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वह भूख से नहीं बीमारी से मरा होगा

जो इस नश्वर संसार में आया है उसे एक दिन जाना ही है। यही एक सत्य है। कैसे जाना है? यह पता नहीं। हमारे देश में ज़्यादातर लोग सड़क और रेल हादसों में मरते हैं। कुछ बीमारी का शिकार होते हैं। कई आत्महतया कर लेते हैं। कुछ दंगों का शिकार हो जाते है। पर कहीं ज़्यादा बवाल नहीं होता। पर जब कोई भूख से मरता है तो हंगामा हो जाता है। बात भी सही है जिस देश में अन्न की बहुतायत हो वहां लोगों का भूख से मरना स्तब्ध कर देता है। विश्वास नहीं होता। सारा प्रशासन यह साबित करने पर लग जाता है कि मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है।

जब डाक्टर पोस्टमार्टम के बाद कह दे कि मृतक ने आठ दिनों से कुछ नहीं खाया था, तो बेचारे मेजिस्ट्रेट को अपनी रपट में मौत का कारण दस्त लगना बताना पड़ता है। साथ ही कुछ सवाल खड़े करने पड़ते है, कुछ शंकांए पैदा करनी पड़ती है, जैसे किसी ने विष दे दिया होगा, अभी विसरा की रिपोर्ट आनी है। तभी पता चलेगा कि असलयित क्या है। प्रशासन इसे हैजा बता दे या कोई और भंयकर बीमारी पर वह इस बात को कभी सहन नहीं करेगा कि मौत भूख से हुई। पर न मानने से क्या असलीयत बदल जाती है।

हमारी बिरादरी सही है। हम कभी भूख से नहीं मरते क्योंकि हमें चारा या घास खाने के लिए राशनकार्ड की ज़रूरत नहीं होती। न कार्ड होते हैं, न दूसरी जगह जाने पर उन्हें रद्द करवाना पड़ता है और न नए बनवाने पड़ते हैं हमारा ‘रेजिडेंस प्रूफÓ भी कोई नहीं पूछता। हमें जहां हरियाली दिखी वहीं पहुंच जाते है चरने। पर ये गरीब लोग चाहे उस आंगनवाडी के पास ही रहे जो गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और मुफ्त भोजन देनेे के लिए बने हैं, पर जिसके पास राशन कार्ड नहीं, उसे राशन नहीं जिसे राशन नहीं, उसे भूख अपने जबड़े में ले ही लेती है। पर ऐसे गरीबों के मरने से किसे क्या फर्क पड़ता है। उल्टा देश में गरीबों की संख्या कम होती है।

हमारे समाज में लंगर लगाने और भंडारे चलाने की एक परंपरा है। पर बदकिस्मती से इसका लाभ भी बहुत गरीब लोग नहीं उठा सकते। इंसान शायद ज़्यादा पढ़ा-लिखा है इसलिए उसके पास ई-मेल, व्हट्स एप, इंटरनेट से फुर्सत नहीं वह ‘फेसबुकÓ पर अपने कथित मित्रों की संख्या बढ़ता है। वह गरीबी और भुखमरी के आंकड़े नहीं देखता, पर हम जाहिल जानवर हैं, धोबी का बोझा ढोते हैं पर हमें मालूम है बाबर की मौत हमंायू से 26 साल पहले हो गई थी, हमें मालूम है तक्षशिला कहां है, हम जानते है कौन सा संत किस शताब्दी में पैदा हुआ। हमें मालूम है देश में सबसे बड़ा अकाल 1935 में पड़ा था। 1968 में राजस्थान में अकाल पड़ा। राजस्थानी लोग साहसी हैं वे पूरे देश में रोज़ी रोटी तलाश करने लगे। बंगाल के कई नगरों में तो वे आज स्थानीय लोगों से भी ज्य़ादा तादाद में हैं। वे वहां की अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। रूसी क्रांति के नायक लेनिन के बारे में कहा जाता है कि वे उतना ही खाना लेते थे जितनी ज़रूरत होती थी। माओ तो यदि खाना खाते समय समझ जाते कि खाना ज्य़ादा है तो उसे कटोरी में भरकर अपनी जेब में रख लेते और जब भूख लगती तभी खाते। हमारे यहां तो बचा खाना जानवरों को खिला दिया जाता है। शहरों में अन्न फेंकना सभ्यता मानी जाती है। क्या इससे देश का विकास होता है? विकास तो क्या पिछले 71 सालों में देश में व्यवस्था नहीं बना पाए जिसमें कोई भूखा न सोए। हमारे अध्यात्मिक लोगों का भगवान पर अटल विश्वास है। वे कहते हैं, ”वो (भगवान) भूखा उठाता है, पर भूखा सुलाता नहीÓÓ। फिर आठ दिन तक भगवान कहां था हमें तो पता नहीं।

