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'सिर्फ उदारीकरण हल नहीं है'

नए साल में भारत के सामने मुख्य रूप से कौन-कौन सी चुनौतियां हैं?

चुनौतियां कईं हैं. कुछ परंपरागत हैं और कुछ नईं. परंपरागत चुनौतियों में से एक ये भी है कि हमारे लोकतंत्र की कार्यप्रणाली और मजबूत बने. देश में जल्द ही चुनाव होने को हैं, इनमें आम जनता की व्यापक भागीदारी बेहद जरूरी है. यह भी महत्वपूर्ण है कि धर्मनिरपेक्षता, सुरक्षा, आर्थिक विकास और गरीबी हटाने, समता तथा निरक्षरता जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया जाए. चुनाव इस बात का सही मौका होगा कि जातिगत समीकरणों के बजाय इन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाए.

एक और पुरानी चुनौती है लोगों को अभावों से छुटकारा दिलाना. देश में करोड़ों लोग भुखमरी, कुपोषण, स्कूली शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं. राजनीतिक दलों को फौरन इस तरफ ध्यान देना चाहिए. पिछले साल अगस्त में संसद में दिए अपने भाषण के दौरान मैंने जिक्र किया था कि कैसे कभी-कभी मैं इस बात से बेहद निराश होता हूं कि सरकार पर उन मुद्दों को लेकर ज्यादा दबाव नजर आता है जिनका सरोकार आबादी के एक छोटे से हिस्से से होता है मसलन भारत-अमेरिका परमाणु समझता या फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतें. दूसरी तरफ तरह-तरह के अभावों से जूझ रहे आबादी के एक बड़े हिस्से की अक्सर उपेक्षा देखने को मिलती है.

वैश्विक आर्थिक मंदी भी एक बड़ी चुनौती है जो भारत के लिए मुश्किलें पैदा करेगी, हालांकि इस साल भारत में इसका इतना बुरा असर देखने को नहीं मिला लेकिन साल 2009 में स्थितियां बदतर हो सकतीं हैं. मुझे आशंका है कि विकास दर, जो कि पहले ही नौ से घटकर सात फीसदी के स्तर पर आ गई है, आगे गिरकर पांच या छह फीसदी तक पहुंच सकती है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस आंकड़े को खराब नहीं कहा जा सकता मगर अहम बात ये है इस मंदी की मार पहले से ही साधनहीन वर्ग पर ज्यादा पड़ेगी.

जैसा कि आपने कहा था कि बाजार पर अतिनिर्भरता का इस आर्थिक मंदी में खासा योगदान है, तो क्या अब मुक्त बाजार की अवधारणा पर दोबारा विचार करने की जरूरत है?

भारत के संदर्भ में मामला कुछ और जटिल है. बाजार पर अतिनिर्भरता वाली बात अमेरिका के बारे में कही गई थी. वहां पर राज्य की निगरानीवाली भूमिका बहुत हद तक खत्म हो चुकी थी. अमेरिका में सब-प्राइम ऋण जैसी वित्तीय गतिविधियां संचालित की जा रही थीं. इन पर किसी तरह का कोई नियम भी लागू नहीं था. इस तरह से ये जोखिम भरे ऋण जल्दबाजी में बेच दिए गए. अब ऐसे में आप पता नहीं लगा सकते कि किसने, किसके साथ कितना गलत किया.

जहां तक भारत का सवाल है तो यहां बाजार पर निर्भरता जरूरत से ज्यादा नहीं बल्कि कम ही थी. यहां जो सबसे खतरनाक बात हुई है वो है स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षातंत्र का जल्दबाजी में किया गया निजीकरण. राज्य द्वारा दी जा रही निम्नस्तरीय प्राथमिक शिक्षा और खराब स्वास्थ्य सेवाओं ने स्थितियों को और जटिल बना दिया है. इसका मतलब है कि धनी लोग ही निजी शिक्षा संस्थानों और निजी अस्पतालों का उपयोग कर सकते हैं और सरकार पर इन मुद्दों को लेकर कोई दबाव नहीं है. स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में स्थिति इसलिए ज्यादा खराब है कि जो लोग इस व्यवसाय में हैं उन्हें मरीजों की फिक्र ही नहीं होती, इस हिसाब से निजी क्षेत्र में कोई बुराई नहीं है पर ये समस्या का हिस्सा जरूर है. लेकिन इससे बड़ी समस्या सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमता है.

यदि आप यूरोप, अमेरिका, कनाडा, जापान, दक्षिण कोरिया की बात करें तो आप देखेंगे कि इन सारे देशों में पूर्ण साक्षरता, सरकार संचालित प्राथमिक शिक्षा तंत्र के माध्यम से ही आ पाई है. और इन सभी देशों में अमेरिका के अलावा बाकी देशों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा सरकारी तंत्र के अंतर्गत ही उपलब्ध कराई जाती है.

ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी नीतियों का झुकाव कॉर्पोरेट भारत के पक्ष में है, ऐसे में क्या आपको लगता है कि हमारे राजनेता इस दिशा में कुछ काम करेंगे?

ये बात सही है कि कॉर्पोरेट भारत और आम जनता के हितों के बीच संतुलन नहीं है और पलड़ा कॉर्पोरेट भारत के पक्ष में झुका हुआ है. लेकिन चुनाव और मीडिया की आलोचना आम जनता को ये मौका देते हैं कि वे इन मुद्दों पर अपना मत व्यक्त कर सकें. हालांकि हर पांच साल की बजाय इन मुद्दों को लगातार उठाया जाना जरूरी है. हमें लगातार निम्नस्तर की बुनियादी शिक्षा और घटिया स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठाना पड़ेगा ताकि राजनेताओं को ये समझ आ सके कि अभी बहुत से क्षेत्र बचे हुए हैं जिनमें उन्हें काम करके दिखाना है.

आपने कहा था कि शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी निवारण के लिए और वित्त मुहैया कराना चाहिए. हालांकि सरकार के सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, किसान कर्जमाफी योजना) का कोई खास नतीजा नहीं मिल पा रहा है. आपके हिसाब से ठोस नतीजों को लिए क्या किया जाना जरूरी है?

ऐसा नहीं है कि इन कार्यक्रमों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. यदि आप राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की बात करें तो ये सही है कि इसमें कई समस्याएं सामने आ रही हैं. लेकिन कुछ राज्यों में ये सफलतापूर्वक भी लागू की गई है. इसके अलावा एकीकृ त बाल विकास योजना भी कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु में सफलतापूर्वक संचालित की जा रही है लेकिन कुछ जगह इसे सफलता नहीं मिली है. सो हमें इन कार्यक्रमों की असफलता के कारणों को खोजना होगा.

वित्त की कमी निश्चित रूप से एक समस्या है और इसे दूर करना बहुत जरूरी है. साथ में इन कार्यक्रमों के प्रशासन और वितरण प्रणाली में भी सुधार की आवश्यकता है. तमिलनाडु और केरल ने सबसे अच्छी वितरण प्रणाली का विकास किया है जो कि और कहीं संभव नही हो पाया है. पं बंगाल में यह तंत्र कहीं बीच की स्थिति में है.

साल 1998 में जब मुझे नोबेल पुरस्कार मिला था उस दौरान मैंने ‘प्रतिची’ नाम की संस्था बनाई थी, यह प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रही है. इसी के साथ काम करते हुए मुझे लगा कि विभिन्न यूनियनों के सहयोग से सकारात्मक बदलाव आ सकता है. हम प्राइमरी टीचर असोसिएशन के साथ काम कर रहे हैं ये प्राथमिक विद्यालयों में सबसे बड़ा संगठन है. इस क्षेत्र में की गई अपनी रिसर्च के नतीजों के हिसाब से मेरे गृह जिले बीरभूम के प्राथमिक विद्यालयों में उपस्थिति 50 फीसदी से बढ़कर 80 फीसदी हो गई है, इसी तरह से अन्य जिलों में भी वृद्धि हुई है. मुझे लगता है कि हमें भारत में संगठनात्मक अवधारणा में परिवर्तन की जरूरत है. हमारे यहां सार्वजनिक क्षेत्र का कृषि और सहकारी खेती में निराशाजनक प्रदर्शन है जबकि अन्य उद्योगों में भी इसे मुश्किल से ही सफल कहा जा सकता है. लेकिन कुछ अन्य उद्योगों जैसे रेलवे का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर है.

दरअसल सबसे गंभीर समस्याएं स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल विकास के मोर्चे पर हैं.मेरे हिसाब से हमें इन मुद्दों पर विभिन्न यूनियन से सहयोग की जरूरत है और इसके लिए आवश्यक है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएं, न सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि यूनियन के स्तर पर भी. विभिन्न यूनियनों को सिर्फ उनके सदस्यों के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए बल्कि अपनी सोच और काम के  दायरे में समुदाय और देश को भी शामिल करना चाहिए. इसी तरह से आम लोगों को भी हमेशा यूनियनों को संदेह की नजर से नहीं देखना चाहिए. लोग मानते है कि यूनियनों के माध्यम से शायद ही कोई अच्छा काम हो सकता है. हमें इस धारणा में बदलाव की जरूरत है इसके साथ ही यूनियनों को भी इस तरह से काम करना होगा ताकि लोगों का उन पर भरोसा बना रहे.

बहुत से लोगों का मानना है कि पूंजीवादी व्यवस्था और वैश्वीकरण के फायदे जमीनी स्तर तक नहीं पहुंचे, फिर भी क्या ये सही नहीं है कि वैश्वीकरण से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और इससे धीरे-धीरे गरीबी दूर हो सकती है?

सिर्फ उदारीकरण से भारत का भला नहीं होने वाला. ये महत्वपूर्ण है पर देश की समस्याओं से निपटने के लिए सिर्फ यही काफी नहीं. हमें एक साथ कई मोर्चे पर काम करना होगा. कई क्षेत्रों के लिए नीतियां बनानी होंगी. हमें विश्व बाजार का फायदा उठाना होगा जो कि बेहद महत्वपूर्ण है. मेरा मानना है कि इसके लिए नीतिगत स्तर पर बेहतर निर्णय लिए जाना भी बेहद जरूरी है.

विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) की अवधारणा पर आपका क्या मत है?

मैं काफी हद तक सेज बनाए जाने का विरोधी हूं. यदि आप सेज बनाने की अनुमति देते हैं तो आपको राजस्व नहीं मिलता क्योंकि इन्हें कर में छूट दी जाती है. मेरे हिसाब से सेज भ्रष्टाचार को और बढ़ावा दे सकते हैं. इनकी स्थापना के बारे में बड़ा ही अजीबोगरीब तर्क दिया जाता है कि इनका निर्माण बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के लिए किया जा रहा है लेकिन वास्तव में यदि सेज का विकास बाजार आधारित व्यवस्था के लिए किया जा रहा है तो इन्हें राज्यों का संरक्षण क्यों है? मेरे विचार से हम बाजार और विश्व अर्थव्यवस्था उचित भागीदारी से बेहतर स्थिति में आ सकते हैं और इसके लिए सोच विचार कर नीतियां बनाने की आवश्यकता है.

आपके  बारे में कहा जाता है कि आप की विचारधारा वामपंथ के ज्यादा नजदीक है, क्या आज वाम पार्टियां अपने आदर्शों के अनुरूप आचरण कर रही हैं?

मेरा मानना है कि आज वाम पार्टियों को भारत-अमेरिका परमाणु करार की बजाय अशिक्षा, अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और वंचित लोगों पर ध्यान देने की जरूरत है. मेरे ख्याल से इन मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. मैं वामपंथी हूं और ये मेरा राजनीतिक मत है. मैं चाहूंगा कि ये पार्टियां समुदाय के सबसे गरीब तबके की समस्याओं के बारे में ज्यादा चिंता करें और उनके हितों से संबंधित मुद्दों को उस स्तर तक ले जाएं जहां उनकी आवाज सुनी जा सके. इसके साथ ही वाम पार्टियां कोशिश करें कि निचले तबके की आवाज कमजोर न पड़ पाए.

अपने सपनों के भारत के बारे में कुछ बताइए?

मेरा सपना है एक ऐसा भारत जहां सबके पास व्यापक स्वतंत्रता हो, जहां लोगों को किसी तरह के अभाव से न जूझना पड़े, जहां हमें कुपोषण के स्तर, निम्नस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं और साक्षरता दर को लेकर शर्मिदा न होना पड़े. 

हाय असत्यम

                          

                   चक्र सुदर्शन

सत्यम के संग शिव नहीं, शिव संग सुंदर नाहिं,

धन अंसुअन की झील में, शेयर पड़े कराहिं.

शेयर पड़े कराहिं, बचा नहीं एक अधन्ना,

बजे तड़पती ताल, ताक धन धन धन धन्ना .

चक्र सुदर्शन, हवस खोपड़ी करती धमधम,

हाय असत्यम, हाय असत्यम, हाय असत्यम.

                                                   अशोक चक्रधर

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कुरूक्षेत्र के कई सव्यसाची

बीसवीं सदी के आठवें दशक में अमेरिका के राष्ट्रपति रीगन और ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थैचर ने मिल कर वित्तीय पूंजीवाद का नया मॉडल बनाया जो नवउदारवादी वाशिंगटन सहमति के नाम से जाना गया. दशक का अंत होते-होते सोवियत संघ बिखर गया. इसे समाजवाद का अंत और पूंजीवाद की अंतिम निर्णायक विजय घोषित कर के अमेरिका ने पूरे संसार में नई नव उदार व्यवस्था लागू करने का अभियान चलाया. भारत इसका पहला रंगरूट बना क्योंकि यहां का परजीवी मध्यवर्ग सोवियत संघ में विघटन के बाद ऐसी विश्व व्यवस्था से जुड़ना चाहता था जो उसे उसकी आत्महीनता में भी आश्वस्त रख सके. आपने देखा होगा कि पश्चिमी विद्या कौशल वाला मध्यवर्ग नौवें दशक में ऐसे अवसर प्राप्त कर सका जो उसे पूरी सदी भर ऐतिहासिक कारणों से मिला नहीं था. राज्य के संरक्षण में मुटियाए उद्योगपति और बड़े व्यापारी वह उदार व्यवस्था में पश्चिमी वित्तीय पूंजी के एजंट हो गए. भूमंडलीकरण के साथ नियोग से भारतीय पूंजी ने गजब की उर्वरता दिखाई और भारत में भी अमेरिकी पूंजीपतियों को मात देते पूंजीपति और फार्चून कंपनियों में शामिल हो सकने वाली कंपनियां बन गईं. वृद्धि और विकास के लिए कारपोरेट्स को आगे करने वाली मनमोहनी नीतियों ने धीरे-धीरे उद्योगपतियों, पूंजीपतियों के बीस घरानों को देश के सकल घरेलू उत्पाद का बाईस प्रतिशत हिस्सा दे दिया.

