
66 MW बिजली परियोजना के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग जांच तेजः कोलकाता के 11 ठिकानों पर ईडी की छापेमारी; प्रमोटर, निदेशक और ऑडिटर भी जांच के घेरे में
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
झारखंड में 66 मेगावाट का बिजली संयंत्र लगाने के लिए बैंकों से लिया गया कर्ज परियोजना पर पूरी तरह खर्च नहीं किया गया। रकम का एक हिस्सा समूह की दूसरी कंपनियों और निजी इस्तेमाल में डायवर्ट कर दिया गया। कंपनी परियोजना पूरी नहीं कर सकी, कर्ज डूब गया और बाद में वह दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच गई। इन सभी आरोपों के चलते अब ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने इसे बैंक धोखाधड़ी और धन का दुरुपयोग मानते हुए इसकी परतें खोलने के लिए कोलकाता में 11 ठिकानों पर तलाशी शुरू की है।
यह तलाशी अभियान समूह के प्रमोटर प्रशांत बोथरा और विजय बोथरा, अन्य निदेशकों और कंपनी से जुड़े ऑडिटरों के कार्यालय में चलाया जा रहा है। मामले में अब जांच की जा रही है कि बिजली परियोजना के नाम पर जुटाया गया बैंक कर्ज आखिर किन रास्तों से दूसरी जगह पहुंचा और उससे किसे फायदा हुआ?
2011 में शुरू हुई थी परियोजना, कई बार बढ़ी समयसीमा
‘तहलका’ की पड़ताल में सामने आए न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक 2011 के आसपास कोहिनूर पॉवर ने झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के कुचीडीह में 66 मेगावाट का कोयला आधारित थर्मल पॉवर प्लांट स्थापित करने की योजना बनाई थी। इसकी अनुमानित लागत करीब ₹349 करोड़ थी, जिसके लिए बैंक ऑफ बड़ौदा की अगुवाई वाले बैंकों के समूह से वित्तीय सहायता ली गई। अदालती रिकॉर्ड में कंपनी द्वारा करीब ₹244 करोड़ की क्रेडिट सुविधा लेने का उल्लेख है। कंपनी ने संयंत्र शुरू करने की समयसीमा पहले जनवरी 2013 रखी थी। इसे बाद में जनवरी 2015 और फिर दिसंबर 2016 तक बढ़ाया गया। लेकिन परियोजना पूरी नहीं हो सकी और कंपनी ने नई पूंजी लगाने में असमर्थता जताई।
परियोजना नहीं बनी, कर्ज एनपीए हो गया
परियोजना में देरी के बीच कंपनी की वित्तीय स्थिति बिगड़ती गई। बैंक ऑफ बड़ौदा ने 1 सितंबर 2015 को कंपनी के खाते को एनपीए घोषित कर दिया। इसके बाद कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई और अंततः वह परिसमापन तक पहुंच गई। आईबीबीआई के रिकॉर्ड में कोहिनूर पॉवर की कॉरपोरेट दिवालिया प्रक्रिया 3 अगस्त 2018 को स्वीकार किए जाने और 4 अक्टूबर 2019 को परिसमापन का आदेश दिया गया। जिस परियोजना के लिए बैंकों के कंसोर्टियम से पैसा जुटाया गया था, वह पूरी नहीं हुई और कंपनी की परिसंपत्तियां कर्ज की भरपाई के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुईं।
ईडी का आरोप: परियोजना के बजाय दूसरी जगह गया पैसा
अब इस पूरे मामले में ईडी का फोकस फंड डायवर्जन पर है। जांच एजेंसी के अनुसार, कंपनी ने कर्ज की रकम को कथित तौर पर दूसरी समूह इकाइयों और निजी उपयोग की ओर मोड़ा गया। यही वह कड़ी है जिसे ईडी अब बैंक खातों, कंपनी के दस्तावेजों और संबंधित व्यक्तियों की वित्तीय गतिविधियों के जरिए जोड़ने की कोशिश कर रही है। हालांकि, किसी रकम का दूसरी कंपनी में जाना अपने आप में अवैध नहीं होता। जांच का निर्णायक सवाल यह होगा कि क्या ये लेनदेन वास्तविक कारोबारी जरूरतों के लिए थे या बैंक से लिए गए कर्ज को उसके स्वीकृत उद्देश्य से हटाकर जानबूझकर दूसरी जगह लगाया गया?
