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छात्रों के लिए हरियाणा का अनूठा अभियान आएगी समृद्धि विदेशी भाषा से

हरियाणा सरकार ने छात्रों को कक्षा पहली से अंग्रेज़ी में पढऩे, लिखने और बोलने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से एक नई और अनूठी पहल की है। ”मुझे अंगे्रज़ी से डर नहीं लगता’’ कार्यक्रम के तहत छात्रों को हर दिन एक वाक्य सिखाने के लिए एक जूनियर बेसिक ट्रेनिंग अध्यापक और ब्लाक में एक ‘ब्लाक रिसोर्स पर्सन’ को प्रशिक्षित और नियुक्त किया गया है। पूरे अभ्यास का उद्देश्य प्रत्येक वर्ग में 10 महीने के लिए हर महीने न्यूनतम 20 वाक्यों को सिखाना है।

इस तरह की पहल करने वाला हरियाणा पहला राज्य बन गया है। अंग्रेज़ी भाषा अकादमिक और पेशेवर करियर में महत्वपूर्ण बन गई है, लेकिन अंग्रेज़ी में अच्छे संचार कौशल को विकसित करना चुनौतीपूर्ण है। सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेज़ी सीखने को आनन्ददायक बनाना है। जो खुशी के लिए पढ़ते हैं वे स्वायत्त भाषा सीखने वाले हैं, जो स्वंय को पढऩे में तल्लीन कर लेते हैं और उसे दिल से सीखते हैं उनके लिए भाषा सीखना एक सुखद अनुभव बन जाता है। इस प्रकार की पढ़ाई बहुत शक्तिशाली होती है क्योंकि आनन्द घटक किसी भी चिंता, दुख और समझने के डर के बिना भाषा सीखने का कारण बन जाता है।

प्राथमिक शिक्षा निदेशक राजनारायण कौशिक ने बताया कि सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे ”मुझे अंगे्रज़ी से डर नहीं लगता’’ कार्यक्रम का लाभ उठा सकेंगे। जिसका पहला उद्देश्य कक्षा पहली से अंग्रेज़ी भाषा को शुरू करना है। यह बच्चों को अंग्रेज़ी पढऩे, लिखने और बोलने में मदद करने के लिए अध्यापकों को सक्षम बनाता है।

पारंभिक शिक्षा निदेशक राजनारायण कौशिक के अनुसार यह कार्यक्रम 180 प्राथमिक स्कूलों में शुरू किया गया है और मौजूदा अकादमिक सत्र में इसे 238 और स्कूलों में शुरू किया जाएगा।

1000 वाक्यों वाली एनसीईआरटी की एक किताब तैयार की गई है। इसमें ग्रेड एक से ग्रेड पांच तक प्रत्येक ग्रेड के लिए 200 वाक्य हैं। एक प्राथमिक अध्यापक और ब्लाक रिसोर्स पर्सन को छात्रों को एक वाक्य हर दिन सीखने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इस तरह छात्र अगले स्तर तक कम से कम 1000 वाक्यों को पढऩे और लिखने में सक्षम बन जाएंगे।

इसके अलावा राज्य भर में चयनित मॉडल संस्कृति स्कूलों में डिजिटल भाषा सीखने और छात्रों को सुनने, बोलने के कौशल में सुधार करने के लिए छह भाषा प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं। ऐसी कई प्रयोगशालाएं बाद में अन्य स्कूलों में भी स्थापित की जाएंगी। एनजीओ ‘हुमाना पीपल टू पीपल इंडिया’ के साथ साझेदारी में 180 प्राथमिक स्कूलों में इसे शुरू किया गया है जिसने कक्षा पहली और दूसरी के बच्चों को बैग फ्री बना दिया है उन्हें लार्कस प्रदान किए गए हैं। धीरे-धीरे राज्य के अन्य स्कूलों में भी भाषा प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी। राज्य के चयनित 180 सरकारी प्राथमिक स्कूलों में प्रथम और दूसरी श्रेणी के लिए बैग मुक्त अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल शुरू किए गए हैं। इसके अलावा सकेण्डरी शिक्षा विभाग ने 310 चयनित स्कूलों में कक्षा नौवी से विज्ञान और गणित की पुस्तकें अंग्रेज़ी में शुरू की हैं।

पिछले साल उत्तराखंड सरकार ने भी इस तरह की मुहिम शुरू की थी। राज्य के 18000 स्कूलों में विभिन्न चरणों में आदेश देने के माध्यम को हिंदी से अंग्रेजी में बदला गया था।

”मुझे अंगे्रज़ी से डर नहीं लगता’’ हरियाणा सरकार का यह नारा और उद्देश्य एक बार समस्या की पहचान के साथ -साथ इसे सुलझाने का एक संभावित तरीका भी बताता है। शिक्षा की वार्षिक रिपोर्ट जो कि ग्रामीण इलाकों में बच्चों के सीखने का अनुमान लगाती है, उससे पता चला है कि ग्रामीण इलाकों में अंग्रेज़ी में सरल वाक्यों को पढऩे की छात्रों की क्षमता अच्छे स्तर की नहीं है। 2016 में कक्षा तीन के केवल 32 फीसद छात्र भाषा के सरल वाक्य पढ़ सकते थे। आमतौर पर सह सभी प्राथमिक कक्षाओं के मानदंड हैं। इस तरह की रुकावटों को दूर करने की तत्काल आवश्यकता है।

इस पहल का उद्देश्य बच्चों को दुनिया और नौकरी बाजार का सामना करने के अनुकुल बनाना है। डिजिटल सीखने की सुविधा और छात्रों के सुनने और बोलने के कौशल में सुधार के लिए राज्य में छह प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं।

खूनी मौसम के खिलाफ ‘पोस्टर वार’

शशि नारायण ‘स्वाधीन’ समाज से जुड़े कवि थे। हैदराबाद के एक दैनिक में ज़मीनी स्तर पर बतौर संवाददाता काम करते हुए उन्होंने कइयों के चेहरे पर चिपकते- उखड़ते चेहरों की परतें देखी। लोकतंत्र, धर्म और पाखंड के जरिए समाज से धन उगाही और समाज के कमज़ोर वर्ग को हाशिए पर खड़ा रखने के तौर-तरीकों को उन्होंने जाना समझा। उन्होंने बेहद ईमानदारी, संवेदनशीलता और ऊष्मा के साथ कविताएं रची।

अहिंदी भाषी शहर हैदराबाद में रहते हुए उन्होंने तेलुगु, हिंदी,उर्दू और अंग्रेज़ी सीखी और समाज के दबे- कुचले लोगों की आवाज़ को अपनी धार दी। तेलंगाना मुक्ति संग्राम के वे एक कवि सिपाही थे।

स्वाधीन के कविता संग्रहों में ‘पोस्टरवार’ ग्यारहवां कविता संग्रह है। उनकी लंबी-कविता ‘पोस्टरवार’ है जो जहां संसदीय विसंगतियां उभरती नज़र आती है। समाज में इंसान ही इंसान की मदद करता है लेकिन उसे पिछले कुछ समय से जिस तरह धर्म, संप्रदाय, जाति में बांट कर एक दूसरे से डराने की प्रवृति शुरू हुई है उसका उन्होंने हमेशा विरोध किया। उन्होंने लिखा है-

समय की धीमी आंच पर

पक रहा है जो घाव

वह तुम्हारी

धर्म की राजनीति की देन है।

कोई भी धर्म इस मुल्क में

आदमी से अधिक ऊँचा कहलाता है।

जब आदमी ही नहीं होगा तो धर्म का क्या मतलब। यह समझाने की कोशिश स्वाधीन ने अपनी कविताओं में की है। यह उनकी विशेषता है। आप देखिए-

ठंड से बचाती है

जिस तरह आग

कविता मेरे साथ रही।

मैंने आवाज़ लगाई

सूरज का रथ रुका नहीं

दौड़ता चला गया

मैं अपने पथ पर

अकेला चलता रहा

तमाम संकेतों के बावजूद।

स्वाधीन ने जनसंघर्ष का एक महत्वपूर्ण माध्यम पोस्टरवार को माना है। यदि तेलंगाना आज साकार हो सका तो उसमें शाशि नारायण ‘स्वाधीन’ की आहुति भी कम महत्व नहीं रखती है। अपनी कविताओं के जरिए वे लगातार पोस्टरवार में शामिल रहे। वे तेलंगाना मुक्ति संग्राम में हमेशा सक्रिय थे। उनकी कविताएं तेलंगाना के जन-जन को साथ लेती हंै। उन्हें लंबी लड़ाई के लिए तैयार करती हैं।

उनकी कविता प्रतिबद्ध इंसानों की कविता है वह रंगीन प्रासादों की मद्धिम होती रोशनी में वासना के रंगों में प्रतिबिंबित नहीं होती। उनका प्रेम हकीकत की भूमि पर होता है। उनकी सोच है कि जिस दिन प्रेम इस दुनिया का मिजाज बन जाएगा, उस दिन यह दुनिया रहने लायक हो जाएगी। स्वाधीन की प्रेम कविताएं सपनों में हकीकत का रंग भरती दिखती है।

पिछली यादों में

खिड़की से

लफ्ज़ तुम्हारे

मुझ तक आकर

पीली धूप पहन लेते थे।

स्वाधीन की कविता हमेशा संघर्षशील लोगों को लडऩे और आगे बढऩे के लिए उत्साहित करती है।

