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थोड़े से सिर-पैर वाला मजा फुल्टू

सबसे पहले मुद्दे की बात..अगर आप मौज मस्ती के शौकीन हैं और ज्यादा दिमाग न लगाना चाहते हुए भी थोड़े सिर-पैर वाली फिल्म देखना चाहते हैं तो हैलो देखें. फिल्म देखने के बाद कई लोगों के चेहरे टटोले, कइयों की छुप कर बातें सुनीं मगर कहीं भी डेढ़ सौ रुपये जाया होने का गम नजर नहीं आया.

हैलो, इंजीनियर, इनवेस्टमेंट बैंकर और आख़िर में राईटर चेतन भगत के बहुचर्चित उपन्यास वन नाइट @ द कॉल सेंटर पर आधारित है. चेतन ने खुद ही फिल्म के संवाद और पटकथा लिखी है, जो कि फिल्म में हास्य पैदा करने वाली मजेदार परिस्थितियों-जिसके लिए चेतन मशहूर हैं – में स्पष्ट नजर भी आता है.

फिल्म का निर्देशन सलमान खान के बहनोई और किसी जमाने में आयीं सर और आतिश जैसी इक्का-दुक्का फिल्मों में अभिनय कर चुके अतुल अग्निहोत्री का है और हालिया वक्त में फिल्म रॉक ऑन के निर्देशक अभिषेक कपूर के बाद वे दूसरे ऐसे असफल अभिनेता नजर आते हैं जिनमें निर्देशन की बड़ी संभावनाएं देखी जा सकती हैं.

फिल्म का सबसे उजला पक्ष है इसकी कसावट. फिल्म में हर वक्त कुछ न कुछ ऐसा घटता है जो दर्शकों को बांधे रहता है. यहां तक कि शर्मन जोशी और गुल पनाग के अन्तरंग पलों का फिल्मांकन भी लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट लाये बिना नहीं रहता. फिल्म में नकारात्मक बिन्दुओं के नाम पर शायद कुछ भी नहीं. हां अंग्रेजी का काफी इस्तेमाल किए जाने की वजह से हो सकता है छोटे शहरों की जनता फिल्म का पूरा मजा न ले पाये मगर पृष्ठभूमि में कॉल सेंटर होने से इसे कैसे भी अन्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता.

फिल्म में अभिनय सभी का ठीक-ठाक है मगर सोहेल और शर्मन को इसकी जान कहा जा सकता है. हां एक बात और! फिल्म के पोस्टरों में सलमान और कैटरीना का आकार फिल्म में उनकी भूमिकाओं के आकार से कतई मेल नहीं खाता मगर इसे भी फिल्म की खासियत ही कहा जाएगा कि इसे देखते वक्त आपको किसी भी तरह की धोखाधड़ी का शिकार होने का जरा भी एहसास नहीं होता.

संजय दुबे

परिवार की मर्द बच्ची

ऊटी की सीली-सीली सी हवाओं वाली, एक सर्द शाम, काई जैसा हरा आसमान और एक लंबा इंतजार. क्या कैटरीना कैफ के लिए इतनी दूर आने का कोई मतलब है? क्या किसी खूबसूरत सजावटी चीजों का भी कोई दिलचस्प अंतर्जगत हो सकता है? लगातार हिट फिल्में और शीर्ष पर होने की मुनादियों के बावजूद आखिर ऐसा कुछ भी तो नहीं जो ये बताए कि कैटरीना किसी खूबसूरत सजावटी गुड़िया से ज्यादा भी कुछ हैं.

होटल के अस्त-व्यस्त से कमरे में व्यवस्थित और संयत कैटरीना को देखकर ही आभास हो जाता है कि उनके भीतर झंकना खासा मुश्किल होगा. वे अभी-अभी पहाड़ी की चोटी पर बने एक सेट से लौटी हैं. कड़कड़ाती ठंड और सर्द हवाओं के बीच उन्हें एक बेहद पतली और छोटी ड्रेस में शाट देना था. वे मुझसे बातें करते हुए अपने सरदर्द से निपटने का प्रयास भी कर रही हैं. उनकी सहायक संध्या और छोटी बहन इजाबेल भी कमरे में हैं और माहौल का इशारा ये है कि इंटरव्यू के दौरान वे भी कमरे में रहने वाली हैं. मगर मेरे आग्रह पर कैटरीना उन्हें बाहर भेज देती हैं (संध्या बाद में बताती हैं कि एक ही तरह के सवालों से कैटरीना इतनी थक चुकी हैं कि कभी-कभी उनकी ओर से वे ही जवाब दे देती हैं)

कैटरीना का बॉलीवुड करिअर यहीं खत्म हो सकता था क्योंकि वे बहुत छोटी थीं, विदेश से आई थीं, उनकी पहली फिल्म बुरी तरह फ्लॉप थी और उन्हें हिंदी भी नहीं आती थी.

कैटरीना 17 साल की छोटी-सी उम्र में निर्देशक कैजद गुस्ताद की फिल्म बूम  में काम करने के लिए भारत आई थीं. कैजद ने उन्हें लंदन में एक विज्ञापन में देखा था. अमिताभ बच्चन, जैकी श्रॉफ, मधु सप्रे और पद्मालक्ष्मी जैसे सितारों वाली ये फिल्म उनके लिए एक आदर्श शुरुआत होनी चाहिए थी, मगर जबर्दस्त अंग-प्रदर्शन के बावजूद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई. कैटरीना का बॉलीवुड करिअर यहीं खत्म हो सकता था क्योंकि वे बहुत छोटी थीं, विदेश से आई थीं, उनकी पहली फिल्म बुरी तरह फ्लॉप थी और उन्हें हिंदी भी नहीं आती थी.

मगर महज छह साल में ही आज उनके सितारे बुलंदी पर हैं. हाल ही में लगातार कई हिट फिल्में दे चुकीं कैटरीना के लिए तेलुगु, मलयालम और हिंदी फिल्मों की छोटी-छोटी गुमनाम भूमिकाएं अब बीते कल की बातें हो चुकी हैं. आज वे विपुल शाह, राजकुमार संतोषी और यशराज फिल्म्स जैसे तमाम बड़े नामों के साथ काम कर रही हैं, कामचलाऊ हिंदी बोलती हैं, कथक में पारंगत हैं और उनका नाम ऐश्वर्या राय और करीना कपूर जैसी बेहद सफल तारिकाओं के साथ लिया जाता है. अब ये अदाकारा विज्ञापनों के लिए दो से तीन करोड़ रुपये मेहनताना लेती है और हाल ही में स्टूडियो 18 ने दो फिल्मों के लिए उन्हें छह करोड़ रुपयों में साइन किया है.

कैसे हो पाया ये सब? फिल्मी पर्दे के इतर क्या हैं कैटरीना?

जानना आसान नहीं. कैटरीना कहती हैं, ‘मेरी राशि कैंसर (कर्क) है और इस राशि के लोग अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करना पसंद नहीं करते.’ यहां तक कि माता-पिता और परिवार से जुड़ी बातें भी कैटरीना काफी घुमा-फिराकर पूछने पर ही बताती हैं.

सात भाई-बहनों (छह बहनें और एक भाई) में चौथे नंबर की कैटरीना की मां सुजैन ब्रितानी हैं और पिता मोहम्मद कैफ़ कश्मीरी. वो कहती हैं, ‘मेरे पिता का मुझ पर कोई असर नहीं रहा. वे हमारे परिवार का हिस्सा ही नहीं थे. जब मैं बहुत छोटी थी तभी वे मेरी मां से अलग हो गए और उसके बाद मैं उनसे कभी नहीं मिली.’ ये पूछने पर कि उस समय उनकी उम्र क्या थी, वो शून्य में ताकने लगती हैं. यहां तक कि उनके पिता का नाम भी इंटरनेट पर खोजना पड़ा.

पिता भले ही छोड़ गए मगर उनकी विरासत हमेशा के लिए कैटरीना के साथ रह गई — उनकी बला की खूबसूरती, आबनूस से बाल, काली आंखें और भारत से एक अजीब-से जुड़ाव का अहसास. अगले दिन शूटिंग के लिए चर्च में तब्दील की गई एक इमारत में बैठीं कैटरीना थोड़ी सहज हो जाती हैं. पिता की गैरमौजूदगी के असर के बारे में पूछने पर कहती हैं, ‘अगर कोई मनोविश्लेषक मेरी जांच करता तो कह सकता था कि मैं दुखी हूं. मगर ज्यादा से ज्यादा इसका असर ये हुआ कि मुझमें बड़ी उम्र के लोगों के प्रति झुकाव पैदा हो गया, ऐसे लोग, जो जिंदगी देख चुके हों, जिन्हें कुछ तजुर्बा हो.’

कैटरीना के जीवन पर मां सुजैन का बेहद गहरा असर रहा. पेशे से वकील और पांच भाषाओं में प्रवीण सुजैन ने समाजसेवा के लिए अपनी सफल कानूनी प्रैक्टिस को अलविदा कह दिया (आजकल वे मदुरई में अनाथ बच्चों के लिए काम करती हैं). सुजैन ने दोबारा शादी की मगर वो भी ज्यादा समय नहीं चली. समाजसेवा से जुड़े कामों की वजह से उन्हें जल्दी-जल्दी अपने ठिकाने बदलने पड़ते थे. हांगकांग, जापान, चीन, युक्रेन, रोमानिया, फ्रांस, हवाई, अमेरिका, पोलैंड, बेल्जियम, आस्ट्रिया, दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड. चूंकि बच्चे इस दौरान उनके साथ ही थे इसलिए उनकी ज्यादातर पढ़ाई घर पर ही हुई.

कैटरीना जैसी लड़की के लिए ये आसान नहीं था जिसे उनके ही शब्दों में हर चीज को जमा करके रखने का शौक था..हर पत्थर, हर गुड़िया, हर डोरी’. लेकिन कैटरीना अपने इस यायावरी जीवन के कुछ फायदे भी गिनाती हैं, ‘हम कहीं भी दो साल से ज्यादा नहीं रहे और हमारी जिंदगी में ठहराव और आराम जैसी चीजें कम ही थीं. जिंदगी में हर चीज के लिए तैयार रहने का इससे बढ़िया प्रशिक्षण हो ही नहीं सकता था. मैंने इतना कुछ देखा है और मैं इतनी अलग-अलग संस्कृतियों के बीच रही हूं कि अब मुझे किसी भी चीज से हैरत नहीं होती.’ स्वाभाविक ही है कि कैटरीना अपनी मां के काफी करीब हैं. वे कहती हैं, ‘उनसे सबसे बड़ी चीज मैंने किसी के बारे में आखिरी निष्कर्ष न निकालना सीखा.’

बचपन की मर्मस्पर्शी यादों के बारे में पूछने पर वे कोई जवाब नहीं दे पातीं. ‘मुझे अपनी बहन से पूछना पड़ेगा.’ वो कहती हैं, ‘अभी तो मुङो बस जापान में महीनों तक होने वाली बर्फबारी (उन्हें ठंड बिल्कुल पसंद नहीं) और पानी के जहाज से यूरोप की लंबी यात्रा के दौरान हुई सी-सिकनेस ही याद है.’ इस जवाब की आपको उम्मीद तक नहीं होती मगर स्क्रीन पर ग्लैमरस, चंचल और चुलबुली नजर आने वाली ये अदाकारा असल जिंदगी में इसके बिल्कुल उलट है..सादी, शांत और किसी बड़े-बुजुर्ग सी परिपक्व.

‘वो परिवार में पुरुष की भूमिका अदा करना चाहती हैं. उन्हें पता है कि किसी भी अभिनेत्री का करिअर बहुत सीमित होता है और वो इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा लेना चाहती हैं.’

कैटरीना ने 14 साल की उम्र से ही मॉडलिंग शुरू कर दी थी. उनके दोस्त मसलन कोरियोग्राफर बॉस्को, डिजाइनर रॉकी एस और भारत में आने के बाद से ही उनसे जुड़ी रही एजेंसी मैट्रिक्स की रेशमा शेट्टी इसकी पुष्टि करते हैं कि कैटरीना स्वभाव से लो-प्रोफाइल, सौम्य और अपने में गुम रहने वाली इंसान हैं. ‘हम अक्सर हंसते हैं कि कैटरीना नाम का एक ग्रह है जिस पर वो रहती हैं.’ रेशमा कहती हैं.

