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क्या 500 का नोट भी हो जाएगा बन्द?

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

इसी वर्ष 30 सितंबर तक 2,000 रुपये के नये नोट चलन में हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने इन बड़े नोटों को 19 मई, 2023 को चलन से बाहर करने की बात कही थी। अब 500 रुपये के नये नोट के बन्द होने की चर्चा छिड़ गयी है। इस दूसरे बड़े नोट के बन्द किये जाने की ख़बरें कई दिनों से सोशल मीडिया पर चल रही हैं। अब संसद के मानसून सत्र में 500 रुपये के बन्द किये जाने को लेकर आशंका जतायी गयी है।

विदित हो कि संसद के मानसून सत्र में वित्त मंत्रालय से 500 रुपये के नये नोट के बन्द करने तथा दोबारा 1,000 रुपये के नोट को चलन में लाने की ख़बरों को लेकर सवाल पूछा गया। इस सवाल का जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लिखित जवाब में कहा कि सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं है। सरकार ने 2,000 रुपये के नोटों को चरणबद्ध तरीक़े से बाज़ार से हटाया है। इन नोटों के बदले में सरकार ने 500 रुपये के नोटों का पर्याप्त बफर स्टॉक रखा है। हालाँकि 500 रुपये के नये नोट के बन्द होने के सवाल को नकारने के उपरांत भी यह ख़बर अख़बारों तथा सोशल मीडिया में सुर्ख़ियाँ बन गयी। सवाल वहीं का वही रहा कि क्या 500 रुपये का नया नोट भी बन्द हो जाएगा? हालाँकि ऐसा करना सरकार के लिए आसान भी नहीं होगा तथा यह उसके हित में भी नहीं रहेगा। इसलिए सम्भव है कि 500 के नये नोटों को चलन से बाहर अभी नहीं किया जाए।

आर्थिक मामलों के जानकार एक बैंक मैनेजर ने नाम छापने की शर्त पर कहा कि सरकार ने 2016 में नोटबन्दी का पहला निर्णय ही ग़लत तथा बिना सूझ-बूझ के लिया था। अगर सरकार उसी समय अर्थशास्त्रियों की राय लेती, तो अधिकतर का जवाब न होता। परन्तु उसने अपने हित साधने के लिए ईगो को सामने रखकर यह बड़ा फ़ैसला ले तो लिया, अब उसे इन नये नोटों से तथा बड़ी दिक़्क़त यह आ रही है कि पुराने नोटों के नक़ली नोट कम थे, इनके अधिक आ गये। इसलिए 2,000 रुपये का नोट भी बन्द किया गया, जिससे नक़ली नोटों के जाल से बाहर निकला जा सके तथा अब 500 रुपये के नये नोट के बारे में भी वही सुन रहे हैं, जो 2,000 के नोट का हो चुका है। हालाँकि नक़ली नोटों का मामला केवल 2,000 तथा 500 रुपये के नोटों तक सीमित नहीं है। छोटो नोट भी नक़ली हैं, जिन पर रोक लगाना आसान नहीं है। चलन से बाहर हो रहे 2,000 रुपये के नोटों को बदलने की तारीख़ नहीं बदलने वाली है। यह वित्त मंत्रालय पहले ही कह चुका है। अभी बहुत-से लोगों के पास 2,000 के नये नोट होंगे ही। क्योंकि 2,000 के नोट कुल नोटों के 2.51 प्रतिशत हैं। कहा जा रहा है कि देश में कुल 31,33,000 करोड़ रुपये के नोट चलन में हैं, जिनमें से 2,000 के कुल 3,62,000 करोड़ रुपये के नोट मार्च 2023 में चलन में थे। मार्च, 2018 में 2,000 रुपये के कुल 6,73,000 करोड़ रुपये मूल्य के नोट चलन में थे। अब इनकी संख्या तथा भी कम हो गयी है। हालाँकि 500 रुपये के नये नोट कितने छप चुके हैं, इसकी जानकारी तो नहीं मिल सकी है, परन्तु अनुमानित तौर पर 500 के नोटों की संख्या 2,000 के नोटों से छ:-सात गुना अधिक है। इन नोटों का काग़ज़ पहले के नोटों के काग़ज़ से काफ़ी हल्का तथा सुलभता से उपलब्ध है। नये नोट के काग़ज़ के जैसा काग़ज़ आसानी से उपलब्ध है। इससे बाज़ार में नक़ली नोटों की भरमार हो चुकी है।

पिछले दिनों एक ख़बर वायरल हुई कि 50 से 200 रुपये के नक़ली नोट बाज़ार में धड़ल्ले से चल रहे है। इसके अतिरिक्त 500 तथा 2,000 के नक़ली नोटों की ख़बरें भी आती रहती हैं। जानकारों का कहना तो यहाँ तक है कि बाज़ार में 10, 20, 50, 100, 200, 500 के नक़ली नोट ख़ूब चलन में हैं। चलन से बाहर होने के चलते 2,000 रुपये के नक़ली नोटों पर रोक लग सकी है। अगर सरकार 500 रुपये के नक़ली नोट चलन से बाहर करना चाहती है, तो उसे 500 रुपये के नये नोट चलन से बाहर करने होंगे। नक़ली नोटों की पहचान आम लोगों को नहीं हो पाती है, इसलिए जालसाज़ लोग नक़ली नोटों को बाज़ार में आसानी से चला देते हैं। 10, 20, 50, 100 तथा 200 के नोटों को आम लोग वैसे भी ध्यान से नहीं देखते। हालाँकि कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक ख़बर चली थी कि 500 रुपये का स्टार (*) वाला नोट नक़ली है। हालाँकि जब इसकी जाँच की गयी, तो पाया कि ख़बर झूठी है।

परन्तु नक़ली नोटों के ख़बरों के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने ग्राहकों को जागरूक करने की नक़ली नोटों की पहचान जारी है। आरबीआई ने कहा कि ऐसी ख़बरें हैं कि जालसाज़ बड़े नोटों के बजाय छोटे नक़ली नोटों को बड़ी संख्या में बाज़ार में फैला रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने इन नक़ली नोटों की पहचान बताते हुए लोगों से सतर्कतापूर्वक नोटों के लेन-देन की सलाह दी है। नये नोटों के नक़ली नोटों की पहचान जारी करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने लोगों को बताया है कि 50 रुपये से लेकर 500 रुपये के नोट तक की पहचान जारी की है। हालाँकि पुराने बड़े नोटों के चलन से बाहर होने के बाद तथा पुराने नोटों की जगह हर तरह के नये नोट आने से पुराने नोटों के नक़ली नोटों की संख्या तेज़ी से कम हुई है। परन्तु नये नोटों के नक़ली नोट बढ़े हैं।

कुछ जानकारों का कहना है कि पुराने सभी नोट धीरे-धीरे चलन से बाहर हो चुके हैं तथा जल्द ही पुराने सभी नोट चलन से बाहर हो जाएँगे, इसका कारण पुराने नोटों की छपाई का बन्द होना भी है। हालाँकि भारतीय रिजर्व बैंक ने सन् 2019 में 100 रुपये के नये नोट जारी करने के समय स्पष्ट कहा था कि 100 रुपये के पुराने नोट भी चलते रहेंगे। परन्तु जानकार मान रहे हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक धीरे-धीरे पुराने नोट बन्द कर रहा है। यह काम बिना घोषणा के पुराने सभी तरह के नोटों की छपाई बन्द करके किया जा रहा है। कहा जा सकता है कि 2016 में घोषित नोटबन्दी तो 500 तथा 1000 के पुराने नोटों की हुई थी। परन्तु अघोषित नोटबन्दी सभी प्रकार के नोटों की हो गयी थी; क्योंकि उसी समय से सभी प्रकार के पुराने नोटों की छपाई नहीं की जा रही है।

हालाँकि भारतीय रिजर्व बैंक ने इस तरह की कोई जानकारी अथवा सूचना नहीं दी है, परन्तु बाज़ार में कम होते पुराने नोटों से इस तरह की ख़बरों को सच माना जा रहा है। जानकारों का तो यहाँ तक कहना हैं कि पुराने नोटों को जिन उद्देश्यों के लिए बन्द किया गया उनमें नक़ली नोटों को चलन से बाहर करने के सबसे बड़े उद्देश्य का कोई लाभ नहीं हुआ, क्योंकि अब नक़ली नोट अधिक चलन में हैं। जालसाज़ नक़ली नोटों को छोटे कम जानकार लोगों के बीच अधिक संख्या में खपा रहे हैं। इन्हीं नक़ली नोटों की शिकायत के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने एक साइट https//cms.rbi.org.in जारी की है, जिस पर कोई भी व्यक्ति नक़ली नोटों की शिकायत दर्ज कर सकता है।

ख़बरों के अनुसार, नक़ली नोटों को खपाने के लिए जालसाज़ छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों तथा आम लोगों के बीच जा रहे हैं। समस्या यह है कि नक़ली नोट पूरी तरह से असली नोट की कॉपी है, जिसके चलते उसकी पहचान नहीं हो पाती। पुराने नोटों में काग़ज़, छपाई, कुछ विशिष्ट पहचान चिह्नों तथा रंग आदि से लोग नक़ली नोटों की पहचान आसानी से कर लेते थे; परन्तु नये असली नोटों का काग़ज़, छपाई, रंग आदि उतना अच्छा है ही नहीं।

इससे कई बार जानकार लोग भी नक़ली नोट की पहचान नहीं कर पाते। 2,000 के नोटों को चलन से बाहर करने की भारतीय रिजर्व बैंक की घोषणा के बाद जबसे लोग उन्हें बैंकों में जमा करने आ रहे हैं, तबसे कई ख़बरें 2,000 के नक़ली नोटों की आ चुकी हैं। जिन लोगों को नक़ली नोटों की पहचान नहीं है, वे 2,000 के नक़ली नोट ले चुके हैं। जब वे 2,000 के नोट बदलवाने के लिए बैंक पहुँचते हैं, तो वहाँ कई बार कुछ नोट नक़ली निकल आते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि अगर 500 रुपये के नये नोटों को भी बन्द किया गया, तो नक़ली नोटों की एक बड़ी खेप चलन से बाहर होगी।

आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि नक़ली नोटों को चलन से बाहर करने के लिए भारत सरकार को पुराने नोटों से भी अच्छे काग़ज़ पर जटिल छपाई प्रक्रिया अपनाते हुए नये नोटों की छपाई करवानी चाहिए थी। परन्तु सरकार ने घाटा छिपाने तथा अपने हित साधने के लिए जल्दबाजी में घटिया काग़ज़ पर घटिया छपाई कराकर नक़ली नोटों के चलन को बढ़ावा तथा नक़ली नोट छापने वालों को अवैध धन्धे के विस्तार का अवसर दिया है। प्रश्न यह है कि क्या सरकार के पास ऐसी कोई योजना है, जिससे नक़ली नोटों को चलन से बाहर किया जा सके? परन्तु इससे पहले प्रश्न यह है कि क्या सरकार को नक़ली नोटों के चलन को लेकर कोई चिन्ता है?

