वंदे मातरम विवाद के बीच जानिए महात्मा गांधी ने हरिजन में क्या लिखा था

वंदे मातरम और महात्मा गांधी से जुड़ी ऐतिहासिक बहस
वंदे मातरम के गायन को लेकर 1937 और 1939 में महात्मा गांधी तथा कांग्रेस के रुख पर ऐतिहासिक बहस हुई थी। यह प्रतिनिधि तस्वीर है।

सुजीत ठाकुर, नई दिल्ली

वंदे मातरम विवाद और महात्मा गांधी

विवाद को लेकर हरिजन में क्या लिखा गांधी ने

राष्ट्र गीत वंदे मातरम को लेकर विवाद मचा हुआ है। भाजपा जहां संपूर्ण वंदे मातरम के गायन का हिमायत कर रही है वहीं कांग्रेस सिर्फ शुरूआती दो पैरा गाए जाने के पक्ष में है। कांग्रेस ने इसको लेकर सीडब्लूसी की बैठक में प्रस्ताव भी पारित किया था।

1937 में शुरुआती दो अंतरों पर बनी सहमति

यहां यह जानना दिलचस्प है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की राय वंदे मातरम को लेकर क्या थी। जब वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक ऊर्जावान प्रेरणा बन उभरा तो मुस्लिम लीग ने विरोध शुरू किया। उनका विरोध लगातार बढ़ता गया। बाद में 1937 में कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि इसके शुरूआती दो स्टैंजा ही गाए जाए। यह गांधीजी के सुझाव पर किया गया था। ऐसा जिन्ना और मुस्लिम लीग के विरोध को देखते हुए किया गया। हालांकि मुस्लिम लीग इन दो स्टैंजा के लिए भी राजी नहीं हो रहा था।

गांधी ने 1939 में मिश्रित सभाओं को लेकर क्या लिखा

बाद में जब दो स्टैंजा गायन का प्रस्ताव पारित हो गया लेकिन विवाद नहीं थमा। उन्होंने 1 जुलाई 1939 को हरिजन नामक पत्रिका में लिखा इसे गैदरिंग (भीड़ या समूह) में नहीं गाया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा “यह (वंदे मातरम) एक साम्राज्यवाद विरोधी पुकार थी…मेरे मन में कभी यह बात नहीं आई थी कि यह एक हिंदू गीत है या केवल हिंदुओं की है। दुर्भाग्यवश अब हमारे बुरे दिन आ गए हैं… मैं (महात्मा गांधी) किसी मिश्रित सभा में वंदे मातरम गाने को लेकर जरा सा भी विवाद मोल उठाने का जोखिम नहीं उठाऊंगा।”

दो अंतरों के बाद भी आपत्ति पर गांधी का रुख

महात्मा गांधी एंड द हार्मोनी ऑफ म्यूजिक नामक पुस्तक में टेरेजा जोसफ और एएम थॉमस लिखते हैं कि,”1जुलाई 1939 को लिखे लेख के एक महीने बाद गांधीजी ने फिर लिखा, यदि कांग्रेस द्वारा किए गए संशोधन (सिर्फ दो स्टैंजा गाना) के बाद भी मिश्रित सभा में वंदे मातरम गाने पर कोई आपत्ति करे तो उसका गायन छोड़ दिया जाना चाहिए।” मतलब साफ है कि महात्मा गांधी का स्पष्ट रूख था कि वंदे मातरम के पूर्ण या फिर आंशिक गायन पर कोई भी आपत्ति करे तो इसका गायन नहीं होना चाहिए। अलबत्ता गांधीजी के इस विचार से न तो कांग्रेस ने वंदे मातरम के शुरूआती दो स्टैंजा के गायन को कभी रोकने की वकालत की न ही हिंदूवादी दलों या विचार के लोगों ने इसके पूर्ण गायन को कांटने-छांटने पर अपनी हामी भरी।