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ममता को अमर सिंह ने कहा

औघट घाट

घाटे पानी सब भरे औघट भरे न कोय।

औघट घाट कबीर का भरे सो निर्मल होय।।

साधो, कल मनसुखा एक अखबार लेकर आया और एक फोटू दिखाकर कहने लगा देख लो अब यह होने लगा है। ममता बनर्जी की ख़ैर नहीं है। उनकी बगल में आकर अमर सिंह बैठ गए हैं। फिर फोटू में दिखाया कि अमर सिंह कौन हैं। हमें फिर भी समझ नहीं आया तो कहा कि ये जो अमर सिंह बड़े उस्ताद हैं। इनने अमेरिका का परमाणु करार समाजवादी पार्टी के अकेले नेता मुलायम सिंह यादव को बिकवा दिया। और फिर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी से बात करके उनको लोकसभा का बहुमत खरिदवा दिया। जहां जाते हैं सौदेबाजी और खरीदी-बिक्री करवाते हैं। अपनी दलाली जेब में रखते हैं। और अगले सौदे के लिए निकल जाते हैं। जहं जहं पांव पड़े संतन के वहं वहं आरमपार।

हमारी नासमझी पर ध्यान मत देना साधो। हमारी समझ में फिर भी नहीं आया कि इससे बेचारी ममता की ख़ैर क्यों नहीं है। वह तो बावरी कभी भी ख़ैर की तलाश में नहीं रहती। अमन चैन के लिए जन्मी ही नहीं है वह महामाया। उसे तो हमेशा एक लड़ाई, एक आंदोलन की जरूरत रहती है। उसके बिना वह जी ही नहीं सकती। हमारा सार्वजनिक जीवन ऐसी ही आंदोलन संतोषी महिलाओं के होने के कारण गुलज़ार रहता है। नहीं तो मनमोहन सिंह सब को ग्रोथ की घुट्टी पिला कर काम में लगा देते। भूखा-नंगा भी तब मुकेश अंबानी होने के सपने में अफीम खाए पड़ा रहता और ग्रोथ रेट बारह से पंद्रह प्रतिशत हो जाती। ग्रोथ रेट भूखे नंगे को मुकेश अंबानी होने का सपना दिखा कर अफीम खाने में लगाने से बढ़ती है। ममता बनर्जी हों कि मेधा पाटकरये महादेवियां भूखों-नंगों को ग्रोथ की अफीम खाने नहीं देती। उन्हें लगातार जगाए रखकर लड़ाए रहती है। ये लड़ाई और आंदोलन से देश बनाने निकली हैं। इनका कोई क्या बिगाड़ लेगा?

मनसुखा ने तब समझाया साधो कि ये अमर सिंह मामूली प्राणी नहीं है। ये ममता को कभी भी समझा सकते हैं कि बुद्धदेव और रतन टाटा से लड़ने में क्या रखा है। बुद्धदेव, युद्धदेव क्या संग्राम सिंह भी हों जाएं तो प्रकाश करात उनको प्रधानमंत्री नहीं होने देंगे। उनकी माकपा ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री नहीं होने दिया जबकि विश्वनाथ प्रताप सिंह फूलों की थाली में दीया जलाए तिलक करके आरती उतारने को खड़े थे। बुद्धदेव रहेंगे तो भट्टाचार्जी ही। और रतन टाटा भले ही एक लाख की चमत्कारी नैनो बना लें वे कभी अनिल या मुकेश अंबानी को अमीरी में मात नहीं दे सकते। सिंगूर की 400 एकड़ ज़मीन के लिए रतन टाटा और बुद्धदेव भट्टाचार्जी से क्या लड़ना। सिंगूर के गरीब किसानों को गंगा-जमना के दोआब की आठ सौ एकड़ ज़मीन हम मुलायम सिंह से दिलवा देंगे।

छोड़ो ये लड़ाई और आओ उत्तर प्रदेश में। वहां मायावती गरीब किसानों पर जुल्म ढा रही हैं। उनकी उपजाऊ ज़मीन लेकर बिल्डरों और उद्योगपतियों को दे रही है। चुटकी भर मुआवजा देकर पेटी-पेटी भर के नोट ले रही हैं। खेती और किसानों की असली लड़ाई तो उत्तर प्रदेश में मायावती से है। मायावती प्रधानमंत्री हो के रहेंगी। खुद प्रकाश करात उनका राजतिलक करेंगे। तब खेती किसानी का क्या होगा। देश बिल्डरों को बिक जाएगा और बिल्डरों का पैसा नोट गिनने की मशीनों से हो कर स्विस बैंको में जमा होगा। दलित की बेटी के प्रधानमंत्री होते ही भारत धन्य हो जाएगा। न खेती की जरूरत रहेगी न उद्योग की। न लड़ाई की न आंदोलन की। उस देश में ममता दी आप कैसे जिएंगी।

इसलिए ममता दी, अमर सिंह कहेंगे सिंगूर के हर किसान को एक डीलक्स नैनो दिलवाओ। उमर भर पेट्रोल की सप्लाई मुकेश अंबानी से करवाओ। बुद्धदेव को नंदीग्राम से चुनाव जितवाओ। और आप खुद आ कर घोड़ी बछेड़ा में किसानों के लिए मायावती से संग्राम करो। ममता भर्सेज़ मायावती। मुलायम नहीं हुए तो अमर सिंह प्रधानमंत्री होंगे। साधो तुम देखते रहना।

प्रभाष जोशी

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गुरूजी की वापसी

चौबीस अगस्त की दोपहर, अपने घर के अहाते में लगे आम के पेड़ की छांव में बैठे झारखंड के सबसे चर्चित मगर उतने ही विवादित नेता शिबू सोरेन कहते हैं, अगर मैं मुख्यमंत्री नहीं बना तो किसान बन जाऊंगा क्योंकि वैसे तो कोई मुझे सफाई का काम भी नहीं देने वाला. अगले दिन 42 विधायकों की सूची के साथ उन्होंने नई सरकार के गठन का अपना दावा राज्यपाल सिब्ते रज़ी के सामने पेश कर दिया.

64 वर्षीय शिबू सोरेन ने करीब एक सप्ताह तक चलने वाले एक तरह के रक्तहीन तख्तापलट में मधु कोड़ा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन कर वर्तमान विधानसभा की चौथी सरकार का गठन किया और 29 अगस्त को आठ विधायकों से अपना बहुमत भी सिद्ध कर दिया.

कोड़ा आंकड़ों के वैसे ही खेल में मात खा गए जिस तरह के खेल में उन्होंने सितंबर 2006 में अर्जुन मुंडा की कुर्सी छीनी थी. झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में 33 राजग(भाजपा 29, जद-एकी 4), 42 संप्रग(झामुमो 17, कांग्रस 9 राजद7 और निर्दलीय 9), तीन वाम दलों और दो अन्य छोटे दलों के हैं.

ये निराशा तब और भी गहरी हो गई जब 22 जुलाई के विश्वासमत के दौरान केंद्र की संप्रग सरकार के समर्थन के बाद भी उन्हें मंत्रिपद मिलता नहीं दिख रहा था. ऐसे में उनकी बिहार का मुख्यमंत्री बनने की इच्छा एक बार फिर से बलवती हो गई.

25 अगस्त 2007 को सोरेन जब अपने एक पूर्व सहायक शशिनाथ झा की हत्या के आरोप से बरी होकर दुमका जेल से बाहर आये थे तो कोड़ा ने उनके वास्ते मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करने का प्रस्ताव रखा था. एक साल बाद गुरूजी(शिबू सोरेन) एक दूसरे ही कोड़ा से रूबरू थे जो उनके रास्ते में तरह-तरह की रुकावटें खड़ी कर रहे थे. नाम भर के बहुमत से सरकार चला रहे कोड़ा ने झामुमो द्वारा 17 अगस्त को समर्थन वापस लिए जाने के छह दिन बाद कहीं जाकर अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपा. आखिरी क्षण तक कोड़ा और उनके दूसरे निर्दलीय मंत्री सोरेन को समर्थन देने से इनकार करते रहे जिससे क्षुब्ध और निराश होकर सोरेन ने किसान बनने की बात कही थी.

