नेपाल में आपदा: सात मिनट में 3,300 मीटर नीचे आया मौत का सैलाब, कैमरे में कैद हुआ असली स्रोत

नेपाल-चीन सीमा पर हिमनद और चट्टान टूटने के बाद मलबे का सैलाब
नेपाल-चीन सीमा पर हिमनद और चट्टान टूटने के बाद बना मलबे का सैलाब सात मिनट में ग्यिरोंग क्षेत्र तक पहुंचा।

5,140 मीटर पर हिमनद-चट्टान टूटी, 20 किमी तक दौड़ा मलबा; नेपाल से निकली तबाही चीन के ग्यिरोंग बंदरगाह को भी लील गई, अब दो नई झीलें अगले खतरे का संकेत दे रही हैं

एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली

नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को आई तबाही की तस्वीर अब पहले से कहीं ज्यादा साफ हो रही है। चीन में एक पर्यटक के कैमरे में कैद वीडियो ने उस शुरुआती क्षण को रिकॉर्ड कर लिया है, जब नेपाल की तरफ करीब 5,140 मीटर की ऊंचाई पर हिमनद और चट्टान का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। चीनी वैज्ञानिकों के मुताबिक यही घटना आगे चलकर उस मलबे के सैलाब में बदली, जिसने नेपाल की घाटियों से गुजरते हुए चीन के ग्यिरोंग बंदरगाह को भी तबाह कर दिया।

यानी अब इस आपदा को सिर्फ ‘अचानक आई बाढ़’ कहना पर्याप्त नहीं होगा।
यह ऊपर से शुरू हुई एक ऐसी श्रृंखला थी, जिसमें हिमनद टूटा, चट्टानें और बर्फ नीचे गिरीं, रास्ते में और मलबा समेटा, नदी का रास्ता प्रभावित किया और देखते ही देखते एक बेहद तेज मलबे की धारा बन गई।

20 किमी का रास्ता, 3,300 मीटर की गिरावट और सिर्फ 7 मिनट

चीनी वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक जिस हिमनद का हिस्सा टूटा, उसका क्षेत्र करीब 6.2 लाख वर्ग मीटर था। वहां से निकला मलबा करीब 20 किमी नीचे आया और इस दौरान लगभग 3,300 मीटर की ऊंचाई खोई। ग्यिरोंग बंदरगाह तक पहुंचने में इसे सिर्फ करीब सात मिनट लगे।

चीनी प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय के विशेषज्ञ गुओ झाओचेंग ने मलबे की गति करीब 50 मीटर प्रति सेकंड आंकी है। यह लगभग 180 किमी प्रति घंटे बैठती है। अलग आकलन में 20 किमी की दूरी सात मिनट में तय करने की औसत गति करीब 171 किमी प्रति घंटा निकलती है। दोनों आंकड़े एक ही बात बताते हैं: यह सामान्य बाढ़ नहीं थी। इतनी तेज गति का सबसे खतरनाक पहलू सिर्फ इसकी ताकत नहीं, बल्कि चेतावनी का बेहद छोटा समय है। अगर स्रोत से तबाही के केंद्र तक पहुंचने में सात मिनट ही लग रहे हों, तो नीचे बसे लोगों को पारंपरिक नदी-स्तर आधारित चेतावनी से सुरक्षित निकालना लगभग असंभव हो जाता है।

हिमनद के साथ नीचे आई पहाड़ की चट्टानी परत

हिमनद अकेला नहीं टूटा, नीचे की चट्टान भी साथ आई

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के भू-आकृति विज्ञानी डैनियल शुगर के शुरुआती आकलन ने इस घटना को और महत्वपूर्ण बना दिया था। उनके मुताबिक ऐसा लगता है कि सिर्फ हिमनद नहीं टूटा, बल्कि उसके साथ पहाड़ की बड़ी चट्टानी परत भी नीचे आई। यही वह बिंदु है जहां आपदा की विनाशकारी शक्ति समझ आती है। ऊंचाई से गिरती बर्फ और चट्टान नीचे आते हुए अपने साथ ढीली चट्टान, मिट्टी और नदी के रास्ते में मौजूद मलबा समेटती गई। इस तरह एक छोटा-सा ऊपरी पहाड़ी हादसा नीचे आते-आते बहुत बड़े मलबे के सैलाब में बदल गया। चीनी वैज्ञानिकों ने भी बताया है कि मलबा रास्ते में अतिरिक्त चट्टानी सामग्री समेटता गया और उसकी मारक क्षमता बढ़ती गई।

