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कब जागेंगे हम?

Tarun J palजब पिछली बार हमने सत्ता के गलियारों को हिलाने की हिमाकत की थी तो हमें तीन साल तक दहकते अंगारों पर चलने का अभिशाप दिया गया. रक्षा सौदों में भष्टाचार की पोल खोलने वाला ऑपरेशन वेस्ट एंड मार्च 2001 में प्रसारित हुआ था. इसके फौरन बाद दो चीजें हुईं. पहला हमें लंबे समय तक लोगों की अपार सराहना और उनका प्यार मिला. दूसरा, हमारे काम और जिंदगी पर एक अनैतिक और असंवैधानिक हमला बोला गया. ये भी लंबे समय तक नहीं रूका—तब तक जब तक सरकार का सारा गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया.

छह साल पहले उस वक्त हम पर एक के बाद एक कई आरोप लगाए गए. कुछ ने कहा कि हम कांग्रेस के लिए काम करते हैं. कइयों के लिए हम दाऊद के आदमी थे. कुछ का कहना था कि हमारे पीछे हिंदुजा का पैसा लगा है. कोई हमें आईएसआई से जोड़ रहा था जिसका मकसद हमारे जरिये शेयर बाजार को औंधे मुंह गिराना था. कहा जा रहा था कि इस काम के लिए हमें करोड़ों रुपये मिले हैं. यही नरेंद्र मोदी उस समय बीजेपी के महासचिव हुआ करते थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा भी छापने वाले थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा छापने वाले थे.

[box]इनमें पहला और सबसे अहम तथ्य ये था कि मैं एक कांट्रेक्टर का बेटा हूं जो कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह के करीबी सहयोगी थे.[/box]

हमारे ख़िलाफ़ उछाला गया हर आरोप दिल्ली के संभ्रांत हलकों में न केवल चटखारे लगाकर सुना-सुनाया गया बल्कि एक कान से दूसरे कान तक जाने की प्रक्रिया में इसमें कई और स्वाद भी जोड़े गए. यहां तक कि दोस्तों और जानने वालों ने भी दबी जबान में बातें कीं. ये वे लोग थे जिन्होंने किसी को बिना फायदे के कभी कुछ करते हुए नहीं देखा था. उनके लिए ये मानना सही भी था कि हम भला उनसे क्योंकर अलग होंगे. और अब जब सरकार हमारे शिकार पर निकल ही चुकी थी तो सच का सामने आना बस कुछ वक्त का ही खेल था. इतना सब कहने के बाद मिलने पर हमारी तरफ एक जुमला उछाल दिया जाता कि आपने असाधारण काम किया…ऐसा काम जो न सिर्फ जरूरी था बल्कि बहुत साहसिक भी.

हकीकत ये है कि-

-मैं कभी भी किसी हिंदुजा से नहीं मिला था

-मैंने स्टॉक मार्केट में एक शेयर की भी खरीद-फरोख्त नहीं की थी.

-मेरा कांग्रेस से कभी भी कोई लेनादेना नहीं रहा. मैं तो राजनीति कवर करने वाला पत्रकार तक नहीं था. रिकार्ड के लिए बता दूं कि तहलका शायद भारत में अकेली ऐसी कंपनी होगी जिसके खिलाफ तीन सीबीआई केस चल रहे हैं. ये तीनों केस एनडीए सरकार के वक्त दर्ज किए गए थे और यूपीए के सत्ता में आने के बाद भी जारी हैं. हमें जमानत लेने के लिए नियमित रूप से कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं.

-हमारे पास कभी भी काले धन की एक पाई तक नहीं रही. अगर ऐसा होता तो हर घड़ी हमारे पीछे लगी रही एजेंसियां हमें कब का जेल में ठूंस देतीं. आखिर में ऐसा वक्त आया जब इस कंपनी में काम करने वाले लोग 120 से घटकर सिर्फ चार रह गए. साउथ एक्सटेंशन के पीछे एक किराए के कमरे में हमारा ऑफिस चल रहा था. कानूनी और जिंदगी के तमाम पचड़ों से लड़ने के लिए हम पर दसियों लाख रुपये उधार चढ़ चुके थे जो हम अब तक चुका रहे हैं. गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता.

-और हां, अंडरवर्ल्ड को झटका देने वाले क्रिकेट मैच फिक्सिंग के खुलासे के बावजूद हमसे से कोई दाऊद इब्राहिम या किसी और भाई से कभी नहीं मिला था.

मेरे पिता को तो छोड़िये मैं भी उस समय तक अर्जुन सिंह से कभी नहीं मिला था. कांट्रेक्टर होने की बजाय मेरे पिता की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना में गुजरा था. इस दौरान उन्होंने 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए दोनों युद्ध भी लड़े. फिर भी मोदी ने सार्वजनिक मंच पर ये और ऐसे दूसरे कई सफेद झूठ बोलने से पहले कुछ नहीं सोचा और सेंसेक्स से भी ज्यादा चकरायमान मीडिया ने इसके पीछे के सच को बाहर लाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं समझी.

झूठ के पीछे के सच को अगर बाहर न लाया जाए तो झूठ खतरनाक आकार ले लेता है. सच्चाई का चेहरा विकृत हो जाता है और अराजकता घर करने लगती है. पुरानी कहावत है कि झूठ को अगर लगातार और कई तरीकों से फैलाया जाता है तो वह सच बन जाता है या फ़िर कम से कम सच को डुबो तो देता ही है. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब 1984 में सिक्खों की गर्दनें तलवारों पर रखी गईं. और हमने ऐसा होते 2002 में भी देखा जब गुजरात को दूषित भावनाओं के साथ गलत जानकारी की आड़ में आग के हवाले कर दिया गया. कुछ मौकों पर मीडिया ने सच की पड़ताल कर उसे दिखाया भी. लेकिन तब तक सच का महत्व ही खत्म हो चुका था. सच से बेनकाब होते लोगों की रणनीति इतना शोर मचाने की थी कि उसमें सब कुछ डूब जाए—अच्छा, बुरा, सच, झूठ सब कुछ. हमारी इस तहकीकात पर उनका शोर है कि आपने गोधरा के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं. जबकि सच ये है कि इस अंक के 30 पन्ने गोधरा की तहकीकात को ही समर्पित हैं.

गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता. पिछले कुछ सालों में मुझे कई बार ये अजीब और कड़वा अनुभव हुआ है जब लोगों को मैंने मेधा पाटकर और अरुंधती रॉय जैसे जनता के लिए लड़ने वाले लोगों पर पैसे के लिए काम करने का आरोप लगाते देखा है. किसी की राय से सहमत न होना अलग बात है. लेकिन खुद ही ये मान लेना कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले लोग भष्ट्र हैं, हमारे बारे में कई गंभीर पहलुओं की पोल खोलता है. इस विकृति का कुछ लेना-देना हमारी गुलामी के समय से भी है–वह दौर जब हम ईर्ष्या, चालाकी, साजिश, चुगली या धोखा, किसी भी तरह से गोरे मालिकों को खुश करने के लिए बैचैन रहते थे.

इस बार जब हमने 2002 के गुजरात नरसंहार के पीछे छिपे सच का खुलासा किया तो साजिश ढूंढने वालों ने नई ऊंचाइयां नाप लीं. बीजेपी ने हम पर कांग्रेस के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए हमला किया. उधर, कांग्रेस का कहना था कि हम बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं. इससे साफ था कि हम किसी सही काम को ही अंजाम दे रहे थे. इस सबके बीच भारत के विचार के लिए लड़ने का काम लालू यादव, मायावती और वामदलों पर छोड़ दिया गया. हालांकि आदर्श भारत का ये विचार कभी कांग्रेस के पुरोधाओं द्वारा रचा गया था लेकिन आज की कांग्रेस से जुड़े दिग्गज शायद इसका मतलब भी भूल चुके हैं. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.

ये भी अपने आप में असाधारण बात है कि गुजरात नरसंहार के खुलासे को कई दिन होने को आए लेकिन अब तक इस पर न तो प्रधानमंत्री ने ही कोई बयान दिया और न ही गृहमंत्री ने. पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार सामूहिक हत्याकांड करने वाले कैमरे पर खुद बता रहे थे कि उन्होंने कैसे मारा, क्यों मारा और किसकी इजाजत से मारा. ये कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं थे. ये विचारधारा में अंधे वे उन्मादी लोग थे जो उस खतरनाक दरार की सच्चाई का खुलासा कर रहे थे जिसमें इस देश के टुकड़े करने की क्षमता है. लेकिन रेसकोर्स रोड में बैठे भद्रजनों के लिए ये काफी नहीं था. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.

प्रधानमंत्री को भी कोसने का क्या फायदा. उनके पास जिम्मेदारी तो है पर शक्तियां नहीं. बेईमानी के पहाड़ की चोटी पर बैठा ईमानदार व्यक्ति. कांग्रेस के उन बड़े रणनीतिकारों पर नजर डालते हैं जो खुद तो कोई चुनाव नहीं जीत सकते मगर कईयों को चुनाव जितवाने के रहस्य जानते हैं. उनके हिसाब से देखा जाए तो हत्याओं और बलात्कारों में मोदी की भूमिका का पर्दाफाश इस तरह से डिजाइन किया गया था कि गुजराती हिंदू को ये यकीन हो जाए कि मोदी ही उनके लिए आदर्श नेतृत्व हैं. उन्हें यह नहीं सूझा कि हिंसा के इन सबूतों को वे मोदी के खिलाफ एक हिला देने वाली सार्थक बहस शुरू करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

वास्तविकता ये है कि कांग्रेस को आज कुछ ऐसे छुटभैये रणनीतिकार चला रहे हैं जो ये भूल चुके हैं कि सही कदम उठाना क्या होता है. उनके पास न तो इतिहास के अनुभवों का प्रकाश है और न ही भविष्य के लिए दृष्टि. वे यह देख पाने में असमर्थ हैं कि एक जमाने में महान विभूतियों ने धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि जैसी खाइयों को पाटते हुए इस देश के विचार को शक्ल दी थी. मूर्खतापूर्ण तरीके से वे अब इन्हीं दरारों को फिर से उभार रहे हैं. वे उन संकटों को देख पाने में असमर्थ हैं जो इसके परिणामस्वरूप सामने आएंगे. उन्हें ये नहीं पता कि राजनीति में नैतिकता को हथियार कैसे बनाया जा सकता है और उनमें नैतिकता के रास्ते पर चलने की हिम्मत भी नहीं है. ये लोग और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा बस चुनावों में वोटों की तिकड़म भिड़ाने वाले एकाउंटेंट हैं जो चुनावी लाभ और हानि के बीच झूला झूलते रहते हैं.

आज की कांग्रेस उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र में निष्ठा रखने वाले उस भारतीय को निराश करती है जिसे भारत की आत्मा की रक्षा करने को एक राजनीतिक छाते की आवश्यकता है. सही बातें न कहकर, सही कदम न उठाकर ये उस उदार भारतीय को कमजोर करती है जिसकी विवादों में कोई रुचि नहीं और जो अपनी अच्छाई की स्वीकृति चाहता है. इससे पैदा हुए खाली स्थान पर जहरीली और विकृत विचारधाराएं काबिज हो जाती हैं.

और ये सब तब हो रहा है जब भारतीय कुलीन वर्ग ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसा कि 1920 में चमक-दमक और शैंपेन की खुमारी में डूबा अमेरिकी कुलीन वर्ग किया करता था जबकि पैरों के नीचे की जमीन बड़ी तेज़ी से दरकती जा रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि पांच मुख्य राज्यों में गरीबी से बदहाल लोगों की संख्या बढ़ रही है. भारत के 30 फीसदी जिलों में घनघोर दरिद्रता से उठता नक्सलवाद बढ़ता रहा है. आखिर कब तक आकंठ पैसे में डूबे हुए और भूख से मर रहे लोग बगैर टकराव के साथ-साथ रह सकते हैं. सच्चाई ये है कि भारत को सिर्फ आर्थिक सुधारों की नहीं बल्कि राजनीतिक दूरदृष्टि की भी जरूरत है जिसका कहीं अता-पता नहीं. गुजरात के प्रति हमारी बेपरवाही बताती है कि दुनिया के इस सबसे जटिल लोकतंत्र के सामने अब तक की सबसे पेचीदा चुनौती मुंह बाए खड़ी है.

तरुण तेजपाल

(कुछ ही दिनों में तहलका की हिंदी पत्रिका पाठकों के सामने होगी जिसमें तरुण तेजपाल सीधे आपसे संवाद करेंगे. यदि आपके मन में तरुण के लिए कोई सवाल हो तो आप इसे hindi@tehelka.com पर ई मेल कर सकते हैं या नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं. )

तहलका, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-110048

कानून की रखवाली

औघट घाट

घाटे पानी सब भरे औघट भरे न कोय।

औघट घाट कबीर का भरे सो निर्मल होय।। 

अब तो कोई संदेह नहीं है साधो कि अपनी देवभूमि उत्तर प्रदेश को कानून की जबरदस्त रखवाली मिल गई है-मायावती! देखो उनने अपने ही एक मंत्री जमुना निषाद को पहले तो मंत्रिमंडल से निकाल बाहर किया. फिर जब वे मायावती के घर एक बैठक में भाग लेने आ रहे थे तो उत्तर प्रदेश की पुलिस ने उन्हें भरे बाजार सड़क पर रोका और गिरफ्तार करके थाने ले गए. यह सब मायावती के सख्त हुक्म के बिना तो हो ही नहीं सकता था. उत्तर प्रदेश में तो मंत्री क्या एमएलसी भी ऐसे घूमा करते थे कि जैसे उनसे बड़ा कोई कानून है ही नहीं. वही सबसे बड़े हैं और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. मायावती मुख्यमंत्री बनते ही हंटर फटकार कर कानून लागू करने में लग गईं. और अब देखो, मछुआरों के इतने बड़े नेता को लखनऊ से पकड़कर उसी महाराजगंज थाने में भेज दिया गया है जिसे उनके लोगों ने घेर लिया था और एक पुलिसवाले को मार गिराया था. 

साधो, मायावती लोकतंत्र और कानून को मानने वाली हैं. प्रधानमंत्री का पद उनका इंतजार कर रहा है. वो मछुआरों के वोटों की चिंता करती रहीं और जमुना निषाद जैसे जाति नेताओं को अपनी वाली करने की छूट देती रहीं तो देश, कानून और संविधान का क्या होगा!