जानवरों के अस्तित्व को मान्यता एक ऐतिहासिक फैसला

Indian tourists ride horses in rented fur coats at Snow Point on Rohtang Pass, Manali, India

नैनीताल में स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नेपाल और भारत के बीच घोड़ों की गतिविधियों को सीमित करने वाली एक याचिका पर सभी जानवरों जिनमें पक्षी और मछलियां तक भी शामिल हैं, के कानूनी अस्तित्व को मान्यता दी है। जानवर कल्याण और जानवरों के अधिकारों की वकालत करने वालों ने इस फैसले पर जश्न मनाया है।

जानवरों के अधिकारों को पहचान देना एक महत्वपूर्ण बात है। इससे भी ज्य़ादा ज़रूरी है मानव को जानवरों की देखभाल के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना। सुप्रीमकोर्ट ने ‘परवेंशन ऑफ क्र्रूऐलिटी टू एनीमलस एक्ट 1960 की धारा के तहत जानवरों की देखभाल को अनिवार्य बताया है। जानवर कल्याण बोर्ड बनाम-ए-नागराज और दूसरे मामले की सुनवाई करते हुए देश की सर्वाेच्च अदालत ने कहा है कि जानवरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मानव की है। अदालत ने कहा कि जानवरों के अधिकारों और मानव जिम्मेदारी को एक सामजस्य में समझना चाहिए।

यह घोषणा जानवरों के साथ हमारे संबंधों पर आत्मनिरीक्षण करने का अवसर है जिसे हम दुनिया के साथ सांझा कर सकते हैं। ज्य़ादातर संबंध उनके शोषण का माध्यम हैं। हम लोग जानवरों के साथ बातचीत के संबंध भी तब बनाते हैं जब हम उनको मारने के लिए ले जाते हैं या जब हम उन्हें वैज्ञानिक प्रयोग के लिए इस्तेमाल करते हैं। हम व्यापार के लिए उनकी संख्या बढ़ाते हैं और उनकी प्रकृति में भी दखल देते हैं।

जानवरों को वस्तुओं के रूप में माना जाता है जिसकी हमारे पास उपयोग करने के अलावा और कोई उपयोगता नहीं। यह निर्णय जानवरों को जीवित और संवेदनशील प्राणियों के रूप में पहचानने के लिए शुरूअत की है। शिक्षा प्रणाली में ऐसी साम्रगी शामिल होनी चाहिए जो सभी जीवित प्राणियों के लिए रु चि और सम्मान पैदा करे। इन उद्देश्यों को ज्ञान प्रदान करके सबसे अच्छा उद्देश्य है कि जानवरों को जीवित, संवेदनशील जीवों के रूप में

मानता है कि ये मनुष्यों के साथ पर्यावरण सांझा करते हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले को साकार करने के लिए मानव की सोच में एक स्थायी और व्यापक बदलाव ज़रूरी है। इसमें जानवरों का शोषण और उपेक्षा को रोकने और प्राकृतिक रहन सहन की रक्षा के लिए मानव चेतना और व्यवहार में एक परिवर्तन आना चाहिए।

भारत सरकार को गैर-मानव जानवरों के प्रति अपने मौलिक कर्तव्यों को पहचानना चाहिए, जैसा कि धारा 48ए और 51ए(जी) में निहित है और इस देश के न्यायालयों द्वारा दोहराया गया है और पत्र और भावना में पशु कल्याण कानूनों को लागू किया गया है। केवल तभी हम राष्ट्र के रूप में जीवन के पूरे समुदाय की रक्षा और संरक्षण कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी का अमर रथ

अमर सिंह बम-बम हैं। दुकान चल गई है। देश के तमाम उद्योगपतियों को मालूम हो गया है कि ‘अमर सिंहजीÓ अब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ब्रांड एंबेसडर हैं। प्रधानमंत्री निवास से लेकर वित्त मंत्री पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान, अमित शाह सबके यहां उनकी फोन लाइन जुड़ गई होंगी। सचमुच वक्त और भाग्य का कमाल देखिए कि जिस प्रधानमंत्री ने यह कसम खा कर दिल्ली का तख्त संभाला था कि वे दिल्ली के पॉवरब्रोकर, इनसाइडरों, दलालों को अपने और अपनी सरकार के पास फटकने नहीं देंगे वे नरेंद्र मोदी अब अमर सिंह, अमिताभ बच्चन, अनिल अंबानी की उस तिकड़ी से घिरे दिख रहे हैं, जिसका अर्थ पूरा देश कई दशकों से जानता है।

