कहा जाता है कि अपना बच्चा सबको प्यारा होता है; लेकिन आजकल की माताएँ अपने ही बच्चों के जीवन से लगातार खिलवाड़ कर रही हैं। दरअसल आजकल की माताएँ अपने नवजात बच्चों को स्तनपान न कराकर डिब्बे वाला दूध पिलाकर पालना चाहती हैं, जिसके चलते वो न सिर्फ अपने आप को, बल्कि बच्चों को भी जाने-अनजाने दर्ज़नों बीमारियों का शिकार बना रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने महिलाओं को इसी सोच को बदलने के लिए स्तनपान कराने पर काफ़ी ज़ोर दिया है। स्तनपान को बढ़ाने के लिए 01 अगस्त से 07 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है। हर साल अगस्त के इस पहले सप्ताह में दुनिया भर की माताओं को उनके शिशुओं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाता है, ताकि माँ और बच्चा दोनों ही सेहतमंद रह सकें।
विश्व स्तनपान सप्ताह यानी वल्र्ड ब्रेस्टफीडिंग वीक (डब्ल्यूबीडब्ल्यू) की शुरुआत सन् 1992 में हुई थी, जबकि स्तनपान को बढ़ावा देने पर विचार सन् 1990 में किया गया था। यह वो दौर था, जब दुनिया की माताओं में अपनी सेहत को लेकर बच्चे कम पैदा करने या किसी किसी में बच्चे पैदा न करने और स्तनों को सुडौल रखने के लिए बच्चों को स्तनपान कराने से बचने की मानसिकता पनप रही थी। विश्व स्तनपान सप्ताह मनाने के पीछे मकसद था कि महिलाओं में अपने और बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैले और वो अपने बच्चों को स्तनपान कराने से कतराएँ नहीं। इस सप्ताह में स्वास्थ्य, स्तनपान विकल्पों के विपणन के अंतरराष्ट्रीय कोड, सामुदायिक समर्थन, पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, शिक्षा और मानवाधिकार सहित अलग-अलग साल में अलग-अलग सालाना थीमें शामिल की गयीं। विश्व स्तनपान सप्ताह 2022 की थीम थी- ‘स्तनपान शिक्षा और सहायता के लिए कदम बढ़ाएँ।’ जबकि इस बार यानी डब्ल्यूबीडब्ल्यू की 2023 की थीम है- ‘स्तनपान को सक्षम बनाना- कामकाजी माता-पिता के लिए एक बदलाव लाना’ सन् 1991 से डब्ल्यूएबीए, डब्ल्यूएचओ और यूएनआईसीईएफ द्वारा विश्व स्तनपान सप्ताह आयोजित किया जाता है।
अ$फसोस की बात है कि इतनी कोशिशों के बावजूद भी माताओं में अपने बच्चों को स्तनपान कराने में अरुचि बढ़ी है। यूनिसेफ की पिछले साल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के कुल शिशुओं में से करीब 60 प्रतिशत शिशुओं को उनकी माताएँ छ: महीने तक जरूरी स्तनपान नहीं कराती हैं। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ माताएँ तो अपने शिशु को पहला स्तनपान तक नहीं कराना चाहतीं। 80 प्रतिशत माताएँ अपने बच्चों को चार से पाँच महीने की अंदर ही ऊपरी दूध, भोजन और दूसरे आहार पर निर्भर बनाने का प्रयास करती हैं। स्तनपान कराने वाली 40 फ़ीसदी माताओं में से 35 फ़ीसदी एक-दो महीने में ही बच्चों के स्तनपान की आदत छुड़ाने की कोशिश करती हैं, जिसके लिए वो उन्हें ऊपरी दूध पिलाने का प्रयास करती हैं। खाने और दूसरे आहार पर निर्भर बना देती हैं। जब बच्चे और बड़े होते हैं, तब उन्हें चाइनीज चीज़ें खिलाने की आदत डाल देती हैं, जो बहुत घातक होती हैं।
यह रिपोर्ट बताती है कि स्तनपान न कराने वाली माताओं में सबसे ज़्यादा संख्या अमीर एवं मिडिल क्लास महिलाओं की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीब माताएँ अपने बच्चों के स्तनपान कराने में आगे हैं। स्तनपान न कराने के रिपोर्ट में कई चौंकाने वाली सोचें बतायी गयी हैं। इनमें पहली सोच है, महिलाओं की यह सोच कि स्तनपान कराने से उनके स्तन ढीले हो जाएँगे। दूसरी सोच है, उनकी सेहत $खराब होगी। तीसरी सोच है, वो चेहरे से जल्द उम्रदराज़ दिखने लगेंगी और चेहरे पर जल्द झाइयाँ उभर आएँगी। चौथी सोच है, उनका शरीर सुडौल नहीं रहेगा। हालाँकि यह सभी धारणाएँ $गलत हैं। स्तनपान न कराने से इसके उलट असर होता है। जहाँ तक सेहत से जुड़ा सवाल है, तो इसके लिए उन्हें पौष्टिक खाने और व्यायाम करने की ज़रूरत होती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और दूसरे स्वास्थ्य संगठनों का मानना है कि स्तनपान बाल अधिकारों में से एक है और हरेक नवजात बच्चे को अच्छे पोषण के लिए स्तनपान का पहला अधिकार है। यह सही भी है और इसके लिए स्तनपान को $कानून के दायरे में अगर लाया जाए, तो सम्भव है कि महिलाएँ अपने शिशुओं को स्तनपान कराने के लिए बाधित हों। लेकिन इससे •यादा ज़रूरी है कि महिलाओं में स्तनपान के लिए जागरूकता फैलायी जाए, जिससे वो स्तनपान कराने के उन $फायदों को समझ सकें, जो उनके और उनके बच्चों को स्तनपान कराने से होते हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने साल 2016 में दुनिया भर से आँकड़े इकट्ठे किये, जिनमें देखा गया कि दुनिया में 410 लाख बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं। पाँच वर्ष से कम उम्र के 1.55 करोड़ बच्चे उम्र के हिसाब से कम विकसित हुए हैं। करीब इतने ही बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। आज दुनिया के 40 फ़ीसदी से ज्यादा छोटे बच्चे कई छोटी-बड़ी बीमारियों की चपेट में हैं। इन सबकी वजह बच्चों को माताओं द्वारा स्तनपान नहीं कराया जाना है। जबकि स्तनपान जन्म के तुरन्त बाद से ही बच्चे को कराना एक माँ का दायित्व होता है। यह बच्चों और माताओं दोनों के लिए सेहतमंद रहता है और भावनात्मक रूप से भी फायदेमंद होता है। स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए आज दुनिया में कई केंद्र खुल चुके हैं। इनमें से एक मलेशिया के पिनांग में वल्र्ड एलायंस फॉर ब्रेस्टफीडिंग एक्शन सेंटर है, जिसके संस्थापक अनवर फजल और चेयरपर्सन फेलिसिटी सैवेज हैं।
सिविल अस्पताल के जच्चा-बच्चा वार्ड की नर्स नूतन कहती हैं कि जन्म से लेकर छ: महीने तक माँ का स्तनपान करने वाला बच्चा सेहतमंद रहता है और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। स्तनपान कराना बच्चे के साथ-साथ माँ के लिए भी बहुत फायदेमंद है। इससे माताओं में ब्रेस्ट कैंसर के चांस कम हो जाते हैं। उनके स्तनों में दर्द नहीं होता है और दूध सूखने से गाँठें नहीं पड़ती हैं। इसी तरह बच्चों में भी क्रोनिक बीमारियों का रिस्क कम रहता है। बच्चों के फेफड़े और दिल कमज़ोर नहीं होते और उनकी पाचन शक्ति भी अच्छी होती है।
जनरल फिजिशियन डॉक्टर मनीष कहते हैं कि बच्चों को उनकी माताओं द्वारा स्तनपान न कराकर डिब्बे वाला दूध पिलाने की वजह से ज्यादातर बच्चों में कम उम्र में ही कई बीमारियाँ लग रही हैं। स्तनपान न कराने और बिना डॉक्टर की सलाह के बच्चों को डिब्बाबंद दूध पिलाने वाली माताओं के सप्लीमेंट वाले दूध के बारे में भी जानकारी नहीं होती कि उसकी क्वालिटी क्या है और वह उनके बच्चों की सेहत के लिए कितना फायदेमंद है या नुकसानदायक है? उन्हें इस बारे में डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर धवल कहते हैं कि माँ के दूध में कई पोषक तत्त्वों के अलावा कई एंटीबॉडीज तत्त्व भी होते हैं, जिनकी मदद से बच्चों का शरीर बाहरी बैक्टीरिया और बीमारियों से लड़ पाता है। जिन बच्चों को उनकी माताएँ छ: महीने या उससे ज्यादा समय तक स्तनपान कराती हैं, वे बच्चों उन बच्चों की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। वहीं जिन्हें छ: महीने से कम या बिलकुल भी स्तनपान नहीं कराया जाता, उन बच्चों का दिमा$ग भी कमज़ोर हो सकता है। ऐसे बच्चों को टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज, ल्यूकेमिया, हॉडकिन्स डिजीज, लिम्फोमा, मोटापा, कमज़ोरी, चिड़चिड़ापन, हाई कोलेस्ट्रॉल लेवल्स और अस्थमा का रिस्क अधिक होता है।
जातियों के संघर्ष से फिर सदियों पुरानी स्थिति में पहुँच गया पूर्वोत्तर, केंद्र सरकार पर उठे सवाल
मणिपुर को विकास और रोज़गार चाहिए था; लेकिन जातीय संघर्ष और सरकार की नाकामी ने इसे फिर दोज़ख़ में धकेल दिया है। ख़ून-ख़राबे और महिलाओं पर अत्याचार ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। नादान बच्चों को माता-पिता के साथ राहत शिविरों में रहना पड़ रहा है। मणिपुर की इस दुरूह स्थिति का देश की छवि पर भी बुरा असर पड़ा है। मणिपुर की जो सच्चाई सामने आ रही है; हक़ीक़त में स्थिति उससे कहीं ज़्यादा भयावह है। राज्य के हालात और कारणों पर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-
मणिपुर में हिंसा ने राज्य के प्रमुख समुदायों को एक बार फिर संघर्ष के वर्षों पुराने कुएँ में धकेल दिया है। क़रीब सात साल पहले राज्य में शान्ति की उम्मीद जगी थी, जो सही रास्ते पर आगे बढ़ रही थी। हालाँकि अब जो हालात बने हैं, वो राज्य और समुदायों को और भयावह स्थिति की तरफ़ ले जा रहे हैं। मणिपुर की वर्तमान स्थिति एक देश के रूप में भारत के लिए भी गम्भीर संकट की स्थिति है। जिस तरह मणिपुर की आँच पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में पहुँच रही है, उससे इन समुदायों का पूरा सामाजिक ताना-बाना अस्त-व्यस्त होने का गम्भीर ख़तरा पैदा हो गया है। यह स्थिति इसलिए भी ख़तरनाक है; क्योंकि इन समुदायों के बीच संघर्ष कुछ वर्षों नहीं, बल्कि दशकों पुराना है। इसमें कोई शक नहीं कि राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी मणिपुर के मामले को बेहतर तरीक़े से नहीं सँभाल पायी है और उसके क़दमों से पूर्वोत्तर के समुदायों में तो खाई चौड़ी हुई ही है, पड़ोसी चीन को भी भारत के ख़िलाफ़ ज़हर घोलने का अवसर मिल गया है।
मणिपुर और इसके साथ लगते राज्यों में स्थिति फिर सन् 1980 के दशक के आख़िरी हिस्से जैसी हो गयी है। दूर से देखने पर भले यह क़ानून-व्यवस्था की स्थिति लगे; लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह नहीं है। सच यह है कि स्थिति कहीं ज़्यादा चिन्ताजनक है और हालात ज़्यादा ख़राब होते जा रहे हैं। मणिपुर में वास्तव में नागरिक संघर्ष शुरू हो गया है और इसे थमने के लिए केवल प्रार्थना ही की जा सकती है। दिल्ली में सत्ता में बैठी भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य विपक्ष के बीच भले मणिपुर राजनीतिक द्वंद्व का विषय बन गया हो, हालत यह है कि यह रिपोर्ट लिखे जाने तक लोगों को भरोसा दिलाने के लिए देश के प्रधानमंत्री तक राज्य नहीं जा सके थे।
मणिपुर म्यांमार के साथ 398 किलोमीटर लम्बी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है, जिसका अधिकांश हिस्सा जंगलों से भरा है। हाल में म्यांमार से घुसपैठियों के मणिपुर में प्रवेश की ख़बरें तेज़ी से आयी हैं। यह इसलिए भी चिन्ताजनक है, क्योंकि पूर्वोत्तर में सक्रिय ज़्यादातर विद्रोही गुटों के प्रशिक्षण केंद्र और छिपने के अड्डे म्यांमार में ही हैं। लिहाज़ा सुरक्षा की दृष्टि से भी यह स्थिति चिन्ता पैदा करती है।
दो कुकी महिलाओं से हुई घटना इतने दिन बाद आम जनता तक पहुँची, जिससे यह साबित होता है कि वहाँ इंटरनेट का बन्द होना कितना नुक़सानदायक है। कुछ संगठन यह आरोप लगा रहे हैं कि इंटरनेट बन्द करने के पीछे सरकार की मंशा हक़ीक़त को छिपाना है, जबकि सरकार कह रही है कि अफ़वाहें न फैलें, इसलिए इंटरनेट बन्द किया गया है। कुकी महिलाओं की घटना का वीडियो जैसे ही सामने आया, इसका असर भारत ही नहीं दुनिया भर में देखा गया। यहाँ तक कि यूरोपीय संसद तक में इस पर चर्चा हुई और मणिपुर की घटनाओं पर ‘गहरी चिन्ता’ जतायी गयी। ज़ाहिर है इन घटनाओं ने दुनिया में भारत की छवि को बट्टा लगाया है। समुदायों के बीच यह असन्तोष गृह मंत्रालय ही नहीं, रक्षा और विदेश मंत्रालयों के लिए चिन्ता का बड़ा कारण है। जब यह संकट गम्भीर होता दिखा तो सरकार ने रक्षा सचिव गिरिधर अरामने को 30 जून को दो दिन के लिए म्यांमार की राजधानी नेय पी भेजा। अरामने ने अपनी यात्रा के दौरान म्यांमार के सैन्य शासक, जनरल मिन-आंग-ह्लाइंग और रक्षा मंत्री, जनरल (रिटायर्ड) मैया-तुन-ऊ से मुलाक़ात के दौरान सीमावर्ती क्षेत्रों में शान्ति, घुसपैठ और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे विषयों पर चर्चा की। हालाँकि इसके बाद भी स्थिति में कोई अन्तर नहीं आया, उलटे मणिपुर का असर अब पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी दिखने लगा है।
मणिपुर के हालात कितने ख़राब हैं, यह असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा के बयान से ज़ाहिर हो जाता है, जिसमें उन्होंने अपने राज्य के लोगों को मिजोरम न जाने की सलाह दी है, जो मणिपुर की हिंसा के बाद प्रभावित होता दिख रहा है। उन्होंने मिजोरम से आने वाली गाडिय़ों की कड़ाई से जाँच करने का फ़रमान जारी किया, जिससे मिजोरम की सरकार काफ़ी नाराज़ हुई है। असम-मिजोरम सीमा पर किसी अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर की तरह पहरा लगा हुआ है।
चिन्ता की बात
मणिपुर में अशान्ति का दायरा काफ़ी बड़ा है। इसमें सबसे बड़ी चिन्ता चीन की तरफ़ से है, जिसकी मणिपुर कई घटनाओं पर गहरी नज़र है। लद्दाख़ से लेकर अरुणाचल तक में भारत के ख़िलाफ़ साज़िशें रचने वाले चीन का सरकारी मीडिया मणिपुर की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है। यहाँ तक कि मणिपुर की तुलना यूक्रेन से की जा रही है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि म्यांमार पर चीन का ख़ासा प्रभाव है और म्यांमार की सेना (टाटामाडा) पर चीन का प्रभाव माना जाता रहा है। चीन के साथ भारत के रिश्ते पहले ही ख़राब चल रहे हैं। ऐसे में मणिपुर और पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति के बहाने उसे भारत के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का नया मुद्दा मिल गया है।
पूर्वोत्तर पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मणि तिवारी ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘हाल के कुछ वर्षों में मणिपुर के पीडि़त लोगों में शान्ति की जो उम्मीद जगी थी, उसे वर्तमान घटनाओं से गहरी चोट पहुँची है। उन्हें लगता था कि वह अब अपने व्यवसायों को जमा पाएँगे; लेकिन स्थिति इतनी विकराल हो चुकी है कि इसे सही करने में लम्बा व$क्त लग जाएगा। साथ ही देश और सीमा की सुरक्षा की दृष्टि के लिहाज़ से भी जो हुआ है, वह घातक है; क्योंकि पड़ोसी चीन ऐसी घटनाओं को हवा देता रहा है।’
