
पालतू जानवरों के कारोबार की आड़ में बढ़ रही तस्करी; सिंगापुर और म्यांमार के रास्ते भारत तक पहुंच रहे पशु-पक्षी, सीबीआई और थाई एजेंसियां मिलकर करेंगी नेटवर्क की पड़ताल
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
दक्षिण-पूर्व एशिया से भारत तक जिंदा विदेशी पशु-पक्षियों की तस्करी का नेटवर्क जांच एजेंसियों के निशाने पर है। पालतू जानवरों के अवैध कारोबार के लिए हो रही इस तस्करी में कई देश और रास्ते शामिल हैं। इसे रोकने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और थाईलैंड की एजेंसियां अब सूचनाएं साझा कर तस्करी के नेटवर्क की कड़ियां जोड़ेंगी।
सीबीआई ने 2 सितंबर को नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय में भारत और थाईलैंड के बीच ‘जिंदा पशु तस्करी’ पर दो दिवसीय केस समन्वय बैठक आयोजित की, जो 3 सितंबर को भी जारी रहेगी। बैठक की मेजबानी सीबीआई ने इंटरपोल की पर्यावरण सुरक्षा उप-निदेशालय के सहयोग से की है।
इस बैठक में सिर्फ तस्करी की घटनाओं पर चर्चा नहीं चल रही, बल्कि तस्करी के रास्ते, विदेशी प्रजातियों की आवाजाही और अपराधी नेटवर्क द्वारा अपनाए जा रहे तरीकों की पड़ताल की जा रही है।
आखिर किन रास्तों से भारत पहुंच रहे विदेशी पशु-पक्षी?
सीबीआई के मुताबिक एशिया में जिंदा विदेशी पशु-पक्षियों की तस्करी का चलन बढ़ रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के बीच होने वाली इस तस्करी में थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया महत्वपूर्ण पड़ाव के तौर पर सामने आ रहे हैं। इन देशों से पशु-पक्षियों को दक्षिण एशियाई देशों तक पहुंचाया जाता है और सिंगापुर का इस्तेमाल एक पारगमन केंद्र के रूप में किया जाता है। जांच एजेंसियों के सामने आया एक प्रमुख रास्ता थाईलैंड से म्यांमार होते हुए भारत तक का है। एक पशु या पक्षी को उसके मूल स्थान से निकालने के बाद कई देशों और बिचौलियों के जरिए अंतिम खरीदार तक पहुंचाया जा सकता है।
पालतू जानवरों का कारोबार बना तस्करों का जरिया
विदेशी और दुर्लभ पशु-पक्षियों की मांग पालतू जानवरों के बाजार में तेजी से बढ़ रही है। इसी मांग का फायदा उठाकर संगठित गिरोह जिंदा जानवरों और पक्षियों को अवैध तरीके से एक देश से दूसरे देश ले जाते हैं। इस तरह की तस्करी सामान्य सामान की तस्करी से अलग है। जानवरों को जिंदा रखना, छिपाना, परिवहन करना और सीमा पार पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती है। इसी वजह से तस्कर कथित तौर पर कई स्तरों वाले नेटवर्क और अलग-अलग परिवहन मार्गों का इस्तेमाल करते हैं।
सीबीआई अब किन सवालों के जवाब तलाश रही?
दो दिवसीय बैठक में भारतीय और थाई अधिकारी मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर काम किया जा रहा है-
पहला- तस्करी का नेटवर्क: कौन लोग विदेशी पशु-पक्षियों की खरीद, परिवहन और बिक्री में शामिल हैं?
दूसरा- तस्करी के रास्ते: किन देशों और किन सीमा मार्गों से पशु-पक्षियों को भारत तक लाया जा रहा है?
तीसरा- तस्करी का तरीका: जानवरों को छिपाने, सीमा पार कराने और उनकी पहचान छिपाने के लिए कौन-कौन से तरीके अपना रहे हैं?
इसके अलावा दोनों देशों की एजेंसियां ऐसे लोगों की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए भी सूचनाओं का आदान-प्रदान करेंगी।
मामला सिर्फ वन्यजीव संरक्षण का नहीं, संगठित अपराध का भी
सीबीआई के विशेष निदेशक मनोज शशिधर ने बैठक का उद्घाटन करते हुए कहा कि जिंदा पशु-पक्षियों की तस्करी अब केवल वन्यजीव संरक्षण का मुद्दा नहीं रह गई है। यह तेजी से सीमा पार फैले संगठित अपराध का रूप ले रही है। उनके मुताबिक तस्करी में संगठित नेटवर्क, छिपाने के जटिल तरीके और कई स्तरों वाली परिवहन व्यवस्था का इस्तेमाल होता है। एक ही पशु या पक्षी को अंतिम गंतव्य तक पहुंचने से पहले कई बिचौलियों और रास्तों से गुजरना पड़ सकता है। यही कारण है कि किसी एक देश की एजेंसी के लिए पूरे नेटवर्क को पकड़ना मुश्किल होता है।
एक देश में तस्करी, दूसरे में बिक्री- इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग
अगर किसी दुर्लभ पशु या पक्षी को थाईलैंड से निकाला गया, म्यांमार के रास्ते भारत लाया गया और फिर किसी भारतीय शहर में बेचा गया, तो पूरी आपूर्ति श्रृंखला की जांच के लिए कम से कम तीन देशों की एजेंसियों के बीच समन्वय जरूरी हो जाता है। सीबीआई के मुताबिक यही इस बैठक का मूल उद्देश्य है। बैठक में यह भी जोर दिया गया कि यदि किसी वन्यजीव तस्करी मामले का आरोपी किसी दूसरे देश में छिपा है, तो उसके खिलाफ इंटरपोल की ओर से जारी रेड नोटिस जैसे अंतरराष्ट्रीय तंत्र का प्रभावी इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
भारत की कई एजेंसियां भी इंटरनेशनल बैठक में शामिल
थाईलैंड के अधिकारियों के अलावा भारत की कई एजेंसियां इस बैठक में हिस्सा ले रही हैं। इनमें वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो, राजस्व खुफिया निदेशालय, उत्तर प्रदेश विशेष कार्य बल, मध्य प्रदेश राज्य टाइगर स्ट्राइक फोर्स, ओडिशा के वन एवं पर्यावरण विभाग और सीबीआई के अधिकारी शामिल हैं। यह भागीदारी बताती है कि जिंदा विदेशी पशु-पक्षियों की तस्करी को अब केवल सीमा शुल्क या वन विभाग का मामला मानकर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे बहु-एजेंसी अपराध के रूप में जांचा जा रहा है।
सीबीआई पहले भी बना चुकी है अंतरराष्ट्रीय जांच का तंत्र
सीबीआई ने बताया कि वह राष्ट्रीय केंद्रीय ब्यूरो-नई दिल्ली के रूप में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव तस्करी के खिलाफ सहयोग कर रही है।
पिछले दो वर्षों में एजेंसी ने इंटरपोल के सहयोग से विभिन्न विदेशी न्याय क्षेत्रों को शामिल करते हुए दो क्षेत्रीय जांच और विश्लेषणात्मक मामलों की बैठकें आयोजित की हैं। मौजूदा भारत-थाईलैंड बैठक उसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने की कड़ी है।
सबसे बड़ी चुनौती: तस्करी के पूरे नेटवर्क तक पहुंचना
जिंदा पशु-पक्षियों की तस्करी में अक्सर केवल तस्कर ही नहीं, बल्कि खरीदार, बिचौलिए, परिवहनकर्ता और अंतिम विक्रेता तक कई स्तर जुड़े हो सकते हैं। इसलिए किसी एक खेप को पकड़ लेना पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। भारत और थाईलैंड के बीच शुरू हुई यह समन्वय प्रक्रिया अब यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि कहां से जानवर निकलते हैं, किन रास्तों से गुजरते हैं, कौन उन्हें सीमा पार कराता है और भारत में पहुंचने के बाद उनका नेटवर्क किस तरह काम करता है। यही जानकारी इस बढ़ते अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी नेटवर्क की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है।