अर्थव्यवस्था के इस तथाकथित भूमंडलीकरण से राजनीति अछूती नहीं रह सकती थी. पिछली सदी के नौवें दशक में राजनीति के मंडल और कमंडल के दो शक्तिशाली ध्रुवों से चल रही थी. सामाजिक सांस्कृतिक रूप से देखें तो यह भारतीय समाज के दो पुरातन तत्वों, जाति और संप्रदाय के निरंतर संघर्ष का नतीजा था. मंडल यानी जाति की शक्तियों को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने निर्बन्ध और निर्बाध किया था और लालकृष्ण आडवाणी जी  कमंडल लेकर निकले ये उससे सांप्रदायिक शक्तियां सारे परदे फाड़ कर प्रकट हो गई थी. बीसवीं सदी का आखिरी दशक जाति और संप्रदाय की पहचान की राजनीति से तहस-नहस होता रहा.क्षितिज पर दिखता तो कुछ नहीं है. लेकिन राजनीति के साथ चित्रकारी करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह कहा करते थे कि राजनीति लेंडस्केप की तरह नहीं बदलती. राजनीति स्काईस्केप है. देखते-देखते बादल झूम के घिरते और बरसते हैं

लेकिन मनमोहन सिंह ने भूमंडल की ताकतों को जो नल सन् इकानवे में खोला था वह मंडल और कमंडल के अनिवार्य संघर्ष के दौरान पहले नाला बना और फिर इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में नदी बन गया. यह संयोग नहीं है कि कमंडल के कर्ताओं को भूमंडल के सबसे बड़े भारतीय एजंट अंबानी के राजनैतिक एजंट प्रमोद महाजन ने मरवाया और गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधान सभाओं में विजय के रथ पर बैठा कर लोकसभा के मैदान में उतार दिया. मंडल और कमंडल दोनों क्षीण हो रहे थे. भूमंडल और भारतीयता का नया संघर्ष चल निकला. भाजपा की अगुवाई वाला कमंडली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन हार गया. कांग्रेस की अगुवाई में नया गठबंधन बना – यूपीए. उसी ने सत्ता संभाली. यह भी संयोग नहीं था कि इसके प्रधानमंत्री का पद मनमोहन सिंह को मिला जो भूमंडल की आर्थिक-राजनैतिक शक्तियों के अग्रणी पहरुए थे. यह भी संयोग नहीं था कि भारत के भूमंडलीकरण पर अंकुश लगाने वाले वामपंथी इसे बाहर से समर्थन दे रहे थे.

वामपंथियों को भारतीयता की नई शक्ति कहना तो हास्यास्पद होगा क्योंकि वे अपने वामपंथी चोले से बाहर नहीं आ सकते थे. उनमें इतनी रचनात्मक ऊर्जा ही नहीं थी कि भूमंडलीकरण के वित्तीय पूंजीवादी हमले के सामने खड़ी हो रही भारत के किसानों और मजदूरों की नई भूमि में वैचारिक हल चला कर नई फसल उगा सकें. वे सिर्फ वित्तीय पूंजी के भूमंडलीकरण से पैदा हुए नए इंडिया पर राजनैतिक अंकुश अमेरिका से अणु करार कर के भारत में नव उदार आर्थिक सुधारों के लिए नई भूमि हथियाने का निश्चय किया.

लेकिन उन्हें पूंजी से की गई खरीद-फरोख्त से मिली जीत का जश्न मनाने को डेढ़ महीना भी नहीं मिला. बाईस जुलाई को जीते और पंद्रह सितंबर को वित्तीय पूंजीवाद की राजधानी वॉल स्ट्रीट का दिवाला पिट गया. वित्तीय पूंजीवाद के नव उदारवादी सारे काशी, मक्का और काबे ढह गए. उनमें बैठे देवी-देवता और भगवान झूठे साबित होकर डूब गए. मनमोहन सिंह डूबते अमेरिकी जहाज से भारतीय नौका को अलग कर के बचाने में मजबूरन लग गए. बीस हजार के पार उछलता सेंसेक्स आठ हजार पर उतर आया. एक अमेरिकी ने कहा कि कितने ट्रिलियन डॉलर डूबने से कितने धनपति कंगाल हुए हैं इसका पता तो तभी चलेगा जब ज्वार उतरेगा क्योंकि तभी दिखेगा कि समुद्र में कौन-कौन नंगे तैर रहे थे. सन् तीस से भी बड़ी महामंदी आ गई है और भारत मंदी के भूमंडलीकरण से बचने में लगा है. मनमोहन सिंह अपनी सबसे बड़ी विजय अमेरिका से अणु करार के बाद अब मंदी के भूमंडलीकरण से भारत को बचाने में लगे हैं. उनकी नदी मंदी के रेगिस्तान में मिल गई है.

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक अपने नौवें साल में भूमंडलीकरण से उपजे भस्मासुर इस्लामी आतंकवाद को गेट वे इंडिया के ताज महल और ओबरॉय होटलों में ले आया है. नकली ईडन गार्डन से आदमी तो निकाल दिया गया है और बड़े-बड़े नखों और दांतों वाला राक्षसी जानवर बैठा दिया गया है. समझदार लोग जानते हैं कि यह राक्षसी जानवर ही भूमंडलीकरण की औरस संतान है. इसलिए आपने देखा कि ताज और ओबरॉय में गिन-गिनकर और चुन कर अमेरिकी और यूरोपीय नागरिकों को मारा गया और नरीमन हाउस में यहूदियों को. यह इस्लामी अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का भारत पर खास कर भूमंडलीकृत इंडिया पर हमला था. आपने देखा कि इस इंडिया ने पाकिस्तान के रास्ते आए राक्षसी जानवर का कैसा विरोध किया और इंडिया के राज्य ने नए इंडिया से माफी मांगी और सख्त तानाशाही कानून तैयार किए. क्या इंडिया पाकिस्तान पर सैनिक हमला चाहता है जैसा बुश ने इराक और अफगानिस्तान पर किया था. उसे बुश की पराजय और ओबामा की जीत का मतलब समझ में नहीं आता. समझदार भारत नए इंडिया की नपुंसक आक्रामकता को रोके हुए है.

ऐसे में नौ का साल लग गया है. नौ पूर्णाक और शुभ माना जाता है. क्या इस साल नई राजनीति आएगी? जम्मू कश्मीर में जनता ने अलगाववाद, आतंकवाद और पार्टियों की मौकापरस्ती को पराजित कर के लोकतंत्र को नई ताकत और नया विश्वास दिया है. लोकसभा चुनाव बराबरी के एक सेमीफाइनल के बाद फाइनल की तरह हो रहा है. तीनों संगठित और राष्ट्रीय पार्टियां – कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी – क्षेत्रीय मददगारों की तलाश में है. यूपीए, एनडीए और वामपंथी बनने और टूटने की प्रक्रिया में है. क्या यह चुनाव कोई नई और स्वायत्त भारतीय शक्ति को प्रक्षेपित कर सकता है?

क्षितिज पर दिखता तो कुछ नहीं है. लेकिन राजनीति के साथ चित्रकारी करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह कहा करते थे कि राजनीति लेंडस्केप की तरह नहीं बदलती. राजनीति स्काईस्केप है. देखते-देखते बादल झूम के घिरते और बरसते हैं और उजली धूप नीले स्वच्छ आकाश को चमका देती है. फिर कहीं से एक बादल आता है और सारा दृश्य बदल जाता है. बादल कहां से आता और कहां चला जाता है कोई नहीं जानता. कोई भविष्यवाणी नहीं होती. कोई भविष्यवाणी सही नहीं निकलती.

अब बताइए कि कौन जानता था कि राष्ट्रपति पद का चुनाव हारे और उप राष्ट्रपति पद से रिटायर हुए भरोंसिंह शेखावत एक पांव राजस्थान और एक पांव दिल्ली में रखते हुए लोकसभा चुनाव में अपनी सतरंगी पगड़ी उछाल देंगे? एक चुनौती की तरह.

अगर वे सचमुच लड़ गए तो भाजपा और एनडीए लाख हथेली लगा लें लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री नहीं बना सकते. कौन जानता था कि आडवाणी के रास्ते में भरोंसिंह शेखावत हनुमान की तरह लेट जाएंगे. शेखावत एनडीए को ही हिला नहीं सकते वे यूपीए को भी चमका सकते हैं. उनके आने से शरद पवार, मुलायम सिंह आदि की महत्वाकांक्षाओं को नए पर लग सकते हैं. भारत की दक्षिणपंथी शक्तियां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मुक्त हो सकती हैं. यानी पूंजीवाद सांप्रदायिकता के ग्रहण से बाहर निकल सकता है. वामपंथी भी नई जमीन खोद सकते हैं. शेखावत जेपी और वीपी दोनों की भूमिका में उभर सकते हैं.

और शेखावत तो इतिहास के एक सव्यसाची हैं. कई सव्यसाची अभी कुरूक्षेत्र में खड़े लड़ूं कि न लड़ूं की दुविधा में हैं. राजनीति स्काईस्केप है. 

निरपराध पर दंडित : कश्मीरी पंडित

गोली सिर्फ शरीर को भेदती है जबकि सोच एक समूची नस्ल को. 1990 में जब कश्मीर में अलगाववाद शुरू हुआ तो माहौल में गोलियों के अलावा एक सोच भी घुलने लगी थी. फुसफुसाहटें, पोस्टर और लाउडस्पीकरों से गूंजते नारे इसका अहसास कराते थे. 

हम क्या चाहते? आजादी, आजादी

सरहद पार जाएंगे, क्लैश्निकोव लाएंगे

और सबसे ज्यादा भयावह..बटो रोअस ते बटनियो सान, इस बनाओ पाकिस्तान (पंडित के बिना, पंडितानियों के साथ, हम बनाएंगे पाकिस्तान.)

इस सोच को कई बार शब्दों के बिना भी महसूस किया जा सकता था. कभी बदली हुई नजरों से तो कभी बदलते हुए बर्ताव से..

तभी से एक नस्ल के लिए बुरे दिनों की शुरुआत हो गई थी. पहली चोट थी टीका लाल टपलू की हत्या. पेशे से वकील और भाजपा की जम्मू-कश्मीर इकाई के उपाध्यक्ष टपलू चरमपंथियों की गोली का पहला शिकार बने थे. 14 सितंबर 1989 को श्रीनगर में कश्मीरी पंडितों की बस्ती हब्बा कदल के पास उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. जब टपलू की शवयात्रा, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हुए थे, निकल रही थी तो नकाब पहने अलगाववादियों ने उस पर पत्थरबाजी की और जबर्दस्ती बंद दुकानें खुलवाईं.

तब से लेकर आज तक कोई चार लाख कश्मीरी पंडित कश्मीर से गायब हो चुके हैं. बुद्धि ही बल है’, इस सिद्धांत को पूजने वाले कश्मीरी पंडितों को जब घाटी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया तो बल के आगे उनकी बुद्धि ने घुटने टेक दिए. उन्हें भागकर जम्मू आना पड़ा. खुली वादियों के बाशिंदों को यहां मिली तंग बस्तियां और अपने ही देश में शरणार्थी होने का दर्द. 

18 साल बीत चुके हैं. धूलभरी इन बस्तियों में कश्मीरी पंडितों के उस धूल-धूसरित गर्व को आज भी महसूस किया जा सकता है जो कभी उन्हें अपनी नस्ल पर था. चुनाव का दौर है मगर उनके वोटों की चिंता लगभग किसी को नहीं. जो ये चिंता करने का कष्ट उठाते हुए इन शरणार्थी कैंपों की तरफ आते भी हैं उन्हें ये नजारा दिखता है.एक कमरे में पूरी दुनिया

पंडितों, जिन्हें बाकी लोग माइग्रेंट्स यानी शरणार्थी कहते हैं, की दुनिया में जिंदगी कुल जमा दो कदमों का खेल है. उनकी दुनिया एजबेस्टस की छत और चार दीवारों के मेल से बने एक कमरे में सिमटी हुई है. अगर आप इस दुनिया के बीचों-बीच खड़े हों तो दो कदम इधर टॉयलेट है और दो कदम उधर रसोई. दो कदम इस तरफ दीवार पर बना पूजाघर है और दो कदम उस तरफ टीवी. मां-बाप, बहू-बेटा, पोता-पोती सब एक कमरे में रहते हैं. जवान बहू-बेटे को कुछ एकांत मिल सके, इसके लिए बूढ़ी मां या बाप को जबर्दस्ती या तो रिश्तेदारों के यहां जाना पड़ता है या फिर कमरे के बाहर. पर घर में कोई बच्चा हो तो फिर कोई चारा नहीं. बाहर निकलने पर गली नाम की जो चीज  दिखती है उससे एक बार में बस एक ही आदमी आराम से गुजर सकता है. अगर दो लोग आमने-सामने से आ रहे हों तो अगल-बगल से गुजरने के लिए उन्हें मुड़कर आमने-सामने होना पड़ता है.

सुबह होने के साथ-साथ बस्ती में रहने वाले बूढ़े एक हाथ में स्टूल और दूसरे हाथ में बांस का पंखा लेकर घर से चलते हैं और बस्ती से लगती सड़क के किनारे बैठ जाते हैं. सपाट चेहरे के साथ आती-जाती गाड़ियों और लोगों को देखती इन जिंदगियों को देखकर लगता है जसे मौत के इंतजार में वो बस किसी तरह वक्त काट रही हैं. दोपहर में घर से खाने का बुलावा आता है और इसके बाद फिर वही इंतजार शुरू हो जाता है. तब तक जब तक कि दिन की रोशनी पूरी तरह ढल नहीं जाती.

24 साल की बबीता रैना जवान है और खूबसूरत भी. जब वो यहां आई थी तो उसकी उम्र महज छह साल थी. बबीता को लगने लगा है कि उसका समय खत्म हो रहा है. वो कहती है, ‘मेरी जिंदगी में कुछ भी अच्छा नहीं. अपने चारों तरफ देखिए. एक कमरे में मैं क्या कर सकती हूं? कुछ सोच नहीं सकती, नाराज नहीं हो सकती. लड़के मुझ में दिलचस्पी नहीं लेते क्योंकि मैं कैंप में रहती हूं. पिछले हफ्ते फोन पर एक लड़के से बात कर रही थी तो कैंप में बात उड़ गई कि मेरा चक्कर चल रहा है.

बात खत्म करने के बाद बबीता कुछ मिनटों तक दीवार को ताकती रहती है  फिर उसकी आंखों से आंसू झरने लगते हैं. वो बहुत भावुक है. जिंदगी से उसे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. उसकी सबसे बड़ी चाह यही है कि कोई नौकरी मिले तो इस जगह से छुटकारा हो. बबीता कंप्यूटर्स से एक पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स कर रही है. वो कहती है, ‘मैं डॉक्टर बनना चाहती थी. मगर जानती हूं कि ज्यादा से ज्यादा मुङो दिल्ली में कोई कंप्यूटर जॉब ही मिल सकता है. उस दिन मेरा दूसरा जन्म होगा जिस दिन पते की जगह मुङो 117, मुथि कैंप नहीं लिखना होगा.

18 साल बहुत लंबा वक्त होता है. और कभी-कभी जब घर पहुंचने में ज्यादा लंबा वक्त लग जाए तो आप अनचाहे भी हो सकते हैं. कश्मीर में आग अब भी धधक रही है. कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं की पंडितों की वापसी में कोई दिलचस्पी नहीं है. पंडितों के मुसलमान दोस्त अपनी जान का खतरा मोल नहीं लेना चाहते और जम्मू में स्थानीय हिंदू उन पर तानाकशी करते हैं.

