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‘उनकी मौत का शोक कैसे मनाएंगे’

काबुल स्थित भारतीय दूतावास में दूसरे नंबर के अधिकारी(डेप्युटी चीफ ऑफ मिशन) संदीप कुमार याद कर रहे हैं कि किस तरह वे एक जोखिम भरे अनुभव का रोमांच महसूस करने काबुल आए थे. मगर जब ऐसा अनुभव हुआ तो वो अपने साथ रोमांच की बजाय उनके साथियों की जुदाई का शोक लेकर आया.

सात जुलाई को काबुल में भारतीय दूतावास पर आत्मघाती बम हमले के दौरान मेरे सहकर्मी वेंकट के कमरे की घड़ी आठ बजकर 27 मिनट पर रुक गई. इमारत के ज्यादातर कमरों की तरह वेंकट के कमरे में भी हर तरफ शीशे और मलबे के टुकड़े बिखरे पड़े थे. मगर तबाही के इस मंजर में ये घड़ी उनकी मौत का लम्हा दर्ज करते हुए किसी तरह सलामत बची रह गई. तालिबान के पतन के बाद राजधानी में हुआ ये सबसे भयानक हमला है. धमाके का वक्त एक दूसरी घड़ी में भी दर्ज है जो दूतावास में सुरक्षा सलाहकार ब्रिगेडियर मेहता के शव से बरामद हुई है. उनके शरीर के तो चीथड़े उड़ गए मगर घड़ी को खरोंच तक नहीं आई.

धमाके के कुछ मिनट बाद ही मैं पुलिस बैरीकेड्स के बीच से किसी तरह रास्ता बनाते हुए दूतावास की इमारत में दाखिल होता हूं. हर तरफ खून, शरीर के टुकड़े, मलबा और बुरी तरह क्षतिग्रस्त कारों के अवशेष नजर आ रहे हैं. ये बर्बादी उस 100-125 किलो विस्फोटक ने मचाई जिसे एक टोयोटा कोरोला कार में सवार हमलावर ने इमारत के गेट से टकरा दिया था. सामने मुझे एक जानी-पहचानी कार के कुछ बचे-खुचे हिस्से नजर आते हैं. “ये कौन सी कार है?” मैं पूछता हूं. “आपकी, सफेद लैंड क्रूज़र.”, जवाब मिलता है. इसे कौन चला रहा था या इसमें और कौन लोग सवार थे जैसे सवालों का जवाब तत्काल मिलना मुश्किल है क्योंकि अभी तो यही पता नहीं है कि कितने लोग हताहत हुए हैं.

खबर फैलते ही सभी स्टाफर्स को उनके आवास से हटाकर एक छोटे से कमरे में इकट्ठा किया जाता है. एकजुटता की भावना में हम सभी एक दूसरे के हाथ पकड़कर एक गोल घेरा बना लेते हैं. हमें पता है कि ये हम सभी की मिलीजुली त्रासदी है. रात को हम राजदूत के आवास में बैठे हैं. दिन की घटना को याद कर मेरे बदन में झुरझुरी दौड़ जाती है. हममें से कोई भी उस हादसे का शिकार हो सकता था. मैं या कोई भी दूसरा. सभी चीजें ठीक ऐसी ही रहतीं, बस हताहतों के नाम बदल जाते. मैं कल्पना करता हूं कि अगर कभी मेरे साथ इस तरह की दुर्घटना होगी तो किस तरह एक विशेष विमान मेरे शव को लेने आएगा, किस तरह शव को सुरक्षित रखने के लिए उस पर रसायनों का लेप किया जाएगा, मेरे साथियों की क्या प्रतिक्रिया होगी, कैसे वे मुझे याद करेंगे और किस तरह वेंकट के कमरे के पास ही स्थित मेरे ऑफिस की घड़ी में मेरी मौत का लम्हा दर्ज होगा.

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आप अपने साथियों, जिनके साथ आपने एक दूसरे से सटे ऑफिसों में कई दिन बिताए हो, की मौत का शोक कैसे मनाएंगे?  ऐसे साथी जिनके साथ आपने काबुल जैसी अपरिचित जगह पर जिंदगी की छोटी-बड़ी मुश्किलें साझा की हों?

जवाब है उस विरासत पर दृढ़ रहकर जो उन्होंने छोड़ी है, उस देश के पुनर्निमाण में जुटे रहकर जिसे वे चाहते थे, इन बर्बर हमलों से न डरने का संकल्प लेकर और अपने पति का शव लेने आई वेंकट की पत्नी के इन प्रेरणादायी शब्दों पर अमल कर—“मैं काबुल में नहीं रोऊंगी क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आतंक के सौदागर मुझे रोता हुआ देखें. वो हम पर हावी नहीं हो सकते. हम उन्हें उनके इरादों में कामयाब नहीं होने देंगे.”

आप उन 60 अफगानियों के लिए किस तरह शोक व्यक्त करेंगे जिन्हें धमाके में जान गंवानी पड़ी? जिनके परिवारों के लिए दुनिया एक सेकेंड में बदल गई? टीवी पर इस घटना से जुड़ी खबरें देखते हुए मैं ये सोचकर हैरान होता हूं कि ज्यादातर लोग आघात से उबरने की सामर्थ्य, वीरता और हौसले का जज्बा दिखा रहे हैं.

और आप अपने कर्तव्य के लिए समर्पित स्थानीय ड्राइवर नियामत के लिए किस तरह शोक व्यक्त करेंगे? वह काबुल में मेरा मार्गदर्शक था. मुझे याद है कि 15 दिसंबर 2007 की सर्द दोपहर जब मैं इस मुल्क में पहुंचा था तो हवाई अड्डे पर वो ही मुझे लेने आया था. तब से सात जुलाई तक नियामत लगातार मेरा साथी रहा. मैं कहां जाता हूं, किससे मिलता हूं, क्या करता हूं, सब कुछ उसे मालूम होता था. मैं भी उससे कुछ नहीं छिपाता था. नियामत मेरा विश्वासपात्र, मित्र और भाई हो गया था. अगर किसी दिन काबुल में कोई हादसा होता था तो हालात की जानकारी लेने के लिए मैं सबसे पहले उसे फोन करता था. उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन मैं उसके गाड़ी लेकर आने का इंतजार कर रहा था. दहला देने वाले धमाके के बाद दूतावास वाली दिशा में धुआं उठते देख मैंने सबसे पहले उसे ही फोन किया. मगर जब फोन पर ‘नो नेटवर्क’ का संदेश आया तो मुझे किसी अपशकुन की आशंका हो गई थी.

मैं सबसे कहा करता था कि नियामत उन लोगों में से है जो हमारी सुरक्षा के लिए अपनी जान तक दे सकते हैं. और यही हुआ. बाद में जब मैं दूतावास पहुंचा तो मैंने पाया कि उसकी लाश बुरी तरह जल गई थी. लोगों की नजरें बचाकर मैंने उसे सैल्यूट किया और मृतक को सम्मान देने की अफगानी परंपरा के मुताबिक अपना हाथ छाती पर रख लिया.

मेरे होटल के बाहर जावेद नाम का एक बच्चा खड़ा रहता है जो च्यूइंग गम बेचता है. आजकल वो हैरान है. उसे समझ में नहीं आ रहा कि सफेद लैंडक्रूज़र अब मुझे लेने क्यों नहीं आती. उसकी आंखें नियामत को भी खोजती हैं. वह मुझसे पूछता है कि नियामत को क्या हुआ. मैं उसका हाथ पकड़े सिर्फ चुपचाप उसके पास खड़ा रहता हूं. मैं नहीं चाहता कि वो दर्द उस तक भी पहुंचे. 

इसी समय मुझे ये भी अहसास होता है कि नियामत, वेंकट या ब्रिगेडियर मेहता के बच्चों के लिए ये सोचना कितना मुश्किल है कि उनके पिता के साथ क्या हुआ और क्यों हुआ. ये बात दुनिया के उन दूसरे बच्चों के लिए भी उतनी ही सच है जिन्हें अपने पिता को इस तरह खोना पड़ता है.

अफगान अपनी मेहमाननवाज़ी के लिए जाने जाते हैं और कई मौकों पर नियामत मुझे अपने घर आने का निमंत्रण दिया करता था. मगर मैं कभी वक्त नहीं निकाल पाया. अब वो इस दुनिया में नहीं है तो मैं उसके घर जा रहा हूं. अब ये मेरे लिए एक तीर्थयात्रा है. काबुल के बाहरी इलाके में स्थित ईंटों से बने घर में घुसते हुए मुझे नियामत की मौजूदगी का अहसास होता है. ऐसा लगता है जैसे उसकी रूह यहां की हवा में तैर रही हो. चार से 15 साल की उम्र के उसके आठ बच्चे एक दूसरे से सटे जमीन पर बिछे कालीनों पर बैठे हुए हैं. मैं उनकी असाधारण खूबसूरती देखकर हैरान हो जाता हूं. लगता है जैसे सबमें नियामत का अक्स उतर आया हो—शानदार हरी आंखें, भूरे बाल, लंबी और तीखी नाक और धनुषाकार भंवें. मैंने कभी भी ऐसा कोई परिवार नहीं देखा जिसके सदस्य शक्लोसूरत में एक-दूसरे से इतना मिलते हों. ऐसा लगता है हर कोई एक दूसरे का बड़ा या छोटा रूप है. मेरे बदन में सिहरन दौड़ जाती है. मैं चुपचाप बच्चों के साथ बैठ जाता हूं. वे रो रहे हैं मगर कोई आवाज नहीं आ रही. घर पर कोई आया है और उन्हें गरिमा बनाए रखनी है इसलिए वे चुपचाप आंसू बहा रहे हैं. बच्चे ऐसे नहीं रोते. मगर जिंदगी में आए इस अप्रत्याशित बदलाव ने उन्हें अनजाने में ही वयस्कों जैसा बना दिया है. वे एक-एक कर मेरे पास आते हैं. मैं उन्हें चूमता हूं और फिर उन सबको गले लगा लेता हूं.

