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अमरोहा की खुशबू चांद तक

उत्तर प्रदेश का अमरोहा जिला दिल्ली से करीब 200 किमी की दूरी पर है. यहां का चौगोरी मौहल्ला एक आम-सी मुस्लिम आबादी है जिसमें शायद ही कुछ ऐसा हो जो आपका जरा भी ध्यान आकर्षित कर पाए. इस मौहल्ले में प्रवेश का एकमात्र रास्ता मात्र छह फुट चौड़ा और घुमावदार है जो अक्सर कीचड़ और गंदगी से भरा रहता है और इसी रास्ते से होकर ही मिर्जा परिवार तक पहुंचा जा सकता है. खुशबू इसी मिर्जा परिवार की तीन संतानों में से एक हैं जिनसे आज यहां हर कोई मिलना चाहता है. आने वालों का तांता लगा है और खुशबू और बेहद खुश लग रही उनकी मां फरहत घर के  दरवाजे पर ही लगातार आ रहे लोगों का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करती हैं.

अक्टूबर 2008 में भेजे गए चंद्र-अभियान के बाद से अब तक इतने लोग इस परिवार से मिलने और उसे बधाइयां देने आ चुके हैं जितनी पिछली दसियों ईदों पर आने वाले लोगों की कुल संख्या भी नहीं होगी

हमारी एक घंटे लंबी बातचीत के दौरान मां-बेटी की ये जोड़ी एक के बाद एक उन तमाम छवियों को तोड़ती हैं जिनसे हम मुस्लिम परिवार और मुस्लिम महिलाओं को शायद ही कभी अलग करके देखते हों. जब मैंने शुरुआत में ही खुशबू से पूछा, ‘हिंदी में या अंग्रेजी में’ तो आत्मविश्वास से लबरेज और दसवीं कक्षा तक हिन्दी माघ्यम से पढ़ी खुशबू का जवाब था, ‘अंग्रेजी में ठीक रहेगा.’ इस घर की छह कुर्सियों वाली खाने की मेज शुभकामना संदेशों और गुलदस्तों से भरी हैं, खुशबू कहती हैं, ‘मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं इस तरह से एक आइकॉन बन जाऊंगी.’

23 साल की यह बाला भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में इंजीनियर है. वे भारत की महत्वाकांक्षी चंद्रयान परियोजना की ‘चेक आउट’ डिवीजन के 12 सदस्यों में से एक थीं, खास बात ये है कि वे इस टीम की सबसे छोटी सदस्य थीं. इस डिवीजन में उनका काम था कृत्रिम परिस्थितियों में उपग्रह के तमाम पुर्जो पर तरह-तरह के परीक्षण करना. ‘हमें ये परीक्षण करना था कि विभिन्न परिस्थितियों में अंतरिक्ष में उपग्रह किस तरह का व्यवहार करेगा’ 2006 में इसरो से जुड़ने वाली गुड़िया जसी इंजीनियर बताती है.

अक्टूबर 2008 में भेजे गए चंद्र-अभियान के बाद से अब तक इतने लोग इस परिवार से मिलने और उसे बधाइयां देने आ चुके हैं जितनी पिछली दसियों ईदों पर आने वाले लोगों की कुल संख्या भी नहीं होगी. खुशबू की मां फरहत हंसते हुए बताती हैं, ‘कई लोग सोचते हैं कि खुशबू चांद पर गई थी, वे पूछते हैं कि वो वहां से लौट कर कब आई.’

मगर मिर्जा परिवार की स्थिति हमेशा से ऐसी नहीं थीं. 1994 में फरहत के पति सिकंदर का निधन हो गया. इन स्थितियों में अपने बाच्चों के स्कूल की फीस और घर चलाने के लिए उन्हें पारिवारिक पेट्रोल पम्प पर काम करना पड़ा. खुशबू उस समय महज सात साल की थी और उसकी छोटी बहन महक मात्र चार और बड़ा भाई खुश्तर दस साल का. फिलहाल महक मुरादाबाद इंस्टीटच्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है और खुश्तर ने दिल्ली के जामिया मिलिया से बी टेक किया है.

मगर मिर्जा परिवार की महिलाओं के लिए पढ़ी-लिखी होना कोई नई या अनोखी बात नहीं. खुद फरहत भी मुरादाबाद कॉलेज से स्नातक हैं. वे बताती हैं, ‘मेरे पति इंजीनियर थे और उनका सपना था कि हमारी बच्चियां खूब तरक्की करें और आगे जाएं. मुझे पता था कि ये सब बिना अच्छी शिक्षा के मुमकिन नहीं.’ फरहत की बहन देहरादून के एक पब्लिक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती हैं. और उनकी दो भतीजियां अमेरिका में पीएचडी कर रही हैं. 45 वर्षीय फरहत गर्व के साथ कहती हैं, ‘मैंने अपने बच्चों को सिखाया है कि वे सितारों तक पहुंचें.’

खुशबू की दुनिया सिर्फ इंजीनियरिंग तक ही सीमित नहीं रही. अपने स्कूल के दिनों में वो जिला स्तर की वॉलीबॉल की खिलाड़ी थीं. दसवीं पास करने के बाद आगे पढ़ाई के लिए उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और फिर यहीं से बी टेक की पढ़ाई भी की.खुशबू इस विश्वविद्यालय की पहली छात्रा भी रहीं जिसने यहां के छात्र संघ के चुनावों में हिस्सा लिया. हालांकि वे चुनाव तो नहीं जीतीं लेकिन उनकी इस कोशिश ने यहां और लड़कियों को चुनाव में भाग लेने के लिए प्रेरित किया.

समय बदल चुका है इसलिए मुस्लिम लड़कियों के प्रति भी नजरिया बदलना चाहिए. हमारे परिवारों को हमें जरूर पढ़ाना चाहिए

बी टेक की डिग्री पूरी करने के तुरंत बाद ही खुशबू को अडोबि सॉफ्टवेयर की तरफ से नौकरी का प्रस्ताव मिला जिसे ठुकराकर अक्टूबर 2006 में इसे छोड़कर वे इसरो से जुड़ गईं. हालांकि इसरो में उन्हें अपनी पहली नौकरी की तुलना में काफी कम पैसों पर काम करना था. इसरो के प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान खुशबू के साथ रहीं उनकी मां फरहत कहती हैं कि ज्यादा पैसों के लिए इसरो के प्रस्ताव को ठुकराने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था. वे कहती हैं, ‘खुशबू देश में विज्ञान के लिए कुछ करना चाहती थी और मैं उसकी इस सोच से बेहद खुश थी.’

खुशबू बताती हैं कि एक साल और दस महीने तक उन्होंने इस मिशन को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की है. ‘इसरो में काम करते हुए भी मैंने रमजान के रोजे रखे, नमाज पढ़ी और परीक्षण केंद्र में ही ईद भी मनाई’ खुशबू कहती हैं. इस बात से शायद ये भी साबित होता है कि इस्लाम की रवायतों का पालन करने के मामले में वो किसी अन्य आम मुस्लिम महिला से जरा भी अलग नहीं. हालांकि वो ये भी स्वीकार करती हैं कि उनकी उदार पारिवारिक पृष्ठभूमि का उनकी सफलता में खासा योगदान है.

सर्दियों में 15 दिन की छुट्टी मनाने अमरोहा लौटीं खुशबू फिलहाल यहां के नए माहौल में अपने को ढाल रही हैं. वे बताती हैं, ‘मैं इस बड़े अभियान का एक छोटा हिस्सा थी और यह अभियान उससे भी बड़े एक सपने का हिस्सा है, एक राष्ट्र द्वारा देखे गए सपने का, इस लिहाज से मुङो जो तारीफ मिल रही है वो कुछ ज्यादा ही है.’ 

हालांकि उन्हें खुद के कुछ खास होने का एहसास तभी हो गया था जब चंद्रयान मिशन के बाद वे पहली बार अपने घर पहुंची थीं. तब घर के बाहर ही एक रिपोर्टर और फोटोग्राफर से उनका सामना हुआ था और इसके बाद ये सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा. इस एयरोनॉटिकल इंजीनियर को शहर के स्कूलों और कॉलेजों में विद्यार्थियों के बीच प्रेरणादायी भाषण देने के लिए ढेरों आमंत्रण मिल रहे हैं.

हमने उनसे पूछा कि आखिर क्या बात है जो उन्हें इस तरह सर आंखों पर बिठाया जा रहा है. इस सवाल के जवाब में खुशबू कहती हैं, ‘ये शायद इसलिए है कि मैं एक मुस्लिम लड़की हूं और एक छोटे शहर से होने के बावजूद भी भारतीय विज्ञान में कुछ योगदान दे सकी.’  मगर तुरंत ही वो ये स्पष्टीकरण भी दे डालती हैं कि धर्म और शिक्षा दो बिल्कुल अलहदा चीजें हैं. वे कहतीं हैं, ‘समय बदल चुका है इसलिए मुस्लिम लड़कियों के प्रति भी नजरिया बदलना चाहिए. हमारे परिवारों को हमें जरूर पढ़ाना चाहिए.’

खुशबू को इस बात पर फख्र है कि अपने दूसरे सहपाठियों के उलट उन्होंने निजी क्षेत्र की आकर्षक नौकरी की बजाय एक मामूली-सी तनख्वाह वाली सरकारी नौकरी को चुना. दरअसल उन्हें लगता था कि देश में विज्ञान के क्षेत्र में योगदान दिए जाने की विशेष आवश्यकता है.

एक ऐसे शहर में जहां की 70 फीसदी आबादी मुस्लिम हो, एक लड़की के रोल मॉडल बनने के क्या मायने हैं? ‘अमरोहा जैसे छोटे शहर में मुस्लिम लड़कियों के लिए कोई रोल मॉडल ही नहीं है जिसकी तरफ वे देख सकें. उनको अक्सर शिक्षा से अलग रखा जाता है जिससे उनकी जिंदगी घरों तक ही सिमट कर रह जाती है.’ स्थानीय विद्याíथयों को संबोधित करने के लिए जाने से पहले वे कहती हैं, ‘मैं जहां भी जाती हूं लड़कियों की शिक्षा के महत्व पर जोर देती हूं, मैं उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने और आवाज बुलंद करने के लिए प्रोत्साहित करती हूं.’

लहू पीने की लत

मंगलौर में महिलाओं और पुरुषों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाता हम सभी ने टीवी पर देखा. एकाध बार अकेले में बैठकर सोचा है कि कैसे आदमी इतना पागल हो गया होगा कि बंटवारे के समय 10 लाख अपने जैसे बल्कि अपनों को ही उसने खुद के पागलपन की भेंट चढ़ा दिया. कैसे बाबू बजरंगी गुजरात में वो कर सका होगा जिसे करने का दंभ वो तहलका  के कैमरों पर कर रहा था. कैसे अंग्रेजों ने आजादी से पहले जलियांवाला बाग जैसी करतूतों को अंजाम दिया होगा.

जवाब सामने था और स्क्रीन पर पिटतीं, गिरतीं, चिल्लाती महिलाओं की  तस्वीरों में बारबार देखा-सुना जा सकता था. उस पर तुर्रा ये कि ये सब कुछ भारतीय संस्कृति की रक्षा और उन भगवान राम के नाम पर किया जा रहा था जिन्हें हमेशा अपनी मर्यादा में रहने वाला पुरुषों का पुरुष माना गया है.

लोकतंत्र में अपनी निजी परेशानियों-शिकायतों तक के निवारण का एक स्थापित संवैधानिक तरीका होता है. और अगर शिकायतें कथित रूप से एक बहुत बड़े समुदाय से जुड़ी हों तब तो इनके निदान के माकूल मंचों की कमी का सवाल ही पैदा नहीं हो सकता. मगर मंचों की बात तो तब उठती है जब समस्या हो, असल हो, और उसे हल करने की मंशा हो. यहां तो इनमें से एक भी चीज नहीं नजर आती.