राजनाथ डार 44 साल के हैं. छह साल पहले ही उन्हें एक प्राइवेट फाइनैंस कंपनी में नौकरी मिली थी. तनख्वाह 6000 रुपये महीना है. जब तक वो 50 के होंगे तब तक ये आंकड़ा ज्यादा से ज्यादा 8000 तक पहुंचेगा. उन्हें अपनी बेटी की शादी की फिक्र है. डार कहते हैं, ‘कम से से कम अब मैं सुबह नौकरी पर जाने के लिए बस तो पकड़ता हूं. इससे पहले 12 साल तक तो मैं सुबह छह बजे उठता था और अपने दोस्तों के दरवाजों पर कंकड़ मारकर उन्हें जगाता था. इसके बाद दोपहर के खाने तक हम गप्पें मारते थे, अखबार पढ़ते थे और कैरम, वॉलीबॉल और क्रिकेट खेलते थे. उसके बाद टीवी पर खबरें देखना होता था. कई साल तक दिन यूं ही गुजरे.

कभी-कभी प्रशासन और सरकार को उनकी सुध आई भी. कुछ समय पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  कैंप में आए थे. उनसे मुलाकात के दौरान 80 साल के एक बूढ़े ने अपने छोटे से कमरे के छोटे से दरवाजे की ओर इशारा करते हुए पूछा, ‘जब मैं मरूंगा तो लोग मेरी लाश कैसे बाहर निकालेंगे.सिंह भावुक हो गए. उन्हें अहसास हुआ कि नाम के ये घर लोगों को सर्दी, गर्मी और बरसात से भले ही बचा लेते हों मगर रहने वालों से उनका आत्मविश्वास छीन लेते हैं. शायद इसी घटना की प्रतिक्रिया में उन्होंने पंडितों के लिए करोड़ों रुपये के पैकेज का एलान कर दिया. उन्होंने कहा कि पंडितों को जम्मू से कुछ दूर एक नए शहर में फिर से बसाया जाएगा. एक प्रधानमंत्री ज्यादा से ज्यादा यही कर सकता है. वो राहत पैकेज दे सकता है. मगर पंडितों के दिमाग में बसा डर और शक और अतिवादी मुसलमान के मन में सुलग रहा गुस्सा दूर नहीं कर सकता.

जख्म भले ही भर जाते हों मगर उनकी टीस रह-रहकर सालती है. खासकर तब जब आप चाहकर भी किसी के लिए कुछ न कर पाएं. 1989 में जब शरणार्थी जम्मू पहुंचने लगे तो विजय बकाया वहां के जिला कलेक्टर थे. कश्मीरी पंडित समुदाय से ही ताल्लुक रखने वाले बकाया के पास उनके लिए न कोई जवाब था, न पैसा और न जगह. बकाया याद करते हैं, ‘वे अपने ट्रक मेरे घर के बाहर खड़े कर देते थे. नौजवान, जिंदगी में पहली बार अपने गांवों से बाहर निकली बूढ़ी औरतें..सबके चेहरों पर सवाल. पेशेवर नौकरशाह होने की वजह से मैं उनके साथ घुलमिल नहीं पा रहा था. मेरी बीवी और मां ने मुझसे झगड़ना शुरू कर दिया कि मैं उनके लिए कुछ कर क्यों नहीं रहा.आने वाला कल

खदेड़े जाने से पहले पंडित वादी की ठंडी आबोहवा में रहते थे. जम्मू इस मामले में बिल्कुल अलग ही दुनिया थी – गर्म, धूलभरी और डरावनी. जम्मू में पंडितों की भीड़ बढ़ रही थी. जिस जगह वे जमा हो रहे थे वो सांपों का इलाका था. कुछ पंडित उनके काटने से मारे गए. कुछ और लू की भेंट चढ़ गए. बकाया कहते हैं, ‘जम्मू में हमारे पास एंटी वेनम सीरम नहीं था. हमें ये दिल्ली से मंगवाना पड़ा.दूसरी समस्या गर्मी की थी. पंडितों को राहत पहुंचाने के लिए बड़ी संख्या में बर्फ की सिल्लियां कैंपों में रखी गईं.

प्रशासन चकराया हुआ था. वरिष्ठ अधिकारी इस समस्या का कोई हल निकालने की उधेड़बुन में लगे थे. अचानक उन्हें एक हल सूझ. हल ये था कि शरणार्थियों को वापस भेज दिया जाए. ये काम जबर्दस्ती नहीं हो सकता था इसलिए अधिकारियों को लगा कि यदि पंडितों के लिए जम्मू में हालात कश्मीर से भी बदतर कर दिए जाएं तो वो वादी में लौट जाएंगे.

प्रशासन ने एक कमरे के कामचलाऊ मकानों की योजना बनाई जो सिर्फ सर्दी, गर्मी और बरसात से बचाने का जुगाड़ थे. इसके पीछे सोच ये थी कि पंडितों को लगे कि इनमें जिंदगी बस किसी तरह ही गुजर सकती है और उनके पास वापस लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. बकाया कहते हैं, ‘एक कमरे में 10 लोग होते थे. आप समझ सकते हैं हालात कितने दयनीय रहे होंगे.

अखबारों में प्रशासन की काफी आलोचना हुई. इससे अधिकारी गुस्से में आ गए. उन्होंने शरणार्थियों पर कायर होने का ताना मारते हुए कहा कि पंडितों को वादी छोड़ने की जरूरत नहीं थी और उन्होंने जम्मू में भी मुश्किलें पैदा कर दी हैं. बकाया कहते हैं, ‘मेरे मन में हमेशा एक ही सवाल होता था, आखिर उन्हें भागने की जरूरत क्या थी?’

बकाया को इसका जवाब कुछ साल बाद मिल गया. वो याद करते हैं, ‘ये 1990 में चरार-ए-शरीफ के जलने के समय की बात है. मैं श्रीनगर में था और शहर में  कर्फ्यू लगा हुआ था. रात 12 बजे के बाद की बात रही होगी. अचानक पास की मस्जिद से एक जोर का शोर उठा. मैं भागकर बालकनी में आया. मैंने देखा कि मस्जिद के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा थी और मस्जिद के लाउडस्पीकर से नारे गूंज रहे थे. कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाह हो अकबर कहना है. यहां क्या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा. मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. सिर्फ नारे सुनकर मेरा ये हाल था. उन पंडितों का क्या हुआ होगा जो ऐसे लोगों से घिरे थे. पंडितों की बात सही थी. हमारे पड़ोसी वहां नहीं थे. न कोई सुरक्षा थी न गश्त होती थी. मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया था.

मगर शरणार्थी पंडितों के सवाल अब भी अनसुलझे हैं. प्रत्येक परिवार को हर महीने अधिकतम 4000 रुपये, नौ किलो चावल, एक किलो चीनी और प्रति व्यक्ति दो किलो आटा मिलता है. ये गुजर-बसर के लिए मिलने वाली राहत है. 39 साल के संजय राजदान अपनी मां, पत्नी और दो बेटों के साथ मुथि कैंप में रहते हैं. 33 साल की उम्र में उनकी शादी हुई और 35 साल की उम्र में उन्हें नौकरी मिली. तीन साल पहले उन्होंने Þाीनगर का अपना घर पांच लाख रुपये में बेच दिया. उन्हें नहीं लगता कि उनकी जिंदगी कभी कैंप से बाहर निकल पाएगी. राजदान कहते हैं, ‘बहुत लंबा वक्त हो गया है. घाटी में रह रहे पंडित भी अब हमसे घुलमिल नहीं पाते. लगता यही है कि मेरी कहानी एक शरणार्थी के रूप में ही खत्म हो जाएगी.

28 साल के अशोक पंडिता उन कुछ शरणार्थियों में से हैं जिन्हें बाकी के बनिस्बत कामयाब कहा जा सकता है. वो दिल्ली में एक अच्छी कंपनी में सीनियर इंजीनियर हैं. पंडिता के लिए कामयाबी का ये सफर काफी मुश्किलों भरा रहा. वो बताते हैं, ‘कुपवाड़ा में हमारा समृद्ध परिवार था. अखरोट का बगीचा था. बचपन में गांव के कुछ लोग दो-तीन महीने के लिए गायब होकर फिर लौट आते थे. मुझे ये जानने की उत्सुकता होती थी कि आखिर ये लोग कहां जाते हैं. धीरे-धीरे मुझे अहसास होने लगा कि कुछ बदल रहा है. टीचर मुझसे मेरे देश का नाम पूछते तो मैं हिंदुस्तान कहता और मुसलमान बच्चे पाकिस्तान. हालांकि मुझे पता नहीं था कि इनमें क्या फर्क है. फिर एक दिन जिया-उल-हक की मौत हो गई और सरकारी प्राइमरी स्कूल होने पर भी वहां दो दिन की छुट्टी का एलान कर दिया गया. मुङो इंदिरा गांधी की मौत का दिन भी याद है. हमारे स्कूल में खुशियां मनाई जा रहीं थीं. उन्होंने एक महीने की छुट्टी घोषित कर दी थी.

एक दिन कुपवाड़ा में मुस्लिम नेताओं ने एक बैठक की. बैठक के बाद लोगों ने पुलिस और सेना पर हमला शुरू कर दिया. उन्होंने एक सिपाही को मार दिया. सेना ने जवाब में फायरिंग की जिसमें कई मुसलमान मारे गए. इससे पूरे इलाके में तनाव फैल गया.

पंडिता के पिता में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो बेटे को सच बता पाते इसलिए एक दिन उन्होंने कहा कि वो कुछ दिन के लिए जम्मू घूमने जा रहे हैं. पंडिता कहते हैं, ‘मैं बहुत खुश था क्योंकि मैंने जम्मू नहीं देखा था. मैंने अपना क्रिकेट का सामान वहीं छोड़ दिया. हमने अपनी गाय भी छोड़ दी. शायद मैं थोड़ा बड़ा होता तो विरोध करता. जम्मू में हमें बहुत दिक्कतें हुईं. पढ़ाई में तेज होने की वजह से स्कूलों में हमें ज्यादा तरजीह मिलने लगी. इससे स्थानीय लोग हमारे दुश्मन हो गए. हिंदू ही हमसे लड़ने लगे थे. शुरुआती दिनों में हम यहां कहीं ज्यादा असुरक्षित थे. हम पर दबाव बहुत ज्यादा था. कश्मीर के आतंकवादियों से कहीं ज्यादा नफरत में जम्मू के लोगों से करता हूं. जम्मूवालों ने मुसीबत में हमें लात मारी. मेरा बस एक ही मकसद था खूब पढ़ना और वहां से बाहर निकलना. जिंदगी मुश्किलों भरी थी. आंधी-तूफान के दौरान हमें सारी रात जगे रहकर अपने तंबू को उड़ने से बचाना होता था. स्थानीय हिंदू हमें कायर कहते थे. हम कुछ नहीं कर सकते थे. मुङो अपने समुदाय की नपुंसकता पर झल्लाहट होती थी. फिर अचानक बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र में कश्मीरी पंडितों के लिए शिक्षा कोटे का एलान कर दिया. इस कोटे की वजह से ही मैं जलगांव से इंजीनिय¨रग कर पाया. मैं बाल ठाकरे का बड़ा अहसानमंद हूं.धुंधलाई उम्मीदें

हालांकि पंडिता अब भी खुश नहीं हैं. वजह है जम्मू में रह रहे पंडितों में पड़ती आपसी फूट. अपने लिए बन रहे अपार्टमेंट्स के चक्कर में पंडित आपस में ही झगड़ रहे हैं. उनमें से कुछ इस चक्कर में हैं कि उन्हें अच्छा घर अलॉट हो जाए और ऐसा करने के लिए वो सरकारी अधिकारियों को घूस दे रहे हैं. पंडिता कहते हैं, ‘इतना कुछ झेलने के बाद उन्हें ऐसा करते देख कर बहुत बुरा लगता है.

हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हालात से निपटने के उपाय खोजने की कोशिश कर रहे हैं. उदाहरण के लिए जम्मू में बनी सबसे नई राजनीतिक पार्टी जम्मू एंड कश्मीर नेशनल यूनाइटेड फ्रंट. चार अगस्त 2008 को चुनाव आयोग इसका पंजीकरण भी कर चुका है. पार्टी की पहली सदस्य हिंदू देवी माता रानी हैं जिनके नाम पर पार्टी नेतृत्व ने पांच रुपये की सदस्यता शुल्क की रसीद काटी है. 57 वर्षीय विजय छिकन इसके कोषाध्यक्ष हैं. उनके मुताबिक पार्टी के 10,000 सदस्य हैं जिनमें 6000, चालीस साल से कम उम्र के हैं. पार्टी का चिन्ह दफोदिल (उर्दू में नरगिस) है और उसका एजेंडा है कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास, पंडित समुदाय के नौजवानों को उनके अधिकार और कश्मीरी हिंदुओं के लिए आरक्षण.

कभी छिकन की कश्मीर में अपनी फैक्ट्री हुआ करती थी. उनके कई मुसलमान दोस्त थे जिनमें एक नौजवान बिजली मिस्त्री भी था. एक दिन छिकन को लगा कि वो उनका पीछा कर रहा है. वो बताते हैं, ‘मुझे शक हुआ कि कुछ गड़बड़ है. मैं डर गया. मुङो याद आया कि किस तरह मेरे एक दोस्त की हत्या से पहले उसका ऐसे पीछा किया गया है. मैं एक दुकान में घुस गया और दुकानदार को बातों में उलझकर वक्त काटता रहा. इस दौरान वो भी कुछ दूर स्थित एक दुकान में इंतजार कर रहा था. जब मैं दुकान से बाहर निकला. वो भी बाहर निकल आया. जब वह बहुत करीब आ गया तो मैंने अचानक मुड़कर उससे पूछा कि क्या वो मुझसे कुछ कहना चाहता है. उसने कहा कि उसे किसी मसले पर मुझसे बात करनी थी. मैंने उससे सुबह आने को कहा. रात को मैं घर में न रहकर अपनी ससुराल में रहा फिर वहां से जम्मू चला आया. बाद में पता चला कि उसे मेरी हत्या की जिम्मेदारी दी गई थी.

शरणार्थी की जिंदगी ने छिकन की सोच को जमा दिया है. हर चीज से पहले अब वो कश्मीरी पंडित को रखते हैं. वो कहते हैं, ‘अब जम्मू से भी पंडित बड़ी संख्या में बाहर निकल रहे हैं और मुङो इससे चिंता होती है. जल्द ही दूसरे समुदायों में शादियां होने लगेंगी और हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. हमारे भीतर 5000 साल पुराने प्योर जीन्सहैं. हमें इसे इसी तरह कायम रखना चाहिए. हमें अपनी संस्कृति को बचाना होगा. जसा आजकल चल रहा है उसे देखते हुए तो लगता नहीं कि भविष्य में कोई बुजुर्ग पंडितों से सलाह-मशविरा लेगा. कंप्यूटर से मैचमेकिंग होने लगेगी और ये नस्ल तबाह हो जाएगी.