यह दिलचस्प ही है कि केंद्र सरकार इसे जातीय संघर्ष कह रही है, जबकि मणिपुर के मुख्यमंमत्री बीरेन सिंह इसे आतंकवादी घटनाएँ बता रहे हैं। बीरेन सिंह, जो खुद मणिपुर के बहुमत समुदाय मैतई से सम्बन्ध रखते हैं; पर यह आरोप लग रहे हैं कि वे अन्य समुदायों को आतंकवाद से जोड़ रहे हैं और उनका रवैया पक्षपात पूर्ण है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) अनिल चौहान ने हाल में कहा था- ‘मणिपुर में हो रही हिंसा दो जातियों के बीच टकराव है और क़ानून व्यवस्था की स्थिति है। हम इस समस्या में राज्य सरकार की मदद कर रहे हैं।’
सीडीएस चौहान का कहना है मणिपुर की हिंसा दो जातियों के बीच टकराव है और क़ानून व्यवस्था की स्थिति है। उन्होंने कहा- ‘हम इस समस्या में राज्य सरकार की मदद कर रहे हैं। मैं कहना चाहूँगा कि सशस्त्र बलों और असम राइफल्स ने वहाँ एक उत्कृष्ट काम किया है और बड़ी संख्या में जान बचायी है। हालाँकि मणिपुर में चुनौतियाँ गायब नहीं हुई हैं, इसमें कुछ समय लगेगा।’
पूरा पूर्वोत्तर प्रभावित
दो कुकी महिलाओं के साथ दरिंदगी का वीडियो वायरल होने के बाद मणिपुर में तो हालात बिगड़ ही गये, इसका असर पूरे पूर्वोत्तर पर पड़ रहा है। कुकी और मैतई समुदाय एक दूसरे के ख़ून के प्यासे दिख रहे हैं। अभी तक जो ज़मीनी हक़ीक़त सामने आयी है, उससे ज़ाहिर होता है कि मणिपुर में दो कुकी महिलाओं से दरिंदगी की घटना इकलौती घटना नहीं है। आशंका है कि वहाँ ऐसी और घटनाएँ हुई हैं। इनमें महिलाओं से दरिंदगी के अलावा लोगों की हत्याएँ भी शामिल हैं। इंटरनेट पर पाबंदी होने के कारण वहाँ से पूरी ख़बरें बाहर नहीं आ पा रही हैं।
दो समुदायों के बीच नफ़रत की आग सरहदें पार करके दूसरे राज्यों में भी फैल रही है। इनका असर मिजोरम से लेकर मेघालय तक नज़र आने लगा है। मेघालय और मिजोरम में कुकी बहुसंख्यक हैं, जबकि मैतई अल्पसंख्यक। ऐसे में मणिपुर की हिंसा का दबाव मिजोरम में भी दिखा है और वहाँ मैतई समुदाय के लोग भागने को मजबूर हो गये हैं। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक सैंकड़ों परिवार अपने घर-बार छोड़ जान बचाने के लिए मणिपुर भागे हैं।
इसका एक कारण मिजोरम के उग्रवादी समूहों की तरफ़ से मैतई समुदाय को मिली धमकियाँ भी हैं। उधर मिजोरम भी हाई अलर्ट पर रखा गया है। धमकियाँ मिलने के बाद सैकड़ों लोगों ने मिजोरम को छोड़ दिया है। इनमें से काफ़ी मणिपुर, जबकि अन्य असम पहुँचे हैं। यही नहीं, मेघालय तक में कुकी और मैतई लोगों में झड़पें भी हुई हैं।
इसके बाद मेघालय सरकार को मैतई समुदाय की सुरक्षा के लिए क़दम उठाने पड़े। मणिपुर के हिंसाग्रस्त क्षेत्रों से बड़ी संख्या में पलायन करके लोग मेघालय पहुँचे हैं। मणिपुर में हिंसा बढऩे के बाद जुलाई के तीसरे हफ़्ते में मिजोरम में विद्रोही गुट सक्रिय हो गये। पीस एकॉर्ड एमएनएफ रिटर्नीज एसोसिएशन (पीएएमआरए) नाम के संगठन ने एक बयान जरी करके कहा कि ‘मैतई को अपनी सुरक्षा के लिए मिजोरम छोड़ देना चाहिए, क्योंकि मणिपुर की बर्बर और जघन्य घटनाओं से मिजोरम में स्थिति तनावपूर्ण हुई है।’ इसके बाद माटी समुदाय के लोगों में $खौफ़ पसर गया और आनन-$फानन उनमें मणिपुर भागने की होड़ लग गयी।
यही नहीं, मणिपुर हिंसा के ख़िलाफ़ मिजोरम में हज़ारों लोगों ने प्रदर्शन किया, जिसमें वहाँ के मुख्यमंत्री जोरमथंगा, उप मुख्यमंत्री तांवलुइया और सभी मंत्रियों और विधायकों ने भी हिस्सा लिया। इस प्रदर्शन के दौरान मणिपुर की घटनाओं की सख़्त शब्दों में निंदा की गयी। यह लोग हाथों में प्ले-कार्ड थामे थे, जिस पर मणिपुर हिंसा के ख़िलाफ़ नारे लिखे हुए थे। इस प्रदर्शन का मक़सद जो-समुदाय के प्रति एकजुटता जताना था।
जनजातियों का समूह कुकी, $गैर-आदिवासी मैतई और आदिवासी नागाओं के बाद मणिपुर में तीसरा सबसे बड़ा समुदाय है। जातीय रूप से सम्बन्धित चिन मुख्य रूप से म्यांमार से हैं, जिनमें से कई कथित तौर पर दशकों से मणिपुर में अवैध रूप से बस गये हैं।
विदेश में भी चर्चा
ब्रिटिश सांसद और धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रधान मंत्री ऋषि सुनक की विशेष दूत फियोना ब्रूस ने ब्रिटिश संसद में मणिपुर की हिंसा का मुद्दा उठाया। ब्रूस, जो आईआरएफबीए की चेयर पर्सन भी हैं; ने दावा किया कि मणिपुर में हिंसा में सैकड़ों चर्च जला दिये गये हैं। उन्होंने कहा- ‘मणिपुर में हुई हिंसा सोची-समझी साज़िश है। मई के बाद से ही सैकड़ों चर्च जला दिये गये हैं और कई बिलकुल नष्ट कर दिये गये। 100 से अधिक लोग मारे गये हैं और 50,000 से अधिक शरणार्थी हैं। न सिर्फ़ चर्च, बल्कि स्कूलों को भी निशाना बनाया गया। साफ़ है कि ये सब योजना के तहत किया जा रहा है और धर्म इन हमलों के पीछे बड़ा फैक्टर है।’
उधर अमेरिकी के मीडिया संस्थान सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में कहा- ‘मणिपुर के परेशान करने वाला वीडियो सामने आया है, जिसमें भीड़ दो महिलाओं को नग्न करके उनका जुलूस निकाल रही है। भले ही ये घटना 4 मई की हो; लेकिन गिरफ्तारियाँ वीडियो के सामने आने के बाद ही हुई हैं। हिंसा शुरू होने के बाद मणिपुर में इंटरनेट बन्द कर दिया गया था।’
इसके अलावा न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा- ‘मणिपुर में यौन हिंसा की घटना को सामने आने में दो महीनों का समय लगा, जिसकी एक वजह राज्य में इंटरनेट बन्द होना भी है। हिंसक नस्लीय झड़पों के दौरान जानकारी के प्रसार को रोकने के लिए इंटरनेट बन्द करना सरकार की रणनीति बनता जा रहा है।’
इससे पहले दो कुकी महिलाओं से दरिंदगी का वीडियो सामने आने के बाद इम्फाल घाटी स्थित नागरिक समाज संगठनों के एक प्रमुख निकाय ने यूरोपीय संसद को चिट्ठी लिखी। इसमें उसने कहा- ‘मणिपुर को आप्रवासी चिन-कुकी नार्को-आतंकवादियों और स्वदेशी मैतई के बीच हिंसा का हवाला देते हुए नशीली दवाओं के व्यापार का नया गोल्डन ट्रायंगल (स्वर्ण त्रिभुज) न बनने दें।’
बता दें गोल्डन ट्रायंगल चीन, लाओस, म्यांमार और थाईलैंड तक फैले दुनिया के सबसे बड़े पोस्त-उत्पादक और नशीली दवाओं की तस्करी के गलियारों में से एक को संदर्भित करता है। यह पत्र, जो 23 जुलाई को स्ट्रासबर्ग स्थित ईपी के अध्यक्ष रोबर्टा मेत्सोला को लिखा गया था; में मणिपुर इंटीग्रिटी समन्वय समिति (सीओसीओएमआई) ने यूरोपीय संघ की मणिपुर पर प्रस्ताव पारित करने के लिए सराहना की।
संगठन ने दावा किया कि 1.7 लाख मैतई लोग ईसाई धर्म का पालन करते हैं, जो मणिपुर में कुल कुकी ईसाई आबादी का 35 फ़ीसदी हैं। पत्र में आरोप लगाया गया कि ईसाइयों सहित 100 फ़ीसदी मैतई लोगों को ऐसे ज़िलों में ईसाई चिन-कुकी-बहुल क्षेत्रों चुराचांदपुर और कांगपोकपी से जातीय रूप से साफ़ कर दिया गया है।
भारतीय खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए संगठन ने कहा कि मुख्य रूप से ईसाई चिन-कुकी जनजातियों से सम्बन्धित ‘नार्को-आतंकवादियों’ ने 1,25,000 एकड़ वन क्षेत्रों पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा करके और परिवर्तित करके मणिपुर के अंदर 500-650 बिलियन रुपये की अर्थव्यवस्था स्थापित की है। इसमें कहा गया है कि भारत-म्यांमार सीमा पर ड्रग कार्टेल ने अवैध कारोबार चलाने के लिए सशस्त्र समूह भी स्थापित किये हैं। सीओसीओएमआई के अध्यक्ष निंगोम्बा ने आशा व्यक्त की कि यूरोपीय संघ अपनी ज़िम्मेदारी निभाएगा और मौज़ूदा संकट को हल करने में गैर-पक्षपातपूर्ण सक्रिय भूमिका निभाएगा और एक नये स्वर्ण त्रिभुज क्षेत्र, विशेषकर मणिपुर में उभरने नहीं देगा।
संसद में हंगामा
मणिपुर का मुद्दा देश की संसद में ख़ूब गूँज रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ने मणिपुर मुद्दे पर संसद में प्रधानमंत्री मोदी के बयान और पिछले ढाई महीने से दो समुदायों के बीच चल रही जातीय हिंसा पर लगातार संसद में चर्चा की माँग की है। हंगामे के कारण संसद की कार्यवाही लगातार बाधित हुई है। विपक्ष की एकजुटता के बावजूद सत्तापक्ष झुकने को तैयार नहीं।
उधर मणिपुर में हिंसा के बीच कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने 29-30 जून को मणिपुर का दौरा किया था और पीडि़तों और राहत शिविरों में प्रभावित लोगों से मिले थे। राहुल गाँधी को एक मौक़े पर चुराचांदपुर जाते हुए मणिपुर पुलिस ने बिष्णुपुर में ही रोक दिया। पुलिस ने उनसे हेलीकॉप्टर से जाने की अपील की, जिसके बाद राहुल हेलीकॉप्टर से गये। चुराचांदपुर में लोगों से मिलकर बातचीत करने के बाद राहुल गाँधी ने ट्वीट में कहा कि वह मणिपुर के अपने सभी भाइयों-बहनों को सुनने आये हैं। उन्होंने कहा कि सभी समुदायों के लोगों ने बहुत स्वागत किया और प्रेम से मिले। शान्ति हमारी एकमात्र प्राथमिकता होनी चाहिए। राहुल ने राहत शिवरों में सुविधाओं की कमी दूर करने की भी मणिपुर सरकार से माँग की। गृह मंत्री अमित शाह ने भी एक बार तीन दिन के लिए मणिपुर का दौरा किया और क़ानून व्यवस्था की जानकारी ली थी। इसके बाद 29 जुलाई को कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के 20 सांसद मणिपुर गये और राहत शिविरों में प्रभावित लोगों से मिलकर बातचीत की।
हिंसा का असर
मौतें 170 से ज़्यादा
घायल 300 से ज़्यादा
विस्थापित 55,000
तैनात सुरक्षाकर्मी 35,000
मेरे घर वाले और बेटे को जान से मार दिया गया। दंगाइयों ने मेरी बच्ची के कपड़े उतारकर उसे इतने लोगों के सामने घुमाया। उसे पीटा गया और उससे गैंगरेप किया गया। एक ही दिन में मेरा सब कुछ छीन लिया गया। आज तक न तो मुख्यमंत्री और न किसी मंत्री ने फोन किया।
वायरल वीडियो की एक पीडि़ता की माँ (26 जुलाई का बयान)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मणिपुर के लिए क्या कर रहे हैं? वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि नरेंद्र मोदी को मणिपुर से कोई लेना-देना नहीं। वह जानते हैं कि उनकी विचारधारा ने मणिपुर को जलाया है। भाजपा और आरएसएस सिर्फ़ सत्ता चाहती हैं और सत्ता पाने के लिए ये कुछ भी कर सकती हैं। ये मणिपुर को जला देंगे, सारे देश को जला देंगे। इनको देश के दु:ख और दर्द से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।’’
राहुल गाँधी
कांग्रेस नेता
राज्य में 34 जनजातियाँ हैं, उनमें कुकी और मैतई भी शामिल हैं। जो लोग यहाँ पहले से रह रहे हैं, उनमें एकता है; लेकिन कुछ लोग रैलियाँ करने के नाम पर राज्य को जला रहे हैं। हम लगातार इस पर नज़र रख रहे हैं कि कोई अवैध तरीक़े से राज्य में प्रवेश तो नहीं कर रहा है। राज्य और केंद्र सरकार सेना के साथ मिलकर राज्य में क़ानून व्यवस्था बनाने के लिए काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि जल्द ही हालात सामान्य हो जाएँगे। घटना का वीडियो बनाने वाले को गिर$फ्तार किया गया है।’’
बीरेन सिंह
मुख्यमंत्री, मणिपुर
सरहद पर देश बचाया, पत्नी को नहीं बचा सका
मणिपुर में हिंसा की कई दु:खद दास्तानें हैं। जिन दो कुकी महिलाओं के साथ दरिंदगी की गयी थी, उनमें से एक के पति ने कारगिल में देश की सरहदों की रखवाली की थी। कारगिल के इस नायक ने खुद अपनी दास्ताँ बतायी। मीडिया से बातचीत में कारगिल के नायक ने दु:खी मन से कहा कि यद्यपि उन्होंने देश की रक्षा की; लेकिन वह अपनी पत्नी को अपमानित होने से नहीं बचा सके। असम रेजिमेंट के सूबेदार रहे ये सूबेदार (सेवानिवृत) ने कारगिल युद्ध में देश के लिए लड़ा और भारतीय शान्ति सेना (आईपीकेएफ) के साथ श्रीलंका भी गये थे। उन्होंने कहा- ‘मैंने देश की रक्षा की; लेकिन मुझे दु:ख है कि मैं अपनी पत्नी और साथी ग्रामीणों की रक्षा नहीं कर सका।’
सेना का यह बहादुर सूबेदार मणिपुर की उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का चश्मदीद भी है। उन्होंने कहा कि 4 मई की सुबह एक भीड़ ने इलाक़े के कई घरों को जला दिया। दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर उन्हें लोगों के सामने गाँव की पगडंडियों पर चलने के लिए मजबूर किया। पुलिस मौज़ूद थी; लेकिन उसने कोई कार्रवाई नहीं की। मैं चाहता हूँ कि उन सभी लोगों को कड़ी सज़ा मिले, जिन्होंने घर जलाये और महिलाओं को अपमानित किया।’
मणिपुर की घटना से पीड़ा से भर गया हूँ। मैं सभी मुख्यमंत्रियों से आग्रह करता हूँ कि वे अपने राज्य में क़ानून व्यवस्था को और मज़बूत करें। ख़ासकर हमारी माताओं और बहनों की सुरक्षा के लिए कठोर-से-कठोर क़दम उठाएँ। घटना चाहे राजस्थान की हो, छत्तीसगढ़ की हो या मणिपुर की हो।’’
नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री
मानवता का चीरहरण
देश में कई ऐसी घटनाएँ हाल के वर्षों में हुई हैं, जिन्होंने मानवता को शर्मशार किया है। मणिपुर की घटना ने उसमें एक और काला अध्याय जोड़ दिया है। मणिपुर की यह घटना एक वायरल वीडियो से सामने आयी, जिसमें उन्मादी भीड़ दो कुकी महिलाओं को निर्वस्त्र कर सडक़ पर घुमा रही है। उनसे अश्लील हरकतें की जा रही थीं। जिसने भी देखा उसका कलेजा कांप गया। वीडियो को लेकर सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा- ‘जो वीडियो हमारे सामने आया है, उससे हम बहुत परेशान हैं।’ घटना इसी साल 4 मई की थी, जिसे लेकर 16 मई को एफआईआर भी दर्ज हुई थी। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जुलाई में जब वीडियो सामने आया, तो सरकार कुछ सक्रिय हुई। हालाँकि वीडियो वायरल होने के कारण तब तक देश भर में इस दरिंदगी के विरोध में $गुस्से की लहर फैल चुकी थी।
मणिपुर में यौन उत्पीडऩ की दो पीडि़त महिलाएँ केंद्र और राज्य सरकार के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय पहुँच गयी हैं। उन्होंने एक याचिका दायर कर सर्वोच्च अदालत से उनके मामले में दख़ल की माँग की है। महिलाओं के वकील कपिल सिब्बल का कहना है कि महिलाएँ मामले की सीबीआई जाँच और मामले को असम स्थानांतरित करने के ख़िलाफ़ हैं। सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश सरकार के वकील से पूछा कि ऐसी कई घटनाएँ हुईं, उनकी कितनी एफआईआर दर्ज हैं?
