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राहुल गाँधी का बढ़ रहा राजनीतिक क़द

मोदी सरनेम वाले मानहानि मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने राहुल गाँधी की सज़ा बरक़रार रखी है। गुजरात हाई कोर्ट ने सज़ा को निलंबन की याचिका ख़ारिज करते हुए कहा कि राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ कम-से-कम 10 क्रिमिनल केस लंबित हैं। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने अपने फ़ैसले में सावरकर के पोते द्वारा दायर मुक़दमे का ज़िक्र करते हुए कहा कि किसी भी केस में दोषसिद्धि से कोई अन्याय नहीं होगा। ये दोषसिद्धि न्यायसंगत और उचित है। कोर्ट के पिछले आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए यह आवेदन ख़ारिज किया जाता है।

गुजरात हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद राहुल गाँधी अब सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या राहुल गाँधी की सज़ा का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट पलट देगा? अगर सुप्रीम कोर्ट से राहुल गाँधी को राहत मिलती है, तो वह 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ सकेंगे और उससे पहले ही अगर समय रहा, तो उनकी संसदीय सदस्यता उन्हें वापस मिलेगी, बंगला भी वापस मिलेगा। लेकिन क्या मोदी सरकार ऐसा होने देना चाहेगी? क्योंकि अगर राहुल गाँधी की सज़ा बरक़रार रहती है, तो अगले छ: साल तक उनकी संसद में वापसी नहीं हो सकेगी और मोदी सरकार यही चाहती है।

वकील मिथलेश पटेल कहते हैं कि यह जजमेंट गुजरात हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सुनाया है। अब अगर हाईकोर्ट की ही डबल यानी बड़ी बेंच भी फ़ैसला बदलते हुए गाँधी की सज़ा को कम कर देती है या पूरी तरह रोक लगा देती है, तो भी उनकी सज़ा माफ़ हो जाएगी और उनकी लोकसभा सदस्यता बहाल हो जाएगी। राहुल गाँधी के पास दोनों ही विकल्प हैं। पहला वह हाईकोर्ट की ही बड़ी बेंच में जाएँ। अगर वह वहाँ भी हार जाते हैं, तो भी उनके पास सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता रहेगा। लेकिन अगर वह सीधे सुप्रीम कोर्ट जाएँगे, तो उनके पास यही एक विकल्प होगा। लेकिन कहा जा रहा है कि अब राहुल गाँधी सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। अगर वहाँ से फ़ैसला पलटा गया, तो यह केंद्र सरकार की बड़ी हार होगी और अगर नहीं पलटा, तो राहुल गाँधी का राजनीतिक करियर बहुत बुरी तरह से प्रभावित होगा। ज़्यादातर चांस हैं कि फिर उन्हें जेल भी जाना पड़ेगा। राजनीतिक जानकार मानकर चल रहे हैं कि गुजरात हाईकोर्ट का फ़ैसला भले ही भाजपा के पक्ष में गया है; लेकिन न तो अभी राहुल गाँधी हारे हैं और न उन्होंने हार मानी है। अभी उनके पास भाजपा की मोदी सरकार की मंशा पर पानी फेरने का एक और बड़ा मौक़ा है।

राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि भले ही मोदी सरकार ने पूरी सोची-समझी राजनीति करके भले ही राहुल गाँधी को मुसीबत में डाल रखा है; लेकिन उनके बढ़ते क़द को मोदी और उनका पूरा तंत्र मिलकर नहीं रोक पा रहा है। लोगों के बीच उनकी प्रसिद्धि और प्रशंसा बढ़ती जा रही है। मणिपुर जाने से उनका क़द और बड़ा हो गया है। इसके अलावा उनके गाड़ी मैकेनिक के गैरेज पर जाने, धान रोपने, लोगों के गले लगाने, बच्चों के साथ खाना खाने से लोग ख़ुश हैं और कांग्रेस से रूठे हुए अधिकतर लोग उन्हें अपना हीरो मानने लगे हैं। कहा जा रहा है कि राहुल गाँधी काफ़ी हद तक अब महात्मा गाँधी के रास्ते पर चलने लगे हैं।

वह इस बात की परवाह छोड़ कि उन्हें सज़ा होगी, तो क्या होगा? सिर्फ़ इस बात पर फोकस कर रहे हैं कि देश में लोगों को कैसे जगाया जाए और उन्हें यह समझाया जाए कि उनका और देश का हित किसमें है। राहुल गाँधी अब मोहब्बत की दुकान खोल रहे हैं और खुलकर कह रहे हैं कि नफ़रत की नहीं, अब मोहब्बत की दुकान चलेगी। इशारों-इशारों मे वह भाजपा को नफ़रत की दुकान चलाने वाला और ख़ुद को मोहब्बत की दुकान चलाने वाला बता रहे हैं। राहुल गाँधी ने अपनी सज़ा को लेकर जो भी फ़ैसला कोर्ट का आया है, उसे स्वीकार किया है। उन्होंने सरकार और कोर्ट पर लोगों के बीच जाकर आरोप नहीं लगाये हैं। वो लोगों से सिर्फ़ उनकी बात कर रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। गुजरात हाईकोर्ट के की टिप्पणी कि राहुल के ख़िलाफ़ 10 क्रिमिनल केस चल रहे हैं; को लेकर लोगों में चर्चा है कि राहुल गाँधी ने ऐसा कौन-सा गुनाह कर दिया है, जो उनके ख़िलाफ़ इतने क्रिमिनल केस चल रहे हैं? उन्होंने नेताओं के चरित्र पर उँगली ज़रूर उठायी है, जो कि कोई आपराधिक मामले नहीं हैं, मानहानि के हो सकते हैं।

जिस मामले में उनकी सज़ा बरक़रार रखी गयी है, वो सन् 2019 का कर्नाटक का मामला है; जहाँ हाल ही में कांग्रेस की बड़ी जीत हुई है। गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक पूर्णेश मोदी ने इस मामले में सूरत की मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अदालत में याचिका दायर की थी, जिस पर इसी साल बीती 23 मार्च को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं-499 और 500 (आपराधिक मानहानि) के तहत मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अदालत ने दोषी ठहराते हुए राहुल गाँधी को अधिकतम दो साल जेल की सज़ा सुनायी थी। इसके ठीक एक सप्ताह के बाद राहुल गाँधी की लोकसभा सदस्यता छीन ली गयी और एक महीने में उनका सरकारी आवास ख़ाली करा दिया गया। लेकिन कर्नाटक में भाजपा की हार से राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ की गयी कार्रवाई पर जनता का जवाब भाजपा को मिला। भाजपा जनता के इस जवाब से घबरायी हुई है कि जिस कर्नाटक की वायनाड क्षेत्र की एक लोकसभा सीट उनसे छीनी गयी है, उस एक सीट के बदले भाजपा ने पूरा राज्य गँवा दिया। लेकिन चुनाव आयोग वायनाड सीट पर उप चुनाव करा सकता है। अगर ऐसा राहुल गाँधी पर अंतिम फ़ैसला आने से पहले होता है, और इस सीट पर कोई अन्य उम्मीदवार जीत जाता है, और उसके बाद अगर राहुल गाँधी को राहत मिल जाती है, तो क्या होगा? हालाँकि हो सकता है कि अब चुनाव आयोग इस सीट पर उप चुनाव की जल्दबाज़ी न करें, क्योंकि अब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। कहीं ऐसा न हो कि वायनाड सीट पर फिर से राहुल नहीं, तो कोई और कांग्रेसी नेता जीत जाए। अगर ऐसा हुआ, तो भाजपा और केंद्र सरकार की बड़ी किरकिरी होगी। अगर राहुल गाँधी को कहीं से भी राहत नहीं मिल पाती है, तो इसका मतलब यह हुआ कि राहुल गाँधी साल 2024 से लेकर साल 2029 तक के लोकसभा चुनाव में चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। क्योंकि सज़ा मिलने की तारीख़ से छ: साल तक वो चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।

कांग्रेस के नेताओं को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट से राहुल गाँधी को राहत मिलेगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अभी भी किसी दबाव में काम नहीं करता है और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ अपनी न्यायप्रियता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन आठ-नौ महीने के भीतर देश में लोकसभा चुनाव होने हैं, जिसे लेकर कांग्रेस में भी राहुल गाँधी के फ़ैसले को लेकर चिन्ता है।

ऐसा माना जा रहा है कि हाल ही में पटना में महागठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में लालू यादव ने दूल्हा बनने के इशारे से राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार रहने को कहा था। उन्होंने कहा था- ‘आप दूल्हा बनने के लिए तैयार रहिए, हम सभी बाराती बनेंगे।’

लालू प्रसाद यादव के इस बयान से भाजपा में खलबली है। लेकिन अभी तक दूल्हा बनने यानी प्रधानमंत्री बनने से मना करते आये राहुल गाँधी क्या इस बात को समझ चुके हैं कि उन्हें अब पूरे विपक्ष की बाग़डोर सँभालनी है? फ़िलहाल पहले तो उनके संसद पहुँचने का रास्ता खुले, उसके बाद ही वो दूल्हा बनने की तैयारी कर सकते हैं। इसके लिए जनता का मूड भी देखना होगा और राज्यों में चुनावी गणित को समझना होगा।

आगामी संसद सत्र के बाद राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा-2 के शुरू होने की सुगबुगाट है। उनकी पहली भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस को बड़ा फ़ायदा पहुँचा है। भाजपा इस यात्रा को रोकना चाहती थी; लेकिन पिछली बार ऐसा नहीं कर सकी। अब देखना होगा कि राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा-2 का क्या असर होगा? क्या भाजपा इस यात्रा को सहज रूप से संपन्न होने देगी? कांग्रेस राहुल गाँधी के पक्ष में माहौल बनाने का कोई भी मौक़ा नहीं छोडऩा चाहती और राहुल गाँधी को उनकी बहन प्रियंका गाँधी का साथ जिस तरह मिल रहा है, उससे लोगों पर काफ़ी प्रभाव पड़ रहा है। कुछ साल पहले यह बात कही जाने लगी थी कि प्रियंका गाँधी में इंदिरा गाँधी की छवि लोग देख रहे हैं; लेकिन अब लोग ये कह रहे हैं कि प्रियंका गाँधी में नेतृत्व की क्षमता है। वह देश चला सकती हैं। ऐसे में जो लोग यह कह रहे हैं कि राहुल के चुनावों से दूर होने का मतलब है- कांग्रेस ख़त्म, वे शायद भूल रहे हैं कि अगर राहुल गाँधी को चुनाव लडऩे का मौक़ा नहीं भी मिलता है और अगर उन्हें दो साल के लिए जेल भी जाना पड़ा, तो कांग्रेस में प्रियंका गाँधी भाजपा के लिए दूसरा बड़ा काँटा साबित हो सकती हैं।

देश भर में महँगी होगी बिजली!

