नेपाल की तबाही में छिपा दूसरा संकट: 933 हाइड्रो कर्मचारी लापता, सुरंगें बनीं ‘मौत का जाल’

नेपाल की तबाही में 933 हाइड्रो कर्मचारी लापता, सुरंगें बनीं मौत का जाल
: नेपाल की हिमालयी तबाही में 933 जलविद्युत परियोजना कर्मी लापता हैं। सुरंगों में मलबा भर जाने से बचाव कार्य चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

903 मौतों और 4,247 लापता लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल- क्या नेपाल का जलविद्युत विकास बदलते हिमालय के खतरे के हिसाब से तैयार है?

एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली

नेपाल की 26 अगस्त की हिमालयी तबाही अब 903 मौतों और 4,247 लापता लोगों की त्रासदी बन चुकी है। लेकिन इस आपदा की सबसे भयावह तस्वीर उन आंकड़ों के भीतर छिपी है, जिनमें 933 लोग ऐसे हैं जो जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े थे और अब तक संपर्क में नहीं हैं। नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के 31 अगस्त सुबह के आंकड़ों के मुताबिक देश में 903 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, 267 घायल हैं और 10,451 लोगों को बचाया जा चुका है। लापता लोगों में 933 जलविद्युत परियोजना कर्मी शामिल हैं। राहत और बचाव में 20,819 सुरक्षा कर्मी लगाए गए हैं।

यही वह बिंदु है जहां नेपाल की यह त्रासदी सिर्फ प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं रह जाती। यह सवाल बन जाती है कि जिस देश ने अपनी नदियों को बिजली और आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार बनाया है, क्या उसी नदी-तंत्र के बदलते खतरे के लिए उसका बुनियादी ढांचा तैयार है?

बाढ़ ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी गलियारों में कई जलविद्युत परियोजनाओं को प्रभावित किया

बाढ़ ने भोटेकोशी और त्रिशूली नदी गलियारों में कई जलविद्युत परियोजनाओं को सीधे प्रभावित किया। करीब आधा दर्जन परियोजनाओं की सुरंगों में मलबा भर गया है और बचाव दल रात-दिन उन्हें खोलने की कोशिश कर रहे हैं। नेपाल की सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल राजा राम बस्नेत के अनुसार, सुरंगों में जमा भारी मलबा बचाव का सबसे बड़ा अवरोध है। ऊपरी त्रिशूली-1 परियोजना में सैकड़ों कर्मचारियों के फंसे होने की आशंका सामने आई है। एक चरण में 576 कर्मचारियों के संपर्क से बाहर होने की सूचना थी; बाद में कई लोगों को बचाया गया, लेकिन करीब 300 लोगों के अब भी सुरंग में फंसे होने की जानकारी परियोजना प्रबंधन ने दी। दूसरी ओर त्रिशूली-3ए में करीब 40-42 तकनीकी कर्मचारियों के फंसे होने की आशंका है।

त्रिशूली-3ए में बचाव दल सुरंग के ऊपरी हिस्से तक पहुंच चुका है। वहां से ऑक्सीजन और कैमरे भीतर भेजने की तैयारी की गई है, ताकि पता लगाया जा सके कि अंदर कोई जीवित है या नहीं। यह सामान्य बचाव अभियान नहीं है। सुरंग में प्रवेश का रास्ता ही मलबे से बंद है, बाहर सड़क और पुल टूट चुके हैं और ऊपर से फिर पानी आने का खतरा बना हुआ है।

नेपाल की बिजली को भी लगा बड़ा झटका, 431 मेगावाट बंद

बाढ़ ने नेपाल की राष्ट्रीय बिजली व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। शुरुआती आकलन में 12 जलविद्युत संयंत्रों की कुल 431.1 मेगावाट क्षमता बंद हो गई थी, जो नेपाल की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का करीब 10 फीसदी है। 15 निर्माणाधीन परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा है। त्रिशूली 3बी का 220 केवी सबस्टेशन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ और कई ट्रांसमिशन लाइनें प्रभावित हुईं। भारत से अतिरिक्त बिजली लेने की जरूरत भी इसी पृष्ठभूमि में सामने आई है। नेपाल की अर्थव्यवस्था में जलविद्युत की भूमिका लगातार बढ़ रही है और वह बिजली निर्यात की महत्वाकांक्षा भी रखता है। ऐसे में एक ही नदी गलियारे में कई परियोजनाओं का एक साथ प्रभावित होना ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी चेतावनी है।

क्या नेपाल का ‘हाइड्रो बूम’ बदलते हिमालय के खतरे से आगे निकल गया?

नेपाल ने अपनी आर्थिक रणनीति में जलविद्युत को केंद्रीय स्थान दिया है। एशियाई विकास बैंक के अनुसार नेपाल विद्युत प्राधिकरण ने 7,000 मेगावाट से ज्यादा नई क्षमता के बिजली खरीद समझौते किए हैं, जिनमें अधिकांश परियोजनाएं नदी के प्रवाह पर आधारित हैं। समस्या यह नहीं कि जलविद्युत परियोजनाएं बनाई जा रही हैं। समस्या यह है कि अब नदी का व्यवहार भी बदल रहा है। ऊपरी त्रिशूली-1 परियोजना के एडीबी आकलन में पहले ही यह दर्ज था कि 2025 में हिमनदी झील फटने की घटना ने निर्माणाधीन परियोजना की कुछ सुविधाओं को नुकसान पहुंचाया और त्रिशूली नदी के स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव किया। इसका अर्थ यह नहीं कि इस साल की तबाही किसी परियोजना की वजह से हुई। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलन हिमनद और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने को मुख्य घटना मानते हैं।

लेकिन सवाल इससे बड़ा है: जब एक ही नदी में पिछले साल हिमनदी झील फटने से नुकसान हो चुका था, तो क्या भविष्य की परियोजनाओं के डिजाइन में ऐसे लगातार बदलते खतरे को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?