नियामत की सबसे छोटी बेटी को अपनी गोद में उठाए मैं बाहर आता हूं. दोपहर के सूरज की चमक उसके भूरे बालों के साथ मिलकर एक सुनहरा आभामंडल बना रही है. मुझे अहसास होता है कि नियामत की आत्मा अब मेरे आसपास नहीं बल्कि मेरे भीतर ही है और मैं जब तक इस मुल्क में रहूंगा वो किसी फरिश्ते की तरह मेरी हिफाजत करेगी. ठीक वैसे ही जैसे नियामत किया करता था.

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उस रात मैं खुद को याद दिलाता हूं कि मैं जोखिम भरे अनुभवों का आनंद लेने के लिए अफगानिस्तान आया था. ब्रिगेडियर मेहता से मैं कई बार मजाक में कहता था कि अगर कोई खतरनाक अनुभव नहीं हुआ तो अफगानिस्तान में पोस्टिंग बेकार हो जाएगी. अगवा करने की कोई घटना या कोई विमान अपहरण, जिसमें कुछ दिन के बाद सुरक्षित रिहाई हो जाए, रोमांच पैदा करने के लिए काफी होगी. बस उसमें कोई खून-खराबा न हो. और देखिए मुझे क्या मिला. इतना भयंकर और घातक बम धमाका. अपनी कल्पना में हमेशा मैं ऐसी घटनाओं के केंद्र में खुद को रखा करता था. मगर वास्तविक जिंदगी में इस घटना का केंद्रीय पात्र और लोग बन गए.

अंतरात्मा की सुनने वाला मार्क्सवादी

14 वीं शताब्दी में इंग्लैंड के लॉर्ड चांसलर(इंग्लैंड के उच्च सदन हाउस ऑफ लॉर्डस के अध्यक्ष) मोर ने सिद्धांतों को व्यावहारिकता पर तरजीह देते हुए अपने मित्र हेनरी अष्टम की तलाक की याचिका पर सहमति की मुहर लगाने से इनकार कर दिया था। अपने सिद्धांतों की रक्षा की खातिर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया, गिरफ्तार हुए और मौत को गले लगा लिया।

वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पिछले कुछ दिनों में जो कुछ किया है सिद्धांतों के लिहाज से कुछ-कुछ मोर की याद दिला देता है। चटर्जी ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के उस आदेश को नज़रअंदाज कर दिया जिसमें उन्हें लोकसभा अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर 22 जुलाई को मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ विश्वासमत प्रस्ताव पर वोट डालने के लिए कहा गया था। 

सवाल ये उठता है कि भारतीय राजनीति की सबसे अनुशासित पार्टी की संस्कृति में आकंठ डूबे इस व्यक्ति को किस चीज़ ने इतना मुखर विद्रोही बना दिया? 79 वर्षीय सोमनाथदा को नज़दीक से जानने वालों के लिए उनकी समझौता न करने वाली छवि कोई नई बात नही है। उनकी अपनी एक मौलिक सोच हैं और इसका आभास उनके साधारण से घर की दीवारों पर देखने से ही मिल जाता है। यहां सिर्फ दो चित्र नज़र आते हैं. एक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और दूसरा ज्योति बसु का। स्पष्ट रूप से यही दो लोग उनके आदर्श हैं। मार्क्सवादियों के आदर्श ब्लादिमिर लेनिन, कार्ल मार्क्स या फ्रेडरिक एंगल के उलट उनकी ये पसंद हैरत में डालती है। चुनौती देना शुरुआत से ही उनके चरित्र का हिस्सा रहा है। उनके पिता निर्मलचंद्र, हिंदू महासभा के अध्यक्ष और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विश्वस्त थे। इस पारिवारिक विरासत के बावजूद उन्होंने 1968 में सीपीएम से जुड़ने का फैसला किया।

चुनौती देना शुरुआत से ही उनके चरित्र का हिस्सा रहा है। उनके पिता निर्मलचंद्र, हिंदू महासभा के अध्यक्ष और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विश्वस्त थे। इस पारिवारिक विरासत के बावजूद उन्होंने 1968 में सीपीएम से जुड़ने का फैसला किया। ये उनकी स्वतंत्र सोच का परिचायक था जिसका प्रदर्शन बाद में उन्होंने समय-समय पर किया। 1971 में उन्होंने बोलेपुर से निर्दलीय के रूप में–सीपीएम के समर्थन से–उपचुनाव जीता। ये सीट उनके पिता की मृत्यु हो जाने से खाली हुई थी। इसके बाद वो सीपीएम के टिकट पर अगले नौ लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। इस दौरान 1984 में उन्हें सिर्फ एक बार ममता बनर्जी के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा।

लेकिन सीपीएम से अपने चार दशक लंबे जुड़ाव के बावजूद चटर्जी कभी भी पूरा तरह से पार्टी का हिस्सा नहीं बन सके। वो पार्टी से बर्खास्त किए जाने के वक्त भी पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य नहीं थे। उन्हें पार्टी की केंद्रीय समिति का सदस्य भी 90 के दशक के अंत में ज्योति बसु के आग्रह पर बनाया गया था। 

उनसे किसी को नाराज़गी नहीं है लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि उनकी अलग सोच और खुल के बोलने की आदत परेशानी का कारण बन जाते हैं। 1996 में जब ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनने का मौका चूक गए तब उन्होंने तो सिर्फ इतना कहा कि सीपीएम द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री न बनने देना एक ऐतिहासिक भूल थी। ये कितनी बड़ी भूल थी ये पार्टी के भीतर और मीडिया में हर सुनने की चाह रखने वाले को चटर्जी ने बताया। उन्होंने कहा कि मार्क्सवादियों को अब बैकसीट ड्राइविंग बंद कर देनी चाहिए। बंगाल अब पीछे से राजनीति करने वालों को नहीं झेल सकता।

अगर उन्होंने पार्टी के कट्टरवादियों और उनकी नियंत्रणवादी प्रवृत्ति की आलोचना की तो किसी मुद्दे पर असहमत होने पर अपने नज़दीकियों को भी नहीं बख्शा। इस बात को जानते हुए भी कि ज्योति बसु कट्टर सीटू(कंफेडरेशन ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन) नेता थे, सोमनाथ ने जूट मिलों को बंद करवाने के सीटू के तौर तरीके पर खुल कर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया। उन्होंने एक बार कहा था, तालाबंदी आखिरी विकल्प है। इसका सहारा तभी लेना चाहिए जब आपके पास दूसरा कोई विकल्प ही न बचा हो। 

ट्रेड यूनियनों के साथ उनके टकराव को भांप कर बसु ने उन्हें पश्चिम बंगाल व्यापार विकास निगम (डब्ल्यूबीआईडीसी) का चेयरमैन बना दिया। उत्साही सोमनाथ तुरंत ही राज्य में निजी निवेश का खाका खींचने लगे। उन्होंने निजी कंपनियों के साथ रिकॉर्ड 100 से ज्यादा समझौतों पर दस्तखत किए। ये अलग बात है कि उनमें से करीब 95 फीसदी असफल रहे क्योंकि चटर्जी की योजनाओं को उनकी पार्टी का ही समर्थन नहीं मिल सका। इनमें से एक योजना कोल इंडिया द्वारा कोलकाता के पूर्वी बाइपास के पास विशाल हॉस्पिटल बनाने की थी, मगर ये शिलान्यास से आगे नहीं बढ़ सकी।

पर इस तरह के प्रतिरोध न तो उनकी एकाग्रता को भंग कर सके और न ही उनकी कोशिशों को। उन्होंने डब्ल्यूबीआईडीसी के अपने सहयोगियों से निराश न होने और देश के शीर्ष उद्योगपतियों के संपर्क में बने रहने को कहा। वो कहते थे, आपको उन नकारात्मक विचारों का खात्मा करना है जो बाहरी दुनिया के मन में पश्चिम बंगाल के प्रति हैं। विचारधारा पर कायम रहना और निजी निवेश की आवश्यकता को समझने की क्षमता ही उनकी एकमात्र ताकत नहीं थी। उनकी क़ानूनी प्रतिभा भी देखने योग्य थी। 1984 में पश्चिम बंगाल सरकार की पैरवी करते हुए उन्होंने एक ऐसी ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को देश की चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। केस का विषय ये था कि क्या मतदाता सूची में नाम न होने की हालत में किसी चुनाव को रोका जा सकता है। चटर्जी ने तर्क दिया कि एक बार शुरू हो जाने के बाद चुनावी प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता और भारत में ये संभव ही नहीं है कि सारे वोटरों के नाम मतदाता सूची में शामिल हों।1984 में पश्चिम बंगाल सरकार की पैरवी करते हुए उन्होंने एक ऐसी ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को देश की चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

सोमनाथ के विरोधी (मुख्यत: मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य और उद्योगमंत्री निरुपम सेन) कभी भी खुलेआम उनसे मुकाबला नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सोमनाथ को हाशिए पर धेकलने का रास्ता चुना। उन्होंने पार्टी में उनकी महत्ता को कम करके बोलेपुर में उन्हें कुछ छोटी-छोटी परियोजना के काम में लगा दिया। चटर्जी ने श्रीनिकेतन और शांतिनिकेतन विकास प्राधिकरण स्थापित करके उसी उत्साह से विकास परियोजनाओं की शुरुआत की जैसा उत्साह उन्होंने राज्य में निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए दिखाया था। जब पार्टी ने उनकी आलोचना की और उन्हें कोर्ट में घसीटा गया–वामपंथी लेखिका महाश्वेता देवी ने ये कह कर उन्हें कोर्ट में घसीटा कि वो शांति निकेतन की खोवाई या लाल मिट्टी को एक आवासीय परियोजना की वजह से बर्बाद कर रहे हैं–तो उन्होंने पूरी शिद्दत से केस लड़ा औऱ सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ सारे आरोपों को खारिज कर दिया।

आधारभूत ढांचे के विकास चटर्झी की प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर रहा। बोलेपुर में उन्होंने पश्चिम बंगाल के सबसे बढ़िया गीतांजलि ऑडीटोरियम और एक बेहद आधुनिक स्टेडियम की स्थापना की। वो मज़ाक में कहते थे, अब अगर आप स्तरीय फुटबॉल खिलाड़ी नहीं पैदा कर पाते हैं तो मुझे दोष मत दीजिएगा।