पता नहीं संस्कृति के स्वघोषित पहरुओं की मानसिक विक्षिप्तता की शिकार उन लड़कियों का इस समय क्या हाल हो रहा होगा मगर जिस तरह की असहिष्णु घटनाएं लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिल रही हैं उससे ये बिल्कुल साफ है कि देश का हाल कतई ठीक नहीं. दरअसल ये केवल संस्कृति को बचाने के नाम पर लोगों की स्वतंत्रता और निजता के साथ खिलवाड़ या कानून को हाथ में लेने भर का मामला नहीं है. अगर मंगलौर की मारामारी, महाराष्ट्र में एमएनएस और शिवसेना की खुलेआम गुंडागर्दी, प. बंगाल में तस्लीमा नसरीन के खिलाफ चले तथाकथित आंदोलन, गुजरात में बाबू बजरंगी जैसे लोगों की करनी और उड़ीसा में जले अनगिनत चचरें की खबरों पर नजर डालें तो साफ समझ आ सकता है कि ये सब या तो सत्तासीन राजनीति द्वारा पोषित किए गए या फिर इसलिए होने दिए गए क्योंकि उनको रोकने से होने वाला राजनीतिक नुकसान उनके होते रहने से होने वाले सामाजिक, आर्थिक और दूसरे कई तरह के नुकसानों से कहीं ज्यादा था.

दरअसल जब राजनीति कुछ बहुत ही छिछली-छिछोरी चीजों पर स्थापित हो जाती है तो उसका सबसे ज्यादा फायदा छिछली-छिछोरी सोच वाले अवसरवादी लोगों को ही मिलता है – मसलन सांप्रदायिक राजनीति का फायदा धर्माधों और धर्म के नाम पर हर तरह का फायदा उठाने में सक्षम दूसरे लोगों और जातिवादी राजनीति का फायदा समाज को बांटने में सिद्धहस्त लोगों को ही तो मिल सकता है.

शायर ने ठीक ही लिखा है –

सियासत को लहू पीने की लत है

वर्ना सब खैरियत है. 

संजय दुबे

गठबंधन के धर्म और संप्रदाय

आम चुनावों में अकेले उतरने का फैसला कांग्रेस ने अपनी ताकत या उसके लंबे-चौड़े आकलन पर नहीं लिया है. उसे मालूम है कि चुनाव के बाद जो भी सरकार बनेगी गठबंधन की होगी. उसका गठबंधन हो या भाजपा का. इसलिए उसके फैसले को गठबंधन-विरोधी कहना गलत है. हालांकि यह सही है कि गठबंधन जितने भाजपा को रास आते हैं कांग्रेस को नहीं आते.

आप कह सकते हैं कि कांग्रेस का स्वभाव गठबंधन का नहीं है. कारण ऐतिहासिक हैं. आजादी के तीस साल बाद तक तो कांग्रेस का वर्चस्व ही चला और देश में एक पार्टी शासन रहा. सन् सतत्तर में ढाई साल के लिए वह टूटा भी तो फिर दस साल चला. वीपी सिंह और चंद्रशेखर की गठबंधन सरकारों ने कोई डेढ़ साल तक कांग्रेस को रोके रखा. लेकिन फिर वह लौट कर आई और भले ही अल्पमत में रहे हों नरसिंह राव पूरे पांच साल रहे. आठ साल बाद कांग्रेस सत्ता में दो हजार चार में आई तो पहली बार गठबंधन में थी. यानी बावन साल बाद उसे गठबंधन की जरूरत पड़ी.

भाजपा गठबंधन धर्म की सच्ची पार्टी होने का दावा कर सकती है. लेकिन देखिए कि गठबंधनों का लाभ लेकर आज वह एक राष्ट्रीय पार्टी हो गई है

इसके उलट भारतीय जनता पार्टी और उसके पहले के अवतार जनसंघ को शुरुआत ही गठबंधन से करनी पड़ी. उसने मिलकर चुनाव लड़े और सन् सड़सठ में पहली बार गठबंधनों में ही राज्यों में सत्ता का स्वाद चखा. सन् सतत्तर में भी जनसंघ जनता पार्टी नाम के गठबंधन में पहली बार केंद्र में सत्ता में आया. कोई बीस साल के वनवास के बाद सन् अट्ठानवे में वह सत्ता में आया तो न सिर्फ भाजपा हो चुका था उसकी भूमिका भी बदल गई थी. अब भाजपा अपने गठबंधन की नेत्री थी. सन् छियानवे में जब राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को सबसे बड़ी पार्टी के नेता के नाते शपथ दिला दी तो तेरह दिन तक भाजपा का साथ देने कोई पार्टी आगे नहीं आई. यानी बावन साल में भाजपा बिना गठबंधन के कभी सत्ता में नहीं रही.

इसलिए गठबंधनों के प्रति अगर देश की दो राष्ट्रीय पार्टियों का रवैया अलग है तो यह स्वाभाविक ही है. लेकिन कांग्रेस मई का चुनाव राष्ट्रीय गठबंधन में नहीं लड़ना चाहती तो इसका कारण गठबंधनों से उसे पड़ने वाली छड़क नहीं है. यूपीए में जो भी पार्टियां उसके साथ हैं वे सब क्षेत्रीय पार्टियां हैं. जैसे कांग्रेस के साथ मिलकर वे केंद्र में सत्ता सुख भोगती हैं वैसे ही चुनाव के समय अपने-अपने क्षेत्रों से बाहर निकल कर फैलना चाहती हैं.

अपने वर्चस्व वाले इलाके में वे कांग्रेस से सीटों पर जो तालमेल करती हैं उसका इस्तेमाल दूसरे राज्यों या इलाकों में अपने लिए सीट पाने में करना चाहती हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस महाराष्ट्र से, समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश से और राष्ट्रीय जनता दल बिहार से बाहर फैलना को उत्सुक हैं. कांग्रेस अगर इनकी महत्वाकांक्षाओं को समोने लगे तो उसे अपना जनाधार लगातार सीमित करते जाना होगा. उसके गठबंधन की पार्टियां उसी की कीमत पर फल फैल सकती हैं. गठबंधन की आज की मजबूरियों से कांग्रेस अपनी महत्वाकांक्षाओं और भविष्य को क्यों सीमित करे? गठबंधन में दरअसल हर पार्टी इसलिए आती है कि सत्ता के जरिए वह अपना वर्चस्व-क्षेत्र बढ़ाना चाहती है.

अपना वर्चस्व-क्षेत्र बढ़ाए बिना न शरद पवार, न मुलायम सिंह, न लालू प्रसाद यादव प्रधानमंत्री होने का ख्वाब देख सकते हैं. इसलिए इनकी पार्टियों का अपने इलाके से बाहर निकलने का इरादा समझ जा सकता है. इस इरादे में अनुचित कुछ नहीं है. गठबंधन आखिर एक लेन-देन और सौदेबाजी है. यह गठबंधन धर्म ही है कि उसकी हर पार्टी उसका उपयोग अपनी शक्ति बढ़ाने में करे लेकिन इस तरह कि गठबंधन टूटे नहीं. भाजपा गठबंधन धर्म की सच्ची पार्टी होने का दावा कर सकती है. लेकिन देखिए कि गठबंधनों का लाभ लेकर आज वह एक राष्ट्रीय पार्टी हो गई है.

इसलिए कांग्रेस का फैसला कि राज्यों में जिससे उसका गठबंधन है उसे वह जारी रखेगी लेकिन चुनाव राष्ट्रीय गठबंधन में नहीं लड़ेगी गठबंधन धर्म के खिलाफ नहीं है. वह अपनी संभावनाओं को बनाए रखना चाहती है. उसका आकलन है कि उसकी स्थिति सन् दो हजार चार की स्थिति से बेहतर है. जरूरी नहीं कि आप इससे सहमत हों. चुनाव के पहले हर पार्टी को अपना गुब्बारा फुलाने और थिगाने का हक है. उसे और फुलाने या हवा निकाल देने का हक जनता को है.

भाजपा पर गठबंधन के उतने दबाव नहीं हैं. दक्षिण में कोई बड़ी क्षेत्रीय पार्टी उसके साथ नहीं है. तमिलनाड की एआईडीएमके और आंध्र की तेलुगुदेशम ने वामपंथियों के साथ जाना तय किया है. कर्नाटक में उसी का राज है. केरल उसकी पहुंच से बाहर है. महाराष्ट्र में शिव सेना ने अभी अपना अलग रास्ता पकड़ा नहीं है. हरियाणा में चौटाला का लोकदल, पंजाब में अकाली दल, बिहार में जनता दल (एकी) ओडीशा में बीजू जनता दल और असम में अगप उसके साथ हैं. इनमें बिहार का जनता दल (एकी) ही सबसे बड़ा है. लेकिन बिहार से बाहर उसकी कोई खास महत्वाकांक्षा भी नहीं है.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भाजपा के गठबंधन एनडीए का रास्ता आसान है. पिछली बार लालकृष्ण आडवाणी ने दावा किया था कि हारी भाजपा नहीं है. आखिर हमारी सीटें कांग्रेस से कुछ ही कम हैं. हारी हैं हमारे गठबंधन की दूसरी पार्टियां. इस बार उनके गठबंधन में ऐसी पार्टियां हैं ही नहीं कि मददगार संख्या दे सकें. इस बार जो भी करना है भाजपा को ही करना है और उसकी संभावनाएं तो सबसे कम दिखाई देती हैं.     

अलग राह पर अभय

बॉलीवुड के इतिहास को जानने का एक तरीका देओल परिवार भी है. धर्मेंद्र अपने दौर के एक्शन हीरो तो थे ही मगर कॉमेडी के मामले में भी उनका कोई जवाब नहीं था. उधर, सन्नी को सिनेमा के पर्दे पर अक्सर भले स्वभाव वाले एक ऐसे हीरो के तौर पर देखा गया जिसे दुनिया की ज्यादतियां गुस्से का ज्वालामुखी बना देती हैं. बॉबी जब आए तो मसाला रोमांस वाली फिल्मों का दौर अपने चरम पर आकर ढलने लगा था. इस तरह की फिल्मों के लिए वे फिट हीरो नहीं थे और जिस तरह की फिल्मों में वे चल सकते थे उनका दौर आने में अभी देर थी. 1998 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म करीब में जब उन्होंने एक चोर का किरदार निभाया तो इसकी उतनी चर्चा नहीं हुई. मगर एक दशक बाद आज जब उनके चचेरे भाई अभय देओल ओए लकी लकी ओए में एक ऐसे ही चोर बने हैं तो हर तरफ उनकी तारीफ हो रही है.

शुरुआत से ही वे ऐसे निर्देशकों की खोज में रहे जो अपने दर्शकों को चौंकाना पसंद करते हैं

एक तरह से देखा जाए तो 32 साल के अभय बॉलीवुड में आए नएपन का प्रतीक हैं. देओल खानदान की शख्सियतों की तरह उनका व्यक्तित्व आकर्षक है और अब तक के उनके सफर पर निगाह डाली जाए तो लगता यही है कि वे अपने परिवार की समृद्ध विरासत को नए आयाम देंगे. अभिनय के मोर्चे पर वे मजबूत हैं और कई नौजवान निर्देशकों की पहली पसंद भी. और सबसे बड़ी बात ये है कि फिल्म इंडस्ट्री में उनका आना शायद बिल्कुल सही वक्त पर हुआ है.

ओए लकी.. के निर्देशक दिबाकर बनर्जी कहते हैं, ‘अभय जैसा सिर्फ एक ही है. होने तो कई चाहिए. शुरुआत से ही वे ऐसे निर्देशकों की खोज में रहे जो अपने दर्शकों को चौंकाना पसंद करते हैं. और अब तो हालत ये है कि जो निर्माता विशुद्ध आर्थिक लाभ के नजरिए से सोचते हैं, उनके लिए भी अभय सबसे भरोसेमंद विकल्प हैं. मुङो लगता है कि अभय ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह अपने बूते बनाई है.’

अभय की हॉलीवुड स्टार जॉनी डेप से तुलना करने वाले फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप कहते हैं, ‘पिछले कुछ साल में छोटी-छोटी और आम से हटकर जो फिल्में आई हैं उन पर नजर डालिए. उनमें एक बात समान होगी और वो है अभय का होना. उन्होंने बाजार के दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया और वही किया जो वो करना चाहते थे.’

अभय एक खुशमिजाज इंसान हैं. अब तक उन्होंने जो भी किरदार निभाए हैं उनमें से उनका व्यक्तित्व सबसे ज्यादा अपनी पहली फिल्म सोचा न था के उस हीरो से मिलता है जो आशावान है और जिसमें कोई घमंड नहीं है. फोन पर उनसे बात करते हुए भी ये महसूस होता है. उनके बात करने के तरीके में किसी नए फिल्मी सितारे वाला गर्व कहीं से भी नहीं झलकता. अभय बताते हैं कि देओल परिवार में बचपन का मतलब था ढेर सारी पाबंदियां. धर्मेंद्र के छोटे भाई अजित सिंह देओल के बेटे अभय इस संयुक्त परिवार के सात बच्चों में सबसे छोटे हैं. उनकी परवरिश बेहद सख्त माहौल में हुई. घूमने का मौका पारिवारिक यात्रा के साथ ही मिलता था और देर रात तक घर से बाहर रहने का तो सवाल ही नहीं होता था. दिलचस्प बात ये है कि धर्मेंद्र को अभय डैड कहते हैं. वो बताते हैं, ‘बाहर वालों को ये अजीब लगता है मगर मैं अपने मम्मी-पापा को अजित अंकल और ऊषा आंटी कहते हुए बड़ा हुआ हूं. मगर मुझे ये कभी भी अजीब नहीं लगा.’

