकास के नये रास्ते तैयार करते हुए विकसित देशों की दौड़ में शामिल होना चाहिए। इसके लिए विदेशों की आर्थिक मदद से बेहतर है, अपने यहाँ अपने दम पर औद्योगिक स्थापना करना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस दिशा में काम करना चाहिए।

मैली हो गयी चंबल

कोटा की जीवन रेखा चंबल मध्य प्रदेश से निकलते हुए करोड़ों लोगों का भाग्य तय करती है। लेकिन मुट्ठी भर ख़ुदगर्ज लोग पिछले कुछ दशकों से इस नदी को नष्ट और बर्बाद कर रहे हैं। पौराणिक साक्ष्य और भूगर्भ वैज्ञानिकों के साक्ष्य बताते हैं कि वह काफ़ी पुरानी नदी है। कालिदास के ‘मेघदूत’ में इस नदी को भागीरथी की संज्ञा दी गयी है। किन्तु फ़िलहाल का दौर तो इस नदी की जलराशि के दोहन का है। उसी अनुपात में गंदगी मिलाने और अतिक्रमण का है। जबकि इस नदी को अधिकतम निचोडक़र अपने बल्ब जलाने, अपने कारख़ाने चलाने और अपने खेतों की सिंचाई करने को विकास की योजना मान चुके हैं। कोटा के लाखों लोगों को अपने आँचल में समेटने वाली नदी का चीर हरण चल रहा है।

यदि इसे सर्वनाश की संज्ञा दे दी जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। नदी के प्रदूषण के तीन मुख्य बिन्दु है। कूड़े, मल और ज़हरीले रसायनों को नदी में डालना, नदी में पानी की मात्रा कम होना एवं नदी जल की गुणवत्ता का हृास होना। आ$िखर क्यों इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया? गंदे नालों से दिन-ब-दिन मटमैली होती शिक्षा नगरी कोटा की जीवन रेखा चंबल नदी के लिए पर्यावरण प्रेमियों का यह कथन एकदम सटीक है कि ‘चंबल शुद्धिकरण योजना सरकारी योजनाओं की नाकामी का मॉडल है।’

बदतर स्थिति तो यह है कि इसके तटीय क्षेत्रों को निगलने की अतिक्रमण की कपट लीला से चंबल अपने किनारे से दो किलोमीटर दूर खिसक गयी है। शुद्ध और स्वच्छ चंबल भले ही इस शहर का सपना हो; लेकिन 18 बड़े नालों के ज़रिये योजना गिरने वाले 960 लाख लीटर गंदे पानी से आज यह नदी नारकीय स्थितियों में है। इस नदी को सीवर की तरह इस्तेमाल करने में यहा के कल-कारख़ाने सबसे आगे है। चंबल शुद्धिकरण योजना के नाम पर अभी तक केवल घाटों का निर्माण किया गया है। चाहे उन घाटों से नदी बहती ही ना हो। जलदाय विभाग ने चंबल शुद्धिकरण योजना के लिए ‘नीरी’ से 127 करोड़ का मसौदा तैयार करवाया था। इसमें चंबल में गिरने वाले सभी नालों को रोककर शोधन प्लांट तक बदलने और शेष पानी को जलापूर्ति के लिए भेजना होता है।

योजना के मुताबिक, नदी किनारे सार्वजनिक शौचालय, विद्युत शवदाह गृह और घाट बनाये जाने थे। साथ ही चंबल के तटीय इलाक़ों में अतिक्रमण करने वालों पर सख़्ती करने की योजना भी शामिल थी; लेकिन इस योजना को केंद्र द्वारा मंज़ूर करना तो दरकिनार योजना का आकार घटाकर मात्र 23 करोड़ का कर दिया गया। एक बड़े प्रस्ताव की बेक़दरी से झुँझलाई राज्य सरकार ने जब तर्कों की तीरंदाज़ी की तो केंद्र तनिक पिघला तो सही; लेकिन इस शर्त के साथ कि इसमें 30 प्रतिशत के भागीदारी राज्य सरकार को निभानी पड़ेगी।

केंद्र ने इसी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके भेजने को कहा था; लेकिन प्रश्न है कि क्या यह रिपोर्ट भेज दी गयी। दरअसल योजना के महँगी होने की मुख्य वजह है चंबल में गिरने वाले नालों को रोककर पहले शोधन संयंत्रों तक पहुँचाना। जलदाय विभाग का कहना है कि भले ही योजना महँगी हो; लेकिन जब तक नालों को सीधे चंबल में गिरने से नहीं रोका जाएगा, तब तक शुद्धिकरण योजना का कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। हालाँकि चंबल शुद्धिकरण की एक समानान्तर योजना नगर निगम भी बना रहा था। इसके लिए शोधन संयंत्र धाकडख़ेड़ी में बनाया जाना था; लेकिन यह योजना चर्चाओं के घेरे से अभी तक बाहर नहीं आयी है।

कोटा शहर को जलापूर्ति बैराज के अपस्ट्रीम से होती है। इसमें चार छोटे और चार बड़े नाले नदी में गिर रहें हैं। इनमें शिवपुरा, गोदावरीधाम, किशोरपुरा और साजीदेहड़ा के नाले शामिल हैं। दिलचस्प बात है कि अतिक्रमण भी अपस्ट्रीम में ही हो रहा है। बैराज के डाउन स्ट्रीम की हालत तो और ज़्यादा $खराब है। इसमें पोर्टवाल का नाला, भटजी घाट, बड़ी समाध, भाटापाड़ा, लाडपुरा, नयापुरा, गांवड़ी, नेहरू नगर, सकतपुरा तथा कुन्हाड़ी समेत 10 नाले शामिल है। शहर को पर्यटन विकास के मद्देनज़र वाटर स्पोट्र्स का ख़्वाब दिखा चुकने में किशोर सागर तालाब भी प्रदूषण से बचा हुआ नहीं है। इसमें छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 22 गंदे नालों का पानी गिरता है।

हालाँकि जलदाय विभाग इस बात का दावा तो करता है कि अगले तीन वर्षों में नदी का 80 प्रतिशत हिस्सा प्रदूषण मुक्त हो जाएगा। लेकिन रेंगती योजना को देखकर यह दावा केवल प्रलाप लगता है। चंबल शुद्धिकरण योजना में नदी के तटों का विकास करना भी शामिल है। लेकिन भूमाफ़िया यहाँ अवैध ढंग से इमारतें बनाकर तटीय क्षेत्रों को निगलने पर उतारू है। नगर निगम के सूत्र यह कहकर अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं कि हमने नोटिस जारी कर दिये हैं। लेकिन सवाल है कि इन पर अमल क्यों नहीं हो रहा?

मध्य प्रदेश में 274 किलोमीटर चलने के बाद चंबल राजस्थान के कोटा में पहाड़ों से नीचे उतरती है। यहीं से इसके साफ़ जल है। गंदगी घुलनी शुरू हो जाती है और कोटा शहर की परछाइयाँ इसके गंदले पानी से धुँधली दिखायी देने लगती है। कोटा में प्रदूषण पैदा करने वाली लगभग 30-35 औद्योगिक इकाइयाँ है। ये इकाइयाँ एन.एच. मर्करी और शीशा लीड जैसे तत्त्व प्रदूषण रूप में नालों में प्रवाहित करती है, जो जलचरों और मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। चंबल के पान में प्रदूषण की मात्रा कितनी हो चुकी है?

इस बारे में पर्यावरण विशेषज्ञ एवं मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त एम.सी. मेहता का कथन काफ़ी मायने रखता है कि ‘चंबल में लगातार ज़हर घुल रहा है।’ कोटा में स्वास्थ्य सम्बन्धी गड़बडिय़ों के बढ़ते ग्राफ का मुख्य कारण भी यही है। धूप से झिलमिलाते जल में चंबल फेस्टीवल का नयनाभिराम समारोह देख चुके लोगों में इस शहर करे पर्यटन से जोडऩे का गहरी चाह जगा दी है। लेकिन चंबल की दयनीय दशा देखते हुए, तो इस सपने के सच होने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती।

दिलचस्प बात है कि चंबल का आँचल साफ़ करने से बेफ़िक्र एक केंद्रीय मंत्री पिछले दिनों इसमें ख़्वाब दिखा चुके हैं। कहीं यह उनका बौद्धिक दर्प तो नहीं?

