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गंगा का आखिरी गर्जन ?

बरसात के मौसम में रात के वक्त भागीरथी घाटी में घुप्प अंधेरा नजर आता है. इसमें सुनाई देती है हिमालय की ढलानों से टकराने वाली तूफानी हवा और घनघोर बारिश के थपेड़ों की आवाज. और ऐसे में अगर आप भागीरथी के किनारे बसी किसी जगह पर हों तो नदी की भयानक गर्जना हर दूसरी आवाज को बौना कर देती है. 

मगर दिन निकलने के साथ दृश्य भी बदलने लगता है और आवाजें भी. पहाडों को खोखला करती ड्रिलिंग मशीनों की कर्कश ध्वनि, पीले हेलमेट, कंक्रीट, खोखली सुरंगों में सांय-सांय बहती हवा और ऐसा बहुत कुछ जो बताता है कि यहां मनुष्य प्रकृति पर विजय पाने की लड़ाई लड़ रहा है. नदियों को बांधने की वो लड़ाई जिसका मकसद देश की आर्थिक तरक्की के लिए बिजली पैदा करना है.

भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. हाल-फिलहाल तक उत्तरकाशी और गंगोत्री के बीच इनमें से सिर्फ एक यानी मनेरी भाली-1 हुआ करता था. मगर अब 125 किलोमीटर लंबे इस इलाके में पांच बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण अलग-अलग चरणों में है. अगर सब कुछ निर्धारित योजना के मुताबिक चला तो भागीरथी यानी गंगा को अपना वो रास्ता छोड़ना होगा जिस पर वह युगों-युगों से बहती आ रही है. 125 किलोमीटर की इस दूरी में उसे अधिकांश जगहों पर सुरंगों से होकर बहना होगा. गंगा के बारे में कहा जाता है कि वो मुक्तिदायनी है मगर विडंबना देखिए कि वही गंगा अपने ही जन्मस्थल में कैद होकर रह जाएगी.

नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी.

भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसे अच्छी तरह से समझने के लिए आपको अपनी यात्रा विवादास्पद टिहरी बांध से शुरू करनी होगी जिससे जुलाई 2006 में विद्युत उत्पादन शुरू हुआ था. बांध से बनी झील की लंबाई करीब 60 किलोमीटर है और इसका पानी नीला और जड़ नजर आता है. गंगा की वह पुरानी जीवंतता फिर से वहीं पर नजर आती है जहां ये झील खत्म होती है. मगर यहां भी गंगा की जिंदगी थोड़े ही दिन की मेहमान है.

टिहरी से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धरासू नाम की जगह मनेरी भाली जलविद्युत परियोजना का द्वितीय चरण है. यहां जनवरी 2008 से विद्युत उत्पादन शुरू हो चुका है. चूंकि 304 मेगावॉट बिजली बनाने के लिए पानी का टरबाइन पर एक निश्चित ऊंचाई से गिरना जरूरी है इसलिए इस ऊंचाई को हासिल करने के लिए गंगा को 24 किलोमीटर लंबी एक सुरंग से होकर गुजारा जाता है जो उत्तरकाशी से शुरू होती है. यानी 24 किलोमीटर की इस लंबाई में नदी का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है.

इस क्षेत्र में परियोजनाएं कुछ इसी तर्ज पर बन रही हैं. एक परियोजना की पूंछ जहां पर खत्म होती है वहां से दूसरी परियोजना का मुंह शुरू हो जाता है. यानी नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी.

ये बात अलग है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण वर्तमान में अपनी निर्धारित क्षमता से काफी कम यानी सिर्फ 102 मेगावॉट बिजली का ही उत्पादन कर रहा है. ये भी गौरतलब है कि इस इलाके में स्थित तीनों बांध—टिहरी और मनेरी प्रथम और द्वितीय—कभी भी अपनी निर्धारित क्षमता के बराबर विद्युत उत्पादन नहीं कर पाए हैं. दिलचस्प है कि सभी जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी ही इस आधार पर दी गई थी 90 प्रतिशत मौकों पर वे अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से बिजली का उत्पादन करेंगे मगर दिल्ली स्थित एक गैरसरकारी संगठन साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (एसएएनडीआरपी) के द्वारा जुटाए गए आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. संगठन ने अपने अध्ययन में जिन 208 बांधों के आंकड़े जुटाए उनमें से 89 फीसदी निर्धारित क्षमता से कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं. 49 फीसदी में तो कुल क्षमता की आधी से भी कम बिजली बन रही है.

एसएएनडीआरपी के संस्थापक हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में अव्यावहारिक परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है. हमें वास्तविक कीमत और वास्तविक लाभों का एक वास्तविक अध्ययन करने की जरूरत है. ये सुनिश्चित करने के लिए कोई भरोसेमंद तंत्र मौजूद नहीं है कि केवल न्यायसंगत परियोजनाओं को ही मंजूरी मिले.”

धरासू से उत्तरकाशी तक के सफर में नदी आपके साथ चलती है. बारिश के मौसम की वजह से आजकल इसमें काफी पानी है मगर स्थानीय लोगों के मुताबिक सर्दियों में ये पानी की एक पतली लकीर सरीखी नजर आती है क्योंकि तब अधिकांश पानी सुरंगों में चला जाता है. इस दौरान नदी को आसानी से पैदल ही पार किया जा सकता है.

भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसके महत्व को समझने के लिए आपको इस नदी की विशालता, इसकी पारिस्थिकी और इस पर निर्भर मानव जीवन के साथ हो रही छेड़छाड़ को समझना जरूरी है.

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. गंगा मछलियों की 140 और उभयचरों की 90 प्रजातियों को आश्रय देती है. इसमें पांच ऐसे इलाके हैं जिनमें पाई जाने वाली पक्षियों की किस्में दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं मिलतीं. इसके किनारों पर पाई जाने वाली वनस्पति और जंतुओं की इसके पोषण और जल संरक्षण में अहम भूमिका है और ये भूक्षरण को भी नियंत्रण में रखते हैं. गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 45 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसपर निर्भर हैं.

पर्यावरणविद कहते हैं कि गंगा के पानी में अनूठे बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं. यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फीसदी ज्यादा होता है. ये अनूठा गुण तब नष्ट हो जाता है जब गंगा को सुरंगों में धकेल दिया जाता है जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी. ये जलविद्युत परियोजनाएं नदी के रास्ते का बुनियादी स्वरूप भी बदल देती हैं जिससे पानी में जैविक बदलाव आ जाते हैं. उदाहरण के लिए मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जहां से पानी जलाशय में दाखिल होता है वहां पर इसके नमूने बताते हैं कि गुणवत्ता के हिसाब से इसे साफ कहा जा सकता है. मगर जलाशय के आखिर में पानी के नमूने बताते हैं कि ये बुरी तरह से प्रदूषित है. केंद्रीय औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पिछले साल मई में जारी एक रिपोर्ट बताती है कि भागीरथी में पारे का स्तर भी बढ़ रहा है.