मीडिया में एक पीडि़ता ने जो सच बताया उसने कई गम्भीर सवाल खड़े कर दिये हैं। उस महिला ने कहा- ‘जान बचाने के लिए मैंने कपड़े उतार दिये।’ विभिन्न रिपोट्र्स को एक करके बताया जाए, तो ज़ाहिर होता है कि मणिपुर में न सिर्फ़ व्यापक स्तर पर हिंसा हुई है, अपितु दरिंदगी की भी दर्ज़नों घटनाएँ हुईं। बड़ी घटना, जिसका वीडियो सामने आया वह 4 मई की कांगपोकपी ज़िले के बी फीनोम गाँव की है। इस हमले में भीड़ ने दो कुकी महिलाओं को निर्वस्त्र कर सडक़ पर घुमाया। एक महिला के साथ दिनदहाड़े बलात्कार हुआ। वायरल वीडियो में साफ़ दिखा कि निर्वस्त्र की गयी महिलाओं के साथ कई युवा पुरुष चल रहे हैं और उनके दरिंदगी कर रहे हैं। कुछ अन्य पुरुष महिलाओं को खेतों की तरफ़ खींच रहे हैं।
घटना पर एक महिला ने कहा- ‘जब हमने सुना कि मैतई भीड़ पास के गाँव में घरों को जला रही है, तो हमारा परिवार और अन्य लोग भाग खड़े हुए। लेकिन भीड़ ने हमें खोज लिया और हमारे पड़ोसी और उसके बेटे को आगे ले जाकर मार डाला गया। फिर भीड़ महिलाओं पर टूट पड़ी। उन्हें कपड़े उतारने के लिए कहा गया। महिलाओं ने जब विरोध किया, तो उन्हें धमकी दी गयी कि यदि उन्होंने अपने कपड़े नहीं उतारे, तो उन्हें गोलियों से भून देंगे। जान बचाने के लिए महिलाओं को ऐसा करना पड़ा। भीड़ में मौज़ूद पुरुषों ने महिलाओं को मारा-पीटा भी।’
एक महिला के मुताबिक, उसे यह भी पता नहीं चला कि उसकी युवा पड़ोसी के साथ क्या हो रहा है। एक महिला को धान के खेत में खींच लिया गया गया और लेटने के लिए कहा गया। तीन लोगों ने उसे घेर रखा था। महिला के मुताबिक, हालाँकि उससे रेप तो नहीं हुआ; लेकिन उसके शरीर को पुरुषों ने बेशर्मी से छुआ।
हिंसा और दरिंदगी की कई और घटनाएँ सामने आयीं, जिनमें 19 साल की एक युवती ने आरोप लगाया कि जब वह भागते हुए एक एटीएम के पास गयी, तो पुरुषों के एक ग्रुप ने उसका अपहरण कर लिया। युवती ने जो आप बीती मीडिया के लोगों को सुनायी, उससे पता चलता है कि कैसे मणिपुर जातीय संघर्ष का ख़ामियाज़ा महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। युवती ने आरोप लगाया कि उसे एक पहाड़ी इलाक़े में ले जाया गया, जहाँ तीन लोगों ने बारी-बारी से उसके साथ रेप किया। महिलाओं को बंदूक की बट से मारा गया। यहाँ तक कि खाना-पानी भी नहीं दिया। महिलाओं के मुताबिक, कुछ लोगों ने उन्हें 15 मई को घाटी स्थित एक विद्रोही समूह को सौंप दिया।
पीडि़ता युवती के मुताबिक, जो कुछ वे उसके साथ कर सकते थे, उन्होंने किया। पूरी रात उसे खाने को कुछ भी नहीं दिया गया। सुबह टॉयलेट जाने के बहाने वह पहाड़ी से नीचे भागने में सफल रही। किसी तरह वह कांगपोकपी पहुँचने में सफल रही, जहाँ उसे साथ लगते राज्य नागालैंड की राजधानी कोहिमा के एक अस्पताल में रेफर किया गया। उसने 21 जुलाई को ही पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी; लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। कुछ महिलाओं ने तो आरोप लगाया कि पुलिस के ही लोग कुछ जगह उन्हें दंगाइयों के हवाले कर रहे थे।
सिनेमैटोग्राफ विधेयक का मुख्य ज़ोर फ़िल्मों की चोरी रोकने पर प्रतीत होता है। हालाँकि यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल है। यह विधेयक फ़िल्मों की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और अनधिकृत प्रदर्शन या इसे बढ़ावा देने पर रोक के मक़सद से लाया गया है। ‘अर्नेस्ट एंड यंग’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाइरेसी की वजह से 2019 में भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री को क़रीब 18,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ।
सरकार इस विधेयक के माध्यम से पाइरेसी की इस समस्या का समाधान करने का दावा करती है, जो मूल रूप से सेंसरशिप (पाइरेसी नहीं) पर है। इस परिष्कृत डिजिटल अपराध से निपटने के लिए उसके पास न तो जनशक्ति है और न ही विशेषज्ञता। इसके अप्रभावी होने की सम्भावना है; क्योंकि सेंसर बोर्ड जैसी अर्ध-न्यायिक संस्था एक पुलिसकर्मी की तरह काम नहीं कर सकती। फ़िल्मों की अनधिकृत रिकॉर्डिंग (धारा-6 एए) और उनके प्रदर्शन (धारा-6 एबी) को नियंत्रित करने वाले विधेयक में तीन महीने से तीन साल तक की क़ैद और 3,00,000 (तीन लाख) रुपये से 10,00,000 (10 लाख) रुपये तक के ज़ुर्माना प्रस्तावित है। ख़तरा यह है कि इतनी ज़्यादा शक्तियों के साथ भ्रष्ट इंस्पेक्टर उन लोगों को धमकियों और ब्लैकमेल के जंगल-राज में धकेल सकते हैं, जो वास्तव में दोषी नहीं हैं; ख़ासकर सिनेमा प्रदर्शक।
मुक़दमेबाज़ी में फँसने के कारण केंद्र सरकार ने इसकी अपीलीय शक्तियाँ हटा दी हैं। उसे क़ानूनी शक्तियों की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि उसकी आदत अधिनियम के कामकाज और सीबीएफसी के प्रशासन में लगातार हस्तक्षेप करने की है। हाल ही में मंत्री ने उन अधिकारियों को धमकी दी थी, जिन्होंने हॉलीवुड फ़िल्म ‘ओपेनहाइमर’ में एक विशेष दृश्य को मंज़ूरी दे दी थी; क्योंकि उन्हें लगा कि यह अपमानजनक है।
वास्तव में यह वह शासन है, जिसने ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरल स्टोरी’ जैसी विभाजनकारी फ़िल्मों के प्रमाणीकरण और प्रचार (प्रचार और कर छूट के माध्यम से प्रोत्साहित करने) का निर्णय किया। यदि शासन नफ़रत फैलाने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ा सकता है, तो संसद के अधिनियम या सीबीएफसी जैसी कथित स्वायत्त संस्था के क्या मायने हैं?
यदि मंत्रालय एक पुलिसकर्मी की ही भूमिका निभाना चाहता है, तो वह फ़िल्म निर्माताओं की रचनात्मकता को नष्ट करने वाली भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इसे फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया और पद्मावत जैसी फ़िल्मों के प्रदर्शन के दौरान क्यों नहीं निभाता? यह विधेयक आयु-उपयुक्तता को इंगित करने के लिए यूए श्रेणी को तीन श्रेणियों- ‘यूए 7+, यूए 13+ या यूए 16+’ से प्रतिस्थापित करता है।
यह सब बहुत जटिल है और उम्र सम्बन्धी मामलों में इस तरह की बारीकियाँ सिनेमा हॉल के मालिकों को परेशान करेंगी। वे या तो इसमें ढिलाई बरतेंगे या फिर इसकी क़ीमत चुकाएँगे या सख्ती करेंगे या फिर लोगों के गुस्से का सामना करेंगे।
‘ए’ या ‘एस’ प्रमाण-पत्र वाली फ़िल्मों को टेलीविजन या केंद्र सरकार के निर्धारित किसी अन्य माध्यम पर प्रदर्शन के लिए एक अलग प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होगी। यह फिर टेलीविजन उद्योग में नौकरशाही और राजनीतिक लोगों का हस्तक्षेप होगा और नेटफ्लिक्स और अमेजॉन जैसी ओटीटी फ़िल्मों को प्रभावित कर सकता है। इसमें शासन बहुत अधिक ऊँच-नीच करेगा और ये नये प्रावधान जल्द ही काले क़ानून जैसे प्रतीत होने लगेंगे।
देश की सुरक्षा सभी देशवासियों के लिए सर्वोपरि है। मगर पाकिस्तान से सचिन के प्यार में अपने पति को छोडक़र आयी सीमा हैदर की घुसपैठ ने सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगा दिये हैं। सीमा हैदर को लेकर देश में ही दो पक्ष खड़े हो गये हैं। एक पक्ष सीमा हैदर को पाकिस्तानी जासूस बता रहा है एवं सीमा हैदर व उसके भारतीय पति सचिन को दण्ड देने की माँग कर रहा है। दूसरा पक्ष सीमा हैदर को भारतीय नागरिकता देने एवं उसे बरी करने की माँग कर रहा है। इस पक्ष ने सीमा हैदर को सदैव के लिए भारत में रहने देने एवं देश के राष्ट्रपति से उसे भारतीय नागरिकता देने की माँग की है। इस पक्ष ने सीमा हैदर का नाम बदलकर सीमा मीणा भी कर दिया है। सीमा हैदर को भारतीय नागरिकता देने की अपील करने वालों में अधिवक्ता एस.पी. सिंह भी हैं।
अधिवक्ता एस.पी. सिंह ने राष्ट्रपति द्रोपदी को लिखे पत्र में कहा है कि सचिन मीणा के साथ हिन्दू रीति-रिवाज़ों से विवाह करने के बाद अब सीमा मीणा अपने पति और चारों बच्चों के साथ, जिन्हें सचिन ने अपना लिया है, अपने ससुराल पक्ष के घर में रहना चाहती हैं। उनकी प्रार्थना है कि उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान करने के साथ ही इसकी इजाज़त दी जाए, ताकि वह यहाँ भारतीय संस्कृति के तहत अपना जीवन जी सकें।
प्रो. सत्यवीर सिंह कहते हैं कि सुरक्षा में चूक होना कोई अच्छी बात नहीं है। ये राष्ट्रहित में नहीं है। अगर राष्ट्र की सुरक्षा में कभी कोई चूक होती है, तो इसके लिए सरकार एवं सुरक्षा एजेंसियाँ दोनों ही उत्तरदायी होनी चाहिए। सीमा हैदर जिस प्रकार से आसानी से राष्ट्र की सुरक्षा एजेंसियों एवं पुलिस को चकमा देकर देश के भीतर चार बच्चों को लेकर घुस आती है, वो आश्चर्यजनक रूप से विस्मित करने वाला है। ये कोई खेल अथवा हँसी-मज़ाक़ का विषय नहीं है। अगर उसने सचिन से विवाह ही करना था, तो उसे क़ानूनी प्रक्रियाओं को पहले से ही पूरा करते हुए भारत में आना चाहिए था।
इस मामले में सीमा हैदर की तरह उसका कथित पति सचिन तो दोषी है ही; मगर यदि निष्पक्ष एवं सही रूप से जाँच हो, तो न जाने कितने ही लोग दोषी पाये जाएँगे। हमें इस मामले में कोई तीखी प्रतिक्रिया करने का अधिकार नहीं है ये मामला सरकार एवं जाँच एजेंसियों का है, इसके लिए उनके बयान एवं प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा करना ही उचित है। अधिवक्ता छत्रपाल सिंह कहते हैं कि लोगों को इस मामले में टिप्पणियों एवं राय देने से बचना चाहिए। सरकार अपना काम कर रही है। अगर सुरक्षा में सेंध लगाने का प्रयास किसी ने किया होगा, तो सरकार उसे दंडित करेगी। जाँच एजेंसियाँ पूरी तन्मयता से जाँच कर रही हैं।
कहानी में नये-नये मोड़
उल्लेखनीय है कि पबजी पर उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा निवासी सचिन से प्यार की पींगें बढ़ाने वाली सीमा हैदर सिंध जनपद के गाँव जैकोबाबाद से नेपाल के रास्ते इतने चुपके से भारत में घुसकर सचिन के घर तक पहुँच गयी कि किसी को पता तक नहीं चला। सचिन ने सीमा को भारतीय नागरिकता दिलाने का भी प्रयास किया मगर पोल खुल गयी। पाकिस्तान से भारत आयी सीमा हैदर का जब मीडिया का सामना हुआ, तो उसके हर दिन बदलते बयानों ने संदेह पैदा किया।
अब इस मामले में हर दिन नये-नये मोड़ आने से कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। सचिन मीणा एवं सीमा हैदर को गिरफ़्तार भी किया गया, जहाँ दोनों का स्वास्थ्य बिगडऩे के समाचार मिले। दोनों से पूछताछ चल रही है। सचिन के घर के बाहर पुलिस तैनात है। 30 वर्षीय सीमा हैदर का फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना एवं यह भी कहना कि वह पाँचवीं तक पढ़ी-लिखी है किसी के गले नहीं उतर रहा है। देश में सीमा हैदर को जेल भेजने से लेकर उसे वापस पाकिस्तान भेजने तक की बात लोग कर रहे हैं। अब सीमा हैदर ने नया दाँव खेलते हुए कहा है कि अगर वो पाकिस्तान गयी, तो उसे जान से मार दिया जाएगा। इन दिनों सीमा मामले में उत्तर प्रदेश एटीएस, नोएडा पुलिस एवं इंटेलिजेंस ब्यूरो जाँच में लगी हैं। सीमा के बयानों एंव बातों में विरोधाभास सभी को हैरान किये हुए है। सीमा हैदर ने अपनी सुरक्षा एवं उसे भारत की बहू बने रहने देने की गुहार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लगायी है।
जाँच एजेंसियाँ सीमा मामले में कई पहलुओं पर जाँच कर रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों की बात सीमा के घर वालों से भी हुई है, उसके ससुर अमीर जान का कहना है कि उनका बेटा अर्थात् सीमा का पाकिस्तानी पति उन्हें कोई पैसा नहीं देता है, वो अपनी पूरी कमायी सीमा को ही देता रहा है। नौ साल के विवाह समय में सीमा के ससुराल वालों से बहुत अच्छे रिश्ते नहीं रहे। मगर सीमा के ससुर का यह भी कहना है कि उसके पोते-पोतियों को पाकिस्तान वापस भेजा जाए सीमा उनका भविष्य तय नहीं कर सकती। वहीं सीमा के पति ग़ुलाम हैदर का भी बयान सामने आया है। उसका कहना है कि सीमा ने यह भी बताया कि उसका भाई 2022 से पाकिस्तानी आर्मी में है। उसके चाचा भी पाकिस्तानी आर्मी में थे।