साधो ये बड़ी हिम्मत की बात है. मुख्यमंत्री चाहे तो उसकी पुलिस किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है. फिर ये जमुना निषाद तो मायावती के बनाए ही मंत्री बने थे और तभी तक बने रह सकते थे जब तक कि बहनजी की मेहरबानी होती. लेकिन ये निषाद मामूली आदमी नहीं है. उत्तर प्रदेश में मछुआरों का अच्छा भला समाज है. कोई तीन दर्जन विधानसभा सीटों पर उनके वोट से उलटफेर हो सकता है. जमुना निषाद उनके ऐसे नेता हैं कि जब रामजन्मभूमि की लहर चल रही थी तब वे भाजपा के साथ अयोध्या में राम मंदिर बनवा रहे थे. फिर समाजवाद लाने के लिए मुलायम सिंह यादव सत्ता में आए तो निषाद समता लाने के लिए उनके साथ हो गए. वहां भी उनकी तूती बोलने लगी. फिर बहुजन का राज चलाने के लिए मायावती आई तो दलित राज निषाद उनके साथ हो गए. विधायक हुए, मंत्री हुए और वही मछली पालन का विभाग लिया जिससे अपने मछुआरे समाज की सेवा कर सकें. जमुना निषाद का ऐसा पव्वा है इसीलिए तो भाजपा, समाजवादी और बहुजन समाज सभी उनकी सेवाएं ग्रहण करने को तैयार बैठे रहते हैं.

ऐसे नेता को गिरफ्तार करना या मंत्रिमंडल से बाहर बैठाना ही साधो बड़ा मुश्किल होता है. ये जमुना निषाद अपने चुनाव क्षेत्र गए थे कि वहां के लोगों ने कहा कि अपने समाज की एक लड़की के साथ बलात्कार हुआ है और पुलिस उस पर लीपापोती कर उसे रफा-दफा करने में लगी है. निषाद को अपने लोगों के साथ जाना पड़ा. किन लोगों ने थाना घेरा और किसने कांस्टेबल कृष्णानंद राय को मारा वे नहीं जानते. पुलिस वालों ने झूठा केस बनाकर उन्हें फंसा दिया है. मायावती ने सुना और कहा कि जब तक जांच नहीं हो जाती किसी को पकड़ा कैसे जा सकता है? मायावती कानून को मानने वाली हैं साधो! उनने अपने मंत्री जमुना निषाद को सिर्फ इस्तीफा देने को कहा. इस्तीफा हो गया. लेकिन यह कांस्टेबल के थाने में मारे जाने का मामला था साधो. पुलिसवाले भी बहुत गुस्से में थे. फिर मंत्री की अगुवाई में ही लोग थाने पर हमले करने औऱ पुलिस को मारने लगे तो कानून का क्या होगा! मायावती के प्रधानमंत्री बनने का क्या होगा.

साधो, मायावती लोकतंत्र और कानून को मानने वाली हैं. प्रधानमंत्री का पद उनका इंतजार कर रहा है. वो मछुआरों के वोटों की चिंता करती रहीं और जमुना निषाद जैसे जाति नेताओं को अपनी वाली करने की छूट देती रहीं तो देश, कानून और संविधान का क्या होगा! मायावती ने अपने लोगों को साफ कह दिया है. थानों में मत जाओ. जो भी शिकायत है मेरे पास लाओ. पुलिस से काम करवाना मेरा काम है. मैं उत्तर प्रदेश में अच्छा शासन चलाऊंगी तभी तो देश पर शासन चला सकूंगी. उनके मंत्रियों ने कहा ठीक ही बहनजी! आप प्रधानमंत्री बनेंगी तो हम भी केंद्र में मंत्री बनेंगे ना!

प्रभाष जोशी

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“सबसे ज्यादा प्रदूषण गरीबी फैलाती है”

विश्व भर और देश में जो आर्थिक हालात हैं उसकी वजह से आज उन्हें तरह-तरह की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ रहा है. शोमा चौधरी और शांतनु गुहा रे के साथ बातचीत में वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने चिरपरिचित आक्रामक स्पष्टता के साथ अपनी बातें रखीं .

शांतनु: शुरुआत उस मुद्दे से करते हैं जो सबसे ज्यादा सुर्खियों में है. थोक मूल्य आधारित मुद्रास्फीति की दर 7.83 फीसदी पर जा पहुंची है. क्या सरकार इससे चिंतित है खासकर तब जब इसके प्रति लोगों की सहनशक्ति में गिरावट आई है? 

मैं पहले भी कई बार ये बात कह चुका हूं. 70 और 80 के दशक में औसत मुद्रास्फीति की दर आठ फीसदी से ज्यादा ही थी. 50 और 60 के दशक में तो ये आंकड़ा इससे भी अधिक होता था. मगर 90 के बाद इसके प्रति लोगों की सहनशक्ति के स्तर में काफी गिरावट आई. मुझे लगता है कि अब ये स्तर 4-5 फीसदी है. इसलिए ‘मुद्रास्फीति की दर पांच के पार’ हेडलाइन छपते ही राजनीतिक पार्टियां इसे मौके की तरह इस्तेमाल कर सरकार की लानत-मलानत करने लगती हैं. हम हालात पर काबू पाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं पर मुझे नहीं लगता कि हमारी सरकार पर इसका कोई खास प्रतिकूल असर पड़ेगा. 

शांतनु:  विकास की बात करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने हाल ही में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ‘ओवरहीटिंग’ के कगार पर खड़ी है. क्या आपको लगता है कि तेज आर्थिक विकास के उलटे परिणाम भी हो सकते हैं?

‘ओवरहीटिंग’ क्या है? ‘ओवरहीटिंग’ की स्थिति तब पैदा होती है जब मांग क्षमताओं से कहीं ज्यादा बढ़ जाए. एक अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में ऐसा हो सकता है. मगर जहां तक भारत का सवाल है तो मुझे नहीं लगता कि मांग क्षमता से ज्यादा है. मसलन हमारे यहां इस्पात की मांग है मगर हम इसका निर्यात भी करते हैं. यही बात सीमेंट और चावल पर भी लागू होती है. कुछ ऐसे क्षेत्र जरूर हैं जिनमें कृत्रिम मांग के बुलबुले उभर आए हैं मसलन रियल एस्टेट और शेयर बाजार मगर इस बात से मैं सहमत नहीं हूं कि भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘ओवरहीटिंग’ का खतरा है. मुझे लगता है कि हमारी अर्थव्यवस्था में अब भी पहले से तेज विकास दर के साथ बढ़ने की क्षमता है. भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘ओवरहीटिंग’ के खतरे पर बहस करने का परिणाम विकास दर के घटने के रूप में सामने आयेगा और भारत के लिए इसके परिणाम विनाशकारी होंगे.

शोमा:  अपने एक बजट भाषण में आपने तीन ऐसे क्षेत्रों के बारे में कहा था जिन पर ध्यान देने की जरूरत है—विकास, समानता और सामाजिक न्याय. पहले की सफलता की तो पूरी दुनिया में चर्चा है. मगर बाकी दो की स्थिति पर क्या आपको चिंता होती है?

हर चीज का एक संदर्भ होता है. गरीबी का अविष्कार यूपीए सरकार ने नहीं किया. न ही आप ये कह सकते हैं कि 2004 से पहले भारत में सब कुछ बढ़िया था और गरीबी की समस्या आज ही हमारे सामने आई है. गरीबी इस देश में 5000 सालों से है. इसके अलावा बच्चों की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी काफी समय से हमारे देश में मौजूद रही हैं. मुद्दा ये है कि क्या हमारी नीतियां इस स्थिति में कुछ परिवर्तन ला पाई हैं?  साफ देखा जा सकता है कि हालात पहले से बेहतर हुए हैं. प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है. स्कूल बीच में ही छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या धीरे ही सही पर गिर रही है. नौकरियां बढ़ रही हैं. इस संदर्भ में देखा जाए तो हमारी नीतियां स्पष्ट रूप से विकास और समानता समर्थक रही हैं. पर यदि पूछा जाए कि क्या हम एक ऐसे बिंदु तक पहुंच गए हैं जहां हम सबकी भागीदारी वाले विकास की रफ्तार से संतुष्ट हैं तो मैं बेबाकी से कहूंगा कि नहीं. बेशक हमारी विकास दर प्रभावशाली है मगर उसमें सबकी भागीदारी की रफ्तार बहुत धीमी है. अगर हमारे पास एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था होती, गरीबों तक फायदे पहुंचाने के लिए एक बेहतर और जिम्मेदार व्यवस्था होती तो हम इस विकास के फायदे कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते थे.

मैं आपको सिर्फ एक उदाहरण देता हूं. सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को लीजिए. 2004 के बाद हमने इस व्यवस्था के तहत पिछले वर्षों के मुकाबले 70 लाख टन ज्यादा खाद्यान्न बांटने का प्रबंध किया. इसका परिणाम और भी ज्यादा लोगों तक खाद्यान्न पहुंचने के रूप में सामने आना चाहिए था. मगर लीकेज यानी रिसाव की बहुत अधिक दर, जो कि कई साल से 35-36 फीसदी पर अटकी हुई है, के चलते ये धारणा बन गई है कि ये व्यवस्था ढह चुकी है और लोगों में इसके प्रति नाराजगी बढ़ी है.

शोमा:  जब आप अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव ला चुके हैं तो क्या इन क्षेत्रों की दशा सुधारने के लिए भी ऐसा ही नहीं किया जा सकता?

बिल्कुल किया जा सकता है. अपने पहले बजट में मैंने कहा था कि हमें स्मार्ट कार्ड आधारित सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को अपनाना होगा. हरियाणा और चंडीगढ़ को छोड़कर किसी ने इसके प्रति दिलचस्पी नहीं दिखाई. इस दिशा में काम की रफ्तार धीमी है मगर कम से कम इसकी शुरुआत तो हो ही चुकी है. काफी पहले मैंने ये भी कहा था कि खाद सब्सिडी सीधे किसानों को दी जानी चाहिए. खाद मंत्रालय को ये विचार पसंद नहीं आया. इसलिए कई मामलों में हम पुराने और बिगड़े हुए ढर्रे पर सिर्फ इसलिए चल रहे हैं क्योंकि हम लोगों को इसके लिए तैयार नहीं कर पाते.

शोमा: विरोध की वजह क्या है?

नई व्यवस्था के साथ हमेशा एक असंभावना जुड़ी होती है. ये सफल भी हो सकती है और असफल भी. दरअसल देखा जाए तो कई अच्छे लोग भी इसका विरोध महज असफलता के डर की वजह से करते हैं. उनके डर कुछ ऐसे होते हैं—अगर फर्टिलाइजर्स सीधे किसान तक नहीं पहुंचे तो क्या होगा, अगर वितरण व्यवस्था में कोई मुश्किल पैदा हो गई तो क्या होगा, हमारे देश में भुखमरी फैल जाएगी वगैरह वगैरह. मगर असली बाधा ये है कि दरअसल कोई भी अपनी सरपरस्ती छोड़ना नहीं चाहता. जरूरी नहीं है कि इस शब्द को निंदात्मक अर्थों में ही लिया जाए. सरपरस्ती भ्रष्टाचार और बेईमानी के बिना भी हो सकती है मगर चूंकि लोग इसे खोना नहीं चाहते इसलिए पुरानी व्यवस्था चलती जा रही है.

शांतनु:  प्रधानमंत्री कॉर्पोरेट जगत को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की सलाह देते रहे हैं. आपने भी विकलांगों को रोजगार देने पर कंपनियों को बडे़ फायदे देने की बात कही है. मगर सवाल ये है कि ऐसा अपने आप क्यों नहीं होता. कॉर्पोरेट जगत को उसकी सामाजिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए तैयार करने की कीमत सरकार क्यों चुकाए?

ऐसा अपने आप कब और कहां होता है?  अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत में अश्वेत लंबे समय तक नौकरियों से वंचित रहे. आपने कल ही सेंट्रल बैंक की प्रबंधनिदेशक एच ए दारूवाला को टीवी पर बोलते सुना होगा कि 1972 में जब वो नौकरी ढूंढ रहीं थीं तो हर व्यापारिक घराने ने ये कहकर उन्हें लौटा दिया कि आप बहुत योग्य हैं पर हम किसी पुरुष को प्राथमिकता देंगे. आप देख सकते हैं कि ऐसा कभी भी अपने आप नहीं होता. आमतौर पर लोग विकलांगों को नौकरियों पर नहीं रखते. हमें उन्हें इसके लिए मनाना होगा. यही वजह है कि हमने विकलांगों को नौकरियां देने वाली कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए खास फायदों का एलान किया है.

शोमा: आज धारणा ये बन चुकी है कि सरकार की नीतियां पूरी तरह से कॉर्पोरेट जगत के पक्ष में झुकी हुई हैं. सामाजिक क्षेत्र में खर्च कम कर कॉर्पोरेट सेक्टर को इतनी सारी सुविधाएं देने का मकसद क्या है?  अगर ये सब मुक्त और प्रतिस्पर्द्धायुक्त बाजार निर्मित करने के लिए है तो फिर विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़), टैक्स हॉलीडे और भूमि अधिग्रहण क्यूं?

आपके कहे को दुरुस्त करने के लिए मैं आपको बता रहा हूं कि हम सामाजिक क्षेत्र में खर्च को नहीं घटा रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि हमने इस खर्च में काफी बढ़ोतरी की है.

शोमा: शायद बीजेपी की तुलना में मगर…

नहीं, आप सही नहीं कह रहीं. शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता—इन सभी चीजों पर जितनी राशि खर्च हो रही है उतनी भारत के इतिहास में पहले कभी खर्च नहीं हुई. आपने सेज़ का जिक्र किया मगर मैं उसका जवाब नहीं देना चाहूंगा क्योंकि मैं सरकार की नीतियों से बंधा हुआ हूं.

शोमा: चीन की बात करें तो वहां केवल छह सेज़ हैं. मगर हमारे यहां बोर्ड ऑफ कंट्रोल ने अपनी पहली ही बैठक में 200 से भी ज्यादा ऐसे क्षेत्रों को मंजूरी दे दी. मैं जानती हूं कि व्यक्तिगत तौर पर आप सोचते हैं कि…

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या सोचता हूं. हम ऑफ द रिकॉर्ड बात नहीं कर रहे और मैं इसके बारे में बात नहीं करना चाहता क्योंकि मैं सरकार की नीतियों से बंधा हुआ हूं. जिस तरह से इस नीति को आगे बढ़ाया जा रहा है उससे कई लोगों को चिंताएं हो रही हैं. और संबंधित मंत्रियों के समूह को इस पर विचार करने के लिए कहा गया है. इसमें मेरी उम्मीद से ज्यादा ही वक्त लग रहा है मगर आशा है कि सेज़ के बारे में जो चिंताए व्यक्त की गई हैं उन्हें दूर किया जाएगा.

शोमा:  भारत के लिए विकास का ये अवसर ऐसे समय पर आया है जब हम दूसरे देशों की गलतियों से सीख सकते हैं, जब हम पर्यावरण, जलवायु बदलाव आदि जैसे मुद्दों पर नई तरह से सोच सकते हैं. क्या जरूरी है कि हम विकास का वही रास्ता अपनाएं और वही गलतियां करें? क्या हमारा रास्ता अलग नहीं हो सकता?