पंडितों को किसी पर भरोसा नहीं. एक समय था जब वो इस बात पर हैरान होते थे कि उनका देश उन्हें बचाने के लिए आगे क्यों नहीं आया. अब उन्हें इसकी वजह मालूम है. पंडित अब अपने वोट को हथियार बनाना चाहते हैं. इसका एक तरीका ये है कि वो एक ही जगह पर रहें. इसीलिए वो अपने लिए अलग से एक शहर की मांग कर रहे हैं.

संजय राजदान के घर में उनका बेटा पहाड़े का सबक सीख रहा है, पांच इकम पांच, पांच दूने सात..एक दिन उसकी गणित सही हो जाएगी और तब वो हिसाब मांगेगा. बेहतर होगा कि कोई जवाब तैयार कर ले.

सभी फोटो: उज्मा मोहसिन

महाकाली सत्ता में बाबा विश्वनाथ

विश्वनाथ प्रताप सिंह किसी भी पद पर टिक कर या उसके होकर नहीं रह सके. उन्होंने सभी से इस्तीफा दिया और किसी का भी कार्यकाल पूरा नहीं किया.

 उनके बड़े बेटे अजेय सिंह ने ठीक फैसला किया कि पिता विश्वनाथ प्रताप सिंह का अंतिम संस्कार प्रयाग में संगम पर किया जाए. लगता है खुद वीपी सिंह ने भी अपने परिवार से ऐसा ही करने को कहा होगा. वे खूब जानते थे कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार का उनकी अंत्येष्टि पर क्या रवैया होगा.

प्रधानमंत्री तो प्रोटोकोल के तहत उनके घर शव पर फूल माला चढ़ाने आए लेकिन सोनिया गांधी नहीं आईं. फिर भी वसीम अहमद ने मनमोहन सिंह से पूछ ही लिया कि दूसरे भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह इनका भी अंतिम संस्कार दिल्ली में क्यों नहीं. इनके लिए भी कोई स्थान निर्धारित क्यों नहीं? वसीम ने बताया कि प्रधानमंत्री ने कहा कि कैबिनेट में आम सहमति बनानी होगी. कल दोपहर से आज सवेरे तक काफी समय था कि मंत्रिमंडल की बैठक कर के सारे फैसले किए जाते. लेकिन ये कुछ करना ही नहीं चाहते.

जेपी भी राजनीति छोड़ कर जीवनदान करते हुए विनोबा के आंदोलन में आए थे. लेकिन जेपी राज परिवार और जमीन-जायदाद से नहीं समाजवादी पार्टी से निकल कर आए थे. वीपी सिंह ने तो विनोबा को देखने और मिलने से पहले ही अपनी दो सौ बीघा जमीन भूदान में दे दी थी.

फिर भी एक महिला तीन मूर्ति के आंगन में बार-बार मुङो कहती रही कि मैं सोनिया गांधी से कहूं. मैं उन्हें नहीं जानता इसलिए उनके आग्रह का कोई जवाब भी मैंने नहीं दिया. लेकिन वे मुङो आश्वस्त करती रहीं कि मैं कहूंगा तो सोनिया गांधी ना नहीं कर सकेंगी. मेरी इच्छा हुई कि उन्हें कहूं कि जरा वसीम अहमद से बात कर लीजिए. लेकिन चुप रहा और उनके आग्रह की अनदेखी करता रहा. वे अकेली नहीं थीं. जिन झुग्गी-झोंपड़ियों वालों के अधिकारों के लिए वीपी सिंह लड़ते रहे उनकी भी बहुत इच्छा थी कि अंतिम संस्कार दिल्ली में हो.लेकिन यह ठीक ही किया गया कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जहां से आए थे वहीं उन्हें ले जाया गया. वे वहीं के आदमी थे और उस इलाहाबाद में ही उनकी मिट्टी जानी चाहिए थी. दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठान को मानने और उसके होकर रहने वाले आदमी वे नहीं थे. सच पूछिए तो वे किसी भी प्रतिष्ठान के आदमी हो नहीं सकते थे. इसे विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि वे मांडा के राज परिवार में गोद गए. यह भी कोई कम बड़ी विडंबना नहीं है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए और भारत के प्रधानमंत्री भी. और भी कुछ पद हैं जिन पर बैठना उनने पता नहीं क्यों मंजूर किया. लेकिन अंतिम सच्चाई यही है कि किसी भी पद पर वे टिक कर या उसके होकर नहीं रह सके. सभी से इस्तीफा दिया और किसी का भी कार्यकाल ‘सफलतापूर्वक’ पूरा नहीं किया. इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में भी दो बार रहे और निकले. राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में तो उनका वित्त मंत्री और फिर रक्षा मंत्री होना खुद प्रधानमंत्री के लिए ही इतना भारी पड़ गया.

सत्ता से विश्वनाथ प्रताप सिंह का रिश्ता हमेशा ही छत्तीस का रहा. विनोबा के भूदान में वे तभी चले गए थे जब तीस के भी नहीं हुए थे. एक राज परिवार से निकल कर विनोबा जैसे निस्संग संत के भूदान जसे बैरागिया आंदोलन में पड़ना उनके स्वभाव और चरित्र की बनावट का अच्छा उदाहरण ही कहा जाएगा. जेपी भी राजनीति छोड़ कर जीवनदान करते हुए विनोबा के आंदोलन में आए थे. लेकिन जेपी राज परिवार और जमीन-जायदाद से नहीं समाजवादी पार्टी से निकल कर आए थे. वीपी सिंह ने तो विनोबा को देखने और मिलने से पहले ही अपनी दो सौ बीघा जमीन भूदान में दे दी थी.

सर्वोदय आंदोलन में रह जाते तो यह स्वभाव और वृत्ति के अनुकूल ही होता. लेकिन विकास के काम करवाने के लिए राजनीति में आए और विधायक बन के लखनऊ भी पहुंच गए. शायद वहीं देखा-समझा कि राजनीति में कोई समाज सेवा के काम करवाने नहीं आता है. राजनीति सत्ता का खेल है. वीपी को सर्वोदय आंदोलन में लौट जाना चाहिए था. लेकिन नहीं वे राजनीति में ही रह गए. दो साल विधायक रहे. फिर अपने चालीसवें साल में सांसद हो कर दिल्ली आ गए. क्या समाजसेवी भूदानी को सत्ता का चस्का लग गया था? शायद हां. इंदिरा गांधी ने पहले वाणिज्य उपमंत्री और फिर वाणिज्य राज्य मंत्री बना लिया. ये वही वर्ष थे जब जेपी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे और इंदिरा गांधी को उनने भ्रष्टाचार की गंगोत्री कहा था. पूरा संवेदनशील देश इंदिरा गांधी, उनके भ्रष्टाचार और तानाशाही रवये के खिलाफ आंदोलन कर रहा था. लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह उनके वफादार सिपाही बने उनकी सरकार में बाकायदा मंत्री बने हुए थे.

जनता राज में लड़-भिड़कर इंदिरा गांधी सन् अस्सी में फिर सत्ता में आईं तो वफादार विश्वनाथ प्रताप सिंह फिर उनके साथ थे. ऐसे कि संजय गांधी ने मां से कह कर उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवा दिया. ऐसे कम ही राजनेता थे जिन्हें इंदिरा और संजय दोनों का विश्वास प्राप्त था. यह विश्वास उन्हें सत्ता में और आगे ले जाकर और अधिक मजबूत कर सकता था. लेकिन वीपी सिंह दो साल भी मुख्यमंत्री नहीं रहे.  उनने इसलिए इस्तीफा नहीं दिया कि इंदिराजी या संजय गांधी चाहते थे. इसलिए दिया कि राज करने का उनका तरीका अलग था. राज्य सभा में आए और फिर मंत्री हो गए. इंदिरा गांधी की हत्या होने तक रहे. फिर राजीव गांधी प्रधानमंत्री हुए तो उनके मंत्रिमंडल में भी वित्त मंत्री हुए. अर्थव्यवस्था को खोलने और उसे उदार बनाने की प्रक्रिया राजीव गांधी-विश्नवाथ प्रताप सिंह के इसी जमाने में चली जिसे नरसिंह राव-मनमोहन सिंह ने बाद में पूरा किया. और विश्वनाथ प्रताप सिंह उसी के आलोचक हो गए और मृत्युपर्यंत रहे.

विश्वनाथ प्रताप सिंह राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री थे और प्रधानमंत्री के बड़े विश्वस्त साथी माने जाते थे. सत्ता के जिन दलालों से राजीव गांधी कांग्रेस और अपनी सरकार को मुक्त करना चाहते थे उनके खास दुश्मन वीपी सिंह ही थे. मगर देश के धनपति उद्योगपतियों ने राजीव गांधी को यह मानने पर मजबूर कर लिया कि उनकी सत्ता और छवि को अगर खतरा है तो विश्वनाथ प्रताप सिंह है. दुष्ट दलन में ऐसे लगे हैं कि राजीव गांधी का आधार ही ध्वस्त कर देंगे. फिर अंडमान के एक द्वीप में छुट्टी मनाते राजीव गांधी से मिलने अमिताभ बच्चन आए और विश्वनाथ प्रताप सिंह की वित्त मंत्रालय से छुट्टी हो गई. रक्षा मंत्री बना दिए गए. तब रक्षा मंत्रालय से बोफोर्स और एचडीडब्लू पनडुब्बियों के कंकाल निकल कर आए जिनने राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बने रहना मुहाल कर दिया. विश्वनाथ प्रताप सिंह नहीं रहे और फिर कांग्रेस से भी निकाल बाहर किए गए.

इंदिरा के बाद राजीव गांधी से भी उनकी खूब पटी थी. लेकिन अब कांग्रेस की राय में वे ऐसे विभीषण हो गए थे जो राजीव जैसे राम को रावण बना रहे थे.

इसके बाद वीपी, जेपी हो गए. यानी उनने सार्वजनिक पदों पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो आंदोलन शुरू किया उसने देश को इंदिरा गांधी के विरुद्ध जेपी आंदोलन की याद करवा दी. राजनीति में पहली बार विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस के विरोध में खड़े हुए. वे कोई तीस साल से नेहरू-गांधी परिवार के वफादार सिपाही माने जा रहे थे. इंदिरा के बाद राजीव गांधी से भी उनकी खूब पटी थी. लेकिन अब कांग्रेस की राय में वे ऐसे विभीषण हो गए थे जो राजीव जैसे राम को रावण बना रहे थे. चार साल पहले राजीव गांधी भारतीय राजनीति के मिस्टर क्लीन थे. अब मिस्टर क्लीन विश्वनाथ प्रताप सिंह थे और राजीव गांधी बोफोर्स के दलदल में धंस गए थे.

भ्रष्टाचार के विरुद्ध विश्वनाथ प्रताप सिंह की ऐसी जबर्दस्त छवि थी कि एक तरफ से मार्क्र्सवादी कम्युनिस्ट और दूसरी तरफ से भारतीय जनता पार्टी उनकी मदद करने को मजबूर थी. बीस साल पहले जब गैर-कांग्रेसवाद की लहर चली थी तब भी सारे कम्युनिस्ट बायीं तरफ से और जनसंघ दायीं तरफ से पूरी तरह किसी के साथ नहीं हुआ था. अब ’89 में ये दोनों राजीव गांधी के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह की पूरी मदद करने में लगे थे. इमरजंसी के बाद सन् ’77 में हुए चुनाव में भी विपक्ष की ऐसी एकता नहीं थी क्योंकि वामपंथियों ने जनता ताकतों का साथ देने से इनकार कर दिया था. लेकिन बारह साल बाद वे भी विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ थे. विश्वनाथ देश के सबसे बड़े नेता हो गए थे और आम लोग नारा लगाने लगे थे – राजा नहीं फ़कीर है देश की तकदीर है. चुनाव में राजीव गांधी हार गए और दिल्ली में पहली गठबंधन सरकार बनी जिसको बायीं ओर से वामपंथी और दायीं ओर से भारतीय जनता पार्टी समर्थन दिए हुए थी.

लेकिन जिस सरकार के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह हों वह पांच साल तो चल नहीं सकती थी. मंडल आयोग की रपट सभी पार्टियों को स्वीकार थी हालांकि कोई भी उसे लागू करने की पहल नहीं करता था. विश्वनाथ प्रताप सिंह इस सच्चाई को इंदिरा गांधी के जमाने से जानते थे. वे यह भी जानते थे कि भाजपा उन्हें दो साल से ज्यादा समर्थन देकर राज में नहीं रखेगी क्योंकि उसे खुद सत्ता हासिल करनी है. वामपंथी भी लगातार उनकी जनता दल सरकार को बनाए नहीं रख सकते थे क्योंकि उन्हें भी भाजपा के विरुद्ध सत्ता के लिए दांव लगाना जरूरी था. तब प्रधानमंत्री रहने के आठवें महीने में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रपट लागू करने की घोषणा की. यह अणु विस्फोट से भी ज्यादा विस्फोटक घोषणा थी क्योंकि इसने भारतीय राजनीति की यथास्थिति को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया. पिछड़ी जातियां पहली बार सत्ता के खेल में स्वायत्त शक्ति बन गईं और दलित अपनी वाली पर आ गए. इससे कांग्रेस का आधार ही ध्वस्त नहीं हुआ भाजपा को भी अपनी वणिक वृत्ति से बाहर आने पर मजबूर होना पड़ा. उसने राम का नाम लिया और कमंडल थाम लिया. क्षत्रिय विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सवर्ण जातियों के सत्ता के एकाधिकार को हमेशा के लिए तोड़ दिया.

बीसवीं सदी में राजनीति को ऐसे निर्णायक मोड़ पहले दो ही नेताओं ने दिए थे – मोहनदास करमचंद गांधी और इंदिरा गांधी ने. इतिहास अब तीसरे विश्वनाथ प्रताप सिंह को स्थान देगा. सत्ता का समीकरण बदलने वाला सत्ता में टिका नहीं रहता.     ’ 

आतंक : 'अ' से 'ज्ञ' तक

आखिर में आतंकी हमले की चेतावनियां कागजों पर ही धरी रह गईं. रात के अंधेरे में गेटवे ऑफ इंडिया के इलाके से मुंबई में दाखिल होने वाले आतंकियों को फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं थी. उन्हें देखकर कोई भी नहीं कह सकता था कि एक घंटे बाद वे ऐसा कहर बरपाने वाले हैं जिसे सारी दुनिया दम साधे देखेगी. कोई नहीं बता सकता था कि शहर के किसी आम नौजवान की तरह दिखने वाले ये लोग अभी-अभी लंबी समुद्री यात्रा तय करके आए हैं और मुंबई में आतंक की बरसात करने वाले हैं. 

वसे अपनी योजना पर अमल आतंकियों ने अल कुबेर नामक ट्रालर के कप्तान अमर सिंह सोलंकी की बेरहमी से हत्या करने के साथ ही शुरू कर दिया था. अल कुबेर यानी वो ट्रालर जिसमें उन्होंने मुंबई तक की अपनी यात्रा का दूसरा चरण पूरा किया था. आतंकी 24 नवंबर को इस ट्रालर पर चढ़े थे और मुंबई के पास पहुंचने के बाद एक स्पीडबोट की मदद से शहर के तट तक आए थे.

सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में जिंदा पकड़े गए एकमात्र आतंकी कसाव का कहना है कि वो और मारे गए उसके नौ साथी कराची के अजीजाबाद से एक छोटे जहाज में चढ़े थे. जल्द ही उन्होंने जहाज बदल लिया. अब ये अल हुसैनी नाम का पाकिस्तानी जहाज था जो कराची से 200 नॉटिकल मील की दूरी पर था. अगला नंबर कुबेर का था जो उन्हें उनके मकसद यानी मुंबई तक ले जाने वाला था. रास्ते में सोलंकी के चार साथियों की हत्या कर उनकी लाशें अरब सागर की अथाह गहराइयों में फेंक दी गईं. सोलंकी को तब तक जिंदा रखा गया जब तक आतंकियों को दूर से मुंबई की चमचमाती इमारतें नहीं दिखने लगीं. इसके बाद उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई. उनके हाथ-पांव भी बांध दिए गए और फिर क्रूरता से गला रेत कर उनकी हत्या कर गई.

इस दौरान आतंकियों ने तटरक्षक बलों की निगाह को चकमा दिया और नौसेना की सुरक्षा दीवार में सेंध लगाई. अब मुंबई सिर्फ तीन या चार नॉटिकल मील दूर रह गई थी और उन्हें ज्यादा फिक्र करने की जरूरत नहीं थी. धर्माधता और घृणा के घोल से भरे गए इन दिमागों की आखिरी मंजिल जन्नत थी.

आज भी कम ही लोग इससे असहमत होंगे कि जिस सहजता से वे लोग आए उससे यही आभास होता था कि वे बोट की सवारी करके ही लौट रहे हैं.

अजय मिस्त्री उन लोगों में से हैं जिन्होंने आतंकियों को सबसे पहले देखा. कफ परेड इलाके में मछुआरों की खाड़ी की तरफ से किनारे पर आए छह लोगों पर मिस्त्री की नजर पड़ी तो बीस से पच्चीस साल की उम्र के दिखते ये नौजवान पहनावे से उन्हें कालेज के छात्रों जसे लगे. दूसरा प्रत्यक्षदर्शी भारत और इंग्लैंड के बीच क्रिकेट मैच देखने में मशगूल एक लड़का था जो जब किसी काम से घर के बाहर आया तो उसने इन लोगों को देखा. जब उसने उनके बारे में पूछा तो उनमें से एक ने कहा कि वे कालेज स्टूडेंट्स हैं और अभी-अभी बोट की सवारी करके लौट रहे हैं. एक और प्रत्यक्षदर्शी अनिता राजेंद्र उदयार के सवाल पर आतंकियों ने कहा, ‘अपना काम करो.’

यहां के बाशिंदे बोट की सवारी का आनंद लेने वाले पर्यटकों को देखने के आदी थे मगर कंधों पर सामान्य से कहीं भारी बैग लटकाए लोग उनमें से नहीं थे. विडंबना देखिए कि आज भी कम ही लोग इससे असहमत होंगे कि जिस सहजता से वे लोग आए उससे यही आभास होता था कि वे बोट की सवारी करके ही लौट रहे हैं.

मिस्त्री के मुताबिक ये रात के करीब साढ़े आठ बजे की बात थी. एक घंटे बाद दो आतंकी एके-47 राइफलों के साथ छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) में दाखिल हुए. खुल्लेआम राइफलें लहराते हुए कसाव और अबू इस्माइल नाम के ये आतंकी प्लेटफार्म नंबर 13 पर पहुंचे जो रेलवे स्टेशन के प्रवेश द्वार के नजदीक ही है. सीएसटी उनका पहला निशाना था. रोज की तरह यहां काफी भीड़ थी. इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते अंधाधुंध गोलियां बरसने लगीं. कुछ ही पलों में प्लेटफॉर्म पर चीख-पुकार और अफरातफरी मच गई. जिन्हें गोलियां नहीं लगीं वे डर के मारे इधर-उधर भागने लगे. किसी को भी पता नहीं था कि क्या हो रहा है. स्टेशन पर तैनात एक सफाई कर्मचारी आनंद शेलगांवकर बताते हैं कि आतंकियों ने स्टेशन के बीचों-बीच एक हथगोला फेंका. इसका एक छर्रा उस रेलवे कर्मचारी की छाती में घुस गया जिसका काम ट्रेनों के प्रस्थान और आगमन की घोषणा करना था.

सवाल उठता है कि रेलवे पुलिस कहां थी? 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों में 187 लोगों के मरने के बाद रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा बढ़ाए जाने का दावा किया गया था.

गोलीबारी के प्रत्यक्षदर्शी रहे और उससे थोड़ी ही देर पहले नाइट डच्यूटी पर आए कांस्टेबल राजेंद्र सदाशिव इस अहम सवाल का जवाब देते लगते हैं. उनके शब्दों में ‘वे आर्मी वालों की तरह लग रहे थे. आर्मी वालों की तरह ही उन्होंने गहरे रंग के कपड़े पहन रखे थे और उनके पास बंदूकें थीं. इसलिए किसी को उन पर शक नहीं हुआ. मगर जब उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी तो मेरे सीनियर इंस्पेक्टर शशांक शिंदे ने उन पर फायरिंग करते हुए मुकाबला करने की कोशिश की तो उन्होंने भी ताबड़तोड़ जवाबी फायरिंग की. शिंदे घटनास्थल पर ही मारे गए. उन्होंने मुझ पर भी गोलियां चलाईं. हालांकि मुङो गोली लगी नहीं मगर मैं जमीन पर गिर पड़ा और खून में सन गया. उन्हें लगा कि मैं मर गया हूं और वे मेरे पास से फायरिंग करते हुए आगे बढ़ गए. ये सब करते हुए उन्होंने कोई बात नहीं की. किसी ने भी एक शब्द नहीं कहा. वे आपस में हाथों के इशारों से बात कर रहे थे.’ 

बिना किसी रुकावट मौत के ये सौदागर अपना काम करते रहे. कुछ ही मिनट के भीतर उन्होंने 40 जिंदगियां खत्म कर दीं थीं. अब उन्हें आगे बढ़ना था. रेलवे स्टेशन पर बूट पालिश करके पेट पालने वाला 11 साल का विलास हाथ में बड़ी सी बंदूक लिए एक आतंकवादी को देखकर फौरन एक बोर्ड के पीछे छिप गया. उसे अहसास हो गया था कि ये कोई गैंगवार या एनकाउंटर नहीं है क्योंकि फायरिंग एक-एक करके नहीं बल्कि बौछार के रूप में हो रही थी.

स्टेशन से बाहर निकलकर टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के सामने से गुजरते हुए कसाव और इस्माइल, कामा हास्पिटल में दाखिल हो गए. विलास ने बोर्ड के पीछे से झंककर देखा तो उसे लाशें, खून और बिखरे सामान के अलावा और कुछ नजर नहीं आया. इस तरह के किसी हमले के कुछ ही मिनट के भीतर हरकत में आ जाने वाले क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का कहीं अता-पता नहीं था. घायल, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बो थे, बस भगवान भरोसे थे. कामा अस्पताल के वे सुरक्षा गार्ड भी भगवान भरोसे थे जो आसानी से गोलियों का शिकार हो गए.

ये पता चलने के बाद कि पुलिस की एक कार हॉस्पिटल के पास आ रही है, दोनों आतंकियों में से एक चौथी मंजिल से दौड़ता हुआ नीचे आया. ये पहला संकेत था कि आतंकवादियों के पास फोन भी था.(अब जांच हो रही है कि उन्हें सिमकार्ड कैसे मिले और वे इतने जल्दी एक्टिवेट कैसे हो गए). यानी वे आपस में संपर्क कर सकते थे.

इस तरह के किसी हमले के कुछ ही मिनट के भीतर हरकत में आ जाने वाले क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का कहीं अता-पता नहीं था. घायल, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बो थे, बस भगवान भरोसे थे.

इसलिए जब तक एटीएस के मुखिया हेमंत करकरे, एनकाउंटर विशेषज्ञ विजय सालस्कर और एसीपी अशोक काम्टे को निशाना साधने का मौका मिलता तब तक गोलियों की ताबड़तोड़ बौछार उन्हें छलनी कर चुकी थी. कांस्टेबल अरुण जाधव को भी चार गोलियां लगीं और वे अचेत हो गए. आतंकियों ने उन्हें मरा समझकर छोड़ दिया. अब जाधव एक अहम गवाह हैं.

आईसीयू में अपनी चोटों से उबर रहे जाधव बताते हैं कि करकरे, सालस्कर और काम्टे की लाशों को क्वालिस से बाहर फेंकने के बाद दोनों आतंकी कार में सवार होकर मेट्रो सिनेमा की तरफ चल पड़े. इस दौरान वे रास्ते में चल रहे लोगों पर लगातार फायरिंग कर रहे थे. सड़क  के दूसरी तरफ खड़े पुलिसकर्मियों ने पहले तो सोचा कि क्वालिस में उनके अधिकारी सवार हैं मगर जल्द ही उन्हें समझ में आ गया कि आतंकियों ने कार पर कब्जा कर लिया है. उन्होंने भी जवाबी फायरिंग शुरू कर दी. इस बीच क्वालिस का टायर फटने से एक जोर का धमाका हुआ. मगर आतंकियों ने कार दौड़ाना जारी रखा. थोड़ी दूर जाने पर उन्हें एक स्कोडा कार दिखी जिसमें चार लोग सवार थे. बंदूकधारियों को देखते ही चारों डरकर कार से बाहर निकल आए और कार उनके हवाले कर दी. कसाव और उसके साथी को बहुत जल्दी थी. एक पुलिस सबइंस्पेक्टर खेडकर उनका पीछा कर रहे थे. खेडकर ने तुरंत इन चार लोगों से कार का नंबर लिया और पुलिस कंट्रोल रूम को सूचित कर दिया.

गिरगांव के नजदीक एक पुलिस चेक पोस्ट पर जब इस कार को रोकने की कोशिश की गई तो कार चला रहे इस्माइल ने यू टर्न लेना चाहा. मगर इस कोशिश में कार डिवाइडर से टकरा कर रुक गई. इससे पुलिसकर्मियों को फायरिंग करने का मौका मिल गया. अब मुकाबला थ्री नॉट थ्री और एके-47 के बीच था. इसमें एक पुलिसकर्मी तुकाराम उंबले और इस्माइल की मौत हो गई. खेडकर बताते हैं कि उन्होंने कसाव को भी मरा हुआ समझ लिया था मगर अस्पताल पहुंचने पर हमने पाया कि वह जिंदा है और गोलियों से उसे सिर्फ खरोंचें आई हैं.

उधर, जब सीएसटी में गोलियां चल रहीं थीं,तो तकरीबन उसी वक्त कसाव के दो साथी दक्षिण मुंबई में काफी लोकप्रिय लियोपोल्ड कैफे के दरवाजे पर खड़े थे. ये रेस्टोरेंट स्थानीय लोगों और विदेशी पर्यटकों का पसंदीदा ठिकाना है. रेस्टोरेंट में रोज की तरह भीड़ थी. दस मिनट के इंतजार के बाद वेटर ने दोनों को भीतर आने का न्यौता दिया. दोनों आतंकियों ने 1871 में बने इस रेस्टोरेंट में दाखिल होकर चारों तरफ निगाह डाली और कुछ सेकेंड बाद ही खाने में तल्लीन बेखबर लोगों पर गोलियों की बौछार कर दी. लियोपोल्ड के बाहर खड़े महमूद पटेल याद करते हैं कि उसके बाद आतंकी आराम से टहलते हुए बाहर निकले और थोड़ी ही दूरी पर स्थित ताज होटल की तरफ बढ़ गए.

सीएसटी में तबाही का मंजर था, गोलियों से छलनी महाराष्ट्र के शीर्ष पुलिस अधिकारियों के शव अस्पताल के बाहर पड़े थे और अब लियोपोल्ड में लाशों की गिनती होनी थी. भारत की आर्थिक राजधानी को बंधक बना लिया गया था. एक ही समय पर अलग-अलग जगहों पर हमले हो रहे थे और सरकार हैरान थी कि क्या हो रहा है.

मगर आतंकी हैरान नहीं थे.

लियोपोल्ड से निकलकर दोनों हत्यारे ताज पहुंचे जहां उनके दो साथी पहले ही मौत का खूनी खेल शुरू कर चुके थे. फायरिंग की खबर सुनकर यहां पहुंचे वसंत प्रभु नाम के एक प्रेस फोटोग्राफर ने एक आतंकी को ताज में घुसते हुए देखा और वे उसके पीछे चल पड़े. रास्ते में उन्हें एक डीसीपी मिले जो अपने एक अंगरक्षक और दो सुरक्षाकर्मियों के साथ होटल के भीतर दाखिल हो रहे थे. वसंत याद करते हैं, ‘जब तक हम पहली मंजिल पर पहुंचे तब तक आतंकियों ने फायरिंग शुरू कर दी थी. किसी तरह से हम तीसरी मंजिल तक पहुंच गए. डीसीपी के पास सिर्फ एक सर्विस रिवॉल्वर थी. सावधानी बरतते हुए उन्होंने नीचे यानी दूसरी मंजिल में झंकने की कोशिश की मगर एक आतंकी ने हमें देख लिया और हमारी तरफ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. बचने के लिए हम फर्श पर लेट गए और रेंगते हुए सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगे.’

एक ही वक्त पर कई जगहों पर हमले हो रहे थे. साढ़े नौ बजे के आसपास दो बंदूकधारियों ने कोलाबा में स्थित एक भारत पेट्रोलियम के एक फिलिंग स्टेशन पर हथगोला फेंका. ये स्टेशन यहूदियों के ठिकाने चबाड हाउस, जिसे नरीमन हाउस के नाम से भी जाना जाता है, के बगल में ही है. इन दो आतंकियों का लक्ष्य यही था और बिना रास्ता भटके जिस तरह से वे इसमें दाखिल हुए उससे नजदीक ही मिठाई की दुकान चलाने वाले विकी पाटिल हैरान रह गए. पाटिल कहते हैं, ‘किसी आम आदमी को ये जगह ढूंढने में अच्छी-खासी दिक्कत हो सकती है मगर उन लोगों को हर गली का पता था. ऐसा लग रहा था जसे उन्होंने इस जगह का बारीकी से अध्ययन किया हो.’