अदालतों में बढ़ रहे लंबित मामले

सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच मणिपुर हिंसा पर चर्चा को लेकर चालू मानसून सत्र के पहले दिन से ही जो हंगामा शुरू हुआ, जो लेख लिखे जाने तक जारी था। लेकिन इस हंगामे के बीच ही सत्र के पहले ही दिन यानी 21 जुलाई को केंद्रीय क़ानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि भारतीय अदालतों में लंबित मुक़दमों की संख्या 5.02 करोड़ से ज़्यादा हो गयी है। अकेले सर्वोच्च अदालत में लंबित मामलों की संख्या 69,766 हो गयी है।

क़ानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा को बताया कि ‘इंटीग्रेटेड केस मैनेजमेंट सिस्टम से प्राप्त आँकड़ों के मुताबिक 01 जुलाई तक सर्वोच्च न्यायालय में 69,766 मामले लंबित हैं।’

उन्होंने कहा-‘ नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) पर मौज़ूद जानकारी के मुताबिक 14 जुलाई तक देश की 25 उच्च अदालतों में 60,62,953 और ज़िला व अधीनस्थ अदालतों में 4,41,35,357 मामले लंबित हैं।’

एनजेडीजी राष्ट्रीय स्तर पर अदालतों के प्रदर्शनों की निगरानी करता है। भारत में लंबित मामलों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है और समय-समय पर न्यायाधीश व सरकार भी इस गम्भीर मुद्दे पर अपनी-अपनी तरह से चिन्ता व्यक्त करते रहते हैं।

मई में जब किरण रिजिजू की जगह क़ानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को बनाया गया, तो उन्होंने कहा था कि सभी को इंसाफ़ उपलब्ध कराया जाना चाहिए और भारत की न्यायपालिका के सभी स्तरों पर मामलों का भारी बैक लॉग एक समस्या है, जिसे संबोधित करने की ज़रूरत है।’

मंत्री मेघवाल ने अपने नये कार्यालय के पहले दिन प्रेस वार्ता में कहा था -‘ मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता सभी को त्वरित इंसाफ़ सुनिश्चित करना होगी।’ दरअसल क़ानून मंत्री कोई भी हो, आम जनता को त्वरित न्याय दिलाने वाले उनके अल्फ़ाज़ बाद में आम जन को निराश ही करते हैं। हज़ारों लंबित मामले 25 साल या इससे अधिक समय से लंबित हैं। सवाल है कि लंबित मामलों की इस समस्या को कैसे कम किया जाए? न्यायिक तंत्र व न्याय दिलाने में सहयोग करने वाली अन्य एजेंसियों को कैसे कारगर बताया जाए कि धरातल पर सकारात्मक नतीजे दिखायी दे।

लंबित मामलों से लोकतंत्र को नुक़सान होता है। इस बाबत मिड-डे में छपी ख़बर के मुताबिक, वॉचडॉग फाउंडेशन के ट्रस्टी एडवोकेट गॉडफ्रे पिमेंटा ने कहा कि भारत में विभिन्न अदालतों में मामलों का ढेर एक दरकते हुए लोकतंत्र की तरफ़ इशारा है। राजनेता जनता को इंसाफ़ दिलाने की पहल में पिछड़ गये हैं, क्योंकि वे सिर्फ़ अपने स्वार्थों को पूरा करते हैं। कोर्ट रूम की संख्या बढ़ाने, ऑनलाइन सुनवाई में बदलाव करने और अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति जैसे बुनियादी ढाँचे में बदलाव की ज़रूरत है।

गॉडफ्रे पिमेंटा ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, लगभग सरकार भी उसके क़रीब ही खड़ी नज़र आती है। सिर्फ़ राजनेता वाले वाक्य को हटाकर। क़ानून एवं न्याय मंत्री मेघवाल का कहना है कि अदालतों में मामलों के लंबित होने के लिए कई कारणों को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिनमें पर्याप्त संख्या में जजों और न्यायिक अफ़सरों की अनुपलब्धता, अदालत के कर्मचारियों और कोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी शामिल है। इसके साथ ही साक्ष्यों का जुटाया जाना; बार, जाँच एजेंसियों, गवाहों और वादियों जैसे हितधारकों का सहयोग भी इसमें शामिल हैं।

ग़ौरतलब है कि अदालतों में मामले के निपटान के लिए पुलिस, वकील, जाँच एजेंसियाँ और गवाह अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यही देश में मामलों को लंबित करने के अहम कारण भी बनते हैं। कई मामलों में पुलिस समय पर आरोप-पत्र दाख़िल नहीं कर पाती, तो कई मामलों में वकील भी पेश नहीं होते। इसके अलावा अदालतों की लम्बी छुट्टियाँ होती हैं।

संदर्भ के लिए हाल ही में छपी एक ख़बर, राजस्थान की बूंदी पुलिस ने लकड़ी काटने के आरोप में 53 साल बाद 7 बुजुर्ग महिलाओं को गिरफ़्तार कर उन्हें अदालत में पेश किया गया। इन महिलाओं पर आरोप है कि 53 साल पहले इन्होंने जंगल से अपने घरों में खाना बनाने के लिए कुछ लकडिय़ाँ काटी थीं।

इस मामले में 12 महिलाओं के ख़िलाफ़ मुक़दमा सन् 1971 में दर्ज हुआ था और पुलिस ने उन्हें पकड़ा 2023 में। तीन महिलाओं की मौत हो चुकी है और दो को पुलिस नहीं पकड़ पायी। अदालत ने 500 रुपये के मुचलके पर इन आरोपी महिलाओं को रिहा कर दिया है। इसके अलावा अदालतें वकीलों की अनुपस्थिति में भी सुनवाई नहीं कर पाती हैं।

हाल ही में एनजेडीजी की रिपार्ट में बताया गया था कि देश में लंबित मामलों में 61,57,268 ऐसे मामले हैं, जिनमें वकील पेश नहीं हो रहे हैं और 8,82,000 मामलों में केस करने वाले और विरोधी पक्षों ने अदालत आना ही छोड़ दिया। इस रिपोर्ट में यह भी ख़ुलासा किया गया कि 66,58,131 मामले ऐसे हैं, जिनमें आरोपी या गवाहों की पेशी नहीं होने के कारण मामलों की सुनवाई रुकी हुई है। इनमें से 36 लाख से अधिक मामलों में आरोपी जमानत लेकर फ़रार हैं। क़ानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल का कहना है- ‘अदालतों में लंबित मामलों का निपटारा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में है। अदालतों के मामलों के निपटारे में सरकार की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है।’

सरकार या क़ानून मंत्री यह कहकर क्या अपनी जनता के साथ न्याय कर रहे हैं? अदालतें मामलों की त्वरित सुनवाई कर त्वरित न्याय करें, यह सुनिश्चित करना क्या सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है। लंबित मामलों को जल्द-से-जल्द निपटाने के लिए सरकार व न्यायपालिका के दरमियान उचित समन्वय होना चाहिए। सर्वोच्च अदालत के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने 2019 में एक अख़बार में अपने लेख में कहा था कि ऐसा अनुमान है कि अगर कोई नया मामला दर्ज नहीं हो, तो बैक लॉग को निपटाने में क़रीब 360 वर्ष लगेंगे।’

उस समय लंबित मामलों की संख्या क़रीब 3.3 करोड़ थी और आज यह संख्या 5 करोड़ का आँकड़ा पार कर चुकी है। गत जुलाई को सर्वोच्च अदालत के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना ने देश में लंबित मामलों पर तत्कालीन क़ानून एवं न्याय मंत्री किरण रिजिजू द्वारा व्यक्त की गयी चिन्ताओं का जबाव देते हुए कहा था कि न्यायिक रिक्तियों को न भरना इसका प्रमुख कारण है। मंत्री को यह संदेश साफ़ दिया गया था कि न्यायिक रिक्तियों को भरना और न्यायिक बुनियादी ढाँचे में सुधार करना चाहिए।

अगर अदालतों में जजों की संख्या पर निगाह डालें, तो पता चलता है कि दिसंबर, 2022 तक 25 उच्च अदालतों में जजों की संख्या 1,108 होनी चाहिए थी; लेकिन यह संख्या 778 है। इसी तरह निचली अदालतों में जजों के पद 24,631 थे; लेकिन जज 19,288 थे। भारत की निचली अदालतों में ज्यूडिशियल अफ़सरों के 5,388 से अधिक और उच्च अदालतों में 330 से अधिक पद $खाली हैं।

क़ानून मंत्रालय ने इंसाफ़ मिलने में हो रही देरी को दुरुस्त करने सम्बन्धित एक सवाल के जवाब में उत्तर दिया था कि केंद्र मामलों के त्वरित निपटारे और लंबित मामलों को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है। क़ानून मंत्रालय ने इस दिशा में उठाये गये क़दमों का ज़िक्र किया और कहा कि जहाँ तक ज़िला अदालतों व अधीनस्थ अदालतों का सम्बन्ध है। 2014 में कोर्ट हाल की संख्या 16,000 थी, जो बढक़र 2020 में 19,500 हो गयी है।

डिजिटल समाधान को अपनाकर एक उल्लेखनीय क़दम मामलों के निपटान के वास्ते उठाया गया है। केंद्र देश भर में ई-कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट को लागू कर रहा है। क़ानून मंत्रालय ने यह भी कहा कि देश के उच्च अदालतों में पाँच साल से अधिक लंबित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए एरियर कमेटी का गठन किया गया है। दरअसल सरकार अपनी सफ़ाई में बहुत कुछ कहती है; लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या है?