कुछ हद तक, पर विकसित देशों के इन तर्कों से ज्यादा मुग्ध होने की जरूरत नहीं है कि विकसित होने की प्रक्रिया में जिन नए विचार और संकल्पनाओं का इस्तेमाल वो नहीं कर पाए उनका इस्तेमाल हमें करना चाहिए. हम उन देशों में से हैं जिनका उत्सर्जन सबसे कम है.

शोमा: मगर ये इसलिए कम है क्योंकि हम अभी अपनी औद्योगीकरण प्रक्रिया की चोटी तक नहीं पहुंचे हैं.

हमने पेशकश की है कि हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में कम होगा. दरअसल हमने तो विकसित देशों को चुनौती दी है कि वे अपना प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम करें और हमारा वादा है कि हम अपना उत्सर्जन उससे भी कम रखेंगे. हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन ज्यादातर विकसित देशों के उत्सर्जन का मात्र बीसवां हिस्सा ही है. इसलिए हमें विकसित देशों के तर्कों से ज्यादा प्रभावित होने की जरूरत नहीं है. अपने हित में हमने फैसला किया है कि हम ऐसी नीतियां और योजनाएं अपनाएंगे जिससे उत्सर्जन कम रहे और कुछ समय के बाद इसकी दर और भी कम होती जाए मगर इससे हमारी विकास दर पर कोई नकारात्मक असर न पड़े. हमें भी विकसित देशों की तरह तरक्की करने का अधिकार है. कभी उनका मौका था. अब हमारा है.

शोमा: पर हमारी औद्योगिक परियोजनाओं और शहरों में पर्यावरण और मानवीय पहलुओं की अनदेखी की जाती है. क्या विकास की इस कहानी में जीवन की गुणवत्ता भी एक महत्वपूर्ण कारक नहीं होना चाहिए?  फ्रांस सकल घरेलू उत्पाद को फिर से परिभाषित कर रहा है. वहां इसमें ‘खुशहाली’ को भी शामिल किया जा रहा है.

हां, मगर तभी जब आप सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय के एक निश्चित स्तर तक पहुंच जाएं.

शोमा: मुद्दा यही है. हम पहले मुश्किल तक पहुंचेंगे और फिर उसका समाधान ढूंढेंगे.

गरीबी प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक है. गरीब सबसे गंदी दुनिया में रहते हैं. उनकी दुनिया में सफाई, पेयजल, आवास, हवा…जैसी चीजें नारकीय अवस्था में होती हैं. हर चीज प्रदूषणयुक्त होती है. इसलिए मैंने कहा कि सबसे ज्यादा प्रदूषण गरीबी फैलाती है. ये हमारा अधिकार और कर्तव्य है कि पहले गरीबी को हटाया जाए. इस प्रक्रिया में हम उन चिंताओं के प्रति संवेदनशील रहेंगे जो दूसरे देशों द्वारा व्यक्त की गई हैं. मगर ऐसा हम विकास और अपने जीवनकाल में गरीबी को जड़ से मिटाने के मकसद की कीमत पर नहीं करेंगे.

शोमा: चिंता की बात ये है कि जो आप कह रहे हैं जमीनी स्तर पर उसका ठीक उल्टा हो रहा है. पॉस्को या फिर वेदांता परियोजना को ही लीजिए. औद्योगीकरण की सबसे ज्यादा मार गरीबों पर ही पड़ी है. हमारे देश में सबसे ज्यादा उथल-पुथल उन्हीं विकास परियोजनाओं पर मच रही है जो जनविरोधी हैं. भूमि अधिग्रहण, संसाधनों को छीनने और हवा-पानी के प्रदूषण के मुद्दे पर विवाद पैदा हो रहे हैं. ये वही चीजें हैं जिनकी आपने बात की है यानी हवा, पानी, बुनियादी स्वास्थ्य और आवास व्यवस्था. जिस विकास का मकसद गरीबी हटाना था वो गरीबों की मुश्किलें और बढ़ा रहा है. क्या आप इसे स्वाभाविक बात कहेंगे या फिर ये मानेंगे कि जिस तरीके से हम आगे बढ़ रहे हैं वो गलत है?

मेरे हिसाब से लोगों को छलावे में रखकर ये यकीन दिलाया जा रहा है कि जिंदगी के मौजूदा हालात आदर्श हालात हैं और विकास व औद्योगीकरण इन्हें बदतर कर देंगे. यहां हम खूब बहस करते हैं कि स्टील की कीमतें ऊपर जा रही हैं. मगर दूसरी तरफ हमने तीन साल से दुनिया के सबसे बड़े इस्पात निर्माता को भारत में इस्पात संयंत्र लगाने से रोक रखा है. ये एक साजिश है कि गरीब लोग गरीब ही रहें. हम जीवन की किस गुणवत्ता की बात कर रहे हैं? उनके पास खाना नहीं है, नौकरियां नहीं हैं, शिक्षा नहीं है, पेयजल नहीं है. उड़ीसा के ये जिले तब से गरीब हैं जब से दुनिया बनी होगी. वे घोर गरीबी में जी रहे हैं और आप चाहती हैं कि मैं मान जाऊं कि अगर वहां एक इस्पात संयंत्र लग जाएगा तो वो और भी गरीब हो जाएंगे? हम क्या बात कर रहे हैं?

शोमा: मैं, जिस तरह से ये किया जा रहा है, उसकी बात कर रही हूं.

तो हम क्या करें?  हम खनिज धरती में ही दबे रहने दें? क्या हम लौह अयस्क को जमीन के भीतर ही रहने दें? हम कोयले को उसकी और गरीबों को उनकी हालत पर छोड़ दें? क्या आप यही सुझाव देना चाह रही हैं? मेरा कहना ये है कि हमें लौह अयस्क की उन खदानों को विकसित करना चाहिए. हमें कोयले का खनन करना चाहिए. हमें उद्योगों की स्थापना करनी चाहिए ताकि हम लोगों को रोजगार दे सकें. अगर आपके तर्क के हिसाब से काम होते तो जमशेदपुर बना ही नहीं होता. आज जमशेदपुर में जीवन की गुणवत्ता दूसरी जगहों से कहीं बेहतर है. यहां 24 घंटे बिजली और पेयजल की सुविधा है. दूसरे शहर इससे सीख ले सकते हैं. अगर ये तर्क देने वाले लोग सलाहकार के रूप में 1908 में जमशेदजी टाटा के इर्दगिर्द होते तो जमशेदपुर का अस्तित्व ही नहीं होता. आप आज वहां के पर्यावरण को देखिए. हो सकता है शुरुआत में कुछ नुकसान हुआ हो पर ये स्वाभाविक है. औद्योगीकरण की प्रक्रिया के दौरान ऐसा होता है. मगर फिर एक स्थिति आती है जहां से चीजें सुधरने लगती हैं. क्या आप ये चाहती थीं कि वहां के लोग हमेशा घोर गरीबी में जिएं? आप क्यों ये मानकर बैठी हैं कि पॉस्को या मित्तल्स उड़ीसा और झारखंड में जमशेदपुर जैसी कोई जगह नहीं बसा सकते. क्यों आपने ऐसा सोच लिया है?

शोमा: ऐसा मानने की वजहें हैं. सर्वहित और राष्ट्रनिर्माण की जो संस्कृति पहले दिखाई देती थी आज वो कहीं नजर नहीं आती.

मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि पर्यावरण के प्रति संवेदना रखने वाली अंतरात्मा इस देश में सिर्फ गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के पास ही बची रह गई है और व्यापारिक घराने और व्यवसायी इसकी कोई परवाह नहीं करते. मैं इससे बिल्कुल सहमत नहीं हूं. आप तमिलनाडु के नेवेली जाइये और देखिए. नेवेली क्या था? ये तमिलनाडु का सबसे विपन्न इलाका था. आज ये एक समृद्ध कस्बा है. यहां एक स्कूल है जहां का परीक्षा परिणाम हर साल सौ फीसदी रहता है. इस स्कूल के लड़के-लड़कियां प्रतियोगी परीक्षाओं में शीर्ष पर रहते हैं. मुझे उम्मीद है इस बात को आप भी मानेंगी कि नेवेली में जीवन की इस सुधरी गुणवत्ता का फायदा उठाने वालों को गरीब नहीं कहा जा सकता.

शोमा: कॉर्पोरेट्स की लोगों के प्रति जवाबदेही तय करने के मामले में हमारी सरकार उदासीन रही है. उड़ीसा के नियमगिरि हिल्स में वेदांता की परियोजना इसका एक उदाहरण है. स्थानीय आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय वेदांता की आलोचना कर रहा है. नार्वे के एक फंड ने तो कंपनी में लगाया अपना पैसा तक वापस ले लिया. मगर यहां परियोजना को रुकवाने के लिए एक जनहित याचिका दाखिल करनी पड़ी. क्या आप मानते हैं कि हमारी सरकार आम आदमी के हितों का ध्यान रखने में नाकाम होती जा रही है?

इस मुद्दे को हल करने के लिए हमारे पास पर्याप्त कानून हैं. उनका इस्तेमाल कीजिए. अगर केंद्र या राज्य सरकार पर्यावरण संबंधित कानूनों का पालन नहीं करवाती तो ये उसका दोष है. अगर कानून कमजोर हैं तो उन्हें मजबूत बनाइए. पर भगवान के लिए पर्यावरण के नाम पर ये मत कहिए कि गरीबों को अगले 5000 साल तक गरीब ही रहना चाहिए.

शोमा: एक बार फिर वेदांता की बात करते हैं. मैं ये पूछ रही हूं कि सरकार उनके बारे में क्या सोच रही है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी परियोजना पर रोक लगाने के बावजूद  सरकार ने कंपनी से कहा कि वो अपनी भारतीय इकाई के नाम से इसके लिए फिर से आवेदन करे. आप जब वित्त मंत्री नहीं थे तो आपने एक वकील के रूप में उनकी तरफ से जिरह की थी.

ये उनके राजस्व कर मामलों में से एक था. उसका इससे क्या सबंध है?  क्या आप अप्रत्यक्ष रूप से ये कह रही हैं कि मैं उनसे मिला हुआ हूं? अगर कोई वकील हत्या के मामले के किसी आरोपी की तरफ से जिरह कर रहा है तो क्या इसका ये मतलब है कि उसकी भी हत्या में मिलीभगत है? आपके सवाल का मतलब क्या है?

शोमा: ठीक है, मैं अपने शब्द वापस लेती हूं. मेरा सवाल ये है कि उड़ीसा में वेदांता के खराब रिकॉर्ड के बावजूद सरकार उसका पक्ष क्यों ले रही है? उसे अयोग्य घोषित क्यों नहीं किया जाता? उसे अपना रवैया सुधारने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया जाता?

तो कीजिए ना. कौन आपको रोक रहा है? कानून का सहारा लीजिए. मगर परियोजना को क्यों रोकते हैं. उन लोगों को घोर गरीबी के पंजे से छुड़ाने का ये एकमात्र तरीका है.

शांतनु:  विषय बदलते हैं. आप खाद्य फसलों द्वारा जैव ईँधन उत्पादन के खिलाफ क्यों हैं?

हम फसलें खाने के लिए उगाते हैं. उनसे ईंधन बनाने के लिए नहीं. अमेरिका में मक्का की फसल का 20 फीसदी ईंधन बनाने में इस्तेमाल हो रहा है. गन्ने से ईँधन बन रहा है. ताड़ के तेल से ईँधन बन रहा है. और चूंकि ईंधन के बढ़ते मूल्यों की वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमत है इसलिए लोग जिस जमीन पर खाने के लिए फसल उगाते थे अब उसी जमीन पर ईंधन बनाने के लिए फसल उगाते हैं. दुनिया में आज भी जब करोड़ों लोग भूख से पीड़ित हों तो आप इस बात को कैसे जायज ठहरा सकते हैं? हम गरीबी को इतिहास बनाने के प्रति गंभीर हैं. हम भूख और कुपोषण को खत्म करने के बारे में भी गंभीर हैं. मुझे लगता है कि सब को इस बात पर सहमत होना चाहिए कि खाने को ईंधन में न बदला जाए. अगर आप जैव ईंधन बनाना ही चाहते हैं तो ऐसी चीजों से बनाएं जिनका भोजन के रूप में इस्तेमाल न होता हो. जैव ईंधन के उत्पादन हेतु फसलें अलग जमीन पर उगाई जानी चाहिए.

शांतनु: वायदा बाजार पर लगी रोक के बारे में आपका क्या कहना है? अभिजीत सेन कमेटी के मुताबिक इस बात के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं कि वायदा बाजार के कारण कीमतें बढ़ रही हैं. मगर साथ ही कमेटी ने रोक को जारी रखने का सुझाव दिया है. क्या ये दुविधाजनक नहीं है?

मैं इस बात से सहमत हूं कि इस बात का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि वायदा बाजार पर रोक से कीमतों पर कोई असर पड़ता है. मगर चावल, गेहूं, अरहर और उड़द की दाल पर रोक जारी रखने का फैसला मैंने नहीं बल्कि कमेटी ने दिया है. अगर संसदीय समिति यही बात कहती है, अगर सभी राजनीतिक पार्टियां प्रतिबंध की मांग करती हैं, अगर गांवों की जनता भी वायदा बाजार को बढ़ती कीमतों का कारण मानती है तो आपको उनकी बात पर ध्यान देना पड़ता है. यही हमने किया है. मैं इस बारे में निश्चित हूं कि इस रोक का इन चीजों की कीमतों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. कभी-कभी आप ऐसे कदम उठाते हैं जिनका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं होता और नकारात्मक भी नहीं.

शोमा- उस सवाल पर लौटते हैं जो सबको परेशान कर रहा है. भारत जैसे जटिल देश में गरीबी खत्म करने के लिए आपके पास क्या योजना है? क्या इसका अर्थ ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था का सह-अस्तित्व है? 

