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राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम

तीनों राज्यों में जहां वामपंथियों की सरकारें हैं इनका कांग्रेस से सांप-छछूंदर वाला बैर है. मगर इसके बाद भी केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार अगर बनी और बन के पिछले चार सालों से चल रही है तो इसके पीछे वामदलों का इसको दिया हुआ जीवनदायी सहारा है. विचारधारा की कोई समानता नहीं, कोई स्थाई हित नहीं और साथ ही साथ होकर भी जनता को समय-समय पर दूरी का एहसास कराने की मजबूरी भी है. मगर कहा गया कि ऐसा सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से बाहर रखने की वजह से किया नहीं जा रहा बल्कि करना पड़ रहा है. सारे देश को वामपंथियों का एहसानमंद होना चाहिए कि उन्होंने देश को कट्टरवादिता औऱ सांप्रदायिकता के राक्षसों का ग्रास होने से बचा लिया!

गठबंधन के पक्ष में एक तर्क ये भी था कि अगर कांग्रेस नीत गठबंधन पर वामपंथियों की लगाम रहेगी तो सरकार की नीतियां ज़्यादा जनोन्मुखी होंगीं और देश उदारवाद के नाम पर पूंजीवाद के चंगुल में फंसने से भी बचा रहेगा.

सवाल ये उठता है कि क्या पांधे का ऐसा कहना उस समाजवादी पार्टी को सांप्रदायिकता का जामा पहनाना नहीं हो गया जिसकी गलबहियों से वामदलों को कभी कोई गुरेज नहीं रहा और जिन्हें हमेशा वे धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बताते रहे हैं?

मगर पिछले कुछ महीनों से वामपंथियों की जनहित के प्रति प्रतिबद्धता सिंगूर और नंदीग्राम जैसी जगहों की वजह से खुल कर लोगों के सामने आ रही है. चलिए हो सकता है वामपंथियों की निगाह में जनहित वही हो जो वो वहां पर कर रहे हैं या करना चाह रहे थे या चाह रहे हैं. मगर सांप्रदायिकता के नाम पर सत्ता से दूर रहते हुए भी उसके सभी लाभों का मज़ा लेने वाले वामपंथी खुद कितने धर्मनिरपेक्ष हैं पिछले कुछ दिनों में इसका भी पता चल चुका है. पहले तो तस्लीमा नसरीन के मसले पर पश्चिम बंगाल सरकार का रुख जैसा था उसने राज्य सरकार की धर्मनिरपेक्षता के डंके बजाए. नंदीग्राम की घटना से बौखलाए मुसलमानों को मनाने के लिए सीपीएम ने तस्लीमा को बलि का बकरा बना दिया. अब सीपीएम पोलित ब्यूरो के सम्मानित सदस्य और इसके मज़दूर संगठन सीटू के महासचिव एम के पांधे के बयान ने रही सही कसर भी पूरी कर दी है.

पांधे ने अपने बयान में समाजवादी पार्टी को चेतावनी देते हुए कहा था कि उन्हें भारत-अमेरिकी परमाणु करार के मसले पर कांग्रेस का साथ देने से पहले अपने मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रखना चाहिए. उनका कहना था कि समाजवादी पार्टी का ज़्यादातर प्रभाव मुसलमानों में है इसलिए परमाणु करार उसके लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है क्योंकि अधिकतर मुसलमान अमेरिका की वजह से इसके पक्ष में नहीं हैं.

सवाल ये उठता है कि क्या पांधे का ऐसा कहना उस समाजवादी पार्टी को सांप्रदायिकता का जामा पहनाना नहीं हो गया जिसकी गलबहियों से वामदलों को कभी कोई गुरेज नहीं रहा और जिन्हें हमेशा वे धर्मनिरपेक्षता की मिसाल बताते रहे हैं? क्या पांधे ये कहना चाहते थे कि भारतीय मुसलमान राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर कोई निर्णय लेते वक्त देश हित की बजाय किसी और ही बात पर ध्यान देते हैं?

देश के हित या अहित से जुड़े सवाल पर सवाल उठाना, उसके हानि-लाभ पर विचार कर उसका समर्थन या विरोध करना लोकतंत्र की एक बड़ी विशेषता ही नहीं बल्कि व्यवस्था भी है. मगर उसके पक्ष-विपक्ष में माहौल तैयार करने के लिए इस हद तक कुतर्क का सहारा लेना वामदलों के दोहरे चरित्र को ही उजागर करता है. एक देशहित से जुड़े मसले पर इसकी अच्छाई-बुराई के आधार पर समर्थन जुटाने के बजाय इसे हिंदू मुसलमान का मसला बनाना इस बात का द्योतक है कि राजनीति के हमाम में आज सभी नंगे हैं. न कोई धर्मनिरपेक्ष, न कोई सांप्रदायिक, न कोई वामपंथी न कोई दक्षिणपंथी, न कोई समाजवादी और न ही कोई पूंजीवादी…सत्ता का चरित्र अब किसी विचारधारा का गुलाम नहीं…देश की आज़ादी के साथ ही अब ये भी आज़ादखयाल बन चुका है.

संजय दुबे

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चिम्मनभाई…..का हवाई अड्डा

      हवाई अड्डे का नाम है चिम्मनभाई खान साहब फोटो स्टेट वाले का हवाई अड्डा…पहले ये जवाहर लाल नेहरुजी के नाम पर था।

      चिम्मन भाई कौन हैं, यह आप नहीं जानते। हम भी नहीं जानते थे, इस विश्वास मत से पहले। पर अब जानते हैं, अब तो पूरा देश जानता है।

      चिम्मनभाई उन तीन सांसदों में हैं, जिन्होने अपना समर्थन खास टाइम पर दिया।

      चिम्मनभाई के बाद खान साहब का नाम जोड़ना पड़ा, क्योंकि उनका वोट भी खास था। फिर झम्मूमल फोटो स्टेट वाले का नाम भी आया, क्योंकि उनका वोट भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरुरी था। झम्मूमल जी का योगदान लोकतंत्र में फोटोस्टेट मशीन का था। आपकी फोटो स्टेट और टाइपिंग की दुकान थी, जिस पर एक पोलिटिकल पार्टी के लैटर वगैरह टाइप होने आते थे। जो नेता टाइप कराने आता था, वह पार्टी से रकम ले लेता था, पर झम्मूमलजी को नहीं देता था। इसके बदले उसने झम्मूमल को नगर निगम के काऊंसिलर का टिकट दिलवा दिया। झम्मूमलजी ने निगम पार्षद होकर अपनी दुकान सड़क पर पांच फुट और बढ़ा ली। इससे उत्साहित होकर तमाम दुकानदारों ने भी यही किया और इस हल्ले में झम्मूमल पहले दुकानदारों के नेता हो गये और फिर विधायक। विधायक होने के बाद उन्होने सौ करोड़ रुपये के तीन घपले किये। जिनमें सीबीआई इन्क्वायरी चली। पार्टी ने बाहर निकाल दिया। पर वह बाइज्जत बरी हो गये, पहले बेइज्जत थे, अब बाइज्जत हो गये। इसके बाद नेचुरल प्रोग्रेस हुई और वह एमपी हो गये। फोटो  स्टेट की दुकानों के साथ, दामादों को पेट्रोल पंप दिलवाकर राजीखुशी जीवन व्यतीत करने लगे।

      जब वोटों की जरुरत पड़ी, तो झम्मूमलजी याद आये।

      झम्मूमलजी ने कहा कि एयरपोर्ट का नामकरण उनके नाम पर होना चाहिए।

      झम्मूमलजी के मसले पर कुछ विद्वानों ने कहा कि यह ठीक नहीं है, जवाहर लाल नेहरुजी के नाम पर, जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने नाम पर एयरपोर्ट, अस्पतालों, कालेजों  के नाम रखे गये हैं। ऐसी सूरत में झम्मूमलजी को इन नेताओँ के मुकाबले कैसे खड़ा कर दिया जाये।

      इस पर एक विद्वान ने कहा-अबे ये बता कि वोट कौन देगा, जयप्रकाश नारायण या नेहरुजी।

      जवाब आया कि झम्मूमलजी।

      इस तरह से झम्मूमलजी के नाम पर एयरपोर्ट बन गया।

      इस तरह से संभावना है कि निकट भविष्य में गेटवे आफ इंडिया का नाम चोरुमल चोरड़िया गेटवे आफ इंडिया हो सकता है। लोहिया अस्पताल का नाम शिबू सोरेन अस्पताल हो सकता है, शिबू सोरेन चाहें तो उनके बेटे या पुत्रवधू के नाम पर भी इस अस्पताल का नामकरण किया जा सकता है।

      सवाल वही है कि वोट कौन देगा-लोहियाजी या शिबू सोरेन।

      जल्दी ही हो सकता है कि बच्चों की किताबों में यह पढ़ाया जाये कि स्वतंत्रता संग्राम में किसने हिस्सा  लिया था, जी चोरुमल चोरड़ियाजी ने। नेहरु, गांधीजी, लोहियाजी, जयप्रकाशजी कौन थे, जी हमें नहीं मालूम। हाल के विश्वास मत में इन्हों का नाम नहीं आया, इनके तो वोट ही नहीं थे।