नेपाल में शुरू हुई आपदा ने चीन को भी प्रभावित किया

आपदा नेपाल में शुरू हुई, लेकिन सीमा पार करके चीन पहुंच गई

इस घटना का एक बड़ा भू-राजनीतिक और आपदा-प्रबंधन सबक भी है। चीनी वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक तबाही का स्रोत नेपाल की तरफ था। वहां से निकला मलबा सीमा पार करके चीन के ग्यिरोंग क्षेत्र में पहुंचा और सीमा बंदरगाह को तबाह कर गया। इसके बाद प्रवाह फिर नदी तंत्र के जरिए नेपाल की ओर भी गया। यानी हिमालय में आपदा की कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं होती। नेपाल में शुरू हुई घटना ने चीन को प्रभावित किया। चीन की तरफ बनी कोई झील या प्राकृतिक बांध टूटे तो उसका असर नेपाल में आ सकता है। और इसी नदी तंत्र का पानी आगे नेपाल से निकलकर भारत की ओर जाता है। यह सिर्फ नेपाल की आपदा नहीं है। यह पूरे हिमालयी नदी तंत्र की साझा जोखिम-व्यवस्था का मामला है। आईसीआईएमओडी भी इस घटना को नेपाल-चीन सीमा के साझा हिमालयी खतरे के रूप में देख रहा है और उसने शुरुआती विश्लेषण में बर्फ-चट्टान के हिमस्खलन से नदी के अस्थायी रूप से बाधित होने तथा अचानक बाढ़ की श्रृंखला की ओर संकेत किया है।

ग्यिरोंग बंदरगाह और हिमालयी विकास का जोखिम

ग्यिरोंग क्यों महत्वपूर्ण है? जहां पहाड़ का रास्ता व्यापार का गलियारा बन गया

ग्यिरोंग सिर्फ एक सीमा चौकी नहीं है। यह नेपाल और चीन के बीच महत्वपूर्ण सड़क और व्यापार संपर्क का हिस्सा है। पिछले वर्षों में यहां परिवहन, माल ढुलाई और दूसरी बुनियादी सुविधाएं विकसित हुई हैं। इस कारण प्राकृतिक खतरे के क्षेत्र में मानव और आर्थिक गतिविधियों का जमाव भी बढ़ा।

यहीं हिमालयी विकास का सबसे कठिन सवाल सामने आता है। क्या जिस घाटी में सड़क, बंदरगाह, पुल, व्यापार केंद्र और बिजली परियोजनाएं बन रही हैं, वहां विकास की योजना बनाते समय ऊपर मौजूद हिमनद और चट्टानों के संभावित टूटने को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है? यह घटना जरूर दिखाती है कि इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा केवल उस जगह के मौसम और नदी के पुराने रिकॉर्ड से तय नहीं की जा सकती जहां निर्माण हो रहा है।

ऊपर 5,000 मीटर की ऊंचाई पर क्या हो रहा है, उसका असर कुछ मिनटों में 3,000 मीटर नीचे मौजूद सड़क और बंदरगाह पर पड़ सकता है।

पहली तबाही के बाद अब ‘दूसरी आपदा’ का खतरा

सबसे चिंताजनक बात यह है कि पहली आपदा के बाद पहाड़ ने नया भूगोल बना दिया है। मलबे ने नदी का रास्ता बाधित किया और अस्थायी झील बन गई। शुक्रवार को इस झील से पानी बाहर निकलने लगा और कुछ समय के लिए बचाव अभियान रोकना पड़ा। शनिवार तक चीन ने कहा कि झील का क्षेत्रफल घटकर करीब 99,000 वर्ग मीटर रह गया है और पानी धीरे-धीरे निकल रहा है। इसलिए पहली झील के तत्काल फटने का खतरा कुछ कम हुआ है। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। चीन के अधिकारियों ने ग्लेशियर टूटने वाली जगह के नीचे एक दूसरी और बड़ी जलराशि की पहचान की है। इसका क्षेत्रफल 1.20 लाख वर्ग मीटर से अधिक आंका गया है, लेकिन उसकी गहराई अभी पता नहीं है। नेपाल के अधिकारियों के अनुसार दोनों जलाशयों के पूरी तरह खाली होने तक बाढ़ का जोखिम बना रहेगा। यानी जिस मलबे ने पहली बाढ़ पैदा की, वही अब नई झीलों का प्राकृतिक बांध बन गया है।

