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पुराना घर, नया मुखिया

कुछ दिन पहले तक आर्थिक मंदी की मार से अर्थव्यवस्था को बचाने की जुगत में जुटे पलानिअप्पन चिदंबरम देश के 16वें गृहमंत्री बन गए हैं. 26 नवंबर को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद सरकार पर से उठ चुके जनता के विश्वास को बहाल करने के मकसद से ये क़दम उठाया गया है. कुर्सी संभालते ही चिदंबरम ने कहा कि इस तरह का आतंक उस विचार पर हमला है जिस पर भारत की बुनियाद रखी गई थी और वे इससे निपटने के लिए दृढ़संकल्प हैं. 

लगता है कि चिदंबरम का वित्तमंत्रालय से गृहमंत्रालय में तबादला 22 साल पहले राजीव गांधी सरकार में गृहराज्यमंत्री के रूप में उनके प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए किया गया है. हालांकि 1986 से अब तक स्थितियां काफी हद तक बदल चुकी हैं. उस वक्त चिदंबरम के सामने सबसे बड़ी चुनौती 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई हिंसा की आग थी जबकि आज उनके सामने आतंकवाद का दावानल है. 

चिदंबरम के तबादले की बड़ी वजह ये है कि वित्त मंत्रालय संभालने के लिए उनसे भी बेहतर एक शख्स मौजूद है और वो हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. इसके अलावा चिदंबरम के हावभाव और लोगों से संवाद स्थापित करने की क्षमता उनके पूर्ववर्ती शिवराज पाटिल से कहीं बेहतर है. अगर किसी तरह की असामान्य स्थिति पैदा नहीं होती है तो आम चुनावों से पहले चिदंबरम को नए मंत्रालय में चार महीने या इससे कुछ ज्यादा काम करने का अवसर मिलेगा. हालांकि किसी तरह का बदलाव लाने के लिए चार महीने का वक्त बहुत कम होता है लेकिन दिग्भ्रमित पाटिल से हुए नुकसान को कम करने के लिए ये वक्त पर्याप्त है. 

पूर्णकालिक गृहमंत्री के रूप में चिदंबरम की पहली चुनौती होगी देश की सुरक्षा एजेंसियों को कुंभकर्णी नींद से जगाना जो मुंबई में हमले के दौरान अपनी डच्यूटी पर सोते हुए रंगे हाथ पकड़ी गईं. खुफिया एजेंसियों के सूत्र बताते हैं कि उन्होंने 12 और 19 नवंबर को सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों को ये जानकारी दी थी कि मुंबई में एक बड़ा हमला हो सकता है. बावजूद इसके नौ सेना, तटरक्षक बल, मुंबई पुलिस और तमाम केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ भी नहीं किया. आतंकवादी बोट पर सवार होकर आए और मुंबई में ऐसे घूमते रहे जसे उन्हें सालों से इसकी आदत हो.

विरोधियों के बीच पाटिल हमेशा हमेशा मजाक का विषय बने रहे और मातहत उन्हें कुछ समझते नहीं थे. वामपंथी पार्टियों ने पहली दफा चार साल पहले उनके इस्तीफे की मांग की थी. वामपंथियों का मानना था कि शिवराज पाटिल गृहमंत्रालय में मौजूद आरएसएस से सहानुभूति रखने वाले अधिकारियों का सफाया करने में नाकाम रहे हैं. गृहमंत्रालय में इन अधिकारियों की नियुक्ति कथिततौर पर उनके पूर्ववर्ती और वर्तमान में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने की थी. वाम पार्टियों का गुस्सा तब और बढ़ गया जब उन्होंने देखा कि पाटिल उन्हीं अधिकारियों की मंडली के साथ काम कर रहे थे. जब पहली बार वाम पार्टियों ने शिवराज पाटिल के इस्तीफे की मांग की उस वक्त मनमोहन सिंह की सरकार वाम पार्टियों की बैसाखी पर टिकी थी. फिर भी पाटिल पर कोई आंच नहीं आई. तब से अब तक सुरक्षा और खुफिया मामले में अनगिनत चूकें हुईं. नतीजतन भारत पर आतंकी हमलों में लगातार इजाफा होता गया. 

लेकिन मुंबई में हुए नरसंहार ने सारी हदें पार कर दीं. इस दुखद हमले के बाद पाटिल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का समर्थन भी जाता रहा. संकट के खत्म होने के तुरंत बाद 29 तारीख की शाम सोनिया गांधी ने नई दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्लयूसी) की बैठक बुलाई. कागजों पर देखा जाए तो सीडब्ल्यूसी कांग्रेस में फैसले लेने वाली सर्वोच्च इकाई है पर असल में इसका काम होता है कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा पहले से ही ले लिए गए फैसलों पर औपचारिक मुहर लगाना. 

बैठक में सोनिया गांधी ने आम जनता में नेताओं के प्रति जबर्दस्त गुस्से का जिक्र किया. सोनिया ने कहा कि इस बार कुछ ठोस करना ही होगा. बैठक में कांग्रेस महासचिव पद राहुल गांधी भी मौजूद थे. उन्होंने कहा, ‘ये बड़े शर्म की बात है कि कोई हमारे घर में आया और हमारे मुंह पर तमाचा मार गया.’ 

ये मानो एक इशारा था. चिदंबरम, कमलनाथ, एचआर भारद्वाज और कपिल सिब्बल, सबने एक सुर से ये आवाज बुलंद की कि पाटिल को नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए. सूत्रों की मानें तो बैठक में किसी ने भी पाटिल का साथ नहीं दिया. अपनी बारी आने पर पाटिल ने कहा कि सीडब्लयूसी जो चहेगी वो करने को तैयार हैं. पाटिल ने आतंकी हमलों में मारे गए लोगों के आंकड़े भी पेश किए जिसके मुताबिक उनके कार्यकाल में मारे गए लोगों की संख्या आडवाणी के कार्यकाल में मारे गए लोगों से कम है. ये तर्क पाटिल अक्सर देते आ रहे थे. पर इस बार उनकी एक नहीं सुनी गई. 30 नवंबर को पाटिल ने ये कहते हुए अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेज दिया कि वो मुंबई में हुए नरसंहार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं.

कांग्रेसी शब्दावली में नैतिक जिम्मेदारीऐसा मुहावरा है जिसका उपयोग लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए किया जाता है. प्रधानमंत्री कार्यालय ने तुरंत ही उनका त्याग पत्र राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को फैक्स कर दिया जो उस वक्त जकार्ता में थी. और उन्होंने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया. इसके बाद तुरंत ही कार्यभार चिदंबरम को सौंप दिया गया. हालांकि वर्तमान लोकसभा के बचे-खुचे दिनों को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि ये एक अल्पकालिक उपाय है. 

चिदंबरम ने अपने करियर की शुरुआत 60 के दशक के अखिरी दिनों में मद्रास हाईकोर्ट में वकील के तौर पर की थी. लगभग इसी दौर में वो यूथ कांग्रेस से भी जुड़ गए थे. सीपीएम महासचिव प्रकाश करात उनके स्कूली दिनों के साथी हैं. वो इंदिरा गांधी के भाषणों का तमिल में अनुवाद करते थे. 1975 में इंदिरा द्वारा थोपे गए आपातकाल का चिदंबरम ने पूरा समर्थन किया था. कुलीन तबकों में उनके दोस्त हैं मसलन अंबानी बंधु जो अक्सर अपने विवाद लेकर उनके पास पहुंचते रहते हैं. चिंदबरम दिग्गज खनन कंपनी वेदांता रिसोर्सेज़ के बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स में भी शामिल रहे हैं जो इन दिनों उड़ीसा में खनन को लेकर स्थानीय लोगों के जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना कर रही है. चिदंबरम के सहयोग के लिए एक संघीय जांच एजेंसी होगी. बहुत संभव है कि उनके पास नए लोगों की टीम भी हो, हालांकि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के इस्तीफे की पेशकश को ठुकरा दिया है. 

निशाने पर और भी लोगों का आना तय था. बढ़ते दबाव के बाद राज्य के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने भी इस्तीफा दे दिया और मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख ने भी इसकी पेशकश कर डाली. देशमुख तो इसलिए भी आलोचना के घेरे में आ गए क्योंकि एनएसजी की कार्रवाई खत्म होने के बाद जब वो ताज में हुए नुकसान का जायजा लेने पहुंचे तो उनके साथ उनके बेटे और हिंदी फिल्म अभिनेता रितेश देशमुख औप निर्माता निर्देशक राम गोपाल वर्मा भी नजर आए. ऐसा लगा कि देशमुख किसी गंभीर दौरे पर नहीं बल्कि किसी हिंदी फिल्म की तैयारी करने आए हों. देशमुख के नायब भी उतने ही लापरवाह दिखे. उधर आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई खत्म हुई इधर आरआर पाटिल मीडिया का जमावड़ा लेकर बैठ गए और कह गए कि बड़े शहरों में इस तरह की छोटी घटनाएं हो जाती हैं और इसका ये मतलब नहीं है कि सारा खुफिया ढांचा ही नाकाम रहा है. ऐसे में तो इस जोड़ी का जाना तय ही लग रहा था. हालांकि आखिर तक दोनों यही कहते रहे कि उनके पद छोड़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता. 

शिवराज पाटिल के पद छोड़ने पर दोस्त और दुश्मन, दोनों ही तंजबाण चलाने से नहीं चूके. का वर्षा जब कृषि सुखानी’, ये कहना था रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का. अरुण जेटली ने कहा, ‘ये काफी पहले हो जाना चाहिए थाजबकि सीपीएम पोलित ब्यूरो सदस्य बृंदा करात ने इसे सिर्फ दिखावा बताया.

8 दिसंबर को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ जाएंगे (जम्मू कश्मीर के नतीजे 28 दिसंबर को आएंगे) अगर कोई चमत्कार नहीं होता है तो बुरी ख़बर कांग्रेस के इंतजार में है. चिदंबरम के सामने असल चुनौती है कुछ ठोस काम करके लोगों के गुस्से को शांत करना. उन्हें अपनी तमाम योग्यताओं के सहारे गृहमंत्रालय को पटरी पर लाना है, ये काम इतना महत्वपूर्ण है कि वो यहां कोई जुआ खेलने का जोखिम नहीं ले सकते. लेकिन कांग्रेस ने ये खतरा मोल ले लिया है. इसमें कितना फायदा होता है और कितना नुकसान ये जल्द ही सामने आ जाएगा. 

विजय सिम्हा

बिहार का मंगल पांडे

25 वर्षीय राहुल राज की इच्छा सेना का अधिकारी बनने की थी लेकिन वो एनडीए की परीक्षा ही पास नहीं कर सका. इसके बाद उसने बीएससी की. फिर रेडियोलॉजी में डिप्लोमा करने के बाद राहुल नौकरी की तलाश में मुंबई पहुंच गया. उसकी सामान्य-सी, शांत जिंदगी से कभी भी किसी को ऐसा कोई संकेत नहीं मिला जो ये बताता हो कि मरने के बाद इस युवक को बिहार का मंगल पांडेकहकर सम्मानित किया जाएगा. एक ऐसा नायक, जिसने बिहार के सम्मान के लिए अपनी जान दे दी.