      चोरड़ियाजी का नाम सारे टीवी चैनलों पर आया।

      लाल किला किसने बनवाया था, जल्दी ही इस सवाल का जवाब भी होगा-चोरुमल चोरड़ियाजी ने।

      शटअप, वोट किसका जरुरी था, वोट किसने दिया शाहजहां ने या चोरुमलजी ने।

      गनीमत यह है कि अभी तक यह कानून नहीं पास कर दिया गया कि हम सबको अपने बाप का क्या नाम बताना पड़ेगा-चोरुमल चोरड़िया।

      खैर छोड़िये, यह बताइए, राष्ट्रपिता कौन-चोरुमल चोरड़िया।

      क्या पूछा-फिर महात्मा गांधी कौन थे।

      हमें क्या पता, हाल के चुनावों में तो उनका वोट ही नहीं था। 

      आलोक पुराणिक

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चार दिनों का ‘सरकार राज’

फिल्म के दूसरे भाग के मध्य में अभिषेक की मौत के बाद अमिताभ उसकी तस्वीर के सामने खड़े होकर रुंधे गले से कहते हैंऔर अब तू भी मुझे छोड़ कर चला गया. पीछे से एक महिला की आवाज़ आती हैतो अब हम भी चलें क्या. फिल्म के बाद एक दर्शक–फिल्म तो दरअसल डेढ़ घंटे की ही थी मगर रामू ने सोचा होगा कि डेढ़ घंटे की भी कोई फिल्म होती है भला और फिर उन्होंने उतनी ही फिल्म को रबड़ की तरह खींचकर दो घंटे का कर दिया. अजब बात है. तीन-तीन घंटे की फिल्म देखने वाला एक आम भारतीय दर्शक अमिताभ, अभिषेक और ऐश्वर्या जैसे सुपर-डुपर स्टारों के काम वाली दो घंटे की फिल्म को भी आधा घंटा लंबी बता रहा था. 

हालांकि मैं चुपचाप फिल्म देख रहा था पर मेरा मन भी चुपके से कुछ ऐसी ही बातें कर रहा था. जो रामू के मेरे जैसे फैन हैं वो उम्मीद लगाए बैठे थे कि ‘दौड़’ जैसी पकाऊ फिल्म के बाद जिस तरह से उन्होंने ‘सत्या’ बनाकर दुनिया भर को चौंका दिया था, ‘डरना मना है’, ‘नि:शब्द’ और ‘शोले’ के रीमेक्स झिलाने के बाद, वो फिर से कुछ वैसा ही कमाल कर दिखाने वाले हैं. मगर अफसोस ऐसा कुछ हो नहीं पाया. हालांकि कहींकहीं ऐसी कोशिश की गई ज़रूर लगती है मगर ये कोशिश खिचड़ी में पड़ी मेवा जैसा असर ही छोड़ पाती है.

Ash

2005 में आई रामू की सरकार बिला शक एक बढ़िया फिल्म थी, ‘गॉडफादर’ से मिलती-जुलती चीज़ों को ठाकरे परिवार से मिलती-जुलती चीज़ों में मिलाकर बनाया गया एक मस्त सा अपराध और राजनीति का कॉकटेल. उसके बाद की तीनों फिल्मों को धोबीपाट मिलने के बादखासकर शोले कोबाज़ार में रामू के भाव तेज़ी से नीचे गिर गए. अब चूंकि जल्दी से जल्दी कुछ किया जाना था तो इसके लिए सरकार के सीक्वल से बढ़िया उपाय और क्या हो सकता था. मगर फिल्म देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि शोले के रीमेक की तरह ही सरकार राजभी सरकार की एक बुरी कार्बन कॉपी मात्र ही है.

फिल्म में अंत से कुछ पहले तक कुछ भी ऐसा नहीं है जो ज़रा भी मौलिक लगे या दर्शकों के अंदर तनिक भी उत्सुकता का संचार कर पाए. मगर अंत में जब अचानक अमिताभ, फिल्म में तब तक हो चुके के पीछे का भयंकर सच बयान कर, कभी न पैदा हुई जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश करते हैं तो लगता है कि जैसे कोई फालतू का काम कर बाद में लॉजिक देकर उसे महान बनाया जा रहा हो. ऐसा लगता है कि रामू, अंत में अमिताभ के भाषण के माध्यम से जो कुछ फिल्म में घट चुका है उसे असाधारण का चोला पहनाने की कोशिश कर रहे हैं. अच्छा होता कि ये सब दर्शकों को बोलकर समझाने की बजाय कहानी में ही शामिल किया जाता.

अभिनय के मामले में शायद किसी के करने के लिए कुछ नया था ही नहीं. मुख्य पात्रों में से केवल ऐश्वर्या को छोड़कर सबने वही किया है जो सरकार में किया था. ऊपर से घटनाओं की जटिलता उससे भी कम है. हां एक खास बात और, फिल्म में अमिताभ, अभिषेक और परिवार बार-बार महाराष्ट्र के भले में अपना भला देखने वाले डॉयलॉग बोलते हैं. वे फिल्म में कोई काम करते हैं तो महाराष्ट्र के भले के लिए और नहीं करते हैं तो प्रदेश और उसके निवासियों को होने वाले अहित से बचाने के लिए. हाल ही में अमिताभ को लेकर राज ठाकरे ने जो महाराष्ट्र बनाम उत्तर प्रदेश की बहस छेड़ी थी क्या ये उसी का परिणाम तो नहीं!

संजय दुबे

ख़ूबसूरत लड़कियां

खूबसूरत लड़कियां

नहीं मिलतीं आसानी से

होती हैं कई प्रतियोगिताएं

मिस सिटी से मिस यूनिवर्स तक

अब मिसेज भी होने लगी हैं

इसके बावजूद नहीं मिलतीं

उनके चेहरे पर लिपे होते हैं

प्रायोजकों के लेप

हर अंग पर लिपटी होती हैं

आयोजकों की चिंदियां

फिर भी नहीं होतीं वे खूबसूरत

उनके चेहरे पर चमकता है बाजार

अंतत: खारिज हो जाती हैं अगले साल

खूबसूरत लड़कियां नहीं मिलती प्रतियोगिताओं से

खूबसूरत लड़कियां जूझती हैं जीवन से

उनके चेहरे पर चमकती हैं पसीने की बूंदें

उनके दिल में होती है निश्‍‍छलता

नहीं जानतीं वे बाजार भाव

वे बिकाऊ नहीं होतीं

                                            राजू कुमार

तैंतीस वर्षीय राजू, भोपाल में मीडिया जगत से जुड़े हैं.

साहित्य की कोपलें ‘ उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) hindi@tehelka.com पर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं.

तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

बदली राजनीति, बदलती तकदीरें

समाजवादी पार्टी की विंडफाल टैक्स की धार को कुंद करने के वास्ते रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के मुखिया मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री कार्यालय और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से मुलाक़ात करके ये बात साफ कर दी कि छोटे भाई अनिल अंबानी के साथ हालिया टकराव में वो इतनी आसानी से सरकार को अनिल का पक्ष नहीं लेने देंगे।

एक तरफ बड़े अंबानी सत्ता के गलियारों में चारा फेंक रहे हैं तो दूसरी ओर ये चर्चा भी गर्म है कि अमर सिंह और उनकी पार्टी से नजदीकी के चलते आजकल अनिल का 10 जनपथ के साथ हॉटलाइन संपर्क हो गया है। जैसे ही अमर सिंह ने घोषणा की कि उनकी पार्टी सरकार पर निजी तेलशोधक कंपनियों पर विंडफाल टैक्स लगाने का दबाव डालेगी, मुकेश अपने निजी जेट विमान से सरपट दिल्ली दरबार की ओर दौड़े। अमर सिंह का तर्क है कि वैश्विक तेल बाज़ार की तेज़ी में इन कंपनियों ने अप्रत्याशित कमाई की है। अगर इस टैक्स की घोषणा की जाती है तो इसका सीधा असर आरआईएल द्वारा भारत में स्थापित किए जाने वाले अब तक के सबसे बड़े तोलशधक संयंत्र की योजना पर पड़ेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था का पांच फीसदी हिस्सा अंबानी भाइयों के विशालतम व्यापारिक साम्राज्य से आता है। दोनों भाइयों ने 90 के दशक के बाद—जब दोनों भाई मिलकर अपने पिता धीरूभाई के मार्गदर्शन में सत्ता को साधे रखते हुए एक के बाद एक कंपनियों को धराशायी कर रहे थे– लंबी दूरी तय कर ली है। एक दौर था जब उनकी ताकत इतनी थी कि देश के बड़े-बड़े उद्योगपति भी तब इनसे पंगा लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे क्योंकि ऐसा करने पर पूरे सरकारी तंत्र के उनके खिलाफ चले जाने का खतरा मंडराने लगता था। धीरूभाई की मौत के बाद एक बार फिर से दोनों को लड़ता देख अब वही लोग अपनी खुशी को दबा नहीं पा रहे हैं। 10 जुलाई को वामपंथियों द्वारा मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेने और समाजवादी पार्टी द्वारा सरकार को समर्थन देने के फैसले के बीच दोनों भाइयों की इस ताज़ा तरीन लड़ाई के राजनीतिक रंग लेने का ख़तरा पैदा हो गया। इसका संकेत बाज़ार में भी साफ देखा जा सकता है। जिस दिन सपा ने यूपीए सरकार को समर्थन देने का एलान किया उस दिन बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में मुकेश की कंपनी आरआईएल के शेयर छह फीसदी गिर गए। 