चबाड हाउस के मालिक रब्बी ग्रैबिएल होल्सबर्ग दुनिया भर से भारत आने वाले यहूदी घुमंतुओं को अपने यहां शरण देते थे. हथगोले के धमाके से चिंतित रब्बी ने पुलिस को फोन किया मगर तब तक आतंकी नरीमन हाउस में दाखिल हो चुके थे. उन्होंने वहां मौजूद नौ लोगों को बंधक बना लिया. रब्बी का दो साल का बेटा मोशे हालांकि भाग्यशाली रहा क्योंकि उसकी आया उसे सुरक्षित जगह पर ले जाने में कामयाब रही. जांच अधिकारियों का मानना है कि आतंकियों ने नौ बंधकों को एक-एक करके मारा. बचाव कार्य में मदद करने वाले विकी पाटिल बताते हैं कि बाहर निकाले जाने तक शवों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी. एनएसजी के निदेशक जे के दत्ता ने भी बाद में माना कि तीनों जगहों-ताज, ओबेरॉय और नरीमन हाउस पर कमांडो कार्रवाई शुरू होने से पहले ही सारे बंधकों की हत्या कर दी गई थी.

‘किसी आम आदमी को ये जगह ढूंढने में अच्छी-खासी दिक्कत हो सकती है मगर उन लोगों को हर गली का पता था.’

मगर कमांडो के आने में भी अभी भी पूरी रात बाकी थी. हमले की शुरुआत के ‘सिर्फ’ दो घंटे बाद एनएसजी को बुलाने का निर्देश दिया गया. सुबह पांच बजे कमांडो मुंबई में उतरे और वहां से उन्हें एक घंटा घटनास्थल पर पहुंचने में लगा. इस दौरान आतंकियों से लोहा लेने का जिम्मा मरीन कमांडोज यानी मार्कोस के कंधों पर था मगर अंधेरे और चालाक दुश्मन के सामने उनका हर दांव खाली गया. वसे भी डाइविंग और पानी के नीचे प्रशिक्षण लेने वाले मार्कोस के लिए ताज एक जमीनी भूलभुलैया था जबकि आतंकी उसकेचप्पे-चप्पे से वाकिफ थे.

सुबह एनएसजी कमांडो मुख्य द्वार के जरिए ताज में दाखिल हुए जहां पिछली रात को चार अनचाहे मेहमान अंधाधुंध फायरिंग करते हुए जा घुसे थे. आतंकियों की तैयारी कितनी जबर्दस्त थी इसका पता इस बात से चल जाता है कि होटल को उनसे मुक्त कराने में तीन दिन लग गए. उन्होंने कमरों में मौजूद मिनीबार से निकालकर शराब कालीनों और परदों पर छिड़क दी थी ताकि उनमें आसानी से आग और धुआं भड़क सके. इससे वे आगे बढ़ रहे कमांडो के रास्ते में रुकावटें खड़ी कर सकते थे. ऐसा हुआ भी.

होटल में रह रहे 19 साल के ओस्कारी पोल्चो दूसरी मंजिल पर बने अपने कमरे से बाहर आ रहे थे जब उन्होंने एक आतंकी को लोगों पर फायरिंग करते हुए देखा. जब तक वह कुछ समझ पाते तब तक बंदूक उनकी तरफ तन चुकी थी. एक गोली पोल्चो के हाथ में लगी और दूसरी जांघ में. कांपती आवाज में पोल्चो बताते हैं, ‘आतंकी को लगा कि मैं मर चुका हूं और वो दूसरे कमरों की तरफ बढ़ गया. मैं खून से लथपथ चुपचाप पड़ा रहा. फिर कमांडो पहुंचे और मुङो बचाया.’

उधर, आतंकियों का एक दूसरा जोड़ा ओबरॉय में दाखिल हो चुका था. रिसेप्शन पर फायरिंग करते हुए आतंकी, होटल के लोकप्रिय रेस्टोरेंट टिफिन में घुस गए. यहां उन्होंने एक बार फिर से गोलियों की बौछार की और इसके बाद कंधार की तरफ बढ़ गए. उन्होंने 17 लोगों को बंधक बना लिया और रेस्टोरेंट के ही एक कर्मचारी से ही उस जगह को आग में झोंकने को कहा. फिर वे बंधकों को 20वीं मंजिल पर ले गए. इस दौरान इनमें से एक बंधक ने अपनी पत्नी को फोन कर फुसफुसाते हुए अपनी हालत के बारे में बताया. ये पति-पत्नी की आखिरी बातचीत थी. गलियारे में बंधकों से दीवार की तरफ मुंह करने को कहा गया. एक बंधक ने पूछा भी कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं. जवाब आया, क्या तुमने बाबरी मस्जिद के बारे में नहीं सुना? क्या तुमने गोधरा के बारे में नहीं सुना? इसके बाद अगली आवाज ट्रिगर दबने की आई और सब कुछ खत्म हो गया.

दूसरी मंजिल पर मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के साथ मौजूद एनएसजी कमांडो सुनील कुमार उन पहले कुछ लोगों में से थे जिनका आतंकियों से सीधी मुठभेड़ हुई. कुमार को लगा कि कमरा नं. 271 से कुछ अजीब सी आवाजें आ रही हैं. उनका अंदाजा सही था. अचानक दरवाजा खुला, बंदूक लिए कोई छाया की तरह निकला और पलक झपकते ही गोलियां बरसाते हुए वापस कमरे में घुस गया. कुमार को तीन गोलियां लगीं थीं और मेजर को अब उन्हें सुरक्षित जगह पर ले जाना था. उन्होंने यही किया मगर अफरा तफरी में वे अपनी टीम से बिछड़ गए. उनके कान में एक छोटा सा रेडियो लगा था जिसके जरिये वे अपने अधिकारियों से बात कर सकते थे. मगर भीतर मौजूद अपने साथियों से संपर्क करने के लिए उन्हें उनका नाम लेकर आवाज लगानी पड़ी. उन्हें पता नहीं था कि एक आतंकी उनके काफी नजदीक है जिसने मेजर को निशाना बनाने में जरा भी देर नहीं लगाई. ऐसा स्वाभाविक ही था क्योंकि कसाव और दूसरे लोगों की तरह उसे भी एक साल से इसी तरह के कामों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा था.

कसाव के साथियों ने मार्कोस और एनएसजी कमांडो को 60 घंटों तक उलझए रखा. एनएसजी के मुखिया भी मानते हैं कि उन्हें लगातार अपनी रणनीतियां बदलनी पड़ीं. अलग-अलग मंजिलों और उन कमरों से होते हुए आगे बढ़ना भी एक चुनौती थी जिनमें मेहमानों ने खुद को बंद कर रखा था. दरवाजे के भीतर और बाहर मौजूद दोनों लोगों के लिए ये एक भयावह अनुभव था. मेहमानों के लिए ये जानना मुश्किल था कि दरवाजे पर मौत दस्तक दे रही है या उनका रक्षक. इसी तरह कमांडो के लिए भी ये मुश्किल थी कि जिस दरवाजे पर वे दस्तक दे रहे हैं उसके पीछे संकट में फंसी कोई जान है या उनका इंतजार करती मौत. हर कमरे की जांच करना बहुत तनाव भरा और समय लेने वाला काम था. किसी को भी ठीक-ठीक पता नहीं था कि अंधियारे गलियारों में कुल कितने आतंकवादी घूम रहे हैं. आ¬परेशन खत्म होने के बाद ही ये पता चल पाया कि कुल जमा छह आतंकी दो होटलों में तीन दिन तक 200 कमांडोज को उलझए रहे.

नरीमन हाउस में भी कुल दो आतंकियों ने कमांडोज का इम्तहान लिया. पुलिस ने आसपास की इमारतों को खाली करवा लिया था क्योंकि खिड़कियों से गोलियां चलाते आतंकियों ने इमारत के पास खड़े कई लोगों को शिकार बना लिया था. बाद में हेलीकाप्टर की मदद से कमांडोज नरीमन हाउस की छत पर उतरे और आतंकियों को मारकर इमारत को मुक्त किया. मगर रब्बी और उनकी पत्नी की तब तक हत्या कर दी गई थी. दूसरे शवों के माथे पर गोलियों के निशान बताते थे कि उन्हें काफी नजदीक से गोली मारी गई थी.

ताज, ओबेरॉय और नरीमन हाउस में मौत बरसाने वाले आठ आतंकी बचकर वापस जाने के इरादे से बिल्कुल नहीं आए थे. नरीमन हाउस में रखा हुआ कई किलोग्राम मांस अनछुआ मिला. आतंकियों के पास से बरामद सूखे मेवों की मात्रा बता रही थी कि वे लंबे समय तक आतंक का खेल खेलने की पूरी तैयारी से आए थे. उन्हें मौतों का आंकड़ा ज्यादा से ज्यादा रखना था. अंतिम आधिकारिक जानकारी बताती है कि ये आंकड़ा 198 है.

इसमें वे चार मेहमान शामिल नहीं हैं जिन्हें ओबेरॉय के कंधार रेस्टोरेंट से बंधक बनाकर होटल की 20वीं मंजिल तक ले जाया गया था. गोलीबारी के बाद गिरे लोगों में से ये चार ऐसे थे जो मरे नहीं, काफी समय तक लाशों के ढेर में पड़े रहे और जिन्हें इस भयावह अनुभव की यादें जिंदगी भर सिहराती रहेंगी.’

सॉरी भाई:लीक से कुछ ज्यादा ही हटके

सबसे पहले काम की बात. सॉरी भाईछोटे और मझोले शहरों की जनता के लिए कतई नहीं है. थोड़ा आगे बढ़ के ये भी कहा जा सकता है कि फिल्म बड़े शहरों में भी हरेक के लिए नहीं बल्कि केवल मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखने वाली जनता के लिए है. मगर शायद ये मल्टीप्लेक्स में भी 700 रुपये वाले लाउंज में लेट कर फिल्म देखने वालों और चंद दूसरे लोगों के लिए ही है. क्यों भई?

दो प्यार करने वाले शादी करने जा रहे हैं..लड़के के परिवार वाले इसमें शामिल होने आते हैं और होने वाले देवर और होने वाली भाभी को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. थोड़ी बहुत ऊंच-नीच के बाद बाकी सबकी समझ में ये सब आ जाता है – इनमें बड़ा भाई भी शामिल है – मगर मां को ये अजीबोगरीब उलट-पुलट कतई मंजूर नहीं. वो, देवर, जो अब पति बनने की जुगाड़ में है, को अपनी कसम खिला कर शादी करने से रोक देती है. बाद में किसी वजह से मां भी उलटफेर के लिए तैयार हो जाती है मगर..अब समस्या ये आती है कि जो मां की कसम खाई गई थी उसका क्या. तो उसका भी हल ढ़ूंढ़ लिया जाता है.जमाना आधुनिक है और शादी किए बिना भी तो पति-पत्नी की तरह रहा जा सकता है. मजे की बात ये कि ये सुझाव मां की तरफ से ही आता है. अब शायद क्यों का जवाब मिल गया होगा. मगर एक बात शायद 700 रुपये खर्चने वाले अतिआधुनिक दर्शक को भी नहीं पचेगी और वो ये कि मां की कसम जसी पुरातनपंथी चीज की खातिर लिव-इन रिलेशन जसी आधुनिक व्यवस्था का चुनाव किया जाना.

ओनीर रिश्तों की जटिलताओं को बहुत बढ़िया तरीके से बरतने के लिए जाने जाते हैं, जो कि इस फिल्म में भी नजर आता है. फिल्म में एक बहुत ही उच्च कोटि के सधे हुए हास्य के भी यत्र, तत्र, सर्वत्र दर्शन होते हैं, जिसे फिल्म के करीब-करीब सभी पात्र – विशेषकर बोमेन ईरानी, शबाना आजमी, शर्मन जोशी – उतने ही सधे तरीके से निभाते नजर आते हैं. सॉरी भाई से चित्रांगदा सिंह ने फिल्मों में वापसी की है और उनका अभिनय देख कर लगता है कि अपरंपरागत मगर ग्लैमरस और कमर मटकाऊ नहीं बल्कि दिमाग चलाऊ भूमिकाएं और वो मानो एक-दूसरे के लिए ही बने हों.

कुल मिलाकर निर्देशन या किसी दूसरे तकनीकी पक्ष में कोई कमी न होने के बाद भी सॉरी भाईकुछ ऐसी फिल्म है जिसे देख के पसंद करने के लिए कुछ अलग ही तरह की पसंद वाला होना जरूरी है. अलग मतलब सही मायनों में अलग.

संजय दुबे

इस्तीफा

चक्र सुदर्शन

इस्तीफा दें या नहीं, मन में भारी पीर,

दिल धकधक-धकधक करे छूट न जाए तीर.

छूट न जाए तीर तनी आलाकामान है,

और निकट ही विकट चुनावी घमासान है.

चक्र सुदर्शन, हमें चाहिए नए खलीफा,

अच्छा हो यदि सबके सब दे दें इस्तीफा.

                                                   अशोक चक्रधर

इस वर्ग की अन्य रचनायें

जाग स्वयं में लीन कुलीन

Tarun J palरोहिंटन मालू को जिस वक्त गोली लगी उस वक्त वे वही कर रहे थे जो उन्हें जिंदगी में सबसे ज्यादा प्रिय था – बढ़िया खाने का लुत्फ उठाना और नये-नये विचार सुझाना. रोहिंटन, ओबेरॉय-ट्राइडेंट के कंधार रेस्टोरेंट में मौजूद उन 17 लोगों में से थे जिन्हें बंदूक की नोक पर सीढ़ियों पर इकट्ठा होने को कहा गया था. ऊपरी तौर पर तो आतंकवादी ये दिखा रहे थे कि वे इन लोगों को बंधक बनाने जा रहे हैं मगर उनका असल इरादा सौदेबाजी का था ही नहीं. उनके एक हाथ में एके-47 थी और दूसरे में मोबाइल फोन. आधुनिकता और मध्यकालीन कट्टरता के इस विरोधाभास का प्रदर्शन करते उन हत्यारों ने अपने आकाओं से पूछा, ‘उड़ा दें?’ सिर्फ मौत के आंकड़ों से सरोकार रखने वाले उनके आका उधर से बोले, ‘उड़ा दो.’

रोहिंटन को सात गोलियां लगीं. और जब उनकी लाश बरामद हुई तो उसकी हालत ऐसी थी कि उन्हें सिर्फ उनकी उंगली में मौजूद अंगूठी से ही पहचाना जा सकता था. 48 साल का ये शख्स अपने पीछे छोड़ गया दो किशोरवय बो और अनगिनत अधूरे सपने. इनमें से कुछ सपने तहलका  के लिए भी थे जहां रोहिंटन पिछले दो सालों से बतौर स्ट्रैटेजिक एडवाइजर काम कर रहे थे. वे एक करिश्माई व्यक्तित्व थे और मीडिया मार्केटिंग में उनका करिअर सफलता की कहानियों से मिलकर बना था.