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

दिल्ली में 200 यूनिट तक बिजली मुफ़्त है। कई बार शोर हुआ मुफ़्त बिजली सुविधा बन्द होगी। अब शोर हो रहा है दिल्ली सरकार ने बिजली महँगी कर दी। हालाँकि यह पूरा सच नहीं है। यह तो सच है कि दिल्ली में बिजली महँगी हुई है, परन्तु किसकी वजह से यह प्रश्न है? केंद्र शासित देश की इस राजधानी में केंद्र सरकार तथा उसके प्रतिनिधि उपराज्यपाल की मंशा पर सब चलता है। अर्थात् इनकी मंशा पर ही बिजली कम्पनियों ने बिजली के दाम बढ़ाये हैं। दिल्ली सरकार की भी इसमें सहमति है, परन्तु वह सीधे-सीधे मोहरा बनायी जा रही है। यह ठीक नहीं।

बिजली के दाम बढऩे का दोष केंद्र सरकार तथा उसके प्रतिनिधि उपराज्यपाल पर भी उतना ही है, जितना दिल्ली सरकार पर। प्रचार हुआ कि दिल्ली में 10 प्रतिशत बिजली महँगी हुई। यह भी सच नहीं है। सच यह है कि बीएसईएस यमुना पॉवर लिमिटेड को 9.42 प्रतिशत, बीएसईएस राजधानी पॉवर लिमिटेड को 6.39 प्रतिशत तथा नई दिल्ली नगर पालिका परिषद् को दो प्रतिशत क़ीमतें बढ़ाने की अनुमति मिली है।

परन्तु इससे बड़ा मुद्दा यह है कि अगले साल से पूरे देश में बिजली महँगी होगी। केंद्र सरकार ने एक प्रस्ताव बना रखा है, जिसके अनुसार 10 किलोवॉट या इससे अधिक बिजली की खपत करने वाले व्यापारिक तथा औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए 1 अप्रैल, 2014 से टीओडी अर्थात् टाइम ऑफ डे टैरिफ सिस्टम लागू होगा। यही व्यवस्था 1 अप्रैल, 2025 से कृषि क्षेत्र को छोडक़र अन्य सभी उपभोक्ताओं के लिए लागू हो जाएगी। यह सब विद्युत (उपभोक्ताओं के अधिकार) नियम, 2020 में बदलाव करके केंद्र सरकार कर रही है। इसके लिए सरकार स्मार्ट मीटर लगवाएगी, जिसकी क़ीमतें अलग से वसूल की जा सकती हैं। ऊर्जा मंत्रालय का कहना है कि नये टैरिफ सिस्टम के लिए स्मार्ट मीटर लगवाना आवश्यक होगा।

मंत्रालय ने पिछले दिनों कहा था कि जिन उपभोक्ताओं के यहाँ स्मार्ट मीटर लगे हुए हैं, उन पर पहले चरण से ही टीओडी सिस्टम लागू हो जाएगा। अधिकतर राज्य सरकारें पहले ही स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन के तहत बड़े व्यावसायिक केंद्रों तथा औद्योगिक क्षेत्रों में पहले ही टीओडी टैरिफ प्लान लागू कर चुकी हैं। ये टैरिफ सिस्टम के लागू होने के बाद बढ़ी हुई बिजली दरें एक महीने पहले ही बिजली कम्पनियाँ अपनी वेबसाइट पर सभी उपभोक्ताओं को बताएँगी।

इस नये डीओडी टैरिफ सिस्टम से दिन तथा रात की बिजली दरें अलग-अलग होंगी। दिन के मुक़ाबले रात को बिजली की दरें महँगी होंगी। केंद्र सरकार ने तय किया है कि दिन में बिजली दरें कम वसूल की जाएँगी, जबकि रात में अधिक बिजली दरें लागू होंगी।

इस टैरिफ सिस्टम के तहत अब बिजली उपभोक्ताओं को दिन और रात की बिजली के लिए अलग-अलग बिल चुकाने होंगे। नयी व्यवस्था में दिन के आठ घंटे के लिए बिजली दरें सामान्य दरों के मुक़ाबले अधिकतम 20 प्रतिशत तक कम हो सकती हैं, जबकि रात के 16 घंटे की बिजली लगभग 11.55 प्रतिशत से 18.90 प्रतिशत तक महँगी होगी। अगर मान लें कि दिन के आठ घंटे के लिए 20 प्रतिशत बिजली दरें कम हुईं, जबकि रात के लिए 16 घंटे 10 प्रतिशत दरें बढ़ीं, तो सामान्य रूप से उपभोक्ताओं को न लाभ हुआ तथा न हानि। परन्तु देखा यह जाना चाहिए कि रात में बिजली खपत घरों में अधिक होती है। इसलिए आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ पड़ेगा। वहीं औद्योगिक तथा व्यापारिक क्षेत्र दिन में अधिक बिजली की खपत करते हैं, तो उन्हें फ़ायदा हो सकता है। परन्तु दिन में 20 प्रतिशत दरें कम करने की गारंटी नहीं है।

बिजली दरें पाँच प्रतिशत से लेकर 20 प्रतिशत तक कम हो सकती हैं। परन्तु रात के 16 घंटे के लिए बिजली दरें 10 प्रतिशत बढऩी लगभग तय हैं। इस आधार पर अभी से फ़ायदे तथा नुक़सान के बारे में सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अधिकतर अनुमान यही है कि लोगों की जेब बिजली कम्पनियाँ ढीली करेंगी। बिजली दरें बढ़ाने के पीछे केंद्र सरकार का तर्क यह है कि दिन में बिजली के अतिरिक्त सस्ती पडऩे वाली सौर ऊर्जा से भी बिजली उपभोक्ताओं को मिलती है। इसलिए दिन में बिजली सस्ती दी जाएगी। वहीं रात में कोयला तथा गैस से बनी बिजली मिलती है, इसलिए महँगी मिलेगी।

प्रश्न यह है कि क्या सरकार ने बिजली दरें बढ़ाने के लिए नया बहाना ढूँढ लिया है? क्योंकि बिजली तो पहले भी ऐसे ही बनती रही है। सौर ऊर्जा की खोज से पहले तो कोयला, पानी तथा गैस से ही बिजली बनती थी। सरकार का कहना है कि टीओडी सिस्टम लागू होने से उपभोक्ता खपत के अनुसार अपना टैरिफ मैनेज करने के प्रति जागरूक होंगे तथा ख़ुद ही बिजली का बिल घटा सकेंगे। सरकार का तर्क है कि उपभोक्ता कपड़ा धोने, पानी मोटर चलाने, खाना बनाने तथा अन्य कई कार्य करने के लिए दिन में अधिक बिजली का इस्तेमाल करने लगेंगे, जिससे उनकी बिजली बचेगी तथा जेब पर बोझ भी कम पड़ेगा।

टीओडी का सबसे बड़ा मक़सद ग्रेड सिस्टम पर अधिक बिजली आपूर्ति की आवश्यकता के दौरान लोड कम करना है। इससे उपभोक्ताओं में भी अधिक खपत वाले समय में बिजली बचाने की आदत पड़ेगी। जिस आठ घंटे के लिए सरकार बिजली बिल कम कर रही है, उन आठ घंटों में अधिकतर लोग बाहर होते हैं, क्योंकि ये आठ घंटे ड्यूटी के होते हैं। परन्तु प्रश्न ये हैं कि इस दौरान कौन अपना खाना बनाएगा? कौन मोटर चलाएगा? कौन अपनी वाशिंग मशीन चलाएगा? कौन कपड़ों पर प्रेस करेगा? कौन कूलर, पंखा, एसी अथवा हीटर चलाएगा? बिजली की अधिक खपत तो बाक़ी के 16 घंटे में ही होगी, जो शाम से सुबह 8-9 बजे तक का समय है। प्रश्न यह भी है कि सरकार वो कौन से आठ घंटे तय करेगी, जिसमें बिजली दरें कम होंगी? अगर सरकार सुबह 10:00 बजे से आगे के आठ घंटे बिजली बिल घटाती है, तो शाम को छ: बजे तक ही यह समय होगा। इस समय में घर में कौन रहता है? अगर घरेलू महिलाएँ घर में रहती भी हैं, तो क्या वे अपने पति और बच्चों के घर से जाने के बाद खाना बनाएँगी? क्या वे उनके जाने बाद ही पानी का इस्तेमाल करेंगी? घर के काम लगी महिलाएँ शायद ही बहुत पंखा, एसी, कूलर चलाएँगी? इसका अर्थ है कि सरकार उपभोक्ताओं को मूर्ख समझती है। इसलिए वह महँगाई के जाल में उन्हें लपेट रही है। इसलिए सरकार का यह दावा उचित नहीं लगता कि इससे बिजली उपभोक्ताओं को फ़ायदा होगा।

सरकार का कहना है कि उसका प्रयास वर्ष 2070 तक 100 प्रतिशत सौर ऊर्जा में बदलने का है। प्रयास अच्छा है। हालाँकि यह इतना आसान नहीं है; शायद सम्भव भी नहीं। जानकार मान रहे हैं कि सरकार के इस क़दम से सरकार उपभोक्ताओं से एक देकर चार लेने की योजना बना चुकी है। सरकार की यह व्यापारिक लाभ की सोच इस दिन तथा रात की उलझन में छिपी है। 65 से 75 प्रतिशत बिजली तो रात में ही खपत होती है। इसलिए दिन में बिजली सस्ती होने से अधिकतम 10-12 प्रतिशत उपभोक्ताओं को मामूली फ़ायदा होगा, वहीं 88-90 प्रतिशत उपभोक्ताओं को यह सौदा महँगा पड़ेगा। दिल्ली की शिक्षा मंत्री आतिशी का कहना है कि केंद्र सरकार के कुप्रबंधन और कोयला ब्लॉकों की बढ़ती दरों के कारण ही दिल्ली में बिजली दरें बढ़ी हैं। भारत में कोयला खदानों की कोई कमी नहीं है, फिर कोयले की क़ीमत क्यों बढ़ रही है? बिजली उत्पादक कम्पनियाँ ऊँची दरों पर कोयला ख़रीदने को मजबूर क्यों हैं?

आम आदमी पार्टी इस नयी बिजली दर का कड़ा विरोध कर रही है। बिजली दरें बढ़ाने के केंद्र सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह तथा अन्य नेता नयी बिजली पॉलिसी को ख़तरनाक बताकर इसका विरोध कर रहे हैं। सांसद संजय सिंह का कहना है कि केंद्र अधिकांश दिन के वक़्त बिजली थोड़ी सस्ती करके रात के वक़्त 20 प्रतिशत बिजली दरें बढ़ाने जा रही है, जो आम लोगों के लिए बहुत ही भारी साबित होगा। केंद्र सरकार की यह नीति जन विरोधी है।

केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव के अनुसार, घरेलू खपत के लिए रात की बिजली दरों में 18.59 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। प्राइवेट तथा सरकारी संस्थानों में बिजली 17.62 प्रतिशत महँगी होगी। अस्थायी कनेक्शन वालों को 18.90 प्रतिशत महँगी बिजली मिलेगी। भारी उद्योगों को 16.25 प्रतिशत, लिफ्ट इरिगेशन के लिए 16.26 प्रतिशत तथा अन्य कॉमर्शियल उपभोक्ताओं को 11.55 प्रतिशत महँगी बिजली ख़रीदनी होगी। देखने वाली बात यह है कि दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के लोग बिजली दरें बढऩे पर दिल्ली सरकार पर हमलावर हैं तथा यह प्रचार कर रहे हैं कि दिल्ली सरकार 200 यूनिट मुफ़्त बिजली का झाँसा लेकर दिल्ली वालों को लूट रही है, जबकि सच इसके विपरीत है। कौन लूट रहा है? सब जानते हैं।

उत्तर प्रदेश में सुरक्षित नहीं सच दिखाने वाले पत्रकार

समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता देवेंद्र कुमार का कहना है कि उत्तर प्रदेश की जनता ये सोचकर प्रसन्न रह सकती है कि योगीराज में रामराज आ गया है; मगर ये विचार करने भर से अच्छा लगता है। वास्तविकता में योगीराज में रामराज दिखता ही नहीं है। जिधर देखो लोग महँगाई, कमायी न होने एवं अपराधियों के आतंक से दु:खी हैं। हर दिन अपराध हो रहे हैं जो थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। जनता की पीड़ा दिखाने वाले पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं। सरकार की कमियाँ दिखाने वाले पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं। पुलिस दबंगई पर उतरी हुई है। सरकारी व्यवस्था चरमरा गयी है। कोई काम आसानी से नहीं होता है। बुलडोजर केवल विरोधियों को निपटाने के लिए है।

देवेंद्र कुमार की बातों पर पूर्णता सहमति तो नहीं जतायी जा सकती; मगर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में अपराध नहीं रुके हैं। भाजपा की छत्रछाया में जीने वाले भाजपा एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीतियों का विरोध करने वालों पर हमला करने से भी नहीं चूकते हैं। अभी सुलतानपुर जनपद में एक पत्रकार के साथ ऐसा ही हुआ। 

पीडि़त पत्रकार को ही जेल

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पूरे प्रदेश के पत्रकारों को खुली चेतावनी देनी चाहिए कि कोई भी पत्रकार सरकार की अव्यवस्था को न दिखाये। अगर दिखाएगा, तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होगी। यह शब्द एक पत्रकार के हैं, जिनका नाम लिखना यहाँ उचित नहीं होगा। ये शब्द एक पत्रकार के क्यों हैं? इस पर जाने से पहले सुल्तानपुर जनपद के कूरेभार थाना क्षेत्र के सराय गोकुल गाँव की एक घटना को समझना होगा, जो अभी कुछ दिन पहले 5 जुलाई को ही घटी है।

इस गाँव में बने एक एएनएम सेंटर की बदहाली तथा इस स्वास्थ्य सेंटर की सच्चाई दिखाने वाले एक यू-ट्यूबर पत्रकार ललित यादव की पहले पिटाई हुई एवं बाद में उन्हें ही पुलिस ने गिर$फ्तार कर लिया। सच्चाई दिखाने पर ललित यादव पर एक महिला स्वास्थ्यकर्मी एएनएम जनक लली त्रिपाठी ने चप्पल एवं लाठी से हमला कर दिया। इसके बाद पुलिस ने पत्रकार के विरुद्ध हथियार लेकर एएनएम के कमरे में घुसने, स्वास्थ्य रजिस्टर फाडऩे, रंगदारी माँगने, वैक्सीन फेंकने, एएनएम से अश्लीलता करने एवं अंत में तमंचा दिखाकर एएनएम को धमकी देकर भाग जाने, सार्वजनिक संपत्ति नु$कसान निवारण अधिनियम के मामले लगाकर आईपीसी की धाराओं- 384, 354, 353, 504, 506 व 2/3 में एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिर$फ्तार कर लिया। जबकि पत्रकार की रिपोर्टिंग का वीडियो स्पष्ट दिखा रहा है कि पत्रकार ललित यादव ने ऐसा कुछ नहीं किया है।