शहरीकरण को रोका नहीं जा सकता. यह एक अनवरत प्रक्रिया है. आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अविवेकपूर्ण शहरीकरण के नुकसानदेह प्रभावों को- नए शहर बनाकर, शहरों का आकार निर्धारित करके, शहरों में ज्यादा से ज्यादा हरियाली और खुला स्थान छोड़कर—नियंत्रित कर सकते हैं. मेरे ख्याल से इस प्राकृतिक विकास को रोकने की ताकत किसी के हाथ में नहीं है. हमें इसमे हस्तक्षेप करने की बजाय इसका प्रबंधन करने की कोशिश करनी होगी. गरीबी मुक्त भारत को लेकर मेरा जो विचार है उसमें एक बड़ी आबादी, तकरीबन 85 फीसद लोग शहरों में रहेंगे. महानगरों में नहीं बल्कि शहरों में. किसी शहरी वातावरण में जल आपूर्ति, बिजली, शिक्षा, सड़क, मनोरंजन और सुरक्षा को प्रभावी तरीके से मुहैया करवाना 6 लाख गांवों के मुकाबले ज्यादा आसान है. मैं ये भी मानता हूं कि एक बड़ी आबादी गांवों में रहना और खेती करना चाहेगी. इसका स्वागत होना चाहिए और हमें इसे बढ़ावा देना चाहिए, लेकिन ये संख्या शहरों की तरफ पलायन कर गई आबादी के मुकाबले काफी छोटी होगी. मेरा ये भी मानना है कि हमें लंबे समय तक ऊंची विकास दर की जरूरत पर ज़ोर देते रहना होगा. हम बहुत जल्द थक जाते हैं. हमने तीन-चार साल ऊंची विकास दर हासिल की और फिर बैठ गए, हमें लगता है कि ये ऐसे ही चलता रहेगा. विकास ऐसे नहीं होता. इसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. हमें सुनिश्चित करना होगा कि विकास की ऊंची दर अगले 20-30 सालों तक जारी रहे। जब हम गरीबी, अशिक्षा का उन्मूलन कर लेंगे, असाध्य रोगों पर लगाम कस लेंगे, जब हम हर बच्चे को सुरक्षित कर लेंगे, जब हम मूलभूत जरूरतों जैसे पेयजल, बिजली, ग्रामीण सड़क संपर्क को पूरा कर लेंगे- उस वक्त विकास की प्रक्रिया खुद ब खुद संचालित होने लगेगी, लोग खुद ही इस बात का ध्यान रखने लगेंगे कि विकास की दर निश्चित रफ्तार से जारी रहे. लेकिन वो समय आने के लिए, अपने जीवनकाल में ही गरीबी उन्मूलन के लिए हमें 9 फीसदी की विकास दर को 10 फीसदी तक ले जाना होगा और इसके लिए हमें कठिन मेहनत करने की दरकार होगी. अगर आप अगले 100 सालों में गरीबी खत्म करना चाहते हैं तो आपके पास अलग योजना हो सकती है. लेकिन अगर हमें इसे अगले 20 सालों में मिटाना है तो हमें कठिन मेहनत की जरूरत होगी.

शोमा- ये तो दिवास्वप्न जैसा है क्योंकि ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा है. गुड़गांव को देखिए- भारत उदय का प्रतीक, बिल्कुल नए सिरे से विकसित हुआ. ये तो शहरी रामराज्य साबित हो सकता था, बजाय इसके आज यहां न तो पानी है, न बिजली है, न यातायात की सुविधा है, भयंकर प्रदूषण है और गरीबों के लिए बिल्कुल भी न तो जगह है न ही योजना है. किसी भी मंझोले दर्जे के शहर को ले लीजिए। मुरादाबाद, सिलीगुड़ी, पटना। किसी भी महानगर को लीजिए–विकास के बोझ तले दबे जा रहे हैं. इन जगहों पर स्पष्ट रूप से गरीबों को कोई फायदा मिलता नहीं दिख रहा है.

तो क्या हम लोगों को इन गांवो में रहने के लिए छोड़ दें?

शोमा- मेरा सवाल है कि क्या चीज़ों को करने का कोई स्थिर, मजबूत और अलग तरीका है ताकि समृद्धि का फायदा कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित रहने की बजाय संपूर्ण विकास सुनिश्चित हो?

नियमों को लागू कीजिए. टाउन प्लानिंग के क़ानूनों को लागू करिए. क़ानून आपको बिना पानी और खुला स्थान मुहैया करवाए निर्माण की इजाजत ही नहीं देगा. क़ानूनों के पालन में हमारी सामूहिक विफलता को आप विकास के मॉडल की असफलता के रूप में पेश करते हैं. मुझे नहीं लगता कि विकास के मॉडल में कोई कमी है. ये संबंधित विभागों की क़ानूनों के पालन के प्रति अनिच्छा से जुड़ा है. इसका हल ये नहीं है कि हम अतीत में चले जाएं और कहें कि हम कानूनों का पालन नहीं कर सकते इसलिए हम गरीबी और निराशा के आलम में रहते रहें.

शांतनू- अगर आपकी राजनीतिक मजबूरियां नहीं होतीं तो आप कृषि क्षेत्र को कैसे सुधारते?

आईसीआरए द्वारा किए गए 2008 के ताज़ा आंकलन के मुताबिक कृषि विकास दर 4.5 से 4.7 फीसदी रहेगी. इस साल अनाज का कुल उत्पादन 227 से 230 मिलियन टन रहेगा. यानी कि कृषि क्षेत्र भी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है. इसके बावजूद किसान गरीब हैं क्योंकि कृषि पर निर्भर आबादी बहुत बड़ी है. अगर ये संख्या कम हो, या कहें कि आधी हो तो आप कहेंगे कि भारत में कृषि बहुत बढ़िया कर रही है. लिहाजा हमें इस मुद्दे पर दुविधा में नहीं पड़ना चाहिए कि कृषि का प्रदर्शन बढ़िया है जबकि किसानों की हालत खराब. कृषि की दशा सुधारने के लिए हमें पांच मुख्य चीजों की जरूरत पड़ेगी. पानी, बिजली, बीज, खाद और ऋण. मेरे ख्याल से हमने ऋण के मामले में बढ़िया किया है. पानी के मामले में भी हमने बढ़िया करना शुरू कर दिया है इसका श्रेय लंबी-चौड़ी सिंचाई परियोजनाओं को जाता है. इसमें कुछ वक्त लगेगा लेकिन जब ये परियोजनाएं पूरी हो जाएंगी तो पानी के मामले में स्थितियां सुधर जाएंगी. हमने अपने घरेलू बीजों की अनदेखी की है, हमारे पास पूरी तरह से विकृत उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था है और बिजली के मामले में हम पूरी तरह से असफल रहे हैं. लेकिन गुजरात ने हमें दिखाया है कि कैसे कृषि के लिए बिजली की व्यवस्था की जाय. बीजों के साथ हमने पिछले साल एक नई शुरुआत की है. हम बीजों को बदलने की दर को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और उर्वरकों की समस्या से भी हम पार पा सकते हैं बशर्ते हम उसके परिणाम झेलने के लिए तैयार हो.

अगर इन पांचों चीज़ों में तालमेल बन जाता है तो कृषि क्षेत्र चार फीसदी से ज्यादा की रफ्तार से हर साल विकास करेगा. लेकिन अगर कृषि की विकास दर चार फीसदी बनी रही तो किसानों की गरीबी भी बनी रहेगी इसकी वजह है इसपर निर्भर लोगों की बड़ी संख्या. इसलिए इसका इलाज यही है कि किसान कृषि से दूर होकर औद्योगिक क्षेत्रों की तरफ रुख करें. इस रूमानी विचार को दूर करें कि हम अपनी 60 फीसदी आबादी को कृषि में लगाकर आगे बढ़ सकते हैं.

शोमा- राष्ट्रीय संसाधनों जैसेकि खनिजों की बात करते हैं. जब आप राष्ट्रीय संपदा को निजी कंपनियों के हाथ सौंपते हैं तो उनका मकसद शुद्ध रूप से मुनाफा कमाने का होता है, इस नीति का क्या तर्क है? निर्दयतापूर्वक किसी स्थान का दोहन करने से रोकने के लिए क्या उपाय हैं?

निजी कंपनियों के हाथ मत सौंपिए. इसकी बजाय अगर आप चाहें तो प्रभावी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी(पीएसयू) स्थापित कर सकते हैं.

शोमा- लेकिन आप तो पीएसयू के खिलाफ हैं.

हम नहीं हैं, किसने कहा हम ऐसे हैं? हम तो एनटीपीसी, सेल और एनएमडीसी में और पैसे का निवेश कर रहे हैं. हमने पिछले चार सालों में 29 बीमार इकाइयों के सुधार के लिए 13,000 करोड़ रूपए का निवेश किया. लिहाजा पीएसयू बनाने से कोई परहेज नहीं है. लेकिन ये रूढ़िवादी मानसिकता क्यों, कि निजी क्षेत्र लालची हैं इसलिए बुरे हैं और सार्वजनिक क्षेत्र अच्छे हैं.

शोमा-बहुत सारे कड़वे उदाहरण हैं. यूनियन कार्बाइड, एनरॉन.

अगर आप निजी और सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े इन रूढ़िवादी विचारों के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. मेरा कहना है कि कोयला और लौह अयस्क ज़मीन के नीचे दबे रहने के लिए नहीं है. उनका उपयोग होना चाहिए. जहां तक पर्यावरण और जरूरत से ज्यादा दोहन को लेकर आपकी चिंता है, जब भी हमको लगेगा कि कुद्रेमुख में खनन प्रदूषण पैदा कर रहा है, हम इसका खनन बंद कर देंगे. लेकिन संसाधनों का दोहन न होने देने की बहस को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता. जो लोग ऐसा कर रहे हैं उनके हित गरीबी कायम रहने से जुड़े हुए हैं.

शोमा- आप कुद्रेमुख में खनन रोक देंगे, लेकिन इस इलाके का तो विनाश हो चुका है.

शांतनु- एक औऱ बड़े खतरे की तरफ बढ़ते हैं. खुदरा बाजा़र- हाल ही में आए सरकार प्रायोजित एक अध्ययन में ये बात साफ हुई थी कि बड़े घरानों के खुदरा बाज़र में घुसने का परिणाम अंतत: छोटे और मझले दर्जे के विक्रेताओं के सफाए के रूप में सामने आएगा.

ये एक स्वाभाविक भय है. इस बात का कोई प्रामाणिक सबूत नहीं है जिससे पता चलता हो कि खुदरा चेन के आने से छोटे-मोटे दुकानदार खत्म हो गए. उदाहरण के लिए वॉलमार्ट को लीजिए- एक बार मैं उसके चेयरमैन से मिला, उन्होंने कहा उनका 47वां स्टोर चीन में खुल गया है और इस बात का कोई सबूत नहीं है कि छोटे खुदरा विक्रेता खत्म हो गए हों. फिर भी चिंताएं स्वाभाविक हैं. जब तक ये पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाती हैं हम धीरे-धीरे और सावधानी से आगे बढ़ेंगे. हम ये नहीं कह रहे हैं कि चिंताएं ग़लत हैं. इसीलिए हमने सिर्फ थोक, एक ही ब्रांड वाले खुदरा केंद्रों में विदेशी निवेश की इजाजत दी है. हमने अभी तक सभी ब्रांड वाले खुदरा चेन में विदेशी निवेश की छूट नहीं दी है.

शोमा- आपको लगता है कि माओवादी-नक्सल समस्या का संबंध वित्तीय समस्याओं से है?

नक्सल प्रभावित इलाके काफी बुरी दशा में हैं. निश्चित रूप से इन इलाकों के आदिवासी गरीबी और अशिक्षा से जूझ रहे हैं. राज्यों को इसकी जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी क्योंकि उनहोंने इन क्षेत्रों के विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है और न ही यहां के निवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान किया है. आज ये राज्य, आदिवासियों के साथ टकराव की अवस्था में नज़र आ रहे हैं. और नक्सलवादी-माओवादी इन आदिवासियों के सहयोगियों के रूप में देखे जाते हैं. लेकिन राज्य की असफलता का मतलब वामपंथी उग्रवाद को बढ़ावा देना नहीं है. हमें नक्सलवाद से लड़ना होगा और साथ ही राज्य को आदिवासियों की बेहतरी के प्रति और संवेदनशील होना पड़ेगा.

शोमा- प्रधानमंत्री ने फिजूलखर्ची पर चिंता जतायी है. क्या एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए ये सही है जो अभी निर्माण के दौर में है?

बिल्कुल, लेकिन इसे आप क़ानून बना कर नहीं रोक सकते. इसे स्कूलों और घरों में मूल्यों पर आधारित शिक्षा देकर ही रोका जा सकता है.

शोमा- बीजेपी और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों में अंतर कर पाना मुश्किल है. इस पर क्या विचार है?

मुझे नहीं लगता कि बीजेपी किसी आर्थिक नीति की जनक है. कांग्रेस नई आर्थिक नीतियों की जनक है. बीजेपी ने उसी प्रक्रिया को अपने तरीके से आगे बढ़ाया, इस दौरान उन्होंने कई ग़लतियां भी की. लिहाजा ये सवाल उनसे किया जाना चाहिए– क्या बीजेपी कांग्रेस जनित आर्थिक नीतियों का अनुसरण करना चाहती है?

हमका अइसा-वइसा ना समझो

शहर की अमीरज़ादी गांव के गरीब स्वाभिमानी छोरे पर मर मिटती है। प्रेमी युगल, लड़की के शातिर बाप को छका कर, जो कि उसे घर जमाई बनाना चहता है, उंचनीच की इस खाई को पाट देते हैं। एक दूसरी कहानी में गांव का शरारती लड़का फिल्मी सितारा बनने के लिए घर से पैसे चुरा कर मुंबई भाग जाता है। धोखा खाने और अपनी आंखें खुलने के बाद वो एक आज्ञाकारी बेटे की तरह घर वापस आ जाता है। या फिर ठाकुर, गांव की औरतों, उनके जानवरों और गरीब किसानों पर अपनी बुरी नज़र डालता है और हीरो जवान हो कर उससे उसकी काली करतूतों का बदला लेता है। क्या हम सत्तर और अस्सी या इससे पहले के दशकों वाली दिलीप कुमार, धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन की सुपर हिट फिल्मों की बात कर रहे हैं? दरअसल इस तरह की कहानियां इक्कीसवीं सदी में ज़बर्दस्त तरीके से फल-फूल रहे भोजपुरी सिनेमा की ख़ास पहचान बन चुकी हैं। 

लंबे समय तक उपेक्षित रही पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के 15 करोड़ लोगों की भाषा भोजपुरी एकाएक बढ़िया मुनाफे वाले सिनेमा का ज़रिया बन गई है। कहा जा रहा है कि भोजपुरी में आई इस बहार का सालाना कारोबार 200 करोड़ रूपए से भी ज्यादा है। और इसमें प्रोड्यूसर, डिस्ट्रीब्यूटर से लेकर सिनेमा हॉल तक सबकी जेबों में अभूतपूर्व पैसा पहुंच रहा है। इस सफलता का कुछ श्रेय उन 40 लाख प्रवासियों को भी जाता है जो मुंबई, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसी अनजान जगहों पर भी तमाम हिंदी फिल्मों के मुकाबले इनका बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित करते हैं। "आम लोग भोजपुरी फिल्मों की तरफ मुड़ रहे हैं क्योंकि वो आजकल की हिंदी फिल्मों से खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते," कहना है भोजपुरी फिल्म निर्माता दीपा नारायण का। दीपा को पिछले साल इन्हें "कब होई गौना हमार" के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। भोजपुरी के गायककलाकार और सितारे मनोज तिवारी धड़ल्ले से कहते हैं, "भोजपुरी ने भारतीय गांवो और वहां के पारिवारिक मूल्यों को पहचान लिया है। हिंदी सिनेमा में बड़ी मुश्किल से ही हिंदुस्तान की झलक मिलती है।" उनके प्रतिद्वन्द्वी भोजपुरी सितारे रवि किशन भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हुए कहते हैं– "हिंदी फिल्मों में आज कोई भी न तो ट्रैक्टर चलाता है न ही अपने पिता के पैर छूता है।

