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संपूर्णता को अभ्यासरत

हर व्यक्ति एक महिला को बचाने के लिए चाकुओं से लैस चेन खींचने वाले एक पूरे के पूरे गिरोह को धराशायी नहीं कर सकता.

मगर हरेक के पास मार्शल आर्ट में ब्लैक बैल्टें भी तो नहीं होतीं.

पर ज़्यादातर लोगों के दो पैर होते हैं.

मगर पूरन के पास तो सिर्फ एक ही है.

उत्तर प्रदेश के रामपुर में जन्मे पूरन जब केवल पांच वर्ष के ही थे कि अपने सहपाठियों को एक ट्रक की चपेट में आने से बचाने के प्रयास में अपनी ही दांयीं टांग गवां बैठे. 24 साल के बाद वो कहते हैं कि हर तरह की प्रतिकूल परिस्थितियों ने उन्हें जो वो आज तक हासिल कर चुके हैं वैसा करने की प्ररणा दी. हार शरीर की नहीं दिमागी होती है और मैंने अपने दिमाग को कभी हारा हुआ महसूस नहीं होने दिया.

दुर्घटना के कुछ समय बाद ख़ुद को साबित करने की धुन में पूरन ने मार्शल आर्ट सीखने का फैसला किया. मेरे स्कूल के कोच ने मुझे प्रशिक्षित करने से इनकार कर दिया. जब मैं उनके पास पहुंचा तो मुझसे पूछा गया कि क्या मैं अपना दूसरा पैर भी खोना चाहता हूं. मैने इसे चुनौती की तरह लिया और खुद ही फिल्मों और किताबों के ज़रिये सीखना शुरू कर दिया., वो बताते हैं.

क्योंकि पूरन नहीं जानते थे कि किस चीज़ का कितना अभ्यास करना है इसलिए उन्होंने न केवल ज़रूरत से बहुत ज़्यादा अभ्यास किया बल्कि जूडो, कराटे, कुंगफू, तोइक्वाडों समेत मार्शल आर्ट्स की छ-छ विधाओं में निपुणता हासिल कर ली. लेकिन इन विधाओं की प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेना इन्हें सीखने से ज़्यादा टेढ़ी खीर साबित हुआ. मैंने एक पैर के साथ जीना काफी पहले सीख लिया था मगर लोग बजाए इसके कि मैं अपने एकमात्र पैर से क्या-क्या कर सकता हूं मेरे कटे हुए पैर के बारे में ही जानना चाहते थे, पूरन कहते हैं.

लेकिन हर तरह की प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी पूरन ने मार्शल आर्ट की विभिन्न विधाओं के राष्ट्रीय स्तर के करीब बीस मुकाबले अपने नाम कर लिए. साल 2001 में एक साउथ कोरियन कोच ने पूरन को एक ऐसी ही प्रतियोगिता के दौरान देखा. उनकी कला से प्रभावित हो उसने उनके साउथ कोरिया जाने और आगे के प्रशिक्षण का बंदोबस्त कर दिया. विदेश में एक साल के कठिन प्रशिक्षण के बाद पूरन ने असंभव को संभव कर दिखाया. उन्होने जूडो, कराटे, कुंगफू और ताइक्वांडो सभी में इनके सबसे ऊंचे मुकामों में से एक ब्लैक बैल्ट फिफ्थ डैन हासिल कर लिया.

मगर इतना कुछ करना भी पेट भरने के लिए काफी साबित नहीं हो पा रहा था. स्वदेश वापसी के बाद पूरन कुछ-कुछ निरुद्देश्य सा जीवन बिता रहे थे कि तभी एक महिला को लुटने से बचाने की घटना ने उन्हें दिल्ली पुलिस की निगाहों में ला दिया. उन्हें आला अफ़सरों द्वारा दिल्ली पुलिस को चुस्त-दुरुस्त बनाने की ज़िम्मेदारी संभालने को कहा गया. पुलिस को प्रशिक्षित करने के काम को पूरन राजधानी में बढ़ते अपराधों को कम करने में अपने योगदान के रूप में देखते हैं. पुलिस को ट्रेनिंग देना अपराधों से अप्रत्यक्ष रूप से निपटने जैसा है., वो गर्व के साथ बताते हैं. इसी दौरान पूरन को साहसिक कारनामों के लिए दिये जाने वाले देश के प्रतिष्ठित रेड एंड व्हाइट वीरता पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.

इसके बाद जो कुछ हुआ वो किसी परी कथा को पूरा करने जैसा था. नैशनल ज्यौग्राफिक ने उनके साहसिक कारनामे को सुन उन्हें सात अंकों वाली मार्शल आर्ट की एक श्रंखला सैवन डैडली आर्ट्स में एक महत्वपूर्ण भूमिका देने का फैसला किया. इस श्रंखला में पूरन ने मशहूर फिल्म स्टार अक्षय कुमार के प्रशिक्षक की भूमिका निभाई. प्रोग्राम ने अप्रत्याशित सफलता अर्जित की. मैंने एक अखबार में पढ़ा था कि कैसे इस शो ने मार्शल आर्ट्स के संस्थानों में प्रशिक्षुओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि कर दी और इसका श्रेय निस्संदेह पूरन को जाता है. लोग शायद उन्हें देख कर ये सोचते थे कि अगर पूरन एक टांग खोकर ऐसा कर सकते हैं तो वो दोनों पैरों के साथ ऐसा क्यों नहीं कर सकते?”, कहना है श्रंखला के निर्देशक योगेश साहू का.

भाग्य पूरन के साथ था. मनाली में सैवन डैडली आर्ट्स की शूटिंग के दौरान वो फिल्म निर्देशक अनिल शर्मा के संपर्क में आए जो उस समय अपनी फिल्म अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोबना रहे थे. पूरन की प्रतिभा से प्रभावित हो शर्मा ने न केवल फिल्म में उन्हें एक संक्षिप्त सा रोल दिया बल्कि उन्हें प्रतिष्ठित फाइट मास्टर टीनू वर्मा का सहायक भी बना दिया. जिस तरह के करतब उन्होंने दिखाए उसने मुझे भौचक्का कर दिया”, वर्मा याद करते हैं. तब से अब तक पूरन टीनू और महेन्द्र वर्मा के साथ बिग ब्रदर, टॉम डिक एंड हैरी और अपने सरीखी कई फिल्मों में काम कर चुके हैं.

घर पर पांच सालों से उनके सुख-दुख की सहभागी रहीं उनकी पत्नी मंजू उन्हें किसी हीरो से कम नहीं आंकतीं. वो कहती हैं,एक साधारण व्यक्ति जो अट्ठाईस जन्मों में भी नहीं पा सकता वो उन्होंने सिर्फ अट्ठाईस सालों में ही हासिल कर लिया है…उनके जैसा इस दुनिया में कोई है ही नहीं लेकिन चैन से बैठना और अपनी पुरानी उपलब्धियों के सहारे जीना पूरन को रास नहीं आता. वो एक ऐसी फिल्म बनाने की तमन्ना रखते हैं जिसका स्टंट्स के मामले में पूरी दुनिया में कोई भी सानी न हो. इसके अलावा वो जितने संभव हों उतने, शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों की, उनके सपनों को साकार करने में हरसंभव मदद भी करना चाहते हैं.

उनकी दृढ़ता और उपलब्धियों को देखकर उनके द्वारा ऐसी किसी भी आकांक्षा के पाले जाने और उसे पूरा करने को दूर की कौड़ी मानना सरासर ग़लत होगा.

संजय दुबे

फ़िल्म न होगी फ़्लॉप

चक्र सुदर्शन

ऐंट्री मिली भोज में, मज़ा मीडिया लीन,

चार बरस से सह रहे, अमर सिंह तौहीन।

अमर सिंह तौहीन, बुलावा मां का आया,

पल भर में ही पट्ठे ने, मतभेद भुलाया।

चक्र सुदर्शन, फेंकी पिछली डॉक्यूमेंट्री,

फ़िल्म होगी फ़्लॉप, मार दी ऐसी ऐंट्री।

                                       अशोक चक्रधर

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लेफ्ट और एतिहासिक भूलें

यह विडम्बना ही है कि अपने को जनता का प्रतिनिधि कहने वाली लेफ्ट पार्टियाँ हमेशा से ऐतिहासिक भूलें करती आयी हैं. बाद में वो इसे तहे-दिल से स्वीकार भी करती आई है. कुछ-कुछ इस शक्ल में कि ‘लो जी फिर से एक ऐतिहासिक भूल हो गई. अब क्या करें. हम करना तो कुछ और चाहते थे पर हो कुछ और ही गया.’ इस बार भी लेफ्ट से ऐतिहासिक भूल हो ही गई. आज नहीं (क्यूंकि बैठकों में काफी वक्त लगता है) पर कल जरूर लेफ्ट वाले यह सच सबके सामने स्वीकार करेंगे कि ‘लो जी एक और भूल हो गई’. पर उसमें अभी काफी समय है. 