27 अक्टूबर को मुंबई की एक डबल डेकर बस में राहुल ने राज ठाकरे की चरम क्षेत्रीय राजनीति के खिलाफ बंदूक लहराने का दुस्साहस किया और पुलिस की गोलियों का निशाना बन गया. अपनी मौत के बाद राहुल उन दसियों लाख बिहारी युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्तंभ बन गया जिनकी भावनाएं राज ठाकरे के उत्तर भारतीयों के खिलाफ शुरू किए हिंसक अभियान के चलते काफी समय से उबाल खा रहीं थीं. मुंबई में बिहारी समुदाय के प्रति अछूतों जसा बर्ताव और हिंसा की घटनाओं की वजह से पैदा हुई कुंठा और गुस्से के ज्वार ने जानकारों को ये कहने पर मजबूर कर दिया है कि भगवान बुद्ध के बिहार में एक नए किस्म का आतंकवाद सिर उठा सकता है.

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार सरकार को राहुल के परिवार वालों से उसका अंतिम संस्कार रात्रि में कराए जाने का आग्रह करना पड़ा. राहुल के घर कदमकुंआ से गुलाबीघाट तक पूरी शव यात्रा के दौरान सैंकड़ो युवा तुम्हारा बलिदान खाली नहीं जाएगाके नारे लगाते रहे. बिहार की जटिल सामाजिक स्थितियों की गहरी समझ रखने वाले समाजशास्त्रियों के मुताबिक युवाओं के बीच पैदा हुए इस आक्रोश को कोरी राजनीति कह कर झुठलाया नहीं जा सकता. राहुल के अंतिम संस्कार में जुटी भीड़ और उसके पहले राज्यभर में मनसे के  खिलाफ भड़का विरोध का ज्वालामुखी काफी हद तक स्वत:स्फूर्त था.

सवाल उठता है कि आखिर किस चीज ने स्वभाव से गंभीर, पायलट पिता के पुत्र राहुल को बंदूक उठाने वाले एक प्रतिशोधी युवक में तब्दील कर दिया? आखिर कैसे नौकरी की तलाश में मुंबई गया राहुल, जिसका कोई थप्पड़ मारने जसा आपराधिक रिकॉर्ड तक नहीं था, राज ठाकरे के घृणा फैलाने वाले संकीर्ण क्षेत्रवादी अभियान की भेंट चढ़ गया? अब राहुल जिंदा नहीं है और हम शायद कभी ये नहीं जान सकेंगे कि जो कुछ उसने किया उसकी असल वजह क्या थी. लेकिन अगर 19 अक्टूबर को नालंदा के पवन की मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा कथित हत्या के बाद से तोड़फोड़ पर उतारू बिहारी युवाओं के नजरिए से देखा जाए तो राहुल के ऐसा करने का औचित्य साफ-साफ नजर आ सकता है. हर तबके के युवाओं में इस बात का क्षोभ है कि राहुल को गिरफ्तार करने के बजाय उसे गोली क्यों मारी गई. उसके बाद महाराष्ट्र के नेताओं द्वारा पुलिस के कारनामे की प्रशंसा और उसे न्यायसंगत ठहराने की कोशिश ने उनके घावों पर और भी नमक छिड़का.

तहलका ने बड़ी संख्या में बिहारी युवाओं से बातचीत की और पाया कि लगभग सभी को इस बात पर पूरा यकीन था कि राहुल, राज ठाकरे की हरकतों की वजह से उसे मार डालना चाहता था. ऐसा प्रतीत होता है कि जसे राहुल की असफलताने सैंकड़ो बहादुर बिहारीयुवाओं के मन में राहुल का सपनापूरा होते देखने की तीव्र इच्छा पैदा कर दी है. परिणाम ये कि बिहार में राज ठाकरे और आरआर पाटिल के पुतले फूंके जा रहे हैं और राहुल अब सिर्फ राहुल न रह कर बिहारी अस्मिता का प्रतीक और शहीद बन चुका है.

उत्तर भारतीयों विशेषकर बिहारियों के ऊपर महाराष्ट्रभर में हो रहे हमलों और उनकी मौत की खबरों को मीडिया द्वारा बार-बार दिखाए जाने से पूरे बिहार में न्याय की मांग बढ़ती जा रही है. ताजा हमलों की सूचना मिलने के बाद से उन बिहारी परिवारों में गुस्सा और निराशा बढ़ती जा रही है जिनके सदस्य वहां रोजगार में लगे हुए हैं. इससे और कई राहुल पैदा होने की संभावना बढ़ गई हैबिहार के पूर्व डीजीपी डीपी ओझा कहते हैं.

एक ऐसा समुदाय जो दशकों से देश के अलग-अलग हिस्सों में सिर्फ बिहारी होने की वजह से लोगों के तानों और मजाक का पात्र बनता रहा हो उसके ऊपर हालिया हिंसक हमलों ने जसे सब्र का बांध तोड़ देने का काम किया है. बिहारियों में विस्थापन की परंपरा रही है, इसके बावजूद वो अपनी संस्कृति को सहेज कर रखते हैं. इसने उन्हें एक आसान निशाना बना दिया है. तमाम विस्थापित समुदायों के विपरीत बिहारी अपने नए कामकाजी स्थानों पर स्थायी रूप से बसने की बजाय वापस बिहार लौट कर आते रहते हैं. इसकी और बिहार की जनसंख्या बढ़ने की वजह से, यहां कृषि, शिक्षा और दूसरे व्यावसायिक अवसर घटे हैं और विस्थापन में वृद्धि हुई है. इसने हितों के टकराव के लिए जमीन तैयार की है.’, वरिष्ठ समाजशास्त्री और एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व निदेशक डा. एमएन कर्ण बताते हैं. डा. कर्ण के हालिया लेख बिहारी बनने की जरूरतमें बिहारियों के सामने खड़े पहचान के संकट को समझने की कोशिश की गई थी.

2005 में नितीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी जिसने बिहार के लोगों में 15 साल के ठहराव के बाद विकास की हल्की-सी उम्मीद जगाई. इस उम्मीद ने बिहारी उपराष्ट्रवाद की चर्चाओं को भी जन्म दिया. मगर विश्लेषकों की निगाह में ये विचार कभी भी मूर्त रूप इसलिए नहीं ले पाया क्योंकि बिहारी समाज जाति-समुदायों में बुरी तरह बंटा हुआ है. मगर अब बिहारी लोगों पर हमले बिहार के हर तबके को अपने में शामिल करने वाली एक नई पहचान को जन्म दे सकते हैं.

राहुल की मौत के दिन बिहार के तीन शीर्ष नेताओं – नीतिश कुमार, लालू यादव और रामविलास पासवान – ने दिल्ली में एक साझा प्रेस कान्फ्रेंस करके एमएनएस के खिलाफ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया. ये एकजुटता थोड़े समय के  लिए ही थी और अब राज ठाकरे के साथ-साथ राजनेताओं को भी एमएनएस की हिंसा की वजह बता कर उनकी खुल कर बिहार और बिहार के बाहर निंदा की जा रही है.

राजनीतिक विश्लेषक और पूर्व पत्रकार सुरेंद्र किशोर बिहारियों पर हो रहे हमले के लिए नीतिश कुमार और लालू यादव को ही पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराते हैं. तीन बिहारी रेलमंत्रियों ने बिहारी लोगों को रेलवे में नौकरियां पाने में सहायता की. वोटबैंक की इस राजनीति ने महाराष्ट्र के लोगों के हितों को चोट पहुंचाई जिसके नतीजे में हालिया उग्र प्रतिक्रिया हुई है.’  

किशोर के मुताबिक 2003 में सेंट्रल रेलवे की नौकरियों में जहां 48 फीसदी बिहारियों को चुना गया था वहीं इनमें महाराष्ट्र से केवल चार फीसदी लोग ही शामिल थे. किशोर बताते हैं, ‘बिहारी एलआईसी और बैंकों में इतनी नौकरियों पाने में सफल नहीं हुए लेकिन राजनीतिक समर्थन के एवज में उन्हें सरकारी नौकरियां बड़ी आसानी से मिलती रहीं. बिहार के नेता ही बिहारियों पर हो रहे हमलों की मूल वजह हैं.

राहुल के पिता कुंदन कुमार सिंह उन बातों पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं जो उनके बेटे के बारे में कही जा रही हैं. वो सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. नितीश कुमार ने भी सीबीआई जांच की मांग की है. इधर राज्यभर के युवा और छात्र संगठन एमएनएस के खिलाफ और राहुल की याद में हर दिन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. आज बिहारी भावनाएं बुरी तरह से चोटिल हैं लेकिन राज ठाकरे और महाराष्ट्र शांति के रास्ते पर आगे बढ़कर उन घावों को भरने की कोशिश कर सकते हैं. 

बेशुमार जुगनुओं की जरूरत

नियाभर में फैल चुका आर्थिक संकट अमेरिका में घर बनाने के लिए दिए गए बेहिसाब कर्ज के डूबने से शुरू हुआ. वहां के वित्तीय संस्थानों ने अपना व्यापार बढ़ाने के लिए पहले तो बिना सोचे-समझे कर्ज दिया. इसके बाद इन कर्जों को उन्होंने सही कर्जों के साथ मिला कर दूसरे वित्तीय संस्थानों को बेच दिया. अब चिंतामुक्त हो के इन पहले वाली संस्थाओं ने आंख मूंद के और भी कर्ज बांटना शुरू कर दिया. जब आंख मूंद कर दिए इस कर्ज की वापसी में समस्या आई तो ये संस्थाएं बुरी हालत में आने लगीं, इनके पास अपना कर्ज चुकाने के लिए पैसों के लाले पड़ने लगे. ये जान कर इन वित्तीय संस्थाओं के पास अपना पैसा जमा करने वालों ने इसे निकालना शुरू कर दिया. उदारीकरण के इस जुड़े हुए दौर में अमेरिका की ये समस्या पूरी दुनिया में निर्यात हो गई. 

मगर भारत में हालात काफी हद तक काबू में हैं. आखिर क्या है इसकी वजह? और आगे का रास्ता क्या है? क्या भारत अपनी ही तरह की आर्थिक नीतियों पर चले या फिर धीरे-धीरे कर पूरी तरह से दुनिया के रंग में रंग जाए?

साठ साल का सार

आजादी के बाद छह दशकों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था छह अलग-अलग चरणों से गुजरती हुई आगे बढ़ी. पहला दौर था व्यवस्थित होने का. ये 1950 का दशक था. आजादी और इसके बाद बंटवारे की उथल-पुथल पीछे छूट चुकी थी और नीति-निर्माताओं के सामने देश को फिर से बनाने की चुनौती सिर उठाए खड़ी थी. उन दिनों भारत में ज्यादा कुछ नहीं बनता था. यहां तक कि हमें सुई भी विदेशों से मंगानी पड़ती थी.