सीमा हैदर पूरे हिन्दू रीति-रिवाज़ से सचिन के साथ रह रही थी एवं यह भी कहती रही है कि उसे इस्लाम धर्म पसंद नहीं है, हिन्दू धर्म पसंद है। उसने नमाज़ पढऩा भी बन्द कर दिया है। उसने कहा है कि उसने सचिन से पशुपतिनाथ मंदिर के गुएश्वरी मंदिर में विवाह किया है। मगर मंदिर ट्रस्ट के प्रवक्ता ने कहा है कि इस मंदिर में कोई विवाह नहीं कराया जाता है। इस मंदिर में सीमा एवं सचिन का कोई ब्योरा भी नहीं मिला। मंदिर में विवाह न होने की बात सामने आने पर सीमा ने कहा कि उसने सचिन से नेपाल के होटल में विवाह किया है। सीमा हैदर स्वयं को निर्दोष भी बता रही है एवं यह भी कह रही है कि उसे चोरी से भारत नहीं आना चाहिए था, यह उसकी भूल थी। कहानी उलझाऊ बहुत है अत: इस मामले में जाँच एजेंसियों की रिपोर्ट आने पर ही सब कुछ स्पष्ट हो सकेगा। लगातार जाँच चल रही है।
एक जासूस दबोचा
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने अलीगढ़ से एक अन्य पकिस्तानी जासूस फ़ैज़ान अंसारी उर्फ़ फ़ैज़ को दबोचा है। उसके किराये के घर की जाँच में पता चला कि वह झारखण्ड के लोहरदगा जनपद का रहने वाला है। फ़ैज़ान के पास से जाँच एजेंसी ने उसके घर से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अतिरिक्त आपत्तिजनक सामग्री एवं सुरक्षा सेंध से सम्बन्धित दस्तावेज़ ज़ब्त किये हैं। दस्तावेज़ अंसारी उर्फ़ फ़ैज़ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का छात्र बताया गया है। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी उसके विश्वविद्यालय से जुड़ी जानकारियों को जुटा रही है। फ़ैज़ान अंसारी लंबे समय से विदेश स्थित आईएसआईएस संचालकों के सम्पर्क में था। ये संचालक प्रतिबंधित आतंकी संगठन में भर्ती के लिए उसका मार्गदर्शन कर रहे थे। फ़ैज़ान के अतिरिक्त सलमान नाम का एक युवक झांसी स्थित बबीना के आर्मी छावनी की जासूसी करने के आरोप में पकड़ा गया है।
सलमान उत्तर प्रदेश के गोंडा के रहने वाले रईस नाम के एक युवक का मित्र है एवं उसी के कहने पर आर्मी छावनी की फोटो खींचकर एवं वीडियो बनाकर रईस को भेज रहा था। रईस ने ये सब पाकिस्तानी व्यक्ति को भेजा। अपने पाकिस्तानी आकाओं को भारतीय सैन्य ठिकानों की जानकारी देने वाला रईस पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई एवं पाकिस्तानी आतंकी संगठन अलकायदा के लिए जासूसी कर रहा था। रईस ने वहाँ से हवाला के माध्यम से लाखों रुपये भी प्राप्त किये थे। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने एक अन्य पाकिस्तानी जासूस इमरान ख़ान को 2022 में राजस्थान से दबोचा था। इससे पूर्व में महाराष्ट्र से भी अरमान सैय्यद एवं मोहम्मद सलमान सिद्दीक़ी को पाकिस्तान के लिए काम करने के जुर्म में दबोचा गया था। इसके अतिरिक्त सन् 1996 में ज़ाफ़रिया, अमरे खाँ एवं नबिया सहित पाँच लोग दबोचे गये। सन् 2002 में रमजान एवं नूरे खाँ पकड़े गये। सन् 2006 में बीकानेर का नूरे खाँ पकड़ा गया। सन् 2013 में मौलवी अल्लाबक्श, माजिद खाँ एवं ग़ुलाम रसूल पकड़े गये।
विश्वासघाती हिन्दू चेहरे
ऐसा नहीं है कि केवल मुस्लिम ही भारत से विश्वासघात करते हैं। कई हिन्दू भी पैसे के लालच में अपने राष्ट्र से विश्वासघात करते हुए पकड़े गये हैं। कुछ समय पूर्व पुलिस और सीमा पर तैनात राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के एजेंट नंदलाल महाराज को जयपुर से दबोचा था। नंदलाल यहाँ आरडीएक्स सप्लाई करने वाला था। नंदलाल के पास से पुलिस एवं जाँच एजेंसी को आर्मी के नक्शे, आर्मी के टेग नंबर, सेना की गतिविधियों की जानकारी सम्बन्धी दस्तावेज़, सैन्य हवाई अड्डे के फोटो, माइक्रो एडी कार्ड आदि मिले। जासूस नंदलाल ने पूछताछ में बताया कि उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई देशों के आर्मी अधिकारियों एवं युद्धाभ्यास की जानकारी पाकिस्तान को भेजी थी। उसने जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, जालोर सहित पश्चिमी राजस्थान में 25 से अधिक लोगों को अपने नेटवर्क से जोड़ लिया है।
इसके अतिरिक्त रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से जुड़ा वैज्ञानिक प्रदीप कुरुलकर पकड़ा गया, जो पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सक्रिय सदस्य एवं पदाधिकारी था। इसके अतिरिक्त बाड़मेर के चौहटन के ताला गाँव का व्यापारी संतोष माहेश्वरी पाकिस्तान के के लिए जासूसी करते पकड़ा गया था। ऐसे कई हिन्दू जासूस भी राष्ट्र से विश्वासघात करते हुए पकड़े गये हैं। मगर हम सबको ध्यान रखना चाहिए कि राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि होती है। अगर कोई राष्ट्र की सुरक्षा से खिलवाड़ करता है तो उसे किसी भी हाल में क्षमा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये राष्ट्रद्रोह है।
बढ़ते अपराधों से समाज में दहशत फैलती है। आज भारत के हर कोने में अपराध हो रहे हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आने पर अपराधों पर कुछ समय तक रोक लगी थी। परन्तु अब एक बार फिर दिल्ली में अपराधी बेख़ौफ़ हैं। निर्भया कांड के एक दशक बाद गुडिय़ा केस, फिर श्रद्धा के शरीर के टुकड़े हुए तथा उसके बाद कई और हत्याएँ। लूटपाट तथा जेब काटने के मामले में दिल्ली पहले से ही बदनाम रही है। परन्तु हत्या, बलात्कार तथा अन्य जघन्य अपराध भी दिल्ली को बीच-बीच में कलंकित करते रहे हैं।
अपराधी इतने निडर हैं कि वे आये दिन एक से एक जघन्य अपराध को अंजाम दे रहे हैं। दिल्ली सरकार द्वारा लगाये गये सीसीटीवी कैमरों का भी डर अब अपराधियों में नहीं दिखता। केंद्र शासित इस प्रदेश में एक तरफ़ सत्ता की लड़ाई दिल्ली सरकार तथा केंद्र सरकार के बीच जारी है। वहीं दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली पुलिस अपराधियों पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रही है।
नाम न बताने की शर्त पर एक मुस्लिम लडक़े ने बताया कि पूर्वी दिल्ली के एक इलाक़े की पुलिस चौकी पर दो युवा पुलिसकर्मियों की दिन में ड्यूटी रहती है। इन युवा पुलिसकर्मियों की पुलिस चौकी के पास ही एक बाल काटने वाली सैलून की फुटपाथ वाली खुली दुकान है। दोनों पुलिसकर्मियों ने इस क्षेत्र में कुछ ऐसे युवाओं से साँठ-गाँठ कर रखी है, जो ख़ुद नशे के तस्कर हैं। इनमें से एक का नाम टूटा है। इस तरह के नशा तस्कर पहले नशीले पदार्थों को सप्लाई नशेडिय़ों को करते हैं और फिर चुपचुप फोटो खींचकर पुलिस चौकी के दोनों पुलिस वालों को देते हैं।
दोनों पुलिस वाले मौक़े पर पहुँचकर नशेडिय़ों को दबोच लेते हैं और उसके बाद उनके घर वालों को फोन करके बुलाते हैं। इसके बाद उन्हें उनके बच्चों को नशीले पदार्थों की तस्करी करने, नशा करने और बलात्कार में फँसाने की धमकी देकर लम्बे समय के लिए जेल भेजने की धमकी देते हैं। दोनों पुलिसकर्मी बिना रिपोर्ट लिखे नशा करने वाले एक युवा के माँ-बाप पर दबाव बनाकर 5,000 से 10,000 तक की वसूली करते हैं। पुलिसकर्मी ये पैसा बाल काटने वाले के हाथ में दिलवाते हैं। होना यह चाहिए कि पुलिस नशा करने वाले को भारतीय दंड संहिता-1860 की धारा-86 के तहत मुक़दमा दर्ज कर जेल भेजे। इसके अतिरिक्त पुलिस नशा करने वाले युवाओं को नशा मुक्ति केंद्र भेज सकती है। लेकिन मुस्लिम युवा द्वारा दी गयी, जानकारी यह साबित करती है कि पुलिस वालों के संरक्षण में अपराधी अपराध करते हैं और उनके चंगुल में फँसे युवाओं के माँ-बाप इसका दंड भरते हैं। इस तरह पुलिस ही अपराध को बढ़ावा देकर अवैध वसूली का काम करती है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस को अपराध न रोक पाने की वजह से कई बार न्यायालयों से फटकार पड़ चुकी है, परन्तु इस पर दिल्ली में अपराध बढ़ रहे हैं। रिकॉर्ड बताते हैं कि दिल्ली में पिछले 10 वर्षों में चार गुना डकैती की घटनाएँ बढ़ी हैं। दिल्ली में 2012 में 608 डकैतियाँ पड़ी थीं, जबकि 2021 में 2,333 डकैतियाँ पड़ी थीं। 2021 में दिल्ली में हर दिन औसत 6 डकैतियाँ हुईं। नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो की 2022 में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 में दिल्ली में 111 प्रतिशत साइबर अपराध बढ़े।
इतना ही नहीं, दिल्ली में 2020 की तुलना में 2021 में सभी तरह के अपराध बढ़े। महिला अपराध, अपहरण, बलात्कार, छेड़छाड़, जेब तराशी, लूट, चेन स्नेचिंग तथा घरेलू हिंसा दिल्ली में बढ़ी है। हत्या के मामले कम होने का दावा करने वाली पुलिस इस बार हत्याओं पर चुप्पी साधे हुए है।
सन् 2021 की नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में महिलाओं पर सबसे अधिक एसिड अटैक के मामले दिल्ली में हुए। हालाँकि एसिड अटैक के मामले में दिल्ली तीसरे नंबर पर रही। सन् 2021 में दिल्ली में 64 गैंगरेप हुए, 1,251 रेप हुए। इनमें सबसे अधिक रेप 18 से 30 वर्ष की महिलाओं से हुए।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि दिल्ली में 5 वर्ष से कम उम्र तक की बच्चियों से लेकर 60 साल से अधिक की उम्र की महिलाओं से भी रेप हुए। यह पुलिस के लिए बेहद शर्मनाक है। रेप तथा गैंग रेप की सबसे अधिक वारदात 1,224 लोगों ने कीं, जिनमें 623 एफआईआर दोस्त, पड़ोसी, रिश्तेदार निकले। इनमें केवल 490 लोग पकड़े गये। रेप तथा गैंगरेप में 111 परिवार के ही लोग शामिल रहे। वहीं 26 मामलों में आरोपी अज्ञात थे। 2021 में पॉक्सो की 1,374 वारदात हुईं। हालाँकि दिल्ली पुलिस के आँकड़े इससे कहीं कम हैं, जो नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के आँकड़ों से मेल नहीं खाते हैं। दिल्ली पुलिस के अनुसार, 2021 में साइबर ठगी की कुल प्रति दिन औसत 315 शिकायतें पुलिस को मिलीं। इनमें एक-चौथाई शिकायतें लोन से जुड़ी थीं। पुलिस ने लगभग 55.49 करोड़ रुपये अलग-अलग बैंक खाते फ्रीज किये। 291 लोगों को गिर$फ्तार किया। 583 बैंक खाते ब्लॉक किये। पुलिस के अन्य अपराधों के आँकड़े भी नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो से मेल नहीं खाते।
दिल्ली पुलिस का पिछला रिकॉर्ड देखें, तो पता चलता है कि दिल्ली पुलिस में एसआई के नौ प्रतिशत लगभग 654 पद ख़ाली पड़े हैं। पूरी दिल्ली में कुल 6,802 एसआई हैं, जो कि 7,456 होने चाहिए। ऐसे ही दिल्ली में पिछले वर्ष 5,729 कॉन्स्टेबल थे, जबकि 43,191 होने चाहिए। हेड कॉन्स्टेबल भी 21,232 की तुलना में मात्र 18,683 ही हैं। कुल मिलाकर दिल्ली पुलिस में 82,196 पुलिसकर्मी होने चाहिए; लेकिन 72,934 हैं।
प्रश्न यह है कि जिस दिल्ली पुलिस को अपराध रोकने के मामले में अव्वल माना जाता है, वही दिल्ली पुलिस दिल्ली में ही अपराध रोकने में नाकाम क्यों है? क्या दिल्ली पुलिस अपनी संख्या कम बताकर अपनी नाकामी को छिपा सकती है? क्या केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा दिल्ली के उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना की नैतिक ज़िम्मेदारी यह नहीं है कि वे दिल्ली की क़ानून व्यवस्था सुधारें? इस मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कई बार गृह मंत्रालय तथा दिल्ली के उप राज्यपाल को पत्र भी लिखा है कि वह दिल्ली की क़ानून व्यवस्था को दुरुस्त करें, जो कि उनकी ज़िम्मेदारी है। परन्तु क्या इससे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा दिल्ली के उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना पर कोई असर हुआ?
दिल्ली की सत्ता पर पूरी तरह निरंकुश शासन की इच्छा रखने वाले उपराज्यपाल की नैतिक ज़िम्मेदारी क्यों नहीं याद रहती? दिल्ली में बाढ़ को दिल्ली सरकार की नाकामी बताने वाले भाजपा नेता आख़िर दिल्ली में होने वाले अपराधों पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं? दिल्ली पर शासन करने की इच्छा रखने से सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अध्यादेश लाने में अगर केंद्र सरकार को जल्दी थी, तो फिर दिल्ली में अपराध रोकने के लिए कौन आगे आएगा? बात-बात पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इस्तीफ़े की माँग करने वाले भाजपा नेता दिल्ली में हर दिन होने वाले दर्ज़नों अपराधों पर दिल्ली के उपराज्यपाल और देश के गृह मंत्री से आख़िर इस्तीफ़ा क्यों नहीं माँगते? अगर नैतिक ज़िम्मेदारी तय हो, तो वो ईमानदारी से हर संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की तय होनी चाहिए। इसके लिए दोहरा मापदंड क्यों?