बेचारे वह भी क्या करें. मार्क्स-लेनिन ने इतना लिख डाला है कि पढ़ते-पढ़ते तरुणाई में ही ऑंखें खराब कर लेते हैं. बाकी अनगिनत विचारक भी हैं. उनसे भी निपटना जरूरी होता है. आख़िर यही पढ़ाई तो उनकी ‘पूंजी’ है जिसके बल पर पोलित ब्यूरो में बैठकर राजनीति करने का हक उन्हें मिलता है. अगर जनता के बीच रहकर राजनीति कर रहे होते तो बाटा की हजारों चप्पलें घिसने के बाद भी शायद ही डिस्ट्रिक्ट कमिटी का चेहरा देख पाते. अब जब आँखों से साफ़ दिखाई ही न दे तो गलती तो होनी ही है. अभी कुछ दिन पहले ही एक पत्रकार बंधु कह रहे थे, ‘परिवर्तन इतनी तेजी से हो रहा है कि आपकी आंखें चुंधिया जाएंगी. समय बिल्कुल राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस की तरह भाग रहा है. प्लेटफार्म पर खड़े किसी व्यक्ति को सिर्फ़ इतना ही दीखता है कि कोई ट्रेन गुजर रही है. उसपर लिखी इबारत नहीं दिखती.’ यहां तो पहले से ही आँखों में मोतिआबिंद हुआ पड़ा है. ऐसे में क्या कुछ खाक दिखेगा.  देखियेगा कोई पांच साल बाद एक बयान आयेगा (आदत के मुताबिक) कि ‘लो जी एक और भूल हो गई’. कारण मैं पहले ही बता चुका हूं, आखिर लोकल कमेटियों से लेकर पोलित ब्यूरो तक कोई निर्णय लेने में इतना वक्त तो लगेगा ही.

पर उनकी ईमानदारी पर आप शक नहीं कर सकते. देखियेगा कोई पांच साल बाद एक बयान आयेगा (आदत के मुताबिक) कि ‘लो जी एक और भूल हो गई’. कारण मैं पहले ही बता चुका हूं, आखिर लोकल कमेटियों से लेकर पोलित ब्यूरो तक कोई निर्णय लेने में इतना वक्त तो लगेगा ही. उसपर पार्टी कोई एक राज्य में थोड़े ही ना है. तीन राज्यों में तो सरकार चला रहें हैं. उसपर थोड़ा बहुत आधार कुछ और राज्यों में भी है. कहीं आधार नहीं भी है तो क्या, पार्टी तो है. वहां की भी राय सुनी जानी जरूरी है. फिर पार्टी के भीतर वाद-विवाद और बहस-मुबाहिसा का वातावरण बरक़रार रखने के लिए अलग-अलग धडे भी हैं. आखिर इन सबको समेटने में वक्त तो लगता ही है.

खैर, तो बात हो रही थी ‘ऐतिहासिक भूल की’. लेफ्ट वाले यह समझकर सरकार को समर्थन दिए जा रहे थे कि सरकार कोई भी जन-विरोधी कदम नहीं उठा रही है. मंहगाई का क्या. गलोब्लाइजेशन का ज़माना है और मंहगाई ग्लोबल फिनोमिना है. कब तक रोक पायेगी सरकार. पेट्रोल-डीज़ल का दाम भी बढेगा. ग्लोबल वॉर्मिंग के ज़माने में फल-सब्जिओं और खाद्यान्न के दामों में तो आग लगेगी ही. कुछ भी है एक सेकुलर सरकार तो है. और इसे साम्राज्यवाद विरोधी भी बनाकर ही दम लेंगे. मनमोहन और चिदम्बरम पहले भले ही वर्ल्ड बैंक की गुलामी बजा चुके हों उन्हें अब ऐसा कभी नहीं करने देंगे. उन्हें भी थोड़ा ह्यूमन टच भर देने की जरूरत है. वे ख़ुद ही समझ जायेंगे. कुछ ऐसा ही मुगालता पाले बैठे थे हमारे लेफ्ट बंधू. कितने भोले हैं हमारे कर्णधार. इतने भोलेपन से पॉलिटिक्स करते हैं जैसे कोई बच्चा अपनी मां के साथ खेल करता है. चॉकलेट नहीं मिले तो रोने लगता है. मां भी उसकी हर अदा जानती है. प्यार से झिड़क देती है. इतने भोलेपन पर ही शायद विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा है: ‘इतने भोले मत बन जाना साथी, जैसे होते सर्कस के हाथी’. बेचारों को बिल्कुल नचा कर छोड़ दिया. चार साल तक  अपना मतलब भी साधा और फ़िर ठेंगा भी दिखा दिया. पर लेफ्ट वाले बेचारे इसमे क्या करें. उन्होंने तो जी भरके कोशिश की कि इनका हृदय परिवर्तन हो जाए. नहीं हो सका तो समर्थन वापस भी ले लिया. इससे ज्यादा क्या कर सकते थे.

अब अगर यह न्यूक्लियर डील हो जाती है. तो लेफ्ट की कोई जिम्मेदारी नही है. वो तो सरकार को अब समर्थन नहीं कर रहे. समाजवादी वाले इनके मुंहबोले भाई लोग कर रहे हैं. लालू-मुलायम को कितना चाहते थे बेचारे. क्या-क्या नहीं किया इनके लिए. दुनिया भर की तोहमतें लीं. फिर भी वे धोखा देकर कांग्रेस के खेमे में चले गए. और शुक्र है कि अभी तक कांग्रेस के खेमें में है. वह भी लेफ्ट की वजह से, नहीं तो बीजेपी के खेमें में चले जाते तो क्या कर लेते. लेफ्ट का पढाया पाठ कि साम्प्रदायिकता बहुत बड़ा खतरा है, उन्हें याद रह गया है. आखिर सब कुछ भूलने में वक्त तो लगता ही है. वरना हो सकता है कि वह सीधे बीजेपी के खेमे में ही चले जाते. आख़िर अमर सिंह ने तो कह ही दिया, सुरजीत साहब की दिली इच्छा थी कि वह कांग्रेस के नजदीक आ जायें सो वो आ गए. कुछ अलग थोड़े ही कर रहे हैं. सुरजीतवाद को ही अपना रहे हैं.

यह भी कम बड़ी विडम्बना नहीं है कि लेफ्ट बंधु जिस चीज़ को पानी पी पी के कोसते हैं वह होकर ही रहता है. बीजेपी को इतना कोसा कि उनकी सरकार तक बन गई. सांप्रदायिकता के नाम पर क्या क्या और किस-किस से समझौता नहीं किया. पर जितना उसे कमजोर करने की कोशिश करते हैं. मजबूत होती जाती है. अभी देखिये. कांग्रेस को समर्थन दिया था कि बीजेपी शासन से दूर रहे पर उसके कदम साउथ ब्लॉक की तरफ बढ़ते ही जा रहे है. अब डील के पीछे पड़े हैं मगर वह भी होकर ही रहेगी. लेफ्ट की छवि भी कुछ उलटी बन गई है. अब तो खाए पिए लोग यह सोचने लगे हैं कि लेफ्ट वाले विरोध कर रहे हैं तो जरूर वह देश के हित में होगा. भाई -बंधुओं को इसपर भी जरा विचार करना होगा. 

कितने मौके आए जब सरकार गिरा सकते थे पर नहीं बीजेपी आ जाएगी का भय दिखाते रहे. कुछ कुछ उस आदमी की तरह जो झूठमूठ हॉल मचाता था कि शेर आया. लोग दौड़-दौड़कर परेशान. और जब शेर आया तो कोई भी साथ में नही था. यही हाल हो गया बेचारों का. तीसरा मोर्चा का बनता पतीला फ़िर लुढ़क गया. और बेचारे अकेले खड़े हैं. कुछ कुछ उन्ही अभिशप्त आत्माओं की तरह जो अकेले रहने को अभिशप्त हैं.

हो सकता है पाँच साल वाद वाले बयान में यह भी आए, कि हमने सरकार को समर्थन देना ही नहीं था. यह भी एक ऐतिहासिक भूल थी.

मृत्युंजय प्रभाकर

माया से मुलायम मालामाल

औघट घाट

घाटे पानी सब भरे औघट भरे न कोय।

औघट घाट कबीर का भरे सो निर्मल होय।। 

तो कौन जीता साधो! मई दो हजार चार की एक शाम कॉमरेड सुरजीत के साथ यूपीए की बैठक में बिना बुलाए आए अमर सिंह को बाहर करने वाली सोनिया गांधी? या अब अमेरिका से लौटे और सरकार को बचाने के लिए पलक पांवड़े पर लाए गए अमर सिंह? तुम कहते हो कि जो आखिर में जीतता है वही विजेता कहलाता है. अंतिम विजय हमारी होगी इसीलिए गाया जाता है. लेकिन इस सौदेबाजी का तो अंतिम विजेता कोई नहीं होना है साधो. इस में तो सब हारने वाले ही हैं. जैसे महाभारत में सब हारे थे. वह कृष्ण भी जिसने यह भारत करवाई, लड़ी, जीती और फिर हार गए. ऐसी राजनीति के खेल में साधो सब हारते ही हैं, जीतता सिर्फ स्वारथ है. क्योंकि अपना स्वार्थ ही सबसे बड़ी राजनीति है.

