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“मुझे हिटलर का तरीका पसंद हैं”

उच्च न्यायालय द्वारा हिंसा न करने के आदेश के बावजूद आपके कार्यकर्ताओं ने मनोहर जोशी के तकनीकी संस्थान पर हमला किया।

मैंने आदेश को एक दिन बाद पढ़ा। ऐसा नहीं है कि मैं क़ानून का अपमान कर रहा हूं। पूरे राज्य में जोशी कई संस्थान चलाते हैं, अगर मैं चाहता तो हम इनमें से कइयों में परेशानी खड़ी कर सकते थे. 

आपको साइनबोर्ड मराठी में न होने से परेशानी थी और अब आपको उसकी लिखावट से भी परेशानी हो रही है।

अगर आप दिशा निर्देशों को पढ़ें, तो इसमें लिखा है कि दुकानदारों को साइनबोर्ड मराठी में लगाने चाहिए। क़ानून का पालन किया जाना चाहिए।

बालासाहेब के साथ आपके कैसे संबंध हैं? उन्होंने सामना में आपकी निंदा की है।

किसी ने उन्हें ये बयान देते हुए देखा है? कोई ये भी नहीं जानता कि वो अख़बार में लिख भी रहे हैं या दूसरे लोग ऐसा करते हैं।

एमएनएस की स्थापना के वक्त आपने कहा था कि आपकी पार्टी सबकी भागीदारी वाली पार्टी होगी, लेकिन ये तो शिवसेना की ही कॉपी नज़र आती है।

महाराष्ट्र के लोगों की बेहतरी के लिए जो भी होना चाहिए मैं कर रहा हूं। मैं बाहरी लोगों को इनके अधिकार नहीं हड़पने दूंगा।

रोज़गार और महिलाओं की सुरक्षा के आपके वादों का क्या हुआ?

मैंने काफी कुछ किया है, लेकिन मीडिया ने उसे नज़रअंदाज कर दिया। मगर जब भी मैंने उत्तर भारतीयों के बारे में कुछ कहा तो वे चिल्लाने लगे।  

क्या आप संकीर्ण राजनीति नहीं कर रहे हैं?

आपने कभी भी मोदी और करुणानिधि की राजनीति पर सवाल खड़े नहीं किए लेकिन मुझे खलनायक साबित करने के लिए सभी कमर कसे हुए हैं।

आप हमेशा मीडिया से नाराज़ क्यों रहते हैं?

क्योंकि यूपी और बिहार के नेताओं के साथ इनका साझा एजेंडा है। वो अपने व्यापारिक हितों के लिए इस शहर पर कब्जा करना चाहते हैं और मैं इसके खिलाफ हूं। वो मुझे ख़तरे के रूप में देखते हैं क्योंकि मैं महाराष्ट्रवासियों की भलाई के लिए काम कर रहा हूं।

आप एक ही देश के नागरिकों को उनकी मनचाही जगह पर आजीविका अर्जित करने से रोक रहे हैं।

क्या वो अपने राज्य में हमारे लोगों को जीवनयापन की अनुमति देते हैं? उनके यहां नियम है कि उनके निवासियों को काम मिलने के बाद ही बाहर के लोगों को अनुमति दी जा सकती है। तो फिर हम क्यों दूसरों को अपनी कीमत पर यहां आने और फलने-फूलने दें?

आप हिटलर के प्रशंसक हैं। उनकी कौन सी चीज़ आपको अच्छी लगती है।

मुझे उनकी संगठनात्मक कुशलता पसंद है, जिस तरह से उन्होंने विकास के कामों को अंजाम दिया।

आप सभी क्षेत्रों में आरक्षण की बात करते हैं। तो फिर दूसरे राज्यों के लोग कैसे यहां काम करेंगे और अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाएंगे? विलासराव देशमुख ने रतन टाटा को नैनो कारखाना लगाने के लिए आमंत्रित किया है। क्या ये आपको स्वीकार्य होगा?

बिल्कुल, क्यों नहीं? उन्हें आना चाहिए और राज्य की समृद्धि में योगदान देना चाहिए।

रतन टाटा महाराष्ट्र के नहीं हैं मगर उन्होंने राज्य के लिए बहुत कुछ किया है।

मैं हरेक के खिलाफ नहीं हूंमैं उत्तर भरातीयों के खिलाफ भी नहीं हूं। मैं सिर्फ उन लोगों के खिलाफ हूं जो यूपी बिहार से यहां अपना एजेंडा लेकर आते हैं। बाहरी लोग यहां क्यों आते हैं और रेलवे की उन नौकरियों के लिए परीक्षा देते हैं जिन पर स्थानीय लोगों का पहला हक बनता है?

क्या तमाम दूसरे क्षेत्रों की तरह इसमें भी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं होना चाहिए? सबको किस्मत आजमाने दीजिए जो बेहतर होगा वो नौकरी पाएगा।

बेहतर! महाराष्ट्रवासियों से बेहतर!  मैं अब कोई इंटरव्यू नहीं करना चाहता…(कमरे से बाहर चले जाते हैं).

ऑपरेशन कमल यानी दल-बदल

9 सितंबर को कर्नाटक की भाजपा सरकार ने सत्ता में अपने 100 दिन पूरे कर लिए। दक्षिण भारत में भाजपा की पहली सरकार को देखते हुए नि:संदेह यह महत्वपूर्ण है। लेकिन पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के लिए भाजपा की क्या योजना है? इस सवाल का जवाब छिपा है ऑपरेशन लोटस में।

मई में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के 110 विधायक जीत कर आए थे-यानी कि बहुमत से महज़ तीन कम। गठबंधन सरकार के दबावों को दरकिनार करने की गरज से भाजपा ने छह निर्दलीय विधायकों को समर्थन के लिए राजी कर लिया जिसके बदले में उनमें से पांच को मंत्रिपद से नवाजा गया। निर्दलीयों को दिए जा रहे महत्व से नाराज़ पार्टी विधायकों और कांग्रेस-जनता दल (एस) द्वारा पार्टी में तोड़फोड़ की सुगबुगाहट को देखते हुए भाजपा ने ऑपरेशन कमल का आगाज़ किया हैइसका मकसद ऐसे विधायकों को ढूंढ़ निकालना है जिन्हें मंत्रिपद या दूसरे मलाईदार पदों का लालच देकर भाजपा में शामिल किया जा सके। ऑपरेशन कमल के तहत अब तक जनता दल-एस के चार और कांग्रेस के तीन विधायकों ने अपनी सीट से त्यागपत्र दे दिया है। इनमें से चार को मंत्री बनाया गया है और तीन को अलग-अलग निगमों का अध्यक्ष।

ऑपरेशन कमल के तहत अब तक जनता दल-एस के चार और कांग्रेस के तीन विधायकों ने अपनी सीट से त्यागपत्र दे दिया है। इनमें से चार को मंत्री बनाया गया है और तीन को अलग-अलग निगमों का अध्यक्ष। सभी विधायक एक ही सुर में कहते हैं कि उन्होंने सत्ताधारी पार्टी का दामन सिर्फ इसलिए थामा है ताकि उनका निर्वाचन क्षेत्र विकास से वंचित न रह जाए। कर्नाटक प्रदेश भाजपा प्रमुख सदानंद गौड़ा ऑपरेशन कमल को ये कह कर उचित ठहराते हैं, विधायकों ने ये क़दम तब उठाया है जब उन्हें इस बात का अहसास हो गया कि भाजपा उनकी पार्टी से कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक है।

लेकिन ऑपरेशन कमल का सबसे मजबूत बचाव खुद मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने किया। एक पत्रकार वार्ता के दौरान उन्होंने कहा कि चूंकि विधायकों ने पहले विधानसभा से इस्तीफा दे दिया इसलिए कुछ भी गलत किए जाने का सवाल ही नहीं उठता। ये पूछने पर कि क्या मंत्रिपद दिया जाना लोकतंत्र के हित में हैं उन्होंने कहा, इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। ये भारतीय लोकतंत्र में एक अहम बदलाव है। एक पार्टी के तौर पर अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि वो उपचुनाव में जीत हासिल करें। येदियुरप्पा ने ये भी कहा कि जनता ने उन्हें राज्य में शासन करने का निर्णय दिया था। ऑपरेशन कमल इसी का परिणाम है क्योंकि हमारे पास पूर्ण बहुमत नहीं था।

येदियुरप्पा मंत्रिमंडल के 34 मंत्रियों में से 9 या तो बाहरी हैं या फिर हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं। 100 दिनों के भीतर ही मंत्रिमंडल के तीन विस्तार हो चुके हैं। पिछले 28 अगस्त को हुए विस्तार में पूर्व जेडी-एस विधायक उमेश कट्टी को शामिल किया गया था। कुछ ही दिन पहले राज्य के बागवानी मंत्री एस के बेल्लुबी को मुख्यमंत्री ने पद छोड़ने के लिए कहा था।

ये बात बेल्लुबी के समर्थकों को रास नहीं आई। बेल्लुबी के समर्थकों ने बीजापुर ज़िले के उनके निर्वाचन क्षेत्र में चार दिनों तक चक्काजाम किए रखा। कट्टी के शपथ ग्रहण समारोह में आधे से भी कम कैबिनेट मौजूद था। अनुपस्थित लोगों में सदानंद गौड़ा भी शामिल थे जिनके बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने करीब दर्जन भर विधायकों द्वारा उनसे मुलाकात कर ऑपरेशन कमल की खिलाफ़त का झंडा उठाए जाने के बाद ऐसा किया। इनमें होन्नाली के विधायक रेनुकाचार्य भी शामिल थे जो एक समय येदियुरप्पा के ख़ासुसख़ास माने जाते थे।

और भी कई विधायक भाजपा में शामिल होने की चाह रखते हैं। भाजपा के सूत्र बताते हैं कि जो लोग अपनी इच्छा से आना चाहते हैं उनका स्वागत है मगर उन्हें केवल निगमों में ही जगह दी जा सकती है क्योंकि कैबिनेट में अब कोई स्थान रिक्त रहा नहीं।

भाजपा के इस अभियान का कांग्रेस और जेडीएस के पास क्या जवाब है? कांग्रेसी खेमे की राय स्पष्ट हैजल्द ही ऑपरेशन कमल की धार कुंद करने के लिए ऑपरेशन हाथ की शुरुआत की जाएगी।

संजना

मातृभाषा

जैसे चींटियां लौटती हैं

 

बिलों में

 

कठफोड़वा लौटता है

 

काठ के पास

 

वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक

 

लाल आसमान में डैने पसारे हुए

 

हवाई अड्डे की ओर

 

ओ मेरी भाषा

 

मैं लौटता हूं तुम मेंजब चुप रहते-रहते

 

अकड़ जाती है मेरी जीभ

 

दुखने लगती है

 

मेरी आत्मा ।

 

केदारनाथ सिंह की एक कविता

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‘मैं सर्कस का रंगीला जोकर हूं’

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सुनने के बाद कैसा महसूस कर रहे हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने भारत की आधुनिक-समकालीन कला की आजादी और सम्मान का समर्थन करते हुए इसे पुनर्स्थापित किया है. दुर्भाग्य से इस मामले में राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाएं नाकाफी साबित हुई हैं. लेकिन मैं भारत को लेकर हमेशा आशान्वित रहा हूं. हमारा काम पिछले 5000 सालों से चल रहा है और ये सब मामूली अड़चने हैं. मेरे लिए ये फैसला इसलिए भी खास है क्योंकि इसका असर मुझसे कहीं आगे जाता है.