सोरेन को दो बार केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था – पहले जुलाई 2004 में चिरडीह हत्याकांड में गिरफ्तारी वारंट जारी किए जाने पर और फिर नवंबर 2006 में महतो के कत्ल का दोषी ठहराए जाने पर. उसके बाद से ही वे मंत्रिपद के लिए जुगत भिड़ा रहे थे मगर कुछ कर नहीं पा रहे थे.

ये निराशा तब और भी गहरी हो गई जब 22 जुलाई के विश्वासमत के दौरान केंद्र की संप्रग सरकार के समर्थन के बाद भी उन्हें मंत्रिपद मिलता नहीं दिख रहा था. ऐसे में उनकी बिहार का मुख्यमंत्री बनने की इच्छा एक बार फिर से बलवती हो गई.

पिछली बार से उलट परिस्थितियां इस बार उनके साथ थीं क्योंकि वाम दलों द्वारा किनारा कर लिए जाने के बाद वे केंद्र सरकार के लिए एक तरह से अपरिहार्य बन चुके थे और इसीलिए कभी सोरेन के मुखर विरोधी रहे राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के तरह-तरह के हथकंडों के बाद भी कोई उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से नहीं रोक सका.

हालांकि नरसिंहाराव सरकार के दौरान हुए झामुमो रिश्वत कांड के बाद से ही सोरेन की छवि पर तरह-तरह के दाग लगते रहे हैं मगर ये भी सच है कि वे झारखंड की जनता में कोड़ा से ज्यादा विश्वास का संचार करते हैं जिनपर उनके पिछले 23 महीनों के कार्यकाल में भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के आरोप लगते रहे हैं.

झारखंड के लिए गुरूजी का योगदान और ज़मींदारों और आदिवासियों का शोषण करने वालों के खिलाफ उनके संघर्ष, किंवंदती बन चुके हैं. वो झारखंड के लिए काफी कुछ कर सकते हैं लेकिन वो एक बेहद अनिश्चित गठबंधंन सरकार चला रहे हैं.रांची विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्री रमेश सरन कहते हैं.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक बड़ा सवाल ये है कि साल 2005 में नौ दिनों की सरकार के मुखिया रहने के बाद नौ दिनों का अजूबा कहाने वाले सोरेन क्या वर्तमान विधायिका के बचे हुए 18 महीनों तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं? अस्थिरता हर और पसरी हुई है. चाहे दावा पेश करने से पहले बुलाई गई संप्रग की बैठक हो या फिर राज्यपाल को समर्थन के पत्र सौंपने का समय या फिर शपथ ग्रहण समारोह, किसी में भी कांग्रेस का एक भी विधायक शामिल नहीं था. और फिर कोड़ा ने भी तो सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

आनंद एसटी दास

राजनीतिक पारी की फिल्मी शुरुआत

जय चिरंजीवा, जय जय चिरंजीवा…26 अगस्त को तिरुपति के अविलला टैंक ग्राउंड में जमा छह लाख लोगों के हुजूम से इन नारों की गूंज सुनाई दे रही थी. मौका था तेलुगू फिल्मों के सुपरस्टार चिरंजीवी की राजनीतिक पार्टी के ऐलान का. जैसे ही उन्होंने प्रजाराज्यम की स्थापना की घोषणा की, समूचा वातावरण लोगों की हर्षध्वनि से गूंज उठा.

नई पार्टी की शुरुआत के लिए विशेष तौर पर 26 अगस्त को चुना गया था जो कि मदर टेरेसा का जन्मदिन भी है. बड़ी संख्या में समर्थकों को पहुंचाने के लिए 1500 बसें और 18 विशेष रेलगाड़ियां चलाई गई थीं. सभास्थल पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के हजारों जवान और स्वयंसेवक भी मौजूद थे. फिर भी इंतजामात पूरे नहीं पड़ रहे थे. धक्कामुक्की कर रही भीड़ पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ गया जिसमें 35 लोग जख्मी हो गए. सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और विकलांगों को झेलनी पड़ी जिन्हें खास तौर पर इस मौके के लिए लाया गया था. आयोजकों के बार-बार अनुरोध के बाद भी बेलगाम समर्थकों की पुलिस के साथ झड़पें हुईं और जमकर कुर्सियां और चप्पल चलीं.

दो घंटे लंबे भाषण में चिरंजीवी ने ज्यादातर दूसरे नेताओं वाली बातें ही दोहराईं. उन्होंने वादा किया कि वो लगातार पिछड़े समुदायों, मजदूरों, किसानों और महिलाओं के कल्याण के लिए काम करेंगे. उन्होंने खेती पर मंडरा रहे संकट की भी बात की जिसकी वजह से राज्य के किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. उन्होंने ये भी कहा कि नक्सलवाद को एक सामाजिक मुद्दे के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि इस समस्या की जड़ बहुत गहरी है जिसकी लगातार उपेक्षा हुई है. चिरंजीवी के भाषण का सबसे अहम पक्ष तेलंगाना रहा. उन्होंने संकेत दिए कि उनकी पार्टी वहां के लोगों की भावनाओं का सम्मान करेगी. चिरंजीवी ने कहा कि अगर तेलंगानावासियों को लगता है कि भाइयों के बीच बंटवारा अपरिहार्य है तो उनके फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए.

चिरंजीवी समाज में मौजूद सांप्रदायिक दरार के बारे में काफी चिंतित हैं इसलिए ये झंडा तीन मुख्य धर्मों को साथ लाने की उनकी कोशिश है क्योंकि सफेद रंग ईसाई, हरा, इस्लाम और लाल, हिंदू धर्म के साथ जुड़ा है. हम किसी समुदाय विशेष की पार्टी नहीं बनेंगे.

चिरंजीवी ने खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जो लोगों की समस्याओं से अपरिचित नहीं है. उन्होंने अपने बचपन के दिनों की मुश्किलों का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पिता पुलिस कांस्टेबल थे और कई बार उन्हें पतला दलिया खाकर गुजारा करना पड़ता था. उनका कहना था, एक्टर बनने के बाद भी मैं आपकी समस्याओं के संपर्क में रहा हूं. मैंने एक मोची से लेकर आईएएस अधिकारी तक के किरदार निभाये हैं. साफ था कि वो अभिनेता और नेता चिरंजीवी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे थे.

संतुलन साधने की ये कोशिश और भी कई रूपों में दिखी. इनमें से एक प्रजाराज्यम का झंडा भी था जिसमें हरी और सफेद पट्टी पर चमकता सूरज दर्शाया गया है. चिरंजीवी का कहना था कि ये सूरज सरीखी ऊर्जा के जरिये सामाजिक क्रांति लाने की भावना को इंगित करता है. सफेद रंग शासन में पारदर्शिता का प्रतीक है और हरा किसानों की खुशहाली का. इस प्रतीकवाद को आगे बढ़ाते हुए उनके एक करीबी सहयोगी का कहना था, चिरंजीवी समाज में मौजूद सांप्रदायिक दरार के बारे में काफी चिंतित हैं इसलिए ये झंडा तीन मुख्य धर्मों को साथ लाने की उनकी कोशिश है क्योंकि सफेद रंग ईसाई, हरा, इस्लाम और लाल, हिंदू धर्म के साथ जुड़ा है. हम किसी समुदाय विशेष की पार्टी नहीं बनेंगे.

मगर संतुलन साधने की तमाम कोशिशों के बावजूद ये सच्चाई अपनी जगह है कि जाति समीकरणों से आगे की राजनीति करना चिरंजीवी के लिए खासी चुनौती साबित होगा. चिरंजीवी कापू समुदाय से आते हैं जो राज्य की कुल आबादी का 25 फीसदी है. आंध्र प्रदेश के दूसरे प्रमुख समुदाय हैं कम्मा और नायडू.  ये समुदाय परंपरागत रूप से कांग्रेस का वोटबैंक रहा है इसलिए चिरंजीवी के राजनीति में उतरने से पार्टी का चिंतित होना स्वाभाविक है. वो इस चुनौती से निपटने के लिए कापू समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए आरक्षण का कार्ड खेलते हुए उसे पिछड़े समुदायों को सूची में शामिल कर सकती है. गौरतलब है कि ये समुदाय काफी समय से इसके लिए लामबंदी कर रहा है. हैदराबाद स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इकॉनॉमिक्स द्वारा समुदाय का एक सामाजिक-आर्थिक सर्वे किया जा रहा है और इस संबंध में आखिरी ऐलान दिसंबर में होने के आसार हैं.