सोनिया गांधी ने उन्हीं अमर सिंह और मुलायम सिंह से हाथ मिलाया जिन्हें वे अपने दर पर फटकने भी नहीं देती थीं. तुम कहते हो कि हमें जानकारी है कि अमेरिका ने हाथ मिलवाए. मिलवाए कोई भी मिलाए तो सोनिया गांधी ने ही. उन्हें ही अपनी सरकार बचानी थी. सरकार बच गई तो उनका स्वारथ पूरा होगा. प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर के उनने जो भी पुण्याई कमाई थी वह मनमोहन सिंह और अमेरिका से एक समझौते पर लुटा दी. साधो जैसी कमाई होती है वह वैसे ही कामों में गंवाई जाती है. अमर सिंह जैसे ख्यातनाम दलाल से सौदा कर के समझौता करने वाली सोनिया  गांधी पर कौन भरोसा करेगा साधो! तुम करोगे? अगले चुनाव में वोट देने लाइन में खड़े होगे? नहीं ना

अमर सिंह ने न सिर्फ चार साल बाद अपमान का बदला ले लिया है बल्कि इसका भी इंतजाम कर लिया है कि उनके सभी रुके हुए कामकाज हो जाएंगे. मुलायम सीबीआई के फंदे में फंसे हुए थे. आमदनी से कहीं ज्यादा जायदाद बनाने के मामले में उनकी गरदन फंसी हुई थी. उधर यूपी में मायावती भी जान के पीछे पड़ी हुई थीं. अमर सिंह ने क्या रास्ता निकाला कि लोकहित और राष्ट्रहित में अपने सारे मामले भी निपट गए और लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस पीछे चलने को तैयार रहेगी. अगर अमेरिका से समझौता हो गया तो देश के पैसे वाले चुनाव में सच्चे समाजवाद की अटैची पर अटैचियां चढ़ा देंगे. अपने देश के उद्योग-व्यापार के लाड़ले बरने का शानदार मौका मिला है.ऐसे ही अमर सिंह के भाग से छींका टूटता है. टूटा है तो अब पूरा फायदा उठाओ. लोक बनाओ परलोक भी बनाओ. साधो, कहीं तुम भी तो अब समाजवादी पार्टी में नहीं जा रहे हो

मुलायम सिंह यादव की भी अच्छी गत हुई साधो. लंगोट बांध के पहलवानी औऱ समाजवाद करने वाले लोहिया के इस पट्ठे ने क्या दांव मारा है. यूपी में मायावती चित्त और देश भर में वामपंथी उलाल. बहुत उपदेश देते थे कि हम कहीं भाजपा के साथ न हो जाएं. देख लो अब कौन किसके साथ खड़ा है. अमेरिका से समझौते पर भाजपा के साथ विरोध में वामपंथी खड़े हैं. अरे भाई कांग्रेस सबसे बड़ी शत्रु है या सांप्रदायिकता? सांप्रदायिकता के खिलाफ तो हम खड़े हैं. भाजपा हमारे सामने है और वामपंथी उसके साथ बगल में खड़े हैं. लोहिया जी सत्ता के लिए गैरकांग्रेसवाद का नारा लगाते थे. सत्ता के लिए अब कांग्रेस के साथ होना जरूरी है. सत्ता मायावती छीन रही है साधो! समाजवाद को मायावती से बचाना है.

प्रभाष जोशी

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'वो मुरली देवड़ा नहीं, मुरली मुकेश मित्तल हैं'

समाजवादी पार्टी के अचानक इस यू टर्न का कारण?

चार साल से इस सरकार को समर्थन देने के बावजूद हमारा इसके साथ किसी भी तरह का संवाद नहीं था. औपचारिक और ही अनौपचारिक. और मैं तो कहूंगा कि इस समर्थन को सरकार ने मान्यता तक नहीं दी थी. मगर डॉ. मनमोहन सिंह से मेरे हमेशा से अच्छे व्यक्तिगत संबंध रहे हैं. ये बात अलग है कि उन्होंने कभी इसका ढिंढोरा पीटा और मैंने. यूपीए सरकार को समर्थन देने की वजह से मुझे हर साल होने वाले यूपीए के रात्रिभोज में निमंत्रित किया जाता रहा सिवाय एक बार केजिस साल चुनाव हुए थे और जब संबंधों में बहुत कड़वाहट थी.

इस साल जब मुझे और बहुजन समाज पार्टी को निमंत्रण मिला तो मैं जानबूझकर जल्दी नहीं पहुंचा, किसी अहं या पूर्वाग्रह की वजह से नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि मेरे पास जश्न मनाने की कोई वजह नहीं थी. फिर भी मैंने अपनी पार्टी के स्तर पर फैसला लिया कि हम सभी जाएंगे क्योंकि प्रधानमंत्री सिर्फ हमारे मित्र हैं बल्कि एक शालीन और आदरणीय व्यक्ति भी हैं. जब मैं पहुंचा तो भोज खत्म हो चुका था और मीठा परोसा जा रहा था. मैंने देखा कि प्रधानमंत्री के बगल में येचुरी के साथ रखी गई मेरी सीट पर डॉ कर्ण सिंह बैठे थे. मैं डरतेडरते दूर एक कोने में बैठ गया कि कहीं राजीव शुक्ला के जैसा कोई व्यक्ति मुझसे जाने के लिए कह दे. मैं भयभीत, सशंकित और असहज था और एक तरह से देखा जाए तो राहत भी महसूस कर रहा था कि मेरी सीट भरी हुई है और जैसे मैं चुपचाप आया हूं वैसे ही चुपचाप चला भी जाउंगा. मगर फिर अचानक ही मैंने प्रधानमंत्री को अपनी तरफ आते हुए देखा. वे मेरी बगल में बैठ गए और जब तक मैंने खाना नहीं खाया वहां से हिले नहीं. उन्होंने कहा, , “हमारा सम्मान पारस्परिक है.और ये खबर बन गई. मैंने प्रधानमंत्री को बताया कि उनकी सरकार ने किसी भी मुद्दे पर कभी भी मुझसे सलाहमशविरा नहीं किया और अगर सरकार को लगता है कि एक राजनीतिक पार्टी होने के नाते वो हमारे साथ कोई बातचीत करना चाहती है तो मैं इसके लिए तैयार हूं.

इसके बाद मैं अपने इलाज के सिलसिले में 20 दिन के लिए अमेरिका चला गया और बात आईगई हो गई. जब मैं लौटा तो मुझे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन का फोन आया जो मुझसे मिलना चाहते थे. समय और तिथि तय की गई और जब नारायणन को आना था तो उससे ठीक पहले ही जसवंत सिंह मुझसे और मुलायम सिंह से मिलने पहुंचे. मैं जसवंत सिंह या आडवाणीजी से मिलने से इनकार नहीं कर सकता क्योंकि अगर वे मुझसे मिलने आते हैं तो ये एक सम्मान की बात है. राजनीति में विरोध का मतलब दुश्मनी बन गया है. मगर विरोधी अच्छे दोस्त भी हो सकते हैं. अरुण जेटली मेरे अच्छे दोस्त हैं. जसवंत सिंह दोस्त तो नहीं हैं पर मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूं. मैंने नारायण को सूचित किया कि जसवंत सिंह भी यहां मौजूद हैं और मीडिया के काफी लोग भी जमा हो गए हैं इसलिए उन्हें बैठक मीडिया की नजरों से दूर किसी जगह पर रखनी चाहिए. जसवंत सिंह ने मुझे ध्यान दिलाया कि कभी मुझे उन्होंने एक प्रस्ताव दिया था जिसमें उन्होंने कहा था कि इस इतावली सरकार से मुक्ति पाने के लिए भाजपा और वामदल यूएनपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे सकते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कभी भाजपा और वामदलों ने वीपी सिंह सरकार को समर्थन दिया था. इसका मतलब था मुलायम सिंह का प्रधानमंत्री बनना क्योंकि हमारे पास सबसे ज्यादा सांसद थे.

और आपने इसे ठुकरा दिया? जसवंत सिंह का कहना है कि यूएनपीए ये तय नहीं कर सका कि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कौन हो?

यद्यपि कांग्रेस के साथ हमारे रिश्ते अच्छे नहीं थे इसके बावजूद हमने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया. हमने जयललिताजी से कहा कि वो आडवाणीजी और जसवंत सिंहजी को बतायें कि हम राष्ट्रपति पद के लिए भैरों सिंह शेखावत का समर्थन नहीं कर सकते क्योंकि हमारी विचारधारा अलग है. हमने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष सरकार को अस्थिर नहीं करेंगे और इसलिए हमने आडवाणीजी और जसवंत सिंहजी से मुलाकात नहीं की.

मगर जसवंत सिंह ने साफ कहा कि यूएनपीए में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं बन पाई?

उन्होंने हमसे कहा कि अगर हम ये सोच रहे हैं कि भाजपा और वामदल साथ नहीं आएंगे तो हम गलत हैं. उनका कहना था कि इतालवी सरकार को हटाने के लिए भाजपा, वामदल और बसपा साथ चुके हैं. मैंने उनकी बात सुनी और कहा कि ये मुमकिन नहीं है, हम इसमें शामिल नहीं होंगे. हमारी कड़वाहट और नाराजगी अलग बात है मगर राजनीति में इस तरह की अस्थिरता पैदा करना ठीक नहीं है. हमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से मिलना था तो मैंने जसवंत सिंह से परमाणु समझौते पर उनके रुख के बारे में पूछा. मैंने कहा कि उन्हें इसका समर्थन करना चाहिए क्योंकि भाजपा के बारे में माना जाता है कि वो अमेरिका की तरफ झुकाव रखती है.

नारायण ने हमें एकएक बात की जानकारी दी. समाजवादी पार्टी की बुनियादी चिंता ईरान के साथ संबंधों को लेकर थी. नारायणन ने हमें बताया कि वे उसी दिन ईरान से होकर आए हैं और ईरानपाकिस्तानभारत गैस पाइपलाइन योजना रुकी नहीं है. उन्होंने ये भी बताया कि अमेरिका चाहे कुछ भी कहे हम उस पर ध्यान नहीं देने वाले और हमारी विदेश और परमाणु नीति एक संप्रभु राष्ट्र की तरह रहेंगी. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं इससे संतुष्ट हूं. मैंने उन्हें बताया कि ये सवाल मेरे संतुष्ट होने का नहीं है. मैंने उनसे कहा कि मैं मीडिया को इस बैठक के बारे में बताना चाहूंगा. सामान्य परिस्थितियों में मैं ऐसा नहीं करता क्योंकि राजीव शुक्ला और सुब्बारामी रेड्डी जैसे मित्रों की तरह मैं दूसरों की सफलता का श्रेय बटोरने में विश्वास नहीं रखता. मेर काम करने का तरीका ऐसा नहीं है. मगर मेरे जुनून के पीछे एक कारण था. मैं सारी दुनिया, समाज और देश को बताना चाहता था कि पहली बार हमसे औपचारिक तौर पर सलाहमशविरा किया गया है. ये दो जुलाई यानी यूएनपीए की तीसरी बैठक से सिर्फ एक दिन पहले की बात है. मैंने नारायणन से कहा कि मैं मीडिया के जरिये प्रधानमंत्री के सामने सवाल रखूंगा और उम्मीद करूंगा कि वे मीडिया के माध्यम से ही मुझे और राष्ट्र को जवाब दें. ईमानदारी से कहूं तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि जवाब मिलेगा. इस सरकार ने चार साल से मुझसे कुछ नहीं पूछा. एक बार मैं अपने मित्र दिग्विजय सिंह के घर गया था क्योंकि उन्हें मुझसे कुछ काम था. बाद में मैंने सुना कि मुझसे मिलने के लिए उनकी खिंचाई हुई थी. लोग मुझे बताया करते थे कि अगर कोई कांग्रेसी अमर सिंह की संगति में दिख जाए तो उसे झाड़ पड़ जाती है. इसलिए मुझे कोई उम्मीद नहीं थी. मगर दो घंटे के भीतर ही मेरे हर सवाल पर प्रधानमंत्री कार्यालय से बिंदुवार सफाई हाजिर हो गई. ये इस बात को दर्शाने के लिए पर्याप्त था कि प्रधानमंत्री किसी पार्टी या गुट का नहीं होता, वह सारे देश का प्रधानमंत्री होता है और खासकर जब वो मनमोहन सिंह जैसे कद का व्यक्ति हो

