पानी की लड़ाई अब कानून की अदालत में पहुंची
सिंधु नदी का पानी सदियों से भारत और पाकिस्तान के बीच शांति और तनाव, दोनों की वजह बनता रहा है। अब इस पुराने विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया है। 31 अगस्त 2026 को नीदरलैंड के हेग शहर में बैठे पंचाट न्यायालय (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) ने साफ कह दिया कि 1960 की सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) “पूरी तरह लागू” है और भारत इसे अपने मन से रोक नहीं सकता। बस कुछ ही घंटों बाद भारत ने इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया, और कहा कि इस अदालत को कोई अधिकार ही नहीं है।
यह टकराव सिर्फ कानूनी नहीं है, बल्कि इसमें कश्मीर, आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और दो पड़ोसी देशों के आपसी भरोसे की पूरी कहानी छिपी है।
अदालत ने आखिर क्या कहा
पाकिस्तान की शिकायत पर विश्व बैंक ने 2023 में पांच सदस्यों वाला यह पंचाट न्यायालय बनाया था, ताकि किशनगंगा और रातले जलविद्युत परियोजनाओं पर चल रहे विवाद को सुलझाया जा सके। इस अदालत ने दो बड़े फैसले सुनाए।
पहला, संधि की स्थिति पर। भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को “स्थगित” (abeyance में) कर दिया था। अदालत ने कहा कि इस संधि में किसी भी देश को इसे अकेले रोकने, खत्म करने या टालने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। जब तक दोनों देश मिलकर कोई नई संधि नहीं करते, यह पूरी तरह बाध्यकारी बनी रहेगी।
दूसरा, भारत ने जो भी वजहें गिनाई थीं जैसे संप्रभुता, पाकिस्तान का कथित उल्लंघन, आतंकवाद, बदलती आबादी और तकनीक, जलवायु परिवर्तन और सैन्य टकराव, अदालत ने एकमत होकर कहा कि इनमें से कोई भी वजह कानूनी रूप से संधि रोकने के लिए काफी नहीं है।
साथ ही अदालत ने चेनाब नदी पर बन रहे रातले जलविद्युत प्लांट को लेकर भी अंतरिम आदेश दिया। भारत को कहा गया कि वह बांध की दीवार और पावर-इनटेक ढांचे पर तय सीमा से ऊपर कंक्रीट का काम अभी रोक दे। यह रोक तब तक रहेगी जब तक विश्व बैंक द्वारा नियुक्त तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) इस प्रोजेक्ट के डिजाइन पर अपना अंतिम फैसला नहीं दे देता, जिसकी उम्मीद जुलाई 2027 तक है।
मतलब यह कि जब तक कुछ और नहीं बदलता, भारत को पश्चिमी नदियों यानी सिंधु, झेलम और चेनाब पर बन रहे प्रोजेक्ट्स के डिजाइन और संचालन में संधि की शर्तें मानते रहना होगा, जबकि पूर्वी नदियां रावी, ब्यास और सतलुज पूरी तरह भारत के अधिकार में रहती हैं।
भारत का दो टूक जवाब
विदेश मंत्रालय ने सोमवार को तीखा बयान जारी करते हुए इस फैसले को “तथाकथित अवार्ड” बताया। मंत्रालय ने कहा कि विश्व बैंक ने यह पंचाट न्यायालय ही संधि की शर्तों का “स्पष्ट उल्लंघन” करके बनाया था, और भारत ने कभी इस अदालत के कानूनी अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं किया, न ही उसकी किसी सुनवाई में हिस्सा लिया।
मंत्रालय के शब्दों में साफ संदेश था, “इसके फैसलों का, अभी हो या आगे कभी हो, भारत की परियोजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का फैसला जैसा है, वैसा ही बना रहेगा।”
याद रहे, भारत ने यह संधि 23 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद स्थगित की थी, और कहा था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को “भरोसेमंद और स्थायी रूप से” खत्म नहीं करता, यह स्थगन जारी रहेगा।
पाकिस्तान की खुशी, पर सावधानी भी
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने इस फैसले को अपने देश की बड़ी जीत बताया। उनका कहना था कि यह अदालत “भारत की गैरकानूनी कोशिश को साफ तौर पर खारिज करती है” और भारत को संधि के तहत अपनी सारी जिम्मेदारियां और अदालत के बाध्यकारी फैसले पूरी तरह मानने होंगे।
पाकिस्तान ने यह भी कहा कि वह इस आदेश की बारीकियों को अभी अच्छे से पढ़ेगा, और उम्मीद जताई कि यह संधि पर दोबारा बातचीत शुरू करने का एक रास्ता बन सकता है। इसी बीच, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के बिश्केक सम्मेलन में 1 सितंबर को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने कहा कि पानी को हथियार नहीं बनाना चाहिए, और साझा नदियों से जुड़ी संधियां “पवित्र वचन” होती हैं।
आगे क्या होगा
यहां असली सवाल यह है कि अदालत का फैसला अपने आप में भारत या पाकिस्तान के जमीनी व्यवहार को कितना बदल पाएगा। पंचाट न्यायालय अपने अवार्ड को अंतिम और बाध्यकारी मानता है, लेकिन अगर कोई देश उसे मानने से ही इनकार कर दे, तो उसे लागू कराने का कोई सीधा तरीका नहीं है। कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह कानूनी जीत भारत की नीति में तुरंत कोई बदलाव नहीं लाएगी।
अगला बड़ा पड़ाव रातले प्रोजेक्ट पर तटस्थ विशेषज्ञ का फैसला होगा, जो जुलाई 2027 तक आने की उम्मीद है। तब तक अदालत की तरफ से लगाई गई निर्माण संबंधी रोक जारी रहेगी।
यह भी पहली बार नहीं है जब हेग की अदालत ने भारत के खिलाफ फैसला दिया हो। जून 2025 में अदालत ने अपनी क्षमता (Competence) को लेकर एक सप्लीमेंटल अवार्ड दिया था, और मई 2026 में जलविद्युत परियोजनाओं में अधिकतम पौंडेज (pondage) सीमा पर भी पाकिस्तान के पक्ष में फैसला आया था। भारत हर बार इन फैसलों को “शून्य और अमान्य” कहकर खारिज करता रहा है।
निचोड़
कानून की किताब में पाकिस्तान का पक्ष मजबूत दिख रहा है, लेकिन असली ताकत अब भी नई दिल्ली के हाथ में है, जो कह रही है कि वह किसी विदेशी अदालत के सामने अपनी संप्रभुता समर्पित नहीं करेगी। सिंधु जल संधि की यह लड़ाई अब सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि यह तय करने की भी है कि दक्षिण एशिया में अंतरराष्ट्रीय कानून का असली वजन कितना है।