हाल ही में बॉम्बे उच्च अदालत ने चोरी के मामलों में 83 साल की सज़ा पाने वाले पुणे के 30 वर्षीय व्यक्ति को रिहा करने के आदेश दिये। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अगर व्यक्ति को सही समय पर क़ानूनी मदद मिल जाती, तो वह 41 मामलों में से 38 में बरी हो जाता। चूँकि वह ग़रीब है और वकील नहीं कर सकता, इसलिए वह जेल में सज़ा काट रहा था। प्रसंगवश यहाँ ज़िक्र करना ज़रूरी है कि देश की जेलों में क्षमता से अधिक क़ैदी हैं और यह स्थिति बद से बदतर हो रही है। इसी अप्रैल को जारी ‘द थर्ड इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022’ के अनुसार, देश में सन् 2019 में 4.81 लाख क़ैदी थे और यह संख्या 2020 में बढक़र 4.89 लाख हो गयी। 2021 में यह संख्या 5.54 लाख तक पहुँच गयी। देश में कुल जेलों की संख्या 1,319 है। दिसंबर, 2021 तक एक जेल में औसतन 130 प्रतिशत क़ैदी थे। चिन्ता की बात यह है कि विचाराधीन क़ैदियों की संख्या बढ़ रही है। विचाराधीन क़ैदी ऐसे क़ैदी जिन्हें अदालत ने सज़ा नहीं सुनायी है। इसे देश में बढ़ते लंबित मामलों से भी जोडक़र देखा जा सकता है। एक दशक में विचाराधीन क़ैदियों की तादाद लगभग दोगुनी हो गयी है।

इसी रिपोर्ट के अनुसार, 2010 में विचाराधीन क़ैदियों की तादाद 2.14 लाख से बढक़र 201 में 4.3 लाख हो गयी थी। लंबित मामलों का असर देश की न्यायिक व्यवस्था के साथ-साथ पीडि़तों की सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक अवस्था पर भी पड़ता है। आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोग इन लंबित मामलों की प्रवृत्ति को ये सोचकर अपराध करते हैं कि अपराध कर लो, अदालतों में तो कई-कई साल तक मुक़दमे चलते रहते हैं। लंबित मामलों से इस संदेश का निकलना किसी भी समाज, राष्ट्र, लोकतंत्र व मानव जाति के लिए ख़तरनाक है; क्योंकि न्याय में देरी भी एक तरह से अन्याय है।

वाड्रा-डीएलएफ भूमि सौदा

खोदा पहाड़, निकली चुहिया

राबर्ट वाड्रा-डीएलएफ भूमि सौदा कोई घोटाला था या भाजपा की चुनावी रणनीति का कोई हिस्सा? यह सवाल इसलिए, क्योंकि हरियाणा सरकार ने इसी वर्ष मार्च में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दाख़िल कर बताया कि ज़मीन सौदे में न नियमों की अनदेखी हुई, न ही सरकारी राजस्व का नुक़सान हुआ। यह रिपोर्ट तो रजिस्ट्री करने वाले तहसीलदार ने वाड्रा पर प्राथमिकी होने और उनसे जवाब माँगने के कुछ समय बाद ही दे दी थी। अब क़रीब-क़रीब 10 साल बाद उसी जवाब को हरियाणा सरकार उच्च न्यायालय में शपथ-पत्र के तौर पर दाख़िल कर रही है।

हरियाणा सरकार ने अपने नौ साल से ज़्यादा के कार्यकाल के दौरान इस मुद्दे को किसी-न-किसी तौर पर बनाये रखा है। अब तक इस मामले की तीन तरह से जाँच हो चुकी है। पहली जाँच तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों कृष्ण मोहन, के.के. जालान और राजन गुप्ता पर आधारित समिति ने की।

जाँच में भूमि सौदे में किसी तरह की अनियमितता और सरकारी राजस्व के नुक़सान न होने की बात कही गयी। बावजूद इसके इस मामले में कुछ और बिन्दू भी थे। मसलन जो ज़मीन साढ़े सात करोड़ रुपये में वाड्रा ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टी से ख़रीदी, उसकी रजिस्ट्री तुरत-फुरत होना, तीन माह बाद कामर्शियल लाइसेंस मिलना, आसपास की ज़मीनों के रेट राकेट गति से बढऩा और ख़रीदी भूमि को कुछ माह बाद सात गुना से ज़्यादा दामों पर बेचना आदि थे। क्या इसके पीछे राज्य सरकार की कोई भूमिका था? वाड्रा ने क्या भूमि सौदे में साढ़े सात करोड़ रुपये वाक़ई अदा किये या फिर सरकारी मंज़ूरी दिलाकर दलाली के तौर पर क़रीब 44 करोड़ रुपये कमाये? जाँच में इन बिन्दुओं पर कोई नतीजा सामने नहीं आया है।

भूमि सौदे को ग़लत बताते हुए तत्कालीन चकबंदी निदेशक आईएएस अशोक खेमका ने इसे रद्द कर दिया था; लेकिन तत्कालीन सरकार ने उनका तुरन्त प्रभाव से तबादला कर दिया। लिहाज़ा सौदा क़ायम रहा। इसके बाद सन् 2014 के लोकसभा और हरियाणा विधानसभा चुनाव में वाड्रा-डीएलएफ सौदा प्रमुख मुद्दा बना और भाजपा को इससे राजनीतिक लाभ मिला। जीत के कारण कुछ और भी हो सकते हैं; लेकिन कांग्रेस और हुड्डा के ख़िलाफ़ यह भूमि सौदा भाजपा के लिए मारक हथियार रहा।

राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद वर्ष 2015 में सेवानिवृत जस्टिस एस.एन. धींगड़ा को जाँच सौंपी गयी। क़रीब चार साल की जाँच के बाद 1,000 से ज़्यादा पन्नों की रिपोर्ट सरकार को सौंपी गयी। तब लगा था कि बहुत बड़ा घोटाला सामने आएगा; लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस रिपोर्ट में क्या कुछ था, इसका कभी ख़ुलासा नहीं हो सका।

अगर रिपोर्ट में बहुत कुछ ठोस होता, तो इसे जारी किया जाता। उसके बाद से लगने लगा था कि यह भूमि सौदा घोटाला न होकर व्यक्ति विशेष की छवि धूमिल कर राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा वाला है। राज्य सरकार ने स्टेटस रिपोर्ट में गड़बड़ी न होने का शपथ-पत्र ज़रूर दाख़िल किया है; लेकिन मामले की जाँच भी जारी रखी हुई है। मामले में तीसरी बार जाँच समिति गठित हुई है। इसमें एक डीसीपी, दो एसीपी, एक इंस्पेक्टर और एक एएसआई हैं। इस एसआईटी ने कामकाज शुरू कर रखा है। एसआईटी टीम में सहयोग के लिए वरिष्ठ आईएएस मुकुल कुमार और सेवानिवृत चीफ टाउन प्लानर दिलबाग़ सिंह भी हैं।

भूमि सौदे में वित्तीय अनियमितताओं की आशंका को देखते हुए टीम ने यूनियन बैंक आफ इंडिया से सम्पर्क किया, जहाँ राबर्ट वाड्रा की कम्पनी स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी का खाता था। सौदे इसी कम्पनी ने किया था और वाड्रा उस समय कम्पनी के निदेशक थे। जाँच टीम ने बैंक से वाड्रा की कम्पनी के लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड देने को कहा, तो जवाब मिला कि वर्ष 2008 से 2012 का बैंक रिकॉर्ड बारिश का पानी भूतल में घुसने से बर्बाद हो गया है। इन्हीं वर्षों के दौरान के रिकॉर्ड की एसआईटी को ज़रूरत थी। बैंक को अब यह जवाब देना होगा कि क्या पानी से वाड्रा की कम्पनी का रिकॉर्ड ही ख़राब हुआ है या फिर उस दौरान सारा रिकॉर्ड। जब तक एसआईटी को वित्तीय लेन-देन का रिकॉर्ड नहीं मिल जाता, अनियमितताओं का पता नहीं चल सकेगा।

इस मामले में मुख्य आरोपी के तौर पर सोनिया गाँधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के अलावा तत्कालीन हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, डीएलएफ और ओंकारेश्वर प्रॉपर्टी थे। सुरेंद्र शर्मा नामक व्यक्ति की शिकायत पर खेडक़ी दौला (गुडग़ाँव) थाने में धोखाधड़ी, जालसाज़ी,नियमों की अवहेलना और भ्रष्टाचार की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई थी। हरियाणा में उस समय कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा थे।

भाजपा ने इस मुद्दे को बड़ी शिद्दत से उठाया; क्योंकि इसमें राबर्ट वाड्रा का नाम जुड़ा था। उस दौरान हरियाणा में कांग्रेस सरकार और ख़ुद हुड्डा पर नियमों की आड़ में क़रीबी और राजनीतिक प्रभाव वाले लोगों को फ़ायदा पहुँचाने के आरोप लग रहे थे। कांग्रेस इसे क्लीन चिट के तौर पर देख रही है। वहीं सरकार इसे किसी भी तरह की क्लीन चिट नहीं, बल्कि जाँच जारी रहने की बात कह रही है। साढ़े सात करोड़ रुपये का यह भूमि सौदा चुनावी मुद्दा क्यों बन गया? जबकि गुडग़ाँव में इससे कहीं ज़्यादा के भूमि सौदे उसी दौरान (वर्ष 2008) में हुए थे।

वर्ष 2024 में राज्य में विधानसभा चुनाव होना है। यह भूमि सौदा तब तक मुद्दा बना रहेगा; लेकिन अब यह कांग्रेस के लिए सकारात्मक रह सकता है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा के मुताबिक, ‘चूँकि मामला अभी लंबित है। लिहाज़ा मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। लेकिन सच देर-सबेर सामने आ जाएगा।’