एक चित्र में अगर आपसे भारत से आपके संबधों को बताने के लिए कहा जाय, तो वो कैसा होगा?

पिछले एक साल से, हर शुक्रवार, मैं अपने परिवार को दुबई में इकठ्ठा करता हूं. जहां मैं उनके सामने अपने विचारों और दूसरी बातों को रखता हूं. इसमें एक दिन मैंने कहा कि मैं ग्रेट इंडियन सर्कस का रंगीला जोकर हूं. पिछले कुछ सालों से इस सर्कस के टेंट में दर्शकों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है. अब यहां काफी धक्का-मुक्की होने लगी है. इसी धक्का मुक्की के बीच एक दिन मुझे भीड़ ने बाहर फेंक दिया. लेकिन मेरी जड़ें बहुत गहरी हैं. वो लोग मुझे तो बाहर फेंक सकते हैं, पर वे मेरी जड़ों को नहीं उखाड़ सकते.

अगर मौका मिले तो आप उन लोगों से क्या कहना चाहेंगे जो आपका विरोध करते रहे हैं?

मेरे दिल में कोई कड़वाहट नहीं है. उन सभी से मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि वे आधुनिक-समकालीन कला को नहीं समझते. मगर वे आज नहीं तो कल इसे समझेंगे. हम एक लोकतांत्रिक देश हैं औऱ इसमें हर तरह की विचारधाराओं के लिए स्थान है. ये हिंदुस्तान की अनूठी ताकत है कि इस पर कई तरह के हमले हुए, इस पर कई तरह के प्रभाव पड़े, मगर यहां सभी एक होकर, एक साथ आगे बढ़े.

क्या आप अब खुद को व्यक्त करते समय थोड़ा सावधान रहते हैं?

नहीं, कतई नहीं. मैं अपनी कला को सिर्फ सौंदर्य की कसौटी पर कसता हूं. बाकी किसी चीज़ का मुझ पर कोई असर नहीं होता.

भारत के बारे में ऐसा विशेष क्या है जिसे आपने अपने चित्रों में उकेरने की कोशिश की है?

मेरे लिए भारत की सबसे खास चीज़ रोज जश्न मनाने की इसकी सोच है. आनंद और उत्सव भारत में जीवन के हर अंग से जुड़ा हुआ है. मैंने हमेशा चाहा है कि मेरा काम कुछ कहने वाला और लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ हो.

हिंदू धर्म की किस खासियत को आपने अपनी कला का हिस्सा बनाया?

बहुत से हिंदू ग्रंथों में अनावृत्तता को शुद्धता का प्रतीक माना गया है. ये हिंदू धर्म का अनूठापन है और इसमें गहरा दर्शन छिपा है. इसके साथ यहां आनंद और खेल की भावना के साथ-साथ प्रकृति और ब्रह्मांड के जटिल गणित की समझ भी मिलती है. इन चीज़ों का मेरी कला में एक प्रमुख स्थान है. रामायण के दृश्यों की पेंटिंग बनाने में मैंने आठ साल लगाए. प्यार के अलावा और कौन सी चीज़ मुझसे ऐसा करवा सकती थी.

भारत के हिंदू और मुसलमान दोनों में संकीर्ण पवित्रता की भावना बढ़ गई है. आपके मुताबिक इसकी क्या वजह है?

इसका जबाब तो समाजशास्त्री ही दे सकते हैं, कलाकार तो महज़ स्वप्नदृष्टा होते हैं. जहां तक मैं समझता हूं दुनिया में कट्टरवादिता के उफान का एक आर्थिक आयाम भी है. आर्थिक उथल-पुथल के दौर में लोग अपनी-अपनी आस्थाओं को मज़बूती से जकड़ लेते हैं…सही से उनको समझे बिना.

क्या आप कला और जीवन में किसी चीज को अश्लील मानते हैं?

सिर्फ ढ़ोंग को, और किसी को नहीं.

क्या आप अब भारत वापस आएंगे?

मैं ऐसा ज़रूर करना चाहूंगा, लेकिन मुझे थोड़ा इंतज़ार और करना पड़ सकता है क्योंकि ये सिर्फ अदालती लड़ाई नहीं है, अभी भी सड़कों पर हिंसा होने का खतरा मौजूद हैं.

'ज़रदारी का एजेंडा राष्ट्रीय एजेंडे पर हावी हो गया'

जबर्दस्त मुशर्रफ विरोधी भावनाओं की ज़मीन पर बना गठबंधन छह महीने भी नहीं चल सका। आपने बड़े-बड़े वादों के साथ शुरुआत की थी, आपको नहीं लगता कि लोकतंत्र को मजबूत करने का सुनहरा मौका हाथ से जाता रहा?

निश्चित रूप से, आपने बिल्कुल सही बात कही। दरअसल मैं भी पिछले कुछ दिनों से यही सोच रहा था। गठबंधन में दरार पड़ गई। ऐसा लग रहा है कि पीपीपी सरकार अभी भी तानाशाह मुशर्रफ के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रही है। ये देखना दुखद है कि जरदारी की पार्टी मुशर्रफ का ही विस्तार प्रतीत हो रही है। मैं इसे सरकार नहीं बल्कि एक तंत्र भर समझता हूं जो कि पुराने रास्ते पर ही चल रहा है। हमें 1973 के संविधान को उसके मूल रूप में लागू करना चाहिए था। सत्ता में आने के बाद एक दिन भी बर्बाद किए बिना ये काम हो जाना चाहिए था। हमें तुरंत ही न्यायपालिका को बहाल करके चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी पर अमल करना चाहिए था। गठबंधन बनाने का मकसद ही यही था। लेकिन हमारी दिशा ही बदल गई और हम लक्ष्य तक पहुंचने से चूक गए।

जरदारी को किस बात का डर था? वो जजों की बहाली से मुंह क्यों मोड़ रहे थे?

इस सवाल का बेहतर जवाब खुद ज़रदारी ही दे सकते हैं। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता क्योंकि इससे गलतफहमी और बढ़ेगी।

अब आपने विपक्ष में बैठने का फैसला कर लिया है, गठबंधन टूट चुका है, आपकी ज़रदारी से कई दौर की बातचीत हुई है। कुछ तो लगा होगा कि ज़रदारी जजों को क्यों बहाल नहीं करना चाहते?

हम कुछ समय तक साथ रहे, साथ-साथ खाया-पीया। चार दिन तो इकट्ठे गुजारे हमने। इन चार दिनों की लाज तो हम कम से कम रखें। मैं ऐसी कोई बात नहीं कहना चाहता जो उनके लिए ठीक नहीं हो।

ज़रदारी तो ऐसा नहीं सोचते। उन्होंने तो आपकी लाज का ध्यान ही नहीं रखा।

अच्छा होता कि वो रखते। इसमें आप क्या कर सकते हैं, कुछ बातें आपकी इच्छा और कोशिशों के हिसाब से नहीं होती।

एक राजनीतिक पार्टी के सह अध्यक्ष के राष्ट्रपति बनने को आप कैसे उचित ठहराएंगे? ये मुशर्रफ से किस तरह अलग है जो कि राष्ट्राध्यक्ष के बजाय किंग्स पार्टी के अध्यक्ष ज़्यादा लगा करते थे.

मुझे याद नहीं कि किसी राजनीतिक पार्टी का पदाधिकारी कभी पाकिस्तान का राष्ट्रपति बना हो। अगर कोई बना है तो ऐसा उसने पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद ही किया है। हालांकि संविधान में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। हमारा संविधान किसी पार्टी के पदाधिकारी को राष्ट्रपति बनने से नहीं रोकता, शायद इसीलिए उन्होंने ये फैसला किया हो।

आपके राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार खड़ा करने से ये साफ है कि आपको ये ठीक नहीं लगा…

मैं कहता रहा हूं कि उम्मीदवार सबकी सहमति से चुना जाना चाहिए। जब गठबंधन टूट गया तो हमने भी अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया।

आप ये तो नहीं कहना चाहते हैं कि गठबंधन इसलिए टूटा क्योंकि वो राष्ट्रपति बनना चाहते थे? या फिर इसलिए क्योंकि जजों की बहाली पर आपके बीच सहमति नहीं थी?

गठबंधन हमारी वजह से नहीं टूटा। वो लोग अपने वादों पर खरा उतरने में नाकाम रहे। ये उनकी करनी है। हमें गठबंधन से अलग होने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि हमारे पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था। हम बहुत दबाव में थे, हमें गठबंधन से बाहर होने की कोई खुशी नहीं है। मेरे और ज़रदारीजी के बीच बहुत स्पष्ट समझ थी। 7 अगस्त को लिखे गए समझौते की लिखावट अभी भी बिल्कुल ताज़ी है जिसमें कहा गया था कि मुशर्रफ के जाने के 24 घंटों के भीतर न्यायपालिका को मुरी समझौते के तहत बहाल कर दिया जाएगा। साथ ही उसमें इस बात का भी साफ-साफ जिक्र था कि राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी आम सहमति से चुना जाएगा। अगर आप हस्ताक्षरित चीज़ों से ही मुकर जाएंगे तो फिर मुझे नहीं पता कि आप अपनी जुबान की लाज कैसे रख सकेंगे।

क्या आप ये कहना चाहते हैं कि जरदारी ने आपके साथ विश्वासघात किया?

अगर आप ऐसा कहती हैं तो मैं इनकार नहीं करूंगा।

मेरे सवाल का जवाब दीजिए, क्या आप छला हुआ महसूस कर रहे हैं?

मैं बुरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा हूं।

क्या समर्थन वापसी की घोषणा के बाद आपकी ज़रदारी से बात हुई है?

नहीं मैंने उनसे बात नहीं की।

क्या उन्होंने भी आपसे बात करके ये नहीं बताया कि वो अपने वादे से क्यों मुकर गए?

उन्होंने टीवी पर कुछ सफाई दी है, पर व्यक्तिगत तौर पर नहीं।

हां उन्होंने टीवी पर माफी मांगी पर क्या ये कोई मायने रखती है?

मेरी व्यक्तिगत तौर पर उनसे कोई नाराज़गी नहीं है। गठबंधन का निर्माण देशहित में और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हुआ था। इसके पीछे हमारा कोई निजी उद्देश्य नहीं था। गठबंधन की राजनीति में हम केवल देशहित को ध्यान में रखकर घुसे थे।

आपके मुताबिक आप देश की सेवा करना चाहते थे वो नहीं?