ललित यादव ने रिपोर्ट के दौरान यही कहा है कि छ: महीने बाद अस्पताल खुला है। दो से तीन फुट की घास इसके मैदान में उग आयी है। कार की पार्किंग यहाँ की हुई है। इसके साथ ही ललित यादव कमरे की ओर अपने कैमरामैन के साथ जाकर डॉक्टर के बारे में पूछते हैं। इस पर अंदर बैठी स्वास्थ्यकर्मी महिला ललित यादव को चप्पल दिखाती है। उन्हें चप्पल से मारती है। ईंट भी मारने के लिए उठाती हैं। उसके बाद लाठी से भी पत्रकार को पीटती है। पत्रकार भी महिला के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराता है एवं महिला भी रिपोर्ट दर्ज कराती है। पुलिस ने पत्रकार को तुरन्त गिर$फ्तार कर लिया, महिला एएनएम से पूछताछ तक नहीं की। पुलिस ने खेल यह किया कि जनता में मामला आने के बाद पत्रकार की एफआईआर अगले दिन दर्ज की, जिससे पुलिस बदनामी से बच सके एवं पत्रकार को दोषी साबित किया जा सके। अब मामला तूल पकड़ गया है। रवि यादव का कहना है कि योगी सरकार यादवों से दुश्मनी पाले बैठी है। पत्रकार यादव समुदाय से है, इसलिए उसे जेल हुई। मुख्यमंत्री योगी मुसलमानों से, दलितों से एवं पिछड़े वर्गों से ईष्र्या करते हैं। उन्हें केवल राजपूतों एवं ब्राह्मणों से ही प्यार है। पत्रकार को पीटने वाली एएनएम ब्राह्मण समुदाय की है, इसलिए उसके विरुद्ध कार्रवाई पुलिस नहीं कर रही है।

उपमुख्यमंत्री बोले, जाँच होगी

रामराज की परिभाषा को सच सिद्ध करने के लिए योगी सरकार कई मामलों में न्याय की मिसाल प्रस्तुत करती रहती है; मगर कुछ मामलों में रावणराज की मिसाल प्रस्तुत हो जाती है। पत्रकार के साथ हुए दुव्र्यवहार एवं जेल मामले में प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने संज्ञान लेते हुए कहा है कि इस मामले की जाँच के आदेश दिये गये हैं। सुल्तानपुर में एएनएम सेंटर में पत्रकार के साथ महिला स्वास्थ्यकर्मी द्वारा अभद्र व्यवहार किये जाने व चप्पल व लाठी से पीटने सम्बन्धी प्रकरण का संज्ञान लेते हुए मेरे द्वारा दिये गये आदेश के क्रम में मुख्य चिकित्साधिकारी, सुल्तानपुर द्वारा प्रकरण की जाँच हेतु एसीएमओ की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी गयी है। जाँच रिपोर्ट एक सप्ताह के अंदर माँगी है। दोषी स्वास्थ्यकर्मी के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाएगी।

सुना है कि इस मामले की भनक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी लग गयी है। भाजपा समर्थक नरेश सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी किसी भी हाल में अन्याय बर्दाश्त नहीं करते। वह प्रदेश में ऐसी किसी भी घटना को बर्दाश्त नहीं करते, जिससे प्रदेश व सरकार की छवि धूमिल हो एवं उनकी न्यायप्रिय छवि पर कोई धब्बा लगे। मुख्यमंत्री योगी बहुत न्यायप्रिय एवं संवैधानिक नीतियों को मानने वाले हैं।

अखिलेश ने सरकार को घेरा

पत्रकार पर हमले एवं उसे जेल भेजे जाने की घटना का वीडियो समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीटर पर डालते हुए योगी सरकार की कड़ी निंदा की है। उन्होंने लिखा है कि भाजपा के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पताल की दुर्दशा का हाल उजागर करने वाले एक मीडियाकर्मी को स्वास्थ्यकर्मी द्वारा पीटे जाने की घटना को आपराधिक मामले की तरह देखा जाए। अगर हर ज़िले में एक भी ऐसा साहसी पत्रकार हो जाए, तो उत्तर प्रदेश की सच्चाई सबको पता चल जाए।

अनेक पत्रकार किये गये प्रताडि़त

मिर्जापुर के पत्रकार पवन जायसवाल को कौन भूल सकता है, जिन्होंने मिड-डे मील योजना के तहत एक विद्यालय में बच्चों को नमक रोटी खिलाये जाने का समाचार दिखाने के बाद माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री से कामकाज का ब्यौरा माँग लिया। इस पर बौखलायी प्रदेश पुलिस ने पवन जायसवाल को अपराधियों की तरह हथकड़ी पहनाकर रस्सियों से पीछे हाथ बाँधकर ले जाकर जेल में डाल दिया था। बाद में पत्रकारों, विपक्षी दलों एवं जनता के दबाव के चलते उन्हें आरोपों से मुक्त किया गया। मगर इसके एक वर्ष के अंतराल के लगभग पत्रकार पवन जायसवाल ने कैंसर से दम तोड़ दिया। कई अन्य पत्रकारों के साथ भी योगी राज में पुलिस का कुपित रूप सामने आया है। कई पत्रकारों की हत्या हो चुकी है।

भारतीय पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले देश के प्रमुख एनजीओ राइट एंड रिस्क एनालिसिक ग्रुप के एक अध्ययन में कहा गया है कि वर्ष 2020 में भारत में 228 पत्रकारों को सच उजागर करने पर निशाना बनाया गया। इन पत्रकारों में उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक 37 पत्रकारों को प्रताडऩा झेलनी पड़ी। वर्ष 2020 में देश में कुल 13 पत्रकारों की हत्या हुई, जिनमें सबसे अधिक छ: पत्रकार उत्तर प्रदेश के थे। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक-2021 में 180 देशों में प्रेस स्वतंत्रता में भारत का 142वाँ स्थान था। पिछले वर्ष रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने मीडिया की स्वतंत्रता का हनन करने वाले विश्व के 37 शासकों के नामों की सूची जारी की थी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम है। 

पत्रकारों के हनन में उत्तर प्रदेश आगे

उत्तर प्रदेश में योगीराज में कई पत्रकारों पर हमले चर्चा में रहे हैं। किसान आंदोलन के समय लखीमपुर में केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र के पुत्र आशीष मिश्र ने किसानों पर गाड़ी चढ़ाकर उन्हें मारने वाली सच्चाई दिखाने वाले स्थानीय पत्रकार रमन कश्यप को भी कुचल दिया था। सहारनपुर में बदमाशों ने स्थानीय पत्रकार सुधीर सैनी की हत्या कर दी थी। बलरामपुर में दबंगों ने पत्रकार राकेश सिंह निर्भीक एवं उनके साथी पिंटू साहू को जीवित जला दिया था। प्रतापगढ़ जनपद के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की एक नशा तस्कर ने हत्या कर दी। नशा तस्कर से हत्या की धमकी मिलने पर भी पुलिस ने पत्रकार को सुरक्षा नहीं दी थी। हाथरस कांड को कवरेज देने गये केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था।

उन्नाव के मुख्य विकास अधिकारी दिव्यांशु पटेल ने एक टीवी रिपोर्टर की पिटाई मतदान केंद्र पर धाँधली दिखाने के चलते की थी। बिजनौर में दबंगों के डर से दलित परिवार के पलायन का समाचार दिखाने वाले पाँच पत्रकारों- आशीष तोमर, शकील अहमद, लाखन सिंह, आमिर खान एवं मोइन अहमद के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई कौन भूल सकता है। ऐसे अनगिनत मामले उत्तर प्रदेश सरकार में पत्रकारों के विरुद्ध देखे गये हैं। पत्रकारों के वैश्विक संगठन कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के एशिया प्रतिनिधि कुनाल मजुमदार ने उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के विरुद्ध घटी घटनाओं का दस्तावेज़ीकरण किया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है- ‘उत्तर प्रदेश में पुलिस छोटे-छोटे मामलों में भी पत्रकारों के पीछे पड़ जा रही है। ऐसा नहीं लगता कि हम लोग लोकतांत्रिक परिवेश में रह रहे हैं।’

आरक्षण का दुष्चक्र

शिवेन्द्र राणा

आरक्षण के बाबत अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला चर्चा में है। उसने विश्वविद्यालयों में नस्‍ल के आधार पर होने वाले एडमिशन को ख़ारिज कर दिया है। अमेरिकी न्यायपालिका का यह फ़ैसला आरक्षण की परंपरागत जन्म आधारित अवधारणा का खण्डन करता है। अमेरिका से पूर्व 2018 में बांग्लादेश ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण को समाप्त कर दिया था। अब भारत में भी आरक्षण की समीक्षा का विमर्श चर्चा में है।

भारत में जाति आधारित असमानता एवं भेदभाव का लम्बा इतिहास रहा था। एक ऐसा वर्ग, जो इसी वजह से तरक़्क़ी की भाग-दौड़ में कहीं पीछे छूट गया था। अत: स्वाभाविक रूप से संविधान निर्माताओं ने इस वर्ग के लिए आरक्षण के रूप में विशेष प्रावधान निर्धारित किये। आरक्षण एक ऐसी व्यवस्था है, जो भेदभाव पर आधारित है। हालाँकि इसका भाव विभेद करने का नहीं, बल्कि समता स्थापना का है। लेकिन सात दशक बीतने पर भी इसकी न तो व्यापक समीक्षा हुई और न ही इस पर राष्ट्रव्यापी गम्भीर विमर्श; जबकि आज यह व्यवस्था गम्भीर विवादों का केंद्र बन चुकी है। ऐसा क्यूँ है?

संविधान के अंतर्गत शैक्षिक एवं सिविल सेवा में अनुसूचित जातियों के लिए 15 फ़ीसदी और अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी। संवैधानिक रूप से यह व्यवस्था नियत-काल के लिए थी। किन्तु दलित एवं वनवासी समाज की स्थिति को देखकर इसे प्रति दशक आगे बढ़ाया जाता रहा। यहाँ तक ठीक था। किन्तु आरक्षण की विकृत राजनीति की शुरुआत तब हुई, जब सत्ता के खेल में जातिवाद की ढाल के रूप में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण लागू हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने सन् 1990 में चौधरी देवीलाल की चुनौती और भाजपा के अयोध्या आन्दोलन से निपटने के लिए मंडल कार्ड खेला। लालकृष्ण आडवाणी लिखते हैं- ‘वह मंडल मुद्दे का प्रयोग केवल राजनीतिक बचाव के लिए कर रहे हैं।’

इसे लागू करने का तरीक़ा भी बड़ा अजीब था। मंडल आयोग की सिफ़ारिश पर बहस के दौरान विपक्ष के नेता राजीव गाँधी ने 6 सितंबर को लोकसभा में अपने भाषण में ओबीसी वर्ग के सुविधा प्राप्त लोगों को आरक्षण का लाभ दिये जाने की आवश्यकता पर प्रश्न उठाया। सदन में बहस के दौरान आरक्षण के लाभ से क्रीमी लेयर को अलग करने के प्रश्न पर कम्युनिस्ट पार्टियाँ कांग्रेस और भाजपा सभी एकमत थे। इसी के अनुरूप सन् 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का निर्णय दिया। असल में आयोग ने 3,743 जातियों और समुदायों की पहचान ओबीसी वर्ग के रूप में की थी, जिसके लिए विभिन्न सामाजिक शैक्षिक एवं आर्थिक मानदंडों को स्वीकार किया गया तथा इन्हें सरकारी सेवाओं और शिक्षा में 27 फ़ीसदी आरक्षण की सिफ़ारिश की थी। किन्तु इस रिपोर्ट के निर्धारित मानक दोषपूर्ण होने के चलते यह व्यवस्था भी दोषपूर्ण साबित हुई।

इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि आरक्षण की जो वास्तविक विचार पद्धति लागू हुई, उसे विस्मृत करते हुए पहले से सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त, सबल मध्यवर्ती जातियों- यादव, कुर्मी, कोईरी, राजभर ने अनाधिकृत रूप से आरक्षण के लाभ पर अधिकार कर लिया और जिन जातियों को वास्तव में इसकी ज़रूरत थी; पिछड़ी ही रह गयीं। ओबीसी आरक्षण की विकृति देखिए कि जाट जैसी प्रभावशाली जाति पिछड़ा वर्ग में शामिल हुई और पाटीदार इसमें शामिल होने की माँग कर रहे हैं। हालाँकि अक्टूबर, 2017 में ओबीसी आरक्षण का वर्गीकरण करने के लिए गठित रोहिणी आयोग इस दिशा में एक सकारात्मक पहल थी; किन्तु सरकार अब तक उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने या लागू करने से बचते हुए लगातार आयोग का कार्यकाल बढ़ाती जा रही है। दूसरी ओर आज जो आरक्षण बचाने के नाम पर पिछड़ा एवं अनुसूचित जाति और जनजाति की गोलबंदी है, वह भी राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित है। विरोधाभास देखिए कि सार्वजनिक जीवन में ओबीसी समाज के लोग दलित वर्ग के आरक्षण एवं उनकी मेरिट के ख़िलाफ़ नकारात्मक टिप्पणियाँ करते आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन समस्या सिर्फ़ यही नहीं है। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था का सबसे बड़ा दुर्गुण इसके पाश्र्व में रूढि़वाद है, जिसके अनुसार तथाकथित सवर्ण जातियों में पैदा होने वाला हर शख़्स अत्याचारी, ब्राह्मणवादी शोषक और चाँदी के चम्मच के साथ पैदा हुआ है। जबकि आरक्षण से लाभान्वित जातियों के सारे लोग मजलूम, अकिंचन, साधन विहीन, दमन से पीडि़त और प्रताडि़त हैं। वास्तव में आरक्षण के कारण फैले विद्वेष के पीछे यही मूल कारण रहा है, जिसने संवैधानिक रूप जन्मना विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग पैदा कर दिया है। आरक्षण, जिसे सामाजिक समानता की स्थापना का संवैधानिक ज़रिया घोषित किया गया था; अब अघोषित विशेषाधिकार का कारण बन चुका है।

पिछड़े एवं दलित वर्ग के लिए आरक्षण सामाजिक न्याय एवं प्रोत्साहन की परिकल्पना होगी, किन्तु सामान्य वर्ग के लिए यह दांडिक विधान बन चुका है। अब यदि सामाजिक अन्याय के शास्त्रीय तर्कों को स्वीकार करें, तब भी न तो वर्तमान तथाकथित सवर्ण पीढ़ी ने ऐसा कोई जातिगत श्रेष्ठता से युक्त एकाधिकारवादी सत्ता क़ायम की है और न ही वर्तमान आरक्षित वर्ग ने ऐसी कोई मनुवादी व्यवस्था झेली है। फिर भी पिछले सात दशकों से अधिक समय से तथाकथित सवर्ण मौन होकर अपने पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित कर रहे हैं। यदि यह दांडिक प्रक्रिया अभी और लम्बी चलनी है, तो चले। किन्तु इसे भी तथाकथित सवर्ण समाज झेल ही लेगा, ताकि राष्ट्र का संतुलन बना रहे। किन्तु दंडविधान के शास्त्रीय नियमों के अनुसार यह विचार अस्वीकृत है कि अतीत में किसी समाज से हुए अपराध के लिए उसकी वर्तमान पीढ़ी को दंडित किया जाए, जिनका इन सबसे कोई वास्ता ही न रहा हो। तब तो यह और भी अनुचित लगता है, जब वर्तमान में अपराधी ठहराने तथा दंड तय करने वाले न किसी भेदभाव का शिकार रहे हों और न ही किसी सामाजिक अपराध का।

असल में आज सिर्फ़ राजनीतिक गोलबंदी के रास्ते सत्ता हथियाने तथा कमज़ोर मेरिट की स्थिति में पद पाने की लालसा में इतिहास के कुरूप विषयों को उभारा जा रहा है। इसके प्रभाव से सामाजिक ध्रुवीकरण एवं विघटन दोनों तीव्र हुए हैं। इन सबमें मेरिट और योग्यता एक अहम बिन्दु है, जिस पर विस्तृत चर्चा आवश्यक है। सन् 2019 में आरक्षण व्यवस्था सही दिशा मिली, जब 103वें संविधान संशोधन के ज़रिये इसे 10 फ़ीसदी ही सही; लेकिन आर्थिक आधार पर लागू किया गया। हालाँकि यह नीति से अधिक राजनीतिक से प्रेरित था और आरक्षित वर्ग इसका विरोधी भी है। आरक्षण के ये घोर समर्थक ईडब्लूएस आरक्षण के विरोध में मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। यह कैसा स्वार्थ है? फिर इसे आपकी जातिवादी कुंठा क्यों न माना जाए? वस्तुस्थिति यह है कि आज की भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा आधार जातिवाद और आरक्षण इसका सबसे अमोघ हथियार है। इसी अनुरूप आज तर्कविहीन आरक्षण के नये-नये पैतरों में सरकारें लिप्त हैं। विकास के नाम पर सरकारें इसे ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान रही हैं। आज जो जातिगत जनगणना की तीव्र माँग है, वो इसी विचार से प्रेरित है। यही नहीं, जातिगत गोलबंदी के ज़ोर से आरक्षण को और बढ़ाने का दबाव भी बनाया जा रहा है।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के प्रमुख हंसराज गंगाराम अहीर के अनुसार, ‘जल्दी ही केंद्र की ओबीसी लिस्ट में छ: राज्यों के क़रीब 80 जातियों को जोड़ा जा सकता है। वहीं तेलंगाना ने 40 जातियों के नाम; आंध्र प्रदेश ने तुरुक कापू जाति; हिमाचल प्रदेश ने माझरा समुदाय; महाराष्ट्र ने लोधी, लिंगायत, भोयर पवार और झंडसे; पंजाब ने यादव समुदाय और हरियाणा ने गोसाईं जाति को केंद्र की सूची में शामिल करने का अनुरोध किया है।’

पता नहीं यह पिछड़ावाद की सूची कहाँ जाकर रुकने वाली है? क्योंकि आरक्षण के इस जिन्न को जिस प्रकार तर्कहीन स्वार्थ के लिए जगाया गया है; अब इसे वापस बोतल में बन्द करना अत्यंत दुष्कर दिख रहा है। इसका परिणाम नित नये विस्फोटक रूप में प्रकट हो रहा है। आरक्षण की आग देश को किस तरह जला रही है, इसके सबसे बड़े उदाहरण 2007 का गुर्जर आन्दोलन एवं 2016 का जाट आन्दोलन थे। इस भयादोहन द्वारा मेरिट की लूट में हिस्सेदारी की प्रतिस्पर्धा देखिए कि देश में जिस पाटीदार समाज सबसे ज़्यादा आरक्षण का विरोध किया, उसी ने पिछड़ा वर्ग में शामिल होने के लिए 2015 में किस तरह का भयंकर आन्दोलन गुजरात में छेड़ा था। अब किसी राष्ट्र के जीवन में इससे बड़ी क्या विडंबना होगी कि एक ओर वह विश्व गुरु और विकसित होने की जिजीविषा दिखा रहा है और दूसरी तरफ़ उसके नागरिक समाज में पिछड़ा एवं दलित बनने की होड़ में लगे हैं। आज प्रतिस्पर्धा इस बात की नहीं है कि कौन अपनी प्रगतिशीलता से समाज का नेतृत्व करेगा, बल्कि होड़ इसकी है कि कौन अपने आपको कितना अकिंचन, दलित और पिछड़ा दिखाने में कामयाब रहता है।

हालाँकि एससी-एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर का एक बेहद ज़रूरी मुद्दा है, जिस पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति समाज बिलकुल भी विमर्श को तैयार नहीं है। आज अनुसूचित समाज में एक ऐसा वर्ग तैयार है, जो अपने ही वर्ग का शत्रु बना बैठा है। संविधान प्रवर्तन के पश्चात् अनुसूचित समाज की जिन जातियों और सम्बन्धित जातियों के जागरूक वर्ग ने शिक्षा और नियुक्तियों में आरक्षण का लाभ उठाया और आर्थिक-सामाजिक उन्नति की। उनमें एक धनाढ्य एवं प्रभावी वर्ग निर्मित हुआ, जो आज नेतृत्वकर्ता की भूमिका में है। स्वतंत्रता काल से औसतन तीन पीढिय़ों से आरक्षण से लाभान्वित यह वर्ग स्वयं को क्रीमीलेयर मानने और उसके अनुकूल आरक्षण में अपना हिस्सा छोडऩे को तैयार नहीं है, जबकि इसका लाभ उसके अपने समाज को ही मिलना है। सोचिए, यह कैसा जातिवादी प्रेम है? जहाँ अपने समाज की ज़रूरत सिर्फ़ आरक्षण का लाभ बचाने के लिए गोलबंदी हेतु है। किन्तु जब उसके लिए त्याग की बात आती है, तो वहाँ कोई तत्परता नहीं है।

यह विमर्श किसी जाति या वर्ग पर कोई दोषारोपण का प्रयास या पक्षधरता की कोशिश नहीं है। अपितु यह आरक्षण व्यवस्था के एक भिन्न पहलू की समीक्षा का प्रयास है। आरक्षण व्यवस्था $गलत नहीं है। हमेशा समाज में एक वर्ग मौज़ूद रहा है, जो उन्नति एवं समता की धारा में पीछे छूट गया है और जिसे राजकीय संरक्षण की आवश्यकता रही है; ताकि वह प्रतिस्पर्धा की इस धारा में सामंजस्य स्थापित कर सके। लेकिन 21वीं सदी में देश को यदि इसकी समीक्षा, इसके पैमानों के पुनर्निर्धारण, सार्थकता, मेरिट एवं योग्यता, संवैधानिक रूप से जातीय पहचान क़ायम रखने एवं जातिगत टकराव जैसे कई बिन्दुओं पर त्वरित मूल्यांकन की ज़रूरत है। यदि निरपेक्ष एवं गम्भीर विमर्श हो, तो यह सुनिश्चित है कि आरक्षण की राजनीति के मंथन से पूर्व में जितना भी हलाहल निकल चुका हो, अब संभवत: अमृत निकलेगा।

(लेखक पत्रकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

हरियाणा में पर्ची-ख़र्ची पर सरकारी नौकरी!

हरियाणा सरकारी नौकरी के लिए पर्ची और ख़र्ची में ज़्यादा कुख्यात रहा है। अन्य राज्य भी हैं; लेकिन छोटे प्रदेश में बड़े खेल के नाम से चर्चा ज़्यादा पा जाता है। पर्ची यानी सिफ़ारिश और ख़र्ची मतलब पैसा। सरकार किसी भी पार्टी की रही हो पैसा और सिफ़ारिश के आधार पर इस छोटे से प्रदेश में नौकरियाँ लगती रही हैं। यह अलग बात है कि किसी सरकार के दौर में कम और किसी में ज़्यादा; लेकिन चलता ज़रूर रहा है।

करोड़ों के वारे-न्यारे और सिफ़ारिश के आधार पर लोगों को उपकृत करने का चलन अब भी टूटा नहीं है। यह अलग बात है कि अब उतने व्यापक स्तर पर नहीं; लेकिन चल ज़रूर रहा है। इसी सरकार के कार्यकाल में हरियाणा सिविल सेवा के अधिकारी को करोड़ों की घूस लेते हुए रंगे हाथों गिरफ़्तार किया गया था, जो चयन बोर्ड से जुड़े हुए थे।

एक दौर में अधिकारी स्तर पर होने वाली भर्तियों में तो खुला खेल इस प्रदेश में चलता रहा है। मामला नया नहीं, बल्कि दो दशक से ज़्यादा पुराना और राज्य में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के समय का है। हरियाणा भ्रष्टाचार निरोधक आपराधिक ब्यूरो (एसीबी) ने हिसार की अदालत में 29 लोगों के ख़िलाफ़ अरोप पत्र दाख़िल कर दिया है। मामले की सुनवाई 10 अगस्त को होगी।

एक बड़े मामले में हरियाणा लोक सेवा आयोग की पहली बार बड़े स्तर पर कारस्तानी सामने आयी है। इसे अंजाम देने वालों में आयोग के पूर्व अध्यक्ष के.सी. बांगड़ हैं, जो इस समय भाजपा सरकार में भागीदार जननायक जनता पार्टी (जजपा) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हैं। आयोग के सचिव रहे पूर्व आईएएस हरदीप सिंह के अलावा आयोग के छ: सदस्य, नौ पेपर चैकर (मूल्यांकनकर्ता) और चुने गये एक दर्ज़न से ज़्यादा अफ़सर भी हैं। इनमें से एक को छोडक़र बाक़ी सभी राज्य में नौकरी कर रहे हैं।