वह शुरू से कहते रहे हैं कि यह भूमि घोटाला नहीं, बल्कि गाँधी परिवार और उनकी छवि को धूमिल करने की एक चाल थी। हरियाणा सरकार के उच्च न्यायालय में दाख़िल शपथ-पत्र को कांग्रेस क्लीन चिट मानकर प्रचारित कर रही है। भाजपा में मायूसी ज़रूर है; लेकिन वह सरकार के शपथ-पत्र को मामले में क्लीन चिट नहीं, बल्कि बहुत कुछ सामने आने की बात कह रही है। एडवोकेट जनरल और गृहमंत्री स्पष्ट करने में लगे हैं कि कांग्रेसी इसे क्लीन चिट कैसे मान रहे हैं? जबकि एसीपी की अध्यक्षता में एसआईटी सुबूत जुटाने में लगी है।

नवगठित एसआईटी की जाँच पहले हुई दो जाँचों से अलग बिन्दुओं पर होगी। इसमें वित्तीय अनियमितताएँ प्रमुख तौर पर हैं। तहसीलदार की रिपोर्ट पर अब एसआईटी सवालिया निशान शायद ही लगाये, क्योंकि सरकार शपथ-पत्र दाख़िल कर चुकी है। कह सकते हैं कि अब यह मामला उतना गम्भीर नहीं रहा, जितना इसे उठाया गया था। जाँच में कुछ ऐसा मिल जाए, जिससे कहा जा सके कि यह राजनीतिक या चुनावी मुद्दा नही था, बल्कि सरकारी संरक्षण में गाँधी परिवार को करोड़ों रुपये का फ़ायदा पहुँचाया गया।

क्या था भूमि सौदा?

राबर्ट वाड्रा ने वर्ष 2017 में मात्र एक लाख रुपये की पूँजी से स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी कम्पनी बनायी। एक साल भी नहीं हुआ कम्पनी ने हरियाणा के शिकोहपुर (गुडग़ाँव) में 3.5 एकड़ भूमि का ओंकारेश्वर प्रापर्टी से फरवरी, 2008 साढ़े सात करोड़ में सौदा कर लिया। भूमि की रजिस्ट्री और इंतकाल बहुत जल्दी हुआ। सामान्य तौर पर जिस काम में तीन माह से ज़्यादा का लगता है, वह कुछ ही दिनों में हो गया। सौदे में सरकारी राजस्व और अन्य ख़र्चे नियमानुसार किये गये। यह अभी तक तहसीलदार की रिपोर्ट में स्पष्ट है। स्काईलाइट ने 3.5 एकड़ में कॉलोनी बसाने के लिए कॉमर्शियल लाइसेंस के लिए आवेदन किया, जो बिना दिक़्क़त के उसे मिल गया। इसके बाद आसपास की प्रॉपर्टी के दाम रातोंरात आसमान छूने लगे। कुछ माह में यह दाम 700 प्रतिशत बढ़ गये। स्काईलाइट ने कॉलोनी नहीं बसायी, बल्कि ख़रीदी गयी ज़मीन डीएलएफ को 58 करोड़ में बेच दी। सब ख़र्च निकाल दिये जाएँ, तो कम्पनी को लगभग 44 करोड़ का लाभ हुआ। यहीं से विशेषकर गुडग़ाँव में प्रॉपर्टी में वह तेज़ी आयी, जिसका फ़ायदा बहुत-से लोगों ने उठाया।

“राबर्ट वाड्रा-डीएलएफ भूमि सौदे में हरियाणा सरकार ने स्टेट्स रिपोर्ट के तहत शपथ-पत्र दाख़िल कर दिया है। मामले की जाँच बदस्तूर चल रही है। न्यायालय ही इस मामले में क्लीन चिट दे सकता है। मामला न्यायालय में लंबित है। लिहाज़ा बहुत कुछ ज़्यादा टिप्पणी ठीक नहीं है।’’

मनोहर लाल खट्टर

मुख्यमंत्री, हरियाणा

“हरियाणा सरकार ने उच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दाख़िल किया है। कांग्रेस नेता इसे राजनीति से प्रेरित मामला बताते हुए इसे क्लीतन चिट मान रहे हैं। नवगठित एसआईटी जाँच कर रही है। मामला न्यायालय में चल रहा है, तो फिर क्लीन चिट कैसे हुई?’’

अनिल विज

गृहमंत्री, हरियाणा

“हरियाणा सरकार के उच्च न्यायालय में दाख़िल शपथ-पत्र बहुत कुछ बताता है। भूमि सौदे में तत्कालीन सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। नियमों की पालना हुई और सरकारी ख़ज़ाने को कोई नुक़सान नहीं हुआ। यह शुरू से ही राजनीतिक से प्रेरित मामला है। न्यायपालिका पर हमें पूरा भरोसा है।’’

भूपेंद्र सिंह हुड्डा

पूर्व मुख्यमंत्री, हरियाणा

मध्य प्रदेश बना आदिवासियों और दलितों पर अत्याचार का गढ़

एक तरफ़ मणिपुर में लगभग तीन महीने से कुकी और नागा आदिवासियों को निशाना बनाकर वीभत्स अत्याचार, हिंसा, हत्या, महिलाओं का बलात्कार, गैंगरेप, निर्वस्त्र कर परेड कराने जैसी शर्मनाक घटनाएँ सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ़ मध्य प्रदेश भी आदिवासियों और दलितों पर अत्याचार के मामले में पीछे नहीं है। मध्य प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में ऐसी कई वीभत्स घटनाएँ सामने आयी हैं। इन घटनाओं से न सिर्फ़ मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे देश को शर्मिंदा होना पड़ा।

मध्य प्रदेश के सीधी ज़िले में भाजपा के स्थानीय विधायक के कथित विधायक प्रतिनिधि प्रवेश शुक्ला द्वारा एक आदिवासी युवक पर पेशाब करने का घिनौना कृत्य न सिर्फ़ देश को शर्मसार किया, बल्कि लोगों को आक्रोश से भर दिया। पेशाब करने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने एवं लोगों के आक्रोश से दबाव में आकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पीडि़त आदिवासी का पैर धोकर प्रदेश वासियों से वादा किया कि मेरे मुख्यमंत्री रहते अब आदिवासियों-दलितों पर अत्याचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आदिवासियों का उत्पीडऩ करने वालों की ख़ैर नहीं। लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ये घोषणाएँ हवा-हवाई ही साबित हुई हैं।

शिवराज सिंह चौहान के घोषणा के अगले ही दिन 7 जुलाई की रात को ग्वालियर ज़िले के भितरवार विधानसभा अंतर्गत ग्राम गोहिंदा में एक आदिवासी परिवार की पाँच बीघा ज़मीन हथियाने के इरादे से गाँव के ही दबंग नानू तिवारी और उसके चार साथियों ने सर्वे क्रमांक 1153/1 की भूमि पर बनी लक्ष्मण आदिवासी और बनवारी आदिवासी की झोंपड़ी जला दी। फिर लक्ष्मण आदिवासी, बनवारी आदिवासी और उनके परिजनों के साथ मारपीट कर उन्हें जूते-चप्पलों की माला पहनायी। बताया जा रहा है कि दबंगों द्वारा आदिवासियों की इस पाँच बीघा ज़मीन को हड़पने के इरादे से अनुसूचित जनजाति के इस परिवार को काफ़ी दिन से प्रताडि़त किया जा रहा था।

वहीं 7 जुलाई, 2023 की रात को ही इंदौर के राऊ क्षेत्र में दो नाबालिग़ आदिवासी लडक़ों को बाँधकर रात भर पीटने का एक वीडियो सामने आया। जानकारी के मुताबिक, धार ज़िले के नालछा के रहने वाले दोनों पीडि़त आदिवासी लडक़े 7 जुलाई, 2023 की रात बाइक से जा रहे थे, तभी सडक़ पर उनकी बाइक फिसलने से दोनों गिर गये। पीछे से आ रहे सुमित चौधरी नामक युवक जो नशे में धुत्त था, दोनों आदिवासी लडक़ों को गाली देने लगा। दोनों भाइयों ने जब उसके गाली देने का विरोध किया तो आरोपी युवक सुमित चौधरी अपने साथियों को बुलाकर दोनों भाइयों को किडनैप कर राऊ क्षेत्र में एक जगह ले गया। वहाँ दोनों भाइयों को रात भर बंधक बनाकर बेरहमी से पीटता रहा और जातिसूचक गालियाँ भी दी। हालाँकि उपरोक्त दोनों मामलों में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज कर लिया गया है।

दोनों घटनाओं के बाद जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन के राष्ट्रीय संरक्षक एवं मध्य प्रदेश के मनावर से विधायक डॉ. हिरालाल अलावा ने मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार पर आदिवासियों को न्याय देने में असफल होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा- ‘इंदौर के राऊ में दो आदिवासी युवकों को रात भर बर्बरतापूर्वक बेरहमी से पीटने एवं ग्वालियर के भितरवार अंतर्गत ग्राम गोहिंदा में आदिवासी परिवार को जूते-चप्पल की माला पहनाकर अपमानित करने का मामला सामने आया है। आज मध्य प्रदेश राज्य आदिवासियों के प्रति अत्याचार में नंबर एक पर है। प्रदेश में आदिवासियों पर होने वाले पिछले अधिकतर अत्याचार न सिर्फ़ वीभत्स हैं, बल्कि पुरातन परम्पराओं में दी जाने वाली यातनाओं से प्रेरित लगते हैं। वहीं नेमावर कांड, कन्हैया भील, बिस्टान आदि मामले में शासन आज तक पीडि़तों को उचित न्याय नहीं दिला सका। वर्तमान राज्य सरकार आदिवासियों को न्याय देने में असफल साबित हुई है और आदिवासी समाज का सरकार के प्रति विश्वास खो गया है।’