मगर चूंकि हमारा गठबंधन इस राष्ट्रीय मुद्दे पर कांग्रेस के विरोध में था इसलिए मैंने अगले दिन यूएनपीए की बैठक बुलाने का फैसला किया. मेरे ज्यादातर साथियोंजिनका मैं नाम नहीं लेना चाहता क्योंकि वे सभी मित्र हैं और मुझे नहीं पता कि राजनीति में कल क्या हो जाएका कहना था कि मैं क्यूं असमंजस की इस स्थिति को सुलझाना चाह रहा हूं, ये कांग्रेस की समस्या है. मैंने कहा कि मैं इसे दूसरी तरह से देखता हूं. समझौता भारत और अमेरिका के बीच हुआ है और मुझे इस बारे में आश्वस्त होने की जरूरत है कि ये देश के हित में है या इसके खिलाफ. अगर ये हित में है तो हमें इसका समर्थन करना चाहिए और अगर हित के खिलाफ है तो और भी आक्रामक होकर इसका विरोध करना चाहिए

ओमप्रकाश चौटाला ने प्रस्ताव दिया कि हम सबको इस सिलसिले में एपीजे अब्दुल कलाम से मिलना चाहिए. सबने इस पर सहमति जताई क्योंकि उन्हें भारत रत्न मिल चुका है और कोई नहीं कह सकता कि वे यूपीए के आदमी हैं. कलाम ने हमें बताया कि ये समझौता देश के लिए अच्छा है. मैं दुविधा में था क्योंकि हमने समझौते का विरोध किया था, मगर अहं की लड़ाई में उलझे रहने का कोई मतलब नहीं था. मैंने कलाम से पूछा कि क्या मैं उन्हें उद्धृत कर सकता हूं और वे उदारता दिखाते हुए इस बात के लिए मान गए.

आप ने समर्थन तो दे दिया है मगर ये तो बताइये कि इस डील के पीछे कौन सी डील है?

समस्या ये है कि छोटे लोगों को बड़ी जगहों पर बैठा दिया गया है और हर चीज को भौतिकतावाद की नजर से देखा जा रहा है. कोई यकीन करने को तैयार ही नहीं कि हमने ऐसा किसी लालच या सत्तालोभ की वजह से नहीं किया है. ये जानकर कि हम अनजाने में ही खुल्लमखुल्ला गलत रास्ते पर चल रहे थे, हम खुद को काफी क्षुद्र महसूस कर रहे थे. मुलायम सिंह एक बहुत सीधे इंसान हैं. उन्होंने कहा कि तीसरा मोर्चा हो या कोई अन्य मोर्चा, तभी बनेगा जब देश रहेगा. अगर हम देश के हित के साथ ही समझौता करने लगेंगे तो राजनीति और राजनेता कहां जाएंगे? ये हमारे लिए एक ऐतिहासिक भूमिका निभाने का मौका है.

पर कलाम तो ये पहले भी कह चुके थे. उन्होंने आपको कोई नयी बात नहीं बताई.

बतौर राजनेता हमारी प्राथमिकताएं और फोकस इस पर नहीं था. यहां तक कि यूपीए तक ने इसका इस्तेमाल नहीं किया. मनमोहन सिंह ने जो कहा उसमें भी कोई नयी बात नहीं थी. मगर मेरी कोशिशों से ये सारा मुद्दा केंद्र में आया.

इसीलिये तो लोगों के लिए इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि समाजवादी पार्टी अचानक ही देशहित में कांग्रेस को समर्थन देने लगी है.

लोग जो चाहे सोचें मगर मुद्दे को इतने उचित तरीके से केंद्र में कभी नहीं रखा गया. कलाम के प्रमाणपत्र के बाद ये देखना काफी पीड़ादायक था कि समझौते को हिंदू बनाम मुसलमान का रंग दिया जा रहा है. सीपीएम पोलित ब्यूरो के एक सदस्य और मायावती ऐसी बातें कर रहे थे. ये बड़ी खराब बात थी. इसलिए हमने अपना फैसला लिया और मनमोहन सिंह और सोनिया जी को सूचित किया कि हम देशहित में इस समझौते का समर्थन करेंगे. जाइये और कांग्रेस से पूछिए, सोनिया गांधी और उनके प्रतिनिधियों से पूछिए.

'मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है'

रजत शर्मा को टेलीविज़न शो ‘आप की अदालत’ से पहले बतौर अखबारी पत्रकार कम ही लोग जानते थे। 16 साल बाद, आज उनका खुद का न्यूज़ चैनल टीआरपी की दौड़ में सबसे आगे है। हरिंदर बवेजा के साथ बातचीत में शर्मा ने सफलता के अपने ही तरीकों से लेकर अपने प्रतिद्वंदियों तक पर बेबाकी से अपने विचार रखे।

आखिरी पायदान से शीर्ष तक का सफर…अपनी यात्रा के बारे में कुछ बताएं?

बहुत मुश्किलों भरी थी ये. आज से चार साल पहले जब मैंने इंडिया टीवी शुरू करने का फैसला किया था तब मेरे दोस्तों ने मुझसे कहा कि मैं एक ऐसे बाज़ार में छलांग लगाने जा रहा हूं जो पहले से ही खचाखच भरा हुआ है। एनडीटीवी, स्टार, आज तक, ज़ी, सहारा और डीडी जैसे न्यूज़ चैनल पहले से ही स्थापित थे। लेकिन मेरा विश्वास उन दर्शकों पर था जिन्होंने मेरे पूरे टेलीविज़न करियर के दौरान मेरा साथ दिया था। मुझे यकीन था कि अगर मैं अपना चैनल शुरू करता हूं तब भी वे मेरा साथ देंगे। इसमें काफी समय और ऊर्जा लगी। इस दौरान कई डरावने पल भी आए, जब मुझे लगा कि शायद मैं इसे कर ही न पाऊं। तीन मौकों पर मुझे तनख्वाहें देने के लिए अपनी संपत्ति तक को बेचना पड़ा। 20 सालों के करियर में मैंने जो भी कमाया था वो सब धीरे-धीरे गायब होने लगा। लेकिन परिस्थितियां बदली। जब पहला विदेशी निवेशक सामने आया तो उसने कंपनी की कीमत 300 करोड़ आंकी, अगले ने 600 करोड़ और अब निवेशक इसे 1000 करोड़ का बताते हैं। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि संकट के जो पल थे उनसे गुज़रना बेकार नहीं गया।

आज तक और स्टार जैसे अपने निकट प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने का आपका फार्मूला क्या है?

मैं अपनी संपादकीय टीम से कहता रहता हूं कि टीवी का दर्शक वर्ग किसी क्रिकेट के खेल की तरह होता है। एक समय था जब टेस्ट मैच काफी पसंद किए जाते थे, गावस्कर हीरो थे। इसके बात सीमित ओवरों के क्रिकेट का जमाना आया और कपिल के रूप में नया सितारा चमका। अब ज़माना टी-20 का है। आज मैं ये थोड़े ही कह सकता हूं कि मुझे सुनील गावस्कर बन कर टी-20 खेलना है। ‘काँटेंट’ को समय के साथ बदलना ही होता है फिर भले ही इसमें मीडिया के दूसरे साथियों की आलोचना क्यों न झेलनी पड़े। हमारे प्रतिस्पर्धी इसे लोकप्रियता की होड़ का नाम दे सकते हैं लेकिन हमारा असल सरोकार तो दर्शक से ही होता है। अगर दर्शक टी-20 देखना चाहते हैं तो मैं उन्हें टेस्ट मैच थोड़े ही दिखा सकता हूं।

आलोचनाओं पर आते हैं…हिंदी चैनलों की सबसे ज्यादा आलोचना इस बात के लिए हो रही है कि उनकी काँटेंट का स्तर काफी गिर गया है।

नहीं, ऐसा नहीं है। हमने न्यूज़ की परिभाषा बदल दी है। अगर लोग आज भी सोचते हैं कि फीता काटते नेता और संसद में भाषण देना ही ख़बर हैं तो वो दिन बीत गए। हिंदी के न्यूज़ चैनलों पर आरोप लग रहे हैं लेकिन अगर आप सभी बड़े अख़बारों के मुखपृष्ठ पर नज़र डालें तो आपको आईपीएल नज़र आएगा। सच्चाई ये है कि दो शीर्ष साप्ताहिक पत्रिकाएं भारतीय महिलाओं की यौन अभिरुचियों पर कवर स्टोरी छाप चुकी हैं, लेकिन उन्हें तो कोई कटघरे में खड़ा नहीं करता। तहलका को छोड़कर, जो कि एक अपवाद रहा, लगभग सभी लोकप्रिय पत्रिकाओं में आईपीएल को प्रमुखता दी गई। अगर आप पुरानी परंपरा के हिसाब से चलेंगे तो इस हफ्ते की कवर स्टोरी महंगाई होनी चाहिए थी। इसी तरह से टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों की भी विषयवस्तु बदल गई है।

राजनीतिक तबके के विचारों की आप किस हद तक परवाह करते हैं?