हरियाणा सिविल सेवा के कुछ अधिकारी वरिष्ठता के आधार पर अब आईएएस बनने की कतार में हैं; लेकिन मामला उजागर होने के बाद तरक़्क़ी के बजाय अब उनकी नौकरी पर ख़तरा मंडरा रहा है। हरियाणा लोक सेवा आयोग राजपत्रित स्तर के अधिकारियों के चयन के लिए अधिकृत है। जिन्हें राज्य का प्रशासन चलाना है, वे अगर येन-केन-प्रकारेण आधार पर चुने जाते हैं, तो कितने कुशल प्रशासक साबित होंगे? यह समझने की बात है। मोटी राशि देकर चुने गये ऐसे अफ़सर पहले अपना ख़र्च पूरा करेंगे, वे अच्छे प्रशासक तो बन सकते हैं; लेकिन ईमानदार बने रहेंगे, यह कहना मुश्किल है। चयन के लिए राशि करोड़ों में जाती है, जिसका हिस्सा काफ़ी लोगों में बँटता है। सफ़ेदपोशों से लेकर चयन से सीधे जुड़े हुए लोगों में बँटता है।

शिक्षक भर्ती घोटाले में हरियाणा अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड तो पहले ही बदनाम हो चुका है, अब हरियाणा लोक सेवा आयोग भी उसी वर्ग में आ गया है। व्यापक स्तर पर हुई गड़बडिय़ों और अनियमितताओं की बहुत-सी परतें अदालत में खुलेंगी और फ़ैसला मील का पत्थर साबित होगा; ठीक शिक्षक भर्ती घोटाले की तरह, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनके विधायक बेटे अजय चौटाला को 10-10 साल की सज़ा हुई थी। इसमें 50 से ज़्यादा लोगों को सज़ा मिली थी, जिसमें दो आईएएस अधिकरी भी थे।

लोक सेवा आयोग के इस मामले में एसीबी ने ठोस साक्ष्य जुटाये हैं; फोरेंसिक जाँच में गड़बडिय़ों की पुष्टि हुई है। जाँच में पाया गया है कि कई सफल अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं में नंबर बढ़ाने, परीक्षा के बाद ख़ाली छोड़े गये प्रश्नों के उत्तर लिखने, क्रम के अनुसार उत्तर न देने, साक्षात्कार में लिखित परीक्षा से काफ़ी ज़्यादा प्रतिशत नंबर देना प्रमुख है। कई अभ्यर्थियों के उतने ही नंबर विभिन्न विषयों में बढ़ाये गये, जिसके आधार पर उन्हें हरियाणा सिविल सेवा के लिए चुना जा सके। कुछेक के लिखित परीक्षा में अंक कम थे, उनके इतने ही अंक बढ़ाये गये, जिसके आधार पर वे साक्षात्कार में बैठकर अतिरिक्त सेवाओं के लिए चुने जा सके।

चयनीत अभ्यथियों में कुछ नाम सरकार से भी जुड़े थे। इनमें एक कुलधीर सिंह हरियाणा सिविल सेवा (एचसीएस) चुने गये। कुलधीर के लिखित परीक्षा में 750 में से 513 नंबर थे और साक्षात्कार में इन्हें 100 में से 88 नंबर मिले। जाँच में मिला कि इनके 33 नंबर बाद में बढ़ाये गये। कुलधीर के पिता शेरसिंह बड़शामी इनेलो के बड़े नेता रहे हैं। वह प्रदेशाध्यक्ष के अलावा मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के कार्यकारी अधिकारी रहे हैं। बड़शामी शिक्षक भर्ती घोटाले में दोषी साबित हो चुके हैं। इसी क्रम में सरिता मलिक के भी 11 नंबर बढ़ाये गये। वह राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक एम.एस. मलिक की बेटी हैं, जो इनेलो से जुड़े रहे हैं।

अशोक कुमार के 10 नंबर बढ़ाये गये। अशोक के पिता इनेलो के पूर्व विधायक रह चुके हैं। कमलेश भादू चौटाला परिवार के क़रीबी हैं जाँच में इनके भी 12 नंबर बढ़ाये गये। भादू सरकार में भागीदार जजपा के कोटे उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के ओएसडी के तौर पर काम कर रहे हैं। इसी तरह वत्सल वरिष्ठ के 29 नंबर बढ़ाने, राकेश कुमार के छ:, पूनम नारा के पाँच, दिलबाग सिंह के 41 नंबर बढ़ाये गये। उपरोक्त सभी को साक्षात्कार में 70 से 90 नंबर मिले। इसके आधार पर ये चुने गये।

अभ्यर्थियों में जगनिवास, सुरेंद्र और जगदीप भी हैं। इसके आधार पर ये चुने गये। लिखित परीक्षा से साक्षात्कार में ज़्यादा नंबर अपवाद स्वरूप ही ज़्यादा आते हैं; लेकिन जाँच में पाये गये अभ्यर्थियों को मिलीभगत से ख़ूब नंबर दिये गये। इसी आधार पर आयोग के छ: सदस्यों के नाम आरोप पत्र में हैं। इनमें महेंद्र सिंह शास्त्री, दयाल सिंह, वी. नरेद्र, जगदीश राय और एन. यादव हैं। जाँच में इनके ख़िलाफ़ भी ठोस सुबूत पाये जाने की जानकारी है।

उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच और नंबर देने में गड़बड़ी के आरोप में नौ लोग शामिल हैं। इनमें जोसेफ चेरियन कप्पन, महेश्वरी प्रसाद, बी. चंद्रमौली, आर.के. बोस, पुष्पेंदर कुमार, जगदीश सिंह, दर्वेश गोपाल, एस.के. वर्मा और प्रेमसागर चतुर्वेदी हैं। भ्रष्टाचार निरोधक और आपराधिक ब्यूरो ने जाँच में बहुत समय लगाया; लेकिन यह बहुत पेचीदा मामला भी रहा। सबसे पहले यह मामला कांग्रेस नेता कर्ण सिंह दलाल ने उठाया था। नतीजा घोषित होने के बाद चुने गये प्रत्याशियों के आधार पर उन्हें इसमें गड़बड़ी लगी। उन्होंने इस भर्ती को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय ने ज्वांइट रजिस्ट्रार स्तर के अधिकारी को इसकी जाँच का ज़िम्मा सौंपा। जाँच में सैकड़ों उत्तर पुस्तिकाओं में गड़बड़ी मिली।

बाद में जाँच का ज़िम्मा तब हरियाणा विजिलैंस ब्यूरो को मिली। अब इसे भ्रष्टाचार निरोधक आपराधिक ब्यूरो के नाम से जाना जाता है। ब्यूरो ने संदिग्ध उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच फोरेंसिक लैब से करायी। जहाँ अलग लिखावट, नंबरों को कटिंग के आधार पर घटाने या बढ़ाने, परीक्षा में जो स्याही इस्तेमाल हुई, कुछ पन्नों पर उससे अलग स्याही पायी गयी। परीक्षा के दौरान ख़ाली छोड़े गये पन्नों पर लिखावट में भी अंतर मिला है। चुने जाने की सूची में शामिल अभ्यर्थियों को नंबर बढ़ाने से लेकर साक्षात्कार में खुले दिल से नंबर देने का खेल हुआ है।

आरोप पत्र में शामिल ऐसे ही एक अधिकारी कमलेश भादू की वजह से उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला भी विवाद में आ गये हैं। पार्टी को इसका नुक़सान उठाना पड़ सकता है। उसकी वजह हरियाणा लोक सेवा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष के.सी. बांगड़ हैं। उनके समय में यह सब बड़बड़ी हुई। लिहाज़ा उनकी सबसे बड़ी जवाबदेही होगी। इस मामले में आरोपी आयोग से जुड़े लोग हैं, तो क्या माना जाए कि बिना सरकार के संरक्षण इन्होंने ही सिफ़ारिश और पैसों के लिए व्यापक स्तर पर अनियमितताएँ कीं। यह संभव नहीं है। हालाँकि आरोप पत्र में सरकार से जुड़े किसी नेता का नाम नहीं है; लेकिन न्यायालय की प्रक्रिया में अपने बचाव में आरोपी कुछ नये ख़ुलासे कर सकते हैं।

कांग्रेस नेता ने उठाया मामला

मार्च, 1999 में लोक सेवा आयोग की ओर से हरियाणा सिविल सेवा और अधिनस्थ सेवा के 66 पदों के लिए विज्ञापन दिया गया। इसमें 21,845 लोगों ने आवेदन किया। प्रारंभिक परीक्षा के बाद 3951 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा में बैठे। लिखित परीक्षा में मिले नंबरों के आधार पर 195 साक्षात्कार के लिए चुने गये। सन् 2001 में 22 अक्टूबर 19 नंवबर तक साक्षात्कार की प्रक्रिया चली। 3 मई, 2002 को नतीजा घोषित किया गया।

सफल अभ्यर्थियों की सूची आने के बाद प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे थें। कांग्रेस नेता कर्ण सिंह दलाल की वजह से यह मामला उठा और आज इस मुकाम पर पहुँचा।

शिक्षक भर्ती घोटाला

हरियाणा लोक सेवा आयोग का मामला भी जेबीटी शिक्षक भर्ती घोटाले जैसा ही है। राज्य में 3,000 से ज़्यादा जेबीटी शिक्षक भर्ती में व्यापक स्तर पर अनियमितताएँ हुईं। सीबीआई ने वर्ष 2008 में 53 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाख़िल किया। वर्ष 2013 में अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, उनके बड़े बेटे अजय चौटाला को 10-10 साल की सज़ा हुई। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा कायम रखी। इस मामले में दो आईएएस तत्कालीन मुख्यमंत्री के ओएसडी विद्याधर और मामला उठाने वाले आईएएस संजीव कुमार को भी दंडित किया था।

पेशाब कांड और आदिवासियों की पीड़ा

इन दिनों पेशाब कांड और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के आदिवासी के पैर धोने के लिए चर्चा में हैं। मध्य प्रदेश के सीधी ज़िले के एक आदिवासी युवक पर प्रवेश शुक्ला नाम का एक शख़्स पेशाब करना दुर्भाग्यपूर्ण रहा। इसका वीडियो वायरल हुआ, जो 26 जून का बताया गया है। पीडि़त व्यक्ति जनजाति विशेष का है और आरोपी प्रवेश शुक्ला सवर्ण जाति का है। वीडियो वायरल होने के बाद जब प्रदेश सरकार की थू-थू हुई, तो पुलिस हरकत में आयी। हालाँकि लोगों का दावा है कि वीडियो में जो पीडि़त युवक है, वह दूसरा है और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसी और को बुलाकर उसके चरण धोये। उसे सम्मानित किया। यह बात सम्मानित किये गये दशमत रावत ने भी कथित रूप से एक वीडियो में कही है कि पेशाब उसके ऊपर नहीं की गयी थी। इससे पहले इस व्यक्ति ने कहा था कि उसने आरोपी को माफ़ किया। पीडि़त आदिवासी युवक ने पुलिस को बताया कि पेशाब करने वाले वीडियो पर जबरन हस्ताक्षर करवाये थे। शपथ पत्र में कहा गया है कि पीडि़त पर पेशाब करने वाला वीडियो फ़र्ज़ी है। पुलिस का कहना है कि वीडियो वायरल होने के बाद 3 जुलाई को आदिवासी युवक से यह हस्ताक्षर करवाये गये थे।

बहरहाल वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और भारतीय दंड संहिता और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अलावा आरोपी के ख़िलाफ़ कड़े राषट्रीय सुरक्षा क़ानून यानी रासुका के तहत भी कार्रवाई शुरू की गयी है। विपक्ष ने भाजपा की शिवराज चौहान सरकार को घेरा है। आदिवासी के अपमान पर बुरी तरह फँसे राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह तुरन्त डैमेज कंट्रोल में लग गये। पहले आरोपी प्रवेश शुक्ला के घर पर बुलडोजर चलाया, बुलडोजर से उसके आवास में लगे टिन वाले हिस्से को तोड़ा गया। उसके बाद मुख्यमंत्री ने भोपाल में अपने आवास पर दशमत रावत का सम्मान किया। उसके चरण धोये, तिलक लगाया। यह सब करने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा-चरण धोना एक संदेश भी है कि ग़रीबों के साथ किस संवेदना के साथ उनकी सेवा करता हूँ। ऐसा लगता है कि शिवराज सिंह व उनकी सरकार ने इस अमानवीय घटना को एक सरकारी इवेंट में तब्दील कर दिया। इसकी एक और बानगी यह है कि जब क़रीब चार दिन बाद यह पीडि़त आदिवासी युवक सीधी शहर से 18 किमी दूर अपने गाँव करौंदी पहुँचा और सुबह उठा, तो देखा कि स्थानीय कलेक्टर व एसपी उसके यहाँ पाँच लाख रुपये की मदद और 1.5 लाख रुपये प्रधानमंत्री आवास का चेक लेकर खड़े थे। यही नहीं, 12 पुलिस वाले भी वहाँ तैनात थे। लेकिन कहा जा रहा है कि असली पीडि़त कोई और है, जिसका कोई अता-पता नहीं है।