उधर, राज्य के एक और प्रमुख दल तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) ने इस संभावना को खारिज कर दिया है कि चिरंजीवी 2009 के विधानसभा चुनावों में उसके प्रदर्शन पर बुरा असर डाल सकते हैं.

पार्टी मुखिया एन चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि राजनीति में चिरंजीवी नए खिलाड़ी हैं और उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है इसलिए टीडीपी को उनसे डरने की जरूरत नहीं है. जब उनसे कुछ नेताओं के चिरंजीवी के पाले में जाने के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि टीडीपी लगातार मजबूत हो रही है और एक दो नेता चले भी गए तो इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. गौरतलब है कि प्रजाराज्यम का औपचारिक ऐलान होने से पहले ही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और सांसद हरिरामा जोगैया, पूर्व टीडीपी सांसद सी रामचंद्रैया, वी गीता और बी नागी समेत कई नेताओं ने अपनी पार्टी छोड़ दी थी. राज्य के बड़े दलित नेता कट्टि पद्म राव भी चिरंजीवी का समर्थन कर रहे हैं.

इन सब घटनाक्रमों से तो यही प्रतीत होता है कि अगर चिरंजीवी कैंप में दरार नहीं पड़ी तो कांग्रेस और टीडीपी को निश्चित रूप से उनसे चिंतित होने की जरूरत है. जहां तक चिरंजीवी का सवाल है तो उन्हें अब फिल्मी परदे पर मिली सफलता को राजनीति के मैदान में भी दोहराना है. इसमें कोई संदेह नहीं कि वो जिस भी सीट से लड़ेंगे, जीत जाएंगे मगर असली चुनौती प्रजाराज्यम के दूसरे नेताओं के लिए भी ऐसी ही जीत सुनिश्चित करने की होगी. तभी वो आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में कोई जलवा दिखा पाएंगे.

संजना

तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं और नॉस्टेल्जिया

मेरा मन है कि मैं उसे कहानी सुनाऊँ। मैं सबसे अच्छी कहानी सोचता हूं और फिर कहीं रखकर भूल जाता हूं। उसे भी मेरे बालों के साथ कम होती याददाश्त की आदत पड़ चुकी है। वह महज़ मुस्कुराती है।

फिर उसका मन करता है कि वह मेरे दाएँ कंधे से बात करे। वह उसके कान में कुछ कहती है और दोनों हँस पड़ते हैं। उसके कंधों तक बादल हैं। मैं उसके कंधों से नीचे नहीं देख पाता।

– सुप्रिया कहती है कि रोहित की बाँहों में मछलियाँ हैं। बाँहों में मछलियाँ कैसे होती हैं? बिना पानी के मरती नहीं?

मैं मुस्कुरा देता हूं। मुस्कुराने के आखिरी क्षण में मुझे कहानी याद आ जाती है। वह कहती है कि उसे चाय पीनी है। मैं चाय बनाना सीख लेता हूं और बनाने लगता हूं। चीनी ख़त्म हो जाती है और वह पीती है तो मुझे भी ऐसा लगता है कि चीनी ख़त्म नहीं हुई थी। मैं सबसे अच्छी कहानी सोचता हूं और फिर कहीं रखकर भूल जाता हूं। उसे भी मेरे बालों के साथ कम होती याददाश्त की आदत पड़ चुकी है। वह महज़ मुस्कुराती है।

– तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं?

– मुझे तुम्हारे कंधों से नीचे देखना है।

– कहानी कब सुनाओगे?

– तुम्हें कैसे पता कि मुझे कहानी सुनानी है?

– चाय में लिखा है।

– अपनी पहली प्रेमिका की कहानी सुनाऊँ?

– नहीं, दूसरी की।

– मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाऊँ?

– नहीं, छोटी साइकिल चलाने वाली बच्ची की। और कंगूरे क्या होते हैं?

– तुम सवाल बहुत पूछती हो।

वह नाराज़ हो जाती है। उसे याद आता है कि उसे पाँच बजे से पहले बैंक में पहुँचना है। ऐसा याद आते ही बजे हुए पाँच लौटकर साढ़े चार हो जाते हैं। मुझे घड़ी पर बहुत गुस्सा आता है। मैं उसके जाते ही सबसे पहले घड़ी को तोड़ूंगा।

मैं पूछता हूं, "सुप्रिया और रोहित के बीच क्या चल रहा है?"

– मुझे नहीं पता…

मैं जानता हूं कि उसे पता है। उसे लगता है कि बैंक बन्द हो गया है। वह नहीं जाती। मैं घड़ी को पुचकारता हूँ। फिर मैं उसे एक महल की कहानी सुनाने लगता हूं। वह कहती है कि उसे क्रिकेट मैच की कहानी सुननी है। मैं कहता हूं कि मुझे फ़िल्म देखनी है। वह पूछती है, "कौनसी?"

मुझे नाम बताने में शर्म आती है। वह नाम बोलती है तो मैं हाँ भर देता हूं। मेरे गाल लाल हो गए हैं।

उसके बालों में शोर है, उसके चेहरे पर उदासी है, उसकी गर्दन पर तिल है, उसके कंधों तक बादल हैं।

– कंगूरे क्या होते हैं?

अबकी बार वह मेरे कंधों से पूछती है और उत्तर नहीं मिलता तो उनका चेहरा झिंझोड़ने लगती है।

मैं पूछता हूं – तुम्हें तैरना आता है? वह कहती है कि उसे डूबना आता है।

मैं पूछता हूं – तुम्हें तैरना आता है?

वह कहती है कि उसे डूबना आता है।

और मैं आखिर कह ही देता हूं कि मुझे घर की याद आ रही है, उस छोटे से रेतीले कस्बे की याद आ रही है। मैं फिर से जन्म लेकर उसी घर में बड़ा होना चाहता हूं। नहीं, बड़ा नहीं होना चाहता, उसी घर में बच्चा होकर रहना चाहता हूं।

मुझे इतवार की शाम की चार बजे वाली फ़िल्म भी बहुत याद आती है। मुझे लोकसभा में वाजपेयी का भाषण भी बहुत याद आता है। मुझे हिन्दी में छपने वाली सर्वोत्तम बहुत याद आती है, उसकी याद में रोने का मन भी करता है।

उसमें छपी ब्रायन लारा की जीवनी बहुत याद आती है। गर्मियों की बिना बिजली की दोपहर और काली आँधी बहुत याद आती है। वे आँधियाँ भी याद आती हैं, जो मैंने नहीं देखी लेकिन जो सुनते थे कि आदमियों को भी उड़ा कर ले जाती थी। अंग्रेज़ी की किताब की एक पोस्टमास्टर वाली कहानी बहुत याद आती है, जिसका नाम भी नहीं याद कि ढूंढ़ सकूं। मुझे गाँव के स्कूल का पहली क्लास वाला एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम भी याद नहीं और कस्बे के स्कूल का एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम याद है, लेकिन गाँव नहीं याद। वह होस्टल में रहता था। उसने ‘ड्रैकुला’ देखकर उसकी कहानी मुझे सुनाई थी। उसकी शादी भी हो गई होगी…शायद बच्चे भी। वह अब भी वही हिन्दी अख़बार पढ़ता होगा, अब भी बोलते हुए आँखें तेजी से झिपझिपाता होगा।

लड़कियों के होस्टल की छत पर रात में आने वाले भूतों की कहानियाँ भी याद आती हैं। दस दस रुपए की शर्त पर दो दिन तक खेले गए मैच याद आते हैं। शनिवार की शाम का ‘एक से बढ़कर एक’ याद आता है, सुनील शेट्टी का ‘क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो’ याद आता है। शंभूदयाल सर बहुत याद आते हैं। उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम क्रिएटिव हो और मैं उसका मतलब जाने बिना ही खुश हो गया था। एक रद्दीवाला बूढ़ा याद आता है, जो रोज़ आकर रद्दी माँगने लगता था और मना करने पर डाँटता भी था। कहीं मर खप गया होगा अब तो।

वह कंगूरे भूल गई है और मेरे लिए डिस्प्रिन ले आई है। उसने बादल उतार दिए हैं। मैंने उन्हें संभालकर रख लिया है। बादलों से पानी लेकर मेरी बाँहों में मछलियाँ तैरने लगी हैं। हमने दीवार तोड़ दी है और उस पार के गाँव में चले गए हैं।

कुछ देर बाद वह कहती है – मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाओ।

मैं कहता हूं कि छोटी साइकिल चलाने वाली लड़की की सुनाऊँगा। वह पूछती है कि तुम्हें कौनसी कहानी सबसे ज़्यादा पसन्द है?