अमृतपाल, एजेंडा और क़ानून

अमृतपाल सिंह का अब तक पुलिस पकड़ से बाहर पंजाब पुलिस की नाकामी तो है; लेकिन कार्रवाई ने उसका हौव्वा ख़त्म करके राज्य में फिर से आतंकवाद की अटकलों पर विराम लगा दिया है। अमृतपाल को छोडक़र संगठन के ज़्यादातर सक्रिय सदस्य गिरफ़्तार हो चुके हैं। राइफलें, पिस्तौलें और कारतूसों के अलावा दर्ज़नों बुलैट प्रूफ जैकेटे आदि बरामद हुई हैं। पंजाब पुलिस ने अमृतपाल सिंह के 353 समर्थकों को गिरफ़्तार किया गया था, जिनमें से 197 को 30 मार्च को छोड़ दिया। हालाँकि आरोप है कि पुलिस ने उन्हें भी पकड़ा, जो अमृतपाल के समर्थक हैं ही नहीं, फिर भी उन पर एनएसए लगा दिया गया।

बहरहाल, अमृतपाल को भगाने में सहयोग देने वाले आधा दर्ज़न लोगों को भी पुलिस ने गिरफ़्तार किया। कहा जा रहा है कि नशा विरोधी मिशन के नाम पर संगठन बहुत कुछ ग़लत कार्रवाई भी कर रहा था। अगर मिशन पंजाब के युवाओं को नशे की लत से छुटकारा दिलाने का था, तो फिर आनंदपुर खालसा फोर्स का गठन किसलिए हुआ? क्या वारिस पंजाब दे संगठन व अमृतपाल विदेशी ताक़तों के इशारे पर पंजाब की शान्ति भंग करने की दिशा में बढ़ रहे थे?

पंजाब पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया शुरुआती जाँच में अमृतपाल के पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई से तार जुड़े होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इस बात की पुष्टि तो अमृतपाल के गिरफ़्तार होने और पूछताछ के बाद हो सकती है; लेकिन यह तय है कि संगठन को बाहर से पैसों की मदद मिल रही थी। आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा का वरदहस्त भी अमृतपाल पर बताया जाता है। बहुत कुछ ग़लत हो रहा था, वरना अमृतपाल सिंह को इस तरह छिपकर भागने की ज़रूरत भी नहीं थी। वैसे अमृतपाल का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। कुछ समय पहले संगठन की गतिविधियों की आलोचना करने पर एक व्यक्ति की बुरी तरह से पिटाई कर दी थी। पीडि़त ने अमृतपाल समेत पाँच लोगों पर प्राथमिकी दर्ज करायी थी। पुलिस ने इस सिलसिले में लवप्रीत सिंह तूफ़ान को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था। इसे निर्दोष बताते हुए अमृतपाल सिंह ने पुलिस को छोडऩे की चेतावनी दी थी। ऐसा न करने पर ही अजनाला थाने जैसी घटना हुई। जरनैल सिंह भिंडरावाले को अपना आदर्श मानने वाले अमृतपाल के खालसा राज को लेकर क्या क्या मंसूबे थे? इसका ख़ुलासा तो विस्तृत पूछताछ के बाद ही होगा; लेकिन समय पर पुलिस की कार्रवाई नि:संदेह अच्छा क़दम कहा जा सकता है। अजनाला थाने के शक्ति प्रदर्शन के बाद अमृतपाल को दूसरा भिंडरावाले के नये अवतार के तौर पर देखा जाना लगा था। वारिस पंजाब दे के पोस्टरों में अमृतपाल और दीप सिद्धू के अलावा भिंडरावाले का फोटो है। कार्रवाई में साये की तरह अमृतपाल के साथ रहने वाले उनके चाचा हरजीत सिंह भी गिरफ़्तार हो चुके हैं। सवाल यह कि आख़िर पंजाब पुलिस अमृतपाल सिंह को भारी पुलिस बल भी गिरफ़्तार करने में सफल क्यों नहीं हो सका, जबकि उसका लक्ष्य ही उसे गिरफ़्तार करना था। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इसी संदर्भ में मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि 80,000 पुलिस बल के बावजूद आरोपी की गिरफ़्तारी न होना हैरान करने वाली घटना है। इसे राज्य पुलिस पर अपरोक्ष टिप्पणी कहा जा सकता है।

पंजाब ने सन् 1984 के बाद आतंकवाद का भयावह दौर देखा है। तीन दशक से ज़्यादा के इस दौर में आतंकवाद की कई घटनाएँ राज्य में हुई; लेकिन उस दौर की काली छाया प्रदेश में जगह नहीं बना सकी। विदेशों में बैठे खालिस्तान समर्थक व संगठन रॉकेट लॉन्चरों से हमले जैसी गतिविधियाँ अंजाम देते रहे हैं, बावजूद इसके राज्य में अमन चैन क़ायम है। पिछले छ: माह के दौरान राज्य में बहुत कुछ बदलने लगा। गुमनाम-सा संगठन वारिस पंजाब दे अचानक पैठ बनाने लगा, तो इसकी मुख्य वजह अमृतपाल सिंह की कट्टरपंथी विचारधारा थी। अमृतसर ज़िले के गाँव जल्लूपुर खेड़ा का एक युवक 10 साल के बाद दुबई से अपने गाँव लौटता है, तो कुछ समय बाद उसे वारिस पंजाब संगठन की उसे ज़िम्मेदारी दे दी जाती है। जरनैल सिंह भिंडरांवाले के पैतृक गाँव रोडे में बाक़ायदा उसे पगड़ी (दस्तारबंदी) पहनाकर अध्यक्ष बनाया जाता है। वह दर्ज़नों हथियारबंद लोगों के घेरे में रहने लगा। देखते-ही-देखते हज़ारों समर्थकों का कारवाँ बन गया। अपने साक्षात्कारों में वह खुलेआम खालसा राज की बात कहता था। खालिस्तान सोच पर प्रतिक्रिया में वह कहता, जब देश में हिंदू राष्ट्र की बात होती है, तो फिर उनकी बात का विरोध क्यों? वारिस पंजाब दे संगठन के नाम से ही स्पष्ट है कि इसे किस सोच के आधार पर बनाया गया होगा। लोकतांत्रिक देश का कोई हिस्सा, राज्य या क्षेत्र का क्या कोई वारिस हो सकता है?

संगठन ने पहली बार अजनाला थाने में शक्ति प्रदर्शन कर बता दिया कि अब इसकी सोच को रोकना बहुत मुश्किल है। अमृतपाल के नेतृत्व में हज़ारों हथियारबंद समर्थकों ने पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया, जिसमें कई घायल हुए। भारी दवाब के चलते पुलिस ने अमृतपाल के समर्थक लवप्रीत सिंह तूफ़ान को मारपीट के मामले में छोड़ दिया था। राज्य में क़ानून व्यवस्था बिगडऩे के आरोप लगते रहे हैं; लेकिन अजनाला थाने की घटना ने आम लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या अब फिर से आतंकवाद अपनी जड़े जमाने में सफल हो जाएगा। संगठन की बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए राज्य सरकार ने अभी तक सीधे तौर पर अमृतपाल पर कार्रवाई करने से गुरेज ही किया; लेकिन अब बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। मुख्यमंत्री भगवंत मान पुलिस कार्रवाई के बाद कह रहे हैं कि राज्य की शान्ति व्यवस्था हर हालत में क़ायम रखी जाएगी। इसे भंग करने की कोशिश किसी भी हालत में सफल नहीं होने दी जाएगी। ऐसा करने वाला संगठन या व्यक्ति कोई भी हो ठोस कार्रवाई की जाएगी। सबसे बड़ा सवाल यह कि आम आदमी पार्टी की सरकार वारिस पंजाब दे संगठन और अमृतपाल की गतिविधियों को कमोबेश नज़रअंदाज़ कर रही थी, वह अब आक्रामक क्यों नज़र आ रही थी। इसकी बड़ी वजह केंद्र सरकार है। अजनाला थाने की घटना के बाद क़ानून व्यवस्था की लचर व्यवस्था को लेकर आलोचना झेल रहे भगवंत मान ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाक़ात की थी। इस बातचीत के बाद पंजाब को अतिरिक्त केंद्रीय सुरक्षा बल मुहैया कराया गया। इसके बाद घटनाक्रम तेज़ी से बदला और अमृतपाल की गिरफ़्तारी की रणनीति बनी; लेकिन योजना ठीक से नहीं बनी।

18 मार्च को एक कार्यक्रम में जाने के दौरान अमृतपाल को गिरफ़्तार किया जाना था, इसमें जोखिम ज़्यादा था, जबकि इससे पहले वह अपने घर जल्लूपुर खेड़ा में ही था। उसके पास हथियारबंद लोग रहते थे; लेकिन वहाँ निश्चित तौर पर गिरफ़्तारी हो सकती थी। अमृतपाल के पिता तरसेम सिंह के मुताबिक, पुलिस उसे गुपचुप तरीक़े से गिरफ़्तार कर उसके साथ कोई अनहोनी करना चाहती है। उन्हें अब भी लगता है कि पुलिस ने अमृतपाल को पकड़ लिया है और कुछ भी कर सकती है। 18 मार्च की कार्रवाई से पहले पुलिस के पास अमृतपाल और उसके संगठन की ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों के बारे में कोई सुबूत नहीं था; लेकिन अब बहुत कुछ है। उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) लग चुका है। देश विरोधी लोगों, संगठनों और ताक़तों के बूते अगर अमृतपाल के मंसूबे कुछ और थे, तो उसकी मुश्किलें बहुत बढऩे वाली है। 

कौन है अमृतपाल?