मध्य प्रदेश के ही रीवा और रायसेन ज़िलों में भी आदिवासियों पर जानलेवा हमले और हत्या की घटनाएँ भी सामने आयी हैं। 16 जुलाई, 2023 को रीवा ज़िले के जवा थाना अंतर्गत नीवा ग्राम पंचायत के आदिवासी सरपंच अमरजीत कोल पर धीरू पाण्डेय पुत्र श्रीनिवास पाण्डेय निवासी चरपनिहन पूर्वा, प्रिंस मिश्रा निवासी बरुहा ने कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ हमला कर, उन्हें अधमरा कर दिया। पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज की गयी है; लेकिन आरोपी फ़रार बताये जा रहे हैं। वहीं रायसेन ज़िले बमोरी थाना अंतर्गत ग्राम पड़रिया ख़ुर्द में 21 जुलाई, 2023 को एक नाबालिग़ आदिवासी युवक की गोली मारकर हत्या करने का मामला प्रकाश में आया है। हत्यारे का पता नहीं चल सका है, पुलिस छानबीन कर रही है। ऐसे ही कई और मामले हैं, जिनमें पुलिस के हाथ ख़ाली हैं।

मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले में मानवता को शर्मसार करने वाली एक और घटना 21 जुलाई, 2023 को सामने आयी, जहाँ एक दलित युवक के चेहरे और शरीर पर मानव मल पोत दिया गया। घटना महाराजपुर थाना अंतर्गत ग्राम डिकौरा का है। गाँव के सडक़ निर्माण में मज़दूरी कर रहे देशराज अहिरवार ने सीमेंट की धूल उडऩे के बात पर मज़ाक़-मज़ाक़ में गाँव के ही रामकृपाल पटेल के हाथ में थोड़ी गिरीश लगा दी। इससे नाराज़ होकर रामकृपाल पटेल ने देशराज अहिरवार के साथ न सिर्फ़ मारपीट की, बल्कि उनके चेहरे और शरीर पर मानव मल फेंक दिया। देशराज अहिरवार ने गाँव के लोगों को जब इस घटना के बारे में बताया, तो ग्राम सभा बुलाकर उलटा देशराज अहिरवार से ही 600 रुपये का ज़ुर्माना वसूला गया।

इस घटना के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ट्विटर पर लिखा कि ‘प्रदेश के छतरपुर में एक दलित व्यक्ति के ऊपर मल लगा देने की घटना अत्यंत घृणित है। ऐसी घटनाएँ सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। ऐसे कृत्यों से मध्य प्रदेश का नाम कलंकित होता है। इसके पूर्व सीधी में आदिवासी समुदाय के व्यक्ति पर पेशाब करने की घटना से भी प्रदेश को शर्मसार होना पड़ा था। मध्य प्रदेश में भाजपा के 18 साल के कुशासन में दलित और आदिवासियों पर अत्याचार चरम पर है। समय आ गया है, जब दलित और आदिवासियों के प्रति घृणित मानसिकता रखने वाली सोच को ख़त्म किया जाए और मध्य प्रदेश में दलित और आदिवासियों को उनका संवैधानिक सम्मान दिलाया जाए।’

कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ट्विटर पर लिखा- ‘मध्य प्रदेश में एक महीने में ही दलित-आदिवासी अत्याचार की दूसरी बेहद निंदनीय व पीड़ादायक वारदात हुई है, जो मानवता को शर्मसार कर देने वाली है। एनसीआरबी रिपोर्ट (2021) के मुताबिक, भाजपा शासित मध्य प्रदेश में दलितों के ख़िलाफ़ अपराधों का रेट सबसे ज़्यादा है। आदिवासियों के ख़िलाफ़ सबसे अधिक अपराध हुए है, हर दिन सात से ज़्यादा अपराध हुए। मध्य प्रदेश के हमारे दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के नागरिक दशकों से भाजपाई कुशासन में अपमान का घूँट पी रहे हैं। भाजपा का सबका साथ, सबका विकास केवल विज्ञापनों में सिमटकर, एक दिखावटी नारा और पीआर स्टंट बनकर रह गया है। भाजपा, हर दिन बाबा साहेब आंबेडकर जी के सामाजिक न्याय के सपने को चूर-चूर कर रही है। हम माँग करते हैं कि छतरपुर ज़िले की इस घटना पर कठोर-से-कठोर कार्रवाई हो!’

जयस संगठन के प्रदेश अध्यक्ष इंद्रपाल मरकाम ने कहा कि ‘मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हर भाषण में आदिवासी हितैषी होने और आदिवासियों की बात करते हैं, परन्तु आज तक उनके शासन आदिवासियों का शोषण और अत्याचार रुका नहीं। यह सरकार की नाकामी है। आज भी आदिवासियों के साथ अन्याय-अत्याचार में मध्य प्रदेश नंबर-वन पर है, यह हमारे लिए अफ़सोस की बात है। आदिवासियों के हित का पैसा राजनीतिक फ़ायदे के लिए रैलियों में ख़र्च किया जा रहा है, जबकि आदिवासियों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।’

ज्ञात हो कि मध्य प्रदेश एवं मणिपुर सहित देश भर में आदिवासियों पर हो रहे बर्बर अत्याचारों के विरोध में मध्य प्रदेश के अनेक आदिवासी संगठनों ने ऐलान किया है कि आगामी 9 अगस्त ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के मौके पर आदिवासी समाज द्वारा कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं किया जाएगा; बल्कि आदिवासियों के साथ बर्बर अत्याचार, हत्या, शोषण, बलात्कार इत्यादि घटनाओं के मद्देनज़र आदिवासियों के संरक्षण और अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रदेश और ज़िला स्तर रैली निकालकर राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया जाएगा।

सरहद पार प्यार और शादी

बुजुर्ग लोगों से हमेशा सुनने को मिलता है, शादी भगवान के हाथ में होती है। भगवान रिश्ता बनाकर भेजते हैं। किससे शादी होगी? भगवान पहले से तय कर देते हैं। हालाँकि भगवान तय करते हैं या नहीं, इसका प्रमाण तो नहीं है; लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया शादी कराने में अहम भूमिका निभा रहा है। देश में दूर-दराज़ से ही नहीं, विदेशों से भी रिश्ते जुड़ रहे।

सात समंदर पार कर विदेशी लड़कियाँ भारत के शहरों और छोटे-छोटे गाँवों तक में शादी के लिए आ रही हैं। देश के कई राज्यों के युवकों से विदेशी लड़कियों के शादी करने की ख़बरें सामने आती रहती हैं। आख़िर यह प्रचलन क्यों बढ़ रहा है? क्या कारण है कि विदेशी लड़कियों को भारतीय लडक़े भा रहे हैं? क्या देश में विदेशी लडक़ी से शादी के लिए नियम-क़ानून का पालन हो रहा है? क्या उन्हें सामाजिक मान्यता मिल रही है? ऐसे ही कई सवाल सरहद पार की लड़कियों से शादी को लेकर लोगों के ज़ेहन में उठते हैं।

विदेशी लड़कियों का भारतीय प्रेम

भारत, यहाँ की संस्कृति और भारतीय लडक़ों से विदेशी लड़कियों का प्रेम कोई नया नहीं है। जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत थी, तब भी वहाँ की लड़कियों को भारत, भारतीय संस्कृति और भारतीय लडक़ों ने आकर्षित किया था। अब भी विदेशी लड़कियों को यही चीज़ें आकर्षित कर रही हैं। विदेशी लड़कियों से भारतीय लडक़ों की कुछ शादियाँ तो सुर्ख़ियों में आती हैं। मीडिया तक इनकी ख़बर पहुँच जाती है, तो कुछ शादियों की जानकारी तक नहीं मिलती। राजस्थान के भरतपुर में एक युवक ने फ्रांस की राजधानी पेरिस की युवती से भारतीय रीति-रिवाज़ से शादी की। दूल्हा-दुल्हन ने सात फेरे लेकर साथ जीने-मरने की क़समें खायीं। आगरा के नगला गाढ़ी गाँव के रहने वाले पालेंद्र को इंग्लैंड की रहने वाली हैना हाबिट अपना दिल दे बैठी। प्रेम परवान चढ़ा। हैनी आगरा पहुँची और पालेंद्र से शादी कर ली। इसी तरह की शादियों के देश में कई राज्यों के बहुत से मामले हैं।

झारखण्ड आयी विदेशी महिला

देश में इन दिनों सीमा हैदर की चर्चा ख़ूब हो रही है। वह पाकिस्तान की रहने वाली है। पाकिस्तान से नोएडा पहुँची सीमा हैदर के बारे में तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं। पुलिस और उत्तर प्रदेश एटीएस की सीमा हैदर के बारे में जाँच जारी है। सीमा हैदर उसके पति सभी से पूछताछ की गयी है। इस मामले के ख़ुलासे के बाद झारखण्ड का एक मामला प्रकाश में आया। जब पुलिस मामले की तफ़्तीश के लिए पहुँची, तब मीडिया को विदेशी महिला के हज़ारीबाग़ पहुँचने की भनक लगी।

हालाँकि यह मामला सीमा हैदर से अलग है। महिला का नाम बरबरा पोलाक है और वह अपनी छ: वर्षीय बेटी आनिया पोलजा के साथ बाक़ायदा टूरिस्ट वीजा पर आयी है। अब वह यहाँ शादी करेगी। पोलैंड की रहने वाली 49 वर्षीय बरबरा पोलाक को झारखण्ड के हज़ारीबाग़ ज़िला स्थित खुटका गाँव के 35 वर्षीय शादाब मल्लिक से प्यार हुआ है। पुलिस ने मामले की छानबीन की, तो बरबरा के पास सारे वैध काग़ज़ात थे। उसके पास पाँच साल तक के लिए वैध टूरिस्ट वीजा है। शादाब और बरबरा दोनों जल्द ही शादी करेंगे। बरबरा यहाँ रहेगी या शादाब को लेकर पोलैंड ले जाएगी? इस पर अभी वह विचार कर रही है। हालाँकि उसकी शादाब को लेकर पौलेंड जाने की इच्छा है। बरबरा पोलाक पोलैंड में नौकरी करती है। घर-गाड़ी समेत सारी सुख-सुविधाएँ उसके पास हैं।