मैं नहीं बताता।

गौरव सोलंकी

(ब्लॉगिंग की दुनिया में सक्रिय गौरव सोलंकी एक आई टी कंपनी में कार्यरत हैं.)

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फरहान की नई उड़ान

दिल चाहता है नाम की इस कहानी को फिल्मी परदे पर उतरे सात साल हो चुके हैं और ये हिंदी फिल्मों के इतिहास में मील का पत्थर बन गई है. इस फिल्म ने दर्शकों को एक नए चलन से रूबरू करवाया था. ये चलन था मल्टीप्लेक्स फिल्मों का. फरहान बताते हैं कि इस फिल्म की मूल पटकथा अंग्रेजी में लिखी गई थी और आमिर खान भी इसे अंग्रेजी में ही बनाना चाहते थे मगर व्यावसायिक पहलू को देखते हुए उन्होंने इसे हिंदी में बनाने का फैसला किया. युवाओं को फिल्म खास तौर पर पसंद आई और इसने बॉक्स ऑफिस पर सफलता का परचम लहरा दिया.

इसके बाद फरहान के निर्देशन में आई दूसरी फिल्म थी लक्ष्य. ये फिल्म कई मायनों में उनके लिए कायाकल्प जैसी थी. दिल चाहता है में अपनी जिंदगी की कहानी को परदे पर उतारने वाले फरहान को सेना की जिंदगी के बारे में कुछ भी पता नहीं था. वो कहते हैं, ‘फिल्म बनाते वक्त हालात जितने हो सकते थे, तने खराब थे. युद्ध और मौत जैसे संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाना एक असाधारण जिम्मेदारी थी. जब मैंने ये फिल्म बनाने का फैसला किया तो मुझे पता नहीं था कि चुनौतियां कितनी बड़ी हो सकती हैं. बतौर निर्देशक ये मेरा असल इम्तहान था.

कभी फरहान भी लक्ष्य के मुख्य पात्र की तरह ही हुआ करते थे जो जिंदगी का कोई मकसद ढूंढने की जद्दोजहद से जूझता रहता है. उनकी बहन और फिल्म निर्देशक जोया अख्तर उस वक्त को याद करती हैं जब फरहान को कम उपस्थिति की वजह से ग्रेजुएशन के दूसरे ही साल में कालेज से निकाल दिया गया था. इसके बाद उनके अगले कुछ साल फिल्में देखते हुए गुजरे. इसके अलावा उन्होंने शायद ही कुछ और किया हो. जोया कहती हैं, “मैंने 19 साल की उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था. मैं उससे कहा करती थी कि तुम सारा दिन लेटे-लेटे क्या करते हो और वो जवाब देता था कि मैं कुछ नहीं करना चाहता, मैं ऐसे ही खुश हूं. अब जोया महसूस करती हैं कि उस दौर ने फरहान को फिल्मों के बारे में काफी कुछ सिखाया.

देखा जाए तो निर्देशन में मिली सफलता के बाद से ही फरहान अभिनय का सपना देखने लगे थे. जोया के शब्दों में, ‘मेरा भाई हमेशा से एक कलाकार रहा है जो लोगों का ध्यान खींचने के लिए लालायित रहता था.

वक्त बदला और बाद में वही फरहान सही फैसले लेने वाले एक बेहद प्रतिभाशाली निर्देशक बन गए. हम उनसे पूछते हैं कि एक अच्छे निर्देशक में क्या खासियतें होनी चाहिए और उनका जवाब आता है कि दूरदृष्टि, सहज बुद्धि, तुरंत फैसले लेने की क्षमता और काम के लिए सही लोगों का चयन. फरहान कहते हैं, ‘मैं अपने क्रू क चयन में बहुत सावधानी बरतता हूं क्योंकि एक भी गलत आदमी आपका दम निकाल सकता है. मैं ऐसे लोगों का साथ नहीं चाहता जो किसी फिल्म में सिर्फ इसलिए काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं कि उसमें शाहरुख खान है.

फरहान की फिल्मों में जो एक खास बात बार-बार दिखती है, वो है पुरुष पात्रों का आपसी जुड़ाव. दिल चाहता है से रॉक ऑन तक दोस्तों की आत्मीयता फिल्म के विषय के केंद्र में रहती है. फरहान खुद भी बेहिचक स्वीकार करते हैं कि वो लड़कों के चहेते रहे हैं. उनकी शुरुआती जिंदगी पर उनके पिता और जानी-मानी शख्सियत जावेद अख्तर का व्यापक असर रहा है. पिता-पुत्र कुछ मायनों में एक जैसे हैं भी. दोनों अच्छे श्रोता हैं और लचीला नजरिया रखते हैं. फरहान कहते हैं, ‘मेरे पिता वक्त के साथ बदलने में कामयाब रहे क्योंकि वो खुले दिमाग के हैं और दूसरों का पक्ष समझने की कोशिश करते हैं. शायद यही वजह है कि उन्होंने अपने बेटे के काम को हमेशा उसकी नजर से देखा है और खुद को उसके मुताबिक ढाला है.

फरहान की फिल्म के पात्रों के हेयर स्टाइल भी काफी लोकप्रिय हुए हैं. वो कहते हैं, ‘किसी पात्र का हेयर स्टाइल उस में आए बदलाव को दिखाने का सबसे आसान जरिया है. इस काम के लिए प्रतिभा उनके घर में ही मौजूद है. उनकी पत्नी अधुना हेयर स्टाइल एक्सपर्ट हैं जिन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर ऐसे हेयर स्टाइल्स पेश किए जिनका पूरे देश पर खुमार सा छा गया. रॉक ऑन में फरहान ने समय में बदलाव को दिखाने के लिए कंधे तक झूलते अपने बालों को बाद में छोटा कर दिया है.

दरअसल देखा जाए तो निर्देशन में मिली सफलता के बाद से ही फरहान अभिनय का सपना देखने लगे थे. जोया के शब्दों में, ‘मेरा भाई हमेशा से एक कलाकार रहा है जो लोगों का ध्यान खींचने के लिए लालायित रहता था. फिर 1980 का जमाना आया जब फिल्मों का स्तर इतना गिर गया था कि उसे एक्टिंग से डर लगने लगा और उसका ध्यान दूसरी चीजों की तरफ मुड़ गया.’ अब फरहान कहते हैं, अभिनय आपको भावुकता के स्तर पर आज़ाद बना देता है. अचानक आप अपने भावों को बिल्कुल अलग तरह से इस्तेमाल करने लगते हैं. मुझे चीजें महसूस करनी पड़ीं. मुझे उन चीजों के बारे में सोचना पड़ा जिनके बारे में मैं सामान्यतया नहीं सोचता.

फिलहाल फरहान दो और फिल्मों में अभिनय कर रहे हैं. उनके किरदार बेहद दिलचस्प हैं. उदाहरण के लिए द फकीर ऑफ वेनिस में वो एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभा रहे हैं जो एक आर्ट प्रोजेक्ट के लिए एक गंजेड़ी साधु को वेनिस ले जाता है. ये उनके मित्र और बीइंग सायरस के निर्देशक होमी अजानिया के अनुभव पर आधारित फिल्म है. लक बाय चांस में वो दिल्ली से मुंबई गए एक संघर्षरत अभिनेता का किरदार निभा रहे हैं तो सबसे पहले रिलीज हुई रॉक ऑन में वो एक पॉपुलर रॉक बैंड के सदस्य हैं.

शहरी मध्यवर्ग के सुरक्षात्मक खोल में पले बढ़े फरहान को 1990 में थोड़े समय के लिए इस खोल की कमजोरियों का अनुभव तब हुआ जब मुसलमान होने पर उन्हें औरों से अलग करके देखा गया. फरहान बताते हैं कि वो उनकी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर था. उनके दोस्तों के मां-बाप उन्हें बार-बार ये अहसास दिलाते कि वो कुछ अलग हैं. फरहान कहते हैं कि वो अगर कट्टरपंथी नहीं हुए तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि उदार थी.