अमृतसर ज़िले का गाँव जल्लूपुर खेड़ा अमृतपाल सिंह की वजह से कुछ ज़्यादा ही चर्चित हो गया है। 10वीं पास करने के बाद अमृतपाल ने कपूरथला से मेकेनिकल इंजीनियरिंग डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश लिया था; लेकिन वह इसे पूरा नहीं कर सका। सन् 2012 में वह दुबई में संधू ट्रांसपोर्ट कम्पनी में काम करने लगा। उसने अपने को ऑपरेशन मेनेजर के तौर पर बता रखा था। अगस्त, 2022 में वह दुबई से यहाँ आया। उसके बाद से लगातार सक्रिय था। परिजनों के मुताबिक, पहले वह आम युवक की तरह ही था; लेकिन पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामलों के बाद उसका रुझान इस तर$फ हो गया। संगठन का प्रमुख बनने के बाद फरवरी, 2023 किरणदीप कौर से उसकी शादी हुई है।

एक और मामला

नंगल अंबिया गुरुद्वारा के ग्रंथी रणजीत सिंह ने अमृतपाल और उसके चार साथियों के ख़िलाफ़ सिर के पास पिस्तौल सटाकर धमकी देने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज करायी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 18 मार्च को गुरुद्वारा परिसर में एक ब्रेजा कार रुकी। उसमें से चार लोग बाहर आये। इनमें से एक अमृतपाल था। उसने कहा कि पुलिस उनका पीछा कर रही है, वह उसे कपड़े दे। इनकार करने पर उसने पिस्तौल सिर से सटा दी। कपड़े और वेश बदलकर वह यहाँ से गया। जाते-जाते उसने पुलिस को किसी तरह की सूचना देने पर बुरा अंजाम भुगतने की धमकी दी।

भारत विरोध के केंद्र बन रहे हैं ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा

हाल के दिनों में खालिस्तानी समूह भारत और बाहर विशेष रूप से इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में, दोनों जगहों पर अपना विरोध बढ़ा रहे हैं। पहले भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र मुख्य रूप से पाकिस्तान माना जाता था और इस पड़ोसी देश को ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख और खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह, जो इस समय भगोड़ा घोषित है; के उदय के लिए दोषी ठहराया गया था।

भारत के बाहर, राजनयिक मिशनों पर हमला किया गया है, जिसमें हाल ही में लंदन और सैन फ्रांसिस्को भी शामिल है। ऑस्ट्रेलिया और अन्य जगहों पर कई हिंदू मंदिरों में तोडफ़ोड़ की गयी है। सिख वर्तमान में कनाडा की आबादी का लगभग 1.4 फ़ीसदी या संख्या में क़रीब 5,00,000 हैं। खालिस्तान उस काल्पनिक राज्य का नाम है, जिसे कुछ अलगाववादी समूह भारत के उन क्षेत्रों को काटकर स्थापित करने का प्रस्ताव रखते हैं, जहाँ सिख धर्म बहुसंख्यक है। कुछ सिख अलगाववादी संगठन कनाडा, इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशों में अपनी उपस्थिति और प्रभाव बढ़ा रहे हैं, जहाँ सिख प्रवासी काफ़ी संख्या में हैं। समस्या की उत्पत्ति यह है कि प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन, सिख फॉर जस्टिस, पंजाब में खालिस्तान समर्थक नेता अमृतपाल सिंह पर कार्रवाई के बीच एक तथाकथित ‘जनमत संग्रह 2020’ आयोजित कर रहा है।

ब्रिटेन में घटनाएँ

कभी क़ानून-व्यवस्था और शालीन व्यवहार का गढ़ रहे लंदन में अब एक के बाद एक घटना देखने को मिल रही हैं। इस बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वीडियो के साथ एक व्यक्ति भारतीय ध्वज को खालिस्तान ज़िन्दाबाद के नारे के साथ उच्चायोग की दीवारों को फाँदते हुए दिख रहा है। घटना के कुछ दिन बाद भारतीय मूल के समुदाय के सदस्य लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर एकजुटता दिखाने के लिए एकत्र हुए। प्रदर्शन में हर तरफ़ से लोग शामिल थे। कुछ व्यक्तिगत क्षमता में, जबकि अन्य एक संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। कुछ ने प्रदर्शन के दौरान अपने गालों पर तिरंगा रंगा हुआ था।

हमलों के विरोध में भारत द्वारा ब्रिटेन के एक राजनयिक को तलब करने के एक दिन बाद सैन फ्रांसिस्को वाणिज्य दूतावास में एक और घटना की ख़बरें सामने आयीं, जिससे हलचल मची। पुलिस विरोध-प्रदर्शन को रोकने के लिए आयी। हालाँकि आन्दोलनकारी ‘भारत सरकार, शर्म करो, शर्म करो’ के नारे लगाते रहे। भारतीय उच्चायोग में तोडफ़ोड़ के बाद भारत में ब्रिटेन के उच्चायुक्त एलेक्स एलिस ने ट्वीट कर इस घटना की निंदा की। उन्होंने लिखा- ‘मैं भारतीय उच्चायोग के लोगों और परिसर के ख़िलाफ़ आज के अपमानजनक कृत्यों की निंदा करता हूँ, पूरी तरह से अस्वीकार्य।’

ब्रिटिश उप उच्चायुक्त क्रिस्टीना स्कॉट को घटना के मद्देनज़र विदेश मंत्रालय में तलब किया गया था। विदेश मंत्रालय ने कहा- ‘लंदन में भारतीय उच्चायोग के ख़िलाफ़ अलगाववादी और चरमपंथी तत्त्वों द्वारा की गयी कार्रवाई पर भारत के कड़े विरोध को व्यक्त करने के लिए नई दिल्ली में यूके के सबसे वरिष्ठ राजनयिक को आज देर शाम तलब किया गया। ब्रिटिश सुरक्षा की पूर्ण अनुपस्थिति के लिए एक स्पष्टीकरण माँगा गया था, जिसने इन तत्त्वों को उच्चायोग परिसर में प्रवेश करने की अनुमति दी थी।’ विदेश मंत्रालय ने कहा कि राजनयिक को वियना कन्वेंशन के तहत यूके सरकार के बुनियादी दायित्वों की याद दिलायी गयी। विदेश मंत्रालय ने कहा- ‘ब्रिटेन में भारतीय राजनयिक परिसरों और कर्मियों की सुरक्षा के प्रति ब्रिटिश सरकार की उदासीनता को भारत अस्वीकार्य मानता है।’ ब्रिटिश सरकार ने इस बात पर प्रकाश डाला कि खालिस्तान समर्थक कार्यकर्ताओं का एक छोटा समूह एक झूठी कहानी फैला रहा है कि सिखों को सताने के लिए ब्रिटेन भारत के साथ मिलीभगत कर रहा है। हालाँकि इसमें कहा गया है कि खालिस्तान समर्थक आन्दोलन से ब्रिटेन को मौज़ूदा ख़तरा कम है; लेकिन यह भविष्य में बढ़ सकता है। यह ‘यूके के सिख समुदायों से उभर रहे खालिस्तान समर्थक उग्रवाद’ के बारे में एक चेतावनी है।

यह समूह ब्रिटिश नागरिक जगतार सिंह जोहल की रिहाई के लिए पैरवी करके ब्रिटेन में सिखों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें आरएसएस नेता और सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा की लक्षित हत्या में उनकी भूमिका के लिए जलंधर से गिरफ़्तार किया गया था। जोहल के समर्थक पंजाब में खालिस्तान समर्थक हत्याओं में उनकी भूमिका का उल्लेख किए बिना #freejagginow हैशटैग के साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर काफ़ी सक्रिय हैं।