जहां से पानी जलाशय में दाखिल होता है वहां पर इसके नमूने बताते हैं कि गुणवत्ता के हिसाब से इसे साफ कहा जा सकता है. मगर जलाशय के आखिर में पानी के नमूने बताते हैं कि ये बुरी तरह से प्रदूषित है.

लेकिन ये तो संकट का सिर्फ छोटा सा हिस्सा है. नोबेल पुरस्कार जीतने वाले इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक गंगोत्री ग्लेशियर के आकार में 80 फीसदी तक की कमी आ जाएगी जिससे गंगा, सदानीरा से एक मौसमी नदी में तब्दील हो जाएगी. इसका मतलब है कि सिर्फ 20 साल में इतना पानी ही नहीं बचेगा कि इन बांधों की टरबाइंस चलाई जा सकें.

इसके बावजूद सरकार इन विशाल परियोजनाओं पर अड़ी हुई है. जब तहलका ने पानी की उपलब्धता और व्यावहारिकता से संबंधित डाटा के बारे में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष ए के बजाज से जानकारी मांगी तो उनका जवाब था, “गंगा जल से संबंधित डाटा गोपनीय है.”

भागीरथी को सुरंगों और बांधों के जरिये कैद करने का विरोध तो स्थानीय लोग छह साल पहले तभी से कर रहे हैं जब इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी. मगर इस विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां तब मिलीं जब जाने-माने पर्यावरणविद और आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल ने इसके विरोध में उत्तरकाशी में अनिश्चतकालीन भूखहड़ताल की घोषणा की. पर्यावरण की गहरी समझ रखने वाले अग्रवाल ने इन परियोजनाओं को मातृहत्या जैसा बताया. लोग और साधु-संत उनके समर्थन में उमड़ पड़े और नतीजा ये हुआ कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी दो परियोजनाओं को अस्थाई रूप से रोकने पर सहमत हो गए.

बाद में अग्रवाल दिल्ली आ गए और लोहारीनाग पाला में एनटीपीसी की 600 मेगावॉट की परियोजना के विरोध में उनकी भूख हड़ताल जारी रही. कुछ दिन पहले उन्होंने अपना अनशन तब तोड़ा जब ऊर्जा मंत्रालय ने उन्हें आश्वासन दिया कि गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी.

मगर मुद्दा अभी सुलझने से काफी दूर है. तहलका से बात करते हुए केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं, “हमने फैसला किया है कि पानी का बहाव अविरल रहना चाहिए. मगर परियोजनाएं भी चलनी चाहिए. तकनीकी रूप से हमें ऐसा करने का रास्ता खोजना होगा. इसलिए हमने तीन महीने का समय मांगा है. एक कमेटी बनाई जा रही है. भागीरथी के साथ भारत के लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं. मैं लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता. यही वजह है कि हम कोई रास्ता खोजने के लिए सहमत हो गए हैं.”

मगर ये केवल भावनाओं की बात नहीं है और रास्ता खोजना आसान नहीं होगा. शिंदे कहते हैं कि 600 मेगावॉट की परियोजना को पूरी तरह से रद्द नहीं किया जा सकता और विशेषज्ञ कमेटी के साथ निर्माण कार्य भी जारी रहेगा. वे कहते हैं, “2000 करोड़ रुपये की अग्रिम मंजूरी हो चुकी है. अब आप इसे रोकने के लिए कह रहे हैं. जब छह साल पहले ये परियोजनाएं शुरू हुई थीं तो मैं मंत्री नहीं था. जब भाजपा ने इनका शिलान्यास किया था. तब तो किसी ने इनका विरोध नहीं किया.”

विडंबना ये भी है कि भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है. अकेले अमेरिका में ही 654 बांध खत्म किए जा चुके हैं और 58 दूसरे बांधों के साथ भी ऐसा ही किया जाना है. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें इसलिए हटाया जा रहा है ताकि सामन मछलियों के निवास को बहाल किया जा सके. गौरतलब है कि सामन मछलियां प्रजनन के लिए समुद्र से नदी के उद्गम की तरफ जाती हैं. बांध उनके इस सफर को रोककर उनकी प्रजाति को संकट में डालते हैं. दरअसल देखा जाए तो सामन मछलियों की घटती संख्या अमेरिका में कई ऐतिहासिक अदालती फैसलों का कारण बनी है. इनमें से सबसे प्रभावशाली उदाहरण है एलव्हा और ग्लाइंस कैन्यन बांध को खत्म किया जाना जो देश के सबसे ऊंचे बांधों में से एक था. इसे हटाने में 10 करोड़ डालर खर्च हुए.

अमेरिकन रिवर्स नामक एक गैरसरकारी संगठन से जुड़ीं एमी कोबर कहती हैं, “इन बड़े बांधों को हटाया जाना इस बात का सूचक है कि अपनी नदियों को लेकर देश के नजरिये में महत्वपूर्ण बदलाव आया है. इस मुल्क को ये अहसास हो गया है कि एक स्वस्थ, अविरल नदी एक समुदाय के लिए सबसे कीमती संपत्तियों में से एक हो सकती है.”

भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है. अकेले अमेरिका में ही 654 बांध खत्म किए जा चुके हैं और 58 दूसरे बांधों के साथ भी ऐसा ही किया जाना है.

मगर भारत का ऊर्जा मंत्रालय इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है. सवाल ये है कि आखिर जब सारी दुनिया में बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन हो रहा है तो भारत में इन पर अब भी क्यों जोर दिया जा रहा है? शिंदे से पूछिए और जवाब आता है, “भारत में 30 हजार मेगावॉट बिजली की कमी है. हम इतनी बिजली कहां से लाएंगे? चीन को देखिए. उनके थ्री गॉर्जेज डैम को देखिए. जब चीन ये कर रहा है तो हम क्यों नहीं कर सकते? टिहरी में 1000 मेगावॉट की परियोजना के लिए हमें इतनी आलोचना झेलनी पड़ी. अगर आप बिजली चाहते हैं तो आपको कुछ न कुछ बलिदान तो करना ही होगा.”