कैटरीना को पैसे और स्थिरता की चाह है और यही उनके फैसलों को प्रभावित करती है. रेशमा बताती हैं, ‘वो परिवार में पुरुष की भूमिका अदा करना चाहती हैं. उन्हें पता है कि किसी भी अभिनेत्री का करिअर बहुत सीमित होता है और वो इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा लेना चाहती हैं.’ कैटरीना भी सहमति जताते हुए कहती हैं, ‘मेरी मां ने कभी भी भविष्य के लिए पैसा नहीं जोड़ा. मगर मैं स्थिरता की जरूरत महसूस करती हूं. मुङो आर्थिक सुरक्षा की जरूरत है. मैं ये कहते हुए बेपरवाह नहीं घूम सकती कि सब ठीक हो जाएगा. मुझे अपनी बहनों के लिए साधन जुटाने की जरूरत है.

बूम से पहले तक कैटरीना के लिए सिनेमा का मतलब था स्टूडियो एमजीएम की गॉन विद द विंड और कैसाब्लैंका जैसी पुरानी और क्लासिक फिल्में. वे कहती हैं, ‘मां हमें नई फिल्में नहीं देखने देती थीं. उनका मानना था कि उनसे हम बुरी चीज़ें सीखेंगे.’ आज उनकी पसंद वीर जारा जैसी प्रेम-कहानियां और संजय लीला भंसाली की पीरियड फिल्में हैं. दूसरी तरफ उन्हें इम्तियाज अली और अनुराग बासु जैसे संवेदनशील फिल्मकार भी पसंद हैं. बावजूद इसके कैटरीना को अपनी फिल्मों पर कोई शर्मिंदगी नहीं. वो कहती हैं, ‘मुझे कॉमेडी फिल्में बेहद पसंद हैं. मुझे हल्के-फुल्के किरदार बहुत अच्छे लगते हैं. ये मुङो फिर से एक किशोरी होने और उस जिंदगी का लुत्फ उठानेका मौका देते हैं जिसे मैं नहीं जी पाई. हालांकि मैं यहां अजनबी थी मगर इस बारे में निश्चित थी कि मुझे ऐसा बनना है कि दर्शक, वितरक और निर्माता तीनों मुझ पर भरोसा कर सकें. इसके लिए अगर मुझे ऐसी फिल्में करनी पड़ें जिसमें बस चार गाने और मेरी याद न रखने लायक भूमिका हो तो भी कोई हर्ज नहीं. 40 की उम्र में मेरा करिअर खत्म होने पर मैं ये नहीं कहना चाहती कि मेरे पास घर और पैसा नहीं है पर कोई बात नहीं, मैंने तथाकथित अर्थहीन भूमिकाएं तो नहीं की.’

स्टारडम कैटरीना के लिए काफी कुछ लेकर आया है. तीन साल पहले उन्होंने बांद्रा में अपने लिए एक घर खरीदा, उसके बाद एक लंदन में. हाल ही में उन्होंने एक शानदार पोर्शे कार भी खरीदी है. पूछने पर कैटरीना कहती हैं, ‘ये चीज़ें आपको अहसास दिलाती हैं कि आप भी कुछ हैसियत रखते हैं.’

मगर यही स्टारडम नए तरह के दबाव भी लाया है. सफलता के साथ-साथ सभी की उम्मीदें भी बढ़ने लगती हैं. कैटरीना कहती हैं, ‘इस तरह के दबावों के प्रति हरेक की प्रतिक्रिया अलग होती है. मेरी बहुत अच्छी नहीं होती. मैं बहुत अधीर हो जाती हूं. मैं बहुत जल्दी दबाव में आ जाती हूं. लोगों को लगता होगा कि ये कैसी अजीब-सी लड़की है. मगर मैं कहना चाहती हूं कि नहीं, नहीं, मैं ऐसी नहीं हूं. मैं बहुत ज्यादा दबाव में हूं.’ 

हालांकि जब कैटरीना ऊटी में बने सेट पर पहुंचती हैं तो ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता. शाट के बाद साथी कलाकार रणबीर कपूर के साथ उनकी धमाचौकड़ी शुरू हो जाती है. वो किसी बच्ची की तरह उछल-कूद करती हैं.

एक मिनट बाद ही वो फिर से पुराने रूप में आ जाती हैं. भीड़ से अलग, शूटिंग के लिए चर्च में तब्दील की गई इमारत में बैठी कैटरीना कहती हैं, ‘मेरी ईश्वर में गहरी आस्था है. मुझे लगता है कि उसने मेरे सफर पर निगाह रखी है और मुझे बहुत कुछ दिया है.’

कुछ और जानने की कोशिश, और वे कहती हैं, ‘कुछ दिन पहले मुश्किलों से गुजर रही मेरी एक दोस्त ने मुझसे पूछा कि दिल टूटने की पीड़ा से उबरने में कितना वक्त लगता है.’ मैंने कहा, ‘मैं भी ऐसी स्थिति से गुजर चुकी हूं जब मुझे लगता था कि मैं किसी चीज़ के बिना जी नहीं सकती, ऐसी भी चीज़ें थी जिनके बिना मुङो लगता था कि मैं सांस भी नहीं ले पाऊंगी और अचानक सब कुछ बदल गया. न कोई नियम काम करता है न ही तर्क. जब मैं यहां आई थी तो मेरे पास कुछ नहीं था. मगर देखिए सब कुछ बदल गया. ये अपने आप में ही काफी अविश्वसनीय है.’

पूरी मुलाकात के दौरान किसी न किसी वजह से सुर्खियों में रहने वाले कैटरीना के ब्वा¬यफेंड्र सलमान खान से जुड़े सवाल किसी बंद पिटारे की तरह हमारे बीच रहते हैं. कोई भी सवाल, चाहे वो कितना ही घुमाकर क्यों न पूछा गया हो, इस पिटारे को नहीं खोल पाता. ऐसी ही हैं कैटरीना..कभी पिघलती हुईं तो कभी जमी बर्फ-सीं.

और यही वो चीज़ें है जो उन्हें महज एक सजावटी गुड़िया बनने से रोक देती हैं.

 

तुम कहती हो या मैं कहता हूं

यूं तो बड़ा अटपटा लगता है कि मैं हिंदी भाषा के बारे में कुछ कहूं पर ऐसा आग्रह है कि तहलका के प्रथम हिंदी संस्करण के लिए मैं अपने अनुभवों और विशेष रूप से उन अनुभवों का जो हिंदी भाषा से जुड़े हैं, जिक्र करू. हिंदी मेरे लिए एक ऐसी भाषा कभी नहीं रही  जिसे मैंने विधिवत सीखा हो. जैसे मुझे ये स्मरण नहीं कि कैसे मैंने सरकते-सरकते दो पैरों पर खड़ा होकर चलना शुरू किया, ऐसे ही मुझे यह भी याद नहीं कि कब और कैसे मैंने हिंदी बोलना और लिखना शुरू किया. मैं यह दावा तो नहीं कर सकता कि मेरे हिंदी ज्ञान में कभी कोई त्रुटि नहीं हो सकती या हिंदी के महापंडित अगर कोई मीन-मेख निकालने पर उतारू हो जाएं तो उन्हें कुछ भी इधर-उधर नहीं मिलेगा. लेकिन एक बात जरूर कह सकता हूं कि हिंदी और मेरे बीच मां और बेटे का-सा संबंध है. जो सहजता एक शिशु और मां के बीच होती है मैं हिंदी के साथ वही सहजता महसूस करता हूं. मैं जब चाहे उसकी चोटी, उसका आंचल खींच सकता हूं और वो जब चाहे मुझे डपट कर चुप करा सकती है. यह हिंदी से मेरी सहजता ही थी जिसके कारण चाहे विज्ञापन की दुनिया हो या फिल्म जगत मैंने अपनी ही तरह से स्वाभाविक लेखन किया, बिना किसी परंपरा को निभाने की कोशिश किए.

जो सहजता एक शिशु और मां के बीच होती है मैं हिंदी के साथ वही सहजता महसूस करता हूं. मैं जब चाहे उसकी चोटी, उसका आंचल खींच सकता हूं और वो जब चाहे मुझे डपट कर चुप करा सकती है.

मुङो याद है, जब मैंने विज्ञापन के क्षेत्र में क़दम रखा था तब यहां पूरी तरह से अंग्रेजी का बोलबाला था. ऐसा नहीं था कि हिंदी में विज्ञापनों की रचना नहीं होती थी परंतु किसी को यह विश्वास नहीं था कि हिंदी में सोचने वाले लोग भी विज्ञापनों की रचना कर सकते हैं. अंग्रेजी का ज्ञान अनिवार्य था या ये कहूं कि पहली शर्त ही यही थी कि आप अंग्रेजी जानते हों. मैं जब भी अंग्रेजी में लिखे विज्ञापनों का हिंदी में अनुवाद होते देखता तो मुझे बड़ा कष्ट होता था. मैनेजमेंट की डिग्री होने की वजह से अगर मैं चाहता तो उस समय विज्ञापन जगत को सदा के लिए अलविदा कह देता. पर थोड़ा सोचने बाद मुझे लगा कि भागना तो ग़लत होगा. यदि मुझे सचमुच ये लगता है कि विज्ञापन जगत की ये धारणा ग़लत है कि मूलत: हिंदी में सोचने वाले लोग विज्ञापन की रचना नहीं कर सकते, तो मुझे ये लड़ाई लड़नी होगी. उस समय तक एक बात मैं समझ चुका था कि यहां क्रोध और आक्रोश के लिए कोई जगह नहीं है. क्योंकि बाजार का हवाला देकर आपका मुंह कभी भी कोई भी बंद करा सकता है. 

और यहां से शुरू हुआ मेरा सफ़र, उतार-चढ़ावों, खट्टे-मीठे अनुभवों से भरा-पूरा. मैं हमेशा से यही मानता आया हूं कि झूठ की लड़ाई आप कभी नहीं जीत सकते इसलिए मेरे लिए सर्वप्रथम यह जानना निहायत ही जरूरी था कि क्या हिंदी में सोचने वालों की जरूरत इस व्यवसाय को सचमुच है या यह सिर्फ मेरा कोरा हिंदी प्रेम है? विज्ञापन व्यवसाय में सबसे बड़ा होता है उपभोक्ता, ग्राहक. क्योंकि कोई भी उत्पाद हो उसका कोई न कोई खरीदार तो होना ही चाहिए अन्यथा उसका औचित्य ही क्या. और विज्ञापन का उद्देश्य है उस उत्पाद की जानकारी उपभोक्ता तक पहुंचाना. जब मैंने बाजार का बारीकी से अध्ययन किया तो सच साफ हो गया. यहां पर हिंदी में सोचने की बहुत बड़ी जरूरत थी क्योंकि आम आदमी अपनी जुबान में ही संदेश सुनना चाहता था और उसे उस समय के विज्ञापनों की भाषा बड़ी अटपटी लगती थी. और क्यों न लगती, कुछ ऐसे लोग विज्ञापनों की रचना कर रहे थे जिनका आम जीवन से कुछ लेना-देना ही नहीं था. इन्होंने आम आदमी को या तो कार के शीशों के उस पार देखा तो या फिर घरों में पोंछा लगाते, खाना बनाते, चौकीदारी करते या फिर हिंदी फिल्मों में. वो कैसे सोचता है, उसके जीवन के सत्य क्या हैं, इन सबसे उसका कोई नाता नहीं था. मार्केट रिसर्च रिपोर्ट में जब मैं आम आदमी का चित्रण देखता तो मन खट्टा हो जाता था.