कनाडा में गतिविधियाँ

एक अन्य घटना में कनाडा में एक भारतीय मूल के पत्रकार समीर कौशल को सरे, ब्रिटिश कोलंबिया में खालिस्तान समर्थक प्रदर्शनकारियों द्वारा घेर लिया गया था। कौशल ने कहा कि वह भारतीय उच्चायुक्त की यात्रा को कवर करने के लिए सरे में थे, जब एक खालिस्तान समर्थक समूह ने उन्हें धमकी दी और उनके साथ मारपीट की। रेडियो एएम600 के समाचार निदेशक समीर कौशल ने ट्वीट में कहा- ‘सरे आरसीएमपी (पुलिस) इस पूरे मामले में मूकदर्शक बनी रही, भले ही विरोध हिंसक हो गया था। पुलिस उन्हें रोकने के बजाय मुझे अपनी सुरक्षा के लिए छोडऩे के लिए कहती रही। 

भारत ने मतदान की और कनाडा सरकार के इसे होने देने की अनुमति देने की कड़ी निंदा की है। नई दिल्ली ने कड़े शब्दों में बयान जारी कर प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के प्रशासन से ऐसे समूहों को प्रतिबंधित करने का आह्वान किया। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा- ‘हमें यह बेहद आपत्तिजनक लगता है कि चरमपंथी तत्त्वों द्वारा राजनीतिक रूप से प्रेरित अभ्यासों को एक मित्र देश में होने दिया जाता है।’ बागची ने कहा- ‘तथाकथित खालिस्तान जनमत संग्रह कराने के लिए भारत विरोधी तत्त्वों के प्रयासों पर हमारी स्थिति जगज़ाहिर है और कनाडा सरकार को नई दिल्ली और कनाडा दोनों में अवगत करा दिया गया है।’ जबकि कनाडा सरकार ने कहा है कि वह भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करती है, उसने वोट रोकने से इनकार कर दिया है।

यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि कनाडा ने हाल ही में खालिस्तान समर्थकों द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों में वृद्धि देखी गयी है, जिन्होंने कुछ हिंदू मंदिरों में तोडफ़ोड़ की है। पिछले सितंबर में विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कनाडा में भारतीयों के ख़िलाफ़ घृणा अपराधों के बढऩे और भारत विरोधी गतिविधियों की निंदा करते हुए कड़ी भाषा में अपनी चिन्ता व्यक्त की। समूह वैंकूवर, कैलगरी, एडमोंटन, विन्निपेग, टोरंटो और मॉन्ट्रियल में आयोजन कर रहे हैं, या पहले ही आयोजित कर चुके हैं। इन शहरों के अलावा उन्होंने उग्रवाद के लिए जेल में बंद कैदियों की रिहाई के लिए आंतरिक पंजाब से चंडीगढ़ की ओर जाने वाली सडक़ों को अवरुद्ध करके पंजाब में भी आन्दोलन शुरू किया है। पंजाब-चंडीगढ़ सीमाओं को अवरुद्ध करने वाले समूहों में विश्वास-आधारित समूहों और किसान संघों से जुड़े विविध संगठनों के मुट्ठी भर लोग शामिल हैं।

ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान में उछाल

इसने यह भी कहा है कि पाकिस्तान में मौलवियों की बयानबाज़ी ब्रिटिश मुसलमानों को भारत के ख़िलाफ़ कट्टरपंथी बना रही है। ऐसी ही हालत ऑस्ट्रेलिया में हो रही है, जहाँ खालिस्तान समूह हाल ही में समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि पंजाब और हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में खालिस्तान के निर्माण के लिए समर्थन जुटाने के लिए खालिस्तान समर्थक ऑस्ट्रेलिया में फैल गये हैं। सूत्रों ने बताया कि इस साल 29 जनवरी को हुए खालिस्तान जनमत संग्रह का समर्थन सोशल मीडिया के ज़रिये हैशटैग #freepunjab, #khalistanzindabad, #freepoliticalprisoners और #freesikhprisoners के ज़रिये किया गया। ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तान जनमत संग्रह के लिए वेबसाइट और मतदाता पंजीकरण कार्ड अमेरिका में बनाया गया था, जो दुनिया भर में खालिस्तानी नेटवर्क के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध दिखाता है।

पंजाब में दबिश

खालिस्तान समर्थक संगठन ‘वारिस पंजाब डे’ के प्रमुख अमृतपाल सिंह पहले ही कह चुके हैं कि भारत सरकार का समर्थन करने वाला कोई भी व्यक्ति चाहे वह हिंदू, सिख या मुस्लिम हो, दुश्मन है। उन्होंने हाल ही में चेतावनी दी थी- ‘अगर सरकार हमारी माँगों को नहीं सुनती है और सिखों को जेल से रिहा नहीं करती है, तो हम अपनी कार्रवाई को बदल देंगे’, जिससे और अधिक हिंसा का संकेत मिलता है। खालिस्तान को लेकर ब्रिटिश सरकार ने पिछले हफ़्ते जो महसूस किया था, वह अब ऑस्ट्रेलिया में होने लगा है। कनाडा, जिसने अलगाववादियों को खुली छूट दी थी, ने पहले ही खालिस्तान जनमत संग्रह के कारण समुदायों के बीच सामाजिक तनाव में बड़ी वृद्धि के साथ हिंसा में वृद्धि देखी है, जिसे खुले तौर पर पाकिस्तान द्वारा बढ़ावा दिया जाता है।

पंजाब पुलिस द्वारा अमृतपाल सिंह और उनके ‘वारिस पंजाब दे’ ग्रुप के सदस्यों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू करने के बाद यह गतिविधि तेज़ हो गयी। 100 से अधिक अमृतपाल समर्थकों को गिरफ़्तार किया गया है; लेकिन अलगाववादी गिरफ़्तारी से बचने में कामयाब रहे और फ़रार हैं। 

घातक साबित हो रहा बढ़ता मीथेन उत्सर्जन

हमारे वायुमंडल में कुछ अच्छी यानी अमृततुल्य, तो कुछ बुरी यानी ज़हरीली गैसें मौज़ूद हैं। पिछले कुछ दशकों में ये देखा गया है कि अच्छी गैसों की हमारे वायुमंडल में लगातार कमी हो रही है, जबकि ज़हरीली गैसें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसा नहीं है कि इन ज़हरीली गैसों की वायुमंडल में ज़रूरत नहीं है; लेकिन अगर ये ज़रूरत से ज़्यादा हों, तो घातक नुक़सान इनके चलते होने लगता है। मीथेन इसी तरह की एक ज़हरीली गैस है, जिसके बढ़ते उत्सर्जन से धरती का तापमान तो बढ़ ही रहा है, और भी बहुत-से नुक़सान धरती पर रहने वाले हर जीव को हो रहे हैं। मीथेन गैस दिखायी नहीं देती है; लेकिन जलवायु संकट ज़्यादा बढ़ाती है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, दुनिया में सबसे ज़्यादा मीथेन उत्सर्जन चीन करता है और दूसरा सबसे बड़ा मीथेन उत्सर्जन करने वाला देश भारत है। लेकिन भारत मीथेन उत्सर्जन को कम करना चाहता है। हालाँकि भारत मीथेन उत्सर्जन को कम करने के लिए वैश्विक मीथेन प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर करने वाले 130 देशों में शामिल नहीं हुआ है। लेकिन इन्फ्रारेड कैमरों से लैस हेलीकॉप्टरों एवं ड्रोन की मदद से पता चलता है कि अमेरिका के टेक्सास और न्यू मैक्सिको में पर्मियन बेसिन से बड़ी मात्रा में मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है।

इस वैश्विक मीथेन प्रतिज्ञा पत्र में समझौता किया गया है कि 2030 तक सामूहिक रूप से वैश्विक मीथेन उत्सर्जन को कम से कम 30 प्रतिशत कम करेंगे। माना जा रहा है कि अगर ऐसा सम्भव हो सका, तो वैश्विक तापमान में 0.2 प्रतिशत की कमी आ सकती है  और ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस के नीचे रखने के लक्ष्य तक पहुँचने में मदद मिलेगी।

भारत में ज़्यादातर मीथेन उत्सर्जन खेती, जानवरों, लैंडफिल से होता है। ऐसे में भारत में मीथेन उत्सर्जन को करने की कोशिश से कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की आजीविका को ख़तरे में डाल सकता है। इतना ही नहीं, ये आर्थिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। लेकिन भारत में लैंडफिलों को ख़त्म करने की दिशा में काम किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, पूरे देश भर में क़रीब 3,100 से ज़्यादा लैंडफिल हैं, जिनसे बड़ी मात्रा में मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। हालाँकि मीथेन उत्सर्जन के स्रोतों को लेकर आज भी वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं कि किस चीज़ से कितनी मात्रा में मीथेन उत्सर्जन होता है।