सोशल मीडिया बन रहा ज़रिया

पहले विदेशी लड़कियों से शादी का मामला बहुत ही कम होता था। फ़िल्म स्टार, राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी या किसी नेता द्वारा ‘विदेशी मेम’ लाने की ख़बर सुर्ख़ियों में रहती थी। या फिर जब भारत से बाहर युवा पढऩे के लिए जाते, तो विदेशी लडक़ी से प्रेम होता और शादी कर लेते थे। लेकिन इन मामलों की छिटपुट ख़बरें सामाजिक स्तर पर मिलती थीं। इनकी संख्या उँगलियों पर थी। विदेशी लडक़ी से शादी करने का सटीक आँकड़ा शायद ही उपलब्ध हो। क्योंकि देश में शादी का पंजीकरण अब भी कम होता है। हालाँकि विभिन्न रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि हर वर्ष देश में विदेशी लड़कियों से शादी के 40-50 मामले सामने आ रहे हैं। इस तरह के मामले शहर ही नहीं गाँव तक पहुँच रहे। इसकी मुख्य वजह सोशल मीडिया है।

विदेशी लड़कियों से शादी के मामलों पर $गौर किया जाए, तो 95 फ़ीसदी मामले सोशल मीडिया पर दोस्ती के ही निकलेंगे। कुछ ही मामलों में व्यक्तिगत मुलाक़ात, साथ पढऩे या साथ काम करने से प्रेम परवान चढ़ा होता है। झारखण्ड पहुँची पोलैंड की बरबरा पोलाक की शादाब के साथ इंस्टाग्राम पर 2021 में दोस्ती हुई। यह दोस्ती प्रेम में बदल गयी। सादाब ने भारत आने का न्योता दिया। बरबरा पोलाक 14 जुलाई को हज़ारीबाग़ पहुँची। इसी तरह पाकिस्तान से नोएडा पहुँची सीमा हैदर हो या न्यूयॉर्क से मुरादाबाद पहुँची सोनिया हो, इन सभी का भारतीय युवाओं से प्यार और फिर शादी का माध्यम सोशल मीडिया ही बना।

रास आ रहीं भारतीय परम्पराएँ

सात समंदर पार कर भारतीय लडक़ों से शादी करने किसी लडक़ी का भारत के दूरदराज़ गाँव तक पहुँचना एकबारगी आश्चर्य में तो डालता ही है। आख़िर क्या वजह है कि विदेशी लड़कियों को भारतीय लडक़े भा रहे हैं। इस सम्बन्ध आयी विभिन्न रिपोट्र्स और भारत पहुँची विदेशी लड़कियों से बातचीत पर जानकारी मिलती है कि यहाँ की परम्पराएँ उन्हें रास आती हैं। इसके अलावा भारतीय लडक़े अपने परिवार के प्रति बहुत ज़िम्मेदार होते हैं, इसलिए वे अपनी पत्नी और बच्चों को परेशानी में नहीं पडऩे देते। माता-पिता का भी ख़याल रखते हैं। अपने परिवार के सदस्यों के हर सुख-दु:ख में एक साथ खड़े होते हैं। इनके केयरिंग नेचर के कारण इनका दांपत्य जीवन ख़ुशहाल और सफल होता है। इनका जीवनसाथी के साथ सम्बन्ध काफ़ी मज़बूत होता है। भारतीय लडक़े अपने पार्टनर के प्रति काफ़ी व$फादार होते हैं। ऐसे में वे जिस किसी से भी जुड़ते हैं, उसकी पूरी ईमानदारी से इसे निभाते हैं। यह धारणा विदेश की ज़्यादातर लड़कियों में है। इन बातों की पुष्टि पोलैंड से हज़ारीबाग़ पहुँची बरबरा पोलाक भी करती हैं।

पंजीकरण में दिक़्क़त

भारतीय क़ानून में ऐसा कोई अनुच्छेद नहीं है, जिससे किसी भारतीय पुरुष या महिला के विदेशी से शादी करने पर रोक लगायी जा सके। भारतीय क़ानून के मुताबिक, भारत के किसी व्‍यक्ति का किसी भी विदेशी से शादी करना ग़ैर-क़ानूनी नहीं है। उनके विवाह में जाति, धर्म, क्षेत्र और यहाँ तक कि देश की सीमाएँ भी बाधा नहीं बन सकती हैं। केवल विदेशी लडक़ी या लडक़े से शादी करने के लिए कुछ क़ानूनी प्रक्रियाएँ अपनाना ज़रूरी है। देश में शादी पर हुए विभिन्न अध्ययनों और प्राप्त आँकड़ों के अनुसार केवल पाँच फ़ीसदी भारतीय अंतरजातीय विवाह होते हैं।

इनमें विदेशी लड़कियों से शादी करने वालों की तादाद का प्रतिशत और भी कम है। इसके बावजूद भी विदेशी लडक़ी से शादी के क़ानूनी प्रक्रियाएँ कम ही लोग अपनाते हैं। पाकिस्तान की सीमा हैदर जिस तरह से नोएडा पहुँची, इसका ख़ुलासा हो चुका है। जब मामला खुला तो उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अभी यह साफ़ नहीं हो सका है कि वह एक सामान्य महिला है या जासूस। इसी तरह कुछ साल पहले सेना के एक मेजर ने कनाडा की लडक़ी से शादी कर परेशानी मोल ले लिया था। उन्होंने सेना से शादी की इजाज़त नहीं ली थी। जब उन्होंने कनाडा जाने के लिए छुट्टी माँगी तो मामला खुला।

ये मामले दिखाते हैं कि विदेशी लडक़ी से शादी में क़ानूनी प्रक्रियाएँ अपनाने में लोग कम ही दिलचस्पी रखते हैं। जबकि भारत में शादी को लेकर हिन्दू मैरिज लॉ, मुस्लिम मैरिज लॉ, ईसाई मैरिज लॉ आदि हैं। विदेशी लडक़ी से शादी को विशेष विवाह अधिनियम-1954 के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इसके लिए नियम बने हैं। पंजीकरण करना ज़रूरी है।

बदलते भारत में परम्परा क़ायम

भारत में प्रेम और अंतरजातीय विवाह आज भी विवाद का विषय है। विभिन्न अध्ययनों में देखा गया है कि कई समाज आज भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को सँभाल रहे हैं। अगर अध्ययनों का निष्कर्ष निकाला जाए, तो वैवाहिक सम्बन्धों का आधार जाति है। परम्परागत रूप में जाति से बाहर की जाने वाली शादी को अब तक सामाजिक स्वीकृति मिलने में मुश्किल होती है। यही कारण है कि ऑनर किलिंग अर्थात् अपने सम्मान की ख़ातिर हत्याओं का दौर आज भी देश-भर में जारी है। हालाँकि धीरे-धीरे प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ रहा है।

कुछ ख़ास जाति, समाज, वर्ग को छोड़ दें, तो सामाजिक और पारिवारिक मान्यता भी मिल रही है; लेकिन इसकी तादाद अभी भी बहुत कम है। इस बात को विदेशों में भी माना जाता है। पिछले दिनों ‘वाशिंगटन पोस्ट’ में भारतीय संस्कृति, परम्परा और शादी पर एक लेख देखने को मिला था। इस लेख में भी लिखा गया था कि 75 साल में भारत बहुत बदल गया है; लेकिन अरेंज मैरिज आज भी आदर्श बनी हुई है। यही कारण है कि इतने बदलाव के बाद भी ‘विदेशी मेम’ लाने का मामला थोड़ा बढ़ा है; लेकिन अभी तक होड़ नहीं मची है।

ख़तरे में मांसाहारी जानवर

बिग बिल्ली कैटेगरी के जीवों की रक्षा की पहल के बीच मांसाहारी जानवरों की मौतों में बढ़ोतरी हो रही है। हाल ही में गुज़रात के अमरेली ज़िले में पीपावाव पोर्ट के निकट उचैया गाँव में मालगाड़ी की चपेट में आने से एक एशियाई शेर की मौत हो गयी, जबकि एक शेर बुरी तरह घायल हो गया। दोनों की उम्र तीन वर्ष बतायी गयी है। यह घटना तडक़े तब घटी जब चार शेर, जिसमें दो शेर और दो शेरनी थीं, शेत्रुजी वन्य जीव डिवीजन के राजुला रेंज से चार किलोमीटर दूर उत्तर की ओर बंदरगाह के पास रेलवे ट्रैक से गुज़र रहे थे। इसी दौरान अचानक मालगाड़ी आ गयी, जिसकी चपेट में दो शेर आ गये। घायल शेर का इलाज जूनागढ़ के शक्करबाग़ चिडिय़ाघर में चल रहा है। वन अधिकारियों के मुताबिक, बारिश की वजह से मौसम में धुँधलापन था। लोको पायलट में शेरों को ट्रैक पार करते देख इमरजेंसी ब्रेक लगाये; लेकिन फिर शेर इसकी चपेट में आ गये।

बता दें कि गिर शेर जूनागढ़, अमरेली, गिर सोमनाथ और भावनगर ज़िले के संरक्षित इलाक़े दुनिया में एशियाई शेरों के एकमात्र शरणगाह माने जाते हैं। राजुला के तटीय इलाक़े भी शेरों के मुफ़ीद माने जाते हैं, जहाँ कई शेर रहते हैं। यहीं से पीपावाव पोर्ट के इलाक़े में शेर आते-जाते रहते हैं, जहाँ जाने के दौरान दो शेर मालगाड़ी की चपेट में आ गये। रिपोट्र्स की मानें, तो पिछले पाँच दशकों में क़रीब डेढ़ दर्ज़न शेर मालगाडिय़ों की चपेट में आ चुके हैं। एक शेर की मौत पर नथवाणी राज्यसभा सांसद और गिर के शेरों के संरक्षण के लिए काम करने वाले परिमल नथवाणी कहते हैं कि बिपरजॉय के चलते इस कॉरिडोर के ट्रैक के पास का नेट सम्पर्क की समस्या है। यहाँ शेर और दूसरे जंगली जानवर अक्सर घूमते रहते हैं। इस इलाक़े में मालगाडिय़ों की गति को कंट्रोल में रखने की सख़्त ज़रूरत है। हमें दु:ख है कि मूल्यवान शेर गँवा रहे हैं। सरकार व रेल प्रशासन प्रयास कर रही है; लेकिन इसमें और भी काम करने की ज़रूरत है।