बैंक ने कितना कर्ज दिया था और दावा कितना बड़ा था?
यहां इस मामले की एक महत्वपूर्ण परत सामने आती है। कलकत्ता हाईकोर्ट के 2025 के एक फैसले में दर्ज रिकॉर्ड के मुताबिक कोहिनूर पॉवर ने बैंक ऑफ बड़ौदा की अगुवाई वाले बैंक समूह से करीब ₹244 करोड़ की क्रेडिट सुविधा ली थी। बाद में बैंक का खाता एनपीए हो गया। दूसरी ओर, आईबीबीआई के आंकड़ों में कंपनी के खिलाफ स्वीकार किए गए वित्तीय लेनदारों के दावे ₹482.95 करोड़ दर्ज हैं। कंपनी के खिलाफ कुल स्वीकृत दावे भी इसी के आसपास थे। इस अंतर को समझना जरूरत है- ₹290 करोड़ ईडी की मौजूदा जांच में बताए गए बैंक फ्रॉड की रकम है, जबकि ₹482.95 करोड़ दिवाला प्रक्रिया में स्वीकार किए गए वित्तीय लेनदारों के दावों का आंकड़ा है।
कंपनी पहले ही परिसमापन में जा चुकी है
कोहिनूर पॉवर अब सामान्य कारोबारी गतिविधि वाली कंपनी नहीं है। आईबीबीआई के आधिकारिक रिकॉर्ड में यह कंपनी परिसमापन के तहत दर्ज है और इसके परिसमापक के रूप में योगेश गुप्ता का नाम दर्ज है। एनसीएलटी और एनसीएलएटी के रिकॉर्ड भी पिछले वर्षों में कंपनी के परिसमापन से जुड़े कई मामलों की पुष्टि करते हैं। इसका अर्थ है कि अब जांच का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य केवल यह देखना नहीं है कि कंपनी ने कर्ज क्यों नहीं चुकाया, बल्कि यह पता लगाना भी है कि कर्ज की रकम और कंपनी की परिसंपत्तियों के साथ वास्तव में क्या हुआ?
मामला ईडी से पहले भी जांच एजेंसियों के पास
कोहिनूर पॉवर से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं की जांच सिर्फ मौजूदा ईडी कार्रवाई तक सीमित नहीं है। कंपनी के खिलाफ गंभीर सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन आफिस (एसएफआईओ) की जांच भी हुई। 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट के सामने केंद्र सरकार और एसएफआईओ की ओर से बताया गया कि कंपनी के मामलों की जांच के बाद एसएफआईओ ने संबंधित आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी और केंद्र सरकार ने अभियोजन की अनुमति दी थी। एसएफआईओ की जांच की शुरुआत भी कंपनी की दिवालिया प्रक्रिया के दौरान सामने आए कथित फर्जीवाड़े से हुई थी। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक कंपनी के समाधान पेशेवर की ओर से कथित धोखाधड़ी की जानकारी केंद्र सरकार तक पहुंचाई गई थी, जिसके बाद केंद्र सरकार ने 2020 में एसएफआईओ को जांच सौंपने की कार्रवाई की।
फॉरेंसिक ऑडिट में भी उठे थे सवाल
कलकत्ता हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान नियुक्त फॉरेंसिक ऑडिटर की रिपोर्ट के आधार पर एनसीएलटी में एक ‘एवॉयडेंस एप्लीकेशन’ दाखिल की गई थी। एसएफआईओ की ओर से अदालत में बताया गया था कि इस प्रक्रिया में करीब ₹3.5 करोड़ और ब्याज से जुड़ी वसूली की मांग की गई थी। हालांकि, यह राशि मौजूदा ईडी द्वारा बताए गए ₹290 करोड़ के बैंक फ्रॉड की कुल रकम नहीं है। यह दिवाला कानून के तहत कथित संदिग्ध लेनदेन से संबंधित एक अलग कार्रवाई थी।
प्रमोटरों के खिलाफ जांच इतनी महत्वपूर्ण क्यों?
मौजूदा कार्रवाई में प्रमोटर प्रशांत बोथरा और विजय बोथरा से जुड़े परिसरों को शामिल किया जाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी के वित्तीय फैसलों और समूह की अन्य इकाइयों के साथ लेनदेन की कड़ी यहीं से जुड़ सकती है। अतीत के न्यायिक रिकॉर्ड में दोनों के कंपनी के निदेशक होने का उल्लेख मिलता है। एक मामले में कोहिनूर पॉवर द्वारा जारी ₹62.50 लाख के चेक के भुगतान में विफलता से जुड़ी कार्यवाही भी अदालत के सामने आई थी। हालांकि, चेक बाउंस या कर्ज चुकाने में विफलता अपने आप में बैंक फ्रॉड या मनी लॉन्ड्रिंग साबित नहीं करती। मौजूदा ईडी जांच में प्रमोटरों की भूमिका का निर्धारण अलग से साक्ष्यों के आधार पर होगा।
ऑडिटर के ठिकाने पर छापे का क्या मतलब है?
ईडी ने प्रमोटरों और निदेशकों के साथ ऑडिटरों के कार्यालयों को भी तलाशी के दायरे में रखा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ऑडिटर को दोषी माना गया है। लेकिन जांच एजेंसी संभवतः यह देखना चाहती है कि कंपनी के खातों में दर्ज लेनदेन और वास्तविक धन प्रवाह के बीच कोई अंतर था या नहीं? जांच का एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी हो सकता है कि अगर बैंक कर्ज को दूसरी इकाइयों या निजी इस्तेमाल की ओर मोड़ा गया, तो कंपनी के खातों और ऑडिट दस्तावेजों में इन लेनदेन को किस तरह दर्ज किया गया था?
बैंक के पैसे की वापसी इतनी कम क्यों हुई?
यह पूरे मामले का सबसे बड़ा आर्थिक सवाल है। ईडी के मुताबिक, कंपनी के परिसमापन के बाद लेनदारों के लिए करीब ₹7 करोड़ ही वसूल हो सके। दूसरी ओर, आईबीबीआई के रिकॉर्ड में वित्तीय लेनदारों के स्वीकार किए गए दावों की राशि ₹482.95 करोड़ दर्ज है। अगर इन दोनों आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो सवाल उठता है कि कंपनी के पास कर्ज चुकाने के लिए पर्याप्त परिसंपत्तियां क्यों नहीं बचीं और क्या कर्ज की रकम का कोई हिस्सा पहले ही कंपनी से बाहर जा चुका था? यही सवाल अब जांच एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण है।
अब ईडी की जांच किन कड़ियों पर होगी?
2 सितंबर की तलाशी के बाद जांच के केंद्र में मुख्यतः ये सवाल हैं-
पहला: बैंक से मिले कर्ज की पूरी रकम का इस्तेमाल कहां हुआ?
दूसरा: समूह की किन कंपनियों को रकम ट्रांसफर की गई?
तीसरा: इन लेनदेन के पीछे वास्तविक कारोबारी कारण था या नहीं?
चौथा: कथित तौर पर निजी इस्तेमाल में कितनी रकम गई?
पांचवां: क्या कर्ज की रकम से ऐसी संपत्तियां बनाई गईं, जिन्हें बाद में प्रमोटरों या उनसे जुड़ी संस्थाओं के लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया?
छठा: कंपनी के खातों और ऑडिट रिकॉर्ड में इन लेनदेन को किस तरह दिखाया गया?
ईडी की मौजूदा जांच, बैंक खातों और दस्तावेजों की पड़ताल के बाद इन सवालों का जवाब सामने आना बाकी है। अभी एजेंसी की ओर से लगाए गए आरोप जांच के चरण में हैं और अदालत में साबित होना बाकी है।