समाजवादी पार्टी और अनिल अंबानी के बीच स्वाभाविक गठजोड़ और इसमें मुकेश को नुकसान पहुंचा सकने की क्षमता का संकेत बाज़ार में भी साफ देखा जा सकता है। जिस दिन सपा ने यूपीए सरकार को समर्थन देने का एलान किया उस दिन बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में मुकेश की कंपनी आरआईएल के शेयर छह फीसदी गिर गए। ये रूझान विंडफाल टैक्स के ख़तरे के प्रति निवेशकों की हताशा को दर्शाते हैं। 

विंडफॉल टैक्स लगाने की मांग के अलावा अमर सिंह ने अनिल की आर कॉम और दक्षिण अफ्रीकी कंपनी एमटीएन के विलय को रोकने की मुकेश अंबानी की कोशिशों की भी आलोचना की। यहां ये दीगर है कि अगर अनिल अंबानी का एमटीएन से समझौता पक्का हो जाता है तो ये न सिर्फ दुनिया की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में शुमार हो जाएगी बल्कि अनिल की कुल संपत्ति भी मुकेश से ज्यादा हो जाएगी। मुकेश ने धमकी दी थी कि अनिल को आरकॉम के शेयरों को बेचने के लिए उनकी सहमति लेनी होगी अन्यथा वो क़ानूनी कार्रवाई करेंगे। इस बाबत एक समाचार चैनल पर अमर सिंह ने कहा कि अनिल और एमटीएन के बीच प्रस्तावित समझौते पर बड़े भाई का रवैया बहुत ही घृणित है। उन्होंने प्रधानमंत्री से दोनों भाइयों के मामले में हस्तक्षेप की भी मांग कर डाली। 

एमटीएन को लेकर पैदा हुए विवाद की जड़ में दरअसल वो समझौता है जिसे दोनों भाइयों ने तीन साल पहले अपने पिता के व्यापारिक साम्राज्य को आपस में बांटने के लिए किया था। इस समझौते की सबसे अहम बात ये थी कि दोनों भाई अलग-अलग क्षेत्रों में काम करेंगे और एक दूसरे के व्यापार में स्पर्धा नहीं करेंगे। मुकेश का दावा है कि समझौते में ये भी था कि अगर कभी अनिल रिलायंस कम्युनिकेशंस के शेयर बेचना चाहें तो मुकेश द्वारा उन्हें न खरीदने की हालत में ही शेयरों को किसी तीसरी कंपनी को बेचा जा सकता है। 

अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (एडीएजी) इस बात से इनकार करता है। एडीएजी का कहना है कि जिस वक्त ये समझौता हुआ था बोर्ड में मुकेश समर्थकों का दबदबा था और उन्होंने अनिल के एकमात्र प्रतिनिधि के विरोध को अनदेखा कर दिया था। खुद अनिल का कहना है कि उन्होंने उसी वक्त इस समझौते का कड़ा विरोध किया था। 

2004 में मनमोहन सिंह के सत्ता में आने के बाद से ही दिल्ली के सत्ताधारी प्रतिष्ठानों में छोटे अंबानी की हैसियत किसी अछूत जैसी रही है। वजह वही थी, अमर सिंह से उनकी नज़दीकी जो खुद भी राजनीतिक कारणों से सत्ताधारी गठबंधन की मुखिया यानी कांग्रेस के लिए अछूत बने हुए थे। अनिल को इसके व्यापारिक परिणाम भी भुगतने पड़े। दिल्ली, मुंबई हवाई अड्डे के निजीकरण के लिए अनिल का आवेदन ठुकरा दिया गया जबकि तकनीकी मूल्यांकन में उन्हें सबसे ऊपर रखा गया था। लेकिन अब अमर सिंह और कांग्रेस के बीच संबंध नाटकीय रूप से सुधर गए हैं तो अनिल अंबानी भी व्यवस्था के लिए अछूत नहीं रहे। अब ये धारणा आम हो चली है कि अमर सिंह सरकार पर रिलायंस कम्युनिकेशंस और एमटीएन सौदे को सुचारूपूर्वक संपन्न कराने का दबाव डाल रहे हैं। व्यापार जगत पर निगाह रखने वालों का मानना है कि आर-कॉम—एमटीएन समझौता हो या न हो मगर इस विवाद से भारत की व्यावसायिक छवि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार और निवेशकों के बीच दागदार जरूर हो जाएगी।   

अमर सिंह ने ये भी आरोप लगाया है कि व्यापारिक घराने सरकार गिराने के लिए लोकसभा सांसदों की खरीद फरोख्त कर रहे हैं। ज़ाहिर है ऐसा कहते हुए उनका इशारा मुकेश अंबानी की तरफ ही रहा होगा। 

अपनी नई दिल्ली यात्रा के दौरान मुकेश अंबानी प्रधानमंत्री के अलवा ताकतवर कैबिनेट सचिव से भी मिले जिनका रसूख पेट्रोलियम सचिव एमएस श्रीनिवासन की सेवानिवृत्ति के बाद और भी बढ़ने वाला हैं। इसके अलावा वो कांग्रेसी दिग्गज अहमद पटेल से भी मिले (जामनगर से उनका जुड़ाव सबको याद है)। यहां तक कि हाल ही में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की यात्रा भी की जहां उन्होंने एमटीएन के चेयरमैन सिरिल रामाफोसा और सीईओ पीएफ हेल्को को पत्र लिखकर एडीएजी और एमटीएन के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई की धमकी दी। इधर एडीएजी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं उन्हें एमटीएन को समझौते का प्रस्ताव देने का हक़ है क्योंकि कंपनी एक्ट उन्हें इस बात की इजाजत देता है कि किसी भी कंपनी के शेयर आसानी स्थानांतरित किए जा सकते हैं और इसमें किसी को भी हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। 

व्यापार जगत पर निगाह रखने वालों का मानना है कि आर-कॉम—एमटीएन समझौता हो या न हो मगर इस विवाद से भारत की व्यावसायिक छवि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार और निवेशकों के बीच दागदार जरूर हो जाएगी। शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध भारत की ज्यादातर कंपनियां आज भी परिवारों के नियंत्रण में हैं और इस तरह की लड़ाइयां ये साबित करती हैं कि भारतीय व्यावसायिक घराने आज भी निजी व्यापारिक हितों से ऊपर नहीं उठ सके हैं। इस बात की चर्चाएं पहले से ही हैं कि कुछ स्वार्थी तत्व आर-कॉम के शेयरों की कीमतें गिराने में लगे हुए हैं और कहा जा रहा है कि ये कड़वाहट दिनों दिन बढ़ती ही जाएगी अगर राजनीति और व्यापार जगत के कुछ शक्तिशाली दोस्तों ने इसमें बीच बचाव नहीं किया। 

फिलहाल तो स्थिति ये हे कि अगर समझौता आगे बढ़ता है तो मुकेश अंबानी क़ानूनी लड़ाई की शुरुआत कर सकते हैं– उनके वकील पहले ही छोटे भाई को ढेर सारी क़ानूनी चेतावनियां भेज चुके हैं। और अगर ये नहीं होता है तो (दक्षिण अफ्रीकी अख़बार द टाइम्स के मुताबिक एडीएजी से बातचीत खत्म होने के कगार पर है और एमटीएन फिर से एयरटेल से बातचीत करने का मन बना रही है) उस हालत में अनिल अंबानी भी चुप बैठेने वाले नहीं हैं। वो अपने नए राजनीतिक रसूख का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। 

दोनों भाइयों ने बंटवारे के बाद अपने व्यापारिक साम्राज्य को हर तरह से आगे बढ़ाया है। दोनों इससे भी तेज़ रफ्तार से तरक्की कर सकते हैं अगर वे एक दूसरे की राहों को काटने की बजाय अपनी-अपनी राह चलें।

शांतनु गुहा रे

करार पर कांग्रेस का आखिरी प्रहार

जैसे-जैसे जादुई आंकड़े को छूने की राह मुश्किल हो रही है, कांग्रेस के भीतर खलबली मचने लगी है. कांग्रेस पार्टी की मन:स्थिति का विश्लेषण कर रही हैं हरिंदर बावेजा.

पिछले पखवाड़े जापान में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ खड़े थे. माहौल गर्म था. टीवी कैमरों की भारी भीड़ थी. दोनों राष्ट्राध्यक्ष खुश थे. ये एक ऐतिहासिक अवसर था, भारतीय प्रधानमंत्री के लिए विरासत के निर्माण का क्षण. एक ऐसा क्षण जब उनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रहे परमाणु समझौते को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का वरदहस्त मिल रहा था. जैसा कि प्रधानमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ सदस्य कहते हैं, “दस साल पहले जुलाई 1998 में जी-आठ ने एकमत से पोखरण-2 के लिए भारत की निंदा की थी. और इस समय वही जी-आठ भारत की परमाणु नीति के समर्थन में एकमत से प्रस्ताव पारित कर रहा था.”