उस नाते कौतुक अमर सिंह का नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ का है! इनके आंगन में यदि अमर सिंह अब ‘अमर सिंह जीÓ हुए हैं और चुनावी उपयोग के लिए अमर रथ आ खड़ा हुआ है तो क्या यह बदले वक्त का गवाह नहीं है? 29 जुलाई 2018 का दिन अमर सिंह के जीवन का अभूतपूर्व दिन था तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह की राजनीति में भी मोड़ था। एक झटके में नरेंद्र मोदी ने देश को बताया कि उन्हें अब अपने पर भरोसा नहीं। वे 2019 के लोकसभा चुनाव में अमर सिंह के रथ पर बैठ कर उत्तर प्रदेश का महाभारत लड़ेंगे।

सोचो, भगवा वस्त्रधारी योगी आदित्यनाथ, कथित हिंदू चाणक्य अमित शाह और हिंदुओं के आज के पृथ्वीराज चौहान को अपने आप पर हिंदू बनाम मुस्लिम कराने का वह भरोसा नहीं है, जो 2014 और 2017 में 56 इंची छाती से खम ठोंक पैदा किया गया था। तभी तो अमर सिंह के रथ को बनवा कर उससे ‘बुआ-बबुआÓ एलायंस के आगे मोर्चेबंदी कराई जा रही है और हल्ला बनाया जा रहा हैं कि ‘अमरसिंहजीÓ का जीवन नरेंद्र मोदी को समर्पित है!

संदेह नहीं जंग में सब कुछ जायज होता है। सो, मोदी-शाह-योगी क्यों न उत्तर प्रदेश में अमर सिंह का उपयोग करें? मगर ऐसा होना अपने आपमें प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-लोकदल-कांग्रेस के एलायंस को मोदी-शाह कितना खतरनाक माने हुए हैं, और इसकी चिंता में नरेंद्र मोदी किसी को भी गले लगाने को तैयार हैं। वे कुछ भी करेंगें। मायावती, अखिलेश, अजित सिंह, राहुल गांधी को नंगा कराने के लिए अमर सिंह जैसे कपड़े खींचने वाले, काटने वाली असंख्य ताकतों को आगे ऐसे दौड़ा दिया जाना है, जिससे राजनीति की तमाम हदें टूट जानी है। इसलिए 29 जुलाई 2018 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में कारोबारियों के सम्मेलन में जो कहा उसके गंभीरता से अर्थ बूझने चाहिए। एक वाक्य से अमर सिंह को मायावती-अखिलेश-राहुल के पीछे छोड़ दिया- सामने अमर सिंह जी बैठे हैं, सबकी हिस्ट्री खोल कर रख देंगे।

और जान लें अमर सिंह हिस्ट्री खोलने में ही नहीं, बल्कि घर में कलह पैदा करने, पार्टियों में तोडफ़ोड़ करने, चरचे-परचे-खरचे और ग्लैमर का वह कीचड़ बनाने में सौ टका समर्थ हैं, जो मोदी-शाह के लिए आगे कमल खिलवा दे!

उस नाते अमर सिंह का ‘अमर सिंहजीÓ होना प्रमाण है कि 2014 के बाद गंगा-यमुना में कितना पानी बह गया है और मोदी-शाह-योगी यूपी में विपक्ष का एलायंस न होने देने के लिए कितनी तरह के जतन करेंगें! अमर सिंह एंड पार्टी की ताकत से मोदी-शाह को उत्तर प्रदेश में कितना धक्का मिलता है यह तो वक्त बताएगा लेकिन इतना तय मानें कि अमर सिंह मौका नहीं चूकेंगें। उनका बड़बोलापन चालू हो गया है। वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पटा कर लखनऊ में शासन, अफसरों और मंत्रियों पर बहुत जल्दी अपनी पकड़ बना लेने वाले हैं। यों भी योगी के पास सलाहकार नहीं हैं। इसलिए वे अपनी ठाकुरशाही में ठाकुर अमर सिंह से राजकाज की शिक्षा-दीक्षा न लें यह संभव ही नहीं है। आगे संभावनाएं असंख्य हैं। अमर सिंह चुनावी पैकेज डील बना कर खुद अखिलेश यादव के खिलाफ खड़े हो सकते हैं, वह जया प्रदा को भी भाजपा के चुनाव चिन्ह पर आजम खान के खिलाफ चुनाव लड़वा सकते हैं तो अजित सिंह को तोडऩे के लिए उनकी पुरानी महिला मंडली को सक्रिय बनवा सकते हैं।