गोरखपुर की गीता-मार्केटिंग और एडवर्टाइजिंग से जुड़े हर आदमी ने यह नाम जरूर सुना होगा. गोरखपुर की गीता  यानी एक आम मध्यवर्गीय महिला. पर इस बात की परवाह किसी को नहीं थी कि इस महिला के धड़कते हृदय में क्या कुछ चल रहा है? किस कोने में पल रहे हैं उसके सपने? किस कोने में संजो रही हैं वो यादें, किस धड़कन में छिपी है प्रतीक्षा और किसमें भय या वहम? उन रिसर्च रिपोर्ट्स में उसका जिक्र तो होता था पर वहां वह सिर्फ एक उपभोक्ता थी. मुट्ठी में एक मुड़ा-तुड़ा नोट लिए किसी दुकान के काउंटर पर खड़ी, खरीदारी करने के लिए लालायित, नए-नए उत्पादनों से अपने घर को भर देने पर उतारू. मुझे इसी गीता को जीवंत करना था, मुङो इसी गीता की भावनाओं को स्वर देना था और उसका संपूर्ण परिचय कराना था विज्ञापन जगत से. सवाल तर्क से जीतने का नहीं था, सवाल था सफलता का. विज्ञापनों की सफलता का, उत्पादनों की सफलता का. तो बस एक ही रास्ता था, कलम का. और अंतत: वहीं किया — मैं लिखता रहा, विज्ञापन पर विज्ञापन, हेडलाइंस पर हेडलाइंस, जिंगल्स पर जिंगल्स, स्लोगन पर स्लोगन. और तब तक ताबड़तोड़ लिखता रहा जब तक बाजार से प्रतिध्वनि नहीं सुनाई दी.

धीरे-धीरे विज्ञापन जगत को ये अहसास होने लगा कि अंतर है. हिंदी में सोचे गए विज्ञापन अलग हैं. मैं ये नहीं कह सकता कि इस तरह का काम सिर्फ मैं ही कर रहा था. उस समय कुछ और लोगों को भी इस बात पर विश्वास था कि विज्ञापनों में बदलाव की जरूरत है, और विज्ञापन जगत इस ओर जागरुक हो रहा था. दरअसल दोष विज्ञापन जगत का भी नहीं था. हमारे देश ने विज्ञापनों की संस्कृति विदेशियों से सीखी थी तो विज्ञापनों की रचना भी उसी तरह से हो रही थी. पर उस समय हम भूल रहे थे कि हमारे देश की संस्कृति और यहां का सामाजिक ढांचा इतना सरल नहीं है. परतें हैं. परतों पर परतें हैं. और यहां लोगों से संवाद करने के लिए भाषा की सहजता को और भाषा को समझना बहुत ही आवश्यक होगा. क्योंकि भाषा सिर्फ व्याकरण में बंधे शब्दों से बना कोई गुच्छा नहीं है. भाषा तो संस्कृति के घोल में डूब-डूबकर, सामाजिक बदलावों से गुजर-गुजरकर, पल-पल बदलता सत्य है. एक सतत बहती धारा है. और उस धारा के साथ जुड़ कर ही आप अपना संदेश आम जनता तक, उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकते हैं. सच कहूं तो भाषा के सही अर्थ का अहसास मुङो भी विज्ञापन जगत से जुड़ने के बाद ही हुआ. उससे पूर्व मैं भी भाषा के संप्रेषण पक्ष को पूरी तरह नहीं समझता था. इसके लिए मैं विज्ञापन व्यवसाय का सदैव ऋणी रहूंगा.

भाषा सिर्फ व्याकरण में बंधे शब्दों से बना कोई गुच्छा नहीं है. भाषा तो संस्कृति के घोल में डूब-डूबकर, सामाजिक बदलावों से गुजर-गुजरकर, पल-पल बदलता सत्य है.

बोलचाल की हिंदी की शक्ति का अंदाजा मुझे बिल्कुल नहीं था. मैं नहीं जानता था कि अगर आप डायलाग लिखने की कला जानते हैं तो आप मुश्किल से मुश्किल बात भी बड़ी आसानी से लोगों तक पहुंचा सकते हैं. ठंडा मतलब कोका कोला सिरीज के तहत मैंने कई विज्ञापन लिखे जहां मैंने बोलचाल की हिंदी को खूब इस्तेमाल किया और परिणामस्वरूप उन विज्ञापनों को ऐतिहासिक सफलता मिली. हालांकि मैंने आरंभ से ही हिंदी में लिखना शुरू कर दिया था, कविताएं, कहानियां, गीत इत्यादि पर विज्ञापनों से जुड़ने के बाद मेरी लेखन-शैली में बहुत अंतर आ गया था. मुङो उसमें ज्यादा स्वाभाविकता और स्वच्छंदता का अनुभव हो रहा था. और इसी समय मेरे सामने अवसर आया गीत लिखने का. पहले पहल मैंने शुभा मुद्गल जी के साथ कुछ निजी एलबमों के लिए गीत लिखे जैसे — अब के सावन, मन के मंजीरे इत्यादि जो श्रोताओं को खासे पसंद आए और एक सिलसिला-सा चल निकला. मैं फिल्मों के लिए भी गीत और डायलाग्स लिखने लगा. फिल्मों में ना ही मैं किसी को जानता था और ना ही मेरे परिवार से कोई इससे पहले इस क्षेत्र से जुड़ा था. मेरे पास अगर कुछ था तो कलम और हिंदी से मेरी सहजता. यहां का दृश्य विज्ञापनों से बिल्कुल अलग था. यहां हिंदी समझने वालों की कमी नहीं थी मगर ज्यादातर लोग एक घिसी-पिटी स्टाइल में ही लिख रहे थे. मुङो याद है जब शुरू-शुरू में मैं अपने गीतों को पढ़कर सुनाता था तो कई लोग मुझे अजीब-सी दृष्टि से देखते थे. ये कौन है जो फिल्मी गीतों की जांची-परखी भाषा के साथ छेड़छाड़ कर रहा है? और तब मैं बार-बार यही सुनता था कि जो बिकता है वही टिकता है. पर क्योंकि बेचने और खरीदने से मेरा रिश्ता सर्वविदित और पुराना हो चुका था इसलिए मैं बार-बार विवाद करता और प्रयास करता था कि मैं अपनी तरह की रचनाओं को फिल्मों में जगह दिला पाऊं. मेरा विज्ञापन जगत का अनुभव कई निर्देशकों और निर्माताओं के साथ बहुत काम आया. उन्होंने यह समझ कर मुझे छूट दी कि यह व्यक्ति कम से कम बाजार को तो समझता ही है. इसलिए एक अवसर इसे दे देना चाहिए. और इसी तरह धीरे-धीरे रंग दे बसंती, हम-तुम, और तारे जमीं पर के गीत में मैं वह लिख पाया जो मेरी जुबान थी. वह भाषा जिसमें मैं बात कर सकता था, और यहां मैं भाग्यशाली रहा. क्योंकि मुझे फिल्मों से जुड़े ऐसे लोग मिले जो स्वयं नएपन की तलाश में थे. जो स्वयं फार्मूलों को तोड़ना चाहते थे.

भाषा से मैंने पूछा — तुम कहती हो या मैं कहता हूं.

तुम गढ़ती हो या मैं गढ़ता हूं.

भाषा गहरी निद्रा में थी.

उसने लिहाफ थोड़ा और ऊपर खींचा. 

और मुंह ढंक लिया

मैंने उसके तलवों में गुदगुदी की

और कुहनी से ठेल कर पूछा..

बताओ ना, सत्य क्या है?

तुम मात्र अभिव्यक्ति हो

या फिर बूंद-बूंद में टपकती हो

मेरी हर रचना में

मस्तिष्क की सीलनी दीवारों से रिसती हो

मेरे विचारों के पलस्तरों पर

भाषा फिर भी मौन रही.

पर मैं लिखता रहा

शब्द हंसे – मैंने पास जाकर देखा

भाषा के होंठों पर एक मुस्कान थी

बात समझ में आ रही थी,

पर गुत्थी अब तक गुत्थी थी.     

प्रसुन जोशी

 

कविता का शहरनामा

रोतरदम! सुंदर, ताजा और अभी-अभी बसा हुआ, लगता है जैसे इसकी अनोखे वास्तुशिल्प वाली इमारतें मशरूम की तरह मिट्टी से फूटी हों या विशाल क्रेनों से ढोकर इन्हें यहां जमा दिया गया हो. यह पूरी तरह से शहर है. गांव-देहात या पुरानी सभ्यता का कोई चिन्ह नहीं है. सामने सफेद रंग का मशहूर इरास्मस पुल है जिसे इस शहर का ट्रेडमार्क माना जाता है. आकाश की ओर मुंह किये हुए विशाल भव्य हंस जैसा पक्षी जिसके पंख मोटे सफेद रस्सों से बनाए गए हैं, और पूरी संरचना में ऐसी गति है कि लगता है यह अभी लंबी उड़ान को निकल पड़ेगा. रोतरदम्स स्खाउबुर्ग यानी नगर केन्द्र के इर्द-गिर्द फैली हुई गलियां और दुकानें चहल पहल से भरी हुई हैं. कई नस्लों, रंगों, और भाषाओं के लोग, डच, स्पानी, जर्मन, अफ्रीकी.. तरह-तरह से गुंथे हुए बालों वाली काली युवतियां, लंबे-तगड़े मोरक्कन, सांवले रंग के भारतीय मूल के सूरीनामी, पेड़ों के नीचे बेंचों पर बैठे सिगरेट पीते हुए अधेड़ लोग. पता चलता है कि रोतरदम में करीब 150 राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हैं और यह उदार और शांत शहर है. लोग प्राय: खुशहाल हैं, लेकिन संपन्नता का प्रदर्शन और तड़क-भड़क नहीं है.

रोतरदम का यह नयापन और सौंदर्य छोटी-सी रोत नदी के किनारे बसे तेरहवीं सदी के शहर के ध्वंस और उसकी राख से पैदा हुए हैं. इसे फीनिक्स भी कहा जाता है. 

रोतरदम में कविता भी जगह-जगह फैली हुई है. बसों, खिलौने जैसी लहराती हुई ट्रामों पर, सड़कों के किनारों पर करीने से लगे स्वचालित विज्ञापनों में, रेस्तराओं की मेजों पर रखे गत्ते के गोल-चौकोर टुकड़ों पर, छह लाख की आबादी के इस शहर में ज्यादातर लोगों को पता है कि यहां एक अंतर्राष्ट्रीय कविता समारोह हो रहा है. उस बूढ़ी स्त्री को भी, जिसकी उदास-सी दुकान पर एक सुबह मैं सिगरेट की तलाश में गया हूं.

यह गर्मियों की शुरुआत है. ट्यूलिप के फूलों की बहार चली गई है और कभी-कभी दिन का तापमान 22 डिग्री तक पहुंच जाता है जो यूरोप के लिए हीट-वेव ही है. हालांकि कुछ देर बाद बारिश की फुहारें मौसम को ठंडा कर देती हैं. अपनी खास रंगत की धूप के लिए पूरा हालैंड मशहूर है और ये बात उनके कई बड़े चित्रकारों की कृतियों में भी नजर आती है.

सात जून को रोतरदम के मेयर उन्तालीसवें काव्योत्सव का शुभारंभ करते हैं जिसकी थीम कविता: शहर और देहातहै. मंच पर पाइपों के सहारे एक तंबू-विश्वबसाया गया है. शायद इसलिए कि देहात से शहर, शहर से महानगर और महानगर से विश्व तक मनुष्य की यात्रा में तंबुओं की एक बड़ी लेकिन अनदेखी भूमिका रही है. वे उसकी विजय और पराजय के गवाह रहे हैं और उनके भीतर रहने वाले जाने कितनी ही भाषाएं बोलते आएं हैं. समारोह की पहली शाम इन तंबुओं के बीच अठारह कवि अपनी भाषाओं और आवाजों का एक ऐसा शहर निर्मित करते हैं जो भौतिक तौर पर शायद कहीं नहीं होगा. नेदरलैंड्स के रेम्को कांपर्त, फ्रांस के ज्यां मिशेल एस्पतालियेर, इटली के आंद्रिया जिबेलीनी, हंगरी के साबोल्च वरादी, अर्जेंटीना की मीर्ता रोजेनबर्ग, बेल्जियम के विलियम क्लिफ और मरियम फान ही, ब्रिटेन के जेम्स फेंटन, भारत से मैं गोरे लोगों की भीड़ में अकेला सांवला तीसरी दुनिया का आदमी जो कहीं से भटक कर आया हुआ-सा लगता है.