ये एक साधारण टिप्पणी है लेकिन उनकी स्पष्टवादिता का अंदाज़ा दे देती है। वो जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं। अगर लोकसभा अध्यक्ष पद को लें तो यहां वो सीपीएम के प्रत्याशी न होकर सर्वसम्मति से चुने गए थे इसलिए पार्टी व्हिप पर बिना लागलपेट के उनकी सीधी प्रतिक्रिया थी कि इस पद को संभालने का मतलब ये है कि वो पार्टी की राजनीति से परे हैं।

वो अपरंपरागत मार्क्सवादी हैं, उनकी ईमानदारी पर किसी को लेशमात्र भी संदेह नहीं है। उनके दोस्त बताते हैं, जब वो 20 अकबर रोड वाले घर में पहुंचे तो उन्हें पता चला कि यहां चाय बिस्किट से लेकर साबुन तक का खर्च लोकसभा के खाते से अदा होता है। मेरे ख्याल से मैं अपने बाथरूम का खर्च उठा सकता हूं। और मैं अपने मेहमानों के लिए एक कप चाय का खर्च भी उठा सकता हूं, चटर्जी ने कहा और इसे बंद करवा दिया।

हालांकि लोकसभा अध्यक्ष का उनका कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा। 2005 में चटर्जी ये बयान देकर संकट में पड़ गए कि सुप्रीम कोर्ट झारखंड विधानसभा के मामले में आदेश देकर विधायकों के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहा है। विपक्ष ने लाभ के पद को मुद्दा बना कर उनके त्यागपत्र की माग की क्योंकि वो शांतिनिकेतन श्रीनिकेतन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष थे। अपनी विशेष अदा में उन्होंने ये कहकर सारे आरोपों को दरकिनार कर दिया कि वो किसी भी तरह का लाभ नहीं उठा रहे हैं और सारे आरोप निराधार हैं।

आज ये गुस्ताख, मार्क्सवादी अपनी ही पार्टी के कट्टरपंथियों के निशाने पर है, जबकि इसी दृढ़ रुख के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रशंसा हो चुकी है। हालांकि अपने भविष्य के बारे में उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया लेकिन उनके नजदीकी लोगों की माने तो सोमनाथदा राजनीति से दूर शांतिनिकेतन में रहना चाहते हैं।

भले ही 22 जुलाई के बाद सोमनाथ चटर्जी का भविष्य अनिश्चित हो गया हो लेकिन उन्हें खुद के सही होने को लेकर कोई संदेह नहीं है…शायद, कभी भी नहीं था…

शांतनु गुहा रे

सिंह बने शेर, विरोधी हुए ढेर

इसीलिए कहते हैं कि राजनीति में भविष्यवाणी करना मूर्खों का खेल है. छह महीने पहले तक भाजपा अनिश्चय और ऊहापोह में फंसी एक पार्टी नजर आ रही थी मगर कर्नाटक के चुनावों के बाद से स्थितियां बदल गईं. इस के बाद यही स्थिति कांग्रेस की हो गई. न कोई नेतृत्व दिख रहा था और न ही ऐसा कोई विचार जो पार्टी में आने वाले आम चुनावों के लिए नई जान फूंक सकता हो. उधर वाममोर्चे ने अलग से जीना दूभर कर रखा था. दूसरी तरफ इन चार सालों में केंद्रीय सत्ता के गलियारों में अमर सिंह नाम के शख्स की कोई पूछ ही नहीं थी. इन्हीं चार सालों के दौरान मनमोहन सिंह ऐसे प्रधानमंत्री नजर आते थे जिसके पास कुर्सी तो हो मगर अपना फैसला करने की आजादी नहीं. एक महीने पहले तक लालकृष्ण आडवाणी अगले प्रधानमंत्री की दौड़ में सबसे आगे नजर आ रहे थे. एक हफ्ते पहले तक यूपीए सरकार लड़खड़ाती दिख रही थी. तीन दिनों पहले तक मायावती प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी की तैयारी में थीं. और दो दिन पहले तक चुनाव अवश्यंभावी लग रहे थे. 

और अब देखिए. बड़े ही नाटकीय एक घटनाक्रम में भाजपा ने खुद ही अपनी स्थिति कमजोर कर ली और खुद पर थोपा गया विश्वास मत हासिल करके मनमोहन सिंह ने देश का राजनीतिक माहौल पूरी तरह से बदल दिया. आज कांग्रेस मजबूत स्थिति में है और अब पार्टी भारत-अमेरिका परमाणु करार को ये कहकर एक चुनावी मुद्दा बना सकती है कि वह देशहित के लिए सरकार का बलिदान देने को भी तैयार थी. उधर, अपने लक्ष्य से चूके वाममोर्चे को समझ ही नहीं आ रहा कि वह क्या करे. क्रॉसवोटिंग के लिए सांसदों को घूस देने का मुद्दा उछालने के बावजूद भी भाजपा किसी पिटे हुए खिलाड़ी की तरह नजर आ रही है और पिछले हफ्ते के दौरान लगातार हमलावर रहीं मायावती अब टक्कर देने वाले से ज्यादा किसी अवसरवादी नेता जैसी नजर आ रही हैं.जुनून से भरे इस भाषण में मनमोहन ने पिछले चार सालों से उनके भीतर उबलती रही सारी भड़ास निकाल दी थी. इस बात से कम ही लोग इनकार करेंगे कि तंज और हमला उनकी शैली नहीं है मगर इस भाषण में ये दोनों तत्व मौजूद थे.

राजनीतिक नजरिये से देखा जाए तो मंगलवार जिन लोगों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद रहा उनमें से एक प्रधानमंत्री भी हैं. पिछले पांच सालों से सरकार के इस मुखिया पर चौतरफा हमले किए गए. किसी के लिए वह कठपुतली थे, किसी के लिए सोनिया की छाया तो किसी के लिए अदृश्य प्रधानमंत्री. वोटिंग के दिन प्रधानमंत्री को संसद में भाषण देना था जिसे वे अपने साथ लिखकर लाए थे. मगर हंगामा इतना था कि वे ऐसा नहीं कर पाए. मगर उनके भाषण की समाप्ति दिलचस्प थी. शब्दों पर गौर करें, मैं कई बार कह चुका हूं कि मेरा राजनीतिज्ञ होना एक संयोग है….अपने कार्यकाल के दौरान हर दिन मैंने ये याद रखने की कोशिश की है कि मेरी जिंदगी के शुरुआती दस वर्ष एक ऐसे गांव में गुजरे जहां न बिजली थी, न सड़क, न अस्पताल और न ही ऐसी कोई चीज जिसे हम आधुनिक रहन-सहन से जोड़ सकें. स्कूल के लिए मुझे मीलों पैदल चलना पड़ता था और पढ़ाई मिट्टी के तेल के लैंप की मद्धम रोशनी में करनी पड़ती थी…इस ऊंचे पद पर रहते हुए मैंने जो भी किया है वह स्वच्छ अंतरात्मा के साथ और दिल में अपने देश व इसके लोगों के भले को सोचकर किया है. मुझे और कोई दावा नहीं करना है.” 

जुनून से भरे इस भाषण में मनमोहन ने पिछले चार सालों से उनके भीतर उबलती रही सारी भड़ास निकाल दी थी. इस बात से कम ही लोग इनकार करेंगे कि तंज और हमला उनकी शैली नहीं है मगर इस भाषण में ये दोनों तत्व मौजूद थे. प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने तहलका को बताया कि मनमोहन ने खुद ही ये भाषण तैयार किया था. वाममोर्चे पर निशाना साधते हुए उनके शब्द थे, वे चाहते थे कि मैं उनके बंधुआ मजदूर की तरह व्यवहार करूं.उन्होंने आडवाणी को भी नहीं बख्शा,क्या हमारा देश एक ऐसे गृहमंत्री को माफ कर सकता है जो संसद पर आतंकी हमले के वक्त सो रहा था? क्या हमारा देश एक ऐसे गृहमंत्री को माफ कर सकता है जे बाबरी मस्जिद ढहने और उसके बाद बाद जो कुछ हुआ, उसका प्रेरणा स्रोत था? क्या हमारा देश उस गृहमंत्री के व्यवहार को उचित कह सकता है जो उन गुजरात दंगों के समय सो रहा था जिनमें हजारों बेगुनाहों की जानें गईं? वाममोर्चे के हमारे मित्रों को सोचना चाहिए कि अपने महासचिव (सीधा निशाना प्रकाश करात की तरफ था ) की चूक के परिणामस्वरूप वे किसके पाले में खड़े हैं. 

भारतीय राजनीति के निर्विवादित मिस्टर क्लीन इस बात से अवगत होंगे कि भले ही विश्वासमत पर फैसला उनके लिए सुखकारी रहा हो लेकिन इसकी चमक उस समय थोड़ी धुंधली पड़ गई जब भाजपा के तीन सांसदों ने ये कहते हुए संसद में नोटों के बंडल लहराने शुरू कर दिए कि उन्हें क्रॉसवोटिंग के लिए एक करोड़ रुपये की अग्रिम धनराशि का भुगतान किया गया है. किसी भी जीत के साथ चुनौतियां भी आती हैं और ये चुनौती तो तब आई जब वोटिंग में थोड़ा ही वक्त बाकी रह गया था. पिछली शाम को ही मनमोहन ने खुली चुनौती के अंदाज में कहा था कि अगर किसी के पास सांसदों की खरीद-फरोख्त का सबूत हो तो हो वह उसे सबके सामने लाए. अगले ही दिन सबूत नोटों की शक्ल में पूरे देश के सामने था और खुद को खरीदे जाने की कोशिश का आरोप लगाते ये सांसद सीधे-सीधे सपा महासचिव अमर सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल का नाम ले रहे थे. 