दिलचस्प ये भी है कि सबसे छोटा होने के नाते सबसे ज्यादा प्यार-दुलार में पले जिस शख्स ने कभी जीवन की कड़वी साइयां, उनसे उपजने वाला दुख और भ्रष्टाचार जैसी चीजें देखी भी नहीं होंगी वो आज इन्हीं चीजों से जुड़े भावों को बेहद सजीव तरीके से परदे पर उतार रहा है. उनके करीबी दोस्त और निर्देशक नवदीप सिंह ने जब मनोरमा सिक्स फीट अंडर बनाने की सोच रहे थो तो छोटे कस्बे में जिंदगी से निराश इस फिल्म के हीरो सत्यवीर के लिए उन्हें अभय कुछ ज्यादा ही छोटी उम्र के लगे थे. अभय ने उन्हें मनाने की कोशिश की मगर नाकाम रहे. फिर उन्होंने एक दूसरा तरीका अपनाया. वीडियो कंपनी शेमारू अभय के साथ एक फिल्म बनाना चाहती थी. उधर, नवदीप को अपनी फिल्म के लिए एक निर्माता की तलाश थी. अभय ने दोनों की जरूरत पूरी कर दी और सत्यवीर की भूमिका के लिए मूंछें लगा लीं. इसके बाद उन्होंने किरदार को जिस जीवंत तरीके से निभाया उसने नवदीप के लिए शिकायत का कोई मौका नहीं छोड़ा.

मुझे नाचते हुए बहुत झिझक होती है. मैं अड़ियल और घमंडी नहीं दिखना चाहता इसलिए अगर फिल्म के लिए बहुत जरूरी हुआ तो मैं डांस कर लूंगा

कुछ ही समय पहले अभय को एक आइडिया आया. ये था देवदास बनने का. उन्होंने संजय लीला भंसाली की देवदास  के स्क्रिप्ट राइटर विक्रम मोटवानी को सुझाव दिया कि देवदास की कहानी को आज के वक्त से जोड़कर लॉस एंजेल्स में फिल्माया जाए. मोटवानी को आइडिया तो पसंद आया मगर उन्होंने अभय से कहा कि वो पहले एक बार मूल कहानी को पढ़ लें. मोटवानी कहते हैं, ‘मैंने उनसे कहा कि देवदास ‘कूल’ नहीं बल्कि लड़खड़ाकर चलने वाला एक शराबी था.’ अभय ने बात मान ली और प्यार और नशे की इस दुखांत कहानी में ऊर्जा का समावेश कर दिया. मोटवानी ने फिल्म का पहला ड्राफ्ट लिखा और इसे अनुराग कश्यप को दे दिया. कश्यप ने इसमें कुछ बदलाव किए और इसी पर आधारित फिल्म अब देव-डी के नाम से आ रही है जिसे पंजाब और दिल्ली की पृष्ठभूमि में बनाया गया है.

अभय के साथ काम करने वाले तमाम लोग बताते हैं कि अगर पटकथा सुधरती हो तो वे हमेशा अपने दृश्य कटवाने के लिए तैयार रहते हैं. कश्यप कहते हैं, ‘वह उन अभिनेताओं में से नहीं हैं जो अपनी भूमिका को ज्यादा से ज्यादा रखना चाहते हैं.’ ऐसा लगता है जसे अभय के लिएफिल्म की अहमियत अपने स्टारडम से ज्यादा है. उन्हें जानने वाले बताते हैं कि वो स्क्रिप्ट धीरे-धीरे पढ़ते हैं और उसमें कुछ भी बिना पढ़े नहीं छोड़ते. फिल्मों को लेकर उनकी समझ बहुत विस्तृत है. अभय कहते हैं, ‘हमारी परवरिश सख्त माहौल में हुई मगर हम चाचा को देखने शूट्स पर जाया करते थे. मुङो फिल्म लोहा  के सेट की याद है जहां मैंने मंदाकिनी को देखा था.’

शुरुआत करने के लिए उनके पास बेहद आसान विकल्प हो सकते थे मगर उन्होंने एक अलग ही राह पकड़ी. एक को छोड़कर उनकी सभी फिल्में ऐसी हैं जिनके निर्देशकों ने भी उसी फिल्म से अपनी शुरुआत की

अभय ने जब बचपन को पीछे छोड़ा तो उस समय फिल्में तकरीबन रटे-रटाए ढर्रे पर बन रही थीं. मगर उन्हें यकीन था कि एक दिन बॉलीवुड में ऐसी फिल्में बनेंगी जिनकी बुनियाद मजबूत स्क्रिप्ट होगी. वो कहते हैं, ‘मुझे विश्वास था कि बदलाव आएगा. मुझे बस अपना काम करना है.’ उन्होंने कुछ साल विदेश स्थित एक फिल्म स्कूल में बिताए और फिर कुछ अलग करने की धुन में मुंबई लौटे.

शुरुआत करने के लिए उनके पास बेहद आसान विकल्प हो सकते थे मगर उन्होंने एक अलग ही राह पकड़ी. एक को छोड़कर उनकी सभी फिल्में ऐसी हैं जिनके निर्देशकों ने भी उसी फिल्म से अपनी शुरुआत की. अभय ने खुद अच्छी फिल्मों का पीछा किया, सैकड़ों स्क्रिप्ट्स पढ़ीं  और स्टार की तरह लांच होने की बजाय निर्देशकों को अपनी तरह की फिल्में करने के लिए मनाया.

मोटवानी अभय को बचपन से जानते हैं. वो कहते हैं, ‘ह्रतिक रोशन के लांच ने किसी स्टार के लांच के मायने ही बदलकर रख दिए. अभय ने उस दिशा में जाने के दबाव को खुद पर हावी नहीं होने दिया. जब आपकी उम्र के लोगों को हाई प्रोफाइल फिल्में, ज्यादा प्रचार और ज्यादा पैसा मिल रहा हो तो इस लालच के आगे न झुकना बहुत मुश्किल होता है.’

आखिरकार ‘सोचा न था’ के साथ अभय को अपनी तरह की फिल्म मिल ही गई. उन्होंने फिल्म के निर्देशक इम्तियाज अली, जिनकी ये पहली फिल्म थी, को परिवार के बड़ों से मिलने के लिए मनाया जो इस फिल्म पर पैसा लगाना चाहते थे. उन्हें फिल्म ठीक लगी और इस तरह आयशा टॉकिया के साथ उनकी पहली जोड़ी बनी. अभय कहते हैं, ‘सोचा न था  किसी आम बॉलीवुड फिल्म जैसी लगती है पर है नहीं.’ और ये बात उन पर भी उतनी ही सटीकता से लागू होती है. अभय की शुरुआत अच्छी रही और उनके प्रति इंडस्ट्री का रुख सकारात्मक हो गया. उनकी कुछ फिल्मों को बड़ी कामयाबी भी मिली. अब तक अभय की सबसे बड़ी शिकायत ये रही थी कि छोटे बजट की फिल्मों का प्रचार उतने बढ़िया तरीके से नहीं हो पाता. ओए लकी..और देव डी  के साथ उनकी ये शिकायत भी दूर हो गई है.

अभय मानते हैं कि वो खुद को एक आम हीरो की भूमिका में नहीं देख पाते. वो कहते हैं, ‘मुझे नाचते हुए बहुत झिझक होती है. मैं अड़ियल और घमंडी नहीं दिखना चाहता इसलिए अगर फिल्म के लिए बहुत जरूरी हुआ तो मैं डांस कर लूंगा. मगर ज्यादातर निर्देशकों को ये महसूस हो जाएगा कि मैं ऐसा करते हुए बेहद असहज हो जाता हूं.’

अभय को सर्वशक्तिमान हीरो की बजाय ऐसी भूमिकाएं पसंद हैं जिनमें वो किसी आम आदमी जैसे ही लगते हों. वो कहते हैं, ‘हर दर्शक को सत्यवीर अपने आस-पास का कोई चरित्र लगेगा. वो सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र तो नहीं है मगर उसके कुछ सिद्धांत हैं. वह गुंडों से बदला नहीं ले सकता. वो किसी की धुनाई नहीं कर सकता.’देओल परिवार से आने वाले किसी हीरो के लिए ये कहना कि वह किसी की धुनाई नहीं कर सकता, वाकई नई बात है. और अभय का यही नयापन नए बॉलीवुड के साथ मेल बिठाकर चल निकला है. 

गुंडागर्दी का सांस्कृतिक समारोह

‘हमलों को लेकर हर कोई इतना शोर क्यों मचा रहा है? हमने जो किया वो हिंदू संस्कृति की रक्षा करने के लिए किया. पब जाने वाली ये लड़कियां हमारी परंपरा को नष्ट करने का प्रयास कर रहीं थीं’ – ये शब्द अब तक लगभग गुमनाम से एक हिंदू कट्टरपंथी संगठन श्रीराम सेना के अध्यक्ष प्रमोद मुतालिक ने अपनी गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले ही कहे थे. संदर्भ उस घटना का था जिसमें मुतालिक के संगठन के कार्यकर्ताओं ने 24 जनवरी 2009 को कर्नाटक के मैंगलोर में एक पब और बाद में एक घर पर हमला बोला था और वहां मौजूद लड़कियों के साथ मारपीट की थी. कार्यकर्ताओं का दावा था कि कम कपड़े पहने ये लड़कियां इन जगहों पर आपत्तिजनक अवस्था में थीं. दो दिन बाद ये मुद्दा राष्ट्रीय खबर बन गया. 6 महीने में ये दूसरी बार है जब मैंगलोर और तटीय कर्नाटक हिंदू कट्टरपंथियों की वजह से चर्चा में आया है. यहां सितंबर 2008 में चर्चों पर हमले किए गए थे.

कई स्थानीय पत्रकारों को पहले से ही इस घटना की जानकारी थी. सेना के कार्यकर्ताओं ने घटना से आधा घंटा पहले उन्हें फोन कर कहा था कि अगर वे पब में आएंगे तो उन्हें घटना की एक्सक्लूसिव तस्वीरें मिलेंगी

उधर, हर तरफ से बढ़ते दबाव के बावजूद साफ लगता है कि कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कार्रवाई के नाम पर बस खानापूरी कर दी है. हमला करने वाले करीब 40 लोगों में से कइयों को अब  तक  गिरफ्तार नहीं किया गया है. स्थानीय मीडिया ने इस घटना की व्यापक कवरेज की मगर पुलिस और प्रशासन का रवैया अब तक ढुलमुल ही रहा है. हालांकि मुतालिक पर पहले से ही कई मामले दर्ज हैं मगर अब तक प्रशासन कभी उसके फरार होने और कभी उस तक न पहुंच सकने की बात कह कर उसकी गिरफ्तारी को टालता रहा था. मगर इस बार आखिरकार उसे गिरफ्तार कर ही लिया गया.

वैसे कई स्थानीय पत्रकारों को पहले से ही इस घटना की जानकारी थी. सेना के कार्यकर्ताओं ने घटना से आधा घंटा पहले उन्हें फोन कर कहा था कि अगर वे पब में आएंगे तो उन्हें घटना की एक्सक्लूसिव तस्वीरें मिलेंगी. एक स्थानीय फोटोग्राफर राकेश भट्ट कहते हैं, ‘यहां अक्सर इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं. हमने सोचा कि ये भी इसी तरह का कोई मामला होगा. मगर किसे पता था कि ये इतनी बड़ी खबर बन जाएगा.’

भट्ट गलत नहीं कह रहे. 24 जनवरी की घटना से कुछ दिन पहले ही शहर के एक सुपरस्टोर में भी ऐसी एक घटना हुई थी. इससे पहले 26 दिसंबर 2008 को मैंगलोर के एक कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले बच्चों को लेकर जा रही बस पर हमला हुआ और कुछ बच्चों की सिर्फ इसलिए पिटाई की गई कि वे बस में सवार दूसरे धर्म के बच्चों के साथ यात्रा कर रहे थे. 20 दिसंबर 2008 को श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं ने शहर में हो रहे एक फैशन शो में ये कहते हुए उत्पात मचाया था कि युवा पीढ़ी को गुमराह किया रहा है.