मगर उसके बाद के कुछ दिनों में देश में जो हुआ उससे इस क्षण का गौरव कांग्रेस के लिए सिरदर्द में तब्दील हो चुका है. अगले हफ्ते क्या होगा कोई नहीं बता सकता. सवाल कई हैं. किसकी रात किसके साथ बीतेगी? कौन दोस्त दुश्मन में तब्दील हो जाएगा? कौन वफादारी खरीदेगा? कौन बेचेगा और इसकी कीमत कितनी होगी? और जब धूल छंटेगी तो कौन अकेला छूट जाएगा और कौन किसके साथ नजर आएगा? 

परमाणु समझौते और मनमोहन सिंह का जिक्र इतिहास में किस तरह होगा ये जानने में अभी वक्त लगेगा. फिलहाल तो इस बात की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं कि इस सौम्य और ईमानदार सिख प्रधानमंत्री पर उसके और उसकी पार्टी के सत्ता से बाहर होने का दोष थोपा जा सकता है. प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों पर यकीन किया जाए तो प्रधानमंत्री ने पिछले साल अक्टूबर में ही करार पर सारी उम्मीदें छोड़ दीं थीं. उस समय उनका वो प्रसिद्ध बयान भी आया था कि अगर परमाणु समझौता नहीं हो पाया तो उन्हें निराशा तो होगी मगर जीवन आगे बढ़ता रहेगा. 

तो क्या कुछ गड़बड़ हुई है? या फिर सत्तासीन पार्टी ऐसा ही चाह रही थी? और अगर गड़बड़ हुई है तो उसका दोषी कौन है? कांग्रेस के दिग्गज और प्रबंधक? या फिर प्रधानमंत्री और उनकी अराजनीतिक टीम? 

जैसे-जैसे दिन गुजरते जा रहे हैं और ये साफ होता जा रहा है कि संख्याबल जुटाने में सत्ताधारी पार्टी की मुश्किलें बढ़ रही हैं, प्रधानमंत्री के ऊपर इल्जामों की बौछार भी बढ़ती जा रही है. कहा जा रहा है कि इस अलोकप्रिय मुद्दे पर सरकार को खतरे में डालना ही नहीं चाहिए था और ऐसा मुख्य रूप से प्रधानमंत्री की वजह से हुआ है क्योंकि वे तय योजना के मुताबिक नहीं चले. 

क्या ये सही है कि कोई तय योजना थी? और उससे भी अहम सवाल ये कि क्या प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस फैसले पर एकराय थे? वैसे कम ही लोग इस बात पर यकीन करते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय 10 जनपथ की सहमति के बगैर आगे बढ़ा होगा. पिछले दो सालों के दौरान जब भी परमाणु करार पर संसद के भीतर और बाहर बहस हुई है, ये तथ्य पूरी तरह से साफ रहा है कि मनमोहन करार के इच्छुक हैं. ये भी सब जानते हैं कि पिछले अक्टूबर में इस मुद्दे पर वामदलों को खुलेआम समर्थन खींचने की चुनौती देने वाले प्रधानमंत्री बाद में खुद ही पीछे हट गए थे. उस समय शरद पवार, लालू यादव, करुणानिधि जैसे यूपीए के सहयोगी इस मुद्दे पर सरकार खतरे में डालने के इच्छुक नहीं थे. 

तो फिर इस बार क्या बदल गया? 

प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी कहते हैं कि मनमोहन सिंह ने जून में सोनिया गांधी से मुलाकात कर उन्हें बताया था कि ये करार ऐतिहासिक है और वाममोर्चा सिर्फ इसलिए इसका विरोध कर रहा है कि उसे बुश पसंद नहीं. माना जाता है कि प्रधानमंत्री ने सोनिया को ये भी बताया कि 2006 के आखिर में सीताराम येचुरी ने जो नौ बिंदु उठाए थे, करार में उनका ख्याल रखा गया है. तब तक प्रधानमंत्री करार पर खुशी से लेकर इसके लागू होने में आ रही अड़चनों पर हताशा तक, हर तरह के भावों की अभिव्यक्ति कर चुके थे. दरअसल अगर प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों पर यकीन किया जाए तो प्रधानमंत्री ने पिछले साल अक्टूबर में ही करार पर सारी उम्मीदें छोड़ दीं थीं. उस समय उनका वो प्रसिद्ध बयान भी आया था कि अगर परमाणु समझौता नहीं हो पाया तो उन्हें निराशा तो होगी मगर जीवन आगे बढ़ता रहेगा. उसके बाद उन्होंने इस मामले पर बातचीत का जिम्मा विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी पर छोड़ दिया था जो सुरक्षा उपायों के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) से समझौते के मसौदे को लेकर वाम दलों के साथ बातचीत कर रहे थे.

मगर फिर पिछले महीने प्रधानमंत्री की नसों में अचानक इस्पात दौड़ा और उन्होंने एक आखिरी कोशिश करने की ठानी. उनके एक करीबी सहायक बताते हैं, “उन्होंने सोचा कि आईएईए के साथ उन्हें आशा से ज्यादा सफलता मिली है और इसके लिए उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जानी चाहिए.” ऐसा लगता है कि इस बिंदु पर उन्होंने करार पर फिर से आगे बढ़ना शुरू किया. उन्होंने अपने इस्तीफे की अफवाहों को फैलने दिया और इस तरह सोनिया गांधी पर कोई फैसला लेने का दबाव बनाने की शुरुआत की. 

तो क्या सोनिया अनिच्छा से उनके साथ खड़ी हुईं? कांग्रेस प्रवक्ता और सांसद अभिषेक मनु सिंघवी इस सवाल के सीधे जवाब से बचने की कोशिश करते हुए कहते हैं, “ज्यादातर लोग जितना सोचते या यकीन करते हैं, प्रधानमंत्री और श्रीमती सोनिया गांधी में पारस्परिक सामंजस्य, सहयोग और सम्मान उससे कहीं ज्यादा है. मैं विश्वासपूर्वक ये कह सकता हूं. मुझे याद है कि कांग्रेस संसदीय दल के एक रात्रिभोज  के दौरान वे घर रवाना होने के लिए दरवाजे तक पहुंची ही थीं कि अचानक कुछ सोचकर रुक गईं. फिर उन्होंने मुझे संकेत किया कि वे तो ये भूल ही गईं कि प्रधानमंत्री अभी भी वहीं मौजूद हैं. इसके बाद उन्होंने खुद प्रधानमंत्री को विदा करने के बाद ही वह स्थल छोड़ा. एक-दूसरे के लिए इस संवेदनशीलता और आदर को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए.” 

अगर ऐसा है और कांग्रेस के दोनों मुखिया करार के पक्ष में थे तो फिर प्रधानमंत्री के वाममोर्चे को दूसरी बार चुनौती देने से पहले उन्होंने और यूपीए ने अपनी तैयारी ढंग से क्यों नहीं की. कांग्रेस में मची हड़बड़ी तो साफ ये दर्शा रही है कि जब प्रधानमंत्री ने जी-आठ सम्मेलन के लिए जापान जाते हुए अपने विशेष विमान में पत्रकारों से बहुत जल्द आईएईए में जाने की बात कही तो इससे पहले कोई पक्की रणनीति बनाई ही नहीं गई थी.

कुछ समय तक तो कई समीक्षक गलती से यही सोचते रहे कि प्रधानमंत्री ने वाम के साथ मिलकर एक ऐसा दांव खेला है कि करार भी हो जाए और सरकार के साथ-साथ वाममोर्चे की लाज भी बच जाए. इस परिस्थिति में वाममोर्चा समर्थन वापस ले लेता और अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अनुपस्थित रहता. यानी दोनों पक्षों का काम हो जाता. पिछले महीने प्रधानमंत्री की नसों में अचानक इस्पात दौड़ा और उन्होंने एक आखिरी कोशिश करने की ठानी. उनके एक करीबी सहायक बताते हैं, “उन्होंने सोचा कि आईएईए के साथ उन्हें आशा से ज्यादा सफलता मिली है और इसके लिए उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जानी चाहिए.” 

मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं और वाममोर्चा अब ऐसे गुस्सैल सांड की तरह नजर आ रहा है जो कांग्रेस को पटखनी देने के लिए कृतसंकल्प है, फिर भले ही इसके लिए उसे भाजपा के साथ ही वोट क्यों न देना पड़े. 

समाजवादी पार्टी के कांग्रेस के पाले में चले जाने को निर्रथक बनाने के लिए वाममोर्चे ने बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती से हाथ मिलाया है. हालांकि भाजपा के साथ वोट देने को लेकर वाममोर्चे के भीतर एकराय नहीं है मगर इसके बावजूद सीपीएम नेता प्रकाश करात रोज अपने चाकू की धार तेज कर रहे हैं. पार्टी पत्र पीपुल्स डेमोक्रेसी को दिए एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, “ये नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस और यूपीए अपना जनाधार खो रहे हैं. यही राजनीतिक हकीकत है. अगर कोई कांग्रेस के साथ अपने भविष्य की डोर बांधना चाहता है तो ये उसका निजी मामला है.”  यानी करात कांग्रेस के सहयोगियों को सिर्फ परमाणु करार के मुद्दे पर ही नहीं बल्कि सत्ता विरोधी लहर का खौफ दिखाकर भी डरा रहे हैं. 