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी हमले की राजनीति से परहेज़ करके अपनी ओर से पूरे प्रयास करें कि दिल्ली में अपराध रुकें। हालाँकि यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है; परन्तु अगर उनके प्रयासों से दिल्ली में अपराध रुकते हैं, तो केंद्र सरकार, विशेष रूप से उप राज्यपाल वी.के. सक्सेना तथा गृह मंत्री अमित शाह की छीछालेदर ख़ुद ही होगी तथा जनता उनके निकम्मेपन की स्वत: ही निंदा करेगी।
दिल्ली पुलिस को भी बढ़ते अपराधों को कम करने के लिए हर ठोस क़दम उठाने की आवश्यकता है। परन्तु सच्चाई यह भी है कि दिल्ली पुलिस किसी का मोबाइल चोरी होने, किसी से छेड़छाड़ होने, किसी पर हमला होने की आशंका तथा किसी के लापता होने के रिपोर्ट दर्ज नहीं करनी चाहती। क्या दिल्ली पुलिस अपराध होने की प्रतीक्षा करती है? मोटे-मोटे अक्षरों ‘दिल्ली पुलिस हमेशा आपकी सेवा में तत्पर’ लिख देने तथा लाउडस्पीकर पर हमेशा इस घोषणा को दोहराने भर से दिल्ली सुरक्षित नहीं हो सकेगी। इसके लिए दिल्ली पुलिस को पूरी निष्ठा तथा लगन से अपराधियों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने की आवश्यकता है।
भाजपा को उसी की तर्ज पर विपक्षी गठबंधन ने दे दी चुनौती
विपक्ष ने अपने गठबंधन का नाम इंडिया (I.N.D.I.A.) रखकर भाजपा को असहज कर दिया है। धर्म और राष्ट्रवाद के सहारे राजनीति करने वाली भाजपा के इस एकाधिकार को विपक्ष ने इस बार अलग अंदाज़ में चुनौती दे दी है। विपक्ष ने अपने लिये नारा भी राष्ट्रवाद से जुड़ा चुना है- ‘जीतेगा भारत।’
विपक्ष ने इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव अलायंस (इंडिया) नाम बहुत सोच समझकर रखा है। विपक्ष के बड़े नेताओं की मानें, तो यह नाम राहुल गाँधी ने दिया है। सन् 2014 के बाद यह पहला अवसर है, जब विपक्ष को सिर्फ़ उसके नाम के ही आधार पर ऐसी चर्चा देश भर में मिल गयी है। विपक्ष ने हाल के दिनों में अपने गठबंधन को तेज़ी से आकार दिया है। यह इस बात से भी ज़ाहिर हो जाता है कि गठबंधन के 26 दलों में, जिनके सदस्य संसद में हैं; उन्होंने भाजपा (एनडीए) सरकार के ख़िलाफ़ साझा रणनीति अपनायी है। विपक्ष की तेज़ी का ही असर था कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को भी लम्बे समय बाद साझी बैठक करनी पड़ी।
हाल के दो लोकसभा चुनावों में भाजपा ने ख़ुद को हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का चैम्पियन बताकर चुनाव लड़ा और उसे सफलता भी मिली। निश्चित ही 2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात और 2023 में कर्नाटक के चुनाव में भाजपा ने खुलकर इस मुद्दे को अपनाया। लेकिन उसे सफलता मिली-जुली ही मिली। बंगाल, कर्नाटक और हिमाचल में उसे नाकामी मिली और दो जगह कामयाबी। भाजपा के इस राष्ट्रवाद को विपक्ष ने उसी की पिच पर जाकर चुनौती दी है। विपक्ष, जैसा कि राहुल गाँधी अक्सर कहते हैं कि ‘भाजपा के राष्ट्रवाद के विपरीत कांग्रेस (विपक्ष) का राष्ट्रवाद संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित है, जो भारत की धर्मनिरपेक्ष सोच पर आधारित है।’
देखें, तो राष्ट्रवाद वास्तव में कांग्रेस का नारा था। आज़ादी के समय से ही। लेकिन भाजपा ने बहुत चतुराई से इसे कांग्रेस से छीन लिया। आज़ादी से पहले की बात करें, तो स्वतंत्रता आन्दोलन में कांग्रेस की ही भूमिका था; आरएसएस की नहीं। नरम और गरम दल दोनों के ही अधिकतर नेता कांग्रेस की ही विचारधारा में पले, बढ़े; या फिर वामपपंथी तेवर के साथ, जिसमें देश के लिए जान भी दे देने का ज़ज़्बा शामिल था।
आरएसएस तो कहीं तस्वीर में कभी रहा ही नहीं। लेकिन भाजपा ने पिछले दो दशक में राष्ट्रवाद का नारा कांग्रेस से चुराकर अपना बना लिया। हाँ, एक अंतर यह ज़रूर है कि भाजपा का राष्ट्रवाद ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ है, जबकि कांग्रेस का ‘समग्र राष्ट्रवाद’।
यानी सभी धर्मों और समुदायों से मिलकर बना राष्ट्रवाद। गठबंधन को इंडिया नाम देकर विपक्ष ने इसी राष्ट्रवाद को अपनाकर भाजपा को चुनौती देने की ठानी है।
विपक्षी गठबंधन के ‘इंडिया’ नाम रखने से भाजपा ख़ेमे में चिन्ता है। यह उसके नेताओं के बयान से साफ़ ज़ाहिर होता है। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री अब अपने हर भाषण में ‘इंडिया’ नाम का ज़िक्र करने लगे हैं। एक बार उन्होंने विपक्ष के ‘इंडिया’ नाम की तुलना ‘इंडियन मुजाहिदीन’ और ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ से कर दी। अगले भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- ‘भ्रष्टाचार छोड़ो इंडिया, परिवारवाद छोड़ो इंडिया।’ भाजपा की कोशिश ‘विपक्ष के इंडिया’ को बदनाम करने की है, ताकि उसके ‘अपने इंडिया’ के लिए चुनौती पैदा न हो। लेकिन राहुल गाँधी समेत विपक्षी गठबंधन के नेता भाजपा की इस बेचैनी को समझ रहे हैं और उसी तर्ज में जवाब भी दे रहे हैं। लेकिन आख़िर में यह इंडिया (देश) की जनता होगी, जो यह तय करेगी कि वास्तव में किसका ‘इंडिया’ उसे पसन्द है- भाजपा का या विपक्ष का। अर्थात् ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ या ‘समग्र राष्ट्रवाद।’
देखा जाए, तो विपक्ष का यह इंडिया नामकरण कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से उपजा है। राहुल का ‘द आइडिया ऑफ इंडिया’ समग्र राष्ट्रवाद की बात करता है- ‘एक ऐसा राष्ट्रवाद, जो देश के सभी धर्मों और समुदायों को समाहित करता है; न कि भाजपा के हिन्दू राष्ट्रवाद की तरह एक ही धर्म की बात करता है।’
कहा जा सकता है कि 2024 का चुनाव इस ‘समग्र राष्ट्रवाद’ और ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ के बीच होना है। विपक्ष इसी एजेंडे के साथ आगे बढ़ेगा और भाजपा विपक्ष (कांग्रेस) के इस राष्ट्रवाद को भ्रष्ट, परिवारवादी, देश-विरोधी आदि-आदि बताती जाएगी।
साफ़ है कि विपक्ष ने अपने गठबंधन का नाम ‘इंडिया’ रखकर भाजपा के एकाधिकार को गम्भीर राजनीतिक चुनौती दे दी है। यह भाजपा के ‘हिन्दू राष्ट्र’ के एजेंडे को भी चुनौती होगी। हो सकता है भाजपा किसी ‘प्रॉक्सी’ के ज़रिये विपक्ष के इंडिया नाम के ख़िलाफ़ कोर्ट में पहुँचे और विपक्ष को ‘इंडिया’ नाम इस्तेमाल करने से रोकने की कोशिश करे। देखना दिलचस्प होगा कि यदि ऐसा होता है, तो उसका क्या नतीजा निकलता है? क़ानून के ज़्यादातर जानकार मानते हैं कि शायद ही अदालत विपक्ष को ऐसा करने से रोकेगी; क्योंकि देश में कई ऐसे राजनीतिक दल हैं, जिनके नाम में इंडिया शब्द इस्तेमाल होता है। राहुल गाँधी की कोशिश हाल के महीनों में भाजपा के राष्ट्रवाद को भेदभावपूर्ण, बहुसंख्यकवादी और हिंसक बताने की रही है।
‘भारत जोड़ो यात्रा’ का मक़सद भी उन्होंने यही बताया था और इसे ‘मोहब्बत की दुकान’ कहा है यानी देशज के हर नागरिक से प्यार, नफ़रत नहीं। ज़मीनी जानकारी बताती है कि राहुल गाँधी को इस यात्रा से अपनी छवि बदलने और ख़ुद को जनता की बीच पहुँचाने में सफलता मिली है। राहुल यह सन्देश देने में सफल रहे कि उनकी यात्रा सत्ता के लिए नहीं, बल्कि देश को बचाने की है। अब इंडिया नाम रखकर गठबंधन यही सन्देश दे रहा है।
गठबंधन की रणनीति
कांग्रेस इस महागठबंधन का नेतृत्व अभी नहीं कर रही; लेकिन बेंगलूरु की बैठक में जिस तरह सभी नेता कांग्रेस के इर्द-गिर्द दिखे, उससे साफ़ लगता है कि इन दलों ने यह महसूस कर लिया है कि कांग्रेस के ही नेतृत्व में भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती दी जा सकती है। महागठबंधन अब मुम्बई की बैठक में आगे जाने की बड़ी चीज़ेंतय करेगा।
यह बैठक 20-22 अगस्त तक होने की संभावना है। हालाँकि अभी तारीख़ तय नहीं की गयी है। बेंगलूरु बैठक के दौरान सीटों के बँटवारे को लेकर चर्चा नहीं हुई थी। बैठक में भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए वैकल्पिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक एजेंडा देने पर ज़रूर सहमति बनी है। सीटों पर बँटवारे में शायद अभी व$क्त लगे।
इंडिया गठबंधन के सभी दल एक समय में एक ही काम करने की रणनीति पर चल रहे हैं। संसद के मानसून सत्र में जिस तरह से विपक्ष ने कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार को मणिपुर और अन्य मुद्दों पर घेरा है, उससे ज़ाहिर है कि संसद में भी यूपीए की जगह ‘इंडिया’ सरकार से लड़ रहा है। शायद भाजपा को भी इसकी उम्मीद नहीं रही होगी।
गठबंधन अब मुम्बई की बैठक में शायद गठबंधन के अध्यक्ष और संयोजक के अलावा अन्य पदाधिकारियों के नामों को अन्तिम रूप दे दे। गठबंधन के एक नेता ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘मुम्बई की बैठक में हम 11 सदस्यों वाली एक समन्वय समिति को अन्तिम रूप दे सकते हैं।’
गठबंधन अलग-अलग समितियाँ गठित करने पर भी काम कर रहा है, जो अलग-अलग मुद्दों को देखेंगी। मुम्बई में ‘इंडिया’ में शामिल 26 दलों के बीच सीट-बँटवारे, चुनाव की तैयारियों और प्रचार प्रबंधन को लेकर चर्चा होनी है। गठबंधन अपना मुख्य सचिवालय दिल्ली में बनाने पर भी सहमत हो सकता है। यह तय है कि गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले देश भर में बड़ा अभियान शुरू करेगा। देश के विभिन्न हिस्सों में बैठकें आयोजित होंगी और भाजपा पर प्रहार किया जाएगा।
कोई चेहरा नहीं
गठबंधन किसी एक नेता को अभी अपने चेहरे के तौर पर सामने नहीं करेगा। पिछली दो बैठकों में दिखा है कि ज़्यादातर दलों का झुकाव राहुल गाँधी की तरफ़ है। लेकिन उनकी लोकसभा सदस्यता का मामला अभी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। यदि उनकी सदस्यता बहाल हो जाती है, तो यह कांग्रेस ही नहीं गठबंधन के लिए भी बड़ी जीत होगी। राहुल गाँधी ही गठबंधन में ऐसे नेता हैं, जिनकी राष्ट्रव्यापी छवि है। बेंगलूरु की बैठक के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह चुकी हैं कि वह प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार नहीं हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कुछ ऐसा ही कह रहे हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि टीवी चैनलों के हाल में गठबंधन के नेता को लेकर किये सर्वे में भी अधिकतर लोग राहुल गाँधी को ही नेता के रूप में सबसे ज़्यादा वोट दे रहे हैं। वैसे इस दौड़ में ममता बनर्जी, शरद पवार, नीतीश कुमार से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक का नाम लिया जाता है। लेकिन कांग्रेस के गठबंधन वाले यूपीए के मुख्यमंत्री भी राहुल गाँधी के ही हक में दिखते हैं, जिनमें तमिलनाडु के एम.के. स्टालिन से लेकर झारखण्ड के हेमंत सोरेन तक शामिल हैं।
मुम्बई की बैठक में गठबंधन सोनिया गाँधी को अपना अध्यक्ष बनाने की घोषणा कर सकता है। बेंगलूरु की बैठक में सोनिया गाँधी ने जो सक्रियता दिखायी थी, उससे साफ़ है कि वह इस भूमिका को निभाने के लिए तैयार हैं। सोनिया गाँधी की उपस्थिति ने इस बैठक में मीडिया का ध्यान भी अपनी तरफ़ काफी खींचा था, जिससे विपक्ष में सोनिया गाँधी के महत्त्व का पता चलता है। भाजपा ने इसे कांग्रेस के गठबंधन को हाईजैक करने से जोड़ा और प्रचार भी किया कि नीतीश कुमार गठबंधन का नाम इंडिया रखे जाने से ख़ुश नहीं हैं। हालाँकि एक दिन के ही भीतर नीतीश कुमार ने बयान देकर साफ़ कर दिया कि यह बात सही नहीं है और सब मिलकर भाजपा को हराएँगे।
सीटों का पेच
कांग्रेस के रणनीतिकारों ने देश भर में अपनी मज़बूत सीटों या उन सीटों जो बदले माहौल में (भविष्य के विधानसभा चुनाव नतीजों के कारण) उसकी झोली में आ सकती हैं; को लेकर खाका तैयार कर लिया है।
‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, पार्टी 390 से 400 सीटों पर लडऩे पर ज़ोर दे सकती है। हालाँकि कांग्रेस के रणनीतिकार इस चीज़ का ध्यान रखेंगे कि साथी विपक्षी दलों का सीटों के बँटवारे में कोई विरोध नहीं रहे। शायद कोशिश रहेगी कि जहाँ भी कांग्रेस का उम्मीदवार हो, वहाँ साथी विपक्षी दल का उम्मीदवार न उतरे और न कांग्रेस का अपना उम्मीदवार अन्य दलों की सीटों पर उतरे। कांग्रेस 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में 400 से अधिक सीटों पर लड़ती रही है और 2009 में उसे 200 से ज़्यादा सीटें मिली थीं।
देश भर में 152 सीटें ऐसी हैं, जहाँ कांग्रेस की सीधी टक्कर भाजपा से है और दूसरे दलों का अस्तित्व नहीं है। कांग्रेस मान रही है कि यदि वह ख़ुद को मज़बूत करती है, तो 2019 के मुक़ाबले इस बार भाजपा को ज़्यादा सीटों पर मात दे सकती है। ऐसी स्थिति में भाजपा की यह सीटें सीधे उसके कुल योग से घट जाएँगी। कांग्रेस मानकर चल कि दक्षिण में इस बार भाजपा की बहुत-सी सीटें कांग्रेस की झोली में आएँगी। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, इस बार लोकसभा चुनाव में पार्टी राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, असम, गुजरात, हिमाचल और उत्तराखण्ड में भाजपा को क्लीन स्वीप नहीं करने देगी और ऐसी रणनीति बनाएगी कि विधानसभा में जीती सीटों और लोकसभा की सीटों में ज़्यादा अन्तर न रहे। इन राज्यों में 152 लोकसभा सीटें हैं और भाजपा ने 2019 में इनमें से अधिकतर सीटें जीतकर केंद्र में सरकार बनायी थी। इन राज्यों में कांग्रेस को ख़ुद अपनी लड़ाई लडऩी होगी, क्योंकि दूसरे दल वहाँ ज़्यादा प्रभाव नहीं रखते।
यही नहीं, कांग्रेस इस बार तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी $खूब ज़ोर लगाने की तैयारी में है। कांग्रेस ने उन सीटों को चिह्नित किया है, जहाँ उसके जीतने की सबसे ज़्यादा संभावना है। इन राज्यों के आलावा कांग्रेस दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार में दूसरे दलों पर निर्भर रहेगी और वहाँ उसे का$फी कम सीटें लडऩे को मिलेंगी। हाँ, पंजाब में वह कुछ कर सकती है; लेकिन आप के गठबंधन में होने से वहाँ भी मिल-बाँटकर ही खाना होगा। पार्टी वहाँ 6-7 सीटों की माँग कर सकती है। सन् 2019 में कांग्रेस 421 सीटों पर लडक़र 52 सीटों पर जीती थी; लेकिन इस बार उसे अपना आँकड़ा का$फी ऊपर जाने की उम्मीद है।
इसके अलावा सन् 1999 में कांग्रेस ने 453 सीटों में से 114 सीटें, सन् 2004 में 417 में से 145 सीटें, सन् 2009 में 440 सीटों पर लडक़र 206 सीटें और सन् 2014 में 464 सीटों पर लडक़र सिर्फ़ 44 सीटें जीती थीं। यदि सीटों पर तालमेल सही से बैठ जाता है, तो इसका सबसे ज़्यादा लाभ कांग्रेस को ही मिलेगा; यह तय है।
भारत जोड़ो यात्रा-2बदलेगी माहौल?