बहुत ज्यादा। जिस तरह से राजनेता लोगों के प्रति जवाबदेह हैं उसी तरह हम भी हैं। हमारा काम ही है राजनीतिज्ञों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना। इसी सोच से प्रेरित होकर “आप की अदालत” का जन्म हुआ था। आज 16 साल बाद भी ये प्रोग्राम उतना ही पसंद किया जाता है। इंडिया टीवी इसी फॉर्मूले पर आधारित है। इसकी कोशिश है कि लोग जनता के प्रति जवाबदेह बनें, चाहे वो राजनेता हों, फिल्म स्टार हों या फिर क्रिकेटर।

अगर मैं ये कहूं कि इंडिया टीवी भूत-प्रेत का पर्याय बन गया है तो आप क्या कहेंगे?

ये छह महीने पहले की बात है। उसके बाद से हमने भूत-प्रेत की एक भी कहानी नहीं दिखाई है।

लेकिन आपने टीआरपी की सीढ़ियां चढ़ने के लिए इसका सहारा लिया है।

नहीं, हमने ऐसा नहीं किया। उन दिनों इसी तरह की कहानियां आती थीं। और लोग इन्हें पसंद करते थे। उदाहरण के लिए पिछले हफ्ते हमने पाया कि 51 फीसदी दर्शकों ने इंडिया टीवी देखा क्योंकि हमने विष्णु का इंटरव्यू दिखाया था, जो कि पहले राजेश तलवार के यहां काम करता था। हमारे रिपोर्टर ने उसे नेपाल में कहीं ढूंढ़ निकाला था। पिछले हफ्ते हमें रेटिंग में सबसे ऊपर जगह मिलने की वजह रही आरुषि हत्याकांड पर हमारी विस्तृत कवरेज। इसमें भूत-प्रेत या सांप-नागिन की कोई भूमिका नहीं थी। किस्मत से दूसरे ख़बरिया चैनलों ने वही पुराना फॉर्मूला अपनाया। शाहरुख ख़ान के शो पांचवीं पास… में लालू प्रसाद यादव मेहमान बन कर आए। ये राजनीति और मनोरंजन का शानदार मेल था। हम लोगों की पसंद के मुताबिक चल रहे हैं।

आप ख़बरों के बाज़ार में हैं या मनोरंजन के?

हम सिर्फ और सिर्फ ख़बरों के बाज़ार में हैं। मगर इन दिनों मनोरंजन भी बड़ी ख़बर बन गया है। समय बदल रहा है। आईपीएल क्रिकेट है, मनोरंजन नहीं। लालू एक राजनेता हैं, जनता के प्रतिनिधि, आप उन्हें मनोरंजनकर्ता नहीं कह सकते। इंडिया टीवी एक न्यूज़ चैनल है, आप इसे मनोरंजन चैनल नहीं कह सकते।

सामाजिक जिम्मेदारियों पर क्या कहेंगे? क्या इंडिया टीवी खैरलांजी में हुई हत्याओं पर कोई अभियान चलाएगा?

इंडिया टीवी अकेला चैनल है जिसने अभियानों को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में चलाया है। मैं आपको तमाम उदाहरण दे सकता हूं। मैं विनम्रता से कुछेक के बारे में आपको बताता हूं। एक जादूगर बच्चे को हर महीने 60,000 रूपए का एक इंजेक्शन लगना था। हमारी स्क्रीन पर एक अपील तीन घंटों तक प्रसारित हुई और इसके बाद चेकों की बरसात होने लगी। मुंबई में अनाथ बच्चों के लिए एक सामाजिक संस्था थी। एक दिन भवन के मालिक ने उन्हें निकाल फेंकने का फैसला कर लिया। इंडिया टीवी वहां पहुंचा और वहां से सीधा प्रसारण शुरू कर दिया। अंतत: मालिक को अपना फैसला बदलना पड़ा। जब पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की घोषणा की गई, हम दिन भर दिखाते रहे कि इस बढ़ोत्तरी का लोगों पर क्या असर पड़ने वाला है। जब भी सामाजिक, राजनीतिक या फिर दर्शकों के हितों के लिए लड़ने की बात आएगी दर्शक हमेशा हमारी जिम्मेदारी को महसूस करेंगे। इसीलिए इंडिया टीवी ने अब अपनी टैग लाइन बनाई है “आपकी आवाज़”। जनता की आवाज़ बनना ही हमारा लक्ष्य है।

लेकिन ये बात तो सच है कि टीआरपी की लड़ाई में अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने के लिए इंडिया टीवी ने भूत प्रेत का सहारा लिया?

इंडिया टीवी ने समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को बदला है। एक समय था जब हमने उड़ीसा के एक गांव में चुड़ैल के घूमने की ख़बर दिखाई थी। हमने अपने दर्शकों को खबर के माध्यम से बताया कि ये महज़ अंधविश्वास है।

लेकिन इस बात से तो आप सहमत होंगे कि ये कोई ख़बर नहीं है?

ये खबर ही है। मान लीजिए ठाणे में ये अफवाह है कि वहां कोई भूत घूम रहा है जो लोगों की हत्या कर रहा है। हम लोगों को बताते हैं कि ये कोई भूत नहीं है बल्कि कोई हत्यारा है जो ऐसा कर रहा है। हम इस तरह की ख़बरें लोगों को जागरुक करने के लिए दिखाते हैं।

आप कह रहे हैं कि लोग जो चाहते हैं आप वही दिखाते हैं। पर आप को नहीं लगता कि आपको खुद भी एक मानक स्थापित करने की जरूरत है?

इस देश का एजेंडा क्या है? क्या ये सिर्फ नेताओं को गाली देते रहना है? क्या सिर्फ लंबे-लंबे भाषण और फीते कटते हुए दिखाए जाएं? हमने मानक तय किए हैं। आज मैं आपसे पूरे गर्व के साथ ये कह सकता हूं कि हमारे पीछे सात चैनल हमारे नक्शेक़दम पर चल रहे हैं। वे हमारी काँटेंट ही नहीं बल्कि चैनल को प्रमोट करने का तरीका भी अपना रहे हैं। ये चैनल हमारे ग्राफिक्स, सेट्स, संगीत और विजुअल्स…सब की नकल कर रहे हैं। आज हम ट्रेंडसेटर बन चुके हैं। इसी वजह से हमें इतनी संख्या में लोग पसंद कर रहे है, लोग असल को देखना पसंद करते हैं, नकल नहीं।

क्या आपका कोई फॉर्मूला है?

मैं अपने संपादकीय दल के साथ रोज़ाना होने वाली बैठकों में कहता हूं कि “जाओ और खुद को झोंक दो”। ऐसी स्टोरी मत करो जिससे मुझे, चीफ प्रोड्यूसर को या तुम्हें खुशी मिलती हो। ऐसा करो कि जिससे दर्शकों को खुशी मिले। यही मेरा फॉर्मूला है। दर्शक के लिए करो, उनके लिए बोलो।

आपके पास न्यूज़ और इन्वेस्टिगेशन के लिए लंबा-चौड़ा बजट है।

जब हमने इन्वेस्टिगेशन पर ध्यान देना शुरू किया तो हमारे ऊपर “स्टिंग चैनल” का ठप्पा लग गया। जब हमने इसे रोक दिया तो लोग कहने लगे, रोका क्यों? ये तेज़ी से बढ़ने, नंबर वन होने की दुश्वारियां हैं। पिछले साल हमारी तरक्की की रफ्तार 110 फीसदी रही। हमारे प्रतिद्वंदियों की रही महज़ 2-4 फीसदी। लोग इस फॉर्मूले को जानना चाहते हैं। फार्मूला ये है कि मैं दिन में 18 घंटे अपने न्यूज़रूम में ही बिताता हूं, मैं अभी भी स्टोरी लिखता हूं। मैं गर्व से कह सकता हूं कि इस देश में ऐसा कोई नहीं है जो एक चैनल का मालिक होते हुए भी स्क्रिप्ट लिखता हो और तीन घंटे की प्रोग्रामिंग और प्रोमोज़ भी करता हो।

शक्ति कपूर के स्टिंग ऑपरेशन की ये कह कर आलोचना हुई थी कि ये लोगों के निजी  जीवन में ताकाझांकी थी। आपको लगता है कि वो एक ग़लती थी?

नहीं, मुझे इस पर फख्र है। पिछले हफ्ते हमारे एक प्रतिद्वंदी ने कास्टिंग काउच पर एक कार्यक्रम चलाया। छह महीने पहले ही पूर्व में नंबर एक रहे एक चैनल ने भी इसे उठाया था। मुझे फिल्म इंडस्ट्री या फिर मीडिया की तरफ से होने वाली आलोचनाओं की चिंता नहीं थी। मेरे ख्याल से ये फिल्म इंडस्ट्री में आने को लालायित युवा लड़कियों को चेतावनी देने के लिए उठाया गया एक सही क़दम था।

आपको टीआरपी के लिए कुछ भी करने और व्यावसायिक सफलता की अंधी दौड़ में ख़बरों को दरकिनार करने का दोषी ठहराया जा सकता है।

मेरी रुचि कभी भी व्यावसायिक सफलता पाने में नहीं रही। मुझे पैसे ने कभी आकर्षित नहीं किया। लोगों का प्यार और लोकप्रियता ही हमेशा से मेरी कमज़ोरी रही हैं।

आपको नहीं लगता कि आपने “काँटेंट” का स्तर गिरा दिया है?