मैं देश को फिर से पटरी पर लाना चाहता हूं, उन ग़लत चीजों को ठीक करना चाहता हूं जिन्हें तानाशाहों ने अंजाम दिया। हम तानाशाहों द्वारा लाए गए उन सभी संविधान संशोधनों को खत्म करना चाहते थे। हम राजनीति में सेना का हस्तक्षेप हमेशा के लिए रोकना चाहते थे। यही असल एजेंडा था। लेकिन हमने राष्ट्रीय के बजाय निजी एजेंडे को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।

क्या मुशर्रफ का इस्तीफा हासिल करने के बाद आपको लगा कि आप सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और आगे न्यायपालिका को भी बहाल कर दिया जाएगा?

इसी भावना के साथ समझौते पर दस्तखत हुए थे। दस्तखत करते वक्त मेरे दिमाग में इसके अमल को लेकर कोई शंका नहीं थी। तब मुझे कुछ निराशा हुई जब मुरी घोषणापत्र का सम्मान नहीं किया गया। पर मैंने सोचा कोई बात नहीं, अब एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। मैंने सोचा कि इस बार ज़रदारी मुझे निराश नहीं होने देंगे।

आपको लगता है कि ज़रदारी भी राजनेता के रूप में एक तानाशाह ही हैं?

ये तो बड़ा कठिन सवाल है। मैं इतना खुल के जवाब नहीं दे सकता जितना खुल के आप सवाल कर रही हैं। मैं ये कहना चाहता हूं कि पीपीपी का तानाशाही से संघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है और उसे इस भावना पर कायम रखना चाहिए था।

कुछ लोग इस बात पर बहस कर सकते है कि आपने पर्याप्त नरमी नहीं दिखाई, जबकि जरदारी ने जजों को बहाल न करने की बात ही नहीं की थी। अपने आलोचकों को क्या जवाब देंगे?

न्यायपालिका की बहाली के मामले में किसी लोच या नरमी का सवाल ही नहीं पैदा होता। मुशर्रफ के इस्तीफे पर भी किसी समझौते का सवाल ही नहीं उठता था। साथ ही जिन मुद्दों पर हमने हस्ताक्षर किए हैं उन पर भी किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता। आप राजनीति में सिद्धांतों से जुड़े मुद्दों पर समझौता कैसे कर सकते हैं। हां व्यक्ति को थोड़ा लचीला होना चाहिए मगर जब लोकतंत्र की मजबूती और संसद की संप्रभुता का सवाल हो तब आप लचीलापन कैसे दिखा सकते हैं।

क्या गठबंधन में शामिल होने की कोई संभावना है? ज़रदारी ने आपसे वापसी की अपील की है।

अपील तो हुई है पर बिनी किसी वादे के। इस अपील में अपनी जुबान की लाज रखने का कोई वादा नहीं है लिहाजा ऐसी कोई संभावना नहीं है। वो कह रहे हैं कि वो जजों को तो बहाल कर देंगे लेकिन मुख्य न्यायाधीश को नहीं।

क्या आपको ये स्वीकार्य होगा?

मुझे नहीं लगता कि ये देश में किसी को भी स्वीकार्य होगा। मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका के संघर्ष के प्रतीक हैं। प्रधानमंत्री गिलानी ने कहा है कि मुख्य न्यायधीश सभी जजों के इमाम हैं और उन्हें फिर से बहाल किया जाएगा। जब गठबंधन एक था तब उन्होंने ऐसा नहीं किया मुझे नहीं लगता कि अब इसके टूट जाने के बाद वो ऐसा कुछ करेंगे।

नेशनल रीकंसीलिएशन क़ानून जिसके तहत ज़रदारी पर चल रहे सभी मामले वापस ले लिए गए थे, निश्चित रूप से पीपीपी नेता के मन में इसका भी डर होगा। हो सकता है वो इफ्तिखार चौधरी को वापस बुला भी लें पर आपको नहीं लगता कि कुल मिलाकर मामला सत्ता का है? सत्ता में बने रहना लोकतंत्र और न्यायपालिका की मजबूती से कहीं ज्यादा अहम है?

मुझे ही नहीं बल्कि देश के करोड़ों लोगों को ऐसा ही लगता है। आखिरकार ये सत्ता की दौड़ साबित हुई और इस प्रक्रिया में वो लोकतंत्र को भूल गए। वो स्वतंत्र न्यायपालिका की जरूरत को भूल गए, उन्होंने नागरिकों, वकीलों और राजनीतिक पार्टियों के संघर्ष को दरकिनार कर दिया। जब इफ्तिखार चौधरी को मुशर्रफ ने हटाया उस वक्त खुद मुशर्रफ की पार्टी के कार्यकर्ता कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष में शामिल थे। यहां तक कि बेनज़ीर भुट्टो भी चाहती थी कि चौधरी को बहाल किया जाए। ये उनकी पार्टी और नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे बेनज़ीर भुट्टो की इच्छाओं का सम्मान करें।

मुझे विश्वास है कि आपने बातचीत के दौरान उन्हें उनकी पत्नी के शब्द याद दिलाए होंगे।

बेनज़ीर का ये बयान हर रोज़ टेलीविज़न पर दिखाया जा रहा है।

तो क्या आपको लगता है कि गठबंधन निजी स्वार्थों के लिए बनाया गया था?

मैं बस ये कहना चाहूंगा कि उनके पास एक निजी एजेंडा था जो राष्ट्रीय एजेंडे से ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया।

अब चूंकि गठबंधन टूट चुका है इसलिए अधिकतम संभावना इस बात की है कि मुशर्रफ साफ बच निकलने में कामयाब रहेंगे क्योंकि उनके खिलाफ आरोप पत्र कोर्ट में दाखिल ही नहीं होगा।

मैं निजी तौर पर मुशर्रफ के खिलाफ नहीं हूं। मैं ऐसा व्यक्ति नहीं हूं जो बदले की नीयत रखता है। अपने दुश्मन से बदला लेने के लिए मैं सारी सीमाओं को पार नहीं करूंगा। जिस अपमान से मैं गुजरा हूं, मेरे और मेरे परिवार के साथ मुशर्रफ ने जो बर्ताव किया मैं उससे बाहर निकलना चाहता हूं। लेकिन जब बात देश और संविधान के साथ उनके कुकर्मों की आती है तो फिर मैं उन्हें माफ करने वाला कौन होता हूं। ये निर्णय लेना मेरा काम नहीं है कि उन्होंने देश के खिलाफ क्या किया।

आपने उन्हें माफ कर दिया पर क्या मुशर्रफ कोर्ट और क़ानून के जरिए देश के प्रति जवाबदेह नहीं हैं?

बिल्कुल हैं।

क्या हम पीएमएल-क्यू को अपनी मूल पार्टी में फिर से देख सकेंगे?

इस दिशा में एक अभियान चल रहा है और पीएमएल-क्यू का एक बड़ा तबका अपनी मूल पार्टी में वापस आने का इच्छुक है।

क्या इसमें एक समय आपके करीबी सहयोगी रहे मुशाहिद हुसैन भी शामिल है?

मैं व्यक्तिगत रूप से किसी का नाम नहीं ले सकता।

नौ बरस में न्याय या अन्याय

बीएमडब्लयू मामले में संजीव नंदा को दोषी ठहराए जाने के बाद मेरी पहली प्रतिक्रिया थीआखिर इसमें इतना समय क्यों लगा? अपने बेटे नितीश के लिए न्याय की लड़ाई में मैंने कभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी थी. हालांकि दूसरे पक्ष ने इसमें रोड़ा अटकाने की जी-तोड़ कोशिशें की. मेरे जैसे किसी वेतनभोगी व्यक्ति के लिए न्याय की लड़ाई लड़ना बेहद मुश्किल काम था. ऐसा करते हुए मुझे तमाम दूसरी जरूरतों की तिलांजलि देनी पड़ीः आप अपने काम पर ध्यान नहीं दे पाते, आपका करियर प्रभावित होने लगता है, आपको तमाम तरह की शारीरिक समस्याएं घेरने लगती हैं. तारीख पर तारीख पड़ने से अपराधियों का हौसला बढ़ता है और वो आप पर हावी होने लगते हैं. यहां तक कि गवाहों की रुचि और याददाश्त भी समय के साथ धुंधलाने लगते है. जब भारती यादव वापस लौटी तब तक साढ़े चार साल की देरी हो चुकी थी. ये देरी पीड़ित के लिए असह्य वेदना और अपराधियों के लिए किसी वरदान सरीखी होती है. मेरे ख्याल से व्यवस्था को कड़ाई से उन वकीलों पर नकेल कसनी चाहिए जो हास्यास्पद वजहें गिना-गिनाकर तारीखें बढ़वाने में लगे रहते हैं.

इस तरह के मामलों में हर तरह की शक्ति अपनी भूमिका अदा करती है. पैसे वाले व्यक्ति द्वारा नियुक्त वकील और एक साधारण व्यक्ति द्वारा नियुक्त वकील में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है. दिल्ली के मुख्य सरकारी वकील और दूसरे सफल वकीलों के दफ्तरों की ही तुलना करके देखें तो ये अंतर साफ हो जाता है. मेरे मामले में सरकारी वकील के पास मामले की रिसर्च आदि के लिए कोई सहायक तक नहीं था. सरकारी वकीलों के ऊपर काम का बोझ इतना ज्यादा होता है कि वो चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते.

जिन लोगों के खिलाफ खड़ी थी वो संजीव नंदा से काफी अलग किस्म के थे. हम ऐसे लोगों के खिलाफ लड़ रहे थे जिनकी एक लंबी आपराधिक पृष्ठभूमि रही थी. पिता बी-क्लास हिस्ट्रीशीटर है. राजनेता-अपराधी गठजोड़ की वजह से मेरी परेशानियां कहीं ज्यादा बड़ी थीं.

किसी हाई प्रोफाइल मामले में ताकतवर आरोपी को दोषी साबित करना बहुत दुष्कर होता है. लेकिन लडा़ई यहीं खत्म नहीं हो जाती. बीएमडब्ल्यू हादसे में मारे गए एक पुलिस कांस्टेबल की विधवा को मैंने किसी टेलीविज़न चैनल पर ये कहते सुना कि उसे यकीन ही नहीं है कि संजीव नंदा कुछ सालों तक जेल में रहेगा. वो ग़लत नहीं है. ऐसा क्यों है कि हत्या का आरोपी भी 14 साल की सुनवाई के बाद माफी की मांग कर सकता है. कई बार ऐसा होता है कि अपराधी को जितने समय की सज़ा मिलती है उससे ज्यादा समय पीड़ित अदालत के चक्कर काटने में बिता देता है.