फिर 60 का दशक आया. ये बुनियाद पड़ने का दौर था. जर्मनी, ब्रिटेन और तत्कालीन सोवियत संघ से तकनीकी मदद लेकर स्टील के नए कारखाने लगाए गए. विदेशी सहयोग से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) की स्थापना की गई. बेहतरीन अमेरिकी बिजनेस स्कूलों की मदद लेकर अहमदाबाद और कलकत्ता में भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) खोले गए. आणविक ऊर्जा आयोग बना. जो अच्छे बीज उस समय रोपे गए थे उनके फलों का फायदा अर्थव्यवस्था आज भी उठा रही है.

इसके बाद आया 1970 का दशक. विदेशी मुद्रा की भारी कमी के चलते अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी. आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी हो गया. मशीनें और भारी उपकरण बनाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बनाईं गईं. निजी कंपनियों से कहा गया कि सब कुछ अपने बूते करिए. अपने उत्पाद खुद डिजाइन करिए, अपनी मशीनें भी खुद बनाइए और अपने मजदूरों, इंजीनियरों और डिजाइनरों को प्रशिक्षण भी खुद ही दीजिए. यही वजह थी कि टाटा मोटर्स (तब टेल्को) को मशीनों और टूल एवं डाई बनाने के लिए नए संयत्र खोलने पड़े. इससे पहले कंपनी इन चीजों को आयात करती थी. भारतीय कंपनियों के लिए ये काफी मुश्किल दौर था क्योंकि काफी हद तक विदेशी सहयोग के बगैर उन्हें, अपने बूते बचे रहना, काम करना और कामयाब होना था.

1980 के दशक में राजीव गांधी के कमान संभालने के साथ अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर से बाहर की तरफ देखना शुरू किया. विदेशी सहयोग की अनुमति देने में उदारता बरती जाने लगी. आटोमोबाइल क्षेत्र में जापानी कंपनियों का आगमन हुआ और उन्होंने इस क्षेत्र में काम कर रही देसी कंपनियों को हिलाकर रख दिया. उस समय तक भी घरेलू कंपनियों पर दिल्ली में बैठे नौकरशाहों का शिकंजा जारी था जो ये तय करते थे कि उनकी फैक्ट्रियों में क्या बनेगा और क्या नहीं. इसका एक दिलचस्प उदाहरण है. भारत आईं जापानी कंपनियों का मुकाबला करने के लिए टाटा मोटर्स ने सरकार से अपील की कि उसे हल्के ट्रक बनाने की इजाजत दी जाए. कंपनी का तर्क था कि आत्मनिर्भर बनने के लिए उसने कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद डिजाइन और निर्माण संयंत्र लगाए हैं और उसे भारत में आने वाले विदेशियों से प्रतिस्पर्धा करने की इजाजत दी जानी चाहिए. नौकरशाह इसके लिए तैयार नहीं थे क्योंकि टाटा का लाइसेंस कहता था कि कंपनी अपने कारखाने में सिर्फ मीडियम साइज के ट्रक ही बना सकती है! आखिरकार टाटा को ये ट्रक बनाने की अनुमति मिल गई. मगर इसके साथ शर्त जोड़ी गई कि इसके लिए कोई भी कलपुर्जा बाहर से नहीं मंगाया जाएगा. मजे की बात ये है कि उनके जापानी प्रतिस्पर्धी ऐसा कर सकते थे.

तो अर्थव्यवस्था के दरवाजे कुछ इस तरह से खुल रहे थे और भारतीय कंपनियों की परीक्षा हो रही थी. टाटा मोटर्स इन परिस्थितियों में न सिर्फ बची रह सकी बल्कि उसने जापानी प्रतिस्पर्धियों को धूल भी चटा दी. मगर दूसरी भारतीय आटोमोबाइल कंपनियों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं रही. प्रीमियर आटोमोबाइल और हिंदुस्तान मोटर्स जसे उस समय के दिग्गज मारुति-सुजुकी के हमले का मुकाबला नहीं कर सके और कुम्हला गए.

1991 में विदेशी मुद्रा संकट के बाद भारत सरकार को मजबूरी में उदारीकरण की राह पर कदम रखने पड़े. ये दरवाजे पूरी तरह से खुलने का दौर था. विदेशी कंपनियां पहले की तुलना में कहीं अधिक आसानी के साथ देश में व्यापार करने आ सकतीं थीं. दूसरी तरफ भारतीय कंपनियों के लिए लाइसेंस राज खत्म हो गया था. वे अपनी मर्जी से अपने उत्पादों, बाजारों और सहयोगियों का चुनाव कर सकतीं थीं. 2000 के बाद कायापलट की इस प्रक्रिया में तेजी आई. भारत में व्यापार की एक नई दुनिया उभर आई थी. पहले दुर्लभता से देखी जाने वाली चीजें मसलन विदेशी कारें, टीवी, घरेलू उपकरण अब सर्वसुलभ थीं. मध्य वर्ग की आय बढ़ गई. उसने दुनिया देखनी शुरू की. विदेशों में भारतीय आईटी कंपनियों की धूम मच गई. जीडीपी विकास दर दो अंकों की तरफ बढ़ने लगी. शेयर बाजार उड़ान भरने लगा. भारत उदय हो रहा था.

भारत उदय या इंडिया शाइनिंग के इस शोर के बीच 2004 में सत्ताधारी एनडीए ने जीत की संभावनाएं देखते हुए आम चुनाव का ऐलान कर दिया. मगर उसे मुंह की खानी पड़ी. इसकी वजह ये थी कि उसने सिर्फ स्टॉक मार्केट के सूचकांक को देखा और सीढ़ियों पर बैठे बदहाल भूखे लोगों को नहीं. इस तरह से आने वाली सरकार के लिए इस चुनाव परिणाम का सबक ये रहा कि विकास तभी सार्थक है जब इसका फायदा सब तक पहुंचे. यूपीए सरकार के जिस प्रधानमंत्री ने कभी वित्तमंत्री के रूप में उदारीकरण की नींव रखी थी वही अब कंपनियों के सीईओ से दिखावा कम करने और सामाजिक सरोकारों की तरफ ज्यादा ध्यान देने की सलाह दे रहा था. कॉरपोरेट्स और मीडिया जगत ने हल्ला मचाया कि प्रधानमंत्री समाजवादियों जैसी बातें कर रहे हैं. उन्होंने मांग की कि आर्थिक सुधार जारी रहें और निजी उद्योगों व विदेशी कंपनियों को और भी ज्यादा आजादी दी जाए. बैंकिंग और बीमा क्षेत्र के दरवाजे और भी खोलने की मांग की गई.

अब अक्टूबर 2008 पर आ जाएं. वही अमेरिकी वित्तीय कंपनियां जो कल तक भारत सरकार से कह रही थीं कि हमारे रास्ते से हट जाओ, अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए अपनी-अपनी सरकारों से गुहार लगा रही हैं. लालची पूंजीवादियों को लेकर वहां गर्मागर्म बहस छिड़ी है और यहां भारतीय उद्योगपति नियामकों का शुक्रिया अदा कर रहे हैं जिन्होंने सावधानी बरतते हुए लगाम पूरी तरह से उतारकर नहीं फेंकी. हाल तक गरीब किसानों की कर्ज माफी के लिए सरकार पर समाजवादी होने का तंज कसने वाले पूंजीवाद के समर्थकों को आज तब कोई दिक्कत नहीं हो रही जब देनदारियां न चुका पाने के कारण दीवालिया हो चुके इनवेस्टमेंट बैंक लेहमैन ब्रदर्स को बचाने के लिए अमेरिकी सरकार ने आयकर दाताओं के कई सौ अरब डालर होम कर दिए हैं.

हालांकि जो हो रहा है उसके अपने सबक भी हैं. भारत में अब तक के अपर्याप्त आर्थिक विकास का ठीकरा सरकार पर फोड़ने और हालिया तेज विकास का सारा श्रेय निजी क्षेत्र को देने का चलन पिछले कुछ साल में आम हो चला था. उद्योगपति अक्सर गर्व से दावा करते दिखाई देते थे कि सरकार को रास्ते से हटाइए और देखिए हम क्या कर सकते हैं. टेल्कॉम के क्षेत्र में मिली अभूतपूर्व सफलता को इसके उदाहरण के तौर पर गिनाया जाता था. सीआईआई के एक पूर्व अध्यक्ष ने तो यहां तक कह दिया कि भारतीय अर्थव्यवस्था तभी काम करती है जब सरकार सो जाए.

मगर अब साफ हो चुका है कि कहानी इतनी सीधी नहीं है. इसमें कई पेंच हैं. उद्योग से जुड़े लोगों को ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस आजादी का आज वो आनंद ले रहे हैं वो राजनेताओं की वजह से ही है. और इसके लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोलकर उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन पर बड़े खतरे मोल लिए हैं. इसके अलावा उदारीकरण के बाद अगर भारतीय आईटी कंपनियों ने दुनियाभर में अपना लोहा मनवाया तो ऐसा इसीलिए हो पाया कि सरकार ने अतीत में ही इस सफलता के लिए बुनियादी काम कर रखे थे. उदाहरण के लिए आईटी कंपनियों के लिए प्रशिक्षित इंजीनियर आईआईटी ने पैदा किए. फार्मा, ऑटो पार्ट्स, इंजीनियरिंग जसे क्षेत्रों में अगर भारतीय कंपनियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना सिक्का जमाया तो इसके पीछे वजह यही थी कि अपने क्षेत्र में उनका ज्ञान चीन जैसे दूसरे विकासशील देशों की कंपनियों से कहीं गहरा था. ये दक्षता उनमें इसलिए आ सकी क्योंकि सरकार ने उन्हें 70 और 80 के दशक में आत्मनिर्भर होने के लिए प्रोत्साहित किया.

कुछ विद्वानों की मानें तो पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस सोवियत संघ के पतन और पूंजीवाद के अमेरिकी संस्करण की जीत के साथ ही खत्म हो गई थी. मगर हाल की घटनाओं ने इसे फिर से जिंदा कर दिया है. ये सवाल उठ रहा है कि सरकार अपनी भूमिका किस तरह निभाए कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया में कोई रुकावट न आए और इसके फायदे भी सभी तक पहुंचें? क्या सरकार इस मुद्दे को पूरी तरह से बाजारवादी ताकतों के हवाले कर दे?