इसकी प्रतिक्रिया में अमर सिंह ने मानहानि का आरोप लगाते हुए भाजपा पर जबर्दस्त जवाबी हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कांग्रेस ने भी तीखे तेवर अपनाए. भ्रष्टाचार का सहारा लेने के विपक्षी दलों के आरोप पर पार्टी प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी कहते हैं, क्षेत्रीय दलों खासकर उत्तर प्रदेश की किसी पार्टी का हमें राजनैतिक नैतिकता का उपदेश देना किसी राक्षस द्वारा वेदों के श्लोकों को उद्धृत करने से भी बुरा है. हालांकि यही सवाल कांग्रेस के एक दूसरे प्रवक्ता के सामने उठाने पर ऑफ द रिकार्ड एक अलग जवाब मिलता है, अब इसे मान भी लेना चाहिए. ये एक धब्बा है और ये तो बस शुरुआत है. बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि क्या हम निष्पक्ष जांच की इजाजत देते हैं और अगर अपराध सिद्ध हो जाता है तो क्या हम उस फैसले का सम्मान करते हैं. कल तक विपक्ष हम पर महंगाई और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर हमला कर रहा था. अब चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी जुड़ गया है. ऑफ द रिकॉर्ड किसी कांग्रेसी से अमर सिंह के बारे में पूछिए तो रूखा सा जवाब आता है: चुनाव में अमर सिंह का साथ महंगाई से भी ज्यादा खतरनाक है. अगर वामदलों ने समर्थन खींचकर फिर से रफ्तार पकड़ने में कांग्रेस की मदद की है तो अमर सिंह ने यूपीए की इस जीत में अधूरापन पैदा कर दिया है. 

हालांकि दूसरी तरफ प्रबल संभावना इस बात की भी है कि कांग्रेस-सपा चुनावी गठबंधन हकीकत में बदल सकता है. आखिर दोनों ही पार्टियां समाजवाद का चोला ओढ़ने के बावजूद पूंजीवाद के प्रति सहज रही हैं. मुस्लिम वोटों के प्रति लगाव और मायावती, वामदलों और भाजपा के प्रति दुश्मनी भी दोनों के एक मंच पर आने का आधार बनाती है. उत्तर प्रदेश में उनका गठबंधन आने वाले चुनावों में अहम भूमिका निभा सकता है. जैसा कि विज्ञान और तकनीकी मामलों के मंत्री कपिल सिब्बल कहते हैं,उत्तर प्रदेश में हमें गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने की आवश्यकता है क्योंकि जब हम अकेले मैदान में उतरे तो हमें हार का मुंह देखना पड़ा. कम से कम हमारे पास जीत की संभावनाओं वाला एक गठबंधन होगा.” 

कम ही लोग जानते हैं कि कांग्रेस ने करीब एक साल पहले से ही सपा को दोस्ती के संकेत भेजने शुरू कर दिये थे. मायावती के हाथों अपमानजनक हार के बाद अपने घाव सहला रही सपा के लिए ये संकेत ऐसे समय पर आए थे जब वह इस बात पर विचार कर रही थी कि उसे भी एक चुनावी गठबंधन की जरूरत है. भाजपा के साथ जाने का तो सवाल ही नहीं था ऐसे में इसके लिए कांग्रेस ही एकमात्र विकल्प थी. जैसा कि सपा के एक वरिष्ठ सांसद कहते हैं,हमें ये समझ में आ रहा था कि हम एक ही समय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के विरोधी नहीं हो सकते.” इस गठबंधन की संभावनाओं पर पहले पानी तब पड़ा जब ये प्रस्ताव लेकर लखनऊ पहुंचे कांग्रेसी ने अमर सिंह के बिना समाजवादी पार्टी से तालमेल की पेशकश की. मुलायम सिंह यादव ने इसे ठुकरा दिया. अमर सिंह को जब पता चला कि पार्टी कांग्रेस से गठबंधन की संभावना पर विचार कर रही है तो उन्होंने इस्तीफे की धमकी तक दे डाली. दोनों दलों के साथ आने का रास्ता औपचारिक रूप से तभी प्रशस्त हुआ जब कांग्रेस अमर सिंह को मध्यस्थ बनाने के लिए सहमत हो गई. बहरहाल सीधी सी बात ये है कि दोनों पार्टियों को ही एक दूसरे की जरूरत थी और कांग्रेस को ये भी अहसास होगा कि अमर सिंह की मांगें उनके उस कॉर्पोरेट एजेंडे से भी आगे जाएंगी जिसके बारे में हर कोई जानता है. कांग्रेस ने करीब एक साल पहले से ही सपा को दोस्ती के संकेत भेजने शुरू कर दिये थे. मायावती के हाथों अपमानजनक हार के बाद अपने घाव सहला रही सपा के लिए ये संकेत ऐसे समय पर आए थे जब वह इस बात पर विचार कर रही थी कि उसे भी एक चुनावी गठबंधन की जरूरत है.

विश्वासमत की लड़ाई जीतने के बाद फिलहाल तो अब कांग्रेस इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रही है कि वह सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसी अपनी उपलब्धियों को किस तरह वापस केंद्रीय मंच पर लाए. पार्टी में भले ही उत्साह का माहौल हो मगर वो जानती है कि गठबंधन और खासकर वह खुद आगामी चुनावों के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है. सवाल कई हैं. मसलन देश में कितने लोग जानते हैं कि परमाणु समझौते से उन्हें क्या फायदा होगा?  परमाणु ऊर्जा के वादे से क्या आम आदमी बढ़ती महंगाई की मुश्किलें भूल जाएगा?  कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, हमें परमाणु समझौते को बिजली के संदर्भ में समझाना होगा. मगर उससे पहले हमें ये समझाना होगा कि परमाणु शक्ति का मतलब क्या है. 22 जून को अपने भाषण में राहुल गांधी ने विदर्भ की एक विधवा कलावती का जिक्र किया था जिसके बच्चों को मिट्टी के तेल के लैंप की रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती है. ये इस बात का संकेत हो सकता है कि कांग्रेस अपनी इस उपलब्धि को ग्रामीण इलाकों में किस तरह प्रचारित करेगी.  

मगर क्या बिजली इतनी महत्वपूर्ण है कि रोटी, कपड़ा और मकान को भूल जाया जाए? पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं,मुद्रास्फीति की दर स्थिर होना शुरू हो गई है. वामदलों से मुक्ति मिलने के बाद सुधारात्मक उपायों को सख्ती से लागू किया जाएगा. हम ये सुनिश्चित करेंगे कि जब हम चुनाव में उतरें तो महंगाई कोई मुद्दा ही न हो.” 

आम चुनाव के लिए अपनी रणनीति बनाने से पहले कांग्रेस को राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और जम्मू एवं कश्मीर में हो रहे चुनाव की लड़ाई में उतरना है. पार्टी में इस बात पर विचार चल रहा है कि इन चुनावों में परमाणु करार और संसद में विश्वास मत पर मिली जीत के जरिये छलांग लगाई जाए. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, हम मनमोहन सिंह को एक ऐसे सख्त प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करेंगे जो देशहित में सख्त फैसले लेने से पीछे नहीं हटा. उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा जो कुर्सी से चिपके रहने के लिए दबाव के आगे नहीं झुका. अभिषेक सिंघवी जोड़ते हैं,ये मत भूलिए कि विश्वास मत सिर्फ परमाणु करार पर नहीं था. इसके दायरे में सरकार की काबिलियत से लेकर इसका अब तक का प्रदर्शन जैसे सभी कारक शामिल थे. देश जल्द ही देखेगा कि सरकार के बंधे हाथों के खुल जाने का अर्थव्यवस्था पर कितना जीवनदायी असर पड़ता है.” 

कई मायनों में सोच भले ही स्पष्ट हो मगर स्थितियां चिंताजनक भी हैं. जैसाकि कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, निश्चित रूप से करार को विकास के नजरिये से पेश किए जाने की जरूरत है. मगर ऐसा करने वाले कहां हैं? कांग्रेस एक सर्कुलर संगठन बन चुका है. एआईसीसी यानी आल इंडिया कांग्रेस कमेटी से एक सर्कुलर पीसीसी यानी प्रदेश कांग्रेस कमेटी को जाता है. यहां से ये सर्कुलर डिस्ट्रिक्ट कमेटी और फिर ब्लॉक कमेटी के पास जाता है और उसके बाद ये किसी फाइल में रख दिया जाता है. उनकी चिंता अतिश्योक्ति नहीं है. वास्तव में देखा जाए तो 250 जिले ऐसे हैं जहां कांग्रेस के पास जिला कमेटी ही नहीं है. एक दूसरा उदाहरण देखिए. राजिंदर कौर भट्टल को साल भर पहले पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया था मगर अब तक उनके पास कोई कमेटी नहीं है. ऐसे में समस्या दोहरी है, पहली, कांग्रेस के प्रबंधक इस समझौते को किस तरह चुनावी लाभ में तब्दील करने की योजना बनाएंगे और दूसरी, इस योजना को अमली जामा किस तरह पहनाया जाएगा. 

शायद इसका जवाब राहुल का संसद में दिया गया भाषण दे सकता है. वह भाषण जिसमें राष्ट्रवाद का वह मुद्दा छिपा है जिसे भाजपा पिछले एक दशक से भुनाने की कोशिश कर रही है. कम से कम कागज पर ही सही, कांग्रेस के पास एक ब्लूप्रिंट तैयार है. वह सांप्रदायिकता का मुकाबला राष्ट्रवाद से और वाममोर्चे का सामना इस बात पर जोर देकर कर सकती है कि देशवासियों के लिए प्रधानमंत्री अपनी सरकार तक कुर्बान करने के लिए तैयार थे. नौजवान भारत को लुभाने के लिए युवा राहुल गांधी को इस्तेमाल किया जा सकता है और हर दिन अपना नेता बदलने के लिए तीसरे मोर्चे की खिल्ली उड़ाई जा सकती है. ये एक ऐसी लड़ाई है जो निश्चित तौर पर व्यक्तिगत दायरे में आ जाएगी. प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों की मानें तो मनमोहन सिंह, लालकृष्ण आडवाणी और प्रकाश करात से आने वाले दिनों में सीधे भिड़ने की भी तैयारी में हैं.  

