
रुखसार- तहलका
नई दिल्ली — 01 अक्टूबर, 2026 —
संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC ने 1 अक्टूबर 2026 को अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर लिए। इस ऐतिहासिक मौके पर नई दिल्ली के भारत मंडपम में UPSC का शताब्दी समारोह आयोजित किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया और सभा को संबोधित किया। यह कार्यक्रम पिछले एक साल से चल रहे UPSC के शताब्दी समारोह का समापन है। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को आयोजित दो दिवसीय समारोह में देशभर के राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद और UPSC से जुड़े अधिकारी शामिल हुए।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में UPSC की 100 साल की संस्थागत यात्रा के साथ-साथ परीक्षा और भर्ती व्यवस्था में समय की निश्चितता, तकनीक, दक्षता और अभ्यर्थी-केंद्रित सुधार की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि सिविल सेवाओं (Civil Services) में केवल ज्ञान और परीक्षा में सफलता पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्तव्य, नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी और सेवा भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
UPSC की प्रतियोगी परीक्षा की शुरुआत 1855 में कैसे हुई?
UPSC के 100 साल के सफर को समझने के लिए इसकी शुरुआत से भी पहले जाना जरूरी है।
भारत में आधुनिक प्रतियोगी सिविल सेवा भर्ती की शुरुआत 1855 में भारतीय सिविल सेवा यानी ICS परीक्षा से मानी जाती है। इससे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवाओं में नियुक्तियां मुख्य रूप से नामांकन के जरिए होती थीं। 1855 में खुली प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था शुरू हुई।
हालांकि शुरुआती व्यवस्था भारतीयों के लिए आसान नहीं थी। परीक्षा लंदन में आयोजित होती थी और अंग्रेजी माध्यम में होती थी। बाद में 1922 में ICS परीक्षा भारत में भी आयोजित की गई। इस बदलाव ने भारतीय उम्मीदवारों के लिए परीक्षा तक पहुंच का दायरा बढ़ाया।
भारत में पहला लोक सेवा आयोग कब बना था?
भारत सरकार अधिनियम, 1919 में लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया। इसके बाद ली आयोग (Lee Commission) ने 1924 में भारत में एक वैधानिक लोक सेवा आयोग स्थापित करने की सिफारिश की।
इसके दो साल बाद, 1 अक्टूबर 1926 को भारत में पहला लोक सेवा आयोग गठित हुआ। इसके पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे। शुरुआत में आयोग की भूमिका आज के UPSC की तरह व्यापक नहीं थी। यह मुख्य रूप से सरकार को सरकारी सेवाओं में भर्ती और सेवा संबंधी मामलों पर सलाह देने वाला निकाय था।
यहीं से उस संस्थागत यात्रा की शुरुआत हुई जो अगले 100 वर्षों में एक संवैधानिक संस्था तक पहुंची।
1935 के बाद लोक सेवा आयोग का स्वरूप कैसे बदला?
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के बाद लोक सेवा आयोग के स्वरूप में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ और संघीय लोक सेवा आयोग अस्तित्व में आया।
आजादी के बाद इसी संस्थागत व्यवस्था ने आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संघ लोक सेवा आयोग का रूप लिया।
यानी 1926 का सीमित सलाहकारी लोक सेवा आयोग धीरे-धीरे ऐसी संस्था में विकसित हुआ जिसकी भूमिका भर्ती से आगे बढ़कर सरकारी सेवाओं की व्यापक व्यवस्था तक पहुंची।
UPSC को संवैधानिक दर्जा कब मिला?
भारत के गणतंत्र बनने के साथ UPSC की स्थिति में सबसे बड़ा बदलाव आया।
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ संघीय लोक सेवा आयोग का नाम संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC हो गया। इसे संविधान के तहत स्वतंत्र संवैधानिक संस्था का दर्जा मिला।
लोक सेवा आयोगों से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था संविधान के भाग XIV और अनुच्छेद 315 से 323 में दी गई है।
यही संवैधानिक ढांचा UPSC की स्वतंत्रता, कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियों का आधार है।
अनुच्छेद 320: UPSC सिर्फ IAS की परीक्षा कराने वाली संस्था नहीं
आम तौर पर UPSC का नाम सुनते ही सिविल सेवा परीक्षा (Civil Services Examination) और IAS का ख्याल आता है, लेकिन आयोग की भूमिका इससे कहीं व्यापक है।
संविधान के अनुच्छेद 320 के तहत UPSC संघ की सेवाओं के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है और भर्ती के तरीकों, नियुक्तियों, पदोन्नति, स्थानांतरण और कुछ अनुशासनात्मक मामलों पर सरकार को सलाह देता है।
आयोग की गतिविधियां केवल सिविल सेवा परीक्षा तक सीमित नहीं हैं। UPSC अलग-अलग क्षेत्रों में लगभग 250 भर्ती प्रक्रियाएं संचालित करता है। इनमें इंजीनियरिंग, चिकित्सा, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्र और रक्षा जैसे क्षेत्रों से जुड़ी भर्तियां शामिल हैं। आयोग की परीक्षा कैलेंडर की योजना भी काफी पहले की जाती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा के तीन चरण क्या हैं?