हाल में कम से कम एक हजार श्रोता हैं लेकिन वातावरण में स्पंदन कुछ ऐसा है जैसे पूरा शहर ही उमड़ आया हो. हर कवि के मंच पर आते ही तालियां और हर पाठ के बाद तालियां. यूरोपीय लोग प्राय: खुलते नहीं हैं, अपने में ही रहते हैं लेकिन यहां कविता पाठ के बाद लोग कवियों को आगे बढ़कर बधाई देने में लगे हैं. कविता से इतना लगाव अचरज में डालने वाला है. कवियों के लिए नि:शुल्क वाइन और बीयर उपलब्ध है. उन्हें इसके बहुत सारे टिकट दे दिए गए हैं. वैसे भी नेदरलैंड्स अपनी बीयर के लिए जाना जाता है और विश्वप्रसिद्ध हैनीकेन बीयर यहीं बनती है. वयोवृद्ध कवि रेम्को कांपर्त ने अपनी एक कविता में एक शहर को कुछ यूं बयां किया है –रात में शहर के लोगों के प्रेमी होते हैं/ रात में शहर लोगों के कंधों और बालों को सहलाते हैं’/ रात में मैंने शहरों को सुना है जब वे अपनी नदियों और पेड़ों की बगल में सो जाते हैं/ मैं उनके साथ पीता रहा हूं/ और उनके साथ हंसता, चूमता और रोता रहा हूं/..नीदरलैंड्स के एक और प्रमुख कवि तेर वल्क्त जैसे कवियों के पास अपने समय, समाज और मनुष्य जीवन पर कहने के लिए बहुत कुछ है. बल्क्त की कविता किसानी और ग्रामीण बिंबों के जरिए एक मिथकीय संसार रचाती है. जेम्स फेंटन की रचनाएं प्रतिरोधी तेवर की हैं और विलियम क्लिफ के यहां चीजें कुछ विरूपित हैं. उनकी एक कविता में भुवनेश्वर में लंगोट पहनकर नदी में तैरने के लिए छलांग लगाते आदमी का उल्लेख है. भुवनेश्वर भारत में कहां है?’ वे पूछते हैं, ‘मैंने एक किताब में तस्वीर देखी थीवृद्ध या प्रौढ़ कवियों की दुनिया खोई हुई चीजों, विश्वयुद्ध की दारुण स्मृतियों, बचपन या किशोरावस्था की विडंबनाओं या आंतरिक एकालापों से बनी हुई दिखती है. लेकिन युवा कवियों की रचनाओं में प्रयोगधर्मिता अधिक हैं और ये पूरी तरह से शहराती संवेदना को व्यक्त करती हैं. उन्हें सुनते हुए लगता है कि ग्लोबल दौर में अमीर देशों में सामाजिक सरोकारों की कविता लगातार कम हो रही है.

 होटल अटलांटा से कुछ ही कदम पर स्खाउबुर्ग तक टहलते हुए एक दीवार पर बड़ी-सी पेंटिंग लगी है. यह इरास्मस है. रोतरदम का योग्यतम पुत्र’. पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी का ये बुद्धिजीवी (पूरा नाम देसीदेरियस इरास्मस रोतरदामस) अपनी क्लासिक रचनाओं से चर्च के पाखंड़ों की आलोचना करता रहा. इरास्मस के एक हाथ में कलम है और दूसरा हाथ किताब पर है. सामने तराजू के एक पलड़े पर सोने की मुहरें हैं और दूसरे पर चिड़िया के पंख की कलम रखी हैं. लेकिन कलम मुहरों पर भारी पड़ रही है. इरास्मस यहां एक घरेलू नाम है, वह शहर के ज्ञान और विवेक का प्रतीक है और यहां का सबसे सुंदर पुल उसी को समर्पित है. यह पुल मेरे होटल के कमरे की खिड़की से भी दिखता है शहर की रखवाली सी करता हुआ. क्या यह कोई स्वर्ग है जहां मैं आठ दिनों से रह रहा हूं? अकेला हिंदुस्तानी, जिसे आने से पहले इस जाने-माने समारोह के बारे में कोई जानकारी तक नहीं थी. लगभग एक हजार कवियों की बिरादरी यहां कविता पढ़ चुकी है. मैं यहां आने वाला चौथा हिंदी कवि हूं (2003 में डा केदारनाथ सिंह और उदय प्रकाश और 1984 में अज्ञेय जी यहां आए थे). भारत से अंग्रेजी के दो कवि सुजाता भट्ट और विक्रम सेठ भी यहां आ चुके हैं और पाब्लो नेरुदा जैसे तमाम सितारे यहां कम-से-कम एक बार काव्यपाठ कर चुके हैं. अभी तक इसका स्वरूप यूरोप-केन्द्रित अधिक रहा है मगर अब शायद तीसरी दुनिया की तरफ ध्यान जाए. चौदह जून को विदा होते समय अपने कमरे से कुछ देर इरास्मस पुल को देखता हूं. उसकी तस्वीर खींचता हूं. नीचे होटल की लाबी में एक लोकप्रिय डच अखबार दि फोक्सक्रांतरखा हुआ है. उसमें मेरा एक इंटरव्यू छपा है. काउंटर पर बैठा व्यक्ति खुश होकर कहता है इसे आप अपने साथ ले जाइए’. बाहर एक टैक्सी खड़ी है जो कुछ ही देर में मुझे इस स्वर्ग से बाहर ले जायेगी.

मंगलेश डबराल

(रोतरदम कविता समारोह से लौटकर) 

विक्रम बेताल की सूट कथा

      एक समय की बात है। विक्रम अपनी पीठ पर वेताल को लादे सास बहू सीरियल देख रहा था, जो वह पिछले सात सालों से देख रहा था। उससे बोर होकर विक्रम ने वेताल से कहा कि समय काटने के लिए कोई धांसू सी स्टोरी सुनाओ। ऐसा सुनकर वेताल ने कथा की शुरुआत की।

      एक समय की बात थी कि एक राजा ने स्टिंग आपरेशन करवाया, यह देखने के लिए कौन कौन सा मंत्री क्या क्या खेल करता है। 

      मंत्री नंबर एक स्टिंग आपरेशन हुआ तो यह सामने आया- 

      एक मंत्री अठारह घंटे काम करता था। दफ्तर में काम, घऱ में काम, कार में काम, बेकार में काम। 

      अलां मंत्रालय कमेटी का चैयरमैन, गायब हो रहे मगरमच्छों की वेलफेयर कमेटी का चेयरमैन, भुट्टा विकास समिति का मेंबर, लुच्चा विरोधी समिति का चैयरमैन, माने तरह तरह का चैयरमैन वह मंत्री इत्ता बिजी था कि वह लुच्चा विरोधी समिति की बैठक में यह कह उठता हमें और पैदा करने हैं, तरह तरह के पैदा करने हैं, एक्सपोर्ट करने हैं। 

      बाद में उसे बताया जाता था कि यह तो भुट्टा विकास समिति की स्पीच है। 

      इत्ता काम इत्ता काम कि सब कहने लगे कि सरकार तो यही चला रहा है। 

      सबको उम्मीद थी कि मंत्री का प्रमोशन होगा। 

      एक मंत्री था, जो बहुत झूठ बोलता था। माने हर नदी के आसपास स्पीच देता था कि हम पुल बना देंगे। बाद में लोग बताते थे कि जिसे आप नदी समझ रहे हैं, वह तो नार्मल नाला है, जो एक घंटे की बरसात में हो गया है। तो वह कह उठता था , तो नो प्राबलम, हम गहरा नाला बनवा देंगे। तो उसे बताया जाता था कि नाला पचास सालों में ना बना, इस बीच पच्चीस मंत्री बन लिये। ये देश ही ऐसा है। इस पर वह आगे कह उठता है कि कोई बात नहीं, हम देश ही नया बनवा देंगे। 

     इसके बाद पब्लिक कुछ नहीं बोलती थी। 

     सबको उम्मीद थी कि इस मंत्री के खिलाफ कार्रवाई होगी, कैसी अंडबंड़ बात करता है। 

      एक और मंत्री था, जो प्रति घंटे सूट बदलता था। 

      उसे बताया जाता कि कश्मीर के लाल चौक में आतंकवादी घुस आये हैं। 

      वह बताता-मुंबई के बढ़िया होते हैं। मेरी पसंद तो मुंबई वाले हैं। 

      उसके अफसर उसे समझाते कि आतंकवादियों में फर्क नहीं करना चाहिए, मुंबई और कश्मीर के एक से होते हैं। 

      इस पर वह चौंक कर उठता और कहता कि अरे मैं तो सूटों की बात कर रहा था। मुझसे सूटों के अलावा कोई और बात क्यों करते हैं लोग। 

      फिर वह सूट बदलने चला जाता था। 

      उसके कई स्टिंग आपरेशन किये गये। सबमें यही सामने आया कि सूट बदलने से पहले वह सूट बदलता था और सूट बदलने के बाद भी सूट ही बदलता था।

      दिन और रात सूट ही सूट। 

      उससे एक बार पूछा गया कि कब तक वारदातों में कमी के आसार हैं। 

      उसने  बताया-कमी क्यों होगी, मेरे पास तो कई कमरे भर के हैं। 

      अफसरों ने घबराकर बताया कि आपके सूटों के बारे में नहीं, बल्कि आतंकी वारदातों के  बारे में पूछा जा रहा है। 

      इस तरह से सूट चलते रहे और मंत्रीजी उनसे ज्यादा जोरदारी से चलते रहे। 

      फिर एक दिन उस मंत्री को निकाल दिया गया, जो भौत बिजी टाइप रहता था और अठारह घंटे काम करता था। 

      अंड बंड बातें करने वाले मंत्री को कायम रखा गया, उसे कुछ नहीं कहा गया। 

      सूट मंत्री से कहा गया स्मार्ट मिनिस्टर, कीप इट अप। यू हैव डन ए ग्रेट जाब। 

      विक्रम को बेताल यह कथा सुनाकर बोला, इस कथा का मर्म बता। आखिर क्यों ऐसे फैसले लिये गये। अगर इस सवाल का जवाब विक्रम तूने नहीं दिया, तो तेरे सिर के उत्ते टुकड़े हो जायेंगे, जितने एपीसोड अब तक सास बहू सीरियल के प्रसारित हो चुके हैं। 

      विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा-देख भौत बिजी टाइप का मंत्री तो एक दिन राजा के लिए खतरा बन सकता था। मेहनत, लगन से काम करने वाले पापुलर हो जाते हैं। और पापुलर लोग खतरा पैदा कर देते हैं, अत ऐसों को हटाना ही उपयुक्त है। 

      और अंड बंड बात करने वाले मंत्री ने कुछ भी असामान्य नहीं किया। ऐसा ही मंत्री से अपेक्षित है। नार्मल अंड बंड करने के लिए उसे कायम रखा गया। 

      सूट वाले मंत्री को प्रोत्साहित किया गया और तारीफ की गयी। सिर्फ सूटीय चिंताओं में बिजी मंत्री को और कोई चिंता नहीं सताती। सिर्फ सूट में बिजी रहने वाला मंत्री किसी को नुकसान नहीं पहुंचा सकता,  ना राजा को, ना साथियों को। वह सिर्फ पब्लिक को नुकसान पहुंचा सकता है, पर पब्लिक की चिंता राजा की चिंता का विषय नहीं है। सो सूट वाले मंत्री को प्रोत्साहित किया गया और उसकी तारीफ की गयी। 

     विक्रम के ऐसे बुद्धिमत्तापूर्ण वचन सुनकर बेताल ने कहा-हे विक्रम, तेरी बातों से मुझे यह शिक्षा मिली है कि सूट पर ही ध्यान लगाने वाले मंत्री का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऐसे ही मंत्री की उन्नति सुनिश्चित है। 

आलोक पुराणिक

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'तब आप एक सच्चे प्यार को जन्म देते हैं।'

लंदन के कैमडेन बाज़ार में हर चीज़ के लिए एक दुकान है। यहां छुरीकांटों को तोड़मरोड़ कर बनायी गई आधुनिक कलाकृतियों से लेकर लीवाइस की थर्डहैंड फटी पुरानी जींस और प्राचीन टैटू तक सब कुछ मिलता है। लेकिन 1996 की उस दोपहर को इनमे से कोई भी चीज़ मुझे नहीं लुभा सकी। इसकी बजाय मेरा ध्यान खींचा हाथ से लिखे एक बोर्ड ने, जिस पर लिखा था "चांदी और अनमोल रत्न"। वहां एक व्यक्ति ने मेरे कुछ कहने से पहले ही चांदी की तीन अंगूठियों का एक सेट निकाल कर मुझे उनमें से एक को पहनने के लिए मजबूर कर दिया–एक आपके लिए, एक आपके पति के लिए और एक…" इसके बाद अगली आवाज़ मेरे मुंह से निकली "मेरे बच्चे के लिएहम एक बच्चे की उम्मीद कर रहे हैं।"