कांग्रेस की खस्ता होती हालत की चर्चा पार्टी के अपने रणनीतिकारों और स्वतंत्र विश्लेषकों के भीतर तेज़ी से फैल रही है. राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता कहते हैं, “वामदलों के एक मुद्दे वाली पार्टी लगने के मुकाबले यूपीए की सरकार कहीं ज्यादा एक मुद्दे वाली लग रही है. तरह-तरह के समझौतों के मद्देनज़र सरकार के लिए अपनी विश्वसनीयता बढ़ा पाना बेहद मुश्किल होगा.” एक और राजनीतिक विचारक सईद नकवी कहते हैं, “परमाणु करार के इर्द-गिर्द बहुत ज्यादा रहस्य बना हुआ था. कांग्रेस इसे लोगों को ठीक से समझा नहीं सकी और अब वो परेशानी में है.” 

मगर इससे भी बुरी बात ये है कि भले ही हर पल नई-नई कहानियां सुनने को मिल रही हों लेकिन कटुसत्य ये है कि सुरक्षित संख्या का इंतजाम नहीं हो सका है. इसके अलावा अनभिज्ञता की हालत भी देखने को मिल रही है—किसी को भी ये पता नहीं है कि 272 का जादुई आंकड़ा जुटाने का काम कौन कर रहा है. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के शब्दों में, “ऐसा लगता है गणितीय आंकड़े के जुगाड़ का जिम्मा अमर सिंह और लालू यादव के कंधों पर छोड़ दिया गया है.” 

उनकी हताशा आसानी से दिख जाती है. आप कांग्रेसी नेताओं से बात करें—त्यागपत्र की सुगबुगाहट तेज़ी से फैलती जा रही है. जिस तरह की तेज़ी और उत्साह प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति चुनने के दौरान दिखाई दिया था. वैसा कुछ भी सरकार को बचाने के लिए नज़र नहीं आ रहा. सोनिया गांधी की पार्टी महासचिवों के साथ एकमात्र बैठक के अलावा किसी को एआईसीसी की बैठक के लिए नहीं बुलाया गया है. इसके उलट राष्ट्रपति चुनावों के दौरान ऐसा किया गया था. इनमें से किसी को सांसदों से संपर्क साधने की जिम्मेदारी भी नहीं दी गई है. पार्टी सूत्र इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि कांग्रेस अध्यक्षा ने राष्ट्रपति चुनावों के लिए समर्थन जुटाने के दौरान सांसदों को रात्रिभोज दिया था जबकि इस बार ऐसा कुछ भी नहीं किया जा रहा है.

एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, “काम कहां दिख रहा है? ऐसा लग रहा है कि हम अंधेरे में तीर मार रहे हैं. इस तरह की परिस्थिति में आपको एक-एक सांसद का हिसाब-किताब रखना पड़ता है क्योंकि कोई भी क्रॉस वोटिंग कर सकता है. एबी बर्धन के ये कहने से, कि हम सांसदों को 25 करोड़ रूपए दे रहे हैं, हमारी मुसीबते और भी बढ़ गई हैं.” 

7 जुलाई को प्रधानमंत्री द्वारा उड़ान के दौरान आईएईए में जाने की घोषणा के बाद यूपीए के भीतर लगातार बढ़ती जा रहीं दरारों को पाटने के लिए और ज़्यादा कोशिशें शुरू की गई–हालांकि इससे पहले ही प्रणव मुखर्जी 10 जुलाई को होने वाली समन्वय समिति की बैठक में शामिल होने के लिए वाम दलों को पत्र लिख चुके थे. लेफ्ट के समर्थन वापस लेने के बाद भी प्रणब मुखर्जी ने एक बार फिर कहा कि सरकार विश्वास मत हासिल किए बिना आईएईए में नहीं जाएगी मगर एक बार ये साफ होने के बाद कि सरकार पहले ही आईएईए से बात कर चुकी है उन्हें वाम दलों का फिर से कोपभाजन बनना पड़ा. नाराज मुखर्जी की अगुवाई में क्षतिपूर्ति अभियान शुरू किया गया जिसमें मोहसिना किदवई, वीरप्पा मोइली और कपिल सिब्बल शामिल थे. इनमें से एक को ये जानकर झटका लगा कि इसके बाद विदेश मंत्रालय के पास सेफगार्ड एग्रीमेंट का ड्राफ्ट अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराने के अलावा कोई और चारा नहीं था. जबकि एक दिन पहले ही कहा गया था कि ये एक “गोपनीय” दस्तावेज़ है. आज कांग्रेस प्रबंधक इस बात को दावे के साथ नहीं कह सकते कि उनकी सरकार बच ही जाएगी. उन्हें बस इस बात की उम्मीद है कि कुछ वाम सांसद बीजेपी के पक्ष में वोट देने की बजाय सदन से अनुपस्थित रहेंगे. ये भी कि शायद अमर सिंह बसपा के कुछ सांसदों को फुसलाने में सफल हो जाएं…शायद कोई चमत्कार हो जाय.

सिर्फ एक चीज ऐसी दिखी जिसके बारे में कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी, वो था समाजवादी पार्टी का समर्थन. लेकिन उनकी संख्या 39 ही है–जिसमें से भी कम से कम तीन उसके साथ ही नहीं हैं–जो वामदलों के 59 के मुकाबले काफी कम हैं. अगर यूपीए किसी तरह से संख्या का जुगाड़ कर भी लेती है तो उसके लिए आगे की राह आसान नहीं होगी. समाजवादी पार्टी का समर्थन ही अपने आप में सैंकड़ो सरदर्द की पर्याप्त वजह है. अमर सिंह कह रहे हैं कि उन्होंने समर्थन राष्ट्रहित में दिया है लेकिन वो अंबानी भाइयों के झगड़े में हस्तक्षेप करने के लिए प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने से खुद को नहीं रोक सके. राजनीतिक विश्लेषक स्वप्नदास गुप्ता कहते हैं, “सरकार के बचाव के लिए पैसों का सहारा ले कर कांग्रेस ने परमाणु समझौते पर धब्बा लगा दिया.” 

आज कांग्रेस प्रबंधक इस बात को दावे के साथ नहीं कह सकते कि उनकी सरकार बच ही जाएगी. उन्हें बस इस बात की उम्मीद है कि कुछ वाम सांसद बीजेपी के पक्ष में वोट देने की बजाय सदन से अनुपस्थित रहेंगे. ये भी कि शायद अमर सिंह बसपा के कुछ सांसदों को फुसलाने में सफल हो जाएं…शायद कोई चमत्कार हो जाय. 

बहरहाल अगर इसमें से कोई जादुई फार्मूला निकल कर आता भी है– जो कि फिलहाल दिख नहीं रहा—तो एक बात साफ है कि उसे जल्द ही चुनावी राग छेड़ना होगा. कुछ तो पहले से ही खुद को शहीद दिखाने की तैयारी करना शुरु भी कर चुके हैं यानी कि कांग्रेस ने राष्ट्रहित में राजनीति की बजाय देश को तरजीह दी. पर क्या इससे फायदा होगा? क्या ग्रामीण भारत के लिए परमाणु करार इतना मायने रखता है? कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी इसके जवाब में कहते हैं, “जब आप देशहित की बात करते हैं तो फिर आपको ये उम्मीद भी रहती है कि देश आपके साथ खड़ा रहेगा. अगर कोई अड़चन है जो भारत के महाशक्ति बनने की राह में रोड़ा अटका रही है तो वो है ऊर्जा की कमी और भारत को महाशक्ति बनाने के लिए किया गया कोई भी बलिदान बहुत छोटा है.” महंगाई के बोझ तले दबी जनता के लिए न्यूक्लियर डील के मायने पूछने पर उनका जवाब था, “90 के शुरुआती दशक से ही चुनाव तीन मुख्य मुद्दों के इर्द गिर्द लड़े जाते रहे हैं है—बिजली, पानी और सड़क. ये समझौता बिजली के लिए है.” 

उनके इस तर्क से कम ही लोग इत्तेफाक रखते हैं. भानु मेहता कहते हैं, “चुनावी नज़रिए से परमाणु करार व्यावहारिक नहीं है. मेरे ख्याल से सरकार को इस डील को इतनी उच्च प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए थी. विशेषकर जब बराक ओबामा भी इसका समर्थन कर रहे हैं.” नकवी कहते हैं, “कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधक हो सकता है 272 का आंकड़ा जुटा भी ले पर मतदाता निश्चित रूप से उन्हें ये संख्या नहीं देने वाले.” 

दिलचस्प बात ये है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के पास चुनाव का खाका तैयार है और मनमोहन सिंह के विश्वस्त इसे बताने के लिए भी तैयार हैं. पार्टी की सोच ये है कि अगर उन्हें जनता के बीच जाना पड़ता है तो पार्टी को इस मौके को इस रूप में भुनाना चाहिए कि हम परमाणु करार के मुद्दे पर अपने रुख पर दृढ़ रहे और वाम तथा दक्षिणपंथियों के विरोध की वजह से हमें नीचा देखना पड़ा. दूसरी बात करार को जनता के सामने इस रूप में पेश किया जाना चाहिए कि ये ऊर्जा की सुरक्षा से जुड़ा हुआ था. और अंत में पार्टी करार के जरिए सांप्रदायिकता को मात देने के लिए राष्ट्रवाद का पत्ता भी खेल सकती है.

