
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ अब सिर्फ एक मानवीय त्रासदी नहीं रह गई है। इसके बाद काठमांडू ने इस आपदा को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और उसकी जिम्मेदारी के बड़े अंतरराष्ट्रीय सवाल से जोड़ दिया है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खानाल ने कहा है कि देश अब आपदा के बाद मिलने वाली मदद को केवल राहत या दान के तौर पर नहीं देखना चाहता। नेपाल की कोशिश है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान की भरपाई को ‘न्याय और मुआवजे’ के मुद्दे के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया जाए।
इस सिलसिले में नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित ‘फंड फॉर रेस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज’ से भी तत्काल वित्तीय सहायता की मांग की है। प्रधानमंत्री बालेंद्र ‘बालेन’ शाह के संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में इस मुद्दे को उठाने की संभावना भी सामने आई है।
आखिर नेपाल को किस नुकसान की भरपाई चाहिए?
26 अगस्त को भोटे कोशी नदी में अचानक आई भीषण बाढ़ ने रासुवा समेत कई जिलों में भारी तबाही मचाई। नदी के रास्ते में आने वाले घर, सड़कें, पुल, बाजार और बिजली परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक रासुवा, नुवाकोट, धादिंग और आसपास के कई इलाके प्रभावित हुए हैं। शुरुआती आकलन में रासुवा में तिब्बत की तरफ से अचानक पानी आने की बात सामने आई है, जिसके पीछे ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ और चट्टान के बड़े हिस्से के खिसकने तथा नदी के अस्थायी रूप से अवरुद्ध होने जैसी संभावनाएं जांची जा रही है।
इस आपदा में 1,100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता हैं। राहत और तलाश अभियान जारी है। नेपाल के लिए संकट सिर्फ जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं है। बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्र पर भी इसका बड़ा असर पड़ा है। बाढ़ ने नेपाल की लगभग 10 फीसदी बिजली उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है और देश को बिजली निर्यात रोककर भारत से बिजली आयात करनी पड़ी।
भारत, चीन और अमेरिका क्यों बने नेपाल की मांग के केंद्र में?
नेपाल के विदेश मंत्री ने चीन, अमेरिका और भारत को दुनिया के सबसे बड़े मौजूदा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों में शामिल करते हुए कहा है कि ऐसे देशों की जिम्मेदारी उन देशों के प्रति भी है, जो जलवायु संकट पैदा करने में बहुत कम योगदान देते हैं लेकिन उसके गंभीर परिणाम झेल रहे हैं।
नेपाल का तर्क है कि हिमालयी देश होने के कारण वह ग्लेशियरों के पिघलने, अस्थिर पहाड़ी ढलानों और अचानक आने वाली बाढ़ जैसे खतरों के प्रति बेहद संवेदनशील है, जबकि उसके अपने उत्सर्जन का वैश्विक स्तर पर योगदान बहुत कम है।
यही वह बिंदु है जहां नेपाल की मांग पारंपरिक विदेशी सहायता से आगे बढ़ती है। काठमांडू का संदेश है कि आपदा के बाद सहायता देना और जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान की जिम्मेदारी स्वीकार करना एक ही बात नहीं है।
लेकिन भारत के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है
नेपाल ने भारत को चीन और अमेरिका के साथ बड़े उत्सर्जकों की सूची में रखा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तीनों देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन या ऐतिहासिक योगदान समान है। यूरोपीय आयोग के 2024 के ईडीजीएआर आंकड़ों के मुताबिक चीन, अमेरिका और भारत कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मामले में शीर्ष तीन देशों में हैं। लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में बड़ा अंतर है। भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन चीन और अमेरिका की तुलना में काफी कम है।