मीथेन गैस के तेज़ी से उत्सर्जन के चलते जलवायु समस्या बढ़ती जा रही है। बीमारियाँ बढ़ रही हैं और धरती के तापमान में बढ़ोतरी के चलते मौसमों में बदलाव हो रहा है। इस बार बसंत ऋतु में गर्मी होना और फिर अचानक बारिश होना, ओले पडऩा इसी मौसम परिवर्तन का नतीजा है। हालाँकि मीथेन भी प्राकृतिक गैसों का एक प्राथमिक घटक है; लेकिन ये गैस ऑक्सीजन (ष्टह्र2) की अपेक्षा 80 गुना ज़्यादा तेज़ी से धरती को गर्म करने की क्षमता रखती है।

रूस यूक्रेन युद्ध के चलते मीथेन गैस का उत्सर्जन बढ़ा है। नये शोधों के मुताबिक, रूस यूक्रेन युद्ध के चलते मीथेन उत्सर्जन में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है। इस युद्ध के बाद से देखा गया है कि दोनों देशों और उनके आसपास के देशों के तापमान में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। मीथेन गैस उतनी ही बढ़ेगी, जितना युद्ध बढ़ेगा और अगर इस युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हुआ, तो इस घातक गैस में और बढ़ोतरी होगी।

यह तो साफ़ है कि मीथेन गैस के उत्सर्जन को आसानी से कम नहीं किया जा सकता, क्योंकि मशीनों का उपयोग कम नहीं हो सकता। लगातार बढ़ते वाहन, हथियारों के लगातार होते परीक्षण, लगातार बढ़ता कचरा, ज़रूरी चीज़ों के उत्पादन के लिए तेज़ी से स्थापित होते उद्योग और लगातार बढ़ता कंस्ट्रक्शन इसके कारण हैं। लेकिन मीथेन गैस का इस्तेमाल ऊर्जा स्रोतों को बढ़ाने में किया जा सकता है। जैसे बिजली बनाने में, पवन चक्कियाँ चलाने में, स्टोव, गैस चूल्हा आदि जलाने में। इसके लिए सबसे बेहतरीन संसाधन लैंडफिल और पशुओं से मिलने वाला गोबर है।

हालाँकि मीथेन एक से डेढ़ दशक में ख़ुद भी नष्ट होती है; लेकिन यह नष्ट होते-होते कई नुक़सान कर जाती है। इस गैस से बेंजीन जैसे ज़हरीले रसायन पैदा होते हैं। मीथेन और इस रसायन के चलते हृदय रोग, अस्थमा, खाँसी, जुकाम, जन्म दोष और अन्य गंभीर रोग होते हैं। मीथेन गैस के उत्सर्जन को रोकने के लिए सिर्फ़ समझौते करने से काम नहीं चलेगा, इसके लिए प्रत्येक देश के मीथेन उत्सर्जन को कम करने के लिए ठोस क़दम उठाने होंगे। 130 देशों के बीच हुए समझौते का अभी तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। हालाँकि मीथेन रिसाव को ट्रैक करने के लिए मीथेनसैट लॉन्च करने की योजना इन देशों ने बनायी है; लेकिन इससे मीथेन उत्सर्जन उतना नहीं रोका जा सकेगा, जितना रुकना चाहिए। मीथेन उत्सर्जन के नतीजों के चलते ज़मीन पर ओजोन में क्रमिक कमी से दुनिया भर में अनुमानित 2,60,000 लोगों की अकाल मौत होती है। जबकि इससे ज़्यादा अस्थमा पीडि़त हो चुके हैं। मीथेन उत्सर्जन को 30 प्रतिशत कम करके जहाँ दुनिया भर में 73 बिलियन घंटे के बराबर श्रम के नुक़सान को रोका जा सकता है, वहीं हर साल 25 मिलियन टन फ़सल उत्पादन का नुक़सान कम किया जा सकता है।

जहाँ तक कृषि क्षेत्र से मीथेन उत्सर्जन का सवाल है, तो उसे जैविक खेती करके काफ़ी हद तक रोका जा सकता है। फर्टिलाइजर खाद, दवाओं और कीटनाशकों के ज़्यादा इस्तेमाल से मीथेन गैस का उत्सर्जन बढ़ा है। इसके अलावा बढ़ती आबादी को रोककर या कम करके, पौधरोपण करके भी मीथेन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। इसके अलावा लीक डिटेक्शन एंड रिपेयर कार्यक्रम शुरू करके, बेहतर प्रौद्योगिकियों एवं परिचालन अभ्यासों को लागू करके और मीथेन उत्सर्जन वाले उद्योगों को प्रतिबंधित करके भी मीथेन उत्सर्जन रोका जा सकता है। मीथेन उत्सर्जन कम होने से न केवल फ़सलों का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि दूध देने वाले पशुओं की दूध देने की क्षमता भी बढ़ेगी। बीमारियाँ कम होंगी और औसत आयु में बढ़ोतरी होगी।

आज इंसानों की औसत आयु में लगातार कमी आ रही है, जिसका एक कारण हमारे वायुमंडल में बढ़ती मीथेन गैस है। मीथेन गैस के बढऩे से न केवल हवा प्रदूषित हो रही है, बल्कि पानी भी प्रदूषित हो रहा है। ज़्यादा इंसानी आबादी के कारण भी मीथेन उत्सर्जन बढ़ रहा है। गंदगी करने से भी मीथेन गैस का उत्सर्जन बढ़ रहा है। मीथेन का उपयोग करने के लिए हर देश की सरकार को एक व्यापक नीति विकसित करने की ज़रूरत है, जिसके तहत मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने के अलावा इसका भी उपयोग किया जाना चाहिए। इससे काफ़ी लोगों को रोज़गार भी मिल सकेगा। इसके साथ-साथ पृथ्वी पर जीवन सुरक्षा के अलावा वातावरण सुरक्षा और फ़सल सुरक्षा के रास्ते भी खुलेंगे।

ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में मीथेन गैस का बड़ा योगदान है। ऐसे में ग्रीनहाउस गैस में मौज़ूद मीथेन के अलावा कार्बन डाइ ऑक्साइड और अन्य ज़हरीली गैसों के उत्सर्जन को भी रोकने की आज सख्त ज़रूरत है। कार्बन डाइ ऑक्साइड के बाद सबसे प्रमुख ग्रीनहाउस गैस मीथेन ही है। एक अनुमान के मुताबिक, हर साल हमारे वातावरण में क़रीब 57 करोड़ टन मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जिसका 60 प्रतिशत हिस्से का उत्सर्जन इंसानी गतिविधियों के चलते होता हैं। बाक़ी का 40 प्रतिशत हिस्से का उत्सर्जन प्राकृतिक कारणों से होता है। ऐसा नहीं है कि मीथेन गैस से सिर्फ़ नुक़सान ही नुक़सान हैं। अगर मीथेन गैस हमारे वायुमंडल में नहीं होगी, तो जहाँ आग का जलना मुश्किल होगा, वहीं गर्मी नहीं रहेगी। इससे दुनिया का तापमान घट जाएगा और इससे भी परेशानी पैदा होगी। जीने के लिए ऊर्जा का होना बहुत ज़रूरी है। गर्मी रहने से ऊर्जा मिलती है; लेकिन अगर गर्मी का औसत ज़्यादा हो जाए, तो भी जीना मुश्किल हो जाएगा। आज लगातार बढ़ती गर्मी से दुनिया भर के लोग बेहाल हैं। इसलिए मीथेन गैस के उत्सर्जन को घटाना होगा।

आज मीथेन गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिए दुनिया भर में कई तरह के अध्ययन हो रहे हैं; लेकिन इन अध्ययनों में मीथेन उत्सर्जन के जो कारण निकलकर सामने आ रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए ठोस क़दम नहीं उठाये जा रहे हैं। हाल के दो सालों में सामने आयी रिपोट्र्स में पहली बार कोयले को मीथेन उत्सर्जन का स्रोत माना गया।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोयला उद्योग से हर साल क़रीब 4.2 करोड़ टन मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। मीथेन गैस के उत्सर्जन को लेकर अब तक सामने आयी रिपोट्र्स और मीथेन गैस के नुक़सानों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि मीथेन गैस के उत्सर्जन को 100 प्रतिशत नहीं रोका जा सकता है, और रोका भी नहीं जाना चाहिए। क्योंकि जीने के लिए बाक़ी गैसों की तरह मीथेन गैस भी ज़रूरी है; लेकिन इसके उत्पादन को कम करना बहुत ज़रूरी है, ताकि इसका बढऩा जानलेवा न बने, जो कि काफ़ी हद तक बन भी चुका है।  