मगर ये सब इतना आसान नहीं था।

हमारी शादी को आठ साल गुजर चुके थे और हम इतने ही शहरों में रह भी चुके थे। अब तक हमारे कोई बच्चा न होने की वजह ये कतई नहीं थी कि हम बच्चा चाहते ही नहीं थे। इसके उलट वे हमें और हम उन्हें बहुत प्यार करते थे। जब हमारा भतीजा पैदा हुआ तो हमने उसके छोटे से मुखड़े पर बननेबिगड़ने वाली तमाम भंगिमाओं को अपने कैमरे में क़ैद किया था। इसके बाद हम उन फोटो को बड़ा करवाते और उन्हें लैमिनेट करवा के अपने पास रख लेते। जब हमारा दूसरा भतीजा पैदा हुआ तब भी हमने ऐसा ही किया। इससे हमें अहसास हो गया कि बच्चो से हमें बेहद लगाव है। हम खुद के बच्चे चाहते थे वो भी एक नहीं कई, मगर थोड़े समय बाद, सोच समझकर।

इसे भाग्य का खेल कहें या फिर कुछ और …वो समय सोचने विचारने के बाद भी नहीं आ सका। निराशा, सलाह, विकल्प, निर्णय, सवाल। इसमें इतना वक्त क्यों लग रहा हैं? क्या हमें इंतज़ार करना चाहिए? या फिर हमें किसी विशेषज्ञ से मिलना चाहिए? इस मामले में विशेषज्ञों की राय पूरी तरह से साफ थीये एक आम समस्या थी जिसे अपनी तनावमुक्त जीवनचर्या के जरिए दूर किया जा सकता था। हमने कुछ महीने इसे भी आजमाया पर कोई नतीजा नहीं निकला। अब सलाहें दूसरी तरह के इलाज की मिलने लगीं थीं।

फर्टिलिटी ट्रीटमेंट–ये दो शब्द ऐसे थे जिनमें आशा और निराशा बराबर मात्रा में मौजूद थी। हमने इस बात पर अपना ध्यान लगाने की कोशिश की कि किस तरह से ये ज़िंदगी को बदल देता है, किसी चमत्कार की तरह काम करता है। लेकिन आधे-अधूरे मन से हुए आधे इलाज के बाद ही हमें पता चल गया कि ये हमारे लिए नहीं था। मुझे ठीक-ठीक तो नहीं पता ये कब हुआ लेकिन हम एक आदर्श दंपत्ति से एक संतानहीन दंपत्ति में बदल गए थे। एकाएक हमारे बीच एक ऐसा खालीपन पैदा हो गया था जिसे भरने की कोशिश में हम दोनों जूझ रहे थे। दिमागी ज़ोरआजमाइश लगातार जारी थी, और दूसरी तरफ कागजी कार्यवाही ने हमें थका कर रख दिया। भारत से बाहर होना और भी मुश्किलें खड़ी कर रहा था

गोद लेना– अब तक हमारे मन में दुबक के बैठा ये विचार तन कर खड़ा हो गया था। मगर हजारों किंतु-परंतु हमारे दिमाग को चकरा रहे थे। तब क्या होगा जब हम बच्चे से मिलें और हमारे मन में कोई संवेदना ही पैदा न हो? अगर बच्चे में ही हमारे प्रति कोई लगाव पैदा न हो तब? अगर बच्चा हमारे भतीजों की तरह न दिखे या उनकी तरह व्यवहार न करे? अगर 18 साल के बाद बच्चा अपने असली मां-बाप को खोजना चाहे तब? तब क्या होगा अगर उसे उसके असली मां-बाप मिल जाए और बच्चा हमसे ज्यादा उन्हें पसंद करने लगे?

दिमागी ज़ोरआजमाइश लगातार जारी थी, और दूसरी तरफ कागजी कार्यवाही ने हमें थका कर रख दिया। भारत से बाहर होना और भी मुश्किलें खड़ी कर रहा था–हर काम में लंबा वक्त लग रहा था और ये एक निहायत ही कठिन प्रक्रिया थी। ज्यादातर मां-बाप का इंतज़ार नौ महीनों में खत्म हो जाता है, लेकिन अठारह महीनों के बाद भी हमारे दिमाग में घुमड़ रहे हज़ारों सवालों के जवाब ढ़ूंढ़ने के साथ-साथ हम बस उम्मीद, प्रार्थना और इंतज़ार ही कर रहे थे। हमने कई बार, हम इंतज़ार कर रहे हैं, ये भी भूलने की कोशिश की।

जिस वक्त फोन आया हम लंदन में थे। करीब डेढ़ दिन बाद हम गोद देने वाली अनाथालय संस्था के ऑफिस में थे। नियत समय 10 बजे से काफी पहले ही हम वहां पहुंच गए थे। मुझे आज भी स्पष्ट रूप से याद है– मैं बहुत उत्सुकता से बच्ची के आने का इंतज़ार कर रही थी। मुझे ये भी अच्छी तरह से याद है कि मेरे पेट में उस समय कुछ अजीब सा हो रहा था। या फिर मेरे दिल में? मुझे याद है उसको पकड़ना उसे सूंघना और उस लम्हे की हर एक दूसरी बात। वो जॉनसन बेबी पाउडर या फिर किसी अन्य बाल उत्पाद की तरह नहीं महक रही थी। वो बिल्कुल अलग अनुभव था। शहद या दालचीनी या फिर टोस्ट की तरह।

कुछ ही पलों बाद सब कुछ जैसे थम सा गया। एक परिचारिका हमारी तरफ आयीमुझे लगा था कि जैसे वो ऐसा स्लो मोशन में कर रही है। उसके हाथों में केवल डायपर पहने एक छह महीने की बच्ची थी। पहली बात जो मैंने उसकी बारे में महसूस की वो थी उसके भौहें। उल्टे U के आकार की उसकी भौहें उसके चेहरे पर भय मिश्रित मासूमियत के भाव पैदा कर रहीं थीं। उसने जिस चीज़ पर सबसे पहले ध्यान दिया वो मेरे पति थे। उसने अपनी बाहों को उनकी तरफ बढ़ाया। और मेरे पति उसकी बाहों में समा गए, कभी न लौटने के लिए। वो उनके गर्दन और कंधे के बीच की जगह में ऐसे फिट हो गई थी कि जैसे दोनों को ही एक दूसरे के लिए नापतौल कर बनाया गया हो।

मुझे याद है उसको पकड़ना उसे सूंघना और उस लम्हे की हर एक दूसरी बात। वो जॉनसन बेबी पाउडर या फिर किसी अन्य बाल उत्पाद की तरह नहीं महक रही थी। वो बिल्कुल अलग अनुभव था। शहद या दालचीनी या फिर टोस्ट की तरह। मैंने उसे और चिपका लिया और नीचे देखने लगी कि कहीं मैं उस पर ज़्यादा दबाव तो नहीं डाल रही हूं। वो मुस्करायी। उसके गालों पर दो डिंपल पड़ गए। वो कुछ नहीं बोली मगर मेरे सारे सवालों का जवाब दस सेकेंड में ही मुझे मिल चुका था।

आज वो 11 साल की है। उसे घूमना फिरना पसंद है। वो जानवरों से बहुत लगाव रखती है और घोड़ों, भेड़ों, कुत्तों, शेरों और यहां तक कि घोंघो के साथ भी घंटो बिता सकती है। बिल्कुल अनजान लोग भी हमें ये कहने के लिए रुक जाते हैं कि उन्होंने उसके जैसी मुस्कुराहट पहले कभी नहीं देखी। हमने भी नहीं देखी है। अब हमें पता चला कि ऐसा क्यूं कहा जाता है कि जब आप किसी को गोद लेते हैं तब आप एक सच्चे प्यार को जन्म देते हैं।

सोनिया बहल

(47 वर्षीय बहल एक क्रियेटिव एड डिज़ाइनर रही हैं और फिलहाल एक स्क्रिप्ट राइटर के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत हैं)

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समर्पण को समर्पण

      यह निबंध उस छात्र की कापी से लिया गया है, जिसे निबंध प्रतियोगिता मे टाप पोजीशन मिली है। निबंध का विषय़ था समर्पण-

      समर्पण का जैसा कि सब जानते हैं कि राष्ट्रीय, सामाजिक और आर्थिक जीवन में घणा महत्व है। नेता लोग कहते हैं कि समर्पण होना चाहिए, बार बार होना चाहिए। साधु संत कहते हैं कि समर्पण से आत्मा परमात्मा का मिलन हो जाता है। 

      हमने देखा कि जो सड़क कुछ दिनों पहले नेताजी के द्वारा राष्ट्र के नाम समर्पित की गयी थी। वह गायब हो गयी। फुल सीमेंट की सड़क मिट्टी में यूं मिल गयी, मानो आत्मा का परमात्मा से मिलन हो गया हो। पुल का इसी तरह का मिलन नदी से हो गया। इधर समर्पण होता है, उधर कुछेक दिनों में ही इस तरह का मिलन हो जाता है। इससे हमें पता चलता है कि नेताई समर्पण के रिजल्ट बहुत फास्टमफास्ट आते हैं। 

      समर्पण चूंकि बार बार होना चाहिए, इसलिए सड़क फिर बनी और राष्ट्र के नाम समर्पित हो गयी। इस तरह से बार बार समर्पण होता रहता है और देश की और खास तौर पर नेताजी, इंजीनियरजी और ठेकेदारों की आर्थिक प्रगति तेज होती रहती है। 

      समझने की बात यह है कि क्या समर्पण होता है और किसे समर्पण होता है। 

      सड़क बनती है, पुल बनते हैं। समर्पित हो जाते हैं। 

      पब्लिक उन पर एक दिन चलती है। फिर सड़क गायब हो जाती है। 

      नेता जो सड़क समर्पित करता है, वह घूम फिर  उसके ही पास लौट आती है। इससे पता चलता है कि धरती गोल है, सड़क जहां से चलती है, वहीं पहुंच जाती है। समर्पित करने वाला भी नेता है, और जिसे समर्पित होता है, वह भी नेता ही है। नेता से चलता है, नेता तक पहुंच जाता है। सारी राहें उसी की हैं, सारी बाहें उसी की हैं, सारी चाहें उसी की हैं। इधऱ भी वही है, उधर भी वही है। लेने वाला भी वही है, देने वाला भी वही है। यह अखिल ब्रह्मांड़ीय दिव्य ज्ञान समर्पित सड़क, पुनसमर्पित सड़क  को बार-बार देखकर सामने आ जाता है। 

      डाकू समर्पण करते हैं। उनमें से कुछ आगे नेता बन जाते हैं। 

      नेता बगैर समर्पण के ही डाकू बन जाता है। इस तरह से हमें पता चलता है कि समर्पण और डाकूगिरी का सघन संबंध है।

      खैर हमें समझना चाहिए कि कुछ समर्पण राष्ट्र के हित में हो सकते हैं। जैसे शिवराज पाटिलजी अगर कुछ कपड़ों को छोड़कर बाकी सारे राष्ट्र को समर्पित कर दें और ध्यान एक घंटे में पांच ड्रेस बदलने में ना लगाकर, होम मिनिस्ट्री में लगायें, तो……………..। तो पता नहीं क्या होगा। शिवराजजी अगर सच्ची में ध्यान देने लग गये, तो पता नहीं मामला और ज्यादा चौपट ना हो जाये। 

      कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि देश नेताओं से जितना बच पाता है, उतना भगवान को ही समर्पित है। उसके अलावा कोई उम्मीद नहीं है। बस इतनी भर उम्मीद की जा सकती कि शिवराजजी एक दिन में पांच ही ड्रेस बदलें, वरना बदलने को तो वह चौबीस घंटे में चौबीस भी बदल सकते हैं।

आलोक पुराणिक

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राजनीति की माला जपती नौकरशाही

 एक वक्त था जब सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा मांग में रहने वाला उत्तर प्रदेश का आईएएस कैडर भारतीय नौकरशाही की शान समझा जाता था. मगर आज आपसी कलह और राजनीतिकरण की वजह से ये काफी हद तक अपनी चमक खो चुका है. पतन का आलम ये है कि वरिष्ठ नौकरशाह खुल्लखुल्ला बसपा, सपा और भाजपा जैसे सियासी गुटों के पाले में खड़े हैं। उनकी स्पष्ट सोच है कि ‘सिस्टम’ से बाहर होने से बेहतर है इसके भीतर रहकर काम किया जाए. सरकारें बदलती हैं और उनके साथ ही बदल जाती है चहेते अधिकारियों की टोली भी. 