आम धारणा के विपरीत मैं अपने और बीएमडब्ल्यू मामले की तुलना नहीं कर सकती. पहली बात तो ये कि बीएमडब्ल्यू मामला केस पीड़ितों की लड़ाई नहीं था. दूसरी बात, मैं जिन लोगों के खिलाफ खड़ी थी वो संजीव नंदा से काफी अलग किस्म के थे. हम ऐसे लोगों के खिलाफ लड़ रहे थे जिनकी एक लंबी आपराधिक पृष्ठभूमि रही थी. पिता बी-क्लास हिस्ट्रीशीटर है. राजनेता-अपराधी गठजोड़ की वजह से मेरी परेशानियां कहीं ज्यादा बड़ी थीं. ये चीज़ मुझे चिंता में डालती है कि संसद या विधानसभाएं अपराधियों के लिए सुरक्षित शरणगाहें बन गई हैं. उनके खिलाफ लोग आवाज़ उठाने से भी डरते हैं. मैं राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण के खिलाफ लड़ रही थी.

इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद किसी मोड़ पर भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि मुझे पीछे हट जाना चाहिए. इसकी वजह थी कि मैं अपने बेटे और एक बड़े मकसद के लिए लड़ रही थी. बहुत से लोग मुझसे कहते थे कि इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा. लेकिन मुझे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा था. अगर एक जगह न्याय नहीं मिलता तो मैं इसे अगले स्तर पर ले जा सकती थी. जब भी मैं पटियाला हाउस कोर्ट जाती हूं तो मुझे वहां बहुत से लोग बिना किसी उम्मीद के बैठे दिखते हैं. कहने को मैं पढ़ी-लिखी हूं, लेकिन मैं वो दिन याद करती हूं जब मुझे बारी भरकम कानूनी शब्दों को समझने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ा. मैं ज्यादा कुछ तो नहीं समझ पाई पर इस लायक ज़रूर हो गई कि कम से कम कुछ सवाल तो पूछ पाऊं. जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टू और नितीश कटारा के मामलों के बाद एक अंतर ज़रूर आया है. अपने किसी करीबी को खो चुके लोग मुझे फोन कर पूछते हैं, “हमने 15 साल पहले किसी को खो दिया था लेकिन तब हम पर मुंह न खोलने का जबर्दस्त दबाव था. पर अब हम इसे फिर से उठाना चाहते हैं.” लोगों में आई इस जागरुकता से मुझे बेहद खुशी होती है. साथ ही ये अपराधियों के लिए निरोधक का काम भी करता हैं. स्कूली बच्चे हथियार उठाकर एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं. जब वो देखते हैं कि 28 साल का एक व्यक्ति हत्या करने के बाद भी सज़ा नहीं पाता तो स्वाभाविक रूप से वो भी ऐसा करने से नहीं डरते. अपराध का दायरा फैलता जा रहा है और साथ ही एक बेशर्मी का भाव भी तेजी से पांव पसार रहा है कि आप अपराध करने के बाद भी बचे रह सकते हैं.

लोग कह सकते हैं कि मेरे जैसे लोगों को न्याय सिर्फ इसलिए मिला क्योंकि मीडिया हमारे साथ था. मुझे नहीं लगता कि इस देश के न्यायाधीश अख़बारों औऱ चैनलों के लिखे-कहे के आधार पर फैसले देते हैं. अगर ऐसा होता तो मेरा मामला छह महीने में ही निपट गया होता. पर ऐसा नहीं हुआ इसमें छह साल लग गए. यहां डीपी यादव है जो चुनावी फायदे के लिए जीनत अमान को जहाज में बिठाकर उड़ता है. दूसरी तरफ आम आदमी लंबे समय से शोषित-पीड़ित है. उसकी आवाज़ को बुलंद करने के लिए अब कोई तो चाहिए. अगर वो मीडिया हो तो इसमें बुराई क्या है. हालांकि ये बहुत छोटी शुरुआत है पर इसे काफी पहले हो जाना चाहिए था.

नीलम कटारा(रोहिणी मोहन से बातचीत पर आधारित) 

कुछ बाढ़ कथाएं

कथा नंबर एकसीबीआई बनाम बाढ़

            आप क्या कर रहे थे मंत्री महोदय, जब बाढ़ रही थी। 

            जी हमने तो पद और गोपनीयता की शपथ खायी थी इसलिए कि हम यह बात हमेशा गोपनीय रखेंगे कि हम क्या करते हैं। वैसे हम जो कर रहे थे, वो साफ है। पहले बाढ़ का इंतजार कर रहे थे, अब हैलीकाप्टर पर सर्वे कर रहे हैं। और हमें लगता है कि इन दोनों ही बातों पर सीबीआई को कोई आपत्ति नहीं है। 

            यह बाढ़ में सीबीआई कैसे घुस गयी। 

            जी हमसे पहले वाली सरकार के बंदों ने कुछ किया, तो सीबीआई ने धर लिया। सो हमने तय किया कि कुछ करना ही नहीं है। कुछ करो, सीबीआई जाती है। 

            और कुछ ना करो, तो बाढ़ जाती है। 

            पर जी बाढ़ सेफ है ना, इसमें सीबीआई को ना बताना पड़ता कि कैसे लाये। 

            पर इसमें पब्लिक मरती है, पब्लिक परेशान होती है। उसकी चिंता नहीं है आपको। 

            गोपनीयता की शपथ से बंधे हुए हैं, सो यह बात गोपनीय ही रखनी पड़ेगी कि हमको चिंता किस बात की रहती है। 

            आप बस हैलीकाप्टर में ही घूमिये। कभी सूखा का सर्वे और कभी बाढ़ का सर्वे कीजिये।

            नहीं, सिर्फ इतना ही नहीं, मंत्री को बहुत काम करना पड़ता है। सिर्फ हैलीकाप्टर नहीं, हवाई जहाज से बीचबीच में विदेश भी जाना पड़ता है एनआरआई को इनवाइट करने। 

            मंत्रीजी फिर हैलीकाप्टर पर उड़ लिये। 

            कहानी से शिक्षा

            करने और ना करने में चुनना हो, तो ना करने को चुनना चाहिए। तब ही बिहार में मंत्री बनने की काबिलियत अर्जित की जा सकती है। 

कथा नंबर दोएनआरआई करेंगे

            बाढ़ से पहले बिहार का माहौल एनआरआईमय हो लिया था।  

            ये परियोजना कौन पूरी करेंगे। 

            जी वो वाले एनआरआई। 

            ओके वहां की युनिवर्सिटी की परियोजना कौन पूरी करेंगे। 

            जी वो अमेरिका वाले एनआरआई। 

            जी बाढ़ के मसले पर कौन क्या करेगा।

            जी यहां भी सब कुछ एनआरआई के हाथों ही होना है। देखिये बाढ़ भी यहां देसी गंगा से नहीं आयी। नेपाल बेस्ड नान रेजिडेंट इंडियन नदी

कोसी से आयी है। 

            ओफ्फो, सब कुछ एनआरआई ही करेंगे, तो इंडियन क्या करेंगे। 

            जी अभी मंत्री गये हैं ना हैलीकाप्टर पर सर्वे करने, वह तो इंडियन हैं ना। कुछ ही एनआरआई करें, यह अच्छा नहीं ना लगता। कुछ काम इंडियन भी करेंगे। अभी बाढ़ राहत घोटाले की खबरें आने वाली हैं, वो सब भी इंडियन ही करेंगे। 

               कहानी से शिक्षा

            कामों को परस्पर बांट कर करना चाहिए। सभी कुछ एनआरआई के हवाले नहीं छोड़ना चाहिए। 

आलोक पुराणिक

ईश्वर के नाम पर

जब वे नर्मदा दिघल को खोजते हुए आए तो उन्हें घर पर कोई नहीं मिला. नर्मदा अपने पांच बच्चों और सास को साथ लेकर पास के घने जंगल में जा छिपी थी. हमलावरों को जब कोई नहीं मिला तो उन्होंने घर को ही आग के हवाले कर दिया. नर्मदा के वापस आने तक अगर कुछ बचा था तो वो थी सिर्फ राख. नर्मदा ने गहरी सांस ली, खड़ी हुई और अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर खींचते हुए ईश्वर से अपने पापों को माफ करने की प्रार्थना की.

एक महिला और उसके ईश्वर के बीच ये एक सहज सा बंधन है जिसे शायद ही कोई मानवीय आपदा तोड़ सकती हो. नर्मदा कहती है, “मैं मर जाऊंगी मगर ईसाई धर्म नहीं छोड़ूंगी.”

ये जगह कंधमाल का केंद्र है. कंधमाल यानी उड़ीसा के बीचों-बीच स्थित एक जिला जहां हिंदुओं और ईसाइयों के बीच तीखा टकराव देखने को मिल रहा है. 1994 में अस्तित्व में आए और 7649 वर्ग किमी में फैले इस जिले में 2515 गांव हैं. पहाड़ियों और गांवों से होकर गुजरने वाली संकरी पगडंडियों से मिलकर बना ये इलाका काफी दुर्गम है. यहां न कोई फैक्ट्री है और न कोई रेलवे लाइन. बस सेवा है मगर दुर्लभ. विकास की दौड़ में कंधमाल इतना पीछे है कि जिले की आधिकारिक बेवसाइट भी इसे उड़ीसा के सबसे पिछड़े जिलों में एक बताती है.

कंधमाल की आबादी करीब आठ लाख है जो अलग-अलग जातियों और जनजातियों से बनी है. इसमें आधा हिस्सा कंध जनजाति का है जो लगभग पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव में है. दूसरा मुख्य हिस्सा पना समुदाय का है जिनमें से ज्यादातर ईसाई हैं. आबादी के लिहाज से देखा जाए तो कंधमाल की एक चौथाई जनसंख्या ईसाई है और बाकी ज्यादातर हिंदू. ये आंकड़ा इस मायने में दिलचस्प है कि पूरे उड़ीसा की आबादी में जहां ईसाइयों की संख्या 2.44 प्रतिशत है वहीं कंधमाल में ये 25 फीसदी हैं. दूसरी तरफ, हिंदू जनसंख्या के घनत्व के मामले में उड़ीसा भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. 2001 की जनगणना के मुताबिक यहां की 95 फीसदी आबादी हिंदू है. कंधमाल में ईसाइयों की संख्या में बढ़ोतरी विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसे कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को उनके अस्तित्व के लिए उर्वरा भूमि मुहैया कराती है. यहां उसने ईसाइयों के खिलाफ हमलावर अभियान छेड़ा हुआ है जिसके दो घोषित उद्देश्य हैं: ईसाइयों को फिर से हिंदू बनाना और गायों के कथित वध को रोकना.

कंधमाल में ईसाइयों की संख्या में बढ़ोतरी विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसे कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को उनके अस्तित्व के लिए उर्वरा भूमि मुहैया कराती है. यहां उसने ईसाइयों के खिलाफ हमलावर अभियान छेड़ा हुआ है जिसके दो घोषित उद्देश्य हैं: ईसाइयों को फिर से हिंदू बनाना और गायों के कथित वध को रोकना.