राहुल गाँधी ‘भारत जोड़ो यात्रा-2’ की तैयारी कर रहे हैं। यह यात्रा गुजरात के पोरबंदर से त्रिपुरा के अगरतला तक की हो सकती है। उत्तर प्रदेश सहित कुछ चुनावी राज्यों में यह यात्रा होगी। अकेले उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं।
‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, राहुल गाँधी प्रदेश में पूरे 23 दिन यात्रा करेंगे। कांग्रेस की कोशिश है कि यात्रा से पहले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी कुछ जगह साथ रखने के लिए सहमत कराया जा सके। यही नहीं, रालोद के जयंत चौधरी, जो बेंगलूरु बैठक में शामिल हुए थे; को राहुल गाँधी के साथ यात्रा में शामिल करने की कोशिश की जाए। कांग्रेस रालोद के साथ गठबंधन कर ले, तो हैरानी नहीं होगी।
इसके अलावा बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव यात्रा में राहुल गाँधी के साथ नज़र आ सकते हैं। कांग्रेस का फोकस पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर है और उसकी नज़र लोकसभा की 27 सीटों पर है। सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 21 जीती थीं और उसके नेता मानते हैं कि राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ राज्य में उसे फिर ऐसा कारण का अवसर दे सकती है। ‘भारत जोड़ा यात्रा-2’ का ज़िम्मा इस बार मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पर होगा, जो इसकी रूपरेखा बनाने में जुटे हैं। यात्रा का संभावित महीना सितंबर हो सकता है। यदि 2 अक्टूबर की तारीख़ तय हुई, तो यात्रा गुजरात के पोरबंदर से शुरू की जा सकती है। यह यात्रा त्रिपुरा तक जाएगी। पिछली यात्रा में राहुल उत्तर प्रदेश पहुँते तो थे; लेकिन $गाज़ियाबाद से प्रवेश करते हुए शामली, बा$गपत होते हुए हरियाणा चले गये थे। ‘भारत जोड़ो यात्रा-2’ का मार्ग मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए तय होगा।
अब चूँकि विपक्षी गठबंधन आकार ले चुका है, जनता को एकता का सन्देश देने के लिए कुछ राज्यों में राहुल गाँधी के साथ विपक्ष के बड़े नेता भी शामिल हो सकते हैं। राजनीति के जानकार यह बार-बार कह चुके हैं कि राहुल गाँधी ने जनता की बीच जाकर साबित कर दिया है कि जनसंवाद का कोई विकल्प नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक एस.पी. शर्मा कहते हैं कि राहुल गाँधी की छवि पिछली यात्रा के बाद काफी बदली है। उन्होंने कहा- ‘भाजपा से लडऩे के लिए उसे जनता की बीच जाना ही होगा। राहुल गाँधी ने पहली यात्रा से जो शुरुआत की थी, उससे कांग्रेस को कर्नाटक और हिमाचल में चुनावी लाभ मिला। यही नहीं, दक्षिण में कांग्रेस अपने पक्ष में माहौल बनाती दिख रही है, जिससे भाजपा में भी बेचैनी है।’
भाजपा पहले ही 2024 के लिए महा जनसम्पर्क अभियान शुरू कर चुकी है। ‘टिफिन’, ‘मेरा बूथ सबसे मज़बूत’, ‘पन्ना प्रमुखों की बैठक’ इसका हिस्सा हैं। ऐसे में कांग्रेस (विपक्ष) को भी तेज़ी दिखानी होगी और जनसंवाद इसका सबसे बेहतर औज़ार है। इसे पहले देश लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा (कई प्रदेश, 1990), अखिलेश यादव की साइकिल यात्रा (यूपी, 2012), प्रजा संकल्प यात्रा (आंध्रा प्रदेश 2018) जैसे उदाहरण हैं; जब नेताओं ने यात्राओं के ज़रिये जनसंवाद करके अपने-अपने दलों को सत्ता में लाने में अहम भूमिका अदा की। ऐसे ही राहुल गाँधी की 2022-23 की भारत जोड़ो यात्रा का भी व्यापक असर दिखा है। यदि इसका दूसरा चरण भी होता है, तो निश्चित ही इसका असर दिखेगा। लिहाज़ा भारत जोड़ो यात्रा-2 के रूट पर रणनीति तैयार हो रही है। तय है कि राहुल गाँधी की यह यात्रा भी ज़्यादा लम्बी हो सकती है।
“आज़ादी का आन्दोलन जब पूरी प्रखरता पर था, तो महात्मा गाँधी ने जो नारा दिया था; आज फिर से देश के कल्याण के लिए उस नारे की ज़रूरत है। महात्मा गाँधी ने नारा दिया था- अंग्रेजों भारत छोड़ो (क्विट इंडिया) और अंग्रेजों को देश छोडक़र जाना पड़ा था। जैसे गाँधी जी ने भारत छोड़ो का नारा दिया था। वैसे ही आज का मंत्र है- भ्रष्टाचार छोड़ो इंडिया, परिवारवाद छोड़ो इंडिया, तुष्टिकरण छोड़ो इंडिया। यह क्विट इंडिया ही देश को बचाएगा।’’
नरेंद्र मोदी
(राजस्थान में भाषण के दौरान)
“आपको जो कहना है, वो कहिए मिस्टर मोदी! हम इंडिया हैं। ये गठबंधन देश के साथ है। लड़ाई किसके लिए है? आक्रमण किस पर हो रहा है? हमला किस पर हो रहा है? देश के संविधान, लोगों, संस्था, प्रजातंत्र पर। ये भारत बनाम मोदी है। हमारा उद्देश्य देश, लोकतंत्र और संविधान को बचाना है। यही आइडिया ऑफ इंडिया है।’’
राहुल गाँधी
कांग्रेस नेता
‘हमारा फेवरेट…’
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी ने बेंगलूरु बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में जहाँ एनडीए पर निशाना साधा, वहीं राहुल गाँधी की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘हमारा फेवरेट राहुल गाँधी।’ सभी का ध्यान इस पर ममता की तरफ़ गया।
इससे पहले पटना की बैठक में रालोद नेता लालू यादव ने राहुल गाँधी को दूल्हा बनने की सलाह देते हुए कहा था- ‘आप दूल्हा बनिए, हम आपके बाराती बनेंगे।’ ज़ाहिर है विपक्ष में अब राहुल गाँधी को लेकर भरोसा बढ़ा है। लेकिन बहुत चर्चा है कि यदि राहुल गाँधी मानहानि मामले में क़ानूनी पेच में उलझे, तो उनकी जगह कांग्रेस प्रियंका गाँधी को आगे करेगी या अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े को।
कहते हैं ख़रीदार होना चाहिए और क़ीमत सही हो, यहाँ सब कुछ बिकता है। महिला पहलवानों से यौन उत्पीडऩ मामले के साथ क़रीब 40 मामलों में पहले से आरोपी रहे सांसद ब्रजभूषण सिंह को ज़मानत मिल गयी। जो खिलाड़ी पीडि़त थीं, वे बिना ट्रायल के एशियन गेम में खेलेंगी। दाँव पर लगी केंद्र की मोदी सरकार की इज़्ज़त बच गयी। खिलाडिय़ों के समर्थन में खड़े होने वाले जो तथाकथित किसान नेता थे, वे भी बरी हो गये। यानी इस संगीन मामले में सबके अपने-अपने हित सध गये और सबके दोनों हाथों में लड्डू आ गये।
कहना पड़ेगा कि सबको इज़्ज़त बीच बाज़ार लाने का इनाम मिल गया। यानी इस खेल में इज़्ज़त, स्वाभिमान, आत्मसम्मान, सब कुछ बिका और जो लोग निष्पक्ष और सच्चे मन से पीडि़त महिला खिलाडिय़ों के साथ आकर खड़े हुए, वे सरकार और पुलिस की नज़रों में आ गये और उनकी सूची पहले ही पुलिस के पास बनी पड़ी है। हो सकता है कि घटना ताज़ा है, इसलिए पुलिस उन लोगों पर हाथ न डाले; लेकिन क्या भरोसा कि वे कब, किस जुर्म के कथित आरोप के बहाने दबोच लिये जाएँ?
बहरहाल छ: महिला पहलवानों, जिन्हें अब तक पीडि़त मानकर पूरा देश उनके साथ खड़ा था, उनके भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीडऩ के आरोप धुले तो नहीं हैं; लेकिन भद्दे ज़रूर पड़ गये हैं। बेटियों की इज़्ज़त करने वाले किसान, ख़ासतौर पर जाट किसान और इन महिलाओं के साथ न्याय की भीख माँगने वाले हैरान हैं कि यह क्या हुआ? इस मामले में दिल्ली पुलिस ने जिस प्रकार से मामले में जो भूमिका निभायी, वो किसी से छिपी नहीं है। आरोपी पर पॉस्को एक्ट हट ही गया। बाक़ी मामलों की हीला-हवाली हुई, उसके चलते कई हित एक साथ सध गये। मेरे विचार से इस मामले में दिल्ली पुलिस की भी सराहना की जानी चाहिए कि किस तरह उसने इस मामले को निपटाया। मैं उन पहलवान बेटियों की भी पीठ थपथपाना चाहूँगा, जिन्होंने आगे से किसी भी पीडि़त बेटी के लिए न्याय के रास्ते बंद करके एक बीच का रास्ता निकाला है, जो कि अब किसी भी ताक़तवर व्यक्ति के ख़िलाफ़ लडऩे की पीडि़त बेटियों की हिम्मत तो ज़रूर तोड़ देगा। इन बेटियों ने जैसे ही अपने हित सधते देखे, उन सभी लोगों को निराश करते हुए एक प्रकार के गोपनीय समझौते को मौन स्वीकृति दे दी, जो कभी नहीं होना चाहिए था।
पिछले दिनों राउज एवेन्यू कोर्ट में पुलिस की चार्जशीट पर आरोपी बृजभूषण शरण सिंह को ज़मानत मिलना इस बात की तस्दीक़ है कि किसी भी ताक़तवर व्यक्ति के लिए कोई भी अपराध चुटकी बजाने जितना आसान है। इस मामले में बीती 18 जुलाई को हुई सुनवाई में राउज एवेन्यू कोर्ट ने कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह और उससे महिला पहलवानों को अकेले में मिलवाने वाले कुश्ती महासंघ के सहायक सचिव विनोद तोमर को भी 25,000 के निजी मुचलके पर अंतरिम ज़मानत मिल गयी।
सोचिए, जिस देश में इतने बड़े आरोप की इतनी सस्ती ज़मानत मिलती हो, वहाँ अपराधों को कौन रोक सकेगा? हालाँकि राउज एवेन्यू कोर्ट ने बृजभूषण सिंह को बग़ैर अदालत की अनुमति के देश छोडक़र जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है और अब इस मामले में सुनवाई जारी है। जानकारी के मुताबिक, पुलिस रिपोर्ट में दिये गये दस्तावेज़ों की जाँच होगी। अफ़सोस की बात यह है कि यौन उत्पीडऩ की शिकायत करने वाली महिला पहलवानों के वकीलों ने भी आरोपी की ज़मानत पर आपत्ति दर्ज नहीं करायी, सिर्फ़ ज़मानत में शर्ते लगाने का आग्रह किया। यहाँ यह बताना भी ज़रूरी है कि बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ पॉस्को का मामला रद्द हो गया था और आईपीसी की धारा-506 (आपराधिक धमकी देने), धारा-354 (महिला की शीलता भंग करने), धारा-354-ए (यौन उत्पीडऩ करने) और धारा-354-डी (पीछा करने) के तहत दिल्ली पुलिस ने आरोप तय किये हैं।
ग़ौरतलब है कि ब्रजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ कुल छ: मामलों की चार्जशीट जून में दिल्ली पुलिस ने जारी की थी, जिसमें पुलिस की जाँच टीम ने कुल 108 गवाहों के बयान दर्ज किये हैं। इन गवाहों में महिला पहलवानों के कोच और रेफरी समेत क़रीब 15 ने पहलवानों के आरोपों को सही बताया है। पुलिस ने अपने आरोप पत्र में कहा है कि एक मामले में ब्रजभूषण सिंह ने कई बार और लगातार उत्पीडऩ किया।
बहरहाल जानकारों का कहना है कि पहलवानों के गृह मंत्री अमित शाह और खेल मंत्री अनुराग ठाकुर से मिलने के बाद न सिर्फ़ पहलवानों का आन्दोलन कमज़ोर पड़ा, बल्कि पहलवानों को मना भी लिया गया, ताकि सरकार की नाक कटने से बची रहे और उसका एक ऐसा बाहुबली नेता भी, जिसका अपने इलाक़े में काफ़ी राजनीतिक रसूख़ और दबदबा है। जानकारों का तो यहाँ तक कहना है कि बृजभूषण शरण सिंह मोदी सरकार की वो नस है, जिसके कट जाने से सरकार के प्राण हलक़ में आ जाते और प्रधानमंत्री मोदी तक पर इसका गहरा असर पड़ता, इसलिए इस मामले को बड़ी होशियारी से ठंडा करने की पूरी कोशिश की जा रही है।
न्याय व्यवस्था का एक तरफ़ बृजभूषण शरण सिंह का मामला है, तो दूसरी अलावा मुज़फ़्फ़रनगर में चर्चा का विषय बना हुआ है कि महिला खिलाडिय़ों के आन्दोलन में शामिल होकर सक्रिय भूमिका निभाने और हरिद्वार में खिलाडिय़ों के पदक गंगा में प्रवाहित न करने देने और विवादित बृजभूषण सिंह पर अच्छा बयान देने का इनाम कथित तौर पर किसान यूनियन (टिकैत) के अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत को भी बख़ूबी मिला है। विदित हो कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के ज़िले मुज़फ़्फ़रनगर के किसान नेता चौधरी जगबीर सिंह की सन् 2003 के हत्या के मामले में चौधरी नरेश टिकैत को भी हाल ही में दोषमुक्त किया गया है। अपर सत्र न्यायालय के पीठासीन अधिकारी ने उन्हें ज़मानत दे दी।
इस केस में पुलिस के अलावा एसआईटी और सीबीसीआईडी ने पहले ही नरेश टिकैत को क्लीन चिट दी थी। बता दें कि किसान नेता जगबीर सिंह की हत्या 6 सितंबर, 2003 को भौराकलां थाना क्षेत्र के अलावलपुर माजरा गाँव में हुई थी। पूर्व मंत्री एवं रालोद नेता योगराज सिंह ने इस मामले में अलावलपुर गाँव के राजीव और प्रवीण के अलावा सिसौली निवासी भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा दर्ज कराया था।
बरहराल देश की क़ानून व्यवस्था किस तरह से दोहरे मापदंडों पर चलती है, यह कोई नयी बात नहीं है। पुराने जमाने से यहाँ यही सब होता आया है। पंचायतों के दौर में भी पैसे वालों के साथ नरमी से पेश आया जाता था और आज संविधान के मुताबिक क़ानून होने के बाद भी वही सब इतिहास दोहराया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में आजकल कई ऐसे उदाहरण देखने को आसानी से मिल जाते हैं, जिमसें अपराध करने वालों को बेल और निर्दोषों को जेल होती दिख जाएगी। हाथरस, उन्नाव, बदायूँ, लखीमपुर खीरी, गोरखपुर, प्रयागराज में हम उत्तर प्रदेश पुलिस का दोहरा चरित्र देख ही चुके हैं। दिल्ली में भी पहलवान बेटियों के धरने के दौरान दिल्ली पुलिस का दोहरा चरित्र साफ़-साफ़ नज़र आया; लेकिन इसके बावजूद पुलिस कोई इसका कोई अफ़सोस नहीं होता। आज के समय में अगर कोई मामूली आदमी अपनी परेशानी लेकर पुलिस थाने जाता है, तो पुलिस उसके साथ किस तरह का व्यवहार करती है और अगर कोई रसूख़दार आदमी पुलिस को अपनी शिकायत देता है, तो पुलिस उसके साथ किस तरह का व्यवहार करती है, ये किसी से छिपा नहीं है। वहीं दूसरी ओर रसूख़दारों और राजनीति से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ सालोंसाल मुक़दमे चलने के बावजूद उन्हें सज़ा नहीं होती, वहीं कई बार निर्दोष लोगों को सज़ा हो जाती है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि क़ानून व्यवस्था बिलकुल चौपट है और पुलिस और अदालतें अपना फ़र्ज़ नहीं निभा रही हैं। लेकिन इतना ज़रूर है कि जो सत्ता में होता है या फिर ताक़तवर होता है, उसके ख़िलाफ़ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती। क्या क़ानून सिर्फ़ $गरीबों के लिए हैं?