मायावती के चौथे मुख्यमंत्रित्व काल में ये अधिकारी राजनीतिक रैलियों के लिए इंतजामात तक करते हुए देखे जा चुके हैं. कुछ तो इससे भी एक क़दम आगे चले गए. 22 जुलाई को विश्वास मत हासिल करने से पहले मायावती के पसंदीदा अधिकारी नई दिल्ली में उनकी राजनैतिक बैठकों का प्रबंध कर रहे थे और कथित रूप से बिना कॉलर आईडी वाले फोनों के जरिए बसपा की तरफ से सांसदों के साथ संपर्क बना रहे थे. सीपीएम नेता प्रकाश करात और यूएनपीएक के दूसरे घटक दलों के साथ मायावती की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री सचिवालय के दो वरिष्ठ अधिकारियों – वी ए पांडे और नवनीत सहगल—की मौजूदगी की फोटो राष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर छपी. 

इस संबंध में दोनों अधिकारियों के एक सहयोगी कहते हैं कि वे दोनों मुख्यमंत्री के ‘डे आफिसर’ हैं लिहाजा उन्हें मुख्यमंत्री के साथ रहना ही था. लेकिन वो इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाते कि ये अधिकारी मुख्यमंत्री की राजनैतिक बैठकों में क्या कर रहे थे?  सहगल पर विश्वासमत के दौरान राजबब्बर से भी संपर्क करने का आरोप लगा था. हालांकि सहगल इस आरोप से इंकार करते हैं. रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर एस वेंकटरमानी कहते हैं कि पहले अधिकारी क्षेत्र, धर्म, और जाति के आधार पर बंटे थे लेकिन अब उनका राजनीतिक बंटवारा भी हो गया है.

1958 बैच के रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर एस वेंकटरमानी कहते हैं कि पहले अधिकारी क्षेत्र, धर्म, और जाति के आधार पर बंटे थे लेकिन अब उनका राजनीतिक बंटवारा भी हो गया है. अधिकारियों का मानना है कि अब नौकरशाही की निष्पक्षता नौकरशाहों के राजनीतिक पार्टियों के पाले में जुड़ने के साथ कम होती जा रही है और वे छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए राजनीतिक आकाओं से जुड़ रहे हैं. हालांकि यूपी आईएएस एसोसिएशन के मानद सचिव संजय बोस रेड्डी कहते हैं कि कुछ लोगों की वजह से पूरी नौकरशाही को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

जबर्दस्त दबाव में घिरे 1972 बैच के आईएएस मुख्य सचिव प्रशांत कुमार मिश्रा को जब बचाव का कोई रास्ता नहीं दिखा तो उन्होंने नई पोस्टिंग की जगह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को चुना. अवकाश ग्रहण करने से पहले मिश्रा ने अपने साथियों के नाम एक चिट्ठी लिखी जिसका मजमून ये था कि जीवन के मूल्य, सांसारिक लाभों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. चौंकाने वाली बात ये रही कि उनकी जगह तैनात किए गए 1974 बैच के अधिकारी एके गुप्ता को 1971-74 बैच के तकरीबन 30 वरिष्ठ अफसरों की अनदेखी करके लाया गया.

इससे भी बड़ी हैरत की बात ये थी कि मार्च 2007 में कैबिनेट सचिव के पद पर नियुक्त किए गए शशांक शेखर सिंह एक गैर आईएएस अधिकारी थे. इस साल मार्च में केन्द्र के दखल के बाद ही वरीयता की इस उलट-पुलट को सुधारा गया. वैसे तो कागजों पर कैडर के 537 आईएएस अधिकारियों का मुखिया मुख्य सचिव होता है मगर असल में प्रशासनिक नियंत्रण की कमान सिंह के हाथ में ही है. कैबिनेट सचिव के तौर पर शशांक शेखर सिंह की नियुक्ति के खिलाफ एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में लंबित है.

वर्तमान सरकार के सामने घुटने टेकने से इनकार करने वाले अधिकारी भयग्रस्त और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. उनकी कोशिश है कि उनकी नियुक्ति राज्य से बाहर या केन्द्र में हो जाए. हालांकि उत्तर प्रदेश में आईएएस अधिकारियों की कमी है लेकिन इसी असुरक्षा और डर की वजह से वे आईएएस अधिकारी भी वापस नहीं आना चाहते जो केन्द्र में या विदेशों में अपनी नियुक्ति की अवधि पूरी कर चुके हैं. उत्तर प्रदेश में आईएएस अधिकारियों की कमी है लेकिन असुरक्षा की वजह से वे आईएएस अधिकारी भी वापस नहीं आना चाहते जो केन्द्र में या विदेशों में अपनी नियुक्ति की अवधि पूरी कर चुके हैं.

राजनेताओं के हाथ में तबादले का अधिकार किसी हथियार की तरह होता है जिसका इस्तेमाल वे अधिकारियों के खिलाफ करते हैं. 14 महीने के मायावती के शासन में कुछेक  को छोड़कर बाकी सभी अधिकारियों का कम से कम तीन या चार बार तबादला हो चुका है. कुछ तो ऐसे भी हैं जिनकी बदली छ: बार तक हो चुकी है. अब तक कुल 1,250 स्थानांतरण हो चुके हैं.. 

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के मनमाने तबादलों और नियुक्तियों को रोकने के लिए सिविल सर्विस बोर्ड है. अगर आईएएस अधिकारियों से संबधित नियमों को देखें तो अधिकारियों की तैनाती कम से कम दो या तीन साल लिए होनी चाहिए. इस मामले में अपवाद केवल तभी हो सकता है जब कमेटी की स्वीकृति या इसकी कोई जगजाहिर वजह हो. इस तरह नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है. लेकिन जब इस बाबत पूर्व सचिव (नियुक्ति और कार्मिक) अनूप चन्द्र पांडे से पूछा गया तो उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. 

अधिकारियों को सरकारी दंड के तौर पर पोस्टिंग के लिए 100 दिनों का इंतजार भी करना पड़ता है. मायावती के डर की वजह से अपना नाम न बताने की गुजारिश के साथ एक और प्रधान सचिव कहते हैं ‘जब सरकार अच्छे काम करने वाले अधिकारियों को दण्डित करती है तो बेहतर प्रशासन की संभावना खत्म हो जाती है.’ उत्तर प्रदेश में विभागों में मुख्यमंत्री और कैबिनेट सचिव की ओर से स्पष्ट मौखिक आदेश हैं कि वे मीडिया से किसी मुद्दे पर बात न करें.

उत्तर प्रदेश के आईएएस एसोसिएशन ने राज्य की मनमाने तबादले की नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन एसोसिएशन के अध्यक्ष एके रस्तोगी के दबाव में उसे वापस ले लिया गया. सेवानिवृत सरकारी अधिकारियों के एक संघ ‘लोक प्रहरी’ के महासचिव और सेवानिवृत अधिकारी एसएन शुक्ला कहते हैं, “हमने नेताओं के शिकंजे से निकलने का एक बढ़िया मौका खो दिया.”  

हालांकि कुछ अधिकारी अब भी मानते हैं कि अब भी सब कुछ लुटा नहीं है. नाम न छापने की शर्त पर 1982 बैच के एक आईएएस अधिकारी कहते हैं, ‘हालांकि विश्वसनीयता और प्रभाव घटने की वजह से कैडर मुश्किल दौर से गुज़र रहा है और उसके ऊपर बेइमानी के आरोप लग रहे हैं, लेकिन फिर भी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर नौकरशाह आज भी ईमानदार, निष्पक्ष और अराजनीतिक हैं.”

उत्तर प्रदेश में नौकरशाही के राजनीतिकरण पर विश्व बैंक भी चिंतित है। जून 2008 में उत्तर प्रदेश पर जारी बैंक की एक रिपोर्ट कहती है, “सिविल सेवाओं का राजनीतिकरण और सरकारी अधिकारियों का बारबार तबादला उत्तर प्रदेश में एक ऐतिहासिक समस्या रहा है।”

मगर इसके बावजूद आज भी यूपी कैडर में कुछ बेहतरीन आईएएस अधिकारी हैं जिन्हें अगर थोड़ी सी आजादी दी जाए तो वे राज्य की बदहाल तस्वीर को पूरी तरह से बदल सकते हैं. यूपीआईएएसए के एक कार्यकारी अधिकारी कहते हैं, “कुछेक राजनैतिक लोगों की आलोचना करने की बजाय हमें उन बहुत से लोगों को भी देखना चाहिए जो अपनी सेवाओं से व्यवस्था को सकारात्मक दिशा में बढ़ाने की सार्थक कोशिश कर रहे हैं.” 

श्रवण शुक्ला 

दो कविताएं

योग

योग कहीं भी कभी भी

एक लंबी सांस लीजिए

थोड़ा धैर्य रखिए,

दूसरे के अपशब्दों को

उसके संस्कारों का

छिछलापन मानकर

भूल जाईये,

उनके बारे में सोचिए

जो आपको पसंद हैं,

उनकी खुशी को

महसूस करिए

जिनकी सरलता से

आपको खुशी मिलती हो,

अब सांस छोड़ दीजिए

और

खुद के अंदर छिपी

अथाह शांति को

महसूस कीजिए…

सरकारी स्कूल की दीवारें

सरकारी स्कूलों की

दीवारें अक्सर

ज्यादा उंची नहीं होती

बड़ा आसान होता है

उन्हें यूं ही फांदा जाना

मुझे अपने

स्कूल की दीवार कभी ज्यादा

ऊंची नहीं लगी

सरकारी तंत्र की हवा

आसानी से यहां आती जाती रही

जाति..धर्म का एहसास

मास्टरों के दिमाग से होता हुआ

अक्सर मेरे अंदर

घुसपैठ करता रहा

भ्रष्टाचार को

गुरु शिष्य परम्परा

के लबादे में..

कई बार सरकारी स्कूल की दीवारें

फांद कर आते देखा..

मास्टरो की डांट

अक्सर

स्कूल की दीवारें

फांद कर उनके घरों में

ट्यूशन पढ़ने के लिए

मजबूर करती रही..

आज भी जब अपने स्कूल

की ओर से गुजरता हूं

तो अपने भीतर की

एक छोटी दीवार का

एहसास हो जाता है…

                           सुबोध राय

सुबोध एक निजी न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं.

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संयोग से शहंशाह

ये 1987 का साल था. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ी भुट्टो खानदान की उत्तराधिकारी बेनजीर ने अचानक ये ऐलान करके सबको चौंका दिया कि उन्होंने अपनी मां नुसरत द्वारा खोजे गए एक नौजवान से निकाह के लिए हामी भर दी है. 

मगर बेनजीर से कहीं ज्यादा ये निकाह जरदारी की जिंदगी को बदलने वाला था. 20 साल पहले जब इस शादी की घोषणा हुई थी तो एक सिंधी उद्योगपति के बेटे जरदारी के भव्य अंदाज ने दिल के आकार वाले हीरे और नीलम जड़ी अंगूठी के लिए सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. इसके बाद 18 दिसंबर 1987 यानी करीब छह महीने तक वो बिना नागा हर दिन लाल गुलाबों का गुलदस्ता बेनज़ीर को भेजते रहे.