बिल्कुल नहीं। अगर हमारी सामग्री इतनी घटिया है तो फिर बाकी सात चैनल इसकी नकल क्यों कर रहे हैं? जब भी लोग मुझसे टीआरपी की दौड़ में शामिल होने के बारे पूछते हैं तो मुझे बहुत आश्चर्य होता है। क्या आप सचिन तेंदुलकर से कभी पूछते हैं कि वो इतने सारे रन क्यों बनाते हैं? मेरा काम एक ऐसे चैनल की स्थापना है जो रेटिंग्स में शीर्ष पर हो। इस पर मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है।

आज तक, स्टार न्यूज़ जैसे प्रतिस्पर्धियों में आपको क्या अच्छा लगता है और वो क्या चीज़ है जो आपको चिंता में डालती है?

मुझे उनका जुझारूपन अच्छा लगता है। एकाध मौकों को छोड़ दिया जाए तो हम स्वस्थ प्रतिस्पर्धी रहे हैं। हमारा नंबर एक पर काबिज होना ऐसा था मानो हरभजन ने श्रीसंथ को थप्पड़ मार दिया हो। इससे पहले हमारी लड़ाई में दुर्भावना नहीं थी। मैं अवीक सरकार की तहेदिल से इज़्ज़त करता हूं जो इस समय स्टार न्यूज़ के मुखिया हैं। मैं अरुण पुरी का सम्मान करता हूं जो आज तक के प्रमुख हैं। इन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता को नये-नये आयाम दिये हैं। अवीक सरकार ने ‘टेलीग्राफ’ की शुरुआत की और अरुण पुरी ने ‘इंडिया टुडे’ की। ये लोग पुरोधा हैं। जब हम उनके चैनलों को ऐसा करते हुए देखते हैं तो कष्ट होता है। लेकिन हम इस गंदे खेल में शामिल नहीं होंगे। हम न तो कोई जवाब देंगे न मखौल उड़ाएंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे।

हैं या नहीं

प्रधानमंत्री को लेकर विकट कांव कांव मची है। प्रधानमंत्री हैं, पर पीएमओ में कुछ काम नहीं हो रहा है। मतलब पीएम पीएम हैं या नहीं, इस पर विकट डाऊट मचे हैं। मैंने एक सीनियर जर्नलिस्ट को पकड़ा और उससे इस बारे में दरियाफ्त की। 

सर, पीएम लगता है कि पीएम नहीं रहे। लेफ्ट एक दिन में पचास बार धमकी देता था, वह अब प्रति दिन एक धमकी के लेवल पर आ गये हैं, मतलब पीएम को अब पीएम ना माना जाये-मैंने अपनी राय रखी।

नहीं ऐसा नहीं है। लेफ्ट ने सारे मीडिया को इंस्ट्रक्शन दे रखे हैं, उनकी धमकी को स्टेंडिंग धमकी माना जाये और हर घंटे पर धमकी की खबर को दिखा दिया जाये। वो तो मीडिया वाले ही कचुआ गये हैं, सो दिखाते नहीं हैं-जर्नलिस्ट ने बताया।

देखिये, एक जमाने में पीएम राष्ट्र के नाम संदेश जारी करते थे, तो पता चलता रहता था कि पीएम हैं। बाकायदा हैं। अब तो प्रधानमंत्री के संदेश भी टीवी पर ना आते, इसका मतलब हम यह मान ले कि पीएम पीएम नहीं हैं-मैंने पूछा।

देखिये, कोई शर्मदार बंदा अब टीवी पर राष्ट्रीय संदेश नहीं देता। टीवी पर पब्लिक खली को देख रही है। खली किसी दिन अगर पीएम बन गये, तो पक्के तौर पर राष्ट्रीय संदेश आयेंगे, पर अभी राष्ट्रीय संदेश ना आने का मतलब यह नहीं है कि पीएम पीएम नहीं रहे। राष्ट्र के नाम संदेशों का अब पीएम से कोई लेना देना नहीं है। अब तो राष्ट्र के नाम संदेश राखी सावंत भी देती हैं कि फलां रीयल्टी शो में उन्हे एसएमएस के जरिये वोट दिये जायें। और पब्लिक उनकी बात सुन भी लेती है। एकाध बार पीएम ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया, तो पब्लिक ने बहुत ध्यान नहीं दिया–जर्नलिस्ट ने बताया।

देखिये, पहले लगातार पीएम यह बयान देते थे कि चीन से संबंध से सुधारेंगे, रुस से संबंध सुधारेंगे। अब इस तरह के बयान पीएम नहीं दे रहे हैं, तो क्या माना जाये कि पीएम पीएम नहीं रहे-मैंने फिर पूछा।

दैहिक विमर्श की रेत

चरित्रों की भीड़…दर्जनों आख्‍यान एक-दूसरे में गुंफित…और कथा की जमीन वह इंसानी जाति जिसे अंग्रेज़ों ने ‘जरायमपेशा’ करार दिया था – ये सब मिल कर बनाते हैं एक नया मुहावरा। यह मुहावरा कई स्थितियों पर लागू किया जा सकता है। इनमें सबसे पहले हम जिक्र करना चाहेंगे आधी दुनिया की बदहाली का, न सिर्फ उसके भौतिक अर्थ में बल्कि उस संदर्भ में भी जिसमें पारंपरिक भारतीय शास्‍त्रों ने इसे ‘नर्क का द्वार’ घोषित कर रखा है। भगवानदास मोरवाल के नए उपन्‍यास ‘रेत’ में दरअसल यही वह केंद्रीय विषय है जिस पर बुद्धि विलासिता के पश्चिमी गलियारों में काफी मगजपच्‍ची तो की गई है, लेकिन कभी भी उस ‘सबआल्‍टर्न’ यथार्थ के बरअक्‍स नहीं देखा गया जो भारतीय उपमहाद्वीप की घुमंतू जनजातियों के जीवन का पर्याय है। मोरवाल ऐसी दृष्टि विकसित करने के लिए अपनी रचना की जमीन ही बदल डालते हैं, नया मुहावरा गढ़ते हैं और बताते हैं कि स्‍त्री विमर्श में निम्‍नवर्गीय प्रसंग के आखिर क्‍या मायने हैं। वे हालांकि ‘काला पहाड़’ की परंपरा को नहीं भूलते। एक विवेकशील और संवेदनशील रचनाकार की यही खूबी है।

राजकमल से प्रकाशित इस उपन्‍यास में कहानी है कंजरों की – एक ऐसी घुमंतू जाति जो समूचे दक्षिण-पश्चिमी एशिया में कमोबेश फैली हुई है। कहानी घूमती है कमला सदन नाम के एक मकान के इर्द-गिर्द, जो परिवार की मुखिया कमला बुआ के नाम पर रखा गया है और जहां रुक्मिणी, संतो, पिंकी आदि तमाम महिलाओं का जमघट है। ये सभी पारंपरिक यौनकर्मी हैं और जिस कंजर समाज से वे आती हैं, वहां इस पेशे को लंबे समय से मान्‍यता मिली हुई है। समूचे परिदृश्‍य में सिर्फ एक पुरुष पात्र है जिसे सभी बैदजी कह कर पुकारते हैं। यह पात्र वैसे तो दूसरी जाति का है, लेकिन घर-परिवार के मामलों में इसे सलाहकार और हितैषी की भूमिका में दिखाया गया है। यहीं से शुरू होती है स्‍त्री विमर्श के निम्‍नवर्गीय प्रसंगों की दास्‍तान – जहां स्‍त्री की देह को पुरुष समाज के खिलाफ लेखक ने एक औजार और हथियार के रूप में स्‍थापित किया है।

पुस्‍तक- रेत 

लेखक- भगवानदास मोरवाल

प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन

 मूल्य-350.00 रुपए

यहीं याद आती है मशहूर बांग्‍ला लेखिका नवनीता देव सेन के एक उपन्‍यास की वह बूढ़ी पात्र, जिसके जीवन का निचोड़ ही यह फलसफा होता है कि पुरुष स्त्रियों की देह का शिकार करने आते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि वे खुद ही शिकार हो गए हैं। मोटे तौर पर कमला बुआ और कमला सदन की सभी रहवासियों का फलसफा भी यही है जो आखिर तक अपनी स्‍वतंत्रता और स्‍वायत्‍तता से समझौते करने को तैयार नहीं होतीं।

भारत के राजस्‍थान में आम तौर पर पाई जाने वाली इन जनजातियों के समाज में यदि यौनकर्म के सामाजिक उभार का अध्‍ययन करें, तो पाएंगे कि यह पेशे के तौर पर अक्‍सर बेडि़या समाज में ही देखने में आता है। कंजरों को जबकि गायक, नर्तक, कलाकार आदि के रूप में लोकप्रियता हासिल है। टेराकोटा के बने छोटे खिलौनों के लिए वे जाने जाते हैं। इसलिए उपन्‍यास के माध्‍यम से इस जाति को पूरी तरह यौनकर्म केंद्रित जाति के रूप में दिखाना भले ही तथ्‍यात्‍मक रूप से सही न हो–हम समझ सकते हैं कि हरेक आख्‍यान की अपनी सीमाएं भी होती हैं–मगर जो बात मायने रखती है वो है इन घटनाओं की बुनावट से निकला संदेश। मोरवाल अपने प्‍लॉट चुनने की क्षमता के लिए ही जाने जाते हैं, बाकी सबआल्‍टर्न शोध और इतिहास की जानकारी भी उन्‍हें पर्याप्‍त है।