हां, अमर सिंह कलाकार हैं तो क्षमतावान भी। आखिर चंद्रशेखर की चिरकुटी से नरेंद्र मोदी के ‘अमर सिंहजीÓ बनने का अमर सिंह का सफर यूं ही नहीं हुआ। यह अलग बात है कि 40 साल के उनके इतिहास का एक निचोड़ यह भी है कि जिस-जिस के साथ अमर सिंह रहे, उनके घरों में भाई-भाई में झगड़े हुए। कलह हुई और अंतत: सब डूबे। जिस घर में उनके पांव पड़े उसमें कलह के साथ घर टूटा और नेता ने सत्ता भी गंवाई! मगर हां, अमर सिंह की अपनी दुकान जरूर चमकी रही। दुकान के बोर्ड पर विविध ब्रांड जुड़ते गए।

क्या वह इतिहास नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के भगवा घरों में अमर सिंह के पांव रखे जाने से दोहराया नहीं जाएगा?

जवाब वक्त देगा। इतना तय मानें कि अमर सिंह उधम मचाने में कसर नहीं रख छोड़ेंगे। बहुत संभव है अपनी बातों, अपनी राजनीति से वे उत्तर प्रदेश में अब योगी आदित्यनाथ के बाद भाजपा के नैरेटिव बनवाने वाले नंबर दो के नेता बन जाएं। यों भाजपा अध्यक्ष उन्हें पार्टी में औपचारिक तौर पर शामिल करें, यह संभव नहीं लगता है। आखिर कुछ भी हो उत्तर प्रदेश को, उसकी तासीर को, उसके कलाकार अमर सिंह को अमित शाह बखूबी, जानते समझते हैं। यदि अमर सिंह भाजपा में शामिल हुए और योगी आदित्यनाथ के साथ ठाकुर नजदीकी में कर्ता-धर्ता बन गए तो अमित शाह के कंट्रोल में फिर क्या रहेगा?

हां, तय मानें नरेंद्र मोदी के जरिए योगी आदित्यनाथ का कर्ता-धर्ता बनना अमर सिंह की दीर्घकालीन उड़ान का टेकऑफ है। वे योगी को अहसास करा देंगें कि आपका भगवा चेहरा मोदी-शाह की मजबूरी है। आपके कारण प्रदेश में हिंदू-मुस्लिम होता है। आप हिंदुओं के, भगवा राजनीति के असली आईकॉन हैं। आप ही आगे के प्रधानमंत्री हैं और आपको ऐसे राजनीति करनी है, जिससे आपके खास लोग टिकट पाएं। वे जीतें और आप अखिल भारतीय इमेज पा कर देश की राजनीति में निर्णायक बनें।

जान लें यह सब अमर सिंह की बेसिक फितरत है। चंद्रशेखर, माधव सिंह सोलंकी, माधवराव सिंधिया, बच्चन परिवार से ले कर मुलायम सिंह यादव सबके यहां एंट्री बनते ही अमर सिंह ने हमेशा पहले इर्द-गिर्द जमे हुए लोगों को उखाड़ा। नेता को अपने ऊपर निर्भर बनाया। उसके चरचे, परचे, खरचे और ग्लैमर का ऐसा बंदोबस्त किया कि उसके दरबार का सौ टका टेकओवर अमर सिंह का बना। वैसा योगी आदित्यनाथ का आगे  हो सकता है और ‘अमर सिंहजीÓ की उपयोगिता देख नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्री निवास में यदि उनको पूरी एक्सेस दे दी तो वह वक्त अकल्पनीय नहीं है कि अमित शाह भी मोदी के यहां से आउट हो जाएं और ‘अमर सिंहजीÓ ही चुनाव के बाद उनके लिए सहयोगी पार्टियों के जुगाड़ के कर्ता-धर्ता बनें!

और वैसा होना बड़ा मजेदार होगा। मैं अमर सिंह को चिरकुटी दिनों से बहुत गहराई से जानता हूं इसलिए अपना मानना है कि नरेंद्र मोदी ने 29 जुलाई 2018 के दिन भारत के नंबर एक ऐयार को ऐसे पंख लगाए हैं कि मायावती, अखिलेश, अजित सिंह, राहुल गांधी को वे चाहे जैसे घायल करें लेकिन असली खेल तो भाजपा के भीतर योगी के टेकओवर या नरेंद्र मोदी के टेकओवर का होगा। देखते जाएं, क्या-क्या गुल खिलते हैं!