फरहान बताते हैं कि अभिनय के बारे में उन्होंने उन बड़े अभिनेताओं से भी काफी कुछ सीखा जिन्हें उन्होंने निर्देशित किया है. द फकीर ऑफ वेनिस में फकीर की भूमिका निभा रहे अन्नू कपूर ने सेट पर फरहान की घबराहट को कम करने में बड़ी मदद की. कपूर कहते हैं, ‘फरहान बहुत खुले दिल के हैं और औरों की बात सुनने से परहेज नहीं करते. अभिनय को निखारने का यही मूलमंत्र है. इस फिल्म के निर्देशक और फरहान के दोस्त आनंद सुरपुर बताते हैं कि अपने पात्र पर ध्यान देने के साथ फरहान के भीतर का निर्देशक दूसरी जरूरी चीजों पर भी उतनी ही नजर रखता है.

फरहान कहते हैं, “मैं खुद सहित और जितने भी निर्देशकों को जानता हूं, वो फिल्म की रिलीज और उसका एक हफ्ते का प्रमोशन पूरा होते ही निढ़ाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ते हैं. आप किसी से मिलना नहीं चाहते. कहीं जाना नहीं चाहते. आप बस टीवी देखते हैं और कुछ नहीं करते. इससे पता चलता है कि हर फिल्म में आप अपनी कितनी ऊर्जा खर्च करते हैं.

एनेस्टेशिया गुहा

तूफान की प्रस्तावना

पिछले साल दिसंबर में देश के सबसे भयावह ईसाई विरोधी दंगो का गवाह बन चुका उड़ीसा का कंधमाल ज़िला सांप्रदायिकता के सुसुप्त ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हुआ था. बीते दिनों विश्व हिंदु परिषद के वरिष्ठ नेता लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके तीन सहयोगियों की हत्या के बाद ये ज्वालामुखी एक बार फिर से फट पड़ा.

85 वर्षीय लक्ष्मणानंद सरस्वती उड़ीसा में ईसाई बन गए आदिवासियों को दोबारा हिंदू धर्म में लाने के अभियान की अगुवाई कर रहे थे. कंधमाल ज़िले के जलासपेटा गांव में स्थित एक बालिका आश्रम में वो मेहमान बनकर आए हुए थे. 24 अगस्त की शाम कुछ हथियारबंद लोग आश्रम में घुसे और अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी. गोलीबारी में लक्ष्मणानंद के अलावा दो महिलाओं और एक बच्चे की भी घटनास्थल पर ही मौत हो गई. अटकलें लगाई जा रहीं थीं कि हत्यारे माओवादी थे—बाद में माओवादियों के एक पत्र से ये और भी साफ हो गया.

पिछले साल के दंगों के बाद से ईसाई समूह जहां विहिप को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे वहीं लक्ष्मणानंद स्थानीय माओवादियों को सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए ज़िम्मेदार बता रहे थे.

लेकिन वीएचपी ने कंधमाल के ईसाइयों पर आरोप थोपने में तनिक भी देरी नहीं लगाई. साल 2007 के अंत में नफरत की जिस आग ने कंधमाल को अपनी गिरफ्त में ले लिया था एक बार फिर से वही सब कुछ घटने लगा. उस समय हुई हिंसा के केंद्र में भी लक्ष्मणानंद ही थे. क्रिसमस के अवसर पर उनके ऊपर हमले की अफवाह से दंगे भड़क उठे थे जिनमें चार लोगों की मौत हो गई और 800 घरों को आग के हवाले कर दिया गया. उस हिंसा में प्रभावित ज्यादातर लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिताने वाले निरीह जंगली आदिवासी थे. लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा की ताज़ा घटनाओं में भी अब तक 20 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और दसियों गिरजाघरों और सैकड़ों घरों को तहस-नहस किया जा चुका है. कई सड़क और रेल मार्ग समय-समय पर अवरुद्ध किए जा रहे हैं और कंधमाल में कई दिनों से निषेधाज्ञा लागू होने के साथ-साथ पूरे उड़ीसा में हाई अलर्ट घोषित किया गया है.

विहिप की केंद्रीय सलाहकार समिति के सदस्य लक्ष्मणानंद पिछले कुछ दिनों से अपने ऊपर हमले की आशंका व्यक्त कर रहे थे. बीते शुक्रवार को तुमुदिबंधा थाने में जा कर उन्होंने अपने लिए सुरक्षा की मांग भी की थी. ये तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें किससे ख़तरा था लेकिन पिछले साल के दंगों के बाद से ईसाई समूह जहां विहिप को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे वहीं लक्ष्मणानंद स्थानीय माओवादियों को सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए ज़िम्मेदार बता रहे थे. तुमुदिबंधा आने से ठीक पहले वो अमरनाथ श्राइन बोर्ड ज़मीन मसले को लेकर चल रहे राज्य व्यापी आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे.

बुरी तरह से कंगाल कालाहांडी ज़िले से लगता कंधमाल गरीबी के मामले में पड़ोसी ज़िले से होड़ करता दिखता हैं. ज़िले की जनसंख्या 6 लाख है जिनमें से आधी से ज्यादा आबादी कंध आदिवासियों (मुख्यत: हिंदू) की है. लगभग 18 फीसदी आबादी पनोस दलितों की है जिनमें से आधे से ज़्यादा ईसाई हैं. लिहाजा इन दोनों समुदायों के बीच के सांप्रदायिक संघर्ष में आदिवासी बनाम दलित का एक और आयाम जुड़ कर आग में घी का काम करता है. दोनों ही समुदाय आरक्षण की कोख से पैदा हुई स्पर्धा में एक दूसरे को मात देने की फिराक में रहते हैं. दोनों के बीच हिंसक स्पर्धा के बीज 20 साल पहले ही पड़ गए थे. उधर विहिप का धर्मान्तरण विरोधी अभियान चार दशक पुराना है. सरस्वती का मुख्य आश्रम कंधमाल के चकपाड़ में 60 के दशक के अंत में स्थापित हुआ था. ये तभी से ईसाई विरोधी भावनाओं को सींचता आ रहा है.

आने वाले दिन सिर्फ कंधमाल ही नहीं बल्कि पूरे उड़ीसा के लिए काफी तनाव भरे रहने वाले है. राज्य के नेताओं, नौकरशाहों और पुलिस पर आरोप लग रहे हैं कि उनके कैडरों में सांप्रदायिक भावनाएं गहराई तक जड़ें जमा चुकी है. आने वाले समय में सरस्वती को एक शहीद के रूप में याद किया जाएगा जबकि राज्य के अल्पसंख्यक भय के साए में जीने को मजबूर होंगे. राज्य को विनाश की गहराइयों में जाने से रोकने के लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की इच्छाशक्ति के लिए ये अग्निपरीक्षा की घड़ी है.

विभूति पति 

'मुझे लगा कि टाटा मुझसे बात करेंगे'

आपको भी लगता होगा कि इस संकट का समाधान होना चाहिए.

ये कोई असाध्य समस्या नहीं है. भूमि अधिग्रहण क़ानूनों का दबाव डालकर अनिच्छुक लोगों पर ज़मीन बेचने का दबाव डालना कहीं से भी उचित नहीं हैं. साथ ही पंचायत चुनावों में मिली मात के बाद सत्ताधारी पार्टी को ये अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि असाधारण बल प्रयोग से काम नहीं चलता. ज़मीनों को वापस किया जाना चाहिए.

पर ज्यादातर लोगों ने अपनी ज़मीनें खुद ही दे दीं और मुआवजा भी ले लिया है.

इसका ये मतलब नहीं कि आप गिनती में कम लोगों को दबा दें. ये कई फसल देने वाली ज़मीन है जिसे बचाकर रखना होगा. हम अपने अन्न के कटोरे की जान लेने पर क्यों तुले हुए हैं? खुद राज्य सरकार के मुताबिक उसके पास 44,000 एकड़ ज़मीन ऐसी है जिन पर जूट मिलें थीं. हाल ही में बिरला को 350 एकड़ ज़मीन वापस कर दी गई जिस पर वो रिहाइशी इमारतें बनाने वाले हैं. पहले ये ज़मीन उन्हें कार प्लांट के लिए दी गई थी. आप कितने हास्यास्पद हो सकते हैं?