यह कहानी एकाध जगहों पर जब झकझोरती है, तो पाठक को समझ आता है कि दरअसल प्‍लॉट को ऐसा चुनना और विषय का ट्रीटमेंट सोद्देश्‍य किया गया है। कमला सदन की बहू ही इकलौती ऐसी महिला है जो यौनकर्म में लिप्‍त नहीं है। उसकी बच्‍ची जब कहती है कि वह बड़ी होकर भाभी नहीं, बल्कि बुआ बनना चाहती है तो लगता है जैसे पैरों के नीचे से धरती खिसक गई हो। इस बच्‍ची का चरित्र दरअसल कमला सदन पर एक गंभीर टिप्‍पणी है- एक नए किस्‍म के स्‍त्री विमर्श में भी यहां दिख जा रही हैं उस पितृसत्‍तात्‍मक समाज की खंडहर होती मान्‍यताएं, जो स्त्रियों के बीच विभाजन का कारण बनती हैं। यह दरअसल दो किस्‍म के दैहिक विमर्शों के बीच पैदा दरार है- बच्‍ची उसी को चुनती है जो सुविधाजनक है। उसे अपनी मां रास नहीं आती। आखिरकार, यह भाभी किसी दिन के झुटपुटे में किसी के साथ चुपके से खिसक लेती है। यह बच्‍ची की टिप्‍पणी का न्‍यायिक परिणाम कहा जा सकता है।

बैदजी का चरित्र शुरू से लेकर अंत तक बाहरी रखा गया है, जो तमाम जुड़ावों के बावजूद बुआ के सामने घुटने टेकने को मजबूर है। यह एक खांटी पैटी-बुर्जुआ पात्र है जो तमाम बुराइयों पर मूक है और अपनी छवि को साफ बनाए हुए है। दरअसल, ये सभी पात्र किसी न किसी स्‍तर पर समाज के किसी न किसी तबके का प्रतिनिधित्‍व करते हैं, फिर चाहे उपन्‍यास में आए पुलिस अधिकारी, रियल एस्‍टेट कारोबारी और अन्‍य अभिजात्‍य वर्ग के पात्र हों। इन सभी पर लेखक ने पर्याप्‍त टिप्‍पणियां छोड़ी हैं।

उपन्‍यास की भाषा हिंदी और अलवर, भरतपुर व मेवात के इलाकों की बोलियों का मिश्रण है। भाषा पर लेखक की जमीनी पकड़ साफ दिखाई देती है। विषय पूरी तरह सबआल्‍टर्न यानी निम्‍नवर्गीय है, जिसे हम शायद ही कभी पाठ्य पुस्‍तकों से भी जान पाते होंगे। लेकिन जिस परिप्रेक्ष्‍य में इस उपन्‍यास को गढ़ा गया है, उस पर एक बार गहन पड़ताल की जरूरत जान पड़ती है। परिप्रेक्ष्‍य का अर्थ हम यहां उन पूर्व स्‍थापित मान्‍यताओं से ही लगा रहे हैं जो हमारे समाज में जनजातियों को लेकर व्‍याप्‍त हैं। इनके सामाजिक इतिहास से जुड़ी कुछ पुस्‍तकों का हवाला दिया जा सकता है जिनके माध्‍यम से यदि इस उपन्‍यास को पढ़ा जाए तो आलोचनात्‍मक नजरिया बेहतर हो सकेगा।

पहली है जोसेफ बर्लांड की 1982 में हारवर्ड युनिवर्सिटी प्रेस से छपी पुस्‍तक नो फाइव फिंगर्स आर अलाइक : कॉग्निटिव एंप्‍लीफायर्स इन सोशल कन्‍टेक्‍स्‍ट । दूसरी उपयोगी पुस्‍तक भी इसी लेखक की है जो 1987 में प्रकाशित हुई थी दी अदर नोमैड्स : पेरीपैटेटिक माइनॉरिटीज इन क्रॉस कल्‍चरल पर्सपेक्टिव । इसके अलावा विषय में दिलचस्‍पी रखने वाले पाठक भारतीय नृविज्ञान सर्वेक्षण द्वारा प्रकाशित पीपॅल ऑफ इंडिया भी देख सकते हैं जिसे कुमार सुरेश सिंह, डी.के. सामंता और एस.के. मंडल ने संपादित किया है।

कुल मिला कर भगवानदास मोरवाल के उपन्‍यास ‘रेत’ के बारे में यही कहा जा सकता है कि सामाजिक गल्‍प की दृष्टि से देखें तो यह पुस्‍तक इतिहास, खासकर हाशिये के लोगों के इतिहास में दिलचस्‍पी रखने वालों के लिए काफी महत्‍वपूर्ण बन पड़ी है। थोड़ी महंगी जरूर है, लेकिन इसे जरूर पढ़ा जाए।

अभिषेक श्रीवास्तव

83 के विश्व विजयी वीरों का सम्मान

घर में नया रंगीन टीवी जून 83 में इसीलिए ही आया था। इसी जून की 25 तारीख को क्रिकेट के मक्का माने जाने वाले लॉर्ड्स के मैदान पर विश्व कप का फाइनल होना था। यह क्रिकेट का तीसरा विश्व कप था। पहले दो विश्व कप वेस्टइंडीज़ जीता था। महत्वपूर्ण रहा कि भारतीय टीम विश्व कप से पहले वेस्टइंडीज़ का सफल दौरा करके इंग्लैंड पहुंची थी।

आज जब 25 साल बाद उन्हीं विश्वविजेताओं का सम्मान हो रहा है तो मन आनंदित है। आईसीएल औऱ आईपीएल से जुड़े खिलाड़ियों की सोच, जरूरतों और द्वंद के बाद उनका एकजुट कर सम्मान करने में एक अलग रोमांच पैदा हुआ है। इसका श्रेय सुनील गावस्कर और कपिल देव दोनों को जाता है।

एक टीवी कार्यक्रम में गावस्कर से पूछा गया कि कपिल से आपकी लगातार नोक झोंक लगी रहती थी तो आप लोग कैसे निभाते थे। गावस्कर ने सवाल का बवाल न बनाते हुए व्यंग्य में कहा, “मैं और कपिल रोज़ नाश्ते के समय से लड़ना शुरू कर देते थे। नाश्ते में दलिया खाएं या कॉर्न फ्लेक्स, अंडे उबले खाएं या फ्राइड, डबल रोटी व्हाइट या ब्राउन इन्हीं बातों की नेकझोंक से हमारा दिन शुरू होता था।” यही सवाल जब कपिल से पूछा गया तो उन्होंने कहा, “मुझे वही करना पड़ता था जो मेरे से ज्यादा अनुभवी खिलाड़ी कहते थे। जैसे अगर गावस्कर कहते उबला अंडा खाने को तो हमें वही खाना पड़ता था।” लेकिन कपिल ने यह भी कहा कि सोच अलग तो आज भी है पर मिलकर चलने की प्रतिबद्धता उसको नज़रअंदाज़ करती है।

25 साल बाद यह मनगढ़ंत व्यंग्य आश्चर्य और हंसाने वाला लगता है। गावस्कर और कपिल भारतीय क्रिकेट के दो महानतम खिलाड़ी हैं। उनके समय के लोगों से सुनें तो पता चलेगा कि अख़बार कैसे भरे रहते थे इन दोनों के आत्मकेंद्रित निर्णय और फैसलों से। सब जानते हैं इसमें काफी कुछ अख़बार वालों की रची रचाई होती थी पर ऐसा भी नहीं था जैसा गावस्कर और कपिल 25 साल बाद दर्शा रहे हैं। छ: महीने पहले ही कपिल ने आईसीएल का हाथ पकड़ा और गावस्कर ने आईपीएल का। सब जानते है कि टी-20 क्रिकेट की इन लीगों में फर्क सिर्फ आधिकारिकता का ही है।

इन दो महानतम भारतीय खिलाड़ियों की खेलने के समय से लगातार होड़ रही है। बढ़ती उम्र और हालात ने दोनों को हाथ मिलाने पर मजबूर किया है। दोनों के लिए और भारतीय क्रिकेट के लिए यह समझौता अच्छा और लाभदायक होगा। इसलिए दोनों के साथ 83 के सूरमाओं का सम्मान करना जरूरी और ऐतिहासिक है। 25 साल बाद गावस्कर और कपिल की अगुवाई में जिस जोश और लगन से भारतीय खिलाड़ी एक मंच पर इकट्ठा हुए वह सम्माननीय और गौरवान्वित पल है। उसे संजो कर रखने के लिए सभी खिलाड़ियों का सम्मान आवश्यक था। 83 विश्व कप में सभी खिलाड़ियों का समयोचित योगदान था। इसलिए 25 साल बाद भी खिलाड़ियों और देशवासियों को गर्व होना स्वाभाविक है।

इस विश्व कप विजय से भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता चौगुनी हुई। तब की लोकप्रियता के कारण ही खेल के प्रति आज का दीवानापन है। इन्हीं खिलाड़ियों को देखकर भारतीय जानमानस में खेल के प्रति जागरुकता बढ़ी। इन्ही विजेताओं को देख कर सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली, अनिल कुंबले और लक्ष्मण ने भारत के लिए खेलने के सपने संजोए। भारतीय क्रिकेट को हाल के इस जनून तक ले जाने के लिए इन्हीं विश्वविजेताओं का योगदान रहा है। उनके इस सम्मान से आज के युवा खिलाड़ियों को 25 साल पहले महानायकों के बारे में जानने का मौका मिलेगा और वे प्रोत्साहित होंगे। खेल के इतिहास और विजेताओं को जानना उतना ही जरूरी होता है जितना अपने पूर्वजों को।

जब हम आराम से नए आए टेलीविज़न पर मैच का आनंद ले रहे थे तो खिलाड़ियों मे जीत का जज्बा और सपना था। विश्व कप की शुरुआत के समय भारतीय टीम को कोई भाव नहीं दे रहा था। इंग्लैंड की नमी भरी घास वाली पिचों पर भारत ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगा- ऐसा माना जा रहा था। एकदिवसीय खेलों का अनुभव भी ज्यादा नहीं था। पर वेस्टइंडीज़ दौरे से मिले आत्मविश्वास ने खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया।