मध्य प्रदेश की बाँध परियोजनाओं से  संकट में एक लाख लोग

विस्थापन व्यक्ति के जीवन के जड़ को न सिर्फ़ काट देता है, बल्कि उसका सब कुछ छीन लेता है। विस्थापन के दर्द और उससे होने वाली हानि की कल्पना सिर्फ़ वहीं कर सकता है, जिसने अपना घर, अपना ठिकाना खो दिया हो। भारत में आज़ादी के समय से ही बड़ी संख्या में विस्थापन और पलायन शुरू हुई और आज तक अनवरत जारी है। भारत में लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाली सभी सरकारों ने साल दर साल लोगों को विस्थापन के ज़ख़्म देती रही हैं।

इंटरनेशनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर द्वारा सन् 2008 से सन् 2019 तक के डाटा के आधार पर जारी किये गये आँकड़े पर ग़ौर करें, तो भारत में हर साल लगभग 36 लाख लोग विस्थापित होते हैं, जो विश्व में सबसे ज़्यादा है। प्राकृतिक रूप से समृद्ध मध्य प्रदेश में भी हर साल लोगों को लगातार विस्थापन का ज़ख़्म मिल रहा है। सन् 1980 में शुरू हुई नर्मदा घाटी परियोजना के तहत बनने वाले लगभग 29 बड़े बाँध परियोजनाओं से विस्थापित लाखों लोगों का ज़ख़्म अभी तक भरा नहीं है; लेकिन मध्य प्रदेश सरकार फिर बाँध और सिंचाई परियोजनाओं द्वारा लाखों लोगों को विस्थापित करने एवं कई हज़ार एकड़ सिंचित भूमि तथा वन भूमि डुबोने की तैयारी में है। फरवरी-मार्च बजट सत्र में मध्य प्रदेश सरकार ने बताया कि प्रदेश में 475 सिंचाई एवं बाँध परियोजनाओं पर कार्यवाही चल रही है, जिसमें नर्मदा कछार में 24500 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे, जबकि 44,600 करोड़ रुपये से अधिक लागत की केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रथम चरण में बाँध, लिंक नहर तथा पॉवर हाउस का निर्माण कार्य इस वर्ष से प्रारम्भ करने का लक्ष्य है।

सरकार का दावा है कि उक्त बाँध और सिंचाई परियोजनाओं से 28 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई क्षमता विकसित होगी; लेकिन इन परियोजनाओं से विस्थापित होने वाले लोगों और नष्ट होने वाले जंगलों और डूबने वाले सिंचित भूमि का स्पष्ट आँकड़ा सरकार द्वारा नहीं दिया जा रहा है। यदि केन-बेतवा लिंक परियोजना की बात करें, तो सरकारी आँकड़ों में बताया गया है कि इस परियोजना में 12,000 लोगों को विस्थापित किया जाएगा, जबकि यह वास्तविक संख्या अधिक है। वनक्षेत्र में पडऩे वाले कई गाँवों के लोगों को इसमें शामिल नहीं किया गया है। वन अधिकार के दावों का निपटारा नहीं किया गया है। विस्थापित होने वाले कई गाँवों के लोगों को अभी तक भी नहीं बताया गया है कि इस परियोजना में उनके गाँव, घर, खेत डूबने वाले हैं और अभी तक पुनर्वास नहीं किया गया है। जो गाँव डूबने वाले हैं उन्हें कहाँ बसाया जाएगा, मुआवज़ा कितना मिलेगा, पुनर्वास, विस्थापन पर अभी तक लोगों की मंशा अनुसार सहमति नहीं बन पायी है। ग्रामसभा की परमीशन नहीं ली गयी है।

आदिवासियों के अधिकारों के लिए लडऩे वाले छतरपुर ज़िले के सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. अरुण यादव कहते हैं कि ‘इस परियोजना के सम्बन्ध जानकारी देने के लिए प्रभावित गाँवों में एक भी ग्राम सभा का आयोजन नहीं किया गया। साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में लोगों के अशिक्षित होने का लाभ उठाया जा रहा है। विस्थापन के नाम पर गाँव का विकास रुक गया। गाँव में बिजली नहीं है, न निकलने का रास्ता, न स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा। लोगों की यही माँग रही कि विस्थापन से पहले उन्हें बताया जाए कि उन्हें कितना मुआवज़ा मिलेगा, वह कहाँ विस्थापित हो रहें हैं; ताकि वह विकास की कल्पना कर सकें।’

केन-बेतवा लिंक परियोजना में हज़ारों-लाखों पेड़ों के कटान हो रहा है। बड़ी संख्या में जंगलों को नष्ट किया जा रहा है। ऐसे में पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्थाएँ भी चिंतित हैं। पेड़ों के कटान से बदलती जलवायु का सबसे ज़्यादा असर पर्यावरण पर हो रहा है। प्राकृतिक चीज़ों के अंधाधुन इस्तेमाल और पेड़ों के अवैध कटान ने पर्यावरण को न सिर्फ़ गहरे संकट में डाल दिया है, बल्कि इससे उत्पन्न स्थिति के कारण ही अभी असमय बारिश, ओले, आँधी-तूफ़ान से किसानों की फ़सलें बर्बाद हो रही हैं।

पत्रकार सत्येंद्र सिकरवार का मानना है कि ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना से पन्ना-छतरपुर ज़िले की ख़ूबसूरती ख़त्म हो जाएगी। केन एक ऐसी नदी है, जिसमें जंगलों-पहाड़ों से पानी आता है। जब केन का पानी बेतवा नदीं में जाएगा, तो केन नदी सूख जाएगी और पानी की जगह धूल उड़ेगा। लोगों को जंगलों से मिलने वाली सुख-सुविधाएँ ख़त्म हो जाएँगी, सिंचाई की ज़मीन व बिजली का सपना अधूरा रह जाएगा।’ केन-बेतवा लिंक परियोजना की तरह ही हरदा-बैतूल-होशंगाबाद ज़िले की मोरंड-गंजाल नदी सिंचाई परियोजना और छिंदवाड़ा ज़िले की सिंचाई कॉम्प्लेक्स परियोजना में भी बड़ी संख्या में आदिवासियों को विस्थापित किया जा रहा है और जंगलों को नष्ट किया जा रहा है। वनग्रामों में निवासरत कई आदिवासियों-जंगलनिवासियों के वनाधिकार के दावे मान्य नहीं किये गये हैं और उन्हें इस परियोजना में पुनर्वास के फ़ायदे भी नहीं दिये जा रहे हैं।

जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन के लिए काम करने वाले बंटी उईके का कहना है कि ‘हरदा, बैतूल और होशंगाबाद में नर्मदा नदी की सहायक नदियों गंजाल एवं मोरंड नदी पर जो सिंचाई परियोजना प्रस्तावित है, इसके सम्बन्ध में प्रभावित होने वाले हज़ारों लोगों से कोई अनुमति नहीं ली गयी है। इस परियोजना में लोगों के घर, ज़मीन, खेत के साथ ही बड़े स्तर पर जंगल भी डूब जाएँगे। ग्रामवासियों ने इस परियोजना को अभी तक अनुमति नहीं दी है। इस परियोजना में जो जंगल डूबने वाले हैं, उनमें अभी तक सामुदायिक वन अधिकार के दावों का निपटारा नहीं किया गया है। इस परियोजना से प्रभावित गाँव के लोगों ने इस परियोजना को लगातार आंदोलनों, विरोध प्रदर्शन एवं आवेदन पत्रों द्वारा नामंज़ूर कर रहे हैं, अत: ग्रामीणों की कब्र पर इस परियोजना का शिलान्यास नहीं किया जाना चाहिए।’ मोरंड-गंजाल सिंचाई परियोजना में वनांचल का का$फी बड़ा एरिया आता है। इसमें क़ीमती सागौन के पेड़ भी लगे हैं। इस परियोजना से तीन ज़िलों- हरदा, होशंगाबाद और बैतूल के लगभग 2371 हेक्टेयर में फैले जंगलों का डूब में आना तय है। इस परियोजना में तीनों ज़िलों के 23 गाँवों के लोग प्रभावित होंगे।