UPSC की सबसे चर्चित परीक्षा सिविल सेवा परीक्षा (Civil Services Examination) है।
इसी परीक्षा के जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी IAS, भारतीय पुलिस सेवा यानी IPS और कई अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए उम्मीदवारों का चयन किया जाता है।
परीक्षा की प्रक्रिया broadly तीन चरणों में होती है:
प्रारंभिक परीक्षा → मुख्य परीक्षा → व्यक्तित्व परीक्षण
हर वर्ष लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा के लिए आवेदन करते हैं, जबकि अंतिम रूप से चयनित उम्मीदवारों की संख्या इससे काफी कम होती है।
यही वजह है कि UPSC की परीक्षा सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के लिए लंबे समय की करियर योजना का हिस्सा बन चुकी है।
100 साल में UPSC की परीक्षा प्रणाली कैसे बदली?
एक सदी में UPSC की परीक्षा प्रणाली में भी बड़ा बदलाव आया है।
औपनिवेशिक दौर की ICS परीक्षा और आज की सिविल सेवा परीक्षा में पाठ्यक्रम, भाषाओं, परीक्षा प्रारूप और चयन प्रक्रिया में व्यापक अंतर है।
आज प्रारंभिक परीक्षा में वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न, मुख्य परीक्षा में वर्णनात्मक प्रश्नपत्र और इसके बाद व्यक्तित्व परीक्षण होता है।
इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य उम्मीदवार के केवल तथ्यात्मक ज्ञान को जांचना नहीं, बल्कि उसकी तर्क क्षमता, विश्लेषणात्मक क्षमता, लेखन कौशल, निर्णय और निर्णय लेने की क्षमता जैसी क्षमताओं का आकलन करना भी है।
UPSC Chairman डॉ. अजय कुमार ने 30 सितंबर के ‘मंथन’ कार्यक्रम में भी कहा कि परीक्षा में उम्मीदवार की पहले से तैयार या रटाए गए उत्तर दोहराने की क्षमता के बजाय तर्क क्षमता, तत्काल सोचने की क्षमता और अस्पष्ट परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता का आकलन महत्वपूर्ण है।
UPSC में महिलाओं और छोटे शहरों के उम्मीदवारों की भागीदारी कैसे बदली?
UPSC की 100 साल की कहानी भारत में बदलती सामाजिक भागीदारी की कहानी भी है।
शुरुआती दौर में उच्च प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच सीमित थी। स्वतंत्र भारत में समान अवसर और आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्थाओं के साथ भर्ती प्रक्रिया में सामाजिक भागीदारी का दायरा बढ़ा।
आज महिलाओं, छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले उम्मीदवारों की भागीदारी सिविल सेवाओं में पहले की तुलना में काफी व्यापक है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1952 में आयोग द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 3.6 प्रतिशत थी, जबकि CSE 2025 में यह आंकड़ा 31.2 प्रतिशत तक पहुंच गया।
यह बदलाव UPSC की परीक्षा तक पहुंचने वाले उम्मीदवारों के सामाजिक और भौगोलिक आधार में आए परिवर्तन को दिखाता है।
PM मोदी ने UPSC भर्ती में ‘समय की निश्चितता’ पर जोर क्यों दिया?
भारत मंडपम में UPSC के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया में ‘समय की निश्चितता’ पर विशेष जोर दिया।
उनका तर्क था कि किसी उम्मीदवार के लिए परीक्षा केवल एक दिन होने वाली परीक्षा नहीं होती। आवेदन से लेकर तैयारी, परीक्षा, परिणाम और नियुक्ति तक पूरी प्रक्रिया उसके जीवन की योजना से जुड़ी होती है।
ऐसे में यदि परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में अनिश्चितता और देरी होती है तो अभ्यर्थियों पर कोचिंग, किराये, यात्रा और अन्य खर्चों का आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। लंबे इंतजार से मानसिक और भावनात्मक दबाव भी बढ़ सकता है।
इसीलिए प्रधानमंत्री ने परीक्षा व्यवस्था में तेजी, दक्षता और समय की निश्चितता को महत्वपूर्ण सुधार के रूप में रेखांकित किया।
यानी उनका संदेश सिर्फ “परीक्षा जल्दी कराएं” तक सीमित नहीं था, बल्कि भर्ती प्रक्रिया को अधिक पूर्वानुमान योग्य बनाने से जुड़ा था।
UPSC और राज्य लोक सेवा आयोग एक-दूसरे से क्या सीख सकते हैं?