कंधमाल में विहिप के अभियान की अगुवाई 81 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती कर रहे थे. उनकी गतिविधियां मुख्य रूप से एक-दूसरे से 150 किमी की दूरी पर स्थित दो आश्रमों से चलती थीं. सरस्वती, विहिप के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के सदस्य भी थे जो संस्था की शक्तिशाली निर्णय समिति है. 23 अगस्त की रात जब वे अपने आश्रम में जन्माष्टमी का उत्सव मना रहे थे तो उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. ईसाइयों की नापसंद और अपने अनुयायियों के लिए पूजनीय सरस्वती पर इससे पहले भी नौ बार जानलेवा हमले हो चुके थे.

सरस्वती की हत्या किसने की इस बारे कई बातें कही जा रही हैं. उड़ीसा सरकार का कहना है कि ये कंधमाल में अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहे माओवादियों का काम है. सरकार का दावा सीपीआई(माओवादी) द्वारा जारी किए गए दो बयानों पर आधारित है जिनमें उन्होंने इस हत्या की जिम्मेदारी ली है. और अगर ये बात सही है तो इसका मतलब ये है कि माओवादी भी यहां चल रहे धार्मिक टकराव में शामिल हो चुके हैं.

दूसरी थ्योरी विहिप की तरफ से आ रही है. सरस्वती की हत्या के बाद विहिप के अंतराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने एक बयान जारी करते हुए कहा, “एक बार फिर ईसाई मिशनरियों के क्रूर चेहरे का खुलासा हो गया है. स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पिछले 45 साल से आदिवासियों के बीच रहकर अस्पताल, स्कूल और हॉस्टल बनाने का काम कर रहे थे. वे न तो पूंजीवादी थे और न असामाजिक तत्व. उनके काम की बदौलत आदिवासियों में अपने धर्म और संस्कृति को लेकर जागरूकता आई थी जो सिर्फ ईसाई मिशनरियों को ही अखर सकती थी.”

दूसरी तरफ, ईसाई संस्थाओं का कहना है कि उनका इस हत्या से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा इस मामले की जांच की मांग की है. पब्लिक अफेयर्स ऑफ आल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के नेशनल सेक्रेटरी डॉ. सैम पॉल का कहना था, “दिवंगत विहिप नेता सरस्वती से हमारे काफी मतभेद रहे. संघ परिवार का नफरत का अभियान ईसाइयों के लिए मुसीबतों का सबब रहा है जिसमें पिछले साल दिसंबर में हुई असाधारण हिंसा भी शामिल है. मगर फिर भी हम चाहते हैं कि हर कोई शांति से रहे और हम हर किसी से कानून का पालन करने की अपील करते हैं.”

मगर सच्चाई जो भी रही हो, इस हत्या ने भावनाओं को भड़का दिया. 25 अगस्त आते-आते हिंदूवादी संगठन कंधमाल में ईसाइयों के घरों पर हमला कर रहे थे. हमले अक्सर रात को होते थे. एक सितंबर को उड़ीसा सरकार ने आंकड़े पेश किए: 16 लोग मारे गए, 35 घायल हुए और 185 को गिरफ्तार किया गया. 558 घर और 17 पूजास्थल जलाए गए, 12539 लोग राहत शिविरों में भेजे गए, अर्धसैनिक बलों की 12 कंपनियां, उड़ीसा राज्य सशस्त्र बल की 24 प्लाटून, आर्म्ड पुलिस रिजर्व फोर्स की दो टुकड़ियां और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप की दो टीमें तैनात की गईं.

विहिप के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण तोगड़िया, सरस्वती के अंतिम संस्कार के लिए कंधमाल पहुंचे.(उन्हें उनके चकपाड़ा आश्रम में, जहां वे स्कूल और लड़कों के लिए एक हॉस्टल चलाते थे, पद्मासन की स्थिति में समाधि दे दी गई) तोगड़िया ने कहा कि सरस्वती की हत्या ईसाई समुदाय ने की है. कंधमाल और उड़ीसा में अन्य जगहों पर ईसाइयों पर हमलों की शुरुआत के लिए ये काफी था. सैकड़ों ईसाइयों के घर जला दिए गए, कुछ पादरियों की हत्या कर दी गई और चेतावनी जारी की गई कि या तो हिंदू बनकर घर वापस लौटें या हमेशा के लिए इलाका छोड़ दें.

कुछ मामलों में इस धमकी ने काम भी किया. हम संकरखोल गांव के जंगलों में पहुंचते हैं जहां संघ कार्यकर्ताओं का एक समूह 18 ईसाइयों को फिर से हिंदू बना रहा है. दुबले-पतले और दाढ़ी रखने वाले संघ के मंडल मुखिया सुधीर प्रधान इसके इंचार्ज हैं. ये 18 ईसाई अपना मन न बदल लें ये सुनिश्चित करने के लिए 30 के करीब हिंदू भी मौजूद हैं. हर ईसाई अपने साथ उड़िया में लिखी एक बाइबल, हाथ पर बांधने के लिए कलावा, नारियल, अगरबत्तियां और माथे पर लगाने के लिए तिलक लाया है. ये ईसाई सबसे पहले वहां पर लगाई गई आग में बाइबल जलाते हैं. उसके बाद वे एक गोल घेरे में बैठते हैं जिसके बीच में नारियल रखे जाते हैं. सबसे पहले पड़ाड़ियों के देवताओं की स्तुति होती है. उसके बाद एक ईसाई उठता है. हाथ में नारियल लिए वह कहता है, “मैं शपथ लेता हूं कि आज मैं हिंदू बन गया हूं. आज के बाद अगर मैं फिर कभी ईसाई बना तो मेरा वंश खत्म हो जाए.”  वह नारियल को एक पत्थर पर पटककर फोड़ देता है. बाकी लोग भी यही प्रक्रिया दोहराते हैं. कुछ बुदबुदाते हैं, तो कुछ चिल्ला-चिल्लाकर ऐसा कहते हैं. एक हिंदू पुजारी ईसाई से हिंदू बने इन व्यक्तियों के माथे पर तिलक लगाता है.

इसके बाद कमान सुधीर प्रधान थामते हैं. तनी मुद्रा में आंखें बंद करके वो ओम और गायत्री मंत्र का पाठ करते हैं. इसके बाद नारों की आवाज आती है. भारत माता की जय…गंगा माता की जय…गौ माता की जय…श्री रामजन्मभूमि की जय. फिर कुछ समय के लिए चुप्पी छा जाती है. ईसाई से हिंदू बने लोग झुकते हैं और जमीन पर माथा लगाते हैं. नारा गूंजता है, जय श्री राम. ईसाई से हिंदू बनने का पहला चरण पूरा हो चुका है.

इन ईसाइयों के लिए हिंदू बनने की वजह जान की सलामती है. वे कंधमाल में रहना चाहते हैं. अपने घर की सुरक्षा चाहते हैं. कुछ महीनों में ईसाई से हिंदू बने इन लोगों से एक यज्ञ में हिस्सा लेने को कहा जाएगा. इसमें उन्हें भगवा कपड़े पहनकर पवित्र धागा बांधना होगा. उनके केश भी काटे जाएंगे. इसकी फीस के तौर पर वे कुछ बकरियां और कुछ चावल देंगे. उन्हें पीने के लिए गौमूत्र और तुलसी का जल दिया जाएगा. वे संकल्प लेंगे और फिर मिलजुलकर चावल और मांस खाएंगे जो उन्हीं के चढ़ावे से बनेगा. ये हिंदू बनने का आखिरी चरण होगा. इसके बाद उन्हें घर पर तुलसी का पौधा रखना होगा, दीवारों पर देवी-देवताओं की तस्वीरें टांगनी होंगी और हिंदू त्यौहार मनाने होंगे.

प्रधान खुश हैं. उनका आज का काम हो गया है. वे हिंदू और ईसाई के बीच का फर्क समझाते हुए कहते हैं, “वे (ईसाई) गाय खाते हैं. हम गाय की पूजा करते हैं. इसलिए जो लोग गाय खाते हैं उनके साथ वैसा ही व्यवहार होना चाहिए जैसा वे गायों के साथ करते हैं.”  प्रधान कहते हैं कि तोगड़िया ने ये नीति बनाई है. वे बताते हैं, “तोगड़िया पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि ईसाइयों के लिए कोई जगह नहीं है. अगर वे हिंदू नहीं बनते तो उन्हें जाना होगा. हमें कोई परवाह नहीं वे कहां जाते हैं. उन्हें उड़ीसा छोड़ना होगा.”

मगर लोगों को मारने और बाहर भगाने की कवायद क्यूं? सिर्फ हिंदुओं का प्रतिशत 95 से 100 तक लाने के लिए? कंधमाल के जिला मजिस्ट्रेट डॉ कृष्ण कुमार का मानना है कि इसके पीछे की पहली दो वजहें नौकरियां और जमीन है और धर्म का नंबर इसके बाद आता है. हिंदू गुटों ने जब ईसाइयों पर हमला शुरू किया तो कुमार को रातोंरात कंधमाल का चार्ज दिया गया. सरस्वती की हत्या के बाद उन्हें सूचना मिली कि रैकिया में एक पादरी की हत्या हो गई है. कुमार कहते हैं, “जिस यात्रा में आमतौर पर दो घंटे लगते हैं उसे पूरी करने में मुझे 11 घंटे लग गए. सड़कों पर कई पेड़ काट कर गिरा दिए गए थे.”

कुमार बताते हैं कि उन्हें क्यों नौकरी कंधमाल में छिड़ी लड़ाई की पहली वजह लगती है. उनका कहना है कि उनके प्रशासन के पास जाली जाति प्रमाणपत्र पेश करने के 1000 मामले हैं. साफ है कि कई गैरआदिवासियों ने—आम तौर पर दलित–खुद को कंध जनजाति का बताते हुए जाली प्रमाणपत्र पेश किए हैं. दरअसल कानून अनूसूचित जनजातियों को धर्म परिवर्तन के बाद भी नौकरियों में आरक्षण देता है. लेकिन अनुसूचित जाति को धर्मपरिवर्तन करने पर आरक्षण का लाभ नहीं मिलता. यानी कि कुमार की मानें तो पना, ईसाई बनने के बाद भी आरक्षण के लालच में कंध आदिवासियों की नौकरी के अवसरों में सेंध लगा रहे हैं. कंधमाल में सरकारी नौकरी का बड़ा महत्व है क्योंकि यहां निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर न के बराबर हैं.कंधमाल के जिला मजिस्ट्रेट डॉ कृष्ण कुमार का मानना है कि इसके पीछे की पहली दो वजहें नौकरियां और जमीन है और धर्म का नंबर इसके बाद आता है.