पिछले साल प्रधानमंत्री ने नामीबिया से 8 चीते लाकर मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के जंगल में उनके पुनर्वास की कोशिश की; लेकिन उनमें भी कुछ चीतों की मौत हो गई। लेकिन इस दौरान शेर, तेंदुआ, बाघ जैसे मांसाहारी जंगली जीवों के कम होने की चिन्ता भी सरकार को करनी चाहिए। भारत में इन बिग कैट प्रजातियों में एशियाई शेर, रॉयल बंगाल टाइगर, इंडियन लेपर्ड, क्लाउडेड लेपर्ड और स्नो लेपर्ड को रखा गया है।

जंगल के राजा शेर की कहानी किसने नहीं सुनी होगी। लेकिन आपको दु:ख होगा कि जंगल के राजा शेरों की संख्या लगातार घट रही है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में शेरों को लुप्तप्राय वन्य जीवों में वर्गीकृत किया गया है। एशियाई शेरों का जहाँ तक सवाल है, तो ये सिर्फ़ भारत में पाये जाते हैं।

पूरी दुनिया में दुर्लभ यह प्रजाति भारत में पायी जाने वाली पाँच बड़ी बिल्लियों की प्रजाति में से एक मानी जाती है। सन् 2021 की रिपोट्र्स के मुताबिक, शेरों की संख्या घटकर क़रीब 20,000 रह गयी है। पिछले तीन-चार दशक में क़रीब 10,000 शेर कम हुए हैं। दुनिया में इतनी तेज़ी से घटती शेरों की संख्या चिन्ताजनक है। रिपोट्र्स के मुताबिक, भारत में फिर भी शेर संरक्षित हैं और इनकी संख्या में बढ़ोतरी भी हुई है; लेकिन दुनिया के कई देशों में शेर लुप्त होने के कगार पर हैं। पिछले साल की रिपोट्र्स के मुताबिक, भारत में एशियाई शेरों की संख्या क़रीब 674 हो गयी थी।

10 अगस्त को विश्व शेर दिवस है। लेकिन शेरों की संख्या लगातार घट रही है। इसलिए इन्हें बचाने के लिए प्रयास किये जाने चाहिए। पिछली बार शेरों की भारत में बढ़ोतरी पर प्रधानमंत्री मोदी ने ख़ुशी जताते हुए ट्वीट किया था कि ‘विश्व शेर दिवस पर मैं उन सभी की सराहना करता हूँ, जो राजसी शेरों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। भारत हमेशा भव्य एशियाई शेर के लिए एक जीवंत घर रहेगा।’

शेरों की संख्या बढऩे पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी देशवासियों की इसकी शुभकामनाएँ दी थीं और शेरों का संरक्षण करने वालों की सराहना की थी। पूर्व राष्ट्रपति ने कामना की थी कि शेरों की दहाड़ भारत के जंगलों में गूँजती रहे।

रिपोट्र्स के मुताबिक, काफ़ी कोशिशों की वजह से ही शेरों की संख्या 180 से बढक़र 674 हुई थी; लेकिन अब इसमें कमी चिन्ता का विषय है। अफ्रीका महाद्वीप में सन् 1950 में 1,00,000 शेर थे, जो अब घटकर 20,000 रह गये हैं। शिकार और जंगलों के कटान के चलते पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर शेरों की आबादी 40 प्रतिशत घटी है। भारत में साल 1974 में 180 शेर थे, जो साल 2010 में 400 हो गये थे। दूसरी बिग कैट प्रजाति में से एक बाघ (टाइगर) की भी प्रजाति ख़तरे में है। भारत में पायी जाने वाली ये प्रजाति लम्बे समय से सुरक्षा जोन में है। भारत के रॉयल बंगाल टाइगर की दुनिया भर में एक ख़ास पहचान है। हालाँकि पूरी दुनिया के 75 प्रतिशत बाघ भारत में पाये जाते हैं। लेकिन 2018-19 की बाघ जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सिर्फ़ 2,967 बाघ हैं, जो कि पिछले छ: दशक की अपेक्षा 60 प्रतिशत से भी कम हैं।

रिपोट्र्स के मुताबिक, 19वीं सदी की शुरुआत में बाघों की संख्या पूरी दुनिया में 10,000 से ज़्यादा थी, जो कि अब 4,000 से भी कम है। सन् 2021 में सरकार ने ख़ुद राज्यसभा में कहा कि सन् 2021 में भारत में 127 बाघों की मौत हुई थी। इसके अलावा सन् 2020 में 106 और सन् 2019 में 96 बाघों की मौत हुई थी। इन रिपोट्र्स के मुताबिक, बाघों की सबसे ज़्यादा मौतें मध्य प्रदेश में हुईं। पिछले साल मध्य प्रदेश में हुईं, उसके बाद कर्नाटक और उसके बाद क्रमश: महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा बाघ मरे। बता दें कि भारत में सन् 1970 से बाघों के शिकार पर पूरी तरह से रोक लगा दी गयी थी। इसके बाद भी बाघों का शिकार पूरी तरह रुका नहीं। इससे तंग सरकार ने सन् 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत बाघों की सुरक्षा के लिए की। इसके बाद से बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई और अब बाघों की मौज़ूदा जनसंख्या के सरक्षण के अलावा इनकी संख्या बढ़ाने की चिन्ता है।

बाघों की तुलना में भारत में शेरों की और दूसरे मांसाहारी जंगली जानवरों की स्थिति बेहतर है। अगर भारत में तेंदुओं की बात करें, तो इनकी संख्या सबसे ज़्यादा है। रिपोट्र्स के मुताबिक, भारत में सन् 2018 में तेंदुओं की संख्या 12,852 थी, जबकि सन् 2014 में भारत में क़रीब 8,000 तेंदुए थे। यानी चार वर्षों में तेंदुओं की संख्या में 60 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ोतरी हुई। तेंदुओं की संख्या की बात करें, तो भारत के मध्य प्रदेश में सबसे ज़्यादा 3,421 तेंदुए हैं। इसके अलावा कर्नाटक में 1,783, महाराष्ट्र में 1,690 तेंदुए हैं। यानी मध्य भारत और पूर्वी घाटों में सबसे ज़्यादा 8,071 तेंदुए पाये जाते हैं। वहीं पश्चिमी घाट यानी कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा और केरल में 3,387 तेंदुए हैं। जबकि शिवालिक एवं गंगा के मैदानी इलाक़ों यानी उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश और बिहार में 1,253 तेंदुए और पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाक़ों में सिर्फ़ 141 तेंदुए हैं। तेंदुओं की भरपूर जनसंख्या के बीच ब्लैक पैंथर्स यानी काले तेंदुओं की संख्या चिन्ताजनक है। कुछ महीने पहले मध्य प्रदेश के पेंच टाइगर रिजर्व में भी दुर्लभ काला तेंदुआ नज़र आया था। इस तेंदुए को देखना अब बहुत दुर्लभ है।

हालाँकि रिपोट्र्स के मुताबिक, काले तेंदुए समुद्र तट से 2,700 मीटर से ज़्यादा की ऊँचाई वाले हिमालय और ट्रांस हिमालय इलाक़ों में पाये जाते हैं। काले तेंदुओं का शिकार बहुत जल्दी होता है, क्योंकि ये दुर्लभ हैं। इसलिए काले तेंदुओं का शिकार रोकना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। कई वर्षों से लगातार होते अवैध शिकार के चलते काले तेंदुओं की संख्या में तेज़ी से कमी आयी है। जंगली मांसाहारी जानवरों में काला तेंदुआ सबसे दुर्लभ हो चुका है, उसके बाद बाघों की कम संख्या भी चिन्ताजनक है।

काले तेंदुओं की खाल पर बादल की तरह पैटर्न बने होने के कारण इसका नाम क्लाउडेड लेपर्ड रखा गया है। वहीं इनकी घटती संख्या के चलते इन्हें इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट में लुप्तप्राय जीव के रूप में रखा गया है। क्लाउडेड लेपर्ड यानी ब्लैक पैंथर की इस दुर्लभ प्रजाति को केवल सिक्कम, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा राज्यों में पहाड़ी वर्षा वनों में कभी-कभी देखा जाता है। यह मेघालय का राजकीय पशु है। मिजोरम के दम्पा बाघ अभयारण्य को क्लाउडेड लेपर्ड के अध्ययन और संरक्षण स्थल के रूप में चुना गया है। इसलिए इस दम्पा टाइगर रिजर्व में ब्लैक पैंथर्स की संख्या सबसे ज़्यादा है।

सरकार को चाहिए कि देश में घटते मांसाहारी जीवों की सुरक्षा के लिए अभी और सार्थक प्रयास करे, ताकि इन्हें बचाया जा सके। आज दिखावे से ज़्यादा ज़रूरत ज़मीनी स्तर पर इन जीवों के संरक्षण की है। वन विभाग और सम्बन्धित मंत्रालय को भी इस दिशा में ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है।

लालची ठेकेदार

अक्सर कहा जाता है कि बिना लालच के कोई किसी का नहीं होता। यह सच भी है। माता-पिता भी बच्चे पैदा करते हैं, उनकी परवरिश करते हैं; तो उसके पीछे उनका यह लालच होता है कि बच्चे बड़े होकर उन्हें रोटी देंगे; उनकी सेवा करेंगे। आजकल बिना लालच के कोई ईश्वर का भी नहीं होता, तो किसी और का कैसे हो सकता है। कम-से-कम संसार में तो नहीं होता। इसका अर्थ यही हुआ कि चाहे वह कितना भी महान् क्यों न हो, किसी-न-किसी प्रकार के लालच में फँसा हुआ है।