वहीं छिंदवाड़ा ज़िले में सिंचाई कॉम्पलेक्स परियोजना के तहत संगम बाँध-1, संगम बाँध-2, जामघाट बाँध, पलासपानी बाँध, रामघाट बैराज एवं जोगिनी बैराज प्रस्तावित हैं। इस परियोजना से कोहटमाल, कोहट रैयत, बीजागोरा, तिकाड़ी, पीपलगाँव, बोरगाँव, भंवारी, संगम दीप, मेहलारी बाकुल, मेहलारी वनग्राम, बडग़ोना वनग्राम, अड़वार, हिवरा वासुदेव, आंजनी, इकलबिहरी, दुधा, राजोराकला, मोहखेड़ समेत दर्ज़नों गाँव प्रभावित होने वाले हैं। ये सभी गाँव संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें संविधान में पावर दी गयी है कि इन गाँवों में किसी भी परियोजना को ग्रामीणों की अनुमति के बगैर प्रस्तावित नहीं किया जा सकता हैं। फिर भी नियमों का उल्लंघन कर इस परियोजना को अंजाम दिया जा रहा है।

छिंदवाड़ा ज़िले के जयस अध्यक्ष महेंद्र परतेती का मानना है कि ‘प्रभावित होने वाले दर्ज़नों गाँव के लोगों के जीवन को अंधकारमय होने से बचाया जाना चाहिए। संगम बाँध परियोजना से आदिवासियों की पैतृक भूमि डूब में चली जाएगी, संविधान की पाँचवीं अनुसूची के तहत जो उन्हें अधिकार और सुरक्षा मिले हैं, वह सब कुछ ख़त्म हो जाएगा। उनकी पहचान संस्कृति, परंपरागत व्यवस्था गम्भीर रूप से प्रभावित होगी। अत: संगम बाँध परियोजना को निरस्त किया जाना चाहिए।’ नीमच ज़िले के सिंगोली क्षेत्र में बांणदा बाँध परियोजना से 1000 से ज़्यादा आदिवासी परिवारों के जीवन पर ख़तरा मंडराने लगा है। बाँध परियोजना में आनेवाले जिस भूमि पर आदिवासी कई दशकों से खेती कर रहे हैं, उन भूमियों का उन्हें पट्टा नहीं दिया गया है, और उस भूमि का कोई मुआवज़ा भी नहीं दिया जा रहा है। कई आदिवासी परिवारों की निजी भूमि, घर, खेत बाँध परियोजना में जा रही है। पुश्तैनी कृषि भूमि, गोचर भूमि, धार्मिक स्थल, खेल मैदान सार्वजनिक हेतु भूमि भी बाणदा बाँध परियोजना में जा रही है। जिससे आदिवासी इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। हालोन बाँध से मंडला एवं बालाघाट ज़िले के अधिकतर विस्थापित परिवार आज भी पुनर्वास का इंतज़ार कर रहे हैं।

पन्ना ज़िले में रूंझ मध्यम सिंचाई परियोजना के प्रभावित गाँवों, जिनमें से 90 प्रतिशत आदिवासी हैं की शिकायत है कि बाँध निर्माण कार्य का 60 प्रतिशत पूरा हो जाने के बावजूद भी उन्हें मुआवज़ा नहीं दिया गया है। पिछले पाँच वर्षों से प्रभावित लोग मुआवज़े का इंतज़ार कर रहे हैं। पिछले पाँच साल से अधिकारी टालमटोल कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि बाँध लगभग पूरा हो गया है, जल्द ही हमारे घर जलमग्न हो जाएँगे। हमारे पास घर या ज़मीन या आजीविका कमाने का कोई स्रोत नहीं है, हम कहाँ जाएँ। धारा-144 लगाकर लोगों को विरोध प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है। पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन, दिल्ली और नर्मदा बेसिन प्रोजेक्ट्स कम्पनी लिमिटेड के बीच हुए अनुबंध के बाद 99 गाँवों के लगभग 55,000 लोगों पर विस्थापन का ख़तरा बढ़ गया है। इनमें लगभग 50 गाँव आदिवासियों के हैं, जहाँ लगभग 30,000 आदिवासी रह रहे हैं। लॉकडाउन का फ़ायदा उठाकर इस परियोजना का अनुबंध किया गया था, ताकि विरोध न हो।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि मध्य प्रदेश सरकार अब तक नर्मदा घाटी परियोजना के लगभग एक लाख परिवारों का तो ठीक से पुनर्वास कर नहीं पायी है, बरगी बाँध से 162 गाँवों के विस्थापितों को 30 साल बाद भी व्यवस्थित नहीं कर पायी, ऐसे में विभिन्न नये बाँध और सिंचाई परियोजनाओं में लगभग एक लाख से अधिक लोगों को विस्थापित कर कैसे उनका पुनर्वास होगा।

प्रदेश में विभिन्न बाँध परियोजनाओं एवं सिंचाई परियोजनाओं एवं इसके तहत बनने वाले छोटे-बड़े बाँधों को प्रस्तावित करने से पूर्व इन परियोजनाओं के तहत प्रभावित होने वाले लोगों से सहमति नहीं ली जाती है, जिससे प्रदेश की एक बड़ी आबादी विस्थापन का दंश झेल रही है, सही पुनर्वास नहीं होने एवं बसने के लिए सरकार द्वारा ज़मीन उपलब्ध नहीं कराये जाने के कारण हज़ारों का परिवारों का अस्तित्व समाप्त हो गया, वे दर-दर की ठोकर खाने, शहरों की स्लम बस्तियों में रहकर निम्नतर जीवन जीने को बाध्य हो रहे हैं। ऐसे में सरकार की

मंशा पर सवाल उठता है कि क्या हज़ारों परिवारों की कब्र पर इन परियोजनाओं को अंजाम दिया जाना चाहिए? 

रोज़गार के लिए प्रवास

मनोज की उम्र 20 साल है। जन्म बिहार में हुआ और 15 साल की उम्र में अपना सूबा छोड़ मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में रोज़ी-रोटी की तलाश में आ गया। वह ख़ुद को सातवीं पास बताता है। इंदौर जो कि मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी है और केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल है, लगातार छठी बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर यानी नंबर वन पर है, वह इंदौर मनोज जैसे सैकड़ों प्रवासी मज़दूरों के लिए भी विशेष है। कारण-यह वह जगह है, जहाँ उन्हें काम मिलता है। अपने मूल घर से दूर रहना मजबूरी है; लेकिन उनके पास कोई ठोस विकल्प भी नहीं है। भारत में दस में से कम-से-कम दो पुरुषों को रोज़गार-धंधे या किसी दूसरी वजह से अपने जन्म स्थान या अपने निजी घर से निकलना पड़ता है।

महिलाएँ भी प्रवासी होती हैं। हाल ही में नेशनल सैंपल सर्वे 2020-2021 के जारी आँकड़ों के अनुसार, ग्रामीण भारत में 39 फ़ीसदी पुरुष प्रवासी और शहरी भारत में 56 फ़ीसदी लोग रोज़गार सम्बन्धी कारणों से घर छोड़ते हैं। महिलाओं में घर छोडऩे का प्रमुख कारण विवाह है। 10 में से क़रीब नौ इसी वजह से अपना घर छोड़ देती हैं।

ग़ौरतलब है कि प्रवास की स्थिति समाज में लगातार चली आ रही है। लोग अपनी रोज़ी-रोटी, बेहतर शिक्षा, रहन-सहन और पारिवारिक स्तर को ऊँचा उठाने के मक़सद से प्रवास करते हैं। दरअसल देश की जनगणना में प्रवास की गणना दो आधारों पर की जाती है। पहला जन्म का स्थान यदि गणना के स्थान से भिन्न है, तो इसे जीवन पर्यंत प्रवासी के रूप में निवास का स्थान जाना जाता है। दूसरा निवास का स्थान-यदि निवास का पिछला स्थान गणना के स्थान से भिन्न है, इसे निवास के पिछले स्थान से प्रवासी के रूप में जाना जाता है। प्रवास मुख्य दो प्रकार का होता है। पहल आंतरिक प्रवास यानी देश के भीतर एक स्थान से दूसरी जगह जाना और दूसरा अंतरराष्ट्रीय प्रवास अर्थात् देश के बाहर। आंतरिक प्रवास के तहत चार वर्ग हैं। पहला ग्रामीण से ग्रामीण, दूसरे ग्रामीण से शहर की ओर। तीसरा-नगरीय से नगरीय और चौथा-नगरीय से ग्रामीण। प्रवासी भारतीयों के आँकड़े जनगणना के आँकड़े भी बताते हैं। देश में 2021 में जनगणना होनी थी, क्योंकि देश में हर साल 10 साल के बाद जनगणना होता है। देश में 2011 में जनगणना हुई थी। वर्ष 2011 जनगणना के मुताबिक, देश में 4.5 करोड़ प्रवासी श्रमिक थे। इन आँकड़ों से पता चलता है कि उस समय उत्तर प्रदेश और बिहार अंतरराज्यीय प्रवासियों के सबसे बड़े स्रोत थे, यानी यहाँ से लोग दूसरे राज्यों में जाते थे। महाराष्ट्र और दिल्ली में सबसे अधिक प्रवासी आकर बसते थे।