समझा जा सकता है कि बॉलीवुड भोजपुरी फिल्मों की तरफ क्यों आकर्षित हो रहा है। जीपी सिप्पी और इंद्र कुमार ने पिछली होली पर ही अपनी पहली भोजपुरी फिल्में रिलीज़ की थी। फरवरी में एकता कपूर की बालाजी टेलीफिल्म ने भी अब तक की सबसे महंगी, 2 करोड़ रूपए की लागत वाली भोजपुरी फिल्म गब्बर सिंहरिलीज़ की। इसके अलावा अमिताभ बच्चन पहले ही दो भोजपुरी फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं तो अजय देवगन ने भी एक भोजपुरी फिल्म में काम किया है। अगर आंकड़ो पर नज़र दौड़ाएं तो इस साल करीब 70 भोजपुरी फिल्मों के रिलीज़ होने की उम्मीद है। 

इन फिल्मों की लोकप्रियता और दिनोंदिन बढ़ती जा रही भव्यता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले महीने ही भोजपुरी फिल्मों का पहला नहीं बल्कि तीसरा समारोह आयोजित किया गया जो हर मायने में हिंदी फिल्मी आयोजनों से टक्कर ले रहा था। 

1961 में रिलीज़ हुई पहली फिल्म "गंगा मैय्या तोहे पियरी चढ़इबों" से शुरू हुआ भोजपुरी फिल्मों का सफ़र एक लंबी यात्रा तय कर चुका है। आज भोजपुरी फिल्म के नायक आसानी से एक फिल्म के लिए 15 लाख से ज़्यादा मेहनताना लेते हैं। श्वेत श्याम "गंगा मैय्या तोहे पियरी चढ़इबों" की रिलीज़ के एक महीने बाद तक उत्तर भारत के सारे सिनेमा घर हाउसफुल रहे। फिल्म देखने वालो में देश के पहले राष्ट्रपति भोजपुरी भाषी डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी शामिल थे। 

हालांकि ये फिल्म, भोजपुरी फिल्मों की कोई परिपाटी स्थापित नहीं कर सकी। 70 के दशक की दो चार फिल्मों को छोड़ दें तो भोजपुरी सिनेमा की पहली लहर ने जल्द ही दम तोड़ दिया था। ऐसा इसलिए नहीं था कि हिंदी ज्यादा विस्तृत इलाके में समझी जाने वाली भाषा थी बल्कि उस समय तक की हिंदी फिल्में भी कमोबेश उत्तर भारतीय गांवो और छोटे कस्बों की सामाजिक परंपराओं को अपनी फिल्मों में शामिल किया करती थीं। "1990 के शुरुआती दिनों में सनी देओल और अजय देवगन के आने तक हिंदी फिल्में आम आदमी के लिहाज से ही बनती थी," फिल्म वितरक और निर्माता सुनील बुबना बताते हैं। इन्होंने अपने सिनेमा हॉल में हिंदी फिल्मों की बजाय भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन शुरू कर दिया है। भोजपुरी फिल्मो की ऐश्वर्या राय मोनालिसा कहती हैं, "भोजपुरी बोलने वाले लोग हाईफाई नहीं हैं।" गब्बर सिंह के निर्माता महेश पांडे मुस्करा कर बताते हैं, "भोजपुरी फिल्मों ने इस हद तक हिंदी फिल्मों की जगह ले ली है कि बिहार में अब इनके लिए सिनेमा हॉल्स ही नहीं बचे हैं"

पिछले एक दशक के दौरान हिंदी सिनेमा को पूरी तरह से बदलने की तीन वजहें स्पष्ट रूप से नज़र आती हैं जिनकी वजह से भोजपुरी सिनेमा के पुनर्जन्म की नींव तैयार तैयार हुई। पहला, 1991 का आर्थिक उदारीकरण जिसने मनोरंजन प्रिय महानगरीय भारतीयों की आय में हुई बढ़ोत्तरी कर उन्मुक्त खर्च को बढ़ावा दिया। मल्टीप्लेक्सों की बाढ़ सा आ गई जिनमें अब तक अगली कतार में बैठने वाले साधारण लोगों के लिए कोई जगह ही नहीं थी। दूसरे, यहां के अंग्रेज़ी भाषी, पश्चिमोन्मुख, छोटे परिवारों वाले भारतीय जो लंबे समय से अपनी पिछली गंवई ज़िंदगी से अलग थलग रहे थे उनके पास जातपांत, गांव का छोराशहर की गोरी, कुली, जूता साफ करने वाला लड़का, मिल मजदूर, ईमानदारी की बेइमानी पर जीत जैसे हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय मसालों के लिए कोई समय नहीं था। और तीसरी बात, हिंदी सिनेमा अपनी मूल आत्मा मध्य भारत की हिंदीउर्दूहिंदुस्तानी से दूर हटकर दिल्ली और उत्तरपश्चिम की पंजाबीहिंदी की ओर मुखातिब हो गया था। इसका विषय, भावनाएं, चरित्र, डायलॉग से लेकर गीतों के बोल तक सब बदल चुके थे। बॉलीवुड ने सूंघ लिया था कि अब बड़े शहरी दर्शकों की जेब में ही पैसा था, जो "से शावा, शावा" पर थिरकता था। यूपी बिहार का गरीब दर्शक इससे खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा था।

"यश चोपड़ा जैसे निर्माताओं ने आम आदमी को किनारे करके ऊपरी तबके के लिए फिल्में बनानी शुरू कर दी", ये कहना है जालंधर के अजय भनोत का जो पंजाब और हरियाणा के 35 सिनेमा हॉल्स में ज़बर्दस्त सफलता के झंडे गाड़ने वालीं भोजपुरी फिल्मों का वितरण करते हैं। भनोत आगे बताते हैं, "ज्यादातर हिंदी फिल्मों में अंग्रेजी संवाद होते हैं जिन्हें ये दर्शक समझ ही नहीं पाते हैं।" पिछली दिवाली पर लुधियाना में मनोज तिवारी की फिल्म "धरतीपुत्र" देखने के लिए मची मारामारी देखकर भनोत सकते में आ गए थे। इसने अक्षय कुमार की "गरम मसाला", संजय दत्त की "शादी नं. वन", और सलमान खान की "क्योंकि" की कुल कमाई से भी ज्यादा पैसे बटोरे थे। 

गायककलाकार मनोज तिवारी के योगदान को भोजपुरी फिल्मों की इतनी बड़ी सफलता में भुलाया नहीं जा सकता। बेहतर मनोरंजन की भूख ने 1990 में भोजपुरी लोकगीतों का एक बेहद फलता-फूलता बाज़ार तैयार कर दिया। इससे जुड़े गायकों मनोज तिवारी, दिनेश लाल यादव को खूब शोहरत मिली। उनके ऑडियो कैसेट्स की बिक्री लाखों में पहुंच गई। सदी की पहली भोजपुरी फिल्म "हमार सैंइयां" 2001 में रिलीज़ हुई। रवि किशन इसके हीरो थे और मनोज तिवारी ने इसके पांच गानों को अपनी आवाज़ दी थी। तीन साल बाद खुद मनोज तिवारी "ससुरा बड़ा पैसावाला" में हीरो बने नज़र आए। फिल्म सुपर हिट साबित हुई और छोटे बजटवाली इस फिल्म ने 2 करोड़ रूपए की कमाई की। किशन इस समय दो फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं जिसमें नायक भी वे खुद ही हैं, और जिनमें से एक का नाम है "बिहार माफिया"। 

भोजपुरी फिल्मों ने मुंबई और दिल्ली के 50 से ज्यादा सिनेमा हॉल्स को भी उनकी निश्चित मौत से बचाया है। बीग्रेड फिल्मों से सप्ताह में 80,000 रूपए कमाने वाले सिनेमाहॉल्स भोजपुरी फिल्मों से हफ्ते में औसतन तीन लाख रूपए की शानदार कमाई का आंकड़ा छूने लगे हैं। मुंबई में भोजपुरी फिल्म दिखाने वाले राजेश सिंह ने बताते हैं, "पहले तो हमें अपने स्टाफ को पैसा तक देने में दिक्कत होती थी।" इसने उन वितरकों को भी नई ज़िंदगी दी है जो मुंबई के कॉर्पोरेट डिस्ट्रीब्यूटर्स के हाथों अपना व्यापार गंवा चुके थे। भनोत आगे जोड़ते हैं, "भोजपुरी फिल्में हमारा ऑक्सीजन है।"

निश्चित रूप से भोजपुरी फिल्मों का व्यापार हिंदी फिल्मों (सालाना व्यापार 8,000 करोड़ रूपया) का एक ज़रा सा हिस्सा ही है। बिहार और उत्तर प्रदेश में 6 से 15 रूपए या फिर शहरों में अधिकतम 30 रूपए की टिकट के मद्देनजर भोजपुरी निर्माताओं को बजट पर ध्यान देने की आवश्यकता है। निर्देशक मोहनजी प्रसाद कहते हैं, "किसी फिल्म के लिए 70 लाख रूपए से ज्यादा का निवेश निस्संदेह जोखिम भरा है।" किशन इसे डेढ़ करोड़ तक पहुंचा देते है। लेकिन तिवारी मल्टीप्लेक्स दर्शकों तक पहुंचने के लिए बजट में बढ़ोत्तरी की हिमायत करते हैं। अजय देवगन के अभिनय वाली फिल्म "धरती कहे पुकार के" के निर्माता अभय सिन्हा कहते हैं, "भोजपुरी फिल्मों को मल्टीप्लेक्सों से फायदा होगा। आखिरकार दक्षिण भारतीय भी अपनी फिल्मों को देखने के लिए मल्टीप्लेक्सों का रुख करते ही हैं।"

भोजपुरी की गंगा का बहाव इतना तेज़ है कि हर कोई इसमें हाथ धोना चाहता है। आलम ये है कि तीन नए भोजपुरी चैनल जल्द ही आने वाले हैं। इनमें से एक चैनल "महुआ" ने रवि किशन को एक कार्यक्रम पेश करने के लिए भी साइन किया है। चाहे टीवी हो या फिर फिल्म, भोजपुरी में सफल होने के लिए सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण चीज़ है इन फिल्मों की कथावस्तु। निर्देशक आनंद घटराज याद करते हैं, "शाहरुख की सुपरहिट फिल्म डरकी भोजपुरी रीमेक बुरी तरह फ्लॉप रही।" 70 के दशक की हिंदी फिल्मों के विषय इस भाषा के दर्शकों के लिए बिल्कुल मुफीद है। इन दिनों भोजपुरी फिल्म बना रहे गर्लफ्रेंड और हवश जैसी बी ग्रेड फिल्मों के सहायक निर्देशक बाबुल सोनी बताते हैं, "मैं अपने माता पिता को अपनी हिंदी फिल्में देखने के लिए कभी नहीं कह सका। लेकिन बांके बिहारी एमएलए का निर्देशन करने के बाद मैं उन्हें सिनेमा हॉल ले गया और हमने साथ में बड़ा अच्छा वक्त बिताया।"

अजित साही

मायावती का ब्राह्मणवादी भाई-भतीजावाद

मायावती कभी सिर्फ दलितों की मसीहा थीं मगर फिर उन्होंने ब्राह्मणों और मुसलमानों को साथ मिलाकर एक ऐसा अजेय गठजोड़ बनाया कि प्रदेश की सत्ता उनकी हो गई. मगर जिस तरह से वे अब अपने करीबी विश्वासपात्र सतीश चंद्र मिश्र को पुरस्कृत करने पर तुली हैं उससे इस गठजोड़ के कुछ कमजोर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है.

समस्या विकलांगों के लिए बनने वाले एक विश्वविद्यालय से पैदा हुई है जिसे मिश्र की मां डॉ. शकुंतला मिश्रा के नाम पर बनाया जा रहा है. शिया मुसलमान ये कहकर इसका विरोध कर रहे हैं कि इस विश्वविद्यालय के नाम जो जमीन स्थानांतरित की गई है उसका एक हिस्सा ऐतिहासिक शाहदरा मस्जिद की भूमि का है. विवाद तीन फरवरी 2008 को इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय की घोषणा के साथ ही शुरू हो गया था. पहले तो राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव पी के मिश्र ने 74 एकड़ जमीन नि:शुल्क डॉ शंकुतला मिश्रा सेवा संस्थान नामक ट्रस्ट के नाम स्थानांतरित किए जाने संबंधी फाइल पर हस्ताक्षर करने से ही इनकार कर दिया. फिर उन्हें निर्देश मिला कि वे या तो फाइल पर हस्ताक्षर करें या इसका नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहें. कथित रूप से मायावती ने उनसे कहा कि उन पर सतीश मिश्र का बहुत अहसान है और ये विश्वविद्यालय तो कुछ नहीं है, वे उनके लिए कुछ भी कर सकती हैं. यद्यपि मुख्य सचिव का कार्यकाल खत्म होने में तीन महीने शेष थे फिर भी मिश्र ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का विकल्प चुनने का फैसला किया. हालांकि तहलका ने जब इस संबंध में उन्हें टटोलने की कोशिश की तो उनका बस यही कहना था, “मेरे पास इस मुद्दे पर कहने के लिए कुछ नहीं है.” मुस्लिम मामलों के जानकार इब्ने हसन सवाल करते हैं, “पास में ही इतनी सरकारी जमीन पड़ी हुई है. तो मस्जिद की ही जमीन लेने की क्या जरूरत है.?” 

मायावती ने सतीश मिश्र की अध्यक्षता वाले ट्रस्ट को 51 लाख रुपये भी दिए. मगर नि:शुल्क भूमि विवाद और मुख्य सचिव की सेवानिवृत्ति के चलते उन्हें थोड़ा पीछे हटना पड़ा. सात जून 2008 को हुई एक कैबिनेट बैठक में उन्होंने अपने पहले वाले फैसले को बदलते हुए ऐलान किया कि विश्विविद्यालय की स्थापना अब ट्रस्ट की बजाय उनकी सरकार करेगी. इसके तुरंत बाद विकलांग कल्याण विभाग को विश्वविद्यालय की चाहरदीवारी बनाने का काम सौंपा गया जबकि दूसरे विभागों से कहा गया कि वे अपने बजट से विश्वविद्यालय के लिए सड़क बिजली और पानी की सुविधाएं सुनिश्चित करें. 