और लगता भी है कि मनमोहन ने इसके लिए खुद को तैयार कर लिया है. अपने नए अवतार में वे सीधी बात करते हैं. विश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले उनके भाषण के शब्दों पर गौर करें, जब मैं अपने सामने बैठे अवसरवादी समूहों को देखता हूं तो मुझे साफ तौर पर ये अहसास हो जाता है कि आज लड़ाई भारत के भविष्य के दो अलग-अलग सपनों के बीच है. पहला सपना यूपीए का है जो भारत को आत्मविश्वास से भरपूर एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ते हुए और वैश्वीकरण के इस दौर में मिलने वाले अवसरों को भुनाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपना जायज मुकाम हासिल करते हुए देखना चाहता है…इसके उलट एक सपना हमारे सामने बैठी भीड़ का है जो अपने  पृथकतावादी, गुटीय और संकीर्ण हितों के लिए सत्ता पाने हेतु साथ में हैं. हमारे वामपंथी साथी हमें बताएं कि क्या उन्हें प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में श्री लालकृष्ण आडवाणी स्वीकार्य हैं.  श्री आडवाणी हमें बताएं कि क्या वे तीसरे मोर्चे के उम्मीदवार के पक्ष में प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी उम्मीदवारी छोड़ देंगे. उन्हें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश को विश्वास में लेना चाहिए…” 

जल्द ही एक विश्वासमत पर फिर से वोट होगा और इस बार परीक्षा जनता की अदालत में होगी. इस सवाल का जवाब ज्यादा दूर नहीं है कि कांग्रेस का ये आभामंडल कब तक और कितना टिकाऊ रह पाएगा. साफ-साफ कहें तो अक्टूबर तक जवाब मिल जाना चाहिए.

राजनीतिक खेल में मीडिया पर सवाल

22 जुलाई की शाम करीब चार बजे भारतीय राजनीति एक सीढ़ी और नीचे उतर गई. एक लाख रुपये अपनी मेज़ की दराज में रखते बंगारू लक्ष्मण, बलात्कार और खून-खराबे का महिमामंडन करता बाबू बजरंगी, संसद में सवाल पूछने के लिए पैसे लेते 11 लोकसभा सांसद, सांसद निधि के इस्तेमाल में घालमेल करते सांसद, ये सब टीवी पर देखने के बाद लोगों ने संसद में नोटों की गड्डियां लहराते बीजेपी सांसदों को देखा. ये पैसे उन्हें कथित रूप से यूपीए सरकार के पक्ष में मतदान के लिए दिए गए थे. 

विश्वासमत पर मतदान से काफी दिनों पहले से ही राजधानी में इस तरह के काले करारों पर चर्चाओं का बाज़ार गर्म था. मगर इसकी निंदा करने और इसे घृणास्पद बताने के बजाए, ज्यादातर राजनीतिज्ञ और मीडियाकर्मियों के बीच ये कीमत बढ़ जाने जैसी बातों को लेकर मज़ाक की वस्तु बना हुआ था. सब कुछ चलता है वाला माहौल था. 

मगर संसद के बीचोंबीच हुई घटना ने सब कुछ बदल दिया और अब तरह-तरह के सवाल पूछे जाने लगे हैं. कहा जा रहा है कि विश्वास मत पर मत तो प्राप्त कर लिया गया मगर विश्वास खो दिया गया है. एक अति महत्वपूर्ण संसदीय मतदान के दौरान अगर किसी के पास सांसदों के एक समूह द्वारा दूसरे समूह को रिश्वत देने के प्रमाण हों तो इससे बड़ी लोकहित की खबर और क्या हो सकती है?

इस सब में एक विचित्र बात ये रही कि न्यूज़ चैनल सीएनएन आईबीएन—और मीडिया–की भूमिका चर्चाओं के केंद्र में आ गई है. जब बीजेपी के तीनों सांसद संसद में नोटों के बंडल लहराते हुए ये भी चिल्ला रहे थे कि सीएनएन आईबीएन के पास इस रिश्वत कांड के वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं–ऐसा वे निराशा में कर रहे थे और जानकारों के मुताबिक उन्हें इसी बात के लिए दंडित किया जा सकता है. मगर यदि इन सब बातों को कुछ देर के लिए दरकिनार कर दिया जाए तो पूछा जा सकता है कि एक अति महत्वपूर्ण संसदीय मतदान के दौरान अगर किसी के पास सांसदों के एक समूह द्वारा दूसरे समूह को रिश्वत देने के प्रमाण हों तो इससे बड़ी लोकहित की खबर और क्या हो सकती है? 

मगर कुछ समझ न आ सकने वाले कारणों के चलते सीएनएन आईबीएन ने इसे प्रसारित ही नहीं किया. जैसे ही मामला प्रकाश में आया टेप्स और इससे मिलने वाले सबूतों के अभाव में पहले की ही तरह मामले को नकारने और इसे खारिज करने का दौर शुरू हो गया. अमर सिंह ने एक तरह से युद्ध छेड़ दिया औऱ हमेशा चुप्पी धारे रखने वाले अहमद पटेल ने प्रतिज्ञा कर डाली कि अगर आरोप सिद्द हो जाते हैं तो वे सार्वजनिक जीवन से ही सन्यास ले लेंगे.

सीएनएन आईबीएन ने टेप्स को प्रसारित न करने का बचाव ये कह के किया कि चूंकि मामले में ‘संसद के सम्मानित सदस्य’ शामिल हैं इसलिए उसे अत्यधिक सावधानी बरतने और इसे और भी सत्यापित करने की आवश्कता है. लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता और समाजसेवी प्रशांत भूषण इससे संतुष्ट नहीं है. “बतौर पत्रकार टेप्स को दुनिया के सामने लाना उनका कर्तव्य था. उन्होंने वास्तव में गलती की है. शायद उन्हें किसी मतलब रखने वाले वकील की सलाह ने डरा दिया या फिर ऐसा उन्होंने किन्हीं दूसरी वजहों को ध्यान में रखते हुए किया”

दो पूर्व कानूनमंत्री राम जेठमलानी औऱ शांति भूषण भी मामले में इसी तरह की मज़बूत राय रखते हैं. भूषण कहते हैं, “इससे क्या लेना देना कि जांच पूरी नहीं हुई है. सबूतों को सामने न लाकर राजदीप अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं. चारों तरफ फैली हुई अफवाहों पर नज़र डालिए. अब जबकि मामला दुनिया के सामने है उन्हें साक्ष्यों को, ये कहते हुए कि वो अपूर्ण हैं, दुनिया के सामने लाना चाहिए. कम से कम दुनिया को पता तो चलेगा कि टेप्स में आखिर है क्या.”

मगर राजदीप गुस्से में इसका बचाव करते हुए कहते हैं, “कब क्या प्रसारित करना है इसपर संवैधानिक विशेषज्ञ और राजनीतिक दल मुझे कैसे आदेश दे सकते हैं? क्या उन्हें पता है कि टेप्स में क्या है? हमें सत्यता जांचने के लिए और भी समय की आवश्यकता थी और हम इसे प्रसारित करने के लिए तैयार नहीं थे?

शायद उनकी बात में दम हो. पिछले बड़े भंडाफोड़ों पर राजनीतिक व्यवस्था ने जैसा कहर ढ़ाया था, शायद उसने उनके मन में भय पैदा कर दिया हो. शायद एक बेहद महत्वपूर्ण स्टोरी के आधा-अधूरा होने को लेकर भी हिचक रही हो. लेकिन, जैसा कि उनके समुदाय के दूसरे सदस्य उन्हें बता सकते हैं कि अगर आपके पास एक गर्म आलू है तो इसे आपको, आपका हाथ जलाने से पहले छोड़ देना होता है.

इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शेखर गुप्ता कहते हैं, “परेशानी ये है कि अब सब कुछ अनुमान के स्तर पर हो रहा है. एक पत्रकार के रूप में हम सरकार या सीबीआई या सरकारी वकील के लिए काम नहीं करते हैं. हमारी जवाबदेही जनता के प्रति होती है.”

पायोनियर के प्रधान संपादक चंदन मित्रा ज़्यादा सतर्क राय रखते हुए कहते हैं, “मेरे हिसाब से राजदीप ने मतदान से पहले टेप्स को न प्रसारित करके सही किया. ऐसा एक राजनीतिक दल की मदद करने जैसा होता जो कि इस मामले में बीजेपी होती. मगर इससे एक गलत प्रथा पड़ जाती. किसी दिन ये उसके खिलाफ भी जा सकता था, इसलिए, सिद्दांतत: उन्होंने सही किया”

कई लोग कह सकते हैं कि राजनीतिक गुणा भाग करना ईमानदार पत्रकारिता नहीं है औऱ स्टोरी को केवल इसकी योग्यता के आधार पर प्रकाशित किया जाना चाहिए. लेकिन फिलहाल समस्या ये है कि सीएनएन आईबीएन के पक्ष और विपक्ष में जो कुछ भी हो रहा है वो सब अंधेरे का हिस्सा है.

शोमा चौधरी

“सपा को कांग्रेस की जरूरत है”

सुबह प्रधानमंत्री निवास पर संपादकों की बैठक में परमाणु करार का गुणगान कर वे इसे राष्ट्रहित में बता रहे थे। मगर दोपहर होते होते यही करार उनकी निगाह में राष्ट्र और मुसलिम विरोधी हो गया। नेहा दीक्षित से बातचीत में राज्यसभा सांसद शाहिद सिद्दीकी अपनी राजनीतिक मजबूरियां बयान करते हुए।

सपा छोड़कर बसपा में जाने की क्या वजह रही?

इसकी वजह है परमाणु करार। सपा पहले इस करार के खिलाफ थी लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया। मैंने समझौते का अध्ययन किया है, समझौते के संदर्भ में कई बार अमेरिका गया हूं और कोंडलीज़ा राइस से भी बातचीत की है। मैंने पाया कि ये समझौता किसी भी तरह से देशहित में नहीं है। इसलिए मैंने सपा से अलग होने का निर्णय किया। सपा एक धर्म निरपेक्ष और समाजवादी दल था जो अपने लक्ष्य से भटक गया है।

समझौते का विरोध करने की एक वजह आपका मुसलमान होना भी है?