साभार: नया इंडिया

निहत्थे संन्यासी पर हमला

स्वामी अग्निवेश के साथ झारखंड के एक जिले भाकुड़ में उन्यत्त भीड़ ने जो व्यवहार किया है वह इतना शर्मनाक और वहशियाना है कि उसकी भत्र्सना के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। एक संन्यासी पर आप जानलेवा हमला कर रहे हैं और ‘जय श्रीरामÓ का नारा लगा रहे हैं।

आपको राम देखते तो अपना माथा ठोंक लेते। आप तो खुद को रावण की औलाद सिद्ध कर रहे हैं। आप अपने आपको हिंदुत्व का सिपाही कहते हैं। अपने आचरण से आप हिंदुत्व को बदनाम कर रहे हैं। क्या हिंदुत्व का अर्थ कायरपन है?

इससे बढ़ कर कायरता क्या होगी कि 80 साल के निहत्थे संन्यासी पर उन्मादी भीड़ टूट पड़े? उसे डंडे और पत्थरों से मारे? उसके कपड़े फाड़ डाले, उसकी पगड़ी खोल दे। उसे जमी पर पटक दे।

स्वामी अग्निवेश पिछले 50 साल से मेरे अभिन्न मित्र रहे हैं संन्यासी बनने से भी पहले से। वे तेलुगुभाषी परिवार की संतान हैं और हिंदी के कट्टर समर्थक हैं। वे महॢष दयानंद के अनन्य भक्त हैं। वे कट्टर आर्यसमाजी हैं। संन्यास लेने से पहले वे कोलकाता में प्रोफेसर थे। अत्यंत संपन्न और सुशिक्षित परिवार के बेटे होने के बावजूद वे संन्यासी बने।

ऐसे व्यक्तित्व को पाकिस्तान का एजंट कहना कितनी बड़ी मूर्खता है। उन्हें गोमांस-भक्षण का समर्थक बताना किसी पाप से कम नहीं। उन्होंने और मैंने हजारों आदिवासियों, ईसाइयों और मुस्लिम भाइयों को मांसाहार लेने से विरत किया है। स्वामी अग्निवेश को ईसाई मिशनरीयों का एजंट बताने वाले यह नहीं जानते कि अकेले आर्यसमाज ने विदेशी मिशनरियों को भारत से खदेड़ा।

अग्निवेश ने जिस शिष्टता से उन हमलावर प्रदर्शनकारियों को मिलने के लिए अतिथिगृह में अंदर बुलाया यह उनकी सहजता थी। लेकिन उसका जैसा जवाब उन्होंने दिया वह जंगली जानवरों की करतूत थी। स्वामी के कुछ विचारों और कामों से मैं भी सहमत नहीं हो पाता। उनकी आलोचना भी करता हूं, लेकिन उनके साथ जानवरपन करने का अधिकार किसी को नहीं है।

यदि ये हमलावर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, और भाजपा से जुड़े हैं तो मैं मोहन भागवत और अमित शाह से कहूंगा कि वे इन्हें फौरन अपने से जुड़े संगठनों ने निकाल बाहर करें और इन्हें कठोरतम सजा दिलाएं।

ऐसे ही लोगों के खिलाफ कठोर कानून बनाने की सलाह ही सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को दी है। लेकिन सरकार का हाल किसे पता नहीं है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ है। उसे पता ही नहीं है कि उसे क्या करना है। देश में उन्मादी भीड़ द्वारा हत्या की कितनी घटनाएं हो रही हैं लेकिन दिन-रात भाषण झाडऩे वाले हमारे प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर अपना मुंह खोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। यदि संघचालक मोहन भागवत भी चुप रहेंगे तो राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के बारे में जो शशि थरूर ने कहा है उसे सच्च होने में देर नहीं लगेगी।

आडवाणी से मिलीं, सोनिया और केजरीवाल से मिलेंगी ममता

असम में नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की सूची में ४० लाख लोगों के भारतीय नागरिक न होने के दावे के वाद सक्रिय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो गयी हैं। वे पहले ही इस मामले में गृह युद्ध छिड़ने का खतरा बता कर इसका मुखर विरोध कर चुकी हैं। अब ममता आज यानी बुधवार को दिल्ली में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से भी मिलेंगी जबकि वे पहले ही राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता शरद पवार से मिल चुकी हैं।

ममता दिल्ली पहुँच चुकी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक ममता जब संसद परिसर में थीं तो उन्होंने भाजपा मार्गदर्शक मंडल के सदस्य पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के पाँव छुए और उनसे बातचीत की। वे आडवाणी से उनके संसद भवन के कमरा नंबर ४ में मिलीं और करीब १५ मिनट उनके साथ रहीं।