दूसरी ओर इस घटना के बाद कुछ और घटनाएँ निचले तबक़े के लोगों को प्रताडि़त करने की मध्य प्रदेश में घटी हैं। नवीनतम सरकरी आँकड़ों के अनुसार, आदिवासियों के ख़िलाफ़ अत्याचार के मामलों में यह राज्य देश में पहले नंबर पर है। बहरहाल पेशाब वाली इस घटना पर सियासत भी ख़ूब हुई। वीडियो वायरल होने के बाद कांग्रेस ने आरोप लगाया कि आरोपी भाजपा के एक स्थानीय विधायक से जुड़ा है। लेकिन विधायक ने इस आरोप को नकार दिया। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने ट्वीट किया, भाजपा के राज में आदिवासी भाइयों और बहनों पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं। तो भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वी.डी. शर्मा ने कहा कि दोशी को किसी भी हालत में नहीं ब$ख्शा जाएगा। लेकिन अब ख़बर यह भी छपी है कि पीडि़त आदिवासी रावत ने राज्य सरकार से इस अपमानजनक कृत्य के आरोपी प्रवेश शुक्ला को रिहा करने का आग्रह किया है। उसने पत्रकारों से कहा-सरकार से मेरी माँग है कि अब प्रवेश शुक्ला को रिहा किया जाना चाहिए। अतीत में जो कुछ भी हुआ; लेकिन उसे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है।

अब सवाल यह भी है कि क्या सरकार क़ानून के अनुसार आरोपी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी या पीडि़त आदिवासी के आग्रह को मानकर आरोपी को रिहा कर देगी। यहाँ पर आशंका यह भी जतायी जा रही है कि पीडि़त आदिवासी ने बाहरी दबाव में आकर आरोपी को माफ़ करने की माँग की है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस अमानवीय घटना के बाद पीडि़त ने अपने गाँव पहुँचकर यह भी कहा कि हाँ, मैं सहमत हूँ। वह हमारे गाँव का पंडित है। हम सरकार से उसे रिहा करने की माँग करते हैं। उधर क्योंकि आरोपी शुक्ला ब्राह्मण जाति से है, तो एक ब्राह्मण संगठन ने शुक्ला के घर का एक हिस्सा गिराये जाने का विरोध करते हुए कहा कि शुक्ला का कृत्य निंदनीय है; लेकिन उसके व्यवहार के लिए उसके परिवार के सदस्यों को दंडित नहीं किया जा सकता। यहाँ पर जाति भी अपना असर दिखाती देखी जा सकती है। भारतीय समाज में जाति व पैसा अपनी ताक़त बार-बार दिखाता है और क़ानून कहीं पीछे रह जाते हैं। असमानता चाहे वह आर्थिक हो या सामाजिक, बहुत भारी चोट मारती है।

ग़ौरतलब है कि हाल ही में आज़ादी की 75र्वी वर्शगाँठ को बड़ी धूमधाम से मनाया गया। इस मुहिम को अमृत-काल कहा गया। यह कैसा अमृतकाल? सरकारी अमृतकाल है, समाज में तो विषमता, जाति का ज़हर व नफ़रत दिखायी देती है। ताक़तवर लोग समाज के निम्न जाति व आय वाले लोगों में दहशत फैलाने के लिए अपनी पहचान का ऐलान लाउडस्पीकरों पर करते हैं। यह ख़ौफ़नाक है। लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्त्व को कम किया जा रहा है। ग़ौरतलब है कि आदिवासी देश की कुल आबादी का क़रीब 8.6 फ़ीसदी हैं। इनमें से दो-तिहाई आदिवासी आबादी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, गुजरात, राजस्थान, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में बसती है। सबसे अधिक आदिवासी आबादी मध्य प्रदेश में है। आज़ादी के 75 साल बाद भी देश की अन्य आबादी व आदिवासियों के दरमियान शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार व अन्य क्षेत्रों में बहुत बड़ा फ़ासला है।

यही नहीं, उनके ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचार की ख़बरें भी मीडिया में आती रहती हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ऑफ ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट 2021 के अनुसार, सन् 2020 की तुलना में 2021 में आदिवासियों के प्रति अत्याचारों में 6.47 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई। सन् 2020 में दर्ज मामलों की संख्या 8,272 थी, जो सन् 2021 में बढक़र 8,802 हो गयी। मध्य प्रदेश में इस साल ऐसे मामलों की संख्या 2627 थी, जो कुल आदिवासी अपराध का 29.8 फ़ीसदी है। उसके बाद राजस्थान आता है, जहाँ 2,121 मामले दर्ज किये गये और इसकी हिस्सेदारी कुल मामलों में 24 फ़ीसदी है। ओडिशा में 676 मामले दर्ज किये गये, जिसकी हिस्सेदारी 7.6 फ़ीसदी है। फिर महाराष्ट्र की भागीदारी 7.3 फ़ीसदी है और तेलंगाना की 5.81 फ़ीसदी है।

इन पाँच राज्यों में आदिवासियों के प्रति अपराध के जो मामले दर्ज हुए, वे देश में कुल मामलों का 74.57 फ़ीसदी हैं। ग़ौरतलब है कि मध्य प्रदेश में बीते क़रीब 16 साल के क़रीब भाजपा की सरकार रही, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रहे हैं। वर्ष 2018 के कांग्रेस की सरकार बनी थी; लेकिन बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके समर्थक कुछ विधायक भाजपा में चले गये और भाजपा सत्ता में आ गयी। लेकिन मध्य प्रदेश बीते पाँच वर्षों से आदिवासियों के प्रति अत्याचारों के मामलों में पहले नंबर पर है। सन् 2018 में आदिवासियों के ख़िलाफ़ 1,868 मामले, सन् 2019 में 1,922 मामले, सन् 2020 में 2,401 और सन् 2021 में 2,627 मामले दर्ज किये गये। ये आँकड़े सरकारी दस्तावेज़ नेशनल क्राइम ऑफ ब्यूरो की सालाना रिपोर्ट के हैं। मध्य प्रदेश में आदिवासियों की संख्या तो उल्लेखनीय है; लेकिन सरकार उनके प्रति होने वाले अत्याचारों व अपराधों को रोकने में असफल दिखती है।

बेशक राज्य के मंत्री यह बयान देते रहे कि राज्य की पुलिस अब चौकन्ना व संवेदनशील है, और आदिवासियों के ख़िलाफ़ होने वाले हर अत्याचार का रिकॉर्ड दर्ज करती है। यह तो अपनी पीठ थपथपाने जैसा है। सच्चाई यह है कि आदिवासियों पर हमले, अत्याचार होते रहते हैं। वैसे मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी वोट पर नज़र डालें, तो साफ़ पता चलता है कि इस राज्य में 47 आदिवासी रिजर्व सीटें हैं। इस वर्ग के 1.25 करोड़ वोटर हैं। अन्य 54 सीटें ऐसी हैं, जहाँ इनके वोट 10 से 39 फ़ीसदी तक हैं। यानी 101 सीटों पर उनका दबदबा है। सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 32 और भाजपा को 15 एसटी सीटें मिली थीं।

बेशक उपचुनाव के बाद भाजपा के पास 18 एसटी सीटें हैं; पर सीधी के पेशाब प्रकरण से शिवराज सिंह चौहान की सरकार पर एक सवालिया निशान लग गया है। लोग कहने लगे हैं कि यहाँ कमज़ोर व अति संवेदनशील आदिवासी वर्ग सुरक्षित नहीं है। आख़िर भाजपा सरकार आदिवासियों के हितों की सुरक्षा करने में बार-बार असफल क्यों हो रही है? मुख्यमंत्री ने आदिवासी दशमत रावत के चरण धोये, उसकी तत्काल वित्तीय सहायता करके डैमेज कंट्रोल वाली भूमिका में भी उन्होंने निभाने में कसर नहीं छोड़ी। अब सवाल यह भी पूछा जाने लगा है कि क्या कांग्रेस सरकार इस पेशाब प्रकरण का राजनीतिक लाभ उठा पाएगी?

इस साल के आख़िरी महीनों में मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं। यहाँ पर आदिवासी आबादी बहुत है। अब इन तीन राज्यों में आदिवासी युवक के प्रति की गयी अमानवीय घटना को कांग्रेस कैसे मुद्दा बनाती है व इसका क्या असर चुनाव पर पड़ता है? यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। मगर भारत की मौज़ूदा राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू एक आदिवासी हैं, फिर भी आदिवासियों की ज़मीनी हक़ीक़त चिन्ता का विषय है।

अनदेखी के शिकार झारखण्ड के पर्यटन क्षेत्र

पुरी की रथयात्रा अभी हाल में संपन्न हुई है। रथयात्रा के दौरान तीन मित्रों के साथ पुरी गया था। रथयात्रा शुरू होने से लेकर भगवान जगन्नाथ के 10 दिन बाद मौसीबाड़ी से वापसी तक 25 लाख से अधिक श्रद्धालु व पर्यटक इस छोटे से शहर में जुटे थे। ओडिशा का यह शहर धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। भगवान जगन्नाथ श्रद्धालुओं के लिए दर्शनीय तो हैं ही, इसके अलावा समुद्र में स्नान और समुद्र किनारे का आनंद पर्यटक लेते हैं। एतिहासिक सूर्य मंदिर कोणार्क, चिलका लेक आदि पर्यटन स्थल हैं। इन जगहों पर भीड़ को छोड़ दें, तो कहीं किसी तरह की गंदगी, आने-जाने में परेशानी या कोई और समस्या देखने को नहीं मिली। सब कुछ साफ़-सुथरा और व्यविस्थत था। पानी-शौचालय आदि का उचित प्रबंध थे। स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार था। समुद्र किनारे कुछ जगहों पर खाने-पीने व समुद्र में ज़्यादा दूर नहाने जाने पर पाबंदी थी।

पुरी से लौटते समय झारखण्ड का पर्यटन स्थल दशम फॉल और पतरातू डैम आदि स्थल जाना हुआ। पुरी के विपरीत दशम फॉल पर गंदगी थी। शौचालय बंद था। पार्किंग स्थल में एक दुकान के पास टेबल-कुर्सी पर पाँच-सात लोग शराब पी रहे थे। न पुलिस और न ही सुरक्षा। राज्य गठन के बाद से ही झारखण्ड में पर्यटन को विकसित करने की चर्चा होती रही है। क्या ऐसे में पर्यटक आकर्षित होंगे? क्या केवल बोल देने से, काग़ज़ों पर योजना और पर्यटन नीति बना देना ही काफ़ी है?