फिर मसला जमीन का भी है. कुमार कहते हैं, “आदिवासी यहां हमेशा से हैं. वे यहां के मूल निवासी हैं. उन्हें कभी ये साबित नहीं करना पड़ा कि जमीन उनकी है. बीसवीं सदी की शुरुआत में उनके इलाके को बाहरी दुनिया के लिए खोल दिया गया. जमीनों के पट्टे दिए जाने लगे. उन्होंने खुद भी अलग-अलग वजहों से अपने पड़ोसियों को जमीन दी. जब मालिकाना हक साबित करने का वक्त आया तो वे ऐसा नहीं कर सके. दूसरे लोग जमीनों पर काबिज होने लगे और आदिवासी बाजारवादी अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं बन सके.” इसलिए अनुसूचित जनजाति के हिंदुओं और अनुसूचित जाति के ईसाइयों के बीच टकराव की एक वजह ये भी हो सकती है.

इस पूरे मुद्दे में एक नया पहलू नवंबर 2007 में जुड़ा जब उड़ीसा सरकार ने कहा कि दलित और आदिवासी दोनों एक ही परिवार यानी कुई समाज का हिस्सा हैं. दरअसल कुई कंधमाल में प्रचलित बोली है और सरकार का इरादा इसे दलित और आदिवासियों को आपस में जोड़ने का जरिया बनाने का था. इससे भी ज्यादा अहम ये है कि इसकी मंशा दलितों को आरक्षण और वे दूसरे सामाजिक लाभ देना था जो जनजातियों को मिलते हैं, भले ही उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया हो. आदिवासियों ने इसका कड़ा विरोध किया.

और अब इस जटिल मिश्रण में धर्म का रंग भी घुल गया है.

कंधमाल में मिशनरी पहली बार करीब 300 साल पहले आए. उन्होंने यहां स्कूल और अस्पताल खोले. उन दिनों यहां मलेरिया का कहर हुआ करता था. मिशनरी घर-घर जाते और मलेरिया और दूसरी बीमारियों के शिकार लोगों की सहायता करते. तब इन इलाकों की तरफ कोई झांकता भी नहीं था. चर्चों ने लोगों तक अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाईं. हो सकता है कि उस दौर में मलेरिया से पीड़ित कुछ लोग जब ठीक हो गए हों तो इसे चमत्कार के रूप में प्रचारित किया गया हो. आज भी कंधमाल में हिंदू से ईसाई धर्म अपनाने वाले ज्यादातर लोग कहते हैं कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि जब उन्होंने जीसस से प्रार्थना की तो उनके परिवार का कोई सदस्य चंगा हो गया. 1998 में ईसाई धर्म अपनाने वाली नर्मदा दिघल बताती हैं, “मेरी बेटी सुभद्रा को रहस्यमय बुखार हो गया था. मैंने कई हिंदू देवी-देवताओं की आराधना की मगर वो ठीक नहीं हुई. एक दिन मेरे पति ने मुझे एक पादरी के बारे में बताया जिसका कहना था कि हमें यीशु से प्रार्थना करनी चाहिए. मैंने ऐसा ही किया और मेरी बेटी ठीक हो गई. मुझे ईसाई क्यों नहीं बनना चाहिए?”

नर्मदा के पति गोवर्धन एक स्थानीय ऑफिस में नौकरी किया करते थे. उन्हें अपनी बेटी सुभद्रा को अक्सर मेडिकल चेकअप के लिए ले जाना पड़ता था. ऐसे ही एक चेकअप के लिए गोवर्धन ने जब अपने अधिकारी से छुट्टी मांगी तो उन्हें नौकरी से ही हाथ धोना पड़ गया. उनकी मुसीबत के बारे में जब स्थानीय पादरी ने सुना तो उन्होंने गोवर्धन से यीशु, बाइबल और ईसाई धर्म की चर्चा की. गोवर्धन और उनके परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया. उन्हें बाइबल दी गई और बताया गया कि यीशु ही ऐसे अकेले भगवान हैं जिन्होंने औरों के लिए अपनी जिंदगी दे दी. छह महीने के बाद उन्हें दीक्षा दी गई. नर्मदा बताती हैं कि गोवर्धन को पहले महीने 800 रुपये दिए गए और उसके बाद छह महीने तक हर महीने 2000 रुपये दिए जाते रहे.

गोवर्धन जैसे लोगों के किस्सों ने चर्च के प्रसार में मदद की है. आज कंधमाल में करीब डेढ़ हजार चर्च हैं और उनके अनुयायियों की संख्या दो लाख तक पहुंच गई है.

लक्ष्मणानंद सरस्वती जैसे व्यक्ति के लिए चर्च का उदय अपमान सरीखा था. अनुयाइयों की नज़र में सरस्वती परशुराम के अवतार थे. कथा मशहूर है कि परशुराम ने 21 बार धरती से क्षत्रियों का संहार किया था. सरस्वती खुद को ईसाइयों का संहार करने वाला संत मानते थे. सरस्वती अति पिछड़ी जाति से संबंध रखने वाले एक सरकारी कर्मचारी थे जिन्हें कुछ अप्रिय परिस्थितियों के चलते अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी थी. कहा जाता है कि कुछ अनियमितताओं की बात सामने आई थी. इसके बाद हत्या के मामले में एक पुलिस रिपोर्ट और आपराधिक षडयंत्र की अपुष्ट ख़बरों के अलावा उनके बारे में और ज्यादा कुछ पता नहीं चलता.

1960 के दशक में आरएसएस नेतृत्व ने सरस्वती को बुलावा भेजा. मार्क्सवादियों के उलट जो अब औद्यौगिक शहरों की ओर रुख कर रहे थे, आरएसएस अपनी योजनाओं को देश के सबसे पिछड़े इलाकों में लागू करने की शुरुआत कर रहा था. उड़ीसा के तत्कालीन आरएसएस प्रमुख भूपेंद्र कुमार बसु ने सरस्वती के लिए कंधमाल का चुनाव किया.

सरस्वती ने ईसाइयों के विरोध में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी. 1969 में उन्होंने चक्रपाड़ा में अपना आश्रम शुरू किया जिसमें इस समय 300 से 400 हिंदू बच्चे हैं जिन्हें आरएसएस के पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है. सरस्वती ने पुराने मंदिरों के पुनरोद्धार के लिए स्वयंसेवकों को तैनात कर रखा था और ईसाइयों को रोकने के लिए उन्होंने आदिवासियों के रहन-सहन पर भी काफी काम किया था.

सरस्वती ने इलाके में सत्संग की शुरुआत की और आदिवासियों के बीच लोकप्रिय शराब और गोमांस के खिलाफ अभियान चलाना शुरु किया. उनके अनुयायी मानते हैं कि सरस्वती ने आदिवासियों के बीच स्वस्थ रहन-सहन की परंपरा पुनर्स्थापित करने का काम किया. संयोगवश ठीक यही तरीका ईसाई भी अपने अनुयाइयों के बीच अपना रहे थे.

1988 में सरस्वती ने जलेसपाड़ा (जहां वो मारे गए) में अपने दूसरे आश्रम की नींव डाली जो सिर्फ लड़कियों के लिए था. ये विवाद की वजह बन गया, एक पूर्ण आवासीय युवा लड़कियों के विद्यालय में पुरुष शिक्षकों पर सवाल खड़े किए जाने लगे. इसी दौरान सरस्वती ने ईसाई बने आदिवासियों को दोबारा हिंदू बनाने और गौ-रक्षा को अपना ध्येय बना लिया.

हो सकता है कि उस दौर में मलेरिया से पीड़ित कुछ लोग जब ठीक हो गए हों तो इसे चमत्कार के रूप में प्रचारित किया गया हो. आज भी कंधमाल में हिंदू से ईसाई धर्म अपनाने वाले ज्यादातर लोग कहते हैं कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि जब उन्होंने जीसस से प्रार्थना की तो उनके परिवार का कोई सदस्य चंगा हो गया.

दिसंबर 2007 मे एक चर्च के सामने की सरकारी ज़मीन पर ईसाइयों द्वारा मेहराब खड़ा कर लेने पर सरस्वती ने अपने अनुयायियों को इसे ध्वस्त करने का आदेश दिया. ईसाइयों का कहना था कि मेहराब सिर्फ क्रिसमस के लिए बना था और उसे दो या तीन दिन बाद हटा लिया जाना था. लेकिन सरस्वती ने किसी की नहीं सुनी. उनके आदमियों द्वारा मेहराब गिराने के बाद सरस्वती इसे देखने के लिए वहां जा रहे थे. जब वे एक गांव से गुज़र रहे थे जहां ईसाई आबादी हिदुओं से कही ज्यादा थी तो भीड़ ने उनकी कार रोक कर उन्हें कार से बाहर खींच लिया. उनके ऊपर पथराव किया गया. सरस्वती के एक सहयोगी ने अपने विश्व हिंदू परिषद के मित्रों को फोन कर कहा, “बाबा को मार दिया”. उसके बाद बड़े पैमाने पर वहां दंगे शुरू हो गए.

दिसंबर के दंगों के बाद सरस्वती ने आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र को संभवत: अपना आखिरी इंटरव्यू दिया. उन्होंने कहा, “संख्या बढ़ने के बाद से ईसाई जबर्दस्ती हिंदुओं की लड़कियों को उठा ले जाते हैं और फिर इनका धर्म परिवर्तन करा कर उन्हें गौमांस खाने को मजबूर करते हैं. ईसाई इन जानवरों के मृत अवशेषों को मंदिरों पर फेंक देते हैं.” उनके मुताबिक ईसाई मिशनरी उन्हें ये कह कर दवाएं देते हैं कि ये यीशू का प्रसाद है.

अपने इंटरव्यू में ये कहते हुए कि चर्चों को विदेशों से बड़ी मात्रा में पैसा मिल रहा हैं सरस्वती ने ये मांग भी की कि देश में धर्म परिवर्तन को ग़ैर-क़ानूनी घोषित किया जाए. उन्होंने चेतावनी दी कि भारत के ईसाइयों को ये बात जल्द से जल्द समझ लेनी चाहिए कि हर साल अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी की जाने वाली हिंदू-विरोधी और मानवाधिकार संबंधी रिपोर्टे उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती. ईसाइयों को सिर्फ बहुसंख्यक हिंदुओं की भलमनसाहत से ही सुरक्षा मिल सकती है, जिनके बीच उन्हें रहना है.

उड़ीसा के आदिवासियों के युद्ध कौशल के किस्से इतिहास का हिस्सा हैं. अशोक ने कलिंग पर 261 ईसापूर्व में हमला किया था. उस वक्त किसी राजा ने तो अशोक से मुकाबला करने की हिम्मत नहीं की लेकिन इन आदिवासियों ने उन्हें नाको चने चबवा दिए. अशोक ने कलिंग की लड़ाई तो जीत ली लेकिन इस लड़ाई में 110,000 लोग खेत रहे. इसके बाद अशोक ने फिर कोई लड़ाई नहीं लड़ी और बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया.