ममता इस बहाने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करती दिख रही हैं। आज राज्य सभा और लोक सभा दोनों में इस मसले पर खूब हंगामा हुआ है। लोक सभा हंगामे के बाद १२ बजे तक स्थगित की गयी। उधर ममता अब यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी से मुलाकात करेंगी। दिलचस्प यह है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस मसले पर ममता बनर्जी के साथ दिख रहे हैं। केजरीवाल के आज शाम ममता से मिलने की सम्भावना है।

पिछले कुछ महीनों से विपक्षी एकता की कोशिशों के बीच नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की सूची एक बड़ा मुद्दा बन गया है। केजरीवाल और ममता की आज की संभावित  मुलाकात राजनीतिक हलकों में तीसरे मोर्चे के गठन की गंभीर कोशिश मानी जा रही है। सम्भावना है कि इस मुलाकात में दोनों नेता राजनीतिक मसलों पर भी बात करेंगे। दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष गंभीरता से एक होने की कोशिश में जुटा है ताकि भाजपा और मोदी के खिलाफ मजबूत साझा मोर्चा बनाया जा सके।

कुछ राजनीतिक हलकों में बेस स्तर पर यह चर्चा रही है कि राहुल गांधी दरअसल कांग्रेस को २०१९ नहीं अपितु २०२४ के लिए तैयार कर रहे हैं। ऐसे दूसरे दलों के बड़े नेता, जिनमें ममता भी शामिल हैं, अपने लिए पीएम पद की संभावनाएं देख रहे हैं। ममता एनसीपी, शिवसेना, टीआरएस, टीडीपी, आरजेडी और सपा के नेताओं के भी संपर्क में हैं। उनके मुखर होने के पीछे बड़ा कारण एनआरसी के मसले पर कांग्रेस का मुखर न होना भी है।

उधर भाजपा अब असम के बाद पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में भी एनआरसी की मांग करने लगी है जिससे यह मुद्दा पूरे देश में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। जबकि ममता का कहना है कि  ”आज असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर जो कुछ हो रहा है उसमें बंगाली लोग ही नहीं पिस रहे। इसमें अल्पसंख्यक, हिंदू, बिहारी सब को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। 40 लाख से ज्यादा लोगों को आज अचानक उनके अपने ही देश में रिफ्यूजी बना दिया गया है जो एक बड़ी चिंता का विषय है।”

करूणानिधि को देखने अस्पताल गए राहुल

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंगलवार को चेन्नई में कावेरी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती द्रमुक अध्यक्ष एम करुणानिधि के स्वास्थ्य का हाल जानने अस्पताल गए। भर्ती होने के चौथे दिन भी करुणानिधि गहन चिकित्सा इकाई में रहे। राहुल ने उनसे मिलने के बाद पत्रकारों को बताया कि करूणानिधि धीरे-धीरे बेहतर हो रहे हैं और वे उनके स्वास्थ्य में सुधार से प्रसन्न हैं।

इस बीच अस्पताल प्रबंधन ने जानकारी दी है कि करुणानिधि को लीवर फंक्शन और हेमेटोलॉजिकल पैरामीटर में आयु संबंधित गिरावट के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया है। अस्पताल के एक प्रवक्ता ने कहा कि वरिष्ठ नेता ”मेडिकल सपोर्ट” पर हैं और उनका स्वास्थ्य स्थिर है। अभी कुछ और दिन उन्हें अस्पताल में रहना पड़ सकता है।

गांधी के साथ तमिलनाडु कांग्रेस के प्रमुख सू थिरूनावुक्कारासर और पार्टी नेता मुकुल वासनिक भी थे। करुणानिधि को देखने के बाद राहुल ने पत्रकारों को बताया – ”मैं आज उनसे मिला। वह ठीक हैं। उनकी हालत स्थिर है। मैं यह देखकर संतुष्ट हूं कि उनकी सेहत में सुधार दिख रहा है।” राहुल ने कहा कि वह (करुणा) तमिलनाडु के लोगों की तरह ही बेहद दृढ़ हैं। ”उनके अंदर तमिलनाडु की भावना है।” राहुल अस्पताल में करीब 15 मिनट रुके। बाद में राहुल ने कहा कि सोनिया गांधी ने करुणानिधि और उनके परिवार के लिए शुभकामनाएं भेजी हैं। हमारा द्रमुक प्रमुख के साथ पुराना रिश्ता है।”

इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष कड़ी सुरक्षा के बीच हवाईअड्डे से सीधे अलवरपेट के कावेरी अस्पताल पहुंचे। अस्पताल में द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन और दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने उनकी अगवानी की।

ममता बनर्जी ने कहा एनआरसी को लेकर हो सकता है देश में रक्तपात

असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) की कवायद राजनैतिक उद्देश्यों से की गई ताकि लोगों को बांटा जा सके। यह कहते हुए पश्चिम बंगा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चेतावनी दी है कि इससे देश में रक्तपात और गृह युद्ध छिड़ जाएगा।
भाजपा पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि यह पार्टी देश को बांटने का प्रयास कर रही है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बनर्जी ने दिल्ली में एक सम्मेलन में कहा, ‘‘एनआरसी राजनैतिक उद्देश्यों से किया जा रहा है। हम ऐसा होने नहीं देंगे। वे (भाजपा) लोगों को बांटने का प्रयास कर रहे हैं। इस स्थिति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। देश में गृह युद्ध, रक्तपात हो जाएगा।’’
असम में रह रहे असली भारतीय नागरिकों की पहचान के लिये उच्चतम न्यायालय की निगरानी में चल रही व्यापक कवायद के तहत अंतिम मसौदा सूची में 40 लाख से अधिक लोगों को जगह नहीं मिली है।
इस मुद्दे की गूंज संसद के दोनों सदनों में सुनाई पड़ी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष से अपील की कि वह इस संवेदनशील मामले का राजनीतिकरण नहीं करे क्योंकि सूची उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर प्रकाशित की गई है और केंद्र की इसमें कोई भूमिका नहीं है।
उन्होंने कहा कि एनआरसी की मसौदा सूची में जिन लोगों के नाम नहीं हैं, उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

बीजेपी संसदीय दल की बैठक में मोदी को लड्डू और हार

करीब डेढ़ हफ्ते पहले लोक सभा में विश्वासमत जीतने के लिए भाजपा संसदीय दल ने मंगलवार को नई दिल्ली में संसद के लाइब्रेरी भवन में बैठक की। बैठक में प्रधानमंत्री मोदी को लड्डू खिलाकर और हार पहनाकर सम्मानित किया गया। बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मोदी को सम्मानित किया।

आजकल संसद का मानसून सत्र भी चल रहा है। अविश्वास प्रस्ताव के दौरान मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के उठाये कुछ सवालों पर चुटकियों के साथ जवाब दिया था। राहुल ने इससे पहले राफेल विमान डील को लेकर पीएम और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण पर गंभीर आरोप लगाए थे। आज हुई बैठक से पहले अविश्वास प्रस्ताव पर मिली जीत के लिए मोदी का सम्मानित किया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में असम पर एनआरसी के अंतिम ड्राफ्ट पर विपक्ष के हमलावर रवैये पर भी चर्चा हुई और आगे की रणनीति पर विचार किया गया। असम के मामले में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को कहा था कि असम के लिए राष्ट्रीय नागरिक पंजीयन का मसौदा पूरी तरह “निष्पक्ष” है और जिनका नाम इसमें शामिल नहीं है उन्हें घबराने की जरुरत नहीं है क्योंकि उन्हें भारतीय नागरिकता साबित करने का मौका मिलेगा। सिंह ने कहा था कि यह सारी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की देख रेख में हो रही है।

उधर मोदी ने बैठक में जाते हुए उस समय एक संसद को अपने पेअर छूने से रोक दिया जब उसने ऐसा करनी कोशिश की। गौरतलब है कि मोदी को मिली धमकियों के मद्देनजर भी इस तरह की सुरक्षा बरती जाती है। हालाँकि यहाँ मोदी ने खुद संसद को पेअर छूने से रोका और हाथ से न करते हुए इशारा किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन संसद ने कुछ रोज पहले मोदी को पत्र लिखकर दलितों के प्रति व्यवहार को लेकर नाराजगी जताई थी। याद रहे प्रधानमंत्री कई बार कह चुके हैं कि कोई भी नेता उनके पैर न छुए। कुछ दिन पहले पीएम की पहल पर बाकायदा सरकारी सेक्युलर जारी हुआ था जिसमें किसी का स्वागत फूलों के गुलदस्ते से न करने को कहा गया था।

सबूतों की कमी के चलते पंचकूला हिंसा के सभी आरोपी बरी

हरियाणा के पंचकूला में यौन शोषण के दोषी और डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सीबीआई कोर्ट में सजा सुनाए जाने के बाद हुई हिंसा के मामले में सभी आरोपियों को सबूतों की कमी के चलते बरी कर दिया गया है।