टाटा का कहना है कि सहायक औद्योगिक इकाइयां भी मुख्य प्लांट के अंदर ही होनी चाहिए.

मैं एक मिनट में इस दावे की हवा निकाल सकती हूं. पूरे देश में कार निर्माता कई विक्रेताओं से सहायक उत्पाद खरीदते हैं. बस मुख्य संयंत्र शत-प्रतिशत आपूर्ति की मांग करता हैं. अगर सहयोगी उत्पाद इकाई किसी संयंत्र के अहाते में ही है तो वो केवल उसके लिए ही काम करेगी. मगर ऐसा हो ही ये ज़रूरी थोड़े ही है.

ये आपकी सबसे बड़ी राजनीतिक वापसी है.

ये याद दिलाने का शुक्रिया कि मेरी पार्टी विलुप्तप्राय थी. तृणमूल कांग्रेस राज्य का एक बेहद मजबूत विपक्ष है. आज अगर चुनाव हो जाएं तो हम बहुत आसानी से पश्चिम बंगाल में 20 लोकसभा सीटें जीत जाएंगे.

पश्चिम बंगाल में निवेश आकर्षित करने के लिए आपके पास क्या योजना है?

हमें ऐसी परियोजनाओं को बनाने की जरूरत है जिसमें उद्योग और कृषि दोनों साथ-साथ फल-फूल सकें. सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु ने राज्य में निवेश के लिए 36 बार विदेश यात्राएं की लेकिन कुछ नहीं हुआ. हमारे यहां 70 लाख से ज्यादा बेरोजगार हैं.

पर क्या आज की दुनिया में बंद और हड़ताल किसी बात का जवाब हैं?

मुझे कोई ऐसा विकल्प बताइए जिसके सहारे गरीब अपनी आवाज़ उठा सके, हम उसपर चलेंगे.

ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है– मुख्यमंत्री की कुर्सी या फिर किसानों का मसीहाहोना?

समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्ता में होने की जरूरत होती है. मेरी पार्टी बार-बार कहती रही है कि हम मानवीय चेहरे वाला विकास चाहते हैं. वर्तमान संकट का ये सबसे बेहतर जवाब है. सिर्फ सिंगूर या नंदीग्राम ही नहीं वाममार्गियों ने राज्य में सभी-कुछ उल्टा-पुल्टा कर दिया है. कोलकाता एयरपोर्ट से हल्दिया बंदरगाह को जोड़ने वाली एक्सप्रेसवे परियोजना ज़मीन विवाद के कारण लटकी हुई है. केमिकल हब को भी नयाचार में स्थानांतरित करने की बातें चल रही हैं. बर्धवान ज़िले के कटवा में प्रस्तावित एक विशाल बिजली परियोजना को ज़मीन अधिग्रहण के विरोध के चलते खत्म कर दिया गया. आप ज़मीन के मालिक की उपेक्षा करके किसी उपक्रम की योजना नहीं बना सकते.

सिंगूर में बहुत से लोग आपका समर्थन कर रहे हैं लेकिन उनके बच्चे सिंगूर फैक्ट्री में काम कर रहे हैं.

इसमें कोई बुराई नहीं है. दो अलग-अलग विचार एक ही छत के नीचे पनप सकते हैं. हो सकता है पिता उन लोगों के बारे में सोच रहे हों जिनकी ज़मीनें छिन गई हैं और बेटा अपने बारे में ही सोच रहा हो.

क्या ये ठीक नहीं होता कि आप सीधे रतन टाटा से बात करतीं?

मुझे लगा था कि वो मुझसे बात करेंगे. मगर मुझे उनसे मिलने ही नहीं दिया गया.

शांतनु गुहा रे

भूल बना विलायती बबूल

गुजरात के सुदूर उत्तर में स्थित है कच्छ जिला. इसका ज्यादातर भाग रण का कच्छ नाम से मशहूर एक बेहद संवेदनशील रेगिस्तानी पारिस्थितिकीय तंत्र में पड़ता है. इस ऊबड़-खाबड़ और चट्टानी इलाके की बाहरी सीमाओं पर कई छोटे-छोटे गांव हैं जिनमें बसने वाली आबादी में मुख्य रूप से मुस्लिम और दलित हैं. इनमें से अधिकांश लोग गरीबी की रेखा से नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं. विकास की सरकारी परियोजनाओं के यहां कहीं भी दर्शन नहीं होते. ऊपर से सूखे की मार और सिमटते पारंपरिक संसाधनों के चलते उनकी जिंदगी के हालात हाल के वर्षों में और भी भयावह होते गए हैं. मजबूरी में यहां के लोगों ने एक खतरनाक पेड़ को अपनी जीविका का साधन बना लिया है. गंडा बावर नाम के इस कांटेदार और झड़ीनुमा पेड़ की  लकड़ी को जलाकर उससे कोयला बनाया जाता है और स्थानीय लोग इसे दलालों को कौड़ियों के भाव बेच देते हैं. इससे होने वाले प्रदूषण से न केवल उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है बल्कि इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीय तंत्र को भी खतरा पैदा हो गया है.

बात दो दशक पहले की है. इस इलाके में रेगिस्तान के विस्तार को रोकने के लिए सरकार ने बबूल जैसी एक प्रजाति के पेड़ को इजरायल से यहां लाकर लगाना शुरू किया. गंडाबावर या विलायती बबूल के नाम से जाने जाना वाला ये पेड़ तेजी से बढ़ता और फैलता है. अब ये पेड़ कई स्थानीय परिवारों के लिए जीविका का एकमात्र साधन बन गया है. इसके चलते इन पेड़ों की अधाधुंध कटाई होने लगी है. लोग पेड़ काटते हैं और इसकी लकड़ी का बड़ा सा ढेर बनाकर उसे जलाते हैं जिससे चारकोल यानी कोयला बनता है. स्थानीय लोग इसे कोलसा कहते हैं. बिचौलिये इन गांवों में ट्रक लेकर पहुंचते हैं और इसे कौड़ियों के दाम पर खरीद लेते हैं. गंडा बावर नाम के इस कांटेदार और झड़ीनुमा पेड़ की  लकड़ी को जलाकर उससे कोयला बनाया जाता है और स्थानीय लोग इसे दलालों को कौड़ियों के भाव बेच देते हैं. इससे होने वाले प्रदूषण से न केवल उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है बल्कि इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीय तंत्र को भी खतरा पैदा हो गया है.

वजीरा गांव के वली साहिब कहते हैं, पहले हमें एक बोरे के 300 रुपये मिलते थे मगर बिचौलियों ने दाम घटाकर 200 रुपये प्रति बोरा कर दिया है. लेकिन हमें आजीविका का नया स्रोत मिल गया है और अब हमें काम की तलाश में गांव छोड़कर कहीं जाने की जरूरत नहीं हैं. मगर पेड़ का विनाशकारी प्रभाव साफ देखा जा सकता है. कोयला बनाने के लिए बड़े पैमाने पर लगाई गई आग के घने धुएं से लोगों को सांस और आंखों की कई बीमारियां हो रही हैं. यहां सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की उपस्थिति नहीं के बराबर है और चूंकि इलाका मुख्यधारा से लगभग कटा हुआ है इसलिए स्वास्थ्य अधिकारियों की इस इलाके पर नज़रें इनायत बमुश्किल ही होती हैं.

वैसे गंडा बावर काफी पहले से ही एक समस्या बन गया था. दरअसल इसके आसपास किसी दूसरे पौधे का पनपना मुश्किल होता है इसलिए इसकी वजह से वनस्पतियों की स्थानीय प्रजातियों के अस्तित्व पर ख़तरा मंडराने लगता है. इसके अलावा ये पेड़ बड़ी मात्रा में भूगर्भीय पानी का शोषण करता है जिस कारण जहां-जहां भी गंडा बावर की अधिकता है वहां भूमिगत जल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है.