इसके करीब 22 साल बाद 27 दिसंबर 2007 को जरदारी की उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी का एक और अध्याय तब शुरू हुआ जब बेनज़ीर की हत्या हो गई. भाग्य के मनमौजी खेल से भरी जरदारी की जिंदगी की कहानी इतनी अजीब है कि जाने-माने किस्सागो भी ठहर कर सोचने लग जाएं. ये तो समझा जा सकता है कि बेनजीर की उथल-पुथल से भरी जिंदगी ज़रदारी की जिंदगी को भी कई उतार-चढ़ावों से भर देगी लेकिन कोई ये नहीं सोच सकता था कि बेनज़ीर की असमय मौत उन्हें देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचा देगी. शिखर तक की आसिफ अली जरदारी की इस असाधारण छलांग को आंकने में इतिहास को लंबा वक्त लगेगा.

प्लेब्वॉय, पोलो प्लेयर, मिस्टर टेन परसेंट…ये वो चंद विशेषणों में से हैं जो 53 वर्षीय जरदारी के नाम के साथ उनकी जिंदगी के अलग-अलग दौर में चस्पा होते रहे हैं. इसकी शुरुआत 1987 में तब हुई थी जब पाकिस्तान में हर कोई जानना चाहता था कि ये शख्स कौन है. जवाब बहुत खुश होने लायक नहीं था. एक सिनेमा हाउस के मालिक के इस बेटे की छवि लड़कियों के पीछे भागने वाले एक शख्स की थी, ऐसा शख्स जिसे पार्टियों का शौक था और जिसने घर में ही चमचमाती लाइटों वाला एक डिस्को तक बना रखा था, जिसने पढ़ाई के नाम पर ग्रेजुएशन तक नहीं किया था और जो निश्चित रूप से देश की सबसे योग्य और प्रतिभाशाली लड़की के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता था. The princess and theplayboy Zardari andBenazir Bhutto in 1989

हालांकि बेनजीर को जरदारी से तालमेल बिठाने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. उनका नजरिया साफ था, वे न सिर्फ अपने माता-पिता बल्कि अपने मजहब के प्रति भी अपने कर्तव्यों से बंधी हुई थीं. वे अक्सर कहा करती थीं, मुहब्बत शादी के बाद हो जाएगी”. और वो बिना देर लगाए ये संकेत भी देती थीं कि भले ही उनका शौहर दूसरे मानदंडों पर खरा नहीं उतरता हो मगर अहम ये है कि वो इस बात को समझता था कि उनकी विरासत उनसे सामाजिक और राजनीतिक दुनिया में पूरी तरह से डूब जाने की मांग करती है.

जरदारी भले ही आज अपनी पसंदीदा फिल्म गॉडफॉदर के मुख्य चरित्र जैसी भूमिका में आ गए हों मगर उन दिनों उन्हें अपनी पत्नी की छाया में एक बढ़िया जिंदगी बिताने से कोई परहेज नहीं था. इसके बदले में तब मार्ग्रेट थचर के नक्शे कदम पर चलने की कोशिश कर रहीं बेनजीर ने जरदारी को लेकर अपनी शंकाओं को ज्यादा तूल नहीं दिया. अपनी आत्मकथा डॉटर ऑफ द ईस्ट में उन्होंने लिखा है कि किस तरह अपने हा पब्लिक प्रोफाइल की वजह से वो अपने जीवनसाथी की तलाश उस तरह से नहीं कर सकीं जैसे आमतौर पर दूसरे लोग किया करते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने तय कर लिया था कि वे परिवार द्वारा तय जीवनसाथी के लिए हामी भरने के लिए तैयार हैं, भले ही उन्हें इसकी कुछ भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

जब बेनजीर ने अपना पहला चुनावी अभियान शुरू किया उस वक्त उनका बेटा बिलावल सिर्फ दो महीने का ही था. इसकी परिणति दिसंबर 1988 में उनके किसी इस्लामी देश की सबसे कम उम्र की महिला प्रधानमंत्री बनने के रूप में हुईं. इधर, अपने पिता की फांसी के नौ साल बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को अपने दम पर सत्ता में लाने वाली बेनजीर सत्ता का केंद्र बन गई थीं और उधर, जरदारी प्रधानमंत्री का पति होने के भरपूर फायदों का आनंद ले रहे थे. पाकिस्तानी मीडिया में अक्सर सीमित संपत्ति और सीमित शिक्षा वाले एक व्यक्ति के रूप में जाने जाने वाले जरदारी को सत्ता काफी नशीली चीज लग रही थी. डिजाइनर कपड़े, विदेशी कारें और महंगी घड़ियां अचानक उनके लिए छोटी-छोटी चीजें हो गईं थीं और वे अब बड़े सौदों के बड़े खेल खेलने लगे थे. ये वही वक्त था जब जरदारी को मिस्टर टेन परसेंट भी कहा जाता था, जो इस बात का संकेत था कि फाइल को आगे बढ़ाकर सौदे को मुकाम तक पहुंचाने में जरदारी का कितना हिस्सा रहता था.

मगर बतौर कमीशन टेन परसेंट भी उस शख्स के लिए बहुत छोटी रकम प्रतीत होती है जिस पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे और साबित भी हुए, उस पोलो खिलाड़ी के लिए, जिसने खुद माना कि ब्रिटेन के सरे में 350 एकड़ में फैला और 45 लाख पाउंड्स की कीमत वाला भव्य एस्टेट उसका है. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने तो उन पर तीखा हमला करते हुए मीडिया को इस एस्टेट का बिवरण देते हुए बताया था कि ये लाहौर के किले से भी दस गुना बड़ा है. अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस एस्टेट पर कई लेख छापे और उनमें पारिवारिक और बैंक दस्तावेजों का भी अनेकों बार हवाला दिया गया. अखबार के रिपोर्टर जॉन बर्न्स ने इस जानकारी को इस साल प्रकाशित होने वाली किताब गुडबा शहजादी के लेखक श्याम भाटिया के साथ भी बांटा. ऑक्सफोर्ड के दिनों से बेनज़ीर के अच्छे दोस्त भाटिया लिखते हैं, बेनजीर की मौत के बाद बर्न्स ने मुझे अपनी जांच की पृष्ठभूमि के बारे में बताया. जब बर्न्स उनके द्वारा हासिल दस्तावेजों पर जरदारी की प्रतिक्रिया लेने पहुंचे तो जरदारी कराची की जेल में थे. प्रतिक्रिया देने से पहले वे10 मिनट तक दस्तावेजों को देखते रहे और फिर कहा कि मुझे इन्हें देखने की जरूरत नहीं है. मेरे पास इनकी मूल प्रति है. बर्न्स इसके बाद बेनजीर से मिलने गए जो उस समय विपक्ष की नेता थीं. जब बर्न्स ने उन्हें उन दस्तावेजों और जरदारी की प्रतिक्रिया के बारे में बताया तो वे सुबकने लगीं. उन्होंने पूछा, आप मेरे साथ ऐसा क्यूं कर रहे हैं. मेरे परिवार के साथ इतना कुछ हुआ है. मेरे पिता मारे गए, मेरे भाइयों की हत्या हुई…

पाकिस्तान में भ्रष्टाचार की कहानियां आम हैं. और जरदारी के औपचारिक रूप से देश का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने के साथ एक बार फिर से ये कहानियां चर्चा में हैं. कराची से सरे, सरे से न्यूयॉर्क और फिर वापस पाकिस्तान तक की जरदारी की यात्रा में जितने संयोग हैं उतने ही दाग भी. उन्हें और बेनजीर को 2003 में स्विटजरलैंड की एक अदालत ने काला धन जमा करने का दोषी पाया था. जरदारी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की थी जिस पर इस साल सुनवाई होनी थी. मगर जैसे ही पीपीपी ने जरदारी को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में नामांकित किया विवादास्पद रूप से स्विटजरलैंड प्रशासन ने ये मामला ही बंद कर दिया.Zardari and Nawaz

गौरतलब है कि इस मामले में जज डैनियल डिवाउड ने जरदारी और बेनजीर को दोषी करार देते हुए फैसला सुनाया था कि वे स्विस खातों में फ्रीज किए गए एक करोड़ दस लाख डालर पाकिस्तान को वापस करें.

जरदारी की जिंदगी में ऐसे कई मोड़ आए. उन्हें पहली बार 1990 में गिरफ्तार किया गया. तब उनकी शादी को सिर्फ दो साल हुए थे और बेनजीर की पहली सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था. जरदारी पर तब ब्लैकमेल का आरोप लगा था. कहा गया था कि उन्होंने ब्रिटेन में रह रहे एक पाकिस्तानी व्यापारी मुर्तजा बुखारी के पैर में रिमोट कंट्रोल से संचालित एक बम लगा दिया था और उसे हुक्म दिया था कि वो बैंक में जाए और अपने अकाउंट से पैसा निकालकर लाए. मगर 1993 में बेनजीर के फिर से सत्ता में आने के बाद ये मामला बंद कर दिया गया और जरदारी आजाद हो गए.

ये साफ हो चुका था कि बेनजीर के लिए सार्वजनिक और निजी जीवन के मापदंड अलग-अलग थे. जरदारी की कहानियां पाकिस्तान में लोगों की जुबान पर चढ़ रही थीं और कई लोग इस विडंबना को महसूस कर रहे थे कि किस तरह बेनजीर अपने पिता की उस चेतावनी को भूल गईं जिसमें कहा गया था कि मामला जब पैसे और जीवनशैली का हो तो सत्ता में रहने वालों और उनके परिवारों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए. 1978 में जुल्फिकार के कहने पर बेनजीर ने न्यूयॉर्क में रह रहे अपने भाई मुर्तजा को एक चिट्ठी भेजी थी. इसमें उन्होंने लिखा था, “यहां प्रेस में कहा जा रहा है कि तुम लंदन में विलासिता से रह रहे हो. पापा जानते हैं कि ऐसा नहीं है मगर वे तुम्हें याद दिलाना चाहते हैं कि निजी जिंदगी को लेकर तुम्हें सबसे ज्यादा सतर्कता बरतनी चाहिए. न फिल्में, न फिजूलखर्ची, वरना लोग कहेंगे कि जब तुम्हारे पिता जेल की कालकोठरी में सड़ रहे थे तो तुम जिंदगी का लुत्फ उठा रहे थे.”

अपने पिता को खोने के बाद बेनजीर को मुश्किल भावुक फैसले करने पड़े. उनके लिए जुल्फिकार उनके मार्गदर्शक, आदर्श सब कुछ थे. अपनी जीवनी में उन्होंने उस शून्य और अकेलेपन के बारे में लिखा है जो जुल्फिकार की फांसी के बाद उनके जीवन में आ गया था. उन्होंने ये भी लिखा है कि किस तरह से जरदारी से निकाह के लिए हामी भरने में इस अकेलेपन की भी भूमिका थी. ये बात भी सबको पता है कि भले ही जरदारी एक राजनीतिक बोझ थे मगर उन्होंने बेनजीर को अपना पूरा समर्थन दिया. बेनजीर अक्सर अपने दोस्तों से बात करते हुए जरदारी के इस पक्ष की तारीफ करती थीं. शायद इसे जरदारी की खूबी ही कहा जाएगा कि वे उस देश में एक बेहद सफल महिला के पृष्ठभूमि में रहने वाले पति की भूमिका में भी संतुष्ट थे जहां महिलाओं को उनके पति की सहमति के बिना बैंक खाते खोलने तक की इजाजत नहीं थी. (बेनजीर की कई मानवाधिकार गुटों ने इस बात के लिए आलोचना भी की कि उन्होंने अपने पहले प्रधानमंत्रित्वकाल में इसके लिए कुछ नहीं किया). जरदारी ने उनकी जिंदगी के शून्य को भर दिया था. वो शून्य जो पिता की फांसी, शादी से पहले सबसे छोटे भाई शाहनवाज की फ्रांस में हुई मौत और दूसरे भाई मुर्तजा, जिन्हें जनरल जिया ने पाकिस्तान से खदेड़ दिया था, से जुदा होने के बाद उनकी जिंदगी में आया था.