श्रीराम सेना का गठन 2007 में हुआ था. मुख्य रूप से कर्नाटक के तटीय जिलों और मुतालिक के गृहनगर बगलकोट में सक्रिय इस संगठन का मानना है कि हिंदुत्व का प्रचार हिंसा का सहारा लिए बिना हो ही नहीं सकता. ये संगठन तो संघ परिवार का हिस्सा नहीं है पर इसके अध्यक्ष प्रमोद मुतालिक का संघ से पुराना नाता है. मुतालिक ने 2004 में बजरंग दल के दक्षिण भारत संयोजक का पद छोड़ दिया था. इसकी वजह थी गौवध के मुद्दे पर दिए गए उसके भड़काऊ भाषण जिनके कारण संगठन को सार्वजनिक तौर पर उससे संबंध स्वीकारने में संकोच होने लगा था. बजरंग दल से नाता तोड़ने के बाद मुतालिक शिवसेना में आ गया और उसने 2005 में शिवसेना की कर्नाटक इकाई की स्थापना की. मगर कुछ ही महीने बाद उसने बेलगाम जिले को महाराष्ट्र में मिलाने के मुद्दे पर शिवसेना भी छोड़ दी. श्रीराम सेना को एक तरह से उसका मुख्यधारा में लौटने का प्रयास कहा जा सकता है. मुतालिक ने 2008 में राष्ट्रीय हिंदुस्तान के नाम से एक राजनीतिक पार्टी भी लांच की थी. इसने राज्य में पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में आठ उम्मीदवार खड़े भी किए थे जिनमें बगलकोट से लड़ रहा मुतालिक भी था पर सभी बुरी तरह हार गए.

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव के दौरान हुबली में हुए बम धमाकों के सिलसिले में पिछले महीने जिन नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें से कइयों के मुतालिक और श्रीराम सेना से सीधे संबंध पाए गए. राज्य के आईजी के मुताबिक 24 साल का नागराज जंबागी हुबली कोर्ट परिसर में धमाके और धारवाड़-बेलगाम रेलवे लाइन पर बम रखने के लिए जिम्मेदार गैंग का अहम सदस्य है. जंबागी को कई सार्वजनिक आयोजनों में मुतालिक  के साथ देखा गया है. बगलकोट के कई लोग भी ये बताते हैं कि जंबागी, मुतालिक का दायां हाथ था. मुतालिक ने खुद भी जंबागी को कानूनी मदद देने की बात मानी है. हालांकि उसका दावा है कि जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उन्होंने धमाके करने से पहले ही श्रीराम सेना छोड़ दी थी. मगर इस दावे की असलियत इसी बात से जाहिर हो जाती है कि ये संगठन अपने सदस्यों का कोई लिखित रिकॉर्ड रखता ही नहीं है.

उधर, सूत्रों के मुताबिक महाराष्ट्र पुलिस भी शुरुआत में अनदेखी करने के बाद अब मालेगांव धमाकों से मुतालिक के संबंध की खोजबीन करने लगी है क्योंकि पुरोहित से पूछताछ के दौरान पुलिस ने उसे मुतालिक से काफी प्रभावित पाया था. मुतालिक को अपने भाषणों में साध्वी प्रज्ञा की प्रशंसा  के साथ और धमाके करने की बात कहते भी पाया गया है.

बंगलुरू धमाकों के बाद सितंबर 2008 में मुतालिक ने मैंगलोर में ऐलान किया कि श्रीराम सेना के 700 सदस्यों को आत्मघाती हमले करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. उसने ये भी दावा किया कि वो आतंकवाद के खिलाफ एक सेना बनाएगा जिसमें एक साल के भीतर ही 5000 लोगों को भरती कर लिया जाएगा. मुतालिक ने हिंदू युवकों से आत्मघाती दस्ते में शामिल होने की भी अपील की थी.

कर्नाटक में भाजपा ने पहली बार सरकार बनाई है और इसके कुछ ही समय बाद उसकी जो किरकरी होनी शुरू हुई तो वो अब तक रुकने का नाम नहीं ले रही. सितंबर 2008 में चचरें पर हमलों को लेकर केंद्र ने राज्य सरकार को तगड़ी फटकार लगाई थी. अब मुतालिक ने नई मुसीबत पैदा कर दी है. पार्टी फिलहाल खुद को मुतालिक से अलग करने की कोशिशों में जुटी है. राज्य के गृहमंत्री वी एस आचार्य उन्हें बेलगाम तोप कह रहे हैं तो पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कहना है कि राजनीतिक विरोधियों को आरएसएस-बीजेपी फोबिया हो गया है.

उधर, मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ये तो कहते हैं कि किसी को भी कानून हाथ में नहीं लेने दिया जाएगा पर लगे हाथ पब संस्कृति के खिलाफ अपना विरोध भी जाहिर करना नहीं भूलते. यही रवैया सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है.

दक्षिणपंथी आतंक का आरोप पत्र

20 जनवरी को मुंबई पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने मालेगांव बम धमाकों से संबंधित 4000 पन्नों का आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया. पिछले साल सितंबर में हुए इन धमाकों में छह लोग मारे गए थे जिनमें छह साल की एक बच्ची भी शामिल थी. आरोपपत्र लेफ्टि. कर्नल श्रीकांत पुरोहित को मुख्य षड्यंत्रकारी बताता है जिसने विस्फोटकों की व्यवस्था की थी. आरोप ये भी है कि उसका लक्ष्य हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना था और वो इजराइल में एक निर्वासित सरकार स्थापित करने की योजना भी बना रहा था. आरोपपत्र में धमाके में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकल की मालकिन साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मुख्य आरोपी बनाया गया है. स्वघोषित धर्मगुरू दयानंद पांडे को कुछ अन्य लोगों के साथ सह-षड्यंत्रकारी बताया गया है. इन अन्य लोगों में 2006 में नांदेड़ में हुए बम धमाकों का आरोपी और हथियार व्यापारी राकेश धवाडे और अभिनव भारत नामक संगठन का कोषाध्यक्ष अजय रहिरकर भी शामिल हैं. ज्यादातर आरोपी इसी संगठन से संबद्ध हैं. इसके अलावा मामले के अन्य आरोपी हैं शिवनारायण कलसांगरा, श्यामलाल साहू, जगदीश म्हात्रे, समीर कुलकर्णी, सुधाकर चतुर्वेदी और रमेश उपाध्याय.

सभी ग्यारह आरोपियों पर मालेगांव में हुए धमाकों के लिए उकसाने उनमें सहयोग करने और उनकी साजिश रचने का आरोप लगाया गया है. जांच अभी भी जारी है क्योंकि संदीप डांगे, रामजी कलसंगरा और प्रवीण पाटिल उर्फ मुतालिक अभी भी फरार हैं. इसके अलावा पुलिस को गुजरात के डांग्स में रहने वाले स्वामी असीमानंद की भी सरगर्मी से तलाश है जो फिलहाल फरार है. इन लोगों के पकड़े जाने की हालत में कई और मामलों, मसलन अजमेर और मक्का मस्जिद के धमाकों, के रहस्य से भी पर्दा उठ सकता है. असीमानंद जिसके बारे में माना जाता है कि उसपर गुजरात के कई ताकतवर लोगों का वरदहस्त है, अभी भी पुलिस की गिरफ्त से दूर है.

आरोप पत्र में दयानंद पांडे के लैपटॉप से मिले ऑडियो और वीडियों रिकॉर्डस, फोन टैपिंग के ट्रांसक्रिप्ट्स, आरोपियों के बीच भेजे गए संदेश, धमाके में आरडीएक्स के इस्तेमाल से जुड़ीं फॉरेंसिक रिपोर्ट्स, आरोपियों की नार्को एनालिसिस रिपोर्ट्स, कुछ आरोपियों की स्वीकारोक्तियां और तकरीबन 300 गवाहों के बयान शामिल हैं. एटीएस अधिकारियों को पूरा विश्वास है कि ये सबूत आरोपियों को सजा दिलाने के लिए पर्याप्त हैं.

जांच के दौरान अभिनव भारत को धन देने वालों में प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता का नाम सामने आ चुका है. माना जाता है कि अभिनव भारत की अध्यक्ष हिमानी सावरकर भी आरोपियों के साथ एक बैठक में शामिल हुईं थीं

महाराष्ट्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और वर्तमान में एटीएस का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे केपीएस रघुवंशी कहते हैं, ‘ये तो इजराइली सरकार से हिंदू राष्ट्र के लिए समर्थन मांगने के लिए भी तैयार थे. ये अपनी विचारधारा से सहमति रखने वालों को अपने साथ जोड़ना चाहते थे.’ दयानंद पांडे के लैपटॉप से मुसलमानों के अत्याचार से जुड़े वीडियो मिले हैं जिनमें तालिबान और इंडियन मुजाहिदीन के दृश्य भी शामिल हैं. इनका उपयोग अभिनव भारत से जुड़े सदस्यों को उकसाने के लिए किया जाता था. कुछ दूसरी वीडियो क्लिप्स में पुरोहित को भारत से मुसलमानों के सफाए की बात करते और अभिनव भारत की बैठकों में धमाके की साजिश रचते हुए दिखाया गया है.

बचाव पक्ष के वकील नवीन चोमल इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहते हैं कि साध्वी प्रज्ञा को सिर्फ इस आधार पर मुख्य आरोपी नहीं बनाया जा सकता कि धमाके के लिए जिस मोटरसाइकिल का इस्तेमाल हुआ वो उनकी थी. हालांकि बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट में साध्वी का धमाकों से संबंध और भी ज्यादा स्पष्ट रूप से सामने आता है. प्रज्ञा शिकायती लहजे में बम रखने के आरोपी रामजी कलसंगरा से कहती हैं – ‘जब तुमने मेरी मोटरसाइकल का इस्तेमाल किया था तब इतने कम लोग क्यों मरे? तुमने इसे भीड़ में क्यों नहीं रखा?’

आरोप पत्र में कहा गया है कि पुरोहित ने अभिनव भारत के लिए 21 लाख रुपए बतौर चंदा इकट्ठा किए थे जिसका उपयोग दुष्प्रचार फैलाने के लिए किया जाना था. इसका वितरण कोषाध्यक्ष अजय रहिरकर ने किया था. आरोपियों ने भोपाल, जबलपुर, कोलकाता, इंदौर और नासिक में 2008 की जनवरी से ही बैठकें करनी शुरू कर दी थीं. 11 अप्रैल 2008 को भोपाल में हुई एक बैठक में मालेगांव को निशाना बनाने के लिए चुना गया. इसके लिए विस्फोटकों का जुगाड़ करने की जिम्मेदारी पुरोहित ने अपने कंधों पर ली. कश्मीर में सेना की खुफिया शाखा में तैनाती से वापस लौटते वक्त वो अपने साथ आरडीएक्स लेकर आया. कलसंगरा, डांगे और मुतालिक ने मिलकर चतुर्वेदी के देवलाली स्थित आवास पर इससे बम तैयार किए. जम्मू का एक हथियार विक्रेता, मिस्त्री, पुरोहित को हथियार बेचता था. 

आरोप पत्र आरोपियों को किसी और धमाके से नहीं जोड़ता और एक तरह से इसमें दूसरे दक्षिणपंथी संगठनों को क्लीन चिट दे दी गई है. मगर जांच के दौरान जांचकर्ता अक्सर कहते रहे हैं कि आरोपियों ने भगवा संगठनों के ऐसे कई बड़े नेताओं का नाम लिया है जो उनकी सहायता किया करते थे. इसके अलावा एटीएस के अधिकारी दबे-छिपे इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि पकड़े गए 11 आरोपियों के संबंध देश में हुए कई दूसरे धमाकों से होने के भी सबूत मिले हैं. इनमें अजमेर और मक्का मस्जिद में हुए धमाके शामिल हैं. पाकिस्तान द्वारा समझोता एक्सप्रेस में हुए धमाकों के आरोप में पुरोहित के प्रत्यर्पण की मांग पर रघुवंशी का कहना था – ‘सिर्फ एक गवाह ने बताया था कि समझोता एक्सप्रेस में हुए धमाकों में इस्तेमाल आरडीएक्स की आपूर्ति करने का दावा पुरोहित ने किया था. हमारी जांच में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है.’ 4 अक्टूबर 2008 को साध्वी और पुरोहित के बीच हुई बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट इशारा करती है कि हो सकता है कि मालेगांव में बम रखने वाले रामजी कलसंगरा की हत्या हो गई हो.