लड़ो

और आगे बढ़ो

जिसने तुम्हारी सोच को

ताबूत में सुलाना चाहा

उसके इरादों में कील ठोंक दो

यह समय

तपते लोहे के सुर्ख होने का है

कड़ी धूप सह कर

करना है हमें सूरज का मुकाबला।

उर्दू हिंदी की प्रगतिशील कविताओं और कवियों में ज़्यादातर से उनका निजी परिचय था। हैदराबाद में हिंदी-उर्दू मुशायरों और हिंदी मुस्लिम एकता का परचम लहराने वालों में वे और उनके साथी अहमद फरीदी नवाब, मकदूम मोहियुद्दीन हैदराबाद के ही बड़े शायर सक्रिय दिखते थे। उन्होंने हैदराबाद में बरसों पहले तरक्की पसंद शायरी की ज़रूरत जताई थी, और जो लोकप्रिय भी थे। उन्हीं की दिखाई राह पर शशि नारायण स्वाधीन और अनगिनत कवि- रचनाकार चले। लेकिन स्वाधीन में बदलाव का जो ज़ज्बा उनमें और उनकी रचनाओं में था उसके चलते उनकी पूरी जिंदगी ज़रूर संघर्ष में गुजरी लेकिन आने वाली पीढिय़ों के लिए वे अपनी रचनाओं में ज़रूर सुगंध छोड़ गए जिनसे अगली पीढ़ी को आगे बढऩे की राह मिल जाती है।

शशि नारायण ‘स्वाधीन’

जन्म-15 मई 1966 निधन -21 जुलाई 2018

कुछ कविताएं

मौजूदगी

एक पुराना दिन

तुम्हें

बाहों में समेटे आज

खिड़की में खड़ा है।

मैं तुम्हें छूता हूं

अनुभवता हूं

बिछड़ा पल संजोता हूं।

सहभागी है

सिर्फ समय

डर

यह दुनिया

न्यूक्लियर बेड़े के डर से

रजाई में दुबकी पड़ी है।

आंखों में ख्वाब लहू लहू

ख्वाहिशें फिर भी

तुम्हारी बांहों सी खुलती जाती हैं।

दरवाजे बंद हैं।

चक्र

शहर के चारागर1

जाने किस वास्ते

मेेरा पता पूछते ही नहीं।

मेरे दिल में रकम2

आरजू3 की कहानी

जो तुम से जुड़ी है

अपने खात्मे पर

किसी और चेहरे से जुड़ जाएगी।

यूं ही फलक दर फलक

सूरज की लाली

रात के स्याह हाथों से मिट जाएंगी।

वे मुजाहिद4 के जिसने

मुल्क के वास्ते

सब कुछ त्यागा

कल हमें छोड़ कर

अपने मिट्टी के मंका से

चला गया है।

शहर पहले भी तन्हा था

तन्हा है अब भी

जिसकी बेदार आंखें

सवालों में गुम

आज हमें देखती हैं

ये गली भी किसी रोज़ सो जाएगी।

वक्त बढ़ता रहेगा बरसा बरस

अजनबी रास्तों की हवा में कहीं

याद की लौ किसी रोज़ बुझ जाएगी।

धुंध में रास्ते सिमट जाएंगे

मंजिलें दूर कदमों से हो जाएंगी

फिर आएगी कोंपल पे इक दिन बहार

फिर बारिश में मिटृटी संवर जाएगी

धूप निकलेगी ख्वाबों की फिर से यहां

बीज रस्तों में दुनिया के बो जाएगी।

शब्दार्थ:

  1. चिकित्सक 2. निहित
  2. इच्छा 4. स्वतंत्रता सेनानी

नई सदी की लड़की

तुम नई सदी हो

तुम्हारे अंदर मेरा पिछला

वक्त छिपा है।

तुम्हारा चेहरा

नई सुबह की मुस्कुराहट

चांद के भीतर छिपी

मेरी इबारत

जेहन में इक गुलाबी रंग सा

लहरा रहा है।

रेज़ा रेज़ा

कोई जैसे तस्वीर तुम्हारी बना रहा है।

मैं अपने लहू की गर्दिशों में

रोज तुम को पा रहा हूं

उंगलियों का लम्स1 तुम्हारा

मेरे बदन को जगा रहा है।

ये लम्स जैसे

इक आग है

जो दिल के पर्वत पर जागती है

तो जमीं से आस्मां तक

परिंदों की जुबान बन कर

फासलों को नापती है।

जो तुम है वो तुम हो

जो मैं है वो मैं हूं

इन्ही जाबियों2 में

ये छोटा सा घर है

अपना सफर है।

शब्दार्थ:

  1. स्पर्श 2. कोणों

जान लेने के लिए क्या सोशल मीडिया ने उकसाया?

भीड़ के हाथों हत्या के बढ़ रहे मामलों में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। आरोप है कि यह अफवाहों को गति देता है और भीड़ बिना छानबीन किए किसी को भी अपना शिकार बना लेती है। अब बच्चा चुराने की अफवाहों ने सबसे ज्यादा जानें ली है। नंदिता सेनगुप्ता की रिपोर्ट

सोशल मीडिया पर ‘बच्चे चुराने वालोंÓ के बारे में संदेश वायरल हुआ इसने आसाम, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश समेत नौ राज्यों में न केवल 27 लोगों की जान ले ली। बल्कि यह भी प्रश्न छोड़ दिया कि भारत में इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की बढ़ती संख्या के साथ क्या सोशल मीडिया अच्छे की बजाए बहुत बुरा कर रहा है।

अगर आंकड़ों पर विश्वास करें तो भीड़ द्वारा हत्या अधिकतर राज्यों में नई बात नहीं हैं। सोशल मीडिया के अविष्कार और इस्तेमाल से पहले भी ‘डायनÓ बताकर निर्दोष लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया जाता था। मुख्य रूप से इसका निशाना महिलाएं होती थी।

नेशनल अपराध ब्यूरो (एनसीआरबी) के आकंड़ों के आधार पर गृह मंत्रालय का कहना है कि 2016 में ‘जादू-टोनेÓ करने की अफवाह में 134 लोगों की हत्या कर दी गई। झारख्ंाड में ऐसी अधिकतम 27 हत्याएं हुई ओडिशा (24), मध्यप्रदेश (19), छत्तीसगढ़ (17) गुजरात (14) और तेलंगाना(11) आसाम, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी इस तरह के मामलों की सूचना है।

2016 में भीड़ द्वारा हत्या के आठ मुख्य कारणो में ‘जादू-टोनाÓ एक मुख्य कारण था। इसके अन्य कारण सड़क पर हिंसा, अतिवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, डकैती, बलात्कार, वर्ग संघर्ष और राजनीतिक हैं।

एनसीआरबी की 2015 की रिर्पोट के अनुसार इस तरह के मामलों की संख्या 2014 में 157 थी जिसमें से ऐसी 30 फीसद (127) हत्याएं अकेले झारखंड राज्य के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में हुई इसके अलावा ओडिशा (32) मध्यप्रदेश (24) और छत्तीसगढ़ (16) में ऐसे मामले सामने आए। ब्यूरो ने बताया कि 2000 और 2012 के बीच इस तरह की 2097 हत्याएं हुई इनमें ‘जादू-टोनाÓ मुख्य कारण था।

भारत के ग्रामीण इलाकों में भीड़ के हमले के मामलों में पुलिस जांच से पता चला है कि इन सब मामलों में एक जैसी मानसिकता रही है चाहे आसाम के चाय के बगान हों या ओडिशा, झारखंड़ के खदान।

एक युवा वकील सीमा झुइंया ने गुवाहटी उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है जो विशेष रूप से भीड़ के हाथों हत्या के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करती है। उनका तर्क है कि ”हमारे कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के साथ दंडित नहीं किया जा सकता। अगर कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसे कानून की स्थापित प्रक्रिया से गुज़र कर ही दंडित किया जा सकता हैÓÓ।

उसने कहा, हालांकि आजकल देखा गया है कि लोग अक्सर भीड़ तंत्र की तरफ जाते हैं और व्यक्ति को बिना किसी कानूनी प्राधिकार प्रक्रिया के दंड दे रहे हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन सरंक्षण एक महत्वपूर्ण अधिकार है और राज्य को इसकी रक्षा करनी चाहिए। भीड़ के हाथों हत्या की ऐसी घटनाएं सविधान की धारा 14 और 21 के उल्लंघन का नतीजा है। इस तरह की घटनाएं हमारे लोकतंत्र पर धब्बा हंै। क्योंकि हमारे पास लोकतंत्र है भीड़तंत्र नहीं। यह जनहित याचिका जून महीने में दायर की गई है। जनहित याचिका को इस साल जून में दो युवाओं की हत्या के बाद दायर किया गया।आसाम के करबी एंग्लोंग जि़ले के एक गांव में दो युवाओं नीलोटपाल और अभिजीत नाथ को 250 लोगों की भीड़ ने बच्चे चुराने वाला होने के शक में पीटकर मार डाला।

एक युवक ने ग्रामीणों को सूचित किया था कि उनके गांव पनीजुरी से बच्चा चुराने वाले दो युवाओं (दास और नाथ) ने एक लड़के का अपहरण कर लिया है और उसे अपनी गाड़ी में ले जा रहे हैं तो ग्रामीणों ने नोलोटपाल और अभिजीत को उनकी काले रंग की गाड़ी से बाहर घसीट लिया और उनकी हत्या कर दी।