[box]अगर मुंबई में मरने वालों में से ज्यादातर उससे ताल्लुक रखने वाले नहीं होते तो देश की ज्यादातर दौलत और सुविधाओं तक पहुंच रखने वाले अभिजात्य वर्ग को इसकी फिक्र तक न होती.[/box]

रोहिंटन की मृत्यु में एक गहरी विडंबना भी छिपी है. उनकी मौत की वजह वही रही जिसकी अहमियत उनकी नजर में ज्यादा नहीं थी. हमारे साथ हर बैठक में वे राजनीति को लेकर तहलका  के जुनून पर बेहद अचंभे और असमंजस में पड़ जाते थे. उनका मानना था कि उनके या कहें कि हमारे वर्ग के किसी भी व्यक्ति की मुश्किल से ही राजनीति में दिलचस्पी होगी, भला इस काजल की कोठरी का हमारी जिंदगी से क्या वास्ता और अगर होगा भी तो इतना नहीं कि हम इस पर इतना ध्यान दें. हमारे कई सीधे और आड़े-तिरछे तर्कों के बाद रोहिंटन अनमने तरीके से ये तो मान लेते थे कि हम कुछ हद तक सही हो सकते हैं मगर ये मानने को जरा भी तैयार नहीं होते  कि ऐसा करना हमारे लिए व्यावसायिक रूप से फायदे का सौदा होगा. उनका तर्क होता था कि हमारे वर्ग के पाठकों की दिलचस्पी उन विषयों में होती है जो उनकी जिंदगी से जुड़ी हुई हैं मसलन, खानपान, फिल्में, क्रिकेट, फैशन, टीवी, स्वास्थ्य वगैरह वगैरह. राजनीति से संबंधित लेख तो उन पाठकों को मजबूरन झेलने पड़ते हैं.

विडंबना देखिए कि आखिर में रोहिंटन और उन जसे सैकड़ों बेगुनाहों की मौत की वजह राजनीति ही रही. वही राजनीति जो इस देश में हर दिन गरीबी, भुखमरी और उपेक्षा से हो रही लाखों मौतों की जड़ में है. अगर मुंबई में मरने वालों में से ज्यादातर उससे ताल्लुक रखने वाले नहीं होते तो देश की ज्यादातर दौलत और सुविधाओं तक पहुंच रखने वाले अभिजात्य वर्ग को इसकी फिक्र तक न होती. मगर मुंबई की घटना पर आज अगर सबसे ज्यादा शोर देश का यही कुलीन वर्ग मचा रहा है तो वजह सिर्फ यही है कि आतंक का ये जानवर आज अचानक अपनी सभी हदें पार कर उन संगमरमरी चारदीवारियों के भीतर घुस आया है जिनमें आज तक ये वर्ग खुद को सुरक्षित महसूस किया करता था. द ताज और द ओबेरॉय जसी जगहों पर इसी कुलीन वर्ग के लोग ठहरते हैं और खाना खाते हैं. वे पूछ रहे हैं. क्या इस देश में अब कोई जगह महफूज नहीं रही?

जिस कड़वी हकीकत से भारत का कुलीन वर्ग पांचसितारा होटलों में नजर आ रहे मलबे के टुकड़ों को देखकर दो-चार हो रहा है उसी कडवे सच को करोड़ों आम भारतीय रोज ङोलने को मजबूर हैं. भुखमरी से मर रहे बच्चे, आत्महत्या कर रहे किसान, शोषण का शिकार हो रहे दलित, सैकड़ों साल पुराने बसेरों से खदेड़े जा रहे आदिवासी, कारखानों के लिए जमीनों से बेदखल हो रहे किसान, अलग-थलग पड़ रहे अल्पसंख्यक..वे जानते हैं कि कुछ ऐसा है जो बहुत गलत हो रहा है. वे जानते हैं कि व्यवस्था काम नहीं करती, ये क्रूर हो गई है, इसमें इंसाफ नहीं मिलता और ये बस उन्हीं के लिए है जो इसे चला रहे हैं. कुलीन वर्ग से ताल्लुक रखने वाले हम लोगों को समझना होगा कि हममें से ज्यादातर इस व्यवस्था से मिले हुए हैं. ज्यादा संभावना यही है कि हमारे पास जितनी ज्यादा सुविधाएं और पैसा है इस अन्यायी व्यवस्था को पनपाने में हमारी भूमिका उतनी ही बड़ी हो.

हम सबके ये समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में इसकी राजनीति होती है. अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है. कई दशक से इस देश का अभिजात्य वर्ग देश की राजनीति से हाथ झड़ता रहा है. पीढ़ियां की पीढ़ियां इसे एक गंदी चीज मानते हुए बड़ी हुईं. लोकराजनीति के जरिए आधुनिक भारत के निर्माण का विचाररूपी बीज बोया जाना और उसका खिलना इस महाद्वीप में पिछले एक हजार साल में हुआ सबसे अनूठा और असाधारण प्रयोग था. मगर पिछले 40 सालों में इसकी महत्ता को मिटाने की कोई कसर हमने नहीं रख छोड़ी है. हमारे संदर्भ में ये दोष हमारे मां-बाप का और हमारे बच्चों के संदर्भ में ये दोष हमारा है कि हमने संगठित दूरदृष्टि, संगठित इच्छाशक्ति और संगठित कर्मों की उस विरासत को आगे नहीं बढ़ाया. एक शब्द में कहें तो उस राजनीति को आगे नहीं बढ़ाया जिसने अपने स्वर्णकाल में एक उदार और लोकतांत्रिक देश बनाने का करिश्मा कर दिखाया था. आज रसातल को पहुंची राजनीति से उसी देश के बिखर जाने का खतरा आसन्न है.

इस तरह से देखा जाए तो हम दो तरह से दोषी हैं. एक, उस सामूहिक प्रयास को विस्मृत करने के और दूसरा, जो हो रहा है उसको बिना विरोध किए स्वीकारने के. ऐसा हमारी स्वार्थी वृत्ति और उथली सोच के कारण हुआ है. शाइनिंग इंडिया में हम जैसे साधनसंपन्न लोगों की जिंदगी बेहतर होती जा रही है और हमें लग रहा है कि सब कुछ बढ़िया चल रहा है. हम इस आधे सच में जीकर खुश हैं और बाकी लोगों की मुश्किल जिंदगी को देखना ही नहीं चाहते. दूसरे समाजों के पतन का कारण बने कुलीन वर्ग की तरह हम भी अपनी ऊर्जा का ज्यादातर हिस्सा सोचने-विचारने की बजाय खूब कमाने और उसे उड़ाने पर खर्च कर रहे हैं. हम चटपटी गपबाजियों में वक्त बिता रहे हैं और उन चीजों की तरफ नहीं देख रहे जिनसे हम असहज महसूस करते हैं.

कई सालों से ये साफ दिखाई दे रहा है कि जिस समाज में हम रहते हैं वह भेदभाव, भ्रष्टाचार, कट्टरता, नाइंसाफी जसी बुराइयों के चलते खोखला होता जा रहा है. राजनीतिक नेतृत्व लगातार उन नीतियों पर चलता जा रहा है जो जाति, भाषा, धर्म, वर्ग, समुदाय और क्षेत्र जसी दरारों को चौड़ा कर समाज को बांटती जा रही हैं. दुनिया के सबसे जटिल समाज के अभिजात्य वर्ग के रूप में हम ये देखने में असफल रहे हैं कि हमारे जटिल तानेबाने के कई जोड़ अत्यधिक संवेदनशील हैं. यानी एक गलती हादसों की एक पूरी श्रंखला पैदा कर सकती है. कांग्रेस ने अकालियों की हवा निकालने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया, भिंडरावाले ने आतंकवाद को पैदा किया, इंदिरा गांधी ने आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा खोला, आतंकवाद ने इंदिरा गांधी की जान ले ली और इंदिरा गांधी की मौत से हुई हिंसा हजारों बेगुनाह सिखों के नरसंहार की वजह बनी. इस एक दशक के दौरान अनगिनत बेगुनाह, उग्रवादी और सुरक्षाकर्मी मारे गए.  इसी तरह मंडल की हवा निकालने के लिए भाजपा ने कमंडल का कार्ड खेला, उन्मादी कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी, दंगे भड़के, बदला लेने के लिए मुंबई धमाके हुए, दस साल बाद गुजरात में कार सेवकों से भरी एक बोगी जली, अगले कुछ दिनों में राज्य में 2000 मुसलमानों का नरसंहार हुआ, छह साल बाद आज भी इसकी प्रतिक्रिया में हिंसा जारी है.

एक और उदाहरण है. 1940 के दशक की शुरुआत में आजादी की लड़ाई के बीच में अचानक कुलीन मुस्लिम वर्ग एक अलग इस्लामी देश की मांग करने लगा, महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया, अंग्रेजों ने इसका समर्थन किया, बंटवारा हुआ, दंगों में दस लाख लोग मारे गए, दो देशों में चार लड़ाइयां हुईं, दोनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा एक दूसरे के खिलाफ खर्च हुआ, परमाणु हथियारों का जखीरा बना, मुंबई पर हमला हुआ.

इन सभी श्रंखलाओं में एक बात समान है. इनकी शुरुआत कुलीन वर्ग द्वारा लिए गए फैसलों से हुई. अनिगिनत विविधताओं से गुंथकर बना भारत का ताना-बाना बेहद नाजुक और जटिल है. कुलीन वर्ग के लिए ये बहुत अहम है कि वह इस तानेबाने और उसमें अपनी भूमिका को समझे. पूंजी, प्रभाव और सुविधाएं उसके नियंत्रण में हैं. वह इस ताने-बाने की मरम्मत कर सकता है. उसके पास देने के लिए काफी कुछ है और उसे उदारता से देना ही होगा. आम जनता, जिसके पास कुछ भी नहीं है, का गुस्सा और क्षोभ इस तानेबाने को सिर्फ पूरी तरह से ढहा सकता है. और याद रखें कि ज्वालामुखी जब फटता है तो  उसमें अमीर और गरीब सभी समान रूप से जल जाते हैं.

सवाल उठता है कि फिर हमें क्या करना चाहिए? नेताओं को गालियां देने को निश्चित रूप से राजनीतिक जागरूकता नहीं कहा जा सकता. और वातानुकूलित जिंदगी जीने वालों की पाकिस्तान पर बम गिराने और टैक्स न भरने की मांग को भी बेतुका ही कहा जाएगा. इस तरह के मूर्खतापूर्ण नाटक को दिखाने की बजाय मीडिया को इसकी उपेक्षा करनी चाहिए. दुनिया में दुश्मनी की पहले ही अति हो चुकी है. हमें इसे शांत करने की जरूरत है न कि भड़काने की. जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो वह तो खुद ही गिरी हुई राजनीति की वजह से बर्बाद है. इसे बमों की बरसात की नहीं बल्कि मदद के हाथ की जरूरत है. याद रखना होगा कि जब संवेदनहीन नौकरशाह गुस्से में अपने दांत पीसते हैं तो इसका शिकार मासूम बच्चों को होना पड़ता है.

[box]हमारे संदर्भ में ये दोष हमारे मां-बाप का और हमारे बच्चों के संदर्भ में ये दोष हमारा है कि हमने संगठित दूरदृष्टि, संगठित इच्छाशक्ति और संगठित कर्मों की उस विरासत को आगे नहीं बढ़ाया.[/box]

पिछले कुछ दिन से हो रहे प्रदर्शन और नारेबाजी सामूहिक तौर पर अपना गुस्सा निकालने से ज्यादा कुछ नहीं. सच पूछिए तो नेता भी वही कर रहे हैं जो हम कर रहे हैं. यानी सिर्फ अपने लिए सोचना, ज्यादा से ज्यादा कमाई करना और देश की बेहतरी के रास्ते में खड़ी चुनौतियों से मुंह मोड़ लेना. बस नेता की पहुंच ज्यादा है तो वह ये काम ज्यादा बेहतर तरीके से कर रहा है.

सबसे पहले हमें सच को ईमानदारी से स्वीकारने की जरूरत है. इस बात को मानने की जरूरत है कि हमने राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया की गाड़ी पटरी से उतार दी है. पांच करोड़ भारतीयों की समृद्धि से देश विकसित नहीं हो जाएगा, खासकर तब जब 50 करोड़ लोगों के लिए जिंदा रहना ही एक संघर्ष हो. आजादी के 60 साल बाद भी आसानी से कहा जा सकता है कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व और कुलीन वर्ग ने देश के वंचितों को बुरी तरह निराश किया है. अगर आप देखने की जहमत उठाएं तो आज का भारत वो जगह है जहां नवजात बो मक्खियों की तरह मरते हैं और जहां समान अवसरों की बात एक क्रूर मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं.

एक बात हमें साफ तौर पर जान लेनी चाहिए. हम पर संकट इसलिए नहीं है क्योंकि ताज में मौत का तांडव हुआ बल्कि इसलिए है कि गुजरात में 2000 मुसलमानों की हत्या के छह साल बाद भी इंसाफ का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है. गैरबराबरी के बाद ये दूसरी बात है जिसे कुलीन वर्ग को समझना होगा. सभ्यता की शुरुआत से ही हर समाज की बुनियाद इंसाफ का पहिया रहा है. आप सिर्फ उन लोगों के लिए ही मोमबत्तियां कैसे जला सकते हैं जो आपके वर्ग से हों. आपको हर नागरिक के लिए आवाज उठानी होगी.

हमें नए कानूनों की जरूरत नहीं है. जरूरत है तो ऐसे लोगों की जो पहले से ही मौजूद कानूनों पर अमल सुनिश्चित कर सकें. आज हमारी सारी संस्थाएं और प्रक्रियाएं जर्जर हो रही हैं. हमने उन मूल्यों और दूरदृष्टि के साथ ही समझौता कर लिया है जिन्हें ध्यान में रखकर इन संस्थाओं की नींव रखी गई थी. अब हर संकट की घड़ी में क्षत बचाने के लिए हम साहस के चंदेक व्यक्तिगत उदाहरणों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं. हमें ये याद रखना होगा कि महान व्यवस्थाएं और समाज ऐसे प्रेरणादायीकार्यों की एक समूची श्रंखला से बनते हैं जिनकी सोच निजी स्वार्थ के परे हो. अपने ऊपर से प्रेरणा पाकर लोग अपना सर्वोत्तम करने का प्रयास करते हैं. चारों तरफ नजर दौड़ाइए. कितने कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, सब इंस्पेक्टर ऐसे होंगे जो उन भ्रष्ट लोगों के लिए अपनी जान दांव पर लगाएंगे जिनकी सेवा में वे तैनात रहते हैं.

काश मुंबई में पिछले हफ्ते बरसे आतंक में रोहिंटन की जान बच जाती. एक पल में वे हमारा पक्ष समझ गए होते. आर्थिक और सामाजिक सुधारों से कहीं ज्यादा जरूरत आज राजनीति में आमूल-चूल बदलाव की है, उस शुचिता की, जिसने देश को आजादी दिलाई. भारत के कुलीन वर्ग को अपने हाथों के गंदे होने का डर छोड़ना होगा. तभी उसे एक साफ-सुथरा देश मिल सकेगा.