सरकारी बनाम निजी क्षेत्र की लड़ाई का सरोकार विश्वास से है. सवाल ये है कि अपने हितों का समुचित ध्यान रखने के लिए लोगों को किस पर यकीन करना चाहिए? आजादी के बाद के कुछ दशकों तक निजी क्षेत्र में नौकरी को बहुत अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था. निजी क्षेत्र की कंपनियों में पैसा भले ही अधिक था मगर इज्जत सरकारी नौकरी की ज्यादा थी. छात्रों की नजर में सरकारी नौकरी के मायने देश को बनाने के लिए अपना कंधा लगाने से थे जबकि प्राइवेट नौकरी का मतलब था साबुन और सिगरेट बेचकर ज्यादा से ज्यादा कमाई करना. मैनेजमेंट के जिन छात्रों से आज मेरा संवाद होता है उनमें से कोई भी सरकारी सेवा में नहीं जाना चाहता. निजी क्षेत्र की ऊंची तनख्वाहें और सरकारी सेवा के लिए आदर की कमी को वे इसकी वजह गिनाते हैं. उन दिनों लोग निजी क्षेत्र की बजाय सरकार पर भरोसा करते थे. अक्सर सुनने को मिल जाया करता था कि सरकारी स्कीम है तो ठीक ही होगी. हालांकि टाटा जैसे कुछेक अपवाद जरूर थे. जेआरडी टाटा ने एक बार कहा था कि जब भी उन्होंने देश की भलाई के लिए कोई काम किया तो इससे उनका भी भला हुआ. ठीक इसके उलट बात उनसे कुछ साल पहले जनरल मोटर्स के चेयरमैन ने की थी जिनका कहना था कि जो जनरल मोटर्स के लिए अच्छा है वही अमेरिका के लिए भी अच्छा है.

मगर इस भरोसे के बावजूद जनता तक सुविधाएं पहुंचाने के मामले में सरकारों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा. उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ी और लोगों को इससे फायदा हुआ. नतीजतन उनका भरोसा अब सरकार से ज्यादा निजी क्षेत्र में हो गया. मगर शहरी मध्यवर्ग में हुए हालिया सर्वेक्षण बताते हैं कि लोग अभी भी इन बुनियादी सुविधाओं को निजी हाथों में दिए जाने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके मुताबिक उनका डर ये है कि निजी क्षेत्र का ध्यान सामाजिक सरोकारों से कहीं ज्यादा लाभ कमाने पर होगा.

उद्योग जगत के खिलाड़ी चाहते हैं कि उन्हें और भी आजादी दी जाए. इसके लिए विश्वास जीतना बहुत जरूरी है. अमेरिका में वित्तीय संस्थाओं के मुखियाओं से लोगों का भरोसा उठ चुका है. एनरॉन जसे उदाहरणों की वजह से का¬रपोरेट लीडर्स पर तो उन्हें पहले से ही विश्वास नहीं रहा था. ये अवश्यंभावी था क्योंकि जब हानिकारक न लगने वाले प्रबंधन के दो सिद्धांत आपस में मिलते हैं तो नतीजा बहुत विस्फोटक होता है. पहला सिद्धांत ये है कि कॉरपोरेट लीडर्स को अपना व्यापार और लाभ बढ़ाना चाहिए और सामाजिक सरोकारों की वजह से अपना ध्यान विचलित नहीं करना चाहिए. दूसरा सिद्धांत ये है कि कॉरपोरेट कंपनी के किसी कर्मचारी का हित पूरी तरह से उसकी कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन से बंधा होता है. बाजारवाद के इस दौर में हर तिमाही में वित्तीय प्रदर्शन की समीक्षा होती है और फिर उसके हिसाब से कर्मचारी को फायदे यानी इंसेंटिव्स मिलते हैं. ऐसे में अगर उस कर्मचारी को इससे कोई सरोकार ही न हो कि उसके काम का उसके समाज पर क्या असर हो रहा है तो इसमें हैरानी की बात क्या है. क्योंकि जिस व्यवस्था से वह बंधा हुआ है वह उससे इस बात की अपेक्षा ही नहीं करती. इसका नतीजा ये होता है कि समाज अपने कल्याण के लिए ऐसे लोगों पर भरोसा नहीं कर सकता. नतीजतन वह व्यवस्था भी भरोसे के काबिल नहीं होती जो इस तरह के लोगों से मिलकर बनती है.

आर्थिक विकास का भारतीय मॉडल

हम पूंजीवाद और समाजवाद की पुरानी बहस में अटके नहीं रह सकते. हमारा आर्थिक विकास कैसे हो इस दिशा में मार्गदर्शन के लिए हमें सारी दुनिया से अलग एक नया और बेहतर दर्शन खोजने की जरूरत है. इसी बात पर विचार करने के लिए कुछ साल पहले अलग-अलग क्षेत्रों के सरोकारी लोग आपस में मिले. इनमें अर्थशास्त्री, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, पत्रकार, कलाकार, व्यापारी, शिक्षक, छात्र, नेता और दूसरे लोग शामिल थे. दरअसल 1980 का दशक आते-आते देश का विकास पहले की तुलना में तेज गति से तो होने लगा था मगर इसके बावजूद ये रफ्तार इतनी तेज नहीं थी कि गरीबी और कमजोर बुनियादी ढांचे जसी समस्याएं जल्द खत्म हो जाएं. इन सभी लोगों ने अपनी-अपनी समझ मिलाई और ये जानने की कोशिश की कि किस परिस्थिति विशेष के पीछे कौन से सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक कारक किस तरह से काम कर रहे हैं. इसके बाद उन्होंने भारत की चार तस्वीरें बनाईं जो भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य की झलक थीं. इनमें भारत के विकास और उसके लिए जरूरी नेतृत्व के लिए चार वैकल्पिक मॉडल छिपे थे. कहा भी जाता है कि एक तस्वीर में 1000 शब्दों से ज्यादा संप्रेषण क्षमता होती है. 

पहली तस्वीर पोखर में नहाती भैंसों की है. भारत में ज्यादातर गांवों में आपको ये नजारा दिख जाएगा. पोखर में तैरती किसी भैंस के लिए हिलना-डुलना मुश्किल होता है क्योंकि वो दूसरी भैंसों से घिरी होती है. इस तरह के परिदृश्य में नीतियां तय करने और जरूरी बदलाव लाने की जिम्मेदारी कई नौकरशाहों और विशेषज्ञों के हाथ में होती है. मगर उन सब में किसी बात को लेकर सहमति नहीं बन पाती. एक कोई बात कहता है तो दूसरा उसका विरोध करता है. इस चक्कर में ज्यादा कुछ नहीं हो पाता. इस बीच देश में लोग, खासकर वे जिन्हें कुछ समय बाद नौकरी की जरूरत होगी, विकास का इंतजार करते रहते हैं. काफी हद तक ये तस्वीर 1990 के दशक के अंत तक भारत की प्रगति को दर्शाती है.

दूसरी तस्वीर खुले बाजार की कहानी को दर्शाती है जिसमें सरकार सब कुछ बाजारवादी ताकतों पर छोड़ देती है. इस तस्वीर में एक महिला है जो अपने दालान में छोटी-छोटी गौरेयाओं को दाना खिला रही है. कुछ कबूतर आते हैं और गौरयाओं को हटा देते हैं. फिर एक मोर आता है और कबूतर हट जाते हैं. बाकी सारी चिड़ियाएं मोर के बड़े आकार और उसकी सुंदरता की तारीफ करती हैं. छोटी गौरेयाएं उम्मीद करती हैं कि मोर का पेट भर जाने के बाद उनके लिए कुछ बच जाएगा. अगर आज नहीं तो कल सही. ये तस्वीर बताती है कि सब कुछ बाजार के हवाले करने का क्या अंजाम होता है. दुनिया के सबसे बड़े धनकुबेरों में भारत के भी कई नाम शामिल हो गए हैं. वहीं दूसरी ओर देश में करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जिन्हें पता ही नहीं कि उन्हें अगली बार खाना कब नसीब होगा. सवाल उठता है कि क्या ऐसी व्यवस्था को सफल कहा जा सकता है जिसका नतीजा मुट्ठीभर लोगों के पास अकूत दौलत और आबादी के बड़े हिस्से के भुखमरी का शिकार होने के रूप में सामने आता हो?

तीसरी तस्वीर में मुट्ठी भर लोगों के हाथों में रहने वाली ताकत के उपयोग और दुरुपयोग की कहानी छिपी हुई है. इस तस्वीर में एक बाघ और कुछ शिकारी भेड़िए हैं. बाघ मनमर्जी से चलता है और किसी की परवाह नहीं करता. उसके चारों तरफ मौजूद भेड़िए असहाय छोटे जानवरों का शिकार करते रहते हैं. ये हिंसा का डर दिखाकर राज कर रहे नेतृत्व और उसके करीबियों द्वारा जनता के शोषण को दर्शाती है.

चौथी तस्वीर कुछ अलग है. ये दर्शाती है कि भारत जसा जटिल और विविधताओं से भरा समाज किसी एक केंद्र से नियंत्रित नहीं किया जा सकता. इसमें बदलाव उन लाखों लोगों द्वारा लाया जाएगा जो केंद्र में किसी शक्तिशाली नेतृत्व के उभरने का इंतजार करने के बजाय अपने-अपने केंद्र से कोई परिवर्तनकारी पहल करेंगे. ये भारत के देहात में गर्मियों की एक अंधेरी रात की तस्वीर है जिसमें पहले कुछ छोटे-छोटे जुगनू प्रकट होते हैं. धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ने लगती है और रात काअंधेरा उनकी रोशनी की चमक के आगे दम तोड़ता दिखने लगता है. देखा जाए तो सबसे पहले पहुंचने वाले जुगनू पहल करने वाले वे लोग हैं जो नई राह बनाते हैं और दूसरों को उस पर चलने की प्रेरणा देते हैं.भारत की तसवीर के अंधेरे हिस्से में ऐसे कई शुरुआती जुगनू पहुंच चुके हैं. अमूल का ही उदाहरण लीजिए जिसने लाखों गरीब पशुपालकों की जिंदगी बदल दी है. इस सहकारी संस्था के डेयरी उत्पाद आज बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पसीने छुड़ा रहे हैं. ऐसे कई संगठन आज अपने-अपने स्तर पर देश की तस्वीर बदलने में लगे हैं. 

दरअसल देखा जाए तो आज के भारत में आपको इन चारों तस्वीरों की कुछ-कुछ झलक मिल जाएगी. इन परिदृश्यों को विकसित करने वाले समूह के विश्लेषण के मुताबिक चौथे परिदृश्य को पैदा करने के लिए एक स्वस्थ आर्थिक नीति के अलावा पांच और दिशाओं में काम किया जाना चाहिए. ये हैं:

नई तकनीक की मदद से बच्चों और महिलाओं में उनके लिए उपयोगी ज्ञान का विस्तार

स्थानीय पहल को सम्मान.

आधारभूत ढांचे की मजबूती

योग्यताओं और नेतृत्व के नए मा¬डलों का विकास

सफलता की कहानियों का प्रचार और आत्मविश्वास का निर्माण

मौजूदा वित्तीय संकट को जल्द से जल्द हल किए जाने की जरूरत है. उम्मीद है ऐसा हो सकेगा हालांकि कहीं-कहीं पर आग अभी कुछ समय तक सुलगती रहेगी. अगले कुछ महीनों में भारतीय अपनी पसंद की सरकार चुनने के लिए एक बार फिर से वोट करेंगे. सरकार कोई भी आए, लोगों का भरोसा और आदर फिर से पाने के लिए उसे सबसे पहले अपना घर दुरुस्त करना होगा. सरकारों और राजनीतिक पार्टियों, दोनों के लिए लोकतंत्र, पारदर्शिता, कार्यकुशलता और अच्छे मूल्य बहुत जरूरी हैं. जो भी सरकार बनती है उसे उद्योग जगत के साथ मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा कि करोड़ों जुगनू चमक उठें और अंधियारा, चाहे वो किसी भी कोने में हो, रोशनी में बदल जाए.