कुछ हद तक। दुनिया भर के मुसलमान अमेरिकी नीतियों के विरोधी हैं। अमेरिका के यहूदी समझौते के पक्ष में ज़बर्दस्त लामबंदी कर रहे हैं। यहां तक कि वे भारतीयों को भी प्रभावित करने के प्रयास कर रहे हैं। अमेरिकी हितों के लिए काम करने वाली ये ताकतवर लॉबी हर जगह मौजूद है और मैं उसका साथ नहीं दे सकता। इसके अलावा जॉर्ज बुश के कार्यकाल में दुनिया भर के मुसलमानों पर हुआ अत्याचार भी इसकी एक वजह है।

लेकिन खुद आपके अख़बार ने एक सर्वेक्षण में दावा किया था कि 80 फीसदी मुसलमान महंगाई के मुद्दे पर वोट करेंगे न कि विदेश नीति के मुद्दे पर।

देखिए अगर मुसलमान महंगाई के मुद्दे पर वोट दे सकता है तो वो न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर भी वोट दे सकता है। मैं इससे सहमत नहीं हूं। अगर आप मेरे मुसलमान होने को ही करार के विरोध की वजह मानती हैं तो आप ऐसा कर सकती हैं।

आखिर सपा ने कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला क्यों किया?

खालिस सियासी वजहों से। उन्हें अहसास हो गया था कि वो किसी भी सूरत में उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापस नहीं आ सकते। सत्ता में वापसी के लिए उन्हें कांग्रेस की जरूरत थी इसलिए उन्होंने यूपीए का समर्थन करने का निर्णय लिया। मायावती को मात देने का उन्हें यही एकमात्र रास्ता सूझा। ये राजनीतिक प्रतिशोध की लड़ाई है।

पर अतीत में आप खुद भी मायावती के धुर-आलोचक रहे हैं?

मैं सपा का महासचिव था, ऐसे में आप मुझसे क्या उम्मीद करती हैं? कोई भी उस पद पर ऐसा ही करेगा। राजनीति व्यक्तिगत स्तर पर नहीं होती। ये पार्टी आधारित होती है। मैं कांग्रेस में जा नहीं सकता था और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के कारण भाजपा में जाने का सवाल ही नहीं उठता था। तो फिर उत्तर प्रदेश में कौन सी पार्टी बाकी बचीसिर्फ बसपा। ये राज्य की सबसे बड़ी पार्टी है इसलिए मैंने इसे चुना।

आपको ये विश्वास क्यों है कि बीएसपी और मायावती अपने रुख पर कायम रहेंगी?

इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। मैंने एक रास्ता चुना है पर मुझे मंज़िल का पता नहीं है। मैंने एक दांव खेला है मुझे नहीं पता आगे क्या होगा।

किस चीज़ ने मायावती पर विश्वास करने के लिए मजबूर किया?

देखिए, इस देश में मायावती और ममता बनर्जी अकेली ऐसी नेता हैं जिनका कोई आधार नहीं था, न ही ये किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती हैं, इन्होंने अपनी ज़मीन खुद बनाई है। इन्हें सहारा देने के लिए कोई पिता या संबंधी नहीं था। इनमें हिम्मत थी लिहाजा ये ज़मीन से शीर्ष तक पहुंचे हैं। इसने मुझे प्रभावित किया।

क्या सपा में आप की तरह कोई और नेता ऐसा है जिसे इस मुद्दे को लेकर मुलायम सिंह या अमर सिंह से परेशानी हो?

इस तरह के लोग हर जगह हैं। अमर सिंह मेरे व्यक्तिगत मित्र हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। लेकिन बहुत से लोगों में खड़ा होने और विरोध करने की क्षमता नहीं होती।

क्या सपा में वापस जाने का विचार है?

नहीं फिलहाल तो नहीं।

"उसने, 3 मकड़ियां, कई चीटियां और एक तिलचट्टा खा लिया था"

1973 में मुझे मोरक्को से भांग की तस्करी करने के आरोप में गिरफ्तार करके एचएमपी विनचेस्टर की जेल में डाल दिया गया। ये मेरी ज़िंदगी का सबसे कठिन और आशा-निराशा के बीच झूलने वाला समय था। इस वक्त मेरे जीवन के क्षितिज पर परिस्थितियों और मेरी मानसिक दशा के मुताबिक दो चीज़ें मुझे बार-बार दिखाई देती थीं—एक तो आज़ादी और दूसरी सज़ा। उसी दौरान मैं पहली बार रिक से मिला। वो छह फुट लंबा था लेकिन हृष्ट-पुष्ट होने की वजह से थोड़ा छोटा ही दिखता था। उसके कंधों से लेकर कलाइयों तक पर मौजूद मांसपेशियों के उभार किसी बलखाती नदी जैसा आभास देते थे। हाल ही में घुटे हुए सिर पर गहरे शहद के रंग की क्रेडिट कार्ड जितनी मोटाई की बालों की झाड़ी जैसी उगी हुई थी। उसकी आंखे छोटी, काली और उत्सुकता से भरी हुई थीं जो एक बेचैन मक्खी की तरह चारों ओर घूमती रहती थीं। उसके दांत छोटे और सफेद, मगर कई जगह से चटखे हुए और उखड़ी परतों वाले थे, जैसा कि उन्हें, उनकी कई कठोर चीज़ों से हुई मुठभेड़ों के चलते होना भी चाहिए था। रिक के दाहिने हाथ पर चमकीले नीले और लाल रंग के उड़ते हुए एक पक्षी का गुदना भी गुदा हुआ था।

जब मुझे, जेल की कोठरी और जिस आदमी के साथ इसे साझा करना था, दिखाए गए तो मुझे उस दिन ये, पहले से ही हो चुकी घटनाओं का चरम बिंदु जान पड़ा। बंद पसीना बहाने वाली गाड़ी में यात्रा, एक झूठा वकील, जमानत की अर्जी, अर्जी का ठुकराया जाना, दोबारा से रिमांड पर भेजा जाना और अंत में निराशा की पराकाष्ठा ये आदेश–एक ऐसे आदमी के साथ कमरे को साझा करने का, जिसके साथ मेरी कोई समानता ही नहीं थी। लेकिन उस शुक्रवार की शाम थका होने के कारण मैं किसी तरह का प्रतिरोध करने की हालत में नहीं था। मगर वहां शतरंज की बिसात देख कर मेरा रुख थोड़ा नर्म भी हो गया था। कम से कम हमारे बीच एक समानता तो थी ही। मगर अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी था। उसने दुनिया के हर महाद्वीप की यात्रा की थी, एक सच्चे घुमक्कड़ की तरह और उसकी सारी दुनिया एक पिट्ठू बैग में सिमटी हुई थी।

मैं उस आदमी की डरावनी छवि से पहले से ही–उसे देख कर और उसके बारे में लोगों से सुनकर– वाकिफ था। उसके प्रति मेरी धारणा दो हफ्ते पहले उस वक्त और मजबूत हो गई थी जब उसने एक शर्त की वजह से 3 मकड़ियां, अनगिनत चीटियां और एक छोटा तिलचट्टा खा लिया था। आखिरी चीज़ को उसने दो बार में खाया था। जेल की चाय के साथ उसने अपने इस अजीबोगरीब नाश्ते को नीचे गटका और फिर एक लंबी डकार लेकर सिगरेट पीने बैठ गया था। मुझे लगा कि वो पागल है। जेल में आने के कुछ हफ्तों के भीतर ही वो तीन लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका था। ऐसा करके उसने उनसे एक पुराना जेल से बाहर का हिसाब-किताब चुकता किया था।

प्रत्यक्षदर्शियों का दावा था कि उसने मुश्किल से ही कभी अपने हाथों का इस्तेमाल किया होगा। सारा काम उसका सर ही कर देता था। जेल के भीतर लोगों का मानना था कि अगर ब्रिटेन में सिर लड़ाने की कोई प्रतियोगिता हो तो वो उसे आराम से जीत सकता था। सप्ताहांत में कोठरी बदलने के आवेदन पर विचार नहीं किया जाता था। मैंने सोचा कि अगले दो दिन बहुत कठिन बीतने वाले हैं लेकिन मैं इसे बढ़िया से बढ़िया बनाने की पूरी कोशिश करूंगा। पहला झटका शतरंज के रूप में आया। मैं शतरंज काफी बढ़िया खेलता था मगर उसने पहला गेम बहुत ही आसानी से जीत लिया था। इसने मेरे अहम को चोट पहुंचाई जिसके चलते मैं एक और गेम खेलने के लिए तैयार था। दूसरा गेम मैंने अपनी पूरी काबिलियत के साथ खेला लेकिन फिर भी ये बिना किसी नतीजे के समाप्त हुआ।

उसके दोहरे व्यक्तित्व ने मेरी उत्सुकता को बढ़ा दिया था– शतरंज खेलने वाला एक सड़क छाप लड़ाका? मगर अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी था। उसने दुनिया के हर महाद्वीप की यात्रा की थी, एक सच्चे घुमक्कड़ की तरह और उसकी सारी दुनिया एक पिट्ठू बैग में सिमटी हुई थी। उसकी रंगीन, खुराफात भरी कहानियां इतनी दिलचस्प थीं कि थकान से चूर-चूर हो चुकने के बाद भी मैंने देर रात तक सोने के बारे में सोचा तक नहीं।

रविवार को उसने एक बार फिर मुझे हैरत में डाल दिया। उसने अपनी जेब से एक पत्र निकाला और मुझसे उसे पढ़ने के लिए कहा। उसने कहा, "मैं पढ़-लिख नहीं सकता।" वो एक तरह के रोग का शिकार था जिसकी वजह से वो सिर्फ कुछ आकृतियां ही खींच सकता था। वो अपने दस्तखत कर सकता था लेकिन सिर्फ उसके आकार की स्मृतियों के आधार पर।

पिछली रात बातचीत के दौरान हमने किताबों के बारे में भी बातें की थीं और एक खास किताब ‘जेन एंड आर्ट ऑफ द मोटरसाइकल मेंटिनेंस’ में से उसने कुछ पंक्तियां भी उद्धृत की थीं। "भगवान बुद्ध किसी डिजिटल कंप्यूटर के सर्किट में या किसी मोटरसाइकल के गियर में भी उतनी ही सहजता के साथ मौजूद रहते हैं जितना कि किसी पर्वत के शिखर पर या फिर फूल की पंखुड़ियों में।"