जादू टोने के मामले

झारखंड

झारखंड के खुंती जि़ले के दादगामा गांव में अज्ञात लोगों की भीड़ ने एक बुजुर्ग युगल पर हमला किया और डायन होने का आरोप लगा कर उन्हें मार डाला और बुजुर्ग महिला का सिर काट दिया। छह अज्ञात लोगों के गिरोह ने पीडि़त जिनकी पहचान सतरी मुंडा (55) और उनकी पत्नी जवनी देवी(50) के रूप में हुई है उनके घर में घुस कर उन पर हमला किया। जब बच्चेे डर कर रोने लगे तो भीड़ ने बच्चों को धमकाया और अपमानित किया। पुलिस ने इस भयानक हमले के बाद कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया। जिनमें से कुछ को जमानत मिल गई क्योंकि पुलिस उनके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने में विफल रही। झारखंड जादू टोने के मामलों की जांच के लिए विशेष कानून रखने वाले सात राज्यों में से एक होने के बाद भी आदिवासी समाज प्रचलित अंधविश्वास के कारण इस तरह के मामलों से संघर्ष कर रहा है।

असम

असम में हुए इस तरह के संदिग्ध हमलों में एक अक्तूबर 2014 में करबी एंग्लोंग जि़ल में एथलीट देवजानी बोरा पर हुआ हमला और अप्रैल 2017 में कोकराझार जि़ले में एक आदिवासी युगल की हत्या का है। कोकराझार जि़ले के पलाशगुड़ी गांव में यह हमला तब हुआ जब वे अपनी झोपड़ी में सो रहे थे। उनके बच्चों को दूसरी झोपड़ी में बंधक बनाया गया था क्योंकि वे मदद के लिए चिल्ला रहे थे। तब से नागाओं जि़ले के अनाथालय में इन पांच बच्चों की देखभाल की जा रही है। 2016 में गुहाटी हाईकोर्ट के कहने के बाद राज्य विधानसभा ने ‘डायन-विरोधीÓ कानून पास किया जिसे हाल में केंद्र से मंजूरी मिली है।

ओडिशा

ओडिशा के कयोंझर जि़ले के गांव मुंडाशाही में 40 वर्षीय आदिवासी गुरू मुंडा के परिवार पर हुआ हमला ‘डायनÓ बता कर किए गए हमलों में से एक था। ओडिशा में झारखंड के बाद सबसे ज़्यादा डायन हत्या के हमले हुए हैं। मुंडा उनकी पत्नी बुद्धिनी, दो बेटियां और दो बेटों की 30 मिनट की अवधि में क्रूरता से हत्या कर दी गई थी। पुलिस के अनुसार ओडिशा के 2014 ‘विच हंटिगÓ रोकथाम अधिनियम का केंद्र महिलाएं थी, परन्तु कई मामलो में पुरूषों को भी पीडि़त पाया गया है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जिसने कुछ साल पहले डायन-हत्या और अन्य अंध विश्वासों, प्रथाओं के खिलाफ कानून बनाने की कोशिश की। यह कुछ धार्मिक समूहों के विरोध के कारण प्रारंभिक स्तर पर असफल रहा, वे यह मानते थे कि कानून को धार्मिक रीतियों और पुरानी परंपराओं से दूर रहना चाहिए। 2013 में राज्य में बने मानव बलि और अन्य अमानवीय बुराईया, अघोरी प्रथाओं की रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम के बाद राज्य में डायन हत्याओं के हमलों में गिरावट आई है।

डायन हत्या

 कम से कम 12 राज्य ‘डायन हत्याÓ की गिरफ्त में है। कुछ ने इस तरह के खतरनाक प्रथा के मूल कारणों को समझने की कोशिश की है। एक एनजीओ ‘पार्टनर फॉर ला इन डेवलमेंटÓ ने अध्ययन किया कि डायन हत्या की जड़ें वित्तीय विवाद, अंधविश्वास, पितृसत्ता, और अन्य व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्ष में निहित है। अक्सर ये संघर्ष पीडि़त और उसके रिश्तेदारों, दोस्तों या परिचितों के बीच ईष्र्या और तनाव के कारण उत्पन्न होते हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों में उचित चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण अक्सर लोग ओझा का सहारा लेते हैं, जो अक्सर गांव में एक परिवार या महिला को डायन के रूप में दोषी ठहराते हैं। जिसके परिणामस्वरूप इस तरह की हत्या होती है। दंड का दायरा घरों से निर्वासित करने से लेकर मौत की सज़ा तक होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

गुवाहाटी मेडिकल कालेज और अस्पताल की मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेसर दीपांजली मेधी का कहना है कि ग्रामीणों की खराब आर्थिक-सामाजिक स्थिति के अलावा, आतंकवाद, दंगे, और हिंसक आदोलन और कानून लागू करने वाली एजेसियों की इस तरह के अपराध में शामिल लोगों का दंडित करने में विफलता लोगों को ‘तत्काल न्यायÓ के लिए कानून को अपने हाथों में लेने के लिए उकसाती है।

उन्होंने कहा, जब लोग दूसरों को गोली मार कर हत्या कर देते हंै, बम विस्फोट में मौंते होती हैं और अक्सर पीडि़त को न्याय नहीं मिलता तो मृत्यु का डर कम हो जाता है और वे

तत्काल कानून न्याय के लिए अपने हाथों में ले लेते हैंÓ।

कानूनी सुरक्षा

मुंबई के एक वकील सदाशिव नारलेकर जो भीड़ हिंसा के पीडितों के लिए कार्य कर रहे एक एनजीओ के साथ काम कर रहे हैं उनका कहना है कि हाल में हुई हत्याओं के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग वजह है। अधिकतर ग्रामीण सच्ची और झूठी खबरों के बीच अंतर करने में असमर्थ हैं, और इस प्रकार के संदेशों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। वे जल्दी से कार्रवाई में कूद जाते हैं- यह बच्चा चुराने वाले और डायन के रूप में पहचाने गए लोगों पर हमला कर देते हैं। उन्होंने कहा,’ लोगों का एक ऐसा वर्ग जो सोशल मीडिया का ज्ञान रखता है इस तरह की स्थिति का लाभ उठाता है। किसी से बदला लेने के लिए और परिवार के प्रत िव्यक्तिगत असंतोष के लिए।Ó

अभी हाल में करबी एंग्लोंग जि़ले में दो युवकों की हत्या की जांच में भी यही तथ्य सामने आया। एक युवक जिसकी इस हत्याकांड में मुख्य आरोपी के रूप में पहचान और गिरफ्तारी हुई उसने पुलिस को बताया की नीलोटपाल और अभिजीत के साथ उसका छोटा सा झगड़ा हुआ। उसने ग्रामीणों को बताया कि दोनो बच्चों को चुराने वाले हैं। ग्रामीणों ने उसका भरोसा किया और उन दोनों को पकड़ लिया और मार डाला।

एशियाई मानव अधिकार आयोग, हांगकांग स्थित मानव अधिकार संगठन ने कहा कि,’भारत में भीड़ द्वारा हत्या को अपराधी सिद्ध करने और दंडित करने के लिए कोई विशेष दंड कानून नहीं है, इसलिए ऐसी गतिविधियों और हत्याओं में भाग लेने वाले भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत ही लाए जाते हैं। एनजीओ ने बताया कि,’ यहां हत्या के लिए धारा 302, गैर इरादतन हत्या के लिए धारा 304, हत्या का प्रयास करने के लिए धारा 307, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के लिए धारा 323, धारा 325 जानबूझ कर गंभीर चोट पहुंचाने के लिए और जब बड़ी संख्या में लोगों के समूह द्वारा अपराध करने की बात आती है तो धारा 34 आम इरादे के लिए, धारा 141 गैर कानूनी ढंग से इक_ा होने के लिए, आपराधिक षडय़ंत्र के लिए धारा 120 बी के साथ ही दंगों को अपराधी बनाने वाले प्रासंगिक वर्ग भी शामिल है।

इस दौरान भारत में एनजीओ ने नेशनल अभियान बैनर के तहत भीड़ के हाथों की गई हत्या के खिलाफ और दंड के लिए एक अभियान शुरू किया है।

मुख्यमंत्री की शिक्षिका पत्नी ने लगाई गुहार

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने पिछले जनता दरबार में एक शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा के फरियाद पूरी सुने बिना ही उसे कस्टडी में लेने का हुक्मनामा सुना दिया था। अब मुख्यमंत्री की शिक्षिका पत्नी सुनीता रावत ने गुरू वार देर रात डालनवाला थाने में एक मुकदमा अपने कथित विरोधी पर दर्ज कराया है। यह कथित विरोधी हैं भाजपा के पूर्व कार्यकर्ता सुभाष शर्मा।

यह मुकदमा सुभाष शर्मा, निवासी औली रोड, रायपुर के खिलाफ है। एसएसपी निवेदिता कुकरेती अनुसार सुभाष शर्मा ने सोशल मीडिया के साथ ही प्रेस मुलाकात मेें सुनीता रावत की शैक्षिणक योग्यता पर सवाल उठाए थे। पिछली 30 जून को सुभाष शर्मा ने शिक्षा विभाग को कटघरे में लेते हुए कहा था कि सुनीता रावत की शिक्षा तय मानकों के अनुरूप नहीं है। उनकी योग्यता भी तदनुसार नहीं है। ऐसे में उनकी नियुक्ति गलत है।

शर्मा ने सोशल मीडिया, फेसबुक और कई दूसरे माध्यमों पर दावा किया था कि सुनीता रावत को यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के रहमोकरम पर टीचर की नौकरी मिली थी। उनके शैक्षणिक दस्तावेज भी फर्जी हैं।

अपनी तहरीर में सुनीता रावत ने लिखा है कि वे 1992 से शिक्षा विभाग में सेवारत हैं और वर्तमान में अजब-पुरकलां में तैनात हैं। इसके पहले वे गौडल, कालसी, और खिर्सूं पौड़ी गढ़वाल के स्कूलों में ड्यूटी निभाती रही हैं। उनकी छवि को धूमिल करने और शिक्षा विभाग के प्रति गलत माहौल बनाने की यह साजिश है।