तरुण तेजपाल

स्वचालित राजनीति

ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब कांग्रेस जोश से सराबोर थी. होती भी क्यों नहीं, आखिर उसने परमाणु करार पर अविश्वास मत में अपने विरोधियों को पटखनी जो दे दी थी. उसे यकीन था कि वो इस उपलब्धि को चुनावी मुद्दा बनाकर मैदान मार लेगी. इसके पब्लिसिटी डिपार्टमेंट ने परमाणु करार के फायदे गिनाती एक पुस्तिका तैयार की थी और पार्टी के प्रवक्ता इस उपलब्धि के गीत गाते चैनल-चैनल घूम रहे थे. विज्ञान और तकनीक मंत्री कपिल सिब्बल के शब्द थे, ‘प्रधानमंत्रीजी को इसके लिए याद किया जाएगा और उनके समर्थन के लिए सोनिया जी को भी. सीधी सी बात है. बिजली ऐसी चीज है जो गरीब से गरीब और अमीर से अमीर आदमी को चाहिए.पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनीष तिवारी का कहना था, ‘1990 की शुरुआत से चुनाव तीन अहम मुद्दों पर लड़े गए हैं-बिजली, पानी और सड़क. करार का मतलब है बिजली.उधर, राहुल गांधी तो मनमोहन को पूरा समर्थन देते हुए यहां तक कह गए कि अगर इस मुद्दे पर सरकार गिर भी जाती है तो उन्हें कोई अफसोस नहीं होगा क्योंकि करार देश के लिए अच्छा है और इस पर आगे बढ़ने के लिए हिम्मत चाहिए.

मगर कुछ ही दिनों में हालात बदल चुके हैं. परमाणु करार को अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि करार देने वाली कांग्रेस में आज वो ऊर्जा कहीं नजर नहीं आ रही. अगर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में हो रहे विधानसभा चुनावों को 2009 में होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारी का पैमाना माना जाए तो पार्टी दिशाहीन नजर आती है. छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक रैली तक नहीं की. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी दूसरे चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन मात्र एक रैली को संबोधित करने पहुंचीं. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दावा करते हैं कि पार्टी ने युद्धस्तर पर रणनीति बनाने के लिए एक वॉर टीमका गठन किया था. मगर हर शाम बैठक करने वाली ये टीम रणनीति बनाने की बजाय भाजपा की रणनीति पर निगाह रखने का काम ज्यादा करती दिखी. यानी पार्टी ने आक्रामक होने की बजाय सुरक्षात्मक रवया अपनाया.

इसलिए अखबारों और टीवी के जरिए जबर्दस्त प्रचार अभियान में जुटी भाजपा जहां तैयारी के मामले में पूरी तरह से चाकचौबंद नजर आती है, वहीं आखिरी समय तक भी अपनी चुनावी रणनीति को आखिरी रूप नहीं दे पाई कांग्रेस इस मामले में पिछड़ गई लगी. चुनाव से कुछ दिन पहले ही इस बारे में पूछने पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना था, ‘कुछ दिन इंतजार कीजिए. हम राजस्थान में एक बढ़िया विज्ञापन लेकर आ रहे हैं जो इस सवाल का जवाब देगा कि क्यों मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मैदान से गायब हैं.हमने उनसे पूछा कि ये जवाब क्या होगा और उनके शब्द थे, ‘ये आपको विज्ञापन में दिख जाएगाउन्हें रैंप पर चलते हुए दिखाया गया है.

अगर चुनाव से हफ्ता-दस दिन तक पहले तक भी विज्ञापन पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाए तो ये साफ तौर से राजनीति के रैंप पर पार्टी की लड़खड़ाती चाल का संकेत लगता है. दूसरे घटनाक्रम भी इस अनुमान को बल देते लगते हैं. मसलन राजस्थान में 200 उम्मीदवारों में से आखिरी 86 के नामों की घोषणा नामांकन की तारीख से ऐन दो दिन पहले की गई. इस चुनावी समर में अपनी तैयारियों को लेकर पार्टी की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि उसने उस एके एंटनी समिति की सिफारिशों पर कोई ध्यान नहीं दिया जिसे कर्नाटक चुनावों में पार्टी की हार के बाद बनाया ही इसलिए गया था कि इससे सबक लेकर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए रणनीति बनाई जा  सके. इसके एक सदस्य का तहलका से कहना था कि समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर से राज्यवार रणनीति की जरूरत पर जोर दिया था. इसका सुझाव था कि विधानसभा के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कम से कम 45 दिन पहले ही कर दी जाए. साथ ही पार्टी महासचिवों से लेकर राज्य, जिला और ब्लाक स्तर तक के कार्यकर्ताओं को निश्चित समय देकर उनकी जिम्मेदारियां निर्धारित की जाएं. एक और अहम सुझाव ये भी था कि एक-एक चुनावी क्षेत्र का बारीकी से अध्ययन और प्रबंध किया जाए और पार्टी के भीतर के झगड़े सुलझाए जाएं. मगर हालात देखकर लगता है कि ये सुझाव बस कागजों पर ही रह गए.

पांच महीने पहले गुजरात के द्वारका में पार्टी का एक शिविर लगा था जहां कार्यकर्ताओं और नेताओं ने आपसी प्रतिद्वंदिता को भूलकर जीत के लिए मिलकर काम करने की शपथ खाई थी. मगर मध्य प्रदेश पर नजर डाली जाए तो लगता नहीं कि इस शपथ का पालन हो रहा है. यहां पार्टी कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी, ज्योतिरादित्य सिंधिया और मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह के खेमों में बंटी हुई है.

किसी पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले जितने कारक हो सकते हैं, सब के सब कांग्रेस में दिख रहे हैं मसलन गुटबाजी, रणनीति का अभाव, चरमरा रही पार्टी मशीनरी और नए और लोगों पर असर छोड़ने वाले मुद्दों की कमी. हालांकि दिलचस्प ये है कि महंगाई और आतंक को लेकर भाजपा के हमले के चलते बचाव की मुद्रा में दिख रही कांग्रेस को इसकी ज्यादा चिंता नहीं. तर्क ये दिया जाता है कि पार्टी की शुरुआत हमेशा धीमी रहती है लेकिन आखिर में वो अंतर को पाट लेती है. 

इशारा शायद 2004 की तरफ है मगर शायद पार्टी इस बात को अनदेखा कर रही है कि तब ऐसा उसकी कोशिशों से कम और अपने आप ज्यादा हुआ था. और वसे भी 2004 को हुए चार साल बीत चुके हैं और इस दौरान हालात में काफी बदलाव आ चुका है. दरअसल देखा जाए तो तब से लेकर आज तक कांग्रेस 12 राज्यों के चुनावी समर में पटखनी खा चुकी है. इसे न सिर्फ पंजाब और कर्नाटक में सत्ता गंवानी पड़ी बल्कि उन राज्यों में भी हार का मुंह देखना पड़ा जहां ये सत्ता में नहीं थी और जहां सत्ता विरोधी लहर कांग्रेस के पक्ष में जानी चाहिए थी.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेसनीत यूपीए के पास वोटरों को लुभाने के लिए मुद्दे ही नहीं हैं. सलमान खुर्शीद कहते हैं, ‘बराक ओबामा की जीत में मुद्दा क्या रहा? मुद्दा था बेहतर शासन. राहुल गांधी भी विकासोन्मुखी शासन की जरूरत पर जोर देते हैं. हमें एक ऐसा अभियान बनाने की जरूरत है जो लोगों तक पहुंच सके. आखिर सरकार ने चांद पर भारत का झंडा फहराया है. इसके अलावा नरेगा, परमाणु करार, सूचना का अधिकार जसी उपलब्धियां हैं. हमारी समस्या ये है कि प्रचार योजनाओं में एकरूपता नहीं है.

खुर्शीद की बात से लगता है कि सत्ताधारी पार्टी के पास सही नारों, मुद्दों और बढ़िया वक्ताओं की कमी है. वॉर ग्रुप के एक सदस्य कहते हैं, ‘ सभी राज्य चाहते हैं कि सोनिया और राहुल वहां आकर प्रचार करें.मगर जब वोटरों को नामांकन वाले दिन तक भी अपने प्रतिनिधियों की जानकारी न हो तो लगता नहीं कि ये काफी होगा. मध्य प्रदेश को देखते हुए कहा जा सकता है कि पार्टी के पास न तो गठबंधन के लिए कोई योजना है और न इसके न होने से पैदा होने वाले हालात से निपटने के लिए.

गौरतलब ये भी है कि 1996 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी एके एंटनी की अध्यक्षता में ही एक समिति बनाई गई थी और इसने एक व्यापक रणनीति भी तैयार की थी. मसलन समिति ने अपनी रिपोर्ट में सुझव दिया था कि बिहार में अपनी दशा सुधारने के लिए पार्टी को राष्ट्रीय जनता दल और झरखंड मुक्ति मोर्चा जसे दलों के साथ गठबंधन से दूर रहना चाहिए. इसके उलट समिति ने बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ चुनावी तालमेल विकसित करने की वकालत का थी. मगर आज जो हो रहा है वो ठीक इसका उल्टा है.

कांग्रेस जानती है कि कमियां क्या हैं मगर जैसा कि एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘हममें से ज्यादातर इसमें दिलचस्पी रखते हैं कि पार्टी ने हमारे लिए क्या किया है बजाय इसके कि हम पार्टी के लिए क्या कर सकते हैं. हम (गांधी-नेहरू) परिवार की तरफ देखते हैं मगर ज्यादातर का उससे सीधा संवाद हो ही नहीं पाता. कांग्रेस एक ऐसे व्यक्ित की तरह हो गई है जिसके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया हो और इसकी वजह है कमजोर होती विचारधारा.पार्टी में किचन कैबिनेट की तरफ इशारा करने वाले ये कांग्रेस के अकेले नेता नहीं हैं. दरअसल कांग्रेस में जिम्मेदारियां और अधिकार कुछ चुनिंदा लोगों के हाथ ही में रहते हैं. इस तरह एक व्यक्ित के ऊपर कई जिम्मेदारियों का बोझ पड़ जाता है. मसलन हाल में दंडस्वरूप अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दी गईं मार्गेट अल्वा छह राज्यों की प्रभारी थीं. इनमें मिजोरम भी शामिल था जहां चुनाव हो रहे हैं. ये जिम्मेदारी तुरंत आस्कर फर्नाडिंस के कंधे पर डाल दी गई जिनके पास कुछ कर दिखाने के लिए सिर्फ दो हफ्ते थे. पृथ्वीराज चव्हाण का उदाहरण भी है जो प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री होने के अलावा जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक और त्रिपुरा के प्रभारी भी हैं. इसी तरह दिग्विजय सिंह वॉर ग्रुप के सदस्य होने के अलावा प्रचार कमेटी के भी इंचार्ज हैं मगर वो मध्य प्रदेश में चुनाव अभियान में भी व्यस्त हैं.

कुछ के मुताबिक सोनिया गांधी के पास जरूरत के मुताबिक सक्षम सिपहसालार नहीं हैं जो उनकी मदद कर सकें. मगर जिस एक चीज पर पार्टी हाईकमान को सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है वो है मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में किसी को पेश करने की इसकी अनिच्छा. राजस्थान में चुनाव अभियान की जिम्मेदारी संभालने वाले अशोक गहलोत को अपनी नियति का पता. मध्य प्रदेश में भी मुख्यमंत्री की कुर्सी के कई उम्मीदवार हैं और छत्तीसगढ़ में भी मामला ऐसा ही है जहां अजित जोगी और महेंद्र कर्मा इस दौड़ में हैं. बस सिर्फ दिल्ली में ही जीत की हालत में शीला दीक्षित को लेकर कोई शक-सुबहा नहीं है. मगर ऐसा किसी रणनीति की वजह से नहीं बल्कि इसलिए है क्योंकि कांग्रेस को उम्मीद है कि राष्ट्रकुल खेलों तक दिल्ली को विश्वस्तर का शहर बनाने के लिए दीक्षित के प्रयास उन्हें लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा सकते हैं. वॉर ग्रुप के एक सदस्य से जब हमने पूछा कि भाजपा के हेमामालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना और स्मृति इरानी जसे सितारों का मुकाबला करने के लिए उनके पास क्या है तो उनका जवाब था, ‘हम गोविंदा के लिए कोशिश कर रहे हैं मगर राजबब्बर ने हमें कुछ तारीखें दी हैं.

आज अगर भारतीय लोकतंत्र की ये सबसे पुरानी पार्टी अव्यवस्थित और बदहाल दिखाई दे रही है तो इसकी एक वजह अलग-अलग मुद्दों को लेकर इसके नेताओं के दृष्टिकोण में एकरूपता का अभाव भी है. मसलन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को एक बार भी ये नहीं बताया गया कि पोटा, अफजल गुरू या फिर रामसेतु जसे अहम मुद्दों पर उन्हें क्या रुख अपनाना है. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, ‘हमारे पास एक थिंक टैंक का अभाव है. फ्यूचर चैलेंजेंस कमेटी इसका विकल्प नहीं हो सकती. राहुल गांधी युवा इकाइयों को लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश में व्यस्त हैं मगर जमीनी स्तर पर पार्टी को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयोग अभी सिर्फ पंजाब तक ही पहुंचा है जबकि बड़ी लड़ाई सिर्फ पांच महीने ही दूर है.

उधर, बदलाव को लेकर पुराने नेताओं की हिचकिचाहट से राहुल खुश नहीं हैं. वो शिकायती लहजे में कई बार इसका संकेत भी दे चुके हैं. हाल ही में इलाहबाद में छात्रों से बात करते हुए उनका कहना था, ‘हम लोगों को भूल चुके हैं. इससे आम आदमी और नेताओं के बीच एक दूरी पैदा हो गई है. अब हमें लोगों के पास जाकर इस दूरी को पाटने की कोशिश करनी चाहिए.राहुल के एक करीबी विश्वासपात्र बताते हैं, ‘हम जानते हैं कि क्या किए जाने की जरूरत है. राहुल के एक दलित के घर में रात बिताने के बाद पार्टी को इस उदाहरण का अनुसरण करना चाहिए था. दूसरे कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को अगले छह महीने तक यही करने की जरूरत थी.

इससे सवाल उठता है कि क्या पार्टी इतनी दिग्भ्रमित या अनुशासनहीन है कि ये उन्हीं नेताओं का अनुसरण नहीं करती जिन पर ये भरोसा करती दिखती है? सबसे मुख्य समस्या ये है कि पार्टी में ऐसे लोगों की कमी है जो कोई पहल कर सकते हों. यहां तक कि वरिष्ठ कांग्रेसजन भी दिशानिर्देशों के लिए लगातार 10 जनपथ का मुंह ताक रहे हैं. वे सही कदम उठाने पर ध्यान लगाने की बजाय इससे डर रहे हैं कि कोई गलत कदम न उठा बैठें.

छह महीने तक पसीना बहाने की बात तो एंटनी समिति भी कह चुकी है. इसका प्रस्ताव था कि चुनावी दौड़ में आगे रहने के लिए लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा छह महीने पहले ही कर दी जानी चाहिए. इसने तो यहां तक कहा कि जिन सीटों पर कांग्रेस लगातार हारती रही है वहां ये काम एक साल पहले ही हो जाना चाहिए. मगर कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं, ‘हमें कम करके मत आंकिए. हमारे दिमाग में एक बड़ी तस्वीर है. सिर्फ कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो देश की एकता को बनाए रख सकती है.

अगर ऐसा हो जाता है तो ये किस्मत से ही होगा. ठीक वैसे ही जैसे 2004 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव हारने के बावजूद कांग्रेस केंद्र की सत्ता पर काबिज हो गई थी.