मगर भूमि अधिग्रहण से मुसलमानों का गुस्सा भड़क गया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जो जमीन ले रही है उसमें से 27.2 बीघा शाहदरा मस्जिद की है जिसे 1820-27 के दौरान अवध के पहले नवाब गाजीउद्दीन हैदर शाह की बीवी मल्लिका किश्वर जहां ने बनवाया था. उधर, लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट चंद्रभानु मस्जिद की जमीन के अधिग्रहण से इनकार करते हैं. उनके मुताबिक विश्वविद्यालय विकलांग कल्याण विभाग की जमीन पर बनाया जा रहा है और इसके अलावा थोड़ी सी जमीन ग्राम सभा से ली गई है. 

लखनऊ-मोहन रोड पर स्थित काकोरी के पास स्थित शाहदरा मस्जिद का शुमार सबसे पुरानी और सम्मानित मस्जिदों में होता है. मस्जिद प्रशासन के पास उपलब्ध रिकॉर्ड्स की मानें तो ये जमीन शिया मुसलमानों के नाम पर है और इसका पंजीकरण यूपी मुस्लिम वक्फ बोर्ड एक्ट 1936(जिसमें 1960 और 1995 में सुधार किया गया था) के तहत हुआ है. इसका पंजीकरण नंबर है I-1564-B (1968). 

इससे पहले मस्जिद की भूमि पर अधिकार को लेकर शिया वक्फ बोर्ड नादवा कॉलेज के साथ भी लंबी लड़ाई लड़ चुका है. इस मामले में 2001 में हाईकोर्ट ने एक आदेश पारित कर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था. पिछले 40 साल से शाहदरा मस्जिद के मुत्तवल्ली डॉ बकार मेहदी नाराजगी भरे स्वर में कहते हैं, “जब भी मायावती सत्ता में आती हैं तो मस्जिद की जमीन हड़पने की कोशिश की जाती है.” मेहदी का आरोप है कि अगस्त 1995 में भी भूमि माफिया द्वारा खाली पड़ी मस्जिद की जमीन पर अतिक्रमण की ऐसी ही कोशिश की गई थी. शाहदरा मस्जिद बचाओ संघर्ष समिति के सचिव सिकंदर हुसैन कहते हैं, “उन्होंने कई पेड़ काट दिए हैं और मजदूरों के रहने और निर्माण सामग्री के रखने हेतु अस्थाई शेड्स बनाने के लिए सात कब्रों को उजाड़ दिया है. ये समिति विधानसभा के सामने एक धरने पर बैठ गई है. 

मगर शायद उत्तर प्रदेश के नौकरशाहों के लिए मुख्यमंत्री के आदेश कोर्ट के फैसले से ज्यादा बड़े हैं इसलिए वे जी-जान से मिश्रा के सपनों को हकीकत का जामा पहनाने में जुटे हैं. बुलडोजर और मशीनों की मदद से काम जारी है. कई पेड़ उखाड़े जा चुके हैं, जमीन समतल कर दी गई है और चाहरदीवारी के लिए बुनियाद खोदने का काम भी शुरू हो चुका है. निर्माण स्थल पर चौबीसों घंटे पुलिस का भारी पहरा रहता है. मिश्रा जब भी लखनऊ में होते हैं तो अक्सर काम की तरक्की का मुआयना करने निर्माण स्थल पर आते रहते हैं. 

मगर शिया मुसलमान इस मामले में हार मानने को तैयार नहीं हैं. तीन जुलाई को दरगाह हजरत अब्बास में आयोजित एक बड़े फरियादी जलसे में उन्होंने ऐलान किया कि वे इस मुद्दे पर सीधे सरकार से आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे. शिया नेता मौलाना कल्बे जव्वाद के करीबी विश्वासपात्र मौलाना सैफ अब्बास नकवी का कहना था, “हम मस्जिद की एक इंच जमीन भी नहीं देंगे. हम विकलांगों के लिए विश्वविद्यालय के नहीं बल्कि इसके विवादित जमीन पर बनाए जाने के विरोध में हैं.” 

मुस्लिम मामलों के जानकार इब्ने हसन सवाल करते हैं, “पास में ही इतनी सरकारी जमीन पड़ी हुई है. तो मस्जिद की ही जमीन लेने की क्या जरूरत है.?”  आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता ने अपने समुदाय के सदस्यों से अतिक्रमण के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का आह्वान किया है. मेहदी चेतावनी देते हैं, “अगर सरकार हमारी जमीन से नही हटी तो हम सड़कों पर उतरेंगे.” मस्जिद प्रशासन इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में इस मुद्दे पर एक याचिका दायर करने वाला है. 

उधर, दूसरी पार्टियों ने भी इस मुद्दे को लेकर राजनीति शुरू कर दी है. समाजवादी पार्टी नेता शिवपाल सिंह यादव ने मायावती पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगाते हुए यहां तक कह डाला कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. 

हालांकि राज्य सरकार ने मस्जिद प्रशासन के दावों की जांच करने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति तो बना दी है पर मिश्र पर मायावती के वरदहस्त और मुस्लिम समुदाय में पैदा हुई नाराजगी को देखते हुए इस मामले में अंतिम मुठभेड़ अवश्यंभावी लगती है. अब इसका मायावती के वोट समीकरणों पर क्या असर पड़ेगा ये तो वक्त ही बता सकता है. 

श्रवण शुक्ला

“हम किसी को फंसा नहीं रहे हैं”

आरुषि-हेमराज हत्याकांड की एक क़दम आगे तो दो क़दम आड़े चल रही सीबीआई जांच पर तहलका संवाददाता तुषा मित्तल ने सीबीआई के संयुक्त निदेशक और मामले के प्रभारी अरुण कुमार से बातचीत की।  

क्या आपको विश्वास है कि आपने असली क़ातिलों को पकड लिया है?

हां।

सीबीआई का कहना है कि उसके पास डॉ. राजेश तलवार के खिलाफ कोई सुबूत नहीं है, फिर भी उन्हें सिर्फ ज़मानत पर रिहा किया गया। क्या उन्हें आरोपमुक्त किया जाएगा?

हमारे पास उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। जब हम आरोपपत्र दाखिल करेंगे तो उसमें सारी बातें साफ हो जाएंगी।

अगर उनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं थे तो फिर उन्हें पचास दिनों तक हिरासत में रखने की क्या जरूरत थी?

शुरुआत में ये बात साफ नहीं थी। उनका पहला लाई-डिटेक्टर टेस्ट आधा-अधूरा था। इसके बाद उनका पॉलीग्राफ टेस्ट हुआ। जैसे ही इसके नतीजे हमें मिले हमने उन्हें रिहा करने के लिए कहा।

अगर कृष्णा और राजकुमार अपराधी थे तो वो फरार क्यों नहीं हुए? कृष्णा उसी कॉलोनी में रहता रहा जहां तलवार का घर है…

शायद हत्यारों को दोनों शवों के पाए जाने की उम्मीद ही नहीं रही होगी। स्थानीय पुलिस तुरंत ही हेमराज की तलाश में उसके दोस्तों के पास गई। एक और वजह ये हो सकती है कि अगर वो फरार हो जाते तो उन पर सीधे शक चला जाता।

सीबीआई का कहना है कि ये हत्या पूर्व नियोजित थी साथ ही आप ये भी कह रहे हैं कि हत्या दुष्कर्म की कोशिश में हुई। क्या ये दोनो बातें विरोधाभासी नहीं है?

मैं इस पर कुछ नहीं कहना चाहूंगा। मेरे लिए ये कहना सही नहीं होगा कि हमें इस बारे में पता नहीं है। हम इस बारे में आपको नहीं बता सकते।

राजकुमार के टी-शर्ट पर खून के धब्बे थे। क्या उनकी जांच हुई? क्या अभी कोई नतीज़ा नहीं मिला है?

हम नतीज़ों का इंतज़ार कर रहे हैं। उन्होंने पीड़ित के मां-बाप और रिश्तेदारों के खून के ताज़ा नमूने मांगे है।

कृष्णा और राजकुमार के वकीलों का आरोप है कि उन्हें इकबालिया बयान देने के लिए यातनाएं दी गई।

जांच तीन अलग-अलग प्रयोगशालाओं में अलग-अलग लोगों ने कीं। लिहाजा उन्हें फंसाने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता।

वकीलों का कहना है कि कृष्णा और राजकुमार को आरुषि के कमरे में नंगे पांव ले जाया गया और उन्हें आरुषी के बिस्तर पर लिटाया गया। आरोप है कि सीबीआई सुबूतों को गढ़ने की कोशिश कर रही है।

अगर हमने उन्हें आरुषि के बिस्तर पर लिटाया तो इससे कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। ये कैसे सबूत बन सकता है? अपराध के 15 दिनों बाद कोई सबूत नहीं लिया जा सकता।

नुपुर तलवार ने बताया कि अमूमन वो आरुषि के कमरे की चाबी अपने तकिए के नीचे रखती थी। क़ातिल उस रात आरुषि के कमरे में घुसे कैसे?

उस दिन चाबी ताले में पड़ी रह गई थी। नुपुर तलवार ने हमें बताया कि हेमराज पर विश्वास होने के कारण कभी कभार वो चाबी ताले में ही लगी छोड़ देती थी।

हेमराज का खून आरुषि के तकिए पर कैसे आया?

हत्यारे इसे ले आए थे। उन्होंने पहले हेमराज का क़त्ल कर दिया और फिर जब वो वापस आरुषि के कमरे में लौटे तो उसका खून आरुषि के तकिए पर लग गया।

अगर उनका मकसद आरुषि का बलात्कार करने का था तो फिर इसके बजाय उन्होंने हेमराज की हत्या के बाद आरुषि का गला क्यों काट दिया?

उन्होंने पहले ही उसके सिर पर किसी भारी चीज़ से वार किया था, इससे लगी चोट काफी घातक थी, हो सकता है उन्हें लगा हो कि वो बच सकती है।

हम कब तक इस क़त्ल के रहस्य से पर्दा उठने की उम्मीद करें?

काफी कुछ पहले ही साफ हो चुका है। हमने कह दिया है कि हत्या में शामिल अभियुक्तों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इक्का-दुक्का चीज़े पूरी करने की जरूरत है। हम उसी पर काम कर रहे हैं।

बराक ओबामा का अद्भुत सफरनामा

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी के दावेदार बराक ओबामा ने जब लगातार हिलेरी क्लिंटन को मात दी तो रिपब्लिकन खेमे के एक प्रमुख रणनीतिकार मार्क मैकिनन का कहना था कि ओबामा के खिलाफ काम करने की बजाय वो रिटायर हो जाना पसंद करेंगे. इसके बाद एक साक्षात्कार के दौरान मैकिनन के शब्द थे, मैं ऐसे किसी भी अभियान में शामिल होने पर असहज महसूस करुंगा जिसमें बराक ओबामा पर हमला करना ज़रूरी होगा” 

ओबामा के विरोधी भी उनके मुरीद हैं. 

उत्तर पश्चिमी राज्य ऑरेगॉन के पोर्टलैंड शहर में 18 मई को ओबामा को सुनने के लिए 75,000 लोगों का अपार जनसमूह इकट्ठा हुआ. इसके दो दिन बाद ही मैकिनन ने इस्तीफा दे दिया. गौरतलब है कि ये शख्स सन 2000 और 2004 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के चुनावी अभियान का भी सूत्रधार रहा था.

वाशिंगटन पोस्ट के जाने-माने स्तंभकार माइकल गर्सन ने बाद में बताया कि मैकिनन ने पिछले साल उन्हें ओबामा द्वारा लिखी द ऑडेसिटी ऑफ होप पढ़ने के लिए दी थी और कहा था कि अगर ओबामा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार होंगे तो वे रिपब्लिकन अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहेंगे. अपने लेखों में गर्सन ने ओबामा की विचारधारा और मिजाज़ के कई पहलुओं में खोट निकाले मगर ये भी कहा कि मैकिनन का ये कदम एक तरह से रिपब्लिकन पार्टी के लिए चेतावनी है कि उन्हें ओबामा को हल्के में नहीं लेना चाहिए. ओबामा एक गंभीर, बुद्धिमान और शालीन व्यक्तित्व हैं जो दूसरे गंभीर, बुद्धिमान और शालीन लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेंगे. उनमें कुछ स्वाभाविक मानवीय कमजोरियां जरूर हैं मगर जो प्रेरणा वो जगाते हैं वो वास्तविक है…उनकी कहानी फर्जी नहीं है. 

मैकिनन जैसे विरोधियों की उनके खिलाफ लड़ने की अनिच्छा जैसे कारकों ने ही 46 वर्षीय ओबामा के 12 साल के राजनीतिक सफर को आज एक ऐसे पड़ाव तक पहुंचा दिया है जहां वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बनने से कुछ ही कदमों की दूरी पर हैं. 

राजनीति की दौड़ में ओबामा बार-बार अप्रत्याशित विजेता साबित होते रहे हैं. हमेशा उन्हें कमतर करके आंका गया मगर हमेशा वो अपने प्रतिद्वंदियों पर भारी पड़ते रहे. 1996 में जब वो इलिनॉय सीनेट के लिए चुनाव लड़ रहे थे तो ज्यादातर लोगों को ओबामा के प्राइमरी चुनाव जीतकर डेमोक्रेटिक पार्टी का नामांकन हासिल करने पर भी शक था. मगर न केवल ऐसा हुआ बल्कि उन्होंने चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार को पटखनी भी दे डाली. आठ साल पहले उन्होंने हाउस ऑफ रिप्रेंजेटेटिव के लिए चुनाव लड़ा और असफल रहे. मगर 2004 में वो अमेरिकी सीनेट के लिए खड़े हुए और शानदार जीत दर्ज की. इसी साल डेमोक्रेटिक पार्टी के एक सम्मेलन में दिये गये उनके एक भाषण द ऑडेसिटी ऑफ होप ने पूरे अमेरिका में तहलका मचा दिया. लोग उनके मुरीद हो गए और राजनीति के पंडितों ने भविष्यवाणियां कर दीं कि ये शख्स भविष्य में अमेरिका के राष्ट्रपति पद का दावेदार होगा. इसी भाषण पर आधारित, इसी शीर्षक की 2006 में आई उनकी एक किताब ने लोकप्रियता के कई रिकॉर्ड्स तोड़े.

पिछले साल तक हर तरफ हिलेरी क्लिंटन का जलवा था और ज्यादातर लोग मान रहे थे कि ओबामा उनके मुकाबले टिक नहीं पाएंगे. मगर उन्होंने एक बार फिर सबको गलत साबित कर दिया. अब इस साल अगस्त में ओबामा एक बार फिर से डेमोक्रेटिक सम्मेलन को संबोधित कर रहे होंगे और वो भी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में. 