यह पारंपरिक ‘ग्लोफ’ नहीं था; असली खतरा घटनाओं की श्रृंखला बनी

नेपाल के इस हादसे को केवल हिमनदी झील फटने वाली बाढ़ मानना वैज्ञानिक रूप से अधूरा होगा। यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग की जलवायु वैज्ञानिक प्रोफेसर मारिया शाहगेदानोवा के अनुसार शुरुआती वैज्ञानिक समझ यह है कि करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ और उसके नीचे की चट्टान का विशाल हिस्सा एक साथ टूट गया। इसके बाद बर्फ, चट्टान और तलछट नीचे आए और नदी को अस्थायी रूप से रोक दिया। इस अवरोध के टूटने पर पानी और मलबे की शक्तिशाली लहर नीचे गई। यानी यह एक घटना नहीं थी। बल्कि- पहाड़ टूटा, बर्फ और चट्टान नीचे आए, नदी का रास्ता रुका, पानी जमा हुआ, अवरोध टूटा, फिर मलबे और पानी की लहर नीचे गई।

असली चेतावनी का समय था, लेकिन निगरानी तंत्र बीच रास्ते में टूट गया

यह इस आपदा का शायद सबसे महत्वपूर्ण और कम चर्चित पहलू है। पड़ताल के मुताबिक 26 अगस्त को नेपाल की सीमा से नीचे आने वाली बाढ़ को नदी के निचले हिस्से तक पहुंचने में कुछ समय लगा, लेकिन शुरुआती निगरानी व्यवस्था भी प्रभावित हो गई। कम से कम चार निगरानी केंद्र बाढ़ में नष्ट हो गए। नेपाल सरकार के आकलन के मुताबिक बाढ़ करीब 168 किलोमीटर नीचे तक गई और लगभग 5.74 करोड़ घन मीटर पानी लेकर चली। नेपाल के जलविज्ञानी सौहार्द्र जोशी ने कहा कि नेपाल को चीन से खास तौर पर यह जानकारी चाहिए थी कि ‘हिमनदों की शुरुआती हलचल’ कब शुरू हो रही है। यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद चेतावनी देने का मतलब कई बार बहुत देर हो सकता है। अगर खतरा हजारों मीटर ऊपर पैदा हुआ है, तो चेतावनी भी वहीं से शुरू होनी चाहिए।

और सबसे बड़ा सवाल: नेपाल ने चीन से चेतावनी मांगी थी, फिर क्या हुआ?

27 मई को नेपाल और चीन के अधिकारियों की बैठक हुई थी। इसमें ग्लेशियर, हिमनदी झील, मौसम और बाढ़ के खतरों की निगरानी बढ़ाने तथा साझा जोखिम मानचित्र तैयार करने पर चर्चा हुई थी। नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें ग्लेशियर की गतिविधियों और पानी के स्तर से जुड़ी उतनी जानकारी नहीं मिली जितनी वे चाहते थे। चीन का कहना है कि उसने महत्वपूर्ण जानकारी समय पर साझा की और दोनों देशों ने सीमा-पार आपदा सूचना साझा करने में प्रगति की थी। यहां चीन को इस आपदा का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। विशेषज्ञों ने कहा है कि सीमित सूचना साझा करना इस खास आपदा की प्रतिक्रिया में निर्णायक कारण नहीं था। लेकिन यही घटना एक बड़ी संस्थागत कमजोरी जरूर सामने लाती है। वाशिंगटन स्थित स्टिमसन सेंटर के पर्यावरण मानवशास्त्री ऑस्टिन लॉर्ड के मुताबिक नेपाल और चीन के बीच इस क्षेत्र में सूचना का आदान-प्रदान अभी बहुत सीमित है और चीन के पास निगरानी के लिए नेपाल की तुलना में कहीं अधिक संसाधन हैं। इसलिए अब सवाल होना चाहिए: क्या हिमालयी आपदाओं की सूचना राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर बंद रह सकती है?

अब राहत से आगे: 4-5 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण और बदलता विकास मॉडल

नेपाल के वित्त मंत्री के शुरुआती अनुमान के मुताबिक इस आपदा के बाद पुनर्निर्माण की जरूरत 4 से 5 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है- करीब देश के वार्षिक आर्थिक उत्पादन का दसवां हिस्सा। लेकिन असली कीमत केवल सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं की मरम्मत नहीं होगी। अगर वही सड़क फिर उसी ढलान पर बनाई गई, वही बिजलीघर उसी जोखिम वाले नदी गलियारे में बना रहा और वही सुरंग बिना नए आपदा मानकों के फिर तैयार हुई, तो पुनर्निर्माण केवल पुराने जोखिम को नए कंक्रीट में बदलना होगा। अब परियोजनाओं के लिए केवल भूकंप, सामान्य बाढ़ और भूस्खलन का आकलन पर्याप्त नहीं होना चाहिए। उन्हें यह भी देखना होगा कि ऊपर किसी ग्लेशियर या चट्टान के टूटने पर क्या होगा, नदी में अचानक कितना मलबा आ सकता है, अस्थायी झील कहां बन सकती है और सुरंग में काम कर रहे लोगों को कितने मिनट में निकाला जा सकता है। विश्व बैंक भी नेपाल में जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे और आपदा जोखिम प्रबंधन को विशेष रूप से जरूरी मानता है और जलविद्युत को जलवायु जोखिम से प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में गिनता है।