इसी विरासत का प्रतिनिधित्व करता है 19 साल का रूपेश कन्हार. 28 अगस्त को गोपिंगिया गांव के जंगल में हुई आरएसएस की बैठक–जिसमें ईसाइयों पर हमले की रूपरेखा तैयार की गई–में रूपेश अपने दोस्तों के साथ मौजूद था. जंगलों में रहने वाले इस तेज़तर्रार कंध आदिवासी ने 2006 में सरस्वती के चक्रपाड़ा आश्रम से अपनी पढ़ाई पूरी की थी. इस बैठक में रूपेश के साथ उसके दोस्त भीमराज के अलावा करीब 15 औऱ भी लोग शामिल थे मीटिंग में फैसला किया गया कि वो ईसाइयों को मारेंगे नहीं बल्कि उन्हें इतना डरा देंगे कि वो कंधमाल छोड़ने को मजबूर हो जाए.

बिना अटके आरएसएस की प्रार्थना सुनाने वाले रूपेश ने किसी की हत्या तो नहीं की पर कइयों के घर ज़रूर आग के हवाले कर दिए. कुछ ही घंटों में वो और उसके साथी फिर से हमले के लिए तैयार होंगे. तब तक उनमें से कुछ नशे में धुत हो चुके होंगे. 200 लोगों का समूह करीब 9 बजे रात में इकट्ठा होगा. उनके पास कुल्हाड़ी, तलवार, माचिस और मशालें होंगी. वो अपनी कलाइयों पर लाल धागा बाधेंगे, और एक दूसरे के माथे पर तिलक लगाएंगे. सिर पर बंधी पट्टी के अलग-अलग रंग उनके संकेत होते हैं. अगर लड़ाई एससी बनाम एसटी की होती है तो सिर की पट्टी लाल होती है. आज की रात लड़ाई हिंदू बनाम ईसाई की है इसलिए सिर पर केसरिया पट्टी होगी.

मगर 35 वर्षीय विजय प्रधान जैसे लोग भी हैं जो इस समय रैकिया में छिपे हुए हैं. प्रधान बताते हैं कि वो आठ सालों तक आरएसएस के कार्यकर्ता रहे. उन्होंने सरस्वती के साथ काम किया और कई धर्म परिवर्तन अभियानों का संचालन भी किया. “फिर एक दिन एक पादरी ने मुझे जीसस के बारे में बताया. मुझे लुभाने के उसके साहस पर मैं हैरत में था लेकिन इससे मैं उत्सुक हो उठा.” प्रधान कहते हैं.

प्रधान इसके बाद काफी भ्रमित हो गए थे. “26 जनवरी 1994 को मैंने सृष्टि के रचयिता को चुनौती दी…मैंने धमकी दी कि अगर तुमने मुझे दर्शन नहीं दिया तो मैं नास्तिक बन जाऊंगा. मैं रातभर सो नहीं सका. 4.30 बजे सुबह जब मैं योग के लिए तैयारी कर रहा था तो मुझे एक मानवीय आकृति दिखाई दी. उसके ईर्द-गिर्द खूब प्रकाश हो रहा था. एक आवाज़ आई—मैं ही हूं जिसकी तुम्हें तलाश है,” प्रधान ने बताया.

प्रधान के मुताबिक इसके बाद से उनके सोचने की दिशा ही बदल गई. उन्होंने धर्म का प्रचार करना और चर्च जाना शुरू कर दिया. “आरएसएस के लोग मेरे पास आए और पूछा तुमने धर्म क्यों परिवर्तित कर लिया. उन्होंने मुझसे पूछा इसके बदले में कितना पैसा तुझे मिला. मैं भी लोगों से यही सवाल पूछा करता था. पर मुझे कोई पैसा नहीं मिला था. आरएसएस वाले मुझे खोज रहे है. जब तक यहां फसाद है मुझे छिपना पड़ेगा,” वो कहते हैं.

इस सब के दौरान प्रशासन की अनुपस्थिति साफ महसूस की जा सकती है. उड़ीसा का क़ानून धर्मांतरण की इजाज़त देता है. लेकिन लोगों को इसके लिए डीएम की अनुमति लेना आवश्यक है. डीएम इसकी पड़ताल करते हैं और यदि उन्हें विश्वास हो जाता है कि इसमें किसी तरह का लेन-देन नहीं हुआ है तो फिर ये अनुमति मिल जाती है. मगर आधिकारिक रूप से कंधमाल में 1961 के बाद से महज़ दो धर्मांतरण ही प्रकाश में आए हैं.

राज्य की अनुपस्थिति कंधमाल में आम जीवन का हिस्सा बन चुकी है. लोगों को ये तो पता होता है कि इलाके का आरएसएस प्रमुख या मुख्य पादरी कौन है. लेकिन उन्हें गांव के सरपंच या पुलिस प्रमुख के बारे में कुछ भी नहीं पता.

21 सितंबर की रात को रैकिया राहत शिविर में पुलिस महानिरीक्षक ने एक शांति बैठक बुलाई. वहां उनसे मिलने वाले लोगों में एक युवा ईसाइयों का समूह भी था.जिसके मुताबिक रैकिया के दो गांवो- गुनधनी और गमांडी- के रास्ते पर चलने की ज़रूरत है क्योंकि मुख्यतः ईसाई आबादी वाले होने के बावजूद इन्हें अब तक छुआ भी नहीं गया है. कारण, यहां के निवासियों ने मुकाबला करने के लिए देसी बम सहित कई तरह की तैयारियां कर रखी हैं. उन्होंने प्रशासन से खुद को हथियार दिए जाने की भी मांग की. साफ है कि इलाके में परिस्थितियां कुछ ऐसी बन चुकी हैं कि एक धड़े को प्रशासन का डर नहीं है तो दूसरे को उस पर विश्वास.

मगर प्रशासन है ही कहां?

एक हवेली, एक कहानी

पुरानी हवेलियां बूढ़ी औरतों सी होती हैं. इठलाते बचपन की तरह किसी ने उन्हें प्यार से उठाया. जवान अल्हड़ नक्काशियां की. उनकी चुनरी पर धानी, नीले, लाल और चटख रंग भरे. फिर इन नशीली हवेलियों ने बुढ़ापे का वो दौर भी देखा जब उनकी ड्योढ़ी की रौनक धीरे-धीरे कर खत्म होने लगी. कभी-कभी राजस्थान के राजपूताना किले, हवेलियां, शाही छतरियां और बावड़ियां, इतिहास की गाढ़ी मोटी जिल्द में लिपटी किसी किताब की कहानियों सरीखे भी लगते हैं, जिन्हें आज भी पढ़ा-सुना जा सकता है. और इन कहानियों के पात्र जैसे अब भी वहीं मौजूद हों…दीवारों पर बने भित्ति चित्रों की शक्ल में. दीवारों पर उकरे रंग. छतरियों पर छितरे रंग. छज्जों में छिपते रंग. आलों में खोए रंग. राजा रंग. दासी रंग. सैनिक रंग. सेठिया रंग. अगर मुझे कोई दोबारा व्याकरण गढ़ने की इज़ाजत दे दे तो इन हवेलियों में बैठकर मैं रंगों को यही नाम दे सकूंगा.

राजस्थान की जमीन पर कई जगह प्रकृति ने उजास रंग नहीं भरे तो यहां की आवारगी ने सतरंगी रंगों में सराबोर ‘सवा सेर सूत’ हर सिर पर बांध लिया. रंगों की इसी चाह ने रेतीले मटीले राजस्थान के हर घर को हवेली बना दिया और हर दीवार को आर्ट गैलेरी.

राजस्थान का शेखावाटी ‘ओपन आर्ट गैलेरी’ कहा जाता है. चुरू, झुंझनू और सीकर जिलों को मिलाकर एक शब्द में ‘शेखावाटी’ कहने का रिवाज है. इसी शेखावाटी में झुंझनू जिले का नवलगढ़ हर सुबह सूरज से रंगों की तश्तरी लेकर हर घर को हवेली बना देता है. नवलगढ़ में तकरीबन 700 छोटी-बड़ी हवेलियां हैं. हर हवेली की देहरी और उसके पार का चौबारा बातें करता है. अगर सिर्फ भव्य और बड़ी हवेलियों की बात करें तो भी 200 का आंकड़ा तो पार हो ही जाएगा. नवलगढ़ की हवेलियों के बारे में सुना था. पर जब देखने पहुंच गया तो लगा कि सावन का अंधा हो गया हूं. हर तरफ सिर्फ रंग ही रंग दिख रहे हैं. दीवारों पर उकरे रंग. छतरियों पर छितरे रंग. छज्जों में छिपते रंग. आलों में खोए रंग. राजा रंग. दासी रंग. सैनिक रंग. सेठिया रंग. अगर मुझे कोई दोबारा व्याकरण गढ़ने की इज़ाजत दे दे तो इन हवेलियों में बैठकर मैं रंगों को यही नाम दे सकूंगा. जितने रंग उतनी हवेलियां. जितनी हवेलियां उतनी कलाकारी. और जितनी कलाकारी उतनी कहानियां. ‘जित देखूं, तित तूं’ हर गली में हवेली. हर घर हवेली. मोरारका की हवेली… पोद्दार की हवेली… सिंघानिया की हवेली… गोयनका की हवेली… जबलपुर वालों की हवेली… जोधपुर वालों की हवेली… कलकत्ता वालों की हवेली… सेठ जी की हवेली… सूबेदार की हवेली… राजा की हवेली… हर मौसम की हवेली… जैसे पुराना रोम जूलियस सीजर जैसे उपन्यासों से झटके से बाहर उतर पड़ा है और हर काला हर्फ एक हवेली बन गया है.