बँटवारे में मिले पर्यटन स्थल

बिहार से कटकर 15 नवंबर, 2000 को झारखण्ड बना। राज्य गठन का 23वाँ वर्ष चल रहा है। विकास हेतु इतना वक़्त काफ़ी होता है। बिहार से बँटवारे के बाद जुमला ख़ूब उछला था कि ‘बिहार अब बालू फाँकेगा।’ इसके पीछे की वजह थी कि खनन और उद्योग के मामले में झारखण्ड बिहार का समृद्ध हिस्सा था। साथ ही झारखण्ड में जंगल, हरियाली, पहाड़, झरना पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए काफ़ी थे। राज्य के क़रीब सभी ज़िलों में पर्यटन स्थल हैं, जिन्हें विकसित किया जा सकता था।

अविभाजित बिहार के तत्कालीन वित्त सचिव आईएएस वीएस दुबे ने एक इंटरव्यू में कहा कि बिहार सरकार दक्षिण बिहार (तब झारखण्ड को इसी नाम से लोग जानते-पुकारते थे) के लिए बजट में जितना प्रावधान करती है, अगर उतने बजट को ही मान लें, तो झारखण्ड का बजट सरप्लस ही रहेगा।

यह कुछ वर्षों तक हुआ भी। झारखण्ड का बजट वास्तव में सरप्लस ही रहा; लेकिन चार-पाँच साल बीतते-बीतते झारखण्ड का बजट घाटे का बनने लगा। दरअसल सरकार ने आईएएस दुबे के सरप्लस बजट के पीछे की बात को ग़ौर नहीं किया। अगर ग़ौर करें, तो ऐसा कहने के पीछे वी.एस. दुबे का इशारा साफ़ था। खनन और उद्योग के मामले में झारखण्ड को समृद्ध हिस्सा मिला था। बँटवारे के बाद बिहार उद्योगविहीन हो गया, जबकि झारखण्ड समृद्ध। खान-खनिज झारखण्ड के पास था ही, साथ ही मिली थी प्राकृतिक सौंदर्यता। इसे पर्यटन उद्योग के रूप में विकसित किया जा सकता था।

70 फ़ीसदी पर्यटन बदहाल

पिछले 22 वर्षों में कई सरकारें आयीं और गयीं। हर सरकार ने पर्यटन के विकास की बात कही। करोड़ों रुपये का फंड बना और $खर्च भी हुए। सरकार की फाइलों में राज्य में एडवेंचर टूरिज्म, ईको, हेरिटेज, रिलीजीयस, स्पिरिचुअल टूरिज्म, डैम-लेक, म्यूजियम आदि को मिलाकर 105 पर्यटन स्थल को चयन किया गया है। इनमें से सुविधायुक्त पर्यटन स्थल कम ही विकसित हो पाये हैं।

दशम फॉल झारखण्ड की राजधानी रांची से केवल 34 किलोमीटर की दूरी पर है। नामचीन पर्यटन स्थल है। कांची नदी की कलकल करती पानी की धाराओं से यह फॉल बना है। 144 फुट ऊँची पहाड़ी से पानी का झरना, जंगल और हरियाली दिलकश नज़ारा है। पुरी से कोणार्क की दूरी 49 किलोमीटर है। वहीं, पुरी से कोणार्क जाने की सडक़ लम्बी-चौड़ी समुद्र के किनारे-किनारे बनी हुई है। कहीं टूटी-फूटी नहीं। कोणार्क की व्यवस्था सुव्यवस्थित। शौचालय, पीने का पानी, बैठने की जगह, साफ़-सुथरा चारों ओर। लेकिन रांची से दशम फॉल जाने रास्ते को देखें, तो मुख्य सडक़ छोडऩे के बाद दयनीय दिखने लगती हैं। जगह-जगह टूटी हुई कम चौड़ी सडक़ें हैं। दशम फॉल में सरकार ने ग्रिल लगवा दिया है। सीढिय़ाँ बनवा दी हैं। कुछ जगह बैठने की व्यवस्था है। लेकिन गंदगी का अंबार लगा था। जगह-जगह काग़ज़, पॉलिथीन, जानवरों के शौच आदि फैले दिख रहे थे। एक शौचालय बंद तो दूसरा गंदा। पानी की भी समुचित व्यवस्था नहीं। बिजली की व्यवस्था नहीं। हालाँकि दूसरे पर्यटन स्थल पतरातू डैम की व्यवस्था थोड़ी बेहतर है। यहाँ मोटर बोट भी चलती हैं और ट्रेंड लोगों को तैनात भी किया गया है।

दरअसल सरकार द्वारा घोषित 105 पर्यटन स्थलों में कुछ जगहों, जैसे- बाबाधाम (देवघर), रजरप्पा मंदिर, पतरातू, नेतरहाट आदि को छोड़ दें, तो 70 फ़ीसदी पर्यटन स्थलों की स्थिति दशम फॉल की तरह ही दयनीय है। जहाँ सुविधाओं का घोर अभाव है। सुरक्षा व्यवस्था भी लचर है। लिहाज़ा लोग जाने से कतराते हें। साथ ही अच्छी व्यवस्था नहीं होने के कारण लोगों के जुबानी प्रचार-प्रसार भी अधिक नहीं हो पाता। ये स्थल केवल सरकारी वेबसाइट और फाइलों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

पर्यटन मित्रों की समस्याएँ

राज्य सरकार ने स्थानीय लोगों को रोज़गार से जोडऩे और पर्यटन स्थलों की देखरेख के लिए कई जगहों पर पर्यटन मित्र बनाया है। पर्यटन मित्रों की अपनी समस्या है। दशम फॉल के पर्यटन मित्रों ने बताया कि इतने बड़े स्थल की देखरेख के लिए 12 लोग हैं। हमें कई-कई महीनों तक मानदेय (वेतन) नहीं मिलता है। काफ़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जहाँ तक संभव है बेहतर रखने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा यहाँ पर्यटक तो आते हैं; लेकिन व्यवस्था अच्छी नहीं होने के कारण थोड़ा मायूस भी होते हैं। दुर्घटनाएँ भी हर कुछ दिन पर होती रहती हैं। फॉल में गिर कर कई मौत भी हुई हैं। युवाओं को समझाते हैं।

डाँटते-फटकारते हैं; लेकिन कई युवा लड़ जाते हैं। बात नहीं मानते, इस वजह से दुर्घटना के शिकार होते हैं। हमें उन्हें रोकने के लिए क़ानून बहुत अधिकार प्राप्त नहीं है। ग़लत करने पर कोई ज़ुर्माना आदि का प्रावधान नहीं है। यहाँ सुरक्षा की भी कमी है। हालाँकि इन सभा बातों से अलग पतरातू डैम की स्थिति अच्छी थी। आने-जाने का रास्ता अच्छा, वहाँ की व्यवस्था अच्छी।

पर्यटकों की नहीं कमी

झारखण्ड में पर्यटकों की कमी नहीं है। नया साल हो या कोई अन्य छुट्टी का मौक़ा पर्यटन स्थलों पर अक्सर सैलानी देखे जाते हैं। सामान्य दिनों में भी सैलानियों का आना-जान लगा रहता है। प्राप्त आँकड़ों के मुताबिक, 2022 में 35 लाख से अधिक घरेलू पर्यटकों ने झारखण्ड का दौरा किया है।

सन् 2021 में 33.83 लाख और 2020 में 25.74 लाख पर्यटक आये थे। केवल सावन की बात की जाए, तो देवघर बाबाधाम में औसतन हर दिन एक लाख श्रद्धालु पहुँचते हैं। हालाँकि अगर सरकार द्वारा चिह्नित 105 पर्यटन स्थलों पर सैलानियों के आने की संख्या अलग-अलग देखी जाए, तो देवघर, नेतरहाट, पतरातू, देवड़ी आदि कुछ नामी-गिरामी जगहों को छोड़ दें तो मूलभूत सुविधा, सुरक्षा आदि नहीं होने और प्रचार-प्रसार की कमी के कारण अन्य पर्यटन स्थलों पर बहुत कम पर्यटक पहुँचते हैं।

धरातल पर काम की ज़रूरत

22 वर्षों में जो भी सरकारें बनीं न ही खान-खनिजों को सँभाल सकी। न ही उद्योग-धंधे बढ़े और न ही पर्यटन जैसे दूसरे क्षेत्र पर ज़मीनी स्तर पर ध्यान दिया गया। झारखण्ड के खनिज से दूसरे राज्यों में औद्योगिक समृद्धि आयी। यहाँ नये उद्योग विकसित नहीं हुए। पर्यटन विकास काग़ज़ों पर होता रहा।

बीते साल मौज़ूदा हेमंत सरकार ने पर्यटन नीति घोषित किया। पूर्व की सरकारों ने भी पर्यटन स्थलों को विकसित करने का प्रयास किया। इस बात को नाकारा नहीं जा सकता है; लेकिन अब तक पर्यटन क्षेत्र को विकसित करने के लिए जो काम हुए हैं, वे नाकाफ़ी हैं। ज़रूरत है चीज़ों को धरातल पर उतारने की। इसके लिए एक-एक पर्यटन स्थल को चयन कर वहाँ बिजली-पानी-शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं को तैयार करना, आवागमन की समुचित व्यवस्था, सडक़ों का सुदृढ़ीकरण, कुछ जगहों पर रहने-खाने की व्यवस्था, सुरक्षा आदि तैयार करना होगा।

पर्यटन स्थलों के साथ वहाँ की सुविधाओं का भी प्रचार-प्रसार करना होगा। जो पर्यटन मित्र बनाये गये हैं, उन्हें ट्रेनिंग देने से लेकर समय पर मानदेय आदि की व्यवस्था करनी होगी, जिससे पर्यटन स्थल साफ़-सुथरे, सुंदर बने रहें। व्यवस्थाएँ अच्छी होंगी, तो पर्यटक $खुद ही खिंचे चले आएँगे। पर्यटन एक बड़ा क्षेत्र उद्योग के रूप में उभर जाएगा। इससे निश्चित रूप से सरकार का राजस्व बढ़ेगा और स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिलेगा।

राज्य के घोषित पर्यटन स्थल

एडवेंचर टूरिज्म 4

ईको टूरिज्म   4

हेरिटेज टूरिज्म 10

डैम-लेक      35

रिलीजियस टूरिज्म    36

स्पिरिचुअल टूरिज्म   4

रूरल टूरिज्म  5

म्यूजियम और अन्य 7

कुल पर्यटन स्थल     105

रूपये पर गम्भीर संकट!

कमज़ोर होती मुद्रा और कालाधन देश को मज़बूती देने के बजाय चंद पूँजीपतियों को मज़बूती देते हैं और निचले तबक़े को लगातार ग़रीबी में धकेलते हैं। भारत में ये दोनों ही स्थितियाँ तेज़ी से हावी हो रही हैं। आज़ादी के बाद से डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगातार कमज़ोर हुआ है। पिछले नौ वर्षों में तो रुपया जिस तेज़ी से डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ है, वो चिन्ता का विषय है।

भारत सरकार ने बजट की आधिकारिक वेबसाइट पर बताया है कि 31 मार्च, 2023 तक भारत पर कुल 155 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ हो गया। कुछ लोगों ने मार्च, 2024 तक इस क़र्ज़ के बढक़र 172 लाख करोड़ होने का अनुमान जताया गया था। सरकार के मुताबिक, 2004 में जब यूपीए की सरकार केंद्र में बनी, तो भारत पर कुल 17 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ था। यूपीए की सरकार ने आगामी 10 वर्षों यानी 2014 तक इस क़र्ज़ को बढ़ाकर 55 लाख करोड़ रुपये कर दिया। लेकिन एनडीए की मौज़ूदा सरकार ने तो रिकॉर्ड क़र्ज़ लेते हुए इसे 155 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुँचा दिया। इस हिसाब से मोदी सरकार के पिछले नौ साल के कार्यकाल में देश पर 181 प्रतिशत क़र्ज़ बढ़ा है। इसी वजह से रुपया डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ है। इसकी वजह से सन् 2014 में 63.33 रुपये की क़ीमत एक डॉलर थी, वो एक डॉलर आज की तारीख़ में 82.31 रुपये के बराबर है। इन सवा नौ वर्षों में रुपया क़रीब 29.96 प्रतिशत कमज़ोर हुआ है। सन् 2004 में 45.32 रुपये के बराबर एक डॉलर था।

कालेधन की अब देश में कहीं बात नहीं होती। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जिस कालेधन को लाने की बात गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री (अब प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी किया करते थे और कहते थे कि विदेशों में इतना कालाधन जमा है कि अगर वो आ जाएगा, तो हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख रुपये आएँगे, प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने कालेधन को लाने की चर्चा ही नहीं की है। नोटबंदी के दौरान भी उन्होंने यह कहा था कि इससे कालाधन रखने वालों की कमर टूट जाएगी। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। सन् 2013 में भारतीयों का 14,000 करोड़ कालाधन था, जो सन् 2021 में बढक़र 20,700 करोड़ रुपये हो गया था। इसके बाद के आँकड़े नहीं हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि कालाधन इन दो वर्षों में बढ़ा ही न हो। जब सन् 2020 में भारतीयों के कालेधन में रिकॉर्ड उछाल की रिपोर्ट जारी हुई थी, तब केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कहा था कि स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के कालेधन के बारे में कुछ पता नहीं चलता है। हैरानी की बात है कि वित्त मंत्रालय ने कालाधन बढऩे की रिपोर्ट सामने आने के बावजूद कहा था कि कालेधन में कमी आयी है। इससे भी हैरानी की बात यह है कि जिन कालेधन वालों की कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में लिस्ट हुआ करती थी, उस कालेधन का बढ़ोतरी के बावजूद सरकार को ही शायद अब पता नहीं है।