ट्रांसक्रिप्ट

प्रज्ञा ठाकुर: मैंने कुलकर्णी से रामजी कलसंगरा को अपने आश्रम लेकर आने के लिए कहा है. मेरे लोग उसे दयानंद पांडे के पास ले जाएंगे और वहीं हम उससे निपट लेंगे

पुरोहित: मैं कलसंगरा से मिल कर पूछना चाहता हूं कि मालेगांव में क्या चूक हो गई.

प्रज्ञा: अगर आप उससे मिलना चाहते हैं तो जबलपुर आ जाइए.

पुरोहित: क्या रामजी को इस तरह से ठिकाने लगाना ठीक होगा?

प्रज्ञा: बिल्कुल, हम कोई खतरा नहीं उठा सकते.

सूत्र इस मामले में फरार चल रहे आरोपी प्रवीण मुतालिक का संबंध कर्नाटक में हाल ही में गिरफ्तार श्री राम सेना के अध्यक्ष प्रमोद मुतालिक से भी जोड़ते हैं. प्रवीण मुतालिक पर 10 मई 2008 को – सिमी नेता सफदर नागौरी को पेश किए जाने से दो दिन पहले – हुबली में हुए धमाकों में शामिल होने का आरोप है. इस मामले में सबसे अहम सुराग है वो सिमकार्ड जिसका उपयोग मालेगांव में धमाका करने के लिए किया गया. अजमेर और मक्का में भी कुछ इसी तरह से धमाके किए गए थे.

जांच के दौरान अभिनव भारत को धन देने वालों में प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता का नाम सामने आ चुका है. माना जाता है कि अभिनव भारत की अध्यक्ष हिमानी सावरकर भी आरोपियों के साथ एक बैठक में शामिल हुईं थीं. इन्हें सबूतों के अभाव में आरोपी नहीं बनाया जा सका. एटीएस का ये भी कहना है कि अन्य धमाकों में इन आरोपियों की भूमिका की जांच करने का काम संबंधित राज्यों की एजेंसियों का है. इसके साथ ही एटीएस ने उन सैन्य अधिकारियों और भगवा संगठनों के कुछ नेताओं को भी क्लीनचिट दे दी है जिनसे उसने जांच प्रक्रिया के दौरान पूछताछ की थी. पूरी जांच के दौरान 400 गवाहों को तलब किया गया था.

आरोप पत्र चार महीने की पड़ताल के बाद दाखिल किया गया है. इस दौरान एटीएस के पूर्व मुखिया हेमंत करकरे – जिन्होंने इस भयावह दक्षिणपंथी आतंक का चेहरा बेनकाब किया था – की शहादत और मुंबई पर हुए हमलों के चलते कई दिनों तक जांच संभव ही नहीं हो सकी 

भोज और गंगू के बीच रंगकर्म

रंगकर्म भी मूलत: साधन-संपन्नता का प्रदर्शन नहीं, कल्पनाशीलता और रचनात्मकता के कुशल प्रयोग का कलाकर्म है. लेकिन आदि काल से आज तक साधन-संपन्न राज्याश्रित (शास्त्रीय) रंगमंच और सीमित-साधनों वाले जनसाधारण के रंगमंच में हमेशा जमीन-आसमान का फर्क रहा है. मुहावरे में कहें तो ‘कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली?’

भरत मुनि ने नाट्य को सभी विधाओं, कलाओं और विद्याओं का संगम माना था. एक लंबी गोलाकार यात्रा के बाद आज हम फिर से उसी आरंभ-बिंदु पर पहुंच गए हैं

आंतरिक सर्जनात्मकता और प्रतिभा का स्थान जब साधन-संपन्नता लेती है तो कला का ह्रास होने लगता है. उदाहरण के लिए जब राज्याश्रित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना हुई तो स्थान और साधन सीमित थे लेकिन सरोकार, लक्ष्य, हौसले असीमित. इस से ही ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘अंधायुग’ और ‘तुग़लक’ जसी अविस्मरणीय-कीर्तिमान प्रस्तुतियां संभव हुईं. रंगमंडल बना. प्रदर्शन-मूल्यों के नए प्रतिमान स्थापित हुए. फ़िरोजशाह कोटला, तालकटोरा और पुराना किला के खंडहरों में बड़े आयामों वाले नाटकों के प्रदर्शन किए गए. प्रदर्शन भव्य थे लेकिन उनमें संसाधनों की, धन की कैसी भी प्रदर्शनीयता नहीं थी. धीरे-धीरे संस्थान का विकास होता गया और उसके आर्थिक-संसाधन भी बढ़ते गए. आज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के एक पूर्व निदेशक का दावा है कि रंगकर्म में कोई व्यावहारिक समस्या या चुनौती नहीं है और प्रशिक्षित कलाकारों के लिए जीविका चलाने के पर्याप्त अवसर हैं. आर्थिक संसाधन तो इतने ज्यादा उपलब्ध हैं कि ‘हम उन्हें इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं.’ जाहिर है कि ‘हम’ का अर्थ यहां देश के हजारों सामान्य रंगकर्मी नहीं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक और उनके करीबी मुट्ठी भर विशिष्ट कलाकार हैं. यह संस्थान छात्र-प्रस्तुतियों, अपने रंगमंडल के प्रदर्शनों, किताबों-पुस्तिकाओं, नाट्य-समारोहों आदि के कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपए प्रति वर्ष खर्च करता है. पर कैसी विडंबना है कि संस्थान में रचनात्मक काम और अधिकांश प्रदर्शनों में कल्पनाशीलता के स्थान पर धन का निरर्थक दिखावा बढ़ता जा रहा है. इनकी बेटी के ब्याह की तामझाम और फूहडपने से आतंकित होकर कोई आम बाप तो बेटी के ब्याह की कल्पना तक नहीं कर सकता. इन्हें राजा जनक और राजा भोज के बीच संतुलन तलाशना चाहिए. तभी रंगकर्म की मुख्यधारा को प्रेरित और प्रोत्साहित किया जा सकेगा.

ये सच है कि सरकारी आर्थिक सहायता और धन के बिना अर्थपूर्ण और गंभीर रंगकर्म नहीं हो सकता मगर नए मौलिक प्रयोगों के बिना भी किसी माध्यम का विकास नहीं होता. प्रयोग हमेशा सफल ही हों, ये जरूरी नहीं है. इसके बावजूद रचनाकार नए प्रयोग करते हैं. समकालीन रंगकर्म में भी कई नाट्य-निर्देशक अपने माध्यम में अनेक मौलिक रंग-प्रयोग कर रहे हैं. भरत मुनि ने नाट्य को सभी विधाओं, कलाओं और विद्याओं का संगम माना था. एक लंबी गोलाकार यात्रा के बाद आज हम फिर से उसी आरंभ-बिंदु पर पहुंच गए हैं. इधर तकनीकी क्रांति और संचार-माध्यमों ने जीवन और जगत का स्वरूप बिल्कुल बदल दिया है. नए रंग-प्रयोगों में तकनीकी उपकरणों का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है. शब्द और अभिनेता की भूमिका लगातार घटती जा रही है. इस दृष्टि से अनुराधा कपूर, अमाल अल्लाना, नीलम मानसिंह चौधरी, माया राव, कीर्ति जन इत्यादि का काम विशेष रूप से ध्यानाकर्षक है. संयोग से ये सभी महिला-निर्देशक हैं. इनके रचना-कर्म पर काव्य की अपेक्षा दृश्य/बिंब हावी है. पिछले दिनों दिल्ली में प्रदर्शित रुद्रदीप चक्रवर्ती के ‘कर्ण: द वारियर ऑफ द सन’ में जिस व्यापक स्तर पर स्क्रीन, वीडियो, कंप्यूटर, सीजीआई प्रभावों और आधुनिक ध्वनि-प्रकाश यंत्रों का प्रयोग किया गया – वह समकालीन भारतीय रंगकर्म में पैसे और तकनीक के अतिशय इस्तेमाल का एक बड़ा उदाहरण है.

अगर देश में अंग्रेजी के रंगमंच की बात की जाए तो इसे अधिकांशत: औद्योगिक घरानों या विदेशी अनुदान द्वारा प्रायोजित किया जाता है. समृद्ध समाज का खाया-अघाया एक खास वर्ग इन नाटकों को सिर्फ इसलिए देखता है कि प्रदर्शन बेडरुम फार्स है या कामेडी, इसका आलेख विदेशी है और भाषा अंग्रेजी. इसकी टिकिट भी काफी महंगी होती है. कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने एक छोटा-सा रास्ता कुछेक हिंदी नाट्य-दलों के लिए भी खोला है. ये सुविधा-संपन्न रंगकर्म राजा भोज का रंगमंच है. शायद इसीलिए इस संपन्न रंगकर्म का एक रूप ‘भोज रंगमंच’(सपर थियेटर) भी है जिसमें मुख्यत: अंग्रेजी और थोड़ा-बहुत हिंदी रंगकर्म को पांच सितारा होटलों में खाने-पीने के साथ परोसा जाने लगा है. वातानुकूलित शानदार होटल के बार या हॉल में सिग्रेट के धुएं, शराब के जाम और फूहड़ हंसी-मजाक के बीच का थियेटर बड़े पैसे के बावजूद इसे एक बाजारू चीज बना देता है.

विदेशों में प्रदर्शित किए जाने के लिए ही खास तौर से तैयार किए नाट्य-प्रदर्शनों का भी एक अच्छा-खासा बाजार है. इससे पैसा भी मिलता है और प्रसिद्धि भी. फिल्म और टीवी के लोकप्रिय कलाकारों के रंगकर्म का भी एक अलग वर्ग है. उनकी लोकप्रिय छवि को ये नाट्य-प्रदर्शन खूब भुनाते हैं. इनके हाउस हमेशा फुल रहते हैं. परंतु एक नसीरूद्दीन शाह और कभी-कभी फिरोज खान को छोड़ कर शायद ही इन ग्लैमरस-प्रदर्शनों में कोई गंभीरता, ईमानदारी या प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती है.

सातवें-आठवें दशक में मोहन राकेश और बादल सरकार ने एक अभिनेता के सम्मुख कई चरित्र निभाने की चुनौती प्रस्तुत की. बांग्ला एकपात्री नाटक ‘अपराजिता’ जैसे एकल भी कलाकार की अभिनय-प्रतिभा के लिए बड़ी कसौटी हैं. लेकिन अनेक समकालीन निर्देशक एक ही चरित्र के विविध रूपों और पक्षों को मंच पर मूर्त करने के लिए अनेक अभिनेताओं का प्रयोग करके कलाकार की अभिनय-चुनौती को खत्म करते जा रहे हैं.

परंतु राजा भोज के इस भव्य रंगमंच के बरक्स आर्थिक दृष्टि से विपन्न लेकिन अपनी रंग-निष्ठा, लगन, जिद और ईमानदार अभिव्यक्ति के लिए कटिबद्ध गंगू तेली का शौकिया रंगकर्म भी मौजूद है जो पूर्वाभ्यास स्थलों, सस्ते प्रेक्षागृहों, दर्शकों, अच्छे मौलिक नाटकों, श्रेष्ठ कलाकारों और आर्थिक संसाधनों के अभाव जैसी समस्याओं और इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों की नई चुनौतियों से लड़ने के बाद भी बढ़ रहा है. इस रंगमंच का विस्तार और वैविध्य आश्चर्यजनक है, किंतु इसका चरित्र और स्तर भी हैरतंगेज ढ़ंग से ऊंचा-नीचा है. कहीं अपनी गंभीर कल्पनाशीलता और जीवंतता के कारण यह प्रोफेशनल रंगकर्म से टक्कर लेता है तो कहीं बिल्कुल अपरिपक्व और बचकाना भी नजर आता है.

आज शौकिया रंगकर्म के कई रूप मौजूद हैं. अच्छे मौलिक रंग-नाटक लिखे तो जा रहे हैं लेकिन निर्देशक उन्हें करने के बजाए पूर्व-प्रकाशित-मंचित सफल भारतीय या विदेशी नाटकों के अनुवादों पर ही ज्यादा भरोसा करते हैं. स्वयं निर्देशक भी नाटक लिखने लगे हैं. कहानी-उपन्यासों के नाट्य-रूपांतर या उन्हें ज्यों-का-त्यों भी प्रस्तुत किया जाता है. कविताओं पत्रों, व्यंग्य-लेखों और जीवनियों को भी को भी मंच पर प्रस्तुत किया जाता है. लोक-नाटकों और शैलियों को लेकर भी नए रंग-प्रयोग हो रहे हैं और नाट्यधर्मी शास्त्रीय संस्कृत नाटकों को लेकर भी. एकल नाट्य की लोकप्रियता भी बढ़ रही है.