पुलिस ने तत्काल सुभाष शर्मा के खिलाफ धारा 569, 504 और 66 आई टी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया हैं। पूरे मामले की तहकीकात की जिम्मेदारी इंस्पेक्टर डालनवाला राजीव के सिपुर्द की गई है। एसएसपी के अनुसार जांच पूरी होते ही कार्रवाई की जाएगी।

शिक्षा ही काटेगी सांप्रदायिकता का जाल

मुस्लिम समाज के मुद्दों को लेकर कानूनों में बदलाव किए जा रहे हैं। उन पर भी बहस। और लाजिमी है कि कोई मौलवी भड़केगा, किसी महिला पर। महिला भी बोलेंगी, भाषा व व्यवहार अभ्रद होगा, हाथापाई होगी। अब चैनलों को एक और मुद्दा मिलेगा बहस का। मुद्दे ऐसे उठाओ जिसमें मुसलमान भी आपस में लड़ते रहे टीवी चैनलों पर। ऐसे मुद्दों पर बहस कराओ जो सुनने में तो सही लगते हैं किंतु उसमें मुस्लिम समाज का अंतर्विरोध उनकी कमियां निकल कर आएं। आपस में ही लड़ाओ और फिर मजे लेते रहो कि देखो मुसलमान तो होते ही ऐसे है। ऐसा लगता है जैसे सारी बुराईयां मात्र मुस्लिम समुदाय में ही हो।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज दंगों के आरोपी से जेल में मिलते हैं और कहते हैं कि ”गिरफ्तारी नहीं सौहार्द चाहिएÓÓ। दूसरे केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा झारखंड हत्याकांड के आरोपियों को उनके मतदाता होने के कारण मिलते हैं, फूलों की माला डाली जाती है। सही बात है सौहार्द की ही तो ज़रुरत है आज देश में। मगर सत्ताधारी दल की ओर से दर्द, इंसानियत, शराफत औऱ ताजातरीन राष्ट्रीयता की परिभाषाएं अब धर्म देख कर बनाई जा रही हैं।

22 जून 2017 को हरियाणा में चलती ट्रेन में चाकू से गोद कर मारे गये 17 साल के हाफिज जुनैद की मां के शब्द बार-बार मुझे कोचते हैं। साल बाद इस ईद पर उनको मिला। इस ईद पर भी वह उतनी ही मायूस थी। उसकी मायूसी व्यवस्था को लेकर ज़्यादा थी कि कैसे अपराधी लोगों को अदालतें छोड़ रही हैं जिन्होंने एक बच्चे की इस तरह हत्या की। खुदा न करे किसी के साथ ऐसा खेल हो। आखिर उन पर दवाब किस बात का है? क्या अपने बच्चे के लिए भी वैसा ही दबाव महसूस करते?

दुबारा मिलने पर उन्होंने कहा कि गांव के कुछ लोग दवाब देते हैं समझौता करने पर किन्तु जब तक हमारी जिं़दगी रहेगी हम अपने बच्चे के लिए इंसाफ के लिए लड़ेंगे। हाफिज जुनैद के हत्यारों में से एक को छोड़ बाकी को अदालतों ने जमानत दे दी।

18 जून 2018 में हापुड़ के गांव में जिस तरह कासिम जो तथाकथित रूप से जानवर के कत्ल का दोषी मानकर मंदिर से एलान किया और जिस वहशीपन से उसकी हत्या की गई वो हत्यारों के बनाये विडियो से मालूम होता है कि एक इंसान तड़प रहा है और बहुत से युवा लड़के उसका वीडियो बना रहे हैं, चारों तरफ खड़े होकर उसे गालियां दे रहे हैं। 62 साल के सैमुद्दीन की दाढ़ी पकड़ कर उसे झूठ सच स्वीकार करने को कहा जा रहा है।

इसी विडियों पर पिलखुआ के थानाध्यक्ष लक्ष्मण वर्मा जी ने ‘अमन की पहलÓ के प्रतिनिधि मंडल को बताया कि वे इन सब युवाओं की मांओं को ढाई घंटे समझाकर, बिना किसी गिरफ्तारी किए लौटे हंै। वे 23 जून को उसी दिन कासगंज से यंहा ड्यूटी पर आए। वर्मा कासगंज की घटना पर बनी एसआईटी में थे।

उत्तर प्रदेश के कासगंज में 26 जनवरी को तिरंगा यात्रा के नाम पर जो उन्मादी घटना हुई, जिसमें चुनौती देकर 60 से ज्यादा बाइकर्स पतली सी गली वाले मुस्लिम मोहल्ले में घुसते हैं और वहां चल रहे तिरंगे के कार्यक्रम को बाइक से पार करने की कोशिश करते हैं। जिसके बाद लोगों के दबाव में वह बाइकों को छोड़कर भागते हैं और शहर में दूसरी जगह मुसलमानों पर हमले होते हंै। दुकानें जला दी जाती है। गिरफ्तार 60 के करीब गरीब मुसलमान हुए।

इस तिरंगा यात्रा में नेतृत्व कर रहे एक युवक चंदन की गोली से हत्या होती है जिस के जुर्म में दो मुसलमान जो इलाके के रसूख वाले व्यापारी परिवार से संबंधित हैं को गिरफ्तार किया जाता है। स्वर्गीय चंदन को तुरंत मुख्यमंत्री के यहां से लाखों की सहायता दी जाती है। हम मानते है कि मिलनी भी चाहिए। किन्तु उसी समय चली गोली में घायल अहमद जो कि एक हिंदू पत्थर वाले के यहंा पत्थर ढुलाई का काम करता था उसका ब्यान तक नही लिया गया किसी तरह की सहायता तो दूर की बात। वर्मा पिलखुवा हत्याकांड में शामिल लोगों को समझा कर लौट आए।

2015 में हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव में एक मस्जिद के साथ ही देवी का एक स्थान गांव वालों ने बनाया इसी बात पर झगड़ा करके मस्जिद पर हमला हुआ मुसलमानों के घर पर हमले हुए घर जला दिए गए स्वर्गीय न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर के साथ हमने घरों की दीवारों को देखा और पाया सभी घर पूर्व योजना के तहत जलाए गए थे हालत इतनी गंभीर थे कि मुस्लिम महिलाओं और परिवारों को महीनों थाने में शरण लेनी पड़ी।

अभी ये चंद डरावनी घटनाएं हैं जहंा मातमपुर्सी में जा पाया। मुश्किल यह होती है कि आप कहीं खड़े हैं कोई बात शुरू करें बात तुरंत मुसलमान के ऊपर आ जाती है। चाहे वह देश के विकास का मसला हो, वह चाहे राम रहीम या आसाराम जैसे तथाकथित साधुओं का हों इस बात के लिए आरएसएस व भाजपा का आईटी सेल बहुत मेहनत से काम करता रहा है। पिछले 70 साल की बोई फसल को 4 साल में जिस तरह सरकारी खाद पानी से, नीतियों से, आभासी दुनिया से जिस तरह लहलहा दिया गया है वह कभी बदल पायेगा? यह एक बड़ा प्रश्न है इतिहास नई करवट ले रहा है।

इंदिरा गांधी के खिलाफ आपात्तकाल में आरएसएस को साथ लेना एक ऐतिहासिक भूल जय प्रकाश नारायण ने की। वे नही जान पाये की आरएसएस के नेता इंदिरा से पूर्ण सहयोग का वादा करके जेल से बाहर निकलने के माथा रगड़ रहे थे। जनसंघ के साथ बनी जनता दल की सरकार के समय जो सांप्रदायिकता का बीज सरकारी अमलों में फैलाया गया वो पेड़ बन कर भारत की पूरी धर्मनिरपेक्ष धरती को ढक गया है। जेपी यह नहीं भाप पाए थे कि आरएसएस कितने छद्मी भेष बदलकर काम करती है। अब सब सामने आ गया है। 2014 से जिस तरह आरएसएस का महिमामंडन हुआ है, हिंदू राष्ट्र की उनकी कल्पना जैसे साकार होती दिख रही हो।

यूपी बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी जैसे लोग भी नई सरकार के तलवा चाट बन रहे हैं। तीन तलाक जैसे मुद्दों पर जो कि सुनने जानने में तो बहुत प्रोग्रेसिव लगता हैं, किंतु असल में मुसलमानों को विभाजित करना, प्रताडि़त करना उसका एक छुपा उद्देश्य है। पिछले 4 सालों में कहीं भी दक्षिण भारत की देवदासी प्रथा पर कोई प्रहार नहीं है, जिक्र तक नहीं। दूसरी तरफ खोद-खोद कर मुसलमानों की धार्मिक आस्थाएं, उनके रहन सहन की, खाने पीने के, सामाजिक तौर तरीके, परंपराएं, पहनावे सब पर आलोचनात्मक खुली चर्चा हो रही है। मुस्लिम त्योहारों तक पर गंदगी की गई है। इंदौर की एक महिला विधायक ने बकरईद पर बकरे की जगह अपने बच्चे की कुर्बानी देनी चाहिये जैसी घटिया बात तक उछाली।

देश के पूरे ताने-बाने को हिंदू-मुसलमान में पुरजोर तरीके से बुनने की कवायद चालू है। अब जैसे-जैसे 2019 चुनाव नजदीक आएंगे यह गंदगी और बढ़ेगी।