इस मामले ने देश की क़ानून व्यवस्था के दोहरे चेहरे को हमारे सामने उजागर किया है, जिसमें एक तरफ़ दुनिया भर में देश और अपना नाम करने वाली महिला पहलवानों से अभद्रता करने वाले माफ़िया और दबंग भाजपा सांसद बृजभूषण सिंह का मामला है और दूसरी तरफ़ देश के कई कथित घोटालेबाज़ आज सत्ताधारी दल के साथ नज़र आते हैं। जिन पर कभी सत्ताधारी दल के नेता गंभीर आरोप लगाते थे, आज वे सफेदपोश हैं। क्योंकि उनके तमाम घोटाले घपलों के ऊपर स$फेद चादर जो डाल दी गयी है, जिससे उनके दा$ग किसी को दिखायी नहीं देते हैं। क्योंकि वह सत्ताधारी दल के सियासी मददगार जो बन गये हैं।
इतना ही नहीं आज देश में कई ऐसे मामले भी हैं, जिनमें आरोप लगते ही लोगों को सज़ा हो जाती है, भले ही वो दोषी न हों। हम देखते हैं कि देश में समय-समय पर कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जब किसी को कई साल की सज़ा के बाद लोग निर्दोष पाये जाते हैं और उन्हें आरोपों से बरी करते हुए जेलों से रिहा किया जाता है। लेकिन कहावत है कि समरथ को नहिं दोष गुसाईं। हालाँकि मैं इस पक्ष में नहीं हूँ कि दोषी ताक़तवर हो, तो उसे माफ़ किया जाना चाहिए। अगर ऐसा ही करना हो, तो फिर एक देश, एक क़ानून या फिर समान क़ानून नागरिक संहिता यानी यूसीसी की वकालत करने की क्या ज़रूरत है? देश में फिर तो एक संविधान की भी कोई ज़रूरत नहीं है। जब अपराध सामने वाले के ताक़त और पैसा देखकर तय किये जाएँ, फिर इन सबकी क्या ज़रूरत है? ग़रीबी और अमीरी देखकर ही फैसले किये जाने चाहिए।
आजकल प्राय: अधिकतर को देखो, वे आँख के लालीपन लिये घूमते नज़र आएँगे और दूसरों को ये रोग बाँटते फिरते रहेंगे। दरअसल यह कंजंक्टिवाइटिस रोग है। अभी मौसम में बदलाव एवं गरम को छोड़ ठंडे की ओर बढऩा ही आपस में वायरस द्वारा संक्रमित होने का मुख्य कारण पाया जा रहा है। हम इस लेख में आँख आने के कारणों को जानेंगे। साथ ही यह भी कि इससे हम कैसे बच सकेंगे? इस रोग में आँखों का सफ़ेद भाग लाल या गुलाबी दिखने लगता है। इसलिए इसे ‘पिंक आई’ भी कहा जाता है।
वैसे तो कंजंक्टिवाइटिस कई तरह के होते हैं। जैसे- एक्यूट या क्रोनिक, वायरल कंजंक्टिवाइटिस, बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस, एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस, रसायनों का एक्सपोज़र, नवजात शिशुओं में टियर डक्ट के (अश्रु नलिका) बन्द होने के कारण कंजंक्टिवाइटिस की समस्या हो सकती है। यह एक अत्यंत संक्रामक स्थिति है, इसलिए इसका तुरन्त उपचार ज़रूरी है।
किसको हो सकता है?
किसी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में आना, जिसे वायरल या बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस है।
किसी ऐसी चीज़ के सम्पर्क में आना, जिससे आपको एलर्जी (एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस) है।
रसायनों का एक्सपोज़र; जैसे- स्विमिंग पूल के पानी में मौज़ूद क्लोरीन के सम्पर्क में आना।
कॉन्टेक्ट लेंस का इस्तेमाल करना; विशेषकर लगातार उन्हें लम्बे समय तक लगाये रखना।
संक्रमण कैसे रोकें?
कंजंक्टिवाइटिस को फैलने से रोकने के लिए सा$फ-स$फाई रखना सबसे ज़रूरी है। इसके अलावा इन बातों का ध्यान भी रखें :-
अपनी आँखों को अपने हाथ से न छुएँ।
जब भी ज़रूरी हो अपने हाथों को धोएँ।
अपनी निजी चीज़ों, जैसे- तौलिया, तकिया, आई कॉस्मेटिक्स (आँखों के मेकअप) आदि को किसी से साझा न करें।
अपने रूमाल, तकियों के कवर, तौलिया आदि चीज़ों को रोज़ धोएँ।
होम्योपैथिक दवा
रोज़ सुबह शाम बेलाडोना 200 की $खुराक दिन में दो बार एक सप्ताह तक लेने से आप बच सकते हैं। और अगर आपको संक्रमण हो गया है, तो यूफ्रेसिया 200 की दिन में तीन बार चार-चार गोली ठीक होने तक लेते रहें। दवा के साथ आप अगर यूफ्रेसिया ड्रॉप दिन में दो बार डालने से आपको जल्दी फायदा दिखेगा। दवा चिकित्सक के सलाह पर ही लें।
* डायरेक्टर, जेडीएस होम्योपैथिक
हॉस्पिटल, झारसुगुडा
लक्षण
कंजंक्टिवाइटिस बड़ा असुविधाजनक हो सकता है। लेकिन बहुत-ही दुर्लभ मामलों में इससे दृष्टि प्रभावित होती है।
यह का$फी संक्रामक होता है, और बहुत तेज़ी से दूसरे लोगों में भी फैल सकता है। इसलिए ये लक्षण दिखें, तो सतर्क हो जाएँ।
इस रोग में एक आँख या दोनों ही आँखें लाल या गुलाबी दिखायी देने लगती हैं।
एक आँख या दोनों आँखों में जलन या खुजली होना।
आसामान्य रूप से अधिक आँसू निकलना।
आँखों से पानी जैसा या गाढ़ा डिस्चार्ज निकलना।
आँखों में किरकिरी महसूस होना।
आँखों में सूजन आ जाना।
(ये लक्षण आमतौर पर एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस के कारण दिखायी देते हैं।)
अपने अज्ञातवास के समय एक बार लेनिन पेरिस (फ्रांस) की सडक़ों पर टहल रहे थे। भूखे ज़ोर की लगी थी, पैसे थे नहीं। एक वेटर ने उन्हें खाना खिलाया। जब लेनिन ने भविष्य में पैसे चुकाने के लिए उसका पता माँगा, तब वेटर ने कहा कि यह उसने सिर्फ़ मानवता के नाते किया था। सन् 1917 में क्रान्ति हो गयी और लेनिन रूस के राष्ट्रपति बने। उन्होंने उस वेटर के पास कुछ पैसे, एक महँगा उपहार और एक पत्र भेजा। उन्होंने लिखा- ‘आपने मेरे बुरे दिनों में मेरा साथ दिया, इसका धन्यवाद। आज मेरे अच्छे दिन आ गये हैं। मैं आपको कुछ तुच्छ उपहार भेज रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार कीजिए।’
उस वेटर ने उपहार एवं पैसे लौटाते हुए उसी पत्र के पिछले हिस्से पर लेनिन के लिए संदेश लिखा- ‘आप कृपया अन्यथा न लें। इसे स्वीकार करने का अर्थ होगा कि मैंने आपकी सहायता आपके अच्छे भविष्य में आपसे कुछ प्राप्त होने के प्रलोभन में की थी। इससे मानवता का उद्देश्य पराजित होगा। अत: मैं आपके पैसे और उपहार लौटा रहा हूँ। लेकिन अच्छे दिनों में अपने बुरे वक़्त के साथियों को यदि आप इसी तरह हमेशा याद रखेंगे; उनका सम्मान करेंगे; तो अच्छा वक़्त हमेशा आपके साथ बना रहेगा।’
भाजपा-संघ को इस प्रकरण का संदेश समझने की ज़रूरत है। पार्टी एक साल बाद आम चुनाव में उतरने की तैयारी में है; लेकिन काडर में असंतोष चरम की ओर है। आमतौर पर पूरी भगवा लॉबी दो तरह के काडर में बँटी थी- एक जनसंघ-भाजपा की दूसरा खांटी संघियों की। अब पिछले पाँच-छ: वर्षों में भाजपा का अनुशासित काडर लुप्तप्राय है। संघ का शेष है; लेकिन उसमें भी कालनेमियों की भरमार है, जो भाजपा के टिकट पर लाभार्थी बनने की फ़िरिक़ में हैं। आज कैमरे और सोशल मीडिया पर भाजपा नेताओं की जो चमक-दमक दिख रही है, बस ये ऊपर की गाज-फेन है। धरातल पर सब नदारद है।
लालकृष्ण आडवाणी ने सन् 2004 में भाजपा की स्तब्ध करने वाली पराजय की समीक्षा करते हुए लिखा था- ‘हालाँकि निष्क्रियता तथा भ्रष्टाचार विधिसम्मत शिकायतें हैं; लेकिन इससे भी ज़्यादा मतदाता और पार्टी के कार्यकर्ता निर्वाचित प्रतिनिधियों के अहंभाव से क्षुब्ध थे। कांग्रेस तथा कुछ अन्य व्यक्ति-केंद्रित राजनीतिक पार्टियों से अलग पार्टी कार्यकर्ता भाजपा की रीढ़ की हड्डी हैं। जहाँ पार्टी कार्यकर्ता रुठे रहते हैं या पूरी तरह से प्रेरित नहीं होते हैं, वहाँ जनता के सामने सरकार की सकारात्मक छवि नहीं बन पाती। अपने कार्यकाल के छ: वर्षों में हमने पार्टी और सरकार के बीच समन्यव स्तर पर पायी गयी कमियों के कारण कुछ हद तक अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की।’
वर्तमान स्थिति इससे अधिक विद्रूप है। पिछले नौ वर्षों में सत्ता ने भाजपा नेतृत्व को इतना अहंकारी बना दिया है कि उसने अपने ही काडर की उपेक्षा और अपमान किया जा रहा है। लगता नहीं है कि पार्टी अपने अतीत या वर्तमान से कुछ सीखने को तैयार है। कर्नाटक की हार के बाद भी पार्टी की कार्यशैली नहीं बदली। उसके लक्षण बता रहे हैं कि वह इस साल के अन्त तक मध्य प्रदेश भी गवाँ देगी। और इसके लिए विरोधियों की एकजुटता से अधिक उसके काडर का मौन विरोध ही काफ़ी होगा।
कितना आश्चर्यजनक है कि भाजपा-संघ द्वारा बाहर से आयातित, अपने विरोधी रहे नेताओं को बड़ा सम्मान प्रदान किया जाता है। जैसे, बसपा प्रमुख मायावती की जी-हुजूरी करने वाले एवं बाद में उनको छोडक़र सत्ता के हमराही बने बृजेश पाठक; बसपा और सपा में उछलकूद करते रहे अभी एक साल पहले भाजपा को गालियाँ देते हुए सपा के साथ जाने वाले पुन: सत्ता सुख के लिए भाजपा में पहुँचे दारा चौहान; ऐसे ही बहुजन मिशन को धोखा देकर भाजपाई बने स्वामी प्रसाद मौर्य, जो पाँच साल सत्ता सुख भोगकर ऐन चुनाव से पहले भाजपा को गालियाँ देते हुए सपा में गये। दूसरी ओर उनकी बेटी पिता का खुलेआम समर्थन करके पूरी ठसक से सत्ता संगिनी बनी हुई हैं। कांग्रेस से आये वर्तमान पंजाब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़, सपा से आये नरेश अग्रवाल, राजद से आये रामकृपाल यादव, कई पार्टियों के भ्रमणशील फागू चौहान आदि। हालाँकि इन्हें सक्षम मानने वाले भाजपाई सोचें कि अगर ये इतने क़द्दावर हैं, तो 2014 की भाजपा लहर में ही अपने दलों को जितवा देते। ऐसे ही अवसरवादियों की आमद से पार्टी काडर भ्रष्ट हो चला है। एक वक़्त था, जब भाजपा द्वारा आमंत्रित 500 कार्यकर्ताओं में 50 इकट्ठे होते थे, किन्तु यह सभी अनुशासित एवं पार्टी की विचारधारा के प्रति समर्पित होते थे। आज 50 को आमंत्रित करने पर 5,000 आसानी से एकत्रित हो जाते हैं। लेकिन अधिकांश लम्पट और ज़ाहिल क़िस्म के होते हैं। और अब पार्टी का ऐसे असामाजिक तत्त्वों पर नियंत्रण भी नहीं रहा है। अब तो देश के सर्वाधिक अनुशासित काडर वाले संघ की भी यही स्थिति है। वरना उसके अनुषांगिक संगठन राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच की इतनी हैसियत नहीं होती कि वह नूपुर शर्मा के विरुद्ध दिन-दिहाड़े मज़हबी, उन्मादी नारे लगाता।
अपने वैचारिक विरोधियों के लिए संघ-भाजपा की थ्योरी थी कि जो जितना हिन्दू धर्म-संस्कृति को गलियाँ देता है, अपमानित करता है वह विपक्षियों की नज़र में उतना ही बड़ा सेक्युलर है। अब नयी थ्योरी है कि संघ-भाजपा को जो जितना अधिक कोसता है, वह उन्हें उतना ही अधिक प्रिय है। अब देखिए, कल तक भाजपा-संघ को भगवा आतंक का पर्याय कहने वाले जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह जैसे कांग्रेसी सरकार में अतिविशिष्ट हैं। जिस अजीत पवार ने महाराष्ट्र में सरकार को समर्थन के नाम पर दग़ा देकर पार्टी की फ़ज़ीहत करायी, आज उन्हें ही उप मुख्यमंत्री बना दिया गया। दो दशकों तक पीडीपी के अलगाववादी सुर के ख़िलाफ़ हिन्दुत्व वाले भाजपा नेताओं ने महबूबा मुफ़्ती के साथ निर्लज्जता से मास्टर स्ट्रोक के नाम पर सत्ता सुख भोगा। असल में इन सबके पीछे इनकी नैतिकताविहीन-निर्लज्ज सत्तालोलुपता रही है, जिसे जनता अब स्पष्ट देख-समझ पा रही होगी।
तो ये है पार्टी विद् डिफरेंस की नैतिकता और उसका उसूल, जो ऐसे सिद्धांतहीन लोगों के लिए रेड कारपेट बिछाने को तैयार रहती है और अपने काडर को जूते की नोक पर रखती है। संघ-भाजपा के विचारहीनता की यह हद है कि जिनसे धोखा खाती है और अपमानित होती है, उन्हें सर-आँखों पर बिठाने से नहीं चूकती। तो फिर वह किस मुँह से अपने काडर से समर्पण एवं निष्ठा की उम्मीद रखती है?