पैसा बटोरने में माहिर जरदारी अगर राजनीतिक नहीं तो राजनीतिक रूप से जागरूक हो गए हैं ये 1994 में तब साफ हो गया जब मुर्तजा ने पाकिस्तान लौटने का फैसला किया. मुर्तजा की बेटी फातिमा भुट्टो के मुताबिक बेनजीर लगातार अपने भाई को ये कहते हुए न लौटने के लिए मनाती रहीं कि उन्हें उन पर चल रहे मामलों को ठिकाने लगाने के लिए कुछ वक्त की जरूरत है. गौरतलब है कि मुर्तजा पर आतंकवाद का मुकदमा चल रहा था. फातिमा और उनकी मां घिनवा का मानना है कि बेनजीर के फैसलों के पीछे जरदारी का हाथ था. मुर्तजा, जरदारी को ज्यादा भाव नहीं देते थे. इस नापसंदगी के पीछे की वजह सिर्फ यही नहीं थी कि उनके मन में जरदारी की छवि एक अमीर प्लेब्वॉय की थी. इसकी ज्यादा बड़ी वजह ये थी कि पीपीपी के अपनी विचारधारा यानी सामाजिक न्याय की लड़ाई के रास्ते से भटकने के लिए वे जरदारी को ही जिम्मेदार मानते थे.

मगर जब वापस आने पर मुर्तजा ने पाया कि उनके और जरदारी के बीच के टकराव में बेनजीर, जरदारी के साथ खड़ी हैं तो उन्होंने अपनी बहन की आलोचना शुरू कर दी. उन दिनों बेनजीर की मां नुसरत भुट्टो चाहती थीं कि मुर्तजा को सिंध का मुख्यमंत्री बना दिया जाए. बेनजीर और जरदारी ने इसके जवाब में नुसरत को पीपीपी के चेयरमैन पद से हटा दिया. अब तक जरदारी बेनजीर के जीवनसाथी से उनके राजनीतिक सलाहकार में तब्दील हो चुके थे. मुर्तजा की पाकिस्तान वापसी के करीब दो साल बाद सितंबर 1996 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. इस हत्या का आरोप जब जरदारी पर लगा तो ज्यादातर लोगों को हैरानी नहीं हुई. समूचे पाकिस्तान के मन में एक ही सवाल था. आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि प्रधानमंत्री का सगा भाई पुलिस मुठभेड़ में मारा जाए? बात साफ थी कि बिना राजनीतिक नेतृत्व की मर्जी के ऐसा नहीं हो सकता था. हर कोई इस बारे में चर्चा कर रहा था कि कैसे मुठभेड़ के बाद बिना कोई समय गंवाए उस जगह को पूरी तरह साफ कर दिया गया था.Zardarileaves a court in 1998

आज पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन चुके जरदारी को अपने खिलाफ मामलों के खुलने की चिंता न के बराबर होगी क्योंकि उन्होंने पहले से ही इसका प्रबंध कर लिया है. हालांकि कुछ लोग अब भी ये मानते हैं कि जरदारी अपने अतीत से पीछा कभी नहीं छुड़ा सकते. द डेली टाइम्स के प्रधान संपादक नजम सेठी कहते हैं, अतीत उनसे किसी जोंक की तरह चिपका हुआ है. मगर उन्होंने सत्ता के सफर में इसका बोझ खत्म करके असाधारण राजनीतिक दक्षता का परिचय दिया है.” 

बात कुछ हद तक सही भी लगती है. जरदारी कितने कुशल हो चुके हैं इसका अंदाजा इस बात से मिल जाता है कि स्विटजरलैंड सरकार ने भी उनके खिलाफ मामला बंद कर दिया. घरेलू मोर्चे पर उनकी पत्नी ने उनकी मुसीबतें खत्म करने के लिए आखिरी बड़ा काम तब किया जब अपनी पाकिस्तान वापसी पर सौदेबाजी करते हुए उन्होंने मुशर्रफ को विवादास्पद नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस के लिए राजी कर लिया. इसके तहत उनके और जरदारी के खिलाफ चल रहे सारे मामले वापस ले लिए गए.

जरदारी का ये कौशल ये भी दर्शाता है कि उन्होंने राजनीति में डूबी अपनी पत्नी को देखकर भी काफी कुछ आत्मसात किया. कुछ समय पहले तहलका के साथ एक साक्षात्कार में जब हमने जरदारी से वंशवादी राजनीति के बारे में पूछा था तो उन्होंने कहा था कि ऐसे परिवारों में लोग बेहतरीन उस्तादों द्वारा तालीम पाते हैं. आखिरकार इंदिराजी ने नेहरू साहब से प्रशिक्षण पाया था और उनके लिए उनसे बड़ा उस्ताद दूसरा कोई नहीं हो सकता था. फिर इंदिराजी ने राजीव और संजय को सिखाया और राजीव ने राहुल और प्रियंका को. बिलावल और मेरे दूसरे बच्चों के लिए मोहतरमा से बड़ा उस्ताद कौन हो सकता था? उन्होंने उनके कदमों तले तालीम पाई है.

साक्षात्कार के दौरान जरदारी ने गांधी परिवार का उल्लेख दो बार किया था. उस समय उन्होंने पीपीपी की कमान संभाली ही थी और सोनिया गांधी से अपनी तुलना पर उन्होंने कहा था, मैं सोनिया गांधीजी जितना बड़ा कभी नहीं हो सकता. उन्होंने बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को मार्गदर्शन दिया है. मैं तो अभी शुरुआत ही कर रहा हूं. इसलिए मैं शायद ये उम्मीद या इच्छा नहीं कर सकता कि मेरी तुलना इतनी महान महिला से की जाए.दिलचस्प है कि सोनिया गांधी ने खुद को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष होने तक सीमित कर लिया और जरदारी कुशलता से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए.

जरदारी ने अपने सफर के इस हिस्से में इतनी कुशलता का परिचय दिया कि दो बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रह चुके नवाज शरीफ भी मात खा गए.

मगर सवाल उठता है कि राष्ट्रपति का पद क्यों? एक कारण तो साफ है: पाकिस्तान में राष्ट्रपति को कानून से सुरक्षा मिलती है. मगर फिर सवाल उठता है कि जरदारी को तो इसकी जरूरत ही नहीं क्योंकि वो हर मुश्किल को पहले ही खत्म कर चुके हैं. उनके करीबी लोग बताते हैं कि पाकिस्तान की राजनीति में हर खिलाड़ी की ये प्रवृत्ति होती है कि वो ज्यादा से ज्यादा शक्तियां अपने हाथ में लेने की कोशिश करता है. जैसा मुशर्रफ पिछले नौ सालों से कर रहे थे. दूसरी बात ये है कि जरदारी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे क्योंकि वो स्नातक ही नहीं हैं जिसके बिना कोई भी पाकिस्तानी नागरिक नैशनल असेंबली का सदस्य ही नहीं हो सकता. उनके करीबी ये भी बताते हैं कि जरदारी को अपनी सुरक्षा की भी चिंता है. राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया के दौरान जरदारी इस्लामाबाद स्थित अपना घर छोड़कर प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के आधिकारिक आवास में रहने लगे थे. बेनजीर की हत्या से बुरी तरह हिल चुके जरदारी अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा क लेकर बेहद चिंतित थे.Mr President Zardari,flanked by daughtersBakhtawar (left) andAsifa, addresses MPs

जरदारी ने राष्ट्रपति चुनाव में अपने प्रतिद्वंदियों को भारी अंतर से हराया और उनकी इस जीत को लोकतांत्रिक और विश्वसनीय कहा जा रहा है. वे पाकिस्तान के पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जो इस तरह से चुने गए हैं. उनके पास सरकार और सैन्य प्रमुख को बर्खास्त करने और अहम नियुक्तियों की शक्ति है. नौ सितंबर को शपथ ग्रहण समारोह के बाद अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में उनका कहना था, मेरी शक्तियां कम करना संसद के हाथ में है. संसद की अहमियत राष्ट्रपति से ज्यादा होगी.मगर पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी और तहरीके-इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान कहते हैं, जरदारी ने अपने फायदे के लिए देश की संप्रभुता को दांव पर लगा दिया है.पूर्व पीपीपी सीनेटर और स्तंभकार शफकत महमूद कहते हैं, जरदारी एक राजनीतिक पार्टी के मुखिया भी हैं जबकि राष्ट्रपति को राजनीति और विवादों से दूर रहना चाहिए.

साफ तौर पर लगता है कि जरदारी ने अपनी पत्नी के अनुभवों से सबक सीखा है जिन्हें दो बार प्रधानमंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया गया था. बेनजीर अक्सर शिकायत किया करती थीं कि उनके पास पद तो है मगर शक्ति नहीं. जरदारी ने सुनिश्चित किया है कि उन्हें ऐसी कोई शिकायत न रहे. आज अगर नवाज शरीफ ये कह रहे हैं कि जरदारी ने उन्हें धोखा दिया है तो ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वो जरदारी की उस रणनीति को समझ नहीं पाए जिसके तहत उन्होंने मुशर्रफ को तो हटा दिया मगर बर्खास्त जजों की बहाली नहीं की. इनमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी भी शामिल हैं जो अगर बहाल हो जाते तो विवादास्पद नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस को रद्द कर सकते थे जिसके तहत जरदारी पर लगे आरोप हटा लिए गए थे.

जरदारी के विवादास्पद अतीत से कहीं ज्यादा उनके देशवासियों को उन शक्तियों से डर लग रहा है जो उन्हें मिल गई हैं. कराची स्थित जाने-माने राजनीतिक अर्थशास्त्री अकबर जैदी कहते हैं, भ्रष्टाचार की तो कोई परवाह ही नहीं करता क्योंकि पाकिस्तान में हर कोई भ्रष्ट है. मगर संसदीय व्यवस्था वाले इस देश में वो बतौर राष्ट्रपति कुछ ज्यादा ही शक्तिशाली हो गए हैं. ऐसा लगता है कि उन्होंने अपना सबक बहुत जल्दी सीख लिया है. वे लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए मुशर्रफ हैं. ये एक आश्चर्य है कि ये देखने के बाद भी कि 1999 में तख्तापलट के बाद मुक्तिदाता करार दिए गए मुशर्रफ का हश्र क्या हुआ, कोई इस पद पर बैठना चाहेगा. जरदारी को अब खुद को मुक्तिदाता साबित करना होगा.नजम सेठी भी कुछ यही बात दोहराते हुए कहते हैं, उनकी सबसे बड़ी चुनौती कट्टरपंथ से उपजे आतंकवाद का मुकाबला करने की है. घर में स्थिरता और भारत व अमेरिका से अच्छे रिश्ते इसी बात पर निर्भर करेंगे. अर्थव्यवस्था को संकट से उबरना भी इसी बात पर टिका है.”

आतंकवाद और आर्थिक संकट दो ऐसे मुद्दे हैं जिनपर तुरंत कुछ किए जाने की जरूरत है. इस साल फरवरी में हुए चुनाव मुशर्रफ के खिलाफ जनादेश साबित हुए जिनकी अमेरिका का पिट्ठू बनने के लिए काफी समय से आलोचना हो रही थी. जरदारी को भी इसी अहम इम्तहान से गुजरना होगा. पाकिस्तान को अमेरिकी मदद की जरूरत है और इसलिए वह आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का विरोध करने की स्थिति में नहीं है. और ये वही कारक है जिसने मुशर्रफ को बेहद अलोकप्रिय बना दिया था. मुशर्रफ का कोई राजनीतिक प्रतिद्वंदी नहीं था क्योंकि उन्होंने ऐसी सारी शख्सियतों को निर्वासित कर दिया था. जरदारी के सामने नवाज शरीफ हैं जो ये देखने के लिए इंतजार कर रहे हैं कि बर्खास्त जजों की बहाली के मुद्दे पर जरदारी क्या करते हैं. हो सकता है वे सबको हैरानी में डालते हुए इफ्तिखार चौधरी को बहाल कर दें मगर ज्यादातर लोगों को इसकी संभावना कम ही लगती है.

मुशर्रफ की नौ साल की तानाशाही के बाद जरदारी की जनसंपर्क मशीनरी दिन-रात एक कर उन्हें ऐसे राष्ट्रपति के रूप में पेश करने की कोशिश में लगी है जिसे लोगों ने चुना है. यहां तक के सफर में उनकी तकदीर की बड़ी भूमिका रही है. अब उनके पास एक दुर्लभ मौका है. यहां से वे जो भी करेंगे उस पर तकदीर से ज्यादा उनकी मर्जी की मुहर होगी. आसिफ अली जरदारी के अजीब मगर असाधारण घटनाओं से भरे सफर के आखिरी अध्याय में अब भी कई मोड़ बाकी हैं.

हरिंदर बवेजा