हत्याओं जैसे मुद्दे पर भी मुसलमानों की कहीं कोई उत्तेजित प्रतिक्रिया नहीं आई। आरएसएस यह मानकर खुश हो सकती है कि मुसलमान उनसे डर गए। वैसे वह भी चाहती है कि कहीं कोई मुसलमान इन सब बातों से परेशन होकर गोली चला दे या बम चला दे मुसलमानों की सब्र को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि सब्र टूटे ताकि फिर वह मुसलमानों पर आक्रमक पलटवार कर सकें। आरएसएस मुखिया भागवत के शब्दों में आरएसएस के स्वयंसेवक युद्ध के लिये तीन दिन में तैयार हो जाएंगे। वह जानते हैं सीमा पर काली टोपी वाले कभी नहीं जा सकते। पिछले 4 साल में 70 साल के फैलाये जहर का सफल परिक्षण किया गया है। नतीजे में कहीं भी बिना किसी लंबी तैयारी किये, भीड़तंत्र खड़ा करके गाय के नाम पर हमले करने पर जो सफलता हासिल की है उससे वे आश्वस्त हैं कि हिंदू राष्ट्र के लिए संघर्ष करने को आरएसएस तैयार हैं। देश भर में आरएसएस किसके खिलाफ रोज हथियारबंद होकर अभ्यास करता हैं। हिंदू आतंकवाद शब्द पर वह बिलबिला जाते हैं यह बिलबिलाना ही बताता है कि हिंदू आतंकवाद देश में बहुत तेजी से फैला है। भीड़तंत्र का नाम बहुत हल्का नाम है। ये हिंदू आतंकवाद है। आरएसएस की सफलता ये भी रही कि उन्होंने जो भी काम किए अब उनको बदलने की हिम्मत विपक्षी दलों की नहीं रही बल्कि उन्होंने कांग्रेस के हिंदू चेहरे को उभारा है।

26 जनवरी 2018 की कासगंज की घटना हो या गाय के नाम पर देश भर में हुई हत्याएं। इसमें विपक्षी दल कांग्रेस बसपा समाजवादी पार्टी भी चुप नजर आई है। आखिर मुजफ्फरनगर समाजवादी पार्टी के समय की ही देन है हिंदू वोटों के डर से अपराध को अपराध की तरह नही देखा गया।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस राजनैतिक संरक्षण प्राप्त हिन्दू आतंकवाद का मुसलमान क्या उत्तर दें?

आने वाले चुनावों में ज़रूर मुसलमानों को विपक्षी दलों का साथ देना पड़ेगा मगर मुस्लिम युवाओं को यह समझ जाना चाहिए कि आरएसएस के बिछाए जा रहे इस जाल से अगर निकलना है तो उन्हें लिखाई पढ़ाई में आगे आना होगा। देश भर में आंदोलन की शक्ल में उन्हें शिक्षा की मुहिम को बढ़ाना होगा। मदरसों में हिंदी, अंग्रेजी और अन्य विषयों को भी बेहतर तरीके से पढ़ाना होगा। हर एक पढ़े लिखे मुस्लिम को गरीब और कमजोर तबके के मुसलमानों को बेहतर शिक्षा देने के लिए काम करना होगा। अखलाक की हत्या के अलावा ज़्यादातर हत्याएं गरीब अनपढ़ और दूरस्थ इलाकों में रहने वाले तबकों के मुसलमानों की हुई हंै। 18 जून को हापुड़ में हुई कासिम की हत्या के परिवार वाले अनपढ़ हैं वह अपनी चि_ी तक नहीं लिख सकते। उनके आस-पास भी कोई ऐसा नहीं जो ऐसे तमाम लोगों की मुकदमे भी आगे कैसे बढ़ पाएंगे। ये समस्या हर केस में आने वाली है।

मुसलमानों के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वे सच्चर समिति की रिपोर्ट को जिसे कांग्रेस ने भी लागू नही किया और इस सरकार से लागू कराने की तो अपेक्षा ही नहीं रखनी चाहिए। किंतु उसमें बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जो मुसलमानों को खुद आगे बढ़कर अपने समाज के लिए करनी चाहिए। सभी समाजो में समय के साथ कुरितियंा भी पनपती जाती हंै। ज़रुरत है कि इन कुरीतियों पर टीवी चर्चाओं में बहस न करके समाज को शिक्षित किया जाये। टीवी की बहस सिर्फ बदनाम करने का ही तरीका है। मुसलमानों को यह साबित करने की कोई ज़रुरत नही की वे कितने देशभक्त है। देश में आरएसएस के बनाये जा रहे मुस्लिम विरोधी वातावरण को, हवा में फैलाये जा रहे जहर को, आरएसएस के बिछाये जाल को तोडऩे का तरीका एक शैक्षिक आंदोलन ही होगा। राजनैतिक समझ के लिये, कानूनी लड़ाईयों के लिये, अपने समाज को ऊंचा उठाने के लिये, इस्लाम की सही बातों को सामने लाने के लिये मुस्लिम युवाओं को ही आगे आना होगा। यह बड़ी चुनौती उनको उठानी ही होगी।

मुझे यह आशा बनी अलीगढ़ की घटना के बाद। मई, 2018 के पहले हफ्ते में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर भगवाधारियों की फैमिली के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी विश्वविद्यालय के छात्रों पर के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस द्वारा नाजायज हमला किया गया उनकी परीक्षाओं के दिन में उनको मारा पीटा गया मुकदमे लादे गए। किंतु कोई उत्तेजनात्मकपूर्ण प्रतिक्रिया छात्रों की और से नहीं आई वे शांतिपूर्ण धरना देते रहे धरने पर अपनी किताबें भी पढ़ते रहे परीक्षाओं की तैयारी भी करते रहे।

वाईटैलिटी महिला हाकी विश्व कप भारत ४० साल बाद अंतिम आठ में

भारत ने लंदन मेें खेले जा रहे वाइटैलिटी महिला विश्वकप के ‘क्रासओवर’ मैच में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए इटली को 3-0 से हरा कर क्वार्टर फाइनल मे प्रवेश कर लिया। यहां उसकी टक्कर आयरलैंड के साथ होगी। भारत के लिए पहला गोल नौवें मिनट में लालरेमसियामी ने ‘रिवर्स फ्लिक’ से किया। दूसरा गोल नेहा गोयल ने तीसरा क्वार्टर खत्म होने से कुछ क्षण पूर्व दागा। नेहा गोयल का ट्रर्नामेंट में यह दूसरा गोल था। तीसरा व अंतिम गोल वंदना कटारिया ने 55वें मिनट में किया।

इससे पूर्व 1978 में भारत क्वार्टर फाइनल में पहुंचा था। अब 40 साल बाद भारत को यह अवसर मिला है। उस समय भारत सातवें स्थान पर रहा था।

मैच के बाद भारतीय टीम की कप्तान रानी रामपाल ने कहा, ‘हम यहां मैच जीतने आए हैं। हम सभी को पता था कि यह मैच कितना महत्वपूर्ण है, पर हमारा सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। हमें मौके मिले और हमने गोल किए। अब हमारा सारा ध्यान अगले मैच पर है।’ रानी ने कहा, ‘आयरलैंड के साथ रोमांचक मुकाबला होगा। हम पूल में उनसे खेल चुके हैं पर विश्वकप का क्वार्टर फाइनल एक अलग गेम होगी।

इससे पूर्व पांचवे पेनल्टी कार्नर पर कप्तान रानी रामपाल का गोल भारत को लंदन में खेले जा रहे वाईटैलिटी महिला हाकी विश्व कप के ‘क्रास ओवर ‘ मैच खेलने का अधिकारी बना गया। सातवीं वरीयता वाले अमेरिका को ‘क्रास ओवर’ मैच खेलने के लिए भारत पर जीत दर्ज करना ज़रूरी था जबकि भारत के लिए ‘ड्रा’ भी काफी था। हालांकि भारत ने इस टूर्नामेंट में अभी तक एक भी मैच नहीं जीता पर तीन में से दो मैच बराबर खेल कर वह गोलांतर के आधार पर अमेरिका को पछाडऩे में सफल रहा। 1974 के मैंडिल्यू (फ्रांस) विश्व कप के बाद जहां भारत को चौथा स्थान मिला था, अब 2018 में 44 साल बाद यह अवसर है कि वह अंतिम चार में प्रवेश कर सकता है।

विश्व की एक नंबर की टीम नीदरलैंडस छठे नंबर की जर्मनी, पांचवें नंबर की आस्ट्रेलिया और 16 वें नंबर की आयरलैंड अपने -अपने पूल में शीर्ष स्थान पर रह कर क्वार्टर फाइनल में प्रवेश पा चुके हैं। बाकी चार टीमों का फैसला क्रास ओवर मैचों के परिणामों के आधार पर होगा। यहां बैल्जियम, स्पेन, भारत, इटली, इंग्लैंड और दक्षिएा कोरिया दावेदार हैं। इन क्रास ओवर मैचों में बैल्जियम की टक्कर स्पेन से और विश्व की तीसरे नंबर की अर्जेंटीना का मुकाबला न्यूजीलैंड से होगा।

भारत की टक्क्र टूर्नामेंट में सबसे निम्न रैंकिंग 17 की टीम इटली से है। ध्यान रहे पूल मैच में इटली नीदरलैंडस से 1-12 से हार चुकी है। इस प्रकार भारत के लिए एक सुनहरी अवसर है। यदि भारत इस मैच को जीतता है तो फिर उसका मुकाबला 16वीं रैंकिंग वाली टीम आयरलैंड से होगा। हालांकि पूल मैच में आयरलैंड भारत को 1-0 से हरा चुका है, पर उस मैच में पलड़ा भारत का ही भारी था। इस कारण भारत को एक आसान रास्ता मिला है सेमी फाइनल में प्रवेश का, पर शर्त यह है कि भारतीय टीम गोल करने की अपनी क्षमता का पूरा लाभ उठाए। अब तक खेले तीन मैचों में भारत ने दो हीगोल किए और गोल करने के दसियों मौके गंवाए है। पेनल्टी कार्नर को भी वे गोल में नहीं बदल पाते। भारत की मज़बूती उसकी रक्षा पंक्ति में गोल रक्षक सविता बेजोड़ रही है। उसके अलावा रक्षा पंक्ति में सुनीता लाकड़ा और निक्की प्रधान चट्टान की तरह अडिग रही हंै। यही कारण है कि भारत ने विश्व की दो नंबर की टीम और मेजबान इंग्लैंड और सात नंबर की अमेरिका के साथ 1-1 से ‘ड्रा- खेला। ये दोनों ही मैच ऐसे थे जिनमें यदि रानी रामपाल के फारवर्ड या ड्रैग फ्लिकर गुरजीत कौर थोड़ा भी कर पाती तो भारत जीत दर्ज कर सकता था।