अनुयायी ज्ञानीराम, संगा सिंह, होशियार सिंह, रवि, तर्सेम और राम किशन पर गुरमीत राम रहीम सिंह को बलात्कार का दोषी ठहराए जाने के बाद हुए दंगों में लिप्त होने का आरोप लगा था।

पंचकूला हिंसा के मामले में पंचकूला पुलिस ने एसआईटी गठित कर आरोपियों की धरपकड़ की और 19 आरोपियों के नाम एफआईआर नंबर 343 में शामिल किए गए थे। इन लोगों पर देशद्रोह व हत्या समेत अन्य धाराएं लगाई गई थीं।

राम रहीम को रेप के 2 अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया था। जिसके बाद 25 अगस्त को हिंसा भड़की थी। राम रहीम को 20 साल की सजा सुनाई गई थी। राम रहीम अभी रोहतक की सुनरिया जेल में बंद है।

असम में दूसरी नागरिकता सूची जारी, ४० लाख के पास भारतीय नागरिकता नहीं

आखिर में नागरिकता की दुसरी सूची सोमवार को जारी कर दी गयी। इसके मुताबिक एक बड़ी आबादी के पास भारत की नागरिकता नहीं है। असम की कुल आबादी 3.29 करोड़ है और सोमवार को असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की दूसरी और आखिरी सूची में 2.89 करोड़ लोगों की पहचान भारतीय के रूप में की गई है जबकि 40 लाख लोगों को असम का नागरिक नहीं माना गया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को कहा कि यह सारा प्रोसेस सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हुआ है लिहाजा इसमें किसी तरह की गड़बड़ की आशंका निर्मूल है। बहुत से लोगों ने आरोप लगाया है कि उनके परिवार में कुछ के नाम हैं कुछ के नहीं।

असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की दुसरी और अंतिम सूची सोमवार जारी कर दिया गया। इसे आॅनलाइन और राज्य के तमाम एनआरसी सेवा केन्द्रों (एनएसके) में सुबह दस बजे प्रकाशित कर दिया गया जिसमें उन सभी भारतीय नागरिकों के नाम, पते और फोटो होंगे जो 25 मार्च, 1971 से पहले से असम में रह रहे हैं। हालाँकि जो सूची आज जारी की गयी हैं उसमें संशोधन का अवसर अभी लोगों के पास होगा। इसके अलावा अंतिम उपाए के रूप में कोर्टका विकल्प भी उनके पास होगा।

राज्य में सुरक्षा कड़ी करते हुए तमाम डीसी और एसपी को कड़ी सतर्कता बरतने के निर्देश सरकार ने दिए हैं। सात जिलों- बारपेटा, दरांग, दीमा, हसाओ, सोनितपुर, करीमगंज, गोलाघाट और धुबरी में धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा लगा दी गयी है। रिपोर्ट के मुताबिक असम और पड़ोसी राज्यों में सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिये केन्द्र सरकार ने सीआरपीएफ की 220 कंपनियां भेजी हैं।

सरकारी अधिकारियों ने बताया कि जिनके नाम सूची में नहीं हैं उनके पास दावों की पर्याप्त गुंजाइश होगी। उन्होंने कहा – ” यदि वास्तविक नागरिकों के नाम दस्तावेज में मौजूद नहीं हों तो उन्हें (महिला/पुरूष) संबंधित सेवा केन्द्रों में निर्दिष्ट फॉर्म को भरना होगा । यह फॉर्म 7 अगस्त से 28 सितंबर के बीच उपलब्ध होंगे और अधिकारियों को उन्हें इसका कारण बताना होगा कि मसौदा में उनके नाम क्यों छूटे। इसके बाद अगले कदम के तहत उन्हें अपने दावे को दर्ज कराने के लिये अन्य निर्दिष्ट फॉर्म भरना होगा, जो 30 अगस्त से 28 सितंबर तक उपलब्ध रहेगा। आवेदक अपने नामों को निर्दिष्ट एनआरसी सेवा केन्द्र जाकर 30 जुलाई से 28 सितंबर तक सभी वर्किंग दिनों में सुबह 10 बजे से शाम चार बजे तक देख सकते हैं।

गौरतलब है कि कुछ दशक से बांग्लादेश से लाखों लोगों के अवैध घुसपैठ का दावा किया जाता रहा है। एनआरसी की पहली सूची 31 दिसंबर, 2017 को जारी हुई थी। पहली लिस्ट में असम की 3.29 करोड़ आबादी में से 1.90 करोड लोगों को शामिल किया गया था। अब 1.40 करोड़ लोगों को दूसरी सूची जारी की गयी है।