तो सवाल उठता है कि ओबामा की इस मिथकीय सफलता का राज क्या है? इसका जवाब उनकी लोकप्रिय किताब द ऑडेसिटी ऑफ होप में मिलता है जिसने मैकिनन और लाखों दूसरे लोगों को परंपरागत राजनीति के इतर देखने और ओबामा के शांति व परिवर्तन के संदेश में विश्वास करने की प्रेरणा दी. ओबामा की राजनीति सिद्धांतवादी है मगर उसमें हठता नहीं है, उसमें आत्मविश्वास है मगर नम्रता भी है. उनकी राजनीति समझौतावादी न होते हुए भी व्यावहारिक है और सबकी भागीदारी को प्रोत्साहन देती है. उनका 12 साल का राजनीतिक सफर इसकी मिसाल है.

ओबामा खुद को एक दार्शनिक राजा की तरह पेश करते हैं. वो एक ऐसे मनीषी की तरह भी लगते हैं जो निष्पक्षता से न सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया के लोगों के लिए सामाजिक न्याय और बराबरी का सपना देखता है. ओबामा को सिर्फ नारे देने वाला नेता कहने वाले लोगों को उनकी किताब ध्यान से पढ़ने की जरूरत है. उन्हें पता चल जाएगा कि ओबामा के पास कितनी विशाल दृष्टि है.

ओबामा एक ऐसे दुर्लभ अफ्रीकी-अमेरिकी राजनीतिज्ञ हैं जो बेहिचक मानते हैं कि बेरोजगार अश्वेतों के कल्याण के लिए बनाए गए सकारात्मक कदम वाले कार्यक्रमों ने दरअसल इस वर्ग का नुकसान ज्यादा किया है. उनके शब्दों में पीढ़ियों से चली आ रही गरीबी को हटाने के लिए अगर कोई योजना बनती है तो वो कार्य के अवसर देने पर केंद्रित होनी चाहिए न कि कल्याण पर, क्योंकि काम आपको न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाता है बल्कि लोगों की जिंदगी में व्यवस्था, आत्मसम्मान और तरक्की के अवसर भी पैदा करता है. अमेरिका में कौन दूसरा ऐसा अश्वेत नेता है जो सामाजिक कल्याण की योजना का इस तरह सीधा विरोध कर सकता हो? आम नेताओं की तरह  ओबामा हर लोकलुभावन नीति के प्रति अपना समर्थन नहीं जताते. पिछले हफ्ते जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल की कीमतों से निपटने के लिए हिलेरी और मैकन गैसोलीन पर टैक्स खत्म करने का सुझाव दे रहे थे तो ओबामा इसका तीखा विरोध कर रहे थे.

मगर इसका मतलब ये नहीं है कि ओबामा वंचितों और गरीबों का हित नहीं चाहते. पिछले सप्ताह उन्होंने एलान किया कि वो उन 15 लाख अमेरिकियों के लिए 10 अरब डॉलर के एक फंड की स्थापना करेंगे जो अर्थव्यवस्था में आई मंदी के चलते कर्ज नहीं चुका पाने की वजह से अपना घर खो चुके हैं या इस खतरे का सामना कर रहे हैं.

वर्तमान सरकार की नीतियों के आलोचक होने के बावजूद ओबामा में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आम आदमी का भला करने की ज़बर्दस्त उत्सुकता साफ नजर आती है. अपने व्यस्त अभियान के बावजूद उन्होंने तीन जून को रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कोबर्न के साथ मिलकर सीनेट में एक नया विधेयक पेश किया जिसमें सरकार द्वारा अपने विभिन्न मदों की जानकारियां सार्वजनिक करने का प्रावधान है ताकि प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ावा मिल सके. इससे www.usaspending.gov नामक उस वेबसाइट की उपयोगिता बहुत बढ़ जाएगी जो पिछले साल दिसंबर में इन दोनों सीनेटर्स के प्रयासों से पारित हुए ओबामा-कोबर्न ट्रांसपेरेंसी कानून के तहत अस्तित्व में आई थी. नैतिक मूल्यों पर जोर देने वाले ओबामा, सरकार में लॉबीइस्ट्स और दलालों के प्रभाव को कम करने की भी वकालत करते हैं.

लेकिन शायद उनका सबसे निर्भीक कदम रहा है अमेरिका की विवादित विदेश नीति की आलोचना. ओबामा मानते हैं कि उनका देश अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए दुनिया भर में कई जगहों पर तानाशाही करता रहा है. ईराक युद्ध के खिलाफ उनका रुख तो जगजाहिर है ही. अपनी किताब में वो इस बात का भी वर्णन करते हैं कि किस तरह अमेरिकी प्रशासन ने 1965 में इंडोनेशिया में जनरल सुहार्तो द्वारा राष्ट्रपति सुकर्णो की लोकतांत्रिक सरकार के तख्तापलट को समर्थन दिया जिसके बाद सुहार्तो के शासनकाल में दस लाख से भी ज्यादा लोगों की हत्या कर दी गई. ये देखकर और भी हैरानी होती है कि 2006 में ये जानते हुए भी कि वो भविष्य में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हो सकते हैं उन्होंने अपनी किताब में पश्चिमी ताकतों के प्रभुत्व वाले विश्व मुद्रा कोष की नीतियों की आलोचना करने का खतरा मोल लिया. 

शायद ओबामा की इस आदर्श सोच और दूरदृष्टि के पीछे उनकी पृष्ठभूमि का भी अहम योगदान है. केन्या से ताल्लुक रखने वाले अश्वेत पिता और श्वेत अमेरिकी मां की इस संतान के बचपन का काफी हिस्सा हवाई और इंडोनेशिया में बीता. उन्होंने अपने पिता को कभी नहीं देखा और एक तरह से देखा जाए तो उनका लालन-पालन उनके नाना-नानी के हाथों हुआ. न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय संबंध और राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद वे शिकागो में समाज सेवा के काम में जुट गए. फिर 1991 में उन्होंने हार्वड लॉ स्कूल में दाखिला लिया जहाँ वे हार्वड लॉ रिव्यू के पहले अफ्रीकी अमेरिकी अध्यक्ष भी रहे. इसके बाद ओबामा दोबारा शिकागो लौटे और यहां कानून के शिक्षक बन गए. इसके साथ ही उन्होंने जमीन स्तर पर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की. इस दौरान उन्होंने अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिकों के लिए कई सफल मतदाता पंजीकरण अभियान चलाए.

अब वो एक ऐसे मुकाम पर हैं जहां इतिहास उनका इंतजार कर रहा है. वो कामयाब हो सकते हैं और ऐसा भी हो सकता है कि उनके प्रशंसकों को निराश होना पड़े. ये भी हो सकता है कि राष्ट्रपति बनने के बाद उनके आदर्शों पर राजनीति की दूसरी मजबूरियां भारी पड़ जाएं.

अजित साही

अंग्रेजी का रेडियो टीचर

जैसे ही आप पटना से 35 किलोमीटर दूर स्थित शंभूपुरा गांव के प्राइमरी स्कूल के एकमात्र कमरे में प्रवेश करते हैं सात साल की सुषमा चहकते हुए कहती है, “गुड मॉर्निंग सर!" दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली इस बच्ची की दुबली काया, बिखरे बाल और फटे कपड़ों से उसकी गरीबी का अंदाजा लग जाता है. मगर इस बात का अंदाजा कतई नहीं लगता कि अनुसूचित जाति की इस बच्ची को अंग्रेजी के अनेकों मुहावरे और लोकोक्तियां याद होंगे. 

सुषमा अकेली नहीं है. इस स्कूल की पांचों कक्षाओं के सभी 109 बच्चों को अब अंग्रेजी के सबक पहले की तरह दुरूह नहीं लगते. बल्कि उन्हें अंग्रेजी सीखना एक खेल जैसा लगता है. ये सभी बच्चे अंग्रेजी के बुनियाद ज्ञान में पारंगत हो गए हैं.  

ये कमाल है एक रेडियो कार्यक्रम का जो धीरे-धीरे बिहार में एक क्रांति का सूत्रपात कर रहा है. आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम का नाम है इंग्लिश इज फन. पिछले साल नवंबर से प्रसारित हो रहा आधे घंटे का ये कार्यक्रम बिहार के प्राथमिक विद्यालयों के करीब 60 लाख बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हो चुका है. ये हफ्ते में तीन बार दोपहर के भोजन के बाद प्रसारित होता है. 

कार्यक्रम से न सिर्फ बच्चों में अंग्रेजी का हौवा तो खत्म हो रहा है बल्कि उनकी उपस्थिति भी बढ़ने लगी है. जैसा कि शंभूपुरा प्राइमरी स्कूल की प्रधानाध्यापिका मंजू कुमारी कहती हैं, पहले गांवों में स्थित स्कूलों में ज्यादातर बच्चे दोपहर के भोजन के बाद घर चले जाते थे. अब लगभग सभी इंग्लिश इज फन के लिए रुके रहते हैं. बल्कि कहा जाए तो उन्हें वास्तव में इसका इंतजार रहता है.” 

गीतों और सरल पाठों के माध्यम से अंग्रेजी सिखाने वाले इस कार्यक्रम को ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. इसमें पांच मुख्य पात्र हैंसियान नाम के हंसमुख बूढ़े काका, बच्चों से लगाव रखने और उनके लिए शिक्षा का सपना देखने वाली तुलसी, आठ साल की शरारती और हंसमुख चंदा, एक जिज्ञासु बच्चा राजू और हिंदी बोलने वाला चंदा का प्यारा तोता मिट्ठू जो बाकी चारों चरित्रों की बातचीत सुनकर अंग्रेजी सीखने लगता है. 

एक भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर की बेटी और पहली कक्षा की छात्र रितु कुमारी कहती है, हमें इसमें बहुत मजा आता है. इसमें बहुत ही मनोरंजक आवाजें और गाने हैं.12 साल का राकेश, जिसके पिता महाराष्ट्र के नासिक में मजदूर का काम करते हैं, बताता है कि वो सिर्फ इस रेडियो कार्यक्रम की वजह से फिर से स्कूल जाने लगा है. राकेश कहता है, मुझे यकीन है कि मैं एक-दो साल में ही अच्छी तरह से अंग्रेजी लिखने और बोलने लगूंगा. बाद में मुझे अच्छी नौकरी मिल जाएगी.” 

बिहार शिक्षा परियोजना के निदेशक राजेश भूषण कहते हैं, अंग्रेजी में बिहार के पिछड़ेपन के मद्देनजर सरकार ने फैसला किया कि बच्चों को प्राथमिक स्तर पर ही अंग्रेजी में दक्ष करने के लिए एक नीति बनाई जाए. बुनियादी उद्देश्य ये था कि अंग्रेजी सीखना एक मनोरंजक अनुभव हो और हमें खुशी है कि ये पूरा होता दिख रहा है.” 

करीब चार करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना में बैंगलोर स्थित गैरसरकारी संगठन एजुकेशन डेवलपमेंट सेंटर और यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएड) का भी सहयोग रहा है. इसके तहत बिहार में 70,000 स्कूलों में एक रेडियो सेट उपलब्ध करवाया गया है. भूषण बताते हैं, हम आकाशवाणी को प्रसारण शुल्क भी अदा कर रहे हैं.” 

इस कार्यक्रम के लिए प्रशिक्षण लेने वाले शिक्षकों में काफी उत्साह है. यूनिसेफ की बिहार इकाई के सहयोग से बिहार शिक्षा परियोजना ने शिक्षकों के मार्गदर्शन के लिए एक पुस्तिका भी प्रकाशित की है. इसकी सहायता से शिक्षक प्रसारित होने वाले कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए बच्चों को पढ़ा सकते हैं. पटना के एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक ओमप्रकाश कहते हैं, ये पुस्तिका और कार्यक्रम हमें ये समझने में मदद करते हैं कि अंग्रेजी किस तरह पढ़ाई जाए.” 

अक्टूबर 2007 में जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि बिहार की साक्षरता दर महज 47 फीसदी है. इंग्लिश इज फन की वजह से स्कूलों में बढ़ती उपस्थिति इस दिशा में एक उम्मीद जगाती है. अर्थशास्त्री शैवाल गुप्ता कहते हैं, राज्य के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों के बच्चे पढ़ने आते हैं और अंग्रेजी उनके लिए अक्सर एक हौवा होती है. बिहार में एक बड़ा बदलाव लाने में इस कदम के दूरगामी परिणाम होंगे.

आनंद एसटी दास

फिल्मों में पर फिल्मी नहीं

थोड़े ही समय में जिंदगी किस तरह से बदल जाती है इसका अंदाजा फिल्म स्टार आमिर खान के इस भांजे को कुछ दिन पहले तब हुआ जब वो सड़क पर टहल रहे थे. अचानक एक व्यक्ति ने उन्हें पहचान लिया और उनसे ऑटोग्राफ मांगा. देखते ही देखते उनके इर्द-गिर्द लोगों की भारी भीड़ इकट्ठी हो गई. एक लड़की तो उनसे शादी करने की जिद पर अड़ गई. ये तब की बात है जब फिल्म रिलीज भी नहीं हुई थी. अब जब फिल्म सफल हो गई है तो निश्चित रूप से उनकी लोकप्रियता में पहले से कई गुना ज्यादा इजाफा होने की उम्मीद है. 

इमरान के मामा और फिल्म के निर्माता आमिर को पता है कि भारतीय दर्शक फिल्मी परिवारों की जिंदगी के बारे में कितने उत्सुक रहते हैं. जाने तू…के प्रचार के दौरान उन्होंने सुनिश्चित किया कि दर्शक उनके और इमरान के जुड़ाव की झलकियां लगातार देखते रहें. फोटो में छोटे इमरान के बाल बनाते आमिर, सलमान खान के शो दस का दम में बड़े इमरान को चिढ़ाते आमिर और भांजे का इंटरव्यू लेते आमिर बार-बार दिखे. 

इमरान जिस परिवार से आते हैं उसे प्रतिभाओं का खजाना होने के बावजूद कभी भी कपूर खानदान जैसी चर्चा नहीं मिली. तीसरी मंजिल, कारवां और यादों की बारात जैसी कई हिट फिल्में देने वाले इमरान के दादा और आमिर के ताऊ नासिर हुसैन अपनी ही तरह के इंसान थे. नासिर के बेटे मंसूर खान ने कयामत से कयामत तक और जो जीता वही सिकंदर जैसी फिल्मों का निर्देशन किया जिन्हें हिंदी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर कहा जाता है. मगर फिर कुछ साल पहले उन्होंने अचानक बॉलीवुड से नाता तोड़ लिया और तमिलनाडु के कन्नूर में अपना एक ऑर्गेनिक फॉर्म चलाने लगे. इमरान के मामा आमिर खान की फिल्म इंडस्ट्री में क्या जगह है ये सभी जानते हैं. नुज़हत बताती हैं, “मैं हर सेमेस्टर के दौरान उससे मिलने जाती थी. वो बिल्कुल मोगली की तरह दिखता था…लंबे बाल, नंगे पांव, निकर पहने दौड़ता हुआ."

