म्यांमार बॉर्डर से गुटखा फैक्ट्रियों तक ‘सुपारी सिंडिकेट’ का जाल, ईडी की 16 ठिकानों पर रेड

म्यांमार सीमा से कथित सुपारी तस्करी और ट्रकों की आवाजाही की प्रतीकात्मक तस्वीर
ईडी की जांच विदेशी मूल की सुपारी की सप्लाई चेन, दस्तावेजों और कथित धन प्रवाह पर केंद्रित है। यह प्रतिनिधि तस्वीर है।

फर्जी जीएसटी दस्तावेजों से सैकड़ों करोड़ का खेल; ट्रकों को बिना जांच निकालने के लिए ‘टोकन सिस्टम’ का भी खुलासा, सुपारी तस्करी से ज्यादा बड़ा है पैसे का खेल- फ्रंट कंपनियां, फर्जी जीएसटी बिल और ट्रकों के लिए ‘सिस्टम’ ईडी की जांच के केंद्र में

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
म्यांमार के रास्ते भारत में विदेशी मूल की सुपारी की तस्करी और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी के गुवाहाटी जोनल कार्यालय ने गुरुवार को असम और पश्चिम बंगाल में एक साथ 16 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। कार्रवाई ऐसे सिंडिकेट के खिलाफ है, जो इंडोनेशिया और थाईलैंड से आई सुपारी को म्यांमार के रास्ते मिजोरम में लाने, उसके बाद उसे देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने और इस पूरी सप्लाई चेन में फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल से धन को इधर-उधर करने में शामिल बताया जा रहा है।
ईडी के मुताबिक, तलाशी की कार्रवाई सिलिगुड़ी के ट्रांसपोर्टर धीरज घोष, उनके सहयोगियों बिनॉय बर्मन और संदीप बैद, गुवाहाटी की लॉजिस्टिक्स कंपनियों जय करणी ट्रेडिंग्स प्राइवेट लिमिटेड और पूर्वोत्तर एग्रो प्राइवेट लिमिटेड तथा कारोबारी नवरतन बैद समेत अन्य से जुड़े परिसरों पर की गई।

म्यांमार सीमा से शुरू होती है सप्लाई चेन

जांच एजेंसी के अनुसार, सिंडिकेट का मॉडल काफी संगठित था। इंडोनेशिया और थाईलैंड मूल की सुपारी को पहले म्यांमार के रास्ते मिजोरम में पहुंचाया जाता था। इसके बाद भारत में मौजूद कुछ स्थानीय लोगों को ऐसी कंपनियों का फ्रंट प्रोपराइटर बनाया जाता था, जिनके जरिए माल और पैसों की आवाजाही दिखाई जाती थी। इन कंपनियों के जरिए सैकड़ों करोड़ रुपये की रकम रूट की गई।
जांच का दायरा केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं है कि सुपारी सीमा पार से कैसे आई, बल्कि एजेंसी यह भी देख रही है कि इस कारोबार से पैदा होने वाले पैसे को किन कंपनियों, खातों और कारोबारी लेनदेन के जरिए वैध कारोबार जैसा दिखाया गया।

फर्जी जीएसटी से असली माल की ‘कागजी पहचान’ बदली जांच में सामने आए नेटवर्क का अगला चरण और अहम है। ईडी के मुताबिक, सीमा पार से आई सुपारी को फर्जी जीएसटी और परिवहन दस्तावेजों के सहारे देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता था। माल की अंतिम खेपें उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में मौजूद गुटखा और पान मसाला निर्माताओं तक पहुंचाई जाती थीं।
इस मॉडल में असली सवाल यह है कि यदि विदेशी मूल की सुपारी को कागजों पर किसी दूसरी जगह से आया हुआ माल दिखाया गया, तो उसकी वास्तविक उत्पत्ति और वास्तविक कारोबारी लेनदेन को ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। यही वह हिस्सा है, जिसकी मनी लॉन्ड्रिंग जांच में विशेष अहमियत है।

ट्रकों के लिए ‘टोकन सिस्टम’- हर महीने भारी भरकम वसूली

ईडी की जांच में सामने आया एक और गंभीर आरोप सिलिगुड़ी से संचालित बताए जा रहे नेटवर्क से जुड़ा है। एजेंसी के अनुसार, सिंडिकेट से जुड़े लोग ट्रक ऑपरेटरों से हर महीने भुगतान लेते थे। इसके बदले ट्रक चालकों को ऐसे टोकन दिए जाते थे, जिनके जरिए असम बॉर्डर से पश्चिम बंगाल और बिहार के रास्ते आगे बढ़ते समय उन्हें बिना जांच के निकलने की सुविधा मिलती थी। अगर जांच में यह आरोप दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों से पुष्ट होता है, तो यह मामला महज अवैध माल की आवाजाही से आगे बढ़कर एक समानांतर लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर के संचालन की ओर इशारा करेगा।

‘फ्रंट’ कंपनियां जांच के केंद्र में क्यों?