नवलगढ़ के इन रंगमहलों को देखकर मन में सवाल  हर घर हवेली. मोरारका की हवेली… पोद्दार की हवेली… सिंघानिया की हवेली… गोयनका की हवेली… जबलपुर वालों की हवेली… जोधपुर वालों की हवेली… कलकत्ता वालों की हवेली… सेठ जी की हवेली… सूबेदार की हवेली… राजा की हवेली… हर मौसम की हवेली…उमड़ने-घुमड़ने लगे- किसने बनवाईं इतनी हवेलियां? एक साथ… एक जैसी… और यहीं क्यों… इतनी सारी…

वहां के लोगों से पूछा- जितने मुंह उतनी कहानियां… हर कहानी की अलग वजहें… और हर वजह के अपने-अपने सवाल…मन नहीं माना तो किताबें कुरेदनी शुरू कीं. किसी ने बताया कि यहां से सिल्क रूट गुजरता था. दो सदी पहले तक यहां 36 करोड़पतियों के घराने थे. एक हवेली बनी. दूसरी बनी. तीसरी… चौथी और फिर पूरा शहर बस गया. खाटी हवेलियों का शहर. शेखावाटी के लिखित-अलिखित इतिहास के जानकारों के मुताबिक पन्द्रहवीं शताब्दी(1443) से अठारहवीं शताब्दी के मध्य यानी 1750 तक शेखावाटी इलाके में शेखावत राजपूतों का आधिपत्य था. तब इनका साम्राज्य सीकरवाटी और झुंझनूवाटी तक था. शेखावत राजपूतों के आधिपत्य वाला इलाका शेखावाटी कहलाया. लेकिन भाषा-बोली, रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा और सामाजिक-सांस्कृतिक एकरूपता होने के नाते चुरू जिला भी शेखावटी का हिस्सा माना जाने लगा. इतिहासकार सुरजन सिंह शेखावत ने अपनी किताब ‘नवलगढ़ का संक्षिप्त इतिहास’ की भूमिका में लिखा है कि राजपूत राव शेखा ने 1433 से 1488 तक यहां शासन किया. इसी किताब में एक जगह लिखा है कि उदयपुरवाटी(शेखावाटी) के शासक ठाकुर टोडरमल ने अपने किसी एक पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के स्थान पर ‘भाई बंट प्रथा’ (सभी बेटों में राज्य का बंटवारा) लागू कर दी. नतीजतन एक-एक गांव तक चार-पांच शेखावतों में बंट गया. इस प्रथा ने शेखावतों को राजा से भौमिया(एक भूमि का मालिक) बना दिया. ऐसा ही कुछ झुंझनू के उस वक्त के शासक ठाकुर शार्दूल सिंह ने किया और झुंझनू उनके पांच पुत्रों- जोरावर सिंह, किशन सिंह, अखैसिंह, नवल सिंह और केशर सिंह की भूमियों में बंट गया. नवल सिंह का नवलगढ़ उसी भाई बंट प्रथा का ही एक नमूना है. केन्द्रीय सत्ता के अभाव ने सेठ-साहूकारों और उद्योगपतियों को खूब फलने-फूलने का मौका दिया. हवेलियों के रंग पहले संपन्नता के प्रतीक बने, और फिर परंपरा बन गये. खेती करते हुए किसान से लेकर युद्ध करते सेनानी तक. रामायण की कथाओं से लेकर महाभारत के विनाश तक. देवी-देवताओं से लेकर ऋषि-मुनियों तक… पीर बाबा के इलाज से लेकर रेलगाड़ी तक… हवेली की हर चौखट, हर आला रंगा-पुता. इंसान की कल्पना जितनी उड़ान भर सकती है, इन हवेली की दीवारों पर उड़ी. जो कहानी चितेरे के दिमाग पर असर कर गई वो दीवार पर आ गई. जो बात दिल में दबी रह गई, उससे भी हवेली की दीवारों को रंगीन कर दिया गया…

आज़ादी के बाद हवेलियों के संपन्न मालिकों ने देश-विदेश के बड़े-बड़े शहरों का रुख किया और जितनी तेजी से एक हवेली को देखकर दूसरी बनी थी उसी तरह एक पर ताला जड़ा तो दूसरी हवेलियों के दरवाजे भी धड़ाधड़ बंद होने लगे. शेखावाटी की हवेलियों के रंग फीके पड़ने लगे हैं. अचानक जैसे इठलाती हवेलियां बूढ़ी हो गई हैं. इन बूढ़ी मांओं को सहारे की ज़रूरत है. जो इन्हें देखे… इनकी देखभाल करे.

देवेश वशिष्ठ खबरी

कटघरे में सुशासन सरकार

इस वर्ष बिहार में आयी प्रलयंकारी बाढ ने लाखों लोगों को अपनी बसी बसायी दुनिया को उजडता छोड पलायन करने पर मजबूर कर दिया है. हजारों लोग कोसी की धार में डूब गये मगर सरकारी आंकडे 100 से भी कम लोगों के ही मरने की पुष्टि करते हैं. अनगिनत लोग भूख और जल संक्रमण की वजह से मौत के कगार पर हैं लेकिन राज्य सरकार का आपदा प्रबंधन विभाग, आंकड़ों में आपदा प्रबंधन करने में लगा हुआ है.

भारत-नेपाल सीमा पर स्थित वीरपुर में कोसी तटबंध के सुरक्षार्थ पदस्थापित बिहार सरकार के अधिकारी और मुख्य अभियंता ई सत्यनारायण ने खुलासा किया है कि कुशहा स्थित तटबंध में कटाव के बारे में उन्होंने राज्य सरकार के महत्वपूर्ण अधिकारियों और काठमांडु में कार्यरत लायजनिंग पदाधिकारी अरूण कुमार सिंह को दिनांक 6 अगस्त 2008 और दिनांक 9 अगस्त 2008 को पत्र संख्या 2942 द्वारा सूचित किया था. अपने पत्र में श्री सत्यनारायण ने इस बात का जिक्र किया था कि कोसी में बढ रहे जल आवेग के कारण कटाव जारी हो गया है. उन्होंने पत्र में ये भी लिखा था कि नेपाली मजदूरों द्वारा मनमाने ढंग से मजदूरी मांगे जाने एवं उनके द्वारा भारतीय मजदूरों एवं अभियंताओं को भगाये जाने के चलते तटबंध पर सुरक्षात्मक कार्य प्रभावित हो रहे हैं. उन्होंने यह भी गुहार लगाई थी कि नेपाल सरकार द्वारा आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध करवाये जाने का इंतज़ाम किया जाए ताकि तटबंध पर सुरक्षा कार्य संपन्न कराया जा सके. इस त्राहिमाम संदेश को भेजे जाने के बाद भी सरकारी तंत्र कुंभकर्णी निद्रा में सोता रहा.

संदेश पर अमल करना तो दूर राज्य सरकार ने उल्टे इस अनुभवी अभियंता को ही बिना किसी कारण 17 अगस्त 2008 को स्थानांतरित कर दिया. यानी कि ऐन उस वक्त जब वे इस समस्या से जुझने का प्रयास कर रहे थे रहे थे.

इसके बाद दिनांक 14 एवं 15 अगस्त 2008 को भी श्री सत्यनारायण ने पुन: ये संदेश टेलीग्राम के ज़रिए मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार, बाढ पर्यवेक्षक(पटना), बाढ पर्यवेक्षक(वीरपुर), सरहसा कमिश्नर, जिला समाहर्ता, सुपौल, अधीक्षण अभियंता(बाढ नियंत्रण एवं निगरानी), अधीक्षण अभियंता(वीरपुर), कार्यपालक अभियंता(पूर्वी तटबंध, वीरपुर), समन्वयक(बाढ कार्य, वीरपुर) और नेपाल के विराटनगर में पदस्थापित लायजनिंग आफिसर को भेजा. परंतु इतने महत्वपूर्ण और अति संवेदनशील मुद्दे पर इनमें से किसी ने भी ध्यान नहीं किया. अपने एसओएस संदेश में उन्होंने लिखा ‘कोसी में तीव्र गति से बढ रहे जल आवेग के कारण, 12.10 और 12.90 किमी के मध्य तटबंध में बुरी तरह कटाव जारी है. जो बाढ नियंत्रण कार्य किये जा रहे हैं वे अप्रभावी हैं और ऐसी आशंका है कि यदि जल्द ही कुछ न किया गया तो नदी तटबंध को तोड देगी. अत: आवश्यक कदम उठाये जायें, अन्यथा कोसी के इस भयंकर रूप को देखते हुए महाप्रलय की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.’

श्री सत्यनारायण द्वारा भेजे संदेश पर अमल करना तो दूर राज्य सरकार ने उल्टे इस अनुभवी अभियंता को ही बिना किसी कारण 17 अगस्त 2008 को स्थानांतरित कर दिया. यानी कि ऐन उस वक्त जब वे इस समस्या से जुझने का प्रयास कर रहे थे रहे थे. ठीक अगले ही दिन श्री सत्यनारायण ने जिन बिंदुओं पर कटाव की बात कही थी, वहां 400 मीटर लंबा तटबंध टूट गया. यही नहीं, ठीक 18 अगस्त 2008 को ही वीरपुर में पदस्थापित एसडीओ की सेवानिवृति के कारण घटनास्थल के निरीक्षण की खानापूर्ति महज़ एक कनिष्ठ अभियंता द्वारा पूरी कर दी गई.

अपनी गलती मानने के बजाय जल संसाधन विभाग के मंत्री श्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव का कहना है कि उन्हें इस संबंध में कोई पत्र ही प्राप्त नहीं हुआ. उन्हें इस संबंध में जानकारी दिनांक 17 अगस्त को हुई और उसी दिन स्थिति की भयावहता को देखते हुए दिल्ली गये और वहां विदेश मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी से मिलकर नेपाल सरकार के सहयोग के लिए ज़रूरी कदम उठाए जाने की मांग की. मगर वास्तविकता यह है कि तटबंद में कटाव कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि उसे लेकर पहले से ही आशंका जताई जा रही थी. इस आशंका के पीछे सबसे मुख्य कारण था वहां का रखरखाव. इस संबंध में जीएफसीसी और कोशी उच्च स्तरीय कमेटी द्वारा की गई अनुशंसा पर 1 लाख 20 हजार रूपये की राशि जारी भी की गयी, लेकिन कोई भी कार्य नहीं कराया गया. न तो बोल्डर(पानी के बडे-बडे पत्थर), लोहे के क्रेट और न ही तटबंध के किनारों पर बालू से भरे बोरे ही डाले गये. अब ऐसे में यदि तटबंध टूटा तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है, यह ई सत्यनाराण के इस खुलासे से स्पष्ट हो जाता है.

वर्ष 2005 में पारित आपदा प्रबंधन अधिनियम में यह स्पष्ट वर्णित है कि बाढ जैसी आपदाओं के लिए तैयारी पहले ही की जानी चाहिए. मसलन ईधन का संग्रह, खाद्यान्न का भंडारण, आवश्यक दवाइयों का संग्रहण और बाढ से लोगों को निकालने के लिए पर्याप्त संख्या में नावों का इंतजाम. मगर इनमें से एक भी कार्य बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने समय पर नहीं किए. बहुतेरे मल्लाह जो बाढ प्रभावित इलाके में रहते हैं तथा जिन्हें भौगोलिक स्थिति का पूर्ण ज्ञान है, उनसे भी समय रहते कोई संपर्क नहीं किया गया. जब बाढ आ गयी तो प्रशासन ने पहले तो उन्हें ढूंढ़ने में वक्त ज़ाया किया और फिर उन्हें जबरन पकड कर, मुफ्त में ही राहत कार्यों में लगाया जा रहा है. सरकार ने राहत कार्य में दिये जाने वाले सत्तू और चिउडा की खरीद भी पहले से नहीं कर रखी थी फलत: खुले बाजार में मिलने वाले हर प्रकार के खाद्यान्न की खरीद की जा रही है, जो कि मंहगा तो है ही साथ ही इसके खराब होने की शिकायतें भी आ रही हैं. हद तो यह है कि जो हेलीकॉप्टर बाढ राहत कार्य में लगे हैं, उन्हें ईंधन के लिए या तो पटना जाना पडता है या फिर कोलकाता. इस प्रकार बाढ राहत कार्य से ज्यादा ईंधन तो ईंधन भरवाने की यात्रा में ही खर्च हो जाता है.

नवल किशोर कुमार

पटना के रहने वाले नवल किशोर, तहलका के पाठक हैं और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं.