
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
सह अध्यक्ष ने ही वित्तीय पारदर्शिता, लॉ कॉलेजों से कथित योगदान, नियुक्तियों और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए वरिष्ठ अधिवक्ता वाईआर सदाशिव रेड्डी ने अध्यक्ष मनन मिश्रा से 15 दिन के भीतर इस्तीफा देने को कहा, छह पन्नों के पत्र में उन्होंने करीब 150 करोड़ रुपये के कथित फंड हस्तांतरण, लॉ कॉलेजों से कथित ‘योगदान’ मांगने, नियुक्तियों में पारदर्शिता और नालसार मामले में एकतरफा कार्रवाई समेत कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
सह-अध्यक्ष के पत्र से BCI में भूकंप, इस्तीफे और विशेष ऑडिट की मांग
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के सह-अध्यक्ष वाईआर सदाशिव रेड्डी ने पत्र लिखकर बीसीआई के भीतर भूकंप ला दिया है। उन्होंने अपने अध्यक्ष मनन मिश्रा से इस्तीफे की मांग करते हुए विशेष बैठक बुलाने और इससे पहले संबंधित रिकॉर्ड सभी सदस्यों के सामने रखने की मांग की है। उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया और बीसीआई ट्रस्ट पर्ल-फर्स्ट के गठन से अब तक के खातों का स्वतंत्र विशेष ऑडिट कराने को कहा है। इसके लिए भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग से सूचीबद्ध स्वतंत्र ऑडिट फर्म की मदद लेने और रिपोर्ट बीसीआई सदस्यों के साथ सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
150 करोड़ रुपये का फंड ट्रांसफर: पुराने ट्रस्ट को निष्क्रिय कर नया ट्रस्ट बनाया गया
सबसे गंभीर आरोप करीब 150 करोड़ रुपये को लेकर है। रेड्डी का दावा है कि पुराने बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट को निष्क्रिय करने के बाद 17 सितंबर 2020 को बीसीआई ट्रस्ट पर्ल-फर्स्ट बनाया गया और बीसीआई की राशि इस नए ट्रस्ट में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव लाया गया। उन्होंने सवाल उठाया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में किसी वैधानिक नियामक संस्था की राशि को इस तरह किसी ट्रस्ट में स्थानांतरित करने का क्या आधार है।
बीसीआई वेबसाइट पर भी दर्ज है BCI ट्रस्ट पर्ल-फर्स्ट, गोवा में यूनिवर्सिटी संचालित
यहां एक अहम तथ्य यह है कि बीसीआई की अपनी वेबसाइट भी बीसीआई ट्रस्ट पर्ल-फर्स्ट को मौजूदा ट्रस्ट के रूप में दर्ज करती है और बताती है कि इसी ट्रस्ट के जरिए गोवा में इंडिया इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लीगल एजुकेशन एंड रिसर्च संचालित की जा रही है। इसलिए विवाद केवल “ट्रस्ट है या नहीं” का नहीं, बल्कि उसकी वित्तीय संरचना, फंड के स्रोत और बीसीआई से उसके संबंध की पारदर्शिता का है।
लॉ कॉलेजों से 25 लाख से 1 करोड़ तक के ‘योगदान’ मांगने का गंभीर आरोप
रेड्डी ने लॉ कॉलेजों से कथित तौर पर 25 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के ‘योगदान’ मांगे जाने का आरोप भी लगाया है। उन्होंने बीसीआई से ऐसे सभी भुगतान तत्काल रोकने की मांग की है। यह आरोप इसलिए गंभीर है क्योंकि बीसीआई को अधिवक्ता अधिनियम के तहत कानून की शिक्षा के मानक तय करने और विश्वविद्यालयों को मान्यता देने का वैधानिक अधिकार हासिल है।
नालसार विवाद ने बढ़ाई आग, 14 साल से नेतृत्व पर भी सवाल
रेड्डी ने 13 अगस्त के नालसार विश्वविद्यालय मामले को भी इस्तीफे के आधारों में शामिल किया है। बीसीआई अध्यक्ष के कार्यालय से उस समय 2026 बैच के छात्रों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था। बाद में तीखी आलोचना के बीच यह आदेश वापस ले लिया गया। मनन मिश्रा ने भी बाद में माना कि शुरुआती कार्रवाई जल्दबाजी में हुई थी।
रेड्डी का आरोप: बैठक में सामग्री रखे बिना लिया गया निर्णय, छात्रों को प्रताड़ित करने जैसी कार्रवाई
रेड्डी का आरोप है कि यह निर्णय बीसीआई की बैठक में संबंधित सामग्री रखे बिना लिया गया। उन्होंने इसे छात्रों को उनके विचार व्यक्त करने के लिए प्रताड़ित करने जैसी कार्रवाई बताया है। इन आरोपों को फिलहाल रेड्डी के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए; इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मनन मिश्रा की ओर से इन वित्तीय और प्रशासनिक आरोपों पर विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है।
2012 से लगातार अध्यक्ष पद पर मिश्रा, संस्थागत जवाबदेही का सवाल
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बीसीआई की अपनी संवैधानिक जानकारी के अनुसार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव परिषद अपने सदस्यों में से करती है और कार्यकाल दो वर्ष का होता है। रेड्डी ने आरोप लगाया है कि मिश्रा 2012 से लगातार अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं और इसे लेकर संस्थागत जवाबदेही का सवाल उठाया है।
विवाद केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे का नहीं, पूरे कानूनी तंत्र से जुड़ा मामला
अब यह विवाद केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे का मामला नहीं है। बीसीआई देश में वकीलों के पेशेवर आचरण, कानूनी शिक्षा के मानक और कानून की डिग्री देने वाले विश्वविद्यालयों की मान्यता जैसे महत्वपूर्ण मामलों में वैधानिक भूमिका निभाता है। इसलिए उसके फंड, निर्णय प्रक्रिया और नियामक शक्तियों के इस्तेमाल पर उठे आरोपों की स्वतंत्र जांच का महत्व पूरे कानूनी तंत्र से जुड़ता है।