यही वजह है कि वैश्विक जलवायु वार्ताओं में भारत लगातार यह तर्क देता रहा है कि जिम्मेदारी तय करते समय केवल मौजूदा कुल उत्सर्जन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और विकासशील देशों की विकास संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इसलिए नेपाल की ओर से भारत का नाम लिए जाने का मुद्दा आने वाले दिनों में नई दिल्ली के लिए भी कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या नेपाल सीधे तीन देशों से अरबों डॉलर मांगेगा?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी से ऐसा नहीं लगता कि नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका को अलग-अलग कोई औपचारिक अरबों डॉलर का बिल भेज दिया है। इसके बजाय काठमांडू ने यूएन-आधारित फंड का दरवाजा खटखटाया है। यह व्यवस्था जलवायु परिवर्तन के कारण विकासशील और विशेष रूप से संवेदनशील देशों को होने वाले आर्थिक और गैर-आर्थिक नुकसान से निपटने के लिए बनाई गई है।
नेपाल ने इस फंड से तत्काल सहायता की मांग की है, ताकि राहत के साथ-साथ विस्थापित लोगों का पुनर्वास, बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण और प्रभावित अर्थव्यवस्था को संभालने का काम किया जा सके।
यानी नेपाल की रणनीति फिलहाल यह दिखाती है कि वह सीधी द्विपक्षीय क्षतिपूर्ति मांगने के बजाय जलवायु नुकसान के लिए बने बहुपक्षीय तंत्रके जरिए धन जुटाना चाहता है।
पुनर्निर्माण में लग सकते हैं 4-5 अरब डॉलर
आपदा का आर्थिक पैमाना भी नेपाल की चिंता को समझने में मदद करता है।
प्रारंभिक आकलनों के मुताबिक बाढ़ से हुई तबाही की भरपाई और पुनर्निर्माण में करीब 4 से 5 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है। यह नेपाल की अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले बेहद बड़ी रकम है।
बिजली परियोजनाओं को नुकसान इस संकट को और गंभीर बनाता है। नेपाल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत की भूमिका तेजी से बढ़ी है और देश भारत को बिजली निर्यात भी करता रहा है। बाढ़ से इस क्षेत्र को लगा झटका सीधे नेपाल की भविष्य की आर्थिक योजनाओं पर असर डाल सकता है।
क्या हर नुकसान को ‘क्लाइमेट चेंज’ से जोड़ना इतना आसान है?
नेपाल सरकार ने आपदा को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी की बात कही है। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भी इसे जलवायु परिवर्तन से जुड़ा संकट बताया है। लेकिन किसी एक बाढ़ या भूस्खलन को सीधे मानव-जनित जलवायु परिवर्तन का परिणाम साबित करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होता है।
इस मामले में शुरुआती संकेत बर्फ और चट्टान के बड़े हिस्से के खिसकने, ग्लेशियर संबंधी अस्थिरता और अचानक पानी के बहाव की ओर हैं। वैज्ञानिकों को अभी यह स्थापित करना होगा कि इन प्रक्रियाओं में जलवायु परिवर्तन की भूमिका कितनी थी।
इसलिए फिलहाल ज्यादा सटीक निष्कर्ष यही है कि गर्म होते हिमालय ने ऐसे खतरों की पृष्ठभूमि को अधिक गंभीर बनाया है, लेकिन इस खास घटना में जलवायु परिवर्तन की सटीक भूमिका का वैज्ञानिक आकलन अभी जारी है।
हिमालय की आपदा अब सिर्फ नेपाल का मुद्दा नहीं
नेपाल की मांग का सबसे बड़ा असर शायद मुआवजे की रकम से कहीं आगे हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अधिकारियों ने भी चेताया है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से जुड़ी अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। तापमान में वृद्धि ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले इलाकों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
इसका मतलब है कि नेपाल की मौजूदा त्रासदी भारत, भूटान, चीन और पाकिस्तान समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है। हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों की पानी, कृषि और ऊर्जा जरूरतों से जुड़ी हैं।
नेपाल इसलिए अब राहत की अपील से आगे बढ़कर एक बड़ा सवाल उठा रहा है- अगर जलवायु परिवर्तन का नुकसान सीमा नहीं देखता, तो उसकी कीमत की जिम्मेदारी भी क्या सिर्फ उस देश की होनी चाहिए जहां आपदा आती है? इसी सवाल को काठमांडू अब संयुक्त राष्ट्र के मंच तक ले जाने की तैयारी में है।