शंभु मित्रा, शीला भाटिया, ब.व. कारंत जसे वरिष्ठ निर्देशक रहे नहीं. हबीब तनवीर, कावालम नारायण पणिक्कर, बादल सरकार, सत्यदेव दुबे और श्यामानंद जालान, रजिन्दर नाथ वाली पीढ़ी अपना योगदान देकर थक चुकी है. इब्राहिम अल्काजी कब का रंगमंच से संन्यास ले चुके हैं और उनके प्रतिभावान शिष्यों में भी अब शिथिलता दिखाई देने लगी है. रतन थियम अपनी पीढ़ी के शायद अकेले ऐसे रंगकर्मी हैं, जिन्होंने निजी रंग-शैली बनाई है और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समकालीन भारतीय रंगमंच का प्रतिनिधित्व करते हैं. नई पीढ़ी सक्रिय है – संभावनामय भी है. लेकिन आज के घोर भौतिकतावादी समय में कब तक घर फूंक कर तमाशा करने की जुर्रत कर पाएगी. फिर इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों का अदम्य आकर्षण भी है.

मुश्किल तो इस सवाल का जवाब देना भी है कि भविष्य में रंगकर्म बचा भी रहेगा या नहीं? यदि बचा भी रहा तो उसका रूप-रंग क्या होगा? पहले प्रश्न का उत्तर तो इतिहास देता है. आरंभ से लेकर आज तक, विपरीत परिस्थितियों और संकटों के बावजूद, रंगकर्म हमेशा जीवित रहा है. उसने समय और समाज के बदलाव के साथ-साथ अपने स्वरूप और सरोकारों को भी बदला है.

साहित्य में जैसे नई कविता को नए उपमानों की जरूरत पड़ी थी, उसी तरह अब रंगमंच को नए मंच-उपकरणों की जरूरत महसूस हो रही है. नए अनुभवों के संप्रेषण के लिए नए अभिव्यक्ति-रूप आ रहे हैं – आएंगे ही. अपने जीवन में जब हम पश्चिम की नकल और तकनीकी उपकरणों के उपयोग रोक नहीं पा रहे हैं तो रंगमंच को इससे कैसे अलग हो? मगर अभी तक हमारे यहां कथ्य और तकनीक से लदी-फदी प्रस्तुति शैली में रचनात्मक साम्य नहीं बन पाया है. यदि ऐसा हो पाया तभी यह सिर्फ चौंकाने के बजाए दर्शक को सहज ग्राह्य हो सकेगा.

रंगमंच मूलत: शब्द, अभिनेता और दर्शक की धुरी पर टिका है. इनमें से किसी भी तत्व को छोड़ देने पर वह चमत्कृत करने वाला कोई मनोरंजक प्रदर्शन भर रह जाएगा – रंगमंच नहीं रहेगा. भविष्य के रंगमंच का स्वरूप कैसा भी हो लेकिन इतना तो लगभग निश्चित है कि रंगकर्म में राजा भोज और गंगू तेली के रंगमंच की दो प्रमुख धाराएं बनी रहेंगी. 

जयदेव तनेजा    

अधबीच का उजास

संगीत जो अपनी सच्चाई खुद बना और नष्ट कर रहा है. बाहर की सच्चाई की लगभग पूरी तरह से उपेक्षा करता हुआ, उससे उदासीन. संगीत के अपने उजास में झिलमिलाते-जगमगाते चेहरे. जो दुनिया गिनती करती, हिसाब लगाती है उसे हाशिए पर करता अपनी परंपरा को पुनर्नवा करता, एकत्र करता, सबको संग-साथ में गूंथता संगीत. आवाज जो पास लाती है – आवाज जो पुकारती है, दुलार से, मनुहार से, इसरार से. आवाज जो अपना स्थापत्य रचती है और घेरते-रचते उसे ओझल भी करती जाती है. आवाज जो दिलासा देती है, जो भरोसा दिलाती है कि हम, कुछ देर के लिए, पल-पल नजदीक आती अपनी नश्वरता से छुटकारा पा सकते हैं. आवाज जो सिर्फ आदमी की है और दूसरों को संबोधित होते हुए भी अपने आप में भरी-पूरी है.

आतंक, हिंसा, हत्या और धमाके से भरे वर्ष से क्या इस तरह छुटकारा पाया जा सकता है? शायद नहीं, बहुत देर के लिए तो नहीं ही. लेकिन क्या यह भूला जा सकता है कि दुनिया में हो रहे निरंतर विनाश के विरुद्ध सृजन ही एकमात्र संभव प्रतिरोध, बचाव है? हम बच नहीं सकते लेकिन कुछ न कुछ बचा सकते हैं. हमारे कठिन और हिंसक समय में जो बचा नहीं सकता वह आदमी नहीं कहा सकता. इस समझ को धूमिल नहीं पड़ना चाहिए कि कलाएं सच्चाई से भगोड़ों की पनाहगाह नहीं बल्कि दूसरी सच्चाई की जगह हैं. वह सच्चाई भी हमारी रोजमर्रा की सच्चाई की ही तरह मटमैली है, उसमें भी और आशंकाओं का संसार है. हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि कोई भी समय बहुत-सी सच्चाइयों में फंसा-बसा समय होता है. मनुष्य का सच न कभी एक है, न उसकी सच्चाई इकहरी है.

एक सुखद विडंबना यह है कि मीडिया द्वारा मनोरंजन, फैशन, अपराध और राजनीति के अत्याकर्षण और दबाव में शास्त्रीय कलाओं की लगातार उपेक्षा के बावजूद, उनमें सर्जनात्मक, गतिशीलता और कल्पनाशील साहस की कोई कटौती नहीं हुई है. विशेषत: शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में लगातार युवा प्रतिभाएं उभर और अपना स्थान बना रही हैं. उनमें से कई अपने-अपने घरानों या शैलियों की विशिष्टता को कायम रखने की कोशिश करके शास्त्रीय संगीत की बहुलता को नया जीवन दे रही हैं. कुछ ऐसी हैं जो निर्भीक प्रयोग करने से घबराती नहीं हैं. नायक-छवियों से आक्रांत समय में ऐसी कोशिशों को समय रहते रसिकता और पोषण का समर्थन नहीं मिल पाएगा, यह आशंका जागती है.कलाकर्म आर्थिक रूप से अब एक अच्छा व्यवसाय बन गया है. बल्कि एक समय साथ रहनेवाले ‘दरिद्रता में सहचरकला और साहित्य, इस वजह से, काफी दूर हो गए हैं

शास्त्रीय नृत्य में एकल प्रदर्शन थोड़ा उतार पर है जो कि दुर्भाग्य की बात है. इस वर्ष न्यूयॉर्क, बैंकाक से लेकर दिल्ली आदि में समूह-नृत्य प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति, जिसे पर्याप्त वित्तीय और संस्थागत समर्थन मिला हुआ है, नृत्य की शास्त्रीयता और सर्जनात्मकता या कि समकालीनता में कोई इजाफा कर पायी है इसमें संदेह है. आशा, फिर भी, इस तथ्य से बंधती है कि सामूहिकता के प्रबल आकर्षण और प्रलोभन के बावजूद कई शैलियों में ऐसे युवा नृत्यकार हैं जो निजता और अद्वितीयता की साधना कर पा रहे हैं. ऐसे भी कुछ हैं, भले अपवाद ही, जो अपनी शास्त्रीय शैली को ही विस्तार देते हुए उसमें समकालीन अभिप्रायों को समाहित कर पा रहे हैं. यह प्रमाण है कि शास्त्रीयता में समकालीनता की पूरी संभावना है और दोनों के बीच सर्जनात्मक द्वंद्व से शास्त्रीयता का विस्तार होता है और समकालीनता भी शास्त्रीयता के अहाते में आ जाती है.

शास्त्रीय संगीत के वर्तमान और भविष्य को लेकर कुछ शीर्षस्थ कलाकार चिंतित हुए हैं और उन्होंने एक अनौपचारिक संगठन बनाया है जिसमें हिंदुस्तानी और कर्नाटक शैलियों के कई मूर्धन्य शामिल हैं. उद्योगपतियों, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि से संवाद कर शास्त्रीय संगीत के लिए अधिक संवेदनशील सुविधाएं और माहौल बनाने के लिए की गई इस पहल का महत्व है. अलग से एक कोशिश यह भी हो रही है कि सार्वजनिक उद्योगों को अपने-अपने क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत और नृत्य में गुरु-शिष्य परंपरा के आधार पर नए शिष्यों को दीक्षित करने के एक देशव्यापी अभियान में शामिल किया जाए, उनकी सामाजिक जिम्मेदारी के तहत.

संगीत और नृत्य दोनों को ही, दुर्भाग्य से, गंभीर और उत्तरदायी आलोचना नहीं मिल पाई है. इस वर्ष इस दुखद स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया. अगर यही हालत बनी रही तो इन कलाओं के सत्व के क्षरण का खतरा हो सकता है. सजग आलोचना सक्रिय सृजन के लिए जरूरी है. स्वयं संगीतकारों द्वारा इस तरह का आलोचनात्मक माहौल बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई है. उल्टे कई वरिष्ठ संगीतकारों का संतान-प्रेम इस कदर प्रबल है कि वे पूरी बेशर्मी से अपने बच्चों को सार्वजनिक मान्यता दिलवाने में मुब्तला हैं. यह दूसरी बात है कि इन चिकने-चुपड़े और अक्सर मीडिया द्वारा अनर्जित प्रशंसा पाए संगीतकारों में किसी को भी वह दर्जा नहीं दिया जा सकता जो सांगली, बेलगाम, धारवाड़ आदि के युवा संगीतकारों ने बिना किसी सिफारिश या समर्थन के, बिना किसी ‘माई-बाप’ के निर्लज्ज समर्थन के अपने दम पर हासिल किया है. अगर राजनीति में संतान-प्रेम कहर ढाता है तो संगीत में वह भला कैसे कुछ और कर सकता है?

आशा यह है कि सो युवा संगीतकारों पर ध्यान जाएगा और उन्हें वह समर्थन मिलेगा, संस्थाओं और रसिकों से जिसके कि वे सर्वथा सुपात्र हैं. आशंका यह है कि चूंकि मूर्धन्यों का दबाव कम नहीं होनेवाला, उनकी कमजोर संतानें सब जस और सुविधाएं बटोर लेंगी.

क्या हम एक अतिरंजित स्थिति से सामान्य स्थिति की ओर लौट रहे हैं? क्या कला में कीमत के आतंक के बरक्स फिर से मूल्य का वर्चस्व स्थापित हो रहा है? ये कुछ सवाल हैं जो ललित कला की दुनिया में इस वक्त तीखेपन के साथ उठ रहे हैं. सच ये है कि पिछले दो-तीन बरसों में कला में छवि काम से कम कीमत से ज्यादा बनने लगी थी.

इसका प्रतितर्क था कि काम में दम है तभी न कीमत ज्यादा मिल रही है. भारतीय आधुनिक कला को देर से सही इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय दुनिया और बाजार में कुछ जगह मिलना शुरू हुई. स्वयं भारत में कला का व्यापार तेजी से बढ़ा, भले वह अभी वहीं नहीं पहुंचा है जहां आधुनिकता में शायद हमसे बाद में आनेवाली चीनी आधुनिक कला पहुंच गई है. साधनहीनता में काफी वक्त गुजारने की कलाकारों की मजबूरी अब काफी घट गई है. कलाकर्म आर्थिक रूप से अब एक अच्छा व्यवसाय बन गया है. बल्कि एक समय साथ रहनेवाले ‘दरिद्रता में सहचर’ कला और साहित्य, इस वजह से, काफी दूर हो गए हैं. कला में पैसा है, साहित्य उसका गरीब बिरादर ही है और आगे भी बना रहेगा.