और कुछ घंटे बाद, आज, वो मुझसे कह रहा था कि वो पढ़-लिख नहीं सकता। ये एक पहेली थी जो कुछ समय पश्चात खुद ही हल हो जाने वाली थी। दरअसल जब भी उसे किसी पढ़े-लिखे आदमी के साथ जेल की कोठरी में रखा जाता था तो वो उसे पढ़ने को कहता था। इस दौरान जो भी कहावतें, मुहावरे उसे अच्छे लगते वो उन्हें याद कर लेता था।

शाम को कोठरी में बंद किए जाने के बाद मैं उसे किताबें पढ़ कर सुनाने लगा। उस आदमी के प्रति मेरे मन में सहानुभूति पैदा हो चुकी थी जिसके जीवन में मैं बेहद अनिच्छा से मगर संयोगवश दाखिल हुआ था। इसके बाद सोमवार को मैंने अपनी कोठरी बदलने का आवेदन नहीं किया। हम अगले कई महीनों तक उसी कोठरी में साथ-साथ रहे। हम दोस्त बन चुके थे।

कृस कृष्णम्मा

(कृस 73 साल के हैं। टेनिस कोच रह चुके, "बैलड ऑफ द लेज़ी ‘एल’" नामक किताब के लेखक कृस, लंदन, गोवा और स्पेन में रहते हैं।)

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"जो मर गया वही तो पैगंबर था"

1994 में जैसे ही मैंने ग्रैजुएशन पूरा किया, मेरे माता-पिता मेरे लिए एक योग्य वर की तलाश में लग गए। शादी या धर्म जैसी संस्थाओं के प्रति मेरे मन में कोई स्थायी विचार या पूर्वाग्रह नहीं था। मैंने केवल उसका नाम सुनकर ही हां कर दी। प्रभु मोहम्मद सिकंदर- हिंदू, मुस्लिम, ईसाई- ये नाम ही इतना अनूठा था कि मैं तुरंत सम्मोहित हो गई।

प्रभु के पास कुछ बेहद दिलचस्प विचार थे। उसका विश्वास था कि सभी धर्म मूल रूप से समान हैं। उसके हिसाब से शादी व्यक्ति की निजी पहचान की हत्या के जैसा है। ये उसी का विचार था कि शादी के बाद भी हम एक दोस्त की तरह रहेंगे।

मदुरै स्थित हमारे घर में हम दोनों के अलग कमरे थे, अलग दिनचर्या थी और अलग आदतें थी। आम दांपत्य जीवन में होने वाली शिकायतों से हमारा कभी पाला ही नहीं पड़ा। वो टीवी देखते तो भी मैं सो सकती थी। या फिर अगर मैं सुबह के चार बजे तक कोई किताब पढ़ना चाहती तो वो सो सकते थे। हमारे रहन-सहन के इस तरीके के बारे में जिन दोस्तों को पता था वो इसे निरा पागलपन समझते थे। लेकिन हमारे लिए एक परिवार की शुरुआत करने का ये नायाब तरीका था। एक ऐसा तरीका जिसमें हर व्यक्ति को उसकी सोच और विचारों के लिए सम्मान दिया और प्यार किया जाता था।

प्रभु बहुत ही लोकप्रिय इंसान था, उसके दोस्तों की एक पूरी फौज थी। लेकिन वो अपने दोस्तों को घर पर आमंत्रित करने के पहले हमेशा मेरी इजाजत मांगता। वो मुझे पत्नी की परंपरागत भूमिका में न बंधने देने के प्रति बहुत सजग रहता था। यहां तक कि एक कप कॉफी की मांग करने पर भी वो मुझसे खेद व्यक्त करता था। उसने एक खाना बनाने वाला भी रख लिया था लिहाजा मैं अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए स्वतंत्र थी। इसके अलावा घर की देखभाल हमेशा से ही दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी थी। यहां तक कि हमारे बेटे सलमान के पैदा होने के बाद भी इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ। सलमान के पास अपना समय बिताने के लिए दो विकल्प थे, वो अपने पापा के कमरे में भी रह सकता था और मम्मी के कमरे में भी। अक्सर उसके पापा उसे स्कूल के लिए तैयार कर देते थे जबकि मैं सोती रहती थी। सलमान के पास अपना समय बिताने के लिए दो विकल्प थे, वो अपने पापा के कमरे में भी रह सकता था और मम्मी के कमरे में भी। अक्सर उसके पापा उसे स्कूल के लिए तैयार कर देते थे जबकि मैं सोती रहती थी।

हमारे बीच लड़ाइयां भी होती थी। हम धर्म जैसे जटिल मुद्दों से लेकर छोटी छोटी चीज़ों पर बहस करते थे। एक बार हमारे बीच सीलिंग फैन की औसत साइज़ को लेकर तीखी बहस हो गई। लेकिन ज्यादातर समय हमारी ज़िंदगी मस्ती से सराबोर थी।

हमने शायद ही कभी सलमान को पढ़ने या फिर उसे अपना कमरा खुद ही साफ करने के लिए दबाव डाला हो। एक बार उसने अपने पापा को ये कहने के लिए फोन किया कि उसे गणित के टैस्ट से डर लग रहा है। प्रभु उसे स्कूल से घर लेकर आ गए। उनका मानना था कि बच्चे तभी पढ़ सकते हैं जब उनके मन में कोई डर न हो, और उन्हें अपनी बात कहने में कोई झिझक नहीं होती थी। हमारे घर के बगल में ही एक स्कूल था। हमारे घर से स्कूल की एक कक्षा दिखाई देती थी। एक बार उन्होंने देखा कि एक टीचर किसी बच्चे को पीट रही है। ये देखते ही प्रभु अपने कमरे की खिड़की से उस टीचर पर चिल्ला पड़े। इससे मुझे और टीचर दोनों को ही शर्मिंदगी महसूस हुई।

प्रभु की रुचि राजनीति में थी और वो हमेशा समाज की बेहतरी के बारे में सोचते थे। वो लंबे समय से म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और स्थानीय राजनीतिक नेताओं को पत्र लिखकर वेस्ट मासी की एक गली की सफाई की मांग करते रहे- इस जगह का उपयोग डंपयार्ड के तौर पर किया जाता था। जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो एक दिन वो खुद ही वहां एक लॉरी लेकर पहुंचे और जगह की सफाई करने लगे। लोग उन्हें अविश्वास के साथ देखते रहे, लेकिन जल्द ही वो भी उनके साथ जुड़ गए और दोपहर होते होते म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का दस्ता वहां पहुंचा और पूरे इलाके की सफाई हो गई। उन्होंने प्रेस वालों को इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्होंने सुर्खियां बटोरने के लिए ये काम नहीं किया था।

प्रभु के पारिवारिक व्यापार की देखभाल करने के लिए 1998 में हम मदुरै से मलेशिया आ गए। नई ज़िंदगी के साथ हालांकि हमारे ऊपर नई जिम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ गया मगर अब हमारे पास बेकार की चीज़ों पर खर्च करने के लिए खूब सारा पैसा था, हमारा घर बहुत बड़ा और शांतिपूर्ण था। ज़िंदगी मज़े से बीत रही थी और हम तीनों एक साथ किसी दोस्त की तरह से रहते थे। लेकिन तभी एक दिन प्रभू ने एक बड़ा ही मूर्खतापूर्ण काम किया। वह हमेशा के लिए हमें छोड़कर चले गए। एक दोस्त के रेस्टोरेंट में रात का खाना खाते समय उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की। मैं सलमान के साथ उसी रेस्टोरेंट में इंतज़ार करती रही और उनका दोस्त उन्हें अस्पताल ले गया। दस मिनट के भीतर हमें पता चला कि उन्हें जबर्दस्त कार्डियक अरेस्ट हुआ है। वो 33 साल के थे।

पांच साल बाद, मैं और सलमान अपने मां-बाप के साथ चेन्नई में रहते हैं। अब हमारी ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ गई है- मैं काम करती हूं और मेरी मां सलमान की देख रेख करती हैं। कोई अगर मुझसे पूछे कि क्या मुझे प्रभु की याद आती है? मेरा जवाब होगा हां, दिनभर में कम से कम 5000 बार। हर पल मुझे प्रभु की कमी महसूस होती है। उनके कपड़े, जूते सबकुछ जस के तस आलमारियों में रखे हैं, उनका कॉन्टैक्ट लेंस आज भी बाथरूम में है। इस तरह के व्यक्ति को जानने के बाद उसे भूलकर दूसरी ज़िंदगी शुरू करना मेरे लिए कोई विकल्प ही नहीं है। ईमानदारी से कहूं तो मुझे कभी इसका अहसास नहीं होता कि कभी मेरी शादी हुई थी, और मैंने अपने पति को खो दिया है बल्कि मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त को खो दिया है।

हाल ही में मेरी मां (जो मेरी दूसरी शादी के लिए हरसंभव कोशिश करती रहती हैं) ने मुझे एक धार्मिक सलाहकार से मिलवाया। उन्होंने मुझे एक विधवा की कहानी सुनायी जो अपने दुखों को दूर करने के लिए अल्लाह से प्रार्थना करती रहती थी। बाद में एक आदमी आया जिसने उससे शादी कर ली। ये आदमी कोई और नहीं बल्कि पैगंबर मोहम्मद खुद थे। वो ये देखकर बहुत रोमांचित हुए कि उन्होंने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। लेकिन मेरे पास कहने के लिए सिर्फ यही था, "सर, आपकी इस सुंदर कहानी के लिए धन्यवाद लेकिन मेरे मामले में जो व्यक्ति मर गया वही तो पैगंबर था।"

परवीन सिकंदर

(चैन्नई की रहने वालीं तैंतीस वर्षीय परवीन, एक लेखिका, ज्वैलरी डिज़ाइनर और टीवी प्रस्तोता हैं।)

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मैं बहुत खुश थी अम्मा ! – अंशु मालवीय

ये कविता, तहलका के एक पाठक कुमार मुकेश ने गुजरात पर तहलका के विशेष अंक में लिखे तरुण जी के संपादकीय पर टिप्पणी करते हुए उद्धृत की थी…एक भीषण मानवीय त्रासदी का ऐसा चित्रण कि कलेजा मुंह को आ जाए…जिसने पढ़ा वही रोया जितनी बार पढ़ा उतनी बार रोया…मगर कविता से पहले थोड़ा सा संदर्भ समझना ज़रूरी है…

अहमदाबाद में कौसर बानो की बस्ती नरोदा पाटिया पर 28 फरवरी 2002 को हमला हुआ था। वह गर्भवती थी। हत्यारों ने पेट चीर कर गर्भस्थ शिशु को आग के हवाले कर दिया। कविता में शिशु को लडकी माना गया है और इसे, अभागन कौसर की उसी अजन्मी बिटिया की तरफ से लिखा गया है…पढ़ें और पढ़कर डरें…

सब कुछ ठीक था अम्मा !