दरअसल देखा जाए तो टिहरी इसका एक सटीक उदाहरण है कि अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को लेकर भारत की समझ में कितना धुंधलापन है. भारत में किसी भी बांध परियोजना का इसके पूरा होने के बाद मूल्यांकन नहीं किया गया है. टिहरी दुनिया का आठवां सबसे ऊंचा बांध है. मार्च 2008 तक बांध पर कुल 8,298 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे जो उस अनुमानित लागत से कहीं ज्यादा है जो परियोजना के प्रारंभ में तय की गई थी. इसकी प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावॉट थी मगर वर्तमान में यह केवल 1000 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर रहा है. यानी क्षमता के आधे से भी कम.

भागीरथी घाटी में घट रही इस त्रासदी का एक मानवीय पहलू भी है. उसे समझने के लिए आपको प्रेम दत्त जुयाल जैसे किसी व्यक्ति से मिलना होगा. जुयाल के पास धुंधले पड़ते जा रहे कागजों का एक गट्ठर है. ये वो दस्तावेज हैं जिन्हें वे तब से इकट्ठा कर रहे हैं जब से उनके घर के नीचे की जमीन धंसनी शुरू हुई. जुयाल जलवाल गांव के निवासी हैं जो उस जगह से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है जहां कभी पुराना टिहरी शहर हुआ करता था. जलवाल और इसके आसपास के गांवों को पुनर्वास योजना का हिस्सा इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि ये टिहरी झील के 840 मीटर ऊंचाई के स्तर से ऊपर स्थित थे. पिछले साल से उनके खेत दरक रहे हैं और गांववालों की जान लगातार हो रहे भूस्खलन से खतरे में है. ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि टिहरी झील का पानी लगातार उस बुनियाद को कमजोर कर रहा है जिस पर ये गांव बसा है. इससे भी बड़ी त्रासदी ये है कि जिस बाजार में ये लोग अपनी सब्जियां बेचते थे और जिन स्कूलों में इनके बच्चे पढ़ने जाते थे, वे सब झील में दफन हो गए हैं. नये टिहरी शहर जाने के लिए इन्हें 250 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है. यानी इनकी जिंदगी पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गई है. मगर उनके पुनर्वास की मांग पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है.

भारतीय लोक प्रशासन संस्थान द्वारा 54 बांधों पर कराया गया एक विस्तृत अध्ययन बताता है कि एक बड़े बांध से विस्थापित होने वाले लोगों की औसत संख्या 44,182 है. भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. अगर माना जाए कि एक बांध से कम से कम 10,000 लोग भी विस्थापित होते हैं तो इसका मतलब ये है कि बड़े बांधों के कारण अब तक करीब साढ़े चार करोड़ लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ना पड़ा है. उत्तरकाशी के नजदीक बसे जोशियाड़ा और कनसैण नामक गांवों के लोगों को भी अब ये अहसास होने लगा है कि उनकी नियति भी कुछ ऐसी ही होने वाली है.

जोशियाड़ा में मुख्य सड़क पर बद्री सेमवाल अपना हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं. दुकान की ऊपरी मंजिल पर ही उनका निवास भी है. उनकी छत से साफ देखा जा सकता है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण की झील का पानी धीरे-धीरे उनके घर को निगलने बढ़ा आ रहा है. सेमवाल कहते हैं, “टरबाइन चलाने के बाद ही अचानक उन्हें अहसास हुआ कि हम भी डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. अब वे कहीं पहाड़ में हमारे पुनर्वास की बात कर रहे हैं. मगर वहां दुकान कैसे चलेगी. मैं जिंदगी कैसे चलाऊंगा?” जोशियाड़ा के दूसरे परिवारों की भी यही व्यथा है.

उत्तरकाशी से मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जाते हुए हमारी मुलाकात अतर सिंह पंवार से होती है. फैशनेबल जींस और टी शर्ट पहने इस व्यक्ति को देखकर कहीं से भी नहीं लगता कि उसके 38 साल पहाड़ में ही गुजरे हैं. पंवार के हाथ में कुरकुरे का पैकेट और बिसलेरी की बोतल है और वे किसी शहरी बाशिंदे जैसे ही लगते हैं. उन्होंने हाल ही में एनटीपीसी में अनुबंध पर मजदूरी शुरू की है. कभी वे पशु चराते थे और आलू व राजमा की खेती करते थे. वे कहते हैं, “मैं तब कहीं ज्यादा खुश था जब मेरे पास अपनी जमीन थी. तब मैं आजाद था. अब मुआवजे में भले ही लाखों रूपये मिल गए हों मगर जल्द ही ये खत्म हो जाएंगे. पैसा तो आता है और चला जाता है. जमीन हमेशा आपके पास रहती है.”

थोड़ा और आगे चलने पर हम पाला गांव पहुंचते हैं जहां विनाश की शुरुआत हो चुकी है. एक किलोमीटर दूर ही पाला-मनेरी सुरंग की खुदाई की जा रही है. यहां के घरों में दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं. पानी के स्रोत सूख रहे हैं क्योंकि सुरंग के मलबे ने प्राकृतिक झरनों का रास्ता रोक दिया है.

अतर सिंह पंवार को कोई ऐसी शक्ति एक शहरी व्यक्ति के रूप में बदल रही है जिस पर उनका बस नहीं चल रहा. अपने जैसे सैकड़ों लोगों की तरह वे शहरी नहीं बनना चाहते. वे गंगा को अविरल बहते देखना चाहते हैं. ठीक वैसे ही जैसे उनकी पीढ़ियां सदियों से देखती आई हैं.

मगर उनके लिए ऊर्जा मंत्रालय का जवाब है कि उत्तरी ग्रिड को और भी ज्यादा बिजली चाहिए. भले ही उनके जैसे लोगों को आसानी से पीने का पानी तक न मिले मगर शहरों के शापिंग मॉल्स का दिन-रात रोशनी में नहाना जरूरी है. 

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कैसे-कैसे खेल तेल के

हाल ही में जब पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ीं तो सरकार ने पूर्व केंद्रीय सचिव बी के चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई. उल्लेखनीय है कि कमेटी को तेल कंपनियों की वित्तीय हालत और दूसरी चीज़ों के साथ-साथ जिस एक और बात का आकलन करना था वो था तेल कंपनियों का असल घाटा. यानी कि देश को तेल बेचने पर 2 लाख से ज्यादा का घाटा दिखा रही सरकार को अब तक खुद ये मालूम नहीं है कि दरअसल ये घाटा अभी है कितना!