कांग्रेस रणनीतिकारों की चिंता मुस्लिम वोटों को लेकर भी है, जिन्हें वो लंबे समय से लुभाना चाहते हैं. सपा सांसद शाहिद सिद्दीकी द्वारा अपने अख़बार ‘नई दुनिया’ के लिए करवाए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 70 फीसदी (5000 शहरी मुसलमानों के बीच हुआ) लोग करार के खिलाफ थे. जब उनसे पूछा गया कि किस मुद्दे पर वो अपना वोट डालना चाहेंगे तो 85 फीसदी लोगों ने ‘महंगाई’ को चुना. शाहिद सिद्दीकी के मुताबिक, “मुसलमान करार के प्रति काफी संवेदनशील है क्योंकि बुश के विरोधी हैं लेकिन मुस्लिम समुदाय विदेश नीति के मुद्दे पर मतदान नहीं करता है.”

लेकिन फिलहाल तो सारी निगाहें यूपीए के लिए कयामत का दिन माने जा रहे 22 जुलाई पर लगी हैं. किसी तरह अगर ये खुद को बचाने में सफल हो भी जाते हैं तो सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरो पर है कि तुरंत ही उन्हें किसी और मुद्दे पर एक नए अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ सकता है. अपनी पुरानी चमक कुछ हद तक फिर से वापस पाने के लिए कांग्रेस के पास एकमात्र रास्ता है—कुशल राजनीतिक प्रबंधन, जिसके सहारे वो राष्ट्रहित में पार्टीहित को बलिदान की बात कर खुद को नैतिक रूप से ऊंचा साबित करने की कोशिश कर सकते हैं. जैसा कि राहुल गांधी ने ये कहते हुए किया, “करार की वजह से अगर सरकार गिर जाए तो मुझे कोई परवाह नहीं है क्योंकि ये अच्छे के लिए है और ऐसा करने के लिए हिम्मत होनी चाहिए.”

लखनवी से अजनबी आज का लखनऊ

उन्नीसवी सदी के एक दिन दो नवाबो की ट्रेन छूटी थी पहले आप-पहले आप के चक्कर में और सारी दुनिया में लखनऊ की शराफत का डंका पीट गई. इक्कीसवी सदी के इस दिन, आज आपकी ट्रेन भी तो छूटी है. ट्रेन में चढ़ती भीड़ को बोल पड़ीं पहले आप. जब लगीं आप चढ़ने, ट्रेन लगी तेज़ बढ़ने. भीड़ तो चली गई, बस रह गईं आप. और कहिये पहले आप-पहले आप! 

क्या किसी ने बोला तमीज और अदब लखनऊ की हवा में बसती है? शायद ये खूबिया अब गुमशुदगी की गली में रहती हैं. हताश घर जाने  के लिए जैसे ही बोरिया बिस्तर समेटा, तभी स्कूली नौजवां ने हाथ में आपका दुप्पट्टा लपेटा. वहीं उसे रोक जब आपने, उसको हड़काया, रुको हम पुलिस को बुलाते है"लखनवी अंदाज़ से महरूम पूछ बैठा, “हम! मतलब मैडम पहले किसी और को बुलाएंगीं बाद में दोनों मिलकर पुलिस को बुलाएंगे. मतलब काफी टाइम है भागने और उससे पहले छेड़ने का", चिढ़कर आपने जवाब दिया, " हम मतलब होता है मैं! बहुवचन नहीं, एक वचन."अचानक झटका सा खाते हुए, मौका न गवाते हुए, लगाता है वो सत्ता में बैठी बेहेनजी की गुहार."बेहेनजी माफ़ कर दो, गलती हो गई इस बार. आपको मै कुछ औऱ ही समझ बैठा." कहाँ गया वो लहजा, कहाँ गया वो लखनवी व्यवहार? पीछे छोडा सबको चल पड़ी स्टेशन के पार. 

घर वापस लौटते वक्त आप, हजरतगंज से गुज़रती है. चौराहे पर हरी बत्ती देख आप गाड़ी आगे बढ़ा लेती है. सौ गज दूर, सिपाही गाड़ी रोक बताता है, " आपने ट्रैफिक नियमो का उल्लंघन किया है, गाड़ी रोको बताता हूँ". आप समझाती है,"भाई साहेब मैंने तो ट्रैफिक लाइट का पालन किया है. वो बताता है, यहाँ ट्रैफिक लाइट नहीं, ट्रैफिक पुलिस वाला, गाड़ी आगे कब बढ़नी है, बताता है. या तो पाँच सौ रुपये दीजिये, या फिर, गाड़ी के पेपर हमारे हवाले कीजिये". उसकी बेधड़क-बेझिझक फरमाइश आपकी नजाकत को चकनाचूर करती है, और आप अपना पीछा छुड़ा आगे बढ़ती हैं. 

शाम को उमराव जान की नज्मों और शायरी के माहौल की ख्वाहिश आपको बारादरी का रुख कराती है. वहाँ पहुँच इन आंखों की मस्ती के" का पंजाबी रीमिक्स उर्दू के अदब का मजाक उडाता है. उससे ध्यान हटा आप चौकीदार से चिकन कढाई की प्रदर्शनी का रास्ता पूछती है. चौकीदार आपको समझाता है, "मैडम चिकन कढाई नहीं, कढाई चिकन. इसी के स्वाद का तो दुनिया मज़ा लूटती है!" 

कारीगिरी की धीमी मौत का चिंतन आपके सर चढ़ता है. बगल का पार्क आपको वहाँ बनी सनी देओल की ग़दर की याद दिलाता है. अचानक दिमाग," मैं निकला गड्डी लेकर" गुनगुनाता है. गुनगुनाती हुईं आप पार्किंग में पहुंचती है और अपनी कार के आगे किसी और की कार को लगा देखती हैं. कार में बैठे महाशय से गाड़ी बढ़ाने का अनुरोध होता है. हाथ में चाबी घुमाते, महाशय का विरोध होता है. "मैं नहीं करूँगा,रुक जाइये, ड्राईवर आ जाए तब बताइए."

बधाई हो, आखिरकार मिल ही गया लखनऊ की नज़ाकत को अमर रखने वाला. यह उस नवाब का वंशज है,जिसने पैरों में नागरे पहनाने वाले नौकर के ना होने का ऐतराज़ किया था. और इसी कारण अंग्रेजों के हाथों मारा गया क्योंकि बिना पांवों में कुछ डाले भागना तो अदब की सरासर हिमाकत हो जाती. नजाकत, नफासत, अदब और शराफत की अन्तिम बूंदों को संजोये यही इक्कीसवी सदी का लखनऊ है. फिर भी बुरा न मानिये भाई साहेब, लखनऊ भी तो इसी दुनिया में ही है.

नेहा दीक्षित

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‘फिलहाल मेरा घर टूटा पड़ा है’

मेरा टूटा हुआ घर

कल जब यह एक आशियाना था,

तब इसका सामने का कमरा बड़ा इठलाता था।

उसमें महंगा डिस्टेम्पर जो पुता था,

बड़ा सा दीवान था, सोफा, टीवी, एक मेज और कुछ कुसियां भी,

आधुनिक युग में आदिम कहे जा रहे जनों की कलाकृतियां भी,

दरवाजे पर भी नक्काशी, बहन की बनाई लाल गुलाबों वाली पेंटिंग भी,

और दरवाजे  पर लटकता चीनी खिलौना विंड चाइम/चैम।

ऐसा नहीं कि यह कमरा ही दूसरों से ईर्ष्या करता था, बल्कि इसके अंदर की चीजें भी एक दूसरे से।

वो जो लाल डिस्टेम्पर से पुती दीवार थी, वह दूसरी दीवारों को मुंह चिढ़ाती थीं

दरवाजा, नक्काशी के मद में चूर था।

सोफा और दीवान एक बिरादरी के होने पर भी एक दूजे को फूटी आंखों नहीं भाते थे।

कभी दीवान से चर्र की आवाज आ गई, तो फिर सोफे का मारे खुशी से बुरा हाल।

और कभी सोफे से आई आवाज, तो फिर दीवान की स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया।

कोने की दीवार पर टंगे थे, झाबुआ के भीलों वाले तीर और तरकश

तो दूसरी दीवार पर टंगे थे, मेवाड़ के तलवार और ढाल

दोनों हमेशा ही रणभूमि की तरह आमने-सामने, अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लगे रहते थे।

विंड चाइम, कोने की अलमारी में रखे खिलौने (जो कि चाबी भरने पर बाजा बजाता है)

को `फटर-फटर´ कहकर चिढ़ाता, तो खिलौना उसे `अधखुली आंख´ कहता।

सबके सब कमरे में एक और अपने में अलग-अलग।

भीतरी कमरे, इस प्रतिस्पर्धा से दूर थे

क्योंकि उन्हें अवसर ही नहीं मिले थे, दंभ भरने के

मगर मेरे घर का पहला कमरा

मुझे सामंतवाद/वर्णवाद/जातिवाद/एकैकवाद/अर्थवाद का बखूबी भान कराता

और चाचा का छोटा बेटा भी तो बार-बार पूछता

भैया! भीतरी कमरों में इतना अंधेरा क्यों है?