तेरे खाए अचार की खटास 

तेरी चखी हुई मिट्टी 

अक्सर पहुँचते थे मेरे पास…!

सूरज तेरी कोख से छनकर 

मुझ तक आता था। 

मैं बहुत खुश थी अम्मा ! 

मुझे लेनी थी जल्दी ही 

अपने हिस्से की साँस 

मुझे लगनी थी 

अपने हिस्से की भूख 

मुझे देखनी थी 

अपने हिस्से की धूप । 

मैं बहुत खुश थी अम्मा ! 

अब्बू की हथेली की छाया 

तेरे पेट पर देखी थी मैंने 

मुझे उन का चेहरा देखना था 

मुझे अपने हिस्से के अब्बू देखने थे 

मुझे अपने हिस्से की दुनिया देखनी थी। 

मैं बहुत खुश थी अम्मा ! 

एक दिन 

मैं घबराई…बिछली 

जैसे मछली…

तेरी कोख के पानी में 

पानी में किस चीज़ की छाया थी अनजानी…. 

मुझे लगा 

तू चल नहीं घिसट रही है अम्मा ! 

फ़िर जाने क्या हुआ 

मैं तेरी कोख के 

गुनगुने मुलायम अंधेरे से निकलकर 

चटक धूप 

फिर…

चटक आग में पहुँच गई। 

वो बहुत बड़ा ऑपरेशन था अम्मा। 

अपनी उन आंखों से 

जो कभी नहीं खुलीं 

मैंने देखा 

बड़े-बड़े डॉक्टर तुझ पर झुके हुए थे 

उनके हाथ में तीन मुंह वाले 

बड़े-बड़े नश्तर थे अम्मा…

वे मुझे देख चीखे ! 

चीखे किसलिए अम्मा…

क्या खुश हुए थे मुझे देख कर 

बाहर निकलते ही 

आग के खिलौने दिए उन्होंने अम्मा ! 

फ़िर मैं खेल में ऐसा बिसरी 

कि तुझे देखा नहीं…

तूने भी अन्तिम हिचकी से सोहर गाई होगी अम्मा ! 

मैं कभी नहीं जन्मी अम्मा ! 

और इस तरह कभी नहीं मरी 

अस्पताल में रंगीन पानी में रखे हुए 

अजन्मे बच्चे की तरह 

मैं अमर हो गई अम्मा !

लेकिन यहाँ रंगीन पानी नहीं 

चुभती हुई आग है ! 

मुझे कब तक जलना होगा …..अम्मा !!!

                         अंशु मालवीय 

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जाहिल मेरे बाने – भवानी प्रसाद मिश्र

मैं असभ्य हूं क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूं

मैं असभ्य हूं क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूं

मैं असभ्य हूं क्योंकि चीर कर धरती धान उगाता हूं

मैं असभ्य हूं क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूं

आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर

आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर

आप सभ्य हैं क्योंकि धान से भरी आपकी कोठी

आप सभ्य हैं क्योंकि ज़ोर से पढ़ पाते हैं पोथी

आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े स्वयं बने हैं

आप सभ्य हैं क्योंकि जबड़े खून सने हैं

आप बड़े चिंतित हैं मेरे पिछड़ेपन के मारे 

आप सोचते हैं कि सीखता यह भी ढंग हमारे

मैं उतारना नहीं चाहता जाहिल अपने बाने

धोती-कुरता बहुत ज़ोर से लिपटाए हूं याने!

                                                भवानीप्रसाद मिश्र

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इसी जनम में पुनर्जन्म

गालिब का एक शेर है,

हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है

वो हर इक बात पे कहना कि यूं होता तो क्या होता

तो जनाब अगर कुछ यूं होता कि आपको किसी ऐसी दुनिया में छोड़ दिया जाता जहां आप अपनी मर्जी से जिंदगी जी सकते तो क्या होता। ऐसी दुनिया जहां खाना जरूरत के बजाय मर्जी की चीज होता और हवा में उड़ना बच्चों का खेल। एक ऐसी दुनिया जहां आपको न आफिस की टेंशन होती और न बढ़ती उम्र की चिंता। कई कंपनियों ने तो इस दुनिया में अपना कारोबार भी शुरू कर दिया है। जानी-मानी कार कंपनी टोयोटा इसके भीतर अपनी वर्चुअल कारें बेच रही है तो समाचार एजेंसी रायटर्स ने इसमें हो रही हलचलों को कवर करने के लिए इसके भीतर ही एक रिपोर्टर का अवतार नियुक्त कर दिया है।

आप कहेंगे कि ये तो वही ‘यूं होता तो क्या होता’ वाली बात हो गई। खैर असल का तो कहना मुश्किल है पर इंटरनेट नाम के ब्रह्मांड में एक ऐसी अनोखी दुनिया का नक्शा तेजी से उभर रहा है। ये एक ऐसी मायावी दुनिया है जहां आप मनचाहा अवतार ले कर जी सकते हैं। सेकेंड लाइफ के नाम से मौजूद इस त्रिआयामी यानी थ्री डी दुनिया में आपकी शक्लोसूरत, कपड़ों का स्टाइल, रोजमर्रा की जिंदगी का रूटीन और ऐसी कई दूसरी चीजें सिर्फ आपकी पसंद के हिसाब से तय होती हैं। मनचाही जिंदगी का लुत्फ उठाने के लिए यहां हर चीज मौजूद है यानी बंगला, गाड़ी, शापिंग माल्स, डिस्को, कालेज और तमाम दूसरी चीजें। आपको चाहिए तो बस एक कंप्यूटर और ब्रांडबैंड इंटरनेट कनेक्शन। और हां, अगर आप सोच रहे हैं कि मन बहलाने के अलावा इस नकली दुनिया में ज्यादा कुछ करने के लिए नहीं है तो आपको बता दें कि न सिर्फ लाखों लोग इस मायावी दुनिया में निहायत ही संजीदा तरीके से जिंदगी जी रहे हैं बल्कि कई कंपनियों ने तो इस दुनिया में अपना कारोबार भी शुरू कर दिया है। जानी-मानी कार कंपनी टोयोटा इसके भीतर अपनी वर्चुअल कारें बेच रही है तो समाचार एजेंसी रायटर्स ने इसमें हो रही हलचलों को कवर करने के लिए इसके भीतर ही एक रिपोर्टर का अवतार नियुक्त कर दिया है।

जहां तक इस दुनिया में अवतार लेने का सवाल है तो इसके लिए आपको सेकेंड लाइफ की वेबसाइट पर जाकर अपना एक प्रोफाइल बनाना होता है। ठीक वैसे ही जैसे आप अपनी एक ईमेल आईडी बनाते हैं। फर्क इतना है कि यहां आपको ईमेल आईडी की जगह कार्टून से मिलता-जुलता अपना एक रूप मिलता है जिसका नाम और रंगरूप आप खुद तय कर सकते हैं। इसके बाद ये दुनिया आपके लिए खुली है। माउस और की बोर्ड की मदद से घूमिए, फिरिए, लोगों से मिलिए और दोस्त बनाइए। कुछ डालर खर्च कर सकें तो सेकेंड लाइफ की प्रीमियम मेंबरशिप भी ली जा सकती है जिसके बाद आप इस दुनिया के स्थाई नागरिक बन जाएंगे। फ्री या बेसिक मेंबर्स के लिए इस दुनिया में कोई पक्का ठिकाना नहीं होता लेकिन प्रीमियम मेंबरशिप लेते ही आप यहां के स्थाई नागरिक बन जाते हैं। मेंबरशिप के साथ आपको हर हफ्ते खर्च करने के लिए एक निश्चित रकम मिलेगी। इस रकम से एक प्लाट खरीदा जा सकता है जिस पर बंगला बनाएं या महल ये आपकी मर्जी।  सेकेंड लाइफ की अपनी एक करेंसी है जिसे लिंडन डॉलर कहा जाता है और इसे आप एक्सचेंज रेट के हिसाब से यूएस डालर में भी बदल सकते हैं।

देखा जाए तो सेकेंड लाइफ की ये दुनिया कई मायनों में असल दुनिया जैसी भी है। थोड़ा बहुत घूमने और इस दुनिया को कुछ-कुछ समझने के बाद यहां आप अपनी जिंदगी का रूटीन तय कर सकते हैं। मसलन अगर आप अपने काम में होशियार प्रोफेशनल हैं तो यहां अलग-अलग काम कर रही कंपनियों में नौकरी तलाश सकते हैं जिसके लिए आपको बाकायदा तनख्वाह मिलेगी। और अगर इनवेस्टमेंट का शौक है तो जमीन का बड़ा सा टुकड़ा खरीदिए, उस पर प्लॉटिंग कीजिए और मुनाफा कमाइये।

फिलहाल करीब 80 लाख ऐसे लोग हैं जो सेकेंड लाइफ के जरिये दोहरी जिंदगी जैसा अनुभव ले रहे हैं। सेकेंड लाइफ पर उठ रही बहस और इसके कई पहलुओं पर पैदा हुए विवाद को अगर छोड़ भी दें तो भी एक जिंदगी में दूसरी जिंदगी जीने का ये आइडिया है तो मजेदार।

विकास बहुगुणा