दरअसल जिस चीज़ को अक्सर कंपनियों के घाटे की तरह देश के सामने रखा जाता है उसे अंडर रिकवरी कहते हैं और ये कंपनियों की हालत की सही तस्वीर देश के सामने नहीं रखती. असल में खुदरा तेल बेचने वाली हिंदुस्तान पेट्रोलियम या भारत पेट्रोलियम सरीखी कंपनियां तेलशोधक कारखानों से तेल उस कीमत पर खरीदती हैं जिस कीमत पर ये तेल उन्हें आयात करने पर मिला होता. यानी कि इस कीमत में अनावश्यक ही कई तरह के कर और ढ़ुलाई का खर्चा आदि जुड़े होते हैं. ऐसा जोड़-घटाव को आसान बनाने के लिए किया जाता है. इसके अलावा तेल की आपूर्ति करने वाली कंपनियां मांग का करीब 30 प्रतिशत भारत में ही उत्पादन करती हैं और ये कंपनियां जिस कीमत पर विदेश से तेल खरीदती हैं वो भी अंतर्राष्ट्रीय कीमत से काफी कम होती है मगर मार्केटिंग कंपनियों को ये आयात वाले दामों पर ही दिया जाता है. अब इस ज़बर्दस्ती मंहगे खरीदे-बेचे तेल को तेल मार्केटिंग कंपनियां सस्ते में बेच कर जो घाटा कमाती हैं उसे अंडर रिकवरी कहते हैं. एक बात और, तेल कंपनियों को और भी कई तरह के फायदे और अतिरिक्त आय होती है जिन्हें अंडर रिकवरी में शामिल नहीं किया जाता. यानी कि केवल दिखावे का इतना बड़ा घाटा होती है ये अंडर रिकवरी. और अगर ये घाटा है भी तो केवल तेल मार्केटिंग कंपनियों का, तेल को खरीदने और बेचने का असल घाटा नहीं.

अब इस मंहगे तेल को अपनी या अपने देश की ही दूसरी कंपनी से खरीद कर सस्ते में बेचने पर जो घाटा होता है उसे अंडर रिकवरी कहते हैं.अगर अब घाटे के दूसरे पहलू पर नज़र डालें और पेट्रोल का उदाहरण लें तो इसकी कीमत में 55% हिस्सा केवल करों का ही होता है. इनमें से कुछ कर केंद्र सरकार(करीब 25 फीसदी) लगाती है तो कुछ राज्य सरकार(करीब 30 फीसदी). तेल उत्पादों से होने वाली कमाई इतनी है कि केंद्र को उत्पाद और आयात शुल्क से मिलने वाले कुल राजस्व का करीब 40 फीसद औऱ राज्यों को बिक्री कर से मिलने वाले कुल राजस्व का करीब 40 फीसद पेट्रोलियम पदार्थों से ही आता है. कोढ़ पर खाज ये है कि उत्पाद शुल्क का एक हिस्सा और राज्य सरकार द्वारा लगाए जा रहे सभी कर एड वेलोरम हैं यानी कि ये उत्पाद की मात्रा पर नहीं बल्कि उत्पाद की कीमत पर निर्भर करते हैं और अगर उत्पाद की कीमत बढ़ गई तो लगने वाला टैक्स भी बढ़ जाएगा. अगर सीधी साधी तरह से कहा जाए तो इस बार हुई तेल के दामों में बढ़ोत्तरी के बाद अगर राज्य सरकारें बिक्री कर से होने वाली अकूत कमाई को केवल स्थिर ही रखें बढ़ाएं नहीं तो भी पेट्रोल की कीमतों में करीब डेढ़ रुपया, डीज़ल की कीमतों में 50 पैसे से 1 रुपया तक और एलपीजी में 6 रुपये तक घटाये जा सकते हैं. मगर राज्य सरकारें पहले से ही तेल की मंहगाई का सदमा झेल रहे लोगों के टेंटुंवों को कुछ और दबाने से बाज ही नहीं आतीं. यहां ये और दीगर बात है कि हमारे करीब-करीब सारे पड़ोसी देशों में करों की मात्रा हमारे देश से काफी कम है. मसलन भारत के 55 फीसदी के बरक्स श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में पेट्रोल के लिए ये क्रमश: 37, 24 और 31 फीसदी ही है. 

हालांकि प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को किए संबोधन में राज्यों से भी अपना दायित्व निभाने की अपील की थी मगर उनके ऐसा करने से किसी पर कुछ फर्क पड़ता नहीं दिखा. हां सोनिया गांधी की कांग्रेस शासित राज्यों से अपील ने ज़रूर थोड़ा असर दिखाया जिससे कुछ राज्यों में दामों में हल्की गिरावट देखी गई और बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इसी तरह की अपील करनी पड़ी. मगर यहां सवाल ये उठता है कि पहले से ही सभी राज्यों से विचार करके कोई सुसंगत कदम क्यों नहीं उठाया गया? मान लिया कि सरकार जनता के गुस्से से बचने के लिए महीनों से कीमतों की बढ़ोत्तरी को टाल रही थी मगर जो करों में अब थोड़ा बहुत बदलाव किया गया है कम से कम वो तो पहले किया जा सकता था. प्रधानमंत्री भी तो केंद्रीय मंत्रियों से विभागों के खर्चे कम करने की अपील और इसके दिशानिर्देश पहले ही जारी कर सकते थे. 

दामों में बढ़ोत्तरी के बाद अगर राज्य सरकारें बिक्री कर से होने वाली अकूत कमाई को केवल स्थिर ही रखें तो भी पेट्रोल की कीमतों में करीब डेढ़ रुपया, डीज़ल की कीमतों में 50 पैसे से 1 रुपया तक और एलपीजी में 6 रुपये तक घटाये जा सकते हैं.

कुछ दिन पहले सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को कंगाली से बचाने के लिए वाम दलों ने भी सरकार को कुछ उपाय सुझाए थे मगर सरकार ने उनमें से ज़्यादातर को बिल्कुल ही नज़रअंदाज़ कर दिया गया. कर ढ़ांचे में बदलाव की सिफारिश करने के साथ वाम दलों का कहना था कि देश के निजी तेल उत्पादकों को सपने में भी ये उम्मीद नहीं रही होगी कि दुनिया में तेल की कीमतें और इसलिए उनका मुनाफा इस तरह कई सौ फीसदी बढ़ जाएगा, इसलिए निजी उत्पादकों पर एक समय अमेरिका द्वारा लगाए गए ‘अप्रत्याशित लाभ कर’ जैसा कर लगाया जाना चाहिए. वामदल ये भी चाहते थे कि 2007-08 में उत्पाद शुल्क और कॉरपोरेट शुल्क में रियायत से सरकार को करीब 1 लाख 40 हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और अगर इस शुल्क के एक छोटे से हिस्से को जारी रखा जाए तो इसका इस्तेमाल तेल कंपनियों को कर में छूट देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके अलावा वाम नेताओं का कहना था कि तेल उद्योग के विकास के लिए जो 7500 करोड़ रुपये सालाना का उपकर ओएनजीसी और ऑइल इंडिया लिमिटेड से लिया जाता है उसका इस्तेमाल कीमतों को स्थिर रखने के लिए किया जा सकता है. 