कालेधन की जानकारी साझा करने के उद्देश्य से सन् 2016 में केंद्र सरकार और स्विस बैंक के बीच ऑटोमेटिक एक्सचेंज ऑफ इंफॉर्मेशन के लिए एक समझौता हुआ था, जिसमें एक संयुक्त बयान पर भारत और स्विट्जरलैंड ने हस्ताक्षर किये थे। इस समझौते के तहत तय हुआ था कि सन् 2018 से स्विट्जरलैंड के स्विस बैंकों में खोले गये हर भारतीय के खाते की जानकारी वहाँ के बैंक भारत सरकार और भारत के आयकर विभाग को सीधे देंगे। सन् 2020 सन् 2021 में जानकारी मिली भी। लेकिन उसके बाद से सब कुछ गोल कर दिया गया यानी कोई भी जानकारी काले धन को लेकर सामने नहीं आयी है। इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्र सरकार या आयकर विभाग को इसकी जानकारी स्विस बैंक नहीं दे रहे होंगे; लेकिन वह जानकारी सार्वजनिक की जा रही है। शायद कोई गोपनीयता होगी; लेकिन क्या छिपाया जा रहा है कहना मुश्किल है।

सन् 2016 में नोटबंदी के बाद देश में भी कालेधन की जमाख़ोरी नहीं रुकी। इसके लिए 2,000 के नोट बंद करने पड़े। क्योंकि अभी हाल ही में नोट छपने के बाद ग़ायब हो गये। हाल ही में मीडिया के ज़रिये ये ख़बरें सामने आयीं कि 500 रुपये के नये डिजाइन वाले क़रीब 176 करोड़ से ज़्यादा नोट ग़ायब हो गये हैं। इन नोटों की ग़ायब हुई रक़म 88,000 करोड़ से ज़्यादा है। यह ख़ुलासा सूचना का अधिकार यानी आरटीआई के तहत हुआ था।

दरअसल, आरटीआई एक्टिविस्ट मनोरंजन रॉय ने अपनी एक आरटीआई में इस सम्बन्ध में सवाल पूछे थे। इसमें जानकारी मिली कि नये डिजाइन वाले 500 रुपये लाखों नोट छपने के बाद रिजर्व बैंक पहुँचे ही नहीं। सवाल यह है कि अगर ऐसा हुआ, तो इसकी जाँच क्यों नहीं की जा रही है? सरकार इतने गम्भीर मामले पर खामोश क्यों है? रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इसे लेकर जाँच और सुरक्षा की माँग सरकार से क्यों नहीं की? बताया जा रहा है कि जो नोट ग़ायब हुए हैं उनकी क़ीमत 88,032.5 करोड़ रुपये है। आरटीआई की जानकारी में कहा गया है कि बेंगलूरु स्थित भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड, नासिक स्थित करेंसी नोट प्रेस और देवास स्थित बैंक नोट प्रेस में कुल (गिनती में) 8,81.065 करोड़ नोट 500 रुपये के छापे गये थे, जिनमें से रिजर्व बैंक को पूरे मिले मिले ही नहीं। आरटीआई के मुताबिक, 500 रुपये के कुल 176.065 करोड़ नोट ग़ायब हुए हैं, जिनकी क़ीमत 88,032.5 करोड़ रुपये है।

आरटीआई के जवाब से मिली जानकारी के मुताबिक, सभी नोट 2016-17 से ही ग़ायब हैं। क्योंकि नासिक मिंट ने जानकारी दी है कि उसने वित्त वर्ष 2016-17 में रिजर्व बैंक को 500 रुपये के 166.20 करोड़ नोट छापकर रिजर्व बैंक भेजे थे। इसी वित्त वर्ष में यानी 2016-17 के दौरान ही बेंगलूरु मिंट ने भी 500 रुपये के 519.565 करोड़ नोट छापकर रिजर्व बैंक भेजे थे और इसी 2016-17 में देवास मिंट ने भी 500 रुपये के 195.30 करोड़ नोट देश की इस मुख्य बैंक को भेजे थे।

इस जानकारी के बाद आरटीआई एक्टिविस्ट मनोरंजन रॉय ने ये आँकड़े सेंट्रल इकोनॉमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो और ईडी के पास भेजकर इस गड़बड़ी में जाँच की माँग की है। सरकार इस मामले में $खामोश है और ईडी, सीबीआई ने भी अभी तक जाँच के नाम पर कोई क़दम नहीं उठाया है। देश की जनता को इसका जवाब और हिसाब मिलना ही चाहिए। इससे देश की अर्थव्यवस्था कमज़ोर हो रही है। हालाँकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कहा है कि कुछ मीडिया में प्रसारित होने वाली ख़बरों के बारे में आरबीआई को पता चला है, जिसमें प्रिंटिंग प्रेस की तरफ से छापे गये बैंक नोटों के ग़ायब होने का आरोप लगाया गया है। यह रिपोर्ट सही नहीं हैं। सवाल यह है कि अगर ऐसा है, तो आरटीआई का जवाब क्या है?

सुलगती घृणा

मनुष्यों के दिमाग़ में घृणा सुलग रही है। विशेषकर हर उस दिमाग़ में गन्धक और पोटाश की तरह घृणा का ढेर है, जिसमें धर्मांधता भरी हुई है। जैसे ही धर्मांधता के मार्गदर्शक या शासक इसे हल्की-सी रगड़ देते हैं, वैसे ही यह घृणा हिंसात्मक रूप में फूँस की आग की तरह धधक उठती है। धर्मों में मत-भिन्नता और धर्मों का वास्तविक ज्ञान नहीं होना इसके सबसे बड़े कारण हैं। मणिपुर में घृणा रूपी गन्धक में धर्म की चिंगारी रखी जा चुकी है। यही वजह है कि मणिपुर में हिंसा ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है।

वास्तव में धर्मों की विविधता लोगों के अलग-अलग मतों के कारण है। मतों की भिन्नता मनुष्य के स्वभाव में है। इसी मत-भिन्नता के चलते संसार भर के लोग सदियों से लड़ते-झगड़ते रहे हैं। आज भी लड़-झगड़ रहे हैं; और आगे भी लड़ते-झगड़ते रहेंगे। लडऩा-झगडऩा केवल मनुष्य का स्वभाव ही नहीं है। पशु भी लड़ते-झगड़ते हैं। इसका अर्थ यह है कि झगडऩा हर प्राणी के स्वभाव में है। लेकिन बाक़ी प्राणियों में मनुष्य के स्वभाव की तरह मत-भिन्नता के झगड़े नहीं हैं। यह केवल मनुष्य का स्वभाव है। दो लोगों के बीच की मत-भिन्नता दोनों में दूरी पैदा करती है। लेकिन धर्मों और जातिवाद के चलते उपजी मत-भिन्नता ने लोगों को एक-दूसरे से दूर तो किया ही है, उनके मन में घृणा भी पैदा की है। हाल यह है कि आज सब एक-दूसरे से अकारण ही घृणा कर रहे हैं। सब एक-दूसरे को फूटी आँख देखना नहीं चाहते। एक-दूसरे को मार डालने पर आमादा हैं।

यह एक कटु सत्य है कि अगर लोगों का एक-दूसरे से वास्ता न हो, एक-दूसरे के बग़ैर सबका काम चल जाए, धन-सम्पत्ति की किसी को किसी से लालसा न हो, और एक-दूसरे के प्रति आकर्षण न हो, तो संसार में सबसे पहले लड़-झगडक़र समाप्त होने वाली प्रजाति मानवों की होगी। कोई किसी को नहीं पूछेगा। सब एक-दूसरे को हिक़ारत की नज़र से देखेंगे। सब एक-दूसरे से घृणा करेंगे। यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह बिना स्वार्थ के ईश्वर को भी भूल जाता है। अकारण उस ईश्वर को भी याद नहीं करता, जिसने इसे बनाया है। जिसने इस मनुष्य के लिए सृष्टि बनायी है। समस्त प्राणियों का शासक बनाया। लेकिन अगर जीवन में तनिक भी कुछ अनर्थ हो, तो कितने ही मनुष्य ईश्वर से ही घृणा करने लगते हैं। ईश्वर को कोसने लगते हैं। अज्ञानता ने मनुष्य की बुद्धि को ऐसे भ्रष्ट किया है कि वह ईश्वर से भी स्वार्थ के लिए ही जुडऩा पसन्द करता है। धर्मों के प्रति अंधश्रद्धा और बिना तर्क के हर तथ्य को आँख बन्द करके मान लेने के चलते मनुष्य का स्वभाव ऐसा हुआ है। धर्मों के चलते उपजी घृणा से धर्मांधता फैलाने वाले पाखण्डियों और शासकों के अलावा किसी की स्वार्थ सिद्धि नहीं होती है। इसलिए यही पाखण्डी और शासक अपने-अपने धर्मों के लोगों के मनों में एक-दूसरे के प्रति घृणा की आग धधकाकर रखते हैं।

आपस में घृणा करने वाले यह नहीं सोचते कि इससे उनका बाहरी नुक़सान तो होता ही है, वे अन्दर से भी स्वयं ही धीरे-धीरे इस आग में भस्म होते रहते हैं। घृणा की विशेषता यह है कि घृणा जिसके प्रति हो, वह चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हों, उसकी अच्छाई घृणा करने वाले को नहीं देखने देती। किसी को जिसके प्रति घृणा हो, उसमें बुराइयाँ ही बुराइयाँ नज़र आती हैं। वहीं इसके विपरीत जिसके प्रति स्नेह हो, उसमें लाख अवगुण हों; लेकिन दिखायी नहीं देते। इन्हीं दो भावों के चलते लोग अच्छे और बुरे लोगों के समर्थक और विरोधी होते हैं। अक्सर देखा जाता है कि बुरे लोगों के भी समर्थक होते हैं और अच्छे लोगों के भी विरोधी। इसी तरह बुरे लोगों के भी विरोधी होते हैं और अच्छे लोगों के समर्थक भी। यह सब कुछ मन-भिन्नता और मतैक्यता के चलते ही होता है। लेकिन स्वाभाविक तौर पर अच्छा व्यक्ति अच्छे व्यक्ति को पसंद करता है और बुरा व्यक्ति बुरे व्यक्ति को। लेकिन जहाँ धर्मों की बात आती है, वहाँ अधिकतर लोग इन दोनों गुण-अवगुणों से अलग अच्छाई-बुराई को न देखकर केवल धर्म के चश्मे से सामने वाले को देखते हैं और उसी के आधार पर समर्थन और विरोध करते हैं। इसी आधार पर स्नेह और घृणा करते हैं। आज पूरे संसार में अनगिनत मन्दिर, अनगिनत मस्जिदें, अनगिनत चर्च, अनगिनत गुरुद्वारे, अनगिनत प्रार्थना स्थल, अनगिनत सिनगाग, अनगिनत बहाई, अनगिनत दरगाह आदि हैं। इतनी तरह के पूजा स्थल होने के बाद भी मनुष्य को यह ज्ञान नहीं हुआ कि उसे सबसे प्यार करना चाहिए। सबको सम्मान देना चाहिए। वह इन पूजा स्थलों से आपस में लडऩा सीख गया। घृणा करना सीख गया। इतना ही नहीं, एक ईश्वर को भी अलग-अलग मान लिया। एक ही धरती पर रहकर, एक ही हवा में साँस लेकर, एक ही पानी को पीकर और एक ही जैसे भरण-पोषण के बाद भी सब एक-दूसरे के दुश्मन बन गये। क्या यह सब कई धर्मों के होने और उनकी विविधता के कारण नहीं है?

बंगाल पंचायत चुनाव में शुरू हुई हिंसा अब तक जारी, 50 लोगों की मौत

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के नतीजे आने के बाद भी लगातार हिंसा जारी है। बीते 24 घंटों में हिंसा के चार और लोगों की मरने की खबर सामने आयी है। अब तक मरने वालों की कुल संख्या 50 पर पहुंच गई हैं।

पुलिस का कहना है कि वह अपने कुछ साथियों के साथ गुरुवार रात बैष्णबनगर इलाके के सिकास्ती गांव में एक लीची के बगीचे में बम बना रहा था और इस दौरान बम फट गया। इस विस्फोट में आलम शेख नाम के युवक का एक हाथ उड़ गया है वही कालू शेख नाम का अन्य व्यक्ति घायल हो गया है।

भाजपा और टीएमसी दोनों दलों ने आरोप लगाए है कि उनके कार्यालय जलाने की कोशिश की गई। और दावे के मुताबिक हावड़ा जिले में एक भाजपा ग्राम पंचायत उम्मीदवार के आवास और दुकान में आग लगा दी गई। वहीं टीएमसी उम्मीदवार के गोदाम में आग लगा दी गई।बता दें, पश्चिम बंगाल में टीएमसी ने हिंसा प्रभावित ग्रामीण चुनावों में भारी जीत दर्ज की है। टीएमसी ने जिला परिषदों पर कब्जा कर लिया है। और 63,219 ग्राम पंचायत सीटों में से 35000 सीटों पर टीएमसी ने जीत दर्ज कराई हैं।