प्रधानमंत्री ने UPSC और राज्य लोक सेवा आयोगों के बीच बेहतर प्रक्रियाएं साझा करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाए जा रहे भर्ती मॉडलों का अध्ययन करने और तकनीक की मदद से परीक्षा व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने की बात कही।
इसमें जहां संभव हो, प्रक्रियाओं में मानकीकरण और बेहतर समन्वय लाने का विचार भी शामिल है।
इसका उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया को अधिक आधुनिक और दक्ष बनाने के साथ-साथ अलग-अलग लोक सेवा आयोगों में बेहतर प्रक्रियाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।
सिविल सेवा में ज्ञान के साथ सेवा भावना क्यों जरूरी है?
PM मोदी के संबोधन का दूसरा बड़ा संदेश सिविल सेवाओं की भूमिका से जुड़ा था।
उन्होंने यह रेखांकित किया कि सरकारी सेवा में आने का अर्थ केवल परीक्षा पास करना या प्रशासनिक पद हासिल करना नहीं है। सिविल सेवकों के लिए कर्तव्य, नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी और लोकसेवा की भावना भी महत्वपूर्ण है।
यानी UPSC की परीक्षा सफलता का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि लोकसेवा की शुरुआत के रूप में देखी जानी चाहिए।
इसी व्यापक विचार के तहत ‘राष्ट्र प्रथम, नागरिक प्रथम’ जैसे सेवा-केंद्रित सिद्धांतों का भी संदर्भ सामने आया। प्रधानमंत्री पहले भी सिविल सेवाओं से जुड़े अपने संबोधनों में इस सिद्धांत पर जोर देते रहे हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उदाहरण PM मोदी ने क्यों दिया?
UPSC के इतिहास और सिविल सेवाओं की विरासत की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उदाहरण भी दिया।
सुभाष चंद्र बोस ने 1920 में भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास की थी। UPSC के शताब्दी समारोह में इतिहास से जुड़े प्रदर्शनों और उस दौर की परीक्षा व्यवस्था का संदर्भ देते हुए मोदी ने उनके उदाहरण को सिविल सेवा की आकांक्षा और देश के व्यापक स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
यह उदाहरण इस बात को रेखांकित करने के लिए इस्तेमाल किया गया कि भारतीय युवाओं और सार्वजनिक सेवा की आकांक्षा का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन के दौर तक जाता है।
सरदार पटेल ने सिविल सेवाओं को ‘Steel Frame’ क्यों कहा था?
प्रधानमंत्री ने सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान का भी उल्लेख किया।
आजादी के बाद भारत के सामने केवल स्वतंत्रता को कायम रखने की चुनौती नहीं थी, बल्कि एक नए राष्ट्र की प्रशासनिक संस्थाओं को मजबूत करने की चुनौती भी थी।
21 अप्रैल 1947 को सरदार पटेल ने Metcalfe House में सिविल सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित किया था। इसी ऐतिहासिक संदर्भ में सिविल सेवाओं को भारत के प्रशासनिक ढांचे का महत्वपूर्ण ‘Steel Frame’ बताया गया था।
UPSC की 100 साल की यात्रा में यह प्रसंग भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि स्वतंत्र भारत के निर्माण में प्रशासनिक सेवाओं की भूमिका को किस तरह देखा गया।
Captain Smit Machchhar की तारीफ में PM मोदी ने क्या कहा?
UPSC समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के दौरान Captain Smit Machchhar का भी उल्लेख किया।
फ्लाईदुबई की दुबई-तेल अवीव उड़ान में हुई घटना के संदर्भ में उन्होंने भारतीय पायलट की तत्काल सूझबूझ, साहस और यात्रियों की सुरक्षा के लिए दिखाई गई तत्परता की प्रशंसा की।
मोदी ने बताया कि उन्होंने Captain Smit के परिवार से बात की और उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की। उन्होंने कहा कि उनके साहस पर देश को गर्व है।
प्रधानमंत्री ने इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के उस बयान का भी जिक्र किया जिसमें घटना को संभावित 9/11 जैसी त्रासदी से जोड़कर Captain Smit की भूमिका की प्रशंसा की गई थी।
यह उदाहरण UPSC के संदर्भ में कर्तव्य, तत्काल सूझबूझ, जिम्मेदारी और दूसरों की सुरक्षा के लिए निर्णय लेने की भावना से जोड़ा गया।
UPSC की परीक्षाओं में कौन-से डिजिटल बदलाव हुए हैं
100 साल पुरानी संस्था अब परीक्षा प्रणाली को तकनीक के जरिए आधुनिक बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।
UPSC ने डिजिटल ई-प्रवेश पत्र, चेहरे का प्रमाणीकरण, यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर, यादृच्छिक साक्षात्कार बोर्ड और उम्मीदवार सहायता केंद्र जैसे उपाय अपनाए हैं।
AI फेस ऑथेंटिकेशन से UPSC उम्मीदवारों की पहचान कैसे जांचता है?