ईडी की कार्रवाई में गुवाहाटी की दो लॉजिस्टिक्स कंपनियों का नाम सामने आना महत्वपूर्ण है। उपलब्ध कॉरपोरेट रिकॉर्ड के मुताबिक पूर्वोत्तर एग्रो प्राइवेट लिमिटेड 2017 में गुवाहाटी में पंजीकृत कंपनी है और इसका कारोबार थोक व्यापार से जुड़ा दर्ज है। वहीं कॉरपोरेट रिकॉर्ड में जय करणी ट्रेडिंग्स प्राइवेट लिमिटेड का भी गुवाहाटी स्थित पता दर्ज है।
हालांकि, केवल किसी कंपनी का नाम ईडी की तलाशी में आना अपने आप में उस कंपनी या उसके निदेशकों के खिलाफ अपराध साबित नहीं करता। जांच एजेंसी को यह स्थापित करना होगा कि संबंधित कंपनियों का तस्करी और धन के लेनदेन में वास्तविक क्या रोल था।

सुपारी तस्करी पर पहले से एजेंसियों की नजर

ईडी की मौजूदा कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब पूर्वोत्तर में विदेशी मूल की सुपारी की कथित तस्करी के खिलाफ डीआरआई भी लगातार कार्रवाई कर रही है। 25 सितंबर 2026 को डीआरआई ने असम और मिजोरम में दो कार्रवाइयों के दौरान 1,25,680 किलोग्राम विदेशी मूल की सुपारी जब्त की थी। इसकी अनुमानित कीमत करीब 14 करोड़ रुपये बताई गई थी। प्रारंभिक जांच में माल के म्यांमार से भारत में आने की बात सामने आई थी।
इससे पहले मई 2026 में डीआरआई की गुवाहाटी जोनल यूनिट ने भी म्यांमार-मिजोरम सीमा के जरिए लाई गई करीब 60,000 किलोग्राम विदेशी मूल की सुपारी जब्त करने की जानकारी दी थी और पांच लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।
अगस्त 2026 में डीआरआई ने दक्षिण-पूर्व एशियाई मूल की सुपारी को कथित तौर पर बांग्लादेशी मूल का बताकर एसएएफटीए (South Asian Free Trade Area) के तहत रियायती शुल्क हासिल करने वाले एक अलग नेटवर्क का भी खुलासा किया था। उस मामले में संभावित राजस्व नुकसान 2,500 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया था।

असली जांच अब पैसे के पीछे जाएगी

ईडी की कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि एजेंसी इस पूरे नेटवर्क में ‘पैसा कहां से आया, किन खातों में गया और किसके पास पहुंचा’ का ट्रेल खंगाल सकती है।

जांच के संभावित प्रमुख बिंदु होंगे-

  • विदेशी सुपारी की वास्तविक खरीद और सीमा पार आवाजाही।
  • मिजोरम में माल प्राप्त करने वाले फ्रंट प्रोपराइटर।
  • फर्जी जीएसटी बिल और ई-वे बिल का नेटवर्क।
  • ट्रांसपोर्ट कंपनियों और ट्रकों की आवाजाही।
  • गुटखा एवं पान मसाला निर्माताओं तक पहुंची खेपों का रिकॉर्ड।
  • बैंक खातों में आने-जाने वाली रकम।
  • मासिक भुगतान और ‘टोकन सिस्टम’ से जुड़े लेनदेन।
  • सिंडिकेट की कमाई को वैध कारोबारी लेनदेन के रूप में दिखाने की कथित कोशिश।

सीमा से बाजार तक एक ही नेटवर्क की कई कड़ियां?

पूरे घटनाक्रम को एक साथ देखने पर नेटवर्क की तस्वीर चार स्तरों में उभरती है- म्यांमार सीमा से माल की एंट्री, मिजोरम में फ्रंट कंपनियों के जरिए कागजी कारोबार, पूर्वोत्तर से उत्तर भारत और महाराष्ट्र तक ट्रांसपोर्ट तथा अंत में गुटखा-पान मसाला उद्योग तक सप्लाई।
ईडी की मौजूदा तलाशी इसी कथित चेन की वित्तीय कड़ियों को खोलने की कोशिश मानी जा रही है।

फिलहाल ईडी की तलाशी से बरामद दस्तावेज, डिजिटल उपकरण, बैंकिंग रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्य सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सिंडिकेट का वास्तविक कारोबार कितना बड़ा था और सैकड़ों करोड़ रुपये की बताई जा रही धनराशि में से कितना पैसा अवैध गतिविधियों से जुड़ा था।