यही नहीं, भाजपा-संघ विरोध में लिप्त रहे प्रशासनिक अधिकारी भी वर्तमान सत्ता में सिरमौर बने हुए हैं। उदाहरणस्वरूप नृपेंद्र मिश्र, जिन्हें नियमों में बदलाव कर पीएमओ में लाया गया था। इनके प्रमुख सचिव रहते ही अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवायी गयी थी। आज वही राम मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन हैं। यानी जिनके हाथ राम सेवकों के ख़ून से रंगे हैं, उन्हीं को मंदिर निर्माण की ज़िम्मेदारी मिल गयी। उनके बेटे साकेत मिश्र को भी उत्तर प्रदेश विधान परिषद् का सदस्य बनाया गया है। ये भाजपाई किसे बेवक़ूफ़ बना रहे हैं? ऐसे ही आडवाणी को रथयात्रा के दौरान तत्कालीन लालू राज में अपने नंबर बढ़वाने के लिए आडवाणी को गिरफ़्तार करने वाले उस समय के समस्तीपुर के ज़िलाधिकारी आर.के. सिंह आज आरा के सांसद हैं और मंत्री पद से सम्मानित हैं। जबकि धनबाद के उस समय के उपायुक्त अफ़ज़ल अमानुल्लाह ने ऐसे ही निर्देश को फ़्तानून-व्यवस्था के लिए संकट मानकर स्वीकार नहीं किया था, और उन्हें कोई इनाम नहीं मिला। आम कार्यकर्ताओं के साथ आर.के. सिंह का रूखा एवं अहंकार भरा व्यवहार चर्चा में रहता है। वह कई बार सार्वजनिक रूप से भाजपा का अपमान कर चुके हैं। लेकिन फिर भी पार्टी उन्हें ढो रही है। वैसे बताते चलें कि ये वही आर.के.सिंह हैं, जिन्होंने कांग्रेस सरकार में गृहसचिव के पद पर रहते हुए हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी दी थी और संघ को हिन्दू आतंकियों का प्रशिक्षण केंद्र बताया था। इसी प्रकार भाजपा सरकार में विशेष रुतबा प्राप्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सलाहकार आईएएस अवनीश अवस्थी एक समय सपा नेतृत्व के नाक के बाल हुआ करते थे। और आज देखिए!
आज़ादी के बाद यह पहली सरकार है, जिसमें नौकरशाहों को इतनी प्रमुखता प्राप्त है। यदि भाजपा नेतृत्व को नौकरशाहों को ही जनप्रतिनिधि के रूप में पार्टी एवं जनता पर लादना है, तो उसे युवा नेतृत्व एवं काडर की क्या आवश्यकता है? आज केंद्र ही नहीं, बल्कि राज्य स्तर पर जहाँ भाजपा सरकारें हैं; सत्ता संरक्षण में प्रशासनिक अमला स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश है। उसके कामों में कोई जनपक्ष नहीं बचा है; क्योंकि जनप्रतिनिधियों का ही सम्मान नहीं है। आज नौकरशाही के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे आम पार्टी कार्यकर्ता तो दूर, विधायक-सांसदों को अपमानित करने से नहीं चूक रहे हैं। यह समस्या सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं है। पत्रकारों, लेखकों समेत तमाम बुद्धिजीवी वर्ग को, जो संघ-भाजपा की वैचारिक लड़ाई लड़ता रहा; सत्ता के स्वर्णिम काल में भी हासिये पर है। जब वामपंथी वर्ग यह कटाक्ष करता है कि सरकार भले उनकी हो, सिस्टम तो हमारा है; तो यह बहुत हद तक यथार्थ है। क्योंकि आज भी वे बौद्धिक क्षेत्र में हावी हैं और अपने लोगों को आगे बढ़ा रहे हैं। आज भी तमाम शैक्षणिक एवं साहित्यिक संस्थानों पर उनका क़ब्ज़ा है। लेकिन भाजपा-संघ को इसकी सुध नहीं कि वो अपने समर्थक बुद्धिजीवियों को इन पदों से सम्मानित करें या उनकी प्रगति के प्रस्तावक बनें। किन्तु उन्हें केवल चुनावी बढ़त की चिन्ता है। पिछले नौ वर्षों में संघ-भाजपा ने हर मोर्चे पर अपने प्रभाव के प्रसार का प्रयास तो किया, किन्तु बौद्धिक मोर्चा ख़ाली ही रहा है। यह सब असावधानीवश नहीं हुआ है, बल्कि नेतृत्व ने दृढ़ता नहीं दिखायी। वरना लेखकों, पत्रकारों, प्राध्यापकों के एक बड़े बौद्धिक समूह ने लम्बे समय तक संघ-भाजपा के पक्ष में वामपंथी जमात से लोहा लिया था। आज अपनी ही सरकार और संगठन द्वारा उपेक्षित, अपमानित यह वर्ग भी है। जैसे पत्रकार एवं लेखक संदीप देव ने निरंतर संघ-भाजपा के लिए विपक्ष से खुलेआम मोर्चा लिया, आज अपमानित किये जा हैं। वर्तमान में कॉरपोरेशन और दूसरी अन्य संस्थाओं में अध्यक्ष तथा निदेशक के अधिकांश पद ख़ाली हैं, जहाँ पार्टी द्वारा वरिष्ठ नेताओं और काडर को समायोजित किया जा सकता है; लेकिन अपनी और अपने बच्चों की कुर्सी सुरक्षित करने के इंतज़ाम में लगे शीर्ष भाजपाई नेतृत्व को अपने काडर की चिन्ता कहाँ है? बस इनकी अपनी सत्ता बनी रहे। आज संघ और भाजपा के समर्पित लोग दबी ज़ुबान से कहने लगे हैं कि जितना अपने कार्यकर्ताओं का अपमान पार्टी और संगठन करता है, उतना तो विरोधी भी नहीं करते। स्पष्ट है शीर्ष पर पहुँचे लोग केवल सत्ता-पिपासु हैं; जिन्होंने धार्मिक गोलबंदी, राष्ट्रवाद एवं नये भारत के निर्माण के नारे के द्वारा आम जनता के साथ ही अपने काडर को भी छला है।
सूफ़ी परम्परा के सबसे चर्चित सन्तों में से सम्मिलित बाबा बुल्ले शाह कहते हैं :-
‘पहाड़ा ते चढ़ते सिलाब वेखे,
विच कंडया दे रूलदे गुलाब देखे,
दौलत ते इतना मान ना कर बंदया,
सडक़ा ते रूलदे नवाब वेखे’
शायद ये सलाह अहंकार से ग्रसित संघ-भाजपा को भविष्य में लज्जित एवं अपमानित होने से बचा ले। अन्यथा तारीख गवाह है कि जब इंदिरा गाँधी का अहंकार नहीं टिका, तो इनका घमंड भी नहीं टिकेगा। अत: इसे समझने-समझाने से परे थोड़ा इंतज़ार करिए इनकी दुर्दशा और दुर्दिन अब अधिक दूर नहीं है।
हाल के महीनों में क़रीब 415 मिलियन लोग पार्टी से अलग हुए
क्या चीन की कम्युनिस्ट पार्टी कमज़ोर हो रही है और देश के लोगों का उस पर से भरोसा उठ रहा है? ख़ुद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हाल के कुछ महीनों में कम-से-कम दो बार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के टूटने के ख़तरे को लेकर कहते रहे हैं। इसके पीछे एक ठोस कारण भी है। ग्रीक सिटी टाइम्स की एक रिपोर्ट में किये गये दावे के मुताबिक, सिर्फ़ जुलाई में दुनिया भर में क़रीब 415 मिलियन लोग ख़ुद को सीसीपी के असंबद्ध (अलग) कर चुके हैं। इनमें ज़्यादातर लोग सीसीपी की रेजिमेंट, टीमों और सम्बद्ध संगठनों से जुड़े थे।
कुछ जानकार इसे जिनपिंग के कमज़ोर होने से जोड़ते हैं। यहाँ यह भी दिलचस्प है कि चीन के विदेश मंत्री क्विन गेंग, जिनकी लोकप्रियता हाल के समय में तेज़ी से बढ़ी है; 25 जून को अचानक ग़ायब हो गये। एक महीने के बाद चीन की सरकार यह तो नहीं बता सकी कि गेंग कहाँ ग़ायब हो गये हैं; लेकिन उनकी जगह वांग यी को विदेश मंत्री बना गिया गया।
चीन में लोगों की नाराज़गी की शुरुआत कोरोना में सरकार की तरफ़ से लादी गयी पाबंदियों के समय से शुरू हुई मानी जाती है। जिनपिंग सरकार ने कोरोना के दौरान जिस जीरो-कोविड नीति को दो साल बहुत सख़्ती के साथ चलाया उसका सबसे ज़्यादा असर रोज़गार पर पड़ा। चीन के लोगों का घरों से बाहर निकलना बन्द रहा। बड़े शहर इससे ख़ासे प्रभावित हुए। यही वह दौर था, जब लोगों का कम्युनिस्ट पार्टी से मोह भंग होना शुरू हुआ। यह माना जाता है कि कोरोना के दौर के बाद ही लोग पार्टी छोडऩे लगे। दूसरे चीन के बाहर रह रहे अधिकतर चीनी भी स्वतंत्रता की हवा अपने देश में बहती देखना चाहते हैं। तीसरा कारण चीन की सत्ता देश में निजी संस्थाओं को आर्थिक तौर पर इतना ताक़तवर होना देना नहीं चाहती कि सरकार उसके सामने बौनी दिखे। जैक मा जैसे व्यापारी इसी नीति का शिकार हुए। यही कारण है चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से इतने लोगों का अलग होना शी जिनपिंग के शब्दों में भी चिन्ता के रूप में झलकने लगा है। जानकार मानते हैं कि विदेश मंत्री क्विन गेंग के अचानक ग़ायब होने से भी लोग चीन में वर्तमान नेतृत्व से नाराज़ हो सकते हैं। क्विन गेंग को बहुत-से जानकार चीन के भावी नेता के रूप में देखते रहे हैं।
जानकार मानते हैं कि यदि चीन में भीतरी असन्तोष तीव्र होता है, उसके सामने भी सोवियत संघ की तरह अलग-अलग राज्यों में टूटने का ख़तरा रहेगा। ग्रीक सिटी टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में लोगों की प्रतिक्रिया ने सीसीपी अधिकारियों को आश्चर्यचकित किया है। ग्रीक सिटी टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जिनपिंग सीसीपी के पतन के बारे में बार-बार चेतावनी जारी कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि अगर इससे जल्दी नहीं निपटा गया, तो मुश्किल होगी।
शी जिनपिंग ने पिछले साल यंग कैडर ट्रेनिंग सेक्शन में दिये भाषण में सीसीपी के पतन के बारे में बढ़ती चिन्ता को ज़ाहिर किया था। जिनपिंग के उस भाषण के अंश हाल में सीसीपी के जर्नल सीकिंग ट्रुथ में प्रकाशित किया गया है। जिनपिंग ने भाषण में चीनी विशेषताओं के तहत माक्र्सवाद और साम्यवाद की मान्यताओं को बनाये रखने के महत्त्व पर ज़ोर दिया था। सीसीपी की चिन्ता चीन की बिगड़ती आंतरिक और बाहरी समस्याओं पर आधारित है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ बढ़ती प्रतिद्वंद्विता, आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर उसके सामने आने वाली चुनौतियों से चीन की चिन्ताएँ जुड़ी हैं। ग्रीक सिटी टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लाखों लोग पार्टी (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी) छोड़ रहे हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व प्रभावित हुआ है। उसके मुताबिक, चीनी लोगों के बीच सीसीपी के प्रभाव में कमी का संकेत मिला है। वैसे जिनपिंग हाल में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में जिनपिंग ने ख़ुद के किसी भी कारण से किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के विरोध में होने की बात कही थी। जिनपिंग का सदस्य देशों से कहना था कि उन्हें नये शीट युद्ध के माहौल को तैयार करने वाली बाहरी ताक़तों से सावधान रहना चाहिए।
ख़तरा कितना वास्तविक?
अभी यह कहना कठिन है कि वास्तव में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कमज़ोर होने की स्थिति में देश पर कैसा और कितना असर पड़ेगा और लोग इसके विकल्प के रूप में किस तरफ़ देखेंगे? हाल के तमाम दशकों में चीन में राजनीतिक अस्थिरता नहीं दिखी है। अर्थव्यवस्था भी ऐसी की अमेरिका के बाद चीन को सबसे मज़बूत माना जाता रहा है। अब 100 साल के बाद आख़िर चीन के लोग कैसे और किसे कम्युनिस्ट पार्टी के विकल्प के रूप में मानेंगे। और यह भी कि इसकी क्या गारंटी है कि नयी पार्टी सफल होगी। चीन में सीसीपी सबसे ताक़तवर है। हालाँकि वहाँ आठ अन्य दलों का भी अस्तित्व है। लेकिन आज की तारीख़ में उनके नेता तक का चयन भी कम्युनिस्ट पार्टी ही करती है। लिहाज़ा सत्ता और विपक्ष में सिर्फ़ सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का ही दबदबा है। सेना से लेकर अधिकारियों तक सब इसी पार्टी के सदस्य हैं।
अब सवाल यही है कि क्या सीसीपी के ख़त्म या कमज़ोर होने से चीन भी डूब जाएगा? दो साल पहले ही बहुत उम्मीदों और नयी उपलब्धियों के नारे के साथ सीसीपी ने अपना 100वाँ स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया था। हालाँकि अचानक हालात अलग दिखने लगे हैं। जिनपिंग का ख़ुद यह स्वीकार करना मामूली बात नहीं है कि अचानक करोड़ों लोग पार्टी से दूरी बना रहे हैं और इसमें आम लोग और राजनेता दोनों हैं। यहाँ तक की दशकों तक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के व$फादार रहे संस्थान नहीं पार्टी से दूर हुए हैं। कई जानकार मानते हैं कि सीसीपी के कमज़ोर होने का मतलब होगा- ‘चीन का कमज़ोर हो जाना।’
दुनिया भर के वित्तीय संकट का असर चीन पर भी दिखा है। चीन की अर्थव्यवस्था भी सुस्ती से बच नहीं सकी है। जून में चीन के निर्यात में बड़ी कमी देखी गयी है। साथ ही खपत में गिरावट है और बेरोज़गारी चीनी नेतृत्व की प्रति भरोसे को डगमगा रही है। पर हाल के महीनों में दुनिया के कई देशों ने चीन से मुँह मोड़ा है और देश में निजी सेक्टर चरमरा रहा है। चीन की सरकार महसूस करने लगी है कि बिना निजी क्षेत्र को साथ लिए वह गति नहीं पकड़ सकती। हाल में जिनपिंग प्रशासन के 31 सूत्रीय दिशा-निर्देश निजी क्षेत्र को साथ लाने की दिशा में एक बड़ा क़दम माना जा रहा है।
सरकार की नीति के चलते हाल के वर्षों में चीन में निजी कम्पनियाँ बर्बादी के कगार पर पहुँच गयी हैं। इनमें सबसे बड़ा उदाहरण जैक मा की अलीबाबा कम्पनी है। एक समय था, जब जैक मा चीन प्रशासन की बहुत ख़ास थे। लेकिन 2020 में स्थिति तब बदली, जब चीन सरकार को लगा मा बहुत ताक़तवर हो रहे हैं। इसके बाद मा की कम्पनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू हुई और मा को देश छोडऩा पड़ा। यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग ही थे, जिन्होंने 2018 में कहा था कि निजी क्षेत्र का देश के टैक्स रेवेन्यू में 50 फ़ीसदी, आउटपुट में 60 फ़ीसदी और शहरी रोज़गार में 80 फ़ीसदी योगदान है। अब स्थिति बदल चुकी है।
चीन के अन्य राजनीतिक दल
चीन में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा आठ और राजनीतिक दल पंजीकृत हैं। इनका थोड़ा बहुत असर है। इनमें चाइना नेशनल डेमोक्रेटिक कंस्ट्रक्शन एसोसिएशन, चाइना डेमोक्रेटिक लीग, चाइना पीजेंट्स एंड वर्कर्स डेमोक्रेटिक पार्टी, ज्यूसन सोसायटी, रिवॉल्यूशनरी कमेटी, चाइना एसोसिएशन फॉर प्रमोटिंग डेमोक्रेसी, चाइना शी गॉन्ग पार्टी और ताइवान डेमोक्रेटिक सेल्फ-गवर्नमेंट लीग हैं। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से इन दलों के रिश्ते बेहतर नहीं कहे जा सकते। एक समय था, जब कम्युनिस्ट पार्टी उदार थी। लिहाज़ा उसने देश के नियम-कायदे बनाते वक़्त सबसे सुझाव माँगे थे। यही नहीं, उन्हें शामिल भी किया था। लेकिन जैसे-जैसे सीसीपी ताक़तवर हुई, अन्य का अस्तित्व गौण होता गया। ऐसे में यह दल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का विकल्प बन पाएँगे? इसे लेकर कई जानकार संदेह जताते हैं।