और मेरे पास उसका कोई जवाब नहीं होता

आप इसे समाज की कालिखों से जोड़कर देख सकते हैं,

अब पिताजी रिटायर हो गये हैं, और चाहते हैं घर को नया लुक देना

तो टूट रहा है अब मेरा घर

उम्मीद है

इस बार पीछे के कमरों को भी समान अवसर मिलेंगे।

या तो परिपाटी बदलेगी, या फिर जारी रहेगा वही पुराना ढर्रा।

या तो सब भरेंगे दंभ या फिर वही सामने वाला कमरा।

फिलहाल मेरा घर टूटा पड़ा है।

                                                          प्रशांत कुमार दुबे

भोपाल के रहने वाले प्रशांत सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ एक थियेटर कलाकार भी हैं. वे सामाजिक मुद्दों पर स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में लिखते भी रहे हैं.

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सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा

आत्मकथाएं कौन लोग लिखते हैं? जो लोग कुछ अच्छे कामों के कारण समाज का प्यार पाते हैं या फिर जो बुरे कामों के कारण बदनाम हो जाते हैं. एक तीसरी श्रेणी ऐसे लोगों की भी है जो दूसरों की कुछ पोलपट्टी खोल सकने वाले पदों पर रहे होंगे. तीनों तरह के लोगों में राजनेता, अभिनेता, तानाशाह, पत्रकार, साहित्यकार, मंजे हुए या पिटे हुए खिलाड़ी, उद्योगपति और उच्च अधिकारी शामिल हैं.

आत्मकथा लोग अक्सर जीवन के उतार पर पहुंचकर लिखते हैं. अच्छे बुरे कामों का तेल तब तक खत्म हो चलता है, तब ऐसे लोगों की आत्मकथा थोड़ा और तेल जुटा देती है. ज्यादातर मामलों में ऐसे दीए बुझने से पहले थोड़े समय के लिए भभक कर जल उठते है. अखबारों में इनके विवादास्पद लेख छपते हैं, टीवी पर बहस होती है. फिर सब खत्म हो जाता है.

आत्मकथाओं के इस ढेर से अलग है गांधीजी की आत्मकथा जो अधूरी होते हुए भी पूरा सच बयान करती है. इसका शीर्षक बड़ा अटपटा है – सत्य के साथ मेरे प्रयोग अथवा आत्मकथा. यहां सत्य के प्रयोग का वर्णन मुख्य था. इसलिए नाम में भी उसे आगे रखा गया आत्मकथा को पीछे. निकट के साथियों के खूब आग्रह करने पर गांधीजी ने आत्मकथा लिखना तय किया. शुरू तो किया लिखना, लेकिन उन्हीं के शब्दों में ‘फुलस्केप का एक पन्ना भी पूरा नहीं हो पाया था कि इतने में बंबई में ज्वाला प्रकट हुई औऱ मेरा शुरू किया हुआ काम अधूरा रह गया.’

सच पूछा जाय तो इसमें गांधीजी की कहानी तो बस सूत्र के रूप में चलती है. मुख्य तो उस धागे में पिरोये गए उनके सत्य के प्रयोग हैं. खुद गांधीजी के शब्दों में ‘मुझे आत्मकथा कहां लिखनी है?  मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के साथ मैंने जो प्रयोग किए हैं उनकी कथा लिखनी है.’ये बात 1921 की है. उसके बाद गांधी जी की व्यस्तता दिनोंदिन बढ़ती ही गई. बीच में उन्हें गिरफ्तार करके यरवदा जेल, पुणे में रखा गया. पर गांधीजी के पास वक्त कहां था. उनके बारे में कहा जाने लगा था कि ये व्यक्ति अपने समय का मालिक था, अपनी घड़ी का गुलाम था, समय का एकदम पाबंद. अपनी कुटिया में साधरणजनों से लेकर ऊंचे दर्जे के नेताओं से दिनभर मिलते, हर दिन अनगिनत पत्र, नोट लिखते. एक हाथ लिखते-लिखते थक जाता तो दूसरे से भी लिखने का अभ्यास कर डाला था.

ये वो दौर था जब गांधीजी देश को एक नई भूमिका के लिए तैयार करने में दिन-रात लगे हुए थे. अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उनके पास अख़बार भी थे जिनके लिए हर हफ्ते कुछ न कुछ लिखना होता था. हल निकाला गांधीजी ने ‘तो फिर क्यों न आत्मकथा लिखूं।’ इस तरह ये विचित्र कथा मूल गुजराती में 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929 तक नवजीवन अख़बार में साप्ताहिक रूप से छपी. फिर अंग्रेज़ी अनुवाद 3 दिसंबर 1925 से 7 फरवरी 1929 तक ‘यंग इंडिया’ के अंको में छपा.

हिंदी पुस्तक के रूप में सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली ने इसे सबसे पहले सन् 1928 में प्रकाशित किया. लेकिन गांधीजी की तमाम रचनाओं का कॉपीराइट रखने वाला नवजीवन ट्रस्ट हिंदी संस्करण पहली बार 1957 में छाप सका. इन तीन भाषाओं में इस पुस्तक की करीब 14,56,000 प्रतियां पाठकों तक पहुंची है. इसके अलावा तमिल, कन्नड़, मराठी, तेलगू, उड़िया, असमी, बंगला और उर्दू में इसकी करीब पांच लाख प्रतियां छप चुकी हैं. सत्य के इस विचित्र प्रयोग को दुनिया की तमाम दूसरी भाषाओं में भी अनूदित किया जा चुका है. अंग्रेज़ी में यहां भी छपी और विदेशों में भी. फिर स्पेनी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, इतावली, जर्मन, पोलिस स्विस, तुर्की के अलावा अरबी भाषा में भी इसका अच्छा स्वागत हुआ है. चीनी, जापानी और तिब्बती भाषाओं में भी इसके संस्करण हैं.

कोई 80 वर्षों से लगातार पाठकों को लुभा रही इस आत्मकथा में ऐसा क्या है? सच पूछा जाय तो इसमें गांधीजी की कहानी तो बस सूत्र के रूप में चलती है. मुख्य तो उस धागे में पिरोये गए उनके सत्य के प्रयोग हैं. खुद गांधीजी के शब्दों में ‘मुझे आत्मकथा कहां लिखनी है?  मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के साथ मैंने जो प्रयोग किए हैं उनकी कथा लिखनी है.’ इस आत्मकथा में ब्रितानी राज, कांग्रेस, हिंदू-मुसलमान या दक्षिण अफ्रीका के दौरे में वहां के शासकों के खिलाफ रत्ती भर ज़हर नहीं मिलेगा, जो है वह है सत्य, अमृत जिसके कारण उन्हें इस गंदी से गंदी राजनीति में भी बहुत कुछ कर जाने की शक्ति मिली. इसमें तो उन्होंने अपने दोषों का भी वर्णन किया है.

आत्मकथा में गांधीजी के विभिन्न सत्याग्रहों और संघर्षों का वर्णन भी है. वो लिखते हैं “सत्याग्रह में संघर्ष व्यक्तियों अथवा पक्षों के बीच नहीं माना जाता, सत्य और असत्य, सही और गलत के बीच माना जाता है.”  ऐसे मौकों पर अपने हिस्से की सच्चाई को नहीं, पूरी सच्चाई को ठीक से पकड़ लो और उसके सहारे झूठ को, असत्य को पराजित करने के काम में लग जाओ. उन्ही के शब्दों में ‘इस तरह न कोई जीतता है, न कोई विजेता होता है. किसी को भी ऐसा नहीं लगता कि हम हार गए, हमने कुछ खो दिया है या हमारा अपमान हो गया है.’

गांधीजी ने इस आत्मकथा में 1921 तक का ही वर्णन किया है. पर यह उनकी कहानी का अंत नहीं है. यह आत्मकथा हमें बताती है कि चम्पारण सत्याग्रह में गांधीजी ने नील की खेती को लेकर अंग्रेजों के अत्याचारों में कैसे सत्य को पकड़ा और फिर अंत तक उसे पकड़े रहे. ‘नील का धब्बा’ नामक शीर्षक से लिखा यह अंश इस बात को बताता है कि गांधीजी ने ये मामला यूं ही नहीं उठा लिया था. एक पक्ष था अत्याचार करने वाले अंग्रेजों का तो  दूसरा था भोले-भाले किसानों का. तीसरा पक्ष ऐसे प्रसिद्ध वकीलों का था जो इन गरीब किसानों के मुकदमें

गांधीजी ने इस आत्मकथा में 1921 तक का ही वर्णन किया है…पूरे सच की ये अधूरी कथा ज़हर से घुली इस दुनिया में दूध से धुली है इसीलिए आज 80 सालों बाद भी खामोशी से तहलका मचा रही है.

लड़ते थे. गांधीजी लिखते हैं “इन भोले किसानों से मेहनताना सभी लेते थे, त्यागी होते हुए भी ब्रजकिशोर बाबू या राजेंद्र बाबू मेहनताना लेने में संकोच नहीं रखते थे. उनकी दलील यह थी कि पेशे के काम में मेहनताना न लें तो घर का खर्च नहीं चल सकता और हम लोगों की मदद भी नहीं कर सकते. उनके मेहनताने तथा बंगाल और बिहार के बैरिस्टरों को दिए जाने वाले मेहनताने के कल्पना में न आ सकने वाले आंकड़े सुनकर मैं दंग रह गया.”