लेखक विश्व के जानेमाने परामर्शदाता समूह बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के पूर्व चैयरमैन और वर्तमान में वरिष्ठ सलाहकार हैं

बॉलीवुड में नारी शक्ति

पॉलिएस्टर की सफेद पतलून और उससे मेल खाते जूते पहने काम पर लगे अजीब से मर्दों की भीड़..दस साल पहले तक अगर आप किसी हिंदी फिल्म के सेट पर जाते तो नजारा कुछ यही होता. सिनेमेटोग्राफर, साउंड डिजाइनर, लाइटिंग एक्सपर्ट.. हर काम में सिर्फ पुरुष टेक्नीशियंस की मौजूदगी. फिल्म की हीरोइन अपनी वैनिटी वन में होती थी और सेट पर महिला चेहरों के नाम पर अगर कुछ होता था तो सिर्फ हेयर ड्रेसर्स.

मगर 10 साल में काफी कुछ बदल गया है. महिला टेक्नीशियंस अब उतनी दुर्लभ नहीं रहीं. कुछ समय पहले आई फिल्म हनीमूल ट्रैवल्स की निर्देशिका रीमा कागती की तकनीकी टीम में तो महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या है. कुछ ऐसा ही जोया अख्तर के साथ भी है जिनकी फिल्म ‘लक बाई चांस’ अगले साल की शुरुआत में रिलीज होने वाली है.

हिंदी फिल्म उद्योग में महिला प्रोफेशनल्स को आज हर जगह देखा जा सकता है. 40 साल की मिरियम जोसेफ का ही उदाहरण लें. जोसेफ, फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी की कंपनी एक्सेल इंटरनेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड में एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं. वो कहती हैं, ‘मेरे काम में शुरुआती तैयारी से शूटिंग तक और शूटिंग से फाइनल प्रोडक्ट देने तक सब कुछ शामिल होता है. यहां तक कि चीखना-चिल्लाना भी. हर किसी की जरूरतें मसलन लाइट्स, साउंड, कास्ट्यूम्स आदि प्रोडक्शन पर ही निर्भर होती है इसलिए अगर प्रोडक्शन टीम ने पूरी तैयारी कर रखी है तो झंझट काफी कम हो जाता है.’

स्क्रिप्ट सुपरवाइजर और प्रोडक्शन डिजाइनर जैसे पदों का चलन इंडस्ट्री में आ रहे नए पेशेवराना रवैये का संकेत है.

मिरियम बताती हैं कि छोटी से छोटी चीज तक पर काफी मेहनत की जाती है. वो कहती हैं, ‘किसी शॉट के लिए किस तरह के लेंस का इस्तेमाल होगा ये आपको निर्देशक से तीन महीने पहले ही सोचना पड़ता है.’ जोसेफ के साथ कई असिस्टेंट डायरेक्टर काम करते हैं और शूटिंग शुरू होने से पहले उनकी टीम को कम से कम पांच बार पूरी स्क्रिप्ट पढ़नी पड़ती है.‘16 दिसंबर’, ‘अग्निवर्षा’ और ‘स्प्लिट वाइड ओपन’ जसी फिल्मों में काम कर चुकीं और इन डेप्थ एंटरटेनिंग आर्ट्स नामक कंपनी में एक्जीक्यूटिव प्रोडच्यूसर 37 साल की अरुणिमा रॉय इससे सहमति जताते हुए कहती हैं, ‘स्क्रिप्ट आपकी उंगलियों पर होनी चाहिए वरना आपको बहुत दिक्कत हो सकती है. उदाहरण के लिए यदि कोई शॉट निर्धारित दिन फिल्माया नहीं जा रहा और इसके बजाय अगर आपको आगे का कोई शॉट फिल्माना हो तो आप कैसे करेंगे.’ रॉय के मुताबिक उनके काम में बजट की योजना बनाना और अलग-अलग तरह के लोगों से निपटना शामिल है.

अहम के टकराव के बीच काम करना फिल्म उद्योग का आम दुस्वप्न है. कई फिल्मों में सहायक निर्देशक और लाइन प्रोडयूसर के रूप में काम कर चुकीं 34 वर्षीय दीपिका गांधी कहती हैं, ‘आप हमेशा लोगों का गुस्सा शांत करने में लगे रहते हैं. बतौर फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर मैं कई बार निर्देशक और सिनेमेटोग्राफर के गुस्से के बीच फंस चुकी हूं. ऐसी हालत में आपको मसला सुलझना होता है.’ दीपिका मानती हैं कि स्क्रिप्ट सुपरवाइजर और प्रोडक्शन डिजाइनर जैसे पदों का चलन इंडस्ट्री में आ रहे नए पेशेवराना रवैये का संकेत है.

शायद यही नयापन भी एक वजह है कि फिल्म निर्माण की पढ़ाई करने के बाद अब महिलाएं उन क्षेत्रों में भी जा रही हैं जिनमें परंपरागत रूप से सिर्फ पुरुषों का बोलबाला रहा है. उदाहरण के लिए सिनेमेटोग्राफी और साउंड डिजाइन. 32 वर्षीय सिनेमेटोग्राफर पूजा शर्मा कहती हैं, ‘हमारे काम का कोई निश्चित समय नहीं होता. पर ये विकल्प हमने खुद चुना है.’

महिला होने की अपनी चुनौतियां हैं. उदाहरण के लिए काम के दौरान पहनने के लिए ठीक से कपड़ों का चयन. बाकी महिला टेक्नीशियंस की तरह पूजा भी इस बात का ख्याल रखती हैं कि उन्हें सेट पर किस तरह के कपड़े पहनने हैं. वो कहती हैं, ‘मैं कारगो और डार्क टी-शर्ट पहनती हूं. सेट पर कई तरह के लोग होते हैं जो आप पर छींटाकशी कर सकते हैं इसलिए मैं टाइट कपड़े नहीं पहनती. इस क्षेत्र में महिलाओं के आने के बावजूद हमारी संख्या अब भी कम है. इसलिए आपको ये संकेत देना होता है कि आप छोटी-सी भी बदतमीजी को बर्दाश्त नहीं करेंगी.’

महिलाओं के लिए एक चुनौती और भी है. अक्सर पुरुषों को ये पसंद नहीं होता कि कोई महिला उन पर हुक्म चलाए. तिगमांशु धूलिया की अगली फिल्म में काम कर रहीं पूजा कहती हैं, ‘कभी-कभी लाइटब्वॉयज किसी दूसरे पुरुष की बात तो सुनते हैं मगर आपकी सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं.’

हालांकि रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘फूंक’ में डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी रह चुकी 28 साल की सविता सिंह के मुताबिक उनका अनुभव उम्मीद से बेहतर रहा. वो कहती हैं, ‘मैंने सुना था कि मुंबई में बहुत भेदभाव होता है मगर जब मैं यहां आई तो मैंने पाया कि मुझे अपना काम गंभीरता से करते देखकर लोगों को प्रसन्नता भरी हैरत होती है. मेरा मुकाबला सबके साथ है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो पुरुष है या महिला.’

महिलाओं के लिए एक चुनौती और भी है. अक्सर पुरुषों को ये पसंद नहीं होता कि कोई महिला उन पर हुक्म चलाए.

वैसे अगर कोई भेदभाव हो भी तो 34 वर्षीय साउंड डिजाइनर आमला पोपुरी इसका मुकाबला करने के लिए दृढसंकल्प हैं. आने वाली चर्चित फिल्म ‘गजनी’ के लिए ऑन लोकेशन साउंड करने वाली और ‘सांवरिया’, ‘आमू’ और ‘मिक्स्ड डबल्स’ जसी फिल्मों में काम कर चुकीं पूजा कहती हैं, ‘कैमरा परसन या फिर साउंड डिजाइनर होना अपने आप में काफी चुनौतीभरा काम है क्योंकि महिलाओं को तो टेक्नीशियंस समझ ही नहीं जाता.’ सात किलो तक वजनी मिक्सर और माइक को खुद ही उठाकर शॉट की जरूरत के हिसाब से इधर-उधर ढोने वाली आमला कहती हैं, ‘आपको अपना काम करते रहना होता है. अगर आप भेदभाव पर ध्यान देंगी तो आपके लिए मुश्किल होगी.’ 

कई महिला पेशेवरों के लिए चुनौतियों भरा शेड्यूल दिल में जोश भरने का काम करता है. ‘मिक्स्ड डबल्स’ और ‘भेजा फ्राई’ जसी फिल्मों से जुड़ी रहीं 37 वर्षीय मीनल अग्रवाल कहती हैं, ‘प्रोडक्शन डिजाइन टीम लोकेशन पर सबसे पहले पहुंच जाती है और शूट के बाद भी सब कुछ समेटने के लिए वहां पर रुकी रहती है. हमारा काम ये सुनिश्चित करना होता है कि फिल्म में एकरूपता हो.’ मीनल को कई बार बढ़ई, पेंटर्स और दूसरे मजदूरों के साथ काम करना होता है मगर उन्हें कभी भी अपने महिला होने की वजह से कुछ अजीब नहीं लगता. हालांकि वो कहती हैं, ‘कुछ सेट्स पर अगर पुरुष बहुत ज्यादा हों उनकी बातें सुनकर लगता है जसे आप ब्वॉयज हॉस्टल में हों.’

मगर देश की एकमात्र लाइट डिजाइनर 23 वर्षीय हेतल देधिया को इस तरह की कोई समस्या नहीं ङोलनी पड़ेगी. उनके पिता मूलचंद देधिया देश के सबसे बढ़िया लाइट डिजाइनर्स में से एक हैं. ‘ब्लफमास्टर’ और ‘लक बाइ चांस’ में अपनी प्रतिभा दिखा चुकीं और फिलहाल एड फिल्म्स के लिए स्वतंत्र रूप से काम कर रहीं दुबली-पतली हेतल न सिर्फ 60 फीट ऊंचे स्कैफफोल्डर्स पर चढ़ सकती हैं बल्कि भारी लाइट्स भी ढोकर ले जा सकती हैं. वो कहती हैं, ‘कई महिलाएं लाइटिंग डिजाइन में नहीं आना चाहतीं क्योंकि ये कुछ ज्यादा ही मर्दाना काम है.’ हेतल के मुताबिक उन्हें दिल को छू लेने वाली सबसे अच्छी टिप्पणी एक पुरुष डांसर से मिली जिसका कहना था कि हेतल को काम करते देख उसे अपनी तुच्छता का अहसास हुआ. उस डांसर को लगा कि हेतल कितनी मेहनत वाला काम कर रही हैं और वो सिर्फ डांस कर रहा है.

महिला पेशेवरों की ये नई पीढ़ी बॉलीवुड में बदलाव की बयार ला रही है. इसके संकेत सेट्स पर दिख जाते हैं जहां अब पालिएस्टर की पतलून और उससे मेल खाते जूते पहने अजीब से लोग अब ज्यादा नहीं दिखते.’