अब सब उपायों पर न सही तो इनमें से कुछ पर और इन पर भी पूरा नहीं तो आधा-अधूरा अमल तो किया ही जा सकता है. भले इससे सरकार के कथित लाखों के तेल घाटे में कोई खास फर्क नहीं पड़ता मगर सरकार के ही मुताबिक फर्क तो 5, 3 और 50 रुपये बढ़ाकर भी कोई खास नहीं पड़ा है. 

एक सरकारी सूत्र के मुताबिक पेट्रोल पर सीधे पांच रुपये बढ़ाने के पीछे सोच ये थी कि कीमतें बढ़ाने के बाद जनता की प्रतिक्रिया और मुद्रास्फीति के हिसाब से यूपीए शासित राज्यों में बिक्री कर कम करवाया जाएगा जिसके परिणामस्वरूप विरोधी दलों द्वारा शासित सरकारों पर भी कीमतें कम करने का दबाव बनेगा. इससे केंद्र को थोड़ा सा राहत मिलेगी और जनता की नाराज़गी भी थोड़ी कम होगी.

यहां विचारने लायक ये भी है कि पट्रोलियम पदार्थों पर सब्सिडी का फायदा उनमें से बहुत कम लोगों को मिलता है जिनके लिए ये घोषित रूप से दी जाती है. होता ये है कि ज़रूरतमंदों और गैरज़रूरतमंदों में भेद करने के लिए ज़रूरी तंत्र और नीतियों के अभाव में और सभी को उतनी सब्सिडी न दे पाने की स्थिति में सरकार कीमतों को कहीं बीच में रख देती है. नतीजा ये होता है कि दाम निचले तबके की जेब से बाहर चले जाते हैं और इसका सबसे ज़्यादा फायदा अनावश्यक रूप से उन्हें मिल जाता है जिन्हें इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

अंत में सरकार की मुश्किल ये है कि चूंकि चुनाव सर पर हैं इसलिए थोक के भाव घोषित लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च करने के लिए धन चाहिए मगर चुनाव सर पर है इसलिए ही पेट्रो उत्पादों के दाम बढ़ाकर जनता को नाराज़ और कहीं अगर इससे चौतरफा मंहगाई और बढ़ गई तो और भी ज़्यादा नाराज़ भी कैसे किया जा सकता है!

मगर जो कुछ किया जा सकता है वो सरकार ठीकठाक कर रही है ऐसा शायद ही कोई कह सकता हो…

संजय दुबे

बजट : राहत या दिखावट

पड़ोस में किराए के एक मकान में जगदीश गुप्ता जी रहते हैं. करीब चालीस साल के गुप्ता जी के परिवार में उनकी मां, पत्नी, एक बेटी और बेटा हैं. अगर दस साल की बेटी को भी गिन लिया जाए तो कुल मिलाकर घर में तीन महिला सदस्य हैं. गुप्ता जी की मासिक आय करीब 25-26000 रुपये है. हिसाब लगाएं तो साल भर में अगर अपनी तीन लाख से कुछ ज़्यादा की आमदनी में से वो कुछ भी न बचाएं—दिल्ली में पांच लोगों के परिवार में वैसे भी इतनी तनख्वाह में कोई बचत शायद ही मुमकिन हो—तो उन्हें नये बजट के मुताबिक करीब तीस हज़ार रुपये कर के रूप में सरकार को देने होंगे…

दूसरा उदाहरण मेरा ही लें. दिल्ली में पत्नी के साथ रहता हूं…ठीक-ठाक कमाता हूं, पत्नी भी कमाती है…इस साल तक कर के दायरे में आती थी मगर वित्तमंत्री के फज़ल से कर अयोग्य आय की सीमा एक लाख अस्सी हज़ार हो गई और अगर अगले साल उसकी वार्षिक आय न बढ़ी तो उसे इस सरकारी देनदारी से मुक्ति मिल जाएगी…पुरुषों की आयकर छूट की सीमा बढ़ने से गुप्ता परिवार की तीन ज़रूरतमंद महिलाओं को फायदा मिलता मगर महिलाओं के लिए छूट से ज़्यादातर फायदा उन्हें होगा जिन्हें शायद इससे ज़्यादा फर्क ही नहीं पड़ता.

अब कई सवाल उठते हैं: पहला, हमारे देश में मेरे जैसे परिवार ज़्यादा हैं या जगदीश गुप्ता जी जैसे? दूसरा, मेरी बीवी को कर में ज़्यादा छूट की ज़्यादा ज़रूरत है या गुप्ता जी को? तीसरा ज़्यादा महिलाओं को महिलाओं के नाम पर मिलने वाली आयकर छूट से फायदा होना है या पुरुषों को मिलने वाली आयकर छूट से? 

अगर पुरुषों की आयकर छूट की सीमा और बढ़ जाती तो गुप्ता जी के परिवार की तीन ज़रूरतमंद महिलाओं को इसका कुछ न कुछ फायदा ज़रूर मिलता मगर महिलाओं के लिए बजट में उद्घोषित छूट से ज़्यादातर फायदा उन्हें होगा जिन्हें इतना फायदा होने न होने से कोई खास फर्क ही नहीं पड़ता. 

यानी कि बिना सही ज़रूरतमंदों की पहचान किये उठाया गया ये कदम केवल महिलाओं को चुनावी वक्त में लुभाने की एक लोकलुभावन तरकीब जैसा है…

ऐसा ही कुछ वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी कहा जा सकता है. बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ा कर सवा दो लाख कर दी गई है…मगर सोचने योग्य बात ये है कि जो व्यक्ति साठ साल से ऊपर होने के बावजूद महीने के बीस हज़ार रुपये तक कमा रहा होगा वो कोई लल्लू पंजू तो होगा नहीं…फिर ऐसे लोग होंगे भी बहुत कम…और वैसे तो पैसा किसी को भी पूरा नहीं पड़ता मगर उसे इतनी छूट की शायद ही कोई ज़रूरत हो…यानी कि योजना का प्रचार बड़ा है मगर इसका फायदा उठाने वाली जनसंख्या का आकार बड़ा ही छोटा होगा…और जिन्हें इसका फायदा होगा उन्हें इसकी कोई ज़रूरत नहीं…

अब सरकार की बहुप्रचारित राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के भूसे में सुई ढूंढ़ते हैं…

ग्रामीण रोज़गार के लिए सरकार ने कितना बढ़िया काम किया है. एक योजना खत्म कर उसका धन दूसरी में डाला और बिना गांठ का कुछ खर्च किए इसका कार्य क्षेत्र भी बढ़ा दिया.