इमरान को शुरुआत से ही रुपहले पर्दे की दुनिया से लगाव था. बचपन में वो कभी घर में ही किसी नाटक का आयोजन करते तो कभी वीडियो कैमरा थामे शूटिंग में मशगूल होते. इमरान ने अपनी तीनों फिल्में खुद चुनी हैं. जाने तू…तो रिलीज हो ही चुकी है जबकि संजय गढ़वी की ‘किडनेप’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है. उनकी तीसरी फिल्म है सोहम शाह की ‘लक’ जिसकी शूटिंग जल्द ही शुरू होने वाली है. 

वैसे तो अभिनय के क्षेत्र में आने की योजना इमरान काफी समय से बना रहे थे मगर उन्होंने शुरुआत करने का फैसला किया अब्बास टायरवाला की स्क्रिप्ट सुनकर. इमरान कहते हैं, “अब्बास की स्क्रिप्ट में आज के नौजवानों से कहीं ज्यादा मासूमियत मौजूद थी पर मैं फिर भी खुद को इससे जोड़ पा रहा था. खासकर जय और उसकी मां के बीच के संबंध की बात करें तो. जाने तू… में सावित्री(रत्ना पाठक शाह) जय को अपने पति के गांव से दूर ले जाती हैं ताकि उसमें अपने राजपूत भाइयों जैसी क्रूर मर्दानगी न आने पाए. गौरतलब है कि इमरान को भी उनकी मां नुज़हत मुंबई की खोखली दुनिया से दूर रखने के लिए कन्नूर ले गईं थीं. 

इमरान की पहली पाठशाला मुंबई का बॉंम्बे स्काटिश स्कूल था- नुज़हत भी इसी स्कूल में पढ़ी थीं. एक दिन नुज़हत को पता चला कि टीचर्स इमरान की पिटाई करते हैं. उन्होंने स्कूल प्रशासन से शिकायत कर अपना विरोध जताया. मगर इसका कोई फायदा नहीं हुआ. उधर, कड़े शारीरिक दंड का इमरान पर काफी नकारात्मक असर पड़ रहा था. जैसा कि इमरान बताते हैं, “चौथी कक्षा में पहुंचते-पहुंचते मैं हकलाने लगा था. मैं बहुत नर्वस हो जाता था और लगता था कि मैं फेल हो जाउंगा.” 

जब काफी विरोध के बाद भी स्कूल प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंगी तो नुज़हत ने फैसला किया कि उनका बेटा अब इस स्कूल में नहीं पढ़ेगा. एक अच्छे स्कूल की उनकी तलाश उन्हें कन्नूर ले गई जहां उन्होंने इमरान का दाखिला ब्लू माउंटेन स्कूल में करवा दिया. इसका असर भी देखने को मिला और कुछ ही महीनों के भीतर इमरान क्लास में प्रथम आने लगा. गणित में तो उसका प्रदर्शन बहुत अच्छा हो गया था. कुछ समय बाद जब स्कूल के करिश्माई प्रिंसिपल ने एक अपनी तरह का एक अलग और सुधारवादी स्कूल खोलने के लिए नौकरी छोड़ने का फैसला किया तो नुज़हत उन चंद अभिभावकों में से थी जिन्होंने उन पर भरोसा किया. अगले पांच साल तक इमरान और दूसरे बच्चे ऊटी के पास स्थित गेद्दाई नामक गांव के नजदीक एक जंगल में रहे जहां न बिजली थी और न नल का पानी. नुज़हत बताती हैं, “मैं हर सेमेस्टर के दौरान उससे मिलने जाती थी. वो बिल्कुल मोगली की तरह दिखता था…लंबे बाल, नंगे पांव, निकर पहने दौड़ता हुआ." मंसूर हंसते हुए कहते हैं, “मेरे वालिद ने सोचा कि नुज़हत पागल हो गई है. फिर उन्होंने देखा कि इमरान एक बहादुर बच्चे के रूप में बड़ा हो रहा था. वह हमारी तरह अंधेरे से डरता नहीं था. वहां बच्चे अपना स्विमिंग पूल खुद खुदाई कर बनाया करते थे. वे इसमें तैरते थे और उन्हें पता होता था कि इसमें सांप भी हैं. वे तो उन्हें पकड़ भी लिया करते थे.” इस तरह के लालन-पालन ने इमरान को आत्मनिर्भर और दूसरों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील बना दिया. 16 साल की उम्र में इमरान अमेरिका के कैलीफोर्निया में अपने पिता अनिल पाल के पास चले गए. कंप्यूटर साइंस में पीएचडी पाल हाल तक याहू में एक वरिष्ठ पद पर थे. इमरान के माता-पिता का जब तलाक हुआ तो इमरान उस वक्त महज दो साल के थे. मगर वो अच्छे दोस्त बने रहे. पाल और उनकी 85 वर्षीय ब्रिटिश मां भी जाने तू…का लांच देखने आई थीं. अमेरिका में इमरान के शिक्षकों को विश्वास था कि अपनी तीव्र बुद्धि के कारण वो बर्कले या स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में जाएंगे. मगर इमरान कहते हैं कि भारत में स्कूली दिनों के उतार-चढ़ाव भरे अनुभवों के चलते उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का इरादा छोड़ दिया.

अमेरिका में इमरान के शिक्षकों को विश्वास था कि अपनी तीव्र बुद्धि के कारण वो बर्कले या स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में जाएंगे. मगर इमरान कहते हैं कि भारत में स्कूली दिनों के उतार-चढ़ाव भरे अनुभवों के चलते उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का इरादा छोड़ दिया. 

इमरान के करीबी लोग बताते हैं कि उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है और उनके बेडसाइड टेबल पर आपको किताबों का एक ढेर नजर आएगा जिसमें उपन्यास से लेकर इतिहास और सिनेमा तक हर तरह की किताबें होंगी. इमरान ने अमेरिका में फिल्म निर्देशन की भी पढ़ाई की है.  

जब इमरान मुंबई लौटे तो अब्बास टायरवाला और उनके बीच अच्छी दोस्ती हो गई. जब उन्होंने ऐलान किया कि वो टायरवाला की जाने तू… में जय की भूमिका निभा रहे हैं तो परिवार में हर कोई चौंक गया. पहले इसका निर्माण झामू सुगंध कर रहे थे मगर फिर उन्होंने अपना हाथ पीछे खींच लिया. आमिर को जब ये पता चला तो वो फिल्म के निर्माता बन गए. 

दूसरे भाई-बहनों के मुकाबले इमरान की मां नुज़हत और आमिर कहीं ज्यादा करीब हैं. नुजहत ने ‘कयामत से कयामत तक’ के बाद आमिर को लोकप्रियता की ऊंचाइयां छूते देखा था और उन्हें चिंता थी कि क्या इमरान इस कड़े सफर के लिए वाकई तैयार हैं. इमरान के बारे में कहा जाता है कि उनमें मंसूर जैसी ईमानदारी और आमिर जैसा आत्मनियंत्रण है. गुणों का ये मेल उन्हें अपनी दुनिया में मगन रहने वाला एक शख्स बनाता है. उनकी सबसे करीबी विश्वासपात्र छह साल से उनकी महिला मित्र अवंतिका मलिक हैं. अवंतिका, नुज़हत और इमरान एक दूसरे के काफी करीब हैं. 

जब आमिर ने पहली बार इमरान के इरादों के बारे में सुना तो भांजे के लिए उनकी पहली सलाह थी कि उसे जमकर देशाटन करना चाहिए. आमिर के शब्द थे, “बस की सवारी करो, घूमो-फिरो और अपनी गुमनामियत के चंद आखिरी दिनों का आनंद लो.”  मगर ऐसी यात्रा हो नहीं पाई और अब तो शायद ही कभी हो पाए. 

परिवार की एक बड़ी चिंता ये भी है कि इमरान जिस परिवेश में पले-बढ़े हैं वो फिल्म इंडस्ट्री से काफी जुदा है. ऐसे में क्या वो इस अंतर को पाट पाएंगे. मंसूर कहते हैं, “हिंदी फिल्मों में कई घिसी-पिटी स्थितियां होती हैं और मुझे वास्तव में हैरत है कि क्या इमरान ऐसी स्थितियों को संभाल सकेगा. उसे तो डांस की भी समझ नहीं है.”  

हालांकि अपने परिवार के दिग्गजों की पैनी नजर के तले इमरान ने खुद में काफी सुधार किया है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही वो सिनेमा की अच्छी समझ विकसित कर लेंगे जिसके लिए उनका परिवार मशहूर रहा है. इसके बाद बॉलीवुड में शायद ही कोई फिल्मकार ऐसा होगा जो अपनी कल्पनाओं को परदे पर उतारने के लिए उनके नाम पर गौर न करे. 

निशा सूज़न

अंधेरे में ज्ञान का जुगनू

हरडी गांव अजमेर से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. आसपास के तमाम दूसरे गांवों की तरह ही हरडी भी बिजली, पानी, सड़क जैसे विकास के न्यूनतम प्रतिमानो से वंचित है. गड़रिया जाति बाहुल्य इस गांव के 12 किलोमीटर के दायरे में कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है और गांव के पचास में से आधे परिवार गरीबी रेखा (सालाना आय दस हज़ार से कम) के नीचे जीवन जीते हैं.

संसाधनों के इस घोर सूखे के बीच गांव वाले एक रात्रिकालीन स्कूल को ज़िंदा रखे हुए हैं. स्कूल में 30 छात्र हैं, जिनमें से 18 लड़कियां हैं. यहां न तो खड़िया है, न ब्लैकबोर्ड, न कॉपी है न ही पेंसिल. गांव के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे (छठवीं तक) प्रभु लाल इस स्कूल के शिक्षक हैं. वो बताते हैं- "यहां बिजली है नहीं और गांव में लालटेन भी बहुत कम लोगों के पास हैं, इसलिए ज्यादातर पढ़ाई मौखिक ही होती है." गांववालों ने हार्डी रात्रिकालीन स्कूल की स्थापना छह साल पहले एक ग़ैर सरकारी संगठन सोशल वर्क एंड एनवायर्नमेंट फॉर रूरल एडवांसमेंट (एसडब्ल्यूईआरए) के सहयोग से की थी.

हरडी निवासी कान्हाराम खरोल कहते हैं, "हम लोग निरक्षर थे इसलिए बैंक के अधिकारी भी हमसे बहुत रूखा व्यवहार करते थे और हमें लोन लेने की प्रक्रिया भी नहीं बताते थे. हम चाहते थे कि हमारे बच्चे कम से कम इतना तो पढ़ना लिखना सीख लें जिससे वो जोड़-घटाना कर सके और जिन कागजों पर हम दस्तख़त कर रहे हैं उन्हें पढ़ सकें."

चूंकि गांव शहर और बुनियादी सुविधाओं तक से काफी दूर था इसलिए स्वयंसेवक भी यहां आकर शिक्षित करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. लिहाजा एसडब्ल्यूईआरए के अधिकारियों और ग्रामीणों ने एकमत से गांव में जितनी संभव हो उतनी शिक्षा फैलाने की जिम्मेदारी प्रभु लाल को सौंप दी.

एसडब्ल्यूईआरए के सचिव बीएल वैष्णव बताते हैं, "हम उन ग्रामीणों को निराश नहीं कर सकते थे जो किसी भी कीमत पर पढ़ना चाहते थे. यहां तक की प्रभु लाल भी पूरी तरह से योग्य नहीं था पर वह लोगों को कुछ बुनियादी बातें तो सिखा ही देता है. कुछ नहीं तो कम से कम बच्चे पढ़ना लिखना ही सीख जाते हैं."

तब से दिन के समय शिक्षक और छात्र दोनों अपने मवेशी चराते हैं या फिर खदानों में काम करते हैं और शाम ढलते ही पढ़ने लिखने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं.

असल में यहां सर्व शिक्षा अभियान के तहत संचालित एक सरकारी स्कूल भी है। लेकिन अभिभावक अपने बच्चों को वहां भेजते ही नहीं हैं. गांव के सरपंच भगवान स्वरूप महेश्वरी ने इसकी वजह कुछ यूं बताई, "इसकी दो वजहें हैं. पहली बात तो सरकारी स्कूलों में शायद ही पढ़ाई-लिखाई होती है. दूसरी और ज़्यादा अहम बात ये कि गांव के पानी में फ्लोराइड की मात्रा सुरक्षित सीमा से काफी ज्यादा है इसलिए ये खेती और मवेशियों दोनों के लिए अनुपयुक्त है. लिहाजा ज्यादातर परिवारों नें पास की खदानों में काम करना शुरू कर दिया है, जहां वो हर दिन 60 रूपए तक कमा लेते हैं. बड़े परिवार वालों के सामने अक्सर एक समय का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो जाता है." इस वजह से बच्चों के सामने इसके अलावा कोई चारा नहीं कि वो भी दिन में अपने जीवनयापन के लिए कुछ काम करें. अब समय केवल रात का बचता है. इसलिए रात्रिकालीन स्कूल एक बेहतर विकल्प लगता है.

कठिन परिस्थितियों के बावजूद छात्र अंकगणित के सवालों को मात्र कुछ ही सेकेंडो में मौखिक ही हल कर देते हैं. ये पूछने पर कि छात्र लिखना कैसे सीखते हैं, प्रभु लाल एक लड़की से उसका नाम लिखने को कहते हैं. वो अपने पास ही पड़ी एक छड़ी उठाती है और ज़मीन पर अपनी अधपकी सी किंतु स्पष्ट हैंडराइटिंग में लिखना शुरू कर देती है.

अपने छात्रों की जागरुकता के प्रदर्शन को उत्सुक लाल, छात्रों के बीच पाठ्यक्रम से परे भी कुछ सवाल उछालते हैं- भारत का ऱाष्ट्रपति कौन है? कक्षा से कुछ दूर बैठे महिलाओं के एक समूह से आवाजें आती हैं- "प्रतिभा पाटिल". 40 के लपेटे में चल रहीं साएरी कहती हैं, "पुरानी मान्यताओं के चलते शादीशुदा महिलाओं को कक्षाओं में बैठने और पढ़ने की मनाही है इसलिए हम अपने घरेलू कामकाज जल्दी से निपटा कर थोड़ी दूर पर बैठ जाते हैं. इस तरह से हम कुछ ऐसी चीज़ें सीख लेते हैं जो कि हमारे लिए वैसे सीखना संभव ही नहीं हो पाता."

इस बीच एक स्तब्धकारी घटना हुई. स्कूल को पिछले साल आर्थिक सहयोग मिलना बंद होने के बाद मई में बंद कर दिया गया. एसडब्ल्यूईआरए इसके बाद से ही इस प्रयास में है कि रात्रिकालीन स्कूल को सर्वशिक्षा अभियान के तहत मान्यता मिल जाए. मगर स्कूल के केवल दरवाज़े बंद हुए हैं स्कूल नहीं. छात्र अब भी हर शाम प्रभु लाल से पढ़ने के लिए स्कूल की इमारत के बाहर इकट्ठा होते हैं.

नेहा दीक्षित