2025 में चुनिंदा परीक्षा केंद्रों पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चेहरे के प्रमाणीकरण का परीक्षण किया गया।
इसके बाद 24 मई 2026 को सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में इसे बड़े स्तर पर लागू किया गया, जिसमें लगभग 5.50 लाख उम्मीदवार शामिल हुए।
यह प्रणाली परीक्षा पर्यवेक्षकों के मोबाइल फोन के जरिए चेहरे का प्रमाणीकरण करती है और प्रत्येक उम्मीदवार के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया में लगभग 6 से 8 सेकंड लगते हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य उम्मीदवार की पहचान की पुष्टि और परीक्षा सुरक्षा को मजबूत करना तथा परीक्षा की विश्वसनीयता को बेहतर बनाना है।
UPSC ने साइबर सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए हैं?
तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हो गई है।
इसी वजह से UPSC ने आईटी ढांचे और साइबर सुरक्षा से जुड़ी आवश्यकताओं के लिए उच्च स्तरीय नेटवर्क समिति गठित की है।
यानी डिजिटल परीक्षा व्यवस्था के साथ आयोग अब बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और साइबर खतरों से निपटने को भी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर रहा है।
पदोन्नति के कामकाज को डिजिटल बनाने के लिए UPSC क्या कर रहा है?
UPSC का डिजिटल बदलाव केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है।
2026 में विभागीय पदोन्नति समिति यानी DPC से जुड़े काम को भी डिजिटल बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
लगभग 101 मंत्रालयों, विभागों और संगठनों से संबंधित DPC प्रस्तावों के लिए कागज रहित ऑनलाइन मंच विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
इससे भर्ती के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों के पदोन्नति से जुड़े प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी अधिक डिजिटल और व्यवस्थित बनाने का प्रयास दिखाई देता है।
भर्ती के अलावा पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों में UPSC की क्या भूमिका है?
UPSC की एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित भूमिका सरकारी अधिकारियों से जुड़े पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों में सलाह देने की भी है।
2023-24 में आयोग ने पदोन्नति से जुड़े 24,581 अधिकारियों के रिकॉर्ड पर प्रक्रिया पूरी की और 532 अधिकारियों को अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल करने के लिए प्रक्रिया पूरी की।
इससे स्पष्ट होता है कि UPSC की भूमिका केवल नए उम्मीदवारों की भर्ती तक सीमित नहीं है। आयोग सरकारी सेवाओं के करियर प्रबंधन, पदोन्नति और कुछ अनुशासनात्मक मामलों से जुड़े संवैधानिक परामर्श ढांचे का भी हिस्सा है।
30 सितंबर के ‘मंथन’ कार्यक्रम में क्या चर्चा हुई?
UPSC की शताब्दी समारोह केवल 1 अक्टूबर के प्रधानमंत्री कार्यक्रम तक सीमित नहीं थीं।
30 सितंबर 2026 को भारत मंडपम में ‘शताब्दी समारोह–मंथन’ आयोजित किया गया। इसमें सिविल सेवाओं की बदलती भूमिका, लोक प्रशासन में नवाचार और संवैधानिक मूल्यों जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। यह दो दिवसीय कार्यक्रम का पहला दिन था।
UPSC Chairman डॉ. अजय कुमार ने आयोग के अगले चरण के लिए तीन मार्गदर्शक सिद्धांत बताए:
विश्वास — पारदर्शिता — तकनीक
उन्होंने परीक्षा सुधारों के संदर्भ में योग्यता, निष्पक्षता और समान अवसर को केंद्रीय मूल्यों के रूप में रेखांकित किया।
UPSC शताब्दी समारोह में PM मोदी ने क्या जारी किया?