सारी बात जान लेने के बाद गांधीजी की पहली राय थी “अब ये मुकदमें लड़ना तो हमें बंद ही कर देना चाहिए. जो रैयत इतनी कुचली हुई हो जहां सब इतने भयभीत रहते हों, वहां कचहरियों के जरिए थोड़े ही इलाज हो सकता है. लोगों का डर निकालना उनके रोग की असली दवा है. यह तिनकठिया प्रथा (जबरन नील की खेती) न जाय, तब तक हम चैन से नहीं बैठ सकते.”

गांधीजी चम्पारण की इस भयानक समस्या को देखने-समझने बस दो दिनों के लिए आए थे पर सत्य के प्रयोग ऐसे ही नहीं होते. उन्होंने यहां आकर जो देखा उससे उन्हें लगा “ये काम तो दो साल भी ले सकता है. इतना समय लगे तो भी मैं देने को तैयार हूं.” सत्य के प्रयोग भत्ते लेने से नहीं चलते. गांधीजी ने सभी प्रसिद्ध वकीलों का मेहनताना खत्म करवाया. खुद पेशे से वकील होते हुए भी उनसे कहा कि “इस बड़े काम में आपकी वकालत की योग्यता का थोड़ा ही उपयोग होगा. आप जैसों से तो मैं मुहर्रिर और दुभाषिए का काम चाहूंगा.” ये भी कहा कि वकील का धंधा अनिश्चित काल के लिए छोड़ देना पड़ेगा. जेल जाने की भी तैयारी रखें.

उधर गांधीजी ने हजारो किसानों से जो बात की उसमें भी सच्चाई का पूरा ध्यान रखा. हर किसान का बयान लेते समय, अंग्रेजों के खिलाफ शिकायत लिखवाते समय एक अच्छे वकील की तरह जिरह की जाती थी. जिस किसी भी शिकायत में झूठ या अतिश्योक्ति की गंध आती उस मामले को वहीं छोड़ दिया जाता था. झूठ के पुलिंदों के सहारे सच की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. गांधीजी का सच, गांधीजी के राम, दो पक्षों के बीच कैसा मजबूत सेतु बन जाता था- ऐसे अनेक प्रयोगों से भरी पड़ी है ये आत्मकथा. इसमें 1921 तक का ही वर्णन है इसके बाद गांधीजी का जीवन और भी सार्वजनिक होता गया. उन्हीं के शब्दों में “शायद ही कोई ऐसी चीज हो जिसे लोग न जानते हों.” इसलिए यहां आकर वे पाठकों से विदा लेते हैं. जिस सत्य के आग्रह पर उन्होंने आत्मकथा लिखना शुरू किया था, उसे इन सब विवरणों के बाद वे और भी गहरे उतर कर लिखते है “सत्य को जैसा मैंने देखा है, जिस मार्ग को देखा है उसे बताने का मैंने सतत प्रयत्न किया है. क्योंकि मैंने यह माना है कि उससे सत्य और अहिंसा के विषय में अधिक आस्था उत्पन्न होगी.”

पूरे सच की ये अधूरी कथा ज़हर से घुली इस दुनिया में दूध से धुली है इसीलिए आज 80 सालों बाद भी खामोशी से तहलका मचा रही है.

(गांधी शान्ति प्रतिष्ठान से सम्बद्ध अनुपम मिश्र स्वयं एक कालजयी पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब के लेखक हैं.)

नोएडा पुलिस की कर्मठता के मायने

सीबीआई कह रही है कि आरुषि का कत्ल कृष्णा, राजकुमार और विजय ने किया, ड़ॉ राजेश तलवार ने नहीं. जबकि नोएडा पुलिस या कहना चाहिए कि लगभग पूरी यूपी पुलिस कह रही थी कि कत्ल डॉक्टर तलवार ने ही किया था. पुलिस ने सीबीआई द्वारा आरोपित तीनों लोगों पर कभी ढ़ंग से शक तक नहीं किया था. ज़ाहिर है कि सीबीआई या पुलिस में से एक तो ग़लत है.

अब अगर सीबीआई को सही मान लिया जाए तो यूपी पुलिस का अपराध, मुख्य अभियुक्त कृष्णा से भी बड़ा हो जाता है. एक पिता जिसने हाल ही में अपनी बेटी की नृशंस ह्त्या देखी हो, जिसने चंद दिनों पहले ही अपने जीवन का एकमात्र सहारा खो दिया हो और अभी इससे उबरने की कोशिश भी शुरू नहीं की हो, पुलिस ने उसे ही बेटी की ह्त्या का जिम्मेदार ठहरा दिया. ऐसा करते वक्त पुलिस आरुषि के कातिलों से कम नहीं बल्कि कई गुना ज्यादा नृशंस हो गई. वो न तो वर्तमान आरोपियों कृष्णा और उसके दोस्तों की तरह शराब के नशे में थी और न ही उनकी तरह कम पढ़ी-लिखी ही थी. इसके बावजूद उसने एक आदमी को फांसी पर लटकाने और उसके और उसके नज़दीकी कई परिवारों को ज़िंदगी भर जिल्लत की ज़िंदगी जीने का इंतजाम कर दिया. अपनी कहानी को सही साबित करने के लिए पुलिस यहीं नहीं रुकी. बड़ों और ज़िंदों से निपटने के बाद उसने वक्त से बहुत-बहुत पहले दुनिया छोड़ने को मजबूर की गई १३ साल की बच्ची की ओर रुख किया. शायद होश में आने के बाद आरुषि के कातिलों को भी सुबह कुछ अपराधबोध हुआ होगा. मगर पुलिस ने जिस बेशर्मी से आधिकारिक और अनाधिकारिक रूप से उसके चरित्र की बखिया उधेड़ी उससे ज़रा भी संवेदनशील हर व्यक्ति का सर शर्म से झुक गया होगा.

नोएडा पुलिस को दिए अपने इकबालिया बयानों में मोनिंदर सिंह पंधेर और सुरेन्द्र कोली ने अपने अपराधों को कुबूल कर लिया था. बाद में सीबीआई ने पंधेर को इस मामले में क्लीन चिट दे दी और केवल कोली को दोषी ठहराया.

दरअसल उत्तर प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण शहर और राजधानी के मुहाने पर होने के बावजूद नोएडा में क़ानून व्यवस्था की स्थिति बेहद शोचनीय है. लूटमार और एकाध कत्ल को तो पुलिस शायद ही तनिक भी गंभीरता से लेती हो. ऐसा ही शायद आरुषि के मामले में हुआ. एक बच्ची का कत्ल होना पुलिस के लिए बेहद मामूली बात रही होगी और उसने इसकी जांच अपने स्थाई चलताऊ तरीके से शुरू कर दी होगी. वो तो अगले दिन जब हेमराज का भी शव छत पर पड़ा मिला तो मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया. जब पुलिस की काफी थुक्का फजीहत हुई और उस पर चौतरफा दबाव पड़ने लगा तो उसने निकृष्टता की सारी सीमायें लांघ दी.

तो अब जबकि सीबीआई ने तलवार, दुर्रानी और आरुषि पर लगाए सारे इल्जामों को खारिज कर दिया है, क्या नोएडा पुलिस के ही नहीं बल्कि राज्य स्तर के कई आला अधिकारियों पर सीआरपीसी की संगीन धाराओं के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए? क्या उन्हें उनके कुकृत्यों का उचित फल नहीं दिया जाना चाहिए? मगर पिछला अनुभव ये चुगली करता है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला.

2006 के आख़िरी दिनों में जब निठारी का मामला सामने आया था तो नोएडा पुलिस को दिए अपने इकबालिया बयानों में मोनिंदर सिंह पंधेर और सुरेन्द्र कोली ने अपने अपराधों को कुबूल कर लिया था. बाद में सीबीआई ने पंधेर को इस मामले में क्लीन चिट दे दी और केवल कोली को दोषी ठहराया. तब भी ये सवाल उठा था कि अगर सीबीआई सही है तो इसका मतलब पुलिस ने पंधेर को बेवजह फंसाने की कोशिश की थी. हालांकि इस मामले में सीबीआई की भूमिका संदेह से परे नहीं थी मगर यदि सीबीआई ने पंधेर को क्लीन चिट दी थी तो उसे पंधेर को फंसाने वाले पुलिस अधिकारियों पर कुछ तो कार्रवाई करनी चाहिए थी मगर उनसे पूछताछ तक नहीं की गई.

पिछले दिनों दिल्ली से बोरिया-बिस्तर उठा नोएडा में शिफ्ट होने की सोच रहा था. मगर अब लगता है कि वहां अपनी और परिजनों की सुरक्षा का मसला तो है ही साथ ही कोई हादसा होने पर पुलिस प्रशासन से कोई उम्मीद करना भी बेकार होगा. और मीडिया या दूसरे तरीकों से पुलिस पर यदि कोई दबाव बनवाया तो बौखला कर न जाने पुलिस मामले का ऊंट किस करवट बिठा दे. फिर लेने के बजाय उल्टे देने भी पड़ सकते हैं.

संजय दुबे

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