संभावित झील टूटने का जल-प्रवाह मॉडल

यह हिमालयी आपदाओं की सबसे खतरनाक विशेषताओं में से एक है- पहली आपदा अपने पीछे दूसरी आपदा की जमीन छोड़ सकती है। चीन का 500 घन मीटर प्रति सेकंड वाला मॉडल क्या बताता है? चीन ने संभावित झील टूटने की स्थिति का जल-प्रवाह मॉडल भी तैयार किया है। उसके मुताबिक प्राकृतिक बांध का एक हिस्सा टूटने पर नदी तंत्र में अधिकतम प्रवाह करीब 500 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकता है। चीनी आकलन में यह प्रवाह नदी के किनारों के भीतर रहने की बात कही गई है, फिर भी नीचे बसे इलाकों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी।
“500 घन मीटर प्रति सेकंड” का अर्थ यह नहीं है कि नई बाढ़ पहली आपदा जितनी बड़ी होगी। पहली आपदा में विशाल मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा भी शामिल था। नई झील के टूटने की स्थिति मुख्यतः जमा पानी के अचानक निकलने का खतरा पैदा करेगी। इसलिए दोनों घटनाओं को एक जैसा मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

खतरा कुछ घटा है, खत्म नहीं हुआ

आज की सबसे ताजा स्थिति यही है कि पहली झील के फटने का खतरा शनिवार को कुछ कम आंका गया है, लेकिन दूसरी बड़ी जलराशि की मौजूदगी के कारण जोखिम खत्म नहीं हुआ। चीन ने निगरानी के लिए ड्रोन, उपग्रह, मोबाइल निगरानी कैमरे और विशेष टीम तैनात की है। उधर नेपाल में खराब मौसम के कारण शनिवार को खोज और बचाव अभियान अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। नेपाल अब विदेशी देशों से खोज-बचाव से ज्यादा तकनीकी मदद मांग रहा है—सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने, टूटे संपर्क मार्ग खोलने, शवों की पहचान और डीएनए जांच जैसी विशेषज्ञ सेवाओं के लिए।

नेपाल के वित्त मंत्री के मुताबिक पुनर्निर्माण की शुरुआती जरूरत 4 से 5 अरब डॉलर तक हो सकती है।

हिमालय में खतरे की निगरानी बहुत ऊपर से शुरू करनी होगी

असली सबक: हिमालय में खतरे की निगरानी नीचे नहीं, बहुत ऊपर से शुरू करनी होगी

इस आपदा की सबसे बड़ी सीख शायद यही है।
हम बाढ़ आने के बाद नदी का जलस्तर मापते हैं। लेकिन इस बार बाढ़ का जन्म नदी में नहीं हुआ था। वह हजारों मीटर ऊपर हिमनद और चट्टान के टूटने से शुरू हुई थी।

इसलिए भविष्य की चेतावनी व्यवस्था को तीन स्तरों पर काम करना होगा-
ऊपर: हिमनद, चट्टान और ढलान की लगातार निगरानी।
बीच में: मलबे से बनने वाले प्राकृतिक बांध और नई झीलों की तत्काल पहचान।
नीचे: नदी के जलस्तर, प्रवाह और संभावित सैलाब की कुछ मिनटों में चेतावनी।

और इन तीनों को एक ही साझा प्रणाली में जोड़ना होगा।

क्योंकि 26 अगस्त की घटना ने एक असहज सच सामने रख दिया है-
जिस जगह आपदा पैदा होती है और जहां वह तबाही मचाती है, उनके बीच कई किमी और हजारों मीटर की दूरी हो सकती है।

नेपाल में हिमनद टूटा।
सात मिनट बाद चीन का बंदरगाह तबाह हो गया।
और अब उसी टूटे पहाड़ ने नई झीलें बना दी हैं।

यानी हिमालय में आपदा खत्म होने का मतलब सिर्फ पानी का उतर जाना नहीं है। असली खतरा तब खत्म होगा, जब पहाड़ से निकली पूरी श्रृंखला- मलबा, नदी-अवरोध और नई झीलें फिर से स्थिर हो जाएं।