साफ है कि गंडा बावर को लगाए जाने से पहले इसके संभावित प्रभावों को लेकर कोई गंभीर सर्वेक्षण नहीं किया गया. पहले सरकार ने इस पेड़ को काटने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था जो तीन साल पहले हटा लिया गया. अब चूंकि गरीबी से बदहाल कच्छ के परिवार बड़ी संख्या में इस पर निर्भर हो गए हैं इसलिए एक अहम सवाल उनकी आजीविका का भी है. जरूरत इस बात की है कि इस क्षेत्र का गंभीरता से सर्वे किया जाए और गंडा बावर का कोई ऐसा विकल्प तलाशा जाए जो पारिस्थितिकी के अनुकूल होने के साथ-साथ लोगों की आय का वैकल्पिक स्रोत भी बन सके.

योगिंदर सिकंद

सरकार या भू-माफिया !

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के लिए अति की पराकाष्ठा क्या है? जवाब है: माया के देश में पराकाष्ठा जैसी कोई चीज़ है ही नहीं. बहनजी की स्वप्निल परियोजनाओं और उनकी सुरक्षा के नाम पर कुछ भी जायज़ ठहराया जा सकता है. सुरक्षा कारणों से लखनऊ के अंबेडकर स्टेडियम पर गाज गिरने के बाद उत्तर प्रदेश के खेल प्रेमी एक बार फिर से सकते में हैं. राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री के लिए हेलीपैड बनाने के वास्ते प्रतिष्ठित लखनऊ गोल्फ क्लब (एलजीसी) की 1.15 एकड़ ज़मीन के अधिग्रहण का फैसला किया है. फिर भी लखनऊ के गोल्फर्स को भाग्यशाली कहा जा सकता है कि वे सस्ते में ही छूट गए. मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद पेश किए गए मूल प्रस्ताव में तो गोल्फ क्लब की पूरी 54 एकड़ ज़मीन को ही कब्जाने की बात थी. 

लगभग एक साल पहले लखनऊ के ज़िला मजिस्ट्रेट चंद्रभानु और एसएसपी अखिल कुमार ने तहसील के तमाम अधिकारियों के साथ क्लब का दौरा किया था. इससे पहले कि क्लब के सदस्यों को कुछ समझ आता दौरे पर आए अधिकारियों ने इस क्लब को-जो कि मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास के ठीक सामने ही स्थित है-मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर की लैडिंग के लिए चुन लिया. ज़मीन की पैमाइश शुरू हो गई और क्लब के अधिकारियों को भूमि छोड़ने का आदेश दे दिया गया.

लखनऊ के बीचोबीच स्थित 150 साल पुराना ये क्लब लखनऊ मार्टिन चैरिटी (एलएमसी) से पट्टे पर ली गई ज़मीन पर बना है. आज इसके 1300 सदस्य हैं जिनमें 250 वरिष्ठ नौकरशाह, हाईकोर्ट के तमाम जज और शहर के बहुत से गणमान्य लोग शामिल हैं. क्लब से समय-समय पर विजय कुमार झुम्मन, संजय कुमार, लाल चंद चांदी, भूप सिंह जैसे कई नामी गोल्फर भी निकलते रहे हैं. इनमें से ज्यादातर दलित समुदाय के हैं. पास ही के गांव मार्टिनपुरवा के रहने वाले ये खिलाड़ी गोल्फ खेलने से पहले क्लब में ही काम किया करते थे. क्लब ही उनके जीवनयापन का जरिया है. दिल्ली से कोलकाता के बीच एलजीसी एक मात्र सिविलियन गोल्फ कोर्स है जहां पर हर साल राष्ट्रीय स्तर के तमाम टूर्नामेंट और प्रशिक्षण कैंप आयोजित किए जाते हैं. इससे पहले कि क्लब के सदस्यों को कुछ समझ आता दौरे पर आए अधिकारियों ने इस क्लब को-जो कि मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास के ठीक सामने ही स्थित है-मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर की लैडिंग के लिए चुन लिया.

पिछले छह महीनों से एलजीसी प्रबंधन के ऊपर लखनऊ के डीएम का जबर्दस्त दबाव बना हुआ था. उन्हें ही हेलीपैड के लिए ज़मीन की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. पहले क्लब में रंगारंग कार्यक्रम आयोजित करने पर रोक लगा दी गई. इसके बाद क्लब के सदस्यों द्वारा यदाकदा दी जाने वाली पार्टियों पर गाज गिरी. अगले चरण में क्लब के बार का लाइसेंस रद्द कर दिया गया और बाद में इस शर्त पर इसका नवीनीकरण किया गया कि उसे हर महीने बार लाइसेंस का नवीनीकरण करवाना होगा. 

हालांकि निर्णायक प्रहार अभी नहीं हुआ था. लखनऊ विकास प्राधिकरण ने डीएम के पास एलजीसी के अधिग्रहण संबंधी एक प्रस्ताव भेजा जिसे डीएम ने कुछ स्पष्टीकरण के लिए वापस भेज दिया. इस बीच एलजीसी के ऊपर दोहरी चोट करते हुए सरकार नियंत्रित लखनऊ नगर निगम ने क्लब को ज़मीन खाली करने के लिए क़ानूनी नोटिस भिजवा दिया. नोटिस में स्पष्ट किया गया कि पट्टे की अवधि 12 मार्च 2008 को खत्म हो चुकी है. उधर ट्रस्ट ने भी सालाना फीस के रूप में क्लब प्रबंधन द्वारा भेजा गया 1,56,250 रूपए का चेक वापस कर दिया और स्थानीय अख़बारों में क्लब की ज़मीन खाली करने संबंधी इश्तहार दे दिया. इसके बाद 27 जून को ट्रस्ट के संपत्ति अधिकारी एल्टन डिसूज़ा ने क्लब प्रबंधन को 15 दिन के भीतर ज़मीन खाली करने का नोटिस जारी कर दिया और साथ में नुकसान के लिए एक करोड़ रूपए का हर्जाना, पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद हर दिन के 50 हजार रूपए और क्लब द्वारा होर्डिंग से कमाई गई राशि में से एक लाख रूपए प्रति माह की मांग भी रख दी.

लेकिन एलजीसी के मानद सचिव देवेश रस्तोगी कहते हैं कि नगर निगम के साथ हुए लीज़ एग्रीमेंट में हमें दस-दस साल के दो विस्तार दिए जाने का प्रावधान है. हम गोल्फकोर्स के रख-रखाव और शहर में खेल को लोकप्रिय बनाने के लिए करोडो़ रूपए खर्च करते हैं. गोल्फ कोर्स शहर की शुद्ध आबोहवा के लिए फेफड़े जैसा काम करता है और ज्यादातर सदस्य ज़मीन का कोई टुकड़ा दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं. रस्तोगी कहते हैं. उन्हें उम्मीद हैं कि ट्रस्ट और सरकार के साथ बैठकर इस मामले का हल निकाला जा सकता है. 

कुछ सदस्यों को इसमें साजिश नज़र आती है, उनका मानना है कि संपत्ति अधिकारी सरकार के हाथों में खेल रहे हैं. क्लब के एक सदस्य आरोप लगाते हैं, कुछ सरकारी अधिकारी ट्रस्ट पर तब तक क्लब के पट्टे का नवीनीकरण नहीं करने का दबाव डाल रहे हैं जब तक कि क्लब प्रबंधन हेलीपैड के लिए ज़मीन देने को तैयार नहीं हो जाता. पूछने पर डिसूजा सिर्फ यही कहते हैं, अगर राज्य सरकार इस तरह का कोई क़दम उठा रही है तो उसे करने दीजिए. जब हमारे सामने मामला आएगा तब हम आधिकारिक रूप से इसका जवाब देंगे. 