आर्थिक मंदी का प्रभाव कला के बाजार पर भी पड़ा है. कला-दीर्घाओं में बिक्री घट गई है और नए काम को आक्रामक ढंग से पेश करने की जोखिम-उठाऊ वृत्ति कुछ कमजोर पड़ी है. पर यह सच्चाई फिर भी अपनी जगह है कि इस समय युवा प्रतिभा का सबसे सर्जनात्मक, दुस्साहसी और निर्भीक विस्फोट ललित कला में ही है. इतने अधिक प्रतिभासंपन्न युवा न तो किसी अन्य कला में हैं और न ही इसके पहले शायद ललित कला में ही हुए हैं. इन दिनों हर दिन डाक में कहीं से, दूर-दराज से, एक कैटलाग जरूर आता है. इससे आशा बंधती है. इससे भी कि कला का अभिलेखन बेहतर हुआ है. लेकिन विडंबना यह है कि कला की आलोचना का क्षेत्र उतनी तेजी से विकसित और विस्तृत नहीं हो पा रहा है. कला की, विशेषकर प्रयोगधर्मी और सरहदों का अतिक्रमण करने वाली कला की सामाजिक मान्यता भी बढ़ी है पर आलोचनात्मक विश्लेषण और आकलन का, मूल्यांकन का उसके बराबर विकास और विस्तार नहीं हुआ है. कई बार यह आशंका होती है कि मूल्यांकन का काम भी कहीं बाजारू न हो जाए. तब ऐसी कला भी बढ़ जाएगी जो दाम से उत्साहित होगी, मूल्य से प्रेरित नहीं.

आम तौर पर साहित्य के मुकाबले अन्य कलाओं में अपने समय से सीधे जुड़ने और सीधे नागरिक हस्तक्षेप की प्रवृत्ति कुछ शिथिल ही रही है. कहा जाता है कि वे समय की राजनीति में कम, अनंत की राजनीति में अधिक भरोसा रखते हैं. लेकिन हमारा समय ऐसा नहीं है कि उन्हें अलग-थलग रहने की सुविधा दे.

शायद यह सामान्यीकरण उचित नहीं है कि ऐसे हस्तक्षेप से कलाएं दूर हैं. उनका हस्तक्षेप प्राय: अधिक सूक्ष्म होने से अलक्षित हो जाता है. आशा है कि देर-सबेर ऐसे औजार हमारे पास होंगें जो हमारी समझ बढ़ाएंगे. आशंका यह है कि ऐसे औजारों को भोंथरे करने के लिए बाजार, मीडिया और लोकप्रियता की शक्तियां सक्रिय रहेंगी. हम आशा और आशंका के बीच के उजास में हैं. कुहरा है, छंटता और बढ़ता, बढ़ता और छंटता.

                                                                                       अशोक वाजपेयी 

भारतीय मुसलमान आशाएं व आशंकाएं

यह वह आतंकवादी है जिसने इस्लाम धर्म के जेहाद की शब्दावली को ही बदल डाला है और जो कई मौकों पर काफिर भारत को मटियामेट कर देने की कसम खा चुका है. ऐसी परिस्थिति में मुसलमान विरोधी प्रचार करने वालों को एक ठोस दलील मिल जाती है. फिर शुरू होता है संघ परिवार का वह मुस्लिम विरोधी प्रचार जिसकी जड़ें उस राष्ट्रीयता से जुड़ी हुई हैं जो इस्लाम धर्म ही को भारत माता के लिए एक अभिशाप समझता है. संघ ने बड़ी चतुराई से मुसलमानों के खिलाफ यह दुष्प्रचार किया है कि मुसलमान भारत के मूल निवासी नहीं हैं. इनके पूर्वज आक्रमणकारी थे. मुसलमानों के खिलाफ जिस बात को सबसे ज्यादा प्रचारित किया गया है, वह है उनकी असहिष्णुता. इसके लिए उन इस्लामी देशों का खासतौर पर जिक्र किया जाता है, जहां गैर मुसलमानों के साथ दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव किया जाता है. मुसलमानों के बारे में यह धारणा भी आम है कि सरकार नाजायज रियायतें देकर उनका तुष्टिकरण करती है. मुसलमानों के बारे में यह तो दूसरों की प्रचलित धारणाएं थीं, लेकिन स्वयं मुसलमानों की भी खुद को लेकर कुछ धारणाएं हैं. मसलन आम ही नहीं प्रबुद्ध मुसलमान भी यही मानते हैं कि इस देश में उनके साथ सरासर अन्याय हो रहा है और उनके लिए इस देश की न्याय व्यवस्था तक ईमानदार नहीं रही. उनका प्रबल मत है कि 12 मार्च, 1993 को मुंबई के बम विस्फोटों के अतिरिक्त देश भर में जितने भी बम विस्फोट हुए हैं उनमें एक भी मुसलमान लिप्त नहीं है, बल्कि एक बड़ी साजिश के तहत मुस्लिम युवकों को आतंकवाद के झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है. स्वतंत्रता के बाद से नौकरियों में उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. बार-बार दंगे इसलिए करवाए जाते हैं ताकि मुसलमान कभी भी स्वाश्रित न हो सकें. आम मुसलमानों का सबसे बड़ा दुख है कि उनकी राष्ट्रीयता पर हमेशा प्रश्नचिन्ह लगाया जाता है.

मुसलमानों पर किए जाने वाले संदेहों और उनके भीतर से उठने वाले सवालों में ही कहीं निहित हैं वह उत्तर, जिन तक पहुंचने में न उन्हें कोई दिलचस्पी है जो यह प्रश्न उठाते रहे हैं और न ही उन्हें जो इन प्रश्नों से आहत हैं. स्वतंत्रता के बाद से इतना वक्त बीत चुका है कि भारतीय मुसलमानों के भविष्य पर नए दृष्टिकोण से विचार करना होगा. वह नस्ल अब नहीं रही जिसने आजादी के बाद ‘मुसलमानों के यूटोपिया’ पाकिस्तान पर अपनी जन्मभूमि को तरजीह दी थी. अब वह नस्ल भी बूढ़ी हो चुकी है जो 1962 के भारत-पाक युद्ध के दिनों में छिप कर धीमी आवाज में पाकिस्तान रेडियो सुना करती थी. आज उस नस्ल पर भी उम्र का भारी साया पड़ चुका है जो पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के जीतने पर अपनी गलियों में पटाखे छोड़ती थी. 1977 में केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार की स्थापना के चमत्कार के बाद मुसलमानों की सोच में कुछ तब्दीली आई. 1980 के बाद खाड़ी के देशों में जाने वाले भारतीय मुसलमानों ने अपनी कौम के पाकिस्तानी भाइयों को करीब से देखा तो उन्हें पहली बार अनुभव हुआ कि पाकिस्तानियों के लिए वे उनके ‘मुसलमान भाई’ नहीं बल्कि ऐसे भारतीय मुसलमान हैं जिनका ईमान मुकम्मल नहीं है और जो काफिरों में रहते हुए काफिरों जैसे हो गए हैं. यहीं से शुरू हुआ था उनका पाकिस्तान से मोहभंग.

अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान का पिशाच धर्म का चोला पहन कर पहले पाकिस्तान में घुसा और फिर सिमी का पहचान पत्र हासिल करके इस्लामी राष्ट्र के मार्ग से भारत में प्रवेश कर गया

आजादी के बाद के तीस बरसों में एक पीढ़ी गुजर चुकी थी और एक पीढ़ी जवान हो गई थी कि 1984 में शाहबानों के तलाक के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मुसलमानों में हलचल मचा दी. हकीकत यह थी कि इस फैसले ने उन रुढ़िवादी मुसलमानों को विचलित कर दिया था जो मुस्लिम समाज पर अपनी पकड़ उसी तरह मजबूत रखना चाहते थे जिस प्रकार 17वीं शताब्दी तक ईसाइयों पर ही नहीं ईसाई बाहुल्य देशों पर भी चर्च का वर्चस्व कायम था. यह अजीब विडंबना है कि जिस इस्लाम में पोप जैसे किसी धर्म गुरू का कोई स्थान नहीं है, उसके मुल्लाओं में पोप जैसा धार्मिक रुतबा रखने की लालसा अब तक भरी है. शाहबानो के मुकदमे से खौफ खाए इन्हीं रुढ़िवादी मुल्लाओं ने अपने निहित स्वार्थो के लिए देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले के खिलाफ पूरे देश में बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. आम हिंदू चकित था कि सरकारी नौकरियों में सिर्फ 6 प्रतिशत और गरीबी रेखा के नीचे 40 प्रतिशत जगह पाने वाले इन मुसलमानों ने अपनी आर्थिक मांगों को लेकर तो आज तक ऐसा कोई आंदोलन नहीं किया. तो फिर एक 70 वर्षीय तलाकशुदा बुढ़िया को केवल तीन सौ रुपए गुजारा देने के अदालती फैसले में ऐसा क्या है कि ये उसके खिलाफ जीवन-मरण की लड़ाई लड़ रहे हैं? वोट बैंक खोने के डर से राजीव गांधी की नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने संसद में एक अध्यादेश लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल दिया.  यह भारत के इतिहास का वह टर्निग प्वाइंट था, जहां से देश की राजनीति को धर्माधता की उस अंधी सुरंग में प्रवेश करना था जिसका रास्ता अयोध्या की बाबरी मस्जिद से होकर गुजरता था.

जिन हिंदुओं को शाहबानो के प्रति मुसलमानों की नफरत समझ में नहीं आ रही थी उनकी परेशानी को संघ ने इस विचित्र तर्क के साथ दूर कर दिया कि मुसलमान सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अगर मान लेते तो जिस आसानी से तलाक देकर वे तीन-चार शादियां कर लेते हैं वह संभव न होगी. ऐसे में वे हिंदुओं से अधिक आबादी बढ़ाने का अपना गुप्त मंसूबा पूरा नहीं कर सकेंगे और भारत पर फिर कब्जा करने का उनका मकसद पूरा नहीं होगा! सीधा सा ये गणित आम हिंदुओं को आसानी से समझ में आ गया पर मुसलमान ही नहीं समझ सके अपने इस कथित धार्मिक आंदोलन की उस प्रतिक्रिया को जो आठ वर्ष बाद राम जन्मभूमि मंदिर के भयावह आंदोलन के रूप में सामने आने वाली थी.

1971 में इरान में आयतुल्ला खुमैनी के इस्लामी इंकलाब ने भारत सहित बाकी दुनिया के तमाम रूढ़िवादी मुसलमानों का हौसला बढ़ा दिया था. खुमैनी शिया संप्रदाय के धर्मगुरु थे. शिया और सुन्नी संप्रदाय में गत 1400 सालों से तनाव चला आ रहा है मगर खुमैनी शिया ही नहीं उन सुन्नियों के भी नायक बन गए थे जिनके मन में कहीं इस्लामी राष्ट्र के लिए नरम गोशा था. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद अफगानिस्तान में कट्टर रुढ़िवादी तालिबान अमेरिका और पाकिस्तान की सहायता से अपना वर्चस्व स्थापित कर चुके थे. उनकी जीत को तमाम भारतीय  मुसलमानों ने भी, इस्लाम की जीत और राष्ट्रपति मुजीबुल्ला की पराजय और उनकी दर्दनाक हत्या को कम्युनिज्म की पराजय के तौर पर देखा था. 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद भाजपा और संघ ने भी मुसलमानों के खिलाफ नफरत को पुख्ता करने में सफलता प्राप्त कर ली.

अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान का पिशाच धर्म का चोला पहन कर पहले पाकिस्तान में घुसा और फिर सिमी का पहचान पत्र हासिल करके इस्लामी राष्ट्र के मार्ग से भारत में प्रवेश कर गया. बाबरी मस्जिद विरोधी आंदोलन ने हिंदुओं में मुसलमानों के खिलाफ दबे उस क्रोध को एक हिंसक दिशा दे दी, जो शाहबानो केस में संघ ने पैदा किया था. इस बार मुसलमानों की ओर से बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को मान लेने का प्रस्ताव रखा गया तो संघ ने आस्था के नाम पर उसे स्वीकार करने से ठीक वैसे ही इंकार कर दिया जिस प्रकार शाहबानो के केस में मुसलमानों ने इंकार किया था! नतीजा बाबरी मस्जिद विध्वंस के रूप में सामने आया था. इस के बाद हुए दंगों ने एकदम से पूरे देश का माहौल बदलकर मुसलमानों में ऐसा भय पैदा कर दिया जिसने समूची व्यवस्था पर से उनका विश्वास उठा दिया. अचानक ही 1977 में कायम की गई सिमी ने मुस्लिम युवकों में और 1926 से स्थापित ‘तबलीगी जमात’ ने आम मुसलमानों में वह जगह बना ली जो उन्हें अब तक नहीं मिली थी. आम मुसलमानों में मजहब के नाम पर धर्माधता, दाढ़ी और बुर्के  की शक्ल में फैलती चली गई. सबसे हैरत की बात थी कि उर्दू अखबारों ने सिमी की धर्माधता और उसकी जेहादी गतिविधियों की कभी आलोचना नहीं की. उनकी यह नीति रही है कि जिस व्यक्ति या संगठन के साथ इस्लाम शब्द जुड़ा हो उसकी आलोचना में एक भी शब्द भी प्रकाशित नहीं किया जाएगा, वह चाहे संपादक के नाम पाठक का कोई पत्र ही क्यों न हो. जिस समाज में यह सूरते हाल पैदा कर दी जाए उसका मानस क्या होगा?