वही पुराना कांग्रेसी खेल

पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) महाराष्ट्र की राजनीति पर छाई हुई है. जिस दिन राज ठाकरे को अदालत में पेश किया गया उस दिन सैकड़ों बसों को आग के हवाले कर दिया गया, करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और मुंबई में रहने वाले उत्तर भारतीयों पर कई हमले भी किए गए. मीडिया ने मराठी लोगों को राज ठाकरे के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए दिखाया. महाराष्ट्र के पढ़े-लिखे तबके ने हालांकि हिंसा की निंदा की मगर सिद्धांतत: वो राज ठाकरे से सहमत दिखे.

इस पूरे तमाशे ने मुझे ये सोचने पर विवश किया कि क्या पिछले चालीस सालों में वाकई में कुछ बदला है. 1970 में शिवसेना और बाल ठाकरे ठीक वैसा ही राजनीतिक खेल खेल रहे थे जैसा आज राज ठाकरे खेल रहे हैं. तब कम्युनिस्ट पार्टियों से मिल रही कड़ी चुनौती का सामना करने के लिए कांग्रेस ने बाल ठाकरे का खुल के इस्तेमाल किया था और आज वही पार्टी शिवसेना से निपटने के लिए राज ठाकरे का इस्तेमाल कर रही है.

ये भी अजीब ही है कि न तो कांग्रेस और न ही ठाकरे परिवार को इस्तेमाल करने वाली इसकी रणनीति में ही कोई बदलाव आया है.

ये भी अजीब ही है कि न तो कांग्रेस और न ही ठाकरे परिवार को इस्तेमाल करने वाली इसकी रणनीति में ही कोई बदलाव आया है. अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए कांग्रेस किसी को भी बढ़ाने-चढा़ने के लिए हमेशा ही कुख्यात रही है. मराठी भाषा और इसे बोलने वालों का हाशिए पर जाना हमेशा ही यहां के लोगों की दुखती रग रहा है. लेकिन इसे दूर करने के बजाय कांग्रेस-एनसीपी सरकार इसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है. दरअसल चुनाव सर पर हैं और इस बार शिवसेना का पलड़ा न केवल महाराष्ट्र के शहरी बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी भारी लग रहा है. पिछले कुछ समय में शिवसेना को मिलने वाले समर्थन में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है और मनसे कम से कम शहरी इलाकों में तो शिवसेना के वोटों को विभाजित कर उसे नुकसान पहुंचाने वाला एक अमोघ अस्त्र साबित हो सकता है. ये नुकसान बड़ा होगा क्योंकि चुनाव क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के बाद मुंबई, पुणे और थाणे जिले चुनावों में एक बड़ी भूमिका अदा करने वाले इलाके बन गए हैं.

सरकार द्वारा राज ठाकरे पर उनके भड़काऊ भाषणों के लिए सही कार्रवाई न किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्हें गिरफ्तार करके मुंबई में किसी हीरो की तरह लाया गया. मुंबई में उनका प्रवेश किसी आरोपी के जैसा नहीं था बल्कि हाथ हिलाकर अपने समर्थकों का अभिवादन स्वीकार करते वक्त वो किसी राजा-महाराजा जसा बर्ताव कर रहे थे. जमानत मिलने के बाद जब वो कार में बैठ रहे थे तो उनके लिए कार का दरवाजा मुंबई पुलिस के एक एसीपी ने खोला. सरकार ने उनपर आईपीसी की केवल जमानती धाराएं लगाने के साथ-साथ ये सुनिश्चित करने के हरसंभव प्रयास किए कि राज ठाकरे को तनिक भी असुविधा न हो. इस दौरान ठाकरे को सीख देने को लेकर सरकार की अनिच्छा और पुलिस अधिकारियों का उनके प्रति सम्मान खुल कर नजर आ रहा था.

निम्न मध्यमवर्गीय मराठी युवा पूरी तरह से राज ठाकरे के साथ हैं. हालांकि ऐसा नहीं है कि उन्हें हर-एक का समर्थन प्राप्त हो लेकिन जिनका नहीं है वो कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि स्थानीय मराठी लोगों में एक तरह के अन्याय की भावना घर कर गई है जिसका सही तरीके से निराकरण किया जाना जरूरी है. देश की आर्थिक राजधानी होने की वजह से मुंबई पैसे की भाषा बोलती-सुनती है मगर वैश्वीकरण के इस दौर में मराठी बोलने वाले लोग हाशिए पर पहुंच गए हैं. औद्योगीकरण के बाद के दौर की आज की मुंबई, सस्ते बिहारी कामगारों को प्राथमिकता देती है जिसके फलस्वरूप जो यहां के भूमिपुत्रों को महसूस हो रहा है वो पूरी दुनिया की कहानी है. और बाहर से आने वालों की वजह से स्थानीय संस्कृति और भाषा पर खतरा मंडराता अलग से प्रतीत होता है. मगर सरकार इसका कोई हल निकालने के बजाय राज ठाकरे जसे लोगों को खुली छूट दे रही है.मुंबई और महाराष्ट्र में आज जो हो रहा है उसका समाधान हालांकि थोड़ा मुश्किल जरूर है मगर असंभव नहीं. इसके लिए सरकार को कानून और व्यवस्था का पालन करवाने को लेकर दृढ़ता दिखानी होगी, मीडिया को थोड़ा संतुलित नजरिया अपनाना होगा और लोगों को राष्ट्रीय एकता की भावना का प्रदर्शन करना होगा. मेरा मन कहता है कि अगर हम सब मिल जाते हैं तो ऐसा करना कतई असंभव नहीं है.

निखिल वागले

(लेखक आइबीएन लोकमत के संपादक हैं)

प्रतिशोध की प्रेमकथा

बॉण्ड सिरीज की 22वीं फिल्म कई मायनों में पहली कही जा सकती है. इसका शुरुआती संगीत ही परंपरागत बॉण्ड संगीत से अलग है, ये अब तक की पहली बॉण्ड फिल्म है जो सिक्वेल है यानी कसीनो रॉयाल की अगली कड़ी, इसके अलावा इस फिल्म में पहली बार बॉण्ड मॉडर्न गेजेट्स की बजाय भुजाओं के जोर से दुश्मनों को धूल चटाता नज़र आया है जो पिछले बॉण्ड के मुकाबले थोड़ा कम मशीनी लगता है. इस तरह से क्वांटम ऑफ सोलेस या कहें कि डेनियल क्रेग उन दर्शकों को भी काफी हद तक संतुष्ट करने में कामयाब रहे हैं जिन्हें कसीनो रॉयाल का बॉण्ड दुश्मनों के सामने थोड़ा कमजोर लगा था.

कसीनो रॉयाल की यही कमजोरी क्वांटम ऑफ सोलेस की बुनियाद कही जा सकती है. पिछली फिल्म में अपनी प्रेमिका की हत्या और उसके हत्यारों तक न पहुंच पाने की खीज में बॉण्ड क्रूर और आक्रामक हो चुका है. बॉण्ड के गुस्से की एक वजह ये भी है कि उसके ऊपर मिशन को पूरी सफलता से अंजाम न दे पाने का धब्बा लग गया है. वो हत्यारों की खोज में चिली के रेगिस्तान से लेकर रूस के बर्फीले बियाबानों तक की खाक छानता है. इस दौरान वो पहुंचता है खलनायकों के एक समूह के बीच जिसका नाम हैक्वांटम. इसका मुखिया है मैथ्यू अमालरिक.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों, उनसे पैदा होने वाले संकटों के बीच आगे बढ़ती फिल्म में बॉण्ड को सहारा देने के लिए दो नई बॉण्ड कन्याएं भी हैं जिन्हें पूर्ववर्ती बॉण्ड फिल्मों की तरह ही कॉस्मेटिक एडीशन कहा जा सकता है. ये नई बॉण्ड गर्ल्स है ओल्गा कुरिलेंको और जेमा आर्टर्टन. अंतरंग दृश्य, लिपलॉक चुंबन और सागर तटों पर रुमानी छट्टियों जैसे बॉण्डमार्का मसाले क्वांटम ऑफ सोलेस में भी पर्याप्त मात्रा में है. लेकिन भारतीय दर्शकों को थोड़ी निराशा होगी क्योंकि सेंसर बोर्ड ने इन दृश्यों को उनके लिए मुफीद नहीं समझा है. शुरुआत से ही बॉण्ड धरती, अग्नि, जल, आकाश में खतरनाक गिरोहों को मात देता हुआ नजर आता है. फिल्म की तेज गति और उतना ही दनदनाता संगीत साथ में कसावट भरी पटकथा और डेनियलअमालरिक का शानदार अभिनय दर्शकों को कहीं बोर होने का मौका नहीं देता. और जब फिल्म अगले पड़ाव की ओर जाती नजर आती है एक घंटे 46 मिनट की ये फिल्म वहीं खत्म हो जाती है. तमाम उत्तेजना, सनसनी, मारधाड़, हैरतअंगेज स्टंट और जबर्दस्त प्रचार के बाद भी क्वांटम ऑफ सोलेस एक लवस्टोरी है. और अंत में क्वांटम ऑफ सोलेस देखने से पहले एक बार कसीनो रोयाल का सरसरी तौर पर मुआयना जरूर कर लें क्योंकि बॉण्ड की मृत प्रेमिका का साया पूरी फिल्म पर पड़ा है.

अतुल चौरसिया

ऐसा प्राणी खोजिए

चक्र सुदर्शन

ऐसा प्राणी खोजिए, स्वारथ से हो दूर,

जन-गन की सेवा करे, तन-मन से भरपूर.

तन-मन से भरपूर, न बिल्कुल रिश्वत खाए,

कष्ट निवारण करे, मदद को दौड़ा आए.

चक्र सुदर्शन, टिकिट बंटी हैं देकर पैसा,

रहो टापते, नहीं मिलेगा, प्राणी ऐसा.  

                                                   अशोक चक्रधर

इस वर्ग की अन्य रचनायें

हिंदू हिंसा हिंसा न भवति

स्वामी निश्चलानंद पुरी के शंकराचार्य हैं. विधिवत. यानी न तो उनने पीठ को धाम घोषित कर रखा है, न वे स्वयं घोषित शंकराचार्य हैं. पुरी का पीठ सर्वमान्य चार धामों में से एक है और आदि शंकराचार्य की दी गई व्यवस्था के अनुसार निश्चलानांद शंकराचार्य हैं. उनके धाम और पद को लेकर कोई विवाद नहीं है. यानी वे फर्जी धाम के फर्जी शंकराचार्य नहीं हैं. इसलिए आस्थावान हिंदू अगर उम्मीद करें कि स्वामी निश्चलानंद धर्म की समझ और पद की जिम्मेदारी से ही बोलेंगे तो स्वाभाविक ही है.