आजकल धर्मों में भी यही तो हो रहा है। धर्मों का एक भी ठेकेदार यानी धर्मों के तथाकथित धर्माचार्य बिना लालच के न तो धर्म के किसी स्थल पर समय देते हैं और न ही लोगों की अगुवाई करते हैं। लोगों को नि:स्वार्थ भाव से ईश्वर की सेवा का उपदेश देते-देते उनका अपना नि:स्वार्थ भाव ख़त्म हो जाता है। धर्म के वाहक बने हुए हैं; लेकिन उनका मन एक आम अज्ञानी की तरह गृहस्थी में रमा हुआ है। न केवल गृहस्थी में रमा हुआ है, बल्कि हवस भी मन में कूट-कूटकर भरी हुई है। कई तो बिलकुल ही लम्पट हो चुके हैं। ऐश-ओ-आराम की ज़िन्दगी के लिए दिन-रात दोनों हाथों से धन बटोरने में लगे हुए हैं। अर्थात् उनके अन्दर लालच जगा हुआ है। वे एक सन्त या फ़क़ीर की तरह केवल दो रोटी और दो जोड़ कपड़ों और किसी टूटी-फूटी झोंपड़ी के सहारे जीवन नहीं काटना चाहते। उनमें इस तरह का जीवन जीने का हौसला नहीं रहता। वे बेसब्र हो जाते हैं। सब्र नाम का शब्द वे अपने जीवन के शब्दकोष से मिटा देते हैं। इतनी फ़क़ीरी में वे जीवन काटना ही नहीं चाहते। उनकी सोच में यह भाव भर जाता है कि अगर फ़क़ीरी में ही जीवन जीना पड़े, तो फिर ईश्वर की क्या ज़रूरत? वे क्यों ईश्वर की सेवा करें? क्यों लोगों को धर्म का उपदेश दें? अगर वे ख़ुद को ईश्वर के निकट दिखाने के लिए रेशमी कपड़े भी नहीं पहन पाये, मेवा-मिष्ठान भी नहीं खा सके, ठाट-बाट से नहीं रह सके, तो फिर फ़ायदा क्या? आख़िर अपने इस ठाट-बाट को जायज़ ठहराने के लिए ही तो उन्होंने ईश्वर को सबसे सुखी और आनन्दित दर्शाया है। आज इन तथाकथित धर्माचार्यों की स्थिति यह है कि ये अपने-अपने धर्मों को धन्धे की तरह इस्तेमाल करके उनसे जमकर पैसे कमा रहे हैं। हर तथाकथित धर्माचार्य ने अपने धर्म के किसी-न-किसी अड्डे पर धन कमाने के लिए क़ब्ज़ा कर रखा है।

आज दुनिया में जितने भी धार्मिक स्थल बने हुए हैं, सब चन्द लोगों की कमायी का ज़रिया बने हुए हैं। कोई सरकार भी किसी भी पाखण्डी धर्मगुरु का विरोध करने का साहस नहीं कर पाती। नेता और धार्मिक नेता सत्ता के लालच में, धन के लालच में धर्मों में होने वाली फूहड़ता, पाखण्ड और कुरीतियों पर नहीं बोलते; उलटा उन्हें बढ़ावा देते हैं। बढ़ावा क्यों न दें? इसमें ही उनके ऐश-ओ-आराम निहित हैं। कुकर्म करने के बाद भी उनकी सुरक्षा उनका अन्धानुकरण करने वाले इसी वजह से करते हैं। इसके अलावा इससे अच्छा धन्धा कोई और नहीं, जिसमें अनाप-शनाप धन अर्जन से लेकर सत्ता तक पहुँच बड़े सुलभ काम हैं। कोई नहीं पूछता कि इतना धन इकट्ठा क्यों कर लिया? सब और भी धन देते जाते हैं, भले ही तथाकथित धर्माचार्यों के पास कितना भी धन हो। फिर भी सब बिना माँगे धन उनके चरणों में उड़ेते रहते हैं। लेकिन हालात के मारों को कोई नहीं देना चाहता। क्योंकि उनमें धूर्तता नहीं है। वे छल नहीं करना जानते। वे ईश्वर के नाम पर किसी को डराते नहीं। उन्हें अपना ही स्वर्ग-नर्क नज़र नहीं आता। वे ख़ुद ही इन दो कल्पनाओं से डरे हुए हैं। फिर दूसरों को क्या डराएँगे? उन्हें धर्म का हथियार की तरह इस्तेमाल करना भी नहीं आता। सरकारें भी इन तथाकथित धर्माचार्यों के पास जमा अथाह धन पर टैक्स लेने से कतराती हैं। उन्हें पता है कि ये धर्माचार्य भले ही पाखण्डी हों; लेकिन इन्हें छेडऩा, इनके साथ आम आदमी जैसा सुलूक करना महँगा पड़ेगा। इन धर्माचार्यों के पीछे धर्म के मोह में खड़ी भीड़ कुछ भी कर देगी।

कभी तथाकथित धर्माचार्यों के ठाट-बाट देखे हैं? किसी राजे-महाराजे से कम नहीं होते। क्यों ये लोग फ़क़ीरों, सन्तों जैसा जीवन नहीं जीते? क्योंकि वास्तव में ये ख़ुद धर्म से कोसों दूर हैं। इसीलिए आज कोई कबीर, नानक, रैदास, भुल्लेशाह, ओशो, विवेकानन्द, दयानन्द, रामकृष्ण, मीराबाई, सूरदास, रसख़ान, रहीम, बहिणाबाई, बुद्ध, महावीर नहीं होता। क्योंकि आज के तथाकथित धर्माचार्यों ने सांसारिक मोह-माया को नहीं छोड़ा है। ये लोग ईश्वर की उपासना भी लालच के चलते ही करते हैं। लालच के चलते ही अलग-अलग धर्मों को मानने वालों में झगड़ा कराते हैं।

सोचिए, अगर इन तथाकथित धर्माचार्यों को इन सभी ज़रियों से कोई आमदनी न हो, तो क्या ये लोग अपने-अपने धर्म स्थलों में उसी तरह सेवा करेंगे, जिस तरह धन के लालच में करते हैं? कभी नहीं। क्योंकि इससे उनका धन कमाने और पाप छिपाने का उद्देश्य मर जाएगा। फिर लोग ऐसे पाखण्डी धर्म के लालची ठेकेदारों को क्यों ठो रहे हैं?

हरियाणा में भगवा यात्रा के दौरान दो गुटों के बीच हुई पत्थरबाजी

हरियाणा के मेवात में दो गुटों के बीच पथराव हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हवाई फायरिंग भी हुई है।

इलाके से एक भगवा यात्रा निकाली जा रही थी और इसी दौरान दो गुटों में विवाद उत्पन्न हुआ और जमकर पत्थरबाजी भी हुई।

हालांकि हालातों पर काबू पा लिया गया है। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस प्रशासन भी मौजूद है। पुलिस ने बीच-बचाव कर हालातों पर काबू पा लिया। और बताया जा रहा है कि घटना के बाद वहां बड़ी संख्या में बजरंग दल के कार्यकर्ता इकट्ठा हो गए।

महाविकास अघाड़ी गठबंधन तय कर ले तो महाराष्ट्र में बदलाव संभव है : पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार ने एक बड़े राजनीतिक बयान में कहा है कि यदि उनकी पार्टी, कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी), जो महा विकास अघाड़ी गठबंधन का हिस्सा हैं, तय कर लें तो वे महाराष्ट्र में बदलाव ला सकते हैं। पवार ने कहा कि वर्तमान शिंदे सरकार के साथ जुड़ना मुश्किल है।

एक पुस्तक विमोचन समारोह में रविवार को पवार ने यह बात कही। भतीजे अजित पवार के धोखे के बाद यह पहला अवसर था जब पवार ने अघाड़ी नेताओं के साथ मंच साझा किया। इस कार्यक्रम में शिवसेना (यूबीटी) अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और वरिष्ठ कांग्रेस नेता बालासाहेब थोराट शामिल थे।

पवार ने कहा – ‘हमारे लिए वर्तमान राज्य सरकार के साथ जुड़ना मुश्किल है, लेकिन कुछ समाधान निकलेगा। अगर हम तीन (एमवीए घटक) निर्णय लेते हैं, तो बदलाव हो सकता है।’

कार्यक्रम में पवार ने कहा कि यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान, जिसके वे प्रमुख हैं, किताबें प्रकाशित करने वाले समूह, राजवाड़े इतिहास संशोधक मंडल को 50 लाख रुपये देगा। उन्होंने इस मौके पर याद किया कि कैसे पिछली सरकारों ने प्राचीन कला और संस्कृति, साहित्य और इतिहास के संरक्षण में मदद की थी।

मणिपुर घटना की दो पीड़ितों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज होगी सुनवाई

मणिपुर में यौन उत्पीड़न की घटना, जिसने दुनिया भर में नाराजगी पैदा की है, की दो पीड़ित महिलाएं केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय पहुँच गयी हैं। उन्होंने एक याचिका दायर कर सर्वोच्च अदालत से उनके मामले में दखल की मांग की है।

अब सर्वोच्च अदालत में स्वत: संज्ञान (सू मोटो) मामले के साथ सोमवार (आज) मामले की सुनवाई होगी। चार मई को हुई यौन उत्पीड़न की घटना से जुड़ी एफआईआर को लेकर याचिका दायर की गई है। पीड़ितों ने मणिपुर सरकार और केंद्र के खिलाफ याचिका दाखिल की है।

याद रहे सीबीआई ने मणिपुर में चार मई को भीड़ में दो महिलाओं के यौन उत्पीड़न किए जाने संबंधी उस मामले की जांच अपने हाथ में ले ली है, जिसका वीडियो इस महीने की शुरुआत में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। राज्य में दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाए जाने संबंधी इस घटना का वीडियो 19 जुलाई को वायरल हो गया था।

घटना की देशभर में कड़ी आलोचना हो रही है। अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया है। सरकार ने इस मामले को सीबीआई को सौंपने का फैसला किया था, जो मणिपुर में हिंसा संबंधी छह मामलों की जांच पहले ही कर रही है।

राज्य पुलिस ने थौबल जिले के नोंगपोक सेकमाई थाने में 18 मई को अज्ञात हथियारबंद व्यक्तियों के खिलाफ अपहरण, सामूहिक बलात्कार और हत्या का मामला दर्ज किया था। सीबीआई ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मणिपुर पुलिस की दर्ज की गई प्राथमिकी के संबंध में अपनी प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई शुरू कर दी है।