नवीनतम नेशनल सैंपल सर्वे मल्टीपल इंडिकेटर (2020-2021) के आँकड़ों पर नज़र डाले, तो पता चलता है कि देश की राजधानी दिल्ली में सबसे अधिक लोग अर्थात् 21.3 फ़ीसदी लोग बाहर से आये हैं। उसके बाद हिमाचल प्रदेश है, जहाँ यह संख्या 8.5 फ़ीसदी है। पंजाब में यी दर 8.1 तो उत्तराखण्ड व केरल में 7.9 फ़ीसदी है। गुजरात में 3.9 फ़ीसदी है। यह आँकड़े तो एक राज्य से दूसरे राज्य में गये लोगों के बारे में है; लेकिन राज्य के अंदर भी लोग रोज़ी-रोटी की तलाश व अन्य कारणों से शिफ्ट होते हैं। ऐसे राज्यों की सूची में हिमाचल प्रदेश नंबर वन पर है। यहाँ ऐसे लोगों की संख्या 37.2 फ़ीसदी है और तेलंगाना में 33 फ़ीसदी। तमिलनाडु में 31.9 और आंध्र प्रदेश में 31.8 फ़ीसदी है।

केरल में 30.6 व महाराष्ट्र में 30.1 फ़ीसदी है। रोज़गार के लिए लोग कहाँ-से-कहाँ जाते हैं, यह जानना भी ज़रूरी है। उत्तर प्रदेश से महाराष्ट्र में 5.7 फ़ीसदी लोग जाते हैं। उत्तर प्रदेश से दिल्ली आने वालों की संख्या 4.1 फ़ीसदी है। इसी राज्य से पंजाब जाने वालों का फ़ीसदी 1.9 है। उत्तर प्रदेश से गुजरात 2.5 फ़ीसदी लोग जाते हैं। बिहार से पश्चिम बंगाल 2.3 फ़ीसदी लोग जाते हैं। देश में गाँवों से ज़्यादा लोग बाहर काम की तलाश में जाते हैं। भारत की पहचान एक ग्रामीण बहुल देश के तौर पर है।

बेशक भारत की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, सैन्य हथियारों का आयात करने में विश्व में पहले नंबर पर है; लेकिन एक हक़ीक़त यह भी है कि गाँवों में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार आदि को लेकर बेहतर तस्वीर सामने नहीं आती है। गाँवों से शहरों की ओर पलायन के प्रमुख कारणों में शहरों में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना है। ग़ौरतलब है कि आज़ादी के बाद भारत ने देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए औद्योगीकरण का रास्ता अपनाया और शहरों को इसके लिए चुना गया। अधिकांश उद्योग शहरों या उसके आस-पास लगाये गये जिसके कारण ग्रामीण लोगों को रोज़गार की तलाश एवं आजीविका के लिए शहरों से पलायन आवश्यक हो गया। यहाँ प्रसंगवश इस बाबत शहरी श्रम आयोग की इस टिप्पणी का ज़िक्र किया जा रहा है- शहरी श्रम आयोग ने लिखा है कि ‘प्रवास की प्ररेक शक्ति एक सिरे से आती है, अर्थात् गाँवों से औद्योगिक श्रमिक नागरिक जीवन के आकर्शण से शहरों में नहीं जाता और न ही उसके पास महत्त्वाकांक्षा होती है। शहर स्वयं उसके लिए आकर्शण का बिंदु नहीं है और गाँव छोडऩे के समय उसके मन में जीवन की आवश्यकताओं की प्राप्ति के अतिरिक्त और कोई भावना नहीं रहती। बहुत कम ही औद्योगिक श्रमिक नगर में रहना चाहेंगे। यदि उन्हें गाँवों में ही जीवन-यापन के लिए पर्याप्त अन्न व वस्त्र मिल जाएँ, तो वह नगर की ओर आकर्षित नहीं हों।’

गाँवों में अच्छे स्कूल भी नहीं होते। आजकल अभिभावक बच्चों की अच्छी शिक्षा व उच्च शिक्षा के लिए भी शहरों में पलायन कर रहे हैं। गाँवों में युवा पीढ़ी के लिए रोज़गार के साधन उतने नहीं हैं, जितने शहरों में मौक़े हैं। और गाँवों की तुलना में शहरों में दिहाड़ी भी अधिक मिलती है। लेकिन यह बात सब जगह लागू नहीं होती। केवल 44 फ़ीसदी प्रवासियों की कमायी में ही बढ़त होती है। बिहार व हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्य है, जहाँ से बाहर गये 64 फ़ीसदी लोग ऐसे हैं, जो काम व अधिक कमाने के लिए घर से बाहर दूसरी जगह गये; लेकिन उनकी कमायी नहीं बढ़़ी। मणिपुर में 92 फ़ीसदी ऐसे प्रवासी हैं, जिनकी आय जगह बदलने के बावजूद नहीं बढ़ी हैं। केरल अनय राज्यों की तुलना में अपेक्षाकृत विकसित राज्य है; लेकिन कड़वी हक़ीक़त यह है कि वहाँ जाने से कमायी नहीं बढ़ती है।

झारखण्ड के समाजसेवी अशोक भगत का मानना है कि समाज में श्रम का पूरा सम्मान नहीं है। बहुत-से युवाओं व लोगों को जो काम अपने घर-गाँव करने में शर्म महसूस होती है, उन्हें वही काम घर से दूर जाकर करने में कोई परेशानी नहीं होती। एक बात और भी ग़ौरतलब है कि प्रवासन के कुछ सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव होते हैं। प्रवासन श्रम की आपूर्ति व माँग के बीच के $फासलों को भरता है। कुशल श्रम, अकुशल श्रम और सस्ते श्रम का आवंटन करता है। प्रवासियों की आर्थिक कमायी से मूल स्थानों के बाज़ार को $फायदा होता है। उपभोक्ता व्यय में वृद्धि होती है।

स्वास्थ्य, शिक्षा व संपत्ति निर्माण में निवेश होता है। प्रवासन प्रवासियों के सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने में मदद करता है। क्योंकि वे नयी संस्कृतियाँ, रीति-रिवाज़ों और भाषाओं के बारे में सीखते हैं, जो लोगों के बीच भाईचारे को बेहतर बनाने में मदद करते हैं और अधिक समानता व सहनशीलता सुनिश्चित करते हैं। इसके नकारात्मक प्रभाव भी होते हैं। मसलन गंतव्य स्थान पर प्रवासियों के अधिक संख्या में आने से उस ख़ास जगह पर नैकरी, घर, स्कूल आदि की सुविधा मुहैया कराने का दबाव बढ़ जाता है और वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों और सेवा क्षेत्र पर अधिक दबाव पडऩे लगता है। बड़े पैमाने पर प्रवासन के कारण प्रभावित क्षेत्रों में स्लम में वृद्धि होने लगती है। ऐसे इलाक़ों में प्रदूषण भी बढ़ जाता है। यह भी ध्यान देने वाला अहम बिंदु है कि अधिकांश प्रवासी श्रमिक ठेकेदारों के अधीन काम करते हैं। इस प्रथा में उनका बहुत शोषण होता है।

रियल एस्टेट व हाईवे निर्माण के चलते प्रवासी श्रमिकों को निर्माण क्षेत्र में काम मिल रहा है। बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखण्ड व ओडिशा से श्रमिक विभिन्न राज्यों में यह काम कर रहे हैं। यहाँ तक कि बीते कुछ समय से सीमा पर जारी सडक़ निर्माण में भी इन्हीं राज्यों के मज़दूर काम करते हैं। प्रवासन एक वैश्विक प्रक्रिया है। सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा (प्रवासियों सहित किसी को पीछे नहीं छोडऩा के मूल सिद्धांत के साथ) पहली बार स्थायी विकास में प्रवासन के योगदान को मान्यता देता है। प्रवासन के लिए सतत विकास लक्ष्य का केंद्रीय संदर्भ लक्ष्य 10.7 में दिया गया है, ताकि व्यवस्थित, सुरक्षित, नियमित और ज़िम्मेदार प्रवास और लोगों की गतिशीलता को सुगम बनाया जाए, जिसमें नियोजित और अच्छी तरह से प्रबन्धित प्रवासन नीतियों के कार्यान्वयन शामिल हैं।