सरकारी अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं. फाइल अभी तक हमारे पास क़ानूनी सलाह के लिए नहीं आई है ये कहना है राज्य के क़ानून विभाग के प्रमुख सचिव एसएमए आब्दी का जो लखनऊ मार्टिन चारिटी के ट्रस्टी भी हैं. हालांकि मायावती सरकार ने क्लब प्रबंधन को ये विश्वास दिलाया है कि वो हैलीपैड के चारो तरफ 30 फीट ऊंची कंक्रीट की दीवार खड़ा करेगी जिससे कि क्लब की गोल्फ संबंधी गतिविधियां प्रभावित न हों. मगर सदस्यों का मानना है कि इससे न केवल खेल सुविधाओं पर प्रभाव पड़ेगा बल्कि हेलिकॉप्टर के उड़ने से पड़ने वाला हवा का दबाव, ध्वनि प्रदूषण और मुख्यमंत्री के जबर्दस्त सुरक्षा इंतज़ाम गोल्फ कोर्स के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर देंगे. इससे न केवल खेल सुविधाओं पर प्रभाव पड़ेगा बल्कि हैलिकॉप्टर के उड़ने से पड़ने वाला हवा का दबाव, कंक्रीट की तीस फुट ऊंची दीवार, ध्वनि प्रदूषण और मुख्यमंत्री के जबर्दस्त सुरक्षा इंतज़ाम गोल्फ कोर्स के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर देंगे

गोल्फरों का कहना है कि उत्तर प्रदेश राजभवन में पहले से ही हेलीपैड की सुविधा है जो कि मायावती के आधिकारिक आवास के पास ही मौजूद है. इसके अलावा उनके बंगले के पास ही एक बंजर ज़मान का टुकड़ा भी है जिसका मालिकाना हक एलएमसी के पास है और जहां मायावती ने एक बार अपना जन्मदिन मनाया था.

वो गोल्फकोर्स की ज़मीन के पीछे क्यों पड़ी हुईं हैं? अगर उन्हें अपनी सुरक्षा की इतनी ही चिंता है तो वो अपने आवास में मौजूद भूमि का उपयोग क्यों नहीं करतीं गोल्फर वाई सिंह कहते हैं. तीन बार के राष्ट्रीय गोल्फ चैंपियन विजय कुमार इशारा कहते हैं, जब भी मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर आएगा या जाएगा तब हमें खेलने की मनाही होगी. उनकी सुरक्षा के चलते गोल्फरों को भारी परेशानी उठानी होगी. एक और गोल्फर भूप सिंह उत्तर भारत में इससे गोल्फ को होने वाले जबर्दस्त नुकसान की चेतावनी देते हैं. अस्सी साल से ऊपर के क्लब के सबसे बुजुर्ग सदस्य राम आडवाणी पिछले बीस सालों में कोर्स में हुए विकास और सुधारों की चर्चा करते हैं. कलकत्ता गोल्फ क्लब से लंबे समय तक जुड़े रहे लालचंद याद करते हैं कि किस तरह से जवाहरलाल नेहरू ने विभाजन के समय शरणार्थियों के लिए बनने वाले शरणार्थी कैंप के लिए इसकी ज़मीन देने से इनकार कर दिया था. यहां तक कि लालू प्रसाद यादव को भी पटना गोल्फ कोर्स से छेड़छाड़ की इजाजत नहीं दी गई थी. हम भी लखनऊ गोल्फ कोर्स को मायावती से बचाने के लिए संघर्ष करेंगे लाल चंद ने कहा.

मार्टिनपुरवा के आस-पास रहने वाले 200 से ज्यादा दलित और अल्पसंख्यक परिवार क्लब के भविष्य का दम साधे इंतज़ार कर रहे है. गोल्फ यहां के निवासियों के लिए सिर्फ खेल से कहीं बढ़ कर है. इसके दम पर यहां के लोग पुलिस विभाग, रेलवे और दूसरे सरकारी विभागों में खेल कोटे के तहत नौकरियां पा चुके हैं. क्लब में दिन भर कैडिंग करके 100 से 150 रूपए कमाने वाले विनोद कुमार इस कल्पना से ही कांप जाते हैं कि लखनऊ में गोल्फ के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. 

सुरक्षा के नाम पर मायावती ने पहले ही एक स्टेडियम और दर्जन भर घरों पर कब्जा कर रखा है. अब एलजीसी की ज़मीन का भी वैसा ही हश्र होता दिख रहा है. प्रदेश के निवासियों के लिए राज्य सरकार और भू-माफिया के बीच अंतर करना ही मुश्किल हो गया है. 

क्षणिकाएं

1) माधुरी लौटी है वापस,

ग्लिसरीन लगा कर रो रही है..

हॉल के लोग अँधेरे में भी जगे हुए हैं…

सुनते हैं ये वही लोग हैं,

जो हर साल बिहार की बाढ़

या विदर्भ की आत्महत्याओं का दौर वापस आने पर भी,

रिमोट से चैनल बदल कर,

देखते हैं सा-रे-गा-मा-पा

देश में अँधेरा पसरा है…

माहौल के अँधेरे में भी लोग नही जग पाते….

मुझे "टीस" होती है…

 

2) दोस्तो से उधार लेकर चल जाते हैं महीने के आखिरी दिन,

तुमने एक हंसी उधार दी थी,

आज तलक साबुत पड़ी है

काश! जिन्दगी का आख़िरी वक़्त

जल्दी से आ धमके…

 

3) पत्नी ने ऑफिस से घर आते ही ,

मांज दिए हैं सभी बरतन,

पति अभी घर में घुसा ही है,

झल्ला रहा है पत्नी पर…

 

4) वो चार साल से दिल्ली में है,

बारह बजे सो कर उठता है…

मैं एक साल से दिल्ली आया हूँ,

उठ जाता हूँ अहले सुबह…

एक ही कमरे में सूरज दोगला हो गया है…

 

5) सड़क पर जल उठी लाल बत्ती,

एक भूखा, मासूम हाथ काले शीशे के भीतर घुसा,

भीतर बैठे कुत्ते ने काट खाया हाथ,

कब, कैसे पेश आना है,

ख़ूब समझते हैं संभ्रांत कुत्ते…

 

6) जिन्दगी में कुछ भी नया नहीं घटता,

फिर भी जीते हैं रोज़,

अखबार में भी रोज़ होता है वही सब,

मैं भी हो रहा हूँ इकठ्ठा,

रद्दी की तरह…

 

7) खचाखच भरी बस,

बुर्के के भीतर पसीने से तर लड़की,

मैं सोचता हूँ-

ग्लोबल वार्मिंग पर बहस ज़रूरी है…

 

8) लैंप-पोस्ट की रौशनी में भी,

बहुत काली है आज की रात…

वो तारा,

जिसमें मैं तुम्हे देखता था,

आज टूट कर गिरा है…

 

9) नेता विकास की बात करता है,

आम आदमी मुग्ध होता है,

वो इस बार फसलें बोता है,

और सपने भी…

फसलें उग आती हैं,

सपने मुरझा जाते हैं…

आम आदमी आत्महत्या करता है,

नेता अब भी विकास की बात करता है,

किसी और गाँव में…

 

10) भीषण नरसंहार के बाद,

जब सान्तवना की बारी आई,

देश के कोने-कोने से,

नेताओं की गाड़ी आई…

 

11) नेता चिल्लाता है,

सोचता है सच बोल रहा है…

जनता बहरी होकर सुनती है…

तालियाँ बजती हैं…

नेता बोलता जाता है तालियों के लालच में…

लालची नेताओं के लिए जनता जिम्मेदार है…

 

12) मैंने शब्द रच डाले,

लोगों ने अपने-अपने अर्थ निकाले,

वाह-वाह कर उठे,

तुम्हारी दी हुई "टीस"

मेरी सबसे बहुमूल्य निधि…

 

13) झुक कर पाँव छूता हूँ,

तो लोग मजहबी समझते हैं…

अल्पसंख्यकों की राजनीति में मशगूल देश में,

कौन समझता है,

बहुसंख्यक होने की टीस…

 

14) वह बिहार से एम.ए पास है…

बड़े बाप का बेटा है,

उसे एक ही टीस है…

कि उसने अगर दिल्ली से दसवीं तक भी पढ़ा होता….

बोल पाता बाजारू भाषा फर्राटे से,

कर पाता कॉल सेंटर में इज्ज़त से चौकीदारी…

 

15) साल का आख़िरी दिन है,

आओ हिसाब कर लें,

तुम्हारी कितनी मुस्कुराहटें मेरे पास हैं,

एक छुअन भी है…

एक वादा भी (कि तुम कभी नही भुलोगी मुझे)

सब रख लो…वादा मेरे पास ही रहने दो…

नए साल का तोहफा जानकर…

 

                                                                निखिल आनंद गिरि 

निखिल आनंद गिरि, एक निजी न्यूज़ चैनल में पत्रकार हैं.

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