पता चला है कि इस योजना के मद में इस साल पिछले साल के बारह हज़ार करोड़ के मुकाबले सोलह हज़ार करोड़ रुपयों का आबंटन किया गया है मगर सच ये भी है कि पिछले साल के 330 ज़िलों के मुकाबले इस बार इसका क्षेत्र बढ़ाकर करीब 600 ज़िले कर दिया गया है…यानी कि पैसा बढ़ाया ज़रूर गया है मगर प्रति ज़िला मिलने वाला धन इस साल काफी कम हो गया है. और उस पर भी तुर्रा ये कि साल 2007-2008 में चलने वाली संपूर्ण ग्रामीण रोज़गार योजना को अब बिलकुल खत्म कर दिया गया है जिसके लिए पिछले साल करीब साढ़े तीन हज़ार करोड़ रुपये आबंटित किये गए थे. ज़रा सोचकर देखें कि ग्रामीण रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कितना बढ़िया काम किया है. एक योजना खत्म कर उसका बचा धन दूसरी में डाला और बिना गांठ का कुछ खर्च किए योजना का कार्य क्षेत्र करीब दुगुना कर दिया यानी कि सूत न कपास गुरूजी का बस लट्ठमलट्ठा.

अब आते हैं किसानों के साठ हज़ार करोड की ऋणमाफी की लगातार की जा रही सरकारी और कांग्रेसी मुनादी पर…इसके मुताबिक दो हेक्टेयर से कम जोत वाले किसानों का बकाया कर्ज़ा माफ कर दिया जाएगा और इससे बड़ी जोत वालों को एकमुश्त भुगतान करने पर केवल तीन चौथाई रकम ही चुकानी होगी. इस मामले में धन कहां से आएगा अभी तक स्पष्ट नहीं है मगर कहीं से भी आए क्या ये ज़रूरतमंदों तक पहुंचेगा?

हकीकत ये है कि बैंकों का ऋण अपेक्षाकृत संपन्न और गिने चुने किसानों को ही मिलता है और ज़्यादातर किसान साहूकारों से मिले कर्ज़ के जाल में गर्दन तक धंसे हुए होते हैं. बैंक ऐसे किसानों को कर्ज़ा देने से हमेशा ही झिझकते रहे हैं जिनसे, सिंचाई वगैरह के उचित संसाधन न होने की वजह से, कर्ज़ा वापस होने की उम्मीद कम हो. ये भी किसी से छिपा नहीं कि बैंक कम जोतों वाले किसानों से भी दूर ही रहना पसंद करते हैं…आखिर उन्हें अपने व्यापारिक हितों को भी तो देखना है. इसके अलावा विदर्भ और बुंदेलखंड में कितने ही ऐसे लोगों ने आत्महत्याएं की हैं या करने की कगार पर हैं जिनकी जोतें कर्ज़माफी के दायरे में ही नहीं आतीं. यानी कि किसानों की समस्याओं को उनकी जोतों के आकार के आधार पर नापना कतई उचित नहीं…पूछा जा सकता है कि छोटी जोत वाले और संकटग्रस्त बड़ी जोत वालों को तो कर्ज़ मिलता ही नहीं तो सरकार कर्ज़माफी देने किसे जा रही है? शायद बहुत थोड़े  बड़ी जोत वाले उन संपन्न किसानों को जो पिछले कर्जे का तीन चौथाई वापस कर अगला कर्ज़ लेने की तैयारी कर रहे हैं.

अब सवाल ये है कि कांग्रेस पार्टी जो बजट के ज़रिए किसानों और दूसरे ज़रूरतमंदों को तरक्की के सब्ज़बाग दिखा खुद भी फिर से सत्ता में आने के ख्वाब देख रही है, लोगों को बजट का असली अर्थशास्त्र समझने का वक्त देती है या नहीं?

संजय दुबे

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आरक्षण कथा और पड़ चुकी प्रथा

आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सभी के हितों को ध्यान में रखने की कोशिश की है मगर राजनेताओं और आरक्षण की ज़रूरत न होते हुए भी इसका लाभ उठाने की मंशा रखने वाले लोगों को इसमें कई गाँठें नज़र आ रही हैं. उन्हें क्रीमी लेयर यानी कि मलाईदार तबके को बाहर रखने के न्यायालय के निर्णय के पीछे कोई तुक-तान ही नज़र नहीं आ रही. कहा जा रहा है कि अभी तक सरकारी नौकरियों में ही आरक्षण लागू होने के 15 साल बाद भी अन्य पिछडे़ वर्गों का कुल प्रतिनिधित्व केवल 5 प्रतिशत के करीब ही है तो ऐसे में उच्च शिक्षा में भी ज्यादातर आरक्षित सीटें सामान्य श्रेणी के लोगों के खाते में चली जायेंगी और इस हालत में उनको पहले से भी ज़्यादा फायदा मिल जायेगा क्योंकि सामान्य सीटों की संख्या में तो कोई परिवर्तन किया ही नहीं जा रहा और ऊपर से 20-22 प्रतिशत उन सीटों का फायदा उन्हें और मिलेगा जिसका फायदा उठाने की स्थिति में ओबीसी उम्मीदवार नहीं होंगे.

मगर यदि किसी सीढ़ी में ऊपर के एक या दो पायदान ही हों और नीचे के पायदान नदारद हों तो ऐसा तो होगा ही. पहले नौकरियों के लिए लोग नहीं मिले तो अब उच्च शिक्षा के लिए भी नहीं मिलेंगे. सवाल ये है कि उल्टी गंगा बहाने की बजाय चीजों को सही क्रम में या फ़िर सभी को एक साथ क्यों नहीं होने दिया गया. मसलन ऐसा भी हो सकता था कि पिछडे तबकों के लिए ज़रूरी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का बंदोबस्त किया जाता  और साथ ही मान लीजिये उन्हें 27 प्रतिशत आरक्षण उच्च शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में भी दे दिया जाता. शुरुआती कुछ सालों तक आरक्षण का फायदा भले ही इन्हें उतना न मिलता और आरक्षित स्थान सामान्य वर्ग को चले जाते मगर जैसे ही शिक्षा ज़्यादा लोगों में और ऊपर की तरफ़ अपने पैर पसारती स्थितियां बदलती ही बदलतीं. ऐसा न करने की स्थिति में केवल 5 प्रतिशत पिछडे वर्गों के अगडे़(क्रीमी लेयर) ही बार बार मलाई खाते रहेंगे. मगर ऐसा करने के लिए हमारे नीति निर्माताओं को दूरदृष्टि और मेहनत करने की ज़रूरत होती सो ऐसा नहीं हो पाया.