1 अक्टूबर को भारत मंडपम में UPSC के 100 साल पूरे होने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन महत्वपूर्ण स्मारक सामग्री जारी की:
- शताब्दी स्मारक सिक्का
UPSC की 100 वर्षों की संस्थागत यात्रा को चिह्नित करने के लिए विशेष शताब्दी स्मारक सिक्का जारी किया गया।
- स्मारक डाक टिकट
UPSC की शताब्दी के अवसर पर विशेष स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।
- ‘100 Landmark Judgements’ पुस्तक
प्रधानमंत्री ने ‘100 Landmark Judgements – Shaping the Policies of UPSC and Public Service Commissions in India’ नामक पुस्तक भी जारी की।
यह पुस्तक UPSC और लोक सेवा आयोगों की नीतियों एवं कामकाज को प्रभावित करने वाले 100 महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों को संकलित करती है।
UPSC का दो दिवसीय शताब्दी कार्यक्रम कैसे आयोजित हुआ?
UPSC की शताब्दी समारोह 30 सितंबर और 1 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित की गईं।
30 सितंबर को ‘शताब्दी समारोह–मंथन’ के तहत विभिन्न विषयों पर वक्ताओं के संबोधन और परिचर्चाएं हुईं।
1 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शताब्दी समारोह के मुख्य कार्यक्रम में हिस्सा लिया और सभा को संबोधित किया। आधिकारिक कार्यक्रम सुबह 11 बजे निर्धारित था।
इसमें राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद, UPSC के अधिकारी और अन्य संबंधित पक्ष शामिल हुए।
अगले 100 वर्षों में UPSC के सामने क्या चुनौतियां होंगी?
UPSC की 100 साल की यात्रा अब एक नए चरण में प्रवेश कर रही है।
1926 में एक सीमित सलाहकारी संस्था के रूप में शुरू हुई संस्था 1950 में संविधान के तहत स्वतंत्र संवैधानिक संस्था बनी और 2026 में अपनी शताब्दी पूरी कर चुकी है।
अब चुनौती सिर्फ लाखों उम्मीदवारों की परीक्षा कराने की नहीं है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डिजिटल पहचान, परीक्षा में अनियमितता, पहुंच, निजता और लोक प्रशासन की बदलती जरूरतें UPSC के सामने नई चुनौतियां लेकर आई हैं।
तकनीक परीक्षा को तेज और सुरक्षित बना सकती है, लेकिन इसके साथ डेटा सुरक्षा, निजता और निष्पक्षता जैसे सवाल भी जुड़े हैं।
इसीलिए UPSC के अगले चरण में विश्वास, पारदर्शिता और तकनीक के साथ-साथ योग्यता, निष्पक्षता और समान अवसर जैसे मूल्यों को बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
1926 से 2026 तक UPSC की प्रमुख घटनाएं क्या रहीं?

UPSC की शताब्दी से आगे का संदेश क्या है?
1926 में एक सीमित सलाहकारी निकाय से शुरू हुई UPSC की यात्रा 2026 में एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था तक पहुंच चुकी है।
इन 100 वर्षों में भारत का प्रशासनिक ढांचा बदला, परीक्षा प्रणाली बदली, उम्मीदवारों की सामाजिक भागीदारी बढ़ी और अब तकनीक ने भर्ती प्रक्रिया का स्वरूप बदलना शुरू कर दिया है।
भारत मंडपम में शताब्दी समारोह के दौरान PM मोदी ने इसी बदलती व्यवस्था पर जोर देते हुए भर्ती प्रक्रिया में समय की निश्चितता, तकनीक और दक्षता की जरूरत बताई। उन्होंने UPSC और राज्य लोक सेवा आयोगों के बीच बेहतर प्रक्रियाएं साझा करने तथा अंतरराष्ट्रीय भर्ती मॉडलों से सीखने की बात भी कही।
वहीं सिविल सेवाओं की भूमिका को केवल परीक्षा में हासिल किए गए ज्ञान तक सीमित न रखते हुए कर्तव्य, जिम्मेदारी और सेवा भावना से जोड़ने का संदेश दिया गया।
दूसरी तरफ UPSC अपने अगले चरण के लिए विश्वास, पारदर्शिता और तकनीक को मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में सामने रख रहा है।
अब अगले 100 वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि बदलती तकनीक और प्रशासनिक जरूरतों के साथ UPSC कितना आधुनिक होता है—और साथ ही योग्यता, निष्पक्षता, पारदर्शिता, सुरक्षा और समान अवसर जैसे मूल सिद्धांतों को किस तरह मजबूत बनाए रखता है।
एक सदी पहले शुरू हुई यह संस्था अब सिर्फ अपने इतिहास का जश्न नहीं मना रही, बल्कि भारत की आने वाली प्रशासनिक व्यवस्था की दिशा पर भी मंथन कर रही है।