भारत का प्रदर्शन

टूर्नामेंट में भारत की शुरूआत इंग्लैंड के खिलाफ मैच से हुई। इसमें नेहा गोयल के गोल से भारत बढ़त पर रहा, पर अंतिम मिनटों में उसने बढ़त गंवा दी। यहां भारत पेनाल्टी कार्नरों को भी गोल में बदल नहीं पाया। अगला मैच 16 वें नंबर की टीम आयरलैंड के साथ था जिसने अमेरिका को 3-1 से परास्त किया था। इस मैच में 0-1 से पिछड़ा भारत लगातार हमलों और विपक्ष की ‘डी’ पर मंडराते रहने के बावजूद कोई गोल नहीं कर पाया। इस हार से भारत के बाहर होने का अंदेशा हो गया था। तीसरे पूल मैच में अमेरिका के खिलाफ जब 11वें मिनट में वह 0-1 से पिछड़ गया और आधे समय तक चार पेनाल्टी कार्नर गंवा चुका तो लगने लगा थ कि वह बाहर हो जाएगा। पर आधे समय के तुरंत बाद मिले पेनाल्टी कार्नर को कप्तान रानी रामपाल से सीधी हिट से गोल में पहुंचा कर भारत को बराबरी पर ला दिया (1-1)। इसके बाद अमेरिका ने कई हमले किए पर गोल न कर सके। इस प्रकार पूल के तीन मैचों में भारत ने दो ‘डाऊ’ और एक हार के साथ दो अंक हासिल किए। इन तीन मैचों में उसने दो गोल किए और तीन खाए। इस प्रकार उसका गोलांतर रहा माईनस एक। दूसरी ओर अमेरिका ने भी दो मैच ‘ड्रा’ खेले और एक 1-3 से आयरलैंड से हारा और उसके अंक भी थे दो पर वह माईनस दो के गोलांतर पर होने के कारण बाहर हो गया।

क्वार्टर फाइनल में प्रवेश के लिए अब भारत को इटली के साथ खेलना है। उसकी रैंकिंग 17 है और नीदरलैंडस ने उसे 12-1 से हराया है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि पूल मैचों में उसने दो एशियाई देशों चीन को 3-0 से और दक्षिण कोरिया को 1-0 से परास्त किया था। 2015 हाकी वल्र्ड लीग सेमीफाइनल में भारत इटली से शूटआउट में जीता था। पर वह पुरानी बात है। पिछले तीन सालों में भारतीय हाकी में भारी सुधार हुआ है और उसकी रैंकिंग 13 से 10 पर पहुंच गई है। इटली पेनाल्टी कार्नर पर गोल करने में मज़बूत है। उसने अब तक के तीन मैचों में जो पांच गोल किए हैं उनमें से दो पेनाल्टी कार्नर से ही आए हैं।

भारत की समस्या

भारत की अब तक की समस्या वही है गेंद के साथ चिपके रहना। जल्दी पास न देना और गैप न बनाना। देखा गया है कि फारवर्ड खिलाड़ी ‘डी’ में पहुंच कर भी शॉट लेने में झिझक दिखाते हैं और मौका चूक जाता है। कई बार तो यह लगता है कि उनमें सोच की कमी है। 23 मीटर की लाइन के आगे जाते ही उनकी गति धीमी हो जाती है और अपने खाली खड़े साथी को देख नहीं पाते।

पेनाल्टी कार्नर लेने में भी उनके पास कोई विकल्प नहीं है। गुरजीत कौर को एक भी ऊंचा फ्लिक करते नहीं देखा। हर शॉट ज़मीनी होता है। उसमें कोई विविधता नहीं होती। अमेरिका के खिलाफ रानी रामपाल का गोल इसलिए हो गया क्योंकि गेंद उछल गई थी। नहीं तो भारत के खिलाफ तो विपक्षी गोल रक्षक पांच चार कदम भाग कर लेट जाता है और हिट की गई गेंद उसके शरीर से टकरा कर रूक जाती है। यदि भारत को जीतना है तो गुरजीत कौर को ऊंचे फ्लिक लगाने होंगे क्योंकि गोलरक्षकों की लेटने की प्रवृति में ये काफी प्रभावशाली साबित हो सकते हैं।

सीबीआई भी बालिका गृह के रख-रखाव पर चकित

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की  मुजफ्फरपुर स्थित बालिका गृह में रह रही बालिकाओं के यौन शोषण के मामले की सीबीआई से जांच कराने की घोषणा करने से एक तरफ विपक्ष की ओर से हो रहा विरोध थमा लेकिन लोकसभा चुनाव के लिहाज से यह मुद्दा काफी लंबा खिंचने को है।

मुजफ्फरपुर में साहू रोड स्थित बालिका गृह में रह रही बालिकाओं के यौन शोषण के मामला का खुलासा मुंबई के टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की सामाजिक आडिट रिपोर्ट से हुआ। ऐसा इत्तफाक से ही हुआ। संस्थान ने राज्य के कई बालिका गृहों का सामाजिक आडिट किया था। मुजफ्फरपुर स्थित बालिका गृह में बालिकाओं के यौन शोषण की बात सामने आई।  राज्य सरकार को टीआईएसएस ने अपनी रिपोर्ट 27 अप्रैल को भेज दी थी। उस रिपोर्ट में आए तथ्यों की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने 26 मई को उच्चस्तरीय बैठक की और 31 मई को प्राथमिकी दर्ज कराई। उसके बाद तीन जून को बालिका गृह से जुड़े 10 अभियुक्तों  की गिरफ्तारी हुई। एक अभियुक्त फरार है। गिरफ्तार अभियुक्तों में बालिका गृह की देखरेख करने वाली सेवा संस्थान एवं विकास समिति के संचालक और मुजफ्फरपुर से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक के संपादक व मालिक ब्रजेश ठाकुर, बालिका गृह के सीपीओ रवि रौशन प्रमुख हैं। पुलिस प्रशासन ने बालिका गृह की तालाबंदी कर दी है। लेकिन कहीं भी ब्रजेश ठाकुर की इस मामले में संलिप्तता लिखित तौर पर मिल नहीं रही है।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) हरप्रीत कौर और जिले के दूसरे अधिकारियों की ओर से दिए गए तमाम जानकारियों के मुताबिक बालिका गृह में रह रही सात से लेकर 17 साल की उम्र की 44 बालिकाओं में 42 बालिकाओं का डाक्टरी जांच (मेडिकल जांच) कराई गई। इनमें दो बालिकाएं बीमार हैं। डाक्टरी जांच के बाद बता चला कि 29 बालिकाओं के साथ बलात्कार हुआ है। इन बालिकाओं के शरीर पर जलाने और सूई घोपने के निशान मिले। एक बालिका के बयान के मुताबिक एक बालिका की हत्या कर उसके शव को वहीं परिसर में दफना भी दिया गया। पुलिस ने जिले के जज के सामने वहां खुदाई की लेकिन शव नहीं मिला पर हड्डिया जरूर मिली। पर कंकाल मिले। जांच-पड़ताल में जुटे अधिकारियों को दूसरे जरूरी प्रमाण मिले हैें।

बालिका गृह की तालाबंदी करने के बाद वहां की बालिकाओं को पटना, मोकामा, मधुबनी स्थित बालिका गृहों में भेज दिया गया। गौरतलब है कि राज्य में 110 ऐसे गृह हैं जिनमें बेसहारा बालिकाओं, बालकों और महिलाओं को अलग-अलग रखा जाता है।

मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में कमरे छोटे-छोटे और बिना खिड़की के हैं। बाहर से प्रकाश नहीं आता। दिन में भी बहुत कम प्रकाश रहता है। रात मेें प्रकाश कम, अंधेरा ज्यादा रहता है। बालिका गृह किसी जेल की कोठरी से कम नहीं दिखता। बालिकाओं को कुछ भी खाने को पर्याप्त तौर पर नहीं दिया जाता और कपड़े भी फटे-पुराने ही मिलते थे जिनसे किसी तरह से तन ढका जा  सकता था। आधा तन फिर भी दिखता ही रहता। इन्हें ऐसी हालत में इसलिए रखा जाता कि वे मजबूरी में वह सब कुछ करें, जो उनसे कहा जाता। किसी ने हिम्मत कर इनकार किया तो उनके साथ मारपीट की जाती।

बालिका गृह के बगल में ही सेवा संकल्प एवं विकास समिति के संचालक व स्थानीय दैनिक के संपादक ब्रजेश कुमार का बड़ा मकान और दैनिक का कार्यालय और छापाखाना है। इस अखबार की 300 प्रतियों छपती हैं लेकिन दावा किया जाता है कि राज्य में यह 60 हजार से भी ज्यादा बिकता है। ब्रजेश कुमार अपने इलाके में प्रभावशाली माने जाते रहे हैें। वे चुनाव भी लड़ चुके हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चुनाव प्रचार भी किया। नीतीश कुमार उनके घर कई बार आ-जा चुके हैें। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी से भी उनका मधुर संबंध है। प्रभावशाली नेताओं और सरकारी अधिकारियों से अच्छा संबंध है। कहते हैें किसी नेता और अधिकारियों की आवभगत करने में ब्रिजेशकोई कोताही नहीं होने देते थे। नीतीश कुमार के शासनकाल में वे काफी प्रभावशाली भी बने।