सेमीफाइनल में पहुंच कर भारत ने मेजबान इंग्लैंड को आसानी से हराया। फाइनल में दो बार विश्वविजेता रही क्लाइव लॉयड की महान वेस्टइंडीज़ का सामना नामुमकिन सा लग रहा था। लेकिन नामुमकिन कुछ नहीं होता। कपिला के सूरमाओं ने गजब कर दिखाया। फाइनल में सभी खिलाड़ियों का योगदान रहा। तब के अख़बार इस आकस्मिक विजय को फ्लूक मान रहे थे। विजय थी ही इतनी आकस्मिक और अविश्वसनीय। भारतीय खिलाड़ी जब अपने ब्लेज़र पहन कर लॉर्ड्स की बालकनी पर विश्व कप लेने आए तो मनोभाव और गर्व से गदगद थे। ऐसा ही हाल हर भारतीय का था। मेरे जैसे तमाम युवाओं ने उस पल को समेटा और आनंद लिया था।

25 साल बाद इन गर्वीले खिलाड़ियों का सम्मान होते देख मन रोमांच से भर गया। सम्मान तो 25 साल पहले भी बहुत मिला था और लता मंगेशकर के सहारे थोड़ा बहुत पैसा भी जुटा लिया था। पर 25 साल बाद सम्मानित राशि ने खिलाड़ियों को एकजुट कर एक मंच पर खड़ा कर दिया। भारत 83 विश्व कप के बाद सिर्फ एक ही बार फाइनल में पहुंचा है। 2003 के दक्षिण अफ्रीका विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया से हार गया था। इसलिए 83 विश्व कप ही भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे महान जीत है। उस पल को याद कर मन आज भी गदगद होता है। उन खिलाड़ियों का भी होगा। सब मनमुटाव झगड़े ताक पर रख कर अगर हम उन खिलाड़ियों के सामने नतमस्तक हैं तो भारतीय क्रिकेट चलाने वालों के लिए सौभाग्य का अवसर है। सारे देश को नाज है। 

देशवासी 83 विश्वविजेताओं को नमन करते हैं और वे 25 जून की याद संजो कर रखेंगे।

‘जीवन एक तीर्थयात्रा है.’

मशहूर उपन्यास ‘द अलकेमिस्ट’ के लेखक पाउलो कोएलो की जिंदगी की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं. शायद ये भी एक वजह है कि वह चमत्कारों को अच्छी तरह से समझते हैं. उनकी किताबों की 10 करोड़ से भी ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. इसके अलावा वह एक ऐसे लेखक भी हैं जिसके काम का सबसे ज्यादा अनुवाद हुआ है. कोएलो की किताबों में आठ उपन्यास, दो संस्मरण और रहस्यमय यात्राओं के कई संग्रह शामिल हैं. ब्राजील में जन्मे 60 वर्षीय कोएलो अपने लेखन में खुद को एक खोजी और संत के रूप में पेश करते हैं. उनकी दुनिया में देवदूत हैं तो राक्षस भी, संकेत हैं और अपशकुन भी और इसके साथ ही है हर व्यक्ति के लिए एक तय नियति. अपने हर पाठक के लिए उनका एक संदेश होता है—आपको जिस भी चीज की तलाश है वो आपको मिल जाएगी. इस किताब को पढ़ें और देखें कैसे. दिलचस्प है कि जिन देशों में उनकी किताबें सबसे ज्यादा बिकती हैं वे हैं ईरान, इस्राइल और भारत. शब्दों के इस जादूगर के साथ एक मुलाकात.

आपने जिंदगी में तमाम दुश्वारियों का सामना किया. इसके बावजूद आपका काम आज दुनिया के सामने है. माता-पिता का नकारात्मक रुख, समीक्षकों की उपेक्षा, कई सालों तक लेखन के अलावा दूसरे काम….इस सबके बाद अपनी सफलता देखकर कैसा महसूस होता है?  

सफलता के साथ कई आयाम भी बदल जाते हैं मगर अंतर्मन को दूसरों के साथ बांटने की भावना अब भी मुझमें बनी हुई है. मैं उस सपने को जी रहा हूं जो मैंने अपनी युवावस्था में देखा था. लेकिन ये ऐसा सपना नहीं है जिसका कोई अंत हो. जब तक मैं जीने, सोचने और प्रेम करने लायक बना रहूंगा ये चिंगारी सुलगती रहेगी.

क्या आपको कभी ये ख्याल नहीं आता कि एक किताब समीक्षकों को खामोश करने के लिए भी लिखनी चाहिए?

मैं कोई भी नई किताब लिखने के लिए दो साल का वक्त लेता हूं. इस दौरान मैं नई कहानी रचने के लिए पर्याप्त भावनात्मक ऊर्जा इकट्ठा करता हूं.

लेखन में कुछ ऐसा जो आपको प्रेरणादायी लगा हो?

हाल ही में मैंने फिलिप जिम्बार्डो द्वारा लिखित एक दिलचस्प किताब द ल्यूसिफर इफेक्ट पढ़ी है. कुछ और भी हैं जिनमें से ज्यादातर मेरे पसंदीदा लेखकों की हैं. मैं सौभाग्यशाली रहा हूं कि मुझे उन्हें उनकी मूल भाषा, चाहे वो अंग्रेजी हो, स्पेनिश, फ्रेंच या पुर्तगाली, में पढ़ने का मौका मिला है.

आपको ऐसा क्यों लगा कि अपनी किताबों को इंटरनेट पर मुफ्त में उपलब्ध कराने से पायरेसी नाम की बीमारी आपके लिए फायदे में बदल जाएगी और इससे आखिरकार किताबों की बिक्री और पाठकों का दायरा ही बढ़ेगा? प्रकाशन उद्योग की इस पर क्या प्रतिक्रिया रही है?

किसी भी लेखक का सबसे बड़ा मकसद ये होता है कि दुनिया उसका लिखा पढ़े. पैसे का नंबर बाद में आता है. मुझे लगा कि ये एक अच्छा विचार है यानी पाठक को अपनी किताबें पढ़ने और फिर उन्हें खरीदने या न खरीदने का फैसला करने का मौका देना. इस विचार के बाद ही मुझे लगा कि क्यों न अपने सारे काम को इंटरनेट पर डाल दूं इसलिए मैंने द पाइरेट कोएलो (piratecoelho.wordpress.com) के नाम से एक वेबसाइट बनाई. जहां तक उद्योग का सवाल है तो मेरे सभी प्रकाशकों ने मेरा समर्थन किया है. उदाहरण के लिए हार्पर कॉलिंस ने फैसला किया है कि वह पाठकों को हर महीने मेरी एक किताब मुफ्त में पढ़ने के लिए उपलब्ध करवाएगा. मैं अपनी किताबों को अपने ब्लॉग (www.paulocoelhoblog.com) में भी डाल रहा हूं.  

आपके शब्दों में आप मौत को अपने बगल में बैठी किसी खूबसूरत औरत की तरह देखते हैं. मौत के बारे में आपके और क्या विचार हैं? क्या इनका आपके लेखन पर भी कोई असर पड़ता है?

जीवन एक तीर्थयात्रा है जिसका हर दिन अलग है. हर दिन में एक जादुई क्षण छिपा हो सकता है जिस पर हम गौर ही नहीं कर पाते. भले ही हमें ये सुनना अच्छा न लगे मगर सच यही है कि हम सभी एक तीर्थयात्रा पर हैं और इसकी मंजिल है मौत. आपको यात्रा से जितना संभव हो सके हासिल करना चाहिए क्योंकि आखिर में आपके पास अगर अपना कुछ बचता है तो वो है यही यात्रा. पैसा बटोरने के लिए भागने का कोई महत्व नहीं क्योंकि आखिर में आपको मरना ही है. तो क्यों न हम जीना सीखें? जब आपको ये महसूस हो जाता है तो आपका डर खत्म हो जाता है और यही  आध्यात्मिक खोज के सफर का पहला कदम होता है.

आप निर्विवादित रूप से दुनिया के कुछ सबसे सफल लेखकों में से एक हैं. मगर फिर भी आपकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता रहता है. आज दुनिया में आपका जो मुकाम है उसके बारे में आप क्या सोचते हैं?

ये दिलचस्प है कि आपने ये सवाल पूछा क्योंकि मैंने इस बारे में एक स्तंभ भी लिखा है. अपनी किताब द विच ऑफ पोर्टोबेलो की रिलीज के दौरान मैं लिस्बन में था और कुछ ही घंटों बाद किताब पुर्तगाल और लैटिन अमेरिका के बाजार में आनी थी. मैं इस शानदार शहर की गलियों में घूमता हुआ उस व्यक्ति के बारे में सोच रहा था जिसके हाथों में सबसे पहले ये किताब जाएगी. मैं बहुत रोमांचित था और मुझे महसूस हुआ कि कई किताबों के प्रकाशित होने के बाद भी मेरे भीतर ठीक वैसा ही रोमांच और उत्साह मौजूद है जैसा पहली किताब द पिलग्रिमेज के जारी होने के वक्त था.

मेरी किताबें सिर्फ मेरे अनुभवों को बयान करती हैं मेरी बुद्धिमत्ता को नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि मैं बुद्धिमान नहीं हूं. ईश्वर भेदभाव नहीं करता और इसलिए मैं मानता हूं कि या तो सभी सब कुछ जानते हैं या फिर कोई कुछ नहीं जानता. आपके पास अगर बांटने के लिए अपना कुछ है तो वह है आपका अनुभव. मैं अब भी अपनी आत्मा, अपना प्यार और अपने अनुभव बांटने की कोशिश कर रहा हूं.

एनेस्टेशिया गुहा