लेकिन उनने अभी कहा कि हिंदू उग्रवादी बने तो तीसरा महायुद्ध हो जाएगा. ‘‘मैं पिछले सत्रह सालों से कहता आ रहा हूं कि हिंदुओं को इतना मजबूर न किया जाए कि एक दिन वे हथियार उठाने को बाध्य हों. आज विदेशी षड्यंत्र इस तरह गहरे फैल गया है कि हिंदुओं के गंगा, राम सेतु, राम मंदिर जसे मानबिंदुओं को अपमानित करने के लिए हिंदू ही विदेशी एजेंट बन कर सामने खड़े हो गए हैं’’ – स्वामी निश्चलानंद का यह कथन एक हिंदी अखबार में छपा है. शंकराचार्य ने कहा कि हिंदुओं को उग्रवादी बनाने को इसी तरह मजबूर किया गया तो संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल हो न हो, एक लाख में एक हिंदू तो ऐसा होगा ही जो राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठा लेगा. हमारे देवी-देवती राम, कृष्ण, काली, दुर्गा सबने शस्त्रों से ही दुष्टों का संहार किया. उनके हाथों में हथियार रहते हैं. इससे अगर उन्हें भी उग्रवादी माना गया तो फिर मुझे भी अपने आप को उग्रवादी मानने में कोई आपत्ति नहीं होगी.

स्वामी निश्चलानंद ने कहा – साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के घर से कोई आपत्तिजनक सामान नहीं मिला न जांच में कोई जानकारी मिली. फिर भी उन्हें घोर प्रताड़ना दी जा रही है जबकि संसद पर हमला करने वाले जेलों में मजा काट रहे हैं.

पुरी के शंकराचार्य का इतना बड़ा उद्धरण मैंने दिया तो इसलिए कि वे प्रवीण तोगड़िया नहीं है. विश्व हिंदू परिषद के इस नेता को एक टीवी चैनल ने भाषण देते हुए दिखाया कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर का तो चार-चार बार नार्को टैस्ट किया गया जबकि डान सलेम का एक बार भी नहीं किया गया. प्रवीण तोगड़िया कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टर हैं लेकिन तथ्यों से उनका कोई लेना-देना नहीं है. वे नहीं जानते कि सलेम का नार्को टैस्ट कितनी बार हुआ. लेकिन प्रज्ञा सिंह ठाकुर के नार्को टैस्ट को बदनाम करने और हिंदू को गुस्सा दिलाने के लिए कि उनकी एक साध्वी का तो चार बार नार्को टैस्ट किया जाता है जबकि अबु सलेम जैसे अपराधी सरगना मुसलमान का एक बार भी नहीं. प्रवीण तोगड़िया सरासर झूठ बोल रहे थे क्योंकि सब जानते हैं कि अबु सलेम का नार्को टैस्ट और ब्रेन मैपिंग सब कुछ हुआ है. तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद के नेता हैं और उनसे हिंदू भी उम्मीद नहीं करते कि सांप्रदायिकता भड़काने में तथ्यों और सच्चाई का ध्यान रखेंगे.

प्रवीण तोगड़िया जसे ही योग गुरु रामदेव हैं. वे भी कहते फिर रहे हैं कि चार-चार बार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नार्को टैस्ट उन्हें प्रताड़ित करने के लिए किया गया है. एक साध्वी का तो चार बार लेकिन आतंकवादियों और नेताओं का नार्को टैस्ट तो एक बार भी नहीं करवाया जाता. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के मामले में जांच में कुछ नहीं निला इसलिए मामला संदिग्ध हो जाता है. बेचारे रामदेव भी प्रचारक हैं. संघ के या विहिप के नहीं योग के. और प्रचारक को भी तथ्यों और सच्चाई से कम ही लेना-देना होता है. उन्हें नहीं मालूम कि आतंकवादियों और नेताओं का नार्को टेस्ट करवाया जाता है या नहीं. उन्हें यह भी नहीं मालूम कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जांच में से क्या तथ्य निकल कर आए हैं. अगर कुछ नहीं निकला होता तो क्या न्यायालय उन्हें हिरासत में रखने की अनुमति देता. मुंबई के आतंकवादी निरोधी दस्ते ने साफ कहा है कि हमने एक भी ऐसा व्यक्ति गिरफ्तार नहीं किया है जिसके खिलाफ हमारे पास सबूत नहीं हैं.

लेकिन रामदेव और स्वामी निश्चलानंद दस्ते की एक भी बात पर एतबार नहीं करते. उन्हें तो भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह पर ही विश्वास है जो कहते चले आ रहे हैं कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जांच में कुछ नहीं निकला है तभी तो बार-बार उनका नार्को टैस्ट करवाया जा रहा है. राजनाथ सिंह का कहना फिर भी समझ जा सकता है क्योंकि वे तो मालेगांव बम विस्फोट में संघ परिवारी संगठनों और कार्यकर्ताओं के शामिल होने के तथ्यों का राजनीतिकरण कर रहे हैं. मालेगांव के आरोपियों को बचाने का एक यही तरीका वे जानते हैं. उन्हें यह करना इसलिए जरूरी है कि उनकी पार्टी ही लगातार प्रचार करती आई है कि यह इस्लामी आतंकवाद है. और देश के सारे मुसलमान आतंकवादी हों या नहीं पकड़े गए सभी आतंकवादी मुसलमान हैं. ओर चूंकि कांग्रेस को मुसलमानों के वोट चाहिए इसलिए उसकी सरकार आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करती.

मालेगांव बम विस्फोट की जांच इस प्रचार को झूठा ठहराती है और बताती है कि मुसलमान बहुल इलाकों में हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं. जांच में ऐसी साई निकल कर आए तो आतंकवाद के विरुद्ध संघ वालों का प्रचार ही झूठ नहीं लगता यह बात भी सामने आती है कि सिर्फ मुसलमान ही आतंकवादी नहीं होते हिंदूवादी संगठन भी हिंदुओं को आतंकवादी बना रहे हैं. यह तथ्य स्थापित हो जाए तो आतंकवाद भारत नामक राष्ट्र को तोड़ने वाला मुसलमान षड्यंत्र नहीं रहता. वह उग्रवाद और कट्टरवाद की करतूत हो जाता है जिसमें हिंदू-मुसलमान उग्रवादी संगठन समान रूप से लगे हुए हैं.

अब हिंदू संगठन ऐसी जांच को झूठी और कांग्रेस की साजिश बताए बिना रह नहीं सकते. सिर्फ इसलिए नहीं कि इससे उनके मुसलमान विरोध की राष्ट्रवादी हवा निकल जाती है. इसलिए भी कि हिंदुत्व और हिंदुत्ववादी संगठन अपने सभी सिद्धांतों और कार्यो के लिए जो प्रखर राष्ट्रवादी औचित्य दिया करते हैं वह भी झूठा और निराधार साबित होता है. मैं बता चुका हूं कि संघ और हिंदुत्व की आस्था में हिंदू ही राष्ट्र है. बाकी सब बाहर के समुदाय हैं. इसलिए हिंदुओं के सारे काम उनकी परिभाषा में राष्ट्रीय कार्य हैं. और इसलिए हिंदू अगर बम भी फोड़ रहे हैं तो यह तो राष्ट्र और धर्म की रक्षा में किया गया राष्ट्रीय कार्य है. जरा समझिए कि शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने क्या कहा है. ¨हिंदूवादी संगठन नहीं भी हों तो भी मजबूर किए गए तो लाख में एक हिंदू तो ऐसा निकलेगा जो राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठा लेगा.

यानी मालेगांव में प्रज्ञा सिंह ठाकुर और उनके साथियों ने बम विस्फोट कर के जो छह मुसलमानों को मारा और नब्बे को घायल किया तो यह तो राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए किया क्योंकि मुंबई, दिल्ली, बंगलूर, अमदाबाद आदि में मुसलमानों ने बम विस्फोट कर के राष्ट्र पर जो हमला किया उसका जवाब तो देना था. आपको याद होगा कि कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता रहे राम माधव ने मालेगांव बम विस्फोट में पकड़ी गई साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और उनके साथियों के बारे में क्या कहा था. उनने बड़ी गंभीरता से कहा कि समाज को सोचना चाहिए कि प्रखर राष्ट्रवादी संगठनों से जुड़े लोग ऐसे काम करने को क्यों मजबूर होते हैं? क्योंकि वे राष्ट्र पर होते निरंतर हमलों को सह नहीं पाते और एक दिन हमलावरों को उन्हीं के तरीकों से जवाब देते हैं. यानी वे जो बम विस्फोट आदि की हिंसा करते हैं वह राष्ट्र को तोड़ने वाला आतंकवाद नहीं होता. वह राष्ट्र की रक्षा के लिए किया गया राष्ट्रीय कार्य है. यानी हिंदू हिंसा हिंसा न भवति. यह तो राष्ट्र रक्षा है.

इसीलिए आप देखिए कि ¨हदुत्ववादी अखबारों में लेख लिख कर बता रहे हैं कि मालेगांव जैसी घटनाएं तो वाजिब हिंदू क्रोध की अभिव्यक्ति हैं. हिंदू रोज-रोज देखते हैं कि जिहादी जहां चाहें तब बम विस्फोट करते हैं और हिंदुओं-बेकसूर हिंदुओं को मौत के घाट उतार देते हैं. पुलिस और खुफिया एजेंसियां कुछ नहीं कर पातीं. राज्य की रक्षा एजेंसियां कुछ नहीं करतीं. कांग्रेस और दूसरी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को मुसलमान वोट चाहिए क्योंकि उनके बिना वे सत्ता में नहीं आ सकती. आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे तो मुसलमान नाराज हो जाते हैं. उन्हें संतुष्ट रखने के लिए आतंकवाद के खिलाफ नरम रवया अपनाया जाता है. सख्त कानून नहीं बनाए जाते. लेकिन मारे जाते हैं हिंदू. वे कब तक सहन करें. उनका गुस्सा फूटता है तो मालेगांव होता है. हिंदुओं को ऐसी हिंसा करने को मजबूर किया जाता है. बाबरी मस्जिद गिरा कर और गुजरात कर के जिन राष्ट्रवीरों ने भारत के मुसलमानों के पास कोई चारा नहीं छोड़ा वही कह रहे हैं कि हिंदू आतंकवाद के कारण समझने की कोशिश करो.

सांप्रदायिक विचारधारा में माननेवाले हिंदुत्ववादी कहें कि हिंदू मजबूर किए जा रहे हैं तो आप समझ सकते हैं कि उन्हें अपनी सांप्रदायिक हिंसा को सही बताने का कारण चाहिए. लेकिन जब पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद अपना धर्म और अपना धार्मिक दायित्व भूल कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भाषा में बोलने लगे और चेतावनी दें कि हिंदू उग्रवादी हुए तो तीसरा महयुद्ध हो जाएगा तो आप जैसे धर्मिक निष्ठा वाले हिंदू क्या करें? शंकराचार्य को कहें कि स्वामी अपने मठ में रहो. हमारे धर्म और राष्ट्र को हम देख लेंगे.  