ब्रजेश कुमार के परिवार के लोगों का कहना है कि उन्हें फंसाया जा रहा है। समाज कल्याण विभाग की ओर से दर्ज मामले में भीे उनका या किसी का नाम नहीं है। बालिका गृह में पुलिस जिन बालिकाओं को लाती है, उनका मेडिकल जांच पुलिस पहले से नहीं कराती रही है। ऐसे में  क्या गारंटी की बालिकाओं का पहले यौन शोषण नहीं हुआ। बालिका गृह के सीपीओ रवि कुमार रोशन की पत्नी ने सवाल उठाया कि समाज कल्याण विभाग की मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर किस अधिकार से बाल गृह जाते थे। इस पर मंजू वर्मा ने तुरंत कहा कि जांच में उनके पति दोषी पाए गए तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगी।

मुजफ्फरपुर बालिका गृह के बालिकाओं के यौन शोषण का मामला सामने आ जाने पर राजद समेत सभी विरोधी पार्टियों ने विधानसभा में और सरकार को बाहर घेरना शुरू किया। उसने मामले की पटना हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई से कराने की जोरदार ढंग से मांग उठाई। संसद में भी विरोधी पार्टियों ने इस मामले को उठाने में देर नहीं की। शुरू मेें सरकार ने विरोधियों को भरोसा दिया कि मामले पर सरकार सख्ती से कार्रवाई कर रही है। राज्य के सभी बाल गृहों की देखरेख करने की ऐसी व्यवस्था की जाएगी, ताकि ऐसी घटना कभी न हो। मामले में किसी भी दोषी व्यक्ति को नहीं बख्शा जाएगा। पुलिस महानिदेशक केएस द्विवेदी ने तो साफ कह दिया कि राज्य पुलिस की जांच और कार्रवाई से वे संतुष्ट हैं। सीबीआई की जांच की कोई जरूरत नहीं है। राजद की ओर से मामले की जांच कराने के लिए पटना हाईकोर्ट में भी अपील की गई।

राजद और कांग्रेस की ओर से नीतीश सरकार पर लगातार दबाव बढ़ाया गया। केंद्रीय गृह राजनाथ सिंह ने कह दिया कि राज्य सरकार चाहेगी, तो मामले की जांच सीबीआई करेगी। फिर जब समाज कल्याण मंत्री मंजू सिंह के पति पर ऊंगली उठ गई तो सरकार पहले से ज्यादा सांसत में पड़ गई। एकाएक मुख्यमंत्री ने 26 जुलाई को मामले की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान कर दिया।

 

बच्चियों की सुरक्षा के बहाने करोड़ों की कमाई

सुजाता चौधरी

मानवता को शर्मसार करने वाली मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं है। जब भी कभी इस तरह के बालिका गृह में जाने का मौका मिला है, वहां अजीब सा दमघोंटू वातावरण देखने को मिला है। हमेशा लड़कियों को डरी, सहमी, हिरणी सी भयभीत, परकटे पक्षी की तरह फडफ़ड़ाते देखा है इन बालिका गृहों के अधिकतर संचालकों और कर्मचारियों के हाव-भाव भी फिल्मों में तीन नंबर के गुंडों जैसे होते है

संचालकों के इर्द-गिर्द रहने वाले लफंगे बालिका गृह की लड़कियों के साथ जिस तरह की अश्लील हरकतें करते हैं, उसे कोई व्यक्ति कुछ देर रहने के बाद ही अनुभव कर सकता है। इन बालिका गृहों में इन गुंडों के साथ कुछ पदों पर देवियंा भी काम करती हैं जो इन दुष्कर्मों में चंद पैसों और अपनी जीविका के लिए सहायक बन कर स्त्री और मां के महान गौरव को शर्मसार करती है।

एक पुरानी घटना है। एक बालिका गृह की गंूगी बच्ची इशारों में मूंछों पर संकेत देकर मुझे कुछ कहना चाहती थी। जब मैने समझने की कोशिश की तो वहां काम करने वाली देवियों ने हमें समझा दिया कि यह शादी करना चाहती है। मैंने उसकी शादी कराने में अपनी भूमिका का निर्वाह कर कर्तव्य की इतिश्री मान ली, लेकिन आज लग रहा है, हो सकता है, उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा हो।

42 बच्चियों में 29 बच्चियों के साथ इतने दिनों से बलात्कार, वेश्यावृति कराया जाना इससे इंकार करने वाली बच्चियों की पिटाई और उनके शरीर को जगह-जगह से जलाया जाता रहा है। किस समाज में हैं हम? यह पता किया जाना चाहिए कि ये लड़कियां कहां सप्लाई होती थीं। विधायक, मंत्री, अधिकारी और रसूख वाले लोगों के सहयोग के बिना यह जघन्य अपराध चलता नहीं रह सकता।

सरकारें बालिका गृह के नाम पर हर साल कई सौ करोड़ रुपए खर्च करती हैं। क्या सरकार कई सौ करोड़ खर्च कर छोटी-छोटी लउ़कियों से वेश्यालय चलवा रही हैं। मैं थूकती हंू उन सभी बड़े लोगों पर जो इन मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाने में पशु से भी बदतर हो गए हंै। लानत है उन स्त्रियों पर जो इसमें सहायक हैं। ये राक्षस मासूम बच्चियों को सुरक्षा देने के नाम पर सिर्फ करोड़ों रुपए डकार नहीं रहे बल्कि उनके नाम पर पैसे खा रहे हैं और बच्चियों को वेश्या बना रहे हैं।

‘पद्मावती’ फिल्म के नाम पर पूरे देश में अपनी सेना के जरिए आग लगवाने वाले आज कहां मुंह छिपाए बैठे हैं।

जब चाहूं बन सकती हूं मुख्यमंत्री: हेमा

जानी-मानी अभिनेत्री और मथुरा से सांसद हेमामालिनी का कहना है कि जब वे चाहें तो एक मिनट में मुख्यमंत्री बन सकती हैं। दक्षिण भारत के तमिलनाडुु में जन्मी यह अभिनेत्री कभी यदि उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री बने तो देश की एका के लिहाज से बुरा नहीं।

लेकिन हेमा ने कहा कि इससे मेरा ‘फ्री मूवमेंटÓ रूक जाएगा। अपने निर्वाचन क्षेत्र में उन्होंने ने बहुत काम किया है। उन्हें कृष्णनगर के बृजवासी लोगों के लिए काम करना बहुत अच्छा लगता है। उन्हें बॉलीवुड में मिली प्रसिद्धि की वजह से जाना जाता है। इस प्रसिद्धि की ही महत्वपूर्ण भूमिका उन्हें सांसद बनाने में रही है।

उन्होंने कहा कि मैंने सांसद बनने से पहले भी पार्टी के लिए काफी कुछ किया है। उन्होंने चार वर्ष में अपने निर्वाचन क्षेत्र में सड़क निर्माण और विकास के ढ़ेरों काम किए हैं। जनता मुझे मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों, किसानों, महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया है। देश उनके नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है। ऐसा प्रधानमंत्री मिलना मुश्किल है। दूसरी पार्टियों के नेता कुछ भी कहें। हमें ऐसा प्रधानमंत्री मिलना मुश्किल है। दूसरी पार्टियों के लोग कुछ भी कहें लेकिन यह देखना चाहिए कि आखिर इतने कम समय में कागजी कार्रवाई समेत सारी चीजें किसने की और ज़मीन पर विकास ला खड़ा किया।

पद्मश्री से सम्मानित और भरतनाट्यम की नृत्यंागना हेमा मालिनी एक धार्मिक कार्यक्रम में भाग लेने पिछले दिनों मथुरा के पास बासवाड़ पहुंची थी।

होलसेल प्राइस इंडेक्स में वृद्धि यानी ढेर सारी मुसीबतें

भारत की होलसेल प्राइस इन्फ्लेशन (थोक बिक्री कीमत में वृद्धि) फिर सबकी निगाहों में हैं। इसकी एक वजह 54 महीनों में सबसे ज्य़ादा जून 2018 में बढ़ी महंगाई है। होलसेल मूल्य महंगाई में बढ़ती ऊंचाई की वजह पेट्रोल की बढ़ती जाती कीमत, महंगा भोजन दूसरे बनाए गए माल और सेवाओं के चलते हैं। लेकिन होलसेल प्राइस इन्फ्लेशन सबसे बड़ी महंगाई साढ़े सात साल में 5.77 फीसद पर रहता है। ऊंचा रहना देश के लिए चिंता का मुद्दा था।

होलसेल प्राइस से हुई महंगाई में बढ़ोतरी से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) को भले कोई चिंता नहीं हो क्योंकि आरबीआई रिटेल इन्फ्लेशन पर ही ध्यान देता है क्योंकि तब ब्याज दरें बढ़ानी पड़ती हैं।

कुल मिला कर सारी मोनेटरी पालिसी (मुद्रा नीति) के तमाम सूत्र कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर निर्भर करते हैं लेकिन ये होलसेल प्राइस इंफ्लेशन पर भी निर्भर हैं। बहुत कम ही ऐसा होता है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स का महत्व न हो।