मगर यदि किसी सीढ़ी में ऊपर के एक या दो पायदान ही हों और नीचे के पायदान नदारद हों तो ऐसा तो होगा ही. पहले नौकरियों के लिए लोग नहीं मिले तो अब उच्च शिक्षा के लिए भी नहीं मिलेंगे.

दरअसल मंडल कमीशन की सिफारिशों पर आधारित अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की जड़ में ही विवाद रहा है. पहले तो 1978 में बनाए गए मंडल कमीशन ने ओबीसी की गिनती के लिए 1931 की जनगणना को आधार बनाया और 47 साल में आए अनगिनत परिवर्तनों का ध्यान इसमें रखा ही नहीं गया. इसके अलावा इसके बाद आए कई सर्वेक्षणों ने ओबीसी की संख्या कुछ अलग ही बताई–मंडल कमीशन 52%, नेशनल सैम्पल सर्वे 36% और नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे 33%. यहाँ तक कि आयोग के एकमात्र दलित सदस्य एल आर नाइक ने तो आयोग की सिफारिशों पर हस्ताक्षर करने तक से इनकार कर दिया था. उनका मानना था कि ओबीसी कोई एक नहीं बल्कि उच्च और अत्यधिक पिछड़ा दो वर्गों में विभक्त है और इन्हें एक साथ मिलाने पर सारा फायदा उच्च अन्य पिछडा वर्ग द्वारा हड़प लिए जाने का ख़तरा था. 

हालांकि मंडल आयोग का गठन तो आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी की सरकार ने किया था मगर इसने अपनी रिपोर्ट 1980 में इंदिरा सरकार को सौंपी. रिपोर्ट की मुख्य सिफारिश थी अन्य पिछडा वर्ग के लिए केन्द्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 फीसद आरक्षण. चूंकि एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसद से कम निर्धारित कर दी थी इसलिए अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के 22.5 फीसद के ऊपर ये अधिकतम आरक्षण था जिसकी आयोग सिफारिश कर सकता था. मामले की गंभीरता को समझ कर इंदिरा गांधी और उनके बाद राजीव गांधी ने इस रिपोर्ट को 10 साल तक ठंडे बस्ते में ही पड़े रहने देने में अपनी भलाई समझी. 

इसके बाद 1989 में आई वीपी सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार जिसने अपने ग्यारह महीने के कार्यकाल में श्रीलंका से शांति सेना वापस बुलाने के अलावा अगर कुछ और उल्लेखनीय किया तो वो थी आपसी जूतम पैजार. ये देश की पहली गठबंधन सरकार थी और इसमें देवीलाल और चन्द्रशेखर जैसे महारथी शामिल थे. अगस्त 1990 तक आते-आते स्थितियां ऐसी बिगड़ी कि वीपी सिंह को ताऊ देवीलाल को सरकार से ही बर्खास्त करना पडा. बस उसके तीन चार दिन बाद और देवीलाल की उनको चुनौती देने वाली विशाल किसान रैली के 1-2 दिन पहले ही वी पी सिंह ने अचानक, मंडल कमीशन की पहली किश्त यानी कि केन्द्रीय नियुक्तियों में अन्य पिछडा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी. उनके इस अचानक निर्णय से न केवल पूरा देश बल्कि उनके निकटवर्ती, केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य और सरकार को समर्थन दे रहीं बीजेपी और वाम पार्टियां भी अचंभित रह गईं.

आने वाले कई महीनों तक देश में अराजकता का माहौल रहा और शायद ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि देशवासियों को तो छोड़ ही दें, आरक्षण लागू करने वालों से लेकर तमाम और दूसरे जिम्मेदार लोगों तक को इसके बारे में पहले से पता नहीं था. 

जानकारों का मानना है कि यदि थोड़ी बुद्धि और विवेक से काम लिया गया होता तो धीरे-धीरे जातियों को भूलने की कोशिश करता समाज एक नई तरह से दोफाड़ न हुआ होता क्योंकि आरक्षण की ज़रूरत से शायद ही किसी को इनकार हो मगर इसके और इसे लागू करने के तौर-तरीकों ने एक नए विवाद को जन्म दिया. मसलन 1931 से 1990 के बीच आज़ादी, बंटवारे की वजह से हुए सबसे ज़्यादा खटकने वाली बात जो रही वो ये कि आजादी के बाद से चले आ रहे अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण का ठंडे दिमाग से आंकलन इसके गुण दोषों को परखने और उससे सबक लेने का भी कोई प्रयास नहीं किया गया.विस्थापन, हरित क्रांति, भूमिसुधारों और राजनीतिक उठापटक के चलते देश की सामाजिक- आर्थिक परिस्थितियों में काफी बदलाव आ चुके थे. मगर इन पर ध्यान देने की कोई ज़रूरत ही नहीं समझी गई. इसके अलावा इसके परिणाम जिनके ख़िलाफ़ जाने वाले थे उन्हें विश्वास में लेने के कोई प्रयास तो किए ही नहीं गए बल्कि उनके हर तार्किक-अतार्किक विरोध को पिछड़ी जातियों के दिमाग में उनके ख़िलाफ़ विष के बीज बोने के लिए इस्तेमाल किया गया. इसके अलावा सबसे ज़्यादा खटकने वाली बात जो रही वो ये कि आजादी के बाद से चले आ रहे अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण का ठंडे दिमाग से आंकलन कर दबे कुचले तबकों की उन्नति के इस तरीके के गुण दोषों को परखने और उससे सबक लेने का भी कोई प्रयास नहीं किया गया. 

आर्थिक सुधारों से पहले वाले दौर में अपेक्षाकृत असमृद्ध उत्तर प्रदेश और बिहार के कथित अगडे़ युवाओं के लिए ये किसी गहरे सदमे से कम नहीं था क्योंकि सरकारी नौकरियां हीं थीं जिनके भरोसे वे बेहतर भविष्य के सपने देखा करते थे.  उस पर तुर्रा ये कि उनको लग रहा था कि उनसे छीन कर ये नौकरियां जाट, यादव और कुर्मी जैसी उनके जैसी ही हालत वाली जातियों के युवाओं को दी जा रही हैं. कुछ मामलों में तो स्थितियां बिलकुल उलट ही थीं.

साफ था कि वी पी सिंह का फैसला अपनी राजनीतिक मजबूरियों और महत्वाकांक्षाओं का परिणाम ज़्यादा और सदियों से दबे कुचले लोगों की दशा सुधारने की मंशा से कम था जिसकी परिणति पूरे देश ने भुगती.