फिर गूंजा जीवन का कलरव

जुलाई 2008 : पांच साल से सूखे की मार ङोल रहे भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य में उम्मीदें भी लगभग सूख चुकी थीं. मानसून के बादल दिखाई दिए तो हर साल की तरह उम्मीदभरी आंखों ने आसमान की तरफ देखा. इस बार इंद्र देवता ने उन्हें निराश नहीं किया और सूखी धरती को बारिश की फुहारों ने मानो नई जिंदगी दे दी. सबसे पहले भूरे बगुले पहुंचे. कुछ ही दिनों में कदंब के पेड़ों पर उनके हजारों बसेरे आबाद हो गए. उनका आना इस बात का संकेत था कि दूसरे मेहमान भी जल्द ही पहुंचने वाले हैं. यही हुआ भी और एक लंबे अंतराल के बाद केवलादेव घाना अभ्यारण्य जिसे आमतौर पर भरतपुर बर्ड सेंचुरी के नाम से जाना जाता है, पुराने रंग में लौट आया. जलकौवे, सारस, जलसिंघे, लकलक बगुले और ऐसे ही दूसरे भांति-भांति के पक्षियों के कलरव से यहां का माहौल जीवंत हो उठा. अब सर्दियों की दस्तक के साथ भरतपुर में प्रवासी पक्षियों का आना भी शुरू हो चुका है और उम्मीद की जा रही है कि पिछले कुछ सालों के सूनेपन को खत्म करते हुए साइबेरियाई सारस जसे मेहमान फिर से भारी संख्या में अपने इस दूसरे घर की तरफ आएंगे. 

आने वाले बुरे वक्त का संकेत तो 2002 की सर्दियों में ही मिल गया था जब अभ्यारण्य की पहचान साइबेरियाई सारस यहां नहीं पहुंचे. कई पक्षी विज्ञानियों की नजर में ये एक अपशकुन था.

पिछले कुछ साल इस अभ्यारण्य के लिए अच्छे नहीं रहे. वैसे आने वाले बुरे वक्त का संकेत तो 2002 की सर्दियों में ही मिल गया था जब अभ्यारण्य की पहचान साइबेरियाई सारस यहां नहीं पहुंचे. इससे पहले के सालों में उनकी संख्या लगातार घटकर इक्का-दुक्का ही रह गई थी. कई पक्षी विज्ञानियों की नजर में ये एक अपशकुन था. उनका डर सही साबित हुआ और 2004 के बाद से ये इलाका भयंकर सूखे की चपेट में आ गया. भरतपुर के जल स्रोतों का पानी सूखने लगा. इससे भी बुरा ये हुआ कि किसानों के विरोध और पानी पर हो रही राजनीति के चलते इस अभ्यारण्य को जरूरत के वक्त अजान बांध से मिलने वाला पानी भी बंद हो गया. इसके पीछे कारण ये था कि पिछले चार साल से बारिश कम हो रही थी और किसान अपने खेतों के लिए पानी की मांग कर रहे थे. 2005 में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा कि उनकी प्राथमिकता अभ्यारण्य नहीं बल्कि लोग हैं. शायद वो इस बात को समझ नहीं पाईं कि अभ्यारण्य के दलदली इलाकों में आने वाला पानी भूमिगत जल के स्रोतों को रिचार्ज करता जिससे आस-पास के किसानों का ही फायदा होता. मगर राजनीतिक दबाव में ऐसा नहीं किया गया.

इसका नतीजा ये हुआ कि दलदली इलाके सूख गए. पानी नहीं रहा तो पक्षी भी अभ्यारण्य में नहीं आए. साइबेरियाई सारसों का आना तो बंद हो ही चुका था. बगुलों के घोंसले और बत्तखों के झुंड दिखने भी बंद हो गए. कभी यहां पक्षियों की 400 प्रजातियां बसेरा करतीं थीं मगर अब ये आंकड़ा सिमटकर पिछले साल 48 पर आ चुका था. जिस अभ्यारण्य में कभी अनगिनत पक्षी नजर आते थे वहां अब पक्षियों को उंगलियों पर गिना जा सकता था. दूसरी प्रजातियों का हाल भी बुरा था. खतरे में पड़ी शिकारी बिल्ली की संख्या भी बहुत कम हो गई थी और कछुओं को कीचड़ से भरे छोटे-छोटे गड्ढों में अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद करते देखा जा सकता था. कभी जिंदगी से भरा-पूरा भरतपुर अब किसी कब्रगाह सरीखा दिखने लगा. बरसों से इस जगह को देखने वाले भोलू अबरार खान कहते हैं, ‘यहां बिल्कुल भी प्रजनन नहीं हो रहा था, ऐसे हालात में होता भी तो कैसे? न पानी था, न घास, न मछलियां.’

इन हालात के चलते पार्क पर आश्रित अर्थव्यवस्था ने दम तोड़ दिया. पर्यटकों को अभ्यारण्य के इर्दगिर्द घुमाने वाले रिक्शाचालकों में से एक रतन सिंह कहते हैं, ‘गिनती के पर्यटक रह गए थे. और जो आते भी थे निराश होकर लौटते थे. होटलों में कमरे खाली पड़े रहते थे.’

शुरुआती उपाय तात्कालिक थे. पार्क में ट्यूबवेल लगाए गए मगर उनके द्वारा उड़ेले गए पानी का ज्यादातर हिस्सा पार्क में घुस गए आवारा जानवरों के पेट में जाने लगा. चंबल से एक पाइपलाइन द्वारा पानी पहुंचाने के लिए राज्य सरकार द्वारा सुझई गई 100 करोड़ रुपये की खर्चीली योजना को विशेषज्ञों ने ठुकरा दिया. भारत में वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर के वेटलैंड्स प्रोग्राम के निदेशक डा परीक्षित गौतम कहते हैं, ‘भरतपुर को ताजे पानी की जरूरत है जो घास और चिड़ियों के भोजन यानी मछलियों का पोषण करता है. सुदूर चंबल से आने वाले पानी में ये खूबी नहीं होगी.’

एक गंभीर समस्या विलायती कीकर की थी. बहुत तेजी से फैलने वाला ये झड़ असल में दूसरे पेड़-पौधों को ठीक से पनपने नहीं देता. 2002 से 2005 के दौरान ही इसने अपना इलाका दोगुना कर लिया. मेसवाक जसे उपयोगी स्थानीय पेड़ों, जिन पर कई चिड़ियों का बसेरा होता है, पर इसका काफी बुरा असर हुआ. द भरतपुर इनहेरिटेंस  नामक किताब के लेखक विक्रम ग्रेवाल कहते हैं, ‘हालात इतने खराब थे कि लग रहा था जैसे ये इलाका विश्व धरोहर के अपने दर्जे को खो ही बैठेगा.’ राजस्थान के प्रमुख वन्यजीव वार्डन कहते हैं, ‘हम ऐसा कैसे होने देते.’

इसलिए अभ्यारण्य को फिर से उसके पुराने स्वरूप में लाने की लड़ाई शुरू हुई. पहला कदम था विलायती कीकर से मुक्ति पाना. इस दिशा में अनुभवहीनता को देखते हुए ये बहुत चुनौतीपूर्ण काम था. वन विभाग ने इसके लिए एक नया तरीका खोज निकाला जिससे स्थानीय गांववालों को काफी फायदा हुआ. अभ्यारण्य के आसपास के गांवों में आर्थिक विकास समितियां बनाई गईं. परिवारों को जमीन के निश्चित टुकड़े आवंटित किए गए जिनसे उन्हें विलायती कीकर हटाना था. इसके बदले में उन्हें लकड़ी दी गई. इस अभियान के द्वारा आठ किलोमीटर का इलाका साफ किया गया और इससे करीब एक लाख क्विंटल लकड़ी इकट्ठी की गई. कई स्थानीय लोगों ने इस अनपेक्षित लाभ का इस्तेमाल अपने पुराने कर्ज से छुटकारा पाने में किया. उदाहरण के लिए जटोली गांव के तुकीराम ने न सिर्फ कर्ज से मुक्ति पाई बल्कि अपना घर भी बना लिया.

हालांकि भरतपुर के पुराने दिन अभी भी कोसों दूर हैं मगर राहत की बात ये है कि इसके संकट से उबरने की शुरुआत तो हो ही चुकी है.

अब बची थी पानी की समस्या जो कहीं जटिल थी. इस साल वरुण देवता की मेहरबानी से ये संकट कम तो हुआ है मगर पूरी तरह से खत्म नहीं. जीवंत रहने के लिए भरतपुर को 550 एमसीएफ पानी की जरूरत होती है. इसका ज्यादातर हिस्सा अजन बांध से आता है. फिलहाल तीन चरणों में बांध से 450 एमसीएफ पानी छोड़ तो दिया गया है मगर पानी पर हो रही राजनीति को देखते हुए इस बांध अब ज्यादा दिन निर्भर नहीं रहा जा सकता. एक समाधान छिकसाना नहर है जिसका इस्तेमाल अजन बांध का अतिरिक्त पानी निकालने के लिए होता है. इसे अभ्यारण्य की तरफ मोड़ दिया गया जिसने 80 एमसीएफ पानी की पूर्ति कर दी. डा गौतम बताते हैं, ‘बाढ़ का पानी निकालने के लिए बनी एक ऐसी ही दूसरी नहर का भी इस्तेमाल करने की योजना है जिसके पानी पर कोई दावा नहीं करता. इसके लिए 17 किलोमीटर लंबे पाइप के जरिये उसका पानी पार्क तक लाना होगा. मुश्किल के समय में ये दोनों नहरें भरतपुर के काम आ सकती हैं.’ मेहरोत्रा कहते हैं, ‘सरकार ने इस योजना के लिए 12.46 करोड़ रुपये मंजूर कर दिए हैं. इसकी लागत करीब 65 करोड़ होगी और योजना आयोग बाकी की राशि देने पर सहमत हो गया है. हम काम शुरू कर चुके हैं और उम्मीद है कि अगले मानसून से पहले नहर तैयार हो जाएगी. भरतपुर को अब कभी भी प्यासा रहने की जरूरत नहीं होगी.’

हालांकि भरतपुर के पुराने दिन अभी भी कोसों दूर हैं मगर राहत की बात ये है कि इसके संकट से उबरने की शुरुआत तो हो ही चुकी है. विलायती कीकर के हटने और पानी के आने से भरतपुर में हजारों पक्षियों का कलरव फिर से गूंजने लगा है. भोलू सारस के एक घोंसले की तरफ इशारा करते हैं जिसमें मां अभी-अभी मछली लेकर लौटी है और उसके चार चूजे खाने के लिए शोर मचा रहे हैं. वो कहते हैं, ‘चार चूजे पैदा हुए और सारे जिंदा रह गए. इसका मतलब है कि पार्क में पर्याप्त खाना मौजूद है.’और भविष्य के लिए पर्याप्त उम्मीद भी. 

सीमाओं में रहे

चक्र सुदर्शन

मन से यदि हम चाहते, देश रहे ख़ुशहाल,

मिलकर रहना सीख लें, सब भारत के लाल।

सब भारत के लाल, बिहारी हों कि मराठी,

लेकिन भाई पर भाई बरसाता लाठी।

चक्र सुदर्शन टूट रहा है, इस अनबन से,

सीमाओं में रहे, मुम्बई की ये मनसे।

                                                   अशोक चक्रधर

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