देश का संकट बढ़ाने में रिटेल इंफ्लेशन का कम हाथ नहीं है। जो ज्य़ादातर उछाल ही दिखती है। सिर्फ मई 2018 में उपभोक्ता मूल्य सूचांक ने चार फीसद की उछाल ली और अब यह पांच फीसद तक हो गया है। चार फीसद पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सिर्फ एक फीसद होता है यानी यह खतरे के निशान छह फीसद से एक ही फीसद कम है। ऐसी स्थिति में इस बात का नोटिस लिया जाना कि आरबीआई को रेपो रेट को 25 बेसिस (आधार) प्वाइंट से मई 2018 में बढ़ाना पड़ा। जब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक चार फीसद हो गया।

दोहरी मार

ऐसे परिदृश्य में आरबीआई के पास और कोई चारा नहीं होता कि वह ब्याज दर बढ़ाए जिससे महंगाई पर रोक लग सके। आरबीआई को ऐसा कदम इसलिए उठाना पड़ता है जिससे गरीबों को वर्तमान और भविष्य में मूल्यवृद्धि से बचाया जा सके। जब भी ऐसा होता है तो नुकसान उद्योग का होता है क्योंकि इस आरबीआई से अपनी दरों में कटौत की उम्मीद नहीं होती। लेकिन उत्पादन क्षेत्र और सेवा क्षेत्र ज़रूर इसके प्रभाव में आते हंै और वृद्धि दर तो अपने आप प्रभावित होती ही है।

कच्चे तेल की कीमतों में पिछले दिनों बढ़ोतरी के अंदेशे पर ‘तहलकाÓ ने अपनी स्टोरी ‘फयूएल ऑन फायरÓ में चेतावनी दी थी। जून के औद्योगिक उत्पादन के ब्यौरे से साफ होता है कि कितने मैक्रो इकॉनामिक क्रियाकलापों पर जून 2018 में 214 बेसिस प्वाइंट का असर रहा। इन तमाम मुद्दों के चलते महंगाई जो फरवी 2018 में 4.55 प्वाइंट पर भी वह बढ़कर जून में 16.18 फीसद पहुंच गई। आहार, फल और सब्जियों के भाव मई में जहां 2.5 फीसद थे वे जून में 8.12 हो गए। उत्पादन क्षेत्र में भी महंगाई ने खासी उछाल ली। इसमें एलॉय स्टील कोएिटंग, स्टेनलेस, स्टीलट्यूब से तांबे की प्लेट और एल्यूमिनियम शीट्स पर भी महंगाई का असर 17.34 फीसद रहा।

आईएमएफ की भविष्यवाणी

अपनी नवीनतम रिपोर्ट में इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) ने भारत की वृद्धि दर दस बेसिस प्वाइंट से घटा कर 7.3 फीसद 2018-19 के लिए रखी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने विकास दर को 30 बेसिस प्वाइंट से 7.5 फीसद पर घटा कर 2019-20 के लिए तया किया गया है। इससे महंगाई कितनी बढ़ेगी जबकि सरकार ने पहले ही खरीफ फसल के लिए अधिकतम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित कर दिया है जिसका असर मंहगाई बढ़ाने पर पड़ेगा ही।

देश के आम चुनाव को साल भर से भी कम समय है। उम्मीद है कि सरकार कई लोकप्रिय योजनाएं घोषित करेगी जिससे मतदाता सत्तासीन दल को अपना वोट दें। इससे और ज्य़ादा वित्तीय घाटा बढ़ेगा और आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा। मानसून इस साल भी खासा कमज़ोर है इससे भी अर्थ-व्यवस्था पर असर पड़ेगा।

एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने भी भारत में महंगाई का अंदेशा 2018-19 में 4.6 फीसद से बढ़ा कर पांच फीसद आंका है। इसके भी तर्क कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी रु पए की डांवाडोल स्थिति और न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी पर आधारित है। एशियन डेवलपमेंट आउटलुक (एडीओ) ने अप्रैल में अपनी रपट में महंगाई के ऊंचे ग्राफ को दिखाया था जिसकी वजह तेल की ज्य़ादा कीमत और पिछले कुछ महीने में रु पए का डांवाडोल होना और चार जुलाई को घोषित गर्मी की फसलों के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य है। सरकार इसमें इसलिए दखल देती है जिससे बाजार में कृषि उत्पादकों की रक्षा हो साथ ही कृषि उत्पाद मूल्य में तेजी से गिरावट न आए। आईएमएफ ने भारत के विकास लक्ष्य को दस बेसिस प्वाइंट से घटा कर 7.3 फीसद कर दिया और तेल की बढ़ती कीमतों और आरबीआई की ब्याज दरों में बढ़ोतरी को बताया।

उमीद है अभी भी

एडीवी का कहना है कि भारत अपनी पुरानी विकास दर यानी 2018-19 में 7.3 फीसद 2019-20 में 7.6 फीसद हासिल कर सकता है यदि इसे गुड्स एंड सर्विस टैक्स से 2017-18 में ज्य़ादा आमदनी हो। 2017-18 में यह भारतीय अर्थ-व्यवस्था बढ़ कर 6.7 फीसद हुई। एडीबी का कहना है कि विकास को गति मिली 2017-18 के क्यू 4 में जहां जीडीपी का विस्तार बढ़ कर 7.7 हो गया।

जो रपट एडीबी की है उसमें बताया गया है कि विकास के दूसरे पैमाने हैं उनमें जनता में खपत में बढ़ोतरी और निर्यात से आमदनी और नए जीएसटी टैक्स के चलते काम शुरू करते हुए लगने वाली पूंजी में कमी के बल पर है। निजी खपत में बढ़ोतरी हो सकती है जो 2016 में हुई नोटबंदी से प्रभावित हुआ था। कैपेसिटी यूटीलाइजेशन की दरें पिछले चार सालों में अपनी खासी ऊंचाई पर आ चुकी हैं और इन्हें अब उन फर्म केा मदद देनी चाहिए जो निवेश करना चाहें।

हालांकि कई विचारक इस अंदेशे को नहीं नकारते कि आरबीआई जल्द ही दरों में बढ़ोतरी नहीं करेगा। आरबीआई ने छह जून 2018 को रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाईट बढ़ाए और उसे 6.25 फीसद कर दिया। यह दर बढ़ाने का चार साल में पहला मौका था क्योंकि ऐसा अंदेशा था कि महंगाई बढ़ सकती है।

जो आर्थिक सर्वे 2017-18 का 29 जनवरी 2018 को आया था उसमें अनुमानित था कि प्रति बैरेल दस डालर की बढ़ोतरी होने पर तेल की कीमतों में आए उछाल से आर्थिक विकास 0.2-0.3 फीसद पवाइंट घटता है और यह होलसेल इन्फ्लेशन को 1.7 फीसद प्वाइंट बढ़ाता है और वर्तमान खाते में जो घाटा डालर 9-10 बिलियन का है वह और बढ़ जाता है।

दरअसल हो यही रहा है और सह थ्योरी फिर वही साबित हो रहा है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स में बढ़ोतरी का मतलब है अर्थ-व्यवस्था के लिए ढेर सारी मुसीबतें।

आतंकवाद के मुकाबले के लिए ब्रिक्स में सहमति

इस सम्मेलन में भाग लेने वाले देशों में विभिन्न मुद्दों पर बात चीत हुई। आर्थिक मुद्दों से आतंकवाद तक जमकर राय-मश्विरा हुआ। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न राष्ट्राध्यक्षो से अलग-अलग मुलाकात की। आतंकवाद पर बातचीत भी हुई लेकिन आतंकवाद के लिए चर्चित गुटों का नाम ब्रिक्स की विज्ञप्ति नें इस बार नहीं आया। जबकि साल भर पहले शंघाई में हुई बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में लश्कर-ए-तोएबा और जैश-ए-मोहम्मद का नाम आतंकवादी संगठनों बतौर शामिल किया गया था।

जोहानिसबर्ग डिक्लेरेशन मे जोरदार तरीके से आतंकवाद से मुकाबला करने की बात तो है लेकिन कोई नाम नहीं दिया गया है। इसमें कहा गया है ब्रिक्स में शामिल कुछ देशों में अब भी विभिन्न रूपों में जारी आतंकवादी घटनाओं की निंदा करते हैं। आतंकवाद को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में मजबूत अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ऐसा मिला जुला प्रयास होना चाहिए जिससे आतंकवाद का मजबूती से मुकाबला किया जा सके। हम सभी देशों को आतंकवादी गतिविधियों के लिए अपनी सीमाओं से धन न देने की पुरजोर व्यवस्था हो। सभी देश मिलजुलकर आतंकवाद का मुकाबला करें साथ ही वे लोगों के दिमाग को उग्रवाद की ओर ले जाने के प्रशिक्षण को बंद कराएं, उन्हें मिलने वाले धन को रोकें और उन तक पहुंचने वाले हथियार को रोकें। यह व्यवस्था भी हो कि नवीनतम सूचना तकनॉलोजी उन तक न पहुंच सके।

इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन कर यात्रा पर रवांडा पहुंचे थे। वहां उन्होंने गरीब गांव वासियों को 200 गाएं तोहफे में दी। इसका मकसद वहां के राष्ट्रपति पॉल कगामा के गरीबी खत्म करो और बच्चों में कुपोषण के खत्मे के कार्यक्रम की सहायता करना था। कगामा ने 2006 में गिरिंका कार्यक्रम शुरू किया था। इसके तहत हर गरीब परिवार को एक गाय दे कर उसे वित्तीय सुरक्षा प्रदान की जाती है।

नरेंद्र मोदी ने गिरिंका कार्यक्रम की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत के लोग यह देख कर हैरान हो जाएंगे की रवांडा में गऊओं को कितना महत्व दिया जा रहा है और इसे देश में आर्थिक समृद्धि लाने का स्त्रोत समझा जाता है।