ऐसा ही कुछ वर्तमान यूपीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने भी मंडल कमीशन की दूसरी किश्त यानी कि अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 % आरक्षण लागू करने के लिए किया. न तो पिछले अनुभवों से कुछ सीखा गया, न सुप्रीम कोर्ट के पिछले सुझावों पर ही कोई ध्यान दिया गया. इसके अलावा उन्होंने एकतरफा ऐलान करके किसी और के लिए भी कुछ और सोचने समझने की गुंजाइश नहीं छोड़ी. पिछली बार के वीपी सिंह के फैसले से केवल एक चीज़ अलग हुई वो ये कि पिछला फैसला केवल एक सरकारी आदेश के ज़रिए आया था और इस बार ये आनन-फानन में संसद द्वारा एक कानून बनवा कर लागू करने की कोशिश की गई.

सवाल ये उठता है कि पिछड़ों के पहरुआ हमारे राजनेताओं को सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्रीमी लेयर का प्रावधान रखे जाने पर और सुप्रीम कोर्ट को सीधे-सीधे जाति के आधार पर आरक्षण लागू किए जाने पर क्या आपत्ति है? 

जवाब है कि हमारा पूरा संविधान अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा जाति की कोई बात ही नहीं करता. अगर वो कहीं ऐसा करता भी है तो नकारात्मक संदर्भों में जैसे कि जाति के आधार पर किसी को अछूत नहीं माना जा सकता, किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता आदि इत्यादि. इसके अलावा आरक्षण का जो प्रावधान हमारे संविधान में रखा गया है वो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए है न कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए. अब सुप्रीम कोर्ट का ये मानना है कि या तो वर्गों की पहचान किसी और न्याय संगत आधार पर हो या फिर अगर जातियों को आधार बनाया जाए तो उसमें से गैरज़रूरतमंद लोगों (क्रीमीलेयर) को बाहर करने पर ही संविधान में मौजूद परिभाषा के अनुरूप ज़रूरतमंद वर्ग बन सकता है. अनुसूचित जाति और जनजातियों के मामले में, इन्हें आरक्षण देते समय इनकी हालत इतनी दबी कुचली थी कि इन्हें जातियों के आधार पर ही आरक्षण देने का प्रावधान कर दिया गया. 

सुप्रीम कोर्ट का ये मानना है कि या तो वर्गों की पहचान किसी और न्याय संगत आधार पर हो या फिर अगर जातियों को आधार बनाया जाए तो उसमें से गैरज़रूरतमंद लोगों (क्रीमीलेयर) को बाहर करने पर ही संविधान में मौजूद परिभाषा के अनुरूप ज़रूरतमंद वर्ग बन सकता है.

राजनीतिज्ञ अपने राजनीतिक और निजी स्वार्थ वश यही बात समझ कर भी नहीं समझना चाहते. उन्होंने पहले भी इस तरह की बात का विरोध किया और 1993 में सुप्रीम कोर्ट के डंडे के बाद जब इसे लागू भी किया तो क्रीमी लेयर के दायरे से खुद को बाहर रखा—सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार द्वारा 1993 में जारी ऑफिस मेमोरेंडम में क्रीमीलेयर के अंतर्गत संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों जैसे कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, नौकरशाहों तथा सेना अधिकारियों के बच्चों को तो शामिल कर दिया गया मगर ये राजनीतिकों के मसले पर एक शब्द भी नहीं बोला. इस बार भी हालांकि पांच जजों की बेंच में से एक जज ने वर्तमान और पूर्व सांसदों और विधायकों को क्रीमीलेयर में शामिल करने की बात कही है मगर ऐसा होना नामुमकिन ही है. 

क्रीमीलेयर के मसले पर दोनों पक्षों की तरफ से कुछ और भी तर्क दिए जा रहे हैं जैसे कि आरक्षण के पक्षधर राजनीतिज्ञ कह रहे हैं कि ये आर्थिक लाभ का नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का उपकरण है इसलिए आर्थिक आधार पर क्रीमी लेयर बना कर किसी को भी इससे वंचित करना उचित नहीं. तो उसपर ये भी कहा जा सकता है कि सामाजिक न्याय दिलाने के लिए तो औऱ भी कई तरह की योजनाएं और कानून बनाए जा सकते थे मगर सबसे पहला जो काम किया गया वो नौकरियों में आरक्षण देकर उनकी सामाजिक स्थिति के साथ आर्थिक स्थिति भी मज़बूत करना था. वैसे भी कम से कम आज के वैश्वीकरण वाले दौर में लोगों की हर तरह की स्थितियां पैसे की बिना पर ही बनती और बिगड़ती हैं…जैसे कि लंबी कार में जा रहे एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति और साइकिल पर हांफ रहे एक सवर्ण में से किसको आजकल ज़्यादा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है सोचना मुश्किल नहीं. तो ऐसे में ये सोचना पूरी तरह अनुचित नहीं कि जब आर्थिक रूप से समृद्ध व्यक्ति सामाजिक रूप से भी प्रतिष्ठित होगा तो फिर उसे आरक्षण में शामिल करके किस सामाजिक न्याय की बात की जा सकती है. 

दूसरी ओर कुछ लोग ये तर्क दे रहे हैं कि अब जब कोर्ट ने आर्थिक आधार पर कथित पिछड़ी जातियों के संपन्न लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया है तो आर्थिक आधार पर ही कथित अगड़ी जातियों के विपन्न लोगों को भी आरक्षण के दायरे में लाया जाना चाहिए…भले ही ये बात पहले सही न हो मगर आज के संदर्भ में इस तरह के तर्क को पूरी तरह से कैसे नज़र अंदाज़ किया जा सकता है? मायावती जैसे दलित नेताओं ने तो इस पर खुल के बात करना भी शुरु कर दिया है मगर ये सब तर्क की कसौटी पर कस के नहीं बल्कि राजनीतिक लाभ हानि का हिसाब कर के ही किया जा रहा है. 

आरक्षण लागू करते समय मंशा ये थी कि थोड़े–थोड़े समय के बाद लाभार्थियों की तालिका में संशोधन किया जाएगा और ऊपर उठ चुके वर्गों या लोगों को इसके दायरे से बाहर लाया जाएगा. मगर ये तालिका छोटी होने की बजाय लंबी ही होती गई औऱ आगे भी होने की उम्मीद है. अब जिस तरह की स्थितियां बन चुकी हैं उनमें आरक्षण का मकसद हासिल करके इसे खत्म करने की संभावनाएं न के बराबर दिखती है. क्योंकि आरक्षण का आधार अब ज़रूरत की पूर्ति नहीं बल्कि छुद्र राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति है.

संजय दुबे

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