बाबरी मस्जिद की घटना का एक रौशन पहलू यह भी है कि असुरक्षा की जिस भावना ने उन्हें धर्माध शक्तियों की ओर ढकेला था उसी ने उन्हें आत्मनिर्भर होने के लिए भी प्रेरित किया. मुसलमानों में शिक्षा का महत्व काफी बढ़ा. वह नौकरियों पर आश्रित न रह हर छोटे-मोटे कारोबारों में लग गए. आज तक भारतीय मुसलमानों को किसी घटना ने इतना आहत और असुरक्षित महसूस नहीं कराया था जितना कि मुंबई और गुजरात के दंगों ने. व्यवस्था के अत्याचार और अन्याय के अहसास का नतीजा ये हुआ कि कभी उच्च शिक्षा का लक्ष्य रखने वाले मुस्लिम युवा सरहद पार करने लगे. इसकी जिम्मेदारी किसके सिर रखी जाएगी?

1878 में मुस्लिम सुधारवादी विचारक सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों को उदारवादी बनाने के विचार से, मोहम्मडन कॉलेज के नाम से अलीगढ़ में भविष्य के सबसे बड़े मुस्लिम विश्वविद्यालय की जो नींव रखी थी. वह आज रुढ़िवादी आंदोलनों का गढ़ बन चुका है. स्वतंत्रता से पूर्व सरकारी उपक्रमों में मुसलमानों का अनुपात 18 प्रतिशत था वह आज घट कर 8 प्रतिशत पर पहुंच गया है. साठ साल बाद भी मुसलमान आज वहीं ठगा हुआ सा खड़ा है जहां वह 60 साल पूर्व खड़ा था. लेकिन उसे अपने ठगे जाने का एहसास शायद आज भी नहीं है.                                                                                                                                               

साजिद रशीद

हर शै बदलती है

यों इस समय हवा में एक नाउम्मीदी दुनिया की आर्थिक मंदी में हमारी लड़खड़ाहट और मुंबई हादसे में आतंकवाद के खूंखारपन से जूझने में हमारी व्यवस्था की नाकामी के कारण घुली हुई है. पर स्थितियों के बदलने या बेहतर होने के प्रति मन के अविश्वास का कारण कुछ अधिक गहरा है. आज हर आदर्श, हर विश्वास और हर प्रतिबद्घता शक के दायरे में है कि कहीं उसके पीछे मानव-विरोधी नफरत तो नहीं. क्या हम एक ऐसे समय में प्रवेश करने जा रहे हैं जहाँ हमें काँटेदार बाड़ों के अंदर से दुनिया देखनी होगी? क्या हम इस घिरी हुई दुनिया के भीतर सुरक्षा-बोध के साथ जी सकेंगे या अपने को लगातार सिकुड़ता हुआ और भयभीत पाएंगे? यह सवाल मेरे मन में सिर्फ दुनिया में बढ़ते आतंकवाद या सांप्रदायिक उन्माद जैसी वृहत्तर समस्याओं को लेकर ही नहीं है, बल्कि एक लेखक और एक स्त्री या एक स्त्री-लेखिका होने की अपनी भूमिका को लेकर भी है.

मुझे लगता है कि आज की दुनिया में हाशिए पर जीते तमाम लोगों, स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों को सुरक्षा देने के नाम पर या उनकी अपने दुख की विशेषज्ञता के नाम पर एक कांटेदार बाड़ में ढकेला जा रहा है. उन पर अपनी पहचान के लेबल इस तरह चस्पां किए जा रहे हैं कि वे अपने ‘आइडेंटिटी कार्ड’ के बिना नामहीन, अस्तित्वहीन हो जाएं. हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ बातें बहुलतावाद और व्यक्ति की बहु-अस्मिताओं या ‘मल्टीपल आइडेंटिटी’ की हैं, पर हकीकत में हर व्यक्ति को एक बिल्ला लगाकर एक कटघरा दिया जा रहा है. जहाँ तक स्त्रियों की अस्मिता या उनके सशक्तीकरण का सवाल है तो मुझे लगता है कि कुछ नई डिजाइन की आकर्षक बेड़ियाँ चलन में हैं, जिन्हें स्त्री शौक से पहन ले और उसे पता भी न चले कि ये उसके नए बंधन हैं. या वह इस भ्रम में जीती रहे कि वह किसी काँटेदार बाड़ से नहीं घिरी है.

दिल्ली में हमारे मित्र, जो एक मुख्य टी.वी.न्यूज चैनल में काम करते हैं, हाल के विधान सभा चुनावों की रिपोर्टिग के बारे में बता रहे थे. आम तौर पर चौबीस घंटों में सोलह घंटे समाचार वाचिकाओं के चेहरे उनके चैनल पर नजर आते हैं. किन्तु जब चुनावों के बारे में समाचार आ रहे थे, तो वहाँ पुरुषों का वर्चस्व या कहें कि एकाधिकार नजर आ रहा था. यदि इसका अर्थ यह निकलता है चुनाव जैसे गंभीर और निर्णायक विषयों पर स्त्रियों में बोलने की काबिलियत नहीं है तो शायद हम मीडिया में स्त्रियों के सशक्तीकरण की बात को सच मानकर अपने को मुगालते में रख रहे हैं. विडम्बना यह है कि ‘गृहशोभा’ से ‘मंच-शोभा’ के इस प्रोमोशन में स्त्री की अस्मिता का जो अवमूल्यन है, वह आसानी से नजर नहीं आता.

नए वर्ष से जुड़ी आशाओं और आशंकाओं के बारे में जब मुझे स्त्री-समस्याओं के संदर्भ में लिखने को कहा जाता है, तो मुझे अपनी बाड़ के काँटे चुभने लगते हैं. इसका आशय यह कतई नहीं है कि मुझे लगता है कि इक्कीसवीं सदी की स्त्री ने सारी समस्याओं का हल पा लिया है या जो स्त्रियाँ इस विषय पर लिख रही हैं, उनका लेखन किसी तरह से कमतर लेखन है. पर मुझे हर बार लगता है कि मुझे बताया जा रहा है कि तुम्हारी बाड़ के बाहर की दुनिया पर लिखने की कूवत तुम्हारी नहीं है या उससे बाहर उड़ने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं है.

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ स्त्री की सजावटी सामान के तौर पर कीमत किसी भी और समय से ज्यादा है. जिस तरह बॉलीवुड की किसी फिल्म की कल्पना आप किसी परी चेहरे के बिना नहीं कर सकते, उसी तरह फिलहाल हमारी दुनिया की आधुनिकता के विमर्श में स्त्री का एक खास सजावटी मूल्य है. किसी लोकतंत्र की पार्लियामेंट या सीनेट में महिलाओं की संख्या अगर नहीं के बराबर है, तो संभावना यही है कि उसे एक पिछड़ा हुआ समाज या देश मान लिया जाएगा. आज स्त्री की स्वतंत्रता या उसकी तथाकथित स्वतंत्रता आधुनिक होने का प्रमाण-पत्र बन चुकी है. दूसरे शब्दों में कहें, तो ‘मेन्स ओनली’ या ‘सिर्फ पुरुषों के लिए’ क्लब अब फैशन में नहीं हैं.

स्त्रियों का एक खास उपयोग टी.वी.के तरह-तरह के रियेलिटी शो और क्रिकेट में मन्दिरा बेदी तक नजर आ रहा है. यहाँ स्त्री मूर्ख नहीं है, अपने विषय की उसे जानकारी है, वह अपनी बात को कहने का तरीका जानती है, लेकिन उसकी एक तयशुदा जगह या स्तर है, जिससे ऊपर उठने की कोई अपेक्षा किसी को नहीं है. विडम्बना यह है कि ‘गृहशोभा’ से ‘मंच-शोभा’ के इस प्रोमोशन में स्त्री की अस्मिता का जो अवमूल्यन है, वह आसानी से नजर नहीं आता.

फिलहाल हमारा देश बहुत चाव से ‘बालिका वधू’ नाम का सीरियल देख रहा है, जो कि अनिवार्यत: खाए-पीए-अघाए उच्च वर्ग की कहानी होते हुए भी एक गरीब लड़की के बिक्री-खरीद का सामान होने की भी कथा है. कथानक दिलचस्प है, अभिनय बढ़िया है और ज्यादातर देखनेवाले आश्वस्त हैं कि उनकी लड़कियों को अपना बचपन इस तरह खोना नहीं पड़ेगा. पता नहीं कि जिन लड़कियों को बालिका-वधू बनना पड़ सकता है, उनमें से कितने माँ-बाप इस सीरियल को देखकर इससे विरत होंगे.

बात शायद इतनी ही है कि औरत का शोषण मनोरंजन के विराट बाजार में एक बेहद बिकाऊ तत्व है. उतना ही बिकाऊ, जितनी कैटरीना कैफ की सुन्दरता, जिसकी तस्वीर पिछले दिनों कोलकाता के अखबार ‘द स्टेट्समैन’ के पहले पन्ने को पूरी तरह घेरे हुए किसी गहने की कम्पनी का विज्ञापन करती नजर आई. मानो यही देश की सबसे बड़ी खबर थी. मुंबई के आतंकी हमले का प्रतिवाद करती औरतों की लिपस्टिक और पाउडर ही कुछ लोगों को नजर आया; दूसरी ओर विडम्बना यह कि मीडिया ने इस हादसे पर मुंबइकरों की राय जमा करने में ‘पेज थ्री’ के लोगों को सबसे ज्यादा जगह दी.

मनोरंजन, समाचार और विज्ञापन की मिली-जुली दुनिया में गाँव से लेकर महानगर की हर तबके की औरत की प्रतिभा, उसकी सुंदरता, उसका क्रोध और यहाँ तक कि उसकी आजादी और गुलामी का भी एक मूल्य है जैसे बाजार में किसी भी सामान का होता है. लेकिन उसकी अपनी अस्मिता या मनुष्य के रूप में उसकी उपस्थिति का यहाँ जो क्षय या अवमूल्यन है, वह इतना महीन और इतना मनोरंजक है कि आम तौर पर खुद उसे किसी तरह की शिकायत नहीं होती. अक्सर आप उसके चेहरे पर एक संतोष और एक गर्व का भी भाव देख सकते हैं.

भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश में नारी की स्थिति को आँके, तो सत्ता के सबसे ऊँचे गलियारों में औरतें हैं. भले बेनजीर भुट्टो और इन्दिरा गाँधी- सोनिया गाँधी और शेख हसीना को वंशानुगत लाभ के चलते सत्ता मिली, लेकिन  हमारे यहाँ नीचे से ऊपर उठी पिछड़ों की रहनुमा हीरों से जगमगाती मायावती भी हैं. यह कहना मुश्किल है कि इनमें से किस महिला को महिला होने का कितना लाभ मिला या उसे महिला होने की क्या कीमत चुकानी पड़ी है. अक्सर हमारे यहाँ आधुनिकता एक बेहद उलझ हुआ मामला नजर आता है, जिसमें वर्ग, लिंग, जाति और संप्रदाय के तत्व गड्डमड्ड रहते हैं. कोडोंलिजा राइस या हिलेरी क्लिंटन के साथ इस तरह की बातें भले न काम करती हों, पर अमेरिका में ही सारा पालिन का स्त्रीत्व उनके उत्थान-पतन में निर्णायक रहा है.

भारत में आधुनिक युग के अंदर और उसके समानांतर मध्ययुग चलता आया है. आनेवाले समय में स्त्री के स्थान को लेकर आशावादी होना मुश्किल है क्योंकि विश्वव्यापी मंदी के दौर में उपभोक्तावादी वृत्ति हमारे यहाँ कन्या-भ्रूण की हत्या से लेकर दहेज की हत्याओं का सिलसिला बढ़ाने ही वाली है. मनोरंजन की मंडी में स्वस्थ, सुंदर और वाक्पटु औरत का इस्तेमाल ‘टी आर पी’ या मुनाफा बढ़ाने की सामग्री के तौर पर किया जाता रहेगा. साहित्य-राजनीति और दूसरे क्षेत्रों में स्त्रीत्व के बिल्ले के साथ उसकी जगह अपनी बाड़ में तय की जाती रहेगी.                                                                                                                                        